Sunday, September 25, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में कुछेक घंटों के लिए पैरोल पर आए असित मित्तल के बेमतलब के समर्थन पर उत्साह दिखा कर दीपक गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी उम्मीदवारी की कमजोरी को ज़ाहिर किया है क्या ?

नोएडा । दीपक गुप्ता की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के समर्थन में जेल में बंद होकर सजा काट रहे 'नेता' के उतर आने से डिस्ट्रिक्ट के चुनावी माहौल में एक अलग तरह की रंगत तो आ ही गई है - साथ ही लेकिन डिस्ट्रिक्ट की पहचान और छवि पर कलंक लगने का खतरा भी पैदा हो गया है । देश की चुनावी राजनीति में जब तब सुनने/देखने को मिलता है कि किस तरह जेल में बंद अपराधी अपने 'आदमी' को चुनाव जितवाने के लिए जेल से ही फरमान जारी करते हैं; दीपक गुप्ता की मेहरबानी से लगभग वही 'सीन' अब रोटरी में डिस्ट्रिक्ट 3012 की पहचान बनेगा । दीपक गुप्ता और उनके समर्थक खासे उत्साहित हैं कि जेल में बंद असित मित्तल ने जिस तरह से उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में कैम्पेन चलाया है, उसके चलते वह चुनावी जीत के और नजदीक पहुँच गए हैं । असित मित्तल पाँच वर्ष पूर्व, वर्ष 2011-12 में डिस्ट्रक्ट गवर्नर होते थे । किंतु पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने के कुछ ही दिनों के भीतर वह अपने बड़े भाई के साथ दिल्ली के तिहाड़ जेल में पहुँच गए । कहने को तो वह बिल्डर कहलाते थे, लेकिन धीरे-धीरे बात खुली और पता चला कि बिल्डर की आड़ में उनका मुख्य धंधा ठगी का था; और उन्होंने व्यक्तियों से लेकर बैंकों व वित्तीय संस्थाओं तक से ठगी व धोखाधड़ी की । कई रोटेरियंस भी उनकी ठगी का शिकार बने हैं । इस कारण से रोटेरियंस के बीच असित मित्तल के प्रति विरोध पैदा हुआ, जो फिर उनकी उपेक्षा में बदल गया । उनके 'राजनीतिक' समर्थन और या असर की हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अपने गवर्नर-काल में उन्होंने संजय खन्ना व रवि चौधरी के बीच हुए चुनाव में रवि चौधरी का बहुत खुल कर समर्थन किया था और उन्हें जितवाने की हर संभव कोशिश की थी, उसके बावजूद लेकिन रवि चौधरी बुरी तरह चुनाव हार गए थे । जेल जाने के बाद तो फिर असित मित्तल का डिस्ट्रिक्ट में कोई नामलेवा भी नहीं रह गया । उन्हें क्लब से निकाल दिया गया और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ने डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनका नाम तक छापना बंद कर दिया । लेकिन फिर भी दीपक गुप्ता और उनके समर्थक असित मित्तल के समर्थन को महत्त्वपूर्ण मान रहे हैं ।
चुनावी राजनीति के संदर्भ में लोग इसे - डूबते को तिनके का सहारा ढूँढ़ने के उदाहरण और सुबूत के रूप में देख रहे हैं ।
दरअसल असित मित्तल पिछले दिनों अपने पिता के निधन के बाद के क्रियाकर्म पूरे करने के लिए कुछेक दिन कुछ कुछ घंटों के लिए पैरोल पर जेल से बाहर निकले थे । उस दौरान अपनी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त करने के लिए कुछेक रोटेरियंस उनसे मिले थे, जिनसे बात करते हुए असित मित्तल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए दीपक गुप्ता का समर्थन करने की बात कही । असित मित्तल का कहना रहा कि दीपक गुप्ता की जीत ग्रुप को मजबूत करने और बनाए रखने के लिए जरूरी है । दीपक गुप्ता और उनके समर्थकों की तो यह बातें देख/सुन कर बाँछे ही खिल गईं हैं । उन्हें विश्वास है कि डिस्ट्रिक्ट के लोग उनके दूसरे समर्थक नेताओं की बात भले ही न मानें/सुने, लेकिन जेल में बंद एक 'अपराधी' की बात जरूर मानेंगे/सुनेंगे । असित मित्तल के कैम्पेन पर दीपक गुप्ता ने जिस तरह का उत्साह दिखाया है, उससे हालाँकि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रति सहानुभूति का भाव रखने वाले कई लोग चौंके भी हैं । दीपक गुप्ता के इस उत्साह को वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की कमजोरी के रूप में देख/पहचान रहे हैं । उनके बीच सवाल उठा है कि दीपक गुप्ता अपनी उम्मीदवारी के कैम्पेन को क्या इतना कमजोर पा रहे हैं, कि उन्हें एक सजायाफ़्ता के समर्थन की जरूरत पड़ी - और उसका समर्थन मिलने पर वह खुश हुए हैं ।
यह ठीक है कि चुनावी मुकाबले में कोई भी उम्मीदवार हर किसी का समर्थन पाने का प्रयास करता ही है, और किसी का सक्रिय समर्थन मिलने/दिखने पर खुश होता ही है । किंतु कोई भी होशियार उम्मीदवार किसी बदनाम व्यक्ति का समर्थन खुल्लमखुल्ला लेने और मिलने पर खुश 'दिखने' से बचने की कोशिश भी करता है । दरअसल वह जानता/समझता है कि एक बदनाम व्यक्ति का खुल्ला संग-साथ फायदा कम नुकसान ज्यादा पहुँचाता है । दीपक गुप्ता इतनी सावधानी नहीं रख सके, जिसका नतीजा यह देखने में आ रहा है कि असित मित्तल के समर्थन पर दीपक गुप्ता द्धारा व्यक्त की गई खुशी ने उनकी उम्मीदवारी की स्थिति को और ज्यादा संदेहास्पद बना दिया है । लोगों का सहज पूछना है कि जिस असित मित्तल के समर्थन को दीपक गुप्ता अपने लिए बड़ी उपलब्धि मान रहे हैं, वह असित मित्तल जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर थे और जब उनकी ज्यादा पोल-पट्टी भी नहीं खुली थी, तब वह जब रवि चौधरी को चुनाव नहीं जितवा सके थे - तो फिर अब जब वह अपनी कारस्तानियों के चलते जेल की हवा खा रहे हैं, तब दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की भला क्या मदद कर सकेंगे ? असित मित्तल के समर्थन पर खुशी प्रकट करके दीपक गुप्ता ने वास्तव में अपनी उम्मीदवारी की कमजोरी को ही जाहिर किया है; और इस तरह अपना नुक्सान ही किया है ।
असित मित्तल के समर्थन के कारण एक और तथ्य पर लोगों का ध्यान गया है; लोगों के बीच चर्चाभरे सवाल हैं कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के जितने समर्थक नेता हैं, वह सब घपलेबाजियों में क्यों फँसे/घिरे हुए हैं ? असित मित्तल का मामला तो उनके जेल में होने के कारण जगजाहिर है ही; मुकेश अरनेजा भी अपनी कारस्तानियों के कारण अपने ही भाई-भतीजों के द्धारा अपनी कंपनी से निकाले जा चुके हैं । सतीश सिंघल पर नोएडा रोटरी ब्लड बैंक की कमाई हड़पने के गंभीर आरोप हैं । इन चर्चाओं के चलते, समर्थक नेताओं की कारस्तानियों के दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए बड़ी मुसीबत बनने का खतरा पैदा हो गया है । मजे की बात है कि इस खतरे को जेल से कुछेक घंटों के लिए पैरोल पर आए असित मित्तल के बेमतलब के समर्थन पर उत्साह दिखा कर दीपक गुप्ता ने खुद ही आमंत्रित किया है ।

Saturday, September 24, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में होने जा रहा डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारियों का अधिष्ठापन समारोह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विशाल सिन्हा की हरकतों के कारण नरेश अग्रवाल के लिए परीक्षा का मौका होगा क्या ?

