Sunday, October 16, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में अपनी फजीहत का बदला लेने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी विनय भाटिया ने अपने ही क्लब में अध्यक्ष अनिल मग्गू के खिलाफ बबाल करवाया

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी विनय भाटिया अपने ही क्लब - रोटरी क्लब फरीदाबाद एनआईटी के अध्यक्ष अनिल मग्गू के खिलाफ षड्यंत्र करने/रचने तथा उन्हें अध्यक्ष पद से हटवाने की मुहिम चलवाने के आरोपों में 'पकड़े' गए हैं - और इस पकड़ से छूटने के चक्कर में उन्हें अपने ही क्लब के सदस्यों से बचना/छिपना पड़ रहा है । उनके इस रवैये से क्लब में घमासान और बढ़ गया है । रोटरी क्लब फरीदाबाद एनआईटी के कुछेक सदस्य पिछले करीब पंद्रह दिन से क्लब के सदस्यों के बीच तथा सोशल मीडिया पर क्लब के अध्यक्ष अनिल मग्गू के खिलाफ इस बात को लेकर अभियान चलाए हुए हैं कि उन्होंने अध्यक्ष पद से जब इस्तीफ़ा दे दिया है, तब फिर वह अध्यक्ष के रूप में काम/व्यवहार क्यों कर रहे हैं ? अनिल मग्गू की तरफ से भी इस अभियान का जोरदार जबाव दिया जा रहा है, और चुनौती दी जा रही है कि जिन लोगों को लगता है कि अनिल मग्गू अब क्लब के अध्यक्ष नहीं हैं - वह हिम्मत दिखाएँ और क्लब का नया अध्यक्ष चुन/चुनवा लें, फालतू की बयानबाजी क्यों कर रहे हैं ? दोनों तरफ की बयानबाजियों में क्लब की गतिविधियों के गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं, और एक दूसरे की पोल-पट्टी खोली जा रही है । इस सीन में लेकिन असली पोल-पट्टी विनय भाटिया की खुल रही है - जो इस क्लब के एक प्रमुख सदस्य होने के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी भी हैं । क्लब में मचे घमासान से दुखी क्लब के सदस्यों का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट का लीडर होने जा रहे विनय भाटिया के सामने जब क्लब में अपनी लीडरशिप क्षमता दिखाने का मौका आया है, तो वह मुँह छिपाते फिर रहे हैं; इससे समझा जा सकता है कि डिस्ट्रिक्ट में वह क्या करेंगे ?
विनय भाटिया पर इससे भी गंभीर आरोप यह है कि क्लब में मचे इस घमासान की जमीन उन्होंने ही तो तैयार की, और फिर उसे हवा भी दी - घमासान लेकिन चूँकि उनकी योजनानुसार नहीं चला, तो अब वह इससे मुँह चुरा रहे हैं । मामला रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट के एक कार्यक्रम में विनय भाटिया के क्लब के को-होस्ट बनने को लेकर था । साऊथ वेस्ट के पदाधिकारियों ने इसके लिए विनय भाटिया से संपर्क किया था । विनय भाटिया की एक बड़ी खूबी यह बताई जाती है कि उनसे किसी काम के लिए कहो, तो वह कभी भी मना नहीं करेंगे; लेकिन उस काम की जिम्मेदारी तुरंत किसी दूसरे के सिर मढ़ देंगे - काम हो जायेगा, तो अपनी पीठ थपथपायेंगे; और यदि नहीं हो पायेगा, तो जिसके सिर मढ़ा था उसे जिम्मेदार ठहरा देंगे । इस मामले में भी यही हुआ । रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट के पदाधिकरियों ने कहा, तो विनय भाटिया ने तुरंत अपने क्लब के को-होस्ट बनने के लिए हामी भर दी - और इस काम को करने की जिम्मेदारी उन्होंने क्लब के अध्यक्ष अनिल मग्गू को सौंप दी । अनिल मग्गू ने यह जिम्मेदारी ले तो ली, लेकिन उन्होंने विनय भाटिया से कहा कि को-होस्ट बनने के लिए जो पैसे देने होंगे, उसके लिए क्लब के लोगों को राजी करने का काम विनय भाटिया करें । विनय भाटिया लेकिन चूँकि काम नहीं करते हैं, वह सिर्फ काम का श्रेय लेते हैं - इसलिए उन्होंने कुछ नहीं किया और फलस्वरूप रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट के पदाधिकारियों के साथ किया गया उनका वायदा पूरा नहीं हो सका । स्वाभाविक रूप से, इससे विनय भाटिया की भारी फजीहत हुई । अपनी इस फजीहत के लिए उन्होंने अपने क्लब के अध्यक्ष अनिल मग्गू को जिम्मेदार ठहराया ।
इसी के साथ अनिल मग्गू के लिए क्लब में मुसीबतें शुरू हुईं । समझा जाता है कि विनय भाटिया की शह पर कुछेक लोगों ने अनिल मग्गू के सामने तरह तरह की अड़चने खड़ी करना शुरू कर दिया । इससे परेशान हो कर अनिल मग्गू ने गुस्से में कहीं अध्यक्ष पद छोड़ने की बात कर/कह दी । क्लब में विनय भाटिया के चेलों के इससे हौंसले और बुलंद हो गए । अब वह अनिल मग्गू की गतिविधियों पर सवाल उठाने लगे । उनका कहना रहा कि अनिल मग्गू ने जब अध्यक्ष पद छोड़ दिया है, तो वह अध्यक्ष के रूप में काम/व्यवहार क्यों कर रहे हैं ? अनिल मग्गू के नजदीकियों ने जब देखा कि कुछेक लोगों की बद्तमीज़ियाँ बढ़ती ही जा रही हैं, तो उन्होंने भी कार्रवाई करते हुए जबाव देना शुरू किया । उनका कहना रहा कि गुस्से में कही गई बात को आधार बना कर कुछेक लोग यदि अनिल मग्गू को अध्यक्ष पद से हटाना/हटवाना चाहते हैं, तो वह भी देखते हैं कि उनके मंसूबे कैसे पूरे होते हैं ? दोनों तरफ के रवैये के चलते क्लब में भारी घमासान मच गया है और तरह तरह की बातों के जरिये कीचड़-उछाल कार्यक्रम चल पड़ा है । इस सारे प्रसंग का दिलचस्प पहलू लेकिन यह है कि विनय भाटिया पता नहीं कहाँ छुप बैठ कर तमाशा देख रहे हैं । क्लब के सदस्यों को उम्मीद थी कि विनय भाटिया डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी के रूप में अपनी जिम्मेदारी समझते हुए मामले में हस्तक्षेप करेंगे तथा मामले को बिगड़ने से बचायेंगे; लेकिन वह तो मामले से ऐसे दूर बने हुए हैं, जैसे कि उन्हें तो इससे कुछ लेना-देना ही नहीं है ।
विनय भाटिया के रवैये से हतप्रभ व निराश क्लब के सदस्यों ने क्लब ट्रेनर संदीप गोयल से गुहार लगाई है कि दोनों तरफ के कुछेक लोगों ने जिस तरह से क्लब में अराजकता-सी फैलाई हुई है, उसे नियंत्रित करने के लिए वही कुछ करें । पूर्व अध्यक्ष संदीप गोयल क्लब के वरिष्ठ और सक्रिय सदस्य हैं, तथा उनका अध्यक्ष-काल ऐसा उल्लेखनीय रहा था कि डिस्ट्रिक्ट के कई प्रमुख लोगों का ध्यान उन पर गया था । वास्तव में उनके अध्यक्ष-काल में ही रोटरी क्लब फरीदाबाद एनआईटी की पहचान डिस्ट्रिक्ट में बढ़ी थी, जिसका फायदा विनय भाटिया के चुनाव में मिला था । विनय भाटिया के चुनाव में फरीदाबाद के जिन कुछेक लोगों ने निर्णायक भूमिका निभाई थी, संदीप गोयल उनमें एक हैं । संदीप गोयल से कहा जा रहा है कि वह क्लब में यदि शांति स्थापित करवायेंगे, तो यह उनकी तरफ से विनय भाटिया की एक और मदद होगी । क्लब के सदस्यों ने संदीप गोयल से गुहार लगाई है कि क्लब में जो बबाल मचा है, उसे थामने तथा क्लब के सदस्यों के बीच पहले जैसा परस्पर सहयोग व सौहार्द बनाये रखने का उपाय करें । क्लब में कुछेक सदस्यों ने लेकिन जिस तरह की गर्मी पैदा की हुई है, उसे देखते हुए संदीप गोयल से की जा रही गुहार संदीप गोयल के लिए खासी बड़ी चुनौती है । विनय भाटिया ने क्लब में जो आग लगाई है, संदीप गोयल सचमुच उसे बुझा सकेंगे, या नहीं - यह देखना दिलचस्प होगा ।

