Tuesday, January 14, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में सत्ता खेमे की तरफ से आरके शाह की उम्मीदवारी को घोषित करवा कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा ने वास्तव में कई मोर्चों पर एकसाथ जीत दर्ज कर लेने का मौका बनाया है

नई दिल्ली । आरके शाह का नाम सत्ता खेमे की तरफ से सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी के लिए क्लियर करवा कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा ने कई शिकार एक साथ कर लिए हैं । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी को लेकर इस वर्ष जैसी असमंजसता रही, वैसी शायद ही कभी देखने को मिली हो । यह असमंजसता शुरू तो दरअसल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा की सोच और रणनीति के कारण हुई, लेकिन जब हर किसी ने इसमें अपनी अपनी राजनीति करने का मौका तलाशने का काम शुरू किया तो फिर असमंजसता का दायरा इस हद तक फैलता दिखा कि उसे नियंत्रित करना मुश्किल लगने लगा । विजय शिरोहा ने पहले तो असमंजसता के दायरे को सोची-समझी रणनीति के तहत फैलने दिया और फिर उसे ऐसे नतीजे के साथ समेटवाया कि बाकी खिलाड़ी हाथ मलते रह गए और विजय शिरोहा ने पैदा हो रही चुनौतियों को सिर उठाने से पहले ही दबा देने में कामयाबी प्राप्त की ।
मजे की बात यह रही कि विजय शिरोहा ने कुछ किया भी नहीं । बिना कुछ किये सब कुछ अपनी मर्जी का और अपनी सुविधा का कर लेने का उन्होंने लेकिन लक्ष्य प्राप्त कर लेने में कोई चूक नहीं की है ।
उल्लेखनीय है कि विजय शिरोहा ने शुरू से घोषणा की हुई थी कि वह सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपना कोई उम्मीदवार नहीं लायेंगे और किसी उम्मीदवार के 'भरोसे' गवर्नरी नहीं करेंगे । इस घोषणा के बावजूद सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के दोनों संभावित उम्मीदवारों - विक्रम शर्मा और आरके शाह - को उनकी गुडबुक में देखा/पाया गया । गुडबुक में होने के चलते विजय शिरोहा ने दोनों को ही डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच सक्रिय होने तथा निरंतर काम करते रहने के लिए तो प्रेरित किया, किंतु उनसे कोई फायदा उठाने की कोशिश नहीं की । किसी को भी यह झमेला समझ में नहीं आ रहा था कि विजय शिरोहा दोनों संभावित उम्मीदवारों को साथ भी लिए हुए हैं, उन्हें प्रेरित भी कर रहे हैं, उन्हें टिप्स भी दे रहे हैं - लेकिन उनसे कोई 'फायदा' उठाते हुए नहीं दिख रहे हैं और उनमें से किसी की जिम्मेदारी नहीं ले रहे हैं । दिसंबर माह में जब सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए गहमागहमी बढ़ी तब कुछेक लोगों को यह लगा तो कि विजय शिरोहा ने विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी को स्वीकार करने का मन बना लिया है, लेकिन विजय शिरोहा ने अपनी तरफ से कोई फैसला नहीं सुनाया । इस कारण से, दिसंबर और जनवरी की पहली तिमाही में पर्दे के पीछे सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार को लेकर जो जो समीकरण बनाने के प्रयास हुए उनमें प्रायः विजय शिरोहा को या तो ठिकाने और या किनारे लगाने के उद्देश्य प्रमुख हो उठे थे ।
विजय शिरोहा चूँकि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए किसी भी उम्मीदवार को लेकर दिलचस्पी नहीं दिखा रहे थे, इसलिए उनके दोस्तों और दुश्मनों को लगा कि उन्हें किनारे और ठिकाने लगाना आसान होगा । विजय शिरोहा के दुश्मन भी और दोस्त भी यह समझने/पहचानने में चूक गए कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव को लेकर विजय शिरोहा दिलचस्पी 'दिखा' भले ही न रहे हों, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें सचमुच कोई दिलचस्पी 'है' नहीं । विजय शिरोहा ने इसी राजनीतिक कौशल का इस्तेमाल किया और सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार के चयन में कोई दिलचस्पी न दिखाने के बावजूद उम्मीदवार तय भी नहीं होने 'दिया' । दिसंबर और जनवरी की पहली तिमाही में पर्दे के पीछे जो जो समीकरण बने, उनमें किसी में दिल्ली के नेताओं के एक हो जाने का फार्मूला था - जिसमें विजय शिरोहा के लिए कोई जगह नहीं थी; किसी में विजय शिरोहा को अलग करके दिल्ली और हरियाणा के नेताओं के एक हो जाने का फार्मूला था; किसी में राकेश त्रेहन और हर्ष बंसल को अलग करके विजय शिरोहा को साथ लेकर दिल्ली के नेताओं के एक होने का फार्मूला था - जिसमें विजय शिरोहा को हरियाणा के नेताओं और लोगों के बीच खलनायक बना देने का उद्देश्य छिपा हुआ था । लेकिन कोई भी फार्मूला सिरे नहीं चढ़ सका । विजय शिरोहा ने जाल कुछ इस तरह से बिछाया हुआ था कि नेता लोग अपने अपने फार्मूले लेकर घूम रहे थे लेकिन कोई भी अपने फार्मूले को क्रियान्वित नहीं करवा पा रहा था ।
विक्रम शर्मा के खैरख्वाह तो बहुत थे, लेकिन सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उनकी उम्मीदवारी को वजन सिर्फ तब मिला, जब वह विजय शिरोहा की शरण में थे - और जिस दिन वह विजय शिरोहा की नजर से गिरे उसी दिन उनकी उम्मीदवारी की हवा निकल गई । किसी नेता की - या किसी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की लायन राजनीति में ऐसी धमक शायद ही देखी गई हो । विक्रम शर्मा का पत्ता कटने के बाद सत्ता खेमे में उम्मीदवार का फैसला करना और भी मुश्किल हो गया था । आरके शाह की उम्मीदवारी को लेकर सत्ता खेमे के नेताओं में सहमति ही नहीं बन पा रही थी, और दूसरी तरफ विरोधी खेमे के लोग यह दावा कर रहे थे कि हरियाणा के नेता/लोग विजय शिरोहा के खिलाफ हैं । ऐसे माहौल में सत्ता खेमे की तरफ से आरके शाह की उम्मीदवारी को हरी झंडी मिल गई । आरके शाह की उम्मीदवारी को हरी झंडी मिलने से विजय शिरोहा इतने निश्चिंत हो गए हैं कि अभी जबकि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फरेंस होने में मुश्किल से बीस दिन से भी कम दिन बचे हैं, विजय शिरोहा बिजनेस ट्रिप पर पाँच दिन के लिए दुबई जा पहुँचे हैं । आरके शाह को चूँकि राजिंदर बंसल के नजदीक समझा जाता है, इसलिए आरके शाह की उम्मीदवारी से विजय शिरोहा के प्रति हरियाणा के नेताओं/लोगों की नाराजगी की बात अपनेआप ही बेबुनियाद साबित हो गई ।
