Sunday, October 15, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने के लिए मजबूर हुए चेयरमैन राकेश मक्कड़ ने लुधियाना में मीटिंग रख कर सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के सामने चुनौती खड़ी की और उन पर तंज कसा

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ ने एक फैसला करने में दिखाए अपने व्यवहार से 'प्याज भी खाए और जूते भी खाए' वाली मशहूर कहावत को चरितार्थ किया है । उल्लेखनीय है कि रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाए जाने की माँग पर पहले तो उन्होंने चुप्पी साधे रखी, लेकिन जब चारों तरफ से इस चुप्पी को लेकर उन पर 'जूते' पड़े तब फिर वह मीटिंग बुलाने के रूप में 'प्याज' खाने को तैयार हो गए । इस तैयारी में भी राकेश मक्कड़ ने एक अन्य मशहूर कहावत को चरितार्थ किया - 'चोर चोरी से जाए, पर हेराफेरी से न जाए ।' रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने को लेकर मजबूर हुए राकेश मक्कड़ ने यह मीटिंग दिल्ली में करने की बजाए लुधियाना में करने का फैसला लिया है । मजे की बात यह भी है कि पैसों की कमी का वास्ता देकर राकेश मक्कड़ ने अभी हाल ही में लायब्रेरीज बंद करने का फैसला किया था, लेकिन लुधियाना में रीजनल काउंसिल की मीटिंग करने में लाखों रूपया बहाने में उनके सामने कोई समस्या नहीं है । रीजनल काउंसिल के 13 में से 7 सदस्यों को इस पर ऐतराज है, लेकिन नियमों का हवाला देते हुए राकेश मक्कड़ लुधियाना में रीजनल काउंसिल की मीटिंग करने के अपने फैसले को सही ठहरा रहे हैं । राकेश मक्कड़ को इस नियम का तो पता है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की एक मीटिंग दिल्ली से बाहर की जा सकती है, लेकिन नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल को लोकतांत्रिक, पारदर्शी और ईमानदार तरीके से चलाए जाने के नियमों को लेकर चेयरमैन के रूप में उन्होंने अपनी आँखें बंद की हुई हैं ।
चेयरमैन के रूप में राकेश मक्कड़ रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की काउंसिल सदस्यों के बहुमत की माँग पर पहले तो चुप्पी साधे रहे, लेकिन चारों तरफ से दबाव पड़ने के कारण अब जब वह मीटिंग बुलाने के लिए मजबूर हुए हैं - तब वह बहुमत सदस्यों की दिल्ली में मीटिंग बुलाने की माँग को अनसुना कर रहे हैं । चेयरमैन के रूप में राकेश मक्कड़ ने मीटिंग के एजेंडे में बहुमत सदस्यों द्वारा प्रस्तुत किए गए मुद्दों को भी शामिल करने से इंकार कर दिया है । यह गहरे अफसोस की और बिडंवना की बात है कि रीजनल काउंसिल के 13 में से 7 सदस्यों को लग रहा है कि लुधियाना में मीटिंग करने के पीछे राकेश मक्कड़ और उनके साथी पदाधिकारियों का वास्तविक उद्देश्य यह है कि वह मीटिंग को मनमाने तरीके से चला सकें, तथा बहुमत सदस्यों को अपनी बात न करने/कहने दें । इसी कारण से, काउंसिल के बहुमत सदस्यों ने मीटिंग के लिए ऑब्जर्वर की माँग की है । यहाँ इस बात को याद करना प्रासंगिक होगा कि पिछले दिनों दिल्ली में हुई रीजनल काउंसिल की मीटिंग में ऑब्जर्वर की उपस्थिति के बावजूद राकेश मक्कड़ और उनके साथी पदाधिकारियों की तरफ से इतनी बदतमीजी हुई थी कि काउंसिल सदस्यों को पुलिस बुलाने की धमकी देनी पड़ी थी । काउंसिल के बहुमत सदस्यों का मानना/कहना है कि जब दिल्ली में राकेश मक्कड़ और उनके साथी पदाधिकारियों के हौंसले इतने बुलंद थे, तो लुधियाना में तो फिर वह मनमानी करने से भला क्यों चूकेंगे ?      
राकेश मक्कड़ और उनके साथी पदाधिकारियों पर आरोप है कि रीजनल काउंसिल की मीटिंग से सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को दूर रखने के उद्देश्य से ही उन्होंने दिल्ली की बजाए लुधियाना में मीटिंग करने का फैसला किया है । दरअसल उन्हें डर है कि दिल्ली में मीटिंग होने पर उनकी मनमानियों पर सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की निगाह रहेगी और जरूरत पड़ने पर वह हस्तक्षेप कर सकते हैं । उन्हें यह डर इसलिए भी है क्योंकि मीटिंग से बचने की उनकी कोशिश सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की सक्रियताभरे हस्तक्षेप के कारण ही विफल हुई है । राकेश मक्कड़ हालाँकि इस आरोप को बेबुनियाद बताते हुए तर्क करते हैं कि सेंट्रल काउंसिल सदस्यों पर लुधियाना में हो रही मीटिंग में शामिल होने पर कोई रोक नहीं है; लुधियाना में हो रही मीटिंग में शामिल होने के लिए सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को लुधियाना जाने की परेशानी उठानी पड़ेगी - जैसी बातों पर तंज कसते हुए राकेश मक्कड़ और उनके साथियों का कहना है कि चुनाव के समय तो यह लोग दौड़ दौड़ कर लुधियाना जाते रहते हैं, तब तो इन्हें किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं होती है; अब मीटिंग में शामिल होने को लेकर इन्हें क्यों परेशानी होगी ?
सेंट्रल काउंसिल सदस्यों द्वारा की गई घेराबंदी के बाद रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने के लिए मजबूर हुए राकेश मक्कड़ ने सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के प्रति जो तंजभरी बातें कहना शुरू की हैं, और इसके जरिए सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के सामने जो चुनौती खड़ी की है - उससे मामला और दिलचस्प हो उठा है । उल्लेखनीय है कि राकेश मक्कड़ के एक साथी-पदाधिकारी नितिन कँवर ने पहले अतुल गुप्ता और फिर विजय गुप्ता के साथ अलग अलग कार्यक्रमों में जो बदतमीजी तथा तू तू मैं मैं की, और राकेश मक्कड़ ने इन 'कामों' के लिए नितिन कँवर को जिस तरह का संरक्षण दिया, उससे सेंट्रल काउंसिल के सदस्य नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मामलों को लेकर पहले से ही दबाव में हैं । लुधियाना में रीजनल काउंसिल की मीटिंग करने का दाँव चल कर राकेश मक्कड़ ने रीजनल काउंसिल के बहुमत सदस्यों की माँग और कोशिश का 'दलिया' बनाने के साथ-साथ सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के सामने भी जो चुनौती खड़ी की है - उससे लग रहा है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की कार्रवाइयों में पटाखे अभी फूटते रहेंगे ।

