Monday, November 26, 2012

नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए राजेंद्र नारंग ने न सिर्फ अपने समर्थन-आधार को बनाये रखने का प्रयास किया, बल्कि नए समर्थन-आधार भी खोजे और तैयार किये हैं

नई दिल्ली/हिसार । राजेंद्र नारंग की उम्मीदवारी के समर्थन में दिल्ली में जो आवाजें सुनी जा रही हैं, उन आवाजों के शोर में रीजनल काउंसिल के कुछेक उन उम्मीदवारों की उम्मीदवारी के नारे धीमे पड़ते देखे जा रहे हैं, जो हिसार-सिरसा-भिवानी-रोहतक क्षेत्र के वोटों पर निगाह लगाये हुए थे । उल्लेखनीय है कि रीजनल काउंसिल के लिए कुछेक उम्मीदवारों ने तो सिर्फ इसी क्षेत्र के वोटों के भरोसे अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की थी, तो जिन लोगों ने जीतने के लिए बड़ा दांव चला हुआ है उनकी नज़र भी इस क्षेत्र के वोटों पर रही है । लेकिन राजेंद्र नारंग की उम्मीदवारी को मिलते दिख रहे समर्थन ने सभी के गणित बिगाड़ दिए हैं । मजे की बात है कि शुरू में कोई भी राजेंद्र नारंग की उम्मीदवारी को गंभीरता से नहीं ले रहा था । राजेंद्र नारंग ने पिछले दो चुनावों में भी अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत किया था, किन्तु वह सफल नहीं हो पाए थे । पिछले चुनाव में हालाँकि वह बहुत ही मामूली अंतर से पिछड़ गए थे - लेकिन चूंकि वह लगातार दूसरी बार पिछड़े थे, इसलिए इस बार शुरू में उनकी उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा था । इसीलिये उनकी उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने के बावजूद कई एक उम्मीदवारों को उनके समर्थन आधार वाले क्षेत्र से वोट मिलने का भरोसा था । ऐसा भरोसा रखने वाले लोगों का मानना और कहना था कि दो बार पिछड़ने के कारण राजेंद्र नारंग के प्रति समर्थन का भाव उनके अपने समर्थन-आधार क्षेत्र में बुरी तरह घट गया है - क्योंकि अब उनके अपने बहुत खास लोग भी यह विश्वास करने को तैयार नहीं हैं कि वह जीतने लायक समर्थन जुटा सकेंगे ।
राजेंद्र नारंग को कम आंकने वाले लोगों ने लेकिन इस बात की पूरी तरह अनदेखी की कि दो बार असफल रहने के बावजूद राजेंद्र नारंग ने हिम्मत नहीं हारी है और अपनी असफलताओं से सबक लेकर उन्होंने काफी पहले से ही तैयारी शुरू कर दी है । उन्होंने न सिर्फ अपने समर्थन-आधार को बनाये रखने का प्रयास किया, बल्कि नए समर्थन-आधार भी खोजे और तैयार किये । यही कारण रहा कि जब चुनावी भाग-दौड़ सचमुच शुरू हुई तो राजेंद्र नारंग को कमजोर आँक रहे लोगों को यह देख कर तगड़ा झटका लगा कि राजेंद्र नारंग को न सिर्फ अपने समर्थकों से और ज्यादा जोश के साथ समर्थन मिल रहा है, बल्कि उनके सक्रिय समर्थकों की संख्या भी बढ़ी है । राजेंद्र नारंग ने इस बार एक बड़ा काम यह किया कि उन्होंने रीजन के बड़े सेंटर्स में अपनी पहचान बनाने पर जोर दिया । पंजाब और हरियाणा में आने वाली प्रमुख ब्रांचेज में अपनी पैठ बनाने सा साथ-साथ राजेंद्र नारंग ने दिल्ली में भी अपने समर्थकों को सक्रिए होने ही नहीं, 'दिखने के लिए भी प्रेरित करने का काम किया । उनकी इस तैयारी ने असर दिखाया; जिसका नतीजा यह निकला कि उनकी उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच स्वीकार्यता और समर्थन का भाव तो पैदा हुआ ही, उनकी उम्मीदवारी का ऑरा (आभामंडल) भी बना । यही वजह है कि नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में जिन उम्मीदवारों की जीत को सुनिश्चित समझा जा रहा है उनमें राजेंद्र नारंग का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है ।

Sunday, November 25, 2012

आरके गौड़ को अपनी जुझारू पहचान के भरोसे, युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का समर्थन पाने की कोशिशों में लगे दूसरे उम्मीदवारों की तुलना में ज्यादा स्पेस मिलता दिख रहा है

