Thursday, July 25, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की वाइस चेयरपरसन श्वेता पाठक द्वारा पुलिस में की गई शिकायत पर हो सकने वाली कार्रवाई से बचने की चेयरमैन हरीश चौधरी जैन और उनके नजदीकियों की कोशिश को गौरव गर्ग ने अपनी घटिया सोच के चलते मुश्किल में डाला

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पदाधिकारियों के झगड़े के पुलिस में पहुँचने से बनी स्थिति को सँभालने के लिए हो रहे प्रयासों में काउंसिल के सदस्य गौरव गर्ग ने आग में घी डालने वाला जो काम किया है, उससे सुलझता दिख रहा मामला भड़क और गया है । उल्लेखनीय है कि 20 जुलाई के सेमीनार के रद्द होने की सूचना देने वाले संदेश में जिस तरह से वाइस चेयरपरसन श्वेता पाठक को जिम्मेदार ठहराया गया था, उससे भड़क कर श्वेता पाठक ने पुलिस में रिपोर्ट कर दी । श्वेता पाठक का आरोप रहा कि रीजनल काउंसिल के कुछेक सदस्य उन्हें तरह तरह से अपमानित व प्रताड़ित करते रहते हैं, और उक्त संदेश इसका नया उदाहरण व सुबूत है । श्वेता पाठक की तरफ से कहा/बताया गया कि उक्त झूठा संदेश काउंसिल के आधिकारिक अकाउंट से तो भेजा ही गया; हरीश चौधरी जैन, नितिन कँवर, राजेंद्र अरोड़ा, अविनाश गुप्ता ने अपने अपने अकाउंट से भी कुछेक लोगों को भेजा है - जो यह साबित करता है कि उक्त संदेश को काउंसिल के आधिकारिक अकाउंट से भेजे जाने में इन्हीं लोगों की मिलीभगत है और इस तरह से उन्हें अपमानित व प्रताड़ित करने में इन्हीं लोगों की भूमिका है । पुलिस ने श्वेता पाठक की शिकायती रिपोर्ट को आधिकारिक रूप से तो दर्ज नहीं किया, लेकिन अपने तरीके से मामले में पूछताछ शुरू की । पुलिस की पूछताछ से परेशान हुए आरोपी सदस्यों की तरफ से समझौते की कोशिशें शुरू हुईं, जिसके नतीजे के रूप में काउंसिल के आधिकारिक अकाउंट से एक और संदेश भेजा गया, जिसमें पिछले संदेश पर खेद व्यक्त किया गया । इससे लगा कि मामला सँभलने और हल होने की तरफ बढ़ रहा है, लेकिन लगभग इसी समय गौरव गर्ग के आए एक संदेश ने मामले को बिगाड़ने का काम कर दिया है । 
गौरव गर्ग ने दरअसल प्रशांत विहार लाइब्रेरी में एक छात्र की शिकायत को मुद्दा बनाया है, और सीधे तौर पर उनके द्वारा उठाया गया मुद्दा काउंसिल के पदाधिकारियों/सदस्यों के बीच चल रहे झगड़े से संबंध रखता नहीं 'दिखता' है; लेकिन 'टाइमिंग' और 'तरीके' के आधार पर काउंसिल सदस्यों ने गौरव गर्ग के संदेश को श्वेता पाठक पर कटाक्ष करने के रूप में देखा/पहचाना और व्याख्यायित किया - और यही व्याख्या मामले को भड़काने का काम कर गई है । प्रशांत विहार लाइब्रेरी में एक छात्र को एक स्टाफ का व्यवहार अनुचित लगा, जिसकी उसने शिकायत की । यह शिकायत मान्य प्रक्रिया के द्वारा सुनी जानी थी, और यदि नहीं सुनी जाती तो उसके सुने जाने के लिए दबाव बनाया जा सकता था । गौरव गर्ग ने लेकिन इस मामले को 13 काउंसिल सदस्यों के छोटे से वाट्स-ऐप ग्रुप में उठाया और सनसनीखेज बनाते हुए उठाया; उन्होंने लिखा कि प्रशांत विहार लाइब्रेरी में एक 'मेल' स्टाफ ने एक 'फीमेल' छात्र को परेशान किया । काउंसिल की लाइब्रेरीज में छात्रों को तरह तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, और वह अक्सर शिकायतें करते रहते हैं; उन शिकायतों को 'मेल' फीमेल' के झगड़े का रूप शायद ही कभी दिया गया हो । संदर्भित मामला यदि 'मेल' 'फीमेल' की प्रकृति का था भी, तो गौरव गर्ग को पूरी बात स्पष्ट करना चाहिए थी, जो उन्होंने नहीं की । दूसरी बात यह प्रसंग 13 काउंसिल सदस्यों के छोटे से वाट्स-ऐप ग्रुप में रखने का कोई मतलब नहीं था । गौरव गर्ग को शिकायत करने वाली छात्रा को यदि सचमुच न्याय दिलवाना था, तो उन्हें काउंसिल के उचित मंच पर इसे उठाना/रखना था । उन्होंने लेकिन उस छात्रा की शिकायत को 'इस्तेमाल' किया । इसी से कुछेक काउंसिल सदस्यों को गौरव गर्ग की बदनीयती का शक हुआ, और माना/समझा गया कि उक्त मामले के जरिए गौरव गर्ग ने दरअसल हरीश चौधरी जैन व उनके नजदीकियों की तरफ से श्वेता पाठक को निशाना बनाया है और उन पर कटाक्ष किया है । 
यह मानने/समझने का कारण यह भी रहा कि गौरव गर्ग पिछले कुछ समय से चेयरमैन हरीश चौधरी जैन तथा उनके नजदीकियों के रूप में पहचाने जाने वाले नितिन कँवर, राजेंद्र अरोड़ा, अविनाश गुप्ता के साथ जुड़ने का प्रयास कर रहे हैं । समझा जा रहा है कि गौरव गर्ग ने अपने इस 'खेल' के जरिए वास्तव में हरीश चौधरी जैन व उनके नजदीकियों की तरफ से 'बैटिंग' की है; उनकी इस बैटिंग ने लेकिन श्वेता पाठक और उनके समर्थकों को भड़का दिया है । हरीश चौधरी जैन और उनके नजदीकियों की तरफ से श्वेता पाठक के पुलिस में शिकायत करने को गलत परंपरा स्थापित करना बताया जा रहा है; इनका कहना है कि काउंसिल के प्रशासनिक विवाद को यदि पुलिस में ले जाने की परंपरा बनी, तो यह बहुत ही खतरनाक बात होगी । इन्हीं लोगों का यह भी कहना है कि काउंसिल में इस समय जो भी विवाद हैं, वह प्रशासनिक फैसलों से जुड़े विवाद हैं, न की 'मेल' 'फीमेल' के झगड़े हैं - जैसा कि श्वेता पाठक बनाने/बताने का कर रही हैं । श्वेता पाठक से हमदर्दी रखने वाले लोगों का कहना है कि प्रशासनिक विवादों को हल करने के लिए जब चीखना-चिल्लाना, अपशब्दों व अशालीन व गाली-गलौच पूर्ण शब्दों का प्रयोग होने लगे तो फिर वह सिर्फ प्रशासनिक विवाद नहीं रह जाता और पुलिस में शिकायत का कारण बन जाता है । प्रशासनिक विवाद में कल यदि कोई किसी का सिर फोड़ दे और कहे कि यह पुलिस का मामला नहीं है, सिर्फ प्रशासनिक विवाद है - तो यह मान्य नहीं होगा । कई लोगों का कहना है कि प्रशासनिक विवाद के नाम पर काउंसिल के कुछेक सदस्य श्वेता पाठक के साथ जिस बदतमीजी से पेश आते हैं, वह सिर्फ एक प्रशासनिक अधिकारी ही नहीं, बल्कि एक स्त्री के सम्मान को भी चोट पहुँचाने का मामला है; और श्वेता पाठक को हक है कि अपने सम्मान को बनाए रखने तथा न्याय पाने के लिए वह किसी की भी मदद लें । उल्लेखनीय है कि काउंसिल के पिछले टर्म में भी कई एक बार नितिन कँवर और राजेंद्र अरोड़ा के बदतमीजीभरे रवैये से परेशान होकर पुलिस में शिकायत करने की नौबत आई थी । इस बार अभी जो नौबत आई है, उससे निपटने की कोशिशों को गौरव गर्ग की हरकत से झटका लगता देखा जा रहा है । लोगों को हैरानी यह देख कर भी है कि अभी तीन दिन पहले ही गौरव गर्ग के पिता का निधन हुआ है; जिस समय उन्होंने प्रशांत विहार लाइब्रेरी की एक शिकायत की आड़ में श्वेता पाठक पर कटाक्ष करने का काम किया है, उस समय तक शायद उनके पिता की अस्थियाँ भी विसर्जित नहीं हुई होंगी - ऐसे मुश्किल निजी समय में भी वह काउंसिल की राजनीति में अपना गंदा खेल खेलने से नहीं चूके; यह उनकी घटिया सोच और व्यवहार को ही सामने लाता है । 

