Saturday, March 30, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स में चलने वाली धाँधलियों और बेईमानियों के मुद्दे को गंभीर व व्यापक बनाने के उद्देश्य से सेंट्रल काउंसिल सदस्य तरुण घिया द्वारा अरुण जैतली को लिखा/भेजा गया आरोप पत्र सचमुच कुछ असर डालेगा या धूल खायेगा ?

नई दिल्ली । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के वरिष्ठ सदस्य तरुण घिया ने केंद्रीय मंत्री अरुण जैतली को संबोधित तथा भेजे गए पत्र में इंस्टीट्यूट में चलने वाली धाँधलियों की पोल खोलते हुए जो शिकायत की है, उसने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल तथा उसके सदस्यों की बेईमानीपूर्ण कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं । हालाँकि तरुण घिया के 47 पृष्ठों में करीब 22 हजार शब्दों में फैले शिकायती विवरणों में शायद ही कोई बात ऐसी होगी, जो पहले से चर्चा में न रही हो; कई बातों/किस्सों को उदाहरण के साथ 'रचनात्मक संकल्प' ने भी प्रमुखता से प्रकाशित किया है - लेकिन यह पहली बार हुआ है कि खुद सेंट्रल काउंसिल का एक सदस्य तथ्यात्मक सुबूतों के साथ इंस्टीट्यूट में कदम-कदम पर होने वाली बेईमानियों को उद्घाटित कर रहा है; और सिर्फ उद्घाटित ही नहीं कर रहा है, बल्कि देश के एक बड़े मंत्री के सामने उन बेईमानियों को आधिकारिक रूप में रख रहा है और कार्रवाई करने की माँग कर रहा है । इस मामले में रोमांचपूर्ण बात यह है कि अरुण जैतली को संबोधित शिकायत पत्र में तरुण घिया ने इंस्टीट्यूट प्रशासन के पदाधिकारियों के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु को भी निशाने पर ले लिया है । सुरेश प्रभु चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं; और तरुण घिया के आरोप के अनुसार, उन्होंने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट प्रफुल्ल छाजेड़ के चुनाव अभियान में शामिल होकर सरकार की उस 'नीति' का उल्लंघन किया है, जिसके तहत सरकार इंस्टीट्यूट के किसी भी चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश से दूर रहती है । इस आरोप के संदर्भ में इस बात पर गौर करना प्रासंगिक होगा कि सेंट्रल काउंसिल के कुछेक सदस्य नेताओं और मंत्रियों के साथ फोटो खिंचवा कर सोशल मीडिया में 'दिखाते' रहते हैं और तरह तरह के 'फायदे' उठाते रहते हैं ।
तरुण घिया के आरोपों से भरे शिकायती पत्र में दिए गए विवरणों ने इंस्टीट्यूट में सेंट्रल काउंसिल सदस्यों तथा इंस्टीट्यूट में कार्यरत पदाधिकारियों के साथ-साथ सेंट्रल काउंसिल में सरकार द्वारा नामित किए गए सदस्यों की भी भूमिका को संदेह के घेरे में ला दिया है । माना/समझा जाता है, और तरुण घिया ने अपने पत्र में इसका खुलासा भी किया है कि इंस्टीट्यूट में होने वाली धाँधलियों, बेईमानियों और पक्षपातपूर्ण कार्रवाईयों पर सेंट्रल काउंसिल सदस्य तो प्रायः इसलिए चुप रह जाते हैं, क्योंकि उन्हें 'अच्छी' कमेटियों की चेयरमैनी, विदेश यात्राओं के मौके, अपने प्रोफेशनल हितों को बढ़ाने के अवसर तथा तरह तरह से लूट-खसोट करने के काम करने होते हैं; लेकिन सरकार द्वारा नामित सदस्य आखिर किस स्वार्थ में इंस्टीट्यूट में होने वाली धाँधलियों, बेईमानियों तथा पक्षपातपूर्ण कार्रवाईयों पर ऑंखें बंद किए रहते हैं ? अरुण जैतली को संबोधित तरुण घिया के शिकायती पत्र को देखने/पढ़ने से यह विश्वास भी मजबूत होता है कि यदि सरकार द्वारा नामित सदस्य ही अपनी जिम्मेदारियाँ ठीक से निभाएँ, तो सेंट्रल काउंसिल के बेईमान सदस्यों व पदाधिकारियों की कारस्तानियों पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकती है । तरुण घिया के शिकायती पत्र को जिन लोगों ने देखा/पढ़ा है, उन्हें उम्मीद है कि खुद सेंट्रल काउंसिल सदस्य के द्वारा की गई शिकायत ने इंस्टीट्यूट में होने वाली धाँधलियों और बेईमानियों के मुद्दे को गंभीर बना दिया है; और माना/समझा जा सकता है कि इंस्टीट्यूट में चलने वाली धाँधलियों और बेईमानियों के सामने एक सेंट्रल काउंसिल सदस्य ही जब लाचार बना हुआ है, तो इंस्टीट्यूट में धाँधलियों व बेईमानियों की जड़ें कितनी गहरी होंगी और उन्हें रोक पाना कितना मुश्किल होगा ?
मजे की बात लेकिन यह है कि तरुण घिया के शिकायती पत्र पर सेंट्रल काउंसिल के उनके साथियों की हालत ऐसी हो गई है, जैसे कि उन्हें साँप सूँघ गया हो । इन पँक्तियों के लेखक ने जिन भी सेंट्रल काउंसिल सदस्यों से इस मामले में बात करने की कोशिश की, वह सभी आधिकारिक रूप से बात करने से कन्नी काट गए । अनौपचारिक बातचीत में दिलचस्पी लेते हुए कुछेक सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने उलटे तरुण घिया के रवैये को ही दोषी ठहराया । उनका कहना है कि तरुण घिया ने जो बातें की हैं, उनमें कई शर्मनाक रूप से सच भी हैं और गंभीर भी हैं, लेकिन उन बातों को उठाने का उनका तरीका स्वार्थपूर्ण रहा है - और इसीलिए उनकी बातों को सेंट्रल काउंसिल में ही समर्थन नहीं मिल पाया है । उल्लेखनीय है कि सेंट्रल काउंसिल में तरुण घिया को लगातार सातवाँ वर्ष है; उनके साथ रहे सदस्य ही कहते/बताते हैं कि सेंट्रल काउंसिल में तरुण घिया का लगातार नकारात्मक रवैया ही रहा है और वह सिर्फ विरोध करने तथा आरोप लगाने का काम ही करते रहे हैं । वह कोई शिकायत करते और आरोप लगाते - और फिर चुप बैठ जाते; बाद में फिर अचानक वह उन शिकायतों/आरोपों को दोहराने लगते; उनके इस रवैये में बाकी सेंट्रल काउंसिल सदस्य उनका स्वार्थपूर्ण खेल देखते और उनका समर्थन करने से बचते । इस तरह तरुण घिया सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के बीच अकेले और अलग-थलग पड़ गए । मनोज फडनिस तथा देवराज रेड्डी को (वाइस) प्रेसीडेंट चुनवाने में तरुण घिया की खासी भूमिका थी, लेकिन तरुण घिया को उन दोनों से भी बहुत शिकायतें रहीं और वह उनके खिलाफ आरोप लगाते रहे; इस कारण सेंट्रल काउंसिल सदस्य ही उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेते हैं । लगता है कि सेंट्रल काउंसिल में अकेले और अलग-थलग पड़ जाने के कारण ही तरुण घिया अपने आरोपों के साथ इंस्टीट्यूट की 'चहारदीवारी' से बाहर खुले में आ गए हैं और अपनी 'लड़ाई'को उन्होंने व्यापक रूप देने का निश्चय किया है । कई लोगों को लगता है कि अपने निश्चय को क्रियान्वित करते हुए तरुण घिया ने अरुण जैतली को जो पत्र लिखा/भेजा है, वह इंस्टीट्यूट में चलने वाली धाँधलियों और बेईमानियों के मुद्दे को गंभीर व व्यापक बनाने का काम तो करेगा ही ।

