Thursday, August 11, 2016

लायंस इंटरनेशनल के नियम-कानूनों का उल्लंघन करने व मजाक बनाने वाले छुट्भैय्यों तक के सामने आत्मसमर्पण करते रहे नरेश अग्रवाल, लेकिन क्या अब अपनी जिम्मेदारी समझेंगे और डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय गर्ग को 'पटरी' पर लाने के बारे में सोचेंगे ?

नई दिल्ली । अधिष्ठापन समारोह के नाम पर डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय गर्ग द्धारा करवाए जा रहे दुबई दौरे के महँगे पैकेज का मामला अब नरेश अग्रवाल की 'अदालत' में पहुँच गया है । अपने आप को डिस्ट्रिक्ट का वरिष्ठ लायन बताते हुए शिवशंकर अग्रवाल ने इस संबंध में नरेश अग्रवाल को एक पत्र लिखा है, जिसकी एक प्रति 'रचनात्मक संकल्प' को भी मिली है । अपने पत्र में शिवशंकर अग्रवाल ने विनय गर्ग की कैबिनेट पर ही सवाल उठाते हुए नरेश अग्रवाल से पूछा है कि विनय गर्ग ने जो तीन सौ से अधिक लोगों की कैबिनेट बनाई है, वह क्या लायंस इंटरनेशनल के नियमानुसार है ? शिवशंकर अग्रवाल का कहना है कि विनय गर्ग ने फर्जी तरीके से कैबिनेट के पदों को गढ़ा है, जिन्हें न तो लायंस इंटरनेशनल से कोई मान्यता प्राप्त है और वास्तव में न जिनका कोई काम है - इन्हें सिर्फ पैसे बटोरने के लिए गढ़ा है; और इनसे चार-चार हजार, आठ-आठ हजार और ग्यारह-ग्यारह हजार रुपए तक लिए गए हैं । शिवशंकर अग्रवाल का कहना है कि विनय गर्ग बातें तो ऊँची ऊँची करते हैं और दावा करते हैं कि उन्होंने लायनिज्म के लिए यह किया है-वह किया है-न जाने क्या क्या किया है; आखिर तब फिर उन्हें अपनी कैबिनेट में फर्जी पद गढ़ने और उन पदों की 'कीमतें' बसूलने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी ? नरेश अग्रवाल को लिखे पत्र में शिवशंकर अग्रवाल ने लिखा है कि इसके बाद, विनय गर्ग डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारियों के अधिष्ठापन समारोह को दुबई में करके - और उसे खासा महँगा बना कर - पदाधिकारियों को अधिष्ठापित होने का मौका भी नहीं दे रहे हैं; क्योंकि अधिकतर पदाधिकारी दुबई जाने के विनय गर्ग के पैकेज को महँगा पा कर वहाँ नहीं जा रहे हैं ।
शिवशंकर अग्रवाल ने अनुमान लगाया है कि विनय गर्ग ने दुबई के लिए करीब ढाई सौ लोगों का जो लक्ष्य तय किया है, उसमें आधे से ज्यादा तो 'बेटर हाफ' और बच्चे होंगे । कई ऐसे लायन होंगे, जो कैबिनेट पदाधिकारी नहीं होंगे - यानि ढाई सौ की संख्या में कैबिनेट पदाधिकारी तो मुश्किल से अस्सी से सौ के बीच ही होंगे; जबकि विनय गर्ग ने कैबिनेट में पदाधिकारी तो तीन सौ से ज्यादा बनाए हैं । इससे लगता है कि विनय गर्ग दुबई में कैबिनेट पदाधिकारियों का अधिष्ठापन करने/करवाने नहीं जा रहे हैं, बल्कि तफरीह करने/करवाने जा रहे हैं । इससे लगता है कि विनय गर्ग को इस बात का बिलकुल भी अहसास नहीं है कि लायनिज्म में अधिष्ठापन की क्या महत्ता है; और उन्होंने लायनिज्म को तफरीह करने का एक अड्डा भर समझा हुआ है । शिवशंकर अग्रवाल ने अपने पत्र में कहा है कि विनय गर्ग डिस्ट्रिक्ट गवर्नर तो बन गए हैं, लेकिन लगता है कि उन्हें लायंस इंटरनेशनल के नियम-कानून तथा लायनिज्म की महान परंपरा व उसके आदर्शों के बारे में कोई ज्ञान नहीं है; यदि है, तो उनकी परवाह नहीं है; यदि होती तो वह अधिष्ठापन कार्यक्रम को तफरीह का मौका बना कर इस तरह मजाक का विषय नहीं बना देते । शिवशंकर अग्रवाल ने अपने पत्र में नरेश अग्रवाल से अनुरोध किया है कि वह विनय गर्ग को - तथा उनके जैसे दूसरे अन्य लोगों को भी - लायंस इंटरनेशनल के नियम-कानूनों से परिचित होने के लिए कहें तथा उनका पालन करने के लिए प्रेरित करें ।
शिवशंकर अग्रवाल ने अपने पत्र में नरेश अग्रवाल का ध्यान इस तथ्य की तरफ खींचा है कि वह इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट हैं, और अगले लायन वर्ष में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट होंगे - इसलिए दुनिया भर के लायन सदस्यों व पदाधिकारियों की नजर इस बात पर होगी कि उनके अपने देश और खासकर उनके अपने मल्टीपल ड्रिस्ट्रिक्ट में लायनिज्म के नाम पर हो क्या रहा है; और ऐसे में जब उन्हें अधिष्ठापन कार्यक्रम के नाम पर किए जा रहे विनय गर्ग के तफरीह भरे तमाशे की जानकारी मिलेगी तो यह - नरेश जी, आपके लिए भी फजीहत की बात होगी । इसी आधार पर, शिवशंकर अग्रवाल ने नरेश अग्रवाल से मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध करते हुए माँग की है कि वह विनय गर्ग से कहें कि तफरीह करने/करवाने के लिए वह दुबई जाना तथा लोगों को ले जाना चाहें - तो जरूर जाएँ/ले जाएँ; किंतु अधिष्ठापन कार्यक्रम ऐसी जगह करें, जहाँ कैबिनेट के सभी पदाधिकारी आसानी से पहुँच सकें । उन्होंने नरेश अग्रवाल से कहा है कि वह विनय गर्ग को लायनिज्म में अधिष्ठापन का जो महत्त्व है, उसके बारे में बताएँ और अधिष्ठापन कार्यक्रम को इस तरह से करने के लिए कहें, जिससे कि उक्त महत्त्व को वास्तव में हासिल किया जा सके । शिवशंकर अग्रवाल ने अपने पत्र में लिखा है कि विनय गर्ग को लायंस इंटरनेशनल के नियम-कानूनों से तथा लायनिज्म की महान परंपरा व उसके उच्च आदर्शों से परिचित करवाना जरूरी है, अन्यथा वह इसी तरह से लायनिज्म का मजाक बनाते/बनवाते रहेंगे ।
यह देखना सचमुच दिलचस्प होगा कि शिवशंकर अग्रवाल ने विनय गर्ग के मामले में इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल से जो उम्मीद की है, उस पर नरेश अग्रवाल कोई ध्यान देते भी हैं - या उनकी बातों को हवा में उड़ा देते हैं । उल्लेखनीय है कि नरेश अग्रवाल का अपना ट्रैक रिकॉर्ड कोई बहुत अच्छा नहीं है; वह लायनिज्म का मजाक बनाने वाली हरकतों का अक्सर सहयोग और समर्थन करते हुए देखे गए हैं; इसलिए बहुत उम्मीद नहीं है कि वह विनय गर्ग को लायनिज्म की 'पटरी' पर लाने के लिए सचमुच में कोई प्रयास करेंगे । पिछले दिनों की कई घटनाओं का हवाला देते हुए लोग देखते, मानते और कहते रहे हैं कि तीन-तिकड़म से नरेश अग्रवाल इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की लाइन में तो लग गए हैं; किंतु अपनी लीडरशिप क्वालिटी को दिखाने/जताने का नैतिक बल और हौंसला उनमें नहीं है - जिस कारण लायंस इंटरनेशनल के नियम-कानूनों का उल्लंघन करने व मजाक बनाने वाले छुट्भैय्यों तक के सामने वह आत्मसमर्पण करते नजर आते रहे हैं । हालाँकि कुछेक लोगों को यह भी लगता है, जैसा कि शिवशंकर अग्रवाल ने अपने पत्र में लिखा है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने जा रहे नरेश अग्रवाल को कम से कम अब तो मैच्योरिटी और गंभीरता के साथ अपनी 'जिम्मेदारी' निभानी चाहिए और जानते-बूझते हुए कोई ऐसा काम नहीं होने देना चाहिए - जिससे लायनिज्म का मजाक बनता हो और लायनिज्म की बदनामी होती हो । दरअसल इसीलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि शिवशंकर अग्रवाल द्धारा उठाए गए मुद्दों का इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने जा रहे नरेश अग्रवाल कोई संज्ञान लेते भी हैं, या लायंस इंटरनेशनल के नियम-कानूनों तथा उसके उच्च आदर्शों का मजाक बनता चुपचाप देखते रहते हैं ?