Wednesday, July 24, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए नामांकन आमंत्रित करके जल्दी चुनाव कराने के संकेत दिए हैं; लोगों को लगता है कि जल्दी चुनाव करवाने की कोशिश दीपक गुप्ता का हाल सतीश सिंघल जैसा कर सकती है

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता द्वारा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के लिए नामांकन आमंत्रित करने की कार्रवाई को डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच जल्दी चुनाव करवाने की 'तैयारी' के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । लोगों को लग रहा है कि दीपक गुप्ता जल्दी चुनाव करवा कर ललित खन्ना की जीत को सुनिश्चित कर देना चाहते हैं । दिलचस्प संयोग यह है कि करीब दो वर्ष पहले यही फार्मूला अपना कर तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल ने ललित खन्ना की चुनावी संभावनाओं को खत्म कर/करवा दिया था, और आलोक गुप्ता की जीत को सुनिश्चित किया था - लेकिन उसी फार्मूले के जरिए इस बार ललित खन्ना की उम्मीदवारी की नाव को किनारे पहुँचाने की तैयारी की जा रही है । दीपक गुप्ता के नजदीकी पदाधिकारियों का हालाँकि कहना है कि उन्हें नहीं लगता है कि दीपक गुप्ता जल्दी चुनाव करवाने की तैयारी में हैं; और नामांकन आमंत्रित करने के पीछे ऐसा कोई उद्देश्य नहीं देखा जाना चाहिए । अन्य लोगों को भी लगता है कि जल्दी चुनाव करवा कर सतीश सिंघल की गवर्नरी का प्रभाव जिस तरह खराब हो गया था, उसे दीपक गुप्ता ने देखा/पहचाना है और उससे सबक लेकर वह वैसी 'गलती' नहीं करेंगे - जैसी सतीश सिंघल ने की थी । दरअसल अक्टूबर में चुनाव का नतीजा आ जाने से क्लब्स के पदाधिकारी आलोक गुप्ता के स्वागत/सम्मान में लग गए थे और यह भूल ही गए थे कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सतीश सिंघल की उपेक्षा होने की स्थितियाँ आलोक गुप्ता की जीत की घोषणा होने के साथ ही बन गईं थीं । इसी आधार पर लोगों को लगता है कि दीपक गुप्ता ने यदि जल्दी चुनाव करवाया तो उनका हाल भी सतीश सिंघल जैसा ही होगा ।
उल्लेखनीय है कि सतीश सिंघल का हाल देख कर ही पिछले वर्ष सुभाष जैन ने नामांकन आमंत्रित करने का काम ही नबंवर में किया था और चुनावी प्रक्रिया को जनवरी में संपन्न हुई डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस तक खींच ले गए थे । इसी बिना पर उम्मीद की जा रही थी कि दीपक गुप्ता भी अपने गवर्नर-वर्ष में होने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुनाव को करवाने में जल्दी नहीं दिखायेंगे । लेकिन दीपक गुप्ता ने नामांकन आमंत्रित करके लोगों को यह कयास लगाने के लिए प्रेरित किया है कि वह जल्दी चुनाव कराने की तैयारी कर रहे हैं । लोगों को लगता है कि जल्दी चुनाव करवा कर दीपक गुप्ता दरअसल ललित खन्ना की जीत को व्यावहारिक रूप दे देना चाहते हैं । दीपक गुप्ता के नजदीकियों का मानना और कहना है कि दीपक गुप्ता को लगता है कि इस समय ललित खन्ना की चुनावी स्थिति बहुत अच्छी है, और यदि अभी चुनाव हो जाएँ, तो उनकी जीत पक्की है - चार/पाँच महीने बाद हालात बदल भी सकते हैं । दूसरे लोगों को भी लगता है कि डिस्ट्रिक्ट में अभी क्लब्स के नए पदाधिकारियों के अधिष्ठापन समारोह हो रहे हैं, और अभी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक गुप्ता की पूछ/परख हो रही है - इस कारण दीपक गुप्ता अभी ललित खन्ना की जीत का श्रेय भी ले सकेंगे; बाद में फिर नए समीकरण बनने लगेंगे और तब राजनीतिक स्थिति जरूरी नहीं है कि वैसी ही बनी रहे, जैसी कि वह अभी नजर आ रही है । 
दीपक गुप्ता को यह डर अभी दिख रहे संकेतों से भी मिल रहा है । दीपक गुप्ता को यह देख/जान कर दरअसल तगड़ा झटका लगा है कि अधिष्ठापन समारोह के लिए उन्होंने क्लब्स को जो 'प्रोटोकॉल' दिया था, अधिकतर क्लब्स के पदाधिकारियों ने उसे मानने/अपनाने से इंकार कर दिया है । उल्लेखनीय है कि दीपक गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट के क्लब्स के पदाधिकारियों को निर्देश दिए थे कि अधिष्ठापन समारोह में वह सिर्फ उन्हें ही आमंत्रित करें, अन्य किसी गवर्नर को नहीं; उनके क्लब - रोटरी क्लब गाजियाबाद के अलावा दो/तीन अन्य क्लब्स के पदाधिकारियों ने ही उनके इस निर्देश को स्वीकार किया, बाकी क्लब्स उनके साथ पिछले/अगले गवर्नर्स को भी अपने अधिष्ठापन समारोह में आमंत्रित कर रहे हैं, और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने के बावजूद दीपक गुप्ता असहाय बने क्लब्स पदाधिकारियों द्वारा की जा रही अपने निर्देश की इस अवहेलना को बर्दाश्त करने के लिए मजबूर हुए पड़े हैं । इसके अलावा, उनकी इस तथा अन्य कुछेक हरकतों के चलते डिस्ट्रिक्ट के पूर्व व भावी गवर्नर्स उनसे नाराज होते जा रहे हैं; डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर मुकेश अरनेजा कई मामलों को लेकर उनसे खफा सुने/बताए जा रहे हैं । दीपक गुप्ता के प्रति गवर्नर्स के बीच