Friday, October 21, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू में लायंस क्लब आगरा मेवरिक्स के मामले में सीपी सिंघल के रवैये ने मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक गवर्नर्स की मुश्किलें बढ़ाई

आगरा । लायंस क्लब आगरा मेवरिक्स के नाम पर हो रही राजनीति ने डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू में खासा दिलचस्प नजारा प्रस्तुत किया हुआ है - 'मार' बेचारे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल पर पड़ रही है, लेकिन दर्द सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवार मधु सिंह के समर्थक गवर्नर्स को हो रहा है । इसका नतीजा यह हो रहा है कि मधु सिंह के समर्थक गवर्नर्स भी सीपी सिंघल को 'पीटने' में जुट गए हैं - और सीपी सिंघल दोनों तरफ से 'पिट' रहे हैं । विडंबनापूर्ण रोचक बात यह हुई है कि एक तरफ तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सीपी सिंघल हर तरह से मधु सिंह की उम्मीदवारी को प्रमोट करने में लगे हुए हैं, और इसके लिए वह दूसरे ग्रुप के लोगों की आलोचना का शिकार भी हो रहे हैं - दूसरी तरफ लेकिन मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक पूर्व गवर्नर्स सीपी सिंघल की फजीहत करते हुए कह रहे हैं कि सीपी सिंघल की कारस्तानियों के चलते मधु सिंह को पिछली हार से भी बड़ी हार का सामना करना पड़ जायेगा । लायंस क्लब आगरा मेवरिक्स के मामले को लेकर सीपी सिंघल ने जिस तरह की अपरिपक्वता दिखाई, और उसके चलते जिस तरह का माहौल बना है - उसमें मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक गवर्नर्स को खतरे की घंटी की आवाज सुनाई दी है; और उन्हें लग रहा है कि यह माहौल सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत मधु सिंह की उम्मीदवारी के लिए मुसीबतों को बढ़ाने वाला साबित हो सकता है ।
दरअसल हुआ यह कि लायंस क्लब आगरा मेवरिक्स के बंद होने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल की कठपुतली भूमिका को जिम्मेदार माना/बताया गया, और आरोप लगा कि पिछले लायन वर्ष में मधु सिंह की चुनावी हार को सुनिश्चित करने में मेवरिक्स की चूँकि सक्रिय भूमिका थी - इसलिए उसका बदला लेने के लिए मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक गवर्नर्स ने सीपी सिंघल को इस्तेमाल करते हुए मेवरिक्स को बंद करवा दिया । इस आरोप को डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच जिस तरह का प्रचार और स्वीकार्यता मिली, उसे देख कर मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक गवर्नर्स परेशान हो उठे हैं । लिहाजा अब वह सीपी सिंघल पर आरोप मढ़ रहे हैं, कि उन्होंने मामले को उचित तरीके से हैंडल नहीं किया और अपनी बेवकूफी से एक छोटे से मामले का बबाल बनवा दिया । मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक पूर्व गवर्नर्स जान/समझ रहे हैं कि इस बबाल से सीपी सिंघल की तो सिर्फ बदनामी हो रही है, जो पहले से ही है भी - इसलिए उनका तो कुछ बिगड़ना नहीं है; लेकिन इस बबाल ने मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को जिस तरह से आरोपों के घेरे में ले लिया है - उसके चलते मधु सिंह की उम्मीदवारी के अभियान को खासा तगड़ा झटका लगा है ।
उल्लेखनीय है कि लायंस क्लब आगरा मेवरिक्स पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर योगेश कंसल के क्लब के रूप में पहचाना जाता रहा है । योगेश कंसल ने अपनी उम्मीदवारी के साल में इसे अपने बेटे को आगे रखकर खुलवाया/बनवाया था । यह क्लब यूँ तो काफी सक्रिय क्लब के रूप में जाना/पहचाना जाता रहा, लेकिन इसकी ज्यादातर सक्रियता नाच/गाने की मस्ती तक ही सीमित रही - जो कभी कभी लफंगई की सीमाओं को भी छूती नजर आई । क्लब के लोगों ने ही कहना शुरू किया कि क्लब के आयोजनों में आकर उन्हें नहीं लगता कि वह किसी लायंस क्लब के आयोजन में आए हैं, उन्हें लगता है कि जैसे वह किसी रेव पार्टी में आ गए हैं । इस तरह की बातों के बीच क्लब में दो ग्रुप बन गए । एक ग्रुप का प्रयास रहा कि जैसा चल रहा है, वैसा चलता रहे; और दूसरे ग्रुप के प्रयासों में इसकी खिलाफत थी । पहला ग्रुप चूँकि सत्ता में था, लिहाजा वह मनमानी करता रहा । दूसरे ग्रुप के लोगों ने तब - पिछले लायन वर्ष में शिकायत करने का रास्ता पकड़ा । यहाँ तक मामला क्लब का आपसी झगड़ा भर था - डिस्ट्रिक्ट के नेता, यानि गवर्नर्स चाहते और कोशिश करते - तो क्लब के झगड़े को ख़त्म करवा सकते थे । शिकायत होने के बाद मामला जब लायंस इंटरनेशनल तक पहुँच गया, तब इसे लेकर डिस्ट्रिक्ट के गवर्नर्स भी दो खेमों में बँट गए । पिछले लायन वर्ष की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रेणु नंदा के कामकाज की बागडोर चूँकि जितेंद्र चौहान के हाथ में थी, इसलिए उन्होंने चालबाजी करके लायंस क्लब मेवरिक्स के खिलाफ हो सकने वाली कार्रवाई को टलवा दिया । इस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल के कामकाज की बागडोर चूँकि दूसरे ग्रुप के लोगों के हाथ में आ गई, सो चालबाजी करने का मौका उन्हें मिला और उन्होंने लायंस क्लब आगरा मेवरिक्स के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता साफ करवा दिया ।
मामला यदि सिर्फ इतना भर ही होता, तो ज्यादा बबाल न मचता । मामले की आड़ में लेकिन जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल ने पैसे बनाने की कोशिश की - तो बात बिगड़ गई । क्लब के पदाधिकारियों के अनुसार, क्लब बचाने के ऐवज में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में ज्यादा से ज्यादा रजिस्ट्रेशन कराने तथा डिस्ट्रिक्ट कैबिनेट के पद बेचने की सौदेबाजी की । क्लब के पदाधिकारियों के आरोप के अनुसार, क्लब की तरफ से सीपी सिंघल की ऊँची डिमांड को चूँकि पूरा नहीं किया जा सका - तो क्लब को बंद करवा दिया गया । लायंस क्लब आगरा मेवरिक्स के पदाधिकारियों के इन आरोपों ने डिस्ट्रिक्ट में बबाल मचा दिया । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल की डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच चूँकि पहले से ही काफी बदनामी है, इसलिए उक्त आरोपों को लेकर लोगों के बीच नाराजगी और बढ़ी । अलग अलग कारणों से सीपी सिंघल से नाराज होने वाले लोगों की डिस्ट्रिक्ट में जो एक बड़ी संख्या है, उन सभी को सीपी सिंघल के खिलाफ अपनी अपनी नाराजगी व्यक्त करने का मौका मिल गया । डिस्ट्रिक्ट कैबिनेट के कुछेक बड़े पदाधिकारियों ने अपने अपने पदों से इस्तीफ़ा देकर सीपी सिंघल की फजीहत करने में 'मदद' की । सीपी सिंघल की फजीहत में जब मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक गवर्नर्स भी फँसने लगे, तब मामला और गंभीर व रोचक हो गया । मधु सिंह की उम्मीदवारी के समर्थक पूर्व गवर्नर्स ने अपने आप को बचाने के लिए, अपनी तरफ से भी सीपी सिंघल की 'धुलाई' शुरू दी । उनके द्धारा सीपी सिंघल की 'धुलाई' मधु सिंह की उम्मीदवारी के अभियान को नुकसान से बचा पायेगी, या नहीं - यह तो बाद में पता चलेगा; अभी तो डिस्ट्रिक्ट के लोगों की प्रतिक्रिया में नजारा यह देखने को मिल रहा है कि लायंस क्लब आगरा मेवरिक्स के मामले में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सीपी सिंघल बेचारे 'घर' और 'घाट' दोनों जगह 'मार' खा रहे हैं ।