Friday, October 14, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सतीश सिंघल पर रोटरी को कमाई का जरिया बनाने के अपने हुनर का पेम वन पर भी इस्तेमाल करने का आरोप लगा

नोएडा । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सतीश सिंघल का पहला औपचारिक कार्यक्रम - पेम वन - होने से पहले ही जिस तरह की आलोचना और विवाद का शिकार हो गया है, उससे संकेत और सुबूत मिल रहे हैं कि सतीश सिंघल के गवर्नर-काल में रोटरी और डिस्ट्रिक्ट का मजाक ही बनना तय है । सतीश सिंघल ने घोषणा की भी है कि अपने गवर्नर-काल में वह ऐसे ऐसे काम करेंगे, जैसे रोटरी और डिस्ट्रिक्ट के इतिहास में पहले कभी नहीं हुए होंगे । इस घोषणा में हालाँकि उनका आशय अच्छे और प्रभावी कामों से रहा होगा, पर अभी तक जो होता हुआ नजर आ रहा है - उसमें बेवकूफियों और तमाशों का ज्यादा जोर बन रहा है; और उसमें रोटरी के नियम-कानून तथा व्यवस्थाएँ टूट रही हैं और उनका मजाक बन रहा है । पेम वन को सतीश सिंघल जिस तरह से आयोजित कर रहे हैं, उसके बारे में जान/सुन कर आरोप यह लग रहा है कि पेम आयोजित करने के पीछे रोटरी में जो उद्देश्य है, सतीश सिंघल ने अपने आयोजन में उसे ही अनदेखा कर दिया है - और अपने इस पहले ही औपचारिक कार्यक्रम को पैसा बनाने तथा राजनीति करने का जरिया बना दिया है ।   
उल्लेखनीय है कि पेम यानि प्रेसीडेंट इलेक्ट मीट, जैसा कि नाम से ही जाहिर है कि अगले रोटरी वर्ष में होने/बनने वाले अध्यक्षों की मीटिंग का कार्यक्रम है - जिसका उद्देश्य उन्हें रोटरी की बातों और व्यवस्थाओं से परिचित कराना होता है । इस कार्यक्रम में प्रेसीडेंट इलेक्ट और रोटरी के अनुभवी व जानकार लोगों की उपस्थिति ही वांछनीय होती है । कार्यक्रम की व्यवस्था करने/देखने के लिए कुछेक और रोटेरियंस भी कार्यक्रम में न्यौत लिए जाते रहे हैं । कुछेक अदृश्य किस्म की 'मजबूरियों' व 'जरूरतों' के चलते व्यवस्था करने/देखने वाले रोटेरियंस की संख्या बढ़ती भी रही है, लेकिन पेम में मुख्य फोकस प्रेसीडेंट इलेक्ट पर ही रहा है । सतीश सिंघल ने लेकिन रोटरी और डिस्ट्रिक्ट के इतिहास में पहली बार यह किया है कि इस फोकस को ही बदल दिया है । अपनी पेम वन में उन्होंने क्लब्स के मौजूदा प्रेसीडेंट तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के संभावित उम्मीदवारों को भी आमंत्रित किया है - और इस तरीके से पेम को मौजूदा रोटरी वर्ष की चुनावी राजनीति के अखाड़े के रूप में सजा दिया है, जिसमें प्रेसीडेंट इलेक्ट तो बेचारे बस तमाशबीन होंगे । इस तरह जो आयोजन रोटरी के भावी कर्ता-धर्ताओं के लिए रोटरी की बुनियादी बातों व भावनाओं को जानने/समझने/पहचानने का मौका होना चाहिए था - सतीश सिंघल ने उसे डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के एक एडवांस-शो में कन्वर्ट कर दिया है ।
पेम के पीछे के रोटरी उद्देश्यों की ऐसी-तैसी करने के सतीश सिंघल के इस 'पराक्रम' का कारण तो और भी मजेदार है । पेम की तैयारी से जुड़े उनके ही नजदीकियों का कहना है कि मौजूदा रोटरी वर्ष के अध्यक्षों को आमंत्रित करने का फैसला यह सोच कर लिया गया कि उससे कार्यक्रम में भीड़ बढ़ेगी और ज्यादा से ज्यादा पैसे मिलेंगे/बनेंगे । उल्लेखनीय है कि पेम वन के आयोजन का खर्च जुटाने के लिए सतीश सिंघल ने 19 क्लब्स से साठ-साठ हजार रुपए लिए हैं । पेम वन का आयोजन यदि अपने मूल स्वरूप में होता - जिसमें प्रेसीडेंट इलेक्ट के लिए तो भागीदारी मुफ़्त होती, लेकिन बाकी लोगों से रजिस्ट्रेशन का पैसा लिया जाता; तो क्लब्स से इकट्ठा हुए 11 लाख 40 हजार रुपए में से ज्यादा कुछ नहीं बचता । एक साधारण सा व्यापारिक फार्मूला पहचाना गया कि रजिस्ट्रेशन वाले भागीदारों की संख्या को यदि बढ़ा लिया जाए, तो रजिस्ट्रेशन से इकट्ठा हुए पैसे से ही खर्चा निकल आयेगा - और क्लब्स से इकट्ठा हुए पैसे को बचाया जा सकेगा । समस्या लेकिन यह पैदा हुई कि रजिस्ट्रेशन वाले भागीदारों को कहाँ से और कैसे जुटाया जाए ? तब क्लब्स के मौजूदा अध्यक्षों पर निगाह गई, और ज्यादा से ज्यादा रजिस्ट्रेशन हो सकें - इसके लिए उन्हें भी पेम में आमंत्रित कर लिया गया । अब लोग माथापच्ची करते रहें कि पेम का जो डिजाईन है, जो कॉन्सेप्ट है - उसमें मौजूदा अध्यक्षों का भला क्या काम है ? आरोप है कि सतीश सिंघल ने रोटरी को कमाई का जरिया बनाने में जो महारत हासिल की हुई है, और रोटरी नोएडा ब्लड बैंक के जरिए अपनी इस व्यापारिक महारत का जो सुबूत दिया हुआ है - उसी का उन्होंने अपनी गवर्नरी के पहले औपचारिक कार्यक्रम पेम वन में एक और नजारा प्रस्तुत किया है ।
सतीश सिंघल ने अभी तक जो भी कार्यक्रम किए हैं, उनमें अपनी सोच का बेतुकापन और स्वार्थी रूप ही जाहिर किया है । पिछले दिनों तो उन्होंने कोर टीम का गठन किए बिना ही कोर टीम की मीटिंग तक कर लेने का - 'कमाल'  दिखाया था । उनके हर कार्यक्रम में शामिल होने वाले लोगों ने अपने आपको ठगा हुआ और ताली बजाने वाली भूमिका में ही महसूस किया था । पेम वन में भी इसी का और बड़ा रूप देखने/दिखाने का सतीश सिंघल ने इंतजाम किया है । आमंत्रितों के 'ग्रुप्स' देख कर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि पेम वन में रोटरी का तो कोई भी काम हो पाना मुश्किल ही होगा - और आमंत्रितों को बस बेवकूफ ही बनना होगा । सतीश सिंघल के नजदीकियों का कहना है कि सतीश सिंघल लेकिन आश्वस्त हैं कि उनके कार्यक्रमों में लोग भले ही अपमानित महसूस करते हों, और अपने को ठगा हुआ पाते हों - लेकिन देखना, भारी संख्या में वह आयेंगे जरूर । सतीश सिंघल की व्यापारिक सोच व्यापार में उन्हें भले ही कामयाबी न दिला पाई हो, लेकिन रोटरी का व्यापारिक इस्तेमाल करने के मामले में उन्हें फायदा पहुँचाने वाली साबित हुई है । आरोपपूर्ण चर्चाओं के अनुसार ही, इसी नाते सतीश सिंघल को पूरा भरोसा है कि पेम वन के नाम पर वह जो तमाशा करने जा रहे हैं : वह प्रेसीडेंट इलेक्ट के लिए भले ही बेमतलब की कसरत हो, मौजूदा प्रेसीडेंट्स व दूसरे भागीदारों के लिए भले ही ताली बजाने वाली भूमिका निभाने का अपमानजनक मौका हो, और रोटरी को व डिस्ट्रिक्ट को भले ही बदनाम करने वाला अवसर हो - लेकिन खुद उनके लिए निश्चित रूप से जेब भरने वाला मौका साबित होगा ।

Thursday, October 13, 2016

दुबई इंस्टीट्यूट में रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दिनेश शर्मा की स्थिति को क्लियर करने से बचने की मनोज देसाई की कोशिश में कहीं दिनेश शर्मा का शिकार करने की उनकी मंशा तो नहीं छिपी है ?

