Friday, March 1, 2019

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू में श्याम बिहारी अग्रवाल को 'गोद' लेने व आगरा पर थोपने तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में बीके गुप्ता के कार्य-व्यवहार से नाराज लोगों के निशाने पर जितेंद्र चौहान के आने से श्याम बिहारी अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए मुसीबत बढ़ी

आगरा । जितेंद्र चौहान और उनके साथी अन्य पूर्व गवर्नर्स पिछले लायन वर्ष में जिन श्याम बिहारी अग्रवाल की उम्मीदवारी का विरोध कर रहे थे - और सिर्फ विरोध ही नहीं कर रहे थे, बल्कि तरह तरह के आरोपों के साथ बदनाम और लांछित भी कर रहे थे; इस वर्ष उन्होंने उन्हीं श्याम बिहारी अग्रवाल की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है । इसे लेकर डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच - खासतौर से जितेंद्र चौहान के नजदीकियों व शुभचिंतकों के बीच खासी नाराजगी दिख रही है । उनका कहना/पूछना है कि जो जितेंद्र चौहान पिछले वर्ष श्याम बिहारी अग्रवाल के कुछेक 'कार्यक्रमों' का हवाला देकर उनके लायन सदस्य बने रहने पर भी सवाल उठा रहे थे, इस वर्ष वह उन्हीं श्याम बिहारी अग्रवाल को (सेकेंड वाइस) डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुनवाने की बात किस मुँह से करेंगे ? लोगों के बीच आरोपपूर्ण चर्चाओं में कहा/सुना जा रहा है कि इस शीर्षासनी बदलाव में पैसों के लेनदेन की बड़ी और निर्णायक भूमिका है । इस भूमिका के चलते एक बड़ा काम लायंस क्लब आगरा रॉयल के फिर से 'जी' उठने का हुआ है । उल्लेखनीय है कि ड्यूज जमा न होने के कारण लायंस इंटरनेशनल ने इस क्लब को 'मरणासन्न' सूची में डाल दिया था; लेकिन जितेंद्र चौहान और श्याम बिहारी अग्रवाल के बीच हुई 'सौदेबाजी' में इस क्लब के बकाया करीब 700 अमेरिकी डॉलर के डयूज जमा हुए और यह क्लब फिर से जी उठा । महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस क्लब के मुखिया राजीव मोहन सक्सेना, जितेंद्र चौहान के बड़े खास लोगों में देखे/पहचाने जाते हैं । पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर और फिर मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के रूप में जितेंद्र चौहान ने अपना कामकाज राजीव मोहन सक्सेना के ऑफिस से ही चलाया था । श्याम बिहारी अग्रवाल ने इस क्लब को नया जीवन तो दिया ही है, साथ ही साथ इस क्लब की सदस्यता भी ले ली है ।
इसके चलते श्याम बिहारी अग्रवाल आगरा के उम्मीदवार बन जाने का दावा कर रहे हैं । उनके इस दावे पर लेकिन आगरा के कई लोग भड़के हुए हैं । उनका कहना/पूछना है कि जितेंद्र चौहान को अपनी राजनीति चलाने के लिए आगरा में कोई उम्मीदवार नहीं मिला क्या - जो उन्होंने श्याम बिहारी अग्रवाल को आगरा के सिर पर थोप दिया है । जितेंद्र चौहान के नजदीकी इस बात का बड़ा तर्कपूर्ण जबाव देते हुए बताते हैं कि जितेंद्र चौहान ने पहले कपिल अग्रवाल और फिर सतीश अग्रवाल को उम्मीदवार बनाने की कोशिश की तो थी; लेकिन जितेंद्र चौहान की डिमांड्स के सामने दोनों ही नहीं टिक पाए - जितेंद्र चौहान तब श्याम बिहारी अग्रवाल को 'गोद' लेने के लिए मजबूर हुए । जितेंद्र चौहान भले ही किसी सौदेबाजी में श्याम बिहारी अग्रवाल को 'गोद' लेने के लिए मजबूर हुए हों और श्याम बिहारी अग्रवाल को भी भले ही लग रहा हो कि जितेंद्र चौहान का समर्थन मिल जाने से सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उनकी दावेदारी मजबूत हो गई है - लेकिन जितेंद्र चौहान और श्याम बिहारी अग्रवाल के बीच बने इस गठजोड़ को लेकर लोगों के बीच जिस तरह की नाराजगी देखने/सुनने को मिल रही है, उससे संकेत लग रहा है कि दोनों के लिए आगे का रास्ता आसान नहीं होगा । दरअसल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में बीके गुप्ता के कार्य-व्यवहार से नाराज लोगों का निशाना भी जितेंद्र चौहान को बनना पड़ रहा है । लोगों का कहना है कि जितेंद्र चौहान अपने स्वार्थ में ऐसे लोगों को गवर्नर बनवा देते हैं, जो किसी काम के साबित नहीं होते हैं और सिर्फ कठपुतली बने रहते हैं । जितेंद्र चौहान और बीके गुप्ता के प्रति पैदा होने वाली यह नाराजगी श्याम बिहारी अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए मुसीबत का कारण बन सकती है । देखना दिलचस्प होगा कि जितेंद्र चौहान अपने आपको और श्याम बिहारी अग्रवाल को लोगों की नाराजगी से पैदा होने वाली मुसीबत से बचाने के लिए क्या और कैसे करतब पेश करते हैं । 

Thursday, February 28, 2019

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव में चेयरमैन बने हरीश चौधरी की धोखेबाजी तो सभी को नजर आ रही है, लेकिन सातवाँ धोखेबाज अभी भी 'छिपा' बैठा है; सातवें वोटर के रूप में कुछेक लोग अविनाश गुप्ता का नाम लेते हैं, तो कई लोग अजय सिंघल को 'देखते' हैं