लखनऊ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ऑनरेरी कमेटी की मीटिंग में कुछेक वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को डिस्ट्रिक्ट अधिष्ठापन समारोह का निमंत्रण न मिलने का संदर्भ देते हुए जिस तरह से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विशाल सिन्हा पर वरिष्ठ पूर्व गवर्नर्स को अपमानित करने के आरोप लगे, उसे देखते हुए इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल के सामने लखनऊ में भी भी वाराणसी जैसे हालात बनते दिख रहे हैं । उल्लेखनीय है कि वाराणसी में आयोजित हुए डिस्ट्रिक्ट 321 ई के अधिष्ठापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए नरेश अग्रवाल को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अपमानित किये जाने की शिकायतें मिलीं थीं, जिन्हें लेकिन नरेश अग्रवाल ने गंभीरता से नहीं लिया था । वाराणसी में नरेश अग्रवाल ने जो रवैया दिखाया था, उसे लेकर मल्टीपल में ही नहीं बल्कि मल्टीपल के बाहर के लायंस पदाधिकारियों के बीच उनकी भारी फजीहत और थू थू हुई थी । नरेश अग्रवाल और दूसरे लोग उस किस्से को अभी पूरी तरह से भूल भी नहीं पाए हैं, कि डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विशाल सिन्हा ने नरेश अग्रवाल के लिए फिर से वैसे ही हालात पैदा कर दिए हैं । नरेश अग्रवाल को 25 सितंबर को लखनऊ में आयोजित हो रहे डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन के अधिष्ठापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने आना/पहुँचना है । विशाल सिन्हा ने उनके स्वागत के लिए अच्छी तैयारी की है; विशाल सिन्हा दरअसल नरेश अग्रवाल को खुश करके लायन व्यवस्था में अपने लिए अच्छी पोजीशन की जुगाड़ में हैं । असल में, विशाल सिन्हा को यह बात बहुत ही अपमानजनक लगती है कि हाल-फिलहाल के वर्षों में उनके आगे-पीछे जो लोग गवर्नर बने हैं, वह तो एक बार में ही गवर्नर बन गए - जबकि उन्हें एक बार पराजित होकर दूसरी बार में गवर्नर बनने का मौका मिल पाया । इस 'कलंक' के दाग को हल्का करने के लिए विशाल सिन्हा को जरूरी लगता है कि वह लायन व्यवस्था में ऐसा कुछ प्राप्त करें, जिससे वह अपने आगे-पीछे गवर्नर बने लोगों के बीच अपना कद ऊँचा कर सकें । यह वह नरेश अग्रवाल की मदद से करना चाहते हैं, और इसीलिए डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में वह नरेश अग्रवाल के स्वागत-सम्मान में कोई कमी नहीं रहने देना चाहते हैं ।
लेकिन डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह से चार दिन पहले हुई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ऑनरेरी कमेटी की मीटिंग में जो हुआ, उसने विशाल सिन्हा के लिए खतरे की घंटी बजा दी है । मीटिंग में कुछेक वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने शिकायत की कि कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अभी तक भी अधिष्ठापन समारोह के निमंत्रण नहीं मिले हैं । यह शिकायत करते हुए विशाल सिन्हा से पूछा गया कि क्या वह कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अधिष्ठापन समारोह से दूर रखना चाहते हैं ? विशाल सिन्हा ने इस सवाल के पीछे छिपे खतरे को पहचानते हुए तुरंत सफाई दी कि उन्होंने तो सभी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को निमंत्रण भेजे हैं; उन्होंने साथ ही यह भी जोड़ा कि किन्हीं कारणों से हो सकता है कि कुछेक पूर्व गवर्नर्स तक निमंत्रण न पहुँचा हो, इसलिए इस मीटिंग के माध्यम से वह सभी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से अधिष्ठापन समारोह में शामिल होने का अनुरोध करते हैं । विशाल सिन्हा में यह बड़ा अच्छा हुनर है कि वह किसी को कितनी भी और कैसी भी गालियाँ दे रहे हों, बुरा-भला कह रहे हों - लेकिन जैसे ही उन्हें आभास होता है कि उनकी यह हरकत उन्हें  नुकसान पहुँचाएगी, वह तुरंत से खुशामद में जुट जायेंगे । विशाल सिन्हा कुछेक पूर्व गवर्नर्स के खिलाफ जमकर गालियाँ बकते हैं, उन्हें लायनिज्म से निकालने तक की बात करते हैं - लेकिन अधिष्ठापन समारोह से ठीक पहले हुई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ऑनरेरी कमेटी की मीटिंग में जैसे ही उन्हें आभास हुआ कि उनकी हरकत अधिष्ठापन समारोह में बबाल कर सकती है और नरेश अग्रवाल के सामने उनकी फजीहत कर/करा सकती है, वह तुरंत गिरगिट की तरह रंग बदल कर पूर्व गवर्नर्स की खुशामद पर उतर आए ।
विशाल सिन्हा ने मौके की नजाकत को पहचान कर भले ही रंग बदल लिया हो, किंतु विशाल सिन्हा की हरकतों से अपमानित महसूस कर रहे पूर्व गवर्नर्स की नरेश अग्रवाल के सामने उनकी असलियत लाने की कोशिशों का खतरा पूरी तरह टला नहीं है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद को विशाल सिन्हा ने जिस तरह से पैसा बनाने का जरिया बना लिया है; और इस चक्कर में जिस तरह से गैर लायन सदस्यों तक को न सिर्फ अपनी कैबिनेट का सदस्य बना लिया है बल्कि डिस्ट्रिक्ट लायंस लीडरशिप इंस्टीट्यूट में भी शामिल कर लिया - उसे देख कर पूर्व गवर्नर्स के बीच भारी असंतोष व नाराजगी है । विशाल सिन्हा के मनमाने तरीके से काम करने और पूर्व गवर्नर्स के प्रति गाली-गलौच भरे शब्दों का प्रयोग करने के रवैये के कारण ही वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नीरज बोरा ने बीस दिन के भीतर ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ऑनरेरी कमेटी के चेयरमैन का पद छोड़ दिया था । दरअसल नीरज बोरा को पता चला था कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय में उनके बारे में बहुत ही ख़राब तरीके से बातें होती हैं और उनके लिए गाली-गलौच पूर्ण शब्दों का इस्तेमाल होता है । विशाल सिन्हा ने इस तरह 'सामने कुछ और पीछे कुछ' वाला अपना दो-रंगी रूप दिखाया, तो नीरज बोरा ने व्यस्तता का वास्ता देकर उनके गवर्नर-काल में किसी भी पद पर रहने से तौबा कर ली । किसी डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के व्यवहार व रवैये के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ऑनरेरी कमेटी का चेयरमैन एक महीने से भी कम समय में अपना पद छोड़ दे, तो यह डिस्ट्रिक्ट और लायनिज्म के लिए बहुत ही अपमानजनक बात है - इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल इस बात को कैसे लेते हैं, यह देखना अभी बाकी है ।
विशाल सिन्हा की हरकतों के कारण ही एक अन्य पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनुपम बंसल ग्लोबल लीडरशिप टीम (जीएलटी) के डिस्ट्रिक्ट को-ऑर्डीनेटर होने के बावजूद अभी हाल ही संपन्न हुए डिस्ट्रिक्ट लायन लीडरशिप इंस्टीट्यूट में शामिल नहीं हुए । मजे की बात यह है कि नीरज बोरा और अनुपम बंसल - दोनों ही विशाल सिन्हा के या तो बहुत खास हैं और या उनकी राजनीति के खेमे के समर्थक हैं । पिछले वर्ष डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में जो खेमेबाजी थी, उसमें नीरज बोरा उस तरफ थे - जिस तरफ विशाल सिन्हा थे । अनुपम बंसल तो विशाल सिन्हा के 'शाम' के पक्के वाले साथी हैं । इसके बावजूद विशाल सिन्हा ने उनके प्रति कोई रियायत नहीं बरती और उनके साथ ऐसा व्यवहार किया कि उन्होंने विशाल सिन्हा के एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम से दूर रहने में ही अपनी भलाई देखी/पहचानी । इन दो उदाहरणों से समझा जा सकता है कि विशाल सिन्हा अपनी कारस्तानियों से जब अपने ही खास व नजदीकी लोगों के साथ बदतमीजी कर सकते हैं और उन्हें उपेक्षित तथा अपमानित तक कर सकते हैं, तो फिर अपने से असहमत और अपने विरोधियों के प्रति उनका रवैया क्या होता होगा ?
डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आने वाले इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल के सामने कुछेक लोग विशाल सिन्हा के इस रवैये को रखने की तैयारी कर रहे हैं । उनका कहना है कि वह नरेश अग्रवाल को बताना चाहेंगे कि विशाल सिन्हा को किसी भी तरह की तवज्जो देकर वह सिर्फ लायनिज्म को ही बदनाम नहीं करवायेंगे, बल्कि अपनी छवि को भी कलंकित करेंगे । विशाल सिन्हा हालाँकि आश्वस्त हैं; उनका कहना है कि नरेश अग्रवाल को उनके बारे में अच्छी तरह पता है और वह गुरनाम सिंह के साथ उनके रिश्ते को जानते/पहचानते हैं, इसके अलावा वह लखनऊ में नरेश अग्रवाल की सेवा में कोई कमी नहीं रहने देंगे - इसलिए उनकी शिकायत करने वालों की दाल नरेश अग्रवाल के सामने नहीं गलेगी । नरेश अग्रवाल यूँ भी घटिया लोगों को प्रश्रय देने के मामले में खासे बदनाम हैं, और इस चक्कर में अपनी छीछालेदर भी कराते रहते हैं । हालाँकि कुछेक लोगों को लगता है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की तरफ बढ़ रहे नरेश अग्रवाल अब शायद थोड़ा सावधान हों, और लायनिज्म की नहीं तो कम से कम अपनी छवि की तो फ़िक्र करेंगे - और इस फ़िक्र में विशाल सिन्हा के मंसूबों को पूरा करने में सहायक नहीं बनेंगे । इस पृष्ठभूमि में, लखनऊ में होने जा रहा अधिष्ठापन समारोह विशाल सिन्हा के लिए ही नहीं - बल्कि नरेश अग्रवाल के लिए भी परीक्षा की घड़ी है ।

Wednesday, September 21, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में इस्तीफ़ा देने के बावजूद बेशर्मी और निर्लज्जता के साथ चेयरमैन पद पर चिपके दीपक गर्ग के संगी-साथियों को अगले चुनाव की चिंता सताने लगी है

नई दिल्ली । दीपक गर्ग की हरकतों ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के उन सदस्यों - खासकर सत्ता गिरोह के उन सदस्यों को खासी मुसीबत में फँसा दिया है, जिन्हें अगला चुनाव भी लड़ना है । दरअसल चेयरमैन के पद से इस्तीफ़ा देने के बाद भी दीपक गर्ग जिस बेशर्मी और निर्लज्जता के साथ चेयरमैन पद के फायदे उठा रहे हैं - और बाकी सदस्य या तो गिरोहबंदी के कारण और या स्वार्थपूर्ण चुप्पी के कारण उन्हें फायदे उठाने दे रहे हैं, उसके कारण उनकी तथा रीजनल काउंसिल के सदस्यों की लोगों के बीच भारी फजीहत हो रही है । लोगों का कहना है कि दीपक गर्ग जब अपने पद से इस्तीफ़ा दे चुके हैं, तब फिर वह चेयरमैन पद की भूमिका निभाते हुए उसके फायदे क्यों ले रहे हैं - और काउंसिल के दूसरे सदस्य उन्हें फायदा क्यों उठाने दे रहे हैं ? यह ठीक है कि दीपक गर्ग का इस्तीफ़ा अभी मंजूर नहीं हुआ है, इसलिए तकनीकी रूप से वह अभी भी चेयरमैन 'हैं' - लेकिन 'इस्तीफित' दीपक गर्ग से आधिकारिक रूप से यह भी तो नहीं कहा गया है कि उनके इस्तीफे पर जब तक अंतिम रूप से फैसला न लिया जाए, तब तक वह चेयरमैन पद की जिम्मेदारियाँ निभाते रहें और उसके फायदे उठाते रहें । नैतिकता के तकाजे के तहत चलन यह है कि जब भी कोई पदाधिकारी अपने पद से इस्तीफ़ा देता है, तो वह इस्तीफे के साथ-साथ मिलने वाली सुविधाओं और पद की जिम्मेदारियों को निभाना भी छोड़ देता है । हाँ, यदि उससे कहा जाता है कि अगली व्यवस्था होने तक वह पद की जिम्मेदारियाँ पहले की ही तरह निभाता रहे, तो फिर बात दूसरी हो जाती है ।
दीपक गर्ग के साथ लेकिन यह दूसरी वाली स्थिति तो आई ही नहीं । स्थिति यह है कि दीपक गर्ग ने इंस्टीट्यूट प्रशासन के असहयोगात्मक रवैए का हवाला देते हुए चेयरमैन के रूप में काम कर सकने में असमर्थता व्यक्त करते हुए इस्तीफ़ा दे दिया - उनके इस्तीफे पर जिस भी अथॉरिटी को फैसला करना है, उसने अभी फैसला नहीं किया है । नैतिकता का तकाजा यह कहता है कि दीपक गर्ग को इस्तीफ़ा देते ही चेयरमैन पद की जिम्मेदारियों तथा फायदों को छोड़ देना चाहिए था - किंतु दीपक गर्ग से नैतिक व्यवहार की उम्मीद शायद वही कर सकता है, जो उन्हें जानता नहीं है । दिलचस्प नजारा है कि दीपक गर्ग इस्तीफ़ा देने के बाद भी पूरी बेशर्मी और निर्लज्जता के साथ चेयरमैन पद से चिपके हुए हैं । दीपक गर्ग ने अपने इस्तीफे में लिखा/कहा है कि उनके लिए चेयरमैन पद की जिम्मेदारियों को निभा पाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव हो रहा है - और इसीलिए वह इस्तीफ़ा दे रहे हैं । सवाल यही है कि एक तरफ तो वह घोषणा कर रहे हैं कि चेयरमैन पद की जिम्मेदारियों को निभा पाना उनके लिए मुश्किल हो रहा है, और दूसरी तरफ वह दीमक की तरह चेयरमैन पद से चिपके हुए भी हैं । दीपक गर्ग लेकिन खुशकिस्मत हैं कि उनकी इस बेशर्मी और निर्लज्जता के लिए लोगों के बीच उनकी चाहें जैसी जो थू थू हो रही हो, रीजनल काउंसिल में कोई भी उनकी इस बेशर्मी और निर्लज्जता पर सवाल नहीं उठा रहा है ।
दीपक गर्ग की इस खुशकिस्मती में लेकिन रीजनल काउंसिल के उन सदस्यों को - खासकर सत्ता गिरोह के उन सदस्यों को अपनी मुसीबत नज़र आ रही है, जिन्हें अगला चुनाव भी लड़ना है । दीपक गर्ग के इस्तीफे के जरिए हो रहे नाटक को लेकर लोगों के बीच जो नाराजगी है, जाहिर है कि वह चुनावों के समय सवालों के रूप में सामने आएगी और लोग उनसे पूछेंगे ही कि दीपक गर्ग की बेशर्मी और निर्लज्जता का समर्थन करने के पीछे आखिर उनका क्या स्वार्थ था ? मजे की बात यह है कि दीपक गर्ग इस सारे झमेले से मुक्त हैं : दरअसल उन्हें तो अगला चुनाव लड़ना नहीं है, इसलिए उनके लिए तो लोगों की नाराजगी और उनके सवालों का सामना करने की कोई भी स्थिति बनेगी नहीं । कुछेक लोग दीपक गर्ग को हालाँकि सेंट्रल काउंसिल के लिए तैयारी करने के लिए उकसा रहे हैं, लेकिन दीपक गर्ग के नजदीकियों का कहना है कि सेंट्रल काउंसिल के बारे में सोचना दीपक गर्ग की क्षमता में नहीं है । रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में उनके कामकाज और अभी के इस्तीफ़ा-नाटक को देखते हुए तो उनके नजदीकियों ने उनके राजनीतिक सफ़र के अंत की घोषणा भी कर दी है । वास्तव में इसीलिए दीपक गर्ग को अपनी हरकतों के चलते लोगों के बीच पैदा हुई नाराजगी की कोई फ़िक्र नहीं है ।
