Wednesday, January 9, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में अचानक से रवि गुगनानी को 'नीचे' से 'ऊपर' बैठा कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय भाटिया व डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर विनोद बंसल उन्हें सिर्फ झाँसा दे रहे हैं, या उनकी उम्मीदवारी को लेकर वास्तव में गंभीर हैं

नई दिल्ली । रविंदर उर्फ रवि गुगनानी को डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस का कन्वेनर बना कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय भाटिया और डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर विनोद बंसल ने अपना उल्लू तो सीधा कर लिया है, लेकिन रवि गुगनानी को मुसीबत में फँसा दिया है । रवि गुगनानी के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि जो लोग उन्हें अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवार बनाना चाहते हैं और इसके लिए तैयारी भी करने लगे थे, उन्हें उनको कॉन्फ्रेंस कन्वेनर बनता देख डर हुआ है कि रवि गुगनानी ने कहीं पाला तो नहीं बदल लिया है । रवि गुगनानी के कुछेक शुभचिंतकों को यह चिंता भी है कि विनय भाटिया और विनोद बंसल की जोड़ी कहीं रवि गुगनानी को झाँसा तो नहीं दे रही है, जिसके चलते रवि गुगनानी फिर न 'इधर' के रहें और न 'उधर' के । उल्लेखनीय है कि इस वर्ष हुए चुनाव में विनय भाटिया और उनकी टीम के प्रमुख सदस्य खुल कर, तो विनोद बंसल पर्दे के पीछे से अशोक कंतूर की उम्मीदवारी के समर्थन में थे, और अगले वर्ष अजीत जालान को उम्मीदवार बनाने की बात कर रहे थे । अशोक कंतूर के चुनाव हार जाने और अगली बार फिर से उम्मीदवार बनने की तैयारी करने से उनके सामने अशोक कंतूर या अजीत जालान में से किसी एक को चुनने की समस्या पैदा हुई । उनकी समस्या रवि गुगनानी द्वारा उम्मीदवारी प्रस्तुत करने से और बढ़ गई । अलग अलग कारणों से विनय भाटिया और विनोद बंसल के रवि गुगनानी से अच्छे संबंध हैं; संबंधों के अलावा इस वर्ष विनय भाटिया और विनोद बंसल को रवि गुगनानी से अभी बहुत से 'काम' भी लेने हैं - लिहाजा उनके लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए रवि गुगनानी की उम्मीदवारी को अनदेखा करना संभव नहीं हुआ ।
ऐसे में, विनय भाटिया और विनोद बंसल ने अलग अलग तरीके से रवि गुगनानी को घेरा : एक तरफ, विनय भाटिया ने उन्हें भरोसा दिया कि वह चिंता न करें, अगले वर्ष अन्य किसी को उनके सामने उम्मीदवार नहीं बनने दिया जायेगा और उन्हें निर्विरोध डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुनवाया जायेगा; दूसरी तरफ विनोद बंसल ने उन्हें समझाया कि अपनी उम्मीदवारी को लेकर वह अभी ज्यादा तेजी न दिखाएँ, क्योंकि इससे उनके विरोधी सक्रिय हो जायेंगे - अभी वह डिस्ट्रिक्ट में काम करें और उचित समय आने पर अपनी उम्मीदवारी की चर्चा चलाएँ । इस तरह की लच्छेदार बातों से भला कौन प्रभावित नहीं होगा - सो, रवि गुगनानी भी हो गए । यह प्रभाव तब और गहरा हो गया जब रवि गुगनानी डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के कन्वेनर बना दिए गए । रवि गुगनानी के शुभचिंतकों को लेकिन इस सारे घटनाक्रम में चालबाजी नजर आ रही है । उनका कहना है कि यह कोई सामान्य बात नहीं है कि विनय भाटिया और विनोद बंसल की जोड़ी ने डिस्ट्रिक्ट टीम का गठन करते समय जिन रवि गुगनानी को जोनल पदाधिकारी से ऊपर की हैसियत का नहीं माना/समझा था और जिन्हें अपनी टीम के पप्पूजीत सिंह सरना, अमित जोनेजा, अजीत जालान जैसे 'रत्नों' के नीचे रखा था - अब अचानक से उन्हीं रवि गुगनानी को कन्वेनर बना कर इन तीनों के सिर पर बैठा दिया है । मजे की बात यह नजर आ रही है कि रवि गुगनानी को मिल रही इस अहमियत से अशोक कंतूर और अजीत जालान को कोई समस्या होती हुई नहीं दिख रही है । अशोक कंतूर तो पूरी सक्रियता के साथ अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु डिस्ट्रिक्ट के लोगों तथा प्रेसीडेंट्स इलेक्ट से बातचीत करते देखे जा रहे हैं । इससे रवि गुगनानी के शुभचिंतकों को लग रहा है कि विनय भाटिया और विनोद बंसल की जोड़ी रवि गुगनानी के साथ चाल खेल रही है और उन्हें झाँसा देते हुए अपने 'काम' के लिए इस्तेमाल कर रही है ।
रवि गुगनानी के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि विनय भाटिया और विनोद बंसल के यहाँ उन्हें अचानक से मिलती दिख रही तवज्जो के चलते उन लोगों के यहाँ उनकी स्थिति संदेहास्पद हो रही है, जो उन्हें अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवार बनाने की तैयारी कर रहे थे । वह अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं; उन्हें लग रहा है कि रवि गुगनानी को उम्मीदवारी के लिए हवा उन्होंने दी - रवि गुगनानी लेकिन हवा में इतना तेज उड़ने लगे कि सीधे विनय भाटिया और विनोद बंसल के नजदीक जा पहुँचे ।उन्हें चिंता यह देख कर हुई है कि रवि गुगनानी ने इतनी राजनीतिक समझदारी भी नहीं दिखाई कि विनय भाटिया और विनोद बंसल की जो जोड़ी इस वर्ष अशोक कंतूर को चुनाव नहीं जितवा सकी, और अभी भी अशोक कंतूर की उम्मीदवारी से जिन्होंने हाथ नहीं खींचा है - उनसे रवि गुगनानी अपनी उम्मीदवारी के लिए क्या फायदा ले सकेंगे ? रवि गुगनानी को जानने वाले वरिष्ठ रोटेरियंस का कहना है कि रवि गुगनानी को पहले भी उम्मीदवारी का वास्ता देकर इस्तेमाल किया जा चुका है; उन्हें लगता है कि रवि गुगनानी एक बार फिर उसी तरह की चालबाजी का शिकार होते हुए नजर आ रहे हैं । देखना दिलचस्प होगा कि कॉन्फ्रेंस कन्वेनर बन कर रवि गुगनानी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए सचमुच ऊँची छलाँग लगाते हैं, या फिर सिर्फ इस्तेमाल होकर रह जाते हैं ?