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन की चुनावी राजनीति में हरीश चौधरी ने कुछ ही मिनटों में ऐसा रंग बदला कि काउंसिल में धोखेबाजी और दगाबाजी के अभी तक के सारे किस्से फीके पड़ गए - और हरीश चौधरी ने मौकापरस्ती का अनोखा रिकॉर्ड बनाया । हरीश चौधरी पहले तो 'आठ सदस्यीय सत्ता ग्रुप' में चेयरमैन पद के चुनाव में उम्मीदवार बनते हैं, और अपने नाम की पर्ची डलवाते हैं - लेकिन वहाँ जब वह चेयरमैन नहीं चुने जाते हैं, तो कुछ ही मिनटों के बाद काउंसिल के 13 सदस्यों के बीच होने वाले चुनाव में सभी को आश्चर्य में डालते हुए वहाँ उम्मीदवार बन जाते हैं और 7 - 6 से चेयरमैन का चुनाव जीत लेते हैं । घटनाक्रम के सीक्वेन्स तथा उसके समयांतराल को देखें तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि हरीश चौधरी ने धोखेबाजी की स्क्रिप्ट पहले से तैयार करके रखी थी - पहले तो वह अपने आप को 'आठ सदस्यीय सत्ता खेमे' के साथ दिखाते रहे, लेकिन वहाँ जब उनकी दाल नहीं गली, तो उन्होंने अपने दूसरे प्लान पर काम किया और चेयरमैन का पद हासिल कर लिया । कुछेक वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की तरफ से सुनने को मिला कि वह पिछले कई वर्षों से चेयरमैन बनने वाले को बधाई देते आ रहे हैं, लेकिन पहली बार ऐसा हुआ है कि हरीश चौधरी को बधाई देने का उनका मन नहीं हुआ; उन्हें लगा कि धोखेबाजी से चेयरमैन का पद पाने वाले हरीश चौधरी को बधाई देना प्रोफेशन व इंस्टीट्यूट की तौहीन करना ही होगा । वैसे हरीश चौधरी की धोखेबाजी की हरकत पर हैरान होने वाले लोगों को 'रचनात्मक संकल्प' की 25 जनवरी की रिपोर्ट को फिर से पढ़ लेना चाहिए, जिसमें कह दिया गया था कि आठ सदस्यीय सत्ता ग्रुप में कुछेक सदस्य तो पहले ही वर्ष में चेयरमैन बनना चाहते हैं, और इसके लिए पाला बदलने से भी परहेज नहीं करेंगे और ग्रुप की एकता बनाये रखना मुश्किल ही होगा । हरीश चौधरी ने 34 दिन पहले 'रचनात्मक संकल्प' की कही गई बात को सच साबित कर दिखाया गया है ।
मजे की, लेकिन गंभीर बात यह है कि हरीश चौधरी की धोखेबाजी तो सभी को नजर आ रही है - लेकिन सातवाँ धोखेबाज अभी भी 'छिपा' बैठा है । माना/समझा जा रहा है कि हरीश चौधरी को 'आठ सदस्यीय सत्ता ग्रुप' से बाहर के पाँच सदस्यों का समर्थन तो मिला ही है - लेकिन यह बात पहेली ही बनी हुई है कि उन्हें सातवाँ वोट किसका मिला है । हरीश चौधरी की धोखेबाजी का मुख्य शिकार बने रतन सिंह यादव तथा अन्य कुछेक लोग सातवें वोटर के रूप में अविनाश गुप्ता का नाम लेते हैं, तो कई लोग अजय सिंघल को 'देखते' हैं । 'आठ सदस्यीय सत्ता ग्रुप' में हरीश चौधरी, रतन सिंह यादव, अविनाश गुप्ता व अजय सिंघल को चेयरमैन पद के लिए ज्यादा लालायित देखा/पहचाना जा रहा था । इनके बीच होड़ केवल चेयरमैन बनने को लेकर ही नहीं है; अपने आपको ज्यादा से ज्यादा जेनुइन और प्रभावी दिखाने की होड़ भी है । यह चारों लोग हालाँकि दूसरी बार में रीजनल काउंसिल का चुनाव जीते हैं, लेकिन चारों ही समझते यह हैं कि जैसे इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के सबसे बड़े तुर्रमखाँ यही हैं । ऐसे में, चारों ही एक दूसरे को आगे बढ़ता हुआ नहीं देख सकते हैं । इन्होंने ग्रुप तो बना लिया, लेकिन अपने आप को दूसरों से आगे और बड़ा दिखाने की कोशिशों में भी लगे रहे - दरअसल यही कारण है कि सातवें वोटर के रूप में अविनाश गुप्ता और अजय सिंघल को ही देखा/पहचाना जा रहा है । माना/समझा जा रहा है कि पर्चीबाजी में रतन सिंह यादव का नाम निकलने की बात को अविनाश गुप्ता और अजय सिंघल हजम नहीं कर पाए और हरीश चौधरी की धोखेबाजी के खेल में शामिल हो गए । यह बात यद्यपि अभी भी साफ नहीं है कि हरीश चौधरी को चेयरमैन चुनवाने में मदद करने वाला सातवाँ समर्थक/वोटर वास्तव में कौन है ?
रतन सिंह यादव के नजदीकियों के अनुसार, रतन सिंह यादव धोखेबाजी के लिए हरीश चौधरी के साथ-साथ अविनाश गुप्ता को कोस रहे हैं - लेकिन पब्लिकली वह जो हुआ, उसे डेमोक्रेटिक वैल्यूज की जीत बता रहे हैं । रतन सिंह यादव का यह मजेदार किस्म का मसखरापन है - पहले तो वह डेमोक्रेटिक वैल्यूज का 'बलात्कार' करते हुए 13 सदस्यों के बीच आठ सदस्यों का ग्रुप बनाते हैं, 13 की बजाये आठ लोगों के बीच चेयरमैन का चुनाव पर्चीबाजी से करने की प्रक्रिया में शामिल होते हैं; और फिर 'फिसल पड़े तो हरगंगे' की तर्ज पर डेमोक्रेटिव वैल्यूज का लिहाफ ओढ़ लेते हैं । लोगों का कहना है कि रतन सिंह यादव की अतिमहत्त्वाकाँक्षा और उस महत्त्वाकाँक्षा को पूरा करने के लिए की गईं मसखरेपन व फूहड़ किस्म की हरकतें ही रतन सिंह यादव को ले डूबीं और उनके हाथ में लगभग आ चुकी नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की चेयरमैनी फिसल गई । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के नए टर्म के लिए चुने गए सदस्यों में हालाँकि कई लोगों की चेयरमैन पद पर निगाह थी, और वह अपने अपने तरीके से गोटियाँ सेट करने में लगे थे - लेकिन रतन सिंह यादव इस मामले में बेहद फूहड़ तरीके से जुटे थे, और उनके नजदीकियों व समर्थकों ने माहौल को और भी हास्यास्पद बनाया हुआ था । उनके नजदीकियों और समर्थकों ने पिछले कई दिनों से उन्हें 'चेयरमैन साब' कहना शुरू किया हुआ था, और यह सुन सुन कर रतन सिंह यादव गदगद हुआ करते थे । खुद रतन सिंह यादव तर्क भी देते थे कि नई रीजनल काउंसिल के सदस्यों में वह चूँकि सबसे 'बूढ़े' हैं, इसलिए उन्हें चेयरमैन बना देना चाहिए । रतन सिंह यादव को नजदीक से जानने वाले कुछेक लोगों का कहना/बताना है कि नई काउंसिल में चुने गए लोगों में रतन सिंह यादव ही सबसे जेनुइन व गंभीर व्यक्ति हैं, लेकिन अपने व्यवहार और अपनी बातों में वह तालमेल नहीं बना पाते हैं; उनके कुछेक घनघोर किस्म के समर्थक तो और भी माशाल्लाह हैं - रतन सिंह यादव तथा उनके घनघोर किस्म के समर्थक अपने तरीकों व अपनी बातों से रतन सिंह यादव की भद्द पिटवाते रहते हैं । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की नई पारी जिस अप्रत्याशित धमाके के साथ शुरू हुई है, उसे देखते हुए अनुमान लगाया जा सकता है कि रीजनल काउंसिल में आगे भी नए नए तमाशे देखने को मिलते रहेंगे ।