Wednesday, March 27, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी दौड़ से रवि गुगनानी के बाहर होने के बाद बने मौके का लाभ उठाने तथा अन्य दोनों उम्मीदवारों से आगे रहने के लिए अजीत जालान ने अपनी सक्रियता बढ़ाई

नई दिल्ली । रविंदर उर्फ रवि गुगनानी के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी से पीछे हटने के बाद अजीत जालान की सक्रियता में खासी तेजी देखी जा रही है, जिसके चलते उम्मीदवारों की दौड़ में उनकी पोजीशन में अच्छा सुधार हुआ पहचाना जा रहा है । दरअसल रवि गुगनानी के उम्मीदवार रहते हुए, पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल के लिए अजीत जालान की उम्मीदवारी की खुलकर तरफदारी करना मुश्किल हो रहा था - जिस कारण अजीत जालान की उम्मीदवारी मुसीबत के भँवर जाल में फँसी हुई थी । लेकिन रवि गुगनानी के मैदान छोड़ देने के बाद विनोद बंसल के लिए अजीत जालान की उम्मीदवारी के समर्थन में खुलकर 'बैटिंग' करने का रास्ता साफ हो गया है । हालाँकि अशोक कंतूर की उम्मीदवारी का बोझ भी विनोद बंसल के कंधे पर है, लेकिन कंधे के उस बोझ को झटक देना उनके लिए मुश्किल नहीं होगा । फिलबक्त अजीत जालान और अशोक कंतूर के रूप में विनोद बंसल के दोनों हाथों में लड्डू हैं; और उनके पास दोतरफा मौका है कि वह जिसका पलड़ा भारी देखें - उसकी उम्मीदवारी का झंडा उठा लें । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के बनने/बिगड़ने वाले समीकरणों को पहचानने/समझने वाले कुछेक लोगों का कहना यह भी है कि अशोक कंतूर और अजीत जालान में से कोई एक ही उम्मीदवार बना रह सकेगा; दोनों के बीच आपसी समझदारी बना कर किसी एक को आगे के लिए बढ़ा दिया जायेगा - क्योंकि इन दोनों में से एक ही उम्मीदवार होगा, तो उसके जीतने की संभावना बन सकती है; दोनों उम्मीदवार बने रहेंगे, तो दोनों ही हारेंगे । अन्य कुछेक लोगों का मानना/कहना लेकिन यह है कि अशोक कंतूर और अजीत जालान की स्थिति तीसरे उम्मीदवार महेश त्रिखा की स्थिति पर निर्भर करेगी - महेश त्रिखा उम्मीदवार के रूप में यदि मजबूती पा सके, तब तो अशोक कंतूर व अजीत जालान में से कोई एक मैदान में रहेगा; और यदि महेश त्रिखा पीछे अपने ही क्लब से उम्मीदवार बने अमरजीत सिंह वाली स्थिति में रहे, तब फिर अशोक कंतूर और अजीत जालान में ही चुनाव हो जायेगा ।
ऐसे में, अजीत जालान ने दोनों ही संभावनाओं में अपनी स्थिति को मजबूत करने/बनाने के लिए प्रयास तेज कर दिए हैं । अजीत जालान के नजदीकियों का कहना/बताना है कि अजीत जालान अपने लिए ऐसा समर्थन जुटा और 'दिखा' देना चाहते हैं कि खेमे के नेता उन्हें और अशोक कंतूर में से किसी एक को उम्मीदवार के रूप में चुनने का फैसला करें, तो उनका पलड़ा भारी साबित हो; और यदि अशोक कंतूर के साथ ही चुनावी मुकाबले की नौबत आए, तो वह बेहतर स्थिति में हों । अजीत जालान और उनके साथियों को लगता है कि अशोक कंतूर पिछली बार जब हर तरह का हथकंडा आजमाने के बावजूद चुनाव नहीं जीत सके, तो आगे आने वाला चुनाव तो उनके लिए और भी मुश्किल होगा । सहानुभूति के 'रास्ते' से कुछेक लोगों को अशोक कंतूर को लाभ होता हुआ तो दिख रहा है, लेकिन उन्हीं लोगों का यह भी मानना/कहना है कि सहानुभूति का लाभ लेने के लिए अशोक कंतूर चूँकि कोई प्रयास करते नहीं दिख रहे हैं, इसलिए सहानुभूति का लाभ उन्हें अपने आप तो नहीं मिलेगा । सहानुभूति का लाभ लेने के मामले में उन्हें सबसे बड़ा झटका तो अजीत जालान और विनोद बंसल से ही लगा है । पिछले चुनाव में अशोक कंतूर को इन दोनों का समर्थन मिला था; आगे के चुनाव के लिए 'अपने' रहे इन्हीं दोनों को जब उनसे सहानुभूति नहीं रही है, तो दूसरों से वह क्या उम्मीद कर/रख सकते हैं ? रवि गुगनानी के उम्मीदवार रहते हुए तो विनोद बंसल के हाथ बँधे हुए थे, और वह अजीत जालान के लिए कुछ नहीं कर पाते और तब अजीत जालान की स्थिति कमजोर बनी हुई थी; रवि गुगनानी के चुनावी मैदान से बाहर होते ही चूँकि विनोद बंसल के बँधे हाथ खुल गए हैं - इसलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अजीत जालान को अपना मौका बनता नजर आ रहा है ।
हालाँकि सारा खेल महेश त्रिखा की स्थिति पर निर्भर करता है । मजे की बात यह है कि रवि गुगनानी के चुनावी मैदान से बाहर होने पर खेमेबाजी के नजरिये से सबसे ज्यादा फायदा महेश त्रिखा को होना चाहिए था, लेकिन वह मौके का फायदा उठाने से चूकते दिख रहे हैं । विडंबना की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट में जिन लोगों को महेश त्रिखा की उम्मीदवारी के स्वाभाविक सहयोगी व समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जाता है, महेश त्रिखा उनका भी सहयोग व समर्थन पक्का नहीं कर पा रहे हैं । ऐसे में, डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच मजाक भी चलने लगा है कि महेश त्रिखा के क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ ईस्ट के सदस्यों के बीच संजय खन्ना की कामयाबी के बाद उम्मीदवार बनने को लेकर तो होड़ मच गई है, लेकिन उम्मीदवारी को लेकर सदस्य और पदाधिकारी गंभीरता नहीं दिखा पाते हैं; अमरजीत सिंह उम्मीदवार बने, लेकिन उन्हें अपने क्लब तक का वोट नहीं मिल पाया; राजीव सागर की उम्मीदवारी का बड़ा शोर था, लेकिन वह शोर बन कर ही रह गया; महेश त्रिखा उम्मीदवार बने हैं, लेकिन वह अपनी और अपने क्लब की पहचान व साख तक का फायदा नहीं उठा पा रहे हैं । किसी भी उम्मीदवार की 'ताकत' को नापने/आँकने के जो भी पैमाने होते हैं, उनके आधार पर महेश त्रिखा की उम्मीदवारी को सबसे ज्यादा दमदार 'दिखना' चाहिए - लेकिन विडंबना की बात यह है कि पहले चार उम्मीदवारों में और अब बचे तीन उम्मीदवारों में सबसे कमजोर उन्हीं को देखा/पहचाना जा रहा है । हालाँकि कुछेक लोगों को लग रहा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी का अगला चुनाव यदि पिछले चुनाव में बने दो खेमों के बीच ही हुआ, तो एक खेमे के उम्मीदवार महेश त्रिखा ही होंगे; और दूसरे खेमे से यदि अशोक कंतूर व अजीत जालान - दोनों ही उम्मीदवार हो गए, तो महेश त्रिखा के लिए मामला अनुकूल भी हो सकता है । दरअसल इसीलिए दूसरे खेमे में अशोक कंतूर व अजीत जालान में से किसी एक को ही उम्मीदवार बनाने के बारे में सोच-विचार चल रहा है - वह 'एक' हो सकने के लिए ही अजीत जालान की सक्रियता में तेजी देखी/पहचानी जा रही है ।