Tuesday, January 8, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में अशोक अग्रवाल की चुनावी जीत के जरिये डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन ने मुकेश अरनेजा व रमेश अग्रवाल जैसे पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस से मुँह छिपाकर भागने के लिए मजबूर किया

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी नतीजे को घोषित करने का समय क्या जानबूझ कर ऐसा रखा था, कि मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल जैसे पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के शुरू होते ही बेआबरू होकर भागने के लिए मजबूर होना पड़ा ? रमेश अग्रवाल इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने की दौड़ में शामिल होना चाहते हैं, लेकिन अपने ही डिस्ट्रिक्ट में उनकी ऐसी गत हो गई है कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में अपनी उपस्थिति बनाये रख पाना उनके लिए मुश्किल हुआ, और वहाँ से उन्हें मुँह छिपा कर भागना पड़ा । मजे की बात यह है कि अपनी इस दुर्दशा के लिए यह दोनों खुद ही जिम्मेदार हैं; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सुभाष जैन ने तो बस तारीखों का सिर्फ तानाबाना ऐसा बुना कि अपने आप को तीसमारखाँ समझने वाले 'रंगा' 'बिल्ला' की यह जोड़ी उसमें उलझ कर न सिर्फ अपनी फजीहत करवा बैठी, बल्कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस जैसे डिस्ट्रिक्ट व रोटरी के महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम को भी बीच में छोड़ कर उन्हें लोगों से मुँह छिपाने के लिए मजबूर होना पड़ा । इससे भी बड़ी फजीहत की बात मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल के लिए यह हुई कि जिन अमित गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी का चुनाव जितवाने का बीड़ा इन्होंने उठाया हुआ था, उनके नजदीकी और समर्थक ही अब आरोप लगा रहे हैं कि इन दोनों की हरकतों के चलते अमित गुप्ता की उम्मीदवारी को फायदा होने की बजाये नुकसान उठाना पड़ा है । उनका कहना है कि मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल का समर्थन यदि नहीं मिलता, हो सकता है कि तब भी अमित गुप्ता चुनाव हारते ही - लेकिन इतनी बुरी तरह से न हारते । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों का मानना/कहना है कि इन दोनों पूर्व गवर्नर के समर्थन के चलते अमित गुप्ता को कई क्लब्स के वोटों से हाथ धोना पड़ा है, और जिस कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में उनकी हार का अंतर काफी बढ़ गया ।
मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल ने अमित गुप्ता को समर्थन दिलवाने के नाम पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन से जो सीधी लड़ाई मोल ली, दरअसल वही अमित गुप्ता की उम्मीदवारी को भारी पड़ी और वह एक तिहाई वोट भी नहीं पा सके । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई की आड़ में इन दोनों ने दरअसल सुभाष जैन के साथ अपनी अपनी खुन्नस निकालने की कोशिश की, और अमित गुप्ता को वोट दिलवाने के नाम पर सुभाष जैन को बदनाम करने के लिए नंगपने की हदों को पार किया । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सुभाष जैन के कामकाज और या उनके तौर-तरीकों से किसी को भी ऐतराज हो सकता है और वह अपने ऐतराज को प्रकट भी कर सकता है; लेकिन ऐतराज प्रकट करने की प्रक्रिया में संगठन के लोग - और वह भी बड़े लोग - यदि अपने और दूसरों के पद की मर्यादा खोते हैं, तो उसे लोगों का समर्थन नहीं ही मिलता है । रोटरी में तकनीकी तथा भावनात्मक रूप से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की एक विशिष्ट हैसियत होती ही है, जिसके आकर्षण में लोग, खासकर क्लब्स के प्रेसीडेंट उसके नजदीक रहना/दिखना चाहते हैं । गौर करने की बात है कि अमित गुप्ता और उनके नजदीकियों व समर्थकों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर और प्रेसीडेंट्स के बीच के नाजुक रिश्ते को पहचान/समझ लिया था, और इसीलिए सुभाष जैन से सहयोग न मिलने की सूरत में भी उन्होंने सुभाष जैन के प्रति आक्रामक रुख नहीं अपनाया था । लेकिन मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल ने अमित गुप्ता की उम्मीदवारी का झंडा उठाते ही सुभाष जैन को निशाना बनाना शुरू कर दिया ।