विजय शिरोहा ने किसी उम्मीदवार को डिस्ट्रिक्ट पर थोपने का प्रयास नहीं किया - लेकिन आरके शाह सत्ता खेमे के उम्मीदवार बने हैं और सत्ता की दहलीज तक आ पहुँचे हैं तो उनके लिए रास्ता विजय शिरोहा की 'राजनीति' ने ही बनाया है - और दूसरे तमाम नेताओं की राजनीति को फेल करके बनाया है । इस तरह, सत्ता खेमे की तरफ से सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए आरके शाह की उम्मीदवारी को घोषित करवा कर विजय शिरोहा ने वास्तव में कई मोर्चों पर एकसाथ जीत दर्ज कर लेने का मौका बनाया है और अपने खुले और छिपे विरोधियों को ठिकाने लगाया है ।  

Saturday, January 11, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 में सीओएल का चुनाव संजय खन्ना की गैर मौजूदगी में करवाने की विनोद बंसल की कार्रवाई को जेके गौड़ ने रमेश अग्रवाल की उम्मीदवारी को विनोद बंसल के समर्थन के रूप में व्याख्यायित किया

नई दिल्ली । जेके गौड़ ने रमेश अग्रवाल को सीओएल(काउंसिल ऑन लेजिसलेशन) चुनवाने का बीड़ा उठा कर सीओएल के चुनाव को दिलचस्प बना दिया है । डिस्ट्रिक्ट की काउंसिल ऑफ गवर्नर्स के सदस्यों के बीच यूँ तो जेके गौड़ की ऐसी हैसियत नहीं है कि वह उन्हें रमेश अग्रवाल के पक्ष में वोट देने के लिए राजी कर सकें, लेकिन अपने गवर्नर-काल की टीम के प्रमुख सदस्यों को चुनने की तैयारी करने के कारण जेके गौड़ को 'उक्त' हैसियत मिलती दिख रही है । उन्हें लगता है कि कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ऐसे जरूर हैं जो किसी पद के लालच में उनके कहने से रमेश अग्रवाल का समर्थन करने को निश्चित ही तैयार हो जायेंगे । उल्लेखनीय है कि जेके गौड़ से पहले गवर्नर का पदभार संभालने वाले संजय खन्ना ने तो अपनी टीम लगभग बना ली है; अब अगले चार-पाँच माह में जेके गौड़ को अपनी टीम के लिए प्रमुख सदस्यों को चुनना है । इस तरह जेके गौड़ के पास चूँकि देने के लिए पद हैं, इसलिए काउंसिल ऑफ गवर्नर्स के सदस्यों के बीच रमेश अग्रवाल के लिए समर्थन जुटाने की हैसियत उन्होंने पहचान/बना ली है । इसी हैसियत को जेके गौड़ ने रमेश अग्रवाल के लिए समर्थन जुटाने में लगा दिया है ।
रमेश अग्रवाल ने चूँकि अपने आप को जेके गौड़ के गवर्नर-काल में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के रूप में 'पोज' करना शुरू कर दिया है, उस नाते से वह भी जेके गौड़ के गवर्नर-काल के पदों का लालच देकर अपने लिए समर्थन जुटाने का प्रयास कर रहे हैं । मजे की बात है कि जेके गौड़ ने अभी तक अपने गवर्नर-काल के डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का नाम नहीं लिया है; कोई इस बारे में उनसे पूछता भी है तो वह जवाब में यही कहते हैं कि वह अभी विचार कर रहे हैं । लेकिन रमेश अग्रवाल का कहना रहता है कि जेके गौड़ मेरे अलावा किसी और को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाने के बारे में सोच भी कैसे सकता है ? जो लोग जेके गौड़ की गतिविधियों को नजदीक से देख रहे हैं उनका कहना है कि पहले तो जेके गौड़ ने संकेत दिए थे कि वह सभी को साथ लेकर और सभी का विश्वास जीत कर काम करेंगे और किसी एक का पिटठू नहीं बनेंगे, लेकिन अब ऐसा लगता है कि वह पूरी तरह रमेश अग्रवाल की गिरफ्त में हैं; और उन्हें कहीं भी नाम लेना होता है तो उनके मुँह से रमेश अग्रवाल का ही नाम निकलता है । इसी भरोसे रमेश अग्रवाल अलग-अलग मौकों पर अलग-अलग लोगों के बीच दावा कर चुके हैं कि जेके गौड़ तो बस नाम का गवर्नर होगा, गवर्नरी तो मैं चलाऊँगा ।
सीओएल के उम्मीदवार के रूप में यूँ तो कई नाम सुने जा रहे हैं लेकिन मुख्य मुकाबला रमेश अग्रवाल और आशीष घोष के बीच होता दिख रहा है । आशीष घोष ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारी से निवृत्त होने के बाद देश और विदेश में रोटरी के कई बड़े और प्रमुख आयोजनों में जिम्मेदारी के पदों पर काम किया है और इस नाते से उन्हें रोटरी का व्यापक अनुभव है । रमेश अग्रवाल अभी करीब छह महीने पहले ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारी से निवृत्त हुए हैं और उन्हें रोटरी के किसी बड़े और प्रमुख आयोजन में जिम्मेदारी निभाने का मौका अभी तक नहीं मिला है । इस मूल्याँकन के आधार पर सीओएल के चुनाव में रमेश अग्रवाल के मुकाबले आशीष घोष का पलड़ा भारी माना जा रहा है । लेकिन रमेश अग्रवाल और उनके समर्थकों का मानना और कहना है कि चुनावी राजनीति में बाजी प्रायः 'खोटे सिक्के' ही जीतते हैं इसलिए आशीष घोष का व्यक्तित्व और प्रोफाइल चाहें कितना ही भारी हो, रमेश अग्रवाल की तीन-तिकड़मों का मुकाबला करना उनके लिए आसान नहीं होगा । पिछली बार के सीओएल के चुनाव का उदाहरण देते हुए वह तर्क भी करते हैं कि व्यक्तित्व और प्रोफाइल के आधार पर मुकेश अरनेजा का अशोक घोष से भला क्या मुकाबला है, लेकिन चुनाव में बाजी तो मुकेश अरनेजा के हाथ ही लगी थी न !