Thursday, October 20, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में नरेश अग्रवाल से फर्जी एल्मनॅक विमोचित करवाने की धोखाधड़ी से पीछा अभी छूटा भी नहीं था, कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विशाल सिन्हा दूसरी कैबिनेट मीटिंग के लिए पैसा माँगने को लेकर निशाने पर आ गए

लखनऊ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विशाल सिन्हा डिस्ट्रिक्ट की सेकेंड कैबिनेट मीटिंग के लिए कैबिनेट के सदस्यों से पैसे माँग कर गंभीर आरोपों के घेरे में फँस गए हैं । दरअसल विशाल सिन्हा कैबिनेट सदस्यों से पहले ही मोटी रकम बसूल चुके हैं, और उक्त रकम बसूलते समय उन्होंने दावा/वायदा किया था कि कैबिनेट सदस्यों से किसी कैबिनेट मीटिंग में, अधिष्ठापन समारोह और अवॉर्ड समारोह में पैसा नहीं लिया जायेगा । लोगों को हैरानी है कि विशाल सिन्हा दूसरी कैबिनेट मीटिंग तक आते-आते अपना दावा/वायदा भूल गए, और कैबिनेट मीटिंग के लिए पैसे माँगने लगे । विशाल सिन्हा हालाँकि लोगों को पैसे माँगने का 'कारण' बता/समझा रहे हैं, लेकिन उनकी बदकिस्मती है कि लोग उनके द्धारा बताए जा रहे कारण को समझने की बजाए उन्हें कोसने में लगे हैं - और उनके द्धारा बताए जा रहे कारण को उनकी ठगी की एक तरकीब के रूप में देख/बता रहे हैं । विशाल सिन्हा का कहना है कि दूसरी कैबिनेट मीटिंग वह भीमताल में कर रहे हैं, और वहाँ एक बढ़िया होटल में लोगों के एक रात ठहरने की व्यवस्था कर रहे हैं - वह तो एक रात होटल में ठहरने के खर्च को पूरा करने के लिए पैसे माँग रहे हैं । विशाल सिन्हा का यह तर्क कैबिनेट सदस्यों को लेकिन उनकी चालाकी लग रहा है । लोगों का कहना है कि विशाल सिन्हा कान सीधे न पकड़ कर, थोड़ा घुमा कर पकड़ रहे हैं - और चाह रहे हैं कि लोग उनकी इस चालाकी को चुपचाप स्वीकार कर लें । लोगों का कहना है कि विशाल सिन्हा कैबिनेट मीटिंग भीमताल में करें या झुमरी तलैया में करें - अपने दावे/वायदे के अनुसार उसके लिए कोई पैसा न माँगे; और जो कोई वहाँ होटल में रुकना चाहता है, उसे अपना इंतजाम खुद करने का मौका/अधिकार दें । हाँ, वह अपनी तरफ से एक विकल्प/पैकेज दे सकते हैं; जिसे उनका पैकेज पसंद आएगा, वह उनसे ले लेगा । लोगों का कहना है कि विशाल सिन्हा को कैबिनेट सदस्यों से किए गए अपने दावे/वायदे को याद करते/रखते हुए कैबिनेट मीटिंग के लिए पैकेज थोपना नहीं चाहिए ।
विशाल सिन्हा के तर्क से जो लोग सहमत भी हैं, उनका भी कहना है कि विशाल सिन्हा ने एक रात होटल में ठहरने/ठहराने के नाम पर कैबिनेट सदस्यों से पैसे माँग कर गलत किया है, और नाहक ही परेशानी मोल ले ली है । विशाल सिन्हा लेकिन अपनी 'गलती' मानने को तैयार ही नहीं हैं । उनका कहना है कि पिछले वर्षों में कई एक (पूर्व) डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने भीमताल और या ऐसी ही जगहों पर कैबिनेट मीटिंग्स या अन्य कार्यक्रम किए हैं, और उसके लिए लोगों से पैसे लिए हैं - इस पर कभी कोई विरोध नहीं हुआ; उन्हें लेकिन निशाना बनाया जा रहा है । लोगों की तरफ से इसका जबाव भी सुनने को मिला है, जिसमें कहा/बताया जा रहा है कि दूसरे गवर्नर्स की तुलना में विशाल सिन्हा की बदनामी ज्यादा है; लोग अच्छी तरह जानते/पहचानते हैं कि विशाल सिन्हा झूठ बोलने में, सामने कुछ और पीछे कुछ कहने में, धोखेबाजी करने में, इधर की उधर करने में बड़े एक्सपर्ट हैं - इसलिए उनकी हर बात, उनका हर काम शक के घेरे में आ जाता है । वह हर काम इतना घुमाफिरा कर तथा छिपा कर करते हैं कि कुछेक लोगों का शक फिर सभी का विश्वास बन जाता है । बेचारे विशाल सिन्हा की डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच (कु)ख्याति ऐसी है कि उनकी हर हरकत तुरंत से लोगों की पकड़ में आ जाती है - और फिर उनकी खुद की सफाई भी उन्हें किसी भी तरह से नहीं बचा पाती है ।
डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में डिस्ट्रिक्ट एल्मनॅक को लेकर विशाल सिन्हा ने इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल तथा इंटरनेशनल डायरेक्टर अरुणा ओसवाल सहित लायंस इंटरनेशनल के अन्य पदाधिकारियों सहित डिस्ट्रिक्ट के लोगों की आँखों में धूल झोंकने का जो काम किया - वह इस बात का सुबूत है कि धोखाधड़ी करने में विशाल सिन्हा खासा दुस्साहस रखते हैं । डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में विशाल सिन्हा ने नरेश अग्रवाल से डिस्ट्रिक्ट एल्मनॅक को विमोचित करवाया । एल्मनॅक हालाँकि उन्होंने किसी को दी नहीं - उनका कहना था कि प्रिंटर/बाइंडर ने अभी कुछ ही प्रतियाँ दी हैं; जैसे ही उन्हें एल्मनॅक की प्रतियाँ मिलेंगी, वह सभी के पते पर पहुँचा देंगे । विमोचित करते समय जो थोड़ी सी प्रतियाँ मंचासीन अतिथियों के पास थीं, विशाल सिन्हा ने उन्हें भी झटपट तरीके से इकट्ठा करके छिपा दिया । बाद में प्रिंटर/बाइंडर से लोगों को पता चला कि एल्मनॅक तो अभी तैयार ही नहीं हुई है; और विशाल सिन्हा ने रद्दी कागजों को जोड़ कर फर्जी एल्मनॅक की पाँच/सात कॉपी बनवा ली थीं, और नरेश अग्रवाल से उसे ही विमोचित करवा लिया । फर्जी एल्मनॅक की एक कॉपी 'रचनात्मक संकल्प' के पास भी आ गई है । फर्जी एल्मनॅक का भेद खुला, तो विशाल सिन्हा ने पैंतरा बदला और लीपापोती करते हुए कहना शुरू किया कि उन्होंने एल्मनॅक नहीं, बल्कि एल्मनॅक का टाइटल कवर विमोचित करवाया था । इस सवाल का जबाव लेकिन उन्होंने नहीं दिया कि टाइटल कवर ही यदि उन्हें विमोचित करवाना था, तो प्रिंटर/बाइंडर से रद्दी कागजों को जोड़ कर फर्जी एल्मनॅक की पाँच/सात कॉपी बनवाने की उन्हें क्या जरूरत थी ? एल्मनॅक के नाम पर किए गए फर्जीवाड़े की पोल खुलने से विशाल सिन्हा की कार्यक्षमता की पोल और खुल गई : लोगों ने पूछना शुरू किया है कि गवर्नरी के तीसरे महीने में तो वह एल्मनॅक का कवर तैयार कर/करवा पाए हैं - ऐसे में एल्मनॅक उनकी गवर्नरी का कार्यकाल पूरा होने तक आ जाएगी या नहीं ?
