Wednesday, March 15, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को सुशील गुप्ता की चेतावनी के चलते डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए मजबूत समझे/देखे जा रहे उम्मीदवारों को लगे झटके से फायदा अनूप मित्तल को मिलता दिख रहा है

नई दिल्ली । सुशील गुप्ता द्धारा कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को चुनावी राजनीति में दिलचस्पी लेने के लिए लगाई फटकार ने संजीव राय मेहरा तथा रवि दयाल की मुसीबत बढ़ाने का काम किया, तो उनकी इस मुसीबत में अनूप मित्तल को अपनी दाल गलाने का मौका मिल गया । उल्लेखनीय है कि पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता को जब यह पता चला कि कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स अपने अपने उम्मीदवारों को समर्थन दिलवाने के लिए सक्रिय हैं, तो वह बुरी तरह नाराज हुए और उन्होंने उन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से अपनी नाराजगी व्यक्त की; सुशील गुप्ता का कहना रहा कि राजनीतिक खेमेबाजी के कारण रोटरी इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारियों के बीच डिस्ट्रिक्ट 3011 की पहले से ही बहुत बदनामी है, और निवर्तमान इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रविंद्रन पता नहीं किस 'दुश्मनी' के चलते डिस्ट्रिक्ट पर निगाह लगाए हुए हैं, इसलिए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी लेना डिस्ट्रिक्ट के लिए भी और खुद उनके लिए भी आत्मघाती साबित हो सकता है । सुशील गुप्ता की चेतावनी रही कि जिन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के बारे में प्रतिकूल रिपोर्ट्स 'ऊपर' गईं, उन्हें रोटरी इंटरनेशनल के असाइनमेंट्स मिलना मुश्किल हो जायेंगे । काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में भी सुशील गुप्ता ने अपनी इस चेतावनी को दोहराया । सुशील गुप्ता की इस चेतावनी का असर होता हुआ दिखा भी, और जो पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स 'छिप-छिपा' कर भी इस या उस उम्मीदवार के समर्थन में कुछ करने के लिए सक्रिय होते देखे/सुने जा रहे थे, वह पीछे हटते देखे/सुने गए ।
इस स्थिति ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के दो उम्मीदवारों - संजीव राय मेहरा तथा रवि दयाल पर बहुत ही बुरा असर डाला है । संजीव राय मेहरा तो पूरी तरह दो-तीन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स पर निर्भर हैं, जिनके पीछे हटने से संजीव राय मेहरा का पूरा अभियान ही ठहर-सा गया है । रवि दयाल ने उम्मीदवार के रूप में अपनी तरफ से यूँ तो काफी मेहनत की है, किंतु उनकी मेहनत को स्वीकार्यता पाने के लिए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के समर्थन की दरकार है । दरअसल पिछले रोटरी वर्ष में चुनावी मुकाबले में पिछड़ जाने पर उन्होंने जिस तरह से कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स पर धोखाधड़ी करने का आरोप लगा कर उन्हें निशाना बनाया था, उसके कारण पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स उनके खिलाफ रहे हैं । रवि दयाल के सामने पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की इस खिलाफत और नाराजगी को दूर करने की गंभीर चुनौती है । सभी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की नाराजगी दूर करने की बजाए रवि दयाल की तरफ से आसान रास्ता यह निकाला गया कि उनके पक्के वाले समर्थक समझे जाने वाले दो-तीन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में सक्रिय होंगे, तो उनके प्रति नाराजगी और खिलाफत वाला परसेप्शन खत्म हो जायेगा और उनकी उम्मीदवारी के प्रति स्वीकार्यता का भाव पैदा होगा । किंतु सुशील गुप्ता की चेतावनी के चलते सब गुड़ गोबर हो गया लगता है ।
संजीव राय मेहरा और रवि दयाल की इस मुसीबत में अनूप मित्तल को अपनी दाल गलाने का मौका मिल गया । यूँ तो अनूप मित्तल की उम्मीदवारी को भी सात-आठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का सहयोग और समर्थन मिल रहा है, लेकिन वह पूरी तरह उन्हीं के समर्थन के भरोसे नहीं हैं । अनूप मित्तल की तरफ से होशियारी यह की गई कि समर्थक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से उन्हें जो फायदा हो सकता है, वह फायदा उनका नाम लेकर लेने का प्रयास अनूप मित्तल ने खुद किया, जिसका नतीजा यह हुआ कि उनके समर्थक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स कहीं सीन में भी नहीं आए - और इस कारण वह बदनामी से तथा सुशील गुप्ता की फटकार खाने से भी बचे और उन्होंने काम भी 'कर लिया' । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से मिले सहयोग और समर्थन को अपनी सक्रियता तथा अपने प्रबंधन से अनूप मित्तल ने जिस तरह संयोजित किया, उसी का नतीजा रहा कि फरीदाबाद और रोहतक में जो प्रमुख होली मिलन कार्यक्रम हुए, उनमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों में एक अकेले अनूप मित्तल ही आमंत्रित किए गए । दिल्ली में तीन-चार बड़े और प्रमुख क्लब्स ने सदगुरु का जो कार्यक्रम आयोजित किया, उसमें भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों में एक अकेले अनूप मित्तल ही आमंत्रित हुए और पहुँचे ।
फरीदाबाद, रोहतक और दिल्ली के बड़े व प्रमुख क्लब्स के आयोजनों में जिस तरह से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों में एक अकेले अनूप मित्तल को ही उपस्थित देखा/पाया गया - और यह जाना गया कि इन आयोजनों में आमंत्रित ही एक अकेले उन्हीं को किया गया है; उससे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अनूप मित्तल की उम्मीदवारी का महत्त्व बढ़ गया । इसके अलावा, एक बड़ा काम यह और हुआ कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के दूसरे उम्मीदवारों - खासकर संजीव राय मेहरा, रवि दयाल और सुरेश भसीन ने जिस तरह फरीदाबाद व रोहतक के वोटरों पर निर्भरता दिखाई, उससे दिल्ली में इनके प्रति विरोध का भाव बना - और इसका फायदा अनूप मित्तल को मिलता नजर आ रहा है । दिल्ली के छह/सात प्रमुख क्लब्स ने पिछले दिनों एक मीटिंग की, जिसमें करीब 25/26 क्लब्स के प्रेसीडेंट्स उपस्थित हुए - जिसमें इस बात पर नाराजगी व्यक्त की गई कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार समझने लगे हैं कि वह फरीदाबाद व रोहतक के वोटों से ही गवर्नर चुन लिए जायेंगे और इस तरह वह दिल्ली के क्लब्स की ताकत को कम करके देखते हैं । इस मीटिंग में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों में एक अकेले अनूप मित्तल को ही आमंत्रित किया गया था । इससे अनुमान लगाया गया है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों द्धारा अपनी उपेक्षा को लेकर दिल्ली के क्लब्स के प्रेसीडेंट्स के बीच जो नाराजगी है, वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अनूप मित्तल की उम्मीदवारी के लिए जैसे वरदान का काम कर रही है ।
डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में हाल-फिलहाल के दिनों में जो घटना-चक्र रहा है, और कुछेक घटनाओं के कारण जिस तरह पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के लिए चेतावनी घोषित करना पड़ी है, उसके कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए मजबूत समझे/देखे जा रहे उम्मीदवारों को तगड़ा झटका लगा है - और इसका फायदा अनूप मित्तल को मिलता हुआ दिखा है । इस स्थिति ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी परिदृश्य को खासा दिलचस्प बना दिया है ।

Saturday, March 11, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में संजीव राय मेहरा के चक्कर में विनय भाटिया की फरीदाबाद में हुई फजीहत अनूप मित्तल के लिए वरदान बन गई

फरीदाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी विनय भाटिया ने फरीदाबाद में संजीव राय मेहरा की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने की मुहिम के बुरी तरह फेल हो जाने के लिए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल को जिम्मेदार ठहरा कर डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में खासी गर्मी पैदा कर दी है । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के संदर्भ में फरीदाबाद के रोटेरियंस का नेता बनने और 'दिखने' की विनय भाटिया की कोशिश जिस तरह उन्हें ही उल्टी पड़ी है, और फरीदाबाद में वह जिस तरह अलग-थलग पड़े हैं - और अपनी इस फजीहत को छिपाने के लिए उन्होंने जिस तरह विनोद बंसल के पीछे छिपने की कोशिश की है, उससे मामला दिलचस्प भी हो उठा है । फरीदाबाद में विनोद बंसल के जो दूसरे नजदीकी हैं, उनका साफ आरोप है कि विनय भाटिया ने अपने स्वार्थ में विनोद बंसल का नाम इस्तेमाल करते हुए उनका नाम और खराब करने की कोशिश की है । उल्लेखनीय है कि विनोद बंसल ने इस वर्ष अपने आप को डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति से दूर रखा हुआ है - इतना दूर कि उन्होंने सीओएल के लिए अपनी उम्मीदवारी को सफल बनाने के लिए कोई हाथ-पैर नहीं मारे । ऐसे में, लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हुआ कि जिन विनोद बंसल ने अपनी खुद की उम्मीदवारी हेतु समर्थन जुटाने के लिए 'राजनीति' नहीं की, वह विनोद बंसल किसी दूसरे के लिए राजनीति भला क्यों करेंगे ? लोगों की इसी समझ के चलते विनय भाटिया का झूठ आसानी से पकड़ा गया ।
विनय भाटिया की फजीहत लेकिन अनूप मित्तल के लिए वरदान बन गई । फरीदाबाद के लोगों ने अपने आप को विनय भाटिया की मुहिम से अलग और दूर दिखाने की कोशिश में जो मीटिंग की, उसमें उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों में एक अकेले अनूप मित्तल को आमंत्रित किया । इस 'घटना' से सुरेश भसीन और रवि दयाल को तगड़ा झटका लगा । यह दोनों फरीदाबाद में कुछ कुछ समर्थन मिलने की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन विनय भाटिया से निपटने के चक्कर में फरीदाबाद के लोगों ने जो सक्रियता दिखाई - उसका फायदा उठाने में यह और फरीदाबाद के इनके समर्थक चूक गए, और तात्कालिक रूप से सारा फायदा अनूप मित्तल के हिस्से में आ गिरा । अनूप मित्तल के लिए सारा मामला 'विंडफॉल गेन' की तरह रहा ।
विनय भाटिया ने जिस अचानक तरीके से संजीव राय मेहरा की उम्मीदवारी का झंडा उठाया, उससे फरीदाबाद के लोगों को घोर आश्चर्य हुआ - किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल हुआ कि फरीदाबाद में संजीव राय मेहरा के लिए जब कोई समर्थन ही नहीं है, तो विनय भाटिया ने क्या सोच कर उनकी उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है । चर्चा चली कि संजीव राय मेहरा से चार्टर्ड एकाउंटेंसी से संबंधित प्रोफेशनल काम मिलने के लालच में विनय भाटिया ने उन्हें फरीदाबाद में समर्थन दिलवाने का सौदा कर लिया है । इस चर्चा से फरीदाबाद के लोगों के बीच तीखी प्रतिक्रिया हुई; खासकर क्लब्स के अध्यक्षों के बीच इस बात पर नाराजगी पैदा हुई कि विनय भाटिया अपने निजी स्वार्थ में उनके नाम और उनके अधिकार की सौदेबाजी कैसे कर सकते हैं ? क्लब्स के अध्यक्षों की नाराजगी के चलते फरीदाबाद के जो नेता लोग हैं, वह भी सावधान हुए और उन्होंने संजीव राय मेहरा के पक्ष में शुरू किए जाने वाले विनय भाटिया के अभियान से खुद को दूर कर लिया । इस स्थिति ने विनय भाटिया को फरीदाबाद में बुरी तरह अलग-थलग कर दिया । अपनी इस स्थिति के लिए विनय भाटिया ने विनोद बंसल को जिम्मेदार ठहरा दिया । उनका आरोप रहा कि उन्हें इस मामले में विनोद बंसल से मदद मिलने की उम्मीद थी, लेकिन मौके पर विनोद बंसल पीछे हट गए और वह अकेले पड़ गए ।
विनोद बंसल को मामले में लपेटने के कारण विनय भाटिया और मुसीबत में फँस गए । फरीदाबाद में कई लोगों ने इस बात के लिए विनय भाटिया को कोसा कि अपनी हरकत को जस्टीफाई करने के लिए वह विनोद बंसल को मामले में नाहक ही घसीट रहे हैं । लोगों का कहना है कि विनय भाटिया ने जब अपने आप को फँसा हुआ और अकेला पाया तो उन्होंने विनोद बंसल से मदद की गुहार की । विनोद बंसल को तब तक अपने दूसरे नजदीकियों से पता चल चुका था कि संजीव राय मेहरा को समर्थन दिलवाने की विनय भाटिया की मुहीम पूरी तरह पिट चुकी है - इसलिए उन्होंने विनय भाटिया की गुहार को अनसुना करने में ही अपनी भलाई देखी । विनय भाटिया की हरकत से सावधान हुए फरीदाबाद के क्लब्स के अध्यक्षों ने यह स्पष्ट करने और संदेश देने की जरूरत समझी कि उनके वोट का फैसला कोई और नहीं - बल्कि वह स्वयं करेंगे ! यह स्पष्ट करने और संदेश देने के लिए उन्होंने एक मीटिंग की, जिसमें फरीदाबाद के 16 में से 14 क्लब्स के अध्यक्ष जुटे - इस मीटिंग में उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों में से एक अकेले अनूप मित्तल को ही अपने बीच बुलाया । इस घटना ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के दूसरे उम्मीदवारों को बेचैन कर दिया है और डरा दिया है । उनकी चिंता यह सोच कर खासी बढ़ी है कि फरीदाबाद में अनूप मित्तल को यदि इतना बम्पर समर्थन है, तो फिर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अनूप मित्तल के मुकाबले में वह कैसे टिकेंगे ?