रमेश अग्रवाल और उनके समर्थकों को सीओएल के चुनाव के मौके पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट संजय खन्ना की अनुपस्थिति में भी अपना फायदा नजर आ रहा है । उल्लेखनीय है कि नोमीनेटिंग कमेटी द्धारा सीओएल के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चुनाव 21 जनवरी को होना निश्चित हुआ है, जिस दिन संजय खन्ना दिल्ली में नहीं होंगे । रमेश अग्रवाल और उनके समर्थकों का मानना और कहना है कि संजय खन्ना यदि होते तो वह आशीष घोष के लिए समर्थन जुटा सकते थे । और तो और, संजय खन्ना की गैर मौजूदगी में सीओएल का चुनाव करवाने की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल की कार्रवाई को जेके गौड़ ने तो रमेश अग्रवाल की उम्मीदवारी को विनोद बंसल के समर्थन के रूप में व्याख्यायित कर दिया है । जेके गौड़ ने कुछेक लोगों के बीच तर्कपूर्ण दावा किया है कि विनोद बंसल सीओएल के लिए रमेश अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में यदि नहीं होते तो ऐसे समय चुनाव क्यों करवाते, जबकि संजय खन्ना यहाँ नहीं हैं । विनोद बंसल ने हालाँकि इस बात को गलत बताया है । उनका कहना है कि डिस्ट्रिक्ट के कार्यक्रमों और संजय खन्ना के बाहर जाने की तारीखों का चक्कर ही कुछ ऐसा पड़ा कि सीओएल का चुनाव संजय खन्ना की अनुपस्थिति में करवाना मजबूरी ही बना है ।
रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ जैसे उनके 'सिपाही' ने सीओएल के चुनाव को भी तिकड़मी, जुगाड़ु और गटर-छाप टाइप राजनीति में बदल दिया है । दरअसल इन्हें भी मालुम है कि काउंसिल ऑफ गवर्नर्स में रमेश अग्रवाल की कोई साख नहीं है और इस नाते उनके लिए कोई समर्थन नहीं है; अभी करीब छह महीने पहले तक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रमेश अग्रवाल को काउंसिल और गवर्नर्स में कई बार अपने फैसलों और अपनी कारस्तानियों के कारण अलग-थलग पड़ जाना पड़ा और अपमानित होना पड़ा है । उन्हीं सब बातों और अनुभवों को याद करते हुए रमेश अग्रवाल और उनके समर्थकों को लगता है कि उन्होंने यदि सीधे और साफ और गरिमापूर्ण तरीके से चुनाव लड़ा तो फिर उन्हें आशीष घोष से हारना ही पड़ेगा । सो, जीतने के लिए उन्हें हथकंडे अपनाने ही पड़ेंगे । इस मामले में आशीष घोष के मुकाबले रमेश अग्रवाल खुशकिस्मत हैं, क्योंकि रमेश अग्रवाल को अपने हथकंडे दिखाने/अपनाने के लिए जेके गौड़ का साथ/सहयोग मिल गया है ।

Friday, January 10, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में राकेश त्रेहन को शक होने लगा है कि उन्हें अँधेरे में रख कर अजय बुद्धराज ने कहीं सत्ता खेमे से संबंध तो नहीं जोड़ लिए हैं

नई दिल्ली । राकेश त्रेहन की सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी को विरोधी खेमे की हरी झंडी दिलवाने की कोशिशों में अजय बुद्धराज ने अड़ंगा डाल दिया है । अजय बुद्धराज ने यह अड़ंगा इस तर्क के साथ डाला है कि विक्रम शर्मा को वह चुनाव जितवा तो नहीं पायेंगे - आखिर तब फिर विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी को लेकर वह चुनाव में क्यों जाएँ ? अजय बुद्धराज के इस तर्कपूर्ण अड़ंगे से विक्रम शर्मा और राकेश त्रेहन को तगड़ा झटका लगा है । विक्रम शर्मा के लिए तो 'न इधर के रहे, और न उधर के' वाला किस्सा हो गया है; जबकि राकेश त्रेहन के लिए इस वर्ष की चुनावी राजनीति में कतई अप्रासंगिक होने का खतरा पैदा हो गया है । राकेश त्रेहन को अजय बुद्धराज से इस तरह का झटका मिलने की उम्मीद नहीं थी - राकेश त्रेहन को यह आशंका तो थी कि विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी को अपने खेमे के दूसरे नेताओं का समर्थन दिलवाना उनके लिए आसान नहीं होगा, लेकिन उन्हें यह आभास नहीं था कि विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी को अपनाने के उनके अभियान में अजय बुद्धराज ही रोड़ा अटका देंगे ।
अजय बुद्धराज के इस रवैये ने राकेश त्रेहन को चौंकाया है और इसमें राकेश त्रेहन को अजय बुद्धराज की एक अलग खिचड़ी पकने की महक आ रही है । राकेश त्रेहन को आशंका हो रही है कि अजय बुद्धराज कहीं डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा से तो मिल जाने की तैयारी नहीं कर रहे हैं ।
दरअसल राकेश त्रेहन भी इस बात को समझ रहे हैं कि वह विक्रम शर्मा को चुनाव नहीं जितवा सकेंगे । राकेश त्रेहन भले ही कहें न और स्वीकार न करें, लेकिन वह भी जान/समझ रहे हैं कि उम्मीदवार तो वही जीतेगा जिसे विजय शिरोहा का समर्थन होगा । इसीलिये राकेश त्रेहन ने बड़ी चतुराई से विक्रम शर्मा को विजय शिरोहा के हाथों से 'छीन' लिया । विक्रम शर्मा पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि उन्हें किसी का समर्थन मिले या न मिले, वह तो इस बार उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे ही । राकेश त्रेहन की चाल यह रही कि विक्रम शर्मा को पहले तो विजय शिरोहा के हाथों से छुड़ा लो, और फिर विक्रम शर्मा को समर्थन की घोषणा करो । विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी के जरिये राकेश त्रेहन ने असल में, अपने और अपने खेमे के दूसरे नेताओं के फर्जी क्लब्स और सदस्यों के ड्यूज जुटाने की तिकड़म लगाई । विरोधी खेमे के नेताओं के सामने चूँकि अपने अपने फर्जी क्लब्स और सदस्यों के ड्यूज जुटाने की समस्या है - इसलिए ही राकेश त्रेहन को भरोसा रहा कि विक्रम शर्मा का 'शिकार' कर लेने के बाद उनकी उम्मीदवारी को खेमे के नेताओं का समर्थन दिलवाने में उन्हें कोई समस्या नहीं आयेगी ।