Wednesday, February 27, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को लेकर उनके अपने क्लब में मचा घमासान अंततः शांत हुआ और सर्वसम्मति से उनकी उम्मीदवारी घोषित हुई

नई दिल्ली । लंबी ऊहापोह के बाद, मुसीबत में घिरे/फँसे रोटरी क्लब दिल्ली विकास ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को हरी झंडी दे दी है । सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को लेकर क्लब में ही जो राड़ मची हुई थी, उसके कारण डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच क्लब की भी काफी बदनामी हो रही थी । रोटरी क्लब दिल्ली विकास डिस्ट्रिक्ट का सिर्फ सबसे बड़ा क्लब ही नहीं है, बल्कि साख और प्रतिष्ठा के मामले में भी इसकी विशेष पहचान है । चूँकि बड़ा क्लब है, इसलिए विचारों और तौर-तरीकों के मामले में विभिन्नता व विविधता के कई कई रूप इसमें सहज ही देखने को मिलते हैं - जिनमें कई दफा टकराव होता भी नजर आता है; लेकिन क्लब की साख व प्रतिष्ठा इसीलिए बनी हुई है कि समय समय पर पैदा होने वाले टकरावों ने कभी भीषण रूप नहीं लिया, और जब कभी लगा कि मामला भीषण रूप लेने जा रहा है - तभी क्लब के संबद्ध सदस्यों ने क्लब की साख व प्रतिष्ठा के प्रति सम्मान दिखाते हुए मामले को यू टर्न दे दिया और हालात सामान्य बना दिए । इस बार भी ऐसा ही हुआ - डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को लेकर क्लब में भारी खींचतान थी, जिसे देख/सुन कर लग रहा था कि इस बार क्लब अपनी साख व प्रतिष्ठा की पहचान को खो देगा - लेकिन एक बार फिर ऐसा हुआ कि मामला बिगड़ते बिगड़ते सँभल गया; और सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को उनके अपने क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली विकास की तरफ से सर्वसम्मति से हरी झंडी मिल गई ।
इस बार का फच्चर हालाँकि खासा गहरा फँसा था । दरअसल बड़ा क्लब होने के कारण, क्लब के कई सदस्य डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने/होने के आकाँक्षी हैं । समस्या लेकिन यह रही कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने के सभी आकाँक्षी सिर्फ आकाँक्षा पाले रहे और इसे व्यावहारिक रूप देने में वास्तव में विफल रहे । इसके चलते क्लब में माहौल यह बन गया था कि क्लब में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का जो नया आकाँक्षी बनता, पुराने आकाँक्षी मिलकर उसकी टाँग खींचने लगते और उसे आगे बढ़ने से रोक देते । पिछले कुछेक वर्षों में रोटरी क्लब दिल्ली विकास के जिस किसी सदस्य ने भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की आकाँक्षा दिखाई, उसे क्लब में ही इतने विरोधों का सामना करना पड़ा कि उसकी आकाँक्षा को दम ही तोड़ना पड़ा । क्लब में हर वर्ष यह दिलचस्प नजारा देखने को मिलता कि शुरू में तो क्लब के वरिष्ठ सदस्य प्रेसीडेंट की तारीफ करने तथा उसे उत्साहित करने के लिए कहते कि वह तो गवर्नर मैटेरियल हैं, और उसे गवर्नर बनने की दिशा में बढ़ना चाहिए; इस तरह की बातें सुनकर प्रेसीडेंट बेचारा जब सचमुच गवर्नर बनने की दिशा में आगे बढ़ने लगता - तो उसे गवर्नर मैटेरियल बताने वाले लोग ही उसकी टाँग खींचने में जुट जाते । इसीलिए हर तरह से बड़ा, प्रमुख और समर्थ होने के बावजूद, रोटरी क्लब दिल्ली विकास अभी तक डिस्ट्रिक्ट को एक गवर्नर नहीं दे सका है । 
इस बार का नजारा भी पिछली बार के नजारों जैसा ही था - सुनील मल्होत्रा में पहले तो खूब हवा भरी गई, जिसके चलते सुनील मल्होत्रा ने क्लब के प्रेसीडेंट पद की जिम्मेदारियों को निभाने के साथ-साथ एक भावी उम्मीदवार के रूप में भी अपनी सक्रियता को संयोजित किया; लेकिन जब उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी की तरफ सचमुच अपने कदम बढ़ाये, तो उनकी कमियों और कमजोरियों की बातें करके उन्हें हतोत्साहित करने का खेल शुरू हुआ । इस बार के नजारे में लेकिन एक ट्विस्ट भी था, और वह यह कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के नए आकाँक्षी के रूप में सुनील मल्होत्रा ने आसानी से हार मानने का रवैया नहीं दिखाया और क्लब में पैदा हुई प्रतिकूल स्थितियों का सामना करने का निश्चय प्रकट किया । सुनील मल्होत्रा को अपने इसी रवैये का फायदा भी मिला - मजे की बात यह हुई कि क्लब में जो लोग उनकी उम्मीदवारी को लेकर संदेह प्रकट करते हुए विरोध कर रहे थे, अंततः वही उनकी उम्मीदवारी के प्रस्तावक व समर्थक बने । गौर करने की महत्त्वपूर्ण और दिलचस्प बात यह है कि सुनील मल्होत्रा को क्लब के प्रेसीडेंट का पद भी आसानी से नहीं मिला था; क्लब के प्रेसीडेंट का पद भी वह अपनी जिद भरी निरंतर सक्रियता, अपने उदार व्यवहार और किस्मत के भरोसे पा सके थे; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए क्लब के सदस्यों की सर्वसम्मत सहमति भी उन्हें अपनी जिद भरी निरंतर सक्रियता, अपने उदार व्यवहार व किस्मत के भरोसे ही प्राप्त हुई है । इस तथ्य ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उनकी उम्मीदवारी को एक खास 'वजन' दे दिया है । सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को मिले इस वजन ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी परिदृश्य को दिलचस्प बना दिया है ।