Saturday, October 14, 2017

रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की लाइन में लगने की तैयारी कर रहे पूर्व डायरेक्टर सुशील गुप्ता के पीछे हटने के कारण, इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार को चेलैंज करने की अशोक गुप्ता की तैयारी मँझधार में फँसी

जयपुर । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए चुने गए अधिकृत उम्मीदवार भरत पांड्या को चेलैंज करने की तैयारी के तहत अशोक गुप्ता ने समर्थन जुटाने का जो प्रयास शुरू किया है, उसे कोई खास समर्थन न मिलता देख अशोक गुप्ता और उनके नजदीकियों को तगड़ा झटका लगा है । पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के रवैये ने तो उन्हें सदमे जैसी हालत में पहुँचा दिया है । निवर्त्तमान इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई उनके चेलैंज में उन्हें दिलचस्पी लेते/दिखाते हुए तो लग रहे हैं, लेकिन कुछ करते और कोई नतीजा दिखाते हुए नजर नहीं आए हैं । अशोक गुप्ता ने विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से समर्थन जुटाने हेतु बात की है, लेकिन अधिकतर पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने उनके चेलैंज को लेकर कोई खास उत्साह नहीं जताया/दिखाया । 17 सितंबर को नोमीनेटिंग कमेटी द्वारा फैसला करने की प्रक्रिया में बुरी तरह पराजित होने के बाद अशोक गुप्ता और उनके नजदीकियों ने पहला सप्ताह तो शोक मनाने में बिता दिया, उसके बाद फिर उन्होंने चेलैंज करने के बारे में सोचना शुरू किया । पिछले दो सप्ताहों में अशोक गुप्ता और उनके नजदीकियों ने विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में समर्थन जुटाने के लिए कई बड़े/छोटे नेताओं के दरवाजे खटखटाए हैं, लेकिन इस कोशिश में उन्हें जो प्रतिक्रिया मिली है - उसने उन्हें हतोत्साहित ही किया है । अशोक गुप्ता के कुछेक नजदीकी और समर्थक तो कहने भी लगे हैं कि अशोक गुप्ता को चेलैंज/फैलेंज के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए, अन्यथा उनकी और ज्यादा फजीहत होगी ।
अशोक गुप्ता के लिए फजीहत की बात यह भी हुई है कि चेलैंज न करने के लिए रोटरी के बड़े नेता उन्हें मनाने का कोई प्रयास भी नहीं कर रहे हैं । उल्लेखनीय है कि भरत पांड्या की अधिकृत उम्मीदवारी को चेलैंज कर सकने को लेकर और जिन जिन उम्मीदवारों से खतरा था, उन सभी को 'मैनेज' कर लेने की बातें सुनी जा रही हैं । गुलाम वहनवती को रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी बना दिया गया है; रंजन ढींगरा और दीपक कपूर को भी आकर्षक ऑफर के साथ-साथ 'अगली बार' का झुनझुना दिया/दिखाया जा रहा है - लेकिन अशोक गुप्ता को कोई 'मैनेज' करने का प्रयास ही नहीं कर रहा है । इससे लगता है कि रोटरी के बड़े नेता और पदाधिकारी भी चाहते हैं कि भरत पांड्या की अधिकृत उम्मीदवारी को अशोक गुप्ता चेलैंज करें : हालाँकि उनकी चाहना है अलग अलग कारणों से - कुछ नेता लोग तो इसलिए चाहते हैं, ताकि उन्हें अपनी राजनीति दिखाने/जताने का मौका मिले, और कुछ इसलिए चाहते हैं ताकि अशोक गुप्ता यह भी करके देख लें और बाहर निकलें तथा दूसरों के लिए मौका छोड़ें ।
अशोक गुप्ता और उनके नजदीकियों को पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता का रवैया काफी हैरान/परेशान करने वाला लगा है । उन्हें सबसे ज्यादा उम्मीद सुशील गुप्ता से ही थी; सुशील गुप्ता की तरफ से जब रंजन ढींगरा को चेलैंज न करने के लिए राजी कर लिया गया था, तब अशोक गुप्ता और उनके नजदीकियों की उम्मीद और बढ़ गई थी - लेकिन सुशील गुप्ता उनकी मदद करते हुए भी नहीं दिख रहे हैं । इसका एक प्रमुख कारण यह सुना/बताया जा रहा है कि सुशील गुप्ता चूँकि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के लिए लाइन में लगना चाहते हैं, इसलिए वह किसी भी तरह के विवाद में पड़ने/फँसने से बचना चाहते हैं - और इसलिए ही उन्होंने अशोक गुप्ता की चेलैंज करने की तैयारी से अपने आपको दूर किया/दिखाया हुआ है । अशोक गुप्ता के लिए मुसीबत की बात यह बनी है कि जिन सुशील गुप्ता पर वह सबसे ज्यादा भरोसा कर रहे थे, उन सुशील गुप्ता ने इस बार तो उन्हें बीच मँझधार में छोड़ ही दिया है - दो/तीन वर्ष में ही मिलने वाले अगली बार के मौके के लिए भी वह कोई झूठा-मूठा भरोसा तक उन्हें नहीं दे रहे हैं । सुना जा रहा है कि सुशील गुप्ता अगली बार के लिए अपने ही डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर विनोद बंसल को 'हवा' दे रहे हैं । उनके डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स के बीच चर्चा है कि विनोद बंसल आजकल सुशील गुप्ता की 'आँख का तारा' बने हुए हैं, जो अभी तक रंजन ढींगरा हुआ करते थे ।
सुशील गुप्ता के पीछे हटने से अशोक गुप्ता के चैलेंजिंग अभियान को जो धक्का लगा है, उससे उबरने का वह कोई तरीका नहीं खोज पा रहे हैं । निवर्त्तमान इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई की तरफ से उन्हें उत्साहित किए जाने की बातें तो सुनी जा रही हैं, लेकिन मनोज देसाई वास्तव में उनकी मदद करते हुए नहीं नजर आ रहे हैं । इसका एक बड़ा कारण यह माना/समझा जा रहा है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर के रूप में मनोज देसाई ने विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में लोगों को अलग अलग कारणों से नाराज किया हुआ है, और इसलिए वह किसी से ज्यादा कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं । अशोक गुप्ता ने हाल ही के दिनों में विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के पूर्व गवर्नर्स से खुद भी बात की है, और अपने चेलैंज के लिए समर्थन जुटाने का प्रयास किया है - पर अपने प्रयासों के नतीजों से वह खुद ही बहुत आश्वस्त नहीं हैं । अशोक गुप्ता के नजदीकियों का कहना है कि उनके कई समर्थकों ने हालात की प्रतिकूलता का हवाला देते हुए उन्हें चेलैंज को लेकर आगे न बढ़ने का सुझाव भी दिया है, लेकिन चेलैंज को लेकर अशोक गुप्ता जितना आगे बढ़ चुके हैं - उससे पीछे हटना भी उनके लिए फजीहतभरा होगा । नोमीनेटिंग कमेटी की चुनावी प्रक्रिया में सबसे पहले चुनावी दौड़ से बाहर होने के कारण अशोक गुप्ता की एक बार किरकिरी हो चुकी है, चेलैंज को लेकर वह जिस मँझधार में फँसे नजर आ रहे हैं - उससे लग रहा है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने के लिए अपनाई गई उनकी कोई भी तरकीब उनके काम नहीं आ पा रही है, और इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने का उनका सपना एक बुरा सपना साबित होने जा रहा है ।

