Saturday, June 30, 2012

रमेश अग्रवाल ने असित मित्तल को नीचा दिखाने की अपनी कारस्तानी को सही साबित करने के लिए शेखर मेहता के नाम का इस्तेमाल किया

नई दिल्ली | रमेश अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के अपने कार्यकाल की शुरुआत इंटरनेश्नल डायरेक्टर शेखर मेहता की उपस्थिति में करने की योजना बनाई और साथ ही साथ उन्हें अपनी चालबाजियों का शिकार भी बना लिया | असित मित्तल को नीचा दिखाने की अपनी कार्रवाई में रमेश अग्रवाल ने जिस तरह शेखर मेहता का नाम इस्तेमाल किया, उससे रमेश अग्रवाल ने एक फिर साबित किया कि उनकी चालबाजियों का शिकार होने से कोई भी नहीं बच सकता है | रमेश अग्रवाल ने अपने प्रायः हर काम में जिस तरह से घटियापन दिखाया है और जिस तरह से वह लगातार उन लोगों को भी नाराज़ करते जा रहे हैं जिनकी एक समय वह खुशामद और चापलूसी किया करते थे - उससे लोगों को यह देख कर तो कोई हैरानी नहीं हुई कि रमेश अग्रवाल ने असित मित्तल को एक फिर नीचा दिखाया; लेकिन यह किसी ने नहीं सोचा था कि रमेश अग्रवाल अपना घटियापन दिखाने के चक्कर में शेखर मेहता तक को नहीं बख्शेंगे | डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रमेश अग्रवाल ने एक से एक मूरखतापूर्ण नजारों को प्रस्तुत किया है, जिसकी श्रृंखला में उन्होंने ऐलान किया कि वह तीस जून के कार्यक्रम में कॉलर एक्सचेंज नहीं करेंगे | कई एक लोगों के सामने रमेश अग्रवाल ने यह कहने/बताने में भी कोई संकोच नहीं किया कि लोगों के बीच असित मित्तल की जिस तरह की बदनामी है, उसे देखते हुए उनसे कॉलर एक्सचेंज करना उन्हें अपमानित होने जैसा लगता है | उल्लेखनीय है कि असित मित्तल की बिजनेस संबंधी बेईमानियों को लेकर रमेश अग्रवाल उन्हें पहले भी कई बार जलील कर चुके हैं | रमेश अग्रवाल को तीस जून के बाद असित मित्तल को जलील करने का मौका चूँकि नहीं मिलता, इसलिए उन्होंने तीस जून को मिल सकने वाले मौके का इस्तेमाल कर लेने में भी कोई चूक नहीं की | उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट में यह प्रथा भी है और तकनीकी रूप से देखें तो यह सही भी है कि चूँकि तीस जून तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का अंतिम कार्यदिवस होता है, इसलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रहते हुए वह पद की जिम्मेदारी आने वाले गवर्नर को सौंप दे | रमेश अग्रवाल ने लेकिन न डिस्ट्रिक्ट की प्रथा का सम्मान किया और न व्यावहारिकता को अपनाया | तीस जून को उन्होंने जब कॉलर एक्सचेंज नहीं किया है, तो एक जुलाई को वह किस्से कॉलर एक्सचेंज करेंगे - भूतपूर्व हो चुके गवर्नर असित मित्तल से ? एक जुलाई को असित मित्तल तो गवर्नर हैं नहीं, कॉलर उनके पास है ही नहीं - उसे तो वह उतार चुके हैं; अब जो चीज उनके पास है नहीं, उसे वह दे कैसे सकते हैं ? लेकिन रमेश अग्रवाल की जिद है कि वह एक जुलाई को कॉलर लेंगे - लेंगे लेकिन किससे ? नियम और संविधान के संदर्भ में इस बात को यदि देखें तो यह 'संवैधानिक संकट' जैसा मामला है | रमेश अग्रवाल ने जिसे अपनी जिद और असित मित्तल को जलील करने की अपनी कोशिश में पैदा किया है | रमेश अग्रवाल के नजदीकियों तथा डिस्ट्रिक्ट के कुछेक बड़े नेताओं ने उन्हें ऐसा न करने को लेकर समझाने की कोशिश की थी, लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी; बल्कि उन्होंने सभी को यह कह कर चुप करा दिया कि इस बारे में उन्होंने इंटरनेश्नल डायरेक्टर शेखर मेहता से बात कर ली है, जो एक जुलाई के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि हैं; और जिन्होंने कहा है कि ऐसा हो सकता है | रोटरी में नियमों के साथ खिलवाड़ चूँकि कोई भी कर सकता है, इसलिए लोगों ने भी मान लिया कि शेखर मेहता ने भी हाँ कह दी होगी | और फिर क्या पता कि रमेश अग्रवाल ने सचमुच उनसे पूछा भी है या नहीं, और यदि पूछा भी है तो उन्हें पूरी बात तो नहीं ही बताई होगी | इस बात पर तो कोई भी विश्वास नहीं करेगा कि रमेश अग्रवाल ने शेखर मेहता को बताया होगा कि उन्हें चूँकि असित मित्तल को नीचा दिखाना है, इसलिए वह तीस जून को नहीं, बल्कि एक जुलाई को कॉलर पहनेंगे और शेखर मेहता ने उन्हें कह दिया होगा कि हाँ, आप ऐसा कर सकते हो | जाहिर है कि रमेश अग्रवाल ने असित मित्तल को नीचा दिखाने की कोशिश में की गई अपनी एक मूरखतापूर्ण कारस्तानी को सही साबित करने के लिए शेखर मेहता को या तो धोखा दिया है और या उनके नाम का इस्तेमाल किया है | रमेश अग्रवाल ने अपनी हरकतों से लगातार लोगों को अपमानित ही किया है, जिसका नतीजा है कि उनसे हमदर्दी रखने वाले और उनके काम आने वाले कई लोग उनका साथ छोड़ चुके हैं | इससे कोई सबक न लेते हुए रमेश अग्रवाल जिस तरह अपनी कारगुजारियों को अंजाम देते जा रहे हैं तथा इंटरनेश्नल डायरेक्टर शेखर मेहता तक का नाम इस्तेमाल कर रहे हैं और रोटरी को कलंकित कर रहे हैं उससे लोगों को लग रहा है कि रमेश अग्रवाल के गवर्नर-काल में उन्हें और-और नज़ारे देखने को मिलेंगे |

Friday, June 29, 2012

रवींद्र सिंह को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार बनाये जाने की सुगबुगाहट ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को दिलचस्प बना दिया है