Tuesday, August 9, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में केआर रवींद्रन की खुराफाती सोच के चलते 'चुनावी अपराधी' घोषित हुए दीपक तलवार, सुशील खुराना और विनोद बंसल की चुनावी सक्रियता डिस्ट्रिक्ट के लिए खतरा तो नहीं बनेगी ?

नई दिल्ली । दीपक तलवार, सुशील खुराना और विनोद बंसल ने इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता तथा सीओएल के लिए अपनी अपनी उम्मीदवारी को लेकर जो तैयारियाँ शुरू की हैं, उनमें डिस्ट्रिक्ट के लिए - और खुद इनके लिए भी एक बड़े खतरे को देखा/पहचाना जा रहा है । दरअसल यह तीनों पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड द्धारा 'चुनावी अपराधी' के रूप में 'पकड़े' जा चुके हैं, और इसके लिए इनकी फटकार के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को निर्देशित किया जा चुका है । चुनावी राजनीति में इनकी सक्रियता चूँकि रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों की निगरानी में है, इसलिए उम्मीद की गई थी कि कुछ समय यह तीनों चुनावी राजनीति के पचड़े से दूर रहेंगे । चुनावी राजनीति से दूर रहने की बात तो दूर - यह तीनों तो चुनावी राजनीति में सीधे सीधे कूदने की तैयारी करते देखे/सुने जा रहे हैं । यूँ रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड का जो फैसला है, वह इन तीनों के चुनावी राजनीति में उतरने पर तकनीकी रूप से कोई रोक नहीं लगाता है; लेकिन उस फैसले का एक नैतिक व व्यावहारिक रूप भी है - जिसका पालन करने की इन तीनों से उम्मीद की गई थी - लेकिन जो अब ध्वस्त होती दिख रही है । सामाजिक जीवन में रिकॉर्डेड आरोप का एक नैतिक व व्यावहारिक रूप भी होता है, जिसका पालन भी किया ही जाता है : सामाजिक/राजनीतिक संस्थाएँ आरोपी व्यक्ति के साथ दूरी बनाने और 'दिखाने' का काम करती ही हैं; सुनते हैं कि अपराधी गिरोह भी ऐसे लोगों को गिरोह में रखने से बचते हैं जो पहले से ही पुलिस की निगाह में चढ़े होते हैं । इसी तरह की बातों के चलते उम्मीद की गई थी कि दीपक तलवार, सुशील खुराना और विनोद बंसल चूँकि रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड की निगाह में 'चुनावी अपराधी' के रूप में चढ़े हुए हैं - इसलिए कुछ समय तो यह चुनावी राजनीति के पचड़े से दूर रहेंगे । इनके ऐसा न करने के कारण आशंका यह व्यक्त की जा रही है कि इन्होंने अपने आप को तो खतरे में डाला ही है, साथ ही डिस्ट्रिक्ट को भी मुसीबत में फँसा दिया है । डर है कि इनकी राजनीति के चलते कहीं डिस्ट्रिक्ट 3011 का हाल भी डिस्ट्रिक्ट 3100 जैसा न हो जाए ?
इस डर का बड़ा ठोस आधार यह है कि पिछले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट 3011 के - और खासकर इस डिस्ट्रिक्ट के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के रूप में दीपक तलवार, सुशील खुराना व विनोद बंसल के - मुसीबत में फँसने व आरोपी बनने के लिए जिन केआर रवींद्रन को जिम्मेदार माना गया था, वही केआर रवींद्रन अभी भी निर्णायक हैसियत में हैं; और इस कारण से उक्त फैसले की तलवार डिस्ट्रिक्ट 3011 पर अभी भी लटकी हुई है । उल्लेखनीय है कि सोचा यह गया था कि केआर रवींद्रन के प्रेसीडेंट-काल के पूरा हो जाने पर उनसे छुटकारा मिल जायेगा, और फिर मनमानी करने का अधिकार भी मिल जायेगा । गौर करने वाला तथ्य यह है कि रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड के उक्त फैसले का विरोध करते हुए पिछले रोटरी वर्ष में काउंसिल ऑफ गवर्नर्स ने अपनी अंतिम मीटिंग में एक प्रस्ताव पास किया था; प्रस्ताव पास करते हुए काउंसिल ने यह भी तय किया था कि इस विरोध प्रस्ताव को एक जुलाई के बाद रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय को भेजा जायेगा - क्योंकि तब केआर रवींद्रन की बिदाई हो चुकी होगी । उक्त मीटिंग में इस बात को बाकायदा रेखांकित किया गया कि रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने डिस्ट्रिक्ट 3011 के खिलाफ जो फैसला दिया है, वह चूँकि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन की खुराफाती सोच का नतीजा है - इसलिए उनके प्रेसीडेंट रहते विरोध प्रस्ताव भेजने का कोई फायदा नहीं होगा, इसलिए विरोध प्रस्ताव भेजने के लिए केआर रवींद्रन का कार्यकाल पूरा हो जाने तक इंतजार किया जाए । 30 जून को केआर रवींद्रन का प्रेसीडेंट-काल तो पूरा गया, लेकिन डिस्ट्रिक्ट 3011 तथा इसके आरोपी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के लिए मुसीबत की बात यह रही कि केआर रवींद्रन दक्षिण एशिया में रोटरी के झगड़ों/मामलों को देखने के इंचार्ज बना दिए गए । इस कारण डिस्ट्रिक्ट 3011 तथा उसके आरोपी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के लिए मामला जहाँ का तहाँ ही बना रह गया है, और इसके चलते पिछले रोटरी वर्ष की अंतिम काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में पास हुए विरोध प्रस्ताव को भी रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय भेजने की बजाए धूल खाने के लिए छोड़ दिया गया ।
ऐसी स्थिति में यह और भी जरूरी हो जाता है कि डिस्ट्रिक्ट 3011 की चुनावी राजनीति के चिन्हित 'अपराधी' चुनावी राजनीति के पचड़े से दूर रहें । पिछले रोटरी वर्ष में रोटरी इंटरनेशनल की तरफ से जो कार्रवाई हुई, उसे पर्दे के पीछे हुए किसी बड़े खेल के नतीजे के रूप में देखा/पहचाना गया था - जिसमें डिस्ट्रिक्ट के कई लोगों की अलग-अलग स्तर पर निभाई गई भूमिकाओं को लेकर बहुत सारे कयास और संदेह अभी भी लगातार बने हुए हैं । इन कयासों व संदेहों के कारण डिस्ट्रिक्ट में कई एक लोगों के बीच के संबंध और ज्यादा तनावपूर्ण हुए हैं । इस बात ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के परिदृश्य को और भी ज्यादा बारूदी बना दिया है, जहाँ एक छोटी से चिंगारी भी डिस्ट्रिक्ट के लिए घातक साबित हो सकती है । सोचने की बात है कि जब काउंसिल ऑफ गवर्नर्स के सदस्य ही यह विश्वास करते हैं कि केआर रवींद्रन के होते हुए उन्हें न्याय नहीं मिलेगा और वह अपने ही एक विरोध प्रस्ताव को धूल खाने के लिए छोड़ देते हैं, तब केआर रवींद्रन चुनावी राजनीति करने के लिए 'अपराधी' घोषित किए गए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को खुल्लम-खुल्ला राजनीति करते कैसे देखेंगे और बर्दाश्त करेंगे ? इसीलिए उम्मीद की गई थी कि दीपक तलवार, सुशील खुराना और विनोद बंसल कुछ समय तक तो - कम से कम केआर रवींद्रन के प्रभावी व निर्णायक हैसियत में रहने तक तो - चुनावी झमेलों से दूर रहेंगे; किंतु इन्हें सीओएल व इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता के लिए कमर कसते देख कई लोगों को डिस्ट्रिक्ट के और खुद इनके भी भविष्य के प्रति खतरा पैदा हो रहा नजर आ रहा है ।

Sunday, August 7, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सतीश सिंघल के पूर्ण नियंत्रण में चल रहे नोएडा ब्लड बैंक की कमाई, दिल्ली स्थित रोटरी ब्लड बैंक की कमाई की तुलना में करीब पचास गुणा कम होने का राज आखिर क्या है ?