नई दिल्ली । आरके गौड़ की चुनावी सक्रियता ने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोटों पर नजर लगाये उम्मीदवारों की उम्मीदों को तगड़ा झटका दिया है । उल्लेखनीय है कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स - यानि पिछले चुनाव के बाद प्रोफेशन से जुड़े लोगों पर इस बार कई उम्मीदवारों की निगाह रही है । इसके दो कारण बने : एक तो यह कि इनकी संख्या अच्छी.खासी है; और दूसरा यह कि कई कारणों से यह तबका अपनी स्थिति से नाखुश है । इसलिए कई एक लोगों को लगा कि इनकी नाखुशी को भड़का कर इन्हें अपना वोट बनाया जा सकता है; और इनके वोटों की सवारी करके इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में पहुंचा जा सकता है । रीजनल काउंसिल से सेंट्रल काउंसिल में छलांग लगाने की तैयारी करने वाले अतुल कुमार गुप्ता और संजय कुमार अग्रवाल, सेंट्रल काउंसिल में जाने के लिए एक बार फिर प्रयास करने वाले एमके अग्रवाल, पिछली बार की हार को जीत में बदलने की कोशिश करने वाले विजय कुमार गुप्ता ने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स पर खास ध्यान देना शुरू किया । प्रोफेशन में और प्रोफेशन में जुड़े लोगों के साथ जो कुछ भी बुरा हो रहा है, उसके लिए मौजूदा सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को जिम्मेदार ठहराने पर इन्होंने ज्यादा जोर और ध्यान दिया । इन्होंने खासा सघन और आक्रामक चुनाव अभियान चलाया - लेकिन जैसे.जैसे चुनाव अभियान में तेजी आई वैसे.वैसे यह साफ होने लगा कि इनके चुनाव अभियान को लोगों के बीच विश्वसनीयता और स्वीकार्यता नहीं मिल पा रही है । इनके लिए इससे भी ज्यादा झटके की बात यह रही कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच इनके मुकाबले आरके गौड़ की विश्वसनीयता और स्वीकार्यता ज्यादा बनी । मजे की बात यह रही कि यह विश्वसनीयता और स्वीकार्यता तब बनी जबकि आरके गौड़ ने इसके लिए कोई ज्यादा योजनाबद्ध तरीके से प्रयत्न भी नहीं किया । ‘बिन मांगे मोती मिलें, और मांगे मिले न भीख’ वाला मुहावरा यहाँ चरितार्थ होता हुआ नजर आया । युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोटों को जुटाने के लिए जिन उम्मीदवारों ने योजना बनाई और योजना के अनुसार काम किया, उन्हें तो कुछ मिलता हुआ नजर नहीं आया; लेकिन जिन आरके गौड़ ने योजना बनाये बिना अपनी उपस्थिति को प्रकट किया उनके प्रति युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच समर्थन का भाव दिखा । इसका कारण यह रहा कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने उम्मीदवारों की बातों पर ही विश्वास नहीं किया, बल्कि यह जानने/देखने का भी प्रयास किया कि उम्मीदवार जो कह रहे हैं उनमें सच्चाई कितनी है । ऐसा करते हुए उन्होंने पाया कि जो उम्मीदवार बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं वह सिर्फ चुनावी मौसम में उन्हें दिखाने/सुनाने के लिए कर रहे हैं; जबकि आरके गौड़ उस समय भी प्रोफेशन में की मुश्किलों तथा इंस्टीट्यूट चला रहे लोगों की मनमानियों के खिलाफ लड़ रहे थे जब चुनाव का मौसम नहीं था । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि पिछले चुनाव में जमकर धांधली हुई थी, और इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन को लज्जित करने वाला बूथ केप्चरिंग कांड हुआ था - लेकिन चुनाव के बाद, काउंसिल का गठन हो जाने के बाद विजय कुमार गुप्ता, एमके अग्रवाल, अतुल कुमार गुप्ता, संजय कुमार अग्रवाल कहाँ थे और क्या कर रहे थे ? विजय कुमार गुप्ता और एमके अग्रवाल तो घर जा कर बैठ गये थे; जबकि अतुल कुमार गुप्ता और संजय कुमार अग्रवाल रीजनल काउंसिल में सत्ता का सुख भोग रहे थे । इनमें से कोई भी इस बात की चिंता तक प्रकट नहीं कर रहा था कि इंस्टीट्यूट में और प्रोफेशन में कहाँ क्या गलत हो रहा है । उस समय लेकिन आरके गौड़ इंस्टीट्यूट में हो रही गड़बडि़यों को सामने लाने तथा उनके संदर्भ में कार्रवाई करने/करवाने के अभियान में लगे हुए थे । इसी कारण से, युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच आरके गौड़ की उम्मीदवारी के प्रति ज्यादा विश्वास और स्वीकार्य का भाव दिखा है ।
युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वोटों को कब्जाने की तिकड़म लगाने वाले उम्मीदवारों ने एक गलती और की और वह यह कि मौजूदा काउंसिल सदस्यों में उन्होंने कमजोर से ‘दिखने’ वाले सदस्यों के खिलाफ ज्यादा हल्ला मचाया हुआ है और चुनावी नजरिये से जो सदस्य मजबूत दिख रहे हैं, उनके खिलाफ कुछ भी कहने से परहेज किया हुआ है । सेंट्रल काउंसिल में ‘घुसने’ की तिकड़म में लगे उम्मीदवारों ने पंकज त्यागी और विनोद जैन को घेरने पर ज्यादा जोर दिया हुआ है; जबकि नवीन गुप्ता, संजय वायस ऑफ सीए अग्रवाल, चरनजोत सिंह नंदा को छोड़ा हुआ है । उन्हें लगता है कि नवीन गुप्ता, संजय वायस ऑफ सीए अग्रवाल, चरनजोत सिंह नंदा तो अपनी सीट बचा ही लेंगे; लेकिन यदि वह शोर मचायेंगे और युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को भड़कायेंगे तो पंकज त्यागी व विनोद जैन को लपेटे में ले लेंगे । युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने लेकिन इस ‘खेल’ को लगता है कि समझ लिया है; और वह सवाल उठाने लगे हैं कि इंस्टीट्यूट में यदि गड़बडि़याँ हो रही हैं, और सेंट्रल काउंसिल में बैठे लोग प्रोफेशन की तथा प्रोफेशन से जुड़े लोगों की कोई चिंता नहीं कर रहे हैं तो सेंट्रल काउंसिल के सभी सदस्य इसके लिए दोषी और जिम्मेदार क्यों नहीं हैं - केवल कुछ ही सदस्य जिम्मेदार क्यों बताये जा रहे हैं ? नवीन गुप्ता को, संजय वायस ऑफ सीए अग्रवाल को, चरनजोत सिंह नंदा को निशाने पर लेने से परहेज क्यों किया जा रहा है ? सिर्फ पंकज त्यागी और विनोद जैन को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है ? उल्लेखनीय है कि सेंट्रल काउंसिल के मौजूदा सदस्यों में तुलनात्मक रूप से सबसे खराब परफोरमेंस नवीन गुप्ता की मानी/समझी जाती है । लोग शिकायत करते हैं कि काउंसिल में प्रोफेशन से और प्रोफेशन से जुड़े लोगों के हित में मुद्दे उठाना तो दूर, वह उनके फोन तक नहीं उठाते हैं । इसके बावजूद, उन्हें निशाना नहीं बनाया गया है । नवीन गुप्ता के प्रति आम लोगों की नाराजगी तो खुल कर सुनी जा रही है, लेकिन इंस्टीट्यूट की गड़बडि़यों की जोरशोर से बातें करने वाले उम्मीदवारों के मुँह से उनके बारे में कभी एक शब्द नहीं सुना गया । इसका कारण यही है कि सभी यह मानते हैं कि नवीन गुप्ता भले ही किसी काम के न हों, लेकिन अपने पिता के संपर्कों की बदौलत चुनाव तो वह जीत ही जायेंगे । इसलिए उनके बारे में बात करके समय क्यों खराब किया जाये ? इसी तरह के रवैये से, युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को भड़का कर, उनके बीच अपने लिए समर्थन पैदा करने की कोशिशों में लगे उम्मीदवारों की पोल खुल रही है । इंस्टीट्यूट में हो रही गड़बडि़यों और उन गड़बडि़यों के लिए जिम्मेदार पदाधिकारियों का जिक्र सभी का ध्यान खींचता है । लिहाजा, विजय कुमार गुप्ता, एमके अग्रवाल, अतुल कुमार गुप्ता आदि जब इस तरह की बातें करते हैं, तो बातों को सुन कर लोग मजा तो खूब लेते हैं - लेकिन इनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेते ।
ऐसा नहीं है कि युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स - या सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स भी - इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन की मौजूदा दशा से निराश और नाराज नहीं हैं; वह निराश और नाराज हैं और चाहते हैं कि उन्हें ऐसी लीडरशिप मिले जो इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की दशा को बेहतर बनाने के लिए सिर्फ बातें न बनाये - बल्कि सचमुच में कुछ करे । कम से कम निरंतरता में कुछ करता हुआ ‘दिखे’ तो । युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की यही चाहत आरके गौड़ को, दूसरे अति सक्रिय दिखने वाले उम्मीदवारों की तुलना में ज्यादा और बड़ा स्पेस देती है । आरके गौड़ को यह ज्यादा और बड़ा स्पेस इसलिए भी मिला है, क्योंकि एक जुझारू पहचान के भरोसे उनकी पैठ सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच भी है । आरके गौड़ चूंकि पिछले कई वर्षों से इंस्टीट्यूट की गतिविधियों से लगातार संबद्ध रहे हैं, इसलिए वह तरह.तरह से कामकाजी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के साथ जुड़े रहे हैं और उनके काम आते रहे हैं । इस कारण से, सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उनका न सिर्फ पहचान का बल्कि विश्वास का भी संबंध है । सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का एक बड़ा तबका मानता और चाहता है कि इंस्टीट्यूट में यदि गड़बडि़यों को रोकना है, इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों को यदि मनमानी करने से रोकना है तो आरके गौड़ को और उनके जैसे लोगों को सेंट्रल काउंसिल में भेजना चाहिए । सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से मिलने वाला यह फीडबैक युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच आरके गौड़ की पहचान को तथा उनकी स्वीकार्यता को और गहरा ही करता है ।

Saturday, November 24, 2012

जेके गौड़ को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद की जीत की तरफ बढ़ता देख कर मुकेश अरनेजा ने गिरगिट की तरह रंग बदल कर उनका समर्थन करना शुरु कर दिया है