नई दिल्ली/गाजियाबाद | रवींद्र सिंह की उम्मीदवारी की चर्चा ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को दिलचस्प मोड़ दे दिया है | मजे की बात यह है कि खुद रवींद्र सिंह अपनी उम्मीदवारी को लेकर अभी बहुत सक्रिय नहीं दिख रहे हैं | इसके बावजूद उनकी उम्मीदवारी की चर्चा है - और उन लोगों के बीच है, पिछले चुनाव में जो संजय खन्ना की उम्मीदवारी के समर्थन में थे | दरअसल इसी एक बात ने रवींद्र सिंह की उम्मीदवारी की चर्चा को महत्वपूर्ण बना दिया है | गौर करने की बात यह है कि अभी तक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए जो भी नाम चर्चा में हैं, वह सभी घूम-फिर कर उन्हीं नेता-लोगों के नज़दीक हैं जो पिछले चुनाव में रवि चौधरी के समर्थन में थे | डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी लड़ाई को यदि खेमेबाजी के ऐंगल से देखते हैं तो पाते हैं कि पिछले चुनाव में जीतने वाले खेमे से अभी तक कोई उम्मीदवार सामने नहीं आया है | ऐसे में, पिछले चुनाव में जीतने वाले खेमे के मुख्य कर्ता-धर्ता यदि रवींद्र सिंह की उम्मीदवारी की बात करते सुने जा रहे हैं, तो इससे डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में नया मोड़ आना स्वाभाविक ही है | उल्लेखनीय है कि पिछले चुनाव में जीतने वाले खेमे के लोग अभी तक रवि भाटिया की उम्मीदवारी को समर्थन देने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन रवि भाटिया की उम्मीदवारी को चूँकि उनके क्लब से हरी झंडी नहीं मिली, लिहाजा पिछले चुनाव में जीतने वाले खेमे के लोगों की उम्मीदें अब रवींद्र सिंह पर आ टिकी है | यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि रवींद्र सिंह पहले हालाँकि उसी 'गिरोह' के सदस्य थे, जो गिरोह पिछले चुनाव में रवि चौधरी की उम्मीदवारी के समर्थन में था | एक समय था जब रवींद्र सिंह, मुकेश अरनेजा की आँख का तारा हुआ करते थे; नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्य के रूप में रवींद्र सिंह ने असित मित्तल की उम्मीदवारी का खुला समर्थन किया था; रमेश अग्रवाल के चुनाव में समर्थन जुटाने के लिए रवींद्र सिंह ने दिन-रात भाग-दौड़ की थी; और विनोद बंसल की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की राह को आसान बनाने के लिए अपनी उम्मीदवारी की बलि दे दी थी, जिसके लिए विनोद बंसल ने सार्वजानिक रूप से उनका आभार व्यक्त किया था - लेकिन रवींद्र सिंह को मुकेश अरनेजा, असित मित्तल और रमेश अग्रवाल से बदले में सिर्फ धोखा ही मिला | जल्दी ही यह भी देख/जान लिया जायेगा कि विनोद बंसल ने जिन रवींद्र सिंह का सार्वजानिक रूप से सबसे पहले आभार व्यक्त किया था, गवर्नर के रूप में उनका उन्हीं रवींद्र सिंह के प्रति कैसा-क्या रवैया रहता है ? मुकेश अरनेजा, असित मित्तल और रमेश अग्रवाल से मिले धोखे के कारण ही रवींद्र सिंह पिछले चुनाव के आते-आते तक 'गिरोह' से अलग हो गए थे | क्या यह सिर्फ संयोग है कि 'गिरोह' के उम्मीदवार रवि चौधरी की उम्मीदवारी में घोषित रूप से पलीता लगाने की शुरुआत रवींद्र सिंह के क्लब - रोटरी क्लब गाजियाबाद हैरीटेज से ही हुई थी ? संजय खन्ना की चुनावी जीत में रोटरी क्लब गाजियाबाद हैरीटेज की सुस्पष्ट आक्रामक पहल की मुख्य भूमिका थी | रवींद्र सिंह के क्लब के अध्यक्ष अरविंद सिंघल ने जिस तरह 'गिरोह' की तरफ से पड़े तमाम दबावों, लालचों और सिफारिशों का सामना करते हुए अपने 'लक्ष्य' को नहीं छोड़ा - उसके पीछे रवींद्र सिंह की सोची-विचारी रणनीति से मिल रही 'ताकत' ही काम कर रही थी | रवींद्र सिंह ने अपनी रणनीति का नज़ारा हालाँकि इससे पिछले वर्ष ही दिखा दिया था, जब उनकी उम्मीदवारी विनोद बंसल की राह में रोड़ा बन रही थी | विनोद बंसल की उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे 'गिरोह' के नेता पहले तो रवींद्र सिंह की उम्मीदवारी को गंभीरता से नहीं ले रहे थे और चूँकि वह दूसरों की खिल्ली उड़ाने में बड़े एक्सपर्ट हैं, इसलिए वह रवींद्र सिंह की उम्मीदवारी की खिल्ली ही उड़ा रहे थे | लेकिन जब उन्हें रवींद्र सिंह की उम्मीदवारी के कारण विनोद बंसल की उम्मीदवारी में फच्चर फंसता