Monday, January 11, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल की सौदेबाजियाँ भी दीपक गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव नहीं जितवा सकीं

नई दिल्ली । ताज पैलेस होटल में आयोजित डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के दूसरे और अंतिम दिन के आखिरी 'प्रोग्राम' में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव का नतीजा घोषित करते हुए जब सुभाष जैन के जीतने का ऐलान हुआ, तो मुकेश अरनेजा और उनके संगी-साथियों के तो जैसे होश उड़ गए । दरअसल उन्होंने तो दीपक गुप्ता की चुनावी जीत का जश्न मनाने की पूरी तैयारी कर ली थी । दीपक गुप्ता को पहनाने के लिए फूल-मालाएँ आ चुकीं थी - यह तय हो चुका था कि पहली बड़ी सी माला मुकेश अरनेजा, रूपक जैन और सतीश सिंघल मिल कर पहनायेंगे; और उसके बाद दूसरे लोग माला पहनायेंगे । माला पहनाने के साथ साथ लोगों का मुँह मीठा करवाने के लिए मिठाई आ चुकी थी । यह तय हो चुका था कि जीत का जुलूस ताज पैलेस होटल से शुरू होकर मयूर विहार स्थित होली डे इन पहुँचेगा, जहाँ फिर देर रात तक पार्टी होगी । इसके लिए होली डे इन में बुकिंग करा ली गई थी । मुकेश अरनेजा, सतीश सिंघल, दीपक गुप्ता व उनके अन्य कुछेक नजदीकी सुबह से जो कपड़े पहने हुए थे, उन्हें बदल कर नए सिरे से सूटेड-बूटेड होकर तैयार हो गए थे । किंतु डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद पर सुभाष जैन की जीत के चुनावी नतीजे ने उनकी सारी तैयारी पर पानी फेर दिया ।
मजे की बात यह रही कि दीपक गुप्ता की चुनावी जीत का भरोसा उनके समर्थकों को सतीश सिंघल की उस पड़ताल से हुआ, जिसे सतीश सिंघल ने वोट डालने वाले क्लब-अध्यक्षों से बात करके पूरा किया था । उल्लेखनीय है कि वोटिंग होने के बाद सतीश सिंघल ने कई एक क्लब-अध्यक्षों को फोन करके उनसे पूछा व इस बात की टोह ली कि उन्होंने किसे वोट दिया है । क्लब-अध्यक्षों से मिले फीडबैक के आधार पर सतीश सिंघल ने हिसाब जोड़ा और पाया कि दीपक गुप्ता को 67 से 72 के बीच वोट पड़े हैं । सतीश सिंघल के इस हिसाब से दीपक गुप्ता के समर्थकों का बम बम होना स्वाभाविक ही था । नतीजा घोषित होने से पहले दीपक गुप्ता के समर्थकों के बीच पैदा हुए जोश को देख कर कुछ समय के लिए तो सुभाष जैन के समर्थकों के बीच निराशा सी पैदा हुई, लेकिन जल्दी ही उन्हें आभास हो गया कि दीपक गुप्ता के समर्थकों के बीच दिख रहा यह जोश वास्तव में गलतफहमियों में तथा हवा में रहने की उनकी प्रवृत्ति का एक और सुबूत है । चुनावी नतीजा घोषित होने के साथ यह साबित भी हो गया । 
दीपक गुप्ता की चुनावी पराजय मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल जैसे उनके समर्थकों के गलतफहमी में तथा हवा में रहने का ही नतीजा है । एक नए उदाहरण से इसे समझा जा सकता है : दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में कॉन्करेंस जुटाने के उनके अभियान में जिन क्लब-अध्यक्षों ने उनकी 'उम्मीद' को पूरा नहीं किया, उनसे वह इस कदर नाराज हो गए कि एक डिस्ट्रिक्ट कार्यक्रम में उनमें से कुछेक ने उन्हें नमस्ते की; तो मुकेश अरनेजा ने उन्हें यह कह कर लताड़ा व अपमानित किया कि तुमने कॉन्करेंस तो दी नहीं, अब नमस्ते किस बात की ? मुकेश अरनेजा ने इस बात का जरा भी ख्याल नहीं रखा कि जिन क्लब-अध्यक्षों को वह लताड़ने व अपमानित करने का काम कर रहे हैं, उन्होंने कॉन्करेंस भले ही न दी हो - लेकिन उन्हें वोट देने के लिए तो राजी किया ही जा सकता है । मुकेश अरनेजा यदि यह कहते कि नमस्ते तो ठीक है, लेकिन इसके साथ आपका समर्थन भी चाहिए होगा ; तो क्लब-अध्यक्ष अपने आप को अपमानित न महसूस करते और दीपक गुप्ता के समर्थकों/वोटों की संख्या में इजाफा ही करते । लेकिन मुकेश अरनेजा का यह स्टाइल नहीं है । गलतफहमी में तथा हवा में रहने के चलते उन्होंने सोचा/माना तो यह था कि वह क्लब-अध्यक्षों से बदतमीजी करेंगे और उसके बाद भी वह क्लब-अध्यक्षों से वोट ले लेंगे । मुकेश अरनेजा ने अपने व्यवहार से अंतिम समय तक लोगों को इर्रिटेट करने का काम किया, जिसका बदला लोगों ने दीपक गुप्ता से लिया । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की गरिमा को छोड़ कर मुकेश अरनेजा चुनाव से पहले हुई क्रिडेंशियल कमेटी की मीटिंग में एक आम रोटेरियन की तरह शामिल हुए, जिसमें अपने बेफालतू के व बेहूदगे सवालों से मीटिंग का माहौल खराब करने का ही काम किया । वोट पड़ने के दौरान वोटिंग-स्थल के बाहर ऊपर जाती सीढ़ियों पर बैठ कर वोट डालने जाते व वोट डाल कर बाहर निकलते अध्यक्षों पर फब्तियाँ कसने का काम करके भी उन्होंने क्लब-अध्यक्षों को वास्तव में दीपक गुप्ता से दूर करने का ही काम किया ।   
