Friday, April 7, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में सुरेश भसीन को मिली अप्रत्याशित जीत ने डिस्ट्रिक्ट के राजनीतिक ठेकेदार बनने की कोशिश करने वाले रवि चौधरी और विनय भाटिया को तगड़ा झटका दिया

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट रवि चौधरी और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी विनय भाटिया ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति का ठेकेदार बनने का प्रयास तो खूब किया, लेकिन डिस्ट्रिक्ट के क्लब्स के पदाधिकारियों ने उन्हें ऐसी धूल चटाई है कि उसका स्वाद उन्हें कई दिनों तक याद रहेगा सुरेश भसीन की चुनावी जीत को लोग भले ही उनकी किस्मत के उपहार के रूप में देख/बता रहे हों, लेकिन किस्मत के इस उपहार को पाने लायक बनने के लिए उन्होंने जो समर्थन प्राप्त किया - वह डिस्ट्रिक्ट के तमाम राजनीतिक चौधरियों के लिए एक बड़ा सबक है । वोटों की गिनती के अंतिम चरण में सुरेश भसीन से दो वोटों से पिछड़ जाने वाले अनूप मित्तल को लोगों का जो समर्थन मिला, उसने डिस्ट्रिक्ट के राजनीतिक चौधरियों को मिले सबक को और गहरा कर दिया है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट के राजनीतिक चौधरियों ने सुरेश भसीन की उम्मीदवारी को तो कोई तवज्जो नहीं दी हुई थे, किंतु अनूप मित्तल की सक्रियता ने उन्हें जरूर परेशान करने के साथ-साथ डराया हुआ था -  इसलिए अनूप मित्तल की उम्मीदवारी को वापस कराने/करवाने से लेकर उन्हें चुनाव हरवाने के लिए चौधरियों ने सारे घोड़े खोले हुए थे । रवि चौधरी और विनय भाटिया ने चौधरियों का भी चौधरी बनने की कोशिश में कमान अपने हाथ में ले ली थी, और चौधरियों के उम्मीदवार के रूप में संजीव राय मेहरा को चुनाव जितवाने के लिए वह जैसी जो घटिया हरकत कर सकते थे, वह उन्होंने की । इसके बावजूद डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में वह संजीव राय मेहरा को अमरजीत सिंह, अतुल गुप्ता और रवि दयाल से ही आगे कर पाए - अनूप मित्तल तथा सुरेश भसीन से वह पीछे ही रह गए
चुनावी नतीजों में सबसे बुरी स्थिति अमरजीत सिंह की रही - उन्हें अपने क्लब के वोट भी नहीं मिले । पहली वरीयता के वोटों की गिनती में अतुल गुप्ता को 3, रवि दयाल को 23, सुरेश भसीन को 29, संजीव राय मेहरा को 30, अनूप मित्तल को सबसे ज्यादा 37 वोट मिले । अतुल गुप्ता और रवि दयाल के मुकाबले से बाहर होने के बाद उन्हें मिले अन्य वरीयताओं के वोटों के बँटवारे के साथ संजीव राय मेहरा के वोटों की गिनती 35, सुरेश भसीन के वोटों की गिनती 38 और अनूप मित्तल के वोटों की गिनती 47 हो गई । इस तरह डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के चौधरियों के उम्मीदवार संजीव राय मेहरा चौथे चरण की गिनती में मुकाबले से बाहर हो गए । संजीव राय मेहरा को मिले अन्य वरीयताओं के वोटों की गिनती में पोल खुली कि उन्हें चुनाव जितवाने में लगे डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के चौधरियों की सोच कितनी घटिया थी और उन्होंने कैसे कैसे हथकंडे अपनाए थे । दरअसल संजीव राय मेहरा को मिले वोटों में हैरान कर देने वाला तथ्य यह पाया गया कि 35 में से 22 लोगों ने दूसरी वरीयता का वोट ही नहीं दिया था । अनुमान यह लगाया जा रहा है कि चौधरियों ने अपने 'आदमियों' को दूसरी वरीयताओं के वोट न देने की हिदायत दी होगी ।  इस हिदायत के पीछे उनका उद्देश्य क्या रहा होगा, यह तो वही जानें - लेकिन इतनी बड़ी संख्या में क्लब-अध्यक्षों का दूसरी वरीयताओं का वोट न देना डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में नासमझी और टुच्चेपन के तत्वों के होने का तथ्य तो प्रस्तुत करता ही है
संजीव राय मेहरा को मिले 35 वोटों में से 22 ने भले ही दूसरी वरीयताओं के वोट नहीं दिए, लेकिन बाकी 13 ने दूसरी वरीयताओं के वोट दिए - और उनका बँटवारा सुरेश भसीन के लिए चकित करने वाला उपहार बन कर आया । पहले चरण की गिनती में तीसरे नंबर पर रहने वाले सुरेश भसीन चौथे चरण तक आते आते दूसरे नंबर पर तो आ गए थे, किंतु शुरू से ही पहले नंबर पर चल रहे अनूप मित्तल से वह अभी भी 9 वोट से पीछे थे । संजीव राय मेहरा के 13 वोटों के दूसरी वरीयताओं के वोटों में सुरेश भसीन ने 12 वोट पाकर लेकिन ऊँची छलाँग लगाई और अपने वोटों की संख्या को वह 50 पर ले गए । अनूप मित्तल को एक ही वोट मिला और उनके कुल वोटों संख्या 48 ही रह गई वोटों की गिनती के अंतिम चरण में यह जो अप्रत्याशित चमत्कार हुआ, उसे भले ही किस्मत की बात कहा जा रहा हो - लेकिन इससे भी अंततः वही बात सच साबित हुई है जो सयानों ने कही है कि किस्मत भी उसी का साथ देती है, जो खुद प्रयत्न करता है । सुरेश भसीन पिछले कई वर्षों से लगातार उम्मीदवार हो रहे थे, और हार रहे थे - और बुरी तरह हार रहे थे । तमाम सक्रियता के बावजूद डिस्ट्रिक्ट के चौधरियों तथा अन्य नेताओं के बीच उनकी उम्मीदवारी के प्रति स्वीकार्यता का भाव नहीं बनता दिख रहा था । लेकिन फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी थी, और वह लगातार अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का प्रयत्न करते रहे । उनकी चुनावी जीत साबित करती है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के चौधरियों और नेताओं की मदद के बिना भी लोगों का समर्थन जुटाया जा सकता है ।
डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के चौधरियों और नेताओं को असली चोट लेकिन अनूप मित्तल से लगी है । अनूप मित्तल चुनाव से करीब दो-ढाई महीने पहले ही अचानक से उम्मीदवार बने थे । वह जिस अचानक तरीके से उम्मीदवार बने थे, उससे डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के चौधरियों को तगड़ा झटका लगा था - और प्रायः सभी चौधरी उनकी उम्मीदवारी की खिलाफत में जुट गए थे । कुछेक चौधरियों ने कोशिश की कि वह अनूप मित्तल को अपनी उम्मीदवारी वापस लेने के लिए राजी कर लें - लेकिन अनूप मित्तल उन्हें जब उनकी बात सुनते/मानते नहीं दिखे तो उन्होंने अनूप मित्तल के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया । रवि चौधरी और विनय भाटिया का इस्तेमाल करते हुए, उनके जरिए अनूप मित्तल की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने के जो प्रयास किए गए - वह घटिया राजनीति के विलक्षण उदाहरण हैं इसके बावजूद, वोटों की गिनती के अंतिम चरण में अप्रत्याशित रूप से अनूप मित्तल पिछड़ भले ही गए - लेकिन उन्होंने जिस तरह का समर्थन प्राप्त किया, वह डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के चौधरियों के लिए तगड़ा झटका तो है ही ।