हुआ नज़र आया तो वह रवींद्र सिंह को मनाने में जुटे | रवींद्र सिंह चूँकि भले व्यक्ति हैं, इसलिए वह जल्दी से मान भी गए | रवींद्र सिंह माने, तो विनोद बंसल का रास्ता साफ हुआ | रवि चौधरी के समय में, 'गिरोह' के लोगों ने एक फिर रवींद्र सिंह को हलके में लिया | विनोद बंसल के समय में, कुछ समय बाद 'गिरोह' के नेताओं को अक्ल आ गई थी और उन्होंने रवींद्र सिंह की अहमियत को समझ लिया था - लिहाजा विनोद बंसल का काम बन गया था | लेकिन रवि चौधरी के समय रवींद्र सिंह की अहमियत को समझने/पहचानने में गिरोह के नेता चूक गए - जिसका नतीजा हुआ कि उम्मीदवार के रूप में रवि चौधरी चारों खाने चित्त नज़र आये | यही तथ्य चुनावी राजनीति की उठा-पटक में रवींद्र सिंह को और उनकी रणनीतिक सोच को महत्वपूर्ण बनाता है | यही कारण है कि रवींद्र सिंह की उम्मीदवारी की संभावनापूर्ण चर्चा ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को दिलचस्प मोड़ दे दिया है | जैसा कि पहले कहा गया है कि रवींद्र सिंह अपनी उम्मीदवारी को लेकर खुद बहुत सक्रिय नहीं हैं - कुछ लोग इसके पीछे पिछले दिनों उनके बीमार पड़ने में देखते हैं तो कुछ लोग इसमें उनकी रणनीतिक चतुराई को पहचानने/समझने का प्रयास करते हैं | उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों रवींद्र सिंह पहले तो बीमार पड़े और फिर बीमारी के चलते कमजोरी का शिकार बने - इस कारण उनकी सक्रियता में स्वाभाविक रूप से कमी आई | उनकी उम्मीदवारी की संभावना को लेकर जिन लोगों ने भी सीधे उनसे बात की - इस संबंध में उनसे बात करने वाले लोगों में इन पंक्तियों का लेखक भी है - उन्हें रवींद्र सिंह ने रहस्यभरा गोल-मोल सा जबाव दिया - इससे उनकी उम्मीदवारी को लेकर बात और भी गंभीर हो गई | रवींद्र सिंह की उम्मीदवारी में 'उम्मीद' देख रहे, संजय खन्ना को चुनाव जितवाने वाले खेमे के कर्ता-धर्ताओं का मानना और कहना है कि पिछली बार एक खेमे के रूप में उन्हें जो जोरदार चुनावी जीत मिली है, उसे जाया नहीं जाने देना चाहिए तथा खेमे की तरफ से अपना उम्मीदवार लाना चाहिए और इसीलिए रवींद्र सिंह को उम्मीदवार बनाने की तैयारी की जा रही है | रवींद्र सिंह को उम्मीदवार बनाने की तैयारी में जुटे, संजय खन्ना को चुनाव जितवाने वाले खेमे के कर्ता-धर्ता रवींद्र सिंह की उम्मीदवारी पर दरअसल इसलिए जोर दे रहे हैं क्योंकि एक रोटेरियन के रूप में रवींद्र सिंह की कर्मभूमि वही गाजियाबाद/उत्तर प्रदेश रहा है, जिसने संजय खन्ना को चुनाव जितवाने में महत्वपूर्ण व निर्णायक भूमिका निभाई | उन्हें यह भी लगता है कि पिछली बार गाजियाबाद/उत्तर प्रदेश पहले भले ही रवि चौधरी की उम्मीदवारी के साथ दिखता रहा हो, लेकिन जैसे ही संजय खन्ना की सक्रियता बढ़ी वह संजय खन्ना की उम्मीदवारी के समर्थन में आ खड़ा हुआ | इससे यही साबित हुआ है कि रवि चौधरी की उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे 'गिरोह' के जो नेता गाजियाबाद/उत्तर प्रदेश में अपना समर्थन मानते हैं, उनका वह समर्थन है नहीं | ऐसे में, गाजियाबाद में भले ही पहले से उम्मीदवार हैं पर वह चूँकि 'गिरोह' के 'इस' या 'उस' नेता के भरोसे हैं, इसलिए रवींद्र सिंह के लिए अच्छा मौका हो सकता है | रवींद्र सिंह ने विनोद बंसल के लिए 'जो' किया था, उसे ध्यान में रखते हुए यह उम्मीद भी की जा सकती है कि विनोद बंसल का समर्थन उन्हें मिल जाये | यह उम्मीद इसलिए भी है क्योंकि 'गिरोह' में रहने के कारण विनोद बंसल को जिस बदनामी का शिकार होना पड़ा उससे यह उम्मीद भी की जाती है कि विनोद बंसल अब गिरोह के साथ नहीं रहना चाहेंगे | समय की नजाकत को पहचानते हुए विनोद बंसल ने 'गिरोह' के नेताओं से पीछा छुड़ाने और संजय खन्ना के साथ 'दिखने' की जो कोशिशें शुरू की हैं - उन कोशिशों में भी संजय खन्ना को चुनाव जितवाने वाले खेमे के कर्ता-धर्ताओं को रवींद्र सिंह के रूप में अपने उम्मीदवार के लिए उम्मीद नज़र आ रही है | इसी उम्मीद के चलते रवींद्र सिंह को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार बनाये जाने की सुगबुगाहट ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को दिलचस्प बना दिया है |