सिकंदराबाद । इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई, डिस्ट्रिक्ट 3100 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दिनेश शर्मा के साथ जो खेल खेल रहे हैं, उसके कारण लोगों के बीच यह सवाल एक बार फिर मुखर हो गया है कि डिस्ट्रिक्ट 3100 को लेकर मनोज देसाई की नीयत और राजनीति वास्तव में है क्या ? उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट 3100 को नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस की बर्बादी तक पहुँचाने में डिस्ट्रिक्ट के अधिकतर लोग मनोज देसाई को ही प्रमुख रूप से जिम्मेदार मानते/समझते हैं - और बातचीत में वह इसे जब-तब मुखर होकर प्रकट भी करते हैं । समझा जाता है कि पिछले कुछेक वर्षों में डिस्ट्रिक्ट में अपनी आवभगत ठीक से न होने की शिकायतों के साथ-साथ मनोज देसाई को अपने चुनाव में डिस्ट्रिक्ट के कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की भूमिका को लेकर भी 'गहरी चोट' लगी हुई है, जिसके 'दर्द' के कारण उन्होंने डिस्ट्रिक्ट 3100 के प्रति दुश्मनी वाला भाव रखा हुआ है । इस भाव के चलते वह सुनील गुप्ता और दीपक बाबू की राजनीतिक बलि लेने के साथ-साथ कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स व पूरे डिस्ट्रिक्ट को भी सबक सिखा चुके हैं; और लोगों को ऐसा लगता है कि अब दिनेश शर्मा का नंबर है । सुनील गुप्ता, दीपक बाबू और कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट को जो सबक मिला, उसके लिए बहुत हद तक ये लोग खुद भी जिम्मेदार रहे हैं; इसलिए मनोज देसाई के खिलाफ तमाम शिकायतें व नाराजगी होने के बावजूद मनोज देसाई सीधे निशाने पर नहीं आ पाए । किंतु दिनेश शर्मा की तरफ से चूँकि अभी तक कोई नकारात्मक काम होता हुआ नहीं दिखा है, इसलिए उनके मामले ने डिस्ट्रिक्ट 3100 के प्रति मनोज देसाई की नीयत तथा उनकी राजनीति को सीधे निशाने पर ला दिया है । 
 दिनेश शर्मा का मामला बड़ा सीधा और आसान सा है, लेकिन मनोज देसाई के रवैये ने उसे बड़ा क्रिटिकल बना दिया है । दिनेश शर्मा दिसंबर में दुबई में होने जा रहे रोटरी इंस्टीट्यूट में अपनी भूमिका को लेकर मनोज देसाई से स्पष्टीकरण माँग रहे हैं, मनोज देसाई लेकिन उनकी इतनी सी बात पर चुप्पी साधे हुए हैं । दरअसल दिनेश शर्मा दुबई इंस्टीट्यूट के लिए अपना रजिस्ट्रेशन करवा चुके हैं । उनके सामने सवाल लेकिन यह है कि दुबई इंस्टीट्यूट में उन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट की पहचान और मान्यता मिलेगी या नहीं ? दिनेश शर्मा यह जानना चाहते हैं कि इंस्टीट्यूट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के लिए होने वाले ट्रेनिंग प्रोग्राम में शामिल होने का मौका उन्हें मिलेगा या नहीं ? इंस्टीट्यूट में जाने का दिनेश शर्मा के लिए उक्त प्रोग्राम में शामिल होना ही एकमात्र उद्देश्य है । दिनेश शर्मा को उक्त प्रोग्राम में शामिल होने के लिए चूँकि अभी तक कोई औपचारिक निमंत्रण नहीं मिला है; इसलिए वह इंस्टीट्यूट के संदर्भ में अपनी पूरी स्थिति को, अपने स्टेटस को जान/समझ लेना चाहते हैं । मनोज देसाई इंटरनेशनल डायरेक्टर होने के साथ-साथ चूँकि उक्त इंस्टीट्यूट के कन्वेनर भी हैं, इसलिए दिनेश शर्मा उनसे अपने स्टेटस को क्लियर करने की बात कर रहे हैं । मनोज देसाई लेकिन पूरे मामले में चुप बने हुए हैं और उन्हें कोई जबाव ही नहीं दे रहे हैं । दिनेश शर्मा ने लोगों को बताया है कि उन्होंने कई प्रमुख पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से भी गुहार लगाई हुई है कि वह मनोज देसाई से उनकी स्थिति स्पष्ट करवाएँ - लेकिन दिनेश शर्मा अपनी स्थिति, अपने स्टेटस को लेकर अभी भी अँधेरे में ही हैं । दिनेश शर्मा ने लोगों को बताया है कि उन्होंने मनोज देसाई को साफ साफ लिखा/कहा है कि इंस्टीट्यूट में यदि वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में शामिल नहीं किए जा सकते हैं, तो उनका रजिस्ट्रेशन रद्द करके उनका पैसा वापस कर दिया जाए; मनोज देसाई की तरफ से लेकिन इस पर भी कोई कार्रवाई नहीं की गई है ।
मनोज देसाई के इस रवैये ने दिनेश शर्मा तथा उनके साथियों को ही नहीं, बल्कि डिस्ट्रिक्ट के दूसरे लोगों को भी हैरान किया हुआ है । उनकी हैरानी का कारण यही है कि दिनेश शर्मा ने ऐसी कोई माँग तो नहीं ही की है, जिसे पूरा करने में मनोज देसाई को पसीने छूट रहे हों । इस हैरानी के चलते ही लोगों को लग रहा है कि दिनेश शर्मा की साधारण सी बात/माँग को अनसुना करके मनोज देसाई लगता है कि डिस्ट्रिक्ट 3100 के संदर्भ में अपनी किसी योजना को क्रियान्वित करना चाहते हैं । लोगों के बीच की चर्चाओं में जो कुछ कहा/बताया जा रहा है, उसके अनुसार लोगों को लग रहा है कि दिनेश शर्मा की बात/माँग को अनसुना करके मनोज देसाई दरअसल दिनेश शर्मा को उकसाने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि दिनेश शर्मा कोई ऐसी हरकत कर बैठें - जिसे आधार बना कर फिर वह सुनील गुप्ता और दीपक बाबू की तरह दिनेश शर्मा का भी शिकार कर सकें । लोगों को लग रहा है कि संजय खन्ना के प्रयासों से डिस्ट्रिक्ट में हालात सामान्य होने की तरफ जिस तरह से बढ़ते हुए दिख रहे हैं, उससे लगता है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर होने के बावजूद मनोज देसाई खुश नहीं हैं;  इसलिए वह डिस्ट्रिक्ट में कोई नया बखेड़ा खड़ा करने/करवाने के हालात पैदा करने के प्रयास कर रहे हैं ।
उल्लेखनीय है कि रोटरी इंटरनेशनल के विशेष प्रतिनिधि के रूप में डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजय खन्ना ने डिस्ट्रिक्ट 3100 में हालात को सामान्य बनाने की तरफ मोड़ने में आश्चर्यजनक रूप से सफलता प्राप्त की है । वह एक तरफ तो डिस्ट्रिक्ट के क्लब्स को सक्रिय करने तथा रोटरी के काम करने व अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने के लिए प्रेरित करने में सफल रहे हैं, और दूसरी तरफ रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों को इस बात पर आश्वस्त कर पाने में सफल हुए हैं कि डिस्ट्रिक्ट 3100 में लोग रोटरी के कामों व उद्देश्यों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं । इन दो-तरफ़ा सफलताओं के कारण ही संजय खन्ना डिस्ट्रिक्ट में मैचिंग ग्रांट व ग्लोबल ग्रांट का काम फिर से शुरू करवाने में कामयाब हुए हैं । संजय खन्ना की इस कामयाबी ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों को आश्वस्त किया है कि संजय खन्ना के सद्प्रयत्नों से डिस्ट्रिक्ट का नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस जल्दी ही हैट जायेगा, और डिस्ट्रिक्ट 3100 जल्दी ही रोटरी की