दरअसल मुकेश अरनेजा ने जिस तरह की बेहूदगियों, बदतमीजियों व ओछी हरकतों से दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का काम किया; तथा क्लब्स में तोड़-फोड़ मचाने व क्लब्स के पदाधिकारियों को आपस में लड़ाने के साथ-साथ सौदेबाजी का जाल फैला कर क्लब-अध्यक्षों को निशाना बनाया - उससे ही दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के खिलाफ माहौल बन गया था । मुकेश अरनेजा रूपी कोढ़ में सतीश सिंघल रूपी खाज ने मामला और खराब कर दिया । दीपक गुप्ता के पक्ष में वोट पक्के करने के लिए सतीश सिंघल जिस तरह अपने गवर्नर-काल के डिस्ट्रिक्ट-पदों को बेचने के लिए लोगों के घर घर घूमे, उसने रोटरी को तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की गरिमा को तो कलंकित करने का काम किया ही, साथ ही लोगों को इर्रिटेट भी किया । सतीश सिंघल का जो रवैया रहा, उससे लग रहा है कि रोटरी को और डिस्ट्रिक्ट 3012 को एक दूसरा 'मुकेश अरनेजा' मिल गया है । नोमीनेटिंग कमेटी द्धारा चुने गए अधिकृत उम्मीदवार के खिलाफ अपने क्लब की कॉन्करेंस दे/दिलवा कर, तथा दीपक गुप्ता के लिए वोट जुटाने में अपने को इन्वॉल्व करके सतीश सिंघल ने बता/जता/दिखा दिया कि रोटरी में 35 से अधिक वर्ष गुजारने/बिताने के बाद भी रोटरी के भाव व उसके उच्च आदर्शों को उन्होंने नहीं जाना/पहचाना है; तथा रोटरी उनके लिए हर तरह की सौदेबाजी करने का एक अड्डा भर है ।
मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की हर सौदेबाजी को लेकिन डिस्ट्रिक्ट के लोगों ने फेल कर दिया और सुभाष जैन को एक अच्छे बहुमत से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी का चुनाव जितवा दिया । सुभाष जैन की जीत इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनकी जीत का साफ संदेश यह है कि डिस्ट्रिक्ट 3012 के लोगों को 'खरीद' कर चुनाव नहीं जीता सकता । डिस्ट्रिक्ट 3012 एक नया डिस्ट्रिक्ट है, इसलिए इस संदेश का और भी गहरा अर्थ व प्रभाव है । मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल की सौदेबाजियों को नकार कर डिस्ट्रिक्ट 3012 के सदस्यों ने रोटरी में अपने डिस्ट्रिक्ट की पहचान व प्रतिष्ठा को बनाने/बचाने का भी काम किया है ।

Friday, January 8, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में विनय भाटिया की जीत का अवार्ड विनोद बंसल की बजाए संजय खन्ना को 'मिलने' की आहट में सत्ता समीकरणों के बदलने के संकेत छिपे हैं क्या ?

नई दिल्ली । विनय भाटिया को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बनवाने/चुनवाने के लिए पर्दे के पीछे जो खेल चला, उसमें क्या सचमुच विनोद बंसल और अशोक कंतूर के साथ रवि चौधरी की 'राजनीतिक बलि' चढ़ने जा रही है ? यह सवाल लोगों के बीच इसलिए महत्वपूर्ण हो उठा है क्योंकि पिछले काफी समय से विनोद बंसल के अगले डीआरएफसी बनने तथा रवि चौधरी के 'आदमी' के रूप में अशोक कंतूर के अगले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी उम्मीदवार बनने की चर्चा सुनी जाती रही है, लेकिन अब इस चर्चा के पात्र बदल गए हैं और विनोद बंसल की जगह संजय खन्ना तथा अशोक कंतूर की जगह संजीव राय मेहरा ने ले ली है । रवि चौधरी की जगह अशोक घोष आ गए हैं । मजे की और विडंबना की बात यह है कि विनय भाटिया की उम्मीदवारी के सबसे घनघोर समर्थक विनोद बंसल व रवि चौधरी ही थे, और बिलकुल शुरू से थे; विनय भाटिया की उम्मीदवारी को दिल्ली में समर्थन दिलवाना इन्हीं दोनों के जिम्मे था; और तमाम बदनामियों का सामना करते हुए इन्होंने अपनी अपनी जिम्मेदारी निभाई भी - लेकिन विनय भाटिया की जीत के साथ जब 'मिठाई' बँटने का नंबर आया, तो देखा/पाया जा रहा है कि इन दोनों को लाइन से बाहर कर दिया गया है, और इनकी जगह संजय खन्ना व अशोक घोष को लाइन में शामिल कर लिया गया है । विनोद बंसल और रवि चौधरी का अचानक से जो तख्तापलट होता हुआ दिख रहा है, उससे इन दोनों के नजदीकियों व शुभचिंतकों को खासा झटका लगा है; किंतु उन्हें समझाया जा रहा है कि वह यदि सचमुच विनय भाटिया के समर्थक और शुभचिंतक हैं, तो उन्हें अपना स्वार्थ छोड़ कर यह कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना चाहिए । 