Tuesday, February 26, 2019

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी टू में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वंदना निगम की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस 'बेचने' की तैयारी और अजय डैंग के बगावती तेवर से बिगड़ते दिख रहे हालात संभालने के मामले में इंटरनेशनल डायरेक्टर जेपी सिंह खुद कोई होशियारी दिखायेंगे क्या ?

कानपुर । अभिनव सिंह की उम्मीदवारी के जरिए पैसे ऐंठने की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वंदना निगम की तैयारी के बीच अजय डैंग व राजीव बब्बर की सक्रियता ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में खासी गर्मी पैदा करने के संकेत दिए हैं । इन संकेतों में एक डर यह भी छिपा दिख रहा है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर जेपी सिंह ने यदि होशियारी से काम नहीं लिया, तो सिर्फ डिस्ट्रिक्ट ही नहीं - बल्कि लायन लीडरशिप भी एक बड़ी मुसीबत में फँस जा सकती है । दरअसल डिस्ट्रिक्ट के चुनावी समीकरण में जो 'रोटियाँ' सिंकती दिख रही हैं, उसमें चूँकि अजय डैंग के लिए कोई जगह बनती नहीं दिख रही है - इसलिए उनके द्वारा की गई अदालती कार्रवाई की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है और डिस्ट्रिक्ट व लायन लीडरशिप के लिए मामला अटकता/उलझता बन जाता है । असल में अजय डैंग और दीपकराज आनंद द्वारा की गई अदालती कार्रवाई में दीपकराज आनंद के साथ तो लीडरशिप ने 'सौदा' कर लिया, जिसके चलते दीपक राज आनंद ने अपने आपको अदालती कार्रवाई से अलग कर लिया - लेकिन अजय डैंग को लीडरशिप ने कोई तवज्जो नहीं दी, जिसके कारण उनकी कार्रवाई अभी खड़ी हुई है । अजय डैंग बनाम नवीन गुप्ता मामले में अदालत ने पिछले लायन वर्ष में हुए चुनाव में 'स्टेटस क्वो' का फैसला दिया हुआ है और आगे की कार्रवाई पर रोक लगाई हुई है; ऐसे में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए होने वाला चुनाव अधर में है । नवीन गुप्ता ने अपने आपको फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार घोषित करके अजय डैंग और उनके साथियों/समर्थकों को भड़का और दिया है । अजय डैंग के तेवर देख कर अंदाजा लग रहा है कि लीडरशिप ने उनके साथ यदि कोई सम्मानजनक समझौता नहीं किया, तो वह अदालती कार्रवाई के जरिये नाक में दम करने का काम तो करेंगे ही । 
इसी स्थिति में इंटरनेशनल डायरेक्टर जेपी सिंह की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है । डिस्ट्रिक्ट के वरिष्ठ नेता लोग जेपी सिंह के अभी तक के रवैये से तो असंतुष्ट हैं । उनका कहना है कि जेपी सिंह ने डिस्ट्रिक्ट के नाजुक बने हालात को ठीक से समझने की ही कोशिश नहीं की है; और पूरी तरह पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर विनोद खन्ना के भरोसे ही रहे हैं - जो डिस्ट्रिक्ट के हालात को बद से बदतर बनाने के लिए जिम्मेदार हैं । डिस्ट्रिक्ट के वरिष्ठ नेताओं का कहना/बताना है कि जेपी सिंह ने यदि अपनी लीडरशिप क्वालिटी नहीं इस्तेमाल की और विनोद खन्ना जैसे ही रंग-ढंग दिखाए - तो डिस्ट्रिक्ट में हालात सामान्य बनाना मुश्किल ही होगा । हालात सामान्य बनाने में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वंदना निगम का रवैया भी एक बड़ी बाधा है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में वंदना निगम का अभी तक का समय तो सिर्फ स्यापा करने, दूसरों को उपेक्षित व अपमानित करने में ही बीता है; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में वंदना निगम की बस एक ही 'उपलब्धि' रही है - और वह यह कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स डीपी सिंह व किरन सिंह के बेटे अभिनव सिंह उन्हें सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार के रूप में मिल गए हैं, जिनसे पैसे ऐंठना उन्होंने शुरू कर दिया है । डिस्ट्रिक्ट में आरोपपूर्ण चर्चा है कि वंदना निगम ने तीसरी कैबिनेट मीटिंग तो सिंह दंपति को 'बेच' ही दी; और अब डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस भी उन्हें 'बेचने' के लिए सौदेबाजी कर रही हैं । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए होने वाले चुनाव के लिए प्रस्तुत की जा रही राजीव बब्बर की उम्मीदवारी के चलते बनते दबाव के कारण वंदना निगम को डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के लिए अच्छे 'दाम' मिलने की उम्मीद बँधी है ।
राजीव बब्बर ने अभी हाल ही में कानपुर का दौरा करके कानपुर के बड़े और प्रमुख क्लब्स का समर्थन जुटाने का प्रयास किया है; उनके कानपुर दौरे से ठीक पहले डीपी सिंह भी कानपुर आ कर कुछेक बड़े नेताओं से मिले हैं और उन्होंने अभिनव सिंह के लिए माहौल बनाने का काम किया है । राजीव बब्बर के पिता पीसी बब्बर पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हैं, लेकिन राजीव बब्बर अपनी 'लड़ाई' खुद लड़ते दिख रहे हैं, जबकि अभिनव सिंह की तरफ से उनके पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पिता डीपी सिंह मोर्चा संभाले नजर आ रहे हैं - इससे राजीव बब्बर की तुलना में अभिनव सिंह का पलड़ा फिलहाल हल्का पड़ता लग रहा है । अभिनव सिंह के शुभचिंतकों का ही कहना है कि अभिनव सिंह ने उम्मीदवार के रूप में अपनी सक्रियता नहीं दिखाई और पिताजी के भरोसे ही रहे, तो उनके लिए राजीव बब्बर के मुकाबले टिक पाना मुश्किल होगा । इसके आलावा, वंदना निगम पर निर्भरता के चलते - अभिनव सिंह के सामने वंदना निगम के विरोधियों की नाराजगी झेलने का भी खतरा है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में अपने कार्य-व्यवहार से वंदना निगम ने डिस्ट्रिक्ट में अपने विरोधियों की संख्या में काफी इजाफा ही किया है; जिनकी नाराजगी का ठीकरा अभिनव सिंह के सिर पर ही फूटने का खतरा है । अभिनव सिंह की उम्मीदवारी के पक्ष में लेकिन एक स्थिति बहुत अनुकूल है, और  वह यह कि तीनों पदों के लिए झाँसी के उम्मीदवारों ने ताल ठोकी हुई है, जिसके चलते डिस्ट्रिक्ट में झाँसी के उम्मीदवारों के खिलाफ भावनात्मक प्रतिक्रिया है और लोगों का कहना है कि तीनों प्रमुख पद झाँसी वालों को ही चाहिए क्या ? यह आरोपपूर्ण सवाल इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अगले लायन वर्ष में बलविंदर सिंह सैनी अपने गवर्नर-वर्ष में संजय सिंह को उम्मीदवार बनाने की तैयारी करते सुने जा रहे हैं । ऐसे में, अभिनव सिंह की उम्मीदवारी के साथ हमदर्दी रखने वाले उनके शुभचिंतकों का मानना/कहना है कि झाँसी से तीनों पदों के उम्मीदवार होने के कारण झाँसी के उम्मीदवारों के प्रति कानपुर तथा अन्य शहरों के लोगों के बीच विरोध व नाराजगी का जो भाव है, उसका फायदा उठाने के लिए अभिनव सिंह को अपनी उम्मीदवारी के अभियान को गंभीरता से लेने की जरूरत है ।

