Wednesday, August 24, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में ऑर्गेन डोनेशन को लेकर चलाई जा रही संजीव वर्मा की गतिविधियाँ और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियम की चुप्पी सवालों के घेरे में

नई दिल्ली । संजीव वर्मा के ट्रस्ट 'रोटरी ऑर्गेन डोनेशन' की संदेहास्पद गतिविधियों के कारण रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ फँसा है । उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट अपने कुछेक सदस्यों व पदाधिकारियों की कारस्तानी के चलते पिछले कुछ समय से आरोपों व विवादों में घिरा हुआ है । संजीव वर्मा की हरकत ने इस घेरे को थोड़ा और कस दिया है । संजीव वर्मा इस वर्ष क्लब के अध्यक्ष हैं - इसलिए उनकी हरकत ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियम की भूमिका को भी लपेटे में ले लिया है । दिल्ली के प्रतिष्ठित अपोलो अस्पताल में अभी पिछले दिनों ही डॉक्टर्स की मिलीभगत से चलने वाले किडनी रैकेट का पर्दाफाश हुआ है, जिसमें कुछेक लोगों की गिरफ्तारी भी हुई है । इस फर्दाफाश ने मानव अंगों की तस्करी के धंधे को चर्चा के केंद्र में ला दिया है । इन परिस्थितियों में, संजीव वर्मा के ट्रस्ट की गंभीर अनियमितताओं ने उनकी भूमिका को प्रश्नाकुल बना दिया है - और चूँकि संजीव वर्मा की तरफ से उन प्रश्नों को अनसुना किया जा रहा है; इसलिए उनकी भूमिका खासी संदेहास्पद हो जाती है । 
संजीव वर्मा 'रोटरी ऑर्गेन डोनेशन' नाम से एक संस्था चलाते हैं, जिसे लोगों के बीच वह ट्रस्ट बताते हैं । इसका एक पैम्फलेट वह अक्सर रोटेरियंस के बीच बाँटते रहते हैं; और इस नाम से उन्होंने एक बेवसाइट भी बनाई हुई है । बेवसाइट में अपना परिचय उन्होंने रोटेरियन के रूप में ही दिया हुआ है और अपने आप को इसके मुख्य व अकेले कर्ता-धर्ता के रूप में दर्शाया है । उनके द्धारा वितरित किए जाने वाले पैम्फलेट में तथा बेवसाइट में उनके क्लब और या उनके डिस्ट्रिक्ट का कहीं कोई नाम नहीं है । अभी तक उपलब्ध नई डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी - सुधीर मंगला के गवर्नर काल की डायरेक्टरी में पृष्ठ 217 पर डिस्ट्रिक्ट में मान्यता प्राप्त ट्रस्ट्स व सोसायटीज की जो सूची प्रकाशित है, उसमें 'रोटरी ऑर्गेन डोनेशन' का नाम नहीं है । इससे यही आभास मिलता है कि यह एक निजी ट्रस्ट है, जो रोटरी के नाम और उसके चिन्ह का नाजायज व गैरकानूनी तरीके से इस्तेमाल कर रहा है ।


डिस्ट्रिक्ट के नियम-कानून के अनुसार, कहीं भी किसी भी काम में रोटरी का नाम तथा उसका चिन्ह इस्तेमाल करने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की अनुमति जरूरी है, और यह अनुमति देने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में प्रस्ताव पास कराना भी जरूरी होता है । रोटरी ऑर्गेन डोनेशन के मामले में लेकिन इस नियम और प्रक्रिया का कोई पालन नहीं हुआ है । संजीव वर्मा रोटरी ऑर्गेन डोनेशन की गतिविधियाँ पिछले दो-तीन वर्ष से चला रहे हैं, और खुले आम चला रहे हैं - डिस्ट्रिक्ट बायलॉज बनाने वाले 'महान' लोगों का ध्यान लेकिन उनकी इस अवैध हरकत पर नहीं गया; और यदि गया भी तो उन्हें संजीव वर्मा की हरकत पर कार्रवाई करने की जरूरत महसूस नहीं हुई ।
ऐसे में सवाल उठता है कि डिस्ट्रिक्ट बायलॉज क्या सिर्फ डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में छापने के लिए बनाए जाते है ? उन्हें बनाने वालों को उन्हें लागू करवाने की जरूरत क्या सचमुच महसूस नहीं होती ? और या संजीव वर्मा के हाथ इतने लंबे हैं कि डिस्ट्रिक्ट बायलॉज लागू करवाने की जिम्मेदारी निभाने वाले लोगों की गर्दन तक पहुँचे हुए हैं, और उन बेचारों की हिम्मत ही नहीं हो पाई उन्हें रोकने की ?
रोटरी का नाम और चिन्ह इस्तेमाल करने वाले ट्रस्ट्स व सोसायटीज के लिए कानूनन यह भी जरूरी है कि वह अपनी संस्था का वार्षिक लेखा-जोखा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को दें, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पहले जिसे काउंसिल ऑफ गवर्नर्स के सामने रखे तथा फिर डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में प्रस्तुत करे । रोटरी ऑर्गेन डोनेशन के मामले में लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है । संजीव वर्मा रोटरी ऑर्गेन डोनेशन के सारे लेखा-जोखा को पूरी तरह से छिपाए हुए हैं - और कोई नहीं जानता कि इसके कामकाज को संभव बनाने के लिए वह कहाँ कहाँ से कितना पैसा इकट्ठा करते हैं, और उसे कैसे कैसे कहाँ कहाँ खर्च करते हैं ? रोटरी ऑर्गेन डोनेशन से संबंधित जितने रिकॉर्ड उपलब्ध हैं, उन पर तो एक अकेले संजीव वर्मा का ही नाम है; लेकिन इसका काम करने में कई मौकों पर रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट के वरिष्ठ सदस्य अजीत जालान को उनके साथ देखा गया है - जिन पर रोटरी के नाम पर कई तरह की घपलेबाजियों में संलग्न रहने का आरोप है । रोटरी ऑर्गेन डोनेशन के काम में संजीव वर्मा के साथ अजीत जालान की संलग्नता ने रोटरी ऑर्गेन डोनेशन की गतिविधियों को और भी संदेहास्पद बना दिया है । 
संजीव वर्मा इस वर्ष रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट के अध्यक्ष हैं; इसलिए उनकी और भी ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी बनती है कि वह रोटरी के नाम पर जो भी काम करें - उसमें पूरी पारदर्शिता हो, तथा नियमों का पूरी तरह से पालन हो । लोगों का कहना है कि संजीव वर्मा 'रोटरी ऑर्गेन डोनेशन' के नाम पर जो काम कर रहे हैं, वह बहुत अच्छा और बहुत जरूरी काम है; समस्या की बात किंतु यह है कि उनका काम जितना है, 'शोर' उसकी तुलना में उसका कई गुना है; और हिसाब-किताब छिपा हुआ है, काम करने के तरीकों में नियमों का उल्लंघन है; और हिसाब-किताब के मामले में पहले से ही बदनाम चले आ रहे अजीत जालान का संगसाथ है - जिसके कारण संजीव वर्मा निशाने पर आ गए हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में डॉक्टर सुब्रमणियम ने 'रोटरी ऑर्गेन डोनेशन' के मनमाने तरीके से सक्रिय होने पर जो आँखें बंद की हुई हैं, उससे भी मामला गंभीर हुआ है । यह एक बहुत ही बुरा संयोग है कि डॉक्टर सुब्रमणियम जिस अपोलो अस्पताल से संबद्ध रहे हैं, उस अपोलो अस्पताल का नाम मानव अंगों की तस्करी के संबंध में चर्चा में है; और डॉक्टर सुब्रमणियम अपने एक क्लब अध्यक्ष की संदेहास्पद रूप से चलाई जा रही ऑर्गेन डोनेशन की गतिविधि पर चुप्पी साधे बैठे हैं ।

Tuesday, August 23, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पारस अग्रवाल के 'दल बदल' ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी राजनीति के संदर्भ में मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थकों को तगड़ा झटका दिया

आगरा । पारस अग्रवाल ने 'दल बदल' करके डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के समीकरणों को तो बदलने का काम किया ही है, साथ ही सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए मधु सिंह की उम्मीदवारी के लिए भी मुसीबत खड़ी कर दी है । मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को भी यह समझने का प्रयास करना पड़ रहा है कि पिछले लायन वर्ष में पारस अग्रवाल के समर्थन के बावजूद मधु सिंह को जब करारी हार का सामना करना पड़ा था, तब इस वर्ष पारस अग्रवाल के विरोध के चलते उन्हें जितवा पाना कैसे संभव होगा ? कई लोगों का हालाँकि मानना और कहना है कि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पारस अग्रवाल कोई इतने बड़े नेता नहीं हैं कि उनके समर्थन और विरोध से जीतने/हारने के फैसले होते हों, इसलिए इस बात से चुनावी राजनीति के नतीजे पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि पारस अग्रवाल किसके साथ हैं और किसके खिलाफ । लेकिन कुछेक लोगों का मानना और कहना है कि यह ठीक है कि पारस अग्रवाल - और पारस अग्रवाल ही क्यों, कोई भी - किसी चुनावी लड़ाई में निर्णायक फैक्टर नहीं हो सकते हैं; लेकिन समर्थन और विरोध बनाने में तो हर किसी की भूमिका होती ही है - वह भूमिका चाहें छोटी हो और या बड़ी; और इस लिहाज से पारस अग्रवाल के 'दल बदल' की भी भूमिका होगी ही, जो अभी तो मधु सिंह की उम्मीदवारी के खिलाफ जाती नजर आ रही है । यही कारण है कि पारस अग्रवाल के दल बदल से मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं के बीच निराशा पैदा हुई है, और उन्हें मधु सिंह की उम्मीदवारी पर खतरा मँडराता दिखने लगा है । उनके समर्थक कुछेक नेताओं ने तो इस बात पर भी विचार करना शुरू कर दिया है कि मधु सिंह की बजाए वह सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए किसी और को उम्मीदवार बनाएँ, तो डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में उन्हें कामयाबी मिल सकती है क्या ?
