Friday, November 30, 2012

जीसी मिश्र के साथ की गई अनुज गोयल की चालबाजी ने रीजनल काउंसिल के लिए राघवेन्द्र की उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच स्वीकार्यता और समर्थन के भाव को और मजबूत बना दिया है

गाजियाबाद । अनुज गोयल ने फिसल कर गिरने से लगी चोट को 'दिखा' 'दिखा' कर सहानुभूति जुटाने में इंस्टीट्यूट की गाजियाबाद ब्राँच के प्रमुख पदाधिकारी जीसी मिश्र का जैसा जो इस्तेमाल करने की कोशिश की, उसके कारण सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए राघवेन्द्र की उम्मीदवारी को खासी धमक मिली है । उल्लेखनीय है कि जीसी मिश्र सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव में राघवेन्द्र की उम्मीदवारी के प्रमुख समर्थकों में हैं और चुनावी राजनीति की खेमेबाजी में अनुज गोयल के धुर विरोधी हैं । अभी पिछले दिनों ही गाजियाबाद ब्राँच में अनुज गोयल ने जब फर्जी तिकड़मों से अपने भाई जितेंद्र गोयल को को-ऑप्ट करवाया था तो ब्राँच में एक अकेले जीसी मिश्र ने ही उनकी इस भाई-भतीजा वाली कार्यवाई का विरोध किया था । रीजनल काउंसिल के चुनाव में अनुज गोयल ने मुकेश बंसल को उम्मीदवार बनाया है । लेकिन उम्मीदवार के रूप में मुकेश बंसल की पतली हालत को देखते हुए अनुज गोयल ने उनके समर्थन से हाथ खींच लिए हैं और जीसी मिश्र/राघवेन्द्र के नजदीक आने की कोशिश कर रहे हैं ।
अनुज गोयल ने फिसल कर गिरने से लगी सामान्य सी चोट पर खुद रो-रो कर और अपनी पत्नी को दूसरों के सामने रुला-रुला कर सहानुभूति जुटाने का जो ड्रामा रचा, उसमें जीसी मिश्र को शामिल करने के पीछे अनुज गोयल की यही समझ काम कर रही थी कि मुकेश बंसल उनके किसी काम नहीं आयेंगे, और उन्हें जीसी मिश्र/राघवेन्द्र की मदद ही लेनी पड़ेगी । अनुज गोयल को सिर्फ सहानुभूति ही जुटानी होती तो उन्हें जीसी मिश्र के नाम का इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ती । अनुज गोयल किंतु अपनी चोट का दो तरह से फायदा उठाना चाहते थे । एक तरफ तो उन्होंने लोगों के बीच सहानुभूति जुटाने की कोशिश की; और दूसरी तरफ उन्होंने जीसी मिश्र/राघवेन्द्र को अपने साथ दिखाने की चाल चली । अपनी इस चाल के लिए अनुज गोयल ने अपनी पत्नी का इस्तेमाल किया । अनुज गोयल ने फिसल कर गिरने से लगी चोट का उपचार हो जाने के कई घंटे बाद अपनी पत्नी से जीसी मिश्र को फोन करवाया । अनुज गोयल की पत्नी ने रोते-रोते जीसी मिश्र को अनुज गोयल के अस्पताल में होने की बात बताई । अनुज गोयल की पत्नी ने जैसा जो बताया उससे ऐसा लगा जैसे अनुज गोयल का कोई भारी एक्सीडेंट हुआ है और वह बड़ी क्रिटिकल स्थिति में हैं । अनुज गोयल की पत्नी का रोना-धोना सुन कर जीसी मिश्र ने राघवेन्द्र को खबर की और दोनों ने ही तय किया कि उनके अनुज गोयल के साथ राजनीतिक रिश्ते भले ही जो भी हों, किंतु इस मुश्किल घड़ी में उन्हें अनुज गोयल की मदद में खड़े होना चाहिए । जीसी मिश्र और राघवेन्द्र तुरंत अस्पताल दौड़े । जीसी मिश्र अपनी पत्नी को भी अपने साथ लाये ।