Thursday, April 6, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू में गुरचरण सिंह भोला की दिल्ली में हुई मीटिंग में दिल्ली के करीब 80 प्रतिशत वोटरों की उपस्थिति ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनावी परिदृश्य को खासा दिलचस्प बनाया

नई दिल्ली । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत गुरचरण सिंह भोला की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने और दिखाने के उद्देश्य से दिल्ली में हुई मीटिंग में दिल्ली के 30 से अधिक क्लब्स के पदाधिकारियों तथा प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने प्रतिद्धंद्धी खेमे के नेताओं के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है प्रतिद्धंद्धी खेमे के नेता अपने उम्मीदवार यशपाल अरोड़ा की जीत के दावे तो हालाँकि अभी भी कर रहे हैं, लेकिन यशपाल अरोड़ा के कई समर्थक यह भी मानने और कहने लगे हैं कि जीत को लेकर अति-विश्वास कहीं यशपाल अरोड़ा और उनके नेताओं के लिए आत्मघाती साबित न हो जाए । यशपाल अरोड़ा के ही कई समर्थकों और शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि गुरचरण सिंह भोला ने जिस रफ्तार के साथ लोगों के बीच अपनी पैठ बनाई है और अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन जुटाया है, उसे यशपाल अरोड़ा और उनके नेताओं को एक खतरे के रूप में देखना चाहिए और अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना चाहिए । चुनाव से दस दिन पहले, जबकि उम्मीदवारों के पक्ष-विपक्ष में ध्रुवीकरण हो चुका माना/समझा जाता है और समर्थकों व शुभचिंतकों के बीच विभाजक रेखा खिंच चुकी होती है - तब किसी एक उम्मीदवार की मीटिंग में 80 प्रतिशत मतदाताओं की उपस्थिति चुनावी हवा का संकेत देने का काम तो करती ही है । यह सच है कि 'हवा' नतीजा नहीं होती है, किंतु वह नतीजे को प्रभावित करने का काम तो करती ही है ।
गुरचरण सिंह भोला की उम्मीदवारी के समर्थन में हुई मीटिंग में दिल्ली के 30 से अधिक क्लब्स के पदाधिकारियों व प्रतिनिधियों की उपस्थिति को हालाँकि यशपाल अरोड़ा के समर्थक नेता 'खास बात' न मानते हुए यह तर्क दे रहे हैं कि मीटिंग में कुछ लोग लोकलाज में तो कुछ लोग खाने-पीने के लालच में आ ही जाते हैं, और यह जरूरी नहीं है कि मीटिंग में आने वाले लोग वोट भी दें । सिद्धांततः और व्यावहारिक रूप से यह तर्क अपनी जगह सही है, लेकिन फिर भी मीटिंग्स में लोगों की उपस्थिति से लोगों के मूड का पता तो चलता ही है । चुनाव से ऐन पहले लोगों का बदलता मूड चुनावी नतीजे पर असर करता भी है । दरअसल इसीलिए गुरचरण सिंह भोला की उम्मीदवारी के समर्थन में दिल्ली में हुई मीटिंग में दिल्ली के 30 से अधिक क्लब्स के साथ-साथ सोनीपत, समालखा और गन्नौर के क्लब्स के पदाधिकारियों व प्रतिनिधियों की उपस्थिति गुरचरण सिंह भोला की उम्मीदवारी के पक्ष में माहौल बनाने का काम तो करती ही है । गुरचरण सिंह भोला और उनके समर्थक नेता इस माहौल को वोटों में बदलने का काम कर पाते हैं या नहीं - चुनावी नतीजा इस पर निर्भर करेगा ।
डिस्ट्रिक्ट में जो लोग पहले गुरचरण सिंह भोला को गंभीरता से नहीं ले रहे थे, लेकिन अब उनके समर्थक और शुभचिंतक के रूप में देखे/पहचाने जा रहे हैं, उनका कहना है कि गुरचरण सिंह भोला की उम्मीदवारी के समर्थन में दिल्ली में हुई मीटिंग में दिल्ली के करीब 80 प्रतिशत वोटरों का जुटना लोकलाज या खाने-पीने के लालच के चलते ही नहीं हुआ है, बल्कि गुरचरण सिंह भोला ने लायनिज्म के कामकाज के प्रति जो व्यवहार दिखाया है - उसकी प्रतिक्रिया है । गुरचरण सिंह भोला ने हाल ही के दिनों में जिस तरह से कई एक प्रोजेक्ट्स में दिलचस्पी दिखाई और जिस तत्परता के साथ उन्हें पूरा किया, उससे डिस्ट्रिक्ट में लोग प्रभावित हुए हैं । मजे की बात यह रही है कि गुरचरण सिंह भोला ने जब कुछेक प्रोजेक्ट्स में दिलचस्पी दिखाई थी और उन्हें पूरा करने को लेकर कमिटमेंट की थी, तब कुछेक लोगों ने उलाहने के साथ कहा था कि लोग कमिटमेंट तो कर लेते/देते हैं, लेकिन उसे पूरा नहीं करते हैं । गुरचरण सिंह भोला ने लेकिन जिस तरह से निर्धारित समय में अपने सभी कमिटमेंट पूरे किए, उसने डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच उनके बारे में सकारात्मक पहचान बनाने का काम किया । डिस्ट्रिक्ट में अपने काम और अपने व्यवहार से गुरचरण सिंह भोला ने जिस तरह से लोगों को प्रभावित किया और उनके बीच अपनी सकारात्मक पहचान बनाई है, वास्तव में उसी का नतीजा है कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में दिल्ली में हुई मीटिंग में दिल्ली और आसपास के करीब 80 प्रतिशत वोटों का प्रतिनिधित्व करने वाले क्लब्स शामिल हुए ।
गुरचरण सिंह भोला की उम्मीदवारी के समर्थन में होने वाली मीटिंग में दिल्ली के क्लब्स के पदाधिकारियों व प्रतिनिधियों की यह उत्साहवर्धक उपस्थिति इसलिए भी उल्लेखनीय देखी/मानी जा रही है, कि तीनों सत्ताधारी गवर्नर्स उनके साथ नहीं हैं - और जिन जेपी सिंह के उम्मीदवार के रूप में उन्हें देखा/पहचाना जा रहा है, डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच उनकी बड़ी बदनामी है । तमाम प्रतिकूल स्थितियों के बावजूद गुरचरण सिंह भोला ने अपनी उम्मीदवारी के प्रति डिस्ट्रिक्ट के लोगों का रुझान और समर्थन जिस तरह जुटाया है - दिल्ली में उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में हुई मीटिंग में जुटी लोगों की भारी भीड़ से जिसका साक्ष्य भी देखने को मिला है, उसने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनावी परिदृश्य को खासा दिलचस्प बना दिया है ।