पैदा होने वाली यह नाराजगी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में ललित खन्ना की उम्मीदवारी के लिए मुसीबत बन सकती है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक गुप्ता की पहले ही महीने में डिस्ट्रिक्ट में जो भद्द पिटने लगी है, उसे देख/पहचान कर खुद दीपक गुप्ता को ही लगने लगा है कि उन्हें यदि ललित खन्ना की जीत का श्रेय लेना है, तो उन्हें जल्दी चुनाव करवा लेना चाहिए । चुनावी राजनीति की जरूरत दीपक गुप्ता को भले ही जल्दी चुनाव करवाने के लिए प्रेरित कर रही हो, लेकिन जल्दी चुनाव करवाने के जरिए सतीश सिंघल के हुए हाल को याद करके उनके लिए जल्दी चुनाव करवाने का फैसला करना आसान भी नहीं होगा । लोगों को लगता है कि दीपक गुप्ता नामांकन आमंत्रित करके फिलहाल 'गोटी' अपने हाथ में कर लेना चाहते हैं और फिर हालात के अनुरूप उन्हें जैसा करने में 'फायदा' दिखेगा, वैसा कर लेंगे । दीपक गुप्ता क्या करेंगे, यह तो बाद में पता चलेगा - अभी लेकिन उनके नामांकन आमंत्रित करने से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी राजनीति की हलचल जरूर बढ़ गई है ।

Tuesday, July 23, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में विनय भाटिया के गवर्नर-वर्ष में रोटरी फाउंडेशन के लिए जुटी रकम को रोटरी फाउंडेशन के पैसों की लूट की 'तैयारी' के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है; रोटरी क्लब दिल्ली राजधानी के प्रोजेक्ट ग्रांट के लिए बढ़चढ़ कर आवेदन करने से भी इस तैयारी का शक बढ़ा है

नई दिल्ली । विनय भाटिया के गवर्नर-वर्ष में रोटरी फाउंडेशन के लिए जुटे 1.53 मिलियन अमेरिकी डॉलर की जिस रकम को उपलब्धि के रूप में देखा/दिखाया जा रहा है, उसे डिस्ट्रिक्ट के कई प्रमुख लोग ही रोटरी फाउंडेशन के पैसों की लूट की 'तैयारी' के रूप में पहचान/समझ रहे हैं । यह पहचान और समझ दरअसल जुटी रकम को वर्गीकरण के लिहाज से देखने के कारण बनी है । रोटरी फाउंडेशन के लिए जो यह रकम जुटी है, उसका करीब 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा वास्तव में ग्लोबल ग्रांट के तहत रोटरी फाउंडेशन से मोटी रकम लेने के लिए 'दिया' गया है - जो रोटरी व रोटरी फाउंडेशन के आदर्शों व लक्ष्यों को उलट-पलट देने का काम करता है । उल्लेखनीय है कि रोटरी और रोटरी फाउंडेशन की बुनियाद इस विचार पर टिकी है कि समाज में मोटे तौर पर दो तरह के लोग होते हैं - एक वह समर्थ लोग जो दान दे सकते हैं, और दूसरे वह असमर्थ लोग जिन्हें दान की जरूरत होती है । रोटरी और रोटेरियंस इस बात पर गर्व करते रहे हैं कि वह पहले वाली श्रेणी के लोग हैं - लेकिन विनय भाटिया और उनके सलाहकारों ने डिस्ट्रिक्ट के रोटेरियंस को दूसरी श्रेणी में खड़ा कर दिया है । विनय भाटिया के गवर्नर-वर्ष में रोटरी फाउंडेशन के लिए 1.53 मिलियन, यानि करीब 15 लाख अमेरिकी डॉलर की जो रकम इकट्ठा हुई है - उसका करीब 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा देने वाले लोगों/क्लब्स ने दी गई रकम के बदले में कई गुना रकम 'लेने' की योजना के साथ दिया है; यानि यह लोग/क्लब्स वास्तव में पहली श्रेणी के देने वाले नहीं, बल्कि दूसरी श्रेणी के दान 'लेने' वाले लोग हैं । 
उल्लेखनीय है कि रोटरी फाउंडेशन में मुख्यतः चार उद्देश्यों के लिए पैसा दिया/लिया जाता है - एनुअल फंड, पोलियो फंड, एंडोवमेंट फंड तथा प्रोजेक्ट ग्रांट के लिए अपना हिस्सा । विनय भाटिया के गवर्नर-वर्ष में 15 लाख अमेरिकी डॉलर से ज्यादा की जो रकम इकट्ठा हुई है, उसमें एनुअल फंड के लिए दो लाख अमेरिकी डॉलर से कम रकम जमा हुई है; पोलियो तथा एंडोवमेंट फंड के लिए कुल मिला कर एक लाख से कम अमेरिकी डॉलर जुटे हैं; बाकी बचे 12 लाख अमेरिकी डॉलर से अधिक रकम प्रोजेक्ट के लिए ग्रांट लेने के लिए मिली है - विनय भाटिया और उनके सलाहकार इसे गर्व की बात मानते हैं, लेकिन डिस्ट्रिक्ट के कई प्रमुख लोगों की निगाह में यह शर्म की बात है । शर्म की बात इसलिए क्योंकि यह तथ्य दिखाता है कि डिस्ट्रिक्ट 3011 में रोटेरियंस के लिए रोटरी सेवा करने की बजाये 'धंधा' करने/जमाने का जरिया बन गया है । रोटरी क्लब दिल्ली मिडटाऊन की प्रोजेक्ट ग्रांट को लेकर अभी जो बबाल हो चुका है, और उसमें जिस तरह से विनय भाटिया की मिलीभगत सामने आई है, उसके चलते उनके गवर्नर-वर्ष में प्रोजेक्ट ग्रांट के लिए लगी होड़ ने संदेह पैदा कर दिया है । यह संदेह रोटरी क्लब दिल्ली राजधानी के बढ़चढ़ कर प्रोजेक्ट ग्रांट के लिए आवेदन करने से भी पैदा हुआ है । विनय भाटिया के गवर्नर-वर्ष में प्रोजेक्ट ग्रांट के नाम पर जो 12 लाख अमेरिकी डॉलर से अधिक रकम मिली है, उसमें करीब सवा दो लाख अमेरिकी डॉलर रोटरी क्लब दिल्ली राजधानी से मिले हैं । रोटरी क्लब दिल्ली राजधानी पूर्व प्रेसीडेंट राजेश गुप्ता के कार्यकाल में मिली एक ग्लोबल ग्रांट को लेकर आरोपों के घेरे में तथा विवाद में रहा है । आरोपों के चलते उक्त ग्रांट का तीन बार तो ऑडिट हुआ था; आरोपों के ही कारण क्लब के एक प्रेसीडेंट ने उक्त प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी लेने से इंकार कर दिया, जिस कारण उक्त प्रोजेक्ट क्लब से छिन कर दूसरे क्लब के नाम करवाना पड़ा और बाद में उक्त प्रोजेक्ट के कर्ताधर्ता के रूप में राजेश गुप्ता का नाम भी हटाया गया । उसके बाद रवि चौधरी के गवर्नर वर्ष में क्लब ने एक और बड़ी ग्लोबल ग्रांट के लिए आवेदन किया, जिसे रवि चौधरी ने स्वीकार नहीं किया और दिल्ली में हुए एक कार्यक्रम में क्लब के कई पदाधिकारियों के सामने रोटरी फाउंडेशन के ट्रस्टी गुलाम वाहनवती से इस बात की शिकायत की कि रोटरी क्लब दिल्ली राजधानी के पदाधिकारियों ने रोटरी फाउंडेशन से ग्रांट लेने को धंधा बना लिया है, और उन्होंने इसीलिए उनके आवेदन को अस्वीकार कर दिया ।