मुख्य धारा का हिस्सा हो जायेगा । लोगों की इस आश्वस्ती ने दिनेश शर्मा और उनके नजदीकियों व समर्थकों को उत्साहित किया है, जिसकी प्रतिक्रिया में उनके बीच उम्मीद पैदा हुई है कि दिनेश शर्मा को गवर्नरी करने का मौका मिल जायेगा । इस उम्मीद के साथ-साथ उन्हें लेकिन इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई का रवैया डरा भी रहा है । मनोज देसाई के तौर-तरीके देख कर दिनेश शर्मा व उनके नजदीकियों/समर्थकों को ही नहीं, बल्कि डिस्ट्रिक्ट के दूसरे लोगों को भी शक व डर हो रहा है कि डिस्ट्रिक्ट में सामान्य होते माहौल को फिर से बिगाड़ने के लिए मनोज देसाई लगता है कि कोई चाल खोज रहे हैं । दुबई इंस्टीट्यूट में दिनेश शर्मा के स्टेटस को क्लियर करने से बचने की मनोज देसाई की कोशिश को ऐसी ही किसी चाल को खोजने की कोशिश के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । यह देखना सचमुच दिलचस्प होगा कि मनोज देसाई की चाल में दिनेश शर्मा फँसते हैं, या उससे बच निकलते हैं ।

Tuesday, October 11, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी को लायंस क्लब संभल के लोगों की तरफ से क्लब के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने से बाज आने तथा डिस्ट्रिक्ट की गतिविधियों में ध्यान केंद्रित करने की नसीहत लायंस इंटरनेशनल के इतिहास की पहली और अनोखी घटना है

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी को डिस्ट्रिक्ट के एक क्लब - लायंस क्लब संभल की तरफ से सार्वजनिक रूप से अप्रत्याशित चेतावनी मिली है कि वह 'हमारे क्लब के आंतरिक मामलों में बेवजह हस्तक्षेप न करें ।' क्लब की तरफ से शिव कुमार चौधरी को यह नसीहत भी दी गई है कि वह 'बेतुकी बातों में समय जाया न करते हुए अपने डिस्ट्रिक्ट की गतिविधियों में ज्यादा ध्यान केंद्रित करें ।' यह इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में अपनी हरकतों और कारस्तानियों से शिव कुमार चौधरी ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच अपनी क्या गत बना ली है । उनसे पहले भी हालाँकि घटिया सोच और व्यवहार के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हुए हैं, लेकिन अभी तक किसी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को सार्वजनिक रूप से लताड़ पड़ती नहीं सुनी गई । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रवैये के प्रति अलग अलग कारणों से अधिकतर लोगों के बीच नाराजगी व असंतोष रहता ही है; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बना व्यक्ति भी इस बात को जानता/समझता है - और इसलिए वह प्रयास करता है कि वह ऐसा कुछ न करे जिससे कि लोगों की नाराजगी व असंतोष ज्यादा भड़के तथा मुखर बने । शिव कुमार चौधरी के साथ लेकिन उल्टा ही हो रहा है । उन्हें जानने वालों का कहना है कि दरअसल घटियापन उनकी सोच व उनके व्यवहार में इतना कूट कूट कर भरा है कि वह जो कुछ भी करते हैं - उससे अपनी फजीहत में और इजाफा ही कर/करवा लेते हैं । यही कारण है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नरी के चौथे महीने में ही उनके लिए यह नौबत आ गई है कि एक क्लब के लोग उन्हें वॉट्स-ऐप पर सार्वजनिक रूप से लताड़ लगाते हुए क्लब के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने से बाज आने तथा डिस्ट्रिक्ट की गतिविधियों में ध्यान केंद्रित करने की नसीहत दे रहे हैं ।
यह इस बात का भी पुख्ता सुबूत है कि अपने आचरण और अपने व्यवहार से शिव कुमार चौधरी ने अपनी ही फजीहत नहीं कराई है, बल्कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की गरिमा व प्रतिष्ठा को भी नीचे गिरा लिया है ।
डिस्ट्रिक्ट में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर व सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के साथ टकराव बनाने/बढ़ाने में भी शिव कुमार चौधरी ने अनोखा रिकॉर्ड बनाया है । इस मामले में भी इस तथ्य को रेखांकित किया जा सकता है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के अपने वाइस के साथ उचित तालमेल के न होने के उदाहरण दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में भी मिल जायेंगे; ऐसे उदाहरण भी मिल जायेंगे जिनमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर और उनके वाइस एक दूसरे को फूटी आँख न देख रहे हों - लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का अपने वाइस के साथ खुला टकराव हो, यह 'कमाल' सिर्फ और सिर्फ शिव कुमार चौधरी के नाम पर है । शिव कुमार चौधरी के लिए फ्रस्ट्रेशन का और चिढ़न का कारण वास्तव में यह है कि उनके दोनों वाइस एक साथ हैं, एकजुट हैं और डिस्ट्रिक्ट के लोगों को अपने साथ जोड़ने में सफल हैं । डिस्ट्रिक्ट के दोनों वाइस गवर्नर्स की देख/रेख में मसूरी में आयोजित हो रहे सेमीनार को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में शिव कुमार चौधरी द्धारा तमाम रोड़े डालने के बावजूद डिस्ट्रिक्ट के लोगों की तरफ से जो जबर्दस्त समर्थन मिला है, उसके कारण शिव कुमार चौधरी का फ्रस्ट्रेशन तथा उनकी चिढ़न और बढ़ गई है । कुछेक लोगों ने शिव कुमार चौधरी को सुझाव भी दिया कि डिस्ट्रिक्ट के दोनों वाइस द्धारा किए जा रहे आयोजन और उसे मिल रहे व्यापक समर्थन से यदि इतना ही जल-भुन रहे हो, तो उनसे भी बड़ा आयोजन करके उन्हें जबाव दो । इस सुझाव पर अमल कर पाना लेकिन शिव कुमार चौधरी के बस की बात नहीं है । उनके द्धारा किए गए डिस्ट्रिक्ट के आयोजनों की जैसी जो भद्द पिटी है और व्यवस्था तथा उपस्थिति के लिहाज से उनका हर आयोजन जिस तरह से फ्लॉप साबित हुआ है, उससे शिव कुमार चौधरी ने इतना सबक तो सीख ही लिया है कि कुछ करने की बजाए - जो हो रहा है, उसे बिगाड़ने की कोशिश करने का काम करना ही उनके लिए संभव है ।