Wednesday, April 5, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 - यानि राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मनप्रीत सिंह की पत्नी पूनम सिंह की अचानक से प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने दूसरे उम्मीदवारों के चुनावी समीकरणों को गड़बड़ाने का काम तो कर ही दिया है

चंडीगढ़ । वर्ष 2018-19 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अचानक से प्रस्तुत हुई पूनम सिंह की उम्मीदवारी ने एक विवाद को जन्म देने के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के समीकरणों को नए सिरे से संयोजित होने की स्थितियाँ भी बनाई हैं । विवाद का कारण यह  आरोप बना है कि पूनम सिंह की उम्मीदवारी के जरिए राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू के नजदीकियों ने एक बार फिर रोटरी के नियमों तथा उसके आदर्शों के साथ खिलवाड़ शुरू कर दिया है । पूनम सिंह पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मनप्रीत सिंह की पत्नी हैं, और मौजूदा रोटरी वर्ष में असिस्टेंट गवर्नर के पद पर हैं । डिस्ट्रिक्ट बाइलॉज के अनुसार, असिस्टेंट गवर्नर के पद पर होने के कारण वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार नहीं हो सकती हैं । आरोप के अनुसार, पूनम सिंह यदि एक सामान्य रोटेरियन होतीं, तो उन्हें डिस्ट्रिक्ट बाइलॉज पढ़ा दिया जाता और उन्हें उम्मीदवार नहीं बनने दिया जाता - पूनम सिंह लेकिन एक सामान्य रोटेरियन नहीं हैं; वह पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मनप्रीत सिंह की पत्नी हैं, उन मनप्रीत सिंह की - जो राजा साबू के बड़े खास लोगों में हैं : इसलिए डिस्ट्रिक्ट बाइलॉज को अनदेखा करते हुए पूनम सिंह की उम्मीदवारी को स्वीकृति दे दी गई है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा का कहना लेकिन यह है कि वर्ष 2018-19 के गवर्नर के लिए होने वाला चुनाव रोटरी इंटरनेशनल की एक विशेष घोषणा के तहत हो रहा है, जो डिस्ट्रिक्ट बाइलॉज की बंदिश से अलग है; तथा व्यावहारिक कारणों से भी जिसे डिस्ट्रिक्ट बाइलॉज के अनुसार नहीं करवाया जा सकता है । रमन अनेजा का कहना है कि उन्होंने रोटरी इंटरनेशनल से भी पूछ लिया है कि पूनम सिंह का स्टेटस ऐसा ऐसा है, वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार हो सकती हैं या नहीं ? रोटरी इंटरनेशनल के नियमों के अनुसार, पूनम सिंह उम्मीदवार होने की पात्रता रखती हैं - इसलिए वहाँ से स्पष्ट जबाव आ गया कि हाँ, वह उम्मीदवार हो सकती हैं । रमन अनेजा का कहना है कि रोटरी इंटरनेशनल से हरी झंडी मिलने के बाद ही वर्ष 2018-19 के लिए पूनम सिंह की उम्मीदवारी को मान्य किया गया है ।
पूनम सिंह की उम्मीदवारी पर सवाल उठाने वाले लोगों का कहना लेकिन यह है कि बात सिर्फ नियम-कानूनों की नहीं है, डिस्ट्रिक्ट में - राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में अपनाए गए ऊँचे आदर्शों का पालन करने की भी है । उनका तर्क है कि डिस्ट्रिक्ट बाइलॉज बनाए ही इसलिए गए हैं, ताकि रोटरी में डिस्ट्रिक्ट की एक विशेष पहचान बनाई जा सके । यह ठीक है कि वर्ष 2018-19 के गवर्नर के लिए होने वाला चुनाव एक विशेष चुनाव है, जिसमें व्यावहारिक रूप में डिस्ट्रिक्ट बाइलॉज के नियमों का पूरी तरह पालन नहीं किया जा सकता है - लेकिन इसका मतलब यह कहाँ है कि डिस्ट्रिक्ट बाइलॉज की जो मुख्य बातें हैं - जो डिस्ट्रिक्ट की विशेष पहचान बनाने के लिए तय की गईं थीं, उनका भी पालन न किया जाए । डिस्ट्रिक्ट में कई लोगों का मानना और कहना है कि कम से कम डिस्ट्रिक्ट के बड़े नेताओं व पदाधिकारियों से तो यह उम्मीद की ही जाती है कि डिस्ट्रिक्ट बाइलॉज के जरिए जिन चीजों/बातों को रोकने की कोशिश की गई है, वह 'चोर-दरवाजों' से उन्हें करने का प्रयास न करें । इस तरह की बातों और आलोचनाओं से बेपरवाह बने पूनम सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं का कहना है कि चुनावी राजनीति में इस तरह की बातें होती ही हैं और तरह तरह के आरोप लगते ही हैं; पूनम सिंह की उम्मीदवारी रोटरी के किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं करती है, और रोटरी इंटरनेशनल के संबद्ध पदाधिकारियों से व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही पूनम सिंह की उम्मीदवारी को प्रस्तुत किया गया है - इसके बाद भी कुछेक लोग उनकी उम्मीदवारी पर विवाद खड़ा कर रहे हैं, तो यह दूसरे उम्मीदवारों के नजदीकी लोग हैं जो दरअसल पूनम सिंह की उम्मीदवारी प्रस्तुत होने के कारण अपने अपने उम्मीदवारों की स्थिति पर पड़ने वाले प्रतिकूल असर से घबराए हुए हैं ।
पूनम सिंह की अचानक से प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने वर्ष 2018-19 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत किए बैठे दूसरे उम्मीदवारों के चुनावी समीकरणों को गड़बड़ाने का काम तो वास्तव में किया ही है । पूनम सिंह की उम्मीदवारी ने एक तरफ सत्ता खेमे का एकजुट समर्थन मिलने की उम्मीद कर रहे डॉक्टर सुधीर चौधरी, प्रदीप अग्रवाल, कपिल गुप्ता की संभावनाओं और उम्मीदों को चोट पहुँचाई है; तो दूसरी तरफ सत्ता खेमे में बिखराव के भरोसे अपनी नैय्या पार होने के प्रति आश्वस्त बैठे रमेश बजाज के लिए चुनौती बढ़ा दी है - और उनके लिए चुनावी मुकाबले को थोड़ा मुश्किल बना दिया है । असिस्टेंट गवर्नर के रूप में पूनम सिंह की डिस्ट्रिक्ट में प्रभावी सक्रियता रही है, जिस कारण क्लब्स के प्रेसीडेंट के बीच उनकी अच्छी पहचान और पैठ है - जबकि दूसरे उम्मीदवारों को अभी क्लब्स के प्रेसीडेंट्स से परिचित होने का काम ही करना है; यह बात उन्हें दूसरे उम्मीदवारों के मुकाबले बढ़त दिलाती है । असिस्टेंट गवर्नर होने के नाते पूनम सिंह को दूसरे असिस्टेंट गवर्नर्स की भी मदद मिल सकती है, जो अपने अपने जोन में उनके लिए समर्थन जुटाने का काम कर सकते हैं ।