Wednesday, June 27, 2012

'गंदी राजनीति' और 'षड्यंत्र' का शिकार बने अरुण जैन, सुधीर मंगला की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी के लिए मुसीबत बने

नई दिल्ली | अरुण जैन को अध्यक्ष पद से हटाये जाने का मामला सुधीर मंगला के लिए आफत बनता दिख रहा है | सुधीर मंगला के लिए राहत की बात यही है कि अरुण जैन को क्लब में कोई समर्थन नहीं मिला और अरुण जैन अलग-थलग ही नज़र आये हैं | लेकिन अरुण जैन को अध्यक्ष पद से हटाये जाने को लेकर जिस तरह की चिट्ठी-पत्री शुरू हो गई है और उसमें जिस तरह से सुधीर मंगला को सीधा निशाना बनाया जा रहा है - उससे सुधीर मंगला के लिए मुसीबत खड़ी हो गई दिख रही है | 'रचनात्मक संकल्प' को एक बेनामी चिट्ठी मिली है जिसमें अरुण जैन को अध्यक्ष पद से हटाये जाने के लिए सुधीर मंगला को जिम्मेदार बताया गया है | इस बेनामी चिट्ठी में सुधीर मंगला पर गंभीर आरोप यह लगाया गया है कि सुधीर मंगला ही रोटरी क्लब दिल्ली राजधानी में हुए विभाजन के लिए जिम्मेदार थे और अब उनकी राजनीति रोटरी क्लब दिल्ली लुटियन को भी 'लुटाने' को तैयार है | सुधीर मंगला और क्लब के दूसरे सदस्य इस चिट्ठी के पीछे अरुण जैन को 'देखते' हैं, लेकिन अरुण जैन इस चिट्ठी के पीछे किसी भी रूप में होने से इंकार करते हैं | अरुण जैन लेकिन अपनी अध्यक्षी जाने का जो जो कारण बताते हैं, कमोवेश वही कुछ इस चिट्ठी में कहा/लिखा गया है | अरुण जैन क्लब के पदाधिकारियों के इस दावे को बिलकुल झूठा बताते हैं कि उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दिया है | उल्लेखनीय है कि बबाल से और डिस्ट्रिक्ट के लोगों के सवालों से बचने के लिए क्लब के पदाधिकारियों ने दावा किया कि समय की कमी के चलते अरुण जैन ने खुद ही अध्यक्ष पद से हटने की पेशकश की थी और उन्होंने अपनी इच्छा से ही अध्यक्ष पद छोड़ा है | अरुण जैन का कहना है कि अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी निभाने के लिए उनके पास समय की कोई कमी नहीं है और उन्होंने न कभी अध्यक्ष पद छोड़ने की बात कही और न इस्तीफ़ा दिया | अरुण जैन का कहना है कि उन्हें गंदी राजनीति का शिकार बनाया गया और नियमों को ठेंगा दिखा कर षड्यंत्रपूर्ण तरीके से अध्यक्ष पद से हटाया गया है | किसने 'गंदी राजनीति' या 'षड्यंत्र' किया, अरुण जैन आपसी बातचीत में यह नहीं बताते | वह यही कह कर किसी का नाम लेने से बचते हैं कि 'आप सब जानते हैं |' लेकिन उनका पक्ष लेते हुए जो चिट्ठी सामने आई है उसमें - जो हुआ, उसके लिए सुधीर मंगला को जिम्मेदार ठहराया गया है | चिट्ठी में कहा गया है कि अरुण जैन तो पूरी मेहनत से न सिर्फ अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी निभा रहे थे, बल्कि सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के लिए भी प्रयास कर रहे थे | चिट्ठी में कहा गया है कि क्लब के कुछेक सदस्य अरुण जैन को सहयोग तो नहीं ही कर रहे थे, तरह-तरह की बातों को फैला कर उन्हें बदनाम और कर रहे थे | अरुण जैन को यह देख/जान कर और बुरा लगा कि क्लब के ऐसे सदस्यों को सुधीर मंगला भी शह और समर्थन दे रहे हैं | अरुण जैन ने कई बार सुधीर मंगला को आगाह किया कि क्लब के कुछेक सदस्यों का जो रवैया और तरीका है, उसके चलते डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत उनकी उम्मीदवारी मुश्किल में पड़ जा सकती है, लेकिन सुधीर मंगला ने कभी भी उनकी बातों को तवज्जो नहीं दी; बल्कि अरुण जैन को ही ऐसी-ऐसी बातों के लिए जिम्मेदार ठहराया जिनके लिए अरुण जैन किसी भी तरह से जिम्मेदार नहीं थे | अरुण जैन को सुधीर मंगला से इस बात की गंभीर शिकायत रही कि सुधीर मंगला क्लब के उन लोगों के ज्यादा नज़दीक रहे जो अरुण जैन को न तो सहयोग करने को तैयार थे, और न अरुण जैन को काम करने दे रहे थे | अरुण जैन के हर फैसले पर ऊँगली उठाना और ऐतराज करना जिन्होंने अपना धर्म बना लिया था; तरह-तरह की बातें फैला कर जो लगातार अरुण जैन को बदनाम कर रहे थे | यह बात तो खुद सुधीर मंगला ने कही/बताई कि अरुण जैन अक्सर उनसे कहते थे कि क्लब में कुछेक लोग उन्हें काम नहीं करने दे रहे हैं | सुधीर मंगला का कहना लेकिन यह रहा कि अरुण जैन जब भी उनसे यह बात कहते, वह उनसे पूछते कि कौन उन्हें काम नहीं करने दे रहा है; अरुण जैन ने लेकिन उन्हें कभी किसी का नाम नहीं बताया | सुधीर मंगला का कहना है कि ऐसे में वह क्या कर सकते थे | सुधीर मंगला को हैरानी है कि अरुण जैन अपनी दशा के लिए उन्हें क्यों जिम्मेदार ठहरा रहे हैं | सुधीर मंगला को भले ही हैरानी हो, लेकिन अरुण जैन की तरफ से उन्हें ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है | रोटरी क्लब दिल्ली राजधानी में हुए विभाजन के लिए सुधीर मंगला को जिम्मेदार ठहरा कर तथा सुधीर मंगला पर 'गंदी राजनीति' व 'षड्यंत्र' करने का आरोप मढ़ कर यह जता दिया गया है कि अरुण जैन को अध्यक्ष पद से हटा देने की कार्रवाई सुधीर मंगला के लिए मुसीबत बन गई है |