अस्पताल पहुँच कर जो नजारा इन्होंने वहाँ देखा, तो यह हक्के-बक्के रह गए । चोट का उपचार करा चुके अनुज गोयल फोन पर लोगों को अपने अस्पताल में होने की जानकारी दे रहे थे । कुछेक दूसरे लोग भी फोन पर यही सूचना लगातार प्रचारित करने में लगे हुए थे । वह बाकायदा एक दूसरे से टिप्स ले/दे रहे थे कि फलाँ को फोन हो गया या नहीं । यह नजारा देख कर जीसी मिश्र और राघवेन्द्र ने अपने आप को ठगा हुआ पाया । इन्हें यह समझने में देर नहीं लगी कि अनुज गोयल ने इन्हें इस्तेमाल किया है । इन्हें लेकिन अनुज गोयल की अगली चाल की भनक नहीं हो पाई । इन्हें यह तो पहले भी पता था, और यह साबित भी हो रहा था कि अनुज गोयल बहुत ही धूर्त किस्म का व्यक्ति है - लेकिन उसकी धूर्तता की हद क्या है, इसका अंदाजा नहीं था । इसका एक आभास तब हुआ जब जीसी मिश्र को पता चला कि उनके नाम से अनुज गोयल की सहानुभूति में एक एसएमएस रीजन के लोगों को भेजा गया है । अनुज गोयल को ऐसा फर्जीवाड़ा करने की जरूरत क्यों पड़ी ? सिर्फ इसलिए ताकि वह रीजन के लोगों को बता/दिखा सकें कि जीसी मिश्र और राघवेन्द्र उनके साथ हैं । अनुज गोयल की यह चालबाजी सामने आते ही जीसी मिश्र ने रीजन के लोगों को एसएमएस करके जानकारी दी कि अनुज गोयल के जो चोट लगी है, उसका उन्हें दुःख है और वह प्रार्थना करते हैं कि अनुज गोयल जल्दी स्वस्थ हों, लेकिन वह लोगों को बताना चाहते हैं कि पहले वाला एसएमएस उन्होंने नहीं किया था ।
जीसी मिश्र के इस एसएमएस से अनुज गोयल की किरकिरी तो खूब हुई - लेकिन उनकी किरकिरी ने राघवेन्द्र की उम्मीदवारी की धमक भी पैदा की । अनुज गोयल ने जो हरकत की, उससे साबित हुआ कि अनुज गोयल भी मान गए हैं कि राघवेन्द्र की उम्मीदवारी को लोगों के बीच अच्छा समर्थन मिल रहा है; लोगों के बीच राघवेन्द्र की उम्मीदवारी को मिल रहे समर्थन का फायदा उठाने के लिए ही उन्होंने जीसी मिश्र के नाम का धोखाधड़ी के साथ इस्तेमाल किया । अनुज गोयल की इस हरकत ने उनके समर्थन के भरोसे उम्मीदवार बने मुकेश बंसल की उम्मीदवारी के लिए अजीब समस्या पैदा कर दी है । रीजन में लोगों को लग रहा है कि मुकेश बंसल को उम्मीदवार बनाने वाले अनुज गोयल को ही जब उन पर भरोसा नहीं रह गया है और अनुज गोयल तीन-तिकड़म से राघवेन्द्र के नजदीकियों के साथ जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं - तो दूसरों को उनसे जुड़ने में फिर क्या दिलचस्पी होगी । अनुज गोयल की इस हरकत से मुकेश बंसल के समर्थकों को भी लग रहा है कि अनुज गोयल ने उनके साथ धोखा किया है । मुकेश बंसल की उम्मीदवारी को अपने खिलाफ अनुज गोयल का षड़यंत्र बताने वाले विनय मित्तल इस मामले में मजा ले रहे हैं । उन्हें लोगों को यह बताने का मौका मिला है कि अनुज गोयल ने पहले उनके साथ धोखा किया और अब अपने धोखे का शिकार उन्होंने मुकेश बंसल को बनाया है । अनुज गोयल के रवैये को लेकर अनुज गोयल के भूतपूर्व सहयोगी रहे विनय मित्तल के इस तरह के विचार और अनुज गोयल के भरोसे अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले मुकेश बंसल के समर्थकों की आशंका ने राघवेन्द्र की उम्मीदवारी को मिलने वाले समर्थन का स्पेस बढ़ाने का ही काम किया है । अनुज गोयल ने अपने स्वार्थ में जीसी मिश्र के साथ जो चालबाजी खेली, उसने राघवेन्द्र की उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच स्वीकार्यता और समर्थन के भाव को और मजबूत बनाने का ही काम किया है ।