बिगाड़ने का काम भी चूँकि एक काम होता है, इसलिए शिव कुमार चौधरी को उसमें भी कोई सफलता नहीं मिल रही है । मसूरी में हो रहे आयोजन के खिलाफ लोगों को भड़काने की शिव कुमार चौधरी ने जो कोशिश की, उसका वास्तव में उल्टा ही असर हुआ, और उक्त आयोजन के प्रति लोगों का जोश व समर्थन और ज्यादा बढ़ा नजर आया । शिव कुमार चौधरी ने डिस्ट्रिक्ट के विभाजन की जो चाल चली है, वह भी औंधे मुँह गिरती दिख रही है । इस मामले में शिव कुमार चौधरी को जितने समर्थन की उम्मीद थी भी, वह भी उन्हें मिलता हुआ नहीं दिख रहा है । इस मामले में शिव कुमार चौधरी के लिए भारी फजीहत का कारण यह तथ्य भी बना है कि उनकी अपनी कैबिनेट के सदस्यों और उनके क्लब्स का समर्थन भी उन्हें मिलता हुआ नहीं नजर आ रहा है । इस मामले में शिव कुमार चौधरी को सबसे बड़ा झटका पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स अरुण मित्तल व अनीता गुप्ता की तरफ से लगा है । उन्हें उम्मीद थी कि इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने की इच्छा रखने वाले यह दोनों पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अलग अलग डिस्ट्रिक्ट में हो जाने को अपने अपने लिए फायदेमंद समझेंगे, और इस कारण से डिस्ट्रिक्ट विभाजन के उनके अभियान को बढ़-चढ़ कर आगे बढ़ायेंगे; किंतु इन दोनों ने ही डिस्ट्रिक्ट विभाजन मुद्दे पर ठंडा रुख अपनाया है । समझा जाता है कि अरुण मित्तल और अनीता गुप्ता को दरअसल भरोसा नहीं है कि डिस्ट्रिक्ट में शिव कुमार चौधरी की जैसी फजीहत हो रही है, उसके चलते डिस्ट्रिक्ट विभाजन का उनका अभियान सफल हो भी पायेगा; दोनों वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने जिस तरह से डिस्ट्रिक्ट विभाजन की बात का दो-टूक विरोध किया है - उसके कारण डिस्ट्रिक्ट विभाजन के मुद्दे की पूरी तरह से हवा निकल गई है । ऐसे में, अरुण मित्तल और अनीता गुप्ता को डर है कि उनके विभाजन के पक्ष में उतरने के बाद भी विभाजन नहीं हुआ तो वह 'दूसरे' क्षेत्र के क्लब्स में तो मुँह दिखाने लायक भी नहीं रहेंगे - इसी डर की वजह से अरुण मित्तल तथा अनीता गुप्ता ने विभाजन के मुद्दे से दूरी बनाई हुई है; उनके इस रवैये ने शिव कुमार चौधरी को पूरी तरह अलग-थलग कर दिया है ।
शिव कुमार चौधरी ने आपदा पीड़ितों की मदद के नाम पर झूठ बोल कर और नरेश अग्रवाल तथा नेविल मेहता जैसे बड़े नेताओं को चकमा देकर एलसीआईएफ एमरजेंसी ग्रांट की पाँच हजार अमेरिकी डॉलर की रकम हड़पने की जो कोशिश की, उसके कारण लायंस इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारियों को भी उनकी ठगीबाजी के 'सुबूत' मिल गए हैं । शिव कुमार चौधरी की ठगीबाजी के एक शिकार सतीश अग्रवाल जब-तब वाट्स-ऐप पर शिव कुमार चौधरी की फजीहत करते ही रहते हैं । इस तरह, चौतरफा मुसीबतों में घिरे शिव कुमार चौधरी का फ्रस्ट्रेशन व चिढ़न इस हद तक बढ़ गई है कि वह क्लब्स के लोगों से खुन्नस निकालने लगे हैं । लायंस क्लब संभल के लोगों की तरफ से लेकिन उन्हें जो करारा जबाव मिला है, वह उनकी फजीहत में और इजाफा करने वाला तो है ही, साथ ही लायंस इंटरनेशनल के इतिहास की पहली और अनोखी घटना भी है, जिसमें एक क्लब के लोग एक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को क्लब के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने से बाज आने तथा डिस्ट्रिक्ट की गतिविधियों में ध्यान केंद्रित करने की नसीहत दे रहे हैं ।

Sunday, October 9, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के दबाव में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा रोटरी इंटरनेशनल के फैसले का मजाक बनायेंगे क्या ?

पानीपत । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा के लिए यह तय करना एक बड़ी भारी मुसीबत बन गया है कि वह रोटरी इंटरनेशनल की बात मानें या राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की ? हालाँकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में वह प्रतिनिधि/पदाधिकारी तो रोटरी इंटरनेशनल के हैं, गवर्नरी करने के लिए उन्हें पैसे भी रोटरी इंटरनेशनल से मिलते हैं या मिलेंगे - इसलिए बात तो उन्हें रोटरी इंटरनेशनल की ही माननी चाहिए; लेकिन डिस्ट्रिक्ट में राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का जैसा 'आतंक' हैं और बात न मानने वालों के खिलाफ वह नीचता की जिस हद तक जाने में गुरेज नहीं करते हैं - उसे देखते/जानते हुए रमन अनेजा के लिए उनकी बात मानने से इंकार करना भी आसान नहीं है । रमन अनेजा के सामने अपने पूर्ववर्ती दो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स - डेविड हिल्टन और दिलीप पटनायक का उदाहरण भी है; जिन्होंने राजा साबू और उनके गिरोह के चक्कर में अपनी जो फजीहत और बदनामी कराई - रमन अनेजा उससे भी डरे हुए हैं । राजा साबू और उनके गिरोह के रवैये ने रमन अनेजा के सामने सचमुच  विकल्प नहीं छोड़ा है । दिलीप पटनायक और डेविड हिल्टन की तरह वह राजा साबू और उनके गिरोह की कठपुतली बनते हैं, तो फजीहत व बदनामी का शिकार बनते हैं; रोटरी इंटरनेशनल के फैसले को यदि वह नहीं मानते हैं, तो रोटरी इंटरनेशनल पता नहीं उनके साथ क्या करेगा; राजा साबू और उनके गिरोह की यदि नहीं मानते हैं, तो वह उनका और भी बुरा हाल करेंगे । ऐसे में, रमन अनेजा के लिए यह समझना वास्तव में मुश्किल बना हुआ है कि वह आखिर करें तो क्या करें ?
मामला वर्ष 2017-18 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का है । रोटरी इंटरनेशनल ने हाल ही में अपने एक फैसले में वर्ष 2017-18 के लिए टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर घोषित किया है । रोटरी इंटरनेशनल के इस फैसले के चलते टीके रूबी अब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट हुए । राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स ने लेकिन घोषणा की है कि वह रोटरी इंटरनेशनल के इस फैसले को नहीं मानेंगे और टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में मान्यता नहीं देंगे । उन्होंने रमन अनेजा से भी साफ बता दिया है कि वह टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में कतई तवज्जो न दें । यह राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के नीचता की हद की नई ऊँचाई पर पहुँचने का उदाहरण है, जहाँ से वह रोटरी इंटरनेशनल के फैसले को भी मानने से इंकार कर रहे हैं । इस बारे में दिया जा रहा उनका तर्क भी मजेदार है : उनका कहना है कि फैसला करने वाली कमेटी के जो सदस्य हैं, वह बहुत ही इम्मैच्योर किस्म के लोग हैं और रोटरी के बारे में सही समझ नहीं रखते हैं, इसलिए उनके द्धारा लिए गए फैसले को स्वीकार व लागू नहीं किया जा सकता है । अब यदि इस तर्क को और आगे बढ़ाएँ, तो यह भी कहा जा सकता है कि रोटरी की सही समझ न रखने वाले इम्मैच्योर किस्म के लोगों को कमेटी का सदस्य नियुक्त करने वाले वरिष्ठ रोटरी पदाधिकारी तो और भी ज्यादा इम्मैच्योर तथा रोटरी की सही समझ न रखने वाले हुए । ऐसे वरिष्ठ पदाधिकारियों को कमेटी सदस्य नियुक्त करने की जिम्मेदारी देने वाले रोटरी इंटरनेशनल के और बड़े अधिकारी तो और भी ज्यादा इम्मैच्योर तथा रोटरी की सही समझ न रखने वाले हुए । यानि रोटरी इंटरनेशनल में ऊपर से नीचे तक हर कोई इम्मैच्योर तथा रोटरी की सही समझ न रखने वाला है । यानि रोटरी में मैच्योर तथा रोटरी की सही समझ रखने वाले सिर्फ राजा साबू और उनकी हाँ में हाँ मिलाने वाले उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स ही हैं बस !
