Sunday, September 9, 2018

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी टू में अजय डैंग को लेकर नियमों का पालन करने की नसीहत मिलने पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वंदना निगम ने पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर विनोद खन्ना के साथ-साथ अपने डिस्ट्रिक्ट के फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बलविंदर सैनी को भी निशाने पर लिया

कानपुर । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वंदना निगम अपने स्वार्थी और मतलबपरस्ती भरे व्यवहार के कारण एक बार फिर लीडरशिप के निशाने पर आती दिख रही हैं । लखनऊ में आयोजित हुई पहली मल्टीपल काउंसिल की मीटिंग में पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर विनोद खन्ना ने वंदना निगम को आगाह किया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उन्हें अजय डैंग से दूरी बना कर रखना चाहिए और उन्हें डिस्ट्रिक्ट के आयोजनों में प्रमुखता देने से बचना चाहिए । विनोद खन्ना का तर्क रहा कि अजय डैंग ने चूँकि लायंस इंटरनेशनल और उसके पदाधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की हुई है, और नियमानुसार ऐसे लोगों को लायनिज्म में कोई तवज्जो नहीं मिल सकती है - इसलिए वंदना निगम से उम्मीद की जाती है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में वह लायंस इंटरनेशनल के नियमों का पालन करेंगी । मजे की बात यह हुई है कि विनोद खन्ना की बात/सलाह को समझने की कोशिश करने की बजाये वंदना निगम ने इस मामले में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बलविंदर सैनी को लपेट लिया है । उन्होंने आरोप लगाया है कि बलविंदर सैनी ही विनोद खन्ना तथा लीडरशिप के दूसरे नेताओं को उनके खिलाफ भड़का रहे हैं । वंदना निगम के साथ बड़ी समस्या यह है कि वह अपनी मनमानी पर सवाल उठने से तुरंत भड़क उठती हैं और मामले की गंभीरता पर कतई गौर नहीं करती हैं । पिछले लायन वर्ष में डिस्ट्रिक्ट में जो तमाशा हुआ, उसके लिए यूँ तो कई लोग जिम्मेदार हैं - लेकिन उस तमाशे की मास्टरमाइंड वंदना निगम ही थीं । कुछेक लोगों का हालाँकि कहना है कि मास्टरमाइंड उनके पति श्याम निगम थे, और वह तो बस 'पत्नी-धर्म' निभा रही थीं । मास्टरमाइंड कौन था, इसे लेकर भले ही विवाद हो - लेकिन एक बात सभी स्वीकार करते हैं कि जो हुआ उसमें फजीहत वंदना निगम की ही हुई ।
दिलचस्प नजारा यह है कि पिछले लायन वर्ष में जो तमाशा हुआ, उसके केंद्र/कारण के रूप में अजय डैंग थे - और इस वर्ष अजय डैंग के कारण ही वंदना निगम एक बार फिर विवाद और फजीहत में फँसती नजर आ रही हैं । विनोद खन्ना का कहना है कि पद-भार सँभालने से पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की जो ट्रेनिंग होती है, उसमें सबसे महत्त्वपूर्ण और जरूरी पाठ यह पढ़ाया जाता है कि लायनिज्म और लायंस इंटरनेशनल की पहचान और प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए क्या क्या नियम हैं । इन्हीं नियमों में एक बड़ा खास नियम यह है कि लायंस इंटरनेशनल और उसके पदाधिकारियों को कानूनी मामलों में फँसाने वाले लोगों को किसी भी आधिकारिक कार्यक्रम में शामिल नहीं किया जायेगा । विनोद खन्ना का कहना/मानना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने के नाते वंदना निगम को इस नियम की जानकारी होगी ही, और उनसे उम्मीद की जाती है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में वह लायंस इंटरनेशनल के उक्त नियम का पालन करेंगी । देखने में लेकिन यह आ रहा है कि लायंस इंटरनेशनल तथा उसके पदाधिकारियों के खिलाफ कोर्ट-कचहरी करने वाले अजय डैंग को वंदना निगम डिस्ट्रिक्ट के आधिकारिक आयोजनों में खासी तवज्जो दे/दिला रही हैं । विनोद खन्ना ने इसी हरकत के लिए मल्टीपल काउंसिल की मीटिंग में वंदना निगम को आगाह किया । डिस्ट्रिक्ट के लोगों का ही कहना/बताना है कि वंदना निगम ने विनोद खन्ना से सामने सामने तो कुछ नहीं कहा, लेकिन डिस्ट्रिक्ट में अपने नजदीकियों के बीच वह सवाल उठा रही हैं कि विनोद खन्ना किस हैसियत से उन्हें आगाह कर रहे हैं या सलाह दे रहे हैं; उनका कहना है कि विनोद खन्ना उनके डिस्ट्रिक्ट के मामलों में नाहक ही दिलचस्पी ले रहे हैं और हस्तक्षेप कर रहे हैं । विनोद खन्ना के साथ-साथ वंदना निगम अपने डिस्ट्रिक्ट के फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बलविंदर सैनी को भी निशाना बना रही हैं । उनका कहना है कि बलविंदर सैनी लीडरशिप के बीच उन्हें बदनाम कर रहे हैं और अपनी नेतागिरी करने/जमाने का प्रयास कर रहे हैं ।
डिस्ट्रिक्ट में लोगों का मानना/कहना है कि वंदना निगम और बलविंदर सैनी को आगे करके डिस्ट्रिक्ट के नेता लोग इस वर्ष की चुनावी राजनीति को साधने का उपक्रम कर रहे हैं । उल्लेखनीय है कि इस वर्ष दो वर्षों के गवर्नर चुने जाने हैं । पिछले वर्ष के तमाशे और उसके नतीजे के चलते वंदना निगम और उनके समर्थक नेता दबाव में हैं, और इसलिए बलविंदर सैनी व उनके समर्थक नेता इस कोशिश में हैं कि दोनों वर्षों पर वह 'अपने' उम्मीदवार 'चुनवा' लें । वंदना निगम और उनके समर्थक नेताओं की डिस्ट्रिक्ट में हालत ऐसी पतली है कि उनके भरोसे कोई उम्मीदवार बनने को तैयार नहीं हो रहा है । ऐसे में वंदना निगम ने अजय डैंग के सहारे/भरोसे ही चुनावी राजनीति में बने/टिके रहने की कोशिश शुरू की है; और इस कोशिश के चलते ही उन्होंने अजय डैंग को डिस्ट्रिक्ट के आयोजनों में आगे आगे रखना/रखवाना शुरू किया है । उन्होंने अजय डैंग को आश्वस्त किया है कि दो वर्षों के लिए गवर्नर चुनने की जब स्थिति आयेगी तब सौदेबाजी के जरिये वह एक वर्ष के लिए अजय डैंग को 'चुनवा' देंगी । कुछेक लोगों को लगता है और उनका कहना है कि इस तरह से वंदना निगम ने वास्तव में अजय डैंग से और पैसे ऐंठने तथा उनके संसाधनों का उपयोग कर लेने का मौका बनाया है । डिस्ट्रिक्ट में कई लोगों को लगता है कि अजय डैंग लायनिज्म और लायंस इंटरनेशनल के साथ दोहरा खेल नहीं खेल सकते हैं - एक तरफ तो वह लायंस इंटरनेशनल के साथ कोर्ट-कचहरी कर रहे हैं, और दूसरी तरह वंदना निगम के सहारे इस वर्ष होने वाले चुनाव में 'चुने' जाने की उम्मीद कर रहे हैं । अजय डैंग क्या कर रहे हैं, इस पर तो लीडरशिप का कोई बस नहीं है - लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वंदना निगम से तो लीडरशिप के नेता सवाल कर ही सकते हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उन्हें लायंस इंटरनेशनल व लायनिज्म के साथ इस तरह का खिलवाड़ नहीं करना चाहिए ।
मल्टीपल काउंसिल की मीटिंग में विनोद खन्ना ने वंदना निगम को यही पाठ पढ़ाते हुए उन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उनकी जिम्मेदारी याद दिलाई है । अपने नजदीकियों के बीच इस मामले में वंदना निगम भले ही विनोद खन्ना की प्रशासनिक हैसियत पर सवाल उठा रही हों, और बलविंदर सैनी पर दोषारोपण कर रही हों - लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि वास्तव में वह विनोद खन्ना से मिली नसीहत को गंभीरता से लेती हैं, या अजय डैंग से फायदा उठाते हुए उन्हें तवज्जो देती/दिलवाती रहती हैं ?