इन दोनों के रवैये से ऐसा लगा जैसे कि अमित गुप्ता का चुनाव सुभाष जैन के साथ हो रहा है । सुभाष जैन की बुराई करने में इन्होंने जो जोर लगाया, उसने प्रेसीडेंट्स को अमित गुप्ता से दूर करने का ही काम किया और इसके चलते अशोक अग्रवाल की ताकत और बढ़ी । 
इस सबके बीच असली खेल सुभाष जैन ने किया । मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल के लिए फजीहत के हालात बनाने के लिए चुनाव की तारीखें उन्होंने ऐसे तय कीं कि नतीजा डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस शुरू होने के तुरंत बाद मिले । चूँकि वोटिंग पूरी होने पर नतीजा पहले भी घोषित हो जाता, इसलिए सुभाष जैन ने 'व्यवस्था' की कि वोटिंग निर्धारित समय पर ही पूरी हो । आँख-नाक-कान खुली रखने वाले हर रोटेरियन के साथ-साथ सुभाष जैन को भी 'पता' था कि चुनाव का नतीजा अशोक अग्रवाल के पक्ष में ही होगा, और अशोक अग्रवाल अच्छे अंतर से चुनाव जीतेंगे । सिर्फ मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल को ही अमित गुप्ता के जीतने की उम्मीद थी । इन्होंने पता नहीं कौन सा नशा किया हुआ था कि उसके असर में इन्हें कुल 164 वोटों में से अमित गुप्ता को कम से कम 85 वोट तो निश्चित ही मिलते दिख रहे थे । इस  तरह सारा खेल सुभाष जैन की योजना के अनुसार ही चल रहा था । सुभाष जैन की योजना थी कि चुनावी नतीजा डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस शुरू होने के तुरंत बाद मिले, जिससे मुकेश अरनेजा व रमेश अग्रवाल की डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच फजीहत हो - और ठीक ऐसा ही हुआ; अशोक अग्रवाल को मिले 111 वोटों के मुकाबले अमित गुप्ता को कुल 48 वोट मिलने का परिणाम सुनते ही मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को बीच में ही छोड़ कर ऐसे गायब हुए, कि लोगों को 'गधे के सिर से सींग' वाला मुहावरा याद आ गया ।
इस नतीजे ने मुकेश अरनेजा को सुभाष जैन से सीधी भिड़ंत में तीसरी बार मात खाने का अनोखा रिकॉर्ड भी बनाया । उल्लेखनीय है कि पहली बार सुभाष जैन और दीपक गुप्ता के बीच हुए चुनावी मुकाबले में सुभाष जैन को हराने के लिए मुकेश अरनेजा ने हर तरह का घटियापन दिखाया था, लेकिन उसके बावजूद वह सुभाष जैन को चुनाव में नहीं हरा पाए थे । दूसरी बार सुभाष जैन की रोटरी इंटरनेशनल में शिकायत के जरिये मुकेश अरनेजा ने उन्हें फँसाने की कोशिश की थी, लेकिन मुकेश अरनेजा की वह कोशिश भी सफल नहीं हो सकी थी । अब की बार, मुकेश अरनेजा तीसरी दफा अमित गुप्ता को चुनाव जितवाने के जरिये सुभाष जैन से सीधे भिड़े - लेकिन इस बार भी वह 'पिटे' । मुकेश अरनेजा के लिए फजीहत की बात यह भी रही कि पहले उन्होंने अशोक अग्रवाल को समर्थन देने का आश्वासन दिया था; लेकिन उन्होंने अशोक अग्रवाल को जब सुभाष जैन के नजदीक जाता/होता देखा, तो उन्होंने अशोक अग्रवाल को धोखा देते हुए रवि सचदेवा की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया; फिर जब उन्हें लगा कि वह अमित गुप्ता के कंधे का सहारा लेकर सुभाष जैन से पुराना हिसाब चुकता कर सकते हैं, तो उन्होंने रवि सचदेवा को भी धोखा देने में देर नहीं लगाई । 'धोखेबाज' का खिताब पाए मुकेश अरनेजा पर प्रेसीडेंट्स ने भी भरोसा नहीं किया, और सुभाष जैन से हिसाब चुकता करने का उनका तीसरा प्रयास भी औंधे मुँह ढेर हो गया । सुभाष जैन की रणनीति के चलते मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल को जो तगड़ी चोट पड़ी है, वह डिस्ट्रिक्ट और रोटरी की एक दिलचस्प गाथा के रूप में याद रखी जाएगी ।