बात दरअसल मैच्योर/इम्मैच्योर या रोटरी की सही समझ रखने या न रखने की नहीं है; बात सिर्फ इतनी है कि कमेटी ने ऐसा फैसला दिया है, जो राजा साबू और उनके गुर्गे पूर्व गवर्नर्स को पसंद नहीं है - और इसलिए उन्होंने रोटरी इंटरनेशनल को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है । इनका दोगलापन इससे भी जाहिर है कि फैसले के एक हिस्से को स्वीकार करने से तो यह इंकार कर रहे हैं, लेकिन फैसले के दूसरे हिस्से को यह शब्दशः स्वीकार कर रहे हैं । उल्लेखनीय है कि रोटरी इंटरनेशनल के दिल्ली स्थित साऊथ एशिया ऑफिस में क्लब व डिस्ट्रिक्ट सपोर्ट टीम के को-ऑर्डीनेटर दमन बावेजा ने रमन अनेजा को भेजे ईमेल संदेश में रोटरी इंटरनेशनल के तीन सदस्यीय पैनल द्धारा लिए गए फैसले के बारे में जो जानकारी दी है, उसमें दो बातें मुख्य हैं : पहली के अनुसार, वर्ष 2017-18 के लिए टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर घोषित करना; और दूसरी के अनुसार, इस फैसले को 21 दिन के भीतर रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड में चेलैंज करने का अधिकार देना । राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स बता रहे हैं कि वह डीसी बंसल से इस फैसले को चेलैंज करवायेंगे । इनसे कोई पूछे कि आप जब कमेटी के फैसले को स्वीकार ही नहीं कर रहे हैं, तो फिर कमेटी ने फैसले को चेलैंज करने का जो अधिकार दिया है, उसे क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं ? इन्हें यदि सचमुच कमेटी का फैसला न मानने की अपनी बात और अपना तर्क सही लगता है, तो यह कहें कि फैसले को न स्वीकार करने के कारण यह डीसी बंसल को ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर (इलेक्ट) मानेंगे और उनसे फैसले को चेलैंज नहीं करवायेंगे । राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि मनमानी करने के नाम पर निरंतर दोगलापन दिखाते रहना ही इनका असली चरित्र है ।
राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स दोगलापन चाहें जितना दिखाएँ, वह भी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि कमेटी का जो फैसला है उसकी पूरी पूरी अहमियत और मान्यता है - इसीलिए वह डीसी बंसल से फैसले को अवश्य ही चेलैंज करवायेंगे । डीसी बंसल को इसका पूरा अधिकार है । कमेटी का फैसला भी डीसी बंसल को यह अधिकार देता है । लेकिन कमेटी का फैसला यह भी कहता/बताता है कि इस समय टीके रूबी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट हैं । यह फैसला चेलैंज होगा, इस आधार पर टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट मानने से इंकार नहीं किया जा सकता है । टीके रूबी की तरफ से डीसी बंसल के चुने जाने को चेलैंज करने के बावजूद डीसी बंसल को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट माना जाता रहा था न; उसी तर्क और व्यवस्था से डीसी बंसल की तरफ से चेलैंज होने के बावजूद टीके रूबी ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट होने चाहिए । राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा पर दबाव बनाए हुए हैं कि वह डीसी बंसल को ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट मानें/समझें और टीके रूबी को कोई तवज्जो न दें । उन्होंने रमन अनेजा को आश्वस्त किया है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई और या रोटरी इंटरनेशनल के किसी अन्य पदाधिकारी से डरने की कोई जरूरत नहीं है; और जैसा हम कह रहे हैं, वैसा ही करो । जो लोग रमन अनेजा को जानते हैं, उनका कहना है कि रमन अनेजा भी दिलीप पटनायक और डेविड हिल्टन के 'रास्ते'  पर ही चलेंगे और वही करेंगे जो राजा साबू और उनके गिरोह के गवर्नर उनसे करने के लिए कहेंगे ।
राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स ने रोटरी इंटरनेशनल के फैसले को न मानने के जो तेवर दिखाएँ हैं - और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रमन अनेजा की तरफ से भी रोटरी इंटरनेशनल के फैसले की अवमानना करने के जो संकेत मिल/दिख रहे हैं, उस पर इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई, रोटरी में नियम-कानून के पालन होने की चिंता करने वाले निवर्त्तमान इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन और रोटरी इंटरनेशनल के अन्य पदाधिकारी क्या प्रतिक्रिया देते हैं - यह देखना दिलचस्प होगा ।

Saturday, October 8, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पूजा बंसल को चेयरपरसन पद की मिली जिम्मेदारी ने रीजन काउंसिल के सत्ता समीकरणों का नए सिरे से गठित होने का मौका बनाया, और उसमें नए गुल खिलने की उम्मीद पैदा की

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की 13 सदस्यीय मैनेजमेंट कमेटी ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के इतिहास में पहला कलंकित अध्याय जोड़ा है, जिसमें वह खुद बिना पूर्णकालिक चेयरमैन के बिना पाँच महीने काम करेगी - इस कलंकित इतिहास को रचने के लिए कई लोग इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य राजेश शर्मा को भी कोस रहे हैं । लोगों का कहना है कि अपनी बेवकूफीभरी छोटी सोच से राजेश शर्मा ने रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों व सदस्यों को न केवल रीजन के लोगों के बीच, बल्कि दूसरे रीजन्स के पदाधिकारियों के बीच भी 'कार्टून' बना कर रख दिया है । जो कोई भी पूरे प्रसंग का रिकॉर्डेड घटनाक्रम देखता/सुनता/जानता है, वह इसी बात पर आश्चर्य करता है कि - नॉर्दर्न रीजन के लोगों ने करीब दस महीने पहले अपनी काउंसिल के लिए प्रतिनिधि चुने थे, या कार्टून चुने थे । रिकॉर्डेड घटनाक्रम के अनुसार, नॉदर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन दीपक गर्ग 22 अगस्त को इंस्टीट्यूट प्रशासन पर सहयोग न करने के गंभीर आरोप लगाते हुए चेयरमैन के रूप में काम करने में असमर्थता व्यक्त करते हुए इस्तीफा दे देते हैं । 9 सितंबर को बुलाई गई रीजनल काउंसिल की मीटिंग में - आश्चर्यजनक रूप से, न दीपक गर्ग के इस्तीफे पर और न इंस्टीट्यूट प्रशासन पर सहयोग न करने के उनके आरोपों पर कोई चर्चा नहीं होती है । इसके बाद, 7 अक्टूबर को रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाई जाती है, जिसमें दीपक गर्ग के इस्तीफे को स्वीकार करके वाइस चेयरपरसन पूजा बंसल को चेयरपरसन पद का भी कामकाज देखने के लिए अधिकृत करने का फैसला लिया जाता है ।
रीजनल काउंसिल सदस्यों के कार्टूनपने का पुख़्ता सुबूत इस सवाल में ही छिपा है कि 7 अक्टूबर को जो फैसला हुआ है, वह 9 सितंबर की मीटिंग में ही क्यों नहीं ले लिया गया था ? इस सवाल का सबसे दिलचस्प जबाव यही सुनने को मिल रहा है कि 7 अक्टूबर को लिया गया फैसला यदि 9 सितंबर की मीटिंग में ले लेते, तो काउंसिल सदस्य और पदाधिकारी अपना कार्टूनपना कैसे दिखाते और साबित करते ? अब ज़रा इस बात पर भी गौर करें कि दीपक गर्ग के इस्तीफ़ा देने के दिन से लेकर उनका इस्तीफा स्वीकार होने वाले दिन तक के 45 दिनों में रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों व सदस्यों ने किया क्या ? बेहिचक सीधा सा जबाव है कि इन दिनों में भी उन्होंने वही कुछ किया, जो यह पहले करते थे : इस्तीफ़ा देने के बावजूद दीपक गर्ग काउंसिल के कार्यक्रमों में चेयरमैन के रूप में खुशी खुशी शामिल होते रहे, और उनके संगी-साथी मीटिंग्स में सेल्फियाँ खींचते रहे । जाहिर है कि न दीपक गर्ग ने और न उनके संगी-साथियों ने और न दूसरे सदस्यों ने इंस्टीट्यूट प्रशासन पर लगाए दीपक गर्ग के आरोपों को गंभीरता से लिया । दीपक गर्ग का इस्तीफ़ा और उनके लगाए आरोप वास्तव में एक गंभीर मुद्दा है : दीपक गर्ग के आरोप यदि झूठे हैं, तो इस बात की जाँच होनी ही चाहिए कि आखिर किस स्वार्थ और षड्यंत्र के चलते उन्होंने इंस्टीट्यूट प्रशासन को बदनाम करने का काम किया; और यदि उनके आरोप सच हैं तो यह रीजनल काउंसिल के प्रत्येक सदस्य के लिए चिंता की बात होनी चाहिए । पर पिछले 45/47 दिनों में ऐसे कोई संकेत देखने को नहीं मिले हैं, जिनसे लगता हो कि किसी को भी दीपक गर्ग के आरोपों को लेकर ज़रा सी भी फ़िक्र हो । रीजनल काउंसिल के मौजूदा सदस्यों को वोट देने वाले लोगों को सोचना चाहिए कि उन्होंने इन्हें क्या इसलिए वोट दिए थे कि काउंसिल में जा कर यह सेल्फियाँ खींचे और इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन को बदनाम करें, उनका मजाक बनाएँ ?
नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में जो ड्रामा चला, उसके रिकॉर्डेड पक्ष से काउंसिल सदस्यों के 'कार्टून' होने का पता चला, तो पर्दे के पीछे की कहानी उनका और भी घटिया रूप सामने लाती है । रिकॉर्डेड पक्ष में जो तमाम 'छेद' हैं, वह आभास देते हैं कि मामला सिर्फ उतना ही नहीं है - जितना कि दिख रहा है; बल्कि उससे कहीं ज्यादा बड़ा और गंभीर है । लोगों के बीच की चर्चाओं के अनुसार इस सारे तमाशे के वास्तविक सूत्रधार सेंट्रल काउंसिल के सदस्य राजेश शर्मा हैं, जिन्होंने भाँप लिया कि रीजनल काउंसिल के अधिकतर सदस्य निरे मूर्ख किस्म के हैं, और इन्हें जैसे चाहें वैसे हाँका जा सकता है । राजेश शर्मा ने इन्हें पट्टी पढ़ाई कि चेयरमैन बनने के लिए ज्यादा इंतजार क्यों करते हो; छह-छह महीने के हिसाब से तीन वर्ष में छह लोग चेयरमैन बन जाओ ! चेयरमैन बनने की दौड़ में लगे लोगों को यह फार्मूला तुरंत से पसंद भी आ गया, और वह राजेश शर्मा को अपना गुरु घोषित कर उनके बताए रास्ते पर चल पड़े । राजेश शर्मा खुद भी बड़ी अनोखी चीज हैं : आमतौर पर जो लोग बड़े बनना चाहते हैं, वह बड़े काम करने और बड़ी सोच रखने की जरूरत समझते हैं; राजेश शर्मा इस पचड़े में पड़ने की जरूरत नहीं समझते - बड़ा 'बनने' का उनका बड़ा आसान सा फार्मूला है और वह यह कि 'बड़े' लोगों के पीछे या दाएँ या बाएँ जबर्दस्ती घुस/घुसा कर फोटो खिंचवाओ और फिर उस फोटो को लोगों को दिखाओ - बस बड़े बन गए, और देखिए कितनी आसानी से बन गए । इसी तर्ज पर उन्होंने रीजनल काउंसिल के चेयरमैन-लोभी सदस्यों को जोड़ा और उन्हें बताया कि छह छह महीने के लिए चेयरमैन बनोगे, तो ज्यादा काम भी नहीं करना पड़ेगा और चेयरमैन भी कहलाने लगोगे । दीपक गर्ग का इस्तीफ़ा दरअसल इसी फार्मूले को क्रियान्वित करने के लिए उठाया गया कदम था ।
राजेश शर्मा के कहने में आकर रीजनल काउंसिल के सत्ता खेमे के लोगों ने कदम तो बढ़ा दिया - चर्चा तो यहाँ तक सुनी गई कि राजेश शर्मा की बातों में आकर पंकज पेरिवाल ने तो चेयरमैन पद की शपथ लेने के दौरान पहनने के लिए सूट चूज कर लिया था और उसे फिटिंग के अनुसार ऑल्टर करने के लिए भी दे दिया था - लेकिन इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट देवराज रेड्डी ने इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन को मज़ाक बनाने की कोशिश करने वाले लोगों के ऐसे कान उमेंठे कि बेचारे न तो दर्द से कराह पाए और न कान छुड़ा पाए । इस बीच नॉर्दर्न रीजन की चंडीगढ़ ब्रांच में भी कुछ इसी तरह का तमाशा हुआ, और उन्होंने थोड़ी बहुत 'हेकड़ी' दिखाने की भी कोशिश की - जिसे देख कर राजेश शर्मा और उनके चंगु-मंगुओं को भी उम्मीद बँधी कि शायद उनके लिए भी कोई सम्मानजनक रास्ता निकल आए । दरअसल इसी उम्मीद में 9 सितंबर की मीटिंग में दीपक गर्ग के इस्तीफे को लेकर कोई बात या फैसला नहीं लिया गया । लेकिन इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया । राजेश शर्मा और उनके चंगु-मंगुओं के लिए मुसीबत की बात यह भी हुई कि सेंट्रल काउंसिल में नॉर्दर्न रीजन का प्रतिनिधित्व करने वाले बाकी सदस्यों ने उनकी हरकत की भर्त्सना ही की और उन्हें किसी भी तरह से समर्थन देने से साफ इंकार कर दिया । 'मरता क्या न करता' वाली तर्ज पर राजेश शर्मा और उनके चंगु-मंगुओं ने 7 अक्टूबर को आखिरकार वह फैसला कर लिया, जिसे वह 9 सितंबर को भी कर सकते थे - और जिसने न सिर्फ उनके सारे प्लान को चौपट कर दिया, बल्कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल और इंस्टीट्यूट के इतिहास में काला और कलंकित करने वाला अध्याय जोड़ दिया ।
वाइस चेयरपरसन पूजा बंसल को बाकी के पाँच महीनों में चेयरपरसन पद की जिम्मेदारियाँ निभाने का जो मौका मिला है, उसमें रीजन काउंसिल के सत्ता समीकरणों को नए सिरे से गठित होने के अवसर के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । पूजा बंसल दरअसल सत्ता खेमे का हिस्सा थीं तो, लेकिन सत्ता खेमे में उनकी भूमिका एक किनारे खड़े मूक दर्शक की और समर्थक की ही थी - अब लेकिन सत्ता खेमे में उनकी भूमिका न सिर्फ महत्त्वपूर्ण बल्कि निर्णायक भी हो गई है । इससे स्वाभाविक ही है कि उनकी महत्त्वाकांक्षाओं को हवा मिलेगी । यही चीज नॉर्दर्न रीजन की चुनावी राजनीति में नए गुल खिलाएगी और उसके परिदृश्य को दिलचस्प बनाएगी ।

Wednesday, October 5, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी की सुशील गुप्ता द्धारा की जा रही वकालत में अशोक गुप्ता को अपने साथ धोखा क्यों नज़र आ रहा है ?