विनोद बंसल और रवि चौधरी के नजदीकियों व शुभचिंतकों को बताया/समझाया जा रहा है कि यह ठीक है कि विनोद बंसल और रवि चौधरी ने विनय भाटिया की उम्मीदवारी को समर्थन दिलवाने के लिए अथक प्रयास किए, किंतु विनय भाटिया को जीत इनके अथक प्रयासों के कारण नहीं मिली है - बल्कि संजय खन्ना और अशोक घोष से मिले 'गुप्त' सहयोग के कारण मिली है; इसलिए 'मिठाई' के सही हकदार वह हैं । दिलचस्प बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में संजय खन्ना और अशोक घोष की भूमिका थी तो तटस्थ - लेकिन यही तटस्थता विनय भाटिया के लिए बड़ी मददगार साबित हुई । दरअसल किसी भी लड़ाई में - किसी भी चुनावी लड़ाई में तटस्थता जैसी कोई भूमिका होती ही नहीं है, तटस्थता भी वास्तव में एक 'पक्ष' होता है : संजय खन्ना और अशोक घोष ने तटस्थ होकर वास्तव में विनय भाटिया का पक्ष 'लिया' और उनके काम आए । मजे की बात यह रही कि विनय भाटिया और रवि दयाल के बीच संगठित हुई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई में जो खेमेबाजी बनी, उसमें संजय खन्ना और अशोक घोष देखे/पहचाने तो उस खेमे में जा रहे थे, जो रवि दयाल की उम्मीदवारी के साथ था; लेकिन इन्होंने रवि दयाल की उम्मीदवारी के लिए सक्रियता न दिखा कर 'गुप्त' रूप से विनय भाटिया की मदद की । नोमीनेटिंग कमेटी में कई लोग संजय खन्ना के बड़े नजदीकी थे, और उन्होंने रवि दयाल के समर्थकों से कहा भी था कि संजय खन्ना यदि उनसे रवि दयाल का साथ देने को कहेंगे, तो वह रवि दयाल का ही साथ देंगे । रवि दयाल के समर्थकों ने संजय खन्ना से कई बार यह बात कही भी, लेकिन संजय खन्ना ने उनकी एक न सुनी । विनय भाटिया के समर्थकों ने संजय खन्ना से एक ही बात कही हुई थी कि हम समझते हैं कि आप जहाँ हैं वहाँ होते हुए आपके लिए विनय भाटिया का खुला समर्थन करना मुश्किल होगा, लिहाजा हम तो सिर्फ यह चाहते हैं कि आप रवि दयाल का भी खुला समर्थन न करें । संजय खन्ना ने उनकी यह बात मान ली । विनय भाटिया की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने इसी तरीके को अपनाकर अशोक घोष का भी समर्थन जुटाया । 
विनय भाटिया की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं का मानना और कहना है कि विनय भाटिया की जीत में यूँ तो बहुत से लोगों के सहयोग और समर्थन का योगदान है, लेकिन संजय खन्ना और अशोक घोष से मिले 'गुप्त' सहयोग ने वास्तव में निर्णायक भूमिका अदा की है । इसलिए विनय भाटिया की जीत की 'मिठाई' पाने वालों में पहला नंबर इन्हीं दोनों का होगा । संजय खन्ना को डीआरएफसी से नवाजे जाने की चर्चा है । डीआरएफसी पद पर सुशील खुराना का कार्यकाल मौजूदा रोटरी वर्ष में पूरा हो रहा है; उनके बाद इस पद पर विनोद बंसल के सुशोभित होने की चर्चा थी । विनय भाटिया की उम्मीदवारी के समर्थन में वह जिस संलग्नता के साथ लगे हुए थे, उसे देख कर सभी मान रहे थे कि विनय भाटिया यदि जीत गए तो डीआरएफसी पद विनोद बंसल को मिलना पक्का है । विनय भाटिया की जीत के साथ लेकिन हालात बदले हुए लग रहे हैं । डीआरएफसी पद के लिए अब विनोद बंसल की बजाए संजय खन्ना का नाम सुना जा रहा है । कुछेक लोग हालाँकि विनोद बंसल के लिए दबाव बनाए हुए हैं, लेकिन संजय खन्ना के वकालती ज्यादा हैं; उनका तर्क है कि पिछले वर्ष भी संजय खन्ना का 'गुप्त' सहयोग न मिला होता, तो रवि चौधरी को चुनाव जितवाना मुश्किल होता - इसलिए संजय खन्ना को 'अवार्ड' देना जरूरी है । 
विनय भाटिया की जीत से डिस्ट्रिक्ट के सत्ता समीकरणों में जो बदलाव आता दिख रहा है, उसमें रवि चौधरी व अशोक कंतूर की जोड़ी को जोर का झटका लगता नजर आ रहा है । उल्लेखनीय है कि रवि चौधरी ने बहुत पहले से अशोक कंतूर को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के अगले उम्मीदवार के रूप में प्रमोट कर रखा है । रोटरी की चुनावी राजनीति का एक मजेदार पहलू यह भी है कि यहाँ रवि चौधरी टाइप के लोग देखने को खूब मिलते हैं, जो अपना खुद का चुनाव तो किसी तरह मुश्किल से जीत पाते हैं, लेकिन जीतने के तुरंत बाद गॉडफादर वाली भूमिका में आ जाते हैं और दूसरों को जितवाने का ठेका ले लेते हैं । इसी तर्ज पर रवि चौधरी ने ऐलान किया हुआ था कि विनय भाटिया को जितवाने के बाद वह अशोक कंतूर को जितवायेंगे । विनय भाटिया की जीत के बाद लेकिन जिस तरह से संजीव राय मेहरा का नाम अगले उम्मीदवर के रूप में सामने आया है, उससे अशोक कंतूर की उम्मीदवारी की बात गर्दिश में ही दिख रही है । संजीव राय मेहरा को अशोक घोष के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है, और इसी कारण से संजीव राय मेहरा की उम्मीदवारी की चर्चा गंभीर हो उठी है । खेमे के नेताओं की बातों से भी लग रहा है कि अशोक कंतूर की उम्मीदवारी को लेकर कोई भी गंभीर नहीं है । रवि चौधरी व अशोक कंतूर की तरफ से हालाँकि कहा जा रहा है कि संजीव राय मेहरा के लिए उम्मीदवार 'बनना' संभव ही नहीं होगा, और इसलिए फिर सभी अशोक कंतूर की उम्मीदवारी पर सहमत हो ही जायेंगे । लेकिन संजीव राय मेहरा के उम्मीदवार न बन 'पाने' की संभावना को देखते हुए जिस तरह से अन्य कुछेक लोग अपने अपने लिए मौके तलाशने में जुटे हैं, उसे देख/सुन कर अशोक कंतूर के लिए मामला मुश्किल बनता हुआ नजर आ रहा है । 