एल्मनॅक के फर्जीवाड़े को लेकर विशाल सिन्हा की फजीहत अभी हो ही रही थी, कि दूसरी डिस्ट्रिक्ट कैबिनेट मीटिंग के लिए कैबिनेट सदस्यों से पैसे माँगने का विवाद शुरू हो गया । लगता है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में विशाल सिन्हा विवादों का कोई रिकॉर्ड बनायेंगे - एक विवाद थमता नहीं है, कि वह दूसरे विवाद में जा फँसते हैं । विशाल सिन्हा से हमदर्दी रखने वाले लायन सदस्यों को भी लगता है और वह कहते भी हैं कि विशाल सिन्हा ने अपनी हरकतों से अपनी गवर्नरी का मज़ाक बनवा लिया है, और इसी का नतीजा है कि डिस्ट्रिक्ट में उनकी बातों को कोई भी गंभीरता से नहीं लेता है । यही कारण है कि विशाल सिन्हा जिस किसी को भी सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपने उम्मीदवार के रूप में तैयार करते हैं, वह डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच विशाल सिन्हा की असलियत देख/जान कर भाग खड़ा होता है - और तमाम कोशिशों के बावजूद विशाल सिन्हा एक उम्मीदवार खड़ा नहीं कर पा रहे हैं ।

Wednesday, October 19, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ई में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनिल तुलस्यान को अपनी दूसरी कैबिनेट मीटिंग में ही जो तगड़ा वाला झटका लगा है, उससे वह सबक लेंगे क्या ?

वाराणसी । प्रकाश मिश्र के बाद राधे मारवाह के हाथों डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनिल तुलस्यान की जो फजीहत हुई, उसका सीधा असर डिस्ट्रिक्ट की दूसरी कैबिनेट मीटिंग पर पड़ा - जिसका अधिकतर कैबिनेट सदस्यों ने बहिष्कार किया । कैबिनेट सदस्यों ने ही नहीं, पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने भी डिस्ट्रिक्ट की दूसरी कैबिनेट मीटिंग से अपनी दूरी बनाई/दिखाई । फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कुँवर बीएम सिंह ने भी कैबिनेट मीटिंग में शामिल होने की जरूरत नहीं समझी, और सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रभात चतुर्वेदी कैबिनेट मीटिंग में शामिल तो हुए, लेकिन बड़े बेमन से हुए - और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आयोजन के दौरान बड़े उखड़े उखड़े से रहे । उल्लेखनीय है कि अनिल तुलस्यान ने 600/650 सदस्यों की तो भारी भरकम कैबिनेट बनाई हुई है; 250 के करीब पीएसटी होते हैं - लेकिन सिंगरौली के ऑफीसर्स क्लब में आयोजित हुई डिस्ट्रिक्ट की दूसरी कैबिनेट मीटिंग में मुश्किल से सवा सौ लोग ही जुटे, और मीटिंग-स्थल की ज्यादातर कुर्सियाँ खाली ही पड़ी रह गईं । जो लोग मीटिंग में थे भी, उनमें भी बहुतायत आसपास के क्लब्स के लोगों की थी । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स में वीरेंद्र गोयल और निधि कुमार भी - शायद स्थानीय होने के नाते ही मीटिंग में शक्ल दिखाने पहुँचे । जो लोग पिछले लायन वर्ष में भी डिस्ट्रिक्ट कैबिनेट में थे, और कैबिनेट मीटिंग्स में शामिल होते रहे थे - उन्होंने तुलनात्मक अध्ययन करते हुए बताया कि निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रकाश जी अग्रवाल की चारों कैबिनेट मीटिंग्स उपस्थिति के लिहाज से भी और व्यापक सक्रियता के लिहाज से भी बेहतरीन रही थीं; और उनके मुकाबले मौजूदा लायन वर्ष में अनिल तुलस्यान की दूसरी कैबिनेट मीटिंग ही बुरी तरह पिट गई और फ्लॉप रही ।
डिस्ट्रिक्ट की दूसरी कैबिनेट मीटिंग में अनिल तुलस्यान को डिस्ट्रिक्ट के आम और खास - दोनों तरह के लोगों से जो झटका लगा है, उसके लिए अनिल तुलस्यान के व्यवहार और रवैये को ही जिम्मेदार बताया/ठहराया जा रहा है । लोगों की तरफ से, विशेष कर डिस्ट्रिक्ट के 'खास' लोगों की तरफ से एक आम शिकायत यह रही कि अनिल तुलस्यान ने उन्हें उचित सम्मान के साथ मीटिंग के लिए आमंत्रित ही नहीं किया । इस मामले में बेचारे पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर जगदीश गुलाटी के साथ तो बहुत ही बुरी बीती । अनिल तुलस्यान ने उन्हें मीटिंग में उदबोधन देने के लिए राजी कर लिया था । उसी दिन हालाँकि जगदीश गुलाटी के क्लब का भी इलाहबाद में एक कार्यक्रम था, लेकिन फिर भी जगदीश गुलाटी ने अपने क्लब के कार्यक्रम की बजाए डिस्ट्रिक्ट की कैबिनेट मीटिंग को प्रमुखता दी, और अनिल तुलस्यान के निमंत्रण पर अपनी सहमति प्रकट कर दी थी । जगदीश गुलाटी लेकिन यह देख कर हैरान रह गए कि सहमति मिलने के बाद अनिल तुलस्यान ने फिर उनसे न तो कोई बात की, और न मीटिंग को लेकर सलाह/विचार किया । जगदीश गुलाटी मीटिंग में देने वाले उदबोधन का मैटर ड्राफ्ट भी कर चुके थे, लेकिन अनिल तुलस्यान के उपेक्षापूर्ण रवैये से खुद को अपमानित महसूस करते हुए जगदीश गुलाटी ने ऐन मौके पर कैबिनेट मीटिंग में जाने का विचार त्याग दिया । अन्य कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स तथा अन्य प्रमुख लोगों की भी शिकायत रही कि अनिल तुलस्यान ने उन्हें चूँकि उचित तरीके से मीटिंग के लिए निमंत्रित नहीं किया, इसलिए उन्होंने मीटिंग से दूर रहने में ही अपनी भलाई देखी/पहचानी ।