पूनम सिंह को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में मनप्रीत सिंह की पहचान और सक्रियता का फायदा भी मिल सकता है । उनके क्लब के वरिष्ठ सदस्य, दूसरे पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेपीएस सिबिया अगले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर होने के नाते उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने में मददगार हो सकते हैं । उल्लेखनीय है कि किसी भी वर्ष के क्लब-प्रेसीडेंट्स की अवॉर्ड और अगले रोटरी वर्ष की डिस्ट्रिक्ट टीम में जगह पर नजर होती है - और यह दोनों 'चीजें' ऑफर करने की स्थिति में पूनम सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेता सक्षम हैं - इसलिए उनकी उम्मीदवारी एक मजबूत आधार पर खड़ी दिखती है । पूनम सिंह की उम्मीदवारी के सामने हालाँकि चुनौती भी कम नहीं है । उनकी जीत डिस्ट्रिक्ट के सत्ता समीकरणों में मनप्रीत सिंह और जेपीएस सिबिया की स्थिति को मजबूत बनाने का काम करेगी - जो मधुकर मल्होत्रा, शाजु पीटर व यशपाल दास जैसे पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को स्वीकार नहीं होगी । जेपीएस सिबिया के अगले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर हो जाने से मधुकर मल्होत्रा पहले से ही चिढ़े बैठे हैं, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद उन्हें मिलेगा । ऐसे में, इन लोगों के पूनम सिंह की उम्मीदवारी के खिलाफ सक्रिय होने की पूरी पूरी संभावना है । सत्ता खेमे के नेताओं की आपसी होड़ के कारण हो सकने वाले नुकसान से बचना पूनम सिंह के लिए बड़ी चुनौती होगी, और उनकी इस चुनौती में ही दूसरे उम्मीदवारों को अपनी अपनी कामयाबी का रास्ता निकलता नजर आ रहा है । चुनावी परिदृश्य और साफ होने में अभी कुछ दिन और इंतजार करना पड़ेगा, लेकिन पूनम सिंह की अचानक से प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने चुनावी परिदृश्य को दिलचस्प अभी से बना दिया है ।

Tuesday, April 4, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इंदरजीत सिंह के खिलाफ झूठा अभियान चलाना/चलवाना जेपी सिंह को खासा भारी पड़ा है

नई दिल्ली । जेपी सिंह और उनके बड़बोले व मूर्ख साथियों के फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इंदरजीत सिंह के खिलाफ चलाए गए अभियान में खुद ही फँस जाने से उक्त मुद्दे पर अब उनके सामने लोगों से मुँह छिपाने की जो नौबत आ गई है, उसने जेपी सिंह के लिए मुसीबतों को और बढ़ा दिया है । जेपी सिंह के खिलाफ जो नए आरोप सामने आए हैं, उसमें शान ट्रैवल्स को भी चपेट में ले लिया गया है, जिसके चलते जेपी सिह की दबी-छिपी कारगुजारियाँ भी बेनकाब होने लगी हैं । नए आरोपों से घबराए जेपी सिंह और उनके साथियों ने अपने को बचाने के लिए तर्क देना शुरू किया है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में व्यक्तिगत आरोपों को नहीं उछालना चाहिए । इस पर उन्हें सुनने को मिल रहा है कि इंदरजीत सिंह के खिलाफ जब झूठे आरोप लगाकर हमला किया जा रहा था, तब उन्हें यह अक्ल क्यों नहीं आई थी ? अब जब जेपी सिंह पर सच्चे आरोप लग रहे हैं तो उन्हें याद आया कि व्यक्तिगत आरोप नहीं लगाने चाहिए - और इसमें व्यक्तिगत क्या है ? जेपी सिंह ने लायन पदाधिकारी के रूप में जो घपलेबाजियाँ की हैं, उनकी बात करना और उन पर सवाल उठाना व्यक्तिगत कैसे हो गया ? जेपी सिंह के नजदीकियों और शुभचिंतकों को ही लगता है और वह कहते हैं कि जेपी सिंह अपनी और अपने समर्थकों की उदंड व बदतमीजीपूर्ण हरकतों के चलते बदनामी के जिस दलदल में फँसते जा रहे हैं, वह उनके राजनीतिक भविष्य के लिए अच्छा नहीं है । जेपी सिंह लायनिज्म में अपने लिए जो बड़ी भूमिका देख रहे हैं और उसे पाने के लिए प्रयत्नशील हैं, उसमें उनकी बदनामी भी रोड़ा अटका सकती है ।
जेपी सिंह लायनिज्म में जिस ऊँची उड़ान पर हैं, उसमें विरोधियों का बनना और सक्रिय होना स्वाभाविक ही है - सयानों ने कहा है कि जिसे ऊँची उड़ान भरनी हो, उसकी पहली जरूरत है कि वह अपने विरोधियों की संख्या को न बढ़ने दे तथा उनकी सक्रियता को नियंत्रित करने के उपाय करे; जेपी सिंह ने लेकिन उलटी ही राह पकड़ी है । अपनी हरकतों और अपने रवैये से वह विरोधियों की संख्या में तो इजाफा कर ही रहे हैं, उन्हें भड़का कर आक्रामक और बना रहे हैं । जेपी सिंह के शह पाकर उनके समर्थक उनसे चार कदम और आगे हैं - जिसका नतीजा है कि जेपी सिंह रोज नई मुसीबतों में फँस जा रहे हैं । इंदरजीत सिंह के मामले में तो यह हुआ कि बिना बात के जेपी सिंह और उनके साथियों ने मुसीबत आमंत्रित कर ली । यह भी तब हुआ जब जेपी सिंह और उनके साथी पिछले वर्ष हुई जेपी सिंह की फजीहत के लिए प्रमुख रूप से इंदरजीत सिंह को ही जिम्मेदार मानते और ठहराते हैं । यदि यह बात सच है, और पिछले वर्ष हुई जेपी सिंह की फजीहत के लिए वास्तव में इंदरजीत सिंह ही प्रमुख रूप से जिम्मेदार थे - तो जेपी सिंह के लिए अक्लमंदी की बात यह होती कि वह इंदरजीत सिंह के साथ अपने झगड़े को बढ़ाने की बजाए कम करने का प्रयास करें । जेपी सिंह के नजदीकियों ने इन पँक्तियों के लेखक को बताया है कि जेपी सिंह ने इसके लिए प्रयास किए थे, और इस बाबत उन्होंने अपनी पत्नी की भी मदद ली थी - जिन्होंने इंदरजीत सिंह की पत्नी के जरिए इंदरजीत सिंह को जेपी सिंह के करीब लाने की कोशिश की थी । जेपी सिंह की कोशिशों के कारण ही डिस्ट्रिक्ट में कुछेक लोगों को लगने भी लगा था कि इंदरजीत सिंह पहले की ही तरह जेपी सिंह के साथ फिर आ मिलेंगे । डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच इस तरह की चर्चा जोर पकड़ ही रही थी कि दृश्य बदला और जेपी सिंह व इंदरजीत सिंह के बीच दूरियाँ कम होने की बजाए बढ़ती हुई देखी जाने लगीं ।
जेपी सिंह के नजदीकियों के अनुसार ही, बनते-बनते बिगड़ गई बात के लिए खुद जेपी सिंह ही जिम्मेदार हैं । दरअसल, उस दौरान विनय गर्ग से निपटने के लिए जेपी सिंह ने इंदरजीत सिंह को ही इस्तेमाल करना शुरू कर दिया । अपनी पत्नी और इंदरजीत सिंह की पत्नी के बीच की सामान्य-सी बातों को इस्तेमाल करते हुए जेपी सिंह ने विनय गर्ग और इंदरजीत सिंह के बीच फूट डालने तथा सत्ता खेमे के लोगों के बीच इंदरजीत सिंह को बदनाम करने की कोशिश की । तब इंदरजीत सिंह को भी समझने में देर नहीं लगी कि जेपी सिंह उनके साथ संबंध सुधारना नहीं चाहते हैं, बल्कि उन्हें सिर्फ इस्तेमाल करना चाहते हैं । इंदरजीत सिंह जब उनकी चाल में नहीं फँसे, तो जेपी सिंह तरह तरह से इंदरजीत सिंह को फँसाने और बदनाम करने के मौकों की तलाश में जुट गए । इस काम के लिए उनकी तड़प ऐसी रही कि प्रोमिला घई की दोहरी सदस्यता के चक्कर में इंदरजीत सिंह का क्लब - लायंस क्लब दिल्ली मेरिडियन जब स्टेटस-को घोषित हुआ, तो जेपी सिंह मामले को बिना जाने-समझे अपने साथियों सहित इंदरजीत सिंह पर टूट पड़े । इन्होंने लोगों के बीच झूठ प्रचारित किया कि ड्यूज न देने के कारण इंदरजीत सिंह का क्लब स्टेटस-को में गया है । डिस्ट्रिक्ट और लायनिज्म के लिए सबसे ज्यादा शर्म की बात यह रही कि पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर विनोद खन्ना तक इस झूठे प्रचार में शामिल हुए । लेकिन जब सच्चाई सामने आई, तो इन्हें साँप सूँघ गया । अब इंदरजीत सिंह माँग कर रहे हैं कि उनके और उनके क्लब के बारे में झूठ फैलाने वाले लोग डिस्ट्रिक्ट के लोगों से माफी माँगे ।