अजय बुद्धराज ने लेकिन समस्या पैदा कर दी है । अजय बुद्धराज के सामने भी हालाँकि अपने फर्जी क्लब्स व सदस्यों के ड्यूज जुटाने की चुनौती है - लेकिन इसके लिए वह हार का सामना करने से बचना चाहते हैं । इसीलिए वह विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी का समर्थन करने से इंकार कर रहे हैं । वह समझ रहे हैं कि अपने फर्जी किस्म के क्लब्स और सदस्यों के ड्यूज जुटाने के चक्कर में वह जिस पराजय को पायेंगे - उससे उन्हें दूरगामी नुकसान होगा ।
अजय बुद्धराज के पास लेकिन इस सवाल का कोई जबाव नहीं है कि उनके और उनके खेमे के दूसरे नेताओं के फर्जी क्लब्स और सदस्यों के ड्यूज कैसे और किससे मिलेंगे ? इस सवाल का कोई जबाव न होने के बावजूद अजय बुद्धराज जिस तरह से विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी का समर्थन करने से इंकार कर रहे हैं - उससे राकेश त्रेहन को शक हो रहा है कि अजय बुद्धराज उनसे छिपा कर कुछ अलग खिचड़ी पका रहे हैं । राकेश त्रेहन ने अपने कुछ लोगों से पूछने वाले अंदाज में कहा/बताया है कि अजय बुद्धराज कहीं डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा से तो नहीं जा मिले हैं ? उल्लेखनीय है कि राकेश त्रेहन को यह तो पता है ही कि अजय बुद्धराज की दीपक टुटेजा और अरुण पुरी के साथ बातचीत होती रहती है - इसी नाते से राकेश त्रेहन को शक हो रहा है कि अजय बुद्धराज ने कहीं इन दोनों के मार्फ़त विजय शिरोहा से संबंध तो नहीं जोड़ लिया है; और इस तरह से अपने फर्जी क्लब्स और सदस्यों के ड्यूज पाने का जुगाड़ कर लिया है ।
राकेश त्रेहन दरअसल यह समझ रहे हैं कि सत्ता खेमे के नेताओं की यह कोशिश तो होगी ही कि उनके उम्मीदवार को चुनाव का सामना न करना पड़े - और अजय बुद्धराज का रवैया सत्ता खेमे के नेताओं की उसी 'कोशिश' की मदद कर रहा है । वास्तव में, राकेश त्रेहन को इसीलिए लग रहा है कि अजय बुद्धराज ने गुपचुप रूप से सत्ता खेमे के साथ संबंध जोड़ लिए हैं । राकेश त्रेहन के कारण विक्रम शर्मा का जो अच्छा-खासा बना-बनाया काम बिगड़ा है, उसके चलते तो राकेश त्रेहन की बदनामी हुई ही है - अब यदि अजय बुद्धराज के उनसे छिप-छिपाकर सत्ता खेमे से संबंध बनाने की बात भी सच साबित हुई तो राकेश त्रेहन के लिए तो बड़ी समस्या हो जायेगी ।

Tuesday, January 7, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में राकेश त्रेहन के साथ हुई विक्रम शर्मा की मेल-मुलाकात पर सत्ता खेमे के नेताओं के बिफरने के चलते सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार चुनने का काम और विकट हो गया है

नई दिल्ली । विक्रम शर्मा की विरोधी खेमे के नेताओं - खासकर राकेश त्रेहन के साथ हुई मेल-मुलाकातों की खबरें मिलने के बाद सत्ता खेमे के नेताओं के बीच सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में बनते दिख रहे समर्थन को लेकर विवाद पैदा हो गया है । मजे की बात यह हुई है कि सत्ता खेमे के नेताओं के बीच पैदा हुए इस विवाद को भड़काने में विरोधी खेमे के नेताओं का - खासतौर से राकेश त्रेहन का हाथ माना/पहचाना जा रहा है । उल्लेखनीय है कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार तय करने को लेकर जो परिस्थितियाँ बनीं, उसमें विक्रम शर्मा के नंबर पिछले दिनों अचानक से बढ़े हुए नजर आये थे । विक्रम शर्मा को हालाँकि विरोधी खेमे के नेताओं के नजदीक पहचाना जाता रहा था, लेकिन पिछले कुछ दिनों में विक्रम शर्मा ने विरोधी खेमे के नेताओं के साथ संबंध ख़त्म करके सत्ता खेमे के नेताओं के साथ संबंध बना लिए थे । सत्ता खेमे में उन्हें हालाँकि अभी तक भी पूरी तरह स्वीकार नहीं किया जा सका है - सत्ता खेमे के दिल्ली के नेताओं के बीच उनकी प्रतिबद्धता को लेकर शक/संदेह अभी भी बना हुआ है; लेकिन फिर भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा के यहाँ पैठ बना कर उन्होंने सत्ता खेमे में अपनी स्थिति अपेक्षाकृत रूप से अच्छी बना ली थी । दरअसल जो स्थितियाँ बनीं, विक्रम शर्मा को उसका फायदा मिलता हुआ दिख रहा था ।
लेकिन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश त्रेहन के साथ हाल ही में हुईं मेल-मुलाकातों की ख़बरें मिलने के बाद विक्रम शर्मा की स्थिति सत्ता खेमे में फिर संदेहपूर्ण हो उठी हैं । सत्ता खेमे में एक विजय शिरोहा ही विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी के पैरोकार हो सकते थे, लेकिन राकेश त्रेहन के साथ हुईं उनकी मेल-मुलाकातों की ख़बरों ने विजय शिरोहा के मन में भी शक/संदेह के बीज डाल दिए हैं । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि विक्रम शर्मा को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित करने का काम राकेश त्रेहन ने ही किया था । किंतु जल्दी ही विक्रम शर्मा ने समझ लिया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा की मदद मिले बिना डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने का उनका सपना पूरा नहीं होगा - लिहाजा विक्रम शर्मा ने विजय शिरोहा के साथ नजदीकी बनाने का काम शुरू किया । इस काम में उन्हें निरंतर सफलता भी मिलती गई । विजय शिरोहा के साथ बनी नजदीकी का राजनीतिक फायदा उठाने के लिए विक्रम शर्मा ने इस बात को भी समझ लिया कि उन्हें विरोधी खेमे के नेताओं से - विशेषकर राकेश त्रेहन के साथ दूरी बनानी - सिर्फ बनानी ही नहीं, बल्कि 'दिखानी' भी पड़ेगी । विक्रम शर्मा ने इस 'काम' को करने में काफी देर तो कर दी, लेकिन फिर भी उन्होंने इसे कर लिया । विक्रम शर्मा चूँकि विरोधी खेमे के नेताओं का साथ छोड़ कर पूरी तरह से सत्ता खेमे के नेताओं की शरण में आ गए थे, इसलिए सत्ता खेमे की तरफ से उनकी उम्मीदवारी को हरी झंडी मिलने की संभावना भी बनती दिखने लगी थी ।