Saturday, September 8, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सेंट्रल काउंसिल चुनाव में नॉर्दर्न रीजन में संजीव चौधरी की उम्मीदवारी की संभावना बनने के बावजूद संजीव सिंघल के नजदीकियों और समर्थकों का दावा है कि संजीव चौधरी की उम्मीदवारी नहीं आ रही है, और यह बात जल्दी ही स्पष्ट हो जाएगी

नई दिल्ली । संजीव चौधरी के सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ने की संभावना के फिर से बलबती होने के संकेतों ने संजीव सिंघल के लिए मुसीबत बढ़ा देने का काम किया है । उल्लेखनीय है कि संजीव चौधरी की उम्मीदवारी को लेकर अभी तक भी हाँ/न की स्थिति बनी हुई है । उनके नजदीकियों के लिए भी दावे के साथ यह बता पाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव ही है कि वह सचमुच उम्मीदवार बनेंगे या नहीं; उनके नजदीकियों का कहना है कि संजीव चौधरी बड़े 'टफ' व्यक्ति हैं, और उनके मन की थाह लेना बड़ा मुश्किल काम है; उनके नजदीकियों को ही लगता है कि उनके दाएँ हाथ के लिए भी यह समझ पाना मुश्किल होता होगा कि उनका बायाँ हाथ क्या कर रहा है ? संजीव चौधरी के इसी रवैये के कारण सेंट्रल काउंसिल के लिए उनकी उम्मीदवारी एक पहेली बनी हुई है । चूँकि वह एक उम्मीदवार के रूप में सक्रिय नहीं दिख रहे हैं, इसलिए उनकी उम्मीदवारी के संदर्भ में अभी तक 'हाँ' की बजाये 'न' का पलड़ा भारी दिख रहा था; लेकिन अभी जिस तरह से इंस्टीट्यूट की बेवसाईट से उनकी तस्वीर छिपा दी गई है, उससे उनकी उम्मीदवारी के संदर्भ में 'हाँ' का पलड़ा अचानक से भारी हो उठा है । उल्लेखनीय है कि चुनावी आचार-संहिता का पालन करने के लिए इंस्टीट्यूट की बेवसाईट में पुनर्निर्वाचन के लिए चुनाव में जाने/उतरने वाले काउंसिल सदस्यों की तस्वीर को छिपा देने का चलन या नियम है । इसी के चलते इंस्टीट्यूट की बेवसाईट में उन काउंसिल सदस्यों की तस्वीरों को छिपा दिया गया है, जो सेंट्रल काउंसिल में पुनर्निर्वाचन के लिए 'तैयारी' कर रहे हैं । छिपाई गई तस्वीरों में चूँकि संजीव चौधरी की भी तस्वीर है, इसलिए लोगों को विश्वास हो चला है कि संजीव चौधरी सेंट्रल काउंसिल में पुनर्निर्वाचन के लिए उम्मीदवार हो रहे हैं ।
संजीव चौधरी के उम्मीदवार हो सकने की संभावना के जोर पकड़ने से संजीव सिंघल की हालत पतली होती दिख रही है । दरअसल दोनों संजीव बिग फोर के प्रतिनिधि के रूप में चुनावी परिदृश्य में हैं, लेकिन चुनावी परिदृश्य में माना/समझा जाता है कि बिग फोर के 'स्टाफ' में जो चार्टर्ड एकाउंटेंट्स हैं, वह सिर्फ एक को ही चुनाव जितवा सकते हैं । प्रैक्टिस करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच बिग फोर की पहचान एक 'दुश्मन' प्रतिद्धंद्धी जैसी है । इसीलिए बिग फोर के उम्मीदवार प्रैक्टिस करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के ज्यादा मुँह नहीं लगते हैं, और वह अपने 'स्टाफ' चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के ही भरोसे रहते हैं । संजीव सिंघल बिग फोर के पहले ऐसे उम्मीदवार हैं, जिन्होंने प्रैक्टिस करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच पिछले दिनों अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के लिए काफी सक्रियता दिखाई है । संजीव सिंघल को यह सब करने की जरूरत दरअसल इसीलिए पड़ी, क्योंकि संजीव चौधरी की उम्मीदवारी के रहते/होते हुए सिर्फ बिग फोर के स्टाफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के भरोसे तो उनका जीत पाना असंभव ही है । बिग फोर के स्टाफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच भी संजीव चौधरी का ज्यादा प्रभाव माना/पहचाना जाता है । इसलिए बिग फोर के उम्मीदवार होने के बावजूद संजीव सिंघल ने प्रैक्टिस करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच पहचान और प्रभाव बनाने का जोरदार प्रयास किया । संजीव सिंघल ने इसके लिए हर हथकंडा आजमाया । गिरीश आहुजा और इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा के साथ नजदीकी बनाने और उसे 'दिखा' कर भी संजीव सिंघल ने लोगों को भरमाने का प्रयास किया है - लेकिन उनके नजदीकियों का ही कहना/बताना है कि इस तरह की तरकीबों से उन्हें कोई चुनावी फायदा होता हुआ अभी तक तो नहीं नजर आ रहा है ।
संजीव सिंघल तमाम प्रयास कर लेने के बावजूद प्रैक्टिस करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच समर्थन को लेकर आश्वस्त नहीं हो पा रहे हैं । असल में, अपने कई कार्यक्रमों में संजीव सिंघल को प्रैक्टिस करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की तरफ से बिग फोर की भूमिका को लेकर तीखे सवालों का सामना करना पड़ा है - जिसके चलते किसी भी रूप में संजीव सिंघल के पक्ष में माहौल बनता हुआ नहीं दिख रहा है । ऐसे में उनके लिए एक अकेली उम्मीद यही है कि संजीव चौधरी उम्मीदवार न बनें - तो उनकी दाल गले । संजीव चौधरी लेकिन अपनी उम्मीदवारी को लेकर सस्पेंस बनाये हुए हैं । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में बिग फोर की दिलचस्पी का अध्ययन करने वाले लोगों का मानना/कहना है कि संजीव चौधरी जिस तरह से अपनी उम्मीदवारी पर सस्पेंस बना कर संजीव सिंघल को छका रहे हैं, उसके पीछे बिग फोर कंपनियों की आपसी उठा-पटक भी कारण हो सकती है । संजीव चौधरी का रवैया और संजीव सिंघल की प्रैक्टिस करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच पहचान बनाने तथा समर्थन जुटाने की कोशिशों से लगता है कि बिग फोर में संजीव सिंघल के लिए हालात अनुकूल नहीं हैं । संजीव सिंघल के नजदीकियों और समर्थकों का भी मानना और कहना/बताना है कि संजीव चौधरी अपनी उम्मीदवारी को लेकर सस्पेंस सिर्फ इसलिए बनाये हुए हैं, ताकि वह संजीव सिंघल को अपनी 'पकड़' में लाने में कामयाब हो जाएँ; अन्यथा यह तय है कि संजीव चौधरी की उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं हो रही है; नजदीकियों और समर्थकों का दावा है कि संजीव चौधरी की उम्मीदवारी नहीं आ रही है, यह बात जल्दी ही स्पष्ट हो जाएगी - और तब संजीव सिंघल के लिए अभी प्रतिकूल दिख रहे हालात अनुकूल हो जायेंगे ।