रोटरी क्लब दिल्ली राजधानी में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल भी सदस्य हैं, इसलिए क्लब के पदाधिकारियों पर लगने वाला आरोप उनकी भूमिका को भी संदेहास्पद बना देता है । क्लब के पदाधिकारियों की ग्रांट लेने में दिखने वाली दिलचस्पी इसलिए भी संदेहास्पद है क्योंकि प्रोजेक्ट ग्रांट के नाम पर करीब सवा दो लाख अमेरिकी डॉलर देने वाला क्लब एनुअल फंड में एक हजार डॉलर की मामूली रकम ही देता है, तथा पोलियो फंड व एंडोवमेंट फंड में तो इकन्नी भी नहीं देता है । जाहिर है कि रोटरी क्लब दिल्ली राजधानी की रोटरी के बुनियादी कामों में कोई रुचि नहीं है, उसका सारा ध्यान तो बस रोटरी फाउंडेशन से ग्रांट लेने में है । डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख लोगों का ही कहना है कि विनोद बंसल इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं, इसलिए उन्हें अपने क्लब की 'गतिविधियों' पर ध्यान देना चाहिए और क्लब में ऐसी गतिविधियों को नहीं होने देना चाहिए, जिससे कि उनकी भूमिका भी संदेह और विवाद के घेरे में आए । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवारी पेश करने वाले अजीत जालान के क्लब ने भी विनय भाटिया के गवर्नर-वर्ष में ग्रांट जुगाड़ने के लिए प्रोजेक्ट बना कर उसके लिए अपना हिस्सा रोटरी फाउंडेशन में जमा कराया है । अजीत जालान का क्लब भी एकाउंट न देने के मामले में आरोपों का शिकार बन चुका है, और वह मामला काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग तक में आ गया था । अजीत जालान के क्लब ने एक ट्रस्ट भी बनाया था, जिसपर आरोप लगे थे कि रोटरी के पैसों की घपलेबाजी को अंजाम देने के लिए वह ट्रस्ट बनाया गया है । अजीत जालान और उनके नजदीकियों द्वारा बनाये गए उक्त ट्रस्ट को लेकर क्लब के भीतर व बाहर ऐसी घेरेबंदी की गई कि उस ट्रस्ट को बंद कर देने के लिए अजीत जालान और उनके साथी मजबूर हुए थे । उन्हीं बातों को याद/ध्यान करते हुए कई लोगों को शक है कि अजीत जालान द्वारा अपने क्लब से ग्लोबल ग्रांट के लिए आवेदन करवाने के पीछे कहीं यह उद्देश्य तो नहीं है कि रोटरी फाउंडेशन से मिली ग्रांट में 'डंडी' मार कर वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी में खर्च होने वाले पैसों को जुटा लें । रोटरी क्लब दिल्ली मिडटाऊन को मिली और फिर वापस हुई रोटरी फाउंडेशन की ग्रांट में विनय भाटिया की मदद से होने वाली घपलेबाजी की कोशिश जिस तरह से बेनकाब हुई है, उसके कारण उनके गवर्नर-वर्ष में रोटरी फाउंडेशन के लिए इकट्ठा हुई रकम के ऐवज में मंजूर हुईं ग्रांट्स संदेह के घेरे में आ गई हैं - खासकर उन क्लब्स की ग्रांट्स, जो पहले से ही वित्तीय घपलेबाजी के आरोपों में घिरे रहे हैं । ऐसे में, विनय भाटिया के गवर्नर-वर्ष में रोटरी फाउंडेशन के लिए इकट्ठा हुई 15 लाख अमेरिकी डॉलर से अधिक की रकम गर्व करने की बजाये शर्म का कारण बन गई लग रही है ।

Sunday, July 21, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में रोटरी फाउंडेशन के पैसों पर सीधे सीधे 'डकैती' डालने वाला प्रोजेक्ट अंततः रद्द हुआ; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश भसीन से कुछेक लोगों की माँग कि उन्हें तुरंत काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग बुलाना चाहिए और उस मीटिंग में उक्त प्रोजेक्ट को हरी झंडी देने से लेकर उसे बनाये रखने की कोशिशें करने वाले और उन्हें समर्थन देने वाले गवर्नर्स की भूमिका की निंदा का प्रस्ताव पास कराना चाहिए

नई दिल्ली । रोटरी फाउंडेशन के पैसों की लूट के मामले में महीनों से तरह तरह से आँखों में धूल झोंकने की कुछेक गवर्नर्स की कोशिशें मामले के 'रचनात्मक संकल्प' में प्रकाशित होने के बाद तीन दिन भी आगे नहीं बढ़ सकीं और धराशाही हो गईं । 'रचनात्मक संकल्प' ने 17 जुलाई को उक्त मामले की एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश भसीन ने 20 जुलाई को एक संदेश के जरिए जानकारी दी कि गरीब बच्चों को फ्री एजुकेशन देने के नाम पर करीब 50/60 लाख रूपए अपनी जेबों में भरने के लिए कुछेक गवर्नर्स ने जो प्रोजेक्ट बनाया था, उसे बंद कर दिया गया है और रोटरी फाउंडेशन से मिला पैसा जल्दी ही वापस कर दिया जायेगा । इस मामले में मजेदार बात यह हुई कि निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय भाटिया की तरफ से सफाई सुनी गई कि इस मामले में उन्हें नाहक ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, जबकि इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रवि चौधरी ने दिखाई थी । रोटरी क्लब दिल्ली मिडटाऊन के उक्त प्रोजेक्ट को लेकर शुरु से ही विवाद था, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रवि चौधरी ने किसी की नहीं सुनी थी और आनन-फानन में उन्होंने उक्त प्रोजेक्ट को क्लियर कर दिया था । प्रोजेक्ट को आनन-फानन में क्लियर करवाने में उस वर्ष डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेटर रहे अशोक कंतूर तथा रवि चौधरी के समर्थन के भरोसे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव लड़ रहे संजीव राय मेहरा की भी अहम् भूमिका थी । विनय भाटिया रोटरी फाउंडेशन के 50/60 लाख रुपयों की लूट के मामले में सारा दोष भले ही रवि चौधरी, संजीव राय मेहरा व अशोक कंतूर पर डालने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन लोगों का कहना है कि उस समय डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में विनय भाटिया उन्हीं के बड़े खास हुआ करते थे और बाद में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में विनय भाटिया को जब 'बहती गंगा' में हाथ धोने का मौका मिला तो उन्होंने भी पूरी बेशर्मी के साथ बेईमानीभरे उक्त प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने का काम किया । 