यह संभावना लेकिन राकेश त्रेहन से जिस मेल-मुलाकात के कारण खतरे में पड़ी दिखाई दे रही है - उसे लेकर यह विवाद भी शुरू हो गया है कि उक्त मेल मुलाकात विक्रम शर्मा की पहल पर हुई या उसे विक्रम शर्मा का खेल बिगाड़ने के उद्देश्य से राकेश त्रेहन ने अंजाम दिया ? कुछेक लोगों को लगता है कि विक्रम शर्मा राजनीति की 'नजाकत' को नहीं समझ रहे हैं और 'राजनीतिक नासमझी' में राकेश त्रेहन से मिल बैठे और अपनी उम्मीदवारी के लिए खतरा पैदा कर लिया । अन्य कुछेक लोग इसमें लेकिन राकेश त्रेहन की चाल देख रहे हैं । राकेश त्रेहन जानते/समझते हैं कि उनकी और विक्रम शर्मा की मेल-मुलाकात की ख़बरें मिलेंगी तो विजय शिरोहा भड़केंगे और तब विक्रम शर्मा का खेल बिगड़ेगा । कुछेक लोगों को लगता है कि राकेश त्रेहन अभी भी ओंकार सिंह के लिए 'रास्ता' बनाने की ताक में हैं, और इसके लिए उन्हें विक्रम शर्मा को 'गिराना' जरूरी लगता है । 'चित भी मेरी और पट भी मेरी' वाले स्टाइल में राकेश त्रेहन की चाल में यह भी मौका रहा कि विक्रम शर्मा यदि नहीं 'गिरते' हैं तो राकेश त्रेहन भी उनके 'बनने' का श्रेय ले लेंगे ।
विरोधी खेमे के नेताओं को एक और भी चिंता सता रही है - वह चिंता यह कि यदि चुनाव की स्थितियाँ नहीं बनीं तो उनके जो फर्जी किस्म के क्लब्स और वोट हैं उनके ड्यूज का पैसा नहीं मिल पायेगा और उन्हें उन क्लब्स और वोटों से हाथ धोना पड़ जायेगा । ऐसा होने पर उनकी तो राजनीति ही चौपट हो जायेगी । राकेश त्रेहन और विक्रम शर्मा के बीच हुई मेल-मुलाकात को इस नजरिये से भी देखा जा रहा है । इसलिए भी राकेश त्रेहन के साथ हुई विक्रम शर्मा की मेल-मुलाकात पर सत्ता खेमे के लोग बिफरे हुए हैं । विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी के प्रति सत्ता खेमे के नेताओं के बिफरने के चलते सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार चुनने का काम और विकट हो गया है ।

Sunday, January 5, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल को चौतरफा बदनामी और फजीहत के बाद अंततः डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को स्वीकार करने की घोषणा करनी ही पड़ी

मेरठ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल ने अंततः वह फैसला सुना ही दिया, जिसे सुनाने से इंकार करने के कारण पिछले करीब दो महीने से उनकी भारी फजीहत और छीछालेदर हो रही थी । बेचारे राकेश सिंघल - अभी तक लोग उनकी इस बात के लिए आलोचना कर रहे थे कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए आये नामांकनों की वैधता पर वह कोई फैसला नहीं ले रहे हैं; लेकिन अब जब उन्होंने फैसला सुना दिया है तो लोग यह कहते हुए उन्हें निशाना बना रहे हैं कि उन्हें यदि यही फैसला करना था तो फिर इतना नाटक करने की क्या जरूरत थी ? राकेश सिंघल ने जो किया, उसे व्याख्यायित करने के लिए कुछ लोगों ने एक पुरानी कविता को याद किया - ' खाया/पिया कुछ नहीं, गिलास तोड़ा बारह आना'; कुछ गर्म दिमाग और बदतमीज स्वभाव वाले लोगों ने 'जूते भी खाये, और प्याज भी खाया' वाला मुहावरा भी हवा में उछाला - लेकिन अधिकतर लोगों ने माना कि 'अंत भला तो सब भला ।' ऐसे लोगों का मानना और कहना रहा कि राकेश सिंघल को अंततः सद्बुद्धि आई, जिसके चलते उन्होंने झुकना स्वीकार किया और उनकी तथा डिस्ट्रिक्ट की और ज्यादा बदनामी होने से बच गई ।
हमारे यहाँ माना/कहा भी जाता है कि सुबह का भूला यदि शाम को घर लौट आये तो उसे भूला नहीं कहा जाता है ।
इस आधार पर लेकिन कई लोग अभी भी राकेश सिंघल को माफ़ करने के मूड में नहीं हैं । उनका तर्क है कि राकेश सिंघल कुछ भूले नहीं थे, उन्होंने षड्यंत्रपूर्वक एक योजना बनाई थी; और वह पश्चाताप करते हुए लौटे नहीं हैं, वह तब लौटे हैं जब लौटने के लिए मजबूर हुए हैं ।
राकेश सिंघल की षड्यंत्रपूर्ण योजना में अपना फायदा देख रहे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के एक उम्मीदवार दीपक बाबू और उनके समर्थकों के लिए आश्चर्य की बात यह रही कि अभी पाँच-छह दिन पहले तक ताल ठोक रहे और 'देख लेंगे' 'निपट लेंगे' जैसे दावे कर रहे राकेश सिंघल ने अचानक से पलटी क्यों मार ली ? उल्लेखनीय है कि 29 दिसंबर को होने वाली कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग को ऐन मौके पर स्थगित करके राकेश सिंघल ने यह स्पष्ट संकेत दे दिया था कि वह 'अपने' फैसले में कॉलिज और गवर्नर्स की भी नहीं सुनेंगे । 31 दिसंबर को राकेश सिंघल के घर पर संजीव रस्तोगी, सुनील गुप्ता, ब्रज भूषण तथा कुछेक अन्य लोगों की उपस्थिति में हुई अनौपचारिक मुलाकात में भी काफी गर्मागर्मी हुई थी, जिसमें संजीव रस्तोगी को यहाँ तक धमकाया गया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में मुरादाबाद में वह कैसे घुस पायेंगे । यहीं राकेश सिंघल ने एक बार फिर यह घोषणा की कि पाँच जनवरी को मेरठ में होने वाली संजीव रस्तोगी की बॉन बॉयज मीटिंग में वह शामिल नहीं होंगे । इससे लगा था कि राकेश सिंघल पूरी तरह से टकराव के मूड में हैं । लेकिन उसके तुरंत बाद ही घटनाचक्र तेजी से घूमा और फिर राकेश सिंघल को जमीन पर आने में देर नहीं लगी ।