नोएडा । दिल्ली स्थित रोटरी ब्लड बैंक के मुख्य कर्ता-धर्ता के रूप में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल की उपलब्धियों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी सतीश सिंघल के लिए खासी मुसीबत खड़ी कर दी है - और रोटरी नोएडा ब्लड बैंक के मैनेजिंग ट्रस्टी के रूप में उनकी भूमिका को गंभीर वित्तीय आरोपों के घेरे में ला दिया है । पहले, विनोद बंसल की उपलब्धि पर गौर करते हैं : विनोद बंसल की देखरेख में चल रहे दिल्ली स्थित रोटरी ब्लड बैंक ने पिछले महीने में करीब 2300 यूनिट ब्लड की बिक्री करके करीब 15 लाख रुपए का लाभ दर्ज किया है । अब, सतीश सिंघल की देखरेख में चल रहे रोटरी नोएडा ब्लड बैंक का रिकॉर्ड देखते हैं : सतीश सिंघल ने पिछले दिनों एक मीटिंग में बताया था कि पिछले वर्ष उनके ब्लड बैंक ने करीब 30 हजार यूनिट ब्लड बेचा था, और करीब चार लाख रुपए का लाभ दर्ज किया था । उनके बताए इस आंकड़े को महीने में विभाजित करें, तो हिसाब ढाई हजार यूनिट पर 34/35 हजार रुपए के लाभ का बना । जिन लोगों को दोनों ब्लड बैंक के हिसाब का पता चला, उनके लिए हैरानी की बात यह हुई कि दिल्ली वाला ब्लड बैंक ढाई हजार से भी कम यूनिट बेच कर 15 लाख रुपए के करीब का लाभ कमा लेता है, तो सतीश सिंघल की देखरेख में चलने वाले ब्लड बैंक की कमाई ढाई हजार यूनिट ब्लड बेचने के बाद भी कुल करीब 34/35 हजार रुपए पर ही क्यों ठहर जाती है ? यहाँ नोट करने की बात यह भी है कि दिल्ली वाला ब्लड बैंक बड़ा है, और इसलिए उसके खर्चे भी ज्यादा हैं; ब्लड के विभिन्न कंपोनेंट्स के दाम बिलकुल बराबर हैं - बल्कि एक कंपोनेंट के दाम सतीश सिंघल के ब्लड बैंक में कुछ ज्यादा ही बसूले जाते हैं । इस लिहाज से सतीश सिंघल की देखरेख में चलने वाले रोटरी नोएडा ब्लड बैंक का लाभ तो और भी ज्यादा होना चाहिए । लाभ के इस भीषण अंतर ने ब्लड बैंक के कर्ता-धर्ता के रूप में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सतीश सिंघल की भूमिका को न सिर्फ संदेहास्पद बना दिया है, बल्कि गंभीर वित्तीय आरोपों के घेरे में भी ला दिया है ।
सतीश सिंघल का अपना व्यवहार व रवैया भी उनकी भूमिका के प्रति संदेह व आरोपों को विश्वसनीय बनाने का काम करता है । रोटरी नोएडा ब्लड बैंक के ट्रस्टी अक्सर शिकायत करते सुने गए हैं कि सतीश सिंघल ब्लड बैंक का हिसाब-किताब देने/बताने में हमेशा आनाकानी करते हैं, और पूछे जाने पर नाराजगी दिखाने लगते हैं । सतीश सिंघल अपना पूरा समय ब्लड बैंक में ही बिताते हैं, जिससे लगता है कि उनके पास और कोई कामधंधा नहीं है । सतीश सिंघल के इसी व्यवहार व रवैये से लोगों को यह लगता रहा है कि रोटरी ब्लड बैंक को उन्होंने अपनी कमाई का जरिया बना लिया है । ब्लड बैंक के कुछेक ट्रस्टी यह कहते सुने जाते रहे हैं कि सतीश सिंघल का कामकाज पूरी तरह चौपट हो गया है, और पिछले वर्षों में उन्हें काफी वित्तीय मुसीबतों का सामना करना पड़ा है । अपनी मुसीबतों से पार पाने के लिए वह पंडितों की शरण में भी गए; और किसी पंडित के सुझाव पर ही उन्होंने अपने नाम की स्पेलिंग में एक अतिरिक्त 'टी' और जोड़ा । सतीश को अंग्रेजी में जितने भी तरीके से लिखा जाता है, उसकी स्पेलिंग में एक ही 'टी' आता है; किंतु सतीश सिंघल खुद जब अपना नाम लिखते हैं, तो उसमें दो 'टी' लगाते हैं । अब सतीश सिंघल अपने नाम की स्पेलिंग में 'टी' एक बार की बजाए दो बार लिखें, या दस बार लिखें - किसी को क्या फर्क पड़ना चाहिए ? 
फर्क तो कुछ नहीं पड़ता है, दूसरों को लेकिन अजीब जरूर लगता है - और जब अजीब लगता है, तो फिर सवाल उठते हैं; सवाल उठते हैं, और उचित तरीके से जब उनके जबाव नहीं मिलते हैं तो लोग अपने अपने तरीके से उनके जबाव खोज लेते हैं । इस मामले में भी यही हुआ । यह तो नहीं पता कि सतीश सिंघल ने खुद बताया या लोगों ने अपने प्रयासों से जान लिया कि नाम में दो 'टी' लगाने का सुझाव किसी पंडित ने उन्हें दिया था और आश्वस्त किया था कि ऐसा करने से उनका कामधंधा फिर से चमक उठेगा । उनका कामधंधा फिर से पटरी पर लौटा या नहीं, यह तो सतीश सिंघल को ही पता होगा - लोगों को तो सिर्फ यह पता है कि पिछले कुछेक वर्षों से सतीश सिंघल अपना पूरा कामकाजी समय ब्लड बैंक को देते हैं, और ब्लड बैंक का हिसाब-किताब पूछने पर भड़क जाते हैं ।
सतीश सिंघल के इस व्यवहार और रवैये से लोगों को यह तो लगता रहा है कि सतीश सिंघल ब्लड बैंक में ऐसा कुछ करते हैं, जिसे दूसरों से छिपाकर रखना चाहते हैं । ब्लड बैंक के कुछेक ट्रस्टियों का ही आरोप भी रहा कि सतीश सिंघल ब्लड बैंक को अपने निजी संस्थान के रूप में इस्तेमाल करते हैं, और उसकी कमाई हड़प जाते हैं । सतीश सिंघल हालाँकि कई बार घाटे का रोना रोते हुए भी सुने गए हैं । तमाम तरह की बातों व आरोपों के बावजूद रोटरी नोएडा ब्लड बैंक में सतीश सिंघल का किया-धरा ज्यादा बबाल का कारण नहीं बना । किंतु अब जब दिल्ली स्थित रोटरी ब्लड बैंक के लाभ के तथ्य सामने आ रहे हैं, तो लोगों को हैरानी हो रही है कि सतीश सिंघल नोएडा ब्लड बैंक की आड़ में कर क्या रहे हैं ? कुछेक लोग हालाँकि सतीश सिंघल को संदेह का लाभ देना चाहते हैं - उनका कहना है कि सतीश सिंघल अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद पर होंगे, इसलिए ब्लड बैंक की आड़ में मोटी कमाई करने के आरोपों के चलते उनके साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट की भी बदनामी होगी; इसलिए इस मामले में उनका पक्ष भी सुना जाना चाहिए । ऐसे लोगों का कहना है कि यह ठीक है कि अभी तक सतीश सिंघल हिसाब-किताब माँगने पर भड़क उठते रहे हैं, लेकिन अब दिल्ली के रोटरी ब्लड बैंक के लाभ के आँकड़े आने पर मामला गंभीर हो गया है - और उम्मीद की जानी चाहिए कि सतीश सिंघल भी इस गंभीरता को समझेंगे, तथा भड़कने की बजाए नोएडा ब्लड बैंक के हिसाब-किताब को पारदर्शी बनायेंगे ।
लोगों का कहना है कि नोएडा ब्लड बैंक रोटरी में डिस्ट्रिक्ट 3012 की मुख्य पहचान है : इसकी कमाई पर यदि सचमुच डाका पड़ रहा है, और या सचमुच उचित तरीके से कमाई हो नहीं रही है - तो यह सभी के लिए चिंता की बात होना चाहिए; इसके कर्ता-धर्ता का पद सँभाले बैठे सतीश सिंघल के लिए तो यह और भी ज्यादा चिंता की बात होना चाहिए । उनकी तमाम मेहनत के बाद भी नोएडा ब्लड बैंक में कमाई का वास्तविक आँकड़ा यदि सचमुच वही है, जो वह बता रहे हैं - तो उन्हें खुद भी देखना चाहिए कि उनके जितना यूनिट ब्लड बेच कर दिल्ली वाला ब्लड बैंक उनके मुकाबले पचास गुना लाभ आखिर कैसे कमा पा रहा है ?