नई दिल्ली । जेके गौड़ के अधिकृत उम्मीदवार चुने जाने से खिसिआये और निराश हुए लोगों को यह देख कर 'उम्मीद' बनी है कि मुकेश अरनेजा अब जेके गौड़ के समर्थन में कूद पड़े हैं । यह अब जगजाहिर बात हो चुकी है कि मुकेश अरनेजा जिसके दोस्त हो जाते हैं, उस बिचारे को दुश्मनों की जरूरत नहीं रह जाती - मुकेश अरनेजा की दोस्ती ही उसका काम तमाम कर देती है । हाल के दिनों में रवि चौधरी के साथ जो हुआ, और फिर अभी आलोक गुप्ता के साथ जो हुआ - उसमें इसके संकेत और सुबूत देखे जा सकते हैं । पिछले रोटरी वर्ष में रवि चौधरी को कई लोगों ने समझाया था कि मुकेश अरनेजा के साथ रहोगे तो निश्चित ही डूबोगे । इस वर्ष आलोक गुप्ता को कई लोगों ने रवि चौधरी के अनुभव से सबक लेने की नसीहत दी थी - लेकिन इन दोनों ने किसी की नहीं सुनी और मुकेश अरनेजा के समर्थन की कीमत चुकाई । इसी आधार पर, मुकेश अरनेजा को जेके गौड़ के समर्थन में जाता देख कर उन लोगों की बाँछे खिल गई हैं जो जेके गौड़ को सफल होते हुए नहीं देखना चाहते हैं ।
मुकेश अरनेजा को जेके गौड़ के समर्थन में आया देख कर उनके समर्थकों और शुभचिंतकों को भी चिंता हुई है कि मुकेश अरनेजा के कारण जेके गौड़ का बना/बनाया काम कहीं बिगड़ न जाये । जेके गौड़ के समर्थकों व शुभचिंतकों के लिए हैरानी की बात यह भी है कि जेके गौड़ के नोमीनेट होने के पहले तक मुकेश अरनेजा से जब भी समर्थन की बात की जाती थी, तब तो वह टाल-मटोल करते थे, और कभी रवि चौधरी तो कभी आलोक गुप्ता का समर्थन करने की बात करते थे - लेकिन जेके गौड़ के नोमीनेट होते ही मुकेश अरनेजा ने गिरगिट को भी मात देने वाले अंदाज़ में रंग बदला और जेके गौड़ के सबसे बड़े समर्थक बन गए । मुकेश अरनेजा ने यह रंग क्यों बदला ? उन्हें जानने वालों का कहना है कि मुकेश अरनेजा ने चूंकि भांप लिया है कि इस वर्ष डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद का चुनाव जेके गौड़ ही जीतने जा रहे हैं, इसलिए उन्होंने बिना देर किये जेके गौड़ की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है - ताकि उनकी जीत का श्रेय वह ले सकें और लोगों को बता सकें कि उन्होंने जेके गौड़ को जितवा दिया ।
एक सच्चे नेता में और एक टुच्चे नेता में यही प्रमुख अंतर बताया/पाया जाता है कि एक सच्चा नेता जिसके साथ होता है उसे जितवाने का प्रयास करता है और असफल होने पर अपनी कमजोरियों का मूल्यांकन करता है; जबकि टुच्चा नेता होता किसी और के साथ है लेकिन जब जीतता हुआ कोई और दिखता है तो झट से पाला बदल कर जीतते हुए के साथ हो जाता है ।
मुकेश अरनेजा के लिए लोगों का कहना है कि यदि वह सचमुच में इतने जिताऊ नेता हैं तो अपने क्लब के ललित खन्ना को जितवाने में क्यों नहीं जुटते ? ललित खन्ना न सिर्फ उनके क्लब के हैं, बल्कि उनके बड़े खास भी रहे हैं और उनके प्रेरित करने के चलते ही उम्मीदवार बने हैं । मुकेश अरनेजा लेकिन उनकी कोई बात ही नहीं कर रहे हैं क्योंकि उन्हें पता है कि ललित खन्ना के जीतने के कोई चांस नहीं हैं ।
मुकेश अरनेजा अब कोई सच्चे नेता तो हैं नहीं, जो हारते नज़र आ रहे उम्मीदवार के साथ हों - भले ही वह उनके क्लब का हो, उनका बड़ा खास हो और उनके प्रेरित करने पर ही उम्मीदवार बना हो ! मुकेश अरनेजा को तो जीतने वाले उम्मीदवार के साथ दिखना है - ताकि वह लोगों को बता और जता सकें कि उसे उन्होंने जितवाया है ।
मुकेश अरनेजा ने अपनी नेतागिरी चलाने के लिए जेके गौड़ की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है, इससे लेकिन जेके गौड़ की उम्मीदवारी के समर्थकों व शुभचिंतकों को चिंता हो गई है । उन्हें डर यह हुआ है कि मुकेश अरनेजा के आगे आने के कारण कई दूसरे प्रमुख नेता बिदक सकते हैं और जेके गौड़ की उम्मीदवारी से हाथ खींच सकते हैं - और तब कहीं जेके गौड़ का बना/बनाया काम ख़राब न हो जाये । जेके गौड़ के समर्थकों व शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि जेके गौड़ ने बिना किसी नेता के समर्थन के - अपनी सक्रियता और अपने व्यवहार से लोगों के बीच अपनी पैठ बनाई है, तथा दूसरे उम्मीदवारों से आगे बढ़े हैं । उन्हें डर हुआ है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के लिए जेके गौड़ का जो दावा मजबूत हुआ है, वह कहीं मुकेश अरनेजा की टुच्चाई के कारण कमजोर न पड़ जाये ।

अरूण आनंदगिरी के कारण शिवाजी जावरे को जो फजीहत झेलनी पड़ी है, उसका फायदा सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में सुधीर पंडित को मिलता नजर आ रहा है