टकराव का मूड दिखाने के तुरंत बाद ही राकेश सिंघल को पहला झटका तब लगा जब रोटरी इंटरनेशनल की तरफ से उन्हें साफ जबाव मिल गया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में लिए गए उनके फैसले को तभी स्वीकार किया जायेगा जब वह कॉलिज ऑफ गवर्नर्स द्धारा अनुमोदित होगा । इसके साथ ही राकेश सिंघल को पता चला कि उनकी डिस्ट्रिक्ट कॉन्फरेंस में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू के कानों तक भी उनकी कारस्तानियों के किस्से पहुँच गए हैं और वह उनके किये-धरे से नाराज हो रहे हैं । इसके अलावा, राकेश सिंघल के सामने यह स्पष्ट होता ही जा रहा था कि डिस्ट्रिक्ट में उन्होंने जो झगड़ा पैदा किया है उसके चलते उनकी डिस्ट्रिक्ट कॉन्फरेंस का कबाड़ा होना निश्चित ही है । इन सब बातों से राकेश सिंघल ने अपने आप को चारों तरफ से घिरा हुआ पाया और फिर उनके तेवरों ने ढीले होने में समय नहीं लिया ।
राकेश सिंघल ने तुरंत स्थितियों को सँभालने का ऑपरेशन शुरू किया और अपने लिए सम्मानजनक वापसी का एक फॉर्मूला तैयार किया । मुजफ्फरनगर में सरेआम उनकी जो फजीहत हुई थी, उसके लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार दिवाकर अग्रवाल को जिम्मेदार ठहराकर उन्होंने पहले दिवाकर अग्रवाल से माफी मँगवाने की शर्त रखी । पाँच जनवरी को मेरठ में होने वाली संजीव रस्तोगी की बॉन बॉयज मीटिंग के लिए राकेश सिंघल ने एक पटकथा तैयार की जिसके अनुसार पहले दिवाकर अग्रवाल द्धारा माफी माँगने का कार्यक्रम संपन्न होना था और फिर राकेश सिंघल को उनकी उम्मीदवारी को मान्यता देने की घोषणा करनी थी । दिवाकर अग्रवाल ने लेकिन माफी मॉँगने से इंकार कर दिया । उनका कहना रहा कि मुजफ्फरनगर में जो कुछ भी हुआ, उसमें उनकी कोई भूमिका नहीं थी - जो कुछ भी हुआ वह डिस्ट्रिक्ट के लोगों के गुस्से का इजहार था, उसके लिए वह माफी क्यों माँगे । राकेश सिंघल ने तब सुझाव दिया कि माफी न सही, दिवाकर अग्रवाल खेद तो प्रकट करें ताकि उनके लिए सम्मानजनक वापसी का मौका बन सके । डिस्ट्रिक्ट के कई प्रमुख लोगों के हस्तक्षेप के बाद फार्मूला यही बना कि दिवाकर अग्रवाल खेद व्यक्त करेंगे और फिर राकेश सिंघल उनकी उम्मीदवारी को स्वीकार करने की घोषणा करेंगे ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट संजीव रस्तोगी की बॉन बॉयज मीटिंग में पहले से तैयार पटकथा को क्रियान्वित करने का माहौल बनाया गया - दिवाकर अग्रवाल ने बड़ी होशियारी से तैयार किये गए बयान को पढ़ा जिसमें राकेश सिंघल के घावों पर मलहम लगाने की कोशिश की गई थी । उसके बाद राकेश सिंघल को अपने हिस्से की भूमिका निभानी थी - 'चोर चोरी से जाये, हेराफेरी से न जाये' वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए राकेश सिंघल ने लेकिन इस मौके पर भी शरारत करने की कोशिश की । दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को सीधे-सीधे स्वीकार करने की बजाये उन्होंने इधर-उधर की बातें करके निकलने की कोशिश की । उनके इस रवैये पर माहौल गर्म होना शुरू हो गया ।
राकेश सिंघल को लेकिन जल्दी ही समझ में आ गया कि दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को स्वीकार करने के अलावा उनके पास कोई चारा बचा नहीं है - सो, चारों तरफ से घिर जाने के बाद राकेश सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को स्वीकार करने की घोषणा अंततः कर ही दी । 

Saturday, January 4, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में शिव कुमार चौधरी की उम्मीदवारी का समर्थन करने के मुकेश गोयल के फैसले को मुकेश गोयल के कई साथियों/सहयोगियों ने ही पसंद नहीं किया है

गाजियाबाद । शिव कुमार चौधरी को मुकेश गोयल के दरबार में समर्पण करने के लिए अंततः मजबूर होना ही पड़ा है । कल तक मुकेश गोयल को हर जगह भला-बुरा कहने वाले शिव कुमार चौधरी की मुकेश गोयल के घर मुकेश गोयल के साथ बैठे होने की तस्वीरें वाट्स अप पर उपलब्ध करवा कर अब यह संदेश दिया जा रहा है कि मुकेश गोयल ने शिव कुमार चौधरी को अपने उम्मीदवार के रूप में मान्यता दे दी है । मुकेश गोयल के घर हुई मीटिंग के एक प्रत्यक्षदर्शी ने इन पँक्तियों के लेखक को बताया कि अभी तक खुद को कुञ्ज बिहारी अग्रवाल का उम्मीदवार बताने वाले शिव कुमार चौधरी ने मुकेश गोयल को भरोसा दिया है कि उनकी उम्मीदवारी के नेता वही होंगे और उनके कहे अनुसार ही वह आगे काम करेंगे ।
शिव कुमार चौधरी की इस कलाबाजी ने सभी को चौंकाया है - क्योंकि अभी तक शिव कुमार चौधरी लोगों को यही कहते/बताते थे कि उन्हें तो दूसरे खेमे के नेताओं ने समर्थन दे दिया है और वह मुकेश गोयल से तो दूर ही रहेंगे । शिव कुमार चौधरी सिर्फ यह कहते ही नहीं थे, बल्कि मुकेश गोयल को इग्नोर करने का खुलेआम प्रदर्शन भी करते थे । वह कहते भी थे कि वह पप्पू भाई और राजीव अग्रवाल को अपने साथ तो सिर्फ इसीलिए रखते हैं ताकि मुकेश गोयल को चिढ़ा सकें । कल तक मुकेश गोयल को इग्नोर और अपमानित करने के मौकों की तलाश में रहने वाले शिव कुमार चौधरी अब मुकेश गोयल की शरण में आने के लिए आखिर क्यों मजबूर हो गए ?