Monday, February 25, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में एमपी गुप्ता की फील्डिंग के सामने राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स ने हेमंत अरोड़ा को डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी में बनाये रखने के मामले में अपने आप को बेबस पाया और डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में बिजनेस सेशन शुरू होने से ठीक पहले हेमंत अरोड़ा का इस्तीफा ले लिया

चंडीगढ़ । रोटरी क्लब चंडीगढ़ सिटी ब्यूटीफुल के पूर्व प्रेसीडेंट और डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी के पूर्व सदस्य एमपी गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट अकाउंट्स में फर्जीवाड़ा करने के आरोपों से घिरे हेमंत अरोड़ा को डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी का सदस्य बनाये जाने के खिलाफ जो अभियान शुरू किया था, अंततः वह रंग लाया - और डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के दौरान हेमंत अरोड़ा डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी की सदस्यता से इस्तीफा देने के लिए मजबूर हुए । राजा साबू  और उनके साथियों के भरपूर समर्थन के बावजूद हेमंत अरोड़ा कुल चार-पाँच महीने ही डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी के सदस्य बने रह सके । मजे की बात यह रही कि हेमंत अरोड़ा को जिस गुपचुप तरीके से डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी का सदस्य बनाया गया था, उसी गुपचुप तरीके से कमेटी से उनकी विदाई भी हुई । डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के बिजनेस सेशन में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अरुण शर्मा ने हेमंत अरोड़ा के मामले से जुड़े एमपी गुप्ता के क्लब के प्रस्ताव के वापस होने की जानकारी तो लोगों को दी, लेकिन हेमंत अरोड़ा के इस्तीफे की बात को वह 'पी' गए - सच्चाई जबकि यही है कि हेमंत अरोड़ा के इस्तीफा दे देने के बाद एमपी गुप्ता के क्लब के प्रस्ताव की कोई प्रासंगिकता ही नहीं रह गई थी, और इसीलिए उसे वापस ले लिया गया था । जानकारियों को डिस्ट्रिक्ट के लोगों से छिपा कर रखने की राजा साबू गिरोह के सदस्यों की प्रवृत्ति का प्रदर्शन करते हुए अरुण शर्मा ने एक बार फिर डिस्ट्रिक्ट के लोगों को लेकिन आधी-अधूरी बात ही बताई । उल्लेखनीय है कि राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स तमाम महत्त्वपूर्ण बातें - खासकर डिस्ट्रिक्ट के तमाम प्रोजेक्ट्स व ट्रस्ट के हिसाब-किताब से जुड़ी बातें डिस्ट्रिक्ट के लोगों से - यहाँ तक कि कॉलिज ऑफ गवर्नर्स तक से - छिपा कर रखते हैं, जिसे लेकर निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी को रोटरी इंटरनेशनल तक में शिकायत करने के लिए मजबूर होना पड़ा था; और जिसके चलते प्रोजेक्ट्स से जुड़े पैसों के मामले में राजा साबू और उनसे जुड़े पूर्व गवर्नर्स की भूमिका को संदेह से देखा जाता है । 
दरअसल इसी कारण से हेमंत अरोड़ा को डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी का सदस्य बनाए जाने से मामला भड़का हुआ था, और हेमंत अरोड़ा को फाइनेंस कमेटी से हटाने की माँग की जा रही थी । एमपी गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रवीन गोयल को पत्र लिख कर हेमंत अरोड़ा के वर्ष 2014-15 के कार्य-व्यवहार का उदाहरण देते हुए उन्हें डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी का सदस्य बनाए जाने पर अपनी आपत्ति दर्ज करवायी थी और हेमंत अरोड़ा के उस कृत्य को ध्यान में रखते हुए उन्हें तुरंत प्रभाव से डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी से हटाए जाने की माँग की थी । राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स इस तरह की माँग पर ध्यान नहीं देते हैं, लिहाजा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रवीन गोयल ने भी उक्त माँग पर ध्यान नहीं दिया । तब एमपी गुप्ता के क्लब - रोटरी क्लब चंडीगढ़ सिटी ब्यूटीफुल ने हेमंत अरोड़ा से जुड़े इस मामले को डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में