Sunday, June 24, 2012

डॉक्टर सुब्रमणियन लीडर/गवर्नर बनना चाहते हैं या ऐनटरटेनर ?

नई दिल्ली | डॉक्टर सुब्रमणियन ने अपनी जिस गायकी को एक उम्मीदवार के रूप में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी लड़ाई में अपना हथियार बनाने की रणनीति बनाई थी, उसने उनकी उम्मीदवारी को चोट पहुँचाने का ही काम किया है | उल्लेखनीय है कि 23 जून को इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में अपनी गायकी के कार्यक्रम के जरिये डॉक्टर सुब्रमणियन ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी को प्रमोट करने की जोरदार तैयारी की थी | किंतु उनके कार्यक्रम में न तो उनकी तैयारी की अपेक्षानुसार रोटेरियन पहुँचे और जो पहुँचे भी उन्होंने भी पाया/माना कि इस एक कार्यक्रम से अपनी उम्मीदवारी का प्रमोशन शुरू करके डॉक्टर सुब्रमणियन ने अपनी उम्मीदवारी का बँटा धार कर लिया है | डॉक्टर सुब्रमणियन के शुभचिंतकों ने भी माना और कहा है कि इस कार्यक्रम के जरिये डॉक्टर सुब्रमणियन ने रोटेरियंस को अपनी उम्मीदवारी के प्रति उत्सुक और उत्साहित करने की जो कोशिश की, वह कोशिश न सिर्फ विफल रही बल्कि उसने उल्टा असर ही पैदा किया है | कुछ लोग मजाक में, तो कुछ गंभीरता के साथ यह पूछने/समझने में लग गए हैं कि डॉक्टर सुब्रमणियन लीडर/गवर्नर बनना चाहते हैं या ऐनटरटेनर ? वह अच्छा गाते हैं - यह जान कर रोटेरियंस उन्हें अपना गवर्नर भला क्यों चुनें ? डॉक्टर सुब्रमणियन के लिए मुसीबत की बात यह भी हुई कि उसी 23 जून को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के एक दूसरे उम्मीदवार जेके गौड़ ने भी अपनी उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से एक कार्यक्रम का आयोजन किया था, जो अप्रत्याशित रूप से सफल रहा | जेके गौड़ की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से आयोजित हुए कार्यक्रम में न केवल रोटेरियंस की उपस्थिति अच्छी दिखी, बल्कि हर किसी ने जेके गौड़ और उनके संगी-साथियों की व्यवहार कुशलता की जम कर तारीफ भी की और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार के रूप में जेके गौड़ की सक्रियता व रोटेरियंस के बीच पैठ बनाने की कोशिशों को सकारात्मक रूप से रेखांकित भी किया | 23 जून से पहले जो रोटेरियंस डॉक्टर सुब्रमणियन और जेके गौड़ के बीच तुलना करते हुए डॉक्टर सुब्रमणियन को ज्यादा नंबर देते थे, 23 जून को हुए दोनों कार्यक्रमों की रिपोर्ट जानने के बाद यह कहते हुए सुने गए हैं कि डॉक्टर सुब्रमणियन को चुनावी राजनीति के तौर-तरीकों की जरा भी समझ नहीं है और कि वह अपनी उम्मीदवारी का कबाड़ा खुद ही कर लेंगे | डॉक्टर सुब्रमणियन के लिए ज्यादा झटके की बात यह भी रही कि उन्होंने जिन भी रोटेरियंस को अपना गाना सुनने के लिए आमंत्रित किया, उनमें से कइयों से उन्हें यह सुनने को मिला कि उन्हें तो जेके गौड़ के कार्यक्रम में जाना है | डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी राजनीति के संदर्भ में, डॉक्टर सुब्रमणियन के कार्यक्रम की विफलता से निराश डॉक्टर सुब्रमणियन के नजदीकियों ने विफलता के लिए एक मजेदार कारण यह बताया कि कार्यक्रम के निमंत्रण कार्ड में चूँकि डिनर का जिक्र नहीं था, इसलिए रोटेरियंस ने इस कार्यक्रम में आने में दिलचस्पी नहीं दिखाई | ऐसा तर्क देने वाले डॉक्टर सुब्रमणियन के नजदीकियों से पूछा लेकिन यह गया कि यदि उन्हें लगता है कि रोटेरियंस डिनर के लालच में ही कार्यक्रम में आते हैं तो उन्होंने रोटेरियंस को डिनर का लालच दिया क्यों नहीं ? डॉक्टर सुब्रमणियन से अभी तक लोगों को यह शिकायत थी कि वह यदि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार हैं तो एक उम्मीदवार के रूप में सक्रिय क्यों नहीं हो रहे हैं | इस तरह की शिकायत करने वाले लोगों को लेकिन यह देख/जान कर घोर निराशा ही हुई है कि डॉक्टर सुब्रमणियन एक उम्मीदवार के रूप में सक्रिय भी हुए तो इस तरह कि उन्होंने रोटेरियंस को अपने से दूर करने का ही काम किया और रोटेरियंस को यह दिखाने/जताने का ही काम किया कि उन्हें चुनावी राजनीति के 'तौर-तरीके' न तो पता हैं और न ही वह उन्हें जानना/समझना चाहते हैं | अधिकतर रोटेरियंस को शक/संदेह है कि डॉक्टर सुब्रमणियन एक उम्मीदवार के रूप में काम कर पायेंगे | 23 जून को हुए कार्यक्रम के जरिये डॉक्टर सुब्रमणियन ने एक उम्मीदवार के रूप में अपनी जिस तरह की सोच और तैयारी को प्रदर्शित किया है उससे उन रोटेरियंस का शक/संदेह इस विश्वास में बदलता हुआ नजर आ रहा है कि डॉक्टर सुब्रमणियन के लिए एक उम्मीदवार के रूप में काम कर पाना सचमुच बहुत ही मुश्किल होगा | 23 जून को हुए दोनों कार्यक्रमों की रोटेरियंस के बीच जो तुलना हुई है उसमें जेके गौड़ का पलड़ा डॉक्टर सुब्रमणियन से भारी हो गया है | डॉक्टर सुब्रमणियन के शुभचिंतकों का भी मानना और कहना है कि डॉक्टर सुब्रमणियन ने इस असफलता से यदि कोई सबक नहीं सीखा तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी लड़ाई में बने रहना उनके लिए सचमुच मुश्किल हो जायेगा |