Thursday, March 9, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 - यानि राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट की कॉन्फ्रेंस में डिस्ट्रिक्ट ग्रांट के बारे में पूछे गए मोहिंदर पॉल गुप्ता के सवाल में रीचआउट टू अफ्रीका प्रोजेक्ट के जिक्र पर राजा साबू के भड़कने से प्रोजेक्ट की फंडिंग तथा उसके खर्च को लेकर लगने वाले आरोप और भी गंभीर हो उठे हैं

करनाल/चंडीगढ़ । करनाल में आयोजित हुई डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में पूछे गए एक सवाल में रीचआउट टू अफ्रीका प्रोजेक्ट का जिक्र सुन कर राजेंद्र उर्फ राजा साबू के गुस्से में आग-बबूला हो जाने के पीछे के रहस्य की पर्तें धीरे-धीरे खुल रही हैं - और जैसे जैसे सच्चाई लोगों के सामने आ रही है, राजा साबू का असली रूप लोगों के सामने प्रकट हो रहा है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में जब रोटरी क्लब चंडीगढ़ सिटी ब्यूटीफुल के वरिष्ठ पूर्व अध्यक्ष मोहिंदर पॉल गुप्ता ने अपने एक सवाल में रीचआउट टू अफ्रीका प्रोजेक्ट का संदर्भ दिया, तो राजा साबू बुरी तरह बौखला गए थे और गुस्से से तमतमाते हुए वह अपनी सीट छोड़ कर हॉल के बीच आ गए थे और लोगों से सवाल करने लगे थे कि उन्हें रीचआउट टू अफ्रीका प्रोजेक्ट नहीं करना चाहिए क्या ? उनके इस व्यवहार और सवाल पर हॉल में मौजूद अधिकतर लोग तो हक्के-बक्के रह गए थे और उनके बीच जो जबाव मिला वह यही कि - जरूर करना चाहिए । रीचआउट टू अफ्रीका प्रोजेक्ट राजा साबू के क्लब का एक महत्त्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है, और इसके पीछे की पूरी सोच सचमुच बहुत शानदार सोच है । इस प्रोजेक्ट से किसी को भी भला क्या ऐतराज हो सकता है ? मोहिंदर पॉल गुप्ता ने इस प्रोजेक्ट के होने या न होने को लेकर सवाल नहीं उठाया था; उनका सवाल तो डिस्ट्रिक्ट ग्रांट के दुरुपयोग को लेकर था, जिसमें संदर्भ के रूप में रीचआउट टू अफ्रीका प्रोजेक्ट की फंडिंग का जिक्र था - लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हुआ कि प्रोजेक्ट की फंडिंग के बारे में पूछे गए सवाल का सीधा-सीधा जबाव देने की बजाए, सवाल से राजा साबू इस कदर बौखला क्यों गए ? राजा साबू की बौखलाहट 'बता' रही थी जैसे कि मोहिंदर पॉल गुप्ता के उक्त सवाल ने राजा साबू को भरी सभा में 'रंगे हाथ' पकड़ लिया था - जिससे बचने के लिए राजा साबू को अपना गुस्सा दिखा कर अपने लिए सहानुभूति जुटाने का नाटक करना पड़ा ।
राजा साबू के इस नाटक में राजा-भक्ति दिखाते हुए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेपीएस सिबिया ने भी अतिथि कलाकार की भूमिका निभाने की कोशिश की, किंतु राजा साबू ने उन्हें जब अपना मुँह बंद रखने की हिदायत दी तो फिर वह चुप लगा गए । जेपीएस सिबिया ने दरअसल सुझाव दिया कि रीचआउट टू अफ्रीका प्रोजेक्ट होने या न होने को लेकर उपस्थिति लोगों के बीच वोटिंग करा ली जाए । कुछ ही वर्ष पहले राजा साबू के हाथों से आउटस्टैंडिंग डिस्ट्रिक्ट चेयरमैन का अवॉर्ड ले चुके मोहिंदर पॉल गुप्ता ने कहा कि लोगों को पूरी बात बताई जाए और फिर वोटिंग करा ली जाए । मोहिंदर पॉल गुप्ता के तेवर देख कर राजा साबू ने मामले की नाजुकता को पहचाना और जेपीएस सिबिया को अपना मुँह बंद रखने को कहा । राजा-भक्ति में जेपीएस सिबिया ने जिस तत्परता के साथ अपना मुँह खोला था, राजा-झिड़की के बाद उसी तत्परता से उन्होंने फिर अपना मुँह बंद कर लिया - और वोटिंग की बात भी फिर गायब हो गई । राजा साबू ने भी मामले को जल्दी से समेट लिया - वह समझ रहे थे कि मामले में बात यदि आगे बढ़ी तो फिर उनकी सारी पोल पट्टी अभी यहीं खुल जायेगी । राजा साबू ने तो मामले को समेट लिया, किंतु लोगों के मन में यह सवाल बना ही रहा कि मोहिंदर पॉल गुप्ता के सवाल में आखिर ऐसा क्या था जिससे कि राजा साबू ने अपना आपा खो दिया और वह बुरी तरह बौखला गए ?
कॉन्फ्रेंस के बाद जिन लोगों ने इस बारे में सच्चाई समझने/जानने की कोशिश की, उन्हें यह जानकर गहरा धक्का लगा कि राजा साबू जैसे व्यक्ति ने सेवा कार्यों की आड़ में कैसे कैसे कारनामे किये हुए हैं, और जैसे ही उनके कारनामे सामने आने को हुए वह अपने गुस्से को दिखाते हुए लोगों को भावनात्मक रूप से भड़काने का प्रयास करने लगे । मोहिंदर पॉल गुप्ता का सवाल वास्तव में डिस्ट्रिक्ट ग्रांट को लेकर था; उनका आरोप था कि डिस्ट्रिक्ट ग्रांट को कुछ ही क्लब मनमाने तरीके से इस्तेमाल करते हैं और उसे दिखा कर मैचिंग ग्रांट ले लेते हैं - जिसे ऐसे कामों में खर्च किया जाता है जो डिस्ट्रिक्ट की भौगोलिक सीमाओं से दूर-दराज होते हैं । मोहिंदर पॉल गुप्ता का कहना था कि इससे रोटरी की बुनियादी सोच का उल्लंघन होता है । इसी संदर्भ में उन्होंने राजा साबू के क्लब के रीचआउट टू अफ्रीका प्रोजेक्ट का जिक्र किया, जिस पर राजा साबू बुरी तरह भड़क गए । उनके भड़कने से लोगों का ध्यान रीचआउट टू अफ्रीका प्रोजेक्ट की फंडिंग संरचना पर गया तो इसमें चल रही धोखाधड़ी की पोल खुली । मजे की बात यह है कि रीचआउट टू अफ्रीका प्रोजेक्ट की फंडिंग को लेकर कई बार सवाल उठे हैं, लेकिन कभी भी लोगों को इसका जबाव नहीं मिला । जो तथ्य चर्चा में आया है, वह यह है कि राजा साबू पहले तो डिस्ट्रिक्ट ग्रांट से इस प्रोजेक्ट के लिए पैसे ले लेते हैं, फिर इस पैसे से मैचिंग ग्रांट का जुगाड़ करते हैं और फिर इस पैसे से समाज सेवा करते हुए अपनी फोटो खिंचवाते हैं । राजा साबू ने डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में लोगों से पूछा था कि उन्हें यह प्रोजेक्ट करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए ? लोग अब उसका जबाव देते हुए कह रहे हैं कि राजा साबू को यह प्रोजेक्ट अवश्य करना चाहिए - किंतु अपने पैसे से करना चाहिए; डिस्ट्रिक्ट ग्रांट पर डिस्ट्रिक्ट के दूसरे क्लब्स का भी अधिकार हैं, उन्हें भी डिस्ट्रिक्ट ग्रांट इस्तेमाल करने का मौका मिलना चाहिए ।