Friday, August 5, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू में अधिष्ठापन समारोह के नाम पर होने वाले दुबई दौरे के महँगे पैकेज की आड़ में जेपी सिंह और विनय गर्ग की अपनी अपनी जेबें भरने की कोशिशों ने यशपाल अरोड़ा के लिए मुसीबत खड़ी की

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय गर्ग ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार यशपाल अरोड़ा को दुबई जाने के लिए पचास लोगों को तैयार करने का जिम्मा देकर उन्हें तो खासी मुसीबत में फँसा ही दिया है, साथ ही अपने लिए भी फजीहत का मौका बना लिया है । विनय गर्ग डिस्ट्रिक्ट के अधिकारियों का अधिष्ठापन समारोह दुबई में कर रहे हैं, जिसमें जाने के लिए लोग लेकिन तैयार ही नहीं हो रहे हैं । लोगों का कहना है कि विनय गर्ग ने प्रति व्यक्ति साढ़े 49 हजार रुपए का जो पैकेज दिया है, वह बहुत ही महँगा है - और इसी आधार पर लोग अधिष्ठापन समारोह में जाने के लिए उत्सुक नहीं दिख रहे हैं । लोगों का कहना है कि दुबई का पैकेज आमतौर पर 40 हजार रुपए में मिल जाता है, ऐसे में वह करीब दस हजार रुपए ज्यादा क्यों दें ? विनय गर्ग ने कम से कम ढाई सौ लोगों की बुकिंग का लक्ष्य तय किया है, जिसे पूरा करने के लिए पिछले तीन महीने से प्रयास किया जा रहा है - लेकिन खुद उनके ही अनुसार अभी तक करीब सवा सौ लोगों की ही बुकिंग हो पाई है । पिछले दिनों विनय गर्ग ने रीजन चेयरपरसंस को तीस तीस बुकिंग करवाने का लक्ष्य दिया था, किंतु रीजन चेयरपरसंस ने साफ बता दिया कि लोगों को पैकेज महँगा लग रहा है - इसलिए कोई तैयार नहीं हो रहा है । अधिष्ठापन समारोह का दिन जैसे जैसे नजदीक आ रहा है, विनय गर्ग पर निर्धारित लक्ष्य के ढाई सौ लोगों को जुटाने के लिए दबाव बढ़ता जा रहा है । ऐसे में, विनय गर्ग ने यशपाल अरोड़ा को घेरा है । विनय गर्ग को उम्मीद है कि यशपाल अरोड़ा को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में चूँकि उनका समर्थन चाहिए होगा, इसलिए वह पचास बुकिंग करवाने में अवश्य ही दिलचस्पी लेंगे । यशपाल अरोड़ा की समस्या लेकिन यह है कि करीब दस हजार रुपए महँगे पैकेज के लिए वह लोगों को कैसे तैयार करें ? और यदि वह बुकिंग नहीं करवाते हैं, तो सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उनकी उम्मीदवारी को विनय गर्ग का समर्थन गड़बड़ा सकता है ।
यशपाल अरोड़ा को यह डर इसलिए भी है, क्योंकि डिस्ट्रिक्ट में उन्हें फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इंद्रजीत सिंह के 'आदमी' के रूप में देखा/पहचाना जाता है; और माना जाता है कि इंद्रजीत सिंह ने यशपाल अरोड़ा को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेपी सिंह से अपनी निजी खुन्नस निकालने के उद्देश्य से उम्मीदवार बना/बनवा दिया है । यशपाल अरोड़ा अपनी सक्रियता से लोगों के बीच पैठ बनाने की हालाँकि कोशिश तो बहुत कर रहे हैं, किंतु उनकी स्वीकार्यता को लेकर मामला अभी संदेहास्पद ही बना हुआ है । ले दे कर उन्हें उम्मीद सिर्फ इस बात की है कि उनके प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार रमेश अग्रवाल को जेपी सिंह के 'आदमी' के रूप में देखा/पहचाना जाता है - और डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में जेपी सिंह के 'भाव' आजकल जरा ढीले चल रहे हैं । जेपी सिंह की कमजोरी में अपनी ताकत देखने वाले यशपाल अरोड़ा को हालाँकि अलग अलग मिजाज के तथा अलग अलग खेमों में बंटे जेपी सिंह के विरोधी नेताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाने की चुनौती से अभी निपटना है । जेपी सिंह के विरोधी नेताओं का शक दरअसल इंद्रजीत सिंह के रवैये के कारण हैं - वह देखते हैं कि इंद्रजीत सिंह 'प्राइवेट' में तो तो जेपी सिंह विरोधी तेवर 'दिखाते' हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से उनकी खुशामद में रहते हैं; इसलिए लोगों को लगता है कि इंद्रजीत सिंह पता नहीं कब सचमुच में फिर से 'पूर्ण रूप से' जेपी सिंह के आदमी बन जाएँ ? ऐसे में, लोगों को लगता है कि अब उन्हें यदि जेपी सिंह के ही आदमी को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुनना है, तो रमेश अग्रवाल क्या बुरे हैं ?
यशपाल अरोड़ा के नजदीकियों का कहना है कि यशपाल अरोड़ा इस 'समस्या' को पहचान रहे हैं, और इसीलिए वह जेपी सिंह विरोधी नेताओं का विश्वास और समर्थन जुटाने के प्रयासों में लगे हुए हैं । यशपाल अरोड़ा को यह बात अच्छी तरह से समझ में आ रही है कि इस वर्ष के चुनाव में जेपी सिंह विरोधी नेताओं का राजनीतिक पलड़ा ही भारी रहना है, इसलिए उनका समर्थन जुटा कर ही वह आसानी से सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का चुनाव जीत लेंगे । यशपाल अरोड़ा को जेपी सिंह विरोधी नेताओं का समर्थन जुटाने का रास्ता डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय गर्ग की 'परिक्रमा' से गुजरता हुआ दिखता है, इसलिए वह हरदम विनय गर्ग के नजदीक होने और 'दिखने' का मौका पहचानते और बनाते रहते हैं । इसी बात का फायदा उठाते हुए विनय गर्ग ने यशपाल अरोड़ा पर दुबई की पचास बुकिंग का बोझ डाल दिया है । विनय गर्ग ने यशपाल अरोड़ा के कुछेक नजदीकियों के बीच तर्क भी दिया है कि दुबई में यशपाल अरोड़ा को अपनी उम्मीदवारी के समर्थन में माहौल बनाने के लिए जो खास मौका मिलेगा, तो उस मौके को संभव बनाने के लिए उन्हें कुछ 'काम' तो करना पड़ेगा न ! यशपाल अरोड़ा इस मामले में हालाँकि खुल कर तो कुछ नहीं कह पा रहे हैं, लेकिन अपने कुछेक नजदीकियों से उन्होंने तथा उनके नजदीकियों ने दूसरे कुछेक लोगों के बीच विनय गर्ग के रवैये पर सवाल उठाए हैं - और शिकायती अंदाज़ में कहा है कि विनय गर्ग ने बड़ी संख्या में फ्री टिकट पाने के चक्कर में पैकेज भी महँगा ले लिया है, और बुकिंग के नंबर भी ज्यादा तय कर लिए हैं; और इसका बोझ वह लायन सदस्यों पर डाल रहे हैं ।
टूरिज्म बिजनेस से जो लोग परिचित हैं, उनका स्पष्ट कहना है कि विनय गर्ग ने दुबई का जो पैकेज ऑफर लिया/दिया है, वह वास्तव में बहुत ही महँगा है । क्यों महँगा है - इसे लेकर तरह तरह की बातें हो रही हैं । पहला कारण तो यही बताया जा रहा है कि इस टूर की जिम्मेदारी जेपी सिंह निभा रहे हैं - जो लहरें गिनने के काम में भी पैसे 'बनाने' का हुनर रखने के कारण कुख्यात हैं । लोगों को याद है कि कुछ ही वर्ष पहले जेपी सिंह का शान ट्रेवल्स के साथ बड़ा भारी झगड़ा हुआ था, जिसमें जेपी सिंह ने शान ट्रेवल्स के कर्ता-धर्ताओं को खुली धमकी दी थी कि लायंस का काम नहीं कर पाओगे । लेकिन बाद में फिर दोनों में ठीक सेटिंग हो गई और शान ट्रेवल्स जेपी सिंह की खास पसंद बन गई । लोगों का कहना है कि जेपी सिंह ने शान ट्रेवल्स के साथ कोई पैकेज फिक्स किया है, तो समझ लो कि वह दस प्रतिशत तो महँगा पड़ेगा ही । इसके बाद विनय गर्ग का नंबर आता है : उन्हें पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को, अपने कुछेक नजदीकियों को और अपने परिवार के सदस्यों को ले चलने की 'व्यवस्था' करनी है; और यह व्यवस्था पैकेज को महँगा करके ही हो सकती है । विनय गर्ग पर इससे भी बड़ा आरोप यह लग रहा है कि अधिष्ठापन समारोह के इंतजाम के खर्चे को भी पैकेज में जोड़ लेने के कारण पैकेज और भी ज्यादा महँगा हो गया है । लोगों का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में विनय गर्ग ने जो 25 से 30 लाख रुपए जुटाए हैं, उसमें से उन्हें अधिष्ठापन का खर्च देना चाहिए । आरोप यह लग रहा है कि उस पैसे को बचाने की तिकड़म लगाते हुए विनय गर्ग ने पैकेज को और ज्यादा महँगा बना दिया है । दरअसल उन्हें पता है कि लायन सदस्य रोना रोयेंगे, आपस में फुसफुसा कर एक-दूसरे से शिकायतें करेंगे - लेकिन पैकेज लेंगे; जो कमी रह जायेगी, उसे पूरा करने में यशपाल अरोड़ा जैसे लोग काम आयेंगे । विनय गर्ग के प्रति हमदर्दी रखने वाले लोगों का कहना है कि अधिष्ठापन समारोह के नाम पर होने वाला दुबई दौरा जेपी सिंह और विनय गर्ग की जेबें भरने के काम भले आए - लेकिन इसे लेकर विनय गर्ग अपने गवर्नर-काल के शुरू में ही जिस तरह के आरोपों में फँसे हैं, वह कोई अच्छी बात नहीं है ।