मनु अग्रवाल ने सेंट्रल काउंसिल उम्मीदवार के रूप में कानपुर से बाहर के अपने समर्थन-आधार के भरोसे अभी तो बढ़त बनाई हुई है

कानपुर । मनु अग्रवाल और विवेक खन्ना की चुनावी सक्रियता को देख/पहचान कर कानपुर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को यह विश्वास तो हो चला है कि इस बार इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल में कानपुर को प्रतिनिधित्व तो अवश्य ही मिल जायेगा और पिछली बार की तरह निराश नहीं होना पड़ेगा । इस बात पर तो लोग एकमत हैं कि मनु अग्रवाल और विवेक खन्ना में से कोई एक अवश्य ही सेंट्रल काउंसिल के लिए चुन लिया जायेगा - लेकिन कौन चुना जायेगा, इसे लेकर मत बँटे हुए है । इन बँटे हुए मतों के पीछे हालाँकि जो गणित और तर्क हैं उनमें मनु अग्रवाल का पलड़ा अभी तो भारी दिख रहा है । 'अभी तो' शब्द यहाँ इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मनु अग्रवाल के खिलाफ नकारात्मक बातें भी यदा-कदा सुनाईं पड़ती हैं और लोगों को लगता है कि उन्होंने यदि सावधानी नहीं बरती तो उनका बना-बनाया काम बिगड़ भी सकता है । अनुज गोयल और रवि होलानी अपनी-अपनी सदस्यता बचाने के लिए और मुकेश कुशवाह जीतने के लिए कानपुर में समर्थन जुटाने का जो प्रयास कर रहे हैं, उसमें भी मनु अग्रवाल के लिए चुनौती के तत्व छिपे हैं । जाहिर तौर पर, आकलन के स्तर पर मनु अग्रवाल की जो बढ़त है, उसे बचाये/बनाये रखने के लिए उन्हें एक तरफ यदि 'घर' में मुकाबला करना है तो दूसरी तरफ बाहर के लोगों से भी जूझना है ।
मनु अग्रवाल को 'घर' में विवेक खन्ना से तगड़ा मुकाबला करना पड़ रहा है । कानपुर में मनु अग्रवाल ने यूँ तो अच्छा समर्थन जुटाया है किन्तु नृपेंद्र गुप्ता और भार्गव परिवार का समर्थन विवेक खन्ना के साथ होने से अपने समर्थन को वोट में बदलने की चुनौती उनके लिए गंभीर हो गई है । कानपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीती में नृपेंद्र गुप्ता और भार्गव परिवार एक साथ शायद पहली बार आये हैं - इससे विवेक खन्ना की उम्मीदवारी का कद बढ़ा है । विवेक खन्ना के साथ चाचा नृपेंद्र गुप्ता हैं, तो मनु अग्रवाल के साथ भतीजा अक्षय कुमार गुप्ता हैं । मनु अग्रवाल के समर्थक नृपेंद्र गुप्ता को यदि 'चल चुके कारतूस' के रूप में देखते हैं तो विवेक खन्ना के समर्थक तर्क देते हैं कि जो अक्षय कुमार गुप्ता अपने अनफ्रेंडली रवैये के कारण अपना चुनाव नहीं बचा सके, वह मनु अग्रवाल के किस काम आ सकेंगे ? विवेक खन्ना के समर्थकों को इस बात से भी राहत मिली है कि राजीव मेहरोत्रा चुनाव में ज्यादा सक्रिय नहीं हैं । कानपुर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में राजीव मेहरोत्रा को यूँ तो विवेक खन्ना के राजनीतिक गुरू के रूप में देखा/पहचाना जाता है; लेकिन विवेक खन्ना के व्यवहार से आहत राजीव मेहरोत्रा अब मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में हैं । राजीव मेहरोत्रा, मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में हैं तो, लेकिन ज्यादा कुछ करते हुए 'दिख' नहीं रहे हैं । मनु अग्रवाल के कुछेक नजदीकियों का हालाँकि कहना है कि मनु अग्रवाल के चुनाव अभियान की रणनीति तैयार करने में राजीव मेहरोत्रा का प्रमुख रोल है, लेकिन इन्हीं नजदीकियों का यह भी मानना और कहना है कि राजीव मेहरोत्रा से जितनी और जिस तरह की उम्मीद थी, उतनी मदद उनसे नहीं मिल पा रही है ।
विवेक खन्ना और मनु अग्रवाल के कानपुर के समर्थन-आधार की तुलना करने वाले मनु अग्रवाल को यदि आगे 'देखते' हैं तो उनके अनुसार इसका एक बड़ा कारण यह है कि विवेक खन्ना की तुलना में मनु अग्रवाल ने यहाँ के लोगों के बीच कानपुर से बाहर के अपने समर्थन-आधार को लेकर अच्छी हवा बनाई हुई है । कानपुर में लोगों को लगता है और वह अपने इस लगने पर काफी हद तक विश्वास भी करते हैं कि मनु अग्रवाल ने मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ में अपने लिए अच्छा समर्थन जुटाया हुआ है । इस सन्दर्भ में, मनु अग्रवाल की तुलना में विवेक खन्ना को कम सक्रिय देखा/पाया गया है । विवेक खन्ना के नजदीकी भी मानते और कहते हैं कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में विवेक खन्ना ने विभिन्न ब्रांचेज में अपने संपर्क तो अच्छे बनाये थे, लेकिन वह उन्हें अपने संभावित राजनीतिक सहयोगियों के रूप में परिवर्तित नहीं कर पाए हैं । जबकि मनु अग्रवाल ने जो संबंध बनाये, उन संबधों के सहारे उन्होंने अपना समर्थन-आधार बनाने का काम किया । उनकी इसी कोशिश ने सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में उन्हें आगे किया हुआ है । चुनावी राजनीति के संदर्भ में एक सर्वमान्य धारणा यह है कि जीतता वह है जो 'लड़ता' हुआ 'दिखता' है । विवेक खन्ना की तुलना में लोगों को मनु अग्रवाल चूंकि 'लड़ते' हुए 'दिख' रहे हैं - इसलिए भी लोगों के बीच मनु अग्रवाल की उम्मीदवारी को लेकर स्वीकार्यता का भाव ज्यादा है । किंतु - जैसा कि मनु अग्रवाल के समर्थक और शुभचिंतक भी मानते और कहते हैं कि मनु अग्रवाल अभी भले ही आगे दिख रहे हों, लेकिन अपनी बढ़त को लेकर वह आश्वस्त और निश्चिंत नहीं हो सकते हैं ।

Thursday, November 29, 2012

योगिता आनंद की रीजनल काउंसिल की उम्मीदवारी को वापस कराने की हरकत से राजेश शर्मा ने हरित अग्रवाल को मुश्किल में डाला