Friday, September 7, 2018

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में पुणे में संजय पवार को धोखे में रख कर सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत की गई सर्वेश जोशी की उम्मीदवारी ने वोटों के समीकरण को ऐसा गड़बड़ाया है कि संजय पवार के साथ-साथ शेखर चितले के लिए भी मुसीबत पैदा हो गई लगती है

पुणे । सर्वेश जोशी ने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करके न सिर्फ संजय पवार, बल्कि शेखर चितले की उम्मीदवारी के लिए भी मुसीबतें खड़ी कर दी हैं । सबसे बुरा तो संजय पवार के साथ हुआ - वह बेचारे इस उम्मीद में थे कि सर्वेश जोशी उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे और उन्हें वोट दिलवायेंगे; पर अब जब सर्वेश जोशी खुद ही उम्मीदवार हो गए हैं, तो संजय पवार की सारी उम्मीदें बुरी तरह ध्वस्त हो गई हैं । संजय पवार को पुणे में सर्वेश जोशी के नजदीकी के रूप में देखा/पहचाना जाता है, और इस नाते हर किसी को विश्वास था कि संजय पवार यदि सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनने की तैयारी कर रहे हैं, तो निश्चित ही सर्वेश जोशी से विचार-विमर्श करके और उनकी सहमति मिलने पर ही कर रहे होंगे । उल्लेखनीय है कि पुणे में इंस्टीट्यूट की छोटी से बड़ी चुनावी राजनीति तक को जानने/समझने वाले लोगों का मानना और कहना है कि पिछली बार एसबी जावरे ने यशवंत कसार के जरिये सर्वेश जोशी की रीजनल काउंसिल की उम्मीदवारी के लिए जो फंदा तैयार किया था, उससे निपटने के लिए सर्वेश जोशी ने ही संजय पवार को सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनाया/बनवाया था । उनकी तरकीब काम कर गई थी और एसबी जावरे अपने 'फंदे' को उतारने/लपेटने के लिए मजबूर हो गए थे - और सर्वेश जोशी किसी तरह रीजनल काउंसिल की अपनी सदस्यता बचा लेने में कामयाब हो गए थे । लोगों को उम्मीद भी थी और विश्वास भी था कि संजय पवार के पिछली बार किए गए इस अहसान को सर्वेश जोशी याद रखेंगे और इस बार सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत होने वाली संजय पवार की उम्मीदवारी के समर्थन में काम करेंगे । सर्वेश जोशी ने लेकिन सभी उम्मीदों और विश्वासों को ठेंगा दिखाते हुए सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी ही उम्मीदवारी प्रस्तुत कर दी है । इससे लोगों को लगा है कि सर्वेश जोशी अभी तक संजय पवार को सिर्फ अपने फायदे के लिए इस्तेमाल ही कर रहे थे, और संजय पवार के साथ उनकी नजदीकी सिर्फ एक धोखा थी ।
सर्वेश जोशी की इस हरकत से सेंट्रल काउंसिल के लिए चुनावी तैयारी कर रहे संजय पवार को तो झटका लगा ही है, शेखर चितले की तैयारी के लिए भी मुसीबत पैदा हुई है । शेखर चितले को एसबी जावरे के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता है; और इस नाते सर्वेश जोशी तथा संजय पवार के बीच के झगड़े का उनकी उम्मीदवारी पर यूँ तो कोई सीधा प्रभाव पड़ता नजर नहीं आता है - लेकिन सर्वेश जोशी से मिले धोखे से संजय पवार के प्रति जो हमदर्दी पैदा हुई दिख रही है, उसे शेखर चितले के लिए जरूर एक चुनौती के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । खुद शेखर चितले के समर्थकों को लग रहा है कि सर्वेश जोशी के 'व्यवहार' की प्रतिक्रिया में संजय पवार जिस तरह से 'विक्टिम कॉर्ड' खेल रहे हैं, उससे वह लोगों की हमदर्दी पा लेंगे - और जो शेखर चितले को भी नुकसान पहुँचाने का काम करेगी । शेखर चितले को एसबी जावरे का समर्थन जरूर है और एसबी जावरे उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का प्रयास भी करेंगे ही - लेकिन लोगों को लगता नहीं है कि एसबी जावरे उन्हें अपने जैसा समर्थन दिलवा सकेंगे । शेखर चितले की लोगों के बीच कोई ज्यादा सक्रियता और संलग्नता भी नहीं रही है - लोग उन्हें एसबी जावरे के नजदीकी होने के नाते ही जानते/पहचानते हैं । शेखर चितले के समर्थकों को लगता है और उनका कहना भी है कि सेंट्रल काउंसिल के लिए यदि चुनाव सीधे-सीधे शेखर चितले और संजय पवार के बीच हो रहा होता, तो शेखर चितले निश्चित ही बेहतर स्थिति में होते - लेकिन सर्वेश जोशी की उम्मीदवारी ने वोटों के समीकरण को ऐसा गड़बड़ाया है कि संजय पवार के साथ-साथ शेखर चितले के लिए भी मुसीबत पैदा हो गई है ।
मजे की बात यह है कि पुणे में सेंट्रल काउंसिल के तीनों उम्मीदवारों में सर्वेश जोशी को बाकी दोनों से बेहतर स्थिति में देखा/आँका जा रहा है, लेकिन फिर भी किसी को यकीन नहीं है कि वह सेंट्रल काउंसिल में जा सकेंगे । सर्वेश जोशी के विरोधियों के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले लोगों का भी मानना और कहना है कि सर्वेश जोशी रीजनल काउंसिल सदस्य और पदाधिकारी के रूप में लोगों को चूँकि लगातार 'दिखते' रहे हैं, इसलिए लोगों के बीच उनका 'परिचय' है और सीनियर्स के साथ-साथ नए बने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स भी उन्हें जानते/पहचानते हैं; जबकि संजय पवार और शेखर चितले को तो अभी लोगों के बीच पहचान व परिचय बनाने का ही काम करना है - इस नाते सर्वेश जोशी फिलहाल तो संजय पवार और शेखर चितले से बेहतर स्थिति में हैं । लेकिन इन्हीं लोगों का मानना और कहना यह भी है कि सर्वेश जोशी ने रीजनल काउंसिल सदस्य के रूप में चूँकि कुछ भी उल्लेखनीय काम नहीं किया है, और न वह किसी के काम ही आये हैं - जिस कारण उनके संगी/साथी ही उनका साथ छोड़ते गए हैं, इसलिए सेंट्रल काउंसिल उम्मीदवार के रूप में वोट जुटा पाना उनके लिए मुश्किल ही होगा । लोग याद कर रहे हैं कि पिछली बार सर्वेश जोशी रीजनल काउंसिल की अपनी सदस्यता ही मुश्किल से बचा पाए थे; पुणे के उम्मीदवारों में ही वह पहली प्राथमिकता के वोटों की गिनती में सत्यनारायण मूंदड़ा और अंबरीश वैद्य से पीछे रहते हुए तीसरे नंबर पर रहे थे । लोगों का तर्क है कि पिछली बार जो व्यक्ति रीजनल काउंसिल की अपनी सदस्यता को मुश्किल से बचा पाया हो, वह सेंट्रल काउंसिल उम्मीदवार के रूप में क्या झंडा गाड़ पायेगा - इसे सहज ही समझा जा सकता है । संजय पवार और शेखर चितले के सामने समस्या यह है कि अभी उन्हें सर्वेश जोशी से भी पीछे समझा/देखा जा रहा है; ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह दोनों अपना अपना प्रचार अभियान किस तरह संयोजित करते और चलाते हैं, ताकि यह कम-अस-कम चुनावी मुकाबले में आते हुए तो नजर आएँ ।