Thursday, August 4, 2016

रोटरी इंटरनेशनल के वर्ष 2018-19 के प्रेसीडेंट चुनाव में राजा साबू और सुदर्शन अग्रवाल के भरोसे सफलता का ख़्वाब देख रहे अशोक महाजन के नोमीनेटिंग कमेटी की मीटिंग होने से पहले ही मुकाबले से बाहर हो जाने के हालात ने कल्याण बनर्जी के सामने राजा साबू के लिए फजीहत का मौका बनाया

मुंबई । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के लिए प्रस्तुत अशोक महाजन की उम्मीदवारी के प्रति सुदर्शन अग्रवाल के रूखे/ठंडे रवैये के चलते नोमीनेटिंग कमेटी की मीटिंग होने के चार दिन पहले ही अशोक महाजन के लिए मौका बिलकुल खत्म सा हो गया है । उल्लेखनीय है कि वर्ष 2018-19 के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट को चुनने के लिए 17 सदस्यीय नोमीनेटिंग कमेटी की मीटिंग आठ अगस्त को हो रही है । नोमीनेटिंग कमेटी में अमेरिका के पाँच जोन के अलावा जापान, थाईलैंड, आस्ट्रेलिया, ताईवान, इटली, जर्मनी, नार्वे, इंग्लैंड, तुर्की, ब्राजील, कनाडा और भारत के एक एक जोन का प्रतिनिधित्व है । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी में भारत के जोन 4 का प्रतिनिधित्व पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुदर्शन अग्रवाल कर रहे हैं । अशोक महाजन ने अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने वास्ते नोमीनेटिंग कमेटी के कई सदस्यों को साधने का जो प्रयास किया, उसमें उन्हें सफलता मिलती तो दिख रही थी - लेकिन जैसे जैसे फैसले का दिन नजदीक आ रहा है, सुदर्शन अग्रवाल के कारण अशोक महाजन को सारा गुड़ गोबर होता हुआ नजर आ रहा है । दरअसल नोमीनेटिंग कमेटी के कई सदस्यों ने अशोक महाजन को बताया है कि जब आपका अपना 'आदमी' ही आपकी वकालत करता हुए नहीं दिख रहा है, तो दूसरे लोग कैसे और क्यों आपकी उम्मीदवारी में दिलचस्पी लेंगे ? इस प्रतिक्रिया ने खेल शुरू होने से पहले ही अशोक महाजन का खेल बिगाड़ दिया है । यहाँ मजे की यह बात नोट करने वाली है कि अशोक महाजन और सुदर्शन अग्रवाल - दोनों ही पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू के 'आदमी' हैं । नोमीनेटिंग कमेटी में सुदर्शन अग्रवाल को रखवाने के लिए लॉबिंग ही इसलिए की गई थी, ताकि वह अशोक महाजन की उम्मीदवारी के पक्ष में माहौल बना सकें; लेकिन जो बातें सुनने को मिल रही हैं - उनसे पता चल रहा है कि खुद कुछ करना तो दूर, सुदर्शन अग्रवाल ने अशोक महाजन की मेहनत पर पानी और फेर दिया है । अशोक महाजन ने राजा साबू से भी कहा कि वह सुदर्शन अग्रवाल को सक्रिय होने के लिए कहें, लेकिन उसका भी कोई असर नहीं हुआ है - हालाँकि यह पता नहीं चला है कि राजा साबू ने सुदर्शन अग्रवाल से कहा नहीं, या सुदर्शन अग्रवाल ने उनकी बात भी नहीं सुनी ।
मजेदार सीन यह देखने में आ रहा है कि राजा साबू और सुदर्शन अग्रवाल की तरफ से अशोक महाजन को मिलने जा रही असफलता के लिए उलटे अशोक महाजन को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है । कहीं कहीं इन्होंने कहा/बताया है कि पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट कल्याण बनर्जी का समर्थन जुटाने में विफल होने के कारण अशोक महाजन का रास्ता पहले ही बंद हो गया था । उल्लेखनीय है कि कल्याण बनर्जी स्पेन के रोटरी डिस्ट्रिक्ट 2210 के जूलियो सोरजस की उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे हैं । एक वही नहीं, रोटरी इंटरनेशनल के तमाम 'चौधरी' जूलियो सोरजस की उम्मीदवारी के पक्ष में हैं । कल्याण बनर्जी चूँकि रोटरी इंटरनेशनल के 'चौधरियों' के साथ हैं - जिनके समर्थन के चलते उन्हें टीआरएफ ट्रस्टी चेयरमैन का पद मिला है - इसलिए वह भी जूलियो सोरजस की उम्मीदवारी के समर्थक बन गए हैं । कल्याण बनर्जी सहित रोटरी इंटरनेशनल के कई प्रमुख चौधरी इस बार जूलियो सोरजस को इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुनवाना चाहते हैं - इसी तथ्य को भाँप कर डिस्ट्रिक्ट 3011 के सुशील गुप्ता ने इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं की । कल्याण बनर्जी से मिले इशारे को समझने में सुशील गुप्ता ने कोई गलती नहीं की, किंतु अशोक महाजन ने राजा साबू और सुदर्शन अग्रवाल पर भरोसा किया - और झटका खा गए ।
मजेदार तथ्य यह है कि अशोक महाजन और जूलियो सोरजस - दोनों ही रोटरी फाउंडेशन (टीआरएफ) में अभी हाल तक साथ साथ ट्रस्टी रहे हैं; और टीआरएफ ट्रस्टी के रूप में दोनों ने ही अपनी अपनी राजनीति की जड़ें मजबूत करने/बनाने की कोशिशें कीं । अशोक महाजन के नजदीकी बताते रहे हैं कि अशोक महाजन ने रोटरी इंटरनेशनल के सेट-अप में अपनी अच्छी स्थिति बनाई है । किंतु उनकी स्थिति की परीक्षा की अब जब घड़ी आई - तब भेद खुला कि उनकी अच्छी स्थिति की जड़ें ज्यादा गहरी और मजबूत नहीं थीं । जूलियो सोरजस उनसे ज्यादा स्मार्ट साबित हुए । आठ अगस्त को नोमीनेटिंग कमेटी क्या फैसला करेगी और जूलियो सोरजस इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुन ही लिए जायेंगे - यह अभी कोई भी दावे के साथ नहीं कह सकता है । नोमीनेटिंग कमेटी के अमेरिकी प्रतिनिधियों के तेवर जूलियो सोरजस के विरोध के संकेत दे रहे हैं; हालाँकि दूसरा कोई उम्मीदवार उनके विरोधी तेवरों का फायदा उठाता हुआ दिख नहीं रहा है - फिर भी चुनाव तो चुनाव ही है, नतीजे का ऊँठ न जाने किस करवट बैठे ? आठ अगस्त को नोमीनेटिंग कमेटी की बैठक में क्या फैसला निकलेगा, यह तो आठ अगस्त को ही पता चलेगा - किंतु राजा साबू और सुदर्शन अग्रवाल के भरोसे इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने का ख़्वाब देख रहे अशोक महाजन के नोमीनेटिंग कमेटी की मीटिंग होने से पहले ही मुकाबले से बाहर हो जाने के हालात ने उनके साथ साथ राजा साबू के लिए भी फजीहत के मौके बना दिए हैं ।