रीचआउट टू अफ्रीका प्रोजेक्ट धोखाधड़ीभरी फंडिंग संरचना के कारण ही विवाद में नहीं है, बल्कि अपनी 'प्रकृति' के कारण भी संदिग्ध बना हुआ है । यह प्रोजेक्ट उस मशहूर कहावत/शिक्षा का मजाक बनाता है - जिसमें कहा गया है कि 'चैरिटी बिगिन्स एट होम' । मैं यदि अपने पड़ोसियों/नजदीकियों की मुश्किलों व परेशानियों की अनदेखी करके दूर-दराज के लोगों की मुश्किलों व परेशानियों को दूर करने की बात करता हूँ, तो वास्तव में मैं धूर्तता और पाखंड का परिचय दे रहा होता हूँ । रीचआउट टू अफ्रीका प्रोजेक्ट के जरिये राजा साबू अपना ऐसा ही परिचय दे रहे हैं । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि कुछ वर्ष पहले राजा साबू का क्लब चंडीगढ़ में गरीब बच्चों के लिए एक स्कूल चलाया करता था, जिसमें कुछ हजार रुपए वार्षिक का खर्च आता था - लेकिन जिसे पैसों की कमी के कारण बंद कर दिया गया । चंडीगढ़ में गरीब बच्चों के लिए स्कूल को चलाते रहने में राजा साबू ने कोई दिलचस्पी नहीं ली, इसीलिए अफ्रीका के बच्चों के लिए उनकी दिलचस्पी सवालों के घेरे है । लोगों को लगता है कि राजा साबू दिखावे के लिए लिए सेवा करते हैं - और इसलिए ही वहीं सेवा करते हैं जहाँ बड़ा दिखावा किया जा सकने की संभावना बनती है । अब चंडीगढ़ में गरीब बच्चों का स्कूल चलाने में तो कोई 'फायदा' नहीं है, इसलिए उसे बंद कर देने में ही अक्लमंदी है; लेकिन अफ्रीकी देशों में बच्चों का ईलाज कराने में फायदा ही फायदा है - लोगों के बीच आरोपपूर्ण चर्चा है कि रीचआउट टू अफ्रीका प्रोजेक्ट के नाम पर अफ्रीकी देशों में जाकर राजा साबू अपने बिजनेस के लिए संभावनाएँ जुगाड़ने का काम करते हैं । किसी की भी समझ में यह बात नहीं आती है कि अफ्रीकी देशों में बच्चों का ईलाज करने के लिए जाने वाली डॉक्टर्स की टीम में राजा साबू क्यों और क्या करने जाते हैं ?
रीचआउट टू अफ्रीका प्रोजेक्ट की फंडिंग संरचना तथा उसके खर्च का हिसाब-किताब देने में राजा साबू जिस तरह से बचने की कोशिश करते हैं, उससे अफ्रीकी बच्चों के ईलाज के नाम पर चलने वाले इस प्रोजेक्ट में पैसों की हेराफेरी के आरोपों को भी बल मिला है । लोगों का कहना है कि इस तरह के आरोपों की चर्चा को रोकने का सबसे अच्छा और आसान तरीका है कि राजा साबू फंडिंग और खर्च का सारा ब्यौरा सार्वजनिक कर दें - इससे आरोप लगाने वालों का मुँह अपने आप बंद हो जायेगा । डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में डिस्ट्रिक्ट ग्रांट के बारे में पूछे जाने वाले मोहिंदर पॉल गुप्ता के सवाल में रीचआउट टू अफ्रीका प्रोजेक्ट का जिक्र आने से राजा साबू जिस तरह भड़के, उससे उक्त आरोप और भी गंभीर हो उठे हैं ।

Tuesday, March 7, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 - यानि राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में राजा साबू और उनके गिरोह के समर्पण के बाद, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा ने जितेंद्र ढींगरा को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी डेजिग्नेटिड घोषित किया

पानीपत । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा ने जितेंद्र ढींगरा को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी डेजिग्नेटिड घोषित करके राजेंद्र उर्फ राजा साबू गिरोह के कई नेताओं और सदस्यों को बुरी तरह निराश किया है । निराश होने वाले इन नेताओं और सदस्यों को उम्मीद थी कि जिस तरह से दो वर्ष पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी डेजिग्नेटिड चुने जाने वाले टीके रूबी के लिए बखेड़ा खड़ा किया गया था, उसी तरह इस बार जितेंद्र ढींगरा को भी लपेटा जायेगा । गिरोह के दो नेताओं - मधुकर मल्होत्रा और प्रमोद विज ने तो लोगों के बीच घोषणा भी की थी कि वह किसी भी कीमत पर जितेंद्र ढींगरा को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की कुर्सी तक नहीं बढ़ने देंगे । मधुकर मल्होत्रा ने तर्क भी दिया था कि टीके रूबी के साथ जो हुआ, वह वास्तव में जितेंद्र ढींगरा के साथ 'लड़ाई' के चलते हुआ; उनके अनुसार, लड़ाई टीके रूबी से नहीं बल्कि जितेंद्र ढींगरा से थी - टीके रूबी तो घुन के रूप में पिसे । मधुकर मल्होत्रा और प्रमोद विज के तेवरों के चलते लोगों को यह देखने का इंतजार था कि जितेंद्र ढींगरा से निपटने के लिए राजा साबू गिरोह के लोग क्या हथकंडा अपनाते हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा की घोषणा ने लेकिन तमाशा होने के इंतजार को खत्म कर दिया और जितेंद्र ढींगरा से 'लड़ने' की घोषणा करने वाले मधुकर मल्होत्रा व प्रमोद विज जैसे 'वीरों' को चुप रह जाने के लिए मजबूर होना पड़ा ।
मधुकर मल्होत्रा और प्रमोद विज के नजदीकियों के अनुसार, राजा साबू ने कुछ न करने की सख्त हिदायत दी थी, जिस कारण इन्हें न चाहते हुए भी चुप रहने के लिए मजबूर होना पड़ा । दरअसल टीके रूबी के मामले में राजा साबू को जिस फजीहत का सामना करना पड़ा और उनकी 'महानता' का छप्पर जिस तरह तिनका तिनका बिखर गया, उसके कारण राजा साबू की फिर से एक नई लड़ाई छेड़ देने की हिम्मत हुई नहीं । टीके रूबी के मामले में उल्लेखनीय है कि राजा साबू और उनके गिरोह के लोग टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने से रोकने में तो कामयाब रहे, लेकिन इसके ऐवज में राजा साबू को बड़ी भारी 'कीमत' चुकानी पड़ी है । इस बात को मधुकर मल्होत्रा और प्रमोद विज जैसे लोग नहीं समझ पायेंगे - वास्तव में इन्होंने तो कुछ खोया नहीं; ये ऐसे लोग हैं जो 'बदनामी' को भी उपलब्धि मानते हैं - बदनाम हुए तो क्या हुआ, नाम तो हुआ । किंतु टीके रूबी से निपटने के चक्कर में राजा साबू की तो जीवन भर की सारी 'कमाई' लुट गई । राजा साबू ने बड़ी मेहनत से रोटरी में अपना एक आभामंडल बनाया था - जिसमें उनके प्रति सम्मान भी था, और उनका डर भी था । अधिकतर लोग उनके प्रति सम्मान का भाव ही रखते थे, और जो नहीं रखते थे - वह उनसे डरते थे, और डर के चलते चुप रहते थे । लेकिन टीके रूबी से निपटने के चक्कर में उन्होंने अपनी ऐसी भद्द पिटवाई कि रोटरी में उन्होंने सम्मान भी खोया और लोगों ने उनसे डरना भी बंद कर दिया ।