Thursday, September 6, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 के मिलियन डॉलर फंडरेजर डिनर कार्यक्रम में गुलाम वहनवती के सामने राजेश गुप्ता और विनोद बंसल के खिलाफ बकवासबाजी करके रवि चौधरी ने अब अपने ही समझे जाने वाले लोगों के खिलाफ मोर्चा खोला

नई दिल्ली । निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी की एक हरकत ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय भाटिया, पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल और राजेश गुप्ता के 'प्लान' में लगता है कि एक साथ 'बत्ती' लगा दी है । राजेश गुप्ता, विनोद बंसल के क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली राजधानी के पूर्व प्रेसीडेंट हैं, और डिस्ट्रिक्ट से एकेएस सोसायटी के अभी तक बने पाँच सदस्यों में एक सदस्य हैं और दूसरे नंबर पर बने सदस्य हैं । एक सामान्य रोटेरियन होते हुए राजेश गुप्ता ने रोटरी में जितने पैसे दान किए हैं, उसके कारण वह रोटेरियंस के बीच कुछेक के लिए प्रशंसा व प्रेरणा तो कुछेक के बीच ईर्ष्या के पात्र बने हैं । अभी हाल ही में डिस्ट्रिक्ट में आयोजित हुए मिलियन डॉलर फंडरेजर डिनर में रोटरी फाउंडेशन ट्रस्टी गुलाम वहनवती के सामने रवि चौधरी ने राजेश गुप्ता और विनोद बंसल के खिलाफ जिस तरह का जहर उगला, उससे जाहिर हुआ कि रवि चौधरी उन लोगों में हैं जो राजेश गुप्ता से ईर्ष्या करते हैं । राजेश गुप्ता के प्रति रवि चौधरी की खुन्नस व बौखलाहट को देखते/सुनते हुआ कुछेक लोगों ने कहा भी कि रवि चौधरी ने खुद तो रोटरी के लिए कुछ किया नहीं है, राजेश गुप्ता आगे बढ़ कर कुछ कर रहे हैं तो उनसे जल रहे हैं, और उन पर अनाप-शनाप आरोप लगा रहे हैं । प्रत्यक्षदर्शियों में से कुछेक को गुलाम वहनवती का रवैया और व्यवहार भी नागवार लगा । उन्हें यह देख कर बुरा लगा और अफसोस हुआ कि फाउंडेशन ट्रस्टी के पद पर बैठा व्यक्ति रोटरी फाउंडेशन के लिए बढ़चढ़ कर काम करने वाले राजेश गुप्ता और विनोद बंसल के लिए रवि चौधरी द्वारा की जा रही बकवास में मजे ले रहा है और इस तरह रवि चौधरी को उत्साहित कर रहा है ।
मिलियन डॉलर फंडरेजर डिनर कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे गुलाम वहनवती को एक मौके पर राजेश गुप्ता दरअसल यह बता रहे थे कि वह इस वर्ष हंड्रेड परसेंट मेजर डोनर सदस्यों का एक क्लब बना रहे हैं; गुलाम वहनवती यह सुन कर खुश हो रहे थे और उन्हें शाबासी व शुभकामनाएँ देते हुआ बता रहे थे कि रोटरी के इतिहास में यह पहला ऐसा क्लब होगा । राजेश गुप्ता और गुलाम वहनवती की यह बातचीत पास ही खड़े रवि चौधरी भी सुन रहे थे - किसी को कुछ अच्छा करता देख बर्दाश्त न करने की फितरत के चलते रवि चौधरी ने भड़क कर गुलाम वहनवती को कहना/बताना शुरू किया कि यह लोग रोटरी के नाम पर धंधा करते हैं और पैसे बनाते हैं; रवि चौधरी ने उन्हें यह भी बताया कि पिछले वर्ष इन्होंने ग्लोबल ग्रांट के लिए एक प्रोजेक्ट बनाया/दिया था, लेकिन इनकी नीयत को पहचान कर मैंने तो इनका प्रोजेक्ट रिजेक्ट कर दिया था; आदि-इत्यादि । रवि चौधरी ने उन्हें यह भी बताया/कहा कि राजेश गुप्ता की इन हरकतों को विनोद बंसल की शह है । रवि चौधरी की इस तरह की बातों को सुन कर और गुलाम वहनवती को उनकी बातों में दिलचस्पी लेता देख कर राजेश गुप्ता के लिए असहज-सी स्थिति बन गई । वहाँ मौजूद दो-एक लोगों ने बात को सँभाला और रवि चौधरी को अलग ले जा कर यह कहते हुए उन्हें चुप करवाने की कोशिश की कि उन्हें राजेश गुप्ता या उनके किसी काम से कोई शिकायत है तो उसे डिस्ट्रिक्ट में हल करो, बाहर के और रोटरी के बड़े पदाधिकारियों के सामने इस तरह डिस्ट्रिक्ट की बदनामी क्यों करते हो ? रवि चौधरी को यह भाँपने/समझने में देर नहीं लगी कि उन्होंने यदि अपनी बदतमीजी जारी रखी, तो उन्हें ही फजीहत का सामना करना पड़ेगा - लिहाजा उस समय तो वह शांत हो गए, लेकिन बाद में वह राजेश गुप्ता और विनोद बंसल को अलग अलग लोगों के बीच निशाना बनाने से नहीं चूके ।