पुणे। सुधीर पंडित की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत उम्मीदवारी को पुणे की प्रमुख चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्म्स का जिस तरह समर्थन मिलता दिख रहा है, उससे शिवाजी जावरे के लिए अपनी सीट बचाने का संकट पैदा हो गया नजर आ रहा है । शिवाजी जावरे के लिए संकट इसलिए और गंभीर है क्योंकि सुधीर पंडित को जिन फर्म्स का समर्थन मिल रहा है उन्होंने पिछली बार शिवाजी जावरे का समर्थन किया था । शिवाजी जावरे के ही समर्थकों व शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि शिवाजी जावरे को अपनी सीट बचाने के लिए नये समर्थन आधार तलाशने होंगे तथा और ज्यादा मेहनत करना होगी । उल्लेखनीय है कि शिवाजी जावरे का सेंट्रल काउंसिल का कार्यकाल खासा विवादपूर्ण रहा है, जिस कारण लोगों के बीच उनकी साख काफी घटी है । शिवाजी जावरे के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि लोगों के बीच उनकी सिर्फ साख ही नहीं घटी है, बल्कि उनके कई समर्थक व शुभचिंतक तक उनके खिलाफ हो गये हैं । पिछली बार सेंट्रल काउंसिल उम्मीदवार के रूप में उन्हें वोट देते हुए चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को उम्मीद थी कि वह उनके लिए ऐसा कुछ करेंगे जिससे कि उनके लिए काम के और अवसर पैदा हों तथा प्रोफेशन में उन्हें भी आगे बढ़ने का मौका मिले । शिवाजी जावरे लेकिन ऐसा कुछ कर सकने में असफल रहे । उनकी इस असफलता ने उन युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को बहुत निराश किया, जो उनसे खास उम्मीद लगाये बैठे थे । शिवाजी जावरे के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को निराश करने के साथ साथ लोगों के साथ व्यावहारिक संबंध बनाये रखने तक में वह पिछड़ गये । हालत यह हुई कि लोगों के बीच, अपने प्रोफेशन के लोगों के बीच उनके संबंधों का मैनेजमेंट पूरी तरह बिगड़ गये ।
शिवाजी जावरे को इस बिगड़े मैनेजमेंट के कारण ही पुणे में आयोजित वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की डायमंड जुबली कांफ्रेंस में उस समय काफी शर्मिंदगी उठानी पड़ी जब कांफ्रेंस का उद्घाटन करते हुए रीजनल काउंसिल के चेयरपरसन ने उनकी तरफ इशारा करते हुए पुणे के अत्यंत सक्रिय चार्टर्ड एकाउंटेंट अरूण आनंदगिरी के साथ की गई बदतमीजी के लिए सार्वजनिक रूप से भर्त्सना की । शिवाजी जावरे पर आरोप रहा कि उन्होंने अरूण आनंदगिरी को शारीरिक चोट पहुंचवाने का प्रयास किया । अरूण आनंदगिरी ने इस आशय का एक शिकायत पत्र इंस्टीट्यूट को भेजा और शिवाजी जावरे के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की । शिवाजी जावरे की तरफ से अरूण आनंदगिरी पर उक्त शिकायत पत्र को वापस लेने के लिए तरह.तरह से दबाव डाला जा रहा था । शिवाजी जावरे की उपस्थिति में अरूण आनंदगिरी पर हुए हमले को इसी दबाव के तहत देखा/पहचाना जा रहा था । शिवाजी जावरे ने इस संबंध में पूछे जाने पर पत्रकारों के बीच यह तो स्वीकार किया कि उनके खिलाफ की गई शिकायत को लेकर उनके कुछेक समर्थकों ने नाराजगी व्यक्त की थी; लेकिन उन्होंने कहा कि उनकी नाराजगी का निशाना अरूण आनंदगिरी नहीं थे । रीजनल काउंसिल के चेयरपरसन ने अरूण आनंदगिरी पर हुए हमले की भर्त्सना करते हुए पत्रकारों को बताया था कि अरूण आनंदगिरी की शिकायत को लेकर उन्होंने इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष से बात की है और अध्यक्ष ने उन्हें आश्वस्त किया है कि वह तथ्यों को देखेंगे और जल्दी ही उचित कार्रवाई करेंगे । कार्रवाई क्या होनी थी - यह तो सभी को पता था । शिवाजी जावरे इस बात पर तो राहत महसूस कर सकते हैं कि अरूण आनंदगिरी की शिकायत पर इंस्टीट्यूट में उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई, लेकिन अरूण आनंदगिरी ने जो कुछ किया - उसके चलते शिवाजी जावरे की फजीहत बहुत हुई । फजीहत का कारण यह रहा कि तकनीकी आधार पर तो शिवाजी जावरे के खिलाफ मामला नहीं बना; लेकिन शिवाजी जावरे के खिलाफ जो आरोप रहा उसका एक नैतिक पक्ष है, जहां शिवाजी जावरे फँसे दिखते हैं ।
अरूण आनंदगिरी का आरोप था कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य होने के कारण शिवाजी जावरे की कोचिंग संस्था जावरे’ज प्रोफेशनल एकेडमी प्राइवेट लिमिटेड को इंस्टीट्यूट की पुणे ब्रांच से ट्रेनिंग कांट्रेक्ट नहीं मिलना चाहिए था । यह नैतिक आदर्शों के खिलाफ था और यह दर्शाता है कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में शिवाजी जावरे अपने पद का दुरूपयोग कर रहे हैं । शिवाजी जावरे का लेकिन कहना रहा कि उक्त कांट्रेक्ट उन्हें जब मिला था, तब वह इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य नहीं थे । शिवाजी जावरे का कहना बिल्कुल सही है - लेकिन पेंच यह है कि शिवाजी जावरे जब सेंट्रल काउंसिल के सदस्य बन गये, तब उन्होंने उक्त कांट्रेक्ट को छोड़ा क्यों नहीं या पुणे ब्रांच ने उनका कांट्रेक्ट रद्द क्यों नहीं किया ? वह रद्द तब हुआ, जब अरूण आनंदगिरी ने इंस्टीट्यूट में इसकी शिकायत की । इंस्टीट्यूट ने अरूण आनंदगिरी की शिकायत