डिस्ट्रिक्ट की इलाहबाद में हुई पहली कैबिनेट मीटिंग में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में अनिल तुलस्यान ने कैबिनेट के कई प्रमुख पदाधिकारियों के साथ चूँकि बहुत ही बदतमीजीपूर्ण व्यवहार किया था, और धौंसभरी बातों से उन्हें बुरी तरह अपमानित व जलील किया था - इसलिए कैबिनेट के तमाम प्रमुख पदाधिकारियों ने दूसरी कैबिनेट मीटिंग से दूर रहने में ही अपनी भलाई देखी/पहचानी । लायंस इंटरनेशनल के जो प्रमुख प्रोग्राम व प्रोजेक्ट्स हैं, उनसे जुड़े पदाधिकारी ही जब कैबिनेट मीटिंग में नहीं पहुँचे - तो समझा जा सकता है कि कैबिनेट मीटिंग में फिर क्या काम हुआ होगा ? जाहिर तौर पर कैबिनेट मीटिंग सिर्फ एक औपचारिकता भर बन कर रह गई । डिस्ट्रिक्ट के वरिष्ठ लायन सदस्यों का कहना है कि गवर्नरी के चौथे महीने में ही अनिल तुलस्यान की लोगों के बीच जैसी बुरी गत बन गई है, वैसा तो डिस्ट्रिक्ट में इससे पहले किसी भी गवर्नर के साथ नहीं हुआ । मजे की बात यह है कि इस स्थिति के लिए खुद अनिल तुलस्यान को ही जिम्मेदार ठहराया/बताया जा रहा है । आरोप है कि अनिल तुलस्यान अपने आप को लोगों पर जबर्दस्ती थोपते हैं, और अपनी बातें मनवाने के लिए लोगों पर दबाव बनाते/बढ़ाते हैं - लेकिन जब कोई उन्हें उनके दबाव में आने से बचने का प्रयास करता नज़र आता है, तो वह उस पर भड़क उठते हैं तथा उसे अपमानित करने का प्रयास करते हैं । अपने इस रवैये से अनिल तुलस्यान ने डिस्ट्रिक्ट में तमाम लोगों को अपने खिलाफ कर लिया है ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में अनिल तुलस्यान के इस रवैये के पहले शिकार उनके अपने क्लब के निवर्तमान अध्यक्ष प्रकाश मिश्र बने । उल्लेखनीय है कि प्रकाश मिश्र के साथ उनके वर्षों से अच्छे संबंध रहे हैं; दोनों एक ही क्लब में थे - अनिल तुलस्यान के चुनाव में प्रकाश मिश्र ने तन-मन के साथ-साथ धन से भी सहयोग किया था । प्रकाश मिश्र वाराणसी के जाने-माने पंडित हैं, और इस नाते शहर के लोगों के बीच उनकी अच्छी व प्रभावी पहचान तथा प्रतिष्ठा है । उनकी पहचान व प्रतिष्ठा का अनिल तुलस्यान ने अपने चुनाव में जमकर फायदा उठाया । अनिल तुलस्यान के चुनाव में प्रकाश मिश्र की जो महत्त्वपूर्ण भूमिका रही, उसने दोनों के बीच के संबंधों को और प्रगाढ़ बनाया । इसी प्रगाढ़ता का नतीजा रहा कि पिछले लायन वर्ष में अनिल तुलस्यान ने अपने कुछेक साथियों के साथ मिलकर जब नया क्लब बनाया तो प्रकाश मिश्र भी उनके साथ पुराना क्लब छोड़ कर नए क्लब में आए - प्रकाश मिश्र बल्कि नए क्लब के चार्टर प्रेसीडेंट बने । सिर्फ इतना ही नहीं, अनिल तुलस्यान ने अपनी कैबिनेट बनाई तो उन्होंने प्रकाश मिश्र को जोन चेयरमैन बनाया । एक तरफ तो यह हो रहा था, इसके साथ-साथ दूसरी तरफ लेकिन गवर्नरी की कुर्सी की तरफ बढ़ते हुए अनिल तुलस्यान के दिमाग में 'गर्मी' भी पैदा होने लगी थी - और इस गर्मी के कारण उन्होंने लोगों के साथ बदतमीजियाँ भी करना शुरू कर दिया था । लोगों के लिए हैरानी की बात यह रही कि उनकी गवर्नरी की 'गर्मी' का पहला शिकार प्रकाश मिश्र ही बने । गवर्नरी के दूसरे महीने में ही प्रकाश मिश्र के साथ उनके संबंध इतने विवादपूर्ण हो गए कि उन्होंने प्रकाश मिश्र को जोन चेयरमैन पद से ही हटा दिया । प्रकाश मिश्र का गुनाह सिर्फ इतना रहा कि उन्होंने अनिल तुलस्यान की बदतमीजियों को बर्दाश्त करने से इंकार किया । प्रकाश मिश्र ही नहीं, अभी पिछले दिनों ही अनिल तुलस्यान ने डिस्ट्रिक्ट के वरिष्ठ सदस्य राधे मारवाह तक के साथ सार्वजनिक रूप से तू तू मैं मैं की । राधे मारवाह का गुस्सा अभी तक भी शांत नहीं हुआ है, जिसकी अभिव्यक्ति के रूप में दूसरी कैबिनेट मीटिंग में लोगों की कम उपस्थिति पर सोशल मीडिया में उनके द्धारा ली गई चुटकी को देखा/पढ़ा गया ।
डिस्ट्रिक्ट की दूसरी कैबिनेट मीटिंग में ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनिल तुलस्यान को डिस्ट्रिक्ट के आम और खास लोगों की तरफ से जो तगड़ा वाला झटका लगा है, वह अनिल तुलस्यान के लिए सबक भी है, और चुनौती भी है - देखना दिलचस्प होगा कि इससे सबक लेते हुए उनके रवैये व व्यवहार में कोई फर्क पड़ेगा या फिर वह अपनी और फजीहत करवायेंगे ?

Monday, October 17, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में पेम वन की अव्यवस्था व बदइंतजामी में खुद को ठगा हुआ महसूस करने वाले मौजूदा रोटरी वर्ष के अध्यक्षों तथा वरिष्ठ रोटेरियंस का कहना/पूछना है कि सतीश सिंघल और मुकेश अरनेजा ने उन्हें क्या अपमानित करने के लिए ही बुलाया था ?

नोएडा । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सतीश सिंघल की पेम वन में आमंत्रितों के तमाशबीन बनने और ठगे जाने का जो अनुमान था, वह तो सच साबित हुआ ही - बदइंतजामी के कारण वह परेशानी व दुर्गति के दोहरे शिकार और बने । जो वरिष्ठ रोटेरियन पिछले वर्षों में पेम में शामिल होते रहे हैं, उनमें से जिनसे भी इन पँक्तियों के लेखक की बात हो सकी - उनका बेहिचक कहना रहा कि इतना घटिया आयोजन इससे पहले उन्होंने नहीं देखा है । आमतौर से रोटरी के और खासतौर से डिस्ट्रिक्ट 3012 (पूर्व के 3010) के आयोजनों के बारे में माना/कहा जाता रहा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चाहें जितना भी नाकारा हो, उसके कार्यक्रम अच्छे से हो ही जाते हैं । इसका कारण यह बताया/समझा जाता रहा है कि आयोजन का एक बना-बनाया ढाँचा होता है और आयोजन किसी बड़े होटल में होता है - लिहाजा बिना किसी खास प्रयास के आयोजन अच्छा हो ही जाता है । सतीश सिंघल ने लेकिन यह रिकॉर्ड तोड़ दिया - उन्होंने साबित कर दिया कि बने-बनाए ढाँचे में और एक बड़े होटल में आयोजित होने वाले कार्यक्रम को भी बिगाड़ा जा सकता है और उसे घटिया रूप दिया जा सकता है ।