विनय भाटिया की जीत के साथ ही डिस्ट्रिक्ट के सत्ता समीकरणों में जो बदलाव आता दिख रहा है, और इस बदलाव में विनोद बंसल और रवि चौधरी जिस तरह अलग-थलग पड़ते हुए नजर आ रहे हैं, उसमें डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में दिलचस्प नजारे बनने/दिखने के संकेत साफ पढ़े जा सकते हैं ।

Thursday, January 7, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में सोनीपत वाले दीपक कुमार गुप्ता की बनी बुरी चुनावी-गत ने गाजियाबाद वाले दीपक गुप्ता की मुसीबतों को बढ़ाने का काम तो किया ही है

सोनीपत । मुकेश अरनेजा के चक्कर में सोनीपत वाले दीपक कुमार गुप्ता की जैसी चुनावी दुर्गति हुई है, उसने गाजियाबाद वाले दीपक गुप्ता तथा उनके समर्थकों को बुरी तरह डरा दिया है । उल्लेखनीय है कि सोनीपत वाले दीपक कुमार गुप्ता ने इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत की थी, जिसमें वह अपनी जमानत तक नहीं बचा सके और बुरी तरह चुनाव हारे । चुनाव में उनकी बुरी स्थिति का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि कुल पड़े वैध 23 हजार 28 वोटों में से दीपक कुमार गुप्ता को मात्र 196 वोट मिले । दीपक कुमार गुप्ता की यह शर्मनाक पराजय खबर इसलिए नहीं है कि उन्हें कुल पड़े वोटों में एक प्रतिशत से भी कम वोट मिले - उनकी पराजय खबर इसलिए है क्योंकि अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के लिए उन्होंने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स पर भरोसा करने की बजाए मुकेश अरनेजा पर भरोसा करने की मूर्खता की । दीपक कुमार गुप्ता चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सोनीपत ब्रांच के चेयरमैन रहे हैं, इस नाते उम्मीद की जाती है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति के अंदरूनी समीकरणों की उन्हें इतनी समझ तो होगी ही कि वह मुकेश अरनेजा की बातों में न फँसते । दीपक कुमार गुप्ता लेकिन मुकेश अरनेजा की बातों में फँसे और ऐसा फँसे कि चारों खाने चित्त होकर धूल फाँकने की स्थिति को प्राप्त हुए । 
उल्लेखनीय है कि दीपक कुमार गुप्ता के सामने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के लिए बेहतर विकल्प थे । दिलचस्प संयोग रहा कि जिस समय दीपक कुमार गुप्ता को नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में अभियान चलाना था, उसी समय उनके रोटरी डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अभियान चला रहे चार उम्मीदवारों में से तीन - अशोक गर्ग, प्रवीन निगम और सुभाष जैन ऑडीटर फर्म के पार्टनर थे । दीपक कुमार गुप्ता अपने चुनाव में फायदा लेने के लिए इन तीनों के साथ और/या इनमें से किसी एक के साथ जुड़ सकते थे । ऑडीटर फर्म के पार्टनर के रूप में यह दीपक कुमार गुप्ता के लिए उपयोगी साबित हो सकते थे । दीपक कुमार गुप्ता ने लेकिन इनसे जुड़ने की और इन पर भरोसा करने की बजाए मुकेश अरनेजा पर भरोसा किया । दरअसल मुकेश अरनेजा उन्हें यह समझाने में कामयाब रहे कि वह उन्हें रोटेरियन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का समर्थन दिलवायेंगे; और सिर्फ दिल्ली के ही नहीं हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के रोटेरियन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का समर्थन भी उनके लिए जुटायेंगे । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में दिल्ली के साथ साथ हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश भी आता है; लिहाजा जाहिर है कि इन प्रदेशों के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स भी नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के उम्मीदवारों के लिए वोट डालते हैं । मुकेश अरनेजा 'फेंकने' की कला के तो उस्ताद खिलाड़ी हैं ही; इस कला की अपनी उस्तादी का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने दीपक कुमार गुप्ता को समझाया कि तुम तो जानते ही हो कि मेरे तो दिल्ली के साथ साथ हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश के रोटेरियंस के साथ कैसे नजदीकी संबंध हैं; और इन चारों राज्यों में करीब ढाई-तीन हजार रोटेरियन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स हैं - जिनके वोट तो मैं तुम्हें घर बैठे ही दिलवा दूँगा; तुम्हें कहीं किसी और के पास जाने की और कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी । 