मजे की बात यह है कि पारस अग्रवाल को दल बदलने के लिए मजबूर करने का आरोप मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल पर ही लगाया जा रहा है । पारस अग्रवाल के नजदीकियों का कहना है कि मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं के इशारे पर काम कर रहे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल ने कई फैसलों और मीटिंग्स आदि में पारस अग्रवाल को शामिल ही नहीं किया और उन्हें अलग-थलग करने/रखने की कोशिशें कीं, जिन्हें देख/जान कर पारस अग्रवाल के पास फिर दल बदल कर दूसरे खेमे में जाने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं रह गया । पारस अग्रवाल के नजदीकियों का कहना है कि सीपी सिंघल और दूसरे नेताओं ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत हुई सुमित गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए पारस अग्रवाल को जिम्मेदार ठहराया तथा पारस अग्रवाल पर जासूसी करने का व धोखेबाजी करने का आरोप लगा कर उन्हें अलग-थलग करने/रखने का रवैया अपनाया । ऐसे में, पारस अग्रवाल दूसरे खेमे में न जाएँ, तो क्या करें ? नजदीकियों का कहना है कि यह ठीक है कि पारस अग्रवाल का सुमित गुप्ता के साथ पुराना परिचय और संबंध है, लेकिन सुमित गुप्ता की उम्मीदवारी की प्रस्तुति से उनका कोई संबंध नहीं है - यह संबंध जोड़ कर मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने दरअसल अपनी कमजोरी को ही जाहिर किया है, और अपनी कमजोरी का ठीकरा पारस अग्रवाल के सिर पर फोड़ दिया है ।
डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने तथा उसे समझने वाले वरिष्ठ लायन सदस्यों का कहना है कि पिछले लायन वर्ष के चुनावी नतीजे ने वास्तव में पारस अग्रवाल को अपनी भूमिका के बारे में सोचने के लिए प्रेरित किया । उल्लेखनीय है कि पिछले लायन वर्ष में मधु सिंह और बीके गुप्ता के बीच चुनाव में पारस अग्रवाल ने मधु सिंह का समर्थन किया था । बीके गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने पारस अग्रवाल को समझाने की बहुत कोशिश भी की थी कि वह खुद चूँकि सभी के समर्थन से निर्विरोध सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुने गए हैं, इसलिए अब उन्हें किसी एक उम्मीदवार के समर्थन में खुल कर सक्रिय नहीं होना/दिखना चाहिए - लेकिन पारस अग्रवाल पर उनकी समझाइस का कोई असर नहीं पड़ा । वह तो जब चुनाव का नतीजा आया, तब पारस अग्रवाल की आँखें खुलीं । मधु सिंह खुद तो सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में बुरी तरह से हारी हीं - उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने की सजा नेगेटिव वोट के रूप में सीपी सिंघल और पारस अग्रवाल को भी मिली ।
इसी से सबक लेकर पारस अग्रवाल ने 'पक्षपाती' भूमिका निभाने से बचने की कोशिशें शुरू कीं । उनकी इन कोशिशों का ही नतीजा था कि मल्टीपल काउंसिल की चंडीगढ़ में हुई कॉन्फ्रेंस में अम्बरीष सरीन की जो फजीहत हुई और जिसके बाद अम्बरीष सरीन व सीपी सिंघल ने इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल के खिलाफ जो मोर्चा खोला - पारस अग्रवाल उससे दूर रहे । सीपी सिंघल तथा उनके समर्थक नेताओं को पारस अग्रवाल का यह रवैया पसंद नहीं आया और उन्होंने पारस अग्रवाल पर धोखेबाजी करने का आरोप तो लगाया ही; साथ ही यह आरोप भी मढ़ दिया कि पारस अग्रवाल 'यहाँ' की खबरें 'वहाँ' पहुँचाते हैं । इसके बाद, लायंस क्लब आगरा आदर्श के सुमित गुप्ता की सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने मधु सिंह के खेमे में पारस अग्रवाल को और भी संदेहास्पद बना दिया । मधु सिंह के खेमे में होने के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट के आयोजनों में तथा डिस्ट्रिक्ट के कार्यक्रमों से संबंधित फैसलों  तक में पारस अग्रवाल को शामिल नहीं किया, जिसकी चर्चा वाट्स ऐप तक में हुई । इस तरह से मधु सिंह के समर्थक नेताओं ने पारस अग्रवाल को पूरी तरह से प्रतिद्धंद्धी खेमे में धकेल दिया है । धकेल तो दिया है, किंतु अब वह पछता भी रहे हैं - उन्हें लग रहा है कि इससे उन्होंने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है ।
मधु सिंह की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों को हालाँकि उम्मीद है कि पारस अग्रवाल अपने पिछले लायन वर्ष के रवैये के कारण 'उस' खेमे के लोगों के बीच भी भरोसा नहीं बना पायेंगे - और तब वह वापस 'यहीं' लौटने के लिए मजबूर होंगे । आगे क्या होगा - यह तो आगे पता चलेगा, अभी लेकिन पारस अग्रवाल के 'दल बदल' ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी राजनीति के संदर्भ में मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थकों को तगड़ा झटका दिया है ।

Saturday, August 20, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में राकेश अग्रवाल के केएस लूथरा के साथ जा मिलने के कारण गुरनाम सिंह की राजनीति को तगड़ा झटका

लखनऊ । वरिष्ठ लायन सदस्य राकेश अग्रवाल ने गुरनाम सिंह का साथ छोड़ कर केएस लूथरा के नजदीक होने का ऐलान क्या किया, गुरनाम सिंह के लिए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवारों का जैसे अकाल पड़ गया है । गुरनाम सिंह के उम्मीदवार का ठप्पा लगवाने के लिए जिन बिश्वनाथ चौधरी तथा सुधाकर रस्तोगी के बीच कुछ दिन पहले तक भयंकर होड़ मची थी, वह दोनों तो चुनावी मैदान से हटने की घोषणा कर ही चुके हैं - तीसरा भी कोई गुरनाम सिंह का उम्मीदवार होने का ठप्पा लगवाने को तैयार नहीं हो रहा है । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में गुरनाम सिंह ने यूँ तो पहले भी झटके खाए हैं, लेकिन अब की बार उन्हें जो झटका मिला है - वह अभूतपूर्व है । केएस लूथरा ने - जब विशाल सिन्हा को हरवाकर शिव कुमार गुप्ता को चुनाव जितवाया था; जब संदीप सहगल को चुनाव जितवाया था; और जब इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी के चुनाव में अनुपम बंसल को हराया था; तब भी गुरनाम सिंह की चुनावी राजनीति को ऐसा झटका नहीं लगा था । राकेश अग्रवाल को अपनी तरफ मिलाकर केएस लूथरा ने लेकिन गुरनाम सिंह की राजनीति की जैसे कमर ही तोड़ दी है । सचमुच, गुरनाम सिंह ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में इतने बुरे दिन कभी नहीं देखे कि उन्हें सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार ही न मिलें ।