Tuesday, August 2, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग का झंडा अपने पास बनाए रखने के लिए अपनाई गई अरुण मित्तल की 'तरकीब' ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी की बेचारगी को उजागर किया

देहरादून । अरुण मित्तल से डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग का झंडा छीन लेने में असफल रहने के बाद अनीता गुप्ता के सुर फिर कुछ बदले बदले से सुनाई दे रहे हैं, जिस कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी तथा उनके साथी अपने आप को मुसीबत में पा रहे हैं । उल्लेखनीय है कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनीता गुप्ता करीब तीन महीने पहले तक मुकेश गोयल खेमे में थीं, और पिछले लायन वर्ष में हुए चुनाव में शिव कुमार चौधरी के उम्मीदवार को हरवाने तथा शिव कुमार चौधरी के खिलाफ रिकॉर्ड नेगेटिव वोट डलवाने में उन्होंने बहुत ही सक्रिय और प्रभावी भूमिका निभाई थी । चुनाव में बुरी तरह चिथड़ा चिथड़ा हुई अपनी 'दुनिया' को फिर से बसाने की कोशिश करते हुए शिव कुमार चौधरी ने खुशामद करके और पदों का लालच देकर अनीता गुप्ता को अपनी तरफ कर लेने में सफलता हासिल कर ली थी । अनीता गुप्ता को लगा था कि शिव कुमार चौधरी जिस तरह से डिस्ट्रिक्ट में बुरी तरह बदनाम हो गए हैं और बदनामी के चलते अकेले पड़ गए हैं, उसके चलते उन्हें अपनी नेतागिरी दिखाने का भरपूर मौका मिलेगा । उन्हें जिस तरह से किसी न किसी बहाने से शिव कुमार चौधरी के खुशामदभरे फोन आ रहे थे, उससे उन्हें उम्मीद बनी थी कि चौधरी शब्द भले ही शिव कुमार के नाम में लगा हो, डिस्ट्रिक्ट की 'चौधरी' लेकिन वही बनेंगी । इसी उम्मीद में अनीता गुप्ता ने पाला बदलने में देर नहीं की । लेकिन जल्दी ही उन्हें अहसास हो गया कि शिव कुमार चौधरी ने उन्हें एक बार फिर धोखा दिया है, और शिव कुमार चौधरी की खुशामदभरी बातों में आकर उन्होंने बड़ी गलती की । शिव कुमार चौधरी के नजदीकियों के अनुसार, अनीता गुप्ता दरअसल डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग की जिम्मेदारी चाहती थीं, जिसे 'देने' के लिए शिव कुमार चौधरी पहले तैयार भी हो गए थे - लेकिन बाद में फिर वह मुकर गए । शिव कुमार चौधरी की इस 'पलटीबाजी' ने अनीता गुप्ता को बुरी तरह से निराश किया है, और उनकी बातों व उनके रवैये में उनकी इस निराशा को लोगों के बीच तीखे स्वरों में 'सुना' जा रहा है ।
डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग का झंडा लेने की अनीता गुप्ता की कोशिश को फेल करने का काम वास्तव में किया तो पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अरुण मित्तल की 'राजनीति' ने, लेकिन इस मामले को शिव कुमार चौधरी और खुद को चाणक्य समझने वाले उनके एक सलाहकार ने जिस तरह से हैंडल किया - उससे ठीकरा फूटा शिव कुमार चौधरी के सिर । दरअसल, पारिवारिक समस्या में फँसने के कारण अरुण मित्तल पीएसटी स्कूलिंग में अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा सके थे - जिस कारण पीएसटी स्कूलिंग का आयोजन बुरी तरह फ्लॉप हुआ और मजाक बन कर रह गया था । शिव कुमार चौधरी और उनके तथाकथित चाणक्य ने पीएसटी स्कूलिंग को सफल बताने/दिखाने के लिए फर्जीबाड़े तो खूब किए, लेकिन सच्चाई पर पर्दा डाल पाने में वह असफल रहे । इस दोहरी असफलता की खीझ उन्होंने अरुण मित्तल पर उतारी । 'चाणक्य जी' कुछ ज्यादा जोश में आ गए और इसी जोश में उन्होंने अनीता गुप्ता से कह दिया कि डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग की जिम्मेदारी अरुण मित्तल की बजाए उन्हें निभानी चाहिए । इस तरह की बातों से अनीता गुप्ता को लगा कि डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग का झंडा उन्हें मिल जायेगा - और इस तरह डिस्ट्रिक्ट पर छा जाने का अवसर उनके हाथ लगेगा ।
अरुण मित्तल को इसकी भनक लगी, तो उन्होंने अपनी 'राजनीति' खेल दी : उन्होंने मुकेश गोयल के साथ हुई अपनी एक मुलाकात की सूचना खुद से लीक कर दी । यह मुलाकात क्यों हुई थी और इसमें क्या बात हुई - इसका तो किसी को नहीं पता; लेकिन अरुण मित्तल की तरफ से इस मुलाकात का जिस तरह से जिक्र हुआ, उसमें यह संदेश छिपा देखा/सुना गया कि शिव कुमार चौधरी ने यदि उनसे डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग का झंडा वापस ले लिया - तो वह मुकेश गोयल के साथ चले जायेंगे । शिव कुमार चौधरी के नजदीकियों के अनुसार, शिव कुमार चौधरी ने इस संदेश को पढ़ने में कोई गलती नहीं की और अपने 'चाणक्य जी' को साफ साफ बता दिया कि अपनी चाणक्यबाजी अपने पास रखो और इज्जत का बिलकुल फालूदा ही मत बनवाओ । शिव कुमार चौधरी को डर हुआ कि डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग की जिम्मेदारी छिनने पर अरुण मित्तल यदि मुकेश गोयल के साथ चले गए - तो वह एक एक व्यक्ति को जोड़ कर अपनी उजड़ी पड़ी 'दुनिया' को बसाने की जो कोशिश रहे हैं, वह फिर से बिखर जायेगी । नेताओं को अपने साथ जोड़ने तथा बनाए रखने की कवायद उनके लिए वैसे ही मेढकों को तोलने जैसी कार्रवाई हो गई है । उन्होंने बड़ी मुश्किलों से सुशील अग्रवाल को अपने निकट लाने - या 'दिखाने' में सफलता प्राप्त की थी, इसके लिए उन्हें सुशील अग्रवाल की पत्नी अर्चना अग्रवाल को जोन चेयरपरसन बनाना पड़ा - उन्होंने उम्मीद की थी कि इसके बदले में सुशील अग्रवाल वर्ष भर 'दुश्मनों' से उनकी रक्षा करेंगे; लेकिन सुशील अग्रवाल ने पहली डिस्ट्रिक्ट कैबिनेट मीटिंग में ही अनुपस्थित होकर शिव कुमार चौधरी को धोखा दे दिया ।   
शिव कुमार चौधरी के गवर्नर-काल की पहली डिस्ट्रिक्ट कैबिनेट मीटिंग की जैसी जो बुरी गत बनी, जिसमें कैबिनेट के मुश्किल से पंद्रह प्रतिशत पदाधिकारी ही शामिल हुए - उसने शिव कुमार चौधरी के सामने विकट संकट पैदा कर दिया । एक के बाद एक जिस तरह से उनके कार्यक्रम पिटते जा रहे हैं, और वह अपने कार्यक्रमों में लोगों को जोड़ने व शामिल करने में विफल साबित होते जा रहे हैं - उससे सबक लेते हुए शिव कुमार चौधरी ने डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग का झंडा अरुण मित्तल के पास ही बने रहने देने का फैसला किया । सुशील अग्रवाल के असहयोगात्मक रवैये को देखते हुए उन्होंने अरुण मित्तल को दूर कर लेने का खतरा उठाना ठीक नहीं समझा । शिव कुमार चौधरी ने एक बात और समझी कि जोन/रीजन स्कूलिंग की जिम्मेदारी अनीता गुप्ता ठीक से नहीं निभा सकेंगी, और उनके भरोसे जिम्मेदारी छोड़ी तो जोन/रीजन स्कूलिंग का हाल भी पीएसटी स्कूलिंग की तरह बेहाल ही होगा । अरुण मित्तल की यह खूबी तो सभी जानते ही हैं, कि वह जिस जिम्मेदारी को लेते हैं - उसे प्रभावी तरीके से पूरा करते हैं; और फिर स्कूलिंग का उनका खासा अनुभव भी है । अनीता गुप्ता में राजनीतिक जोश चाहें जितना भी हो, लेकिन किसी काम को संयोजित कर सकने का हुनर वह अभी तक नहीं दिखा सकी हैं - इसलिए शिव कुमार चौधरी को उनके भरोसे रिस्क लेना उचित नहीं लगा ।
डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग की जिम्मेदारी न मिलने से अनीता गुप्ता को जोर का झटका लगा । चाणक्य जी की तमाम कोशिशों के बावजूद अनीता गुप्ता को यह जिम्मेदारी नहीं मिली - यह देख/जान कर अनीता गुप्ता को गहरी निराशा हुई है । यह सुन/जान कर तो अनीता गुप्ता का पारा और चढ़ गया है कि डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग का झंडा अपने पास बनाए रखने के लिए अरुण मित्तल ने मुकेश गोयल के साथ चले जाने की 'धमकी' का इस्तेमाल किया है - और उनकी धमकी कामयाब रही । अनीता गुप्ता का कहना है कि शिव कुमार चौधरी यह क्यों समझ रहे हैं कि जो 'काम' अरुण मित्तल कर सकते थे, उसे वह नहीं कर सकती हैं । अनीता गुप्ता के तेवरों ने शिव कुमार चौधरी के लिए मामले को ढाक के तीन पात वाली स्थिति में ला दिया है - वह खुशामद कर/करा कर किसी एक को अपने साथ लाते हैं, तो दूसरा उछल कर अलग हो जाता है; और जो साथ आता भी है, वह मुसीबतों को कम करने की बजाए बढ़ाने का काम ज्यादा करता है ।