उठाने को लेकर एक प्रस्ताव भेजा । राजा साबू की शह पर लेकिन प्रवीन गोयल ने उक्त प्रस्ताव को निष्प्रभावी करने की चाल चली । नियमों केअनुसार, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रवीन गोयल को इस प्रस्ताव से डिस्ट्रिक्ट के सभी क्लब्स को अवगत कराना चाहिए था, ताकि प्रस्ताव में उठाये मुद्दे पर डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में विचार-विमर्श हो सके और वोटिंग के जरिये प्रस्ताव में की गई माँग पर लोगों की राय ली जा सके । प्रवीन गोयल ने यह खुद तो नहीं ही किया, रोटरी क्लब चंडीगढ़ सिटी ब्यूटीफुल के पदाधकारियों तथा एमपी गुप्ता को भी ऐसा करने से रोका । प्रवीन गोयल की कोशिश थी कि हेमंत अरोड़ा से जुड़े मुद्दे/प्रस्ताव को वह डिस्ट्रिक्ट के लोगों के सामने आने ही न दें - और डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस की आपाधापी में उक्त प्रस्ताव को रफादफा करवा दें । प्रवीन गोयल के रवैये से उनके इरादे को भाँप कर एमपी गुप्ता ने भी ऐसी फील्डिंग लगाई कि प्रवीन गोयल और राजा साबू तथा उनके संगी-साथियों को समझ में आ गया कि उन्होंने ज्यादा होशियारी दिखाई तो सिवाये फजीहत के उनके हाथ कुछ नहीं लगेगा । 
एमपी गुप्ता की फील्डिंग के सामने राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स ने हेमंत अरोड़ा को डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी में बनाये रखने के मामले में अपने आप को बेबस पाया और डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में बिजनेस सेशन शुरू होने से ठीक पहले डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी से हेमंत अरोड़ा का इस्तीफा ले लिया । दरअसल राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स को डर हुआ कि बिजनेस सेशन में मामला आयेगा, तो पता नहीं क्या क्या सुनने को मिलेगा और क्या क्या पोल खुलेगी - इसलिए हेमंत अरोड़ा से छुटकारा पा लेने में ही भलाई है । राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स के लिए फजीहत की बात सिर्फ यही नहीं रही कि उन्हें हेमंत अरोड़ा से इस्तीफा लेना पड़ा - बल्कि यह भी रही कि उन्हें हेमंत अरोड़ा के नजदीकियों तथा उनसे हमदर्दी रखने वाले लोगों के कोप का भी निशाना बनना पड़ा । हेमंत अरोड़ा के नजदीकियों का कहना है कि राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स ने जिस तरह हेमंत अरोड़ा को बेइज्जत करवाया है - उससे राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स का लोगों के प्रति 'यूज एंड थ्रो' वाला रवैया एक बार फिर प्रकट हुआ है । हेमंत अरोड़ा के नजदीकियों का कहना है कि राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स ने पहले तो अपनी बेईमानियों पर पर्दा डाले रखने के लिए हेमंत अरोड़ा को डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी में सदस्य बना लिया, लेकिन जब बबाल हुआ तो उन्हें दूध में पड़ी मक्खी की तरह बाहर निकाल फेंका । राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स ने यही तरीका क्रमशः डीसी बंसल और कपिल गुप्ता के साथ भी अपनाया था - उन्हें जब तक लगा कि डीसी बंसल और कपिल गुप्ता के सहारे/भरोसे वह अपनी राजनीति चला सकते हैं, उन्होंने इन्हें अपने साथ रखा; लेकिन जैसे ही उन्हें लगा कि यह उनके काम के नहीं रह गए हैं इन्हें दूर छिटक दिया । हेमंत अरोड़ा के साथ भी यही हुआ । वर्ष 2014-15 के कार्य-व्यवहार को लेकर हेमंत अरोड़ा की जो बदनामी है, वह सब भी राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स की देन है; लेकिन उसी देन के कारण हेमंत अरोड़ा फजीहत में फँसे - तो राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स ने उन्हें अकेला छोड़ दिया ।

Friday, February 22, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता के उदाहरण के साथ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए ललित खन्ना की उम्मीदवारी को मिलते दिख रहे जोर के चलते सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी की तैयारी के लिए संकट और गहरा गया लग रहा है