यह ऑफर यूँ तो हर किसी को अच्छा लगेगा, लेकिन जो लोग मुकेश अरनेजा की 'असलियत' को जानते/पहचानते हैं - उनसे तो उम्मीद की ही जाती है कि वह मुकेश अरनेजा के 'फेंकने' में नहीं फँसेंगे । इसके बावजूद दीपक कुमार गुप्ता उनके झाँसे में फँसे । दीपक कुमार गुप्ता लंबे समय से रोटरी में सक्रिय हैं, और मुकेश अरनेजा के बड़े नजदीक रहे हैं - इसके बावजूद वह मुकेश अरनेजा की 'असलियत' से परिचित नहीं हो सके हैं और उनके झाँसे में फँसे, तो उनसे किसी को हमदर्दी भी नहीं है । मुकेश अरनेजा खुशकिस्मत हैं कि उनकी सारी पोल-पट्टी जगजाहिर है, लेकिन फिर भी कुछ अंधभक्त लुटने-पिटने के लिए उन्हें मिल ही जाते हैं । मुकेश अरनेजा ने दीपक कुमार गुप्ता को जो सब्जबाग दिखाए, वह दरअसल अपना काम निकालने के उद्देश्य से दिखाए; उन्हें गाजियाबाद वाले दीपक गुप्ता को दिखाना था कि सोनीपत वाला उनका पट्ठा उनके साथ बना हुआ है । अब 'पट्ठा' यदि मूर्ख बन रहा है, तो इसमें मुकेश अरनेजा की भला क्या गलती है ? दीपक कुमार गुप्ता को रोटेरियन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का समर्थन दिलवाने की मुकेश अरनेजा की झाँसा-पट्टी का असली हाल यह रहा कि हरियाणा, पंजाब व हिमाचल प्रदेश तो छोड़िये - दिल्ली तक में रोटेरियन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का समर्थन दीपक कुमार गुप्ता को नहीं मिला । मुकेश अरनेजा के नजदीकी के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले रोटेरियन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स तक दीपक कुमार गुप्ता की बजाए नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के दूसरे उम्मीदवारों के समर्थन में देखे जा रहे थे । जाहिर है कि मुकेश अरनेजा ने अपना काम निकालने के लिए दीपक कुमार गुप्ता को जमकर उल्लू बनाया । 
दीपक कुमार गुप्ता की शर्मनाक पराजय ने, जिसमें कि वह एक प्रतिशत से भी कम वोट पाने के कारण अपनी जमानत तक नहीं बचा सके हैं, दो दिन बाद होने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को दिलचस्प बना दिया है । दीपक गुप्ता के समर्थकों के बीच डर पैदा हुआ है कि मुकेश अरनेजा के 'फेंकने' में फँसने से दीपक कुमार गुप्ता की जो फजीहत हुई है, उसके कारण अब वह मुकेश अरनेजा से बदला लेना चाहेंगे तथा इसके लिए वह दीपक गुप्ता के समर्थन से पीछे हटेंगे । मुकेश अरनेजा हालाँकि अभी भी दीपक गुप्ता के समर्थकों को आश्वस्त कर रहे हैं कि दीपक कुमार गुप्ता उनके पक्के वाले चेले हैं; आप देखियेगा कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में वह उनके साथ सक्रिय नजर आयेंगे । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव में मुकेश अरनेजा की झाँसा-पट्टी में आकर अपनी फजीहत कराने वाले दीपक कुमार गुप्ता, दीपक गुप्ता के समर्थकों के डर को सच साबित करेंगे या मुकेश अरनेजा के भरोसे को - यह तो दस जनवरी को ही पता चलेगा; लेकिन चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के चुनाव में सोनीपत वाले दीपक कुमार गुप्ता की बनी बुरी गत ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में गाजियाबाद वाले दीपक गुप्ता की मुसीबतों को बढ़ाने का काम तो कर ही दिया है । 

Wednesday, January 6, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में बार बार तहस-नहस होते रहे मुकेश गोयल विरोधी मंच को फिर से खड़ा करने की कोशिश में रेखा गुप्ता मोहरा बनीं

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील निगम ने जिस सहजता और तत्परता से कॉन्फ्रेंस के रजिस्ट्रेशन चार्ज कम रखने की मुकेश गोयल की सलाह को मान लिया, उसे देख कर रेखा गुप्ता के सहारे राजनीति जमाने की कोशिश करने वाले लोगों के तो जैसे तोते ही उड़ गए हैं । 'वे' दरअसल सुनील निगम को अपने साथ मान रहे थे; और इस नाते उम्मीद कर रहे थे कि मुकेश गोयल के सुझाव को तो सुनील निगम कतई स्वीकार नहीं करेंगे । लेकिन सुनील निगम ने उल्टा ही नजारा पेश किया । हुआ यह कि डिस्ट्रिक्ट कैबिनेट की नोएडा में आयोजित तीसरी मीटिंग में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सुनील निगम ने कॉन्फ्रेंस के रजिस्ट्रेशन चार्ज के रूप में 1200 रुपए तय करने का प्रस्ताव रखा; मीटिंग में मौजूद दूसरे लोग इस प्रस्ताव पर सहमति प्रगट करते दिखे, लेकिन एक अकेले मुकेश गोयल ने 1200 रुपए की रकम को आम लायन सदस्यों के लिए ज्यादा बताते हुए पिछली कॉन्फ्रेंस के रजिस्ट्रेशन चार्ज को ही रखने का सुझाव दिया । पिछले लायन वर्ष की कॉन्फ्रेंस में रजिस्ट्रेशन के रूप में 800 रुपए बसूल किए गए थे । सुनील निगम ने बिना कोई समय गवाएँ मुकेश गोयल के सुझाव को स्वीकार कर लिया । मंच पर यह जो 'काम' हुआ, इसे तो सभी ने देखा - लेकिन इसके पीछे छिपे राजनीतिक मंतव्य को कुछ ही लोगों ने 'पढ़ा'; डिस्ट्रिक्ट में पूरी तरह तहस-नहस हो चुके मुकेश गोयल विरोधी मंच को फिर से जमाने की कोशिश करने वाले लोगों ने तो इस मंतव्य को खासी निराशा के साथ 'पढ़ा' ।