जेपी सिंह और उनके साथियों का रवैया यह है कि झूठे आरोप लगाओ और भाग जाओ - ऐसे में, माफी कौन माँगे ? इंदरजीत सिंह और उनके क्लब को बदनाम करने के लिए लगाए गए झूठे आरोपों पर जेपी सिंह और उनके साथी माफी माँगने से भले ही बच रहे हों, लेकिन इस मामले को लेकर लोगों के बीच उनकी फजीहत खूब हो रही है । इस मामले के चलते लोगों का गुस्सा इतना भड़का हुआ है कि जेपी सिंह पर नए नए आरोपों की बौछार होने लगी है । जेपी सिंह पर नया आरोप यह लगा है कि जेपी सिंह शान ट्रैवल्स के साथ मिल कर लायन सदस्यों तथा पदाधिकारियों के कार्यक्रमों के नाम पर विदेशी टूर आयोजित करते हैं, और उससे पैसा बनाते/कमाते हैं । इस आरोप ने जेपी सिंह और उनके साथियों को बुरी तरह तिलमिला दिया है । तिलमिलाहट में इस आरोप का सीधा जबाव देने की बजाए उनकी तरफ से तर्क किया जा रहा है कि लायन राजनीति में व्यक्तिगत आरोप नहीं लगाना चाहिए । आरोप लगाने वाले लोगों का कहना लेकिन यह है कि इस आरोप में व्यक्तिगत क्या है ? लायन पदाधिकारी के रूप में लायनिज्म के आयोजनों को जेपी सिंह ने यदि धंधा बनाया हुआ है, तो इस बारे में आरोप व्यक्तिगत कैसे हुए ? डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति जिस तरह से दिन-पर-दिन तीखी होती जा रही है, उसमें जेपी सिंह के लिए मुसीबत लगातार बढ़ती जा रही है । ऐसे में, बात सिर्फ चुनावी जीत-हार की ही नहीं रह गई है - जेपी सिंह के खिलाफ जिस तरह से नाराजगी बढ़ रही है और संगठित तथा आक्रामक हो रही है, उसे जेपी सिंह की भविष्य की राजनीति के लिए बड़े खतरे और फजीहत के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है ।

Sunday, April 2, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स प्रशासन फर्जीवाड़ा करने वाले राधेश्याम बंसल और एसके गुप्ता जैसे चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सामने असहाय और मजबूर क्यों पड़ जाता है ?

नई दिल्ली । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के मुख्यालय के बराबर से निकलती बाराखम्बा रोड पर स्थित अरुणाचल बिल्डिंग में चार्टर्ड एकाउंटेंट एसके गुप्ता के ऑफिस पर पड़ा प्रवर्तन निदेशालय का छापा इंस्टीट्यूट प्रशासन पर भी कालिख पोतने/चिपकाने जैसा है । छापे के बाद प्रवर्तन निदेशालय के सूत्रों की तरफ से दावा किया गया है कि एसके गुप्ता ने दो सौ अधिक फर्जी कंपनियाँ बनाई हुई हैं, जिनके जरिए उसने काले धन को सफेद करने का धंधा जमाया हुआ था । उल्लेखनीय बात यह है कि एसके गुप्ता तीन-चार वर्ष पहले भी इसी तरह की हरकतों के चक्कर में आयकर विभाग की पकड़ में आया था, जब आयकर विभाग ने उसे 'एंट्री प्रोवाइडर' के रूप में चिन्हित किया था । यानि, आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय के रडार पर रहने वाला एसके गुप्ता लगातार प्रोफेशन और इंस्टीट्यूट का नाम बदनाम कर रहा था - लेकिन इंस्टीट्यूट प्रशासन ने कभी भी उसके खिलाफ कार्रवाई करने की जरूरत नहीं समझी । इससे पहले, राधेश्याम बंसल और अनिल अग्रवाल के मामले में इंस्टीट्यूट प्रशासन हालाँकि भारी फजीहत झेल चुका है । राधेश्याम बंसल का नाम वित्तीय फर्जीवाड़े में पहले भी आ चुका है, और वह इंस्टीट्यूट की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का सदस्य और चेयरमैन भी रह चुका है । यानि, इंस्टीट्यूट प्रशासन की नाक के ठीक नीचे रहते हुए चार्टर्ड एकाउंटेंट्स फर्जीवाड़ों में लिप्त हैं, और इंस्टीट्यूट प्रशासन इस सब से बेपरवाह बना हुआ है ।
इस तरह के मामलों में इंस्टीट्यूट प्रशासन पर ज्यादा जिम्मेदारी थोपना उसके साथ ज्यादती करना भी होता - यदि उसने खुद ही आगे बढ़ कर नैतिकता व ईमानदारी के ऊँचे आदर्शों को स्थापित करने के लिए कदम न उठाए होते । सरकार के नोटबंदी के फैसले को लेकर इंस्टीट्यूट प्रशासन इतने जोश में आ गया था कि उसने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए एडवाईजरी तक जारी कर दी थी कि कोई भी चार्टर्ड एकाउंटेंट किसी भी तरह से और किसी भी रूप में सरकार के इस फैसले की आलोचना नहीं करेगा । इंस्टीट्यूट प्रशासन का तर्क था कि काले धन को समाप्त करने की दिशा में नोटबंदी एक महत्त्वपूर्ण कदम है, और इसलिए सरकार के इस कदम में कोई बाधा नहीं पड़ना चाहिए और इसलिए किसी भी रूप में इसकी आलोचना नहीं होनी चाहिए । उल्लेखनीय है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स सरकार के फैसलों पर क्या राय रखें और व्यक्त करें - यह तय करने का अधिकार इस्टीट्यूट प्रशासन को नहीं है । लेकिन अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर भी इंस्टीट्यूट प्रशासन ने काले धन के खिलाफ लड़ाई को समर्थन देने का काम किया, और इस तरह नैतिकता व ईमानदारी के ऊँचे आदर्श दिखाने और स्थापित करने के लिए कदम उठाए - लेकिन इस बात से उसने आँखें मूँदे रखीं कि उसकी नाक के ठीक नीचे बैठे चार्टर्ड एकाउंटेंट्स कैसे काले धन को सफेद करने का धंधा चलाए हुए हैं । इंस्टीट्यूट प्रशासन से जुड़े लोग हालाँकि नियमों और प्रक्रिया का हवाला देकर कुछ कर सकने को लेकर अपनी असमर्थता जताते हैं, लेकिन यह सिर्फ बहानेबाजी ही है - एक बार फिर दोहरायेंगे कि जो इंस्टीट्यूट प्रशासन अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स पर नोटबंदी के खिलाफ कुछ न कहने के लिए दबाव बना सकता है, वह चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को गैरकानूनी काम करने से रोकने का अपने अधिकार क्षेत्र का काम क्यों नहीं कर सकता है ?