Thursday, October 12, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में राजनीतिक रूप से लगातार 'पिट' रहे राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स को, कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में टीके रूबी और अजय मदान पर हुए 'हमलों' को चुपचाप देखते रहे, जितेंद्र ढींगरा के रवैये में उम्मीद और उत्साह का 'टॉनिक' मिला

चंडीगढ़ । इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम की मौजूदगी में हुई कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी पर हुए 'हमलों' के बीच जितेंद्र ढींगरा के चुप बने रहने को राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स अपने लिए उम्मीद की किरण के रूप में देख/पहचान रहे हैं । राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स को यह बात बहुत ही उल्लेखनीय और महत्त्वपूर्ण लगी है कि मीटिंग में टीके रूबी को तरह तरह के आरोपों के जरिए जब घेरा जा रहा था, तब मीटिंग में मौजूद जितेंद्र ढींगरा ने न तो आरोपों का कोई विरोध किया और न ही टीके रूबी का बचाव करने का कोई प्रयास किया । यहाँ तक कि राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स द्वारा मीटिंग में डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी अजय मदान की उपस्थिति का आक्रामक ढंग से विरोध किए जाने के मुद्दे पर भी जितेंद्र ढींगरा चुप बने रहे । अजय मदान, जितेंद्र ढींगरा के ही क्लब के सदस्य हैं और समझा जाता है कि जितेंद्र ढींगरा के सुझाव पर ही उन्हें टीके रूबी की टीम में डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी जैसा महत्त्वपूर्ण पद मिला है । इसके बावजूद, उनके साथ राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स द्वारा की गई बदतमीजी पर जितेंद्र ढींगरा चुप बने रहे - तो इसे राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स अपने लिए एक संभावित अनुकूल स्थिति के रूप में देख रहे हैं ।
दरअसल, राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स को लगता है कि उनकी आक्रामक रवैये भरी रणनीति के कारण टीके रूबी जिस तरह अलग अलग किस्म की 'मुसीबतों' में फँसे हैं, उसे देख कर जितेंद्र ढींगरा सावधान और बचाव की मुद्रा में आ गए हैं । उन्हें लगता है कि जितेंद्र ढींगरा को महसूस हो रहा होगा कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में टीके रूबी को जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ा है, या पड़ रहा है - वैसी मुश्किलें उनके सामने न आएँ;  इसीलिए जितेंद्र ढींगरा, टीके रूबी के 'साथ' होते हुए भी उनसे दूर 'दिखने' का भी प्रयास कर रहे हैं । हालाँकि टीके रूबी चूँकि एक अलग परिस्थिति में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर 'बने' हैं, इसलिए उन्हें परेशान करने के लिए राजा साबू गिरोह के लोगों को कई मौके स्वतः ही मिल गए हैं - जो जितेंद्र ढींगरा के मामले में नहीं मिल सकेंगे; लेकिन राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स ने पिछले दिनों बार बार जिस तरह की नॉनसेंस हरकतें की हैं, उससे लगता नहीं है कि मौके 'बनाने' में उन्हें कोई समस्या आएगी । इस बात को जितेंद्र ढींगरा भी समझ रहे होंगे; और इसी बिना पर राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स को लग रहा है कि जितेंद्र ढींगरा संभावित मुसीबतों से बचने के लिए ही उनके साथ टकराव को टालना चाहते हैं और इसीलिए टीके रूबी पर हो रहे शाब्दिक हमलों को लेकर वह चुप ही बने रहे ।
यहाँ इस तथ्य को रेखांकित करना प्रासंगिक होगा कि पिछले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए नोमीनेटिंग कमेटी द्वारा अधिकृत उम्मीदवार चुने जाने के  बाद जितेंद्र ढींगरा को राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स के प्रति लचीला रवैया अपनाते हुए 'देखा' गया था, जिसका उन्हें सुफल भी मिला - राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स की तरफ से उनके डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बनने में कोई बाधा खड़ी नहीं की गई । हालाँकि गिरोह के दो नेताओं - मधुकर मल्होत्रा और प्रमोद विज ने लोगों के बीच स्पष्ट घोषणा की हुई थी कि वह किसी भी कीमत पर जितेंद्र ढींगरा को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की कुर्सी तक नहीं पहुँचने देंगे । उन दिनों राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स तथा जितेंद्र ढींगरा के बीच शांति स्थापित होती हुई नजर आ रही थी । वास्तव में, इस शांति की दोनों को ही जरूरत थी - राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स लड़ाई/झगड़े के चलते अपनी भारी फजीहत करवा चुके थे, तो जितेंद्र ढींगरा भी समझ रहे थे कि शांति करके ही वह गवर्नरी कर सकेंगे । जितेंद्र ढींगरा चूँकि कुछ समय पहले तक राजा साबू गिरोह के प्रमुख 'लड़ाकुओं' में थे, लिहाजा उनके बीच शांति स्थापित होने में ज्यादा समस्या भी नहीं आई । लेकिन अप्रत्याशित रूप से घटे घटनाचक्र में जब टीके रूबी को वर्ष 2017-18 की गवर्नरी मिल गई, तब अचानक से हालात फिर पहले वाली स्थिति में पहुँच गए ।
टीके रूबी को गवर्नरी मिलने से राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स की छाती पर जो साँप लोटा, उसकी फुँकार ने राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स की तरफ बढ़ते जितेंद्र ढींगरा के कदमों को रोकने का भी काम किया । गवर्नर बनने के बाद से टीके रूबी को राजा साबू गिरोह की तरफ से जिन भी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, वह यूँ तो उन्होंने अकेले ही भोगी/निपटाई हैं - लेकिन जितेंद्र ढींगरा हमेशा ही उनके सहयोगी बने भी दिखाई दिए हैं; किंतु इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम की मौजूदगी में संपन्न हुई कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में पहली बार  जितेंद्र ढींगरा और टीके रूबी के बीच कुछ 'गैप' देखा गया । राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स को इस गैप में अपनी साँसे वापस मिलती दिख रही हैं, और जिसे वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में भुनाना चाहेंगे । राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स के लिए इस वर्ष होने वाला डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव बिलकुल जीने/मरने जैसा मामला है । हालाँकि वह अभी तक कोई ऐसा उम्मीदवार नहीं खोज पाए हैं, जो टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा की मिलीजुली ताकत का मुकाबला करने का साहस दिखा सके । इस मामले में राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स के लिए राहत और उम्मीद की बात सिर्फ यही है कि टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा के उम्मीदवार के रूप में देखे/पहचाने जा रहे रमेश बजाज का चुनाव अभियान ढीला/ढाला ही है, और वह पूरी तरह टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा के भरोसे हैं; ऐसे में टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा के बीच दिख रहा गैप रमेश बजाज के लिए मुसीबत बढ़ाने वाला भी साबित हो सकता है - रमेश बजाज की उम्मीदवारी को लेकर जितेंद्र ढींगरा की असहमति की चर्चा पहले से है भी ।
डिस्ट्रिक्ट में कई लोगों का मानना और कहना लेकिन यह भी है कि कुछेक मौकों पर टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा के व्यवहार और रवैये में फर्क भले ही नजर आता हो, किंतु उसे दोनों के बीच बनते/बढ़ते गैप के रूप में देखना राजनीतिक नासमझी और जल्दबाजी में निर्णय पर पहुँचने का सुबूत है । इसके अलावा, राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स खुद बुरी तरह बँटे हुए हैं - वह टीके रूबी के सामने मुसीबत खड़ी करने के मामले में तो आपसी बैरभाव भूल कर एकसाथ हो जाते हैं, लेकिन सत्ता में अपनी वापसी करने को लेकर किसी रोडमैप पर उनके बीच सचमुच एकता हो सकना अभी तो मुश्किल क्या, असंभव ही दिख रहा है । राजनीतिक रूप से लगातार 'पिट' रहे राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स को बासकर चॉकलिंगम की मौजूदगी में हुई कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में टीके रूबी और अजय मदान पर हुए 'हमलों' को चुपचाप देखते रहे जितेंद्र ढींगरा के रवैये में उम्मीद और उत्साह का 'टॉनिक' जरूर मिला है ।