दरअसल, रेखा गुप्ता को शिखंडी की तरह इस्तेमाल करते हुए जिन लोगों ने मुकेश गोयल विरोधी मंच फिर से बनाने/सजाने का प्रयत्न शुरू किया है, उन्होंने सुनील निगम को अपने साथ माना था; किंतु रजिस्ट्रेशन चार्ज तय करने के मामले में सुनील निगम ने जिस तरह से मुकेश गोयल की बात मान ली, उससे उन्हें सुनील निगम - मुकेश गोयल के साथ जाते हुए 'दिख' रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में एक सदाबहार और शाश्वत सा दृश्य अक्सर बनता रहता है, जिसके केंद्र में मुकेश गोयल रहते हैं । डिस्ट्रिक्ट में अक्सर मुकेश गोयल विरोधी मंच बनाने की सुगबुगाहट चलती है, जो इस तथ्य से खाद-पानी पाती है कि डिस्ट्रिक्ट में बहुत से लोग मुकेश गोयल के तौर-तरीकों को पसंद नहीं करते हैं और उन्हें निपटाना चाहते हैं । यह सच्चाई भी है । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों में 90 प्रतिशत से ज्यादा लोग ऐसे हैं, जिनका वश चले तो वह पहला काम मुकेश गोयल को निपटाने का करें । इस 'सच्चाई' के चलते मुकेश गोयल को तो वर्षों पहले निपट जाना चाहिए था; किंतु प्रायः हर बार के सत्ता संघर्ष में मुकेश गोयल और और ज्यादा मजबूत होकर उभरे हैं तथा मुकेश गोयल विरोधी मंच छिन्न-भिन्न होता रहा है । इस बार भी नए सिरे से मुकेश गोयल विरोधी मंच की नींव रखने की तैयारी करते हुए रेखा गुप्ता को सब्जबाग तो यही दिखाया गया कि मुकेश गोयल का तो चौतरफा विरोध है - जो घोषित विरोधी हैं, वह तो हैं ही; मुकेश गोयल के जो नजदीकी हैं, वह भी उनसे नाराज हैं और उनके साथ नहीं जायेंगे । इस संबंध में उन्हें खास तौर से सुनील निगम, अरुण मित्तल और अजय सिंघल का नाम बताया गया । किंतु डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के रजिस्ट्रेशन चार्ज को तय करने में मुकेश गोयल की जो भूमिका देखने को मिली, उससे प्रतीकात्मक संदेश यही गया है कि रेखा गुप्ता को झूठे आश्वासनों से बहला कर उम्मीदवार बना/बनवा दिया गया है । 
मुकेश गोयल विरोधी मंच बनाने की इस बार की तैयारी का मजेदार पहलू यह है कि इस तैयारी के मुख्य सूत्रधार शिवकुमार चौधरी, मुकेश गोयल के शरणागत होकर ही गवर्नर की लाइन में आ सके हैं । नोएडा में आयोजित तीसरी कैबिनेट मीटिंग में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में शिवकुमार चौधरी ने जब यह फरमाया कि वह डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में ठेकेदारी प्रथा खत्म करने आए हैं - तो बिलकुल सही फरमाया । वह आए तो ठेकेदारी प्रथा खत्म करने ही थे, किंतु उन्होंने यह नहीं बताया कि फिर बाद में उन्होंने यू-टर्न ले लिया था । उल्लेखनीय है कि उन्होंने अपना पहला चुनाव 'ठेकेदार' के खिलाफ ही लड़ा था, और उसमें वह बुरी तरह पराजित हुए थे । दूसरी बार चुनाव लड़ने का जब मौका आया तो शिवकुमार चौधरी की 'समझ' में आ गया था कि 'ठेकेदार' के खिलाफ बातें करना तो आसान है, लेकिन उससे लड़ना मुश्किल है - लिहाजा शिवकुमार चौधरी ने 'ठेकेदार' के सामने समर्पण करने में जरा भी देर नहीं लगाई और उनकी जी-हुजूरी करने लगे । उसका सुफल भी उन्हें मिला और 'ठेकेदार' की कृपा से चुनाव में जीत कर वह गवर्नर वाली लाइन में लगे । ऐसे में, अब जब वह फिर से ठेकेदारी के विरोध का जुमला उछालने लगे हैं तो लोगों का कहना/पूछना स्वाभाविक ही है कि इतना ही दम था तो गवर्नर बनने के लिए खुद 'ठेकेदार' की शरण में क्यों चले गए थे ? हालाँकि यह सच्चाई शिवकुमार चौधरी को नहीं समझनी है - उन्हें तो रेखा गुप्ता को इस्तेमाल करके अपनी राजनीति करने का मौका मिला है; यह सच्चाई तो रेखा गुप्ता को समझनी है - चुनावी घमासान में आखिर समय, एनर्जी और पैसा तो उनका खर्च होना है । 
मुकेश गोयल के सुझाव पर रजिस्ट्रेशन चार्ज कम करने/रखने पर सुनील निगम ने जो तत्परता दिखाई, उसमें अरुण मित्तल की सहमति होने की संभावना ने रेखा गुप्ता के लिए ज्यादा बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है । रेखा गुप्ता को भरोसा दिलाया गया था कि अरुण मित्तल को चूँकि गवर्नर के नजदीक रहने का शौक है, और वह कोई न कोई तिकड़म भिड़ा कर गवर्नर के नजदीक हो ही जाते हैं - इसलिए वह शिवकुमार चौधरी के भी नजदीक रहेंगे । अरुण मित्तल के दोस्ताना व्यवहार को शिवकुमार चौधरी और उनके नजदीकियों ने नजदीकी बनाने की उनकी तिकड़मों के रूप में 'देखा' भी और बहुत ही अभद्र व अपमानजनक तरीके से जगह जगह टिपण्णियाँ भी कीं । अरुण मित्तल ने चूँकि उनका कभी संज्ञान नहीं लिया और शिवकुमार चौधरी व उनके नजदीकियों से सहज संबंध बनाए रखे, जिसे शिवकुमार चौधरी व उनके नजदीकियों ने उनकी 'कमजोरी' के रूप में देखा/पहचाना । इसी बिना पर उन्होंने अरुण मित्तल को अपने साथ माना और 'दिखाया' । अरुण मित्तल की तरफ से हालाँकि सफाई भी आई कि रेखा गुप्ता के परिवार के साथ उनके पुराने संबंध हैं, इसलिए रेखा गुप्ता की महत्वाकांक्षा के प्रति उनकी सहानुभूति होना स्वाभाविक ही है - किंतु इस सहानुभूति को चुनावी राजनीति से जोड़ कर देखना जल्दबाजी करना होगा । अरुण मित्तल की तरफ से कहा गया है कि रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी को हवा देने में उनका हाथ बताना कुछेक लोगों का दुष्प्रचार है । अरुण मित्तल की इस तरह की सफाईयों के बीच सुनील निगम का मुकेश गोयल का सुझाव तत्परता से स्वीकार करना रेखा गुप्ता के लिए 'सिर मुंडाते ही ओले पड़ने' जैसा साबित हुआ है । 

Tuesday, January 5, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में क्लब्स के सदस्यों को एक दूसरे के खिलाफ भड़काने तथा उन्हें आपस में लड़वाने की मुकेश अरनेजा वाली रणनीति खुद अपना कर दीपक गुप्ता दोहरी मुसीबत में फँसे

गाजियाबाद । दीपक गुप्ता के नजदीकी मुकेश अरनेजा के तौर-तरीकों को अपनाते हुए क्लब्स में झगड़े कराने के प्रयासों में जिस तरह की बातें कर रहे हैं, उनमें से कुछ के रिकॉर्ड पर आने की खबर से दीपक गुप्ता के नजदीकियों व समर्थकों के बीच खलबली मच गई है । हुआ यह कि दीपक गुप्ता के नजदीकी विभिन्न क्लब्स के सदस्यों को उनके पदाधिकारियों के खिलाफ पट्टी पढ़ाने की कोशिश में बेसिरपैर की तथा बदनामीभरी ऐसी ऐसी बातें कर रहे हैं, जिनसे क्लब्स के लोगों के बीच मनमुटाव पैदा हो तथा उनके बीच झगड़े हों । क्लब्स में झगड़े करवा कर अपना उल्लू सीधा करने की उनकी यह चाल लेकिन यह जान कर मुश्किल में पड़ गई कि फोन पर की गईं उनकी इस तरह की कुछेक बातें रिकॉर्ड कर ली गईं हैं । इससे लोगों के बीच यह बहुत स्पष्ट हो गया है कि दीपक गुप्ता के नजदीकी दीपक गुप्ता की चुनावी पराजय को सामने देख कर क्लब्स के पदाधिकारियों को बदनाम करने तथा क्लब्स में झगड़े करवाने के घटिया स्तर तक पर उतर आए हैं । 
यह मुकेश अरनेजा की चुनावी राजनीति का ही नहीं, उनके सामान्य व्यवहार का बड़ा पुराना और घिसपिट चुका तरीका है - जिसमें सामने वाले को तरह तरह से बदनाम करने का प्रयास किया जाता है । मुकेश अरनेजा के लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि इस तरीके को इस्तेमाल करने के बावजूद उन्हें हासिल कुछ नहीं हुआ, और उन्होंने बदनामियों का जो घोल दूसरों के लिए तैयार किया वह घोल उन्हीं पर चढ़ता रहा । दीपक गुप्ता के साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों का कहना है कि मुकेश अरनेजा के हाल से दीपक गुप्ता ने लगता है कि कोई सबक नहीं सीखा है और बदनामी पाने वाले काम वह खुद भी करने लगे हैं । यह बात सामने आने के बाद दीपक गुप्ता के शुभचिंतकों को यह जान कर धक्का लगा है कि चुनावी हार को सामने देख कर दीपक गुप्ता और उनके नजदीकी इस कदर बदहवास हो गए हैं कि मुकेश अरनेजा के स्तर के घटियापने पर उतर आए हैं । दीपक गुप्ता के साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों का ही मानना और कहना है कि इस तरह की बातों व हरकतों से अपनी हार को तो वह जीत में नहीं ही बदल पायेंगे, अपनी साख व प्रतिष्ठा और हार के कारण लोगों के बीच पैदा होने वाली सहानुभूति को लेकिन वह जरूर खो देंगे । इन लोगों का दीपक गुप्ता के लिए सुझाव है कि सामने दिख रही अपनी चुनावी पराजय को उन्हें खिलाड़ी-भावना  के साथ स्वीकार करना चाहिए और गंभीरता के साथ अपने चुनाव अभियान में रह गई कमियों की पड़ताल करना चाहिए और उन्हें दूर करते हुए आगे के वर्षों में फिर प्रयास करना चाहिए । इस तरह के रिएक्शन से साबित हुआ कि क्लब्स के सदस्यों व पदाधिकारियों को भड़काने की रणनीति से दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी को दोतरफा नुकसान हुआ : पोल खुलने से एक तरफ तो लोगों के बीच नाराजगी पैदा हुई कि दीपक गुप्ता के नजदीकी उन्हें एक दूसरे से लड़ाने के प्रयास कर रहे हैं; और दूसरी तरफ उनके शुभचिंतक भी इस तरह की बातों से भड़के हैं तथा उनके खिलाफ होते नजर आ रहे हैं । 
दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के अभियान के साथ मजेदार किस्म की बुरी बात यह हुई कि उसे डिस्ट्रिक्ट में लोगों का समर्थन तो नहीं ही मिला, टेक्नोलॉजी ने भी उसकी मदद नहीं की - उलटे बल्कि उनकी पोल ही खोली । रोटरी क्लब वैशाली की एक मीटिंग में क्लब के पदाधिकारियों की पदों के बदले अपना समर्थन 'बेचने' की स्वीकारोक्ति रिकॉर्ड न हुई होती, तो यह सच्चाई कभी लोगों के सामने न आ पाती कि सतीश सिंघल के गवर्नर-काल के पद बेच कर मुकेश अरनेजा - दीपक गुप्ता के लिए समर्थन जुटाने का काम कर रहे हैं । इसी तरह, क्लब्स के सदस्यों व पदाधिकारियों को एक दूसरे के खिलाफ भड़का कर उन्हें आपस में लड़ाने की कोशिश करना दीपक गुप्ता के अभियान को भारी पड़ा है । इस प्रसंग ने दिखाया/जताया है कि सामने दिख रही हार ने दीपक गुप्ता के नजदीकियों व समर्थकों को बुरी तरह से हताश व निराश कर दिया है और अपनी हताशा/निराशा में वह क्लब्स के पदाधिकरियों को बदनाम करने की हद तक जा पहुँचे हैं । 