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश भसीन ने अपने संदेश में उक्त प्रोजेक्ट के रद्द होने की सूचना देते हुए दावा किया है कि प्रोजेक्ट को रद्द करने की कार्रवाई डिस्ट्रिक्ट 3011 के कामकाज में पारदर्शिता बने रहने की प्रतिबद्धता का एक उदाहरण है । सुरेश भसीन के इस दावे को झूठ के पुलिंदे के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है और कहा जा रहा है कि डिस्ट्रिक्ट के कामकाज में यदि सचमुच पारदर्शिता होती तो उक्त प्रोजेक्ट क्लियर ही नहीं होता और यदि हो भी गया था तो रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल को ट्रांसफर न हो पाता । लोगों का कहना है कि रोटरी क्लब दिल्ली मिडटाऊन के प्रेसीडेंट सुरेश गुप्ता यदि मामले को न उठाते और 'रचनात्मक संकल्प' में उक्त मामले की रिपोर्ट यदि प्रकाशित न होती तो पारदर्शिता की ऐसीतैसी करते हुए कुछेक गवर्नर्स ने रोटरी फाउंडेशन के 50/60 लाख रुपए हजम करने की पूरी 'व्यवस्था' कर ली थी । कुछेक लोगों का कहना है कि सुरेश भसीन डिस्ट्रिक्ट के कामकाज में पारदर्शिता यदि सचमुच बनाना चाहते हैं तो उन्हें तुरंत काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग बुलाना चाहिए और उस मीटिंग में उक्त प्रोजेक्ट को हरी झंडी देने से लेकर उसे बनाये रखने की कोशिशें करने वाले और उन्हें समर्थन देने वाले गवर्नर्स की भूमिका की निंदा का प्रस्ताव पास कराना चाहिए तथा और कुछ नहीं तो कम-से-कम उन्हें चेतावनी तो देना ही चाहिए । ऐसा करना इसलिए जरूरी है ताकि आगे इस तरह की जालसाजी न हो सके। ऐसा करना इसलिए और भी जरूरी है, क्योंकि उक्त प्रोजेक्ट के जरिये रोटरी फाउंडेशन के पैसों को हड़पने की योजना में शामिल लोग किसी न किसी रूप में सत्ता में आने वाले हैं या आने के प्रयासों में लगे हैं । रवि चौधरी व संजीव राय मेहरा की जो जोड़ी उक्त प्रोजेक्ट को हरी झंडी देने के लिए जिम्मेदार ठहराई जा रही है, वही जोड़ी अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर व डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के रूप में फिर से इसी तरह के मौके बना सकती है; अशोक कंतूर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर (नॉमिनी) बनने के लिए तैयार घूम रहे हैं, और विनय भाटिया इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चुनाव/चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी करते हुए सुने/बताए जा रहे हैं । 
बेईमानीपूर्ण इरादों से सुसज्जित उक्त प्रोजेक्ट के रद्द हो जाने से यह बात भी साबित हुई है और सबक मिला है कि आम रोटेरियंस यदि चाहें और कोशिश करें, तो गवर्नर्स की बेईमानियों को रोका जा सकता है । रोटरी क्लब दिल्ली मिडटाऊन के पिछले वर्ष के पदाधिकारियों तथा मौजूदा प्रेसीडेंट सुरेश गुप्ता ने इस मामले में जिस तरह की दिलचस्पी दिखाई, और मामले को लगातार उठाते रहे - उसके कारण बेईमान गवर्नर्स तथा पीछे से उन्हें समर्थन व हौंसला देने वाले गवर्नर्स की हिम्मत भी जबाव दे गई और उन्होंने प्रोजेक्ट को बनाये रखने की कोशिशों से हाथ खींच लिए । कुछेक लोगों का हालाँकि मानना/कहना है कि इस मामले में बेईमानों को मिली हार से ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है; क्योंकि यह मामला इस बात का भी सुबूत है कि बेईमान गवर्नर्स के हौंसले इस हद तक बुलंद हैं कि वह रोटरी फाउंडेशन के पैसों पर सीधे सीधे 'डकैती' डालने से भी नहीं हिचकिचाए - इसलिए उन्हें तात्कालिक झटका भले ही लगा हो, लेकिन वह अपनी हरकतों से बाज तो नहीं ही आयेंगे । यह मामला कितना बड़ा था, और इसके चलते डिस्ट्रिक्ट की साख व पहचान किस हद तक दाँव पर लग गई थी - इसका अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि प्रोजेक्ट के रद्द होने की जानकारी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को देने की जरूरत पड़ी । इससे पहले शायद ही कभी किसी डिस्ट्रिक्ट में ऐसा हुआ हो कि किसी प्रोजेक्ट के मिलने और या रद्द होने की जानकारी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ने लोगों को दी हो । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश भसीन इस प्रोजेक्ट के रद्द होने को भले ही डिस्ट्रिक्ट के कामकाज में पारदर्शिता बने रहने के उदाहरण के रूप में देख/बता रहे हों, लेकिन डिस्ट्रिक्ट के ही कई लोगों को लगता है कि कुछेक गवर्नर्स की हरकतों पर यदि निगाह नहीं रखी गई, तो फिर वह रोटरी के पैसों को लूटने की अपनी हरकतों से बाज नहीं आयेंगे । 

Saturday, July 20, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में चेयरमैन हरीश चौधरी के नाकारापन के चलते कार्यक्रमों तक को लेकर श्वेता पाठक व अविनाश गुप्ता के बीच बनी संवादहीनता ने न सिर्फ सेमीनार को रद्द करवाया, बल्कि काउंसिल के माहौल को और खराब किया

नई दिल्ली । अविनाश गुप्ता के को-ऑर्डिनेशन में आज होने वाले सेमीनार के स्थगित होने से नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्यों के बीच चल रहा झगड़ा एक बार फिर मुखर हो उठा है । पिछले कुछेक दिनों से रीजनल काउंसिल में शांति बनी हुई थी, जिसके चलते लोगों को लग रहा था कि काउंसिल सदस्यों ने झगड़े से तौबा कर ली है और अब काउंसिल का कामकाज बिना किसी बाधा के आगे बढ़ेगा; लेकिन यह उम्मीद झूठी साबित हुई है और पता चला कि जिसे शांति-काल समझा जा रहा था - वह दरअसल तूफान से पहले की तैयारी के लिए लिया गया 'ब्रेक' था । मजे की बात यह है कि 20 जुलाई के सेमीनार के को-ऑर्डिनेटर के रूप में जब अविनाश गुप्ता का नाम सामने आया, तो कई लोगों ने पहले से ही घोषणा कर दी थी कि इस कार्यक्रम को लेकर अवश्य ही बबाल होगा और बहुत संभव है कि यह सेमीनार हो ही न सके । इससे भी ज्यादा मजे की बात यह है कि सेमीनार के रद्द होने की घोषणा वाले जिस संदेश में वाइस चेयरपरसन श्वेता पाठक को जिम्मेदार ठहराया गया है, उसे तैयार करने तथा भेजने की अनुमति/स्वीकृति देने की जिम्मेदारी से काउंसिल के सभी सदस्य बच रहे हैं । यह किस्सा दरअसल इस बात का एक उदाहरण भी है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में कामकाज आखिर हो कैसे रहा है - जब काउंसिल के किसी भी पदाधिकारी और या सदस्य ने उक्त संदेश तैयार करने व भेजने की अनुमति/स्वीकृति देने का काम नहीं किया है, तो उक्त संदेश काउंसिल की तरफ से लोगों को चला कैसे गया; और काउंसिल सदस्य इसकी जाँच-पड़ताल करने/करवाने को लेकर भी दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं । वास्तव में सिर्फ यह किस्सा ही नहीं, बल्कि पूरा वाकया ही काउंसिल में फैली अराजकता और सदस्यों व पदाधिकारियों की मनमानियों का नजारा व सुबूत पेश करता है ।