Wednesday, October 11, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 की मुकदमेबाजी में नैनीताल हाई कोर्ट का फैसला गवर्नरी पाने के लिए तरह तरह के फार्मूलों पर काम कर रहे दिनेश शर्मा के लिए खासा फजीहत भरा है

सिकंदराबाद । दिनेश शर्मा ने जिस कोर्ट-कचहरी के जरिए अपनी उम्मीदों और सपनों को पूरा करने, अन्यथा रोटरी को ही भाड़ में भेजने की तैयारी की हुई थी - उसी कोर्ट-कचहरी ने न सिर्फ उनकी उम्मीदों और सपनों पर पानी फेर दिया है, बल्कि पटरी पर लौटते 'दिख' रहे डिस्ट्रिक्ट में उनकी स्थिति को और कमजोर बना दिया है । नैनीताल हाई कोर्ट के फैसले के बाद वर्ष 2018-19 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हो रहे चुनाव पर छाए संकट के बादल पूरी तरह छंट गए हैं, और जल्दी ही अगले रोटरी वर्ष के लिए डिस्ट्रिक्ट को गवर्नर मिल जाने का रास्ता साफ हो गया है । नैनीताल हाई कोर्ट ने जिस सख्त 'लहजे' में फैसला सुनाया है और निचली अदालत के 'तरीके' पर टिप्पणी की है, उससे निचली अदालत से अपनी जीत का फैसला ला कर गवर्नर बनने का दिनेश शर्मा का दावा भी कमजोर पड़ गया है । उल्लेखनीय है कि दिनेश शर्मा और उनके संगी-साथी लगातार यह दावा करते रहे हैं कि निचली अदालत में तो उनके पक्ष में फैसला आएगा ही, और तब वह गवर्नर भी बन जायेंगे । पिछले दिनों निचली अदालत से वह जिस तरह से वर्ष 2018-19 के गवर्नर के लिए हो रहे चुनाव को रुकवाने का फैसला करवा लाए थे, उससे उन्हें और उन्हें भड़का कर अपनी राजनीति चमका रहे लोगों को तो विश्वास भी हो चला था कि अब वह रोटरी इंटरनेशनल को 'घुटनों' पर ले आयेंगे और अपने पक्ष में मनमाने फैसले करवा लेंगे । लेकिन नैनीताल हाई कोर्ट के फैसले के बाद दिनेश शर्मा और उन्हें भड़काने वाले नेताओं का सारा विश्वास डोल गया है । इस फैसले से यह भी स्पष्ट हो गया है कि कोर्ट-कचहरी के जरिए दिनेश शर्मा ने जो नाटक फैलाया हुआ था, वह भी अब ज्यादा दिन नहीं चलेगा ।
नैनीताल हाई कोर्ट के फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि दिनेश शर्मा की अदालती कार्रवाई अगले रोटरी वर्षों के गवर्नर के लिए होने वाले चुनावों की प्रक्रिया के लिए कोई बाधा नहीं बनेगी । अगले दो सप्ताह में डिस्ट्रिक्ट को अगले रोटरी वर्ष का गवर्नर मिल जायेगा, और अगले चार-छह महीने में वर्ष 2019-2020 के गवर्नर पद के लिए भी चुनावी प्रक्रिया शुरू हो जाने की उम्मीद है । दिनेश शर्मा रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों के साथ सौदेबाजी में लगे हुए थे और अगले रोटरी वर्ष की गवर्नरी पाने की उम्मीद लगाए हुए थे - वह यदि उचित समय पर सौदेबाजी को अंजाम दे दिए होते, और डिस्ट्रिक्ट के गिरोहबाज पूर्व गवर्नर्स पर निर्भर होने की बजाए डिस्ट्रिक्ट के लोगों के साथ भरोसे के संबंध बनाने का प्रयास करते - तो बहुत संभावना थी कि अगले रोटरी वर्ष में उन्हें गवर्नरी मिल जाती । लेकिन वह जिस बेवकूफीभरी अकड़ में रहे, और डिस्ट्रिक्ट के गिरोहबाज पूर्व गवर्नर्स के साथ मिल कर न सिर्फ रोटरी इंटरनेशनल की तरफ से नियुक्त किए गए पदाधिकारी संजय खन्ना से, बल्कि इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम तक से लुकाछिपी खेलते हुए भिड़ते रहे - उससे उन्होंने कुल मिलाकर अपना ही नुकसान कर लिया है और अब लग यही रहा है कि डिस्ट्रिक्ट में अपने लिए कोई हैसियत या सम्मानजनक स्थान पाने/लेने की स्थिति से भी वह दूर होते जा रहे हैं ।
दिनेश शर्मा ने जो नया शगूफा छोड़ा है, उससे उन्होंने खुद को और फजीहत में फँसा लिया है । रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों से वह सौदेबाजीभरी गुजारिश कर रहे हैं कि वह अपना मुकदमा वापस ले लेते हैं, जिसके बदले में वर्ष 2018-19 के गवर्नर के लिए हो रहे चुनाव को रोक कर दोबारा से चुनावी प्रक्रिया शुरू हो - जिसमें अभी के चारों उम्मीदवारों को उम्मीदवारी न प्रस्तुत करने के लिए वह राजी कर लेंगे और वह अकेले ही उम्मीदवार होंगे और इस तरह वर्ष 2018-19 के लिए वह गवर्नर चुन लिए जायेंगे । उनकी इस बात पर रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारी हँस ही रहे हैं, और सोच रहे हैं कि दिनेश शर्मा खुली आँखों से भी कैसे कैसे सपने देख लेते हैं ? कुछेक लोग मजे भी ले रहे हैं । उनकी तरफ से दिनेश शर्मा को कहा गया है कि अब जो स्थिति है उसमें उनके अगले रोटरी वर्ष का गवर्नर बनने की एक ही सूरत है और वह यह कि चुनावी प्रक्रिया के बीच में ही सही, चारों उम्मीदवार अपनी अपनी उम्मीदवारी वापस लेने के साथ साथ यह घोषणा भी कर दें कि अभी तक की वोटिंग के आधार पर उनकी जीत यदि घोषित भी की गई, तो वह उसे स्वीकार नहीं करेंगे - तब रोटरी इंटरनेशनल को झक मार कर दोबारा चुनाव करवाना ही पड़ेगा । यह सुझाव देने वाले लोग कोई सुझाव नहीं दे रहे हैं, बल्कि वास्तव में दिनेश शर्मा की फिरकी ले रहे हैं । इस तरह की बातों के बीच, दिनेश शर्मा के नजदीकियों को लग रहा है कि डिस्ट्रिक्ट के गिरोहबाज पूर्व गवर्नर्स ने अपने चक्कर में फँसा कर दिनेश शर्मा की खासी फजीहत करवा दी है ।