नई दिल्ली । हरित अग्रवाल की नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए जीत पक्की करने के लिए उनके सबसे बड़े समर्थक राजेश शर्मा ने योगिता आनंद पर अपनी उम्मीदवारी को वापस लेने के लिए जिस तरह से दबाव बनाया, वह अब बड़े बबाल का रूप लेता जा रहा है । इस मामले में आरके गौड़ की एंट्री होने से मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है । मजे की बात है कि योगिता आनंद इस मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहती हैं, लेकिन उनके समर्थक और शुभचिंतक चुप बैठने को तैयार नहीं हैं; क्योंकि उन्हें डर है कि हरित अग्रवाल के समर्थक ऐन मौके पर उनकी उम्मीदवारी को लेकर कहीं कोई समस्या खड़ी न कर दें; इसलिए वह मामले को ऐसा बना देना चाहते हैं कि हरित अग्रवाल के समर्थकों के सामने योगिता आनंद की उम्मीदवारी के खिलाफ कुछ करने का कोई मौका ही न बचे । इस कोशिश में योगिता आनंद के कुछेक समर्थकों ने आरके गौड़ से संपर्क किया । उल्लेखनीय है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स - खास कर युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच आरके गौड़ की पहचान ऐसी है कि अन्याय और बेईमानी और मनमानीपूर्ण दादागिरी के खिलाफ लड़ाई में किसी को भी मदद की जरूरत होती है तो वह सबसे पहले आरके गौड़ का फोन लगाता है । आरके गौड़ भी मदद के लिए तुरंत हाज़िर हो जाते हैं । इस मामले में भी ऐसा ही हुआ ।
आरके गौड़ लेकिन, चूंकि सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार भी हैं, इसलिए मामले में उनके पड़ते ही मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया है । मामले ने राजनीतिक रंग इसलिए भी ले लिया, क्योंकि जिन राजेश शर्मा ने हरित अग्रवाल की मदद करने के लिए योगिता आनंद की उम्मीदवारी को वापस कराने का बीड़ा उठाया, वह राजेश शर्मा सेंट्रल काउंसिल के लिए चरनजोत सिंह नंदा की उम्मीदवारी का समर्थन करते हुए बताये जा रहे हैं । मजे की बात यह है कि आरके गौड़ को इस मामले में अभी तक कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ी है - योगिता आनंद के समर्थकों को उन्होंने सिर्फ आश्वस्त भर किया है कि वह चिंता न करें और परेशान न हों - योगिता आनंद की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने वाला कोई काम नहीं हो सकेगा । यूँ तो यह बात हर कोई कहता जिससे भी योगिता आनंद के समर्थक गुहार लगाते । किंतु अभी यह बात चूँकि आरके गौड़ ने - सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार आरके गौड़ ने कही है - और सेंट्रल काउंसिल के एक दूसरे उम्मीदवार चरनजोत सिंह नंदा के समर्थक समझे जाने वाले लोगों के संदर्भ में कही है; इसलिए उक्त मामला बड़ा हो गया है ।
आरके गौड़ की एंट्री के बाद, योगिता आनंद की उम्मीदवारी को वापस कराने की मुहिम में जुटे राजेश शर्मा के लिए सचमुच मुसीबत हो गई है कि अब वह क्या करेंगे ? राजेश शर्मा ने जो किया, उसे लेकर हरित अग्रवाल के दूसरे समर्थकों के बीच हालाँकि नाराजगी है - उनका मानना और कहना है कि हरित अग्रवाल की उम्मीदवारी को अच्छा समर्थन मिलता दिख रहा है, इसलिए राजेश शर्मा को ऐसी हरकत नहीं करनी चाहिए जिससे कि हरित अग्रवाल की उम्मीदवारी विवाद में फँसे और कमजोर नज़र आये । राजेश शर्मा नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन रह चुके हैं - इसलिए इस तरह की हरकत की उनसे उम्मीद नहीं की जाती है । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के चुनाव घटिया हरकतों के कारण लगातार विवादस्पद होते जा रहे हैं - पिछली बार बूथ केप्चरिंग तक की हरकत हो गई थी और इस बार उम्मीदवार को डरा-धमका कर उम्मीदवारी वापस कराने का प्रयास करने का मामला सामने आया है । गंभीर बात यह है कि इस तरह के मामलों में बड़े पदों पर रहे लोगों के नाम आरोपियों के रूप में सामने आये हैं - बूथ केप्चरिंग में सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के पूर्व चेयरमैन अनुज गोयल का नाम है तो डरा-धमका कर उम्मीदवारी वापस कराने के मामले में नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पूर्व चेयरमैन राजेश शर्मा का नाम है ।
राजेश शर्मा की इस हरकत ने हरित अग्रवाल की उम्मीदवारी को सवालों के घेरे में ला दिया है । लोगों के बीच सवाल पैदा हो रहे हैं कि हरित अग्रवाल क्या इसी तरह की घटिया हरकतों के भरोसे चुनाव जीतने की तैयारी कर रहे हैं; और कि हरित अग्रवाल भी क्या इसी तरह की हरकतें करेंगे जैसी कि राजेश शर्मा कर रहे हैं ? हरित अग्रवाल के कुछेक समर्थकों का ही कहना है कि योगिता आनंद की उम्मीदवारी को वापस कराने के लिए राजेश शर्मा ने जो किया है, हरित अग्रवाल को उसके लिए सार्वजानिक रूप से माफी मांग लेनी चाहिए, ताकि इस कारण से होने वाली बदनामी उनका कोई नुकसान न करे । उल्लेखनीय है कि हरित अग्रवाल के समर्थकों के बीच राजेश शर्मा की भूमिका को लेकर पहले से ही संदेह रहा है और हरित अग्रवाल के ही समर्थक कहते रहे हैं कि राजेश शर्मा समर्थक के भेष में विरोधी की भूमिका निभा रहे हैं । अब फिर हरित अग्रवाल के कुछेक समर्थकों ने सुझाव दिया है कि हरित अग्रवाल को राजेश शर्मा से हाथ जोड़ कर एक यह अहसान करने के लिए कहना चाहिए कि अब वह उन पर कोई अहसान न करें ।  