रवि चौधरी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अलग-अलग आरोपों के निशाने पर लेते रहे हैं, और उन पर रोटरी के नाम पर धंधा करने तथा प्रोजेक्ट्स में हेराफेरी करने के आरोप लगाते रहे हैं । राजेश गुप्ता और विनोद बंसल पर उनका आरोप है कि यह रोटरी में एक रुपया खर्च करके रोटरी से चार रुपए ले लेते हैं, और फिर उसमें से अपना रुपया तो निकाल ही लेते हैं, और कमाई भी कर लेते हैं । रवि चौधरी उनके क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली राजधानी को मिली एक करीब सवा चार करोड़ रुपए की मैचिंग ग्रांट से जुड़े प्रोजेक्ट का हवाला देते हैं, जो लगातार विवाद तथा संदेह के घेरे में रहा है - जिस कारण रोटरी इंटरनेशनल को इस ग्रांट का तीन बार ऑडिट करवाना पड़ा, और उसके बावजूद उक्त प्रोजेक्ट रोटरी क्लब दिल्ली राजधानी से छिन भी गया । रवि चौधरी लोगों को बता रहे हैं कि विनोद बंसल और राजेश गुप्ता की जोड़ी ने पिछले वर्ष उन्हें एक प्रोजेक्ट रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें ग्लोबल ग्रांट के तहत रोटरी फाउंडेशन से एक मोटी रकम लेने की उनकी योजना थी - लेकिन प्रोजेक्ट से संबंधित डिटेल्स वह यह कहते हुए देने से मना कर रहे थे कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में मैं प्रोजेक्ट को बस आगे बढ़ा दूँ, बाकी काम वह करवा लेंगे । रवि चौधरी कह/बता रहे हैं कि विनोद बंसल और राजेश गुप्ता के तरीके और इरादे उन्हें उचित नहीं लगे और इसलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उन्होंने उनके प्रोजेक्ट को वापस कर दिया । रवि चौधरी का कहना है कि हंड्रेड परसेंट मेजर डोनर सदस्यों का क्लब भी राजेश गुप्ता और विनोद बंसल इसलिए बनवा रहे हैं, ताकि इसकी आड़ में वह ग्लोबल ग्रांट के नाम पर मोटी रकम ले सकें - वह जो रकम रोटरी को देंगे, उसकी चार गुनी ग्लोबल ग्रांट के नाम पर रोटरी से ले लेंगे । रवि चौधरी का आरोप है कि इस तरह यह लोग रोटरी को दान नहीं देते हैं, बल्कि रोटरी में इन्वेस्ट करते हैं - और फिर मुनाफे सहित अपने पैसे को वापस पाने के लिए तिकड़में करते हैं ।
रवि चौधरी के इन आरोपों पर राजेश गुप्ता और विनोद बंसल की तरफ से यही कहा/सुना गया है कि रवि चौधरी की इस तरह की बातों से रोटरी की छवि ही खराब होगी और रोटरी से जुड़ने से तथा रोटरी फाउंडेशन में पैसे देने से लोग बचेंगे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय भाटिया को चिंता यह होने लगी है कि रवि चौधरी के इस रवैये से विनोद बंसल तथा राजेश गुप्ता द्वारा हंड्रेड परसेंट मेजर डोनर सदस्यों वाले क्लब बनाने के काम में कहीं बाधा न पड़ जाये - और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में वह एक 'उपलब्धि' से कहीं वंचित न हो जाएँ ? मजे की बात है कि विनय भाटिया के साथ रवि चौधरी के खासे अच्छे संबंध रहे हैं, और दोनों लोग लोगों के सामने 'छोटे भाई-बड़े भाई' बनते रहे हैं, और विनोद बंसल भी जब-तब रवि चौधरी की बदतमीजियों पर पर्दा डालने  तथा उन पर लीपापोती करने और या उन्हें उचित ठहराने का प्रयास करते रहे हैं और उनका पक्ष लेते रहे हैं । रवि चौधरी कुछेक बार सार्वजनिक रूप से विनोद बंसल की लानत-मलानत भी करते रहे हैं, लेकिन विनोद बंसल ने उनकी हरकतों की अनदेखी ही की है । लोगों को लगता है कि इसी कारण से रवि चौधरी का हौंसला अब इतना बढ़ गया है कि वह विनोद बंसल को रोटरी के बड़े नेताओं के सामने भी बेइज्जत करने लगे हैं । लोगों का कहना है कि विनोद बंसल ने रवि चौधरी के रूप में जो 'भस्मासुर' पाला है, वही अब उनके और - राजेश गुप्ता तथा विनय भाटिया जैसे उनके नजदीकियों के लिए मुसीबत बन गया है ।