Monday, August 1, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ई के वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमाशंकर अग्रवाल को अपमानित करने के कारण इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल की दोहरी पोल खुली और लोगों के बीच उनकी खासी फजीहत हुई

वाराणसी । इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट 321 ई के अधिष्ठापन समारोह में डिस्ट्रिक्ट के एक वरिष्ठ पूर्व गवर्नर रमाशंकर अग्रवाल की जिस तरीके से सार्वजनिक रूप से बेइज्जती की - उससे नरेश अग्रवाल का असली चेहरा लोगों के सामने आया है, जिसे देख कर लोग सचमुच हैरान हैं । अधिष्ठापन समारोह में डिस्ट्रिक्ट के तमाम पदाधिकारियों तथा प्रमुख लोगों के साथ साथ दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारी व अन्य प्रमुख लोग उपस्थित थे - जिनके बीच दिए अपने भाषण में नरेश अग्रवाल ने रमाशंकर अग्रवाल को पूरी निर्लज्जता के साथ अपमानित किया । नरेश अग्रवाल ने न तो इस बात का कोई लिहाज किया कि वह जिस डिस्ट्रिक्ट में मुख्य अतिथि के रूप में आए हैं, रमाशंकर अग्रवाल उस डिस्ट्रिक्ट के एक वरिष्ठ पूर्व गवर्नर हैं - और न रमाशंकर अग्रवाल की उम्र का, उनके वृद्ध होने की उन्होंने कोई परवाह की । नरेश अग्रवाल ने रमाशंकर अग्रवाल का नाम लेकर कहा कि इनके जैसे बूढ़े लोग अब किसी काम के नहीं रह गए हैं और इन्हें तो लायनिज्म से और डिस्ट्रिक्ट से निकाल देना चाहिए । रमाशंकर अग्रवाल का 'अपराध' यह था कि कार्यक्रम शुरू होते समय उन्होंने मंच पर प्रोटोकॉल के हिसाब से पदाधिकारियों को बैठाने की तरफ ध्यान खींचने का प्रयास किया था । उस समय भी नरेश अग्रवाल ने मंच से चिल्लाते हुए रमाशंकर अग्रवाल को चुपचाप बैठने तथा कार्यक्रम को डिस्टर्ब न करने के लिए फटकार लगाई थी । रमाशंकर अग्रवाल भी चुप हो गए थे, और सभी ने मान लिया था कि मामला खत्म हो गया है । इस तरह के 'सीन' किसी भी कार्यक्रम में बन जाते हैं, इसलिए किसी ने भी यह कल्पना नहीं की थी कि नरेश अग्रवाल जब अपना भाषण करने के लिए खड़े होंगे - तो वह रमाशंकर अग्रवाल को और भी अभद्र व अशालीन तरीके से संबोधित करेंगे । रमाशंकर अग्रवाल वर्ष 1993- 94 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर थे । बढ़ती उम्र के कारण होने वाली शारीरिक व्याधियों के चलते उन्हें चलने-फिरने में दिक्कत होती है, लेकिन फिर भी लायनिज्म के प्रति अपने लगाव के कारण वह व्हीलचेयर पर प्रमुख आयजनों में पहुँचते हैं । इस बात को ध्यान में रखते हुए, रमाशंकर अग्रवाल के प्रति प्रकट किए गए नरेश अग्रवाल के बर्ताव के लिए अधिकतर लोगों ने नरेश अग्रवाल को खूब धिक्कारा भी । लोगों के बीच डिस्ट्रिक्ट के बड़े पदाधिकारियों के प्रति भी नाराजगी देखी/सुनी गई, जो रमाशंकर अग्रवाल के अपमान को चुपचाप बैठे देखते रहे और उन्होंने एक बार भी नरेश अग्रवाल को टोकने/रोकने का प्रयास नहीं किया ।
नरेश अग्रवाल का सामने सामने विरोध भले ही किसी न न किया हो, किंतु नरेश अग्रवाल के रवैये पर अधिकतर लोगों ने उनकी थू थू ही की । वाराणसी के कुछेक वरिष्ठ लायन सदस्यों ने याद किया कि नरेश अग्रवाल जब इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उम्मीदवार थे, तब वाराणसी में रमाशंकर अग्रवाल की मदद से ही वह लोगों से मिले थे । कई लोगों का कहना रहा कि रमाशंकर अग्रवाल के प्रति नरेश अग्रवाल का जो व्यवहार रहा, वह उनकी अहसानफरामोशी का सुबूत तो है ही, साथ ही इस बात का भी सुबूत है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की 'गर्मी' नरेश अग्रवाल के दिमाग में जा घुसी है । जो हुआ, उससे नरेश अग्रवाल की दरअसल दोहरी पोल खुली । रमाशंकर अग्रवाल ने जो मुद्दा उठाया था, वह प्रोटोकॉल का एक सामान्य सा मामला था, जिसे नरेश अग्रवाल चाहते तो सेकेंड्स में हल कर सकते थे । रमाशंकर अग्रवाल ने कार्यक्रम शुरू होते समय जब निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रकाश जी अग्रवाल को मंच की बजाए दर्शक दीर्घा में बैठे देखा, तो उन्होंने मंच पर बैठे लोगों का ध्यान खींचते हुए प्रोटोकॉल की बात उठाई और प्रकाश जी अग्रवाल को मंच पर बुलाने/बैठाने की माँग की । उनके अलावा, कार्यक्रम में मौजूद डिस्ट्रिक्ट के तथा दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के कई पदाधिकारियों को भी यह देख कर अचरज हुआ था कि प्रकाश जी अग्रवाल मंच की बजाए दर्शक दीर्घा में क्यों बैठे हैं ? लोगों का कहना रहा कि डिस्ट्रिक्ट के आधिकारिक कार्यक्रमों में निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के ठीक बगल में बैठने का अधिकार लायंस इंटरनेशनल द्वारा निर्धारित प्रोटोकॉल देता है । कई लोगों ने प्रकाश जी अग्रवाल से कहा भी कि वह मंच पर क्यों नहीं बैठते ? प्रकाश जी अग्रवाल का कहना होता कि वह अपने आप मंच पर जाकर तो नहीं बैठ सकते हैं, उन्हें बुलाया जायेगा - तो वह जायेंगे । लोगों के लिए हैरानी की बात यह रही कि मंच पर नरेश अग्रवाल के होते हुए भी प्रोटोकॉल का पालन क्यों नहीं हो रहा है ? रमाशंकर अग्रवाल ने इसी बात की तरफ ध्यान खींचने के लिए दर्शक दीर्घा से सवाल उठाया - लेकिन उनके सवाल पर ध्यान देने व कार्रवाई करने की बजाए नरेश अग्रवाल ने उन्हें बहुत ही बुरी तरह से डपटते हुए चुप करा दिया ।