Wednesday, November 28, 2012

अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ 'चुनावी' काम कर रहे और कुछ ही दिन बाद उनके यहाँ से निकाले जाने की आशंका से घिरे युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले अतुल कुमार गुप्ता को अपने ही लोगों से गंभीर चुनौती मिलने से एक अजीब तरह की समस्या का सामना करना पड़ रहा है । अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ अलग-अलग रूपों में नौकरी करने वाले युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स दूसरों के सामने अपना दुखड़ा रोते सुने गए हैं कि अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ उनकी नौकरी तो बस चुनाव तक ही है और चुनाव हो जाने के बाद उन्हें नौकरी से निकाल ही दिया जाना है । उल्लेखनीय है कि अतुल कुमार गुप्ता ने पिछले कुछेक महीनों में कई युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को अपने यहाँ नौकरी पर रखा है - ऐसा करते हुए उन्होंने दिखाने/जताने का प्रयास यह किया था कि उन्हें युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की कितनी फिक्र है; और कि उन्हें जैसे ही कुछ करने का मौका मिलेगा वह युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए करेंगे । उन्होंने दिखाया/जताया कि उन्हें अपने काम - अपने प्रोफेशनल काम के लिए जैसे ही लोगों की जरूरत महसूस हुई, उन्होंने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को चुना तथा उन्हें मौका दिया । लेकिन अब पोल खुल रही है कि उन्होंने अपने प्रोफेशनल काम के लिए नहीं, बल्कि अपने चुनावी काम के लिए युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को अपने यहाँ नौकरी दी हुई है ।
अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ काम करने वाले युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को अपने दोस्तों व नजदीकियों के बीच कहते/शिकायत करते हुए सुना गया है कि उनसे प्रोफेशनल काम तो कोई कराया ही नहीं जाता है, उनसे तो सिर्फ चुनावी काम ही कराया जाता है । उनके यहाँ काम करने वाले युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के ही अनुसार, प्रोफेशनल काम के लिए अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ पहले से ही पर्याप्त नेटवर्क था और उन्हें उतने लोगों की जरूरत थी ही नहीं, जितने कि उन्होंने रख लिए हैं । इस बीच उनके काम में इतना और ऐसा इजाफा भी नहीं हुआ है कि उन्हें कई लोगों की जरूरत पड़े; उनका काम सिर्फ इस रूप में ही बढ़ा है कि वह सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार हो गए हैं - जिस कारण उनकी व्यस्तता बढ़ गई और चुनावी काम के लिए उन्हें हेल्पिंग हेंड्स की जरूरत पड़ी । इसलिए पिछले दिनों एक साथ काम पर रखे गए युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स किन्हीं प्रोफेशनल कामों में नहीं, बल्कि चुनावी काम में लगाये गए हैं । चुनावी काम मुश्किल से दस दिन का और बचा है - इसलिए अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ काम कर रहे युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को चिंता होने लगी है और वह समझ रहे हैं कि अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ उनके दिन अब गिने-चुने ही बचे हैं । अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ काम कर रहे युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स चूंकि अपनी चिंता दूसरे लोगों के बीच व्यक्त कर रहे हैं इसलिए अतुल कुमार गुप्ता का खेल बिगड़ रहा है । अतुल कुमार गुप्ता ने यह जो खेल किया है, पिछले चुनाव में यही खेल सुधीर कुमार अग्रवाल ने भी किया था - लेकिन उम्मीदवार के रूप में उन्हें इसका कोई फायदा नहीं हुआ था । अतुल कुमार गुप्ता के लिए मुश्किल कुछ ज्यादा इसलिए है क्योंकि उन्होंने अपने आप को बहुत जेनुइन रूप में पेश किया और यह दिखाने/जताने का प्रयास किया कि उन्हें प्रोफेशन की और युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सचमुच बड़ी फ़िक्र है - लेकिन उनके यहाँ काम पर रखे गए युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के हवाले से जो बातें सामने आ रही हैं वह बता रही हैं कि अतुल कुमार गुप्ता युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को सिर्फ इस्तेमाल कर रहे हैं और उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ ही कर रहे हैं । अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ काम कर रहे और कुछ ही दिन बाद उनके यहाँ से निकाले जाने की आशंका से घिरे युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स कह भी रहे हैं कि अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ होने की बजाये वह यदि अन्य किसी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के यहाँ नौकरी करते तो इतने दिनों में प्रोफेशन से जुड़ी बारीकियों को समझते/पहचानते, अनुभव प्राप्त करते और अपने कैरियर में कुछ कदम आगे बढ़ चुके होते । अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ काम करते हुए, उनके चुनाव अभियान से जुड़े काम करते हुए युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को अपने ठगे जाने का अहसास हो रहा है, क्योंकि इतने दिन काम करने के बदले में उन्हें कुछ भी मिलने नहीं जा रहा है - उनके लिए अपनी नौकरी तक बचा पाना भी मुश्किल ही होगा ।
अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ काम करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का यह 'अहसास' और मुखर रूप में प्रकट की जा रही उनकी चिंता अतुल कुमार गुप्ता के लिए मुसीबत बन गई है । उन्हें और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों को लग रहा है कि इस तरह की बातें युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच अतुल कुमार गुप्ता की स्थिति को कमजोर करेंगी । अतुल कुमार गुप्ता के यहाँ काम करने वाले युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स यदि अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, और मान रहे हैं तथा दूसरे लोगों से बता भी रहे हैं कि अतुल कुमार गुप्ता ने अपने चुनावी लाभ के लिए उन्हें इस्तेमाल किया है और उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ किया है, तो चुनाव में वोट देने वाले युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स पर कोई अच्छा असर तो नहीं ही पड़ेगा और अतुल कुमार गुप्ता को नुकसान ही पहुंचाएगा ।

Tuesday, November 27, 2012

नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव में राधेश्याम बंसल के 'काम' को ही, उनके खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है