Wednesday, September 5, 2018

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू के थाईलैंड में हुए अधिष्ठापन समारोह में बदइंतजामी और लूट-खसोट का शिकार हुए लोगों को भड़काने का इंद्रजीत सिंह पर आरोप लगा कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि मेहरा अपनी फजीहत और 'कमाई' को सचमुच बचा सकेंगे क्या ?

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि मेहरा ने थाईलैंड मामले से जुड़े विवाद में निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इंद्रजीत सिंह को लपेट कर, भारत वापस पहुँचने से पहले ही अपने नजदीकियों के जरिये मामले को जो रंग देने का प्रयास किया है - उसे सुन/देख कर लग रहा है कि यह मामला सत्ता खेमे के लोगों की आपसी लड़ाई का जरिया बनेगा । रवि मेहरा के नजदीकियों की तरफ से अचानक से आरोप सुने जा रहे हैं कि थाईलैंड मामले में इंद्रजीत सिंह लोगों को भड़का रहे हैं, और इस तरह रवि मेहरा को बदनाम करने, उन्हें परेशान करने तथा उनके गवर्नर-वर्ष को खराब करने के लिए माहौल बना रहे हैं । मजे की बात यह है कि इस तरह के आरोपों पर उन लोगों ने भी हैरानी प्रकट की है, जो इंद्रजीत सिंह के विरोधी के रूप में देखे/पहचाने जाते हैं । उनका भी कहना है कि थाईलैंड मामले में जो कुछ भी हुआ है, उससे रवि मेहरा का नाकारापन और लालची/स्वार्थी रूप ही सामने आया है; उन्होंने आयोजन की न तो ठीक से प्लानिंग की, न उसे उचित तरीके से व्यावहारिक रूप देने की कोशिश की, और जब समस्याओं ने सामने आना शुरू किया - तब भी वह उन्हें हल करने की कोशिश करने की बजाये उनसे बचते/छिपते और उनकी अनदेखी करते नजर आए; जिस कारण मामला और ज्यादा गंभीर होता गया । लोगों को लग रहा है कि रवि मेहरा ने भी यह तो समझ लिया है कि भारत लौटने पर बदइंतजामी को लेकर उनकी भारी फजीहत होनी है, इसलिए उन्होंने अपने नजदीकियों के जरिये पहले से ही निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इंद्रजीत सिंह को घेरने की तैयारी शुरू कर दी है, ताकि मामला डायवर्ट हो और अकेले उन्हें ही निशाना न बनना पड़े । बेशर्मी और विडंबना की बात यह है कि रवि मेहरा की तरफ से मामले को व्यावहारिक व सम्मानजनक तरीके से हल करने के प्रयास होने की कोई आहट नहीं सुनाई पड़ी है, सुनाई पड़े हैं इंद्रजीत सिंह पर मामले को हवा देने के आरोप । लोगों का कहना है कि एक बार के लिए उनके आरोप को यदि सच भी मान लें, तो रवि मेहरा और उनके नजदीकियों को बताना यह चाहिए कि मामले को - और मामले के कारण पैदा हुई लोगों की नाराजगी को दूर करने के लिए वह क्या कर रहे हैं ?
डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारियों के अधिष्ठापन का कार्यक्रम थाईलैंड में करने की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि मेहरा की तैयारी बदइंतजामी का इस हद तक शिकार बनी कि थाईलैंड के लिए तैयार किए गए पैकेज की रकम उचित समय पर जमा करवाने और फ्लाईट के समय पर एयरपोर्ट पहुँचने के बावजूद कई डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारी थाईलैंड के लिए उड़ान नहीं भर सके और उन्हें लज्जित व अपमानित महसूस करते हुए घर वापस लौटना पड़ा । लोगों का पूछना है कि इसके लिए क्या इंद्रजीत सिंह जिम्मेदार हैं ? बदइंतजामी के चलते बदकिस्मती ने सिर्फ उन्हीं लोगों को अपना शिकार नहीं बनाया जो थाईलैंड के लिए उड़ान नहीं भर सके, बल्कि जो लोग थाईलैंड पहुँच भी गए - उन्हें भी शिकार बनाया । थाईलैंड पहुँचे लायंस पदाधिकारियों से एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए अतिरिक्त पैसे माँगे गए, और जो पैसे देने को नहीं राजी हुए उन्हें पराये देश में सड़क पर रहने के लिए छोड़ दिया गया । लोगों का पूछना है कि इसके लिए क्या इंद्रजीत सिंह जिम्मेदार हैं ? लोगों का बहुत साफ आरोप है कि थाईलैंड के कार्यक्रम में जो भी बदइंतजामी हुई है, उसके लिए सिर्फ और सिर्फ रवि मेहरा की लालची और लूट-खसोट भरी हरकत जिम्मेदार है । थाईलैंड कार्यक्रम की आड़ में रवि मेहरा ने मोटी कमाई करके अपनी जेब भरने की जो योजना बनाई थी, उसी के तहत उन्होंने पैकेज की कीमत बसूलने के बाद भी वीजा तथा अन्य मदों के लिए अतिरिक्त पैसों की बार-बार माँग की और बसूली की; इसके चलते अव्यवस्था फैली, जिसका नतीजा रहा कि रवि मेहरा की पैसों की हर माँग को पूरा करने के बावजूद लोगों को बहुत बुरी तरह से परेशान होना पड़ा । परेशान और अपमानित/लज्जित हुए लोगों ने बबाल करना शुरू किया है, जिसे देख/सुन कर रवि मेहरा को भी इस खतरे का आभास हो चला है कि इस मामले में उनकी फजीहत तो होगी ही, साथ ही थाईलैंड दौरे में हुई 'कमाई' से भी उन्हें कहीं हाथ न धोना पड़ जाए । इसलिए उन्होंने अपने नजदीकियों के जरिये इंद्रजीत सिंह को लपेटे में लेना शुरू कर दिया है, ताकी भड़के लोगों को ज्यादा समर्थन न मिल सके - और वह अपनी 'कमाई' बचा सकें । 
उल्लेखनीय है कि इंद्रजीत सिंह के साथ रवि मेहरा की पहले से ही काफी खटपट चल रही है । इंद्रजीत सिंह का आरोप रहा है कि एक निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को जो और जितना सम्मान मिलना चाहिए, रवि मेहरा उन्हें उतना सम्मान नहीं दे रहे हैं; उधर रवि मेहरा की शिकायत रही है कि इंद्रजीत सिंह अभी भी अपने आप को गवर्नर समझ रहे हैं, और उन्हें काम नहीं करने दे रहे हैं । पिछले दिनों रवि मेहरा यह देख कर खासे भड़के कि कुछेक क्लब्स ने इंद्रजीत सिंह से अपने नए पदाधिकारियों को अधिष्ठापित करवाया, जिसके बाद रवि मेहरा ने क्लब्स को निर्देश दिए कि नए पदाधिकारियों को अधिष्ठापित करवाने का काम सिर्फ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर - यानि उनसे ही करवाया जाए । रवि मेहरा के इस निर्देश के चलते अगले कुछ दिनों में होने वाले कुछेक प्रमुख क्लब्स के अधिष्ठापन कार्यक्रमों को बदला गया, और उनमें अधिष्ठापन अधिकारी के रूप में शामिल किया गया इंद्रजीत सिंह का नाम हटाया गया । इस प्रसंग ने इंद्रजीत सिंह और रवि मेहरा के बीच खटपट को और बढ़ाने का काम किया है । रवि मेहरा ने इसी स्थिति का फायदा उठाते हुए इंद्रजीत सिंह को थाईलैंड मामले में लपेट लिया है । उन्हें विश्वास है कि डिस्ट्रिक्ट के और खेमे के लोग उनकी इस बात पर सहज ही विश्वास कर लेंगे कि बदइंतजामी के कारण नाराज हुए लोगों को भड़काने का काम इंद्रजीत सिंह कर रहे हैं, ताकि वह उनसे बदला ले सकें । भारत वापस लौटने से पहले ही रवि मेहरा ने अपने आपको और अपनी 'कमाई' को बचाने के लिए इंद्रजीत सिंह को मामले में लपेट कर दाँव तो अच्छा चला है, लेकिन लगता नहीं है कि इससे उन्हें कोई राहत मिलेगी । बदइंतजामी और धोखाधड़ी व लूट-खसोट का शिकार हुए लोग जिस कदर नाराज हैं, और अपनी नाराजगी को लेकर जिस तरह उन्होंने पुलिस तक में शिकायत दर्ज करवा दी है, उससे लगता नहीं है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि मेहरा फजीहत से बच सकेंगे ।

Tuesday, September 4, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में सतीश सिंघल की व्यूह रचना में शामिल होने की मुकेश अरनेजा, दीपक गुप्ता व आलोक गुप्ता की 'तैयारी' ने अशोक अग्रवाल के लिए चुनौती पैदा की तथा अमित गुप्ता के लिए मौका बनने के संकेत दिए हैं