मिलने पर शिवाजी जावरे का कांट्रेक्ट तो रद्द कर दिया, लेकिन शिवाजी जावरे के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की । इस संबंध में इंस्टीट्यूट ने बड़ा मजेदार जबाव दिया । इंस्टीट्यूट के सचिव ने बताया कि इस तरह के मामलों को लेकर चूंकि स्पष्ट नियम नहीं हैं, इसलिए इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती है । मजे की बात यही है कि इंस्टीट्यूट जब यह मान रहा है कि कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती है, तो फिर उसने उक्त कांट्रेक्ट रद्द क्यों कर दिया ? ‘कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती’ का तर्क देने वाले इंस्टीट्यूट ने लेकिन कार्रवाई तो की - आरोप यह है कि उसने अधूरी कार्रवाई की । जाहिर तौर पर इंस्टीट्यूट ने यह तो माना कि ‘अपराध’ हुआ है, लेकिन उसने इस सवाल पर धूल डाल दी कि अपराध किया किसने है ? इंस्टीट्यूट ने शिवाजी जावरे का कांट्रेक्ट रद्द करके यह तो मान ही लिया कि शिवाजी जावरे के पास उक्त कांट्रेक्ट का होना गलत था - लेकिन वह इस गलती के लिए जिम्मेदारी तय नहीं करना चाहता । अरूण आनंदगिरी का कहना यही था कि इंस्टीट्यूट को अधूरा फैसला नहीं करना चाहिए; उसने जब मान लिया है कि शिवाजी जावरे के पास जो कांट्रेक्ट था, वह नहीं होना चाहिए था - इसीलिए उसने शिवाजी जावरे को मिले कांट्रेक्ट को रद्द किया/करवाया; तो फिर इस गलती के लिए वह जिम्मेदारी तय करने से बचने की कोशिश क्यों कर रहा है ? अरूण आनंदगिरी के इस सवाल ने शिवाजी जावरे को इंस्टीट्यूट से क्लीन चिट मिलने के बावजूद आरोपों के घेरे में चूंकि फंसाये रखा, इसलिए शिवाजी जावरे का परेशान होना और भड़कना स्वाभाविक ही था ।
अरूण आनंदगिरी को चुप कराने के लिए शिवाजी जावरे को तब गुंडागर्दी का सहारा लेने का उपाये ही सूझा । उनकी मौजूदगी में कुछेक लोगों ने अरूण आनंदगिरी को धमकाने और शिवाजी जावरे के खिलाफ की गई शिकायत को वापस लेने के लिए दबाव बनाने का काम किया और अरूण आनंदगिरी को शारीरिक चोट पहुंचाने की कोशिश की । इस घटना से शिवाजी जावरे के लिए बात और बिगड़ गई । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के उनके जैसे सदस्य के लिए यह वास्तव में शर्मिंदगी की बात रही कि उनके अपने शहर पुणे में आयोजित हो रही वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की डायमंड जुबली कांफ्रेंस का उद्घाटन करते हुए रीजनल काउंसिल के चेयरपरसन ने उनकी तरफ इशारा करते हुए अरूण आनंदगिरी के साथ की गई बदतमीजी के लिए सार्वजनिक रूप से भर्त्सना की । इस प्रसंग से जो एक बात साबित हुई वह यह कि शिवाजी जावरे को प्रतिकूल स्थितियों से निपटना नहीं आता है, और प्रतिकूल स्थितियों से निपटने की कोशिश में वह अपनी फजीहत और करा लेते हैं । यहाँ यह रेखांकित करना प्रासंगिक होगा कि पिछले चुनाव में अरूण आनंदगिरी ने भी सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की थी, लेकिन चुनावी जीत उनके मुकाबले शिवाजी जावरे को मिली । शिवाजी जावरे लेकिन अपनी जीत का बड़प्पन नहीं बनाये रख सके । इसी का नतीजा यह हुआ है कि अरूण आनंदगिरी से चुनावी मुकाबला जीत जाने वाले शिवाजी जावरे उन्हीं अरूण आनंदगिरी से सामाजिक पहचान और छवि की लड़ाई में ‘पिट’ गये । अरूण आनंदगिरी ने उन्हें पुणे से लेकर दिल्ली तक ऐसा घेरा कि वह उस घेरे से निकलने की कोशिश में - अपने ऐटीट्यूड के चलते - बल्कि फँसते और चले गये । शिवाजी जावरे ने अपने इसी ऐटीट्यूट के कारण अपने कई साथियों को अपने खिलाफ कर लिया है ।
शिवाजी जावरे के लिए समस्या की बात यह हुई है कि उनके खिलाफ हुए उनके साथी सुधीर पंडित के साथ खड़े नजर आ रहे हैं । अरूण आनंदगिरी के कारण शिवाजी जावरे को जो फजीहत झेलनी पड़ी है, उसका फायदा तो सुधीर पंडित को मिलने की उम्मीद बनी ही है; शिवाजी जावरे ने अपने ऐटीट्यूड के कारण अपने जो नये दुश्मन बना लिए हैं उनके सुधीर पंडित के साथ जा खड़े होने के कारण शिवाजी जावरे की मुश्किलें और बढ़ गई हैं । को-ऑपरेटिव क्षेत्र में अपनी संलग्नता के चलते सुधीर पंडित की पुणे में और आसपास के शहरों में काफी सक्रियता रही है । इस क्षेत्र में अग्रणी जनता सहकारी बैंक के डायरेक्टर के रूप में सुधीर पंडित की भूमिका की इस नाते काफी प्रशंसा रही है कि कभी संकट से जूझ रहे इस बैंक को न सिर्फ संकट से उबारने में बल्कि उसे इस क्षेत्र के प्रमुख सहकारी बैंक के रूप में स्थापित करने में उन्होंने न सिर्फ महत्वपूर्ण बल्कि निर्णायक भूमिका निभाई है । जनता सहकारी बैंक के संदर्भ में इस भूमिका के कारण सुधीर पंडित की लोगों के बीच खासी साख है, जो अब इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में उनके काम आ रही है । सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में सुधीर पंडित को अपनी साख का फायदा तो मिलता दिख ही रहा है, साथ ही शिवाजी जावरे के प्रति लोगों के बीच बढ़ी नाराजगी व निराशा के कारण भी उन्हें लोगों के बीच समर्थन मिलता नजर आ रहा है । सुधीर पंडित के लिए चुनौती बस सिर्फ यही है कि वह इस समर्थन को वोट में कैसे बदलें ?