टीके रूबी से पहले, डिस्ट्रिक्ट में हालत यह थी कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के जिन भी उम्मीदवारों को राजा साबू का नाम लेकर कह दिया जाता था कि राजा साबू अभी तुम्हें गवर्नर के रूप में देखने के लिए तैयार नहीं हैं, तो वह उम्मीदवार बेचारे घर बैठ जाते थे । पहली बार टीके रूबी ने राजा साबू के 'फतबे' को चुनौती दी, तो राजा साबू अपने पूरे दल-बल के साथ उन पर पिल पड़े । इस लड़ाई के नतीजे को लेकर राजा साबू खुद कंफ्यूज हुए कि नतीजे को वह अपनी जीत के रूप में देखें या अपनी तबाही भरी हार के रूप में देखें । टीके रूबी से निपटने के चक्कर में राजा साबू की तरफ से जो और जैसी हरकतें हुईं, उनके कारण पूरे रोटरी समाज में उनकी जमकर थू थू हुई; उनकी हरकतों के बारे में लोगों ने चटखारे ले ले कर बातें कीं - हर किसी का कहना रहा कि राजा साबू का असली चेहरा देख कर वह मायूस हुए हैं, और वह सोच भी नहीं सकते थे कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट के पद पर रह चुका व्यक्ति इस तरह की हरकतें करेगा, या अपने डिस्ट्रिक्ट में होने देगा । राजा साबू की सबसे ज्यादा बुरी दशा तो उनके अपने डिस्ट्रिक्ट में हुई - जहाँ दो वर्ष पहले तक उनके कहे हुए शब्द 'वेद-वाक्य' की तरह लिए जाते थे और उनसे कोई सवाल करने की हिम्मत नहीं कर पाता था, वहाँ अब हालत यह हो गई कि उनसे जुड़े मामलों में लोग न सिर्फ उनसे सवाल करने लगे, बल्कि उनके जबाव से संतुष्ट न होने पर प्रतिसवाल तक करने लगे । आयोजनों में लोगों को अपनी उपेक्षा करते देख उन्हें तगड़ा झटका लगा, और उन्हें खुद लोगों के पास जाकर पूछना पड़ा कि 'तुम मुझे इग्नोर तो नहीं कर रहे हो न ?'
राजा साबू के निकटवर्तियों को उम्मीद तो हालाँकि नहीं थी कि टीके रूबी के चक्कर में राजा साबू को जो चौतरफा फजीहत झेलना पड़ी है, उससे राजा साबू कोई सबक लेंगे - लेकिन जितेंद्र ढींगरा के मामले में राजा साबू की तरफ से जिस तरह का समर्पण हुआ है, उसे देखते हुए लोगों को लगा है कि राजा साबू ने अपने नुकसान की भरपाई करने के बारे में सोचना शुरू कर दिया है । दरअसल राजा साबू को यह देखकर भी खासा तगड़ा झटका लगा कि उनके और उनके 'सैनिकों' के विरोध के बावजूद जितेंद्र ढींगरा को नोमीनेटिंग कमेटी में एकतरफा समर्थन मिला और नौ में से आठ सदस्यों के पहली वरीयता के वोट पाकर जितेंद्र ढींगरा अधिकृत उम्मीदवार चुने गए । इस नतीजे से राजा साबू ने भाँप लिया कि डिस्ट्रिक्ट में हवा पूरी तरह उनके खिलाफ है । डिस्ट्रिक्ट में लोगों को लगता है कि इस नजारे को देख कर भी राजा साबू ने समझ लिया होगा कि अभी जितेंद्र ढींगरा और नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले से पंगा लेना उचित नहीं होगा और इस फैसले के सामने समर्पण करने में ही भलाई है । राजा साबू के बारे में रोटरी में हालाँकि (कु)ख्यात है कि वह अपने विरोधियों को भूलते नहीं हैं और जब जैसे जहाँ मौका मिलता है, उनसे बदला लेने का पूरा पूरा प्रयास करते हैं । इसलिए लोगों को लगता है कि राजा साबू ने अभी भले ही जितेंद्र ढींगरा की जीत के सामने समर्पण कर दिया हो, लेकिन मौका मिलने पर वह जितेंद्र ढींगरा के सामने अवश्य ही मुश्किलें खड़ी करेंगे । वह सब जब होगा, तब देखा जायेगा - अभी लेकिन जितेंद्र ढींगरा को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी डेजिग्नेटिड घोषित करने की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा की घोषणा पर डिस्ट्रिक्ट के लोगों ने राहत की साँस लेते हुए खुशी जाहिर की है ।

Monday, March 6, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का समर्थन पाने के मामले में संजीव राय मेहरा तथा अनूप मित्तल को मिलती दिख रही असफलता रवि दयाल के लिए सुनहरा अवसर बन कर आई है

नई दिल्ली । रवि दयाल ने नाराज पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की नाराजगी को दूर करने के लिए जो प्रयास किए हैं, वह कुछ कुछ सफल होते दिखने से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में रवि दयाल के समर्थकों और शुभचिंतकों का हौंसला काफी बढ़ा है । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स - जो अभी कुछ दिन पहले तक रवि दयाल को चुनावी मुकाबले में नहीं देख/पा रहे थे, अब जिस तरह से उनकी वकालत-सी करते सुने जा रहे है - उससे लग रहा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई में रवि दयाल के 'भाव' अचानक से बढ़ गए हैं । इन पँक्तियों के लेखक से बात करते हुए एक पूर्व गवर्नर का कहना रहा कि रवि दयाल को संजीव राय मेहरा और अनूप मित्तल से तगड़ी चुनौती मिलती हुई दिख रही थी, लेकिन संजीव राय मेहरा के पूरी तरह फेल रहने और अनूप मित्तल के तेजी पकड़ने के बाद सुस्त पड़ने से रवि दयाल के लिए उक्त चुनौती उतनी तगड़ी नहीं बची है - जितनी कि वह पहले दिखाई दे रही थी । इस बीच रवि दयाल की सक्रियता में भी तेजी आई है और उनकी पत्नी ज्योत्स्ना दयाल ने भी मोर्चा संभाला है - तो लोगों को अचानक से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में रवि दयाल के लिए स्थितियाँ अनुकूल बनती नजर आईं हैं ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए इस बार यूँ तो छह उम्मीदवार मैदान में हैं, लेकिन मुकाबले में रवि दयाल, संजीव राय मेहरा और अनूप मित्तल को ही देखा/पहचाना जा रहा है । अनूप मित्तल ने हालाँकि देर से अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की, लेकिन अपनी जोरदार सक्रियता से वह जल्दी ही प्रमुख मुकाबलेबाजों में देखे जाने लगे । रवि दयाल ने पिछले वर्ष पराजय का शिकार होने के बाद जिस तरह से पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स पर धोखेबाजी करने के आरोप लगाए थे, उसके कारण पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर उनसे खफा थे और माना जा रहा था कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स उनकी राह में रोड़े अटकाने का काम तो जरूर ही करेंगे । संजीव राय मेहरा और अनूप मित्तल को उम्मीद थी कि रवि दयाल के प्रति पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की यह नाराजगी उनके लिए फायदे का कारण बनेगी - और उन्होंने इसके लिए भरसक प्रयास भी किया । लेकिन लगता है कि उनकी दाल गली नहीं है । संजीव राय मेहरा तो अपने ढीले-ढाले रवैये से पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को इंप्रेस नहीं कर पाए, और अनूप मित्तल की ताबड़तोड़ तेजी ने लगता है कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के ईगो को हर्ट किया है । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के समर्थन के मामले में इन दोनों को मिलती दिख रही असफलता रवि दयाल के लिए सुनहरा अवसर बन कर आई है ।