नोएडा । रोटरी क्लब नोएडा एक्सेलेंस के नए पदाधिकारियों के अधिष्ठापन समारोह में मुकेश अरनेजा के मुख्य अतिथि तथा दीपक गुप्ता व आलोक गुप्ता के गेस्ट ऑफ ऑनर बनने ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में जो करंट पैदा किया है, उसने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में अशोक अग्रवाल के लिए चुनौती और अमित गुप्ता के लिए एक बेहतर मौका बनाने वाली स्थितियाँ पैदा की हैं । उल्लेखनीय है कि नोएडा एक्सेलेंस के इस समारोह को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत रवि सचदेवा की उम्मीदवारी के प्रमोशन के उपक्रम के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । मजे की बात यह है कि तीनों ही - मुकेश अरनेजा, दीपक गुप्ता और आलोक गुप्ता लोगों को यह भरोसा दिलाने का प्रयास भी कर रहे हैं कि नोएडा एक्सेलेंस के अधिष्ठापन समारोह में उनके जाने को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए - और इसे रोटरी की एक गतिविधि के रूप में ही देखा जाना चाहिए । हालाँकि सयाने लोग जानते/समझते हैं कि सिर्फ रोटरी में ही नहीं, बल्कि जीवन और जगत में भी जो कुछ भी 'होता' है, उसका कोई न कोई खास उद्देश्य होता ही है - निरुद्देश्य या बेमतलब में तो पत्ता भी नहीं हिलता है । इसीलिए नोएडा एक्सेलेंस के अधिष्ठापन समारोह में जाने के पीछे कोई राजनीति न देखने के उक्त तीनों के आग्रह को राजनीति जानने/समझने वाले लोगों ने स्वीकार नहीं किया है; और माना/कहा जा रहा है कि यह पूरी तरह से एक राजनीतिक 'मूव' है - इसे राजनीतिक मूव स्वीकार करने से इंकार सिर्फ इसलिए किया जा रहा है ताकि इसके फेल हो जाने पर यह कह कर बचा जा सके कि 'हम' तो कोई राजनीति कर ही नहीं रहे थे !
सात सितंबर को होने जा रहे उक्त कार्यक्रम में इन तीनों के साथ सतीश सिंघल के भी 'दिखने' की संभावना है । इससे पिछले रोटरी वर्ष के उस घटना चक्र को याद करना प्रासंगिक होगा जब आलोक गुप्ता को चुनावी फायदा पहुँचवाने के लिए जल्दी चुनाव कराने से जुड़ी हलचल को देखते हुए, पूछे जाने पर इन चारों ने ही जल्दी चुनाव करवाने की बात से साफ-साफ इंकार किया था - लेकिन फिर जल्दी चुनाव करवा लिए थे । पहले इंकार और फिर स्वीकार का नाटक इसीलिए किया गया था, ताकि पूरी व्यवस्था कर लेने तथा पूरी तरह आश्वस्त हो लेने के बाद ही 'कार्यक्रम' की घोषणा की जाए । पिछले वर्ष के इसी 'व्यवहार' को देखते हुए लोगों को लग रहा है कि मुकेश अरनेजा, दीपक गुप्ता और आलोक गुप्ता पहले देख और समझ लेना चाहते हैं कि रवि सचदेवा की उम्मीदवारी को लेकर डिस्ट्रिक्ट में सचमुच कोई स्वीकार्यता बन भी रही है क्या ? वह यदि आश्वस्त हुए, तो रवि सचदेवा की उम्मीदवारी का झंडा उठायेंगे, अन्यथा यही कहते/बताते रहेंगे कि भई 'हम' तो राजनीति करते नहीं हैं, 'हम' तो राजनीति से दूर ही रहते हैं, 'हम' तो अमित गुप्ता और अशोक अग्रवाल के कार्यक्रमों में भी गए हैं । राजनीति न करने का दावा करना भी हालाँकि राजनीति का एक बहुत पुराना दाँव है ।
इन तीनों की भूमिका इस कारण से भी संदेहास्पद बनी है कि यह तीनों घोषित रूप से असिस्टेंट गवर्नर्स द्वारा आयोजित थैंक्स गिविंग कार्यक्रम में नहीं गए थे; क्योंकि उस कार्यक्रम के पीछे सतीश सिंघल को ही देखा/पहचाना गया था - सात सितंबर का कार्यक्रम भी कहने को तो रोटरी क्लब नोएडा एक्सेलेंस के नए पदाधिकारियों के अधिष्ठापन का कार्यक्रम है, लेकिन इसके पीछे मुख्य उद्देश्य रवि सचदेवा की उम्मीदवारी का प्रमोशन तथा शक्ति-प्रदर्शन है - और यह सतीश सिंघल की व्यूह रचना के अनुरूप है । करीब दो महीने पहले हुए थैंक्स गिविंग कार्यक्रम में सतीश सिंघल के नजदीक 'दिखने' से बचने की कोशिश करने वाले मुकेश अरनेजा. दीपक गुप्ता और आलोक गुप्ता को अब सतीश सिंघल के साथ दिखने में कोई समस्या नहीं है - तो इस हृदय परिवर्तन का एक ही कारण समझ में आता है और वह यह कि थैंक्स गिविंग कार्यक्रम की सफलता ने इन तीनों को अहसास कराया है कि सतीश सिंघल के साथ राजनीतिक गठजोड़ किया जा सकता है । इस गठजोड़ की संभावना को और पुख्ता करने के लिए ही इन तीनों ने सतीश सिंघल की व्यूह रचना में शामिल होना स्वीकार किया है । सतीश सिंघल की व्यूह रचना के तहत आ रही रवि सचदेवा की उम्मीदवारी को लेकर अभी भी चूँकि यह पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं, इसलिए यह अभी रवि सचदेवा की उम्मीदवारी का झंडा नहीं उठा रहे हैं; लेकिन जिस तरह से यह उनकी तरफ बढ़ रहे हैं, उसे देख कर समझा जा रहा है कि हालात रवि सचदेवा की उम्मीदवारी के जरा भी अनुकूल नजर आये तो मुकेश अरनेजा, दीपक गुप्ता, आलोक गुप्ता के हाथों में रवि सचदेवा की उम्मीदवारी का झंडा होगा ।
यह स्थिति अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए खासी बड़ी चुनौती खड़ी करती है । दरअसल अभी उन तीनों को अशोक अग्रवाल अपनी उम्मीदवारी के समर्थन में दिखाते/जताते हैं; जो स्थिति बन रही है वह लेकिन यह संकेत दे रही है कि उक्त तीनों लोग अशोक अग्रवाल का विकल्प खोज रहे हैं - यह संकेत अशोक अग्रवाल के लिए मनोवैज्ञानिक रूप से भी और व्यावहारिक कारणों से भी खासे झटके वाला है । इस स्थिति में अमित गुप्ता के समर्थकों व शुभचिंतकों को अमित गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए फायदे का मौका बनता दिख रहा है । उन्हें लगता है कि रवि सचदेवा की उम्मीदवारी को उन तीनों के परोक्ष और या अपरोक्ष समर्थन से जो बल मिलेगा, वह वास्तव में अशोक अग्रवाल की स्थिति को कमजोर करने का काम करेगा और रवि सचदेवा व अशोक अग्रवाल के समर्थक एक-दूसरे पर जो कीचड़ उछालेंगे - उससे लोगों के बीच दोनों की ही स्थिति डावांडोल बनेगी - जिसका फायदा अमित गुप्ता को मिल सकेगा । दरअसल सतीश सिंघल के बहाने रवि सचदेवा को तथा जेके गौड़ की कारस्तानियों के बहाने अशोक अग्रवाल को घेरने की दोनों तरफ से जो कोशिश होगी, उसमें डिस्ट्रिक्ट के लोग एक निर्विवाद उम्मीदवार को चुनना पसंद करेंगे, और तब उनकी पसंद अमित गुप्ता बन सकते हैं । सिद्धांततः और तर्कपूर्ण नजरिये से ठीक लग रही यह उम्मीद सचमुच पूरी हो सकेगी या नहीं, यह इस पर निर्भर करता है कि स्थितियाँ किस रास्ते पर चलती हैं और क्या मोड़ लेती हैं ? 

Monday, September 3, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के कन्वोकेशन समारोह में राजेश शर्मा की हरकतों को देख कर नए बने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स, उनके अभिभावक और मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित जनरल वीके मलिक तक के लिए यह समझना मुश्किल हुआ कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स जैसे प्रोफेशन में ऐसे 'सड़कछाप' लोग हैं कैसे ?