Thursday, November 22, 2012

निहार जम्बूसारिया को रिलायंस कनेक्शन के जाल में घेरने और फँसाने की तरूण घिया की रणनीति ने चुनाव को दिलचस्प बना दिया है

मुंबई। तरूण घिया ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को जीत में बदलने के लिए कंपनी प्रतिनिधियों के खिलाफ जो अभियान छेड़ा/छिड़वाया हुआ है, उसने निहार जम्बुसारिया की उम्मीदवारी के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर दी है। उल्लेखनीय है कि तरूण घिया और उनके समर्थक अलग.अलग तरीकों से लोगों को आगाह कर रहे हैं कि सेंट्रल काउंसिल में उन्हें ऐसे उम्मीदवारों का समर्थन नहीं करना चाहिए जो किन्हीं कंपनियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका तर्क है कि कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले उम्मीदवार सेंट्रल काउंसिल में पहुंच जाते हैं तो वहाँ वह इंस्टीट्यूट के और या प्रोफेशन के हितों का ध्यान नहीं रखते हैं, बल्कि अपनी कंपनी के हितों के अनुसार काम करते हैं। तरूण घिया के इस अभियान के निशाने पर निहार जम्बुसारिया को देखा/पहचाना जा रहा है। तरूण घिया और निहार जम्बुसारिया के बीच कुछ पुरानी खुन्नस की लोगों के बीच पहले से भी चर्चा है। रीजनल काउंसिल में निहार जम्बुसारिया तो चेयरपरसन बनने में कामयाब हो गये थे, लेकिन अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद तरूण घिया वहां चेयरपरसन नहीं बन सके - इस तथ्य ने इन दोनों के बीच की कड़बाहटभरी दूरी को और बढ़ाने का ही काम किया। यह तथ्य दोनों के बीच कड़बाहट का कारण इसलिए बना क्योंकि दोनों का समर्थन आधार एक ही है। सेंट्रल काउंसिल के पिछले चुनाव में बहुत ही मामूली अंतर से आगे पीछे रहते हुए दोनों ही चुने जाने से रह गये थे; और अपनी अपनी हार के लिए दोनों ने एक दूसरे को ही जिम्मेदार ठहराया था। इस बार भी, दोनों के ही सिर पर यह डर सवार है कि दूसरा उसके समर्थक तो नहीं तोड़ रहा है क्या ?
पिछले चुनाव के बाद, निहार जम्बुसारिया ने रिलायंस समूह ज्वाइन किया है - जिसके चलते इस बार उनकी उम्मीदवारी को पिछली बार की तुलना में ज्यादा मजबूत माना/समझा जा रहा है। ऐसे में, तरूण घिया के लिए डर यह पैदा हुआ है कि रिलायंस समूह के वोटों के कारण निहार जम्बुसारिया को जो फायदा होगा, उसके मनोवैज्ञानिक असर के चलते तरूण घिया के वोट भी निहार जम्बुसारिया की तरफ आकर्षित होंगे और तब तरूण घिया के सामने अपने वोटों को अपने साथ बनाये रखना भी मुश्किल होगा। समर्थन आधार एक होने के कारण तरूण घिया को यह डर सता रहा है कि रीजनल काउंसिल में उन्हें जिस तरह निहार जम्बुसारिया से पिछड़ना पड़ा - उसी तरह कहीं उन्हें सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में भी निहार जम्बुसारिया से मात न खानी पड़े। तरूण घिया पिछले चुनाव में जीत नहीं पाये थे, लेकिन उन्हें इस बात का  संतोष रहा कि उन्हें निहार जम्बुसारिया से ज्यादा वोट मिले - भले ही यह ज्यादा कोई ‘बहुत ज्यादा’ नहीं थे। पिछली बार का यह ‘संतोष’ कहीं इस बार उनसे न छिन जाये - इसलिए तरूण घिया ने कंपनी का प्रतिनिधित्व करने वाले उम्मीदवार की आड़ में निहार जम्बुसारिया के खिलाफ खुला अभियान छेड़ दिया है। निहार जम्बुसारिया इस अभियान के चलते भारी दबाव में हैं। रिलायंस कनेक्शन के भरोसे उन्हें अपनी जो लड़ाई आसान दिख रही थी, तरूण घिया के अभियान के चलते वह मुश्किल में फंस गई दिख रही है। रिलायंस कनेक्शन के कारण निहार जम्बुसारिया को फायदा होने के दावे को लेकर कई लोगों को हालांकि शक भी था। ऐसे लोगों का कहना रहा है कि जिस रिलायंस कनेक्शन के कारण भावना दोषी को इंस्टीट्यूट के चुनाव से बाहर बैठने के लिए मजबूर होना पड़ा है, वही रिलायंस कनेक्शन निहार जम्बुसारिया के लिए फायदेमंद कैसे हो सकता है ?
उल्लेखनीय है कि भावना दोषी को अपने पति गौतम दोषी के रिलायंस की ‘सेवा’ करने के चक्कर में जेल जाने के कारण मिली बदनामी के चलते ही सेंट्रल काउंसिल की चुनावी राजनीति से बाहर होने के लिए मजबूर होना पड़ा है। यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि गौतम दोषी खुद भी सेंट्रल काउंसिल में दो टर्म सदस्य रह चुके हैं। इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में भावना दोषी ने सफलता की जो सीढि़यां तेजी से चढ़ीं हैं, वह हालांकि उनके व्यक्तित्व की अपनी काबिलियत और उनकी अपनी क्षमताओं भरी सक्रियता का ही नतीजा है, लेकिन गौतम दोषी की पहले से ही बनी प्रतिष्ठापूर्ण पहचान तथा उनके ऑरा का भी फायदा भावना दोषी को मिला ही है। भावना दोषी को गौतम दोषी की प्रतिष्ठापूर्ण पहचान तथा उनके ऑरा का यदि फायदा मिला, तो गौतम दोषी के जेल जाने से मिली बदनामी का नुकसान भी उठाना पड़ा। भावना दोषी के साथ जो हुआ, वह तो गौतम दोषी की कारस्तानी के चलते हुआ; लेकिन गौतम दोषी के साथ जो हुआ, वह इस बात का सुबूत है कि ‘व्यवस्था’ कैसे किसी अच्छे भले व्यक्ति को इस्तेमाल करती है। गौतम दोषी एक निहायत भले और सरल व्यक्ति के रूप में लोगों के बीच पहचाने जाते थे। गौतम दोषी से एक बार मिल लेने वाला व्यक्ति भी उनकी सरलता और सज्जनता का कायल हो जाता था; उनकी विद्धता से तो वह लोग भी परिचित हैं जो उन्हें व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते हैं। चार्टर्ड एकाउंटेंट प्रोफेशन से संबद्ध शायद ही कोई ऐसा विषय हो, जिस पर गौतम दोषी की एक्सपर्टीज न हो। कंपनियों के विलय और अधिग्रहण जैसे मामलों में तो गौतम दोषी की जो एक्सपर्टीज रही है, उसके चलते वह देश के नामी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स में गिने और पहचाने जाने लगे थे। गौतम दोषी को जानने वाले लोग जानते हैं कि गौतम दोषी ने अपनी काबिलियत से नाम और दाम दोनों कमाये हैं, और इतने कमाये हैं कि उसके बाद उनके मन में कोई लालच या कोई स्वार्थ बचा नहीं हो सकता। प्रोफेशन में गौतम दोषी की जो धाक और पहचान थी, उनकी जो संलग्नता थी, प्रोफेशन के प्रति उनका जो कमिटमेंट ‘दिखता’ था, उसे जानने/पहचानने वाले लोगों को हैरानी थी कि रिलायंस से उन्हें आखिर ऐसा क्या मिला कि वह प्रोफेशन से ही ‘किनारा’ कर बैठे।
उस समय तो किसी को भी यह पहेली समझ नहीं आई थी - जिन्होंने समझने का दावा भी किया था, उनका भी सिर्फ यही कहना था कि गौतम दोषी पैसा और पोजीशन के चक्कर में ही अनिल अंबानी ग्रुप में गये थे; लेकिन जो लोग उन्हें जानते थे, वह इस बात पर इसलिए विश्वास नहीं करते थे क्योंकि उन्हें पता था कि पैसा और पोजीशन का संकट तो गौतम दोषी के साथ था ही नहीं - संकट इसलिए भी नहीं था क्योंकि गौतम दोषी असंतोषी, लालची और स्वार्थी किस्म के व्यक्ति के रूप में ‘दिखते’ ही नहीं थे। जो व्यक्ति असंतोषी नहीं हैं, लालची नहीं है, स्वार्थी नहीं है, अपने प्रोफेशन के प्रति पूरी तरह समर्पित है, प्रोफेशन को दशा और दिशा देने वाली संस्था (इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स) और संस्था की कार्यप्रणाली को सुनिश्चित करने वाली टीम (सेंट्रल काउंसिल) के साथ गहरे से जुड़ा है - वह एक दिन अचानक प्रोफेशन को छोड़ कर एक ऐसे कार्पोरेट समूह का हिस्सा बन जाता है जिसकी छवि बहुत पाक.साफ नहीं है: अनिल अंबानी ग्रुप को ज्वाइन करने के गौतम दोषी के फैसले पर - उन्हें जानने वालों के लिए हैरान होने के पूरे कारण मौजूद थे। हैरान होने का कारण यह भी था कि अनिल अंबानी ग्रुप ने गौतम दोषी को आखिर क्या ‘देख’ कर अपने यहां एक बड़ा ओहदा दिया। गौतम दोषी को जानने वाले लोगों को यही लगता था कि अनिल अंबानी ग्रुप में ओहदे पर बैठे लोगों से जिस तरह की ‘सेवाओं’ की उम्मीद की जायेगी, उस तरह की ‘सेवा’ तो गौतम दोषी नहीं दे पायेंगे। उन्हीं जानने वाले लोगों में से बहुतों को अब यह लग रहा है कि वह गौतम दोषी को वास्तव में कितना कम जानते थे, और अनिल अंबानी ने गौतम दोषी को कितना सही पहचाना था।
अनिल अंबानी ग्रुप में गौतम दोषी ‘जो’ करने के लिए गए, ‘जो’ करने के लिए अनिल अंबानी ने उन्हें चुना - और ‘जिसे’ करने के चक्कर में वह जेल के सींखचों के पीछे जा पहुंचे - उसने उनकी साख व प्रतिष्ठा को तो धूल में मिला ही दिया; उनकी पत्नी भावना दोषी की सेंट्रल काउंसिल की राजनीति को भी ग्रहण लगा दिया। भावना दोषी इंस्टीट्यूट की अध्यक्ष पद की प्रबल दावेदार के रूप में देखी जाने लगीं थीं और अगले टर्म में उनके अध्यक्ष चुने जाने की उम्मीदें की जा रही थीं। रिलायंस कनेक्शन ने लेकिन सब चैपट कर दिया। इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति का यह एक ट्रेजिडीभरा पक्ष ही कहा जायेगा कि जिस रिलायंस कनेक्शन ने भावना दोषी की चुनावी राजनीति का बेड़ा गर्क किया, उसी रिलायंस कनेक्शन के भरोसे निहार जम्बुसारिया ने सेंट्रल काउंसिल में अपने प्रवेश करने की उम्मीद पैदा की। निहार जम्बुसारिया जिस रिलायंस कनेक्शन के भरोसे सेंट्रल काउंसिल में प्रवेश पा लेने की उम्मीद लगाये हुए हैं, उसी रिलायंस कनेक्शन को तरूण घिया ने निहार जम्बुसारिया के खिलाफ अपना हथियार बना लिया है। गौतम दोषी और भावना दोषी के साथ जो हुआ, उसने तरूण घिया के हथियार को धारदार बना दिया है। रिलायंस कनेक्शन के जाल में निहार जम्बूसारिया को घेरने और फँसाने की तरूण घिया ने जो रणनीति बनाई है, उसने वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल की चुनावी लड़ाई को खासा दिलचस्प बना दिया है ।

भगवान लाल ने अपनी पहचान और साख के भरोसे सेंट्रल काउंसिल के दूसरे उम्मीदवारों के सामने संकट पैदा किया