Wednesday, April 18, 2012

राकेश त्रेहन जिन केएल खट्टर के कारण तरह-तरह से अपमानित होते रहे हैं, मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के लिए अब उन्हीं केएल खट्टर का समर्थन करेंगे क्या

नई दिल्ली | केएल खट्टर मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन बनने के लिए अब उन्ही राकेश त्रेहन की खुशामद में जुट गए हैं, जिन राकेश त्रेहन के खिलाफ अभी हाल तक उन्होंने जबरदस्त निंदा अभियान चलाया था और जिनके खिलाफ षड्यंत्रपूर्वक नेगेटिव वोटिंग करवाई थी | केएल खट्टर ने अपने नजदीकियों को तथा दूसरे अन्य लोगों को विश्वास दिलाया है कि उन्होंने राकेश त्रेहन के साथ भले ही कितना ही घटियापन किया हो, लेकिन फिर भी वह राकेश त्रेहन से अपनी उम्मीदवारी की चिठ्ठी पर हस्ताक्षर करवा लेंगे | यहाँ मजे की बात यह है कि राकेश त्रेहन के नजदीकियों को तो केएल खट्टर के इस दावे के पूरा होने का कुछ-कुछ भरोसा है, लेकिन केएल खट्टर के नजदीकियों को ऐसा भरोसा नहीं है | दरअसल राकेश त्रेहन के नजदीकियों ने उन्हें बार-बार समझाया था कि केएल खट्टर और उनके ग्रुप के लोग किसी भी तरह से विश्वास करने योग्य नहीं हैं; लेकिन राकेश त्रेहन कभी छुप कर तो कभी चालाकी से केएल खट्टर और उनके ग्रुप के नेताओं से संबंध जोड़े रहे थे | पता नहीं क्यों, राकेश त्रेहन को यह विश्वास रहा कि केएल खट्टर और उनके ग्रुप के नेता दूसरों के साथ भले ही घटियापन करते/दिखाते रहे हों, लेकिन उनके साथ घटियापन नहीं करेंगे | नेगेटिव वोटिंग को लेकर भी राकेश त्रेहन को पक्का विश्वास था कि विजय शिरोहा के खिलाफ नेगेटिव वोटिंग भले ही हो, लेकिन उनके खिलाफ नेगेटिव वोटिंग नहीं होगी | इसके लिए उन्होंने अपने लोगों को अँधेरे में रख कर चंद्रशेखर मेहता से तार भी जोड़ लिए थे - किंतु उसका कोई फायदा नहीं हुआ और जितने नेगेटिव वोट विजय शिरोहा को पड़े, उतने ही नेगेटिव वोट राकेश त्रेहन को भी मिले | सभी का - पक्ष और विपक्ष के सभी लोगों का मानना है कि केएल खट्टर और चंद्रशेखर मेहता ने मिल कर राकेश त्रेहन को उल्लू बनाया | राकेश त्रेहन के नजदीकियों को लगता है कि इससे राकेश त्रेहन को शायद सबक मिला हो कि केएल खट्टर और चंद्रशेखर मेहता किसी भी तरह से विश्वास करने योग्य नहीं हैं | राकेश त्रेहन के कुछेक नजदीकियों को हालाँकि अभी भी शक है कि पता नहीं राकेश त्रेहन ने अब भी सबक सीखा है या नहीं ? केएल खट्टर ने अपनी उम्मीदवारी के आवेदन पर राकेश त्रेहन के हस्ताक्षर करवा लेने का जो विश्वास जताया है, उससे राकेश त्रेहन पर शक करने वाले नजदीकियों का शक और बढ़ गया है | सभी के लिए यह उत्सुकता का विषय है कि केएल खट्टर और उनके संगी-साथियों से बार-बार अपमानित होते रहने के बावजूद उनके साथ तार जोड़े रखने वाले राकेश त्रेहन अब भी उनके काम आयेंगे क्या ?
केएल खट्टर भी मजेदार व्यक्ति हैं | सिर्फ इसलिए ही नहीं कि जिन राकेश त्रेहन को वह बार-बार और तरह-तरह से अपमानित करते/करवाते रहे हैं, उन्हीं राकेश त्रेहन से वह समर्थन की उम्मीद भी कर रहे हैं; बल्कि इसलिए भी कि कई बार विभिन्न मौकों पर यह कह चुकने - कि लायनिज्म में आकर उन्होंने बड़ी गलती की और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनना तो उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल रही - के बावजूद अब वह मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन की चुनावी दौड़ में शामिल हो गए हैं | हालाँकि उनके नजदीकियों का कहना है कि वह भी जानते हैं कि उनके चेयरपरसन बनने की तो कोई संभावना नहीं है, वह तो बस काउंसिल में किसी भी पद की जुगाड़ में हैं | लेकिन इसके लिए भी शामिल तो उन्हें चेयरपरसन पद की दौड़ में होना पड़ेगा | केएल खट्टर मान कर चल रहे हैं कि वह चेयरपरसन पद के लिए अपना दावा पेश करेंगे तब कहीं यह संभावना बनेगी कि वह काउंसिल में कोई पद पा लें | इस कोशिश में उनके लिए मुसीबत की बात यह रही कि जिन लोगों का उन्हें सहयोग और समर्थन चाहिए उन लोगों तक उनकी बदनामी उनसे पहले पहुँची हुई थी | चेयरपरसन - या कुछ भी - बनने के लिए उन्होंने जिस किसी के यहाँ भी गुहार लगाई उसी ने उन्हें उलाहना दिया कि अपने डिस्ट्रिक्ट में तो कोई तुम्हारे साथ है नहीं - वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर फर्स्ट और वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सेकेंड तुम्हारे खिलाफ हैं; ऐसे में कैसे कुछ बनोगे ? मल्टीपल में लोगों को पता हो गया है कि केएल खट्टर ने अपने व्यवहार से अधिकतर लोगों को, खास करके काम के लोगों को अपने खिलाफ किया हुआ है | वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर फर्स्ट राकेश त्रेहन और वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सेकेंड विजय शिरोहा को तो छोड़िये, अभी हाल ही में जो सुभाष गुप्ता वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सेकेंड पद के लिए चुने गए हैं और जिन्हें चुनवाने का श्रेय केएल खट्टर लेने का प्रयास करते रहे हैं, वह सुभास गुप्ता भी केएल खट्टर के कट्टर खिलाफ हो गए हैं | इसी का नतीजा है कि अपने चुने जाने की खुशी में सुभाष गुप्ता ने जो पार्टी दी न तो उसमें उन्होंने केएल खट्टर को बुलाया और न अपने एक पारिवारिक समारोह में उन्हें निमंत्रित करने की जरूरत समझी | सुभाष गुप्ता का कहना है कि केएल खट्टर ने उम्मीदवार के रूप में उन्हें तरह-तरह से जमकर चूसा और हर तरह से तंग किया |
केएल खट्टर की (कु)ख्याति चूँकि मल्टीपल के विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में जा पहुँची है, इसलिए उन्हें कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है; लेकिन फिर भी उन्हें उम्मीद है कि उन्हें मल्टीपल काउंसिल में कोई न कोई पद मिल ही जायेगा | केएल खट्टर ने अपने नजदीकियों से कहा है कि मल्टीपल काउंसिल में पदों की बंदरबांट करने वाले नेताओं को उन्होंने पटा लिया है और उन्हें कुछ न कुछ अवश्य ही मिल जायेगा | अपने नजदीकियों से तो उन्होंने यहाँ तक दावा किया है कि राकेश त्रेहन यदि उनके आवेदन पर समर्थन-हस्ताक्षर नहीं भी करते हैं तो भी वह मल्टीपल काउंसिल में किसी न किसी पद पर होंगे ही | किंतु फिर भी वह राकेश त्रेहन को समर्थन-हस्ताक्षर के लिए पटाने में लग गए हैं, क्योंकि वह भी जान रहे हैं कि बिना राकेश त्रेहन के समर्थन-हस्ताक्षर के उनका दावा कमजोर पड़ेगा |
राकेश त्रेहन की खुशामद में केएल खट्टर को जुटा देख कर लोगों की उत्सुकता यह जानने को लेकर बढ़ गई है कि केएल खट्टर के हाथों तरह-तरह से अपमानित होते रहने वाले राकेश त्रेहन उनके लिए अपना समर्थन हस्ताक्षरित करेंगे या नहीं ?