नई दिल्ली । नए बने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को इंस्टीट्यूट की सदस्यता का सर्टीफिकेट देने के लिए यमुना स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में आयोजित हुए कन्वोकेशन समारोह में राजेश शर्मा की हरकतों और कारस्तानियों के कारण इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन को एक बार फिर शर्मिंदा व लज्जित होना पड़ा है, जिसके चलते लोगों के बीच पिछले वर्ष 'सीए डे' पर उनके द्वारा किए गए कारनामों की याद एक बार फिर ताजा हो गई है । इस बार तो राजेश शर्मा की हरकतों ने और गजब ढाया । अभिभावकों द्वारा मंच पर सर्टीफिकेट लेने/देने के दौरान लड़कियों को गलत तरीके से और गलत जगहों पर छूने/पकड़ने के राजेश शर्मा पर लगाए आरोपों ने मामले को खासा गंभीर रूप दे दिया है । अभिभावकों ने इंस्टीट्यूट के स्टॉफ से कार्यक्रम की वीडियो रिकॉर्डिंग के असंपादित - रॉ फुटेज माँगे हैं, ताकि वह राजेश शर्मा के खिलाफ उचित कार्रवाई कर/करवा सकें । राजेश शर्मा ने कार्यक्रम में जिस तरह से अपने लोगों को इकट्ठा करके अपने भाषण में पढ़े घटिया व फूहड़ किस्म की शेर-ओ-शायरी पर उनसे तालियाँ और सीटियाँ बजवाईं, उससे कार्यक्रम की गरिमा सार्वजनिक रूप से पहले ही नष्ट हो चुकी थी । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता का बेबसीभरा नाकारापन एक बार फिर लोगों के सामने आया । यह सब हुआ भारतीय सेना के पूर्व चीफ जनरल वीके मलिक के सामने, जो कन्वोकेशन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे । कुछेक लोगों ने नवीन गुप्ता की यह कहते हुए भी आलोचना की कि वह यदि राजेश शर्मा की हरकतों पर लगाम नहीं लगा सकते हैं, तो उन्हें इंस्टीट्यूट के कार्यक्रमों में बाहर के प्रतिष्ठित लोगों को आमंत्रित नहीं करना चाहिए, ताकि कम से कम बाहर के लोगों को तो न पता चले कि एक गंभीर समझे जाने वाले विषय के इंस्टीट्यूट के आयोजनों में आयोजक-सदस्यों की तरफ से ही किस तरफ की टुच्ची और लफंगईभरी हरकतें होती हैं । 
उल्लेखनीय है कि कल, दो सितंबर को मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद, अहमदाबाद, पुणे, जयपुर, कानपुर के साथ-साथ दिल्ली में भी नए बने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए कन्वोकेशन समारोह हुए । दिल्ली में हुए कन्वोकेशन समारोह में सेंट्रल काउंसिल में नॉर्दर्न रीजन के संजीव चौधरी को छोड़ कर सभी सदस्य तथा नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के कुछेक सदस्य मौजूद थे । नार्दर्न रीजन के करीब ढाई हजार नए बने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए यह समारोह था, जिसके लिए हालाँकि करीब दो हजार नए बने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने रजिस्ट्रेशन करवाया था । इंस्टीट्यूट के स्टॉफ के अनुसार समारोह में करीब 1600 नए बने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स पहुँच सके थे । उनमें से चार/पाँच सौ के अभिभावक भी थे । इस बार अभिभावकों को भी समारोह में शामिल होने की अनुमति दे दी गई थी । कार्यक्रम की शुरुआत में सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को पाँच पाँच मिनट का समय भाषण देने के लिए तय किया गया था । बाकी सभी ने समय-सीमा में थोड़ी-थोड़ी आजादी ली और जो जैसा बोलता/बताता है, उसने वैसा ही बोला/बताया । राजेश शर्मा का जब नंबर आया, तो माहौल एकदम से बदल गया । उनके माइक पर आते ही तालियों और सीटियों का जो शोर मचा, उसे सुन कर मौजूद लोगों ने अनुमान लगा लिया कि राजेश शर्मा ने अपने लोगों को बुला कर यहाँ तमाशा खड़ा करने का इंतजाम किया हुआ है । राजेश शर्मा ने करीब पंद्रह मिनट भाषण दिया, जिसमें हर दो/एक मिनट पर वह एक सस्ता व फूहड़ सा कोई शेर कहते - जिस पर कुछेक लोग तालियाँ पीटते और सीटियाँ बजाते । नए बने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स, उनके अभिभावक और मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित जनरल वीके मलिक यह नजारा देख कर हैरान थे; उनके लिए यह समझना मुश्किल हुआ कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स जैसे प्रोफेशन में ऐसे 'सड़कछाप' लोग हैं कैसे ? इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता तथा कुछेक सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने इशारों इशारों में कई बार प्रयास भी किया कि कम से कम सीटियाँ तो न बजाई जाएँ, लेकिन राजेश शर्मा के लोगों को इस तरह से सिखा/पढ़ा कर लाया गया था कि उन्होंने किसी की नहीं सुनी और जब तक राजेश शर्मा का भाषण व शेर-ओ-शायरी चलती रही - वह अपनी हरकतों को दोहराते हुए इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की पहचान और साख के साथ खिलवाड़ करते रहे । 
इस शर्मनाक वाकये से मिले झटके से इंस्टीट्यूट के पदाधिकारी अभी उबरे भी नहीं थे कि कार्यक्रम के अंतिम चरण में राजेश शर्मा की हरकतों को लेकर एक नया बबाल खड़ा हो गया । समारोह में मौजूद कुछेक अभिभावकों ने आरोप लगाना शुरू किया कि सर्टीफिकेट लेने मंच पर पहुँचने वाली लड़कियों को मंच पर व्यवस्था बनाये रखने के नाम पर गलत तरीके से छू रहे हैं । इंस्टीट्यूट के स्टाफ ने हालाँकि यह शिकायत करने वाले अभिभावकों को यह कहते हुए शांत करने का प्रयास किया कि मंच पर और मंच के सामने इतने लोगों के बीच राजेश शर्मा ऐसी हरकत नहीं कर सकते हैं, और उन्हें गलतफहमी हो रही है । स्टाफ के लोगों ने अनुभव किया कि राजेश शर्मा के भाषण के दौरान जिस तरह का सीन बना, उसे तथा मंच पर राजेश शर्मा की बेमतलब में की जा रही उछल-कूद को देख कर अभिभावकों के बीच राजेश शर्मा को लेकर समझ बनी कि वह कोई सड़कछाप व्यक्ति हैं; और इस समझ के चलते ही लड़कियों को छूने की राजेश शर्मा की हरकत उन्हें नागवार लगी । दरअसल नए बने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को सर्टीफिकेट देने के काम को जल्दी जल्दी पूरा करने के लिए 'व्यवस्था' बनाने हेतु मंच पर मौजूद काउंसिल सदस्य सर्टीफिकेट लेने आने वाले को पकड़ पकड़ कर ठीक जगह पर खड़ा कर रहे थे; इस चक्कर में कई बार खींचा-तानी जैसा दृश्य बनता हुआ नजर आया । लड़कों के मामले में तो यह दृश्य 'चल' गया, लेकिन लड़कियों के संदर्भ में मामला सेंसेटिव हो गया । 
अपनी हरकतों से राजेश शर्मा ने जो पहचान बनाई, कुछ उसके असर में और कुछ व्यवस्था बनाने में उनके ज्यादा सक्रिय होने से अभिभावकों को उनकी हरकत नागवार तथा उनकी 'नीयत' संदेहास्पद लगी है । कुछेक अभिभावकों ने इंस्टीट्यूट के स्टॉफ से समारोह की वीडियो रिकॉर्डिंग के असंपादित, रॉ फुटेज देने की माँग की है; उनका कहना है कि वह वीडियो रिकॉर्डिंग देखेंगे और यदि उन्हें अपना संदेह सही लगा, तो वह राजेश शर्मा को छोड़ेंगे नहीं । अभिभावकों ने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता से भी अनुरोध किया है कि उन्हें राजेश शर्मा की हरकतों पर लगाम लगाना चाहिए । यह अनुरोध करने वाले बेचारे अभिभावकों को राजेश शर्मा के मामले में नवीन गुप्ता की बेबसी का पता नहीं है, इसलिए उन्हें लगता है कि नवीन गुप्ता अवश्य ही उनके अनुरोध पर ध्यान देंगे । उधर मामले की गंभीरता को समझ रहे इंस्टीट्यूट के प्रशासनिक अधिकारियों ने वीडियो रिकॉर्डिंग की माँग कर रहे अभिभावकों को टालने का रवैया अपनाया हुआ है । उन्हें लगता है कि इसी तरीके से राजेश शर्मा की हरकतों से इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की पहचान व छवि को होने वाले और नुकसान से बचा जा सकता है । यह देखना दिलचस्प होगा कि वीडियो रिकॉर्डिंग की माँग कर रहे अभिभावकों को टाल/टरका कर पहचान व छवि के नुकसान से बचने तथा राजेश शर्मा को मुसीबत से बचाने की इंस्टीट्यूट प्रशासन की चाल कामयाब होती है या नहीं ?