Tuesday, October 10, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल की बेईमानीपूर्ण हरकतों का रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों द्वारा संज्ञान लिए जाने की खबर से आलोक गुप्ता की चुनावी जीत के रंग में भंग पड़ा और उनकी जीत विवाद के घेरे में आ गई

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव जल्दी कराए जाने के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल के फैसले के पीछे बेईमानी और बदनीयती के आरोपों का रोटरी इंटरनेशनल द्वारा संज्ञान लिए जाने की खबर ने आलोक गुप्ता की जीत के जोश को ठंडा करने तथा 'आगे' के लिए उनकी मुश्किलों का बढ़ाने का काम किया है । उल्लेखनीय है कि आज सुबह आलोक गुप्ता की चुनावी जीत की खबर मिलने के साथ ही सतीश सिंघल को दिल्ली स्थित रोटरी इंटरनेशनल के साऊथ एशिया ऑफिस से यह खबर भी मिली कि रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों ने जल्दी चुनाव करवाए जाने के पीछे उनकी पक्षपातपूर्ण बेईमानी और बदनीयती को पहचाना है और अपने स्तर पर इसकी जाँच करवाने का निश्चय किया है । सतीश सिंघल ने अपनी तरफ से तो खबर को छिपाने की कोशिश की, लेकिन साऊथ एशिया ऑफिस से ही डिस्ट्रिक्ट 3011 के कुछेक पूर्व गवर्नर्स को भी यह खबर मिली, तब फिर सतीश सिंघल के लिए इसे छिपाए रखना मुश्किल हो गया । सतीश सिंघल ने हालाँकि यह कहते हुए बेफिक्री दिखाने/जताने का प्रयास जरूर किया कि रोटरी इंटरनेशनल के नियमों के अनुसार ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को यह अधिकार प्राप्त है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव वह कब करवाए, इसलिए इस संबंध में की गई शिकायत और या होने वाली जाँच का कोई अर्थ नहीं है - लेकिन मामले में रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों के दिलचस्पी लेने की खबर के कारण आलोक गुप्ता की चुनावी जीत के रंग में भंग जरूर पड़ गया है और उनकी जीत विवाद के घेरे में आ गई है ।
मजे की बात यह है कि जल्दी चुनाव करवाए जाने को लेकर रोटरी इंटरनेशनल में कोई ऑफिशियल शिकायत नहीं की गई है । साऊथ एशिया ऑफिस से भी जो जानकारी मिली है, उसके अनुसार भी जल्दी चुनाव करवाने के पीछे बेईमानी और बदनीयती का संज्ञान रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों ने खुद से ही लिया है । दरअसल, सतीश सिंघल का यह फैसला रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों के संज्ञान में खुद-ब-खुद रोटरी में सतीश सिंघल की कुख्याति के कारण आया जान पड़ता है । रोटरी नोएडा ब्लड बैंक में हिसाब-किताब की गड़बड़ियों के कारण सतीश सिंघल को रोटरी में रोटरी के नाम पर धंधा करने वाले व्यक्ति के रूप में देखा/पहचाना जाता है । इस 'पहचान' के कारण - 'बद अच्छा बदनाम बुरा' वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए उनके हर कदम को संदेह की निगाह से देखा जाता है । संभवतः यही वजह रही कि जल्दी चुनाव करवाने की सतीश सिंघल की घोषणा को संदेह की निगाह से देखा गया, और रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों ने अपने स्तर पर सतीश सिंघल के असली इरादे को भाँपने/समझने की कोशिश की । पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित हुए रोटरी के बड़े कार्यक्रमों में रोटरी इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारी और नेता शामिल हुए तो उन्हें सतीश सिंघल की हरकतों और बेईमानियों के तरह तरह के किस्से सुनने को मिले । इन्हीं किस्सों में आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी को प्रमोट करने तथा क्लब्स के प्रेसीडेंट्स पर आलोक गुप्ता को तवज्जो देने के लिए दबाव बनाने के उनके प्रयासों का भी जिक्र हुआ । समझा जाता है कि इसके बाद से ही रोटरी इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारियों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सतीश सिंघल की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव से जुड़ी कारगुजारियों पर निगाह रखना शुरू किया ।
डिस्ट्रिक्ट 3012 में चुनावी विवादों का हाल का रिकॉर्ड कुछ अच्छा नहीं है । पीछे संपन्न हुए सीओएल तथा इंटरनेशनल डायरेक्टर के चुनाव के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव विवाद और आरोपों में पड़े और मामला रोटरी इंटरनेशनल तक पहुँचा । डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर मुकेश अरनेजा की बदनामी का आलम यह है कि पिछली रोटरी इंस्टीट्यूट की कमेटी में तत्कालीन इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई ने उन्हें जगह तक नहीं दी । सतीश सिंघल के साथ उन्हीं मुकेश अरनेजा ने भी आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी की कमान सँभाली हुई थी और आरोप सुने जा रहे थे कि डीआरएफसी के रूप में मुकेश अरनेजा ने आलोक गुप्ता के लिए वोट जुटाने के  उद्देश्य से डीडीएफ की सौदेबाजी की । मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की भरपूर बदनामी के कारण, आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी को सफल बनाने के लिए उनके द्वारा अपनाए जा रहे हथकंडों ने उनकी बदनामी की आग को घी डाल कर भड़काने का काम किया । यही कारण रहा कि रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों ने कोई ऑफिशियल शिकायत हुए बिना, खुद से संज्ञान लेकर जल्दी चुनाव करवाने के पीछे छिपी बेईमानी और बदनीयती की जाँच करने का फैसला लिया है । उल्लेखनीय है कि पड़ोसी डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट विनय भाटिया के चुनाव के मामले में भी रोटरी इंटरनेशनल ने बिना ऑफिशियल शिकायत हुए, खुद से संज्ञान लेकर चुनावी बेईमानी की जाँच की थी और जाँच में आरोपों को सच पाए जाने पर इंटरनेशनल बोर्ड ने तीन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के खिलाफ सख्त टिप्पणियाँ की थीं ।
मजे की बात है कि सतीश सिंघल डिस्ट्रिक्ट 3011 के उक्त मामले को अपनी और आलोक गुप्ता की ढाल के रूप में देख रहे हैं और आश्वस्त हैं कि चुनावी बेईमानी के दोषी पाए जाने के बावजूद जैसे वहाँ 'वास्तव' में किसी का कुछ नहीं बिगड़ा, वैसे ही यहाँ भी नहीं बिगड़ेगा - बदनामी से डरना क्या ? बदनाम हैं तो क्या, नाम तो है । दरअसल मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल ने तो अपने आप को बदनामी के कीचड़ में 'एडजस्ट' कर लिया है; आलोक गुप्ता के लिए लेकिन 'सिर मुंडाते ओले पड़ने' वाली बात हो गयी है । एक अच्छी जीत की खबर के साथ-साथ, उनकी चुनावी जीत को 'मैनेज' करने के मामले को इंटरनेशनल पदाधिकारियों द्वारा संज्ञान में लेने की खबर भी आने से उनकी जीत का उत्साह तो ठंडा पड़ा है - रोटरी इंटरनेशनल पदाधिकारियों और नेताओं के बीच उनका नाम मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल जैसे पहले से बदनाम लोगों के साथ सीधे-सीधे और जुड़ गया है ।

Sunday, October 8, 2017

थैंक्यू मिस्टर राजा साबू और मिस्टर यशपाल दास, काफी हील-हुज्जत के बाद आखिरकार आपने रोटरी उत्तराखंड डिजास्टर रिलीफ ट्रस्ट के अकाउंट तो दे दिए हैं; लेकिन रिस्टेब्लिशमेंट के नाम पर 'निकाले' गए दो करोड़ 83 लाख रुपए कहाँ और कैसे खर्च हुए - यह आपने क्यों नहीं बताया ?