नई दिल्ली । अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी को लेकर लगातार मुसीबत में घिरे/फँसे रोटरी क्लब दिल्ली विकास के प्रेसीडेंट सुनील मल्होत्रा को ललित खन्ना की उम्मीदवारी की तैयारी की खबर से और बड़ा झटका लगा है । मजे की बात यह है कि ललित खन्ना को उम्मीदवार बनने की तैयारी करते 'देख' सुनील मल्होत्रा के विरोधियों की उनके अपने क्लब में संख्या और बढ़ गई है । उम्मीदवारी को लेकर क्लब में मचे घमासान को अभी तक चुपचाप बैठे तमाशा देख रहे कई एक वरिष्ठ सदस्यों ने भी कहना शुरू कर दिया है कि सुनील मल्होत्रा के लिए समय लगता है कि अनुकूल नहीं है, इसलिए उन्हें अपनी उम्मीदवारी को लेकर जोर नहीं देना चाहिए । रोटरी क्लब दिल्ली विकास के कई वरिष्ठ सदस्यों को यह चिंता भी सताने लगी है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए चुनाव लड़ कर सुनील मल्होत्रा कहीं क्लब की साख  और प्रतिष्ठा को चोट न पहुँचा दें । उनका कहना है कि अभी डिस्ट्रिक्ट का सबसे बड़ा क्लब होने के नाते डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में क्लब की एक अलग ही पहचान, साख और धमक है; लेकिन यदि सुनील मल्होत्रा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव हार गए तो क्लब की बनी चली आ रही पहचान, साख और धमक एक झटके में धूल में मिल जाएगी । क्लब में सुनील मल्होत्रा के विरोधी ही नहीं, बल्कि साथी/समर्थक भी ललित खन्ना के उम्मीदवार बनने की स्थिति में सुनील मल्होत्रा के लिए चुनावी मुकाबले को मुश्किल हुआ मान रहे हैं और इस कारण सुनील मल्होत्रा के समर्थन से पीछे हटते हुए नजर आ रहे हैं ।
इस बीच, क्लब में पर्दे के पीछे रह कर सुनील मल्होत्रा के खिलाफ मुहिम चला रहे पूर्व प्रेसीडेंट जवाहर गुप्ता भी कूद कर पर्दे के सामने आ गए हैं और सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी के खिलाफ आमने-सामने की लड़ाई लड़ने के लिए पोजीशन ले चुके हैं । उनका कहना है कि क्लब की तरफ से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवार यदि प्रस्तुत किया जाना है, तो वरिष्ठ होने के नाते पहला मौका उन्हें मिलना चाहिए । क्लब के तथा क्लब की राजनीति की जानकारी रखने वाले डिस्ट्रिक्ट के लोगों का मानना/कहना है कि जवाहर गुप्ता को सचमुच में उम्मीदवार नहीं बनना है, उन्होंने तो बस सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी का रास्ता रोकने के लिए अपनी उम्मीदवारी की बात उछाल दी है । दिलचस्प नजारा यह बना है कि क्लब में सुनील मल्होत्रा के नजदीकियों व समर्थकों की तरफ से कहा/सुना जा रहा है कि जवाहर गुप्ता वास्तव में ललित खन्ना के लिए रास्ता 'साफ करने' और सुनील मल्होत्रा को ललित खन्ना के 'रास्ते' से हटाने के लिए अपनी उम्मीदवारी का बुलडोजर लेकर आ गए हैं । मजे की बात यह है कि जवाहर गुप्ता जब क्लब के प्रेसीडेंट थे, तब उनके भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवार बनने की बात जोरशोर से उठी थी, लेकिन उनके प्रेसीडेंट पद से उतरने के बाद उनके उम्मीदवार बनने की बात भी उतर गई और फिर खुद जवाहर गुप्ता ने खुद भी कभी अपनी उम्मीदवारी को लेकर दिलचस्पी नहीं दिखाई । क्लब में ही लोगों का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की 'जरूरतों' को पूरा कर पाना जवाहर गुप्ता के बस की बात नहीं है; इसलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने का ख्बाव देखना उन्होंने छोड़ दिया है - लेकिन उन्हें यह भी मंजूर नहीं है कि क्लब से कोई और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बन जाये; इसलिए उन्होंने सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी को रोकने के लिए हर हथकंडा अपनाया हुआ है ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के लिए ललित खन्ना को तैयारी करता और डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख लोगों का समर्थन जुटाता देख जवाहर गुप्ता को अपना 'मकसद' पूरा होता हुआ लग रहा है । रोटरी क्लब दिल्ली विकास में ललित खन्ना की उम्मीदवारी का वास्ता देकर सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी का विरोध करने वालों की संख्या बढ़ी है, उससे जवाहर गुप्ता का काम आसान हो गया है और उन्हें लग रहा है कि सुनील मल्होत्रा के नजदीकियों और समर्थकों ने ललित खन्ना की उम्मीदवारी को जिस गंभीरता से लिया है, उसके चलते सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी के चांस अब बहुत ही कम रह गये हैं । कुछेक लोग हालाँकि सुनील मल्होत्रा और ललित खन्ना की उम्मीदवारी से डरे उनके नजदीकियों व समर्थकों को समझा रहे हैं कि ललित खन्ना दो बार पहले भी उम्मीदवार रह चुके हैं और असफल रहे हैं, इसलिए उनकी उम्मीदवारी को ज्यादा गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है; इस समझाइस से सुनील मल्होत्रा को कुछ बल मिलता नजर आता है, कि तभी कोई न कोई उन्हें ध्यान दिला देता है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने जा रहे दीपक गुप्ता भी तो तीसरी बार में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुने जा सके थे - इसलिए ललित खन्ना की तीसरी बार की उम्मीदवारी को हल्के में लेने की जरूरत नहीं है । अगले रोटरी वर्ष के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति जिस तरह से थकी थकी सी लग रही है, उसमें ललित खन्ना की उम्मीदवारी को और जोर मिलता दिख रहा है । ललित खन्ना की उम्मीदवारी को मिल रहे जोर के चलते सुनील मल्होत्रा की उम्मीदवारी के लिए संकट और गहरा गया है ।

Thursday, February 21, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में राजा साबू को फजीहत से बचाने के लिए ही हेमंत अरोड़ा को डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी से हटाने की माँग के रोटरी क्लब चंडीगढ़ सिटी ब्यूटीफुल के प्रस्ताव को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रवीन गोयल डिस्ट्रिक्ट के क्लब्स से छिपा कर रखते हुए डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में चलते-फिरते अंदाज में लीपापोती कर निपटा देने की तैयारी में हैं