उल्लेखनीय है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी के चुनाव में गुरनाम सिंह के उम्मीदवार अनुपम बंसल को केएस लूथरा से जो करारी मात मिली थी, उसके बाद भी डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में गुरनाम सिंह का राजनीतिक जलवा कम नहीं हुआ था । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए बिश्वनाथ चौधरी के रूप में गुरनाम सिंह को एक उम्मीदवार आसानी से मिल गया था । यह गुरनाम सिंह की राजनीति का जलवा ही था कि सुधाकर रस्तोगी ने भी अपनी उम्मीदवारी के लिए उनकी सरपरस्ती पाने के प्रयास शुरू कर दिए थे; और उन्हें विश्वास था कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विशाल सिन्हा के क्लब का सदस्य होने के नाते वह गुरनाम सिंह के हाथों से बिश्वनाथ चौधरी की उम्मीदवारी का झंडा फिंकवा देंगे और गुरनाम सिंह के हाथों में उनकी ही उम्मीदवारी का झंडा रहेगा । लेकिन राकेश अग्रवाल के गुरनाम सिंह का साथ छोड़ कर केएस लूथरा के साथ जा मिलने से सारा नजारा एकदम से ही बदल गया है । दरअसल राकेश अग्रवाल का क्लब एक बड़ा क्लब है, और उसके पंद्रह वोट हैं । किसी भी चुनावी मुकाबले में पंद्रह वोट बहुत मायने रखते हैं । हालाँकि किसी भी चुनाव में पंद्रह वोट एकमुश्त मिलने से भी चुनावी जीत की गारंटी नहीं मिलती है - राकेश अग्रवाल के क्लब के पंद्रह वोट मिलने के बावजूद गुरनाम सिंह के उम्मीदवार कई बार चुनाव हारे ही हैं; लेकिन पंद्रह वोट यदि प्रतिपक्षी खेमे में चले जाएँ, तब तो हार की पक्की गारंटी है । राकेश अग्रवाल ने गुरनाम सिंह का साथ छोड़ कर केएस लूथरा के साथ होने का जो फैसला किया है, उसके कारण हालात लेकिन निर्णायक रूप से बदल गए हैं; और गुरनाम सिंह के उम्मीदवार होने का अर्थ - निश्चित पराजय हो गया है । अब निश्चित पराजय का वरण तो कोई भी नहीं करना चाहेगा । सो, जो बिश्वनाथ चौधरी और सुधाकर रस्तोगी जोरशोर से अपनी अपनी उम्मीदवारी का झंडा गुरनाम सिंह को थमा देने की होड़ में लगे थे, वह तो अपने अपने झंडे लपेट कर चुपचाप बैठ ही गए हैं; अन्य जिसे भी गुरनाम सिंह की तरफ से उम्मीदवार बनने के लिए कहा जा रहा है, वह चुपचाप पतली गली पकड़ ले रहा है ।
बिश्वनाथ चौधरी तथा सुधाकर रस्तोगी की तरफ से उम्मीदवारी वापस होने का कारण स्वास्थ्य ठीक न होना बताया गया है । यह सच है कि इन दोनों को हाल ही के दिनों में स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है; पर उम्मीदवारी से पीछे हटने के संदर्भ में यह आधा सच है । स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलों का यह ईलाज करवा रहे हैं, और जल्दी ही ठीक हो जायेंगे । स्वास्थ्य संबंधी मुश्किलों के बावजूद बिश्वनाथ चौधरी ने चीफ डिस्ट्रिक्ट कैबिनेट सेक्रेटरी का और सुधाकर रस्तोगी ने डिस्ट्रिक्ट कैबिनेट सेक्रेटरी एडमिनिट्रेशन का पद तो नहीं छोड़ा है न ! जाहिर है कि उम्मीदवारी छोड़ने में स्वास्थ्य को कारण बताना सिर्फ बहाना है । इनके ही नजदीकियों का कहना है कि अभी यदि केएस लूथरा इनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने की घोषणा कर दें, तो यह अपनी बीमारी को भूल कर फौरन से उम्मीदवार हो जायेंगे । गुरनाम सिंह और उनके नजदीकी भी इस सच्चाई को समझ/पहचान रहे हैं, और इसीलिए वह बार-बार माफी/आफी माँगते हुए राकेश अग्रवाल को फिर से अपने साथ लाने की जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं - राकेश अग्रवाल अभी तक तो उनकी माफी से पिघलते हुए दिख नहीं रहे हैं ।
राकेश अग्रवाल को गुरनाम सिंह से आखिर ऐसी क्या चोट पड़ी है, जिसके 'घाव' माफी से भी नहीं भर रहे हैं ? राकेश अग्रवाल का कहना है कि उन्हें गुरनाम सिंह और उनके नजदीकियों ने पहले तो एके सिंह की उम्मीदवारी को लेकर धोखे में रखा, और फिर एके सिंह का नाम लेकर लोगों के बीच उन्हें बदनाम करने की कोशिश की । गुरनाम सिंह तथा उनके नजदीकियों ने ही लोगों के बीच उड़ाया कि एके सिंह को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनता देख राकेश अग्रवाल को अच्छा नहीं लगा है । राकेश अग्रवाल का कहना है कि एके सिंह को लायनिज्म से परिचित करवाने का काम उन्होंने किया; एके सिंह को लायनिज्म में और डिस्ट्रिक्ट में सक्रिय व संलग्न करने तथा पहचान दिलाने का काम उन्होंने किया; एके सिंह को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद की तरफ बढ़ने के लिए प्रेरित करने का काम उन्होंने किया; एके सिंह की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के अभियान में वह उस हालत में भी उनके साथ गए, जब एक दुर्घटना का शिकार होने के चलते वह बुरी तरह चोटिल थे और ठीक तरह से कपड़े भी नहीं पहन सकते थे; ऐसे में एके सिंह को कामयाब होता देख उन्हें अच्छा भला क्यों नहीं लगेगा ? राकेश अग्रवाल ईमानदारी से इस बात को भी स्वीकार करते और बताते हैं कि हाँ, एके सिंह के कुछेक फैसलों को लेकर उनकी नाराजगी थी - लेकिन वह नाराजगी इतनी बड़ी नहीं थी कि वह एके सिंह की राह में रोड़ा बनने की कोशिश करते । राकेश अग्रवाल की शिकायत यह है कि गुरनाम सिंह और उनके नजदीकियों ने पहले तो एके सिंह की उम्मीदवारी को समर्थन देने के मामले में उनसे झूठ बोला और बराबर उन्हें अँधेरे में रखा; और फिर डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच उन्हें ही बदनाम करने का काम किया । राकेश अग्रवाल का कहना है कि लायनिज्म में और डिस्ट्रिक्ट में उनका कोई स्वार्थ नहीं है; कौन गवर्नर बन रहा है और उसे कौन बनवा रहा है; कौन जीत रहा है और कौन हार रहा है; उन्हें इस सबसे कोई मतलब नहीं है - वह तो बस आपसी विश्वास और सम्मान के साथ लोगों के साथ रहना चाहते हैं और जो बन पड़े, उसे करते रहना चाहते हैं; गुरनाम सिंह और उनके नजदीकियों ने इसके बावजूद उनके साथ पहले तो धोखा किया, और फिर उन्हें ही बदनाम करने का प्रयास किया । इसके चलते ही उन्होंने बहुत विनम्रता से गुरनाम सिंह को बता दिया कि वह अब आगे उनके साथ नहीं रह पायेंगे ।