Sunday, January 6, 2019

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी टू में अजय डैंग व नवीन गुप्ता को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुनवाने के फार्मूले के जरिये फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बलविंदर सैनी ने अभिनव सिंह की उम्मीदवारी के लिए किए गए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वंदना निगम के 'सौदे' को फेल करने की चाल चली है क्या ?

कानपुर । फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बलविंदर सैनी और अजय डैंग के बीच पक रही खिचड़ी की खुशबू ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वंदना निगम के उस प्लान को खतरे में डाल देने के संकेत दिए हैं, जिसमें वह अभिनव सिंह को उम्मीदवार बना/बनवा कर पैसे ऐंठने की तैयारी कर रही थीं । अभिनव सिंह पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डीपी सिंह और किरन सिंह के बेटे हैं, जिनके सहयोग से अभी हाल ही में कानपुर में कुछेक क्लब्स के नए पदाधिकारियों का संयुक्त अधिष्ठापन समारोह करवाया गया था । पिछली जून में अमेरिका जाते समय तथा जुलाई में अमेरिका से लौटते समय हवाई अड्डे पर वंदना निगम का स्वागत करने में डीपी सिंह और किरन सिंह के साथ अभिनव सिंह की भी जो सक्रियता थी, उससे लोगों को अभिनव सिंह की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की कुर्सी की तरफ बढ़ते कदमों की कुछ आहट तो लगी थी, लेकिन सिंह दंपति अभिनव सिंह की उम्मीदवारी को लेकर साफ साफ कुछ भी कहने से बच रहे थे । वंदना निगम के नजदीकियों का कहना रहा है कि वंदना निगम इस बात को समझती तो रहीं कि सिंह दंपति अभिनव सिंह की उम्मीदवारी को लेकर उनसे बात करना चाहते हैं, लेकिन सिंह दंपति की तरफ से पहल न होने के कारण वह भी चुप बनी रहीं । इस बीच धीरे धीरे कुछेक और प्रमुख लोगों को यकीन होने लगा कि सिंह दंपति अपने बेटे अभिनव सिंह को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनवाने को लेकर उत्सुक हैं, और इस बार चूँकि दो वर्षों के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का चुनाव होना है - इसलिए इस बार वह अभिनव सिंह के लिए उचित अवसर मान रहे हैं । वंदना निगम के साथ खासी नजदीकियत रखने के बावजूद सिंह दंपति ने उनसे सीधी बात यदि नहीं की, तो सिर्फ इसी डर से कि वंदना निगम बदले में पता नहीं क्या माँग कर दें ? पिछले वर्ष के चुनाव में जो तमाशा हुआ, उसके चलते गवर्नरी से फायदा उठाने की वंदना निगम की सारी योजना पर पहले ही पानी फिर गया है, और इस बार के चुनाव ही उनके लिए 'फायदा' उठाने का आखिरी अवसर है । वंदना निगम के इस आखिरी अवसर में सिंह दंपति के लिए उम्मीद भी थी और डर भी था । 30 दिसंबर को सिद्धि विनायक फार्महाउस में हुए संयुक्त अधिष्ठापन समारोह में अभिनव सिंह को मिली तवज्जो से लोगों को संकेत मिल गया कि वंदना निगम ने अभिनव सिंह की उम्मीदवारी को लेकर सिंह दंपति से 'सौदा' कर लिया है ।
इस 'सौदे' को लेकर डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच चर्चा आगे बढ़ती कि एक-दूसरे से जुड़ी दो बातें लोगों के संज्ञान में आईं - जिनमें एक बात दिल्ली में बलविंदर सैनी और अजय डैंग के बीच हुई बात/मुलाकात को लेकर थी । दरअसल डिस्ट्रिक्ट के एक लायन सदस्य के परिवार में दिल्ली में शादी का आयोजन हुआ, जिसमें हालाँकि गिनती के लायन ही उपस्थित हो सके थे; लेकिन गिनती के उन लायंस में बलविंदर सिंह और अजय डैंग भी थे । दोनों के बीच वहाँ बातें क्या हुईं, यह तो वह दोनों ही जानते होंगे - लेकिन उनके बीच हुई बातों के बाद अचानक से अजय डैंग के लिए हमदर्दी का उफान उठता देखा गया; और उनके जन्मदिन के मौके पर सोशल मीडिया में उनके प्रति व्यक्त होने वाले बधाई संदेशों की बाढ़ सी देखी गई । लोगों के संज्ञान में आने वाली यह दूसरी बात थी । इस बात पर लोगों का ध्यान दरअसल इसलिए गया क्योंकि अजय डैंग करीब छह महीने से लायनिज्म की गतिविधियों से दूर हैं - उसके बावजूद उनके जन्मदिन के मौके पर डिस्ट्रिक्ट के लोगों ने उन्हें जिस उत्साह से याद किया, उससे डिस्ट्रिक्ट के नेताओं को हैरानी हुई । सभी को लगा कि जन्मदिन के मौके पर उत्साह के साथ बधाई देने से लगता है कि अजय डैंग के साथ पिछले वर्ष जो हुआ, उसे लेकर लोगों को उनसे हमदर्दी है । कई लोगों ने तो कहना शुरू भी कर दिया कि अजय डैंग नाहक ही दीपक राज आनंद व वंदना निगम के स्वार्थी चक्कर में फँस गए और नुकसान का शिकार बन बैठे । इस बीच, इस बार पिछले वर्ष के दोनों उम्मीदवारों - अजय डैंग व नवीन गुप्ता को इस तर्क के साथ चुनवाने की बात चल पड़ी है कि इससे डिस्ट्रिक्ट में लड़ाई-झगड़े का माहौल बंद होगा, दोनों खेमे शांत होंगे और  इस तरह डिस्ट्रिक्ट में सौहार्द बनेगा । इस तर्क को दिल्ली में हुई बलविंदर सैनी तथा अजय डैंग के बीच हुई बात/मुलाकात के नतीजे के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है - और इसे अभिनव सिंह की उम्मीदवारी के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर  के रूप में वंदना निगम द्वारा किए गए 'सौदे' को फेल करने की बलविंदर सैनी की कार्रवाई के रूप में भी समझा जा रहा है । 
वंदना निगम के लिए मुसीबत की बात यह है कि अजय डैंग व नवीन गुप्ता को लेकर बन/बनाये जा रहे फार्मूले पर डिस्ट्रिक्ट के अधिकतर नेताओं की तरफ से सहमति ही बनती नजर आ रही है, और ऐसे में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने के बावजूद उनकी भूमिका ज्यादा नहीं रह जाती है । हालाँकि अजय डैंग व नवीन गुप्ता को लेकर बन रहा फार्मूला अभी सिर्फ जुबानों पर ही है, और इसके सचमुच में सफल होने को लेकर अभी दावे के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता है । अभी चूँकि अजय डैंग व नवीन गुप्ता की तरफ से कोई सक्रियता नहीं है; और इन दोनों की तरफ से कोई अभी इनकी खुलकर वकालत भी नहीं करता दिख रहा है - इसलिए इनकी उम्मीदवारी को एकतरफा रूप में हरी झंडी मिलने को लेकर अभी कोई दावा करने की स्थिति में तो नहीं है, और सारा कुछ इन दोनों के खुद के रवैये पर भी निर्भर करता है । इन दोनों के साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों को लगता है कि इन दोनों के पक्ष में माहौल तो अच्छा बन सकता है, लेकिन इसके लिए प्रयास इन्हें ही करना होगा - इन्होंने यदि यह सोचा कि दूसरे लोग इनकी 'लड़ाई' लड़ेंगे तो बाजी इनके हाथ से निकल भी सकती है । डिस्ट्रिक्ट में लोगों को लगता है कि दीपक राज आनंद का हाल देख कर वंदना निगम ने इतना तो समझ ही लिया होगा कि ज्यादा मनमानी करना उनके लिए मुसीबतभरा साबित हो सकता है, लेकिन अजय डैंग और नवीन गुप्ता ने अपनी अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने में कोई चूक की तो अभिनव सिंह के साथ हुआ 'सौदा' पूरा करने के लिए वंदना निगम कोई खेल भी कर सकती हैं ।

Saturday, January 5, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट हरि गुप्ता के नजदीकियों की ही 'मदद' से होने वाली मनीष शारदा की जीत हरि गुप्ता के लिए फजीहत का कारण बनी