इस सवाल का जबाव भी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से ही मिल जाता है । अधिकतर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का कहना है कि फर्जीवाड़ा करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नकेल कसना इंस्टीट्यूट प्रशासन के लिए मुश्किल इसलिए है, क्योंकि उनकी पहुँच इंस्टीट्यूट प्रशासन तक है और इंस्टीट्यूट प्रशासन उनके सामने अपने आप को लाचार पाता है । क्या कोई विश्वास करेगा कि फर्जी काम करने के मामले में जिस राधेश्याम बंसल की कुख्याति मीडिया तक की जानकारी में थी और मीडिया ने उसे 'रंगे हाथ' पकड़ा, उस राधेश्याम बंसल के कारनामों के बारे में इंस्टीट्यूट प्रशासन के लोगों को नहीं पता होगा ? नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का चेयरमैन बनने के बाद राधेश्याम बंसल ने पिछले चुनाव में इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए चुनाव लड़ा था, जीत जाता तो वह इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल का सदस्य होता । उस जैसे लोगों की जिस इंस्टीट्यूट प्रशासन में पहुँच इतनी आसान हो, तो उस इंस्टीट्यूट प्रशासन से उसके और उसके जैसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की उम्मीद भी भला कैसे की जा सकती है ? इस बात का सुबूत इंस्टीट्यूट प्रशासन के लोगों के रवैये में देखा भी जा सकता है : इंस्टीट्यूट प्रशासन से जुड़े या जुड़ने की तैयारी करने वाले कई चार्टर्ड एकाउंटेंट्स नेता सोशल मीडिया में बहुत सक्रिय हैं और देश व समाज में गंदगी फैलाने वाले नेताओं को कोसने में लगे रहते हैं; लेकिन अपने प्रोफेशन तथा अपने इंस्टीट्यूट में गंदगी फैलाने वाले नेताओं के बारे में वह कभी कुछ नहीं कहते - यहाँ वह पूरा भाईचारा दिखाते हैं । राधेश्याम बंसल की कारस्तानी को मीडिया ने पकड़ा और दिखाया, जिसके चलते प्रोफेशन और इंस्टीट्यूट की देशभर में बदनामी हुई; इंस्टीट्यूट प्रशासन तब सफाई देते हुए प्रेस रिलीज जारी करने के लिए भले मजबूर हुआ; किंतु सोशल मीडिया में बड़ी बड़ी बातें करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स नेताओं ने इस मामले में चुप्पी साधने में ही अपनी भलाई देखी । एसके गुप्ता के मामले में भी सोशल मीडिया के वीर-बहादुरों का यही रवैया है ।
इस मामले में दिलचस्प व्यवहार राजेश शर्मा का है । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य राजेश शर्मा सरकार और सरकार चला रही पार्टी के प्रमुख पदाधिकारियों व सदस्यों के साथ अपनी तस्वीरें दिखा दिखा कर उनके साथ अपनी नजदीकी दिखाने और जताने का काम लगातार करते रहते हैं, और इस काम के जरिए इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट तथा दूसरे प्रमुख पदाधिकारियों के साथ नजदीकी बनाने और उनसे फायदा उठाने का प्रयास करते रहते हैं - लेकिन प्रोफेशन और इंस्टीट्यूट की साख व प्रतिष्ठा के साथ-साथ सरकार की नीतियों, उसके उद्देश्यों व लक्ष्यों में पलीता लगाने की कोशिश करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के खिलाफ कुछ कहते और करते हुए उन्हें कभी सुना या देखा नहीं गया है । राजेश शर्मा की सक्रियता का जो 'दृश्य' दिखता है, उसमें सबसे ज्यादा उन्हीं से उम्मीद की जा सकती है कि वह राधेश्याम बंसल, अनिल अग्रवाल, एसके गुप्ता जैसे चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की पहचान को सामने लाने का काम करेंगे और सोशल मीडिया में ऐसे लोगों को बेनकाब करेंगे - लेकिन उनकी सारी सक्रियता नेताओं के साथ अपनी तस्वीरें दिखाने में ही सिमटी रहती है । अपने प्रोफेशन, अपने इंस्टीट्यूट, अपनी पार्टी, अपनी सरकार के प्रति जिम्मेदारी निभाने के प्रति राजेश शर्मा की यह अरुचि यह शक पैदा करती है कि राधेश्याम बंसल और एसके गुप्ता जैसे लोगों के साथ कहीं उनकी भी तो मिलीभगत नहीं है ? आखिर उनके जैसे लोगों के होते हुए भी इंस्टीट्यूट प्रशासन राधेश्याम बंसल और एसके गुप्ता जैसे चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सामने असहाय और कमजोर क्यों पड़ जाता है ?

Wednesday, March 29, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में चेयरमैन राकेश मक्कड़ तथा उनकी टीम के सदस्यों की कोशिशें अनिल लाल की वापसी करवा सकेंगी क्या ?