Monday, April 9, 2012

मुकेश अरनेजा ने अपनी फितरत के अनुरूप ललित खन्ना की उम्मीदवारी को लेकर रमेश अग्रवाल से धोखा किया और रमेश अग्रवाल को पचास हजार रुपये की चपत लगवाई

नई दिल्ली | ललित खन्ना की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवारी की तैयारी की बात को रमेश अग्रवाल से छिपा कर मुकेश अरनेजा ने रमेश अग्रवाल को जो 'धोखा' देने की कोशिश की है, उससे रमेश अग्रवाल ने अपने आप को ठगा हुआ पाया है | इस मुद्दे को लेकर रमेश अग्रवाल के दो नजदीकियों के बीच हुई बातचीत को सुना गया जिसमें एक ने कहा कि 'सुनते हैं कि डायन भी पड़ोस का एक घर छोड़ देती है, लेकिन मुकेश अरनेजा ने रमेश अग्रवाल को भी नहीं छोड़ा'; दूसरे ने तुरंत चुटकी ली कि 'मुकेश अरनेजा डायन थोड़े ही हैं, वह क्यों एक भी घर छोड़े ?' उल्लेखनीय है कि रमेश अग्रवाल ने अपने गवर्नर-काल में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार बनने वाले लोगों को चिन्हित करने पर खासा जोर दिया हुआ है और उनके साथ 'लूटो और दूर दिखने की कोशिश करो' वाला संबंध अपनाया हुआ है | पेट्स में संभावित उम्मीदवार जा सकें इसके लिए संभावित उम्मीदवारों से पचास-पचास हज़ार रुपये अतिरिक्त बसूलने वाले रमेश अग्रवाल पेट्स में यह देख/जान कर हैरान रह गए कि वहाँ मुकेश अरनेजा के मुँहबोले ललित खन्ना भी अपने आप को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का उम्मीदवार बताते हुए अपना चुनाव अभियान चला रहे हैं | हैरान होने का कारण यह रहा कि रमेश अग्रवाल ने मिले फीडबैक के आधार पर जिन लोगों को अपने गवर्नर-काल में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार के रूप में चिन्हित किया है उनमें ललित खन्ना का नाम है ही नहीं | इसी कारण से उन्होंने संभावित उम्मीदवारों को दूर 'रखने' का जो नाटक रचा हुआ है, उस नाटक को वह ललित खन्ना के साथ नहीं रच पाये और न ही ललित खन्ना से वह पचास हज़ार रुपये बसूल कर पाये | रमेश अग्रवाल इस बात पर बहुत ही भन्नाए हुए रहे कि मुकेश अरनेजा ने उन्हें पचास हजार रुपये की चपत लगवा दी | ललित खन्ना ने जिस होशियारी के साथ अपने आप को रमेश अग्रवाल के हाथों लुटने से बचाया और रमेश अग्रवाल को उल्लू बनाया - रमेश अग्रवाल उसके पीछे मुकेश अरनेजा के 'धोखेबाजी के तरह-तरह के आइडियाज़ से भरे दिमाग' को जिम्मेदार मान रहे हैं | रमेश अग्रवाल को विश्वास है कि ललित खन्ना ने उनके साथ जो चाल चली है, उसे चलने की हिम्मत मुकेश अरनेजा ने ही उन्हें दी है |
रमेश अग्रवाल ही क्या, कोई भी यह नहीं स्वीकार करेगा कि ललित खन्ना ने पेट्स में अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के लिए जो अभियान चलाया उसकी उन्होंने पहले से तैयारी नहीं की होगी और उनकी उस तैयारी के बारे में मुकेश अरनेजा को नहीं पता होगा | रमेश अग्रवाल के लिए शिकायत की और निराशा की बात यही है कि तमाम दवाबों व प्रतिकूल स्थितियों के बावजूद उन्होंने मुकेश अरनेजा को इस विश्वास के भरोसे डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाया था कि मुकेश अरनेजा कम-से-कम उन्हें धोखा नहीं देंगे; लेकिन मुकेश अरनेजा अपनी फितरत से बाज नहीं आये और उन्होंने ललित खन्ना की उम्मीदवारी को लेकर रमेश अग्रवाल से धोखा किया | उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए ललित खन्ना की उम्मीदवारी की संभावना काफी समय से व्यक्त की जा रही थी | मुकेश अरनेजा ही लोगों को बताते थे कि ललित को तो वह जब चाहेंगे, तब उम्मीदवार बना देंगे | ललित खन्ना क्लब की राजनीति में मुकेश अरनेजा के प्रमुख सिपाही हैं और मुकेश अरनेजा की हिफाजत में तथा उनके कहने से किसी की भी ऐसी-तैसी करने को हमेशा तैयार रहते हैं | क्लब के लोगों का ही कहना है कि ललित खन्ना वैसे बहुत बढ़िया व्यक्ति हैं, बहुत मिलनसार हैं, बहुत मीठा बोलते हैं - लेकिन मुकेश अरनेजा की राजनीति को ज़माने के लिए वह किसी भी तरह का तांडव करने से पीछे नहीं रहते हैं | ललित खन्ना और मुकेश अरनेजा के बीच की जो केमिस्ट्री है, उसे जानने/पहचानने वाले लोगों को पूरा विश्वास है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी की तैयारी मुकेश अरनेजा की देख-रेख में ही संपन्न हुई होगी | रमेश अग्रवाल को भी यही विश्वास है और इसीलिए वह मुकेश अरनेजा द्धारा उनके साथ किए गए घटियापन को लेकर निराश और नाराज़ हैं |
ललित खन्ना और मुकेश अरनेजा के नजदीकियों का हालाँकि कहना है कि ललित खन्ना अभी अपनी उम्मीदवारी की बात भले ही कर रहे हों और अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हों - लेकिन दरअसल अभी वह स्थितियों का जायेजा ले रहे हैं | संभवतः इसीलिए उन्होंने और मुकेश अरनेजा ने रमेश अग्रवाल को न बताया हो - उन्होंने तय किया हो कि वह पहले स्थितियों को समझ लें; और अभी पचास हजार रुपये रमेश अग्रवाल को देने से बच भी जाएँ | ललित खन्ना को जानने वाले लोगों का कहना है कि ललित खन्ना में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की इच्छा तो बहुत है, किंतु उम्मीदवार बनने की काबिलियत उनमें नहीं है | वह मुकेश अरनेजा के 'खाड़कू' की भूमिका तो अच्छे से निभा सकते हैं, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार की 'जरूरतों' को पूरा करना उनके बस की बात नहीं है | मुकेश अरनेजा के चक्कर में ललित खन्ना ने अपनी स्थिति को हास्यास्पद ही बनाया हुआ है | इसका नज़ारा यह है कि पेट्स में तो ललित खन्ना ने अपने आप को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के उम्मीदवार के रूप में पेश किया और समर्थन जुटाने के लिए अभियान चलाया, किंतु पेट्स के लिए रवाना होने से कुछ ही दिन पहले वह क्लब में प्रेसीडेंट नोमीनी बने | अब ऐसे व्यक्ति की राजनीतिक समझ या अक्ल को आप क्या कहेंगे जो जिस वर्ष डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर रहा होगा, उस वर्ष वह अपने क्लब का प्रेसीडेंट इलेक्ट होगा ? इसी बात से ललित खन्ना के नजदीकियों की इस बात में दम लगता है कि ललित खन्ना के बस की उम्मीदवार बनना है नहीं | यह बात शायद उन्हें भी पता है और इसीलिए उन्होंने रमेश अग्रवाल द्धारा मांगे जाने वाले पचास हजार रुपये होशियारी से बचा लिए | पचास हजार रुपये की 'दिन-दहाड़े' लगाई गई इस चपत के लिए रमेश अग्रवाल लेकिन ललित खन्ना की बजाये मुकेश अरनेजा को ज्यादा जिम्मेदार मान रहे हैं |
|| रमेश अग्रवाल की धूर्तता का नायाब उदाहरण ||
नई दिल्ली | रमेश अग्रवाल ने पेट्स में अपनी धूर्तता का एक नायाब नमूना प्रस्तुत किया | उन्होंने अपने भाषण में जोर देकर कहा कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए होने वाले चुनाव में किसी भी उम्मीदवार का पक्ष नहीं लेंगे और उम्मीदवारों से दूरी बना कर रखेंगे | उन्होंने अपनी टीम के सदस्यों को भी चेतावनी के लहजे में आगाह किया कि वह भी उम्मीदवारों से दूर रहें | यह सुनते ही लोगों में इस बात की चर्चा शुरू हो गई कि रमेश अग्रवाल यदि सचमुच इतने ही ईमानदार हैं तो फिर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवार यहाँ - पेट्स में क्यों आमंत्रित किए गए हैं ? रमेश अग्रवाल की कथनी और करनी का भेद साक्षात् लोगों के सामने था - लेकिन रमेश अग्रवाल की बेशर्मी का आलम यह था कि वह लगातार उम्मीदवारों से दूर रहने की बात किए जा रहे थे | पेट्स में संभावित उम्मीदवारों का कोई काम नहीं था, उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं मिली थी, पेट्स में उनके उपस्थित होने का कोई कारण नहीं था - लेकिन फिर भी वह पेट्स में बुलाये गए थे | क्यों ? इस मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि पेट्स में उपस्थित होने की अनुमति देने के बदले में रमेश अग्रवाल ने संभावित उम्मीदवारों से पचास-पचास हजार रुपये अतिरिक्त बसूले | बेईमानी का - पैसे बसूलने का ऐसा नायाब तरीका इससे पहले किसी भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ने नहीं अपनाया है | 'रंगे हाथ' पकड़े जाने के बावजूद रमेश अग्रवाल द्धारा की जा रही उम्मीदवारों से दूरी बनाये रखने की बात को लोगों ने उनकी धूर्तता के एक नायाब सुबूत के रूप में ही देखा/पहचाना |

Wednesday, April 4, 2012

देखा असर ....................! रमेश अग्रवाल ने अपनी आलोचना से कुछ सबक तो सीखा है, लेकिन 'हेराफेरी' से वह सचमुच बाज आयेंगे क्या ?