अंबाला । 'रचनात्मक संकल्प' को अंबाला के एक अज्ञात/अनजान नंबर से आई फोन कॉल पर थोड़ी खीज, थोड़े गुस्से और थोड़ी ठसक से भरी आवाज में बताया गया कि 'आपको रोटरी उत्तराखंड डिजास्टर रिलीफ ट्रस्ट के अकाउंट देखने हैं तो रोटरी न्यूज ऑनलाइन पर देख लीजिये ।' उक्त आवाज से अभी उसका परिचय ही पूछा गया था, कि फोन काट कर उक्त आवाज चुप हो गई । तब 'रचनात्मक संकल्प' के पास रोटरी न्यूज ऑनलाइन पर जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा । 'रचनात्मक संकल्प' यूँ तो खोजबीन करने में अपने आप को बड़ा होशियार मानता/समझता है, लेकिन रोटरी न्यूज ऑनलाइन की भूल-भुलैय्या में रोटरी उत्तराखंड डिजास्टर रिलीफ ट्रस्ट के अकाउंट वाली पोस्ट खोजने में उसके लिए नाकों चने चबाने वाली स्थिति बन गई । खासी मशक्कत के बाद आखिरकार उक्त पोस्ट खोज ली गई । इस मशक्कत में बार बार इस सवाल ने भी परेशान किया कि उक्त ट्रस्ट के मुख्य कर्ताधर्ता पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर यशपाल दास ने वायदा तो उक्त ट्रस्ट के हिसाब/किताब को जीएमएल में प्रकाशित करवाने का किया था, फिर उन्होंने हिसाब/किताब ऐसी भूल-भुलैय्या वाली जगह पर प्रकाशित क्यों किया/करवाया है - जहाँ उसे देख पाना आसान न हो । यशपाल दास ने आखिर यह परस्पर विरोधी रवैया क्यों अपनाया - जिसमें एक तरफ तो वह हिसाब/किताब प्रकाशित करवाने का दावा कर सकें; और दूसरी तरफ उन्होंने ऐसी जगह हिसाब/किताब प्रकाशित किए/करवाए, जहाँ कोई आसानी से देख न सके ।
रोटरी के बड़े नेताओं व पदाधिकारियों द्वारा संचालित एक बड़े और महत्त्वपूर्ण प्रोजेक्ट के पूरे होने की खबर गुमनाम तरीके से प्रकाशित किए/करवाए जाने का नतीजा यह है कि खबर को प्रकाशित हुए एक सप्ताह से अधिक का समय हो जाने के बाद भी पोस्ट पर सिर्फ एक कमेंट आया है - और वह भी मधुकर मल्होत्रा का । उक्त ट्रस्ट को 33 डिस्ट्रिक्ट्स से पैसे मिले हैं । किसी डिस्ट्रिक्ट के किसी भी रोटेरियन ने उक्त हिसाब/किताब को नहीं देख पाया है क्या, या इस हिसाब/किताब को मधुकर मल्होत्रा के अलावा अन्य किसी ने तारीफ के लायक नहीं समझा है ? वास्तव में एक अकेले मधुकर मल्होत्रा के प्रशंसा भरे कमेंट ने हिसाब/किताब वाली उक्त पोस्ट को और भी संदेहास्पद बना दिया है । उल्लेखनीय है कि रोटरी उत्तराखंड डिजास्टर रिलीफ ट्रस्ट के हिसाब-किताब में हेराफेरी के आरोपों को लेकर जो राजा साबू और यशपाल दास लोगों के निशाने पर रहे हैं, मधुकर मल्होत्रा को उनके ही संगी-साथी के रूप में देखा/पहचाना जाता है । सेवा कार्यों की आड़ में मौज-मजा और तफ़रीह करने के आरोपों के घेरे में मधुकर मल्होत्रा का नाम भी सुना जाता रहा है । ऐसे में, रोटरी उत्तराखंड डिजास्टर रिलीफ ट्रस्ट की गुमनाम तरीके से प्रकाशित की/करवाई गई रिपोर्ट पर एक अकेले मधुकर मल्होत्रा द्वारा ही की गई प्रशंसा ने दाल में कुछ ज्यादा ही काला होने का संकेत दिया ।