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में इंस्टीट्यूट के पदाधिकारी के रूप में अनिल लाल की वापसी की आहट ने काउंसिल के स्टॉफ सदस्यों को एक बार फिर आंदोलित कर दिया है । उल्लेखनीय है कि स्टॉफ सदस्यों की लगातार की जा रही शिकायतों के चलते ही अनिल लाल को पिछली 13 जनवरी को नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल से पदमुक्त किया गया था । काउंसिल के पॉवर ग्रुप के प्रमुख सदस्य उन्हीं अनिल लाल की वापसी की जिस तरह से कोशिशें कर रहे हैं, उसे जानने/सुनने के बाद काउंसिल के स्टॉफ सदस्यों का गुस्सा भड़का हुआ है । स्टॉफ सदस्यों का आरोप है कि काउंसिल चेयरमैन राकेश मक्कड़ और काउंसिल में उनके खास साथी नितिन कँवर, राजेंद्र अरोड़ा और सुमित गर्ग आदि जिस तरह से अनिल लाल को वापस लाने का प्रयास कर रहे हैं - उससे न सिर्फ एक बार फिर काउंसिल का माहौल बिगड़ेगा, बल्कि काउंसिल का कामकाज भी बुरी तरह प्रभावित होगा । स्टॉफ सदस्यों का कहना है कि उन्होंने अनिल लाल को हटाने के लिए खासी लड़ाई लड़ी है, और लड़ाई को निरंतरता के साथ लड़ते हुए बड़ी मुश्किल से उन्हें हटाने/हटवाने में उन्होंने सफलता पाई है - जिसे वह किसी भी हालत में व्यर्थ नहीं जाने देंगे ।
स्टॉफ सदस्यों के भारी विरोध के बावजूद राकेश मक्कड़ और उनके संगी-साथी अनिल लाल की वापसी कराने को लेकर लेकिन जिस तरह से अड़े दिख रहे हैं, उसने इंस्टीट्यूट की प्रशासन व्यवस्था से जुड़े लोगों को हैरान किया हुआ है । किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल बना हुआ है कि काउंसिल के मुख्य पदाधिकारी(यों) के रूप में जिन लोगों को प्रोफेशन तथा उससे जुड़े लोगों के हितों से संबंधित मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए - वह एक अधिकारी के ट्रांसफर-पोस्टिंग में आखिर क्यों इतनी दिलचस्पी ले रहे हैं ? वह भी तब जब, स्टॉफ सदस्यों की लगातार रहने वाली शिकायतों के कारण उसको हटाया गया था । उल्लेखनीय है कि अनिल लाल के अभद्र व्यवहार को लेकर स्टॉफ सदस्यों के गंभीर आरोप रहे हैं । स्टॉफ सदस्यों के आरोप रहे हैं कि अनिल लाल उनके साथ बहुत ही बदतमीजी के साथ पेश आते हैं और बात-बेबात उन्हें अपमानित करते रहते हैं । पिछली 17 दिसंबर को स्टॉफ-सदस्यों ने तत्कालीन कार्यकारी चेयरपरसन पूजा बंसल से मिलकर उन्हें हस्ताक्षरित ज्ञापन दिया जिसमें अनिल लाल के अभद्र व अशालीन व्यवहार का जिक्र करते हुए साफ कहा गया कि उनके लिए अनिल लाल के साथ काम करना संभव नहीं है । इसके बाद ही अनिल लाल की विदाई की तैयारी शुरू हो गई और अंततः 13 जनवरी को उनका ट्रांसफर आर्डर आ गया था ।
अनिल लाल की विदाई हालाँकि आसानी से नहीं हुई थी; उस समय अपने आप को नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का स्वयंभू मुखिया समझने और जताने वाले राकेश मक्कड़ तथा उनके साथियों ने अनिल लाल को बचाने की बहुत कोशिश की थी, किंतु अपने आप को तुर्रमखाँ समझने के बावजूद तब वह असफल रहे थे । राकेश मक्कड़ और उनके साथी अब जब सचमुच सत्ता में आ गए हैं, तो उन्हें लगता है कि अब वह अनिल लाल को वापस बुला सकते हैं । अनिल लाल की वापसी में इनके इतनी दिलचस्पी लेने से इंस्टीट्यूट प्रशासन के लोगों के कान खड़े हुए हैं । यह बात तो लोगों को समझ में आती है कि अनिल लाल के जरिए यह स्टॉफ-सदस्यों पर दबाव बनाए रखने का काम करते हैं और अनिल लाल इनकी हाँ में हाँ मिलाते हुए इनके खाने-पीने की व्यवस्था करवाते रहते हैं; लेकिन सिर्फ इस कारण से यह अनिल लाल की वापसी कराने की बदनामी मोल लेंगे - यह बात किसी को हजम नहीं हो रही है । लोगों को लगता है कि अनिल लाल के साथ राकेश मक्कड़ एंड टीम का यह 'रिश्ता' कुछ ज्यादा गहरा है ।
इस गहरे रिश्ते की पड़ताल की कोशिश इस तथ्य से सामना करवाती है कि अनिल लाल पिछले कुछेक वर्षों से नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सेमिनार्स के आयोजन का जिम्मा सँभाले हुए थे, जिसमें भारी झोल-झाल होने के आरोप लगते रहे हैं । आशंका है कि अनिल लाल ने राकेश मक्कड़ और उनकी टीम के लोगों को उस झोल-झाल में से हिस्सा देना शुरू कर दिया था, जिसके चलते वह राकेश मक्कड़ एंड टीम के चहेते बन गए । स्टॉफ-सदस्यों की शिकायत के चलते अनिल लाल से सेमिनार्स करवाने की जिम्मेदारी भी छिन गई थी, जिसके कारण राकेश मक्कड़ एंड टीम के सदस्यों के ऊपरी खर्चों की व्यवस्था पर भी रोक लग गई । समझा जाता है कि अनिल लाल की वापसी करवा कर वह उस 'व्यवस्था' को फिर से चालू करवाना चाहते हैं - और इसीलिए स्टॉफ-सदस्यों के विरोध के बावजूद अनिल लाल को नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में वापस लाने के लिए राकेश मक्कड़ एंड टीम के सदस्यों ने अपने प्रयासों में तेजी ला दी है । अनिल लाल की वापसी का विरोध करने के लिए काउंसिल के स्टॉफ-सदस्यों ने भी चूँकि कमर कस ली है, इसलिए उम्मीद की जा रही है कि रीजनल काउंसिल में टकरावपूर्ण दिलचस्प नजारे देखने को मिल सकेंगे ।
अनिल लाल के खिलाफ स्टॉफ-सदस्यों का शिकायती पत्र :

Tuesday, March 28, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू में ब्लड बैंक के मामले में जेपी सिंह और उनके भक्तों ने बैठे-बिठाए खुद ही मुसीबत और फजीहत को आमंत्रित कर अपने लिए पिछले वर्ष जैसे ही हालात बना लिए हैं क्या ?