नई दिल्ली । राधेश्याम बंसल की अति-सक्रियता ही रीजनल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में उनकी जैसे दुश्मन बन गई लगती है । नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में उनकी जोरदार सक्रियता ने उन्हें जीत की तरफ तो बढ़ाया है, लेकिन उनके विरोधियों को भी आक्रामक होने के लिए उकसाया है । उन्हें सफलता की तरफ बढ़ता देख कर उनके कामकाज को लेकर उन्हें घेरने के प्रयास उनके विरोधियों ने तेज कर दिए हैं । राधे श्याम बंसल को एंट्री का काम करने वाला बताते हुए लोगों के बीच सवाल किया जा रहा है कि ऐसे लोग काउंसिल में आयेंगे तो इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन के लिए आखिर करेंगे क्या ?
राधेश्याम बंसल इस बार दूसरी बार चुनाव लड़ रहे हैं । पिछली बार भी उन्होंने रीजनल काउंसिल का चुनाव लड़ा था और एक बड़े स्टडी सर्किल का सदस्य होने के बावजूद वह चुनाव हार गए थे । पिछली बार की अपनी हार के लिए उन्होंने अपने ही स्टडी सर्किल के मुखिया सुधीर अग्रवाल को जिम्मेदार ठहराया था । नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन रह चुके सुधीर अग्रवाल पिछली बार सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार थे । राधेश्याम बंसल का आरोप रहा कि सुधीर अग्रवाल ने स्टडी सर्किल के जरिये होने वाली राजनीति का सारा और एकतरफा इस्तेमाल अपने लिए किया, और उन्हें उसका फायदा नहीं लेने दिया । सुधीर अग्रवाल अपना चुनाव भी नहीं जीत पाए और राधेश्याम बंसल को भी हार का सामना करना पड़ा । राधेश्याम बंसल भी मानते थे और दूसरे लोगों ने भी माना कि स्टडी सर्किल के जरिये होने वाली राजनीति का इस्तेमाल यदि राधेश्याम बंसल के लिए भी होता तो राधेश्याम बंसल तो अपनी सीट निकाल ही सकते थे ।
यह 'समझने' के बाद राधेश्याम बंसल ने पहला काम यह किया कि सुधीर अग्रवाल की मुखियागिरी में चलने वाले स्टडी सर्किल को छोड़ कर अपना अलग एक स्टडी सर्किल बनाया । इस बार का नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का चुनाव उन्होंने अपने भरोसे लड़ने की तैयारी की और धुआँधार अभियान संयोजित किया । रीजनल काउंसिल के उम्मीदवारों में राधेश्याम बंसल का चुनाव अभियान सबसे ज्यादा तड़क-भड़क वाला रहा है और उन्होंने शुरू से ही पार्टियों पर खासा जोर दिया । जाहिर है कि उन्होंने अपने चुनाव अभियान में काफी पैसा खर्च किया है । एक उम्मीदवार के रूप में उन्हें इससे लाभ भी हुआ है । उन्हें जीतते हुए उम्मीदवार के रूप में देखा जाने लगा है ।
राधेश्याम बंसल के इसी लाभ ने लेकिन उनके सामने मुश्किलें भी खड़ी कर दी हैं । दूसरे उम्मीदवारों ने लोगों के बीच कहना शुरू किया है कि राधेश्याम बंसल पैसे के बल पर चुनाव जीतने की कोशिश कर रहे हैं । उनके खिलाफ उनके काम को ही हथियार बनाया जा रहा है । कहा/बताया जा रहा है कि वह एंट्री का काम करते हैं और इस कारण उन्हें इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन के सामने की चुनौतियों के बारे में कुछ पता ही नहीं है और उनके लिए काउंसिल में कुछ कर पाना संभव ही नहीं होगा । नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मौजूदा दशा और दिशा का हवाला देते हुए तर्क दिया जा रहा है कि प्रोफेशन की चुनौतियों से अनजान लोग यदि काउंसिल में जाते हैं तो फिर वह काउंसिल का कबाड़ा ही करते हैं । इस तरफ की बातों ने राधेश्याम बंसल के सामने आकस्मिक रूप से मुश्किल तो खड़ी कर ही दी है । 

Monday, November 26, 2012

नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए राजेंद्र नारंग ने न सिर्फ अपने समर्थन-आधार को बनाये रखने का प्रयास किया, बल्कि नए समर्थन-आधार भी खोजे और तैयार किये हैं

नई दिल्ली/हिसार । राजेंद्र नारंग की उम्मीदवारी के समर्थन में दिल्ली में जो आवाजें सुनी जा रही हैं, उन आवाजों के शोर में रीजनल काउंसिल के कुछेक उन उम्मीदवारों की उम्मीदवारी के नारे धीमे पड़ते देखे जा रहे हैं, जो हिसार-सिरसा-भिवानी-रोहतक क्षेत्र के वोटों पर निगाह लगाये हुए थे । उल्लेखनीय है कि रीजनल काउंसिल के लिए कुछेक उम्मीदवारों ने तो सिर्फ इसी क्षेत्र के वोटों के भरोसे अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की थी, तो जिन लोगों ने जीतने के लिए बड़ा दांव चला हुआ है उनकी नज़र भी इस क्षेत्र के वोटों पर रही है । लेकिन राजेंद्र नारंग की उम्मीदवारी को मिलते दिख रहे समर्थन ने सभी के गणित बिगाड़ दिए हैं । मजे की बात है कि शुरू में कोई भी राजेंद्र नारंग की उम्मीदवारी को गंभीरता से नहीं ले रहा था । राजेंद्र नारंग ने पिछले दो चुनावों में भी अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत किया था, किन्तु वह सफल नहीं हो पाए थे । पिछले चुनाव में हालाँकि वह बहुत ही मामूली अंतर से पिछड़ गए थे - लेकिन चूंकि वह लगातार दूसरी बार पिछड़े थे, इसलिए इस बार शुरू में उनकी उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा था । इसीलिये उनकी उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने के बावजूद कई एक उम्मीदवारों को उनके समर्थन आधार वाले क्षेत्र से वोट मिलने का भरोसा था । ऐसा भरोसा रखने वाले लोगों का मानना और कहना था कि दो बार पिछड़ने के कारण राजेंद्र नारंग के प्रति समर्थन का भाव उनके अपने समर्थन-आधार क्षेत्र में बुरी तरह घट गया है - क्योंकि अब उनके अपने बहुत खास लोग भी यह विश्वास करने को तैयार नहीं हैं कि वह जीतने लायक समर्थन जुटा सकेंगे ।
राजेंद्र नारंग को कम आंकने वाले लोगों ने लेकिन इस बात की पूरी तरह अनदेखी की कि दो बार असफल रहने के बावजूद राजेंद्र नारंग ने हिम्मत नहीं हारी है और अपनी असफलताओं से सबक लेकर उन्होंने काफी पहले से ही तैयारी शुरू कर दी है । उन्होंने न सिर्फ अपने समर्थन-आधार को बनाये रखने का प्रयास किया, बल्कि नए समर्थन-आधार भी खोजे और तैयार किये । यही कारण रहा कि जब चुनावी भाग-दौड़ सचमुच शुरू हुई तो राजेंद्र नारंग को कमजोर आँक रहे लोगों को यह देख कर तगड़ा झटका लगा कि राजेंद्र नारंग को न सिर्फ अपने समर्थकों से और ज्यादा जोश के साथ समर्थन मिल रहा है, बल्कि उनके सक्रिय समर्थकों की संख्या भी बढ़ी है । राजेंद्र नारंग ने इस बार एक बड़ा काम यह किया कि उन्होंने रीजन के बड़े सेंटर्स में अपनी पहचान बनाने पर जोर दिया । पंजाब और हरियाणा में आने वाली प्रमुख ब्रांचेज में अपनी पैठ बनाने सा साथ-साथ राजेंद्र नारंग ने दिल्ली में भी अपने समर्थकों को सक्रिए होने ही नहीं, 'दिखने के लिए भी प्रेरित करने का काम किया । उनकी इस तैयारी ने असर दिखाया; जिसका नतीजा यह निकला कि उनकी उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच स्वीकार्यता और समर्थन का भाव तो पैदा हुआ ही, उनकी उम्मीदवारी का ऑरा (आभामंडल) भी बना । यही वजह है कि नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में जिन उम्मीदवारों की जीत को सुनिश्चित समझा जा रहा है उनमें राजेंद्र नारंग का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है ।