Monday, March 25, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 के प्रेसीडेंट्स इलेक्ट ट्रेनिंग सेमीनार में ललित खन्ना ने प्रेसीडेंट्स इलेक्ट के साथ पर्सनल संबंध बनाने का ख्याल रखने के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट में बनी अपनी पहचान और महत्ता 'दिखाने' पर जोर देकर प्रेसीडेंट्स इलेक्ट तथा अन्य रोटेरियंस पर अच्छा प्रभाव बनाया

नई दिल्ली । 'धनक' शीर्षक से आयोजित हुए प्रेसीडेंट्स इलेक्ट ट्रेनिंग सेमीनार में ललित खन्ना ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी के अभियान की जो धमक पैदा की, वह अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को एक तरफा बनाने/करने का काम करती दिख रही है । रोटरी में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति में   प्रेसीडेंट्स इलेक्ट ट्रेनिंग सेमीनार को उम्मीदवारों के 'लॉन्चिंग पैड' के रूप में देखा/पहचाना जाता है । माना/समझा जाता है कि आने वाले रोटरी वर्ष में जो जो लोग डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करना चाहते हैं, उनके लिए प्रेसीडेंट्स इलेक्ट ट्रेनिंग सेमीनार अपनी उम्मीदवारी के प्रस्तुतिकरण के लिए एक शानदार और प्रभावी मौका होता है । दरअसल यह एक बड़ा और प्रभावशाली कार्यक्रम होता है, जिसमें कि प्रेसीडेंट्स इलेक्ट अगले रोटरी वर्ष में प्रेसीडेंट के रूप में अपना अपना कार्य-व्यवहार तय करते हैं । उनके लिए अपने कार्य-व्यवहार को तय करने का यह चूँकि पहला मौका होता है, इसलिए 'पहले प्यार' की तर्ज पर यह मौका एक अलग तरह की छाप छोड़ता है - जो संभावित उम्मीदवारों के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण, यहाँ तक कि निर्णायक भूमिका निभाता है । इसलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के संभावित उम्मीदवार इस मौके को बहुत ही गंभीरता से लेते हैं । जो उम्मीदवार इस मौके को गंभीरता से नहीं लेते हैं, और या इस मौके तक अपनी उम्मीदवारी को तय नहीं कर पाते हैं, उन्हें कन्फ्यूज उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता है - और उन्हें प्रेसीडेंट्स इलेक्ट गंभीरता से नहीं लेते हैं । 
दरअसल प्रेसीडेंट्स इलेक्ट ट्रेनिंग सेमीनार हो जाने के बाद जो कोई अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करता है, उसके बारे में मान लिया जाता है कि उम्मीदवारी को लेकर उसकी अपनी कोई तैयारी या सोच नहीं थी; वह तो बस 'इसके' या 'उसके' द्वारा सब्जबाग दिखाए जाने और या उकसाने पर उम्मीदवार बन गया है; और ऐसे में 'इसकी' या 'उसकी' कठपुतली बन कर ही रहेगा । ऐसे कठपुतली उम्मीदवारों को डिस्ट्रिक्ट के लोग, खासकर  प्रेसीडेंट्स इलेक्ट चूँकि गंभीरता से नहीं लेते हैं, इसलिए जो भी लोग अपनी खुद की सोच व अपने खुद के भरोसे उम्मीदवार बनना चाहते हैं, वह प्रेसीडेंट्स इलेक्ट ट्रेनिंग सेमीनार से पहले ही अपनी उम्मीदवारी के बारे में फैसला कर लेते हैं, और प्रेसीडेंट्स इलेक्ट के साथ तालमेल बनाने लगते हैं । इसी 'परंपरा' और प्रक्रिया के तहत ललित खन्ना और सुनील मल्होत्रा ने अपनी अपनी उम्मीदवारी के अभियान पर जोर देने के इरादे के साथ प्रेसीडेंट्स इलेक्ट के बीच अच्छे से प्रभावी संपर्क अभियान चलाया । कई एक प्रेसीडेंट्स इलेक्ट ने बताया है कि ट्रेनिंग सेमीनार से पहले ही ललित खन्ना और सुनील मल्होत्रा उनसे मिल चुके थे; और इसलिए ट्रेनिंग सेमीनार के दौरान उन्हें उन दोनों को पहचानने तथा उनके साथ जुड़ने में कोई दिक्कत नहीं हुई ।
ट्रेनिंग सेमीनार से लौटे प्रेसीडेंट्स इलेक्ट लेकिन ललित खन्ना के प्रेजेंटेशन से काफी प्रभावित दिखे और सुनील मल्होत्रा का 'प्रदर्शन' उन्हें काफी फीका लगा । दरअसल ललित खन्ना ने ट्रेनिंग सेमीनार के विभिन्न अवसरों को प्रेसीडेंट्स इलेक्ट के साथ 'कनेक्ट' होने के लिए योजनाबद्ध व बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया, जिसे सुनील मल्होत्रा बिलकुल भी नहीं कर सके । ऐसा कर सकने के लिए सुनील मल्होत्रा को अपने क्लब के सदस्यों का भी सहयोग नहीं मिला, और वह दूसरे अनुभवी लोगों का सहयोग भी नहीं ले पाए । ट्रेनिंग सेमीनार में पहुँचे हुए सुनील मल्होत्रा के क्लब के कई एक सदस्य तो दूसरे दिन ही वापस लौट आये, जिस कारण वह अकेले और अलग-थलग पड़ गए । ललित खन्ना ने लेकिन अवसरों को पहले से पहचाना और उनका भरपूर इस्तेमाल किया । प्रेसीडेंट्स इलेक्ट को ललित खन्ना का वह तरीका खूब भाया और प्रभावित करने वाला लगा, जिसमें परफॉर्मेंस देने जाते समय और परफॉर्मेंस देकर लौटते समय प्रेसीडेंट्स इलेक्ट को ललित खन्ना शुभकामनाएँ और बधाई दे रहे थे । ललित खन्ना ने एक तरफ प्रेसीडेंट्स इलेक्ट के साथ पर्सनल संबंध बनाने का ख्याल रखा और दूसरी तरफ प्रेसीडेंट्स इलेक्ट को यह 'दिखाने'/जताने पर भी जोर दिया कि डिस्ट्रिक्ट में उनकी अपनी एक पहचान और महत्ता है, और इसके लिए उन्होंने हर उस अवसर का उपयोग किया जो संयोगवश उन्हें मिले । प्रेसीडेंट्स इलेक्ट ट्रेनिंग सेमीनार में ललित खन्ना ने अपनी उम्मीदवारी के संदर्भ में अपनी सक्रियता को जिस तरह से संयोजित किया, उसका प्रेसीडेंट्स इलेक्ट के साथ-साथ दूसरे रोटेरियंस पर भी अच्छा प्रभाव पड़ा दिखा है; जो उनकी उम्मीदवारी को खासी बढ़त दिलवाने वाला माना/समझा जा रहा है ।

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में नोमीनेटिंग कमेटी के चेयरमैन पद से तथा कमेटी से हटाए जाने की लायंस इंटरनेशनल में शिकायत करते हुए संजय चोपड़ा ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर एके सिंह पर सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में पक्षपातपूर्ण भूमिका निभाने का आरोप लगाया