नई दिल्ली । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के संदर्भ में पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के विरोधाभासी रवैये ने अशोक गुप्ता और उनके नजदीकियों व समर्थकों को चक्कर में डाला हुआ है । डिस्ट्रिक्ट 3052 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अशोक गुप्ता अगले रोटरी वर्ष में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी करते हुए सुने/बताए जा रहे हैं, और इसके लिए वह पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट कल्याण बनर्जी, पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता और मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई के समर्थन का दावा करते हैं । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी भी आने की चर्चा से सुशील गुप्ता का अशोक गुप्ता को समर्थन संदेह के घेरे में आ गया है । रंजन ढींगरा को सुशील गुप्ता के बड़े खास नजदीकियों के रूप में देखा/पहचाना जाता है; और इसी बिना पर माना/समझा गया कि रंजन ढींगरा यदि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उम्मीदवार हो रहे हैं - तो निश्चित ही सुशील गुप्ता के साथ विचार-विमर्श करके और उनके समर्थन का आश्वासन मिलने के बाद ही हो रहे हैं । हालाँकि इस मानने/समझने को गलत साबित करने के लिए इस बीच सुशील गुप्ता ने रंजन ढींगरा के कुछेक असाइनमेंट दूसरे पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को दिलवा दिए । सुशील गुप्ता की इस कार्रवाई ने लोगों को हैरान भी किया । दरअसल रोटरी में कोई इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकता कि सुशील गुप्ता, रंजन ढींगरा से असाइनमेंट वापस ले/लिबवा कर किसी दूसरे को दे/दिलवा देंगे । पर सुशील गुप्ता की इस कार्रवाई ने अशोक गुप्ता को राहत की साँस दी थी और उन्होंने विश्वास कर लिया था कि रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी में सुशील गुप्ता का कोई हाथ नहीं है, और सुशील गुप्ता का समर्थन उनकी उम्मीदवारी को ही मिलेगा । अभी पिछले दिनों लेकिन अशोक गुप्ता को यह जान/सुन कर चक्कर सा आ गया कि सुशील गुप्ता रोटरी इंटरनेशनल के जोन 4 के विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी की वकालत कर रहे हैं ।
अशोक गुप्ता दरअसल यह देख/जान कर हैरान हुए कि पिछले दिनों जोन 4 के कुछेक डिस्ट्रिक्ट्स के महत्त्वपूर्ण आयोजनों में रंजन ढींगरा को बहुत अहमियत देते हुए निमंत्रण मिले और रंजन ढींगरा उन आयोजनों में शामिल हुए । डिस्ट्रिक्ट 3080 का समर्थन एक अन्य संभावित उम्मीदवार दीपक कपूर को मिलने का अनुमान लगाया जाता है, किंतु उसके एक प्रमुख आयोजन में रंजन ढींगरा की उल्लेखनीय उपस्थिति और संलग्नता देखी गई । जोन 4 के डिस्ट्रिक्ट्स में रंजन ढींगरा की अचानक से बढ़ी सक्रियता के बारे में जान/सुन कर अशोक गुप्ता का माथा ठनका, तो उन्होंने अपने स्तर पर सारे माजरे को जानने/समझने की कोशिश की, और अपनी कोशिश में उन्हें पता चला कि रंजन ढींगरा की इस अचानक बढ़ी सक्रियता में सुशील गुप्ता का भी 'योगदान' है । यह पता चलने पर अशोक गुप्ता को सुशील गुप्ता के रवैये पर हैरानी भी हुई, और साथ ही उन्होंने यह भी समझ लिया कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति में सुशील गुप्ता दोहरा खेल खेल रहे हैं ।
इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति के समीकरण को जानने/समझने वाले तथा बदलते समीकरणों पर निगाह रखने वाले लोगों का मानना और कहना है कि अगले रोटरी वर्ष में होने वाला इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चुनाव सुशील गुप्ता के 'भविष्य' के लक्ष्य के लिहाज से बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं, और अपने 'भविष्य' के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए ही वह इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में अपनी भूमिका निभायेंगे । इसी लिहाज से माना जा रहा है कि 'सारे अण्डे एक ही टोकरी में न रखने' के सिद्धांत पर विश्वास और अमल करते हुए सुशील गुप्ता किसी एक उम्मीदवार की ही सरपरस्ती नहीं करेंगे । सुशील गुप्ता के नजदीकियों का भी कहना है कि सुशील गुप्ता अभी अशोक गुप्ता और रंजन ढींगरा - दोनों के ही साथ खड़े हैं; और वह देखेंगे कि चुनाव अभियान में किसका पलड़ा भारी रहता है । स्वाभाविक रूप से जिसका पलड़ा भारी दिखेगा - अंततः वह उसके साथ हो लेंगे । अभी सुशील गुप्ता ने एक सुरक्षित रास्ता यह निकाला/बनाया हुआ है कि वह रंजन ढींगरा के प्रति हमदर्दी रखने वालों के सामने रंजन ढींगरा की बात करते हैं, और अशोक गुप्ता के प्रति सहानुभूति रखने वाले लोगों के सामने अशोक गुप्ता की बात करते हैं । उनकी इस रणनीति में वह यदि रंजन ढींगरा के ज्यादा समर्थन में दिख रहे हैं, तो इसका कारण यही माना/समझा जा रहा है कि जोन 4 के अधिकतर डिस्ट्रिक्ट्स में रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी के प्रति हमदर्दी रखने वाले लोग ज्यादा हैं; और आश्चर्य की बात यह है कि कई डिस्ट्रिक्ट्स में लोग अशोक गुप्ता को ज्यादा जानते/पहचानते भी नहीं हैं ।
इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति के समीकरणों पर निगाह रखने वाले लोगों का मानना और कहना है कि अशोक गुप्ता जिस तरह से अपनी उम्मीदवारी को बड़े नेताओं के भरोसे टिकाए/बनाए हुए हैं, और उम्मीद लगाए हुए हैं कि उन्हें तो मनोज देसाई ही इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवा देंगे - उसके कारण अशोक गुप्ता अपने समर्थन-आधार को और कमजोर करने का ही काम कर रहे हैं । लोगों को हैरानी है कि अशोक गुप्ता इंटरनेशनल डायरेक्टर बनना चाहते हैं, लेकिन जोन 4 के अधिकतर डिस्ट्रिक्ट्स में न तो उनकी कोई सक्रियता है, और न उनके भरोसे के कोई लोग हैं । आईआईएस यूनीवर्सिटी के स्वयंभू उपकुलपति के रूप में अशोक गुप्ता ने रोटरी के बड़े नेताओं को डॉक्टरेट बाँट कर उन्हें खुश करने का तो प्रयास किया, लेकिन रोटेरियंस के बीच जाने की उन्होंने कभी कोई कोशिश नहीं की । अशोक गुप्ता ने 'मैं तुम्हें डॉक्टरेट दूँगा, तुम मुझे इंटरनेशनल डायरेक्टर का पद देना' फार्मूले को अपना कर इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने की जो योजना बनाई थी, वह तो काम करती हुई दिख नहीं रही है; और भरत पांड्या के मुकाबले उनकी स्थिति को बहुत ही कमजोर माना/समझा जा रहा है । दरअसल इसी कारण से सुशील गुप्ता ने रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी को हवा दी है । रोटरी के विभिन्न प्रोजेक्ट्स में अपनी संबद्धता के चलते रंजन ढींगरा का अपना जो काम है, तथा विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में रोटेरियंस के बीच अपनी जो पहचान व सक्रियता है - उसमें सुशील गुप्ता के समर्थन के कारण और इजाफ़ा ही हुआ है । इस बात ने अशोक गुप्ता के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है; उन्हें और उनके समर्थकों को लग रहा है कि सुशील गुप्ता उनके साथ धोखा कर रहे हैं : सुशील गुप्ता एक तरफ तो अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी का समर्थन करने की बात कर रहे हैं; लेकिन व्यवहार में वह रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी को प्रमोट कर रहे हैं । सुशील गुप्ता के इस विरोधाभासी व्यवहार का कारण दूसरों को भले ही समझ में आ रहा हो - किंतु अशोक गुप्ता और उनके नजदीकी इस 'कारण' को तो पहचानने/देखने को तैयार नहीं हैं । वह तो बस सुशील गुप्ता को ही कोसने में लगे हैं ।