मजे की बात यह रही कि गुरनाम सिंह और उनके नजदीकियों ने पहले तो राकेश अग्रवाल की इस 'बाय-बाय' को गंभीरता से नहीं लिया; लेकिन जैसे ही उन्होंने देखा/पाया कि राकेश अग्रवाल के उनका साथ छोड़ कर केएस लूथरा के साथ जा मिलने के बाद डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के बदले समीकरणों के चलते उनके उम्मीदवार 'बीमार' पड़ रहे हैं, और उनसे बचने लगे हैं - तब उनके तोते उड़े । अपने 'तोतों' को बचाने के लिए गुरनाम सिंह तथा उनके नजदीकियों ने राकेश अग्रवाल को मनाने और अपने खेमे में वापस लाने के लिए प्रयास तो तेज किए हैं, लेकिन उनके प्रयासों को अभी तो कामयाबी मिलती नहीं दिख रही है ।

Thursday, August 18, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080, यानि राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर यशपाल दास के मामले में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट जॉन जर्म को एक रोटेरियन का खुला पत्र

श्री जॉन जर्म जी,
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा को लिखा आपका पत्र पढ़ने का मौका मिला, तो यह जानकर वास्तव में अच्छा लगा कि आपने प्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट्स का संज्ञान लिया और अपनी तरफ से पहल करके एक मामले में स्पष्टीकरण दिया । आप शायद पहले इंटरनेशनल प्रेसीडेंट हैं, जिन्होंने अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद प्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट्स का संज्ञान लिया । मुझे लगता है कि यह किया जाना चाहिए, क्योंकि प्रेस रिपोर्ट्स ही हैं - जो हमें आईना दिखाती हैं और हमें सच्चाई के सामने ला खड़ा करती हैं : हो सकता है कि कई प्रेस रिपोर्ट्स बात को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करती हों; हो सकता है कि कई प्रेस रिपोर्ट्स कुछ सच और कुछ झूठ का घालमेल करती हों; यह भी हो सकता है कि कई प्रेस रिपोर्ट्स बिलकुल झूठ बात ही कहती हों - लेकिन फिर भी यह प्रेस रिपोर्ट्स ही हैं, जो हमें सच्चाई की तरफ जाने के लिए प्रेरित करती हैं या मजबूर करती हैं । अन्यथा आप तो जानते ही हैं कि हम रोटेरियंस पीठ पीछे तो एक दूसरे की बुराई करते हैं और सामने पड़ने पर चापलूसी करते हैं । प्रेस के प्रति भी हमारा रवैया धूर्ततापूर्ण व पाखंडभरा है - हम यह प्रयास तो खूब करते हैं कि प्रेस हमारे कामकाज को और हमारी तस्वीरों को अच्छे से छापे; इसके लिए हम प्रेस के लोगों को अपनी मीटिंग्स में बुलाते हैं, उन्हें खिलाते-पिलाते हैं, उन्हें गिफ्ट्स देते हैं; लेकिन प्रेस के जो लोग हमारी गलतियों, हमारी कमजोरियों, हमारी बेईमानियों की बात करते हैं, हमें हमारी असलियत बताने/दिखाने की कोशिश करते हैं - उन्हें हम अपना दुश्मन मान लेते हैं । हम इस सच्चाई को समझने व स्वीकार करने से बचते/छिपते हैं कि प्रेस का काम हमारी तारीफ करना और या हमारा प्रचार करना नहीं है; प्रेस का काम सच सामने लाने का है - यदि हम कभी पाते हैं कि किन्हीं प्रेस रिपोर्ट्स में सच की बजाए झूठ कहा/लिखा जा रहा है, तो हमें उनसे संवाद करना चाहिए और उन्हें बताना चाहिए कि सच वह नहीं है जो लिखा/छापा जा रहा है, बल्कि सच 'यह' है । पर, लगता है कि हम चाहते ही नहीं हैं कि सच सामने आए -  और इसीलिए हमारी गलतियों, हमारी कमजोरियों व हमारी बेईमानियों की बात करने वाली प्रेस को हम 'दुश्मन' घोषित कर देते हैं और समझ लेते हैं कि ऐसा करके हम सच्चाई पर पर्दा डाल देंगे ।
श्रीमान जॉन जर्म, इसीलिए मुझे यह 'देख' कर अच्छा लगा कि प्रेस में प्रकाशित रिपोर्ट्स का आपने संज्ञान लिया और एक मामले में उसका स्पष्टीकरण दिया ।
श्री जॉन जर्म, अब आपके स्पष्टीकरण पर दो बात करना चाहूँगा । आपका कहना है कि रोटरी इंटरनेशनल की इलेक्शन रिव्यू कमेटी की सदस्यता तथा उसके चेयरमैन पद से हटने का फैसला यशपाल दास का अपना फैसला है; और आपने या अन्य किसी ने उन्हें हटने के लिए नहीं कहा था । यह बताते हुए आपने लेकिन एक बात स्पष्ट नहीं की कि यशपाल दास यदि उक्त कमेटी से खुद नहीं हटते तो क्या वह उक्त कमेटी के सदस्य और चेयरमैन बने रहते ? रोटरी के अपने करीब बीस वर्षों के जीवन में अर्जित किए ज्ञान और समझ के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि रोटरी इंटरनेशनल यशपाल दास को उस कमेटी का सदस्य और चेयरमैन नहीं बने रहने देता, जिस कमेटी को यशपाल दास की मिलीभगत के आरोप लगाने वाली उनके डिस्ट्रिक्ट की चुनावी शिकायत पर विचार और कार्रवाई करना है । मेरा विश्वास है कि रोटरी इंटरनेशनल नैसर्गिक न्याय की इस माँग का पुरजोर समर्थन करता है कि आरोपी को ही जज नहीं बनाया जा सकता है । इस आधार पर यशपाल दास को उक्त कमेटी से हटना ही था । ऐसे में, यदि आपकी बात को सच भी मान लें कि यशपाल दास अपने आप उक्त कमेटी से हटे हैं - तो यह बात उनके 'हाई करैक्टर' को कैसे दर्शाती है ? एक अपराधी अपराध करने के बाद पकड़े जाने से बचने की कोशिश में छिपता/भागता है, लेकिन यह समझ लेने के बाद कि वह ज्यादा दिन तक छिप/भाग नहीं सकेगा और कभी भी पकड़ा जायेगा - वह सरेंडर कर देता है; तो उसका सरेंडर करना उसके 'हाई करैक्टर' का सुबूत कैसे हो सकता है ?
श्री जॉन जर्म, अपने करीब बीस वर्षों के रोटरी जीवन में मैं यह जानने/समझने में सर्वथा असमर्थ रहा हूँ कि इलेक्शन रिव्यू कमेटी और या अन्य कमेटियों के लिए सदस्य व पदाधिकारी चुनने के मापदंड या पैमाने आखिर हैं क्या ? बीस वर्षों में मुझे जो बात समझ में आई वह यह कि इन कमेटियों में सदस्यता और पद फैसला करने वाले बड़े पदाधिकारियों के परिचय के चलते होने वाली सिफारिश, उनकी चापलूसी और तिकड़मों से मिलते हैं । यशपाल दास को भी इनमें से ही किसी कारण से इलेक्शन रिव्यू कमेटी की सदस्यता व चेयरमैन का पद मिला होगा; मैंने सुना है कि इस कमेटी में जगह पाने वाले की रोटरी में राजनीति बहुत चमकती है और उसके सामने पैसे बनाने के मौके भी होते हैं, इसलिए इस कमेटी में जगह पाने के लिए रोटेरियंस के बीच बड़ी मारामारी रहती है । ऐसे में, यह सहज समझा जा सकता है कि इस कमेटी में जगह पाने के लिए यशपाल दास ने पता नहीं किस किस की सिफारिश जुटाई होगी, किस किस की चापलूसी की होगी और न जानें कैसी कैसी तिकड़में की होंगी ? लेकिन उनके अपने ही डिस्ट्रिक्ट के रोटरी क्लब हिमालयन रेंजेस मनसा देवी की तरफ से रोटरी इंटरनेशनल में दर्ज हुई चुनावी शिकायत ने उनकी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया । स्वाभाविक सी बात है कि अपनी मेहनत पर पानी पड़ता देख उन्होंने अपनी मेहनत की 'कमाई' को बचाने की कोशिश की होगी । कोई भी ऐसा करेगा ही । कौन होगा जो अपनी मेहनत को पानी में बहते जाते हुए चुपचाप देखता रहेगा ? हर कोई अपनी तरफ से अपनी मेहनत की 'कमाई' को बचाने की हर संभव कोशिश करेगा ही ।