लखनऊ । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए जगदीश अग्रवाल की उम्मीदवारी के नामांकन को लेकर चल रहे विवाद में अब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर एके सिंह भी लपेटे में आ गए हैं, और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनकी भूमिका को पक्षपातपूर्ण बताते हुए लायंस इंटरनेशनल कार्यालय में शिकायत दर्ज हो गई है । इस शिकायत को देखते/समझते हुए माना/कहा जा रहा है कि एके सिंह ने नोमीनेटिंग कमेटी के चेयरमैन पद से संजय चोपड़ा को हटा कर अपने लिए बड़ी मुसीबत आमंत्रित कर ली है । संजय चोपड़ा ने नोमीनेटिंग कमेटी के चेयरमैन पद से हटाये जाने को लायंस इंटरनेशनल में चुनौती दी है । संजय चोपड़ा का आरोप है कि जगदीश अग्रवाल की उम्मीदवारी के संदर्भ में नोमीनेटिंग कमेटी के निर्णय को प्रभावित करने के उद्देश्य से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर एके सिंह ने उन्हें कार्रवाई के बीच में ही नोमीनेटिंग कमेटी के चेयरमैन पद से हटा दिया है, जो न तो न्यायपूर्ण है और न लायंस इंटरनेशनल के नियमों के अनुरूप है । संजय चोपड़ा का कहना है कि नोमीनेटिंग कमेटी ने अपना काम करना शुरू कर दिया है, लेकिन जो अभी पूरा नहीं हुआ है - इसलिए कार्रवाई के बीच में उन्हें तथा बाकी तीन सदस्यों में से दो सदस्यों को हटा देने से उनकी पक्षपातपूर्ण भूमिका का संकेत और सुबूत मिलता है । संजय चोपड़ा का आरोप है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमीनेटिंग कमेटी पर जगदीश अग्रवाल के नामांकन पत्र को रिजेक्ट करने के लिए दबाव बना रहे थे, लेकिन चार सदस्यीय नोमीनेटिंग कमेटी के बहुमत सदस्यों ने जब उनके दबाव को मानने से इंकार कर दिया, तो एके सिंह ने चेयरमैन सहित तीन सदस्यों को हटा कर उनकी जगह नए सदस्य बना दिए हैं । 
डिस्ट्रिक्ट में लोगों को लगता है कि नोमीनेटिंग कमेटी के चेयरमैन के साथ-साथ दो और सदस्यों को हटा कर उनकी जगह नए सदस्यों को नियुक्त करने का कोई कारण न बता कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर एके सिंह ने अपने फैसले को संदेहास्पद व विवादग्रस्त बना लिया है - और इस तरह अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मार ली है । उल्लेखनीय है कि मामले की पृष्ठभूमि में नोमीनेटिंग कमेटी के हटाये जा चुके चेयरमैन संजय चोपड़ा के जो भी किस्से/कहानियाँ चल रहे हों और जो भी आरोप/प्रत्यारोप लग रहे हों, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर एके सिंह ने आधिकारिक रूप से नोमीनेटिंग कमेटी के चेयरमैन के रूप में संजय चोपड़ा पर कोई आरोप नहीं लगाया है; और संजय चोपड़ा को चेयरमैन पद से हटाए जाने का भी उन्होंने कोई कारण नहीं बताया है । इसी तथ्य का वास्ता देकर संजय चोपड़ा ने लायंस इंटरनेशनल को लिखी/भेजी अपनी शिकायत में एके सिंह ने आरोप लगाया है कि नोमीनेटिंग कमेटी के चेयरमैन के रूप में वह तथा अन्य दो सदस्य चूँकि जगदीश अग्रवाल की उम्मीदवारी के नामांकन पत्र को रिजेक्ट करने की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर एके सिंह के माँग को पूरा नहीं कर रहे थे, इसलिए बिना कोई कारण बताये उन्हें नोमीनेटिंग कमेटी से बाहर कर दिया गया है ।
संजय चोपड़ा ने लायंस इंटरनेशनल को लिखी/भेजी अपनी शिकायत में यह दावा भी किया है कि एके सिंह ने पहले नोमीनेटिंग कमेटी के चेयरमैन के रूप में उनके उस अधिकार को मानने/देने से इंकार किया था, जिसके तहत उन्होंने जगदीश अग्रवाल को अपने आधे-अधूरे कागजातों को पूरा करने का मौका दिया था । एके सिंह का कहना था कि नोमीनेटिंग कमेटी को जगदीश अग्रवाल की तरफ से जो कागजात मिले हैं, उनके आधार पर ही उनके नामांकन की स्वीकृति का फैसला करना है; जगदीश अग्रवाल को दोबारा से दूसरे कागजात प्रस्तुत करने का मौका नहीं दिया जा सकता है । संजय चोपड़ा ने लेकिन मल्टीपल काउंसिल द्वारा स्वीकृत किए गए नियमों का हवाला देकर एके सिंह को बताया कि नोमीनेटिंग कमेटी किसी भी उम्मीदवार को अपने कागजात दुरुस्त करने तथा पूरे करने का मौका दे सकती है । संजय चोपड़ा का आरोप है कि एके सिंह को जब लगा कि वह नियमतः वह नोमीनेटिंग कमेटी को जगदीश अग्रवाल का नामांकन रिजेक्ट करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते हैं, तब उन्होंने चेयरमैन सहित चार सदस्यीय कमेटी के तीन सदस्यों को ही हटा दिया और उनकी जगह नए सदस्य नियुक्त कर दिए । इससे लेकिन मामला खत्म होने की बजाये भड़क और गया है, और निशाने पर अब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर एके सिंह खुद आ गए हैं । संजय चोपड़ा की शिकायत ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में एके सिंह की भूमिका को संदेहास्पद व विवादपूर्ण बना दिया है । एके सिंह के लिए मुसीबत व फजीहत की बात यह हो गई है कि उक्त मामले में उनके पक्ष के लोग भी मानने और कहने लगे हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में एके सिंह ने मामले को होशियारी तथा उचित तरीके से हैंडल नहीं किया, जिस कारण मामला उलझ भी गया है और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में एके सिंह के लिए भी मुश्किलें खड़ी हो गईं हैं । 

Friday, March 22, 2019

रोटरी इंटरनेशनल के पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई ने नेपाल के डिस्ट्रिक्ट 3292 की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में डब्ल्यूजी मील के लिए किए जा रहे आभा झा चौधरी के प्रयासों का उल्लेख करते हुए उनकी निरंतर सक्रियता और प्रभावी नतीजे हासिल करने की उनकी योग्यता को रेखांकित किया