यह संकेत रोटरी उत्तराखंड डिजास्टर रिलीफ ट्रस्ट के अकाउंट पर सरसरी निगाह डालते ही 'तथ्य' में बदलता हुआ नजर आया । और यह तथ्य इस बात का सुबूत भी है कि राजा साबू और यशपाल दास लोगों की आँखों में धूल झौंकने का कैसा कैसा साहस रखते हैं । वर्ष 2015-16 की बैलेंस शीट में दो करोड़ 83 लाख रुपए स्कूल रिस्टेब्लिशमेंट फंड में ट्रांसफर दिखाए गए हैं । रिस्टेब्लिशमेंट फंड में इससे पहले के दो वर्षों में क्रमशः 28 लाख रुपए तथा दो करोड़ 55 लाख रुपए, यानि कुल दो करोड़ 83 लाख रुपए 'खर्च' किए हुए दिखाए गए हैं । ऐसे में सवाल यह है कि वर्ष 2013-14 और वर्ष 2014-15 में रिस्टेब्लिशमेंट फंड में जब दो करोड़ 83 लाख रुपए के खर्च का हिसाब 'बराबर' हो गया था, तब वर्ष 2015-16 में उक्त मद में और दो करोड़ 83 लाख रुपए ट्रांसफर करने का क्या मतलब है ? यह 'क्या मतलब' इसलिए और बड़ा हो जाता है कि वर्ष 2015-16 की बैलेंस शीट में ट्रस्टियों में से किसी के हस्ताक्षर नहीं हैं । नियमानुसार, ट्रस्टियों के हस्ताक्षर के बिना बैलेंसशीट मान्य ही नहीं है । तो क्या यशपाल दास और राजा साबू ने जानबूझ वर्ष 2015-16 की बैलेंसशीट पर इसीलिए हस्ताक्षर नहीं किए हैं, कि कहीं दो करोड़ 83 लाख रुपए का मामला 'पकड़ा' गया तो वह अपने आप को बचा लें ? उल्लेखनीय है कि बाकी तीन वर्षों की बैलेंसशीट में यशपाल दास के तीन तथा दो में राजा साबू के हस्ताक्षर हैं ।
रोटरी उत्तराखंड डिजास्टर रिलीफ ट्रस्ट के हिसाब-किताब में एक और मजेदार चीज देखने को मिली - इसमें एक तरफ तो फोटोस्टेट करवाने में खर्च हुए 140 रुपए और बैंक चार्ज में खर्च हुए 56 रुपए तक का हिसाब देते हुए दिखाने/जताने का प्रयास किया गया है कि जैसे एक एक पैसे का हिसाब दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन और बिल्डिंग रिस्टेब्लिशमेंट के नाम पर बिना कोई डिटेल्स दिए हुए लाखों और करोड़ों रुपए खर्च हुए दिखा दिए गए हैं । उल्लेखनीय है कि रोटरी उत्तराखंड डिजास्टर रिलीफ ट्रस्ट के हिसाब/किताब में गड़बड़ी के जो संदेह पैदा हुए और आरोप लगने शुरू हुए, वह वास्तव में इसलिए ही गहराते गए क्योंकि हिसाब/किताब को छिपाने की कोशिश की जाती रही - और हिसाब/किताब पूछने वालों से चिढ़ने, नाराज होने तथा उनको 'दुश्मन' समझने का व्यवहार प्रदर्शित किया गया । तमाम हील-हुज्जत के बाद अब जब हिसाब/किताब सामने आए भी हैं, तो उनमें भी बताने/दिखाने से ज्यादा 'छिपाने' का प्रयास नजर आ रहा है । गुमनाम और भूल-भुलैय्या वाली जगह पर दिए गए हिसाब/किताब में ट्रस्ट को पैसे कहाँ कहाँ से और कितने कितने मिले हैं, इसका तो बड़ा विस्तृत विवरण दिया गया है, लेकिन पैसे खर्च कहाँ और कैसे हुए हैं - इसका विस्तृत विवरण छिपा लिया गया है । बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन और बिल्डिंग रिस्टेब्लिशमेंट के नाम पर विभिन्न वर्षों में जो लाखों और करोड़ों रुपए खर्च दिखाए गए हैं, उनके भी विस्तृत विवरण यदि दे दिए जाते, तो ट्रस्ट के पैसों में हेराफेरी और गड़बड़ी का संदेह करने वाले लोगों के मुँह अपने आप बंद हो जाते । इसकी बजाए, पहले तो हिसाब/किताब देने में तरह तरह की बहानेबाजी करने, दबाव पड़ने पर घोषित जगह की बजाए गुमनाम और भूल-भुलैय्या वाली जगह पर हिसाब/किताब देने, और वह भी आधे-अधूरे ढंग से और अमान्य बैलेंसशीट से देने की कोशिश ने ट्रस्ट के पैसों में गड़बड़ी और हेराफेरी के संदेहों और आरोपों को और हवा देने का ही काम किया है । ट्रस्टियों के हस्ताक्षर के बिना दिखाई जा रही वर्ष 2015-16 की बैलेंसशीट में दो करोड़ 83 लाख रुपयों के ट्रांसफर के तथ्य ने मामले को खासा गंभीर बना दिया है ।

Saturday, October 7, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में रमेश अग्रवाल से हुए 'सौदे' के चलते मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल ने यदि अशोक जैन को समर्थन दिया, तो अमित गुप्ता की उम्मीदवारी का क्या होगा ?