संजीव राय मेहरा की उम्मीदवारी के प्रति पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का झुकाव शुरू में दिखा भी था, लेकिन उन्होंने जब देखा कि संजीव राय मेहरा पूरी तरह उन्हीं पर निर्भर हैं और खुद ज्यादा कुछ करने को तैयार नहीं हैं - और इस कारण लोगों के बीच उनकी कोई स्वीकार्यता बन ही नहीं रही है, तब फिर पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स उनकी उम्मीदवारी से पीछे हटने लगे । इस स्थिति का फायदा उठाने के लिए अनूप मित्तल ने कमर कसी, लेकिन परिस्थितियों ने उन पर कुछ ऐसा शिकंजा कसा - जिसका कि वह मुकाबला नहीं कर सके । अनूप मित्तल दरअसल बहुत 'महीन' तरीके से इस जाल में फँसे कि उन्हें निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुधीर मंगला के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना गया । यह जाल इतना महीन था कि अनूप मित्तल इसमें फँसने के खतरे को समझ/पहचान ही नहीं पाए । सुधीर मंगला की पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के बीच जैसी जो 'पहचान' है, उसके कारण अनूप मित्तल पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के बीच अछूत बन गए । दूसरी बड़ी प्रतिकूल परिस्थिति अनूप मित्तल ने खुद बना ली - कहीं उन्होंने कह दिया कि वह यदि इस बार के चुनाव में सफल नहीं हुए तो अगले रोटरी वर्ष में उम्मीदवार बनेंगे । उनकी इस घोषणा के कारण उन्हें अगले रोटरी वर्ष के उम्मीदवार के रूप में देखा जाने लगा । कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने तो उन्हें सलाह भी दे डाली कि अगले रोटरी वर्ष के लिए कोई गंभीर उम्मीदवार नहीं दिख रहा है, इसलिए उन्हें अगले रोटरी वर्ष में ही उम्मीदवार होना चाहिए । इस तरह की बातों ने तेजी से आगे बढ़ते अनूप मित्तल के कदमों की रफ्तार को कम कर दिया । संजीव राय मेहरा और अनूप मित्तल की इस दशा ने रवि दयाल को चुनावी मुकाबले में वापस लाने का काम किया है ।
रवि दयाल अनुकूल परिस्थितियों का फायदा उठाते हुए मुकाबले में वापस लौटते हुए भले ही दिख रहे हों, लेकिन उनके ही समर्थकों व शुभचिंतकों के अनुसार - उनके लिए हालात अभी भी पूरी तरह आसान और सुरक्षित नहीं हैं । असल में, पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की बातों और बातों में व्यक्त किये जाने वाले समर्थन से माहौल तो बनता है - किंतु उससे वोट मिलने जरूरी नहीं हैं । वोट पाने के लिए एक अलग तरह के 'मैनेजमेंट' की जरूरत होती है । इस बार के चुनाव में एक तो उम्मीदवार ज्यादा हैं, और दूसरे किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में एकतरफा माहौल नहीं बन सका है - इस कारण डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने तथा उसे प्रभावित करने वाले नेता लोग असमंजस में हैं । इस असमंजसता के चलते नेता लोग स्टैंड नहीं ले पा रहे हैं और इस कारण मतदाता तबके को बँटा हुआ देखा/पाया जा रहा है । ऐसे में उम्मीदवारों के लिए जीतने लायक वोटों को प्राप्त करना एक बड़ी चुनौती है । जैसे जैसे चुनाव के दिन नजदीक आ रहे हैं, उम्मीदवारों के लिए यह चुनौती और गंभीर होती जा रही है ।

Sunday, March 5, 2017

लायंस इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में लायन लीडर के रूप में मुकेश गोयल की सक्रियता व उपलब्धियों को देखते हुए फ्रांस की प्रतिष्ठित सोर्बोन यूनिवर्सिटी ने उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित करते हुए खुद को गौरवान्वित महसूस किया

नई दिल्ली । नई दिल्ली के पार्क होटल में आयोजित एक कार्यक्रम में कुछेक राजदूतों और देश भर से आए विभिन्न पेशों से जुड़े प्रबुद्ध लोगों की उपस्थिति में फ्रांस की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी - सोर्बोन यूनिवर्सिटी के प्रेसीडेंट डॉक्टर जॉन थॉमस ने जब लायंस इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मुकेश गोयल को डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया, तो लायंस इंटरनेशनल के गौरवशाली सौ वर्षों के इतिहास में एक नया अध्याय और जुड़ा । मुकेश गोयल पहले और अकेले पूर्व गवर्नर हैं, जिन्हें फ्रांस ही नहीं बल्कि विश्व की उक्त प्रमुख यूनिवर्सिटी ने डॉक्टरेट की उपाधि के लिए चुना । यह यूनिवर्सिटी प्रत्येक वर्ष दुनिया के विभिन्न देशों में जनहित के कामों में लीडरशिप क्वालिटी के साथ निर्णायक व महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली विभूतियों की पहचान करती है, और उन्हें सम्मानित करती है । नई दिल्ली के पार्क होटल में आयोजित कार्यक्रम में भारत के विभिन्न शहरों से चुने गए 43 लोगों को सम्मानित किया गया । इस कार्यक्रम में तथा इससे पहले के कार्यक्रमों में सम्मानित होने वाले लोगों में लायंस इंटरनेशनल के पदाधिकारियों में अकेले मुकेश गोयल का नाम है । यह तथ्य मुकेश गोयल के लिए तो खास और गर्व करने योग्य होगा ही, डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के लिए और लायंस इंटरनेशनल के लिए भी खास व गर्व करने योग्य है ।