पेम वन से लौटे लोगों की शिकायत रही कि आयोजन-स्थल का हॉल बहुत छोटा था, जिसमें कुर्सी-मेज सटा सटा कर लगाए गए थे - जिस कारण एक जगह से दूसरी जगह तक पहुँच पाना संभव ही नहीं हो रहा था, और इसका नतीजा यह हुआ कि स्नैक्स अधिकतर लोगों को सर्व ही नहीं हो सके । फैलोशिप-स्टॉल की बदइंतजामी का हाल मछली बाज़ार का माहौल बना रहा था, और खाने की क्वालिटी देख कर लोगों को भ्रम हो रहा था कि खाने की व्यवस्था कहीं किसी लो-बजट हलवाई से तो नहीं करवा ली गई । अव्यवस्था सिर्फ खाने-पीने के मामले में ही नहीं थी - साँस्कृतिक कार्यक्रम के तहत नृत्य प्रस्तुत करने वाली बच्चियों को सम्मानित करने का काम सतीश सिंघल को करना था; इसके लिए सतीश सिंघल का नाम पुकारा भी गया, लेकिन जब तक वह 'मौके' पर पहुँचते - मोमेंटो लेकर आने वाली युवतियों ने ही बच्चियों को मोमेंटो दे दिया और बच्चियाँ सम्मानित होकर वहाँ से निकल चुकी थीं । बच्चियों को सम्मानित करने 'मौके' पर पहुँचे सतीश सिंघल को खिसिया कर बैरंग ही वापस लौटना पड़ा । एमओसी की भूमिका निभा रहे जनाब ने तो और कमाल किया - डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन को वह पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कहते/बताते हुए संबोधित कर रहे थे । यह संबोधन सुनकर शरत जैन ने अपने आसपास बैठे लोगों से चुटकी भी ली कि सतीश सिंघल और उनके लोगों ने तो उन्हें आठ महीने पहले ही रिटायर कर दिया है । यह पेम वन के अलग-अलग मौकों के कुछ उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि पेम वन के आयोजन में हर स्तर पर अव्यवस्था, बदइंतजामी व अराजकता का राज था ।
सतीश सिंघल के नजदीकियों का ही कहना है कि इसका मुख्य कारण योजना का अभाव था । कार्यक्रम की तैयारी तथा उसके विभिन्न चरणों को लेकर सतीश सिंघल के पास कोई योजना थी ही नहीं; और यदि थी भी तो उन्होंने उसे किसी के साथ शेयर नहीं किया था । कार्यक्रम की तैयारी को लेकर सतीश सिंघल ने कुछेक लोगों के साथ मीटिंग्स की तो थीं, लेकिन उन मीटिंग्स में अपनी शेखी मारने के अलावा उन्होंने और कुछ नहीं किया । पेम वन की तैयारी से जुड़े लोगों को भी यह नहीं पता था कि किस मौके पर क्या काम होना है, और कैसे होना है ? यहाँ तक कि किन किन लोगों को पेम वन में आमंत्रित करना है, और कितने लोगों के लिए व्यवस्था करनी है - इसका भी किसी को नहीं पता था । मुकेश अरनेजा को जिस जिस की याद आती जा रही थी, वह उसे उसे आमंत्रित करते जा रहे थे । सतीश सिंघल भी ऐन मौके तक उन लोगों को भी फोन करके आमंत्रित कर रहे थे, जिनके साथ वह पहले खासी बुरी तरह से पेश आ कर झगड़ चुके थे । सतीश सिंघल पेम वन में लोगों की भारी भीड़ जुटा कर लोगों के बीच अपनी स्वीकार्यता व लोकप्रियता दिखाना चाहते थे; और साथ ही साथ, जैसा कि लोगों का आरोप रहा कि ज्यादा से ज्यादा पैसा इकट्ठा कर लेना चाहते थे ।
सतीश सिंघल अपने इन दोनों उद्देश्यों को पाने में तो सफल रहे, किंतु इस सफलता के चक्कर में उन्होंने कार्यक्रम का कबाड़ा कर लिया और पेम को लेकर रोटरी का जो कॉन्सेप्ट है, उसकी ऐसी-तैसी कर दी । पेम यानि प्रेसीडेंट इलेक्ट मीट, सिर्फ प्रेसीडेंट इलेक्ट का आयोजन होना चाहिए था - और इसमें सिर्फ उन्हें ही तवज्जो मिलना चाहिए थी, जिसके तहत वह रोटरी से और अपने समानधर्मा साथियों से परिचित होते । सतीश सिंघल ने लेकिन पेम के नाम पर ऐसा मेला जमाया कि बेचारे प्रेसीडेंट्स इलेक्ट को तो आपस में मिलने-जुलने तथा एक-दूसरे से परिचित होने का मौका ही नहीं मिल पाया । पेम वन के नाम पर मुकेश अरनेजा ने अपने जिस राजनीतिक मंसूबे को पूरा करने की योजना बनाई थी, वह भी आयोजन की बदइंतजामी व अव्यवस्था के चलते धूल-धूसरित हो गई । मुकेश अरनेजा ने मौजूदा रोटरी वर्ष के अध्यक्षों तथा कई वरिष्ठ रोटेरियंस को आमंत्रित तो कर लिया, लेकिन आयोजन में उन्हें चूँकि कोई तवज्जो नहीं मिली - और उनकी भूमिका सिर्फ ताली बजाने वाले तमाशबीनों जैसी बन कर रह गई, इसलिए वह बुरी तरह नाराज़ हुए हैं । मौजूदा रोटरी वर्ष के कई अध्यक्षों व वरिष्ठ रोटेरियंस का कहना है कि सतीश सिंघल और मुकेश अरनेजा ने पेम वन के आयोजन में उन्हें क्या अपमानित करने के लिए ही बुलाया था ?

Sunday, October 16, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में अपनी फजीहत का बदला लेने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी विनय भाटिया ने अपने ही क्लब में अध्यक्ष अनिल मग्गू के खिलाफ बबाल करवाया

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी विनय भाटिया अपने ही क्लब - रोटरी क्लब फरीदाबाद एनआईटी के अध्यक्ष अनिल मग्गू के खिलाफ षड्यंत्र करने/रचने तथा उन्हें अध्यक्ष पद से हटवाने की मुहिम चलवाने के आरोपों में 'पकड़े' गए हैं - और इस पकड़ से छूटने के चक्कर में उन्हें अपने ही क्लब के सदस्यों से बचना/छिपना पड़ रहा है । उनके इस रवैये से क्लब में घमासान और बढ़ गया है । रोटरी क्लब फरीदाबाद एनआईटी के कुछेक सदस्य पिछले करीब पंद्रह दिन से क्लब के सदस्यों के बीच तथा सोशल मीडिया पर क्लब के अध्यक्ष अनिल मग्गू के खिलाफ इस बात को लेकर अभियान चलाए हुए हैं कि उन्होंने अध्यक्ष पद से जब इस्तीफ़ा दे दिया है, तब फिर वह अध्यक्ष के रूप में काम/व्यवहार क्यों कर रहे हैं ? अनिल मग्गू की तरफ से भी इस अभियान का जोरदार जबाव दिया जा रहा है, और चुनौती दी जा रही है कि जिन लोगों को लगता है कि अनिल मग्गू अब क्लब के अध्यक्ष नहीं हैं - वह हिम्मत दिखाएँ और क्लब का नया अध्यक्ष चुन/चुनवा लें, फालतू की बयानबाजी क्यों कर रहे हैं ? दोनों तरफ की बयानबाजियों में क्लब की गतिविधियों के गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं, और एक दूसरे की पोल-पट्टी खोली जा रही है । इस सीन में लेकिन असली पोल-पट्टी विनय भाटिया की खुल रही है - जो इस क्लब के एक प्रमुख सदस्य होने के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी भी हैं । क्लब में मचे घमासान से दुखी क्लब के सदस्यों का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट का लीडर होने जा रहे विनय भाटिया के सामने जब क्लब में अपनी लीडरशिप क्षमता दिखाने का मौका आया है, तो वह मुँह छिपाते फिर रहे हैं; इससे समझा जा सकता है कि डिस्ट्रिक्ट में वह क्या करेंगे ?