नई दिल्ली । रोटरी फाउंडेशन पोलियो फंड के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए डब्ल्यूजी मील कार्यक्रम की भारत और नेपाल की कंट्री को-ऑर्डिनेटर आभा झा चौधरी ने नेपाल के डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3292 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट किरनलाल श्रेष्ठा की पत्नी गीता श्रेष्ठा को इस कदर प्रभावित किया कि उन्होंने अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट की फर्स्ट लेडी के रूप में डब्ल्यूजी मील के लिए काम करने को अपनी पहली प्राथमिकता में शामिल करने की घोषणा की है । डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के विभिन्न कार्यक्रमों के दौरान गीता श्रेष्ठा द्वारा की गई इस घोषणा का डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई ने खासी प्रशंसा की । गीता श्रेष्ठा की घोषणा की प्रशंसा करते हुए मनोज देसाई ने डब्ल्यूजी मील के लिए किए जा रहे आभा झा चौधरी के प्रयासों का उल्लेख किया और रेखांकित किया कि आभा झा चौधरी की निरंतर सक्रियता और प्रभावी नतीजे हासिल करने की उनकी योग्यता दूसरे लोगों को भी डब्ल्यूजी मील कार्यक्रम से जुड़ने के लिए प्रेरित करती है । गीता श्रेष्ठा ने मनोज देसाई की इस बात का समर्थन करते हुए ही बताया कि डब्ल्यूजी मील कार्यक्रम के बारे में उन्हें आभा झा चौधरी से ही विस्तार से जानने का मौका मिला और आभा झा चौधरी के काम करने के तरीकों तथा उनके अनुभवों ने ही 'मुझे डब्ल्यूजी मील कार्यक्रम पर' फोकस करने तथा इसके लिए खास तौर से कुछ करने के लिए प्रेरित किया है । उल्लेखनीय है कि नेपाल के बुटवाल में आयोजित हुई डिस्ट्रिक्ट 3292 की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में बाहर के लोगों में मनोज देसाई के साथ आभा झा चौधरी को मुख्य अतिथि तथा मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था । 
नेपाल के डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3292 की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में कंट्री को-ऑर्डिनेटर के रूप में निभाई गई आभा झा चौधरी की भूमिका तथा उनकी उपलब्धियों ने डब्ल्यूजी मील के पदाधिकारियों को खासा प्रभावित किया; और डब्ल्यूजी मील की मुख्य कर्ताधर्ता सुजेन रे ने कई मौकों पर अलग अलग तरीकों से आभा झा चौधरी की भूमिका व उपलब्धियों को प्रशंसाभाव से विशेष रूप से रेखांकित किया । वास्तव में, नेपाल के डिस्ट्रिक्ट की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में आभा झा चौधरी की उपलब्धियाँ डब्ल्यूजी मील कार्यक्रम के लिए महत्त्वपूर्ण इसलिए रहीं - क्योंकि वहाँ उन्होंने रोटेरियंस को कार्यक्रम के लिए डोनेशन देने के लिए तो प्रेरित किया ही, जिसके चलते अच्छी-खासी रकम कार्यक्रम को मिली; साथ ही एक समर्पित कार्यकर्ता के रूप में कार्यक्रम से जुड़ने के लिए भी रोटेरियंस को उत्साहित और प्रेरित किया । इसी संदर्भ में, अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने जा रहे किरनलाल श्रेष्ठा की पत्नी गीता श्रेष्ठा का डिस्ट्रिक्ट की फर्स्ट लेडी के रूप में डब्ल्यूजी मील के लिए काम करने को अपनी पहली प्राथमिकता में शामिल करने की घोषणा करने का खास महत्त्व है - और गीता श्रेष्ठा की यह घोषणा आभा झा चौधरी की एक बड़ी उपलब्धि है । मजे की बात यह रही कि बुटवाल में आयोजित हुई डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में आभा झा चौधरी की सक्रियता तथा उनकी भूमिका को मिलने वाली प्रशंसा को देख कर तथा उससे उत्साहित व प्रेरित होकर बुटवाल के मिथिला समाज संगठन ने आभा झा चौधरी के सम्मान का कार्यक्रम आयोजित कर लिया ।  
इससे भी बड़ी बात यह हुई कि नेपाल के डिस्ट्रिक्ट की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई की मौजूदगी में आभा झा चौधरी की सक्रियता व उपलब्धियों को मिली प्रशंसा की ख्याति तमिलनाडु के विझुपुरम में मल्टी-डिस्ट्रिक्ट्स के पब्लिक इमेज सेमीनार के आयोजकों तक पहुँची, तो उन्होंने आभा झा चौधरी को अपने सेमीनार में मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित कर लिया । डिस्ट्रिक्ट 2980, 2981, 3000 व 3231 द्वारा मिल कर किए गए उक्त सेमीनार में डब्ल्यूजी मील के प्रतिनिधि के रूप में आभा झा चौधरी की उपस्थिति तथा उनके द्वारा निभाई गई उनकी भूमिका ने डब्ल्यूजी मील कार्यक्रम की पहचान को व्यापक बनाने तथा विस्तार देने का काम किया ।इससे पहले रोटरी डिस्ट्रिक्ट 3170 के एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम में तथा रोटरी डिस्ट्रिक्ट 3250 के रोटरी क्लब मिथिला के एक बड़े स्थानीय आयोजन में आभा झा चौधरी को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जा चुका है । आभा झा चौधरी की जो सक्रियता व उपलब्धियाँ रहीं हैं, वह तो उल्लेखनीय हैं ही; रोटरी के विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में उन्हें आमंत्रित किए जाने और सम्मान दिए जाने का भी अपना एक अलग महत्व है । उल्लेखनीय है कि गवर्नर्स के अलावा किसी रोटेरियन को - किसी पूर्व क्लब प्रेसीडेंट को रोटरी जगत में और दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में ऐसी पहचान व सम्मान मिला हो, जैसा सम्मान आभा झा चौधरी को मिला है - ऐसा देखने/सुनने में नहीं आया है । रोटरी के बाहर भी विभिन्न सामाजिक संस्थाओं में आभा झा चौधरी ने अपनी सक्रियता से न सिर्फ अपनी पहचान बनाई है, बल्कि विभिन्न रूपों में सम्मानित भी हुई हैं । कुछ ही समय पहले एक भव्य कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह व अन्य प्रमुख लोगों के हाथों वह सम्मानित हुई हैं, जिससे उनकी सामाजिक पहचान का दायरा न सिर्फ बढ़ा हुआ दिखा है - बल्कि उसमें प्रतिष्ठित होने का सुबूत भी लोगों को देखने को मिला है । 

Thursday, March 21, 2019

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में सुनीता बंसल की उम्मीदवारी की बागडोर संभालने को लेकर उनके समर्थक नेताओं के बीच मचे झगड़े ने श्याम बिहारी अग्रवाल की स्थिति को बेहतर बनाया