मेरठ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में मनीष शारदा की जीत की खबर मिलने के तुरंत बाद पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर योगेश मोहन गुप्ता द्वारा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट हरि गुप्ता को लानत-सी देता वाट्स-ऐप संदेश भेजना इस बात की पुष्टि ही करता है कि डिस्ट्रिक्ट के कुछेक नेताओं के लिए मनीष शारदा को चुनाव जितवाना हरि गुप्ता को नीचा दिखाने के लिए जरूरी हो गया था - और उसके लिए उन नेताओं ने हर हथकंडा अपनाया । दरअसल इसीलिए मनीष शारदा की मामूली अंतर से हुई चुनावी जीत को हरि गुप्ता की पराजय के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष दीपक जैन और हरि गुप्ता के बीच हुए चुनाव में मनीष शारदा के क्लब - रोटरी क्लब मेरठ महान - ने दीपक जैन का समर्थन किया था; और तभी से हरि गुप्ता तथा मनीष शारदा के क्लब के बीच तनातनी की चर्चा थी । यह चर्चा पिछले दिनों उस समय पुख्ता हुई जब अगले वर्ष की डिस्ट्रिक्ट टीम में हरि गुप्ता द्वारा शामिल किए गए मनीष शारदा के क्लब के सदस्यों ने इकट्ठे इस्तीफा दे दिया । उनका आरोप रहा कि हरि गुप्ता डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में दीपा खन्ना का समर्थन कर रहे हैं और इस तरह मनीष शारदा की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने का काम कर रहे हैं । हरि गुप्ता ने उनके इस्तीफे तुरंत स्वीकार भी कर लिए । इस प्रसंग से संदेश यह गया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव  जैसे मनीष शारदा और हरि गुप्ता के बीच हो रहा है । इससे अलग अलग कारणों से हरि गुप्ता के विरोधी बने पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स जीएस धामा, योगेश मोहन गुप्ता और राकेश सिंघल ने खुलकर मनीष शारदा की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया, और तब मनीष शारदा की उम्मीदवारी के पक्ष में वोट जुटाने के लिए हर हथकंडा अपनाया गया ।
हरि गुप्ता के लिए बड़े झटके की बात यह रही कि अगले वर्ष की उनकी डिस्ट्रिक्ट टीम के प्रमुख सदस्यों तक के क्लब के वोट मनीष शारदा और उनके समर्थकों के हाथों 'बिक' गए । माना/समझा जा रहा था कि हरि गुप्ता ने जिन प्रमुख रोटेरियंस को अपनी टीम में महत्त्वपूर्ण पद दिए हैं, वह अपने अपने क्लब के वोट निश्चित रूप से दीपा खन्ना को दिलवा देंगे । रोटरी की चुनावी राजनीति का यह एक बड़ा आम फार्मूला है, जिसे प्रायः हर डिस्ट्रिक्ट में हमेशा ही आजमाया जाता है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पास अवॉर्ड का तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के पास पदों का 'खजाना' होता है, जिसके जरिये वह चुनाव को प्रभावित करने का काम करते हैं । लेकिन मनीष शारदा और उनके समर्थकों ने हरि गुप्ता की टीम में जगह पाने वाले प्रमुख रोटेरियंस के क्लब्स के प्रेसीडेंट के सामने ऐसी-ऐसी पेशकशें कीं कि प्रेसीडेंट्स ने अपने क्लब के नेताओं की बात मानने से इंकार कर दिया और हरि गुप्ता की टीम में जगह पाने वाले क्लब्स के नेताओं के लिए हरि गुप्ता से आँख मिला पाना मुश्किल हुआ । इस उलट-फेर के कारणों का आकलन करने वाले लोगों को यह भी लगता है कि हरि गुप्ता के अति-आत्मविश्वास में रहने के चलते भी यह हुआ । चुनाव से पहले हरि गुप्ता को कुछेक क्लब्स के प्रेसीडेंट के बदलते दिख रहे रवैये के प्रति आगाह किया गया था, लेकिन हरि गुप्ता ने उसकी परवाह नहीं की और आश्वस्त रहे कि उन्हें धोखा नहीं मिलेगा । हरि गुप्ता का यह अति-आत्मविश्वास ही दीपा खन्ना की हार का कारण बना । हरि गुप्ता के लिए समस्या की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में पराजय दीपा खन्ना की हुई है, लेकिन फजीहत हरि गुप्ता की हो रही है ।
डिस्ट्रिक्ट में कुछेक लोगों को लगता है कि हरि गुप्ता की फजीहत इसलिए भी हो रही है, क्योंकि वह हर किसी को साथ लेकर चलना चाहते हैं, और डिस्ट्रिक्ट में सौहार्द बनाने का प्रयास कर रहे हैं । इसी प्रयास के तहत उन्होंने मनीष शारदा के क्लब के कई सदस्यों को अपनी गवर्नर-टीम में जगह दी । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में वह दीपा खन्ना की उम्मीदवारी के समर्थन में थे - इसका प्रचार तो बहुत था, लेकिन दीपा खन्ना की उम्मीदवारी के पक्ष में कुछ करते हुए उन्हें देखा किसी ने नहीं । वास्तव में उनके रवैये को देखते हुए उनके ऊपर आरोप चस्पाँ हुआ कि वह दोनों नावों में पैर रखे रहना चाहते हैं । हरि गुप्ता के नजदीकियों का कहना है कि वह स्पष्ट फैसला करने से हिचकते/बचते हैं, और इसलिए उनके विरोधी उन्हें गंभीरता से नहीं लेते हैं । लोगों का कहना है कि हरि गुप्ता की सदाशयता और भलमनसाहत को उनके विरोधी उनकी कमजोरी समझते हैं, और उनके साथ मनमाना व्यवहार करते हैं - हरि गुप्ता लेकिन उससे कोई सबक नहीं लेते हैं । रोटरी क्लब मेरठ महान से धोखा खाने के बाद भी हरि गुप्ता उसके कई सदस्यों को अपनी टीम में प्रमुख पद देते हैं; वह सदस्य लेकिन हरि गुप्ता की इस भलमनसाहत का सम्मान नहीं करते हैं और उन्हें नीचा दिखाने के उद्देश्य से सामूहिक इस्तीफे दे देते हैं । हरि गुप्ता उन इस्तीफों के पीछे छिपी षड्यंत्रकारी राजनीति को समझने/पहचानने में भी चूक कर जाते हैं, और सावधान होने की बजाये अति-आत्मविश्वास का शिकार बने रहते हैं - जिसका नतीजा हरि गुप्ता के नजदीकियों की ही 'मदद' से होने वाली मनीष शारदा की जीत के रूप में सामने आता है ।

Thursday, January 3, 2019

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए दिनेश जोशी और दिनेश बत्रा के बीच होते दिख रहे चुनावी मुकाबले में लायंस ब्लड बैंक के कामकाज के मुद्दा बनने से डिस्ट्रिक्ट में माहौल गर्म हुआ