वाइस चेयरपरसन श्वेता पाठक इस बात पर भड़की हुई हैं कि काउंसिल की तरफ से भेजे गए संदेश में पर्चेज ऑर्डर पर उनके द्वारा साइन न करने को सेमीनार के रद्द होने का कारण बताते हुए उन्हें लोगों के बीच बदनाम करने की कोशिश की गई है । उनकी तरफ से कहा/बताया जा रहा है कि सेमीनार करने की तैयारी को लेकर उनसे जब कभी कोई बात ही नहीं की गई, उनसे न कुछ पूछा गया और न उन्हें कुछ बताया गया - तो उन्हें भला कौन से पर्चेज ऑर्डर पर साइन करने थे; क्या उनसे यह उम्मीद की जा रही है कि कोई भी मनमाने तरीके से पर्चेज ऑर्डर बना ले और वह आँख बंद करके उस पर साइन कर दें ? दूसरी तरफ अविनाश गुप्ता से हमदर्दी रखने वाले लोगों का यह भी मानना/कहना है कि प्रोग्राम को-ऑर्डिनेटर के रूप में अविनाश गुप्ता यदि श्वेता पाठक से कार्यक्रम की तैयारी के संबंध में बात करते भी तो भी श्वेता पाठक कोई न कोई मीन-मेख निकाल कर बखेड़ा खड़ा करती हीं और फिर मामला खराब ही होता । इस आशंका को यदि सच मान भी लिया जाए तो भी यह सवाल तो बना ही रहता है कि एक प्रोग्राम का को-ऑर्डिनेटर यदि पर्चेज कमेटी के मुखिया को प्रोग्राम की तैयारी तथा उसकी जरूरतों से अवगत नहीं करवाता है, तो पर्चेज कमेटी का मुखिया आखिर किस बिना पर पर्चेज ऑर्डर पर साइन कर दे ? दरअसल काउंसिल के पदाधिकारियों और सदस्यों के बीच संवाद हीनता की स्थिति ने ही ऐसे हालात बनाए हुए हैं और काउंसिल के कामकाज को बुरी तरह प्रभावित किया हुआ है । काउंसिल के पदाधिकारियों तथा सदस्यों के बीच संवाद या तो है ही नहीं, और जो है उसमें प्रायः तेज चीखने-चिल्लाने व गाली-गलौच भरे शब्द हैं । 'रचनात्मक संकल्प' को चार से पाँच मिनट का एक ऐसा ऑडियो मिला है, जिसमें चेयरमैन हरीश मल्होत्रा के साथ रीजनल काउंसिल के ही कुछेक सदस्य खासी आक्रामक, अशालीन व गाली-गलौच भरी भाषा में बात कर रहे हैं; बात क्या कर रहे हैं, उन्हें हड़का रहे हैं । काउंसिल सदस्यों तथा स्टॉफ के सदस्यों का कहना/बताना है कि काउंसिल के पदाधिकारी और सदस्य एक-दूसरे से प्रायः सड़कछाप तरीके से ही पेश आते हैं और एक दूसरे के साथ चीखते-चिल्लाते हुए व गाली-गलौच करते हुए ही बात करते हैं ।
इस सारी स्थिति के लिए हर कोई चेयरमैन हरीश चौधरी को ही जिम्मेदार ठहराता है । काउंसिल के हालचाल से परिचित लोगों का कहना है कि चेयरमैन के रूप में हरीश चौधरी में न तो कोई अपनी अक्ल/समझ है, और न ही वह नियम-कानून का पालन करने में दिलचस्पी लेते हैं - और इसीलिए लगातार वह खुद भी फजीहत का शिकार बनते हैं और काउंसिल का कामकाज भी बुरी तरह प्रभावित हो रहा है । पिछले दिनों एक अनौपचारिक मीटिंग में वरिष्ठ सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने उन्हें स्पष्ट रूप से समझाया/बताया था कि नियमानुसार काउंसिल में वह कोई भी काम सेक्रेटरी की सहमति/स्वीकृति के बिना नहीं कर सकते हैं । कई वरिष्ठ व अनुभवी लोगों का मानना और कहना है कि हरीश चौधरी यदि फैसलों की प्रक्रिया में सेक्रेटरी पंकज गुप्ता को शामिल रखें तो बहुत ही समस्याएँ पैदा ही नहीं होंगी । माना जा रहा है कि कई मुसीबतों को हरीश चौधरी ने स्वयं ही पैदा किया हुआ है - जिस धोखाधड़ी से वह चेयरमैन बने, उसके चलते रतन सिंह यादव व अजय सिंघल उनसे खफा हैं और वह तरह तरह से उनके सामने मुश्किलें खड़ी करते रहते हैं; उन मुश्किलों से बचाने के लिए नितिन कँवर, राजेंद्र अरोड़ा, सुमित गर्ग, अविनाश गुप्ता उनकी मदद करते हैं तो श्वेता पाठक, पंकज गुप्ता, विजय गुप्ता जैसे पदाधिकारियों की उपेक्षा होती है और तब वह अपने दाँव चलते हैं; उनके दाँव से बचने के लिए हरीश चौधरी उनकी सुनते हैं तो नितिन कँवर, राजेंद्र अरोड़ा, सुमित गर्ग, अविनाश गुप्ता उनकी ऐसीतैसी करने में जुट जाते हैं । इन सब से वह किसी तरह बचते हैं तो 'न तीन में न तेरह में' वाले गौरव गर्ग धरने जैसी नौटंकी करने लगते हैं । इस सब नौटंकी से परिचित लोगों का कहना है कि वास्तव में चेयरमैन के रूप में हरीश चौधरी के नाकारापन तथा ढुलमुल रवैये के कारण ही काउंसिल में अराजकता का माहौल बना है और कामकाज का मजाक बना हुआ है । 'सर्वे, सर्च एंड सीज़र' जैसे महत्त्वपूर्ण विषय पर आज होने वाला सेमीनार जिस तरीके से रद्द हुआ है, उससे आभास मिल रहा है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में हालात जल्दी नहीं सुधरने वाले हैं ।

Friday, July 19, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 के रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के अधिष्ठापन समारोह में प्रेसीडेंट्स, असिस्टेंट गवर्नर्स के साथ-साथ वरिष्ठ रोटेरियंस व गवर्नर्स की उत्साही उपस्थिति ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए ललित खन्ना की उम्मीदवारी को प्रभावी रूप से उत्साहित करने का काम किया