श्री जॉन जर्म, आप चाहते हैं कि सभी लोग लेकिन आपकी इस बात पर विश्वास कर लें कि यशपाल दास ने अपनी मेहनत की कमाई को बचाने की कोई कोशिश नहीं की; और अपना 'हाई करैक्टर' दिखाते हुए खुशी खुशी अपनी 'कमाई' छोड़ दी । चलिए, आप कहते हैं तो मान लेते हैं; लेकिन कृपया इतना तो बता दीजिए कि अपना 'हाई करैक्टर' दिखाने में यशपाल दास को खासा लंबा समय क्यों लगा और उन्होंने 22 जून को चुनावी शिकायत दर्ज होते ही इलेक्शन रिव्यू कमेटी की सदस्यता व चेयरमैनी क्यों नहीं छोड़ दी थी ? 20 जुलाई तक किसी को यह नहीं पता था कि यशपाल दास उक्त कमेटी के सदस्य और चेयरमैन नहीं हैं । खुद यशपाल दास ने, या आपने या अन्य किसी ने यह जानकारी देने की जरूरत आखिर क्यों नहीं समझी ? 20 जुलाई तक भी रोटरी इंटरनेशनल की बेवसाइट यशपाल दास को ही उक्त कमेटी का चेयरमैन क्यों दिखा रही थी ? संभवतः इसी आधार पर टीके रूबी ने आपको ईमेल लिखा होगा; और जैसा कि आपने अपने पत्र में बताया है कि 20 जुलाई के टीके रूबी के ईमेल का जबाव में आपने उन्हें बताया - और पहली बार यह बात सामने आई कि यशपाल दास उक्त कमेटी छोड़ चुके हैं । यह बात यदि पहले से लोगों को पता होती, तो टीके रूबी को आपको उक्त मेल लिखने की जरूरत ही नहीं पड़ती । दरअसल इन्हीं बातों के चलते लोगों के बीच संदेह है कि आप जितना बता रहे हैं, उससे ज्यादा छिपा रहे हैं - और इस कारण से लोगों के बीच यशपाल दास की और भी ज्यादा फजीहत हो रही है, जिसके लपेटे में आप भी आते जा रहे हैं । यशपाल दास के चक्कर में आप अपनी फजीहत क्यों करवा रहे हैं, यह आप ही बेहतर बता सकते हैं ।
श्री जॉन जर्म, दो बातों लिए मैं आपसे माफी भी माँगना चाहूँगा । पहली बात तो यह कि अपना यह पत्र मैं आपको प्रेस के जरिये भेज रहा हूँ । इसका कारण यह है कि इस पत्र में मैंने जो बातें की हैं, वह कोई मेरे और आपके बीच का मामला तो है नहीं; यह तो रोटेरियंस के बीच का मामला है - इसलिए यह बातें लोगों के बीच आनी चाहिएँ । आप इंटरनेशनल प्रेसीडेंट हैं, आप डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा से कह सकते हैं कि वह लोगों के सामने आपके पत्र में कहीं गईं बातें लाएँ; मेरी तो ऐसी हैसियत है नहीं, लिहाजा मुझे प्रेस की ही मदद लेनी पड़ेगी । दूसरी बात यह है कि मैं अपनी पहचान छिपाते हुए यह पत्र लिख रहा हूँ । आप तो जानते ही हैं कि मेरे डिस्ट्रिक्ट में बड़े पॉवरफुल रोटरी नेता हैं, जो सिर्फ चापलूसों को पसंद करते हैं और वह जिसे पसंद नहीं करते हैं उसका रोटरी कैरियर तबाह कर देते हैं । मुझे अभी रोटरी में और डिस्ट्रिक्ट में रहना है, इसलिए मुझे उनकी चापलूसी ही करनी है और इस पत्र के लेखक के रूप में उनकी नजरों में आने की मेरी हिम्मत नहीं है । उम्मीद है कि आप मेरी मजबूरी समझेंगे ।
रोटरी अभिवादन सहित
आपका
एक रोटेरियन 
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रमन अनेजा को संबोधित जॉन जर्म का पत्र :


Tuesday, August 16, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियम की अकर्मणता और पक्षपाती रवैये से उत्साहित होकर अजीत जालान ने 'पत्थर' फेंका तो अनूप मित्तल की तरफ, किंतु 'घायल' उन्होंने अपनी पत्नी अंजु जालान को कर लिया

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियम के अकर्मणता और या पक्षपाती रवैये के चलते रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट की वित्तीय धांधलियों का मामला डिस्ट्रिक्ट के दो प्रमुख रोटेरियंस - अनूप मित्तल व अजीत जालान के बीच तू तू मैं मैं में तब्दील होता जा रहा है; और इसके चलते यह रोटरी तथा डिस्ट्रिक्ट 3011 के लिए बदनामी भरा सबब बनता जा रहा है । इस मामले में बड़ी खास बात लेकिन यह है कि डॉक्टर सुब्रमणियम को ज्यादा कुछ काम करना भी नहीं है । निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुधीर मंगला मामले से जुड़े सारे तथ्य डॉक्टर सुब्रमणियम को सौंप कर उनसे उचित कार्रवाई करने की सिफारिश कर चुके हैं । हो सकता है कि आरोपों को अपनी जाँच पड़ताल में सही पाते हुए सुधीर मंगला ने क्लब को निलंबित करने की जो सिफारिश की है, डॉक्टर सुब्रमणियम उसे उचित न मानते हों - लेकिन वह इस बात को कहते हुए अपना फैसला तो दें, ताकि मामला निपटने की और बढ़े । डॉक्टर सुब्रमणियम लेकिन मामले पर कुंडली मारे बैठे हैं । किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल हो रहा है कि रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट में की धांधलियों पर कार्रवाई करने की सुधीर मंगला की सिफारिश पर डॉक्टर सुब्रमणियम चुप्पी क्यों बनाए हुए हैं ? सुधीर मंगला ने अपनी कार्रवाई - मामले की पड़ताल करने से लेकर डॉक्टर सुब्रमणियम को की गई सिफारिश तक की कार्रवाई - के दस्तावेज चूँकि रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय को भी भेजे हुए हैं; जिस कारण रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट की घपलेबाजी का मामला खासा गंभीर हो गया है - जिसकी अनदेखी करना डिस्ट्रिक्ट को खासा महँगा पड़ सकता है । लेकिन डॉक्टर सुब्रमणियम का मामले पर कोई ध्यान नहीं है ।
डॉक्टर सुब्रमणियम के इस रवैये पर कुछेक लोगों का कहना है कि वह फैसला लेने की क्षमता ही नहीं रखते हैं; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वह बन जरूर गए हैं, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारी निभा सकने की काबिलियत उनमें नहीं है और इसीलिए वह मामले को लटकाए हुए हैं । अन्य कुछ लोगों को आशंका लेकिन यह है कि डॉक्टर सुब्रमणियम के गवर्नर-काल के अभी तक के खर्चों को लेकर अजीत जालान उन्हें 'ब्लैकमेल' कर रहे हैं, जिस कारण वह सुधीर मंगला की सिफारिश पर कार्रवाई नहीं कर पा रहे हैं; घपलों के सुबूत इतने पुख़्ता हैं कि वह सुधीर मंगला के निष्कर्षों को ख़ारिज भी नहीं कर सकते हैं - इसलिए उन्होंने फैसला न करने वाला रवैया अपना लिया है । समस्या से मुँह चुरा लेने से समस्या हल तो नहीं हो जाती है - बल्कि वह अपने साईड इफेक्ट्स और प्रकट करती है । इस मामले में भी यही हो रहा है । डॉक्टर सुब्रमणियम के चुप्पी साध लेने के बावजूद मामला चूँकि शांत नहीं पड़ा, तो मोर्चा अजीत जालान ने संभाला । अजीत जालान क्लब के प्रमुख सदस्यों में हैं और क्लब में जिन घपलों का आरोप है, उनमें कुछेक में उनकी परोक्ष/अपरोक्ष मिलीभगत के संकेत व सुबूत हैं । अभी तक वह पर्दे के पीछे से मोर्चा सँभाले हुए थे तथा क्लब के खिलाफ हो सकने वाली कार्रवाई को 'रोके' हुए थे; मामले को शांत होता न देख उन्होंने पर्दा हटा दिया और खुल कर सामने आ डटे ।