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि मेहरा और लायंस ब्लड बैंक के प्रेसीडेंट राजेंद्र अग्रवाल द्वारा सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए दिनेश जोशी की उम्मीदवारी को शह देने की कार्रवाई उनके अपने ग्रुप के अन्य नेताओं को पसंद नहीं आ रही है, और इस स्थिति ने सत्ता खेमे के लोगों को असमंजस में फँसा दिया है । रवि मेहरा तथा राजेंद्र अग्रवाल लेकिन दिनेश जोशी तथा अन्य लोगों को आश्वस्त कर रहे हैं कि ग्रुप के जो नेता अभी उनके फैसले का समर्थन नहीं कर रहे हैं, देर/सवेर उनके फैसले का समर्थन करने लगेंगे । उनका तर्क है कि ग्रुप के उन नेताओं के लिए विरोधी ग्रुप के उम्मीदवार दिनेश बत्रा का समर्थन करना तो संभव नहीं ही होगा; और इसलिए उन्हें दिनेश जोशी की उम्मीदवारी का समर्थन करने के लिए मजबूर होना ही पड़ेगा । मजे की बात यह है कि दिनेश बत्रा की भी जेपी सिंह के नेतृत्व वाले ग्रुप में पूरी स्वीकार्यता नहीं है - वहाँ भी ग्रुप के कई नेताओं को लगता है कि दिनेश बत्रा चुनाव को 'अफोर्ड' नहीं कर पायेंगे और मदन बत्रा की तरह ग्रुप की फजीहत ही करवायेंगे । इस वर्ष यदि सचमुच दिनेश जोशी और दिनेश बत्रा के बीच ही चुनावी जंग होती है, तो चुनावी वातावरण तो कुछ बदला बदला सा ही होगा - लेकिन चुनाव को प्रभावित करने वाला फैक्टर कमोवेश पिछले दो वर्षों जैसा ही होगा; पिछले दो वर्षों का अनुभव 'बताता' है कि चुनाव का नतीजा उस उम्मीदवार के हक में गया, जिसने दमदारी से चुनाव लड़ा - खेमे की मजबूती तथा नेताओं की भीड़ व उनका समर्थन निर्णायक भूमिका में नहीं रहा । पिछले से पिछले वर्ष यशपाल अरोड़ा का खेमा खासा मजबूत दिख रहा था, और उनके प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार गुरचरन सिंह भोला को नया/नवेला तथा अनुभवहीन माना/देखा जा रहा था - लेकिन फिर भी नतीजा गुरचरन सिंह भोला के पक्ष में रहा, तो इसका कारण सिर्फ यही था कि गुरचरन सिंह भोला ने चुनाव पूरी दमदारी से लड़ा था । पिछले वर्ष भी यही कहानी दोहराई गई - लायनिज्म में संलग्नता की अवधि और अनुभव के आधार पर मदन बत्रा का पलड़ा भारी समझा/माना जा रहा था, लेकिन उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का अभियान चलाने के मामले में रमन गुप्ता ने उन्हें पछाड़ दिया और जीत प्राप्त की ।
दिनेश बत्रा के लिए मुसीबत की बात यही है कि उन्हें समर्थन देने वाले ग्रुप के ही कई लोग उन्हें यशपाल अरोड़ा व मदन बत्रा वाली 'स्थिति' में देख/रख रहे हैं, और अभी से मान कर चल रहे हैं कि दिनेश बत्रा चुनावी अभियान की जरूरतों और चुनौतियों का सामना नहीं कर पायेंगे । अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के लिए दिनेश बत्रा के पास ले दे कर एक यही तर्क है कि डिस्ट्रिक्ट और लायनिज्म में उनकी खासी सक्रियता रही है और वह एक पुराने लायन हैं - लेकिन इसी तर्क के भरोसे चुनाव जीतने की यशपाल अरोड़ा व मदन बत्रा की कोशिशों का क्या हश्र हुआ, यह सभी ने देखा ही है । दिनेश बत्रा और उनके समर्थकों के लिए राहत की बात यही है कि दिनेश जोशी की उम्मीदवारी को लेकर सत्ता खेमे में मतभेद हैं, और सत्ता खेमे के कुछेक नेता अपनी अपनी 'मुसीबतों' में फँसे/उलझे पड़े हैं - इस कारण दिनेश जोशी की उम्मीदवारी के अभियान में वैसी 'गर्मी' नहीं दिखाई दे रही है, जैसी पिछले वर्ष रमन गुप्ता के अभियान में थी । इसका कारण दोनों के व्यक्तित्व में भी देखा/पहचाना जा रहा है; खेमे के लोगों का ही कहना/बताना है कि रमन गुप्ता ने आगे बढ़ कर अलग-अलग मिजाज के नेताओं को एकजुट व सक्रिय करने का काम किया था, लेकिन दिनेश जोशी ऐसा करने में कोई दिलचस्पी ही नहीं ले रहे हैं - और पूरी तरह से रवि मेहरा व राजेंद्र अग्रवाल पर ही निर्भर हैं । दिनेश जोशी को अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के मामले में रवि मेहरा व राजेंद्र अग्रवाल पर ही निर्भर देख कर खेमे के दूसरे नेता और भड़के हुए हैं ।
दिनेश बत्रा और उनके समर्थक दिनेश जोशी को घेरने के लिए लायंस ब्लड बैंक के साथ उनके व्यापारिक संबंधों को मुद्दा बनाते और हवा देते हुए भी लग रहे हैं, जिससे आभास हो रहा है कि इस बार के चुनावों में आरोपों/प्रत्यारोपों का आक्रामक नजारा देखने/ को मिलेगा । दिनेश बत्रा और उनके समर्थकों की तरफ से कहा/बताया जा रहा है कि लायंस ब्लड बैंक के प्रेसीडेंट राजेंद्र अग्रवाल ब्लड बैंक के कामकाज में दिनेश जोशी के साथ मिलकर कुछ गड़बड़ कर रहे हैं, जिसे और 'मजबूत' करने के लिए ही राजेंद्र अग्रवाल ने दिनेश जोशी को उम्मीदवार बना/बनवा दिया है । खेमे के लोगों का कहना/बताना रहा है कि राजेंद्र अग्रवाल खुद उम्मीदवार होना चाहते थे, लेकिन उन्हें स्पष्ट कर दिया गया कि वह यदि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार होते हैं, तो उन्हें ब्लड बैंक का प्रेसीडेंट पद छोड़ना होगा । राजेंद्र अग्रवाल ब्लड बैंक का प्रेसीडेंट पद छोड़ने को तैयार नहीं हुए, और सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी से पीछे हटने के लिए मजबूर हो गए । डिस्ट्रिक्ट में चर्चा है कि तब राजेंद्र अग्रवाल को आईडिया सूझा कि वह क्यों न दिनेश जोशी को गवर्नर की लाईन में लगवा दें, ताकि ब्लड बैंक में उन्हें अपनी मनमानी करने का मौका मिलता रहे और दूसरे नेताओं के मुँह बंद रहें । गौर करने वाली बात यह है कि लायंस ब्लड बैंक के कामकाज को लेकर सत्ता खेमे के ही कुछेक बड़े नेताओं ने सवाल उठाए हुए हैं, जिन्हें लगातार अनसुना किया जा रहा है । दिनेश बत्रा और उनके समर्थकों को लग रहा है कि ब्लड बैंक के कामकाज और उसमें दिनेश जोशी की संलग्नता को मुद्दा बना कर वह दिनेश जोशी को घेर लेंगे और अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटा लेंगे । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में लायंस ब्लड बैंक के कामकाज के मुद्दा बनने से क्या नजारा बनेगा, यह देखना दिलचस्प होगा ।

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सुरेश भसीन की अमेरिकी वीजा के लिए हो रही ज़द्दोजहद ने विनोद बंसल को यह स्पष्टीकरण देने के लिए मजबूर किया कि वह डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बने हैं, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के ट्रेनर नहीं बने हैं