शिव कुमार चौधरी दरअसल दावा तो करते थे कि उनकी उम्मीदवारी को दूसरे खेमे का समर्थन मिल गया है, लेकिन दूसरे खेमे के नेताओं के बीच उनकी उम्मीदवारी को लेकर सहमति नहीं बन पा रही थी । दूसरे खेमे के कई नेताओं का साफ कहना रहा कि शिव कुमार चौधरी को अभी कुछ वर्ष काम करना चाहिए तथा लोगों के साथ व्यवहार करना सीखना चाहिए और तब उम्मीदवारी प्रस्तुत करना चाहिए । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनीता गुप्ता ने जरूर उनके साथ रियायत बरती और कुछ वर्ष नहीं, सिर्फ दो महीने का समय दिया कि वह अपने तौर-तरीके में सुधार करें तो उनकी उम्मीदवारी का समर्थन किया जा सकता है । इस बात का पता तो नहीं चल पाया है कि शिव कुमार चौधरी ने अनीता गुप्ता की रियायत को गंभीरता से लिया या नहीं; लेकिन इस बात का पता लोगों को जरूर चल गया कि अनीता गुप्ता ने शिव कुमार चौधरी की उम्मीदवारी को गंभीरता से नहीं लिया और उन्होंने अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया । अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी को एक तरफ तो दूसरे खेमे के दो बड़े नेताओं - आरसी जैन और एसएन मित्तल का समर्थन मिल गया और दूसरी तरफ मुकेश गोयल खेमे के सुनील जैन का समर्थन मिल गया । दूसरे खेमे के एक बड़े नेता कुञ्ज बिहारी अग्रवाल अभी भी हालाँकि शिव कुमार चौधरी की उम्मीदवारी के समर्थन में बताये जा रहे थे, लेकिन शिव कुमार चौधरी ने समझ लिया था कि कुञ्ज बिहारी अग्रवाल के भरोसे उनके लिए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनना मुश्किल ही नहीं, असंभव ही होगा । ऐसे में, शिव कुमार चौधरी के सामने मुकेश गोयल की शरण में आने के अलावा और कोई चारा ही नहीं बचा था ।
मुकेश गोयल की शरण में आने के बाद भी शिव कुमार चौधरी के लिए मुश्किलें लेकिन कम होती हुई नजर नहीं आ रही हैं । इसका कारण यह है कि मुकेश गोयल ने भले ही उन्हें उम्मीदवार के रूप में स्वीकार कर लिया हो, लेकिन मुकेश गोयल के कई साथियों/सहयोगियों ने मुकेश गोयल के इस फैसले को पसंद नहीं नहीं किया है । मुकेश गोयल के ऐसे साथियों/सहयोगियों में कुछ तो शिव कुमार चौधरी के व्यवहार और तौर-तरीके से पीड़ित हैं और कुछेक को लगता है कि शिव कुमार चौधरी का समर्थन करके मुकेश गोयल धोखा ही खायेंगे । मुकेश गोयल की टीम पहले से ही छिन्न-भिन्न है - शिव कुमार चौधरी की उम्मीदवारी के समर्थन के मुद्दे पर मुकेश गोयल की टीम के सदस्यों के बिदकने से मुकेश गोयल का समर्थन-आधार और कमजोर ही होगा । मुकेश गोयल का कमजोर पड़ता समर्थन-आधार शिव कुमार चौधरी के कितना और कैसे काम आएगा - इसे समझना और इससे उबरना शिव कुमार चौधरी के लिए एक बड़ी चुनौती है ।

Friday, January 3, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में पिछले वर्ष विशाल सिन्हा को हरवाने में दिन-रात एक कर देने और विशाल सिन्हा के हारने पर झूम के नाचने वाले वाले केएस लूथरा इस वर्ष उन्हीं विशाल सिन्हा की उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे क्या ?

लखनऊ । विशाल सिन्हा को केएस लूथरा के समर्थन का दावा करके गुरनाम सिंह ने केएस लूथरा के लिए डिस्ट्रिक्ट में भारी मुसीबत खड़ी कर दी है । डिस्ट्रिक्ट में केएस लूथरा के समर्थकों के लिए गुरनाम सिंह के इस दावे पर यकीन करना असंभव बना हुआ है । केएस लूथरा के समर्थकों के लिए ही नहीं, डिस्ट्रिक्ट के दूसरे लोगों के लिए भी इस बात पर विश्वास करना इसलिए मुश्किल हो रहा है क्योंकि केएस लूथरा ने पिछले लायन वर्ष में ही गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा के खिलाफ गंभीर अभियान चलाया था और इन्हें चुनावी पटखनी देने का असंभव-सा काम संभव कर दिखाया था । केएस लूथरा कुछ महीने पहले तक डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच गुरनाम सिंह की मनमानी और उनकी चौधराहट को डिस्ट्रिक्ट से हमेशा हमेशा के लिए ख़त्म कर देने का आह्वान कर रहे थे । उनके आह्वान और गुरनाम सिंह के खिलाफ चलाये गए अभियान के दौरान की गईं उनकी बातें लोगों के जहन में चूँकि अभी तक भी ताजा हैं, इसलिए किसी के लिए भी गुरनाम सिंह के इस दावे पर यकीन करना संभव नहीं हो रहा है कि पिछले लायन वर्ष में विशाल सिन्हा को हरवाने में दिन-रात एक कर देने वाले और विशाल सिन्हा के हारने पर झूम के नाचने वाले वाले केएस लूथरा इस वर्ष उन्हीं विशाल सिन्हा की उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे ।
गुरनाम सिंह भी जानते हैं कि डिस्ट्रिक्ट में लोग उनकी इस बात का विश्वास नहीं करेंगे, इसीलिए उन्होंने कुछ लोगों को केएस लूथरा से फोन करवाये । जिन लोगों को गुरनाम सिंह के दावे को सच साबित करता हुआ केएस लूथरा का फोन मिला, वह पहले तो हैरान हुए - लेकिन फिर इसे गुरनाम सिंह की कलाकारी के रूप में पहचानते/समझते हुए इसे अनदेखा किया । डिस्ट्रिक्ट में लोग अब गुरनाम सिंह की इस तरकीब को जान/पहचान गए हैं - कि गुरनाम सिंह अपने सामने अपने मतलब के फोन करवाने का काम करते हैं । सामने-सामने हर किसी के लिए गुरनाम सिंह के आग्रह को टालना संभव भी नहीं होता है । इसीलिये केएस लूथरा का फोन सुनने वाले लोगों ने भी माना/समझा कि उन्होंने जो फोन सुना वह केएस लूथरा ने उन्हें किया नहीं है, बल्कि गुरनाम ने केएस लूथरा से करवाया है ।
सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए विशाल सिन्हा की उम्मीदवारी को केएस लूथरा के समर्थन का गुरनाम सिंह का दावा लोगों के गले नहीं उतर रहा है तो इसका कारण सिर्फ यही नहीं है कि केएस लूथरा पिछले लायन वर्ष में विशाल सिन्हा की उम्मीदवारी के खिलाफ थे; इसका कारण बल्कि यह है कि डिस्ट्रिक्ट में हर कोई इस बात को जानता है कि गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा ने केएस लूथरा को किस हद तक परेशान और अपमानित किया है । गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा ने केएस लूथरा के लिए किस किस तरह की बातें कीं और किस किस तरह के शब्दों का इस्तेमाल किया - इसे डिस्ट्रिक्ट में हर व्यक्ति जानता है; और इसीलिये किसी को भी इस बात का विश्वास नहीं हो रहा है कि केएस लूथरा किसी भी तरह से गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा के साथ जा सकेंगे । केएस लूथरा के नजदीकियों का कहना है कि गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा ने जिस तरह का व्यवहार केएस लूथरा के साथ किया है और केएस लूथरा ने जिस तरह का अभियान उनके खिलाफ चलाया है - उसके बाद केएस लूथरा यदि उनके साथ हो जाते हैं तो लोगों के बीच बनी हुई अपनी सारी साख और प्रतिष्ठा को हमेशा हमेशा के लिए खो देंगे; डिस्ट्रिक्ट में फिर कोई केएस लूथरा की किसी भी बात का कभी विश्वास नहीं करेगा ।
केएस लूथरा के नजदीकियों का मानना और कहना है कि केएस लूथरा भी इस बात को अच्छी तरह जानते/समझते हैं कि अपना काम निकाल लेने के बाद गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा उन्हें दोबारा से दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेकेंगे । गुरनाम सिंह को केएस लूथरा से ज्यादा भला और कौन जान/समझ सकता है ? उल्लेखनीय है कि केएस लूथरा एक समय गुरनाम सिंह के बड़े खास हुआ करते थे - लेकिन फिर भी वह गुरनाम सिंह के कोप से नहीं बच पाये और उनके द्धारा ही नहीं, उनकी शह पर विशाल सिन्हा के द्धारा भी बुरी तरह परेशान और अपमानित किये गए । केएस लूथरा के नजदीकियों का कहना है कि अभी गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा अपना काम निकालने के लिए भले ही केएस लूथरा को पटाने तथा अपनी तरफ करने का प्रयास कर रहे हों - लेकिन काम निकलने के बाद वह केएस लूथरा के साथ फिर वैसा ही सुलूक करेंगे जैसा कि पीछे उन्होंने किया था ।
केएस लूथरा के नजदीकियों को यह भी लगता है कि गुरनाम सिंह ने केएस लूथरा को हमेशा के लिए निपटा देने के उद्देश्य से ही उन्हें मनाने/पटाने का नाटक रचा है । दरअसल केएस लूथरा को गुरनाम सिंह ने अपने सबसे खतरनाक विरोधी के रूप में पहचाना है । यह सच है कि गुरनाम सिंह ने सबसे ज्यादा ऐसी-तैसी केएस लूथरा की ही की है, लेकिन सच यह भी है कि केएस लूथरा ने भी तुरंत ही उनसे बदला भी ले लिया । गुरनाम सिंह समझ रहे हैं कि केएस लूथरा को लड़ कर नहीं, 'दोस्ती' करके ही निपटाया जा सकता है - लिहाजा उन्होंने केएस लूथरा से दोस्ती करने तथा उन्हें अपने साथ लाने का अभियान छेड़ दिया है । गुरनाम सिंह जानते हैं कि केएस लूथरा उनके साथ आ गए तो फिर डिस्ट्रिक्ट में केएस लूथरा अपने लोगों का विश्वास खो देंगे और फिर कोई भी उनका उस तरह से साथ नहीं देगा, जैसा कि पिछले वर्ष केएस लूथरा को मिला था । और इस तरह केएस लूथरा अपने समर्थन आधार को पूरी तरह खो देंगे और तब गुरनाम सिंह का पिछले वर्ष का बदला भी पूरा हो जायेगा ।
केएस लूथरा भी लगता है कि गुरनाम सिंह के इस खेल को समझ/पहचान रहे हैं और इसीलिए वह उस तरह से सक्रिय नहीं हो रहे हैं जैसे कि गुरनाम सिंह चाहते हैं । गुरनाम सिंह ने जबर्दस्ती उनसे जिन लोगों को फोन करवा लिए, उन्होंने सिर्फ उन्हीं लोगों को फोन किया है । इस तरह, केएस लूथरा ने अभी अपनी तरफ से विशाल सिन्हा की उम्मीदवारी का समर्थन करने को लेकर कोई उत्साह नहीं दिखाया है । लगता है कि वह भी समझ रहे हैं कि पिछले वर्ष उन्होंने जिस तरह से गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा के खिलाफ अभियान चलाया था, उसके चलते उनके सामने सचमुच यह खतरा है कि गुरनाम सिंह और विशाल सिन्हा के समर्थन में आने पर लोगों के बीच बना हुआ उनका भरोसा ख़त्म हो जायेगा और तब डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में उनका दखल हमेशा हमेशा के लिए कमजोर हो जायेगा । केएस लूथरा भी जान/समझ रहे हैं कि उनके समर्थन के बावजूद विशाल सिन्हा का भला होगा या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा - लेकिन उनकी विश्वसनीयता का भट्टा अभी ही बैठ जायेगा । इसीलिये गुरनाम सिंह के दावे पर जो लोग भरोसा नहीं कर रहे हैं, उन्हें भरोसा दिलाने का केएस लूथरा अपनी तरफ से कोई प्रयास भी नहीं कर रहे हैं ।