मजे की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनिल तुल्सियान ने डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह की तैयारी शुरू करते समय प्रकाश जी अग्रवाल के लिए मंच पर जगह सुनिश्चित की थी । इसका सुबूत यह है कि मंच पर बैठने वाले पदाधिकारियों के लिए उन्होंने एक ड्रेसकोड तय किया था, और उसके लिए कोट का कपड़ा पहले से ही उन पदाधिकारियों को उपलब्ध करवा दिया था । यह कपड़ा और ड्रेसकोड का विवरण प्रकाश जी अग्रवाल को भी मिला था । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनिल तुल्सियान से प्राप्त दिशा-निर्देश के अनुसार ही तैयार होकर प्रकाश जी अग्रवाल अधिष्ठापन समारोह में पहुँचे थे, किंतु फिर भी अनिल तुल्सियान ने उन्हें मंच पर जगह देने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई । अनिल तुल्सियान के नजदीकियों का कहना है कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स दीपक वधावन तथा मंगल सोनी की शह पर अनिल तुल्सियान ने प्रकाश जी अग्रवाल को मंच पर जगह न देने का फैसला किया । अनिल तुल्सियान के नजदीकियों के अनुसार, अनिल तुल्सियान दरअसल पहले से ही प्रकाश जी अग्रवाल से कुछ खिंचे खिंचे से थे । हुआ असल में यह कि अनिल तुल्सियान ने अपनी कैबिनेट के सदस्यों से पदों के बदले में मोटी मोटी 'कीमतें' माँगना शुरू किया, तो लोगों ने उनसे सवाल किया कि प्रकाश जी अग्रवाल जब कैबिनेट सदस्यों से बिना पैसा लिए काम कर सकते हैं, तो उन्हें पैसा क्यों चाहिए ? उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में प्रकाश जी अग्रवाल के कामकाज को लोगों से बहुत ही प्रशंसा मिली है, और लोगों को पहली बार इस बात का पता चला कि कैबिनेट सदस्यों से मनमाने पैसे लिए बिना भी डिस्ट्रिक्ट का काम किया जा सकता है - और अच्छे से किया जा सकता है । लोगों के बीच होने वाली इस तरह की बातों से अनिल तुल्सियान ने अपने आपको प्रकाश जी अग्रवाल के सामने बहुत 'छोटा' पाया । अपने आप को 'बड़ा' साबित करने के लिए वह किसी भी तरह से प्रकाश जी अग्रवाल को अपमानित करना चाहते थे ।
ऐसे में उन्हें दीपक वधावन और मंगल सोनी से सुझाव मिला कि वह अधिष्ठापन समारोह में प्रकाश जी अग्रवाल को मंच पर जगह न दें । दीपक वधावन की प्रकाश जी अग्रवाल के साथ पुरानी खुन्नस है : दीपक वधावन के गवर्नर-काल में प्रकाश जी अग्रवाल उम्मीदवार बने थे; डिस्ट्रिक्ट के 'रिवाज' के अनुसार डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के कुछेक खर्चों के लिए उन्होंने दीपक वधावन को मोटी रकम दी थी । किंतु कॉन्फ्रेंस से कुछ ही दिन पहले दीपक वधावन के रवैये से परेशान व निराश होकर उन्होंने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली थी । प्रकाश जी अग्रवाल चूँकि उम्मीदवार के रूप में डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के लिए दी गई अपनी रकम वापस माँग रहे हैं, इसलिए रकम वापस करना तो दूर की बात - दीपक वधावन उनसे खुन्नस और रखने लगे । कई बार लोगों ने उनसे कहा भी कि भई, खुन्नस रखो तो रखो - प्रकाश जी अग्रवाल के पैसे तो वापस कर दो; पर दीपक वधावन पर इसका कोई असर नहीं पड़ा । मंगल सोनी की नाराजगी का कारण बिलकुल नया है । मंगल सोनी अभी पिछले दिनों अपनी हरकतों के चलते वाराणसी की प्रतिष्ठित संस्था - प्रभुनारायण यूनियन क्लब के पद से हटा दिए गए हैं । मंगल सोनी इस बात को पहले से जानते हैं कि उक्त क्लब के प्रमुख लोगों के साथ प्रकाश जी अग्रवाल के अच्छे संबंध हैं - सो, मंगल सोनी इस बात पर खफा हैं कि प्रकाश जी अग्रवाल ने उक्त क्लब में उनका पद बचवाने में कोई दिलचस्पी क्यों नहीं ली ? इन्हीं अलग अलग कारणों से मंगल सोनी, दीपक वधावन व अनिल तुल्सियान ने प्रकाश जी अग्रवाल को डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में मंच न देने का फैसला किया । अनिल तुल्सियान के नजदीकियों के अनुसार, पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर जगदीश गुलाटी ने अनिल तुल्सियान को समझाने की बहुत कोशिश की, कि निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को मंच पर जगह नहीं दोगे - तो यह लायंस इंटरनेशनल के प्रोटोकॉल का तो उल्लंघन होगा ही, साथ ही मल्टीपल में बहुत बदनामी भरा काम भी होगा । लेकिन अनिल तुल्सियान ने जगदीश गुलाटी की भी नहीं सुनी और वह प्रकाश जी अग्रवाल को मंच पर जगह देने के लिए तैयार नहीं हुए ।
प्रकाश जी अग्रवाल को अपमानित करके लोगों की निगाह में प्रकाश जी अग्रवाल से 'बड़ा' बनने/दिखने की कोशिश में अनिल तुल्सियान ने जगदीश गुलाटी को तो धता बता दी, किंतु उन्हें नरेश अग्रवाल की तरफ से डर था - उन्हें लगता था कि नरेश अग्रवाल इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की राह पर हैं, वह कम से कम अपने सामने तो लायंस इंटरनेशनल के प्रोटोकॉल व परंपरा का उल्लंघन नहीं होने देंगे और प्रकाश जी अग्रवाल मंच पर बुलवा ही लेंगे । अनिल तुल्सियान के डर को दूर किया मंगल सोनी ने । मंगल सोनी ने उन्हें आश्वस्त किया कि वह नरेश अग्रवाल की एक ऐसी कमजोरी जानते हैं, कि उसके डर से नरेश अग्रवाल वही करेंगे - जैसे हम चाहेंगे । मंगल सोनी को भरोसा था, किंतु दूसरे लोगों को नहीं था - डिस्ट्रिक्ट के वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमाशंकर अग्रवाल को तो बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी कि नरेश अग्रवाल अपने सामने लायंस इंटरनेशनल के प्रोटोकॉल को तथा लायनिज्म की परंपरा को भंग होने देंगे । इसीलिए उन्होंने नरेश अग्रवाल का ध्यान खींचने का प्रयास किया - किंतु अपने इस प्रयास में उन्हें नरेश अग्रवाल के हाथों जिस तरह अपमानित होना पड़ा, उससे साबित हुआ कि नरेश अग्रवाल सचमुच ही मंगल सोनी व अनिल तुल्सियान के हाथों इस कदर मजबूर हुए कि अपनी हरकत के चलते लोगों की आलोचना का और उनकी थू थू का शिकार बने ।