विनय भाटिया पर इससे भी गंभीर आरोप यह है कि क्लब में मचे इस घमासान की जमीन उन्होंने ही तो तैयार की, और फिर उसे हवा भी दी - घमासान लेकिन चूँकि उनकी योजनानुसार नहीं चला, तो अब वह इससे मुँह चुरा रहे हैं । मामला रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट के एक कार्यक्रम में विनय भाटिया के क्लब के को-होस्ट बनने को लेकर था । साऊथ वेस्ट के पदाधिकारियों ने इसके लिए विनय भाटिया से संपर्क किया था । विनय भाटिया की एक बड़ी खूबी यह बताई जाती है कि उनसे किसी काम के लिए कहो, तो वह कभी भी मना नहीं करेंगे; लेकिन उस काम की जिम्मेदारी तुरंत किसी दूसरे के सिर मढ़ देंगे - काम हो जायेगा, तो अपनी पीठ थपथपायेंगे; और यदि नहीं हो पायेगा, तो जिसके सिर मढ़ा था उसे जिम्मेदार ठहरा देंगे । इस मामले में भी यही हुआ । रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट के पदाधिकरियों ने कहा, तो विनय भाटिया ने तुरंत अपने क्लब के को-होस्ट बनने के लिए हामी भर दी - और इस काम को करने की जिम्मेदारी उन्होंने क्लब के अध्यक्ष अनिल मग्गू को सौंप दी । अनिल मग्गू ने यह जिम्मेदारी ले तो ली, लेकिन उन्होंने विनय भाटिया से कहा कि को-होस्ट बनने के लिए जो पैसे देने होंगे, उसके लिए क्लब के लोगों को राजी करने का काम विनय भाटिया करें । विनय भाटिया लेकिन चूँकि काम नहीं करते हैं, वह सिर्फ काम का श्रेय लेते हैं - इसलिए उन्होंने कुछ नहीं किया और फलस्वरूप रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ वेस्ट के पदाधिकारियों के साथ किया गया उनका वायदा पूरा नहीं हो सका । स्वाभाविक रूप से, इससे विनय भाटिया की भारी फजीहत हुई । अपनी इस फजीहत के लिए उन्होंने अपने क्लब के अध्यक्ष अनिल मग्गू को जिम्मेदार ठहराया ।
इसी के साथ अनिल मग्गू के लिए क्लब में मुसीबतें शुरू हुईं । समझा जाता है कि विनय भाटिया की शह पर कुछेक लोगों ने अनिल मग्गू के सामने तरह तरह की अड़चने खड़ी करना शुरू कर दिया । इससे परेशान हो कर अनिल मग्गू ने गुस्से में कहीं अध्यक्ष पद छोड़ने की बात कर/कह दी । क्लब में विनय भाटिया के चेलों के इससे हौंसले और बुलंद हो गए । अब वह अनिल मग्गू की गतिविधियों पर सवाल उठाने लगे । उनका कहना रहा कि अनिल मग्गू ने जब अध्यक्ष पद छोड़ दिया है, तो वह अध्यक्ष के रूप में काम/व्यवहार क्यों कर रहे हैं ? अनिल मग्गू के नजदीकियों ने जब देखा कि कुछेक लोगों की बद्तमीज़ियाँ बढ़ती ही जा रही हैं, तो उन्होंने भी कार्रवाई करते हुए जबाव देना शुरू किया । उनका कहना रहा कि गुस्से में कही गई बात को आधार बना कर कुछेक लोग यदि अनिल मग्गू को अध्यक्ष पद से हटाना/हटवाना चाहते हैं, तो वह भी देखते हैं कि उनके मंसूबे कैसे पूरे होते हैं ? दोनों तरफ के रवैये के चलते क्लब में भारी घमासान मच गया है और तरह तरह की बातों के जरिये कीचड़-उछाल कार्यक्रम चल पड़ा है । इस सारे प्रसंग का दिलचस्प पहलू लेकिन यह है कि विनय भाटिया पता नहीं कहाँ छुप बैठ कर तमाशा देख रहे हैं । क्लब के सदस्यों को उम्मीद थी कि विनय भाटिया डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी के रूप में अपनी जिम्मेदारी समझते हुए मामले में हस्तक्षेप करेंगे तथा मामले को बिगड़ने से बचायेंगे; लेकिन वह तो मामले से ऐसे दूर बने हुए हैं, जैसे कि उन्हें तो इससे कुछ लेना-देना ही नहीं है ।
विनय भाटिया के रवैये से हतप्रभ व निराश क्लब के सदस्यों ने क्लब ट्रेनर संदीप गोयल से गुहार लगाई है कि दोनों तरफ के कुछेक लोगों ने जिस तरह से क्लब में अराजकता-सी फैलाई हुई है, उसे नियंत्रित करने के लिए वही कुछ करें । पूर्व अध्यक्ष संदीप गोयल क्लब के वरिष्ठ और सक्रिय सदस्य हैं, तथा उनका अध्यक्ष-काल ऐसा उल्लेखनीय रहा था कि डिस्ट्रिक्ट के कई प्रमुख लोगों का ध्यान उन पर गया था । वास्तव में उनके अध्यक्ष-काल में ही रोटरी क्लब फरीदाबाद एनआईटी की पहचान डिस्ट्रिक्ट में बढ़ी थी, जिसका फायदा विनय भाटिया के चुनाव में मिला था । विनय भाटिया के चुनाव में फरीदाबाद के जिन कुछेक लोगों ने निर्णायक भूमिका निभाई थी, संदीप गोयल उनमें एक हैं । संदीप गोयल से कहा जा रहा है कि वह क्लब में यदि शांति स्थापित करवायेंगे, तो यह उनकी तरफ से विनय भाटिया की एक और मदद होगी । क्लब के सदस्यों ने संदीप गोयल से गुहार लगाई है कि क्लब में जो बबाल मचा है, उसे थामने तथा क्लब के सदस्यों के बीच पहले जैसा परस्पर सहयोग व सौहार्द बनाये रखने का उपाय करें । क्लब में कुछेक सदस्यों ने लेकिन जिस तरह की गर्मी पैदा की हुई है, उसे देखते हुए संदीप गोयल से की जा रही गुहार संदीप गोयल के लिए खासी बड़ी चुनौती है । विनय भाटिया ने क्लब में जो आग लगाई है, संदीप गोयल सचमुच उसे बुझा सकेंगे, या नहीं - यह देखना दिलचस्प होगा ।

Friday, October 14, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सतीश सिंघल पर रोटरी को कमाई का जरिया बनाने के अपने हुनर का पेम वन पर भी इस्तेमाल करने का आरोप लगा

नोएडा । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सतीश सिंघल का पहला औपचारिक कार्यक्रम - पेम वन - होने से पहले ही जिस तरह की आलोचना और विवाद का शिकार हो गया है, उससे संकेत और सुबूत मिल रहे हैं कि सतीश सिंघल के गवर्नर-काल में रोटरी और डिस्ट्रिक्ट का मजाक ही बनना तय है । सतीश सिंघल ने घोषणा की भी है कि अपने गवर्नर-काल में वह ऐसे ऐसे काम करेंगे, जैसे रोटरी और डिस्ट्रिक्ट के इतिहास में पहले कभी नहीं हुए होंगे । इस घोषणा में हालाँकि उनका आशय अच्छे और प्रभावी कामों से रहा होगा, पर अभी तक जो होता हुआ नजर आ रहा है - उसमें बेवकूफियों और तमाशों का ज्यादा जोर बन रहा है; और उसमें रोटरी के नियम-कानून तथा व्यवस्थाएँ टूट रही हैं और उनका मजाक बन रहा है । पेम वन को सतीश सिंघल जिस तरह से आयोजित कर रहे हैं, उसके बारे में जान/सुन कर आरोप यह लग रहा है कि पेम आयोजित करने के पीछे रोटरी में जो उद्देश्य है, सतीश सिंघल ने अपने आयोजन में उसे ही अनदेखा कर दिया है - और अपने इस पहले ही औपचारिक कार्यक्रम को पैसा बनाने तथा राजनीति करने का जरिया बना दिया है ।   