नई दिल्ली । रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के क्लब के नए पदाधिकारियों के अधिष्ठापन समारोह ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत ललित खन्ना की उम्मीदवारी के अभियान को और मजबूती देने का काम किया है । वास्तव में उक्त अधिष्ठापन समारोह को ललित खन्ना की उम्मीदवारी के समर्थन-आधार की झलक पाने-दिखाने के रूप में ही डिजाईन किया गया था; और कह सकते हैं कि उसका नतीजा भी उनकी तैयारी के अनुरूप ही निकला/रहा । उल्लेखनीय है कि चुनावी राजनीति के चलते रोटरी में दरअसल यह प्रथा ही बन गई है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के क्लब का अधिष्ठापन समारोह नए पदाधिकारियों की बजाये वास्तव में उम्मीदवार का 'शो' बन जाता है - और उसमें जुटे लोगों की पहचान के आधार पर उम्मीदवार की ताकत और कमजोरी का शुरुआती आकलन किया जाता है । संख्या के हिसाब से रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के - नहीं, ललित खन्ना के - समारोह में भीड़ तो अच्छी जुटी ही; उस भीड़ में प्रेसीडेंट्स और असिस्टेंट गवर्नर्स की अच्छी-खासी उपस्थिति ने ललित खन्ना की उम्मीदवारी के शुभचिंतकों को बम बम भी किया । समारोह में प्रायः सभी असिस्टेंट गवर्नर्स थे और प्रेसीडेंट्स की संख्या भी 70 के करीब सुनी/बताई गई । समारोह में डिस्ट्रिक्ट के प्रायः हर क्षेत्र - दिल्ली, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों/कस्बों तथा सोनीपत के क्लब्स के सदस्यों की अच्छी खासी संख्या थी; और कई क्लब्स के छोटे/बड़े समझे जाने वाले नेता लोग भी समारोह की रौनक बढ़ा रहे थे ।  गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों/कस्बों तथा सोनीपत के रोटेरियंस की उपस्थिति ने ललित खन्ना की उम्मीदवारी को खासा उत्साहित करने का काम किया ।
समारोह में मौजूद डिस्ट्रिक्ट के कुछेक वरिष्ठ रोटेरियंस ने इस मजेदार संयोग को भी रेखांकित किया कि जेके गौड़ और उनके बाद जिस उम्मीदवार के क्लब का अधिष्ठापन समारोह इस जगह पर हुआ है, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी का चुनाव उसी ने जीता है । उम्मीदवार के रूप में ललित खन्ना लेकिन संयोगों पर निर्भर नहीं हैं; और कई एक वरिष्ठ रोटेरियंस का कहना रहा कि ललित खन्ना इस बार अपने चुनाव अभियान में कहीं कोई कमी नहीं रहने देना चाहते हैं और हर तरफ ध्यान दे रहे हैं । पिछले महीनों में ललित खन्ना ने प्रेसीडेंट्स तथा वरिष्ठ रोटेरियंस के बीच काफी प्रभावी तरीके से संपर्क-अभियान चलाया है - समारोह में डिस्ट्रिक्ट के कई आम और खास लोगों की उपस्थिति को उनके उसी संपर्क-अभियान के नतीजे के रूप में देखा/समझा गया है । ललित खन्ना ने इस बार के अधिष्ठापन समारोह को इस तरह से डिजाईन किया कि उनका समारोह सिर्फ समारोह के रूप में ही नहीं था, बल्कि उसमें रोटरी के उद्देश्य व लक्ष्य भी थे - अधिष्ठापन समारोह में क्लब ने 17 नए प्रोजेक्ट्स की शुरुआत की घोषणा की तथा दो ग्लोबल ग्रांट्स के प्रोजेक्ट्स घोषित हुए; ग्लोबल ग्रांट्स के तहत घोषित किए गए दो प्रोजेक्ट्स में एक में ललित खन्ना का क्लब एक विदेशी क्लब से मदद ले रहा है, तथा दूसरे में उनका क्लब एक अन्य विदेशी क्लब को मदद दे रहा है । समारोह में एक और खास बात यह रही कि इसमें इनरव्हील की एक पूर्व प्रेसीडेंट तथा दो पूर्व एसोसिएटेड प्रेसीडेंट तथा ललित खन्ना की पत्नी नीलु खन्ना के अलावा दो अन्य पूर्व डिस्ट्रिक्ट चेयरपरसन उपस्थित हुईं - और उनकी उपस्थिति ने रोटेरियंस को, खासतौर से प्रेसीडेंट्स को रोटरी परिवार की अवधारणा से परिचित होने का मौका दिया और उन्हें विशेष रूप से प्रभावित किया ।
ललित खन्ना की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के संपर्क-अभियान के असर को जाँचने/परखने तथा उसे और गति देने के उद्देश्य से आयोजित हुए समारोह में कई गवर्नर्स के शामिल होने से भी ललित खन्ना की उम्मीदवारी के अभियान को 'वजन' मिलता नजर आया । हालाँकि यह देखने की बात होगी कि 'समय' पर कौन उनकी उम्मीदवारी के सचमुच काम आता है, लेकिन कई एक गवर्नर्स ने जिस उत्साह के साथ ललित खन्ना की और उनकी लीडरशिप क्वालिटी की प्रशंसा की, उससे उपस्थित लोगों के बीच ललित खन्ना की 'पहचान' का रंग कुछ गाढ़ा तो हुआ ही - और यह बात उनकी उम्मीदवारी के अभियान को सुदृढ़ तो करती नजर आई भी । ललित खन्ना की उम्मीदवारी की नाव को पिछले दिनों कुछ हिचकोले खाने पड़े हैं, लेकिन क्लब के अधिष्ठापन समारोह को भव्यता तथा रोटेरियंस की व्यापक उपस्थिति के साथ आयोजित करके ललित खन्ना ने अपनी उम्मीदवारी की नाव को स्थिरता व मजबूती देने का जो काम किया है, उसने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी परिदृश्य को रोमांचक बना दिया है । 

Wednesday, July 17, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में प्रोजेक्ट के नाम पर रोटरी फाउंडेशन के पैसों की लूट के मामले को तथा इस मामले में डिस्ट्रिक्ट के कुछेक गवर्नर्स की मिलीभगत को रोटरी क्लब दिल्ली मिडटाऊन के प्रेसीडेंट सुरेश गुप्ता ने बेनकाब किया

नई दिल्ली । रोटरी फाउंडेशन के पैसों की 'लूट' के मामले में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स रमन भाटिया, नरसिम्हन सुब्रमणियन व सुशील खुराना तथा निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय भाटिया व मौजूदा गवर्नर सुरेश भसीन तथा इन दोनों के डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर विनोद बंसल के बीच जो एकता 'दिखी' है, वह रोटरी में लूट-खसोट के तंत्र की जड़ों के व्यापक होने का आभास देती है । मामला एक ग्लोबल ग्रांट (जीजी 1755679) का है, जिसके तहत रोटरी क्लब दिल्ली मिडटाऊन को दिल्ली के पटेल नगर के नजदीक स्थित कठपुतली कॉलोनी में 'कठपुतली कॉलोनी फ्री एजुकेशन सेंटर' के लिए करीब 88 लाख रुपए मिले । यह ग्रांट क्लब के वरिष्ठ सदस्य व पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन भाटिया के प्रयासों से मिली बताई गई । लेकिन क्लब में ही इस ग्रांट और इससे जुड़े प्रोजेक्ट