Sunday, November 25, 2012

आरके गौड़ को अपनी जुझारू पहचान के भरोसे, युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का समर्थन पाने की कोशिशों में लगे दूसरे उम्मीदवारों की तुलना में ज्यादा स्पेस मिलता दिख रहा है

नई दिल्ली । आरके गौड़ की चुनावी सक्रियता ने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोटों पर नजर लगाये उम्मीदवारों की उम्मीदों को तगड़ा झटका दिया है । उल्लेखनीय है कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स - यानि पिछले चुनाव के बाद प्रोफेशन से जुड़े लोगों पर इस बार कई उम्मीदवारों की निगाह रही है । इसके दो कारण बने : एक तो यह कि इनकी संख्या अच्छी.खासी है; और दूसरा यह कि कई कारणों से यह तबका अपनी स्थिति से नाखुश है । इसलिए कई एक लोगों को लगा कि इनकी नाखुशी को भड़का कर इन्हें अपना वोट बनाया जा सकता है; और इनके वोटों की सवारी करके इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में पहुंचा जा सकता है । रीजनल काउंसिल से सेंट्रल काउंसिल में छलांग लगाने की तैयारी करने वाले अतुल कुमार गुप्ता और संजय कुमार अग्रवाल, सेंट्रल काउंसिल में जाने के लिए एक बार फिर प्रयास करने वाले एमके अग्रवाल, पिछली बार की हार को जीत में बदलने की कोशिश करने वाले विजय कुमार गुप्ता ने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स पर खास ध्यान देना शुरू किया । प्रोफेशन में और प्रोफेशन में जुड़े लोगों के साथ जो कुछ भी बुरा हो रहा है, उसके लिए मौजूदा सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को जिम्मेदार ठहराने पर इन्होंने ज्यादा जोर और ध्यान दिया । इन्होंने खासा सघन और आक्रामक चुनाव अभियान चलाया - लेकिन जैसे.जैसे चुनाव अभियान में तेजी आई वैसे.वैसे यह साफ होने लगा कि इनके चुनाव अभियान को लोगों के बीच विश्वसनीयता और स्वीकार्यता नहीं मिल पा रही है । इनके लिए इससे भी ज्यादा झटके की बात यह रही कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच इनके मुकाबले आरके गौड़ की विश्वसनीयता और स्वीकार्यता ज्यादा बनी । मजे की बात यह रही कि यह विश्वसनीयता और स्वीकार्यता तब बनी जबकि आरके गौड़ ने इसके लिए कोई ज्यादा योजनाबद्ध तरीके से प्रयत्न भी नहीं किया । ‘बिन मांगे मोती मिलें, और मांगे मिले न भीख’ वाला मुहावरा यहाँ चरितार्थ होता हुआ नजर आया । युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोटों को जुटाने के लिए जिन उम्मीदवारों ने योजना बनाई और योजना के अनुसार काम किया, उन्हें तो कुछ मिलता हुआ नजर नहीं आया; लेकिन जिन आरके गौड़ ने योजना बनाये बिना अपनी उपस्थिति को प्रकट किया उनके प्रति युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच समर्थन का भाव दिखा । इसका कारण यह रहा कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने उम्मीदवारों की बातों पर ही विश्वास नहीं किया, बल्कि यह जानने/देखने का भी प्रयास किया कि उम्मीदवार जो कह रहे हैं उनमें सच्चाई कितनी है । ऐसा करते हुए उन्होंने पाया कि जो उम्मीदवार बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं वह सिर्फ चुनावी मौसम में उन्हें दिखाने/सुनाने के लिए कर रहे हैं; जबकि आरके गौड़ उस समय भी प्रोफेशन में की मुश्किलों तथा इंस्टीट्यूट चला रहे लोगों की मनमानियों के खिलाफ लड़ रहे थे जब चुनाव का मौसम नहीं था । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि पिछले चुनाव में जमकर धांधली हुई थी, और इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन को लज्जित करने वाला बूथ केप्चरिंग कांड हुआ था - लेकिन चुनाव के बाद, काउंसिल का गठन हो जाने के बाद विजय कुमार गुप्ता, एमके अग्रवाल, अतुल कुमार गुप्ता, संजय कुमार अग्रवाल कहाँ थे और क्या कर रहे थे ? विजय कुमार गुप्ता और एमके अग्रवाल तो घर जा कर बैठ गये थे; जबकि अतुल कुमार गुप्ता और संजय कुमार अग्रवाल रीजनल काउंसिल में सत्ता का सुख भोग रहे थे । इनमें से कोई भी इस बात की चिंता तक प्रकट नहीं कर रहा था कि इंस्टीट्यूट में और प्रोफेशन में कहाँ क्या गलत हो रहा है । उस समय लेकिन आरके गौड़ इंस्टीट्यूट में हो रही गड़बडि़यों को सामने लाने तथा उनके संदर्भ में कार्रवाई करने/करवाने के अभियान में लगे हुए थे । इसी कारण से, युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच आरके गौड़ की उम्मीदवारी के प्रति ज्यादा विश्वास और स्वीकार्य का भाव दिखा है ।
युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोटों को कब्जाने की तिकड़म लगाने वाले उम्मीदवारों ने एक गलती और की और वह यह कि मौजूदा काउंसिल सदस्यों में उन्होंने कमजोर से ‘दिखने’ वाले सदस्यों के खिलाफ ज्यादा हल्ला मचाया हुआ है और चुनावी नजरिये से जो सदस्य मजबूत दिख रहे हैं, उनके खिलाफ कुछ भी कहने से परहेज किया हुआ है । सेंट्रल काउंसिल में ‘घुसने’ की तिकड़म में लगे उम्मीदवारों ने पंकज त्यागी और विनोद जैन को घेरने पर ज्यादा जोर दिया हुआ है; जबकि नवीन गुप्ता, संजय वायस ऑफ सीए अग्रवाल, चरनजोत सिंह नंदा को छोड़ा हुआ है । उन्हें लगता है कि नवीन गुप्ता, संजय वायस ऑफ सीए अग्रवाल, चरनजोत सिंह नंदा तो अपनी सीट बचा ही लेंगे; लेकिन यदि वह शोर मचायेंगे और युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को भड़कायेंगे तो पंकज त्यागी व विनोद जैन को लपेटे में ले लेंगे । युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने लेकिन इस ‘खेल’ को लगता है कि समझ लिया है; और वह सवाल उठाने लगे हैं कि इंस्टीट्यूट में यदि गड़बडि़याँ हो रही हैं, और सेंट्रल काउंसिल में बैठे लोग प्रोफेशन की तथा प्रोफेशन से जुड़े लोगों की कोई चिंता नहीं कर रहे हैं तो सेंट्रल काउंसिल के सभी सदस्य इसके लिए दोषी और जिम्मेदार क्यों नहीं हैं - केवल कुछ ही सदस्य जिम्मेदार क्यों बताये जा रहे हैं ? नवीन गुप्ता को, संजय वायस ऑफ सीए अग्रवाल को, चरनजोत सिंह नंदा को निशाने पर लेने से परहेज क्यों किया जा रहा है ? सिर्फ पंकज त्यागी और विनोद जैन को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है ? उल्लेखनीय है कि सेंट्रल काउंसिल के मौजूदा सदस्यों में तुलनात्मक रूप से सबसे खराब परफोरमेंस नवीन गुप्ता की मानी/समझी जाती है । लोग शिकायत करते हैं कि काउंसिल में प्रोफेशन से और प्रोफेशन से जुड़े लोगों के हित में मुद्दे उठाना तो दूर, वह उनके फोन तक नहीं उठाते हैं । इसके बावजूद, उन्हें निशाना नहीं बनाया गया है । नवीन गुप्ता के प्रति आम लोगों की नाराजगी तो खुल कर सुनी जा रही है, लेकिन इंस्टीट्यूट की गड़बडि़यों की जोरशोर से बातें करने वाले उम्मीदवारों के मुँह से उनके बारे में कभी एक शब्द नहीं सुना गया । इसका कारण यही है कि सभी यह मानते हैं कि नवीन गुप्ता भले ही किसी काम के न हों, लेकिन अपने पिता के संपर्कों की बदौलत चुनाव तो वह जीत ही जायेंगे । इसलिए उनके बारे में बात करके समय क्यों खराब किया जाये ? इसी तरह के रवैये से, युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को भड़का कर, उनके बीच अपने लिए समर्थन पैदा करने की कोशिशों में लगे उम्मीदवारों की पोल खुल रही है । इंस्टीट्यूट में हो रही गड़बडि़यों और उन गड़बडि़यों के लिए जिम्मेदार पदाधिकारियों का जिक्र सभी का ध्यान खींचता है । लिहाजा, विजय कुमार गुप्ता, एमके अग्रवाल, अतुल कुमार गुप्ता आदि जब इस तरह की बातें करते हैं, तो बातों को सुन कर लोग मजा तो खूब लेते हैं - लेकिन इनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेते ।
ऐसा नहीं है कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स - या सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स भी - इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन की मौजूदा दशा से निराश और नाराज नहीं हैं; वह निराश और नाराज हैं और चाहते हैं कि उन्हें ऐसी लीडरशिप मिले जो इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की दशा को बेहतर बनाने के लिए सिर्फ बातें न बनाये - बल्कि सचमुच में कुछ करे । कम से कम निरंतरता में कुछ करता हुआ ‘दिखे’ तो । युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की यही चाहत आरके गौड़ को, दूसरे अति सक्रिय दिखने वाले उम्मीदवारों की तुलना में ज्यादा और बड़ा स्पेस देती है । आरके गौड़ को यह ज्यादा और बड़ा स्पेस इसलिए भी मिला है, क्योंकि एक जुझारू पहचान के भरोसे उनकी पैठ सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच भी है । आरके गौड़ चूंकि पिछले कई वर्षों से इंस्टीट्यूट की गतिविधियों से लगातार संबद्ध रहे हैं, इसलिए वह तरह.तरह से कामकाजी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के साथ जुड़े रहे हैं और उनके काम आते रहे हैं । इस कारण से, सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उनका न सिर्फ पहचान का बल्कि विश्वास का भी संबंध है । सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का एक बड़ा तबका मानता और चाहता है कि इंस्टीट्यूट में यदि गड़बडि़यों को रोकना है, इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों को यदि मनमानी करने से रोकना है तो आरके गौड़ को और उनके जैसे लोगों को सेंट्रल काउंसिल में भेजना चाहिए । सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से मिलने वाला यह फीडबैक युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच आरके गौड़ की पहचान को तथा उनकी स्वीकार्यता को और गहरा ही करता है ।