उल्लेखनीय है कि पेम यानि प्रेसीडेंट इलेक्ट मीट, जैसा कि नाम से ही जाहिर है कि अगले रोटरी वर्ष में होने/बनने वाले अध्यक्षों की मीटिंग का कार्यक्रम है - जिसका उद्देश्य उन्हें रोटरी की बातों और व्यवस्थाओं से परिचित कराना होता है । इस कार्यक्रम में प्रेसीडेंट इलेक्ट और रोटरी के अनुभवी व जानकार लोगों की उपस्थिति ही वांछनीय होती है । कार्यक्रम की व्यवस्था करने/देखने के लिए कुछेक और रोटेरियंस भी कार्यक्रम में न्यौत लिए जाते रहे हैं । कुछेक अदृश्य किस्म की 'मजबूरियों' व 'जरूरतों' के चलते व्यवस्था करने/देखने वाले रोटेरियंस की संख्या बढ़ती भी रही है, लेकिन पेम में मुख्य फोकस प्रेसीडेंट इलेक्ट पर ही रहा है । सतीश सिंघल ने लेकिन रोटरी और डिस्ट्रिक्ट के इतिहास में पहली बार यह किया है कि इस फोकस को ही बदल दिया है । अपनी पेम वन में उन्होंने क्लब्स के मौजूदा प्रेसीडेंट तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के संभावित उम्मीदवारों को भी आमंत्रित किया है - और इस तरीके से पेम को मौजूदा रोटरी वर्ष की चुनावी राजनीति के अखाड़े के रूप में सजा दिया है, जिसमें प्रेसीडेंट इलेक्ट तो बेचारे बस तमाशबीन होंगे । इस तरह जो आयोजन रोटरी के भावी कर्ता-धर्ताओं के लिए रोटरी की बुनियादी बातों व भावनाओं को जानने/समझने/पहचानने का मौका होना चाहिए था - सतीश सिंघल ने उसे डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के एक एडवांस-शो में कन्वर्ट कर दिया है ।
पेम के पीछे के रोटरी उद्देश्यों की ऐसी-तैसी करने के सतीश सिंघल के इस 'पराक्रम' का कारण तो और भी मजेदार है । पेम की तैयारी से जुड़े उनके ही नजदीकियों का कहना है कि मौजूदा रोटरी वर्ष के अध्यक्षों को आमंत्रित करने का फैसला यह सोच कर लिया गया कि उससे कार्यक्रम में भीड़ बढ़ेगी और ज्यादा से ज्यादा पैसे मिलेंगे/बनेंगे । उल्लेखनीय है कि पेम वन के आयोजन का खर्च जुटाने के लिए सतीश सिंघल ने 19 क्लब्स से साठ-साठ हजार रुपए लिए हैं । पेम वन का आयोजन यदि अपने मूल स्वरूप में होता - जिसमें प्रेसीडेंट इलेक्ट के लिए तो भागीदारी मुफ़्त होती, लेकिन बाकी लोगों से रजिस्ट्रेशन का पैसा लिया जाता; तो क्लब्स से इकट्ठा हुए 11 लाख 40 हजार रुपए में से ज्यादा कुछ नहीं बचता । एक साधारण सा व्यापारिक फार्मूला पहचाना गया कि रजिस्ट्रेशन वाले भागीदारों की संख्या को यदि बढ़ा लिया जाए, तो रजिस्ट्रेशन से इकट्ठा हुए पैसे से ही खर्चा निकल आयेगा - और क्लब्स से इकट्ठा हुए पैसे को बचाया जा सकेगा । समस्या लेकिन यह पैदा हुई कि रजिस्ट्रेशन वाले भागीदारों को कहाँ से और कैसे जुटाया जाए ? तब क्लब्स के मौजूदा अध्यक्षों पर निगाह गई, और ज्यादा से ज्यादा रजिस्ट्रेशन हो सकें - इसके लिए उन्हें भी पेम में आमंत्रित कर लिया गया । अब लोग माथापच्ची करते रहें कि पेम का जो डिजाईन है, जो कॉन्सेप्ट है - उसमें मौजूदा अध्यक्षों का भला क्या काम है ? आरोप है कि सतीश सिंघल ने रोटरी को कमाई का जरिया बनाने में जो महारत हासिल की हुई है, और रोटरी नोएडा ब्लड बैंक के जरिए अपनी इस व्यापारिक महारत का जो सुबूत दिया हुआ है - उसी का उन्होंने अपनी गवर्नरी के पहले औपचारिक कार्यक्रम पेम वन में एक और नजारा प्रस्तुत किया है ।
सतीश सिंघल ने अभी तक जो भी कार्यक्रम किए हैं, उनमें अपनी सोच का बेतुकापन और स्वार्थी रूप ही जाहिर किया है । पिछले दिनों तो उन्होंने कोर टीम का गठन किए बिना ही कोर टीम की मीटिंग तक कर लेने का - 'कमाल'  दिखाया था । उनके हर कार्यक्रम में शामिल होने वाले लोगों ने अपने आपको ठगा हुआ और ताली बजाने वाली भूमिका में ही महसूस किया था । पेम वन में भी इसी का और बड़ा रूप देखने/दिखाने का सतीश सिंघल ने इंतजाम किया है । आमंत्रितों के 'ग्रुप्स' देख कर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि पेम वन में रोटरी का तो कोई भी काम हो पाना मुश्किल ही होगा - और आमंत्रितों को बस बेवकूफ ही बनना होगा । सतीश सिंघल के नजदीकियों का कहना है कि सतीश सिंघल लेकिन आश्वस्त हैं कि उनके कार्यक्रमों में लोग भले ही अपमानित महसूस करते हों, और अपने को ठगा हुआ पाते हों - लेकिन देखना, भारी संख्या में वह आयेंगे जरूर । सतीश सिंघल की व्यापारिक सोच व्यापार में उन्हें भले ही कामयाबी न दिला पाई हो, लेकिन रोटरी का व्यापारिक इस्तेमाल करने के मामले में उन्हें फायदा पहुँचाने वाली साबित हुई है । आरोपपूर्ण चर्चाओं के अनुसार ही, इसी नाते सतीश सिंघल को पूरा भरोसा है कि पेम वन के नाम पर वह जो तमाशा करने जा रहे हैं : वह प्रेसीडेंट इलेक्ट के लिए भले ही बेमतलब की कसरत हो, मौजूदा प्रेसीडेंट्स व दूसरे भागीदारों के लिए भले ही ताली बजाने वाली भूमिका निभाने का अपमानजनक मौका हो, और रोटरी को व डिस्ट्रिक्ट को भले ही बदनाम करने वाला अवसर हो - लेकिन खुद उनके लिए निश्चित रूप से जेब भरने वाला मौका साबित होगा ।

Thursday, October 13, 2016

दुबई इंस्टीट्यूट में रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दिनेश शर्मा की स्थिति को क्लियर करने से बचने की मनोज देसाई की कोशिश में कहीं दिनेश शर्मा का शिकार करने की उनकी मंशा तो नहीं छिपी है ?