चंडीगढ़ । डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में विचार करने के लिए रोटरी क्लब चंडीगढ़ सिटी ब्यूटीफुल द्वारा दिए गए एक प्रस्ताव की उपेक्षा करके डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रवीन गोयल ने एक बार फिर यह साबित किया है कि डिस्ट्रिक्ट में राजा साबू और उनसे जुड़े लोग अपनी बेईमानियों को न सिर्फ जारी रखे हुए हैं, बल्कि उन पर पर्दा डाले रखने का भी 'इंतजाम' करने में लगे हुए हैं । रोटरी क्लब चंडीगढ़ सिटी ब्यूटीफुल के उक्त प्रस्ताव में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हेमंत अरोड़ा के बेईमानीपूर्ण कारनामों का हवाला देते हुए उन्हें डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी की सदस्यता से निलंबित करने की माँग की गई है । नियमों केअनुसार, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रवीन गोयल को इस प्रस्ताव से डिस्ट्रिक्ट के सभी क्लब्स को अवगत कराना चाहिए था, ताकि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में प्रस्ताव में उठाये मुद्दे पर विचार-विमर्श हो सके और वोटिंग के जरिये प्रस्ताव में की गई माँग पर लोगों की राय ली जा सके । प्रवीन गोयल लेकिन नियमानुसार कार्रवाई करने की बजाये प्रस्ताव पर कुंडली मारे बैठे रहे । डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के नजदीक आने पर चंडीगढ़ सिटी ब्यूटीफुल के पूर्व प्रेसीडेंट तथा डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी के पूर्व सदस्य एमपी गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रवीन गोयल को एकबार फिर अपने क्लब के प्रस्ताव की याद दिलाई और उनसे पूछा कि डिस्ट्रिक्ट कार्यालय यदि किसी कारणवश नियमों का पालन नहीं कर सका है, तो क्या वह डिस्ट्रिक्ट के सभी क्लब्स को उक्त प्रस्ताव की प्रति भेज दें - लेकिन प्रवीन गोयल की तरफ से उन्हें उक्त प्रस्ताव की प्रति डिस्ट्रिक्ट के सभी क्लब्स को भेजने से मना किया गया है और बताया गया है कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के बिजनेस सेशन में उक्त प्रस्ताव को उपस्थित लोगों के बीच पढ़ा जायेगा । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रवीन गोयल के इस रवैये से जाहिर है कि वह हेमंत अरोड़ा को 'बचाने' की कोशिश कर रहे हैं और इसके लिए नियमों की अवहेलना व अनदेखी करने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं ।   
हेमंत अरोड़ा दरअसल वर्ष 2014-15 के डिस्ट्रिक्ट अकाउंट्स को लेकर आरोपों के घेरे में हैं । उल्लेखनीय है कि उस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट अकाउंट्स में भारी झोलझाल हुआ था - और उस झोलझाल में ऑडिटर के रूप में हेमंत अरोड़ा की भूमिका को संदिग्ध देखा/समझा गया था । उक्त भूमिका को लेकर हेमंत अरोड़ा की उस समय भी खासी फजीहत हुई थी । डिस्ट्रिक्ट में लोग उस किस्से को भूलने लगे थे, लेकिन हेमंत अरोड़ा के डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी का सदस्य बनने की खबर मिलने के बाद से - हेमंत अरोड़ा की वह भूमिका एक बार फिर चर्चा में आ गई । उल्लेखनीय है कि दिलीप पटनायक के गवर्नर वर्ष 2014-15 के डिस्ट्रिक्ट अकाउंट्स की दो बैलेंसशीट बनी थीं, जिन्हें ऑडिटर के रूप में हेमंत अरोड़ा ने साइन किया था । यह दो बैलेंसशीट का बनना और साइन होना विवाद और आरोपों का विषय इसलिए बना था - क्योंकि 16 सितंबर 2015 को साइन हुई बैलेंसशीट में 20,407 रुपए का जो लाभ आ रहा था, वह 30 अक्टूबर 2015 को साइन हुई दूसरी बैलेंसशीट में 6 लाख 23 हजार 547 रुपए के घाटे में बदल गया । इस 'जादु' को चार्टर्ड एकाउंटेंट व ऑडिटर हेमंत अरोड़ा के 'अनुचित व्यवहार' के रूप में देखा/समझा गया था । हेमंत अरोड़ा को इसलिए भी फजीहत का सामना करना पड़ा था क्योंकि बैलेंसशीट में ऑडिटर के रूप में उन्होंने खुद दर्ज किया था कि बहुत से खर्चे कच्चे बिल्स के आधार पर हिसाब-किताब में लिए गए हैं । उस समय डिस्ट्रिक्ट के लोगों की तरफ से खुल कर आरोप लगे थे कि डिस्ट्रिक्ट के पैसों में हेराफेरी करने के उद्देश्य से फर्जी तरीके से लाभ को घाटे में बदला गया है - और इसमें हेमंत अरोड़ा से लेकर राजा साबू की भी मिलीभगत है ।
डिस्ट्रिक्ट में राजा साबू और उनसे जुड़े लोगों की बेईमानियों के किस्से दरअसल इतने इकट्ठे हो गए हैं, कि लोगों को उनके द्वारा लिया जाने वाला कोई भी संदेहास्पद फैसला लूट-खसोट की मदद करने वाला दिखने/लगने लगता है । डिस्ट्रिक्ट के तमाम प्रोजेक्ट्स व ट्रस्ट के हिसाब-किताब जिस तरह से कुछेक लोगों की ही जानकारी में रहते हैं और उन्हें लोगों से - यहाँ तक कि कॉलिज ऑफ गवर्नर्स तक से - छिपा कर रखा जाता है; जिसे लेकर निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी रोटरी इंटरनेशनल तक में शिकायत कर चुके हैं; उसके चलते राजा साबू और उनसे जुड़े पूर्व गवर्नर्स की भूमिका को संदेह से देखा जाता है । इसी कारण से हेमंत अरोड़ा को डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी का सदस्य बनाए जाने से मामला भड़क गया है, और हेमंत अरोड़ा को फाइनेंस कमेटी से हटाने की माँग होने लगी है । डिस्ट्रिक्ट के लोगों का मानना और कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में प्रवीन गोयल ने हेमंत अरोड़ा को डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी का सदस्य बनाने के लिए राजा साबू से अवश्य ही हरी झंडी ली होगी; ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि हेमंत अरोड़ा 'जैसे' व्यक्ति को डिस्ट्रिक्ट फाइनेंस कमेटी का सदस्य बनाने का फैसला प्रवीन गोयल ने क्यों तो लिया - और क्यों राजा साबू ने उन्हें इस फैसले के लिए हरी झंडी दी ? लोगों को लगता है कि राजा साबू को फजीहत से बचाने के लिए ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रवीन गोयल ने रोटरी क्लब चंडीगढ़ सिटी ब्यूटीफुल के प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी की हुई है और इसीलिए वह उक्त प्रस्ताव को डिस्ट्रिक्ट के क्लब्स से छिपा कर रखना चाहते हैं, और डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के बिजनेस सेशन में चलते-फिरते अंदाज में लीपापोती कर मामले को निपटा देने की तैयारी में हैं ।