सोर्बोन यूनिवर्सिटी फ्रांस की ही नहीं, बल्कि दुनिया की एक ऐसी बड़ी और बर्ल्ड-क्लास यूनिवर्सिटी है, जिसमें शिक्षा और ज्ञान की प्रत्येक धारा में उच्चस्तरीय पढ़ाई होने के साथ साथ शोध कार्यों को प्रोत्साहित किया जाता है । विज्ञान, मेडिसिन, इंजीनियरिंग, मानविकी, सामाजिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, कानून, मास मीडिया आदि विषयों में प्रतिभाओं को सामने लाने का तथा अपने अपने क्षेत्रों में उन्हें और योग्यता हासिल करने के लिए प्रोत्साहित करने का विलक्षण काम इस यूनिवर्सिटी ने किया है । यूनिवर्सिटी में 20 डिपार्टमेंट हैं, और इसके पेरिस में ही 12 कैम्पस हैं । उच्च शिक्षा में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के लिए यहाँ हर तरह की एकेडमिक व व्यवस्था संबंधी सुविधा है, और यही कारण है कि इस यूनिवर्सिटी ने दुनिया के तमाम देशों की युवा प्रतिभाओं को अपनी ओर आकर्षित किया है । सोर्बोन यूनिवर्सिटी का एक अनोखा कार्यक्रम विभिन्न देशों में अलग अलग क्षेत्रों में ऐसे कामयाब लोगों की पहचान करना तथा उन्हें सम्मानित करना है, जिन्होंने अपने अपने क्षेत्रों में सफलता तो पाई ही है - साथ ही साथ अपने अपने काम को निरंतरता के साथ लीडरशिप का आयाम भी दिया है, और दूसरे लोगों को भी प्रेरित व प्रोत्साहित किया है ।
सोर्बोन यूनिवर्सिटी की टीम ने मुकेश गोयल को सामाजिक क्षेत्र में अपनी लीडरशिप की निरंतरता को बनाए रखने का ऐतिहासिक काम करने के लिए पहचाना और दिल्ली में आयोजित कन्वोकेशन में उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि से नवाजा । जैसा कि इसी रिपोर्ट में पहले बताया जा चुका है कि मुकेश गोयल लायंस इंटरनेशनल के पहले और अकेले पदाधिकारी हैं, जिन्हें इस उपाधि के लिए चुना गया है । इस तथ्य को यहाँ फिर से दोहराने का उद्देश्य इस तथ्य को वास्तविक व संपूर्ण फलक पर देखना है, जो यह है कि हजारों पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स - जिनमें कई इंटरनेशनल डायरेक्टर्स व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट्स भी बने - के बीच सोर्बोन यूनिवर्सिटी ने मुकेश गोयल को डॉक्टरेट उपाधि के लिए चुना । सोर्बोन यूनिवर्सिटी के प्रेसीडेंट जॉन थॉमस ने खुद से मुकेश गोयल को उपाधि से नवाजते हुए कहा कि मुकेश गोयल के जीवन संघर्ष तथा एक लायन लीडर के रूप में उनकी सक्रियता व जीवटता तथा उनकी उपलब्धियों ने उन्हें आकर्षित और प्रेरित किया है । उन्होंने कहा कि विलक्षण व्यक्तित्व के मुकेश गोयल को डॉक्टरेट की उपाधि के लिए चुनते हुए सोर्बोन यूनिवर्सिटी खुद को गौरवान्वित महसूस करती है ।
लायन लीडर के रूप में मुकेश गोयल की उपलब्धियों ने फ्रांस की ही नहीं, बल्कि दुनिया की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी के पदाधिकारियों का ध्यान खींचा है, तो यह लायन लीडर के रूप में मुकेश गोयल की उपलब्धियों की एक बड़ी स्वीकार्यता की सच्चाई को सामने लाता है । लायन लीडर के रूप में मुकेश गोयल की संगठनात्मक सफलता का मुकाबला शायद ही कोई दूसरा लायन लीडर कर पाए । डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में जिसे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनना होता है, उसके लिए मुकेश गोयल का आशीर्वाद और समर्थन लेना जरूरी होता है । जिन कुछेक लोगों ने मुकेश गोयल की छाया में आए बिना गवर्नर बनने की कोशिश की भी, उन्हें भी ठोकर खाने के बाद अंततः मुकेश गोयल की शरण में आने के लिए मजबूर होना ही पड़ा । मौजूदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी आज भले ही मुकेश गोयल के साथ बदतमीजी से पेश आ रहे हों, लेकिन गवर्नर बनने के लिए उन्हें भी मुकेश गोयल की खुशामद करना पड़ी थी । शिव कुमार चौधरी ने पहली बार सुनील निगम के खिलाफ चुनाव लड़ा था, और बुरी तरह हारे थे । सुनील निगम खुद भी तीसरी/चौथी (या पाँचवी ?) बार में गवर्नर बने थे; शिव कुमार चौधरी जब उनसे भी चुनाव हार गए - और बुरी तरह हार गए, तब उन्होंने समझ लिया कि मुकेश गोयल की शरण में गए बिना तो वह जीवन में गवर्नर नहीं बन पायेंगे । और तब शिव कुमार चौधरी ने अपना रंग बदला और मुकेश गोयल का विरोध छोड़ कर उनका समर्थन पाने के लिए उनकी खुशामद शुरू की - और मुकेश गोयल के समर्थन के बाद ही वह गवर्नर बन सके ।
मुकेश गोयल को डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में दो/एक बार हालाँकि हार का सामना भी करना पड़ा है - लेकिन उन इक्का/दुक्का पराजयों ने उन्हें और और मजबूत बनाने का काम ही किया है । एक मशहूर हिंदी फिल्म का डायलॉग है - हार कर जीतने वाले को ही बाजीगर कहते हैं । मुकेश गोयल ने लायन राजनीति में इस डायलॉग को चरितार्थ किया है । लायन राजनीति में सचमुच उन्हें बाजीगर के रूप में ही देखा/पहचाना जाता है । उनकी सफलता की कहानी इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उनकी सफलता से ईर्ष्या करने वाले उनके विरोधियों की संख्या भी कम नहीं है, जो हर समय और हर तिकड़म से उन्हें फेल करने के प्रयासों में लगे रहते हैं । इसलिए फ्रांस की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी सोर्बोन यूनिवर्सिटी से उन्हें मिली डॉक्टरेट की उपाधि उनके विरोधियों के लिए एक करारा तमाचा भी है ।

Friday, March 3, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की इंदौर ब्रांच को कब्ज़ाने की कोशिशों के चलते सेंट्रल काउंसिल सदस्य केमिशा सोनी की बढ़ती बदनामी ने विष्णु झावर व मनोज फडनिस को वापसी करने के लिए उत्साहित और सक्रिय किया