दीपक गर्ग को अपनी फ़िक्र भले ही न हो, किंतु रीजनल काउंसिल में उनके संगी-साथियों को अपनी अपनी फ़िक्र जरूर होने लगी है । दरअसल नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में जो नाटक चल रहा है, उसके मुख्य 'हीरो' भले ही दीपक गर्ग हों - लेकिन सत्ता गिरोह के दूसरे सदस्य भी साईड हीरो की भूमिका निभाते हुए दीपक गर्ग की भूमिका को सपोर्ट करते हुए नजर आ रहे हैं । जाहिर तौर पर लोगों की नाराजगी का ठीकरा उनके सिर पर भी फूटेगा । जो लोग चेयरमैन बन कर चुनावी चक्कर से बाहर निकल जायेंगे और या अन्य किसी कारण से चुनावी पचड़े में नहीं पड़ेंगे, उनके लिए तो समस्या नहीं है - किंतु जिन्हें अगले चुनाव में लोगों के बीच जाना होगा, उन्हें तो लोगों के सवालों का जबाव देना ही होगा न कि छह छह महीने की चेयरमैनी पाने के लिए रचे गए नाटक में उन्होंने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट तक को क्यों घसीट लिया ? और इस तरह अपनी हरकत से न सिर्फ कामकाज पर प्रतिकूल असर डाला बल्कि इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन को भी बदनाम किया । रीजनल काउंसिल में सत्ता गिरोह के सदस्य सेंट्रल काउंसिल के सदस्य राजेश शर्मा के रवैए को लेकर भी निराश हैं, जिन्होंने पहले तो छह छह महीने की चेयरमैनी का लालच दिखा कर उनसे नाटक करवा लिया, लेकिन अब जब नाटक संकट में फँस गया तो उन्हें फजीहत और बदनामी के बीच मँझदार में छोड़ कर किनारे खड़े हो कर तमाशा देखने लगे हैं ।

Tuesday, September 20, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार दीपक गुप्ता के घर पर हुई मीटिंग में बने माहौल पर उनके ही समर्थक नेताओं - मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की स्वार्थपूर्ण 'होशियारी' ने पानी फेरा

गाजियाबाद । दीपक गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई के संदर्भ में की अपनी कमजोरियों व गलतियों से कोई सबक न सीखता देख, दीपक गुप्ता के नए बन सकने वाले समर्थकों को तगड़ा झटका लगा है । उन्हें तगड़ा वाला झटका दरअसल इसलिए भी लगा है क्योंकि वह देख/पा रहे हैं कि दीपक गुप्ता उनकी सलाह व उनके सुझावों पर भी कोई गंभीरता नहीं दिखा रहे हैं, और अभी भी मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल से ही दिशा निर्देश ले रहे हैं । उल्लेखनीय है कि दीपक गुप्ता ने अभी पिछले दिनों ही अपने घर पर अपनी उम्मीदवारी के अभियान की दशा-दिशा पर विचार-विमर्श करने को लेकर एक मीटिंग बुलाई थी, जिसमें उन्होंने अपने संभावित समर्थकों व शुभचिंतकों को आमंत्रित किया था । मीटिंग खत्म होते ही मीटिंग को लेकर मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की तरफ से जिस तरह की सक्रियता 'देखने' को मिली, उसने भी मीटिंग में शामिल हुए कुछेक लोगों को भड़काया है । उल्लेखनीय है कि दीपक गुप्ता द्धारा मीटिंग के लिए आमंत्रित किए गए लोगों में दो तरह के लोग थे : एक तो वह लोग थे जो पिछले वर्ष हुए चुनाव में भी उनके समर्थन में थे; और दूसरी तरह के लोगों के रूप में वह थे जो पिछले वर्ष हुए चुनाव में उनके प्रतिद्धंद्धी रहे सुभाष जैन के समर्थन में थे । विचार-विमर्श में लोगों ने जो जो कहा उसमें भी मोटे तौर पर दो खेमे बने : एक खेमे की आवाज़ में 'जीतेगा भई जीतेगा, दीपक गुप्ता जीतेगा' वाला भाव था; दूसरे खेमे में संजीदगी के साथ हालात व स्थिति की जरूरत को समझते हुए एक्शन तय करने का सुझाव था, जिसके तहत कहा/बताया गया कि हमेशा यह आकलन करते रहना चाहिए कि लोगों के बीच धारणा क्या बन रही है और उसके अनुसार ही अपनी सक्रियता की दशा-दिशा को संयोजित करना चाहिए । विचार-विमर्श में कुछेक लोगों ने स्पष्ट रूप से डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच दीपक गुप्ता को लेकर बनी नकारात्मक धारणाओं का जिक्र करते हुए सुझाव दिया कि दीपक गुप्ता को इस बारे में सावधान होना/रहना चाहिए और प्रयास करना चाहिए कि उनके व्यवहार व आचरण से लोगों के बीच कोई नकारात्मक संदेश न जाए । विचार-विमर्श में शामिल लोगों ने महसूस किया कि दीपक गुप्ता ने व्यक्त किए गए सुझावों को सहृदयता से स्वीकार किया और सभी को आश्वस्त किया कि वह सुझावों पर अमल करेंगे ।
उक्त विचार-विमर्श में शामिल कुछेक लोगों को अब लेकिन लग रहा है कि दीपक गुप्ता के अभियान के रवैये में कोई बदलाव नहीं है, तथा वह अपने पुराने ढर्रे पर ही कायम हैं । इस विचार के लोगों को लग रहा है कि दीपक गुप्ता दरअसल जमीनी सच्चाइयों को पहचानने/समझने की कोई कोशिश ही नहीं करते हैं, और अपने नजदीकियों के बहकाए में रहते हैं । इसी रवैए के चलते पिछले वर्ष उन्हें पहले नोमीनेटिंग कमेटी में हुए चुनाव में और फिर सीधे हुए चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था । मजे की बात यह है कि दोनों ही मौकों पर दीपक गुप्ता के नजदीकी और समर्थक नेता उनकी ही जीत के दावे कर रहे थे; दावे जब उलटे साबित हुए तो 'इस' पर और 'उस' पर धोखा देने के आरोप लगा कर अलग खड़े हो गए । दीपक गुप्ता के प्रति हमदर्दी रखने वाले लोगों का मानना और कहना है कि दीपक गुप्ता ने लेकिन पिछले वर्ष के अपने अनुभव से कोई सबक नहीं सीखा है, और अभी भी वह ऐसे लोगों के ही प्रभाव में हैं, जो जमीनी सच्चाई को अनदेखा करते हुए 'जीतेगा भई जीतेगा' वाली रट लगाए रख रहे हैं । कई लोग हैं जो खुल कर कहते हैं कि दीपक गुप्ता ने पिछले वर्ष उनके सुझावों पर कोई तवज्जो नहीं दी, और अपनी फजीहत करवाई; इस वर्ष भी उनका वैसा ही रवैया दिख रहा है । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के अभियान को लेकर होने वाले विचार-विमर्श में शामिल होने खातिर उनके घर जाने वाले कुछेक लोगों का ही नाराजगी के साथ कहना है कि दीपक गुप्ता को अपनी जीत का यदि इतना ही भरोसा है, तो फिर विचार-विमर्श करने की जरूरत ही क्या है ?