को लेकर संदेह पैदा हो गया और आरोप लगने लगे कि यह ग्रांट बच्चों को फ्री एजुकेशन देने के लिए नहीं, बल्कि कुछेक वरिष्ठ रोटेरियंस की जेबें भरने के लिए ली गई है । पिछले रोटरी वर्ष में क्लब के पदाधिकारियों को शिकायत मिली, तो जाँच-पड़ताल के लिए क्लब के वरिष्ठ सदस्यों की एक कमेटी बनाई गई - जिसके मुखिया तत्कालीन प्रेसीडेंट इलेक्ट सुरेश गुप्ता बने । कमेटी ने कुछेक प्रोफेशनल एक्सपर्ट्स की मदद लेकर की गई अपनी जाँच-पड़ताल में प्रोजेक्ट को पूरा करने की तैयारी को फर्जी व झूठा पाया और प्रोजेक्ट के खर्चे के आकलन को तीन से चार गुना तक बढ़ा-चढ़ा देखा । कमेटी ने पाया/समझा कि जो काम किया जाना है, उसमें मुश्किल से 25 से 30 लाख रुपए के बीच रकम खर्च होनी है, लेकिन रोटरी फाउंडेशन से उसके लिए करीब 88 लाख रुपए ले लिए गए हैं । प्रोजेक्ट की आड़ में की जाने वाली पैसों की इस भारी लूट का पता चलने पर रोटरी क्लब दिल्ली मिडटाऊन के पदाधिकारियों ने इस प्रोजेक्ट से हाथ खींच लिए और रोटरी फाउंडेशन से मिले पैसे ब्याज सहित वापस कर दिए ।
मामला यहाँ खत्म हो जाना चाहिए था - लेकिन यदि सचमुच खत्म हो जाता तो रोटरी में बने लूट-तंत्र की जड़ों के फैले होने की बात कैसे सामने आती ? रोटरी क्लब दिल्ली मिडटाऊन ने उक्त ग्रांट छोड़ी, तो पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नरसिम्हन सुब्रमणियन की 'गिद्ध' दृष्टि इस पर पड़ी और उन्होंने अपने क्लब के लिए उसी प्रोजेक्ट व ग्रांट को ले लिया । इस तरह प्रोजेक्ट तो वही रहा, लेकिन उसके 'माई-बाप' बदल गए और ग्रांट का नाम/नंबर भी बदल कर जीजी 1987611 हो गया और उसका खर्च भी पहले जितना ही रहा । इस मामले में तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय भाटिया और डीआरएफसी सुशील खुराना की भूमिका भी संदिग्ध रही । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में विनय भाटिया और डीआरएफसी के रूप में सुशील खुराना के जरिये ही रोटरी क्लब दिल्ली मिडटाऊन ने उक्त ग्रांट वापस की थी और इन दोनों को ही इस तथ्य से अवगत कराया था कि प्रोजेक्ट के नाम पर तीन से चार गुना ज्यादा रकम रोटरी फाउंडेशन से बसूलने की तैयारी की गई थी । इस तरह, रोटरी फाउंडेशन के पैसों की 'लूट' की बात जानते हुए भी विनय भाटिया और सुशील खुराना ने उक्त प्रोजेक्ट पहले वाले खर्चे पर ही रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल के नाम करवा दिया । विनय भाटिया और सुशील खुराना की इस हरकत को देखते हुए आरोप लगा कि उक्त ग्रांट के बढ़े पैसों के बँटवारे में इन दोनों का भी हिस्सा तय हो गया होगा, और इसीलिए इन्होंने रोटरी क्लब दिल्ली मिडटाऊन की 'शिकायत' को अनदेखा कर दिया । विनय भाटिया के गवर्नर-वर्ष के डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर विनोद बंसल की भूमिका भी संदेह के घेरे में आई । आरोप लगा कि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर होने के नाते विनोद बंसल को यह तो पता होगा ही कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में विनय भाटिया जानते-बूझते हुए रोटरी फाउंडेशन के पैसों की लूट के मामले में क्या गुल खिला रहे हैं, लेकिन तब भी उन्होंने मामले में चुप बने रहने का फैसला किया और लूट की कार्रवाई को होने दिया ।        
प्रोजेक्ट के नाम पर रोटरी फाउंडेशन से तीन से चार गुना पैसा लेने का आरोप लगा कर वापस की गई ग्रांट रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल को मिल जाने की बात रोटरी क्लब दिल्ली मिडटाऊन के पदाधिकारियों को पता चली, तो वह भड़क गए और हैरान रह गए - उनकी हैरानी का कारण यही रहा कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर और डीआरएफसी जैसे प्रमुख पदों पर बैठे लोग कैसे जानते-बूझते हुए भी रोटरी फाउंडेशन के पैसों की लूट में शामिल रहते हैं । इस बीच डिस्ट्रिक्ट में सत्ता बदल गई । रोटरी क्लब दिल्ली मिडटाऊन के पदाधिकारियों ने लेकिन चुप रहने की बजाये मामले को उठाने तथा अपनी आपत्ति दर्ज करने/करवाने का फैसला किया । क्लब के प्रेसीडेंट सुरेश गुप्ता ने मौजूदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश भसीन को एक लंबा पत्र लिख कर पूरे मामले की जानकारी दी और उनसे अनुरोध किया कि उक्त प्रोजेक्ट के खर्चे का प्रोफेशनल एक्सपर्ट्स की मदद से आकलन कराया जाए और जरूरत से ज्यादा पैसे को रोटरी फाउंडेशन को वापस किया जाए । सुरेश गुप्ता ने अपने पत्र में मुद्दे की बात यह भी उठाई है कि प्रोजेक्ट के नाम पर खर्चों को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने तथा इस तरह रोटरी फाउंडेशन के पैसों को लूटने की प्रवृत्ति पर यदि रोक नहीं लगाई गई, तो इससे एक तरफ तो रोटरी फाउंडेशन में दान देने वाले लोगों की सोच पर प्रतिकूल असर पड़ेगा और दूसरी तरफ रोटरी फाउंडेशन के बड़े पदाधिकारियों के बीच देश के रोटेरियंस का नाम खराब होगा । सुरेश गुप्ता ने अपने पत्र में इस बात की जरूरत को भी रेखांकित किया है कि डिस्ट्रिक्ट में ग्लोबल ग्रांट के आवेदनों की गहराई से पड़ताल होना चाहिए ताकि बूढ़ों, गरीबों, बीमारों, अनपढ़ों के नाम पर प्रोजेक्ट्स बना कर रोटरी फाउंडेशन के पैसों को हड़पने/लूटने की कोशिशों पर रोक लग सके । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुरेश भसीन को लिखे पत्र की प्रतिलिपि सुरेश गुप्ता ने काउंसिल ऑफ गवर्नर्स के सदस्यों को भी भेजी है - और इसे लिखे/भेजे हुए करीब दस दिन हो गए हैं; लेकिन अभी तक तो किसी के कानों पर जूँ रेंगती हुई नहीं दिखी है । देखना दिलचस्प होगा कि रोटरी क्लब दिल्ली मिडटाऊन के पदाधिकारियों द्वारा शुरू की गई मुहिम तथा उसके प्रेसीडेंट सुरेश गुप्ता द्वारा लिखे पत्र से रोटरी फाउंडेशन के पैसों की होने वाली लूट रुकती है, या गवर्नर्स मिलजुल कर मामले में लीपापोती कर लेते हैं ।