नई दिल्ली । भगवान लाल ने सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के समर्थन में जो अभियान संयोजित किया उसके नतीजे ने उन उम्मीदवारों को चिंता में डाल दिया है, जो दिल्ली के लक्ष्मी नगर क्षेत्र के चार्टर्ड अकाउंटेंट्स के समर्थन पर खास तौर से निर्भर हैं । उल्लेखनीय है कि नवीन गुप्ता, दुर्गा दास अग्रवाल, अतुल कुमार गुप्ता, विजय कुमार गुप्ता और पंकज त्यागी आदि अपनी-अपनी उम्मीदवारी की सफलता के लिए लक्ष्मी नगर क्षेत्र के वोटों पर खास तौर पर निर्भर हैं । आरके गौड़ का भी इस क्षेत्र में समर्थन-आधार है, लेकिन उनका समर्थन-आधार ऐसा है जिसे डिस्टर्ब करना थोड़ा मुश्किल है । बाकी उम्मीदवारों को परसेप्शन - धारणा के आधार पर समर्थन मिलना है इसलिए उनका समर्थन-आधार इधर से उधर होता रहता है । नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पूर्व चेयरमैन सुधीर अग्रवाल की तरफ से नवीन गुप्ता के समर्थन में होने वाली मीटिंग के निमंत्रण भले ही गए हों, लेकिन सुधीर अग्रवाल के लिए अपने समर्थकों के वोट नवीन गुप्ता को दिलवा पाना मुश्किल ही होगा । इसका कारण यही है कि सुधीर अग्रवाल के जो नजदीकी हैं, वह भगवान लाल के भी नजदीकी हैं; और वह नवीन गुप्ता की बजाये अपने आप को भगवान लाल के ज्यादा नजदीक पाते हैं । इसका सुबूत नवीन गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने की खातिर उनके पापा द्धारा आयोजित की गई मीटिंग के फ्लॉप होने में देखा/पहचाना जा सकता है ।
उल्लेखनीय है कि नवीन गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए लक्ष्मी नगर क्षेत्र में समर्थन जुटाने के उद्देश्य से एनडी गुप्ता ने जो मीटिंग की, उसके सात हजार से अधिक निमंत्रण पत्र भेजे गए थे, लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार मीटिंग में कुल करीब सौ-सवा सौ लोग ही पहुँचे - और इतनी संख्या भी तब जुटी जब कि निमंत्रण पत्र इसी क्षेत्र के अत्यंत सक्रिय चार्टर्ड अकाउंटेंट और नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पूर्व चेयरमैन सुधीर अग्रवाल की तरफ से भेजे गए थे । इससे ज्यादा लोग तो सुधीर अग्रवाल के स्टडी ग्रुप की मीटिंग में आ जाते हैं । यह कहना तो सही नहीं होगा कि नवीन गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में होने वाली मीटिंग के फ्लॉप होने के पीछे कारण भगवान लाल हैं, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि भगवान लाल एक प्रमुख कारण जरूर हैं । भगवान लाल लक्ष्मी नगर क्षेत्र में पिछले कई वर्षों से चार्टर्ड अकाउंटेंट्स की कोचिंग चला रहे हैं और उनके यहाँ कोचिंग प्राप्त करीब दस हजार बच्चे चार्टर्ड अकाउंटेंट्स बन चुके हैं । इस सबके चलते भगवान लाल की इस क्षेत्र में न केवल अच्छी पहचान है, बल्कि साख भी है । इस क्षेत्र के वोटों पर निर्भर दूसरे उम्मीदवारों के लिए मुसीबत दरअसल इसी कारण से है; क्योंकि इस क्षेत्र में भगवान लाल की पहचान और साख के कारण उनके लिए अपने-अपने समर्थन आधार को बचाए/बनाए रखना मुश्किल हो रहा है ।
भगवान लाल की उम्मीदवारी के कारण दूसरे उम्मीदवारों के लिए अपने-अपने समर्थकों को सक्रिय कर पाना मुश्किल बना हुआ है । उल्लेखनीय है कि लक्ष्मी नगर क्षेत्र में कई कोचिंग संस्थान हैं और वह अलग-अलग उम्मीदवारों के लिए वोट जुटाने के अड्डे या जरिये भी हैं - लेकिन भगवान लाल के उम्मीदवार होने के कारण दूसरे कोचिंग संस्थानों के लिए अपने-अपने उम्मीदवारों के समर्थन में खुल कर कुछ कर पाना मुश्किल बना हुआ है । जो लोग भगवान लाल के समर्थन में नहीं भी हैं, और दूसरों उम्मीदवारों के साथ हैं - उनके लिए भी नैतिक लोक-लाज के कारण दूसरे उम्मीदवारों के साथ खड़े 'दिखने' में मुश्किल हो रही है । भगवान लाल की उम्मीदवारी के कारण दूसरे उम्मीदवारों के सामने पैदा हुआ संकट दरअसल यही है ।
भगवान लाल की उम्मीदवारी ने दूसरे उम्मीदवारों के सामने संकट भले ही पैदा कर दिया हो, लेकिन दूसरे उम्मीदवारों के इस संकट में अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन बनाने का काम करना भगवान लाल के लिए अभी बाकी है । भगवान लाल के नजदीकियों का ही मानना और कहना है कि भगवान लाल ने चुपचाप तरीके से काम करते हुए अपने लिए समर्थन-आधार तो तैयार कर लिया है, लेकिन अपने इस समर्थन-आधार को वोट में ट्रांसफर करने का काम उनके लिए अभी बाकी है । भगवान लाल ने अपनी पहचान और साख के भरोसे जिस तरह से दूसरे उम्मीदवारों के सामने संकट पैदा किया है, उससे लेकिन एक बात साफ हो गई है और वह यह कि उनकी उम्मीदवारी को हल्के में नहीं लिया जा सकता है ।

Wednesday, November 21, 2012

संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की लगातार तारीफ करके अमरजीत चोपड़ा ने उनके समर्थन का दावा करने वाले दूसरे उम्मीदवारों का खेल बिगाड़ दिया है