नई दिल्ली । जेपी सिंह के 'सेनानियों' की वाट्स-ऐप पर जारी छिछोरपंती ने जिस तरह से ब्लड बैंक से जुड़े आरोपों की चपेट में एक बार फिर जेपी सिंह को ले लिया है, उससे लगता है कि पिछले वर्ष की भांति इस वर्ष भी जेपी सिंह के भक्त ही उनकी फजीहत का कारण बनेंगे । उल्लेखनीय है कि ब्लड बैंक का मामला पूरी तरह से शांत हो गया था, किंतु जेपी सिंह के भक्तों को पता नहीं किस च्यूंटी ने काटा कि वह ब्लड बैंक का मामला फिर से चर्चा में ले आए । दरअसल ब्लड बैंक से जुड़ी जेपी सिंह की बदनामी के दाग को धोने की कोशिश में जेपी सिंह के भक्तों ने ब्लड बैंक के मौजूदा प्रबंधन को ललकारा कि ब्लड बैंक में पैसा बनाने के जो आरोप जेपी सिंह पर लगाए गए थे, उन आरोपों को अभी तक साबित क्यों नहीं किया गया है ? यह सवाल तो अपने आप में में बड़ा वाजिब है, लेकिन दुस्साहस भरा है, और बहुत ही गलत समय पर पूछा गया । यह ऐसी ही बात हुई कि चोरी के आरोप में पकड़ा गया व्यक्ति यदि सुबूतों के अभाव में छूट जाता है, तो फिर वह आरोप लगाने और पकड़ने वालों को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करने लगे । उसकी कोशिश जायज हो सकती है, लेकिन उसे समझना चाहिए कि यह वास्तव में व्यवस्था की एक बड़ी खामी है - जिसमें हम कभी शिकार 'करते' हैं, तो कभी शिकार 'बनते' हैं । इसलिए इसे लेकर ज्यादा हायतौबा नहीं मचाना चाहिए । जेपी सिंह और उनके भक्त लेकिन इस सबक को भूल गए, और बदले में अपनी बेवकूफाना हरकतों से अपने लिए और ज्यादा फजीहत व मुसीबत को आमंत्रित कर बैठे । 
जेपी सिंह के सेनानियों की वाट्स-ऐप पर ललकार सुनी तो ब्लड बैंक का मौजूदा प्रबंधन भी चार पृष्ठों की चिट्ठी के साथ मैदान में उतर आया । इस चिट्ठी ने ब्लड बैंक की बदनामी के संदर्भ में जेपी सिंह के बचे-खुचे कपड़े भी उतार लिए । इस चिट्ठी ने दरअसल ब्लड बैंक से जुड़े आरोपों को क्रमबद्ध करने का महत्त्वपूर्ण काम किया, जिसके कारण जेपी सिंह के लिए भ्रष्ट-आचरण के आरोपों से बचना और मुश्किल हो गया । इस चिट्ठी में कहा/बताया गया कि ब्लड बैंक में पैसा बनाने का आरोप तो प्रतिप्रश्न था, जिसका मुख्य प्रश्न यह था कि वर्ष 2013-14 में एक करोड़ 33 लाख रुपए का लाभ दर्ज करने वाले ब्लड बैंक को अगले ही वर्ष 80 लाख रुपए का भारी घाटा क्यों और कैसे हो जाता है ? ब्लड बैंक के मौजूदा प्रबंधन ने उक्त तथ्य को रेखांकित करते हुए इस बात को भी स्पष्ट किया कि इस सवाल का जबाव जेपी सिंह को ही देना है - कल भी उन्हें ही देना था, और आज भी उन्हें ही देना है । इस दो-टूक जबाव ने एक बार फिर जेपी सिंह को कठघरे में खड़ा कर दिया । मजे की बात यह रही कि कठघरे से निकलने की कोशिश में जेपी सिंह पहले यह जबाव दे चुके थे कि वर्ष 2013-14 में दिल्ली में चूँकि डेंगू का प्रकोप ज्यादा था, इसलिए ब्लड बैंक का धंधा अच्छा चला और उसे तगड़ा फायदा हुआ, लेकिन उसके अगले वर्ष चूँकि डेंगू का प्रकोप ज्यादा नहीं था, इसलिए ब्लड बैंक का धंधा पिटा और उसे घाटा हुआ । कई लोगों ने जेपी सिंह के इस तर्क को स्वीकार कर लिया था और मान लिया था कि डेंगू के बढ़ने/घटने के कारण ही ब्लड बैंक का नफा-नुकसान प्रभावित हुआ है, और इसका जेपी सिंह की प्रबंधकीय अक्षमता तथा ब्लड बैंक में की गई उनकी लूट-खसोट से कोई संबंध नहीं है ।
ब्लड बैंक के मौजूदा प्रबंधन की चार पृष्ठीय चिट्ठी ने लेकिन जेपी सिंह के इस झूठ को भी बेनकाब कर दिया । मौजूदा प्रबंधन ने चार वर्षों का हिसाब देते हुआ सवाल उठाया कि यदि डेंगू ही ब्लड बैंक के नफे-नुकसान का कारण है, तो वर्ष 2015-16 में डेंगू का प्रकोप होने के बाद भी ब्लड बैंक का लाभ 37 लाख रुपए ही क्यों रह गया - जबकि वर्ष 2013-14 में यह एक करोड़ 33 लाख रुपए था । प्रबंधन ने मौजूदा वर्ष के दस महीनों का आँकड़ा देते हुए बताया कि इस वर्ष डेंगू का प्रकोप न होने के बावजूद दस महीने में 80 लाख रुपए लाभ दर्ज किया गया है । इन तथ्यों से सवाल पैदा हुआ कि डेंगू न होने के बाद भी मौजूदा प्रबंधन यदि दस महीनों में ही 80 लाख रुपए कमा लेता है, तो जेपी सिंह के प्रबंधन को पूरे वर्ष में 80 लाख रुपए खोने क्यों पड़े थे ? यह सवाल इसलिए और भी गंभीर है क्योंकि जेपी सिंह के साथ ब्लड बैंक के प्रबंधन में जुड़े लोगों का साफ कहना रहा है कि ब्लड बैंक में होने वाली खरीद-बेच की सारी डील जेपी सिंह अकेले ही करते थे, और उन्हें किसी भी स्तर पर डील में शामिल नहीं होने देते थे ।
ब्लड बैंक के मौजूदा प्रबंधन की चार पृष्ठीय चिट्ठी ने जेपी सिंह की हरकतों की और बचाव में दिए उनके जबाव की जो पोल खोली, तो जेपी सिंह और उनके भक्तों को लगा कि वह जैसे 'रंगे हाथ' पकड़ लिए गए हैं । तब उन्होंने इस बात का शोर मचाया कि वर्ष पूरा होने से पहले ही लाभ के आंकड़े देकर ब्लड बैंक प्रबंधन राजनीति कर रहा है; इस पर उन्हें सुनने को मिला कि जेपी सिंह तो वर्ष पूरा हो जाने के बाद - बार बार माँगने के बाद भी हिसाब नहीं देते थे, हिसाब देने में आपत्ति की क्या बात है ? और रही राजनीति की बात, तो इसकी शुरुआत तो खुद जेपी सिंह और उनके भक्तों ने ही की है । जल्दी ही स्पष्ट हो गया कि जेपी सिंह और उनके भक्त अपने ही बिछाए जाल में खुद ही फँस गए हैं । इस प्रसंग ने पिछले वर्ष के घटना-चक्र को एक बार फिर से प्रासंगिक और उल्लेखनीय बना दिया है । जेपी सिंह के साथ सच्ची हमदर्दी रखने वाले लोगों को ही कहना/बताना है कि पिछले वर्ष जेपी सिंह के लिए हालात शुरू में ज्यादा बुरे नहीं थे, किंतु उनकी और उनके भक्तों की बड़बोली और बेवकूफाना हरकतों के चलते हालात लगातार बिगड़ते चले गए - जिसका नतीजा हुआ कि वह अपने आप से ही हार गए । ब्लड बैंक के मामले में अभी जिस तरह से जेपी सिंह और उनके भक्तों ने बैठे-बिठाए खुद ही मुसीबत और फजीहत को आमंत्रित कर लिया है, उससे लग रहा है कि जेपी सिंह और उनके भक्तों ने पिछले वर्ष की फजीहत से कोई सबक नहीं सीखा है - और इस वर्ष भी अपने लिए वह पिछले वर्ष जैसे ही हालात बना रहे हैं ।