अजीत जालान ने क्लब की घपलेबाजियों को पर्सनल झगड़े में बदलने का प्रयास करते हुए अनूप मित्तल को निशाना बनाया । डिस्ट्रिक्ट में कई कई पदों पर रहते हुए अनूप मित्तल रोटरी की सेवा करते रहे हैं और कई उल्लेखनीय रिकॉर्ड बनाते रहे हैं । प्रसंगवश एक रिकॉर्ड का यहाँ जिक्र करना मामले को समझने में मदद करेगा : पिछले रोटरी वर्ष में रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट ने रोटरी फाउंडेशन में 1057 अमेरिकी डॉलर दिए थे, जिनमें 1000 अमेरिकी डॉलर अनूप मित्तल के थे । बाकी 57 अमेरिकी डॉलर में रोटरी की बड़ी बड़ी बातें करने वाले अजीत जालान का कितना हिस्सा था, इस रहस्य पर पर्दा पड़ा ही रहे तो ज्यादा अच्छा है । बहरहाल, अजीत जालान ने आरोपों और उनके सुबूतों का सीधा जबाव देने की बजाए अनूप मित्तल को निशाना बनाया । यह सच है कि घपलेबाजियों को सामने लाने का काम अनूप मित्तल ने किया है; किंतु उन्होंने तो हिसाब-किताब को लेकर आरोप लगाए थे; जिनकी जाँच-पड़ताल करने पर निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुधीर मंगला ने आरोपों को सही पाया । इससे जाहिर है कि अनूप मित्तल कोई पर्सनल झगड़ा नहीं कर रहे थे; किंतु अजीत जालान ने उन्हें निशाना बना कर मामले को पर्सनल बनाने का प्रयास किया । अजीत जालान के लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि वह 'चोट' तो अनूप मित्तल को पहुँचाना चाहते थे, लेकिन अपनी इस हरकत से वह 'घायल' अपनी पत्नी को कर बैठे । रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट के घपलेबाजों को बचाने के प्रयासों का साईड इफेक्ट यह हुआ है कि इस मामले में अब अजीत जालान की पत्नी अंजु जालान का नाम भी जुड़ गया है ।
उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट के वर्ष 2014-15 के हिसाब-किताब में गड़बड़ी के गंभीर आरोप हैं, और इस आरोप के लिए अजीत जालान पर उस वर्ष क्लब के ट्रेजरार पद का कामकाज संभाले होने का हवाला देते हुए जिम्मेदारी डाली गई है । अनूप मित्तल को निशाना बनाते हुए लिखे पत्र में अजीत जालान ने दावा किया कि वह कभी भी रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट के ट्रेजरार नहीं रहे हैं । तकनीकी रूप से अजीत जालान का दावा बिलकुल सच है; लेकिन उन्होंने यह दावा एक 'व्यावहारिक सच' को छिपाने की नीयत से किया, और उनकी यही होशियारी मामले में उनकी पत्नी का नाम आ जाने के कारण उन्हें उल्टी पड़ी । वास्तव में वर्ष 2014-15 में क्लब की ट्रेजरार उनकी पत्नी अंजु जालान थीं । क्लब में जो लोग जालान दंपति को जानते हैं, उनका कहना है कि अंजु जालान एक भली सीधी सादी महिला हैं, जिन्हें अपने राजनीतिक व आर्थिक स्वार्थ में 'इस्तेमाल' करते हुए अजीत जालान ने क्लब का ट्रेजरार बनवा दिया था । तकनीकी रूप से क्लब की ट्रेजरार अंजु जालान थीं, लेकिन ट्रेजरार का काम अजीत जालान ही करते थे । वर्ष 2014-15 का क्लब का हिसाब-किताब क्लब के सदस्यों को यदि अभी तक नहीं मिला है, तो इसका कारण यही माना/समझा जा रहा है कि उस वर्ष के हिसाब-किताब में भारी घपलेबाजी है । उस वर्ष अजीत जालान की पत्नी क्लब की ट्रेजरार थीं, तब अजीत जालान घपलेबाजी के आरोप से इस तर्क से भला कैसे बच सकते हैं कि वह कभी क्लब के ट्रेजरार नहीं रहे ? अपने इस दावे के जरिए अजीत जालान क्या यह कहने की कोशिश कर रहे हैं कि वर्ष 2014-15 की घपलेबाजी के लिए मुझे मत पकड़ो, मेरी पत्नी को पकड़ो ? अजीत जालान को शायद इस बात का आभास नहीं रहा होगा कि आरोपों से बचने की उनकी होशियारी उनके साथ-साथ उनकी पत्नी को भी आरोपों के दलदल में घसीट लेगी ।
इस मामले में और गंद फैले, इससे बचने का एक ही उपाय है कि लंबित पड़े इस मामले में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियम तुरंत से फैसला करें - जो ठीक समझें, वह फैसला करें; ताकि मामला निर्णायक दिशा में आगे बढ़े । इस मामले में फैसला करने के डॉक्टर सुब्रमणियम के रवैये को लेकर उनके एक नजदीकी ने एक कहानी 'बनाई' है, जिसका 'संदेश' खासा दिलचस्प और प्रासंगिक है । कहानी के अनुसार, अनूप मित्तल एक शाम डॉक्टर सुब्रमणियम से मिले और उन्हें रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट के घपलों के बारे में विस्तार से बताया और उचित करवाई करने की माँग की । डॉक्टर सुब्रमणियम ने उनकी पूरी बात बहुत ध्यान से सुनी और कहा : 'अनूप, तुम बिलकुल ठीक कह रहे हो । यू आर राईट । यू आर एब्सोल्यूट्ली राईट ।' अगले दिन शाम को अजीत जालान उनसे मिले और उन्होंने तमाम आरोपों को तरह तरह के तर्क देते हुए झूठा बताया और क्लब के खिलाफ कोई कार्रवाई न करने का उनसे अनुरोध किया । डॉक्टर सुब्रमणियम ने उनकी भी पूरी बात बड़े ध्यान से सुनी और बोले : अजीत, तुम बिलकुल ठीक कह रहे हो । यू आर राईट । यू आर एब्सोल्यूट्ली राईट ।' अजीत जालान जब चले गए, तब डॉक्टर सुब्रमणियम की पत्नी डॉक्टर ललिता उन पर बहुत बिगड़ी कि तुम कैसे व्यक्ति हो; दोनों को राईट और एब्सोल्यूट्ली राईट बता रहे हो; दोनों में से राईट तो कोई एक ही होगा न । डॉक्टर ललिता ने डॉक्टर सुब्रमणियम से कहा कि आपको फैसला करना चाहिए कि दोनों में से कौन सचमुच राईट है । डॉक्टर ललिता ने कहा कि आपको याद रखना चाहिए कि आप डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हो; और आपको किसी एक के पक्ष में फैसला करना चाहिए । डॉक्टर सुब्रमणियम ने अपनी पत्नी की नाराजगी भरी और सलाहपूर्ण बातों को ध्यान से सुना और कहा : 'ललिता, तुम बिलकुल ठीक कह रही हो । यू आर राईट । यू आर एब्सोल्यूट्ली राईट ।' यह सुनकर डॉक्टर ललिता ने अपना सिर पीट लिया ।
कहानी में डॉक्टर ललिता ने अपना सिर पीट लिया; तो डिस्ट्रिक्ट में डॉक्टर सुब्रमणियम के टालू रवैये से उत्साहित होकर अजीत जालान ने अनूप मित्तल की तरफ जो पत्थर फेंका था, उससे अपनी पत्नी को ही घायल कर लिया है । देखना दिलचस्प होगा कि रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट की घपलेबाजियों का मामला और क्या क्या तमाशे दिखवायेगा ?