नई दिल्ली । अमरजीत चोपड़ा के रवैये ने सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता के लिए अपनी अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का प्रयास करने में लगे एमके अग्रवाल, विजय कुमार गुप्ता और संजीव चौधरी को हैरान और परेशान किया हुआ है । इनकी हैरानी और परेशानी का कारण यह है कि अमरजीत चोपड़ा ने सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में समर्थन का 'दिखावा' तो इनसे कर रखा है; लेकिन लोगों के बीच अपने प्रेसीडेंट काल की उपलब्धियों की बात करते हैं तो तारीफ संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की करते हैं । सेंट्रल काउंसिल के मौजूदा सदस्य संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल चूंकि अगली सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता के लिए भी उम्मीदवार हैं इसलिए अमरजीत चोपड़ा द्धारा की जाने वाली उनकी तारीफ उनकी उम्मीदवारी को फायदा पहुँचाती है और अमरजीत चोपड़ा के समर्थन का दावा करने वाले एमके अग्रवाल, विजय गुप्ता और संजीव चौधरी अपने आप को ठगा हुआ पाते हैं । उल्लेखनीय है कि अमरजीत चोपड़ा जब इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट थे तब संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल उनके बड़े नजदीकी सहयोगी थे और अमरजीत चोपड़ा की प्रायः प्रत्येक कार्रवाई में मुख्य भूमिका निभाया करते थे । कुछ लोग सहजता में तो कुछ खुन्नस में कहा भी करते थे कि संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की मदद के बिना तो अमरजीत चोपड़ा कुछ कर ही नहीं सकते हैं । कुछेक लोगों ने अमरजीत चोपड़ा को संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल से दूर करने की बहुत कोशिश भी की, लेकिन अमरजीत चोपड़ा ने किसी भी कोशिश को कामयाब नहीं होने दिया ।
अमरजीत चोपड़ा ने प्रेसीडेंट के पद पर रहते हुए भी और उसके बाद भी प्रेसीडेंट के रूप में प्राप्त की गईं अपनी उपलब्धियों की जब भी बात की, संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल से मिले सहयोग की, हर काम में दिलचस्पी लेने में उनकी तत्परता की और उनकी सक्रिय भूमिका की लगातार तारीफ की । अमरजीत चोपड़ा द्धारा संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की लगातार की जा रही इस तारीफ से लोगों के बीच अनुमान लगाया गया कि सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में अमरजीत चोपड़ा इस बार संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे । लेकिन जब चुनाव का समय आया तो अमरजीत चोपड़ा के समर्थन का दावा करते हुए एमके अग्रवाल को, विजय कुमार गुप्ता को और संजीव चौधरी को सुना गया । मजे की बात यह है कि खुद अमरजीत चोपड़ा ने किसी भी उम्मीदवार के समर्थन की बात नहीं कही है - लेकिन अलग-अलग तरह की परिस्थितियों का 'हवाला' देकर उनके समर्थन का दावा किया जा रहा है । जैसे अमरजीत चोपड़ा ने चूंकि एमके अग्रवाल के एक उपक्रम 'प्रोफेशनल टाइम्स' की टीम का चेयरमैन बनना स्वीकार किया - तो उसका हवाला देकर एमके अग्रवाल ने उनके समर्थन का दावा कर दिया; और विजय कुमार गुप्ता ने अमरजीत चोपड़ा के समर्थन का दावा इसलिए किया हुआ है क्योंकि अमरजीत चोपड़ा के नजदीक समझे जाने वाले मधुसुदन गोयल उनका समर्थन कर रहे हैं । अमरजीत चोपड़ा के कुछेक नजदीकी चूँकि संजीव चौधरी का समर्थन कर रहे हैं तो उसका हवाला देकर संजीव चौधरी उनके समर्थन का दावा करने लगे हैं । इन्हें लगा कि ऐसा करके यह लोगों के बीच गलतफहमी पैदा कर लेंगे और फायदा उठा लेंगे ।
इसका मौका इन्हें अमरजीत चोपड़ा ने ही दिया - क्योंकि उन्होंने यह कभी भी स्पष्ट नहीं किया कि उनका समर्थन किसके साथ है । दरअसल वह किसी को नाराज नहीं करना चाहते और हरेक से फायदा उठाना चाहते हैं । एमके अग्रवाल ने अपने उपक्रम 'प्रोफेशनल टाइम्स' का मुखिया बना कर उन्हें सार्वजानिक रूप से दिखने का मौका दिया है; संजीव चौधरी के जरिये अमरजीत चोपड़ा को बिग फोर में काम लेने का जुगाड़ बैठाना है । अमरजीत चोपड़ा को व्यक्तिगत रूप से जानने वाले कहते/बताते हैं कि अमरजीत चोपड़ा को इस बात का बड़ा मलाल है कि इंस्टीट्यूट का प्रेसीडेंट होने पर जितना पैसा एनडी गुप्ता ने और वेद जैन ने कमाया, उतना पैसा वह नहीं कमा पाए हैं । इसकी भरपाई अब वह बिग फोर की मदद से करना चाहते हैं । अमरजीत चोपड़ा के साथ मुश्किल यह रही कि इंस्टीट्यूट में प्रेसीडेंट के पद पर रहते हुए उन्होंने बातें और फैसले बिग फोर के खिलाफ किये, जिसके चलते बिग फोर ने उन्हें तवज्जो नहीं दी । अमरजीत चोपड़ा लेकिन अब बिग फोर से अपने संबंध सुधारना चाहते हैं और इसीलिये अपने कुछेक लोगों को उन्होंने संजीव चौधरी के साथ लगा दिया है । अमरजीत चोपड़ा ने खुद संजीव चौधरी के लिए कुछ नहीं किया या कहा है - क्योंकि उन्हें डर है कि संजीव चौधरी की जीत के बाद यदि बिग फोर ने उनका अहसान नहीं माना तो वह तो मुफ्त में ही बदनाम होंगे । इसलिए वह खुद कुछ नहीं कह रहे हैं और अपने लोगों के जरिये ही अपने मतलब साधने का जुगाड़ बैठा रहे हैं ।
विजय कुमार गुप्ता के साथ उनका मामला खासा दिलचस्प है । एक समय विजय कुमार गुप्ता उनके बड़े खास हुआ करते थे, लेकिन पिछले चुनाव में विजय कुमार गुप्ता की हार के बाद बात बिगड़ गई । विजय कुमार गुप्ता ने अपनी हार को लेकर कोर्ट-कचहरी करना चाही थी और उम्मीद की थी कि प्रेसीडेंट के रूप में अमरजीत चोपड़ा उनकी मदद करेंगे । हारे हुए विजय कुमार गुप्ता की मदद करने से अमरजीत चोपड़ा ने लेकिन साफ इंकार कर दिया । अमरजीत चोपड़ा के इस रवैये की विजय कुमार गुप्ता को जरा भी उम्मीद नहीं थी । उन्हें तगड़ा झटका लगा और फिर उन्होंने अमरजीत चोपड़ा के खिलाफ मोर्चा ही खोल दिया । विजय कुमार गुप्ता उन दिनों लोगों को अमरजीत चोपड़ा की धोखेबाजियों के किस्से सुनाया करते थे । दूसरे कई लोगों के साथ-साथ अमरजीत चोपड़ा ने पूर्व प्रेसीडेंट सुनील तलति के साथ किस तरह की धोखेबाजी की थी, इसे लोगों ने विजय कुमार गुप्ता के जरिये ही जाना था । अमरजीत चोपड़ा के नजदीकी कुछेक लोगों का तो यहाँ तक कहना था कि विजय कुमार गुप्ता को सबक सिखाने के लिए ही अमरजीत चोपड़ा ने संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल को अपने साथ जोड़ा और आगे बढ़ाया । लेकिन तब मधुसुदन गोयल इस चुनाव में विजय कुमार गुप्ता के साथ क्यों हैं ? मधुसुदन गोयल के नजदीकियों का कहना है कि मधुसुदन गोयल अपने कारण से विजय कुमार गुप्ता की उम्मीदवारी के साथ हैं - न कि अमरजीत चोपड़ा के नजदीकी होने के कारण; और वह लोगों से यह कह/बता भी रहे हैं । यही कारण है कि अमरजीत चोपड़ा के दूसरे नजदीकियों का समर्थन विजय कुमार गुप्ता को दिलवाने का वह कोई भी प्रयत्न नहीं कर रहे हैं । विजय कुमार गुप्ता के साथ होकर मधुसुदन गोयल दरअसल अगली बार सेंट्रल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की 'तैयारी' कर रहे हैं । इस तैयारी में वह विजय कुमार गुप्ता के नजदीकियों के साथ अपनी नजदीकी बनाते हुए तो खूब नजर आ रहे हैं, लेकिन विजय कुमार गुप्ता के लिए कुछ खास करते हुए नहीं दिख रहे हैं । लोगों को यह सफाई देकर वह विजय कुमार गुप्ता का काम और बिगाड़ रहे हैं कि विजय कुमार गुप्ता को उनके समर्थन का मतलब यह नहीं है कि अमरजीत चोपड़ा का समर्थन विजय कुमार गुप्ता को है ।
अमरजीत चोपड़ा का समर्थन फिर किसको है ? यह बड़ा रहस्य है । क्योंकि अमरजीत चोपड़ा ने किसी भी उम्मीदवार का समर्थन करने की घोषणा नहीं की है । उनकी इस चुप्पी या तटस्थता का फायदा उठाने के उद्देश्य से एमके अग्रवाल ने, विजय कुमार गुप्ता ने और संजीव चौधरी ने कुछेक परिस्थितियों का इस्तेमाल करते हुए लोगों के बीच उनके समर्थन का दावा किया हुआ है । उनकी इस दावे को लेकिन अमरजीत चोपड़ा ने जगह-जगह संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की तारीफ कर कर के बेमानी बना दिया है । अमरजीत चोपड़ा के समर्थन का दावा करने वाले इन लोगों से पूछा भी जाता है कि अमरजीत चोपड़ा के समर्थन का दावा तो आप कर रहे हो, लेकिन अमरजीत चोपड़ा तो कभी भी आपका जिक्र नहीं करते - वह तो हमेशा ही संजय वॉयस ऑफ सीए अग्रवाल की तारीफ करते हैं; इसलिए क्या माना जाये कि वह किसका समर्थन करते हैं ?