गाजियाबाद । अशोक जैन द्वारा अगले रोटरी वर्ष की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी में दिलचस्पी लेने तथा उनकी उम्मीदवारी को मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल का भी समर्थन होने की खबरों ने अमित गुप्ता की सारी प्लानिंग को चौपट करने का खतरा पैदा कर दिया है । उल्लेखनीय है कि अमित गुप्ता की तरफ से लगातार यह दावा किया/सुना जाता रहा है कि अगले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल ने उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने का आश्वासन उन्हें दिया हुआ है । माना/समझा तो यहाँ तक जाता है कि उनके समर्थन के भरोसे ही अमित गुप्ता ने अगले रोटरी वर्ष की उम्मीदवारी के लिए तैयारी की हुई है; और उनके समर्थन के भरोसे ही अमित गुप्ता ने अगले वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन और क्लब के प्रमुख सदस्यों के ऐतराज तक को नजरअंदाज किया हुआ है । अमित गुप्ता चूँकि सुभाष जैन के क्लब के ही सदस्य हैं, इसलिए सुभाष जैन और क्लब के अन्य प्रमुख लोगों का लगातार कहना रहा कि अगले रोटरी वर्ष में सुभाष जैन और क्लब के प्रमुख सदस्य गवर्नरी 'करने/चलाने' के काम में व्यस्त रहेंगे, इसलिए अमित गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में काम करने के लिए वह समय नहीं निकाल सकेंगे - और इस कारण से अमित गुप्ता अगले रोटरी वर्ष की बजाए उससे आगे के वर्ष में उम्मीदवारी प्रस्तुत करें । अमित गुप्ता की तरफ से लोगों को लेकिन हमेशा ही इस बात का यही जबाव सुनने को मिला कि अगले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में वह स्वयं ही काम कर लेंगे और सुभाष जैन या क्लब के लोगों से सहयोग लेने/मिलने की कोशिश या उम्मीद वह नहीं करेंगे - और सहयोग न मिलने की किसी से कोई शिकायत भी वह नहीं करेंगे ।
अपने क्लब के लोगों के ऐतराज के बाद भी अमित गुप्ता के अगले वर्ष के लिए ही अपनी उम्मीदवारी पर डटे रहने के पीछे मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल के समर्थन को ही देखा/पहचाना जा रहा है । अमित गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार ही, अगले रोटरी वर्ष की सिचुऐशन अमित गुप्ता को पूरी तरह अपने अनुकूल लग रही है - अमित गुप्ता को लग रहा है कि अगले रोटरी में सुभाष जैन चूँकि गवर्नरी करने में व्यस्त रहेंगे इसलिए उनकी मदद भले ही न कर सकें, लेकिन उनकी उम्मीदवारी का विरोध भी नहीं कर सकेंगे । दरअसल अमित गुप्ता को डर यह है कि सुभाष जैन कभी भी उनकी उम्मीदवारी को स्वीकार नहीं कर पायेंगे - उनके नजदीकियों को ही लगता है कि उन्हें यह बात मुकेश अरनेजा ने ही समझाई होगी कि सुभाष जैन कभी भी नहीं चाहेंगे कि क्लब में उनके अलावा और कोई भी गवर्नर हो जाए; इसलिए सुभाष जैन का गवर्नर-वर्ष ही उनके लिए उम्मीदवार बनने का बढ़िया मौका है । नजदीकियों की मानें तो मुकेश अरनेजा की समझाइस के अनुसार, अगले वर्ष की चुनावी राजनीति के परिदृश्य को लेकर अमित गुप्ता का आकलन यह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने के नाते सुभाष जैन उनकी उम्मीदवारी में कोई समस्या पैदा नहीं करेंगे और मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल के समर्थन के बूते वह आसानी से अपनी उम्मीदवारी की नाव को पार करा लेंगे ।
अमित गुप्ता इस आकलन के भरोसे अपनी उम्मीदवारी को लेकर बेहद आश्वस्त रहे और इसी आश्वस्ति के चलते उन्होंने अपने क्लब के लोगों की भी एक नहीं सुनी । किंतु अब जब वह अशोक जैन की संभावित उम्मीदवारी को मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल के समर्थन की बात सुन रहे हैं, तो उन्हें चिंता हुई है । सुना/बताया जा रहा है कि मुकेश अरनेजा ने मौजूदा वर्ष के चुनाव में आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए रमेश अग्रवाल का समर्थन जुटाने के ऐवज में रमेश अग्रवाल से सौदा किया था, जिसके तहत अशोक जैन को अगले वर्ष समर्थन देने की बात है । उक्त सौदे के अनुरूप ही अशोक जैन ने अपनी उम्मीदवारी के लिए तैयारी करना शुरू कर दी है - हालाँकि वास्तविक खेल इस वर्ष के चुनाव का नतीजा आने के बाद ही शुरू होगा । आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी को सफल बनाने के लिए मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल ने जो चौतरफा 'फील्डिंग' लगाई थी, उसके चलते उन्हें आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के सफल होने की उम्मीद तो पूरी है; और सफल होने पर रमेश अग्रवाल तथा अन्य लोगों से किए गए सौदों का 'भुगतान' भी हो जाएगा - लेकिन किसी कारण से चुनावी नतीजा मनमाफिक नहीं आया तो उसका खामियाजा रमेश अग्रवाल और अशोक जैन को भी भुगतना पड़ेगा । अमित गुप्ता इसीलिए अशोक जैन की उम्मीदवारी को मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल के समर्थन की बात से निराश महसूस करने के बावजूद उम्मीद की लौ भी जलाए हुए हैं; वह इस बात को भी जानते ही हैं कि रोटरी की चुनावी राजनीति में वायदों और आश्वासनों की उम्र ज्यादा लंबी नहीं होती है । देखना दिलचस्प होगा कि मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल से अमित गुप्ता को मिला आश्वासन सच्चा साबित होता है, या झाँसा - और यदि झाँसा साबित हुआ तो अमित गुप्ता की उम्मीदवारी का क्या होगा ?