Sunday, August 14, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के संदर्भ में दीपक गुप्ता की तैयारी की कमजोरियों का अशोक जैन ने पूरा पूरा फायदा उठा कर अपनी उम्मीदवारी को टक्कर का बना लिया है

गाजियाबाद । मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की बुरी दशा ने दीपक गुप्ता के चुनाव अभियान को जो चोट पहुँचाई है, अशोक जैन उसका पूरा पूरा फायदा उठाने की कोशिश करते देखे जा रहे हैं - और दीपक गुप्ता के ही समर्थकों व शुभचिंतकों को लगने लगा है कि दीपक गुप्ता ने यदि स्थिति की गंभीरता को जल्दी से नहीं समझा - तो वह अभी की अपनी बढ़त को खो देंगे । ललित खन्ना की उम्मीदवारी के अभियान के ढीले पड़ते संकेतों ने भी अशोक जैन का पलड़ा भारी किया है, जिसके चलते दीपक गुप्ता के लिए चुनौती और ज्यादा गंभीर हो गई है । सुभाष जैन की सक्रियता - प्रभाव और असर बनाती/दिखाती सक्रियता दीपक गुप्ता के लिए एक अलग समस्या बनाए हुए है, जिससे निपटने की दीपक गुप्ता की अभी तक की तमाम कोशिशें तो विफल ही रही हैं । दीपक गुप्ता और अशोक जैन के अभियान की 'दशा/दिशा' का आकलन करने वाले लोगों ने पाया है कि अशोक जैन ने अपने अभियान की कमजोरियों को पहचाना/पकड़ा है और उन्हें काफी हद तक दूर करने का प्रयास शुरू किया है; इसके ठीक विपरीत दीपक गुप्ता का अपने अभियान की कमजोरियों पर तथा पल पल बदलती स्थितियों पर कोई ध्यान नहीं है और वह अपने पुराने ढर्रे पर ही चले जा रहे हैं और इस बात की कोई परवाह करते हुए नहीं दिख रहे हैं कि धीरे धीरे उनकी बढ़त का फासला कम होता जा रहा है ।
रोटरी क्लब गाजियाबाद सफायर के अधिष्ठापन समारोह में जेके गौड़ की जैसी जो फजीहत हुई, वह इस बात का जीता-जागता सुबूत है कि दीपक गुप्ता और उनके समर्थक उनकी उम्मीदवारी के अभियान को लेकर कितने लापरवाह बने हुए हैं । उनकी इसी लापरवाही का फायदा उठाने में अशोक जैन ने फुर्ती दिखाई है । अशोक जैन की उम्मीदवारी के अभियान में पिछले दिनों एक बड़ा अंतर लोगों ने यह महसूस किया है कि उन्होंने रमेश अग्रवाल की बदनामी की छाया और शरत जैन के संरक्षण से 'बाहर' निकल कर अपने अभियान की बागडोर को खुद सँभाला है । कई लोगों ने इस बात को नोट किया है कि अशोक जैन एक उम्मीदवार के रूप में पहले के मुकाबले ज्यादा कॉन्फीडेंट हुए हैं । पहले वह रमेश अग्रवाल और शरत जैन पर पूरी तरह निर्भर नजर आ रहे थे : लोगों के बीच रमेश अग्रवाल की बदनामी लेकिन उनका काम खराब कर रही थी; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में शरत जैन उनकी उम्मीदवारी को प्रमोट करने के नाम पर जो पक्षपात कर रहे थे, उससे फायदा होने की बजाए नुकसान ज्यादा हो रहा था । अशोक जैन ने इस स्थिति को पहचानने में देर नहीं की, और जल्दी से यह समझ लिया कि अपनी लड़ाई उन्हें खुद ही लड़नी पड़ेगी । उन्हें जानने वाले लोगों का भी मानना और कहना रहा कि रोटरी में उन्हें करीब करीब तीस वर्ष होने जा रहे हैं, और इन वर्षों में एक लीडर नहीं तो एक कार्यकर्ता के रूप में लोगों के बीच उनकी अच्छी सक्रियता और पहचान रही है; इसलिए अपनी उम्मीदवारी के अभियान की बागडोर यदि वह खुद सँभालेंगे तो ज्यादा असर छोड़ेंगे । अशोक जैन ने यही किया । इसके दो फायदे होते हुए दिख रहे हैं : एक तो यह कि रमेश अग्रवाल की बदनामी तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में शरत जैन के प्रति पैदा होने वाली नाराजगी से होने वाले नुकसान की मात्रा घटी, और दूसरा यह कि लोगों ने 'असली' अशोक जैन को जानना/पहचानना शुरू किया - जिससे उनके बारे में एक सकारात्मक परसेप्शन बनना शुरू हुआ । 
दीपक गुप्ता की समस्या यह है कि एक उम्मीदवार के रूप में वह अभी भी पूरी तरह मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल के समर्थन के भरोसे बने हुए हैं । एक कॉमन सेंस की बात है कि पिछली बार इन दोनों ने दीपक गुप्ता को जितवाने के लिए अपने सारे घोड़े खोल लिए थे, लेकिन फिर भी बुरी पराजय को प्राप्त हुए थे - सो अबकी बार यह दोनों क्या नया कर लेंगे ? इसके अलावा, बुरी बात यह और हुई है कि पिछली बार की तुलना में इन दोनों की ही स्थिति और ज्यादा खराब व कमजोर हुई है । मुकेश अरनेजा को जिन स्थितियों में जिस तरह से अपना क्लब छोड़ कर 'भागना' पड़ा और एक फर्जी किस्म का क्लब बना कर उसमें शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा है, उससे लोगों के बीच उनका बचा-खुचा असर और कम ही हुआ है । सतीश सिंघल नोएडा ब्लड बैंक में की 'बेईमानी' के आरोपों के कारण इतनी फजीहत में हैं कि उन्हें अपनी पेम फर्स्ट को स्पोंसर करने के लिए पर्याप्त क्लब नहीं मिल रहे हैं, जिन्हें जुटाने में उन्हें एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है । ऐसे में, दीपक गुप्ता को इन दोनों से भला क्या सहयोग और फायदा मिलेगा ? दीपक गुप्ता लेकिन इन्हीं की मदद के भरोसे अपनी उम्मीदवारी का अभियान चलाए हुए हैं । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को ललित खन्ना की उम्मीदवारी से फायदा मिल रहा था, क्योंकि ललित खन्ना की उम्मीदवारी सीधे सीधे अशोक जैन की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचा रही थी । ललित खन्ना की सक्रियता को देखते हुए उम्मीद की जा रही थी कि लोगों के बीच अशोक जैन से बेहतर स्थिति बना लेंगे; किंतु पिछले कुछ दिनों में उनकी सक्रियता ढीली पड़ती दिखी है, जिसका फायदा अशोक जैन को मिला और यह बात दीपक गुप्ता के लिए मुसीबतभरी साबित हुई है । 
दीपक गुप्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौती सुभाष जैन साबित हो रहे हैं । दरअसल सुभाष जैन ने अपने व्यवहार, अपने आचरण और अपनी सक्रियता से लोगों के बीच अच्छी और असरदार पैठ बनाई है । लोगों के बीच उनकी जिस तरह की संलग्नता है, और लोगों की तरफ से भी उन्हें जिस तरह की लगावपूर्ण प्रतिक्रिया मिल रही है - उसके कारण डिस्ट्रिक्ट में उनका कद और उनकी पहचान बड़ी हो गई है, जिसका निश्चित रूप से एक राजनीतिक अर्थ और पक्ष भी होगा ही । लोगों को यह आभास तो है कि सुभाष जैन का समर्थन अशोक जैन को मिलेगा, लेकिन सुभाष जैन की तरफ से इस बारे में अभी कुछ नहीं कहा/सुना गया है । वृंदावन स्थित बाँके बिहारी मंदिर जाने के उनके आयोजन में डिस्ट्रिक्ट के तमाम लोगों के बीच अशोक जैन की अनुपस्थिति का यही अर्थ निकाला/लगाया गया है कि सुभाष जैन वैसी बेवकूफी करने से बच रहे हैं, जैसी बेवकूफी सतीश सिंघल ने पिछले रोटरी वर्ष में की - और जिसके चलते अपनी फजीहत करवाई । इस तथ्य में दीपक गुप्ता के लिए एक उम्मीद भी है, और एक चुनौती भी - लोगों के बीच आभास होने के बावजूद सुभाष जैन यदि खुलकर अशोक जैन के साथ नहीं दिख रहे हैं, तो इससे दीपक गुप्ता का काम आसान ही होता है; चुनौती की बात लेकिन यह है कि लोगों के बीच आभास यह भी है कि दीपक गुप्ता को 'रोकने' के लिए सुभाष जैन जरूरत पड़ने पर कुछ भी करेंगे । सुभाष जैन के नजदीकियों के अनुसार, पिछले रोटरी वर्ष में कुछेक मौकों पर दीपक गुप्ता का जो व्यवहार रहा - उसने सुभाष जैन को गहरे से आहत किया हुआ है, और उसे वह जल्दी से भूलने को तैयार नहीं हैं । सुभाष जैन साधारण रूप से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी होते तो उनकी नाराजगी ज्यादा मायने नहीं रखती; लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी होने के बावजूद उन्होंने लोगों के बीच अपनी जो पैठ बनाई है, उसके चलते उनकी भूमिका निर्णायक असर डालने वाली हो सकती है । इस तथ्य ने दीपक गुप्ता के लिए चुनावी मुकाबले को और भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण बना दिया है ।
दीपक गुप्ता के लिए मुसीबत की बात हालाँकि यह चुनौतियाँ उतनी नहीं हैं, जितनी कि उनकी तैयारी की कमजोरियाँ हैं । उनकी उम्मीदवारी के समर्थकों का ही कहना है कि दीपक गुप्ता इस गलतफहमी में हैं कि पिछली बार जिन क्लब्स के वोट उन्हें मिले थे, उनके वोट तो उन्हें मिलेंगे ही और उन्हें तो बस जो कमी रह गई थी, सिर्फ उसे ही पूरा करना है - इसलिए ज्यादा कुछ करने की उन्हें जरूरत ही नहीं है । उनकी इसी सोच ने उनकी उम्मीदवारी के सामने पैदा होने वाली चुनौतियों को और बड़ा बना दिया है । अशोक जैन ने इसका पूरा पूरा फायदा उठाया है और अभी कुछ समय पहले तक वह दीपक गुप्ता के मुकाबले जहाँ कहीं टिकते हुए नजर नहीं आ रहे थे, वहीं लेकिन अब वह उन्हें कड़ी टक्कर देते हुए दिख रहे हैं ।

Friday, August 12, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी की ठगी के शिकार लोगों को पैसा वापस दिलवा कर पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर राजू मनवानी लायनिज्म की पहचान व प्रतिष्ठा को बचाए/बनाए रखने का प्रयास वास्तव में करेंगे क्या ?