आगरा । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए सुनीता बंसल की उम्मीदवारी को मिल रहे समर्थन को 'दिखलाने' के उद्देश्य से हुए होली मिलन समारोह में जुटे लोगों को देख/जान कर श्याम बिहारी अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थक डिस्ट्रिक्ट के सत्ता खेमे के लोगों ने राहत की साँस ली है । दरअसल डिस्ट्रिक्ट के सत्ता खेमे के नेताओं ने जब से श्याम बिहारी अग्रवाल की उम्मीदवारी का झंडा उठाया है, तब ही से विरोधी खेमे के नेताओं ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच यह हवा बनाने की कोशिश की है कि सत्ता खेमे के कई नेता श्याम बिहारी अग्रवाल को उम्मीदवार बनाये जाने से खुश नहीं हैं और श्याम बिहारी अग्रवाल की उम्मीदवारी को लेकर सत्ता खेमे में फूट पड़ गई है । यह हवा बनाने के लिए विरोधी खेमे के नेताओं ने तर्क दिया कि सत्ता खेमे के जो नेता पिछली बार श्याम बिहारी अग्रवाल की उम्मीदवारी का विरोध कर रहे थे, उन्होंने अचानक से इस बार जिस तरह से श्याम बिहारी अग्रवाल की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है - उसे देख कर उन नेताओं के संगी-साथी ही खफा हैं, और इससे सत्ता खेमे की राजनीतिक ताकत कमजोर हुई है । सत्ता खेमे की राजनीतिक ताकत कमजोर हुई है या नहीं, यह तो निश्चित रूप से अभी नहीं पता है; लेकिन सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के लिए हुए आयोजन से यह जरूर पता चल गया है कि विरोधी खेमे को उसका कोई लाभ मिलता हुआ नहीं दिख रहा है । सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के समर्थन में कमोवेश वही लोग दिख रहे हैं, जो पिछले वर्ष श्याम बिहारी अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में थे । ऐसे में लोगों को कहने का मौका मिला है कि 'वह लोग' पिछले वर्ष जब श्याम बिहारी अग्रवाल को नहीं जितवा सके थे, तब फिर वह इस वर्ष सुनीता बंसल को भला कैसे चुनाव जितवा सकेंगे ?
मजे की बात यह हुई है कि विरोधी खेमे के नेता जिस तर्क से सत्ता खेमे के नेताओं को 'लपेटने' की कोशिश कर रहे हैं, वह तर्क पलट कर खुद उनके लिए ही मुसीबत बन गया है । डिस्ट्रिक्ट में लोगों का कहना/पूछना है कि विरोधी खेमे के जो नेता पिछले वर्ष श्याम बिहारी अग्रवाल की उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे थे, उन्हें तो यह देख/जान कर खुश होना चाहिए कि 'उनके' श्याम बिहारी अग्रवाल को अब पिछले वर्ष विरोधी रहे लोगों ने भी स्वीकार कर लिया है - और इस तरह 'उनके' श्याम बिहारी अग्रवाल के लिए तो इस वर्ष निर्विरोध सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुने जाने की स्थितियाँ बनी हैं । इस स्थिति पर खुश होने की बजाये 'समर्थक' रहे विरोधी खेमे के नेता जिस तरह से श्याम बिहारी अग्रवाल की उम्मीदवारी के विरोधी बन गए हैं, उससे वास्तव में वह यही साबित कर रहे हैं कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी राजनीति में उन्हें उम्मीदवार से कोई लगाव नहीं है, वह तो बस उम्मीदवार को इस्तेमाल करते हुए अपनी राजनीति करना चाहते हैं । पिछले वर्ष उन्होंने उम्मीदवार के रूप में श्याम बिहारी अग्रवाल को इस्तेमाल किया, इस बार वह सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के सहारे विरोध की अपनी राजनीति दिखा रहे हैं । विरोधी खेमे के नेता पिछले वर्ष भी सत्ता खेमे के नेताओं की तथाकथित फूट के तथा श्याम बिहारी अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में होने वाले आयोजनों में जुटे लोगों के आधार पर अपनी स्थिति मजबूत देखा/बताया करते थे, और इस बार सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के मामले में भी उनका वैसा ही रंग-ढंग है । सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के पक्ष में पिछले दिनों हुए होली मिलन में यही नजारा देखने को मिला कि वहाँ या तो ऐसे लोग थे, जो प्रायः हर आयोजन में होते हैं और या फिर वह लोग थे जो पिछली बार श्याम बिहारी अग्रवाल की उम्मीदवारी के साथ थे - लेकिन जो श्याम बिहारी अग्रवाल को चुनाव जितवा नहीं सके थे ।
सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं में से ही कुछेक का मानना/कहना है कि सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के मामले में सबसे बड़ी समस्या यह है कि डिस्ट्रिक्ट में उनकी कोई सक्रियता नहीं रही है, जिसके चलते न तो डिस्ट्रिक्ट के लोग उन्हें जानते/पहचानते हैं, और न वह ही डिस्ट्रिक्ट के लोगों को जानती/पहचानती हैं । सुनीता बंसल की चूँकि अपने क्लब के कार्यक्रमों में भी कोई खास भागीदारी नहीं रही/दिखी है; मौजूदा लायन वर्ष में क्लब के जो महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम हुए, उनमें सुनीता बंसल की कोई खास सक्रियता न दिखी, न रही - इसलिए उनकी उम्मीदवारी को लेकर क्लब के लोगों तथा पदाधिकारियों के बीच कोई उत्साह नहीं नजर आ रहा है, जिसका खामियाजा उनकी उम्मीदवारी को झेलना पड़ रहा है । सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के समर्थक बने विरोधी खेमे के नेताओं के बीच के आपसी 'झगड़े' भी सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के लिए मुसीबत बने हुए हैं; दरअसल विरोधी खेमे के नेताओं के बीच सुनीता बंसल की उम्मीदवारी की बागडोर संभालने को लेकर जो होड़ मची है, उससे भी सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के सामने सबसे बड़ी समस्या खड़ी हो रही है । दूसरी तरफ सत्ता खेमे में श्याम बिहारी अग्रवाल की उम्मीदवारी को स्वीकार करने को लेकर शुरू में जो हिचक और असमंजस दिख रहा था, वह काफी हद तक दूर होता नजर आ रहा है । विरोधी खेमे के नेताओं के बीच बनी/फैली असमंजसता और बिखराव की स्थिति ने भी श्याम बिहारी अग्रवाल की चुनावी स्थिति को बेहतर बनाया है ।

Monday, March 18, 2019

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में चौतरफा षड्यंत्रों और विरोध के बावजूद डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय मित्तल ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए गौरव गर्ग को बड़ी जीत दिलवा कर लायन राजनीति में इतिहास रचा