दीपक गुप्ता के घर हुई मीटिंग की जानकारी जिस तत्परता के साथ मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल तक पहुँची और जिस तत्परता के साथ उन्होंने अलग अलग लोगों से फीडबैक लेना और दीपक गुप्ता की जीत का दावा करना शुरू किया, उससे भी दीपक गुप्ता के घर पर हुई मीटिंग में शामिल हुए कुछेक लोगों को ऐतराज हुआ । उनका कहना है कि दीपक गुप्ता को यदि लगता है कि मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल ही उन्हें चुनाव जितवा देंगे, तो फिर वह उनके ही भरोसे रहें - किसी और से बात करने की उन्हें भला क्या जरूरत है ? ऐसा कहने वाले लोग ध्यान दिलाते हैं कि मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की हर संभव कोशिशों के बावजूद पिछले वर्ष दीपक गुप्ता अपनी हार और फजीहत को बचा नहीं सके थे - फिर भी वह इन दोनों के चक्कर में पड़े हुए हैं । दीपक गुप्ता इस सच्चाई को या तो देख/पहचान नहीं रहे हैं, और या स्वीकार नहीं कर रहे हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में सतीश सिंघल जो कर रहे हैं, उसके कारण बहुत से लोग नाराज हो रहे हैं - और उसका नुकसान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में दीपक गुप्ता को उठाना/भुगतना पड़ सकता है ।
मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल दरअसल दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का समर्थन करने की आड़ में अपना अपना उल्लू सीधा करने की कोशिशों में हैं । उनकी कोशिश है कि दीपक गुप्ता को उनके उम्मीदवार के रूप में पहचाना जाए तथा दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का समर्थन करने वाला हर व्यक्ति उनके 'आदमी' के रूप में देखा जाए । समस्या की बात यह है कि दीपक गुप्ता को यदि सचमुच चुनाव जीतना है, तो उन्हें ऐसे लोगों का भी समर्थन चाहिए होगा, जो मुकेश अरनेजा और या सतीश सिंघल को पसंद नहीं करते हैं । ऐसे कई लोग दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रति हमदर्दीभरी और समर्थनपूर्ण बातें करते सुने/देखे भी जा रहे हैं; लेकिन ऐसे लोगों को मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल जब अपने पाले में खींचने और अपना 'आदमी' बताने की कोशिशों में जुटते हैं, तो फिर वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का समर्थन करने से पीछे हटते हैं - और इससे कुल मिलाकर दीपक गुप्ता का ही नुकसान होता है । दीपक गुप्ता के घर पर हुई मीटिंग के बाद, मीटिंग में शामिल हुए कुछेक लोगों से मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल ने जिस अंदाज़ में बातें कीं, उससे उन लोगों को तथा दूसरे लोगों को भी समझ में आ गया है कि दीपक गुप्ता जब तक मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की 'छाया' से बाहर नहीं निकलेंगे, तब तक सफलता के नजदीक पहुँच पाना उनके लिए मुश्किल ही होगा । दीपक गुप्ता के घर पर हुई मीटिंग में, पिछले वर्ष दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के विरोध में रहे लोगों के भी पहुँचने से दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को जो दम मिलने की उम्मीद बनी दिखी थी - मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की 'होशियारी' ने फिलहाल तो उस दम का दम निकाल दिया है ।

Monday, September 19, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में अपने पद की प्रतिष्ठा के साथ न्याय करने की अनुपम बंसल की कोशिश ने लीडरशिप इंस्टीट्यूट के नाम पर जगदीश गुलाटी, वीएस कुकरेजा और विशाल सिन्हा के तमाशे की पोल खोली

लखनऊ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विशाल सिन्हा के अपमानजनक रवैये के प्रति नाराजगी व्यक्त करते हुए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनुपम बंसल ने ताशकंद में आयोजित हुए डिस्ट्रिक्ट लायंस लीडरशिप इंस्टीट्यूट का बहिष्कार किया । ताशकंद से लौटे लोगों से डिस्ट्रिक्ट के लोगों को यही एक महत्त्वपूर्ण खबर सुनने को मिली है । मजे की बात यह है कि अनुपम बंसल इसी इंस्टीट्यूट में शामिल होने के लिए लखनऊ से ताशकंद गए थे । उल्लेखनीय है कि ग्लोबल लीडरशिप टीम (जीएलटी) के डिस्ट्रिक्ट को-ऑर्डीनेटर होने के नाते अनुपम बंसल को उक्त कार्यक्रम में प्रमुख भूमिका निभानी थी, लेकिन वह पूरे कार्यक्रम से ही बाहर रहे । प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, अनुपम बंसल के इस रवैए पर लोगों के सामने ही विशाल सिन्हा ने अनुपम बंसल को खूब कोसा; हालाँकि कार्यक्रम शुरू हो जाने के कुछ देर बाद तक भी विशाल सिन्हा फोन पर अनुपम बंसल से बात करने और उन्हें मनाने की कोशिश करते रहे - पर अनुपम बंसल कार्यक्रम में नहीं ही पहुँचे । वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर गुरनाम सिंह ने भी अनुपम बंसल को कार्यक्रम में शामिल होने के लिए राजी करने वास्ते प्रयास किया, किंतु उनका प्रयास भी अनुपम बंसल की नाराजगी को दूर नहीं कर सका । प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कार्यक्रम समाप्त होने के बाद जब खाना शुरू हुआ, अनुपम बंसल तब मौके पर पहुँचे ।