इंदौर । इंदौर ब्रांच के दूसरे वर्ष के पदाधिकारियों के चुनाव में एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की सदस्य केमिशा सोनी ने जिस तरह की मनमानियाँ कीं, उससे उनके समर्थकों व शुभचिंतकों तक को तगड़ा झटका लगा है - और उनके लगे झटके ने इंस्टीट्यूट की इंदौर की राजनीति में उथल-पुथल मचने के संकेत दिए हैं । इस प्रसंग ने इंदौर में केमिशा सोनी की बदनामी में और इजाफा किया है । केमिशा सोनी की बढ़ती बदनामी और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों के भी उनके खिलाफ होते जाने से विष्णु झावर उर्फ़ काका जी और मनोज फडनिस को इंदौर की राजनीति में अपनी खोई हुई जमीन वापस मिलने की उम्मीद होने लगी है, और उन्होंने इस बारे में अपने प्रयास भी तेज कर दिए हैं । उल्लेखनीय है कि पिछले चुनाव में केमिशा सोनी ने इन्हें कड़ी टक्कर दी थी, और इंदौर की राजनीति में इनके प्रभुत्व को धूल चटा दी थी; हालाँकि उस समय भी माना/समझा गया था कि विष्णु झावर और मनोज फडनिस को केमिशा सोनी ने नहीं, बल्कि उनकी खुद की चौधराहटभरी कार्रवाइयों ने हराया है । विष्णु झावर के 'आशीर्वाद' से नियंत्रित होने वाली इंस्टीट्यूट की इंदौर की राजनीति से लोग इतने त्रस्त हो गए थे कि पिछले चुनाव में उनके सेंट्रल काउंसिल व रीजनल काउंसिल के उम्मीदवारों को हार का शिकार होना पड़ा था । यह हार इसलिए और उल्लेखनीय बन गई थी क्योंकि मनोज फडनिस के इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट होने के बावजूद उन्हें यह हार मिली थी । उम्मीद की गई थी कि विष्णु झावर और मनोज फडनिस का हाल देखकर केमिशा सोनी सबक लेंगी और वह गलतियाँ नहीं करेंगी जो विष्णु झावर और मनोज फडनिस ने कीं - और जिनके कारण उन्हें फजीहत झेलना पड़ी ।
लेकिन लोगों ने पाया कि केमिशा सोनी तो उनकी भी 'गुरु' साबित हो रही हैं । पिछले एक वर्ष में इंदौर ब्रांच के कामकाज में उनका जैसा हस्तक्षेप रहा है, उससे लोगों को लगा है जैसे इंदौर ब्रांच को वह अपना निजी ऑफिस मान रही हैं और ब्रांच के पदाधिकारियों व सदस्यों को अपने ऑफिस के कर्मचारी के रूप में देख रही हैं । लोगों का कहना है कि उनका रवैया तो विष्णु झावर और मनोज फडनिस से भी बुरा है - यह लोग मनमानी और पक्षपात तो करते थे, लेकिन ऐसा करते हुए दूसरों को बेइज्जत नहीं करते थे; केमिशा सोनी विरोधियों को तो छोड़िये, अपने समर्थकों तक का लिहाज नहीं करतीं हैं और वह यदि उनकी बात मानते हुए नहीं दिखते हैं तो उन्हें भी बुरी तरह झिड़क देती हैं । इंदौर ब्रांच में पिछले वर्ष चेयरपर्सन रहीं गर्जना राठौर शुरू में केमिशा सोनी के समर्थकों में देखी/पहचानी जाती थीं, लेकिन केमिशा सोनी के निरंतर बने रहने वाले हस्तक्षेप व दबाव से वह इतनी परेशान हो उठीं कि कार्यकाल पूरा होते होते वह केमिशा सोनी के विरोधियों के नजदीक दिखाई देने लगीं । सबसे दिलचस्प मामला निलेश गुप्ता का है : रीजनल काउंसिल के सदस्य निलेश गुप्ता खेमेबाजी के संदर्भ में यूँ तो केमिशा सोनी वाले खेमे में 'होते' हैं, लेकिन कई मौकों पर उन्हें केमिशा सोनी के रवैये पर इर्रीटेट होते हुए देखा गया है । निलेश गुप्ता के नजदीकियों का कहना है कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की राजनीति में निलेश गुप्ता चूँकि केमिशा सोनी की 'राजनीति' का समर्थन नहीं करते हैं, इसलिए इंदौर ब्रांच के मामलों में केमिशा सोनी उन्हें अक्सर हड़काती रहती हैं - इंदौर ब्रांच में राजनीतिक खेमेबाजी का जो तानाबाना है, उसके कारण निलेश गुप्ता चूँकि केमिशा सोनी के साथ रहने के लिए मजबूर हैं, इसलिए मनमसोस कर वह अपमानित होते रहते हैं ।
इंदौर ब्रांच के सदस्यों को ही नहीं, रीजनल काउंसिल के सदस्यों को भी अभी चार दिन पहले इंदौर ब्रांच के दूसरे वर्ष के पदाधिकारियों के चुनाव में केमिशा सोनी की मनमानियों का शिकार होना पड़ा । इस चुनाव में पहला झमेला तो चेयरमैन के चुनाव को लेकर हुआ - केमिशा सोनी ने इंस्टीट्यूट के नए बने नियम के हवाले से वाइस चेयरमैन को ही चेयरमैन बनाने के लिए दबाव बनाया; ब्रांच के बहुमत सदस्य लेकिन मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए चेयरमैन पद के लिए चुनाव कराने की माँग कर रहे थे - केमिशा सोनी ने लेकिन हाईकोर्ट के फैसले को मानने/अपनाने से इंकार कर दिया । केमिशा सोनी ने हाईकोर्ट के फैसले की ही अवमानना नहीं की, बल्कि इंस्टीट्यूट के उक्त नियम के उस प्रावधान की भी अवहेलना की जो ब्रांच के दो-तिहाई सदस्यों को अधिकार देता है कि वह यदि एकमत हों तो चेयरमैन पद के लिए चुनाव कर सकते हैं । इससे भी बड़ी बात यह कि एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में केमिशा सोनी को ब्रांच के चुनाव को गवर्न करने का नैतिक अधिकार ही नहीं था - ब्रांच के पदाधिकारियों का चुनाव ब्रांच के सदस्यों को ही करने देना चाहिए था; लेकिन ब्रांच पर अपना कब्जा बनाये रखने के लिए केमिशा सोनी ने न नैतिकता की परवाह की, न हाईकोर्ट के फैसले को स्वीकार किया और न इंस्टीट्यूट के नियम को ही माना । ऐसा करते हुए उन्होंने ब्रांच के सदस्यों और रीजनल काउंसिल सदस्यों को तरह तरह से हड़काया व अपमानित किया, सो अलग ।
चेयरमैन पद 'हथियाने' के बाद केमिशा सोनी ने बाकी पदों पर भी नजर गड़ाई और उन्हें कब्जाने के लिए भी चालें चलीं - कुछेक पदों पर लेकिन उन्हें मात भी खानी पड़ी; इस सारे नज़ारे को लोगों ने बहुत ही बुरे प्रसंग के रूप में देखा और रेखांकित किया है । केमिशा सोनी के रवैये से इंदौर ब्रांच में पहली बार यह हुआ कि एक्सऑफिसो सदस्यों ने ब्रांच के पदाधिकारियों के चुनाव में वोट डाले - और इस तरह ब्रांच के सदस्यों की हैसियत घटाने का काम हुआ । पहली बार अल्पमत का व्यक्ति चेयरमैन बना है । ब्रांचेज के संचालन में एक अलिखित 'नियम' है कि ब्रांच के पदाधिकारियों का चुनाव ब्रांच के सदस्यों को ही करना चाहिए तथा एक्सऑफिसो सदस्यों को उनके अभिभावक तथा उनके सलाहकार के रूप में ही रहना चाहिए । जो नेता लोग ब्रांचेज में अपना प्रभुत्व बनाना चाहते हैं और बना कर रखना चाहते हैं, वह भी और चाहें जो उठापटक करें - लेकिन इस 'लक्ष्मणरेखा' को पार करने से बचते हैं; केमिशा सोनी ने लेकिन इस 'लक्ष्मणरेखा' की मर्यादा की कोई परवाह नहीं की और इस तरह इंदौर ब्रांच के इतिहास में काला पन्ना जोड़ा ।
केमिशा सोनी की इस कार्रवाई को लेकर इंदौर में नाराजगी का जो माहौल बना है, उसने विष्णु झावर तथा मनोज फडनिस व उनके नजदीकियों को खासा उत्साहित किया है । उन्हें उम्मीद बंधी है कि केमिशा सोनी की जिस तेजी से लोगों के बीच बदनामी बढ़ रही है, और उनके समर्थक ही उनसे खफा और दूर होते जा रहे हैं - उससे उन्हें इंदौर की राजनीति में अपनी वापसी करने का मौका आसानी से मिल जायेगा ।