मसूरी । डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में हुए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में गौरव गर्ग ने जोरदार और ऐतिहासिक जीत हासिल की है । कुल पड़े 330 वोट में गौरव गर्ग को 316 वोट मिले; उनके प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार राजेश गुप्ता को कुल 13 वोट मिले और एक वोट निरस्त हुआ । इतनी बड़ी जीत इससे पहले डिस्ट्रिक्ट में क्या, मल्टीपल में - और संभवतः देश में किसी को नहीं मिली होगी । 330 में से 13 वोट पाने वाले राजेश गुप्ता को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनीता गुप्ता, सुनील जैन तथा लायन समाज में 'चोर' गवर्नर के रूप में कुख्यात एक अन्य पूर्व गवर्नर का समर्थन प्राप्त था; 'चोर' गवर्नर ने तो राजेश गुप्ता को समर्थन दिलवाने के उद्देश्य से मुकेश गोयल व विनय मित्तल के खिलाफ सोशल मीडिया में गाली-गलौच से भरा भारी अभियान चलाया हुआ था - तीन तीन पूर्व गवर्नर्स की मेहनत के बावजूद राजेश गुप्ता को मात्र 13 वोट ही मिल पाए । चुनाव से पहले के करीब दस दिनों में राजेश गुप्ता का चुनाव अभियान हालाँकि दम तोड़ता दिखने लगा था; वह और उनके समर्थक पूर्व गवर्नर्स ठंडे पड़ते और अपनी हार स्वीकार करते नजर आने लगे थे; लेकिन उनकी तरफ से डिस्ट्रिक्ट के लोगों को कन्फ्यूज करने तथा बरगलाने का काम जारी था; मुकेश गोयल और विनय मित्तल के बीच बनी एकता को तोड़ने के लिए तरह तरह के उपाय किए जा रहे थे और वोटिंग शुरू होने से ठीक पहले होने उम्मीदवारों द्वारा किए जाने वाले उद्बोधनों में राजेश गुप्ता बता रहे थे कि यदि वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बने तो वह आधिकारिक ड्यूज के अलावा लोगों से कोई पैसा नहीं लेंगे । चुनाव से ठीक पहले की जा रही राजेश गुप्ता और उनके समर्थक गवर्नर्स की कोशिशों को दरअसल बुरी हार से बचने की तरकीबों के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था; लेकिन अंततः उनकी कोई तरकीब काम न आई और कुल पड़े 330 वोटों में मात्र 13 वोट पाकर राजेश गुप्ता एक बड़ी पराजय को प्राप्त हुए ।            
गौरव गर्ग को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय मित्तल के उम्मीदवार के रूप में 'चित्रित' करते हुए मुकेश गोयल को भड़का कर उन्हें विनय मित्तल से अलग करने की कोशिशें चुनाव से ऐन पहले तक खूब हुईं, लेकिन एक अनुभवी व कुशल नेता के रूप में मुकेश गोयल ने डिस्ट्रिक्ट में विनय मित्तल की प्रशासनिक व राजनीतिक हैसियत को पहचान लिया था और समझ लिया था कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति की 'नब्ज' इस समय विनय मित्तल के हाथ में है, और विनय मित्तल के विरोध में होने का मतलब अपने आप को राजनीतिक रूप से खत्म कर लेना होगा - लिहाजा मुकेश गोयल किसी झाँसे में नहीं आए । गौर करने वाला तथ्य यह है कि कॉल आने और नामांकन होने से ठीक पहले तक मुकेश गोयल सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए गौरव गर्ग की उम्मीदवारी के पक्ष में बिल्कुल भी नहीं थे; वह एक तरफ तो गौरव गर्ग को हर तरह से डराने व हतोत्साहित करने के काम में लगे थे, दूसरी तरफ अन्य लोगों को उम्मीदवार बनने के लिए 'तैयार' करने के काम में जुटे थे, और तीसरी तरफ विनय मित्तल पर दबाव बना रहे थे कि वह गौरव गर्ग की जगह अपनी पसंद के और किसी को उम्मीदवार बना लें । विनय मित्तल ने लेकिन ऐसी व्यूह रचना तैयार की कि मुकेश गोयल को फिर गौरव गर्ग की उम्मीदवारी के समर्थन के लिए ही राजी होना पड़ा । इसीलिए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी प्रक्रिया के पूरे घटनाक्रम को देखने वाले लोग गौरव गर्ग की भारी जीत को वास्तव में विनय मित्तल की जीत के रूप में देख रहे हैं । लायन राजनीति में ऐसा शायद ही कभी/कहीं हुआ होगा कि एक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर 'अपने' उम्मीदवार को जीत - और वह भी भारी भरकम जीत दिलवा दे ।  