गाजियाबाद । पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर राजू मनवानी डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के अधिष्ठापन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनना स्वीकार करने के बाद से एक अजीब सी मुसीबत में फँस गए हैं । मुसीबत यह कि डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के कई एक लायन सदस्यों ने उन्हें फोन करके कहा है कि वह जब शिव कुमार चौधरी की कैबिनेट के सदस्यों को अधिष्ठापित करने आयेंगे, तब जरा शिव कुमार चौधरी से उनके पैसे वापस करवाने का काम भी कर दें । लोगों ने उनसे अनुरोध किया है कि उन्होंने जब शिव कुमार चौधरी के गवर्नर-काल के एक प्रमुख कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनना स्वीकार किया है, तो इसका मतलब है कि शिव कुमार चौधरी उनकी जरूर सुनेंगे - और इसलिए अब वही हैं जो शिव कुमार चौधरी की ठगी का शिकार हुए लोगों की मदद कर सकते हैं । लोगों ने राजू मनवानी से कहा है कि मुख्य अतिथि की जिम्मेदारी निभाने जब वह गाजियाबाद आयेंगे, तब शिव कुमार चौधरी की ठगी का शिकार हुए लोगों से मिलने, उनकी शिकायतें सुनने और उनके साथ न्याय करने का काम करने के लिए समय जरूर निकालें । राजू मनवानी ने इस मामले में फँसने/पड़ने से बचने की कोशिश में बहुत से तर्क भी दिए; किंतु एक प्रति-तर्क का जबाव उनसे भी नहीं बन पड़ा - उनसे कहा गया कि एक अत्यंत सक्रिय पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर होने के नाते क्या उन्हें यह जरूरी नहीं लगता कि लायंस इंटरनेशनल के शताब्दी वर्ष में वह किसी एक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को अपनी ठगी-हरकतों से लायनिज्म का नाम खराब न करने दें ? राजू मनवानी इस सवाल का जबाव नहीं दे पाए; किंतु उनके लिए मुसीबत की बात यह है कि वह शिव कुमार चौधरी से लोगों को पैसे वापस दिलवाने के लिए करें तो क्या करें ?
उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी से जिन लोगों को अपने पैसे वापस लेने हैं, वह पिछले कुछ समय से बहुत सक्रिय हो गए हैं - और हर वह उपाय कर रहे हैं तथा हर उस व्यक्ति का दरवाजा खटखटा रहे हैं, जहाँ उन्हें उम्मीद की जरा सी भी किरण दिखाई देती है । बिजनेस के नाम पर लोगों से पैसे ले लेने और फिर वापस न करने के गंभीर आरोपों के चलते शिव कुमार चौधरी को बदनामी तो पहले से ही झेलनी पड़ रही है, बल्कि कोर्ट केस तक का सामना भी करना पड़ रहा है - लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर 'बनने' के बाद उन्हें लायन समाज के लोगों के बीच भी जिस तरह से शर्मसार होना पड़ रहा है; उसके मूल में उनकी ठगी का शिकार हुए लोगों की सक्रियता ही है । लोगों की इस सक्रियता ने शिव कुमार चौधरी के लिए ही नहीं, लायनिज्म के बड़े नेताओं के लिए भी समस्या खड़ी की हुई है । शिव कुमार चौधरी ने पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील अग्रवाल की पत्नी अर्चना अग्रवाल को जोन चेयरपरसन बना कर जब यह संकेत दिया कि सुशील अग्रवाल उनके लिए बड़े खास हैं, तो शिव कुमार चौधरी की ठगी का शिकार हुए लोगों ने सुशील अग्रवाल से मदद की गुहार लगाई - इस गुहार से बचने के लिए सुशील अग्रवाल को जोन चेयरपरसन अर्चना अग्रवाल सहित पहली कैबिनेट मीटिंग से गायब रहने के लिए मजबूर होना पड़ा । लायंस क्लब गाजियाबाद के एक कार्यक्रम में शामिल होने आए फर्स्ट इंटरनेशनल वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल ने अपने भाषण में तो बड़ी ऊँची ऊँची बातें कीं, लेकिन जब शिव कुमार चौधरी की ठगी का शिकार लोगों ने उनसे अपनी समस्या पर बात करना शुरू किया - तब नरेश अग्रवाल जल्दी निकलने की बात कहते हुए 'भागते' नजर आए ।
शिव कुमार चौधरी की फजीहत में अभी हाल ही में तब और वृद्धि हो गई जब उनकी ठगी के एक शिकार सतीश अग्रवाल ने वाट्स-ऐप पर शिव कुमार चौधरी को संबोधित संदेश शेयर किया, जिसमें उन्होंने लिखा कि - 'लायन एसके चौधरी जी, बहुत समय से मैं आपसे अनुरोध कर रहा हूँ कि कृपया मेरी रकम मुझे लौटा दें; आपने रकम लौटाने का वायदा तो बहुत बार किया है, किंतु रकम लौटाई नहीं है और इस तरह से आपने दो वर्ष निकाल दिए हैं । कृपया अब तो जल्दी से मुझे मेरा पैसा वापस दे दें ।' सतीश अग्रवाल वरिष्ठ लायन हैं और लायंस क्लब मसूरी के अध्यक्ष हैं । ऐसे वर्ष में, जो कि लायनिज्म का शताब्दी वर्ष है और जिसमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स व क्लब-प्रेसीडेंट्स के लिए बड़े महत्वपूर्ण लक्ष्य व आदर्श निर्धारित किए जा रहे हैं; डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर और क्लब-अध्यक्ष के बीच सोशल मीडिया में इस तरह की बातचीत हो रही है - जो कि लायनिज्म के लिए बहुत ही शर्म की बात है । इस शर्मनाक स्थिति के रचयिता शिव कुमार चौधरी को लेकिन इसकी कोई परवाह होती नहीं दिख रही है । सतीश अग्रवाल ने अपने वाट्स-ऐप संदेश में अपने लायन साथियों से भी अनुरोध किया है कि वह प्रार्थना करें कि ईश्वर चौधरी जी को सद्धबुद्धि दे और वह उनका पैसा जल्दी वापस करें । सतीश अग्रवाल के इस संदेश से अपना अपना पैसा वापस पाने की कोशिशों में लगे दूसरे लोगों को भी उम्मीद बंधी थी कि शिव कुमार चौधरी को सद्धबुद्धि आयेगी और वह उनके पैसे वापस करेंगे ।
शिव कुमार चौधरी को लेकिन सद्धबुद्धि आती हुई नहीं दिखी, तो उनकी ठगी के शिकार लोगों ने राजू मनवानी का दरवाजा खटखटाया है । लोगों को लगता है कि राजू मनवानी लायनिज्म में सक्रिय तो हैं ही, साथ ही लायनिज्म की छवि को लेकर भी वह बहुत सतर्क हैं; शिव कुमार चौधरी ने उन्हें अपनी कैबिनेट के अधिष्ठापन समारोह के लिए मुख्य अतिथि बनाया है; यह कुछ बातें ऐसी हैं - जिनसे उन्हें लगता है कि राजू मनवानी शायद शिव कुमार चौधरी को सद्धबुद्धि दे सकते हैं और उनके पैसे दिलवा सकते हैं । लोगों की इन उम्मीदों ने राजू मनवानी के लिए समस्या खड़ी कर दी है । वास्तव में यह एक अजीब सी समस्या है - मुख्य अतिथि के रूप में उन्हें जिसके यहाँ जाना है, उससे वह यह कैसे कहें कि तुमने जिन जिन को ठगा है और जिनके पैसे दबाए हुए हैं, उनके पैसे वापस करो ? नहीं कहते हैं तो अपनी जिम्मेदारी से भागते हुए दिखेंगे ! शिव कुमार चौधरी की ठगी के शिकार हुए लोगों की तरफ से सुनने को मिल रहा है कि अधिष्ठापन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आ रहे राजू मनवानी से वह मिलेंगे और अपनी बात कहेंगे । इस बात की भनक मिलने के बाद शिव कुमार चौधरी और उनके नजदीकियों ने भी तैयारी शुरू कर दी है कि उनके शिकार बने लोग राजू मनवानी से न मिल सकें । होगा क्या, यह तो बाद में पता चलेगा; इस स्थिति ने फिलहाल लेकिन राजू मनवानी को और डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन तथा लायनिज्म की पहचान, साख व प्रतिष्ठा को मुसीबत में जरूर फँसा दिया है ।