सिकंदराबाद । इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई, डिस्ट्रिक्ट 3100 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दिनेश शर्मा के साथ जो खेल खेल रहे हैं, उसके कारण लोगों के बीच यह सवाल एक बार फिर मुखर हो गया है कि डिस्ट्रिक्ट 3100 को लेकर मनोज देसाई की नीयत और राजनीति वास्तव में है क्या ? उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट 3100 को नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस की बर्बादी तक पहुँचाने में डिस्ट्रिक्ट के अधिकतर लोग मनोज देसाई को ही प्रमुख रूप से जिम्मेदार मानते/समझते हैं - और बातचीत में वह इसे जब-तब मुखर होकर प्रकट भी करते हैं । समझा जाता है कि पिछले कुछेक वर्षों में डिस्ट्रिक्ट में अपनी आवभगत ठीक से न होने की शिकायतों के साथ-साथ मनोज देसाई को अपने चुनाव में डिस्ट्रिक्ट के कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की भूमिका को लेकर भी 'गहरी चोट' लगी हुई है, जिसके 'दर्द' के कारण उन्होंने डिस्ट्रिक्ट 3100 के प्रति दुश्मनी वाला भाव रखा हुआ है । इस भाव के चलते वह सुनील गुप्ता और दीपक बाबू की राजनीतिक बलि लेने के साथ-साथ कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स व पूरे डिस्ट्रिक्ट को भी सबक सिखा चुके हैं; और लोगों को ऐसा लगता है कि अब दिनेश शर्मा का नंबर है । सुनील गुप्ता, दीपक बाबू और कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट को जो सबक मिला, उसके लिए बहुत हद तक ये लोग खुद भी जिम्मेदार रहे हैं; इसलिए मनोज देसाई के खिलाफ तमाम शिकायतें व नाराजगी होने के बावजूद मनोज देसाई सीधे निशाने पर नहीं आ पाए । किंतु दिनेश शर्मा की तरफ से चूँकि अभी तक कोई नकारात्मक काम होता हुआ नहीं दिखा है, इसलिए उनके मामले ने डिस्ट्रिक्ट 3100 के प्रति मनोज देसाई की नीयत तथा उनकी राजनीति को सीधे निशाने पर ला दिया है । 
 दिनेश शर्मा का मामला बड़ा सीधा और आसान सा है, लेकिन मनोज देसाई के रवैये ने उसे बड़ा क्रिटिकल बना दिया है । दिनेश शर्मा दिसंबर में दुबई में होने जा रहे रोटरी इंस्टीट्यूट में अपनी भूमिका को लेकर मनोज देसाई से स्पष्टीकरण माँग रहे हैं, मनोज देसाई लेकिन उनकी इतनी सी बात पर चुप्पी साधे हुए हैं । दरअसल दिनेश शर्मा दुबई इंस्टीट्यूट के लिए अपना रजिस्ट्रेशन करवा चुके हैं । उनके सामने सवाल लेकिन यह है कि दुबई इंस्टीट्यूट में उन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट की पहचान और मान्यता मिलेगी या नहीं ? दिनेश शर्मा यह जानना चाहते हैं कि इंस्टीट्यूट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के लिए होने वाले ट्रेनिंग प्रोग्राम में शामिल होने का मौका उन्हें मिलेगा या नहीं ? इंस्टीट्यूट में जाने का दिनेश शर्मा के लिए उक्त प्रोग्राम में शामिल होना ही एकमात्र उद्देश्य है । दिनेश शर्मा को उक्त प्रोग्राम में शामिल होने के लिए चूँकि अभी तक कोई औपचारिक निमंत्रण नहीं मिला है; इसलिए वह इंस्टीट्यूट के संदर्भ में अपनी पूरी स्थिति को, अपने स्टेटस को जान/समझ लेना चाहते हैं । मनोज देसाई इंटरनेशनल डायरेक्टर होने के साथ-साथ चूँकि उक्त इंस्टीट्यूट के कन्वेनर भी हैं, इसलिए दिनेश शर्मा उनसे अपने स्टेटस को क्लियर करने की बात कर रहे हैं । मनोज देसाई लेकिन पूरे मामले में चुप बने हुए हैं और उन्हें कोई जबाव ही नहीं दे रहे हैं । दिनेश शर्मा ने लोगों को बताया है कि उन्होंने कई प्रमुख पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से भी गुहार लगाई हुई है कि वह मनोज देसाई से उनकी स्थिति स्पष्ट करवाएँ - लेकिन दिनेश शर्मा अपनी स्थिति, अपने स्टेटस को लेकर अभी भी अँधेरे में ही हैं । दिनेश शर्मा ने लोगों को बताया है कि उन्होंने मनोज देसाई को साफ साफ लिखा/कहा है कि इंस्टीट्यूट में यदि वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में शामिल नहीं किए जा सकते हैं, तो उनका रजिस्ट्रेशन रद्द करके उनका पैसा वापस कर दिया जाए; मनोज देसाई की तरफ से लेकिन इस पर भी कोई कार्रवाई नहीं की गई है ।
मनोज देसाई के इस रवैये ने दिनेश शर्मा तथा उनके साथियों को ही नहीं, बल्कि डिस्ट्रिक्ट के दूसरे लोगों को भी हैरान किया हुआ है । उनकी हैरानी का कारण यही है कि दिनेश शर्मा ने ऐसी कोई माँग तो नहीं ही की है, जिसे पूरा करने में मनोज देसाई को पसीने छूट रहे हों । इस हैरानी के चलते ही लोगों को लग रहा है कि दिनेश शर्मा की साधारण सी बात/माँग को अनसुना करके मनोज देसाई लगता है कि डिस्ट्रिक्ट 3100 के संदर्भ में अपनी किसी योजना को क्रियान्वित करना चाहते हैं । लोगों के बीच की चर्चाओं में जो कुछ कहा/बताया जा रहा है, उसके अनुसार लोगों को लग रहा है कि दिनेश शर्मा की बात/माँग को अनसुना करके मनोज देसाई दरअसल दिनेश शर्मा को उकसाने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि दिनेश शर्मा कोई ऐसी हरकत कर बैठें - जिसे आधार बना कर फिर वह सुनील गुप्ता और दीपक बाबू की तरह दिनेश शर्मा का भी शिकार कर सकें । लोगों को लग रहा है कि संजय खन्ना के प्रयासों से डिस्ट्रिक्ट में हालात सामान्य होने की तरफ जिस तरह से बढ़ते हुए दिख रहे हैं, उससे लगता है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर होने के बावजूद मनोज देसाई खुश नहीं हैं;  इसलिए वह डिस्ट्रिक्ट में कोई नया बखेड़ा खड़ा करने/करवाने के हालात पैदा करने के प्रयास कर रहे हैं ।
उल्लेखनीय है कि रोटरी इंटरनेशनल के विशेष प्रतिनिधि के रूप में डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजय खन्ना ने डिस्ट्रिक्ट 3100 में हालात को सामान्य बनाने की तरफ मोड़ने में आश्चर्यजनक रूप से सफलता प्राप्त की है । वह एक तरफ तो डिस्ट्रिक्ट के क्लब्स को सक्रिय करने तथा रोटरी के काम करने व अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने के लिए प्रेरित करने में सफल रहे हैं, और दूसरी तरफ रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों को इस बात पर आश्वस्त कर पाने में सफल हुए हैं कि डिस्ट्रिक्ट 3100 में लोग रोटरी के कामों व उद्देश्यों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं । इन दो-तरफ़ा सफलताओं के कारण ही संजय खन्ना डिस्ट्रिक्ट में मैचिंग ग्रांट व ग्लोबल ग्रांट का काम फिर से शुरू करवाने में कामयाब हुए हैं । संजय खन्ना की इस कामयाबी ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों को आश्वस्त किया है कि संजय खन्ना के सद्प्रयत्नों से डिस्ट्रिक्ट का नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस जल्दी ही हैट जायेगा, और डिस्ट्रिक्ट 3100 जल्दी ही रोटरी की मुख्य धारा का हिस्सा हो जायेगा । लोगों की इस आश्वस्ती ने दिनेश शर्मा और उनके नजदीकियों व समर्थकों को उत्साहित किया है, जिसकी प्रतिक्रिया में उनके बीच उम्मीद पैदा हुई है कि दिनेश शर्मा को गवर्नरी करने का मौका मिल जायेगा । इस उम्मीद के साथ-साथ उन्हें लेकिन इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई का रवैया डरा भी रहा है । मनोज देसाई के तौर-तरीके देख कर दिनेश शर्मा व उनके नजदीकियों/समर्थकों को ही नहीं, बल्कि डिस्ट्रिक्ट के दूसरे लोगों को भी शक व डर हो रहा है कि डिस्ट्रिक्ट में सामान्य होते माहौल को फिर से बिगाड़ने के लिए मनोज देसाई लगता है कि कोई चाल खोज रहे हैं । दुबई इंस्टीट्यूट में दिनेश शर्मा के स्टेटस को क्लियर करने से बचने की मनोज देसाई की कोशिश को ऐसी ही किसी चाल को खोजने की कोशिश के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । यह देखना सचमुच दिलचस्प होगा कि मनोज देसाई की चाल में दिनेश शर्मा फँसते हैं, या उससे बच निकलते हैं ।