गौरव गर्ग की उम्मीदवारी के अभियान को आगे बढ़ाना विनय मित्तल के लिए भारी चुनौती का काम था । दरअसल गौरव गर्ग की एक तो डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच कोई पहचान नहीं थी, और दूसरे वह बहुत महँगा चुनाव लड़ने के लिए तैयार नहीं थे; मुकेश गोयल तो गौरव गर्ग की उम्मीदवारी के खिलाफ थे ही, गौरव गर्ग के अपने क्षेत्र मसूरी/देहरादून के दो प्रमुख पूर्व गवर्नर्स अनीता गुप्ता और सुनील जैन भी उनकी उम्मीदवारी के मुखर रूप में खिलाफ थे । सबसे बड़ी मुसीबत की बात यह हुई कि गौरव गर्ग को शुरु में ही विनय मित्तल के उम्मीदवार के रूप में पहचान लिया गया था - जिस कारण विनय मित्तल से किसी भी कारण से थोड़ी बहुत नाराजगी रखने वाले लोग भी गौरव गर्ग की खिलाफत करने लगे थे; दरअसल गौरव गर्ग की खिलाफत में वह विनय मित्तल से 'बदला लेने' का सुख पा रहे थे । ऐसे में, विनय मित्तल के लिए गौरव गर्ग की उम्मीदवारी की राह बनाना तथा उसे कामयाबी दिलवाना एक बड़ी चुनौती थी । यह बड़ी चुनौती इसलिए और भी ज्यादा बड़ी थी, क्योंकि विनय मित्तल खुद की पहचान सिर्फ एक 'चुनावबाज' नेता के रूप में नहीं बनाना चाहते हैं; वह एक अच्छे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर भी 'बनना' चाहते हैं, जो लायनिज्म के उच्च आदर्शों का पालन करते हुए लायनिज्म के काम-काज को भी न सिर्फ प्रमुखता देता है, बल्कि ईमानदारी के साथ अपना काम भी करता है । डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में 'चोर' गवर्नर की हरकतों - आपदा पीड़ितों की मदद के नाम पर मिले पैसों के साथ-साथ ड्यूज तक के पैसों को हड़पने की उसकी हरकतों के चलते - लोगों ने यह मान लिया था कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का काम हर तरह से पैसा लूटना ही होता है; और इस तरह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जैसे महत्त्वपूर्ण व प्रतिष्ठा के पद की साख गर्त में जा पड़ी थी; उसे सुधारने की जरूरी जिम्मेदारी भी विनय मित्तल ने ली हुई थी ।  
विनय मित्तल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दोहरी जिम्मेदारी ली हुई थी - एक तरफ उन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद को लोगों के बीच पुनर्प्रतिष्ठित करना था, और दूसरी तरफ हर तरह से कमजोर समझे जा रहे गौरव गर्ग की उम्मीदवारी को कामयाबी दिलवाना था । इन जिम्मेदारियों को निभाने में उन्हें तमाम लोगों - खुद 'अपने' लोगों के 'षड्यंत्रों' तथा तगड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा था; सिर्फ सामना ही नहीं करना पड़ रहा था, हर पल खतरा बना हुआ था कि कब कौन 'अपना' उनके लिए मुसीबत खड़ी कर दे । विरोधियों और अपनों के बनाये गए चक्रव्यूह में विनय मित्तल अकेले ही थे, और उन्हें अकेले ही उसमें से बाहर निकलना था । लेकिन ठहरिये - यहाँ कुछ बताना छूट रहा है । यहाँ फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजीवा अग्रवाल की भूमिका को रेखांकित न करना उनके साथ अन्याय करना होगा । एक अकेले संजीवा अग्रवाल ही हैं, जो हर तरह से और पूरे भरोसे के साथ विनय मित्तल के साथ रहे । संजीवा अग्रवाल के सहयोग के साथ विनय मित्तल ने एक साथ युधिष्ठिर और अर्जुन की भूमिका निभाई और इतिहास रचा ।