ताशकंद से लौटे लोगों के अनुसार, अनुपम बंसल ने दो कारणों से अपने आप को बहुत अपमानित महसूस किया और इसके चलते पैदा हुई नाराजगी के कारण उन्होंने डिस्ट्रिक्ट लायंस लीडरशिप इंस्टीट्यूट का बहिष्कार किया । पहला कारण तो यह रहा कि इस इंस्टीट्यूट का जो निमंत्रण पत्र छपा, उसमें अनुपम बंसल का नाम ही नहीं छपा । अनुपम बंसल यह देख कर बुरी तरह बौखलाए कि निमंत्रण पत्र में इंस्टीट्यूट के चेयरपरसन के रूप में संजय चोपड़ा का नाम छपा, लेकिन डिस्ट्रिक्ट को-ऑर्डीनेटर होने के बावजूद उनका नाम नहीं छपा । संजय चोपड़ा वैसे भी अनुपम बंसल से जूनियर पूर्व गवर्नर हैं । इसके अलावा, संजय चोपड़ा की तुलना में अनुपम बंसल को विशाल सिन्हा के ज्यादा नजदीक समझा/देखा जाता है । यानि हर तरह से संजय चोपड़ा से 'भारी' होने के बावजूद अनुपम बंसल का नाम विशाल सिन्हा ने निमंत्रण पत्र पर नहीं छापा । विशाल सिन्हा की तरफ से अनुपम बंसल को दूसरा झटका यह देख कर लगा कि विशाल सिन्हा खुद तो एक अच्छे होटल में ठहरे, किंतु उन्हें दूसरे अपेक्षाकृत सेकेंडग्रेड होटल में ठहरवा दिया । लोगों का कहना है कि इन दो बातों से अनुपम बंसल ने खुद को अपमानित महसूस किया और फिर विरोधस्वरूप उन्होंने उस कार्यक्रम से ही दूर रहने का फैसला किया, जिसके नाम पर वह ताशकंद गए/पहुँचे थे ।
डिस्ट्रिक्ट लायंस लीडरशिप इंस्टीट्यूट को विशाल सिन्हा ने जिस तरह से आयोजित किया, उसकी ऊपरी रूपरेखा को देख कर ही समझा जा सकता है कि इसके आयोजन को लेकर वह जरा भी गंभीर नहीं थे, और इस आयोजन के जरिए उन्होंने वास्तव में अपना और लायनिज्म का मज़ाक ही बनाया है । कार्यक्रम का निमंत्रण पत्र ही बताता है कि इंस्टीट्यूट लीडरशिप को लेकर था, लेकिन उसके लिए फैकल्टी मेंबरशिप की बुलाई गई - और वह पट्ठे आकर भाषण भी पेल गए । यह क्या ऐसा ही मामला नहीं है कि चिकनगुनिया और डेंगू जैसी बीमारियों के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए किसी डॉक्टर की बजाए किसी चार्टर्ड एकाउंटेंट का भाषण करवा दिया जाए ? इस मामले में इसीलिए अकेले विशाल सिन्हा को ही दोष देने का क्या फायदा ? जगदीश गुलाटी और वीएस कुकरेजा को क्या यह कहते हुए कार्यक्रम में फैकल्टी के रूप में शामिल होने से इंकार नहीं कर देना चाहिए था कि हम लोग जीएमटी के लोग हैं - इस कार्यक्रम में जीएलटी के लोगों को बुलाया जाना चाहिए ? लेकिन जब पता हो कि विदेश घूमने का मौका मिल रहा हो, भाषण पेलने का और नेतागिरी दिखाने का अवसर मिल रहा हो, और बुलाने वाला बिलकुल मूर्खता दिखाने पर ही आमादा हो - तो फिर इंकार करने में कौन सी अक्लमंदी है ? इस तरह अपनी अपनी अक्लमंदी में जगदीश गुलाटी और वीएस कुकरेजा से मिली शह में विशाल सिन्हा ने फिर लायनिज्म का मज़ाक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी ।
जगदीश गुलाटी और वीएस कुकरेजा की सरपरस्ती में विशाल सिन्हा ने लीडरशिप इंस्टीट्यूट के नाम पर जो तमाशा किया, उसकी पोल शायद न खुलती - यदि वह अनुपम बंसल को नाराज न करते । ताशकंद में जो लोग उपलब्ध थे, उनमें लीडरशिप इंस्टीट्यूट के लिए अनुपम बंसल सबसे बड़े अधिकृत पदाधिकारी थे - विशाल सिन्हा ने लेकिन उन्हें ही कार्यक्रम की औपचारिक व्यवस्था से अलग-थलग रखा । अनुपम बंसल ने एक सामान्य प्रतिभागी की तरह कार्यक्रम में शामिल होना यदि उचित नहीं समझा, तो इस तरह उन्होंने अपने पद की प्रतिष्ठा के साथ वास्तव में न्याय ही किया है । अनुपम बंसल की इस न्यायप्रियता ने लेकिन लायनिज्म के नाम पर जगदीश गुलाटी, वीएस कुकरेजा और विशाल सिन्हा द्धारा किए गए तमाशे की असलियत को डिस्ट्रिक्ट व मल्टीपल के लोगों के सामने ला देने का काम कर दिया है ।

Thursday, September 15, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल पस्त है, उसके पदाधिकारी लेकिन मस्त हैं

नई दिल्ली । किसी के घर में आग लगी हुई हो और या घर पर कब्ज़ा करने के लिए दूसरे लोग जबर्दस्ती आ पहुँचे हुए हों - और घर के सदस्य सेल्फी लेने में व्यस्त हों, तो उन्हें आप क्या कहेंगे ? नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में आजकल ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है । 44 हजार से अधिक चार्टर्ड एकाउंटेंट्स सदस्यों वाली 66 वर्षीय नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल इस समय अभूतपूर्व संकट में है, लेकिन काउंसिल के पदाधिकारियों और सदस्यों के बीच इस संकट को लेकर न तो चिंता/परेशानी है और न ही संकट को लेकर किसी भी तरह का कोई विचार-विमर्श है । पदाधिकारियों और सदस्यों का व्यवहार देख कर ऐसा लग रहा है, जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं है । वह सेल्फियाँ खींचने में मस्त और व्यस्त हैं - जैसे कि इन्हें इसी काम के लिए चुना गया है । पदाधिकारियों व सदस्यों को तो छोड़िए, जो लोग नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पदाधिकारी व सदस्य होने की हसरत रखते हैं, वह भी गर्दन जमीन में घुसा कर बगुला बने हुए हैं । उल्लेखनीय है कि पिछले दिसंबर में हुए चुनाव में नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए 58 उम्मीदवार थे; उनमें से जो कामयाब नहीं हुए - उनमें से कुछेक अगले चुनाव में उम्मीदवार बनने की तैयारी में लगे हुए हैं; लेकिन रीजनल काउंसिल को जिस संकट ने घेरा हुआ है, उसे लेकर सभी के मुँह पर जैसे ताले लगे हुए हैं । यह बात इसलिए गंभीर है - क्योंकि मौजूदा संकट ने वास्तव में नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के अधिकारों और उसकी स्वायत्तता व उसकी पहचान पर सवाल खड़े कर दिए हैं ।
नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मौजूदा संकट को पहचानने/समझने के लिए जो तथ्य रिकॉर्ड पर हैं, सिर्फ उन्हें देखना ही काफी होगा : रीजनल काउंसिल के चेयरमैन दीपक गर्ग ने इंस्टीट्यूट प्रशासन पर सहयोग न करने के आरोप लगाते हुए चेयरमैन पद से इस्तीफ़ा दे दिया । उनका तर्क रहा कि इंस्टीट्यूट प्रशासन के सहयोग न करने के कारण चेयरमैन पद की जिम्मेदारियों का निर्वाह कर पाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव है । होना यह चाहिए था कि रीजनल काउंसिल के बाकी पदाधिकारियों व सदस्यों को तथा आगे आने वाले चुनाव में उम्मीदवार होने की इच्छा रखने व तैयारी करने वाले लोगों को - और उनके गॉडफादर की भूमिका निभाने वाले लोगों को दीपक गर्ग के आरोपों को आधार बना कर इंस्टीट्यूट प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाना चाहिए था । इंस्टीट्यूट प्रशासन नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के साथ कोई नाइंसाफी न करे, इसे लेकर सार्वजनिक रूप से चर्चा करना चाहिए थी । पर ऐसा कुछ नहीं हुआ । इसके बाद, इंस्टीट्यूट प्रशासन ने रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों को निर्देश दिया कि वह अपनी मीटिंग में चेयरमैन के इस्तीफे को लेकर कोई बात नहीं करेंगे; और चेयरमैन के इस्तीफे के बाद रीजनल काउंसिल में क्या होगा, इसे 'हम' तय करेंगे - रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों तथा पक्ष-विपक्ष के सदस्यों ने इस मामले में भी समर्पण कर दिया । रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों तथा सदस्यों ने तो समर्पण किया ही; रीजनल काउंसिल में आने की इच्छा रखने तथा तैयारी करने वाले लोगों ने भी मुँह पर ताले लगा लिए हैं ।
मजेदार सीन यह है कि सोशल मीडिया में बड़ी बड़ी बातें करने/हाँकने - तथा अपनी जागरूकता, अपनी बहादुरी, अपनी नेतागिरी जताने/दिखाने वाले लोगों ने भी इस मामले में चुप्पी साधी हुई है । सबसे ज्यादा नाटकीय और बेचारी हालत सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा की हुई । दीपक गर्ग के इस्तीफे के साथ जो नाटक शुरू हुआ, उसके स्क्रिप्ट राईटर और निर्देशक के रूप में राजेश शर्मा को ही पहचाना गया है; वह रीजनल काउंसिल की स्वायत्तता को लेकर लोगों के बीच बहुत बढ़-चढ़ कर बातें भी कर रहे थे; लेकिन इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट देवराज रेड्डी ने जैसे ही कोड़ा फटकारा - वह भी मुँह बंद करके बैठ गए । दिल्ली के इन नेताओं से ज्यादा 'बहादुर' तो चंडीगढ़ ब्रांच के पदाधिकारी साबित हुए - जिन्होंने ब्रांच की स्वायत्तता को बचाए रखने के लिए एक स्टैंड लेते हुए इंस्टीट्यूट प्रशासन से टकराने का फैसला तो लिया । आगे जो होगा, सो होगा; अभी तो उन्होंने यह 'दिखाया' है कि उन्होंने जो फैसला किया, उस पर उन्होंने अमल भी किया है । दिल्ली में जो सर्कस हुआ, वह तो अपने आप में अनोखा है - दीपक गर्ग इस्तीफ़ा दे चुके हैं, लेकिन फिर भी इस जुगाड़ में हैं कि किसी भी तरह उनकी चेयरमैनी बच जाए । इस्तीफे से पैदा हुई स्थिति पर विचार के लिए जो मीटिंग बुलाई गई, इंस्टीट्यूट प्रशासन की चेतावनी के बाद उस मीटिंग में इस्तीफे की कोई बात ही नहीं हुई ।
नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के इतिहास में इस तथ्य को कॉमेडी और ट्रेजडी - दोनों रूपों में याद रखा जायेगा कि चेयरमैन के इस्तीफे के बाद हुई काउंसिल की मीटिंग में इस्तीफे पर कोई बात ही नहीं हुई ।
कई लोगों का मानना और कहना है कि इंस्टीट्यूट प्रशासन ने जो किया, वह बिलकुल ठीक किया - अन्यथा दीपक गर्ग के इस्तीफे के जरिए शुरू हुए नाटक के कर्ता-धर्ता रीजनल काउंसिल को अपनी मनमानियाँ करने/थोपने का अड्डा बना लेते । मजे की बात यह है कि ऐसा मानने/कहने वाले लोगों ने भी इशारों और फुसफुसाहटों के रूप में ही अपना मत व्यक्त किया है, और उनकी भी बातें कहीं रिकॉर्ड पर नहीं आईं हैं । किसने सही किया, और किसने गलत किया - यह बातें यदि रिकॉर्ड पर नहीं आतीं हैं, तो क्या यह समझा जाए कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारी तथा पक्ष-विपक्ष के सदस्य और अगली बार 'यहाँ' आने की तैयारी करने वाले लोग सिर्फ कठपुतलियाँ हैं; जो मुसीबत के समय भी मस्त रहेंगे और सिर्फ सेल्फियाँ खींचने का काम करेंगे ।

Tuesday, September 13, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सतीश सिंघल ने एक फर्जी किस्म के आयोजन के जरिए अपनी फजीहत तो करवाई ही, साथ ही दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की मुसीबतों को भी बढ़ाया

नोएडा । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सतीश सिंघल ने अगले रोटरी वर्ष के अपने गवर्नर-काल के असिस्टेंट गवर्नर्स घोषित करके कई लोगों को जिस तरह का झटका दिया है, उसके कारण दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के अभियान के लिए भारी समस्या खड़ी हो गई है । सतीश सिंघल के खिलाफ पैदा हुई नाराजगी के कारण दरअसल दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के सामने उन कई लोगों का समर्थन खोने का खतरा पैदा हो गया है, जिन्होंने पिछले वर्ष के चुनाव में उनका साथ दिया था - और जिन्हें इस वर्ष भी दीपक गुप्ता और उनके समर्थक अपने साथ मान रहे हैं । उल्लेखनीय है कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का साथ देने वाले लोगों को विश्वास था कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का साथ/समर्थन करने के कारण सतीश सिंघल के गवर्नर-काल में उन्हें महत्त्वपूर्ण पद मिलेंगे - लेकिन सतीश सिंघल जो और जिस तरह से करते हुए दिखे हैं, उससे उन लोगों का विश्वास भंग हुआ है । कई लोग तो शिकायत करते हुए सुने जा रहे हैं कि सतीश सिंघल ने उन्हें असिस्टेंट गवर्नर का पद देने का वायदा किया था, लेकिन अब जब पद देने का समय आया - तो उनके तेवर ही बदले हुए हैं । इस बिना पर कई लोगों ने सतीश सिंघल पर धोखाधड़ी करने का गंभीर आरोप लगाया है । सबसे ज्यादा फजीहत रोटरी क्लब वैशाली के लोगों की हुई है । पिछले वर्ष इस क्लब में भारी झगड़े का कारण ही यह था कि क्लब के पदाधिकारी सतीश सिंघल के गवर्नर-काल में असिस्टेंट गवर्नर का पद पाने के बदले में क्लब के वोट दीपक गुप्ता को देने को तैयार हो गए थे । किंतु अब जब पद देने का नंबर आया तो सतीश सिंघल ने रोटरी क्लब वैशाली के लोगों को बाबा जी ठुल्लू थमा दिया है । रोटरी क्लब वैशाली के लोगों की समझ में ही नहीं आ रहा है कि इसका वह करें तो क्या करें ? हाँ, यह उन्हें अच्छी तरह से समझ में आ गया है कि सतीश सिंघल ने उन्हें ठगते हुए उन्हें मजाक का विषय जरूर बना दिया है ।