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सुरेश भसीन को अमेरिकी वीजा अभी तक न मिल पाने के लिए डिस्ट्रिक्ट के कुछेक लोग जिस तरह से पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, उसके कारण विनोद बंसल को लोगों को समझाना पड़ रहा है कि वह डिस्ट्रिक्ट के ट्रेनर बने हैं, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के ट्रेनर नहीं बने हैं । उल्लेखनीय है कि अमेरिका के कैलिफोर्निया के सेन डिएगो में 13 से 19 जनवरी के बीच रोटरी इंटरनेशनल असेम्बली का आयोजन होना है, जिसमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स इलेक्ट की ट्रेनिंग होनी है - जो रोटरी इंटरनेशनल का एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम है; लेकिन जिसमें सुरेश भसीन के शामिल हो पाने को लेकर अभी तक संशय बना हुआ है । यह संशय इसलिए बना हुआ है क्योंकि वीजा के लिए होने वाले इंटरव्यू में सुरेश भसीन फेल हो चुके हैं और वीजा के लिए दिया गया उनका आवेदन रिजेक्ट हो चुका है । मजे की और बिडंवना की बात यह है कि अमेरिका जाने को लेकर सुरेश भसीन का बॉन वॉयज हो चुका है, जिसमें सुरेश भसीन अमेरिकी यात्रा को लेकर लोगों की शुभकामनाएँ ले चुके हैं - लेकिन उनका अमेरिका जा पाना अभी निश्चित नहीं है । इस बिडंवना के लिए कुछेक लोग विनोद बंसल के डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर होने का वास्ता देते हुए विनोद बंसल को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, जिस पर विनोद बंसल का कहना है कि वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के ट्रेनर नहीं बनाए गए हैं, डिस्ट्रिक्ट के ट्रेनर बनाए गए हैं - और अभी कुछ ही दिन पहले बनाए गए हैं ।
सुरेश भसीन और उनके नजदीकियों की तरफ से हालाँकि दावा किया जा रहा है कि सुरेश भसीन के मामले में वीजा की समस्या को अंततः हल कर लिया जायेगा और सुरेश भसीन इंटरनेशनल कन्वेंशन में शामिल हो सकेंगे । यह दावा करते हुए बताया जा रहा है कि रोटरी के बड़े पदाधिकारियों ने अमेरिकी दूतावास के पदाधिकारियों से संपर्क साधा हुआ है और वीजा क्लियर करवाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं । बताया जा रहा है कि यह समस्या सिर्फ सुरेश भसीन के साथ ही नहीं हुई है, बल्कि और कुछेक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स इलेक्ट के वीजा आवेदनों को भी रिजेक्ट किया गया है - और उनके वीजा भी क्लियर करवाने के लिए प्रयत्न किए जा रहे हैं । जानकारों के अनुसार, शुरू में कुल करीब 15 डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स इलेक्ट के वीजा आवेदन रिजेक्ट हुए थे; जिनमें से कई के मामले सुलटा लिए गए हैं - लेकिन छह-सात डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स इलेक्ट के मामले अभी भी फँसे हुए हैं, जिनमें सुरेश भसीन भी एक हैं । सुरेश भसीन के मामले के फँसे होने पर सभी को हैरानी है । सुरेश भसीन खासे अनुभवी रोटेरियन हैं, कुछेक दिनों के लिए वह पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रह चुके हैं - इस नाते उम्मीद की जाती थी कि वह अपने कामकाज और अपनी जिम्मेदारियाँ अच्छे से निभायेंगे; लेकिन वीजा मामले में उनके साथ जो हुआ है - उससे उनकी और उनके डिस्ट्रिक्ट की भारी फजीहत हुई है । रोटरी में लोगों का कहना है कि दूर-दराज के छोटे शहरों के लोगों के साथ वीजा की समस्या हो जाये, यह तो समझ में आता है; लेकिन दिल्ली में रहने वाले और रोटरी का खासा अनुभव रखने वाले सुरेश भसीन का वीजा मामले में मुसीबत में पड़ना हैरान करता है - और सुरेश भसीन के गवर्नर-काल के प्रति सशंकित करता है ।
डिस्ट्रिक्ट में लोगों को लग रहा है कि जो सुरेश भसीन अपने लिए वीजा की व्यवस्था नहीं कर सकते हैं, वह गवर्नर पद की जिम्मेदारी भला कैसे संभाल और निभा पायेंगे ? इसी तर्ज पर उनके डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर विनोद बंसल को निशाने पर लिया जा रहा है । यह मामला डिस्ट्रिक्ट के लिए भी इसलिए फजीहत भरा है क्योंकि यह इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता का डिस्ट्रिक्ट है; डिस्ट्रिक्ट के तीन तीन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने की जुगाड़ में हैं; और रोटरी इंटरनेशनल के दिल्ली स्थित साऊथ एशिया ऑफिस के मुखिया राजीव रंजन इसी डिस्ट्रिक्ट के सदस्य हैं - इतने सब के बावजूद इस डिस्ट्रिक्ट के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट का वीजा आवेदन रिजेक्ट हो गया और उसका इंटरनेशनल असेम्बली में होने वाली जरूरी ट्रेनिंग में जा पाना मुश्किल में पड़ गया है । गौरतलब बात यह भी है कि कई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स इलेक्ट के वीजा आवेदन रिजेक्ट हो जाने के बाद मामले से इंटरनेशनल डायरेक्टर भरत पांड्या को अवगत करवाया गया था, लेकिन उन्होंने मामले से निपटने की जिम्मेदारी दिल्ली स्थित साऊथ एशिया ऑफिस के मुखिया राजीव रंजन के मत्थे मढ़ दी । मजे की बात यह है कि वीजा संबंधी मुश्किलें प्रत्येक वर्ष आती हैं, लेकिन फिर भी रोटरी के बड़े पदाधिकारी और नेता इस मामले को गंभीरता से लेते नहीं नजर आते हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने वाले लोग भी कमाल लोग होते हैं; सुरेश भसीन का ही उदाहरण लें - डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने के लिए तो उन्होंने जी-जान लगा दिया और कई कई वर्ष चुनावी दौड़ में बने रहे; लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद तक पहुँचने की पहली सीढ़ी - अधिकृत ट्रेनिंग में शामिल होने के लिए अमेरिकी वीजा लेने - के काम के प्रति लापरवाह बने रहे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बनते ही वह यदि वीजा लेने का प्रयास करते, तो अब ऐन मौके पर, जबकि ट्रेनिंग शुरू होने में करीब दस दिन का समय बचा है, उन्हें वीजा के लिए ज़द्दोजहत में नहीं फँसना पड़ता ।

Wednesday, January 2, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में अपने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर मुकेश अरनेजा की हरकतों पर ओढ़ी गई चुप्पी, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता के लिए सेन डिएगो में होने जा रही रोटरी इंटरनेशनल असेम्बली के दौरान अपने कलीग गवर्नर्स के बीच मुसीबतभरी साबित होगी क्या ?