नई दिल्ली | डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवारों को हेराफेरीपूर्ण तरीके से 'मौका' देने को लेकर रमेश अग्रवाल की चारों तरफ जो थू थू हुई, उससे सबक लेकर रमेश अग्रवाल ने पेट्स की तैयारियों को अंतिम रूप देने के लिए अपनी टीम के सदस्यों की अभी हाल ही में जो मीटिंग बुलाई उसमें उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवारों को नहीं बुलाया | उल्लेखनीय है कि अपने आप को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी होड़ से दूर और तटस्थ दिखाने के चक्कर में रमेश अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवारों को अपनी टीम में शामिल करने से तो इंकार कर दिया, लेकिन अपने सभी कार्यक्रमों में उन्हें नियमित रूप से शामिल करते रहे | रमेश अग्रवाल ने गजब तो यह किया कि पहले ऐजी एंड डिस्ट्रिक्ट कोर टीम ट्रेनिंग सेमिनार में तथा बाद में डिस्ट्रिक्ट टीम ट्रेनिंग सेमिनार (DTTS) में उन्होंने संभावित उम्मीदवारों को भी शामिल किया | सबसे पहले 'रचनात्मक संकल्प' ने यह सवाल उठाया था कि रमेश अग्रवाल ने जिन लोगों को अपनी टीम का सदस्य बनाने से इंकार कर दिया है, उन लोगों को 'कोर टीम सेमिनार' व 'डिस्ट्रिक्ट टीम सेमिनार' में आमंत्रित करने के पीछे आखिर उद्देश्य क्या है ? रमेश अग्रवाल के नजदीकियों के हवाले से ही 'रचनात्मक संकल्प' ने बताया था कि इसके पीछे उद्देश्य दरअसल संभावित उम्मीदवारों से पेट्स के लिए पैसा ऐंठना है | 'रचनात्मक संकल्प' में यह बात सामने आने के बाद रमेश अग्रवाल की चौतरफा आलोचना हुई | दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के रमेश अग्रवाल के साथी गवर्नर्स ने भी आश्चर्य से पूछना/कहना शुरू किया कि रमेश अग्रवाल बातें तो बड़ी ऊँची ऊँची करते हैं, हरकतें उनकी ऐसी हेराफेरी वाली हैं ? रमेश अग्रवाल को अपने डिस्ट्रिक्ट में भी पूर्व गवर्नर्स की आलोचना का शिकार होना पड़ा | पूर्व गवर्नर्स के साथ की गई मीटिंग में रमेश अग्रवाल ने होशियारी तो दिखाई कि नियम और व्यवस्था की बात करने वाले पूर्व गवर्नर्स को उन्होंने मीटिंग में बुलाया ही नहीं, और सिर्फ उन्हीं पूर्व गवर्नर्स को बुलाया जिनसे उन्हें उम्मीद थी कि वह उनकी आलोचना नहीं करेंगे | इतनी होशियारी करने के बाद भी रमेश अग्रवाल आलोचना से बच नहीं पाये | रमेश अग्रवाल की इस बात के लिए अच्छी खिंचाई हुई कि जिन लोगों को उन्होंने खुद ही तो अपनी टीम में शामिल नहीं किया, फिर क्यों उन्हीं लोगों को वह अपनी टीम के कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए बुलाते हैं ?
रमेश अग्रवाल ने समझ लिया कि 'रचनात्मक संकल्प' ने जो मुद्दा उठाया उस मुद्दे का व्यापक असर हुआ है और उसने उनके अपने डिस्ट्रिक्ट में और दूसरे डिस्ट्रिक्ट के गवर्नर्स के बीच उनकी खासी फजीहत करा दी है | इससे उन्होंने सबक लिया और पहली बार - पहली बार उन्होंने अपने किसी कार्यक्रम में उन लोगों को शामिल नहीं किया जो उनकी टीम में नहीं हैं |
तो क्या रमेश अग्रवाल पर सचमुच असर हुआ है ? रमेश अग्रवाल वह नौटंकीपना अब नहीं दिखायेंगे जो अभी हाल तक वह दिखाते रहे हैं ?
रमेश अग्रवाल को जानने वाले लोगों का कहना है कि रमेश अग्रवाल पर अभी असर होता हुआ जरूर दिखा है, लेकिन यह असर ज्यादा दिन तक बना नहीं रह पायेगा; क्योंकि रमेश अग्रवाल उन लोगों में से हैं जिनके बारे में मशहूर कहावत कही गई है कि 'चोर चोरी से जाये, पर हेराफेरी से न जाये' | रमेश अग्रवाल के नजदीकियों का ही कहना है कि रमेश अग्रवाल ने पेट्स की तैयारियों को अंतिम रूप देने के लिए अपनी टीम के सदस्यों की मीटिंग में भले ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवारों को नहीं बुलाया है, लेकिन पेट्स में संभावित उम्मीदवारों की उपस्थिति को आप अवश्य ही देखेंगे | पेट्स, जैसा कि नाम से ही जाहिर है कि प्रेसीडेंट इलेक्ट सेमिनार है - जिसमें प्रेसीडेंट इलेक्ट की उपस्थिति होनी होती है | इस कार्यक्रम को संभव बनाने तथा अच्छे से आयोजित करने के लिए कुछेक लोगों का सहयोग चाहिए होता है - जिन लोगों को सहयोग करने के लिए चुना जाता है उनकी उपस्थिति की बात भी समझ में आती है | लेकिन जिन लोगों को सहयोग के लिए नहीं चुना जाता, जिन लोगों का पेट्स में कोई काम नहीं है - पेट्स में उनकी उपस्थिति का क्या अर्थ है ? पेट्स की तैयारियों से जुड़े रमेश अग्रवाल के नजदीकियों का ही कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवारों का पेट्स में कोई काम नहीं है, पेट्स की तैयारी से जुड़ी मीटिंग में रमेश अग्रवाल ने उन्हें बुलाया भी नहीं - लेकिन पेट्स में वह उपस्थित होंगे | इसलिए होंगे - क्योंकि रमेश अग्रवाल उनसे मोटा पैसा ऐंठ चुके हैं |
रमेश अग्रवाल लेकिन जिन संभावित उम्मीदवार से पैसा नहीं ऐंठ पाये - जैसे रवि भाटिया से, उन रवि भाटिया का पेट्स के लिए रजिस्ट्रेशन करने में अड़ंगे डाल रहे हैं | रवि भाटिया पेट्स में जा सकें इसके लिए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश चंद्र प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उनके प्रयासों के बाद भी रवि भाटिया का पेट्स में जाना अभी तक तो मुश्किल ही बना हुआ है | इस तरह रमेश अग्रवाल ने 'दिखा' दिया है कि रोटरी को धंधा बना देने और पक्षपात करने जैसे आरोपों से बचने के लिए वह एक कदम आगे तो बढ़ाते हैं लेकिन फिर तुरंत ही दो कदम पीछे खींच लेते हैं - 'हेराफेरी' की आदत आसानी से छूटती जो नहीं |