सतीश सिंघल की तरफ से कुछेक लोगों को जब डिस्ट्रिक्ट कोर टीम मीट में शामिल होने का निमंत्रण मिला, तब कई लोगों की उम्मीदों ने बड़ी जोरों की अँगड़ाई ली - उन्हें लगा कि सतीश सिंघल के आश्वासन पर पिछले वर्ष उन्होंने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का जो समर्थन किया था, उसके लिए पुरुस्कृत होने का समय आ गया है । इसी उम्मीद और विश्वास के साथ लोग डिस्ट्रिक्ट कोर टीम मीट में शामिल होने के लिए पहुँचे । लेकिन डेढ़ दिन के कार्यक्रम के नाम पर वहाँ जो कुछ भी हुआ, उसे देख कर अधिकतर लोगों को यही लगा कि उन्होंने अपना समय और पैसा नाहक ही बर्बाद किया है । पूरा कार्यक्रम जिस तरह से डिजाईन किया गया था, उसे अधिकतर लोगों ने मूर्खता के चरम प्रदर्शन के रूप में ही देखा/पहचाना । कार्यक्रम में शामिल हुए रोटेरियंस को तो छोड़िए, वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रूपक जैन के साथ वहाँ जो सुलूक हुआ - उसमें ही मूर्खता के चरम प्रदर्शन का सुबूत देखा/पाया जा सकता है । रूपक जैन को सतीश सिंघल ने हालाँकि अपने गवर्नर-काल में डिस्ट्रिक्ट के मार्ग-दर्शक की भूमिका दी है - किंतु डिस्ट्रिक्ट के मार्ग-दर्शक को कोर टीम के तथाकथित सदस्यों को संबोधित करने का मौका सबसे आखिर में बचे-खुचे समय में तब दिया गया, जब कार्यक्रम ख़त्म होने की मनोदशा में आ चुका था, और लोगों ने अपने अपने घर वापस लौटने की तैयारी करना शुरू कर दिया था । रूपक जैन ने स्वयं इस स्थिति का शिकायती स्वर में जिक्र किया और यह शिकायत करते हुए ही आगे कुछ भी कहने से इंकार कर दिया । लोगों ने पाया/देखा कि वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रूपक जैन का ऐसा अपमान इससे पहले शायद ही कभी हुआ हो - और उन्होंने रूपक जैन को इससे पहले शायद ही कभी इतना खिन्न और नाराज देखा हो ।
दरअसल यह पूरा आयोजन ही रोटरी को अपमानित करने वाला फर्जी किस्म का आयोजन था । एक सीधी सी कॉमनसेंस की बात है कि सतीश सिंघल ने अभी जब अपने गवर्नर-काल के लिए कोर टीम तय ही नहीं की है, कोर टीम के बारे में - कौन कौन लोग कोर टीम में होंगे तथा किसके पास क्या पद और क्या जिम्मेदारी होगी आदि इत्यादि - किसी को कुछ अतापता ही नहीं है : तब फिर 'डिस्ट्रिक्ट कोर टीम मीट' का मतलब भला क्या है ? कई लोगों ने सतीश सिंघल का उपहास उड़ाते हुए टिप्पणियाँ कीं कि सतीश सिंघल को इतनी सी अक़्ल भी नहीं है क्या कि कोर टीम की मीटिंग करने से पहले वह कोर टीम का गठन तो कम से कम कर लें ? कोढ़ में खाज वाली बात यह हुई है कि डिस्ट्रिक्ट कोर टीम मीट हो जाने के बाद भी - सतीश सिंघल के गवर्नर-काल की कोर टीम का अभी भी कोई अतापता नहीं है ।  
इसी बात ने वास्तव में आयोजन में समय और पैसा खर्च करने वाले लोगों को निराश किया और भड़काया हुआ है । आयोजन में लोग दरअसल शामिल ही इसलिए हुए थे, ताकि वह सतीश सिंघल की कोर टीम में अपनी जगह सुनिश्चित करवा लें और अपने लिए महत्त्वपूर्ण पद का जुगाड़ कर लें । कोर टीम में शामिल होने की इच्छा रखने वाले लोगों को लगा कि वह यदि इस आयोजन में शामिल नहीं होंगे, तो कहीं ऐसा न हो कि कोर टीम में उन्हें जगह ही न मिले और मनचाहा पद कोई और ले उड़े । पद तो छोड़िए, पूरे आयोजन में लेकिन जब कोर टीम की घोषणा ही नहीं हुई - तो लोगों ने अपने आप को पूरी तरह से लुटा-पिटा महसूस किया । लुटे-पिटे लौटे रोटेरियंस का कहना है कि इससे पहले किसी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट ने रोटेरियंस को इतना बेवकूफ नहीं बनाया होगा, जितना सतीश सिंघल ने बनाया है ।
आयोजन की एकमात्र उपलब्धि यह रही कि अगले रोटरी वर्ष में असिस्टेंट गवर्नर्स का पद सँभालने वाले लोगों के नाम घोषित हुए । इस घोषणा ने लेकिन सतीश सिंघल की मदद के सहारे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव जीतने की उम्मीद लगाए दीपक गुप्ता के लिए गंभीर समस्या पैदा कर दी है । पिछले रोटरी वर्ष में दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए वोट इकट्ठा करने की मुहिम में सतीश सिंघल ने जिन जिन लोगों को अपने गवर्नर-काल में असिस्टेंट गवर्नर बनाने का ऑफर दिया था, उनमें से अधिकतर को उन्होंने ठेंगा दिखा दिया है । असिस्टेंट गवर्नर के पद की उम्मीद लगाए लोगों ने सतीश सिंघल द्धारा की गई इस धोखाधड़ी का डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में बदला लेने की बातें करना शुरू किया है । इस तरह की बातों से संकेत मिल रहा है कि सतीश सिंघल की बातों में आकर जिन लोगों ने पिछले वर्ष दीपक गुप्ता को वोट दिया था, अब की बार वह उसका उल्टा करेंगे । पिछले रोटरी वर्ष में सतीश सिंघल अपने गवर्नर-काल के पदों का सौदा करके भी दीपक गुप्ता को चुनाव नहीं जितवा सके थे - ऐसे में, सतीश सिंघल की अभी की कार्रवाई से तो दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के सामने और ज्यादा मुश्किलें खड़ी हो जाने का खतरा पैदा हो गया है ।