गाजियाबाद । अमेरिका के कैलिफोर्निया के सेन डिएगो में 13 से 19 जनवरी के बीच होने जा रही रोटरी इंटरनेशनल असेम्बली में शामिल होने जा रहे दीपक गुप्ता अपने साथ मुकेश अरनेजा की कारस्तानियों से पैदा हुई समस्या को भी ले जा रहे हैं, जो उनके लिए भारी फजीहत भरी हो सकती है । अंग्रेजी में एक जुमला होता है - 'एलिफैंट इन द रूम' । इसका प्रयोग एक ऐसी समस्या के लिए किया जाता है जो दरअसल दिखाई नहीं देती है लेकिन होती बहुत बड़ी है और ठीक बगल में होती है । इस वर्ष हो रहे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में दिखाई गईं मुकेश अरनेजा की हरकतें दीपक गुप्ता के लिए वही समस्या है, जो दिख तो नहीं रही है - लेकिन दीपक गुप्ता के लिए बन जी का जंजाल रही है । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मुकेश अरनेजा पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को प्रभावित करने के उद्देश्य से 'नंगा नाच' करने और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन के खिलाफ कुत्सित प्रचार करने से लेकर कुछेक प्रेसीडेंट्स को घेरघार कर उनके लिए 'सुरा और सुंदरी' का इंतजाम करने के जो आरोप लग रहे हैं, वह आरोप दीपक गुप्ता के लिए फजीहत का कारण बन रहे हैं । ऐसा इसलिए क्योंकि दीपक गुप्ता ने मुकेश अरनेजा को अपने गवर्नर वर्ष के लिए डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाया हुआ है । इसके चलते कई लोगों को कहने का मौका मिल रहा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में मुकेश अरनेजा ने जो गंद फैलाया, वह उन्होंने अपने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर होने का फायदा उठाते हुए फैलाया - और इसलिए उसमें दीपक गुप्ता की भी मिलीभगत होने का अंदेशा होता है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में दीपक गुप्ता की सीधी मिलीभगत के आरोप तो हालाँकि किसी ने नहीं लगाए हैं - लेकिन उनके डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर मुकेश अरनेजा द्वारा की गई गंदगी की कीचड़ दीपक गुप्ता पर भी चिपकती तो है ही, और यही बात दीपक गुप्ता के लिए मुसीबतभरी है ।
दीपक गुप्ता के लिए यह बात मुसीबतभरी इसलिए भी है, क्योंकि दीपक गुप्ता अक्सर ही दिखाते/जताते रहते हैं जैसे कि उन्हें रोटरी का बड़ा ज्ञान है, वह रोटरी के आदर्शों व लक्ष्यों को अच्छे से समझते हैं और उन्हें निभाना व हासिल करना चाहते हैं । लोगों का कहना/पूछना है कि यदि सचमुच ऐसा ही है, जैसा कि वह दिखाने/जताने का प्रयास करते हैं - तो अपने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर मुकेश अरनेजा की हरकतों पर आँखें मूँदे और चुप्पी साधे हुए क्यों हैं ? दरअसल इसीलिए लोगों को लगता है कि हो न हो मुकेश अरनेजा की हरकतों को पर्दे के पीछे से दीपक गुप्ता का संरक्षण प्राप्त था । दीपक गुप्ता रोटरी के प्रति जिस तरह का आदर्शपूर्ण व पवित्र किस्म का लगाव दिखाते/जताते हैं, उसे देखते हुए लोगों को आश्चर्य इस बात का भी है, कि उन्होंने मुकेश अरनेजा जैसे बदनाम व्यक्ति को अपना डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाया ही क्यों ? उल्लेखनीय है कि मुकेश अरनेजा अपनी हरकतों के चलते डिस्ट्रिक्ट और रोटरी में खासे बदनाम रहे हैं, जिस कारण न सिर्फ यह कि उनके लिए 'अपने' क्लब में बने रहना मुश्किल हुआ और उन्हें वहाँ से निकलना पड़ा - बल्कि यह भी कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अमित जैन को उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाये जाने के बाद उनकी हरकतों से तंग आकर दो महीने के अंदर अंदर उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद से हटाने के लिए मजबूर भी होना पड़ा था । लोगों को हैरानी है कि रोटरी के उच्च आदर्शों व लक्ष्यों के प्रति सम्मान का भाव रखने और दिखाने वाले दीपक गुप्ता ने - मुकेश अरनेजा की हरकतों तथा उनकी कुख्याति से परिचित होने के बावजूद उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर क्यों और क्या सोच कर बनाया ?
दीपक गुप्ता के लिए यह सवाल सेन डिएगो में 13 से 19 जनवरी के बीच होने जा रही रोटरी इंटरनेशनल असेम्बली के दौरान ज्यादा मुसीबतभरा इसलिए होने जा रहा है, क्योंकि वहाँ उन्हें अपने कलीग गवर्नर्स तथा रोटरी के बड़े नेताओं की तरफ से इस सवाल का सामना करना पड़ सकता है । दरअसल दीपक गुप्ता ने रोटरी को लेकर बड़ी बड़ी  बातें करके देश के विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट - जो अगले रोटरी वर्ष में उनके साथ ही अपने अपने डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होंगे - के बीच अपनी पैठ और खास छवि बनाने की कोशिश की, जिसमें उन्हें शुरू में तो सफलता मिली; लेकिन फिर उनकी पोल खुलना शुरू हो गई । कुछेक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स इलेक्ट ने इन पंक्तियों के लेखक से बात करते हुए बताया कि शुरू में तो दीपक गुप्ता की बड़ी बड़ी बातें सुन कर वह और दूसरे लोग उनसे प्रभावित हुए थे, लेकिन जैसे जैसे उन्होंने दीपक गुप्ता को नजदीक से देखा/जाना तो मालुम चला कि उनके पास सिर्फ बातें ही बातें हैं - अपनी ही बातों को वह खुद भी गंभीरता से नहीं लेते हैं; और इसीलिए उनकी बातों और उनके व्यवहार में जमीन-आसमान का अंतर नजर आता है । कलीग डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स इलेक्ट के बीच जाहिर होती जा रही उनकी असलियत से पैदा हुआ उनका संकट मुकेश अरनेजा की हरकतों पर उनके चुप बने रहने से और बढ़ेगा ही । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में मुकेश अरनेजा द्वारा की गईं हरकतों पर दीपक गुप्ता की चुप्पी - उन हरकतों में उनकी मिलीभगत के संदेहों को बल देने के साथ-साथ रोटरी के आदर्शों के प्रति जताए/दिखाए जा रहे लगावों को नकली, दिखावटी और फर्जी भी साबित कर रही है । यानि मानचेस्टर ग्रेंड हयात सेन डिएगो में दीपक गुप्ता के 'एलिफैंट इन द रूम' जुमले का शिकार होने की पूरी पूरी स्थितियाँ हैं ।