Sunday, January 3, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में विकास जैन को इंदौर में विष्णु झावर व मनोज फडनिस की चौधराहट के खिलाफ फैली नाराजगी का शिकार होना पड़ा

इंदौर । विकास जैन की कूड़ा बुहारते सार्वजनिक हुई तस्वीर ने एक मजेदार किस्म का प्रतीकात्मक संयोग बनाया - क्योंकि जिस समय उनकी यह तस्वीर लोगों के सामने आई, लगभग उसी समय इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए चल रही वोटों की गिनती में विकास जैन के 'बुहारे' जाने की सूचना लोगों को मिली । पहली वरीयता के वोटों की गिनती में 23 उम्मीदवारों के बीच विकास जैन के 847 वोटों के साथ दसवें नंबर पर रहने की सूचना मिली तो हर कोई हैरान रह गया । विकास जैन के समर्थकों व शुभचिंतकों के लिए ही नहीं, उनके विरोधियों के लिए भी यह नतीजा हैरान करने वाला था । इंदौर में यह मानने और कहने वाले लोग तो काफी थे कि विकास जैन चुनाव नहीं जीतेंगे, लेकिन उनकी इतनी बुरी हार की उम्मीद उनके घनघोर किस्म के विरोधियों को भी नहीं थी । कोढ़ में खाज वाली बात यह हुई कि केमिशा सोनी चुनाव जीत गईं - और अच्छे प्रदर्शन के साथ जीत गईं । 1328 वोटों के साथ पहली वरीयता के वोटों की गिनती में वह तीसरे नंबर पर थीं । विकास जैन की हार की तरह केमिशा सोनी की जीत भी इंदौर के लोगों के लिए किसी चमत्कार की तरह रही । वास्तव में, केमिशा सोनी के समर्थकों व शुभचिंतकों को भी उनकी इतनी बड़ी जीत की उम्मीद नहीं थी । इसलिए इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में विकास जैन की बड़ी हार तथा केमिशा सोनी की बड़ी जीत के कारणों को समझने/पहचानने के लिए गहन विश्लेषण की जरूरत है । 
पहली नजर में यह चुनावी नतीजा विष्णु झावर और मनोज फडनिस की हार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । विष्णु झावर उर्फ काका जी को इंदौर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के गॉडफादर के रूप में देखा/पहचाना जाता है; और मनोज फडनिस इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट हैं । इन दोनों का समर्थन विकास जैन को था । सिर्फ समर्थन होता, तो भी कोई बात नहीं थी - हर किसी का किसी न किसी को समर्थन होता ही है; विष्णु झावर और मनोज फडनिस की भूमिका लेकिन समर्थक से बड़ी - बहुत बड़ी थी । उन्होंने विकास जैन को चुनाव जितवाने के लिए जो भी, जैसी भी तीन-तिकड़म हो सकती थी - वह की; और इसके लिए अपनी वरिष्ठता, अपनी पोजीशन व अपने पद की गरिमा तक को दाँव पर लगाया हुआ था । मनोज फडनिस भूल गए थे कि वह एक उम्मीदवार के समर्थक कार्यकर्ता नहीं हैं; इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट हैं, और इस नाते उनकी कुछ नैतिक व प्रशासनिक जिम्मेदारी है । विष्णु झावर व मनोज फडनिस की देखरेख में चले विकास जैन की उम्मीदवारी के अभियान का सबसे शर्मनाक पहलू यह रहा कि कई मौकों पर केमिशा सोनी को बहुत ही अभद्र व अशालीन तरीके से निशाना बनाया गया । समझा जाता है कि इसी बात ने केमिशा सोनी के प्रति लोगों के बीच हमदर्दी पैदा की, जिसका उन्हें चुनावी फायदा मिला । 
विष्णु झावर को इंदौर में कई लोगों ने यह समझाने की कोशिश की थी कि सेंट्रल काउंसिल के लिए विकास जैन उपयुक्त व्यक्ति नहीं हैं; और विकास जैन की जगह किसी और को उन्हें उम्मीदवार बनाना चाहिए । विष्णु झावर ने लेकिन किसी की नहीं सुनी । उन्होंने माना और कहीं कहीं कहा भी कि भले ही विकास जैन सेंट्रल काउंसिल के लायक न हों, किंतु मैं उन्हें सेंट्रल काउंसिल में भिजवाऊँगा । विष्णु झावर की इस अहंकारपूर्ण सोच व कहन को लोगों ने लगता है कि दिल पर ले लिया; और उन्हें विष्णु झावर व मनोज फडनिस को यह 'बताना' जरूरी लगा कि सेंट्रल काउंसिल में किसी को भिजवाने का काम उनका नहीं, 'हमारा' है । कुछेक लोगों का कहना है कि इंदौर में विष्णु झावर और मनोज फडनिस ने चौधराहट दिखाने/ज़माने की जो कोशिश की है, उसके प्रति लोगों के बीच गहरी नाराजगी व विरोध का भाव है, जिसका शिकार विकास जैन को होना पड़ा है । इन दोनों की छाया में रहने के कारण विजेश खण्डेलवाल रीजनल काउंसिल तक का चुनाव हार गए । इसीलिए विकास जैन की हार को विकास जैन की हार के रूप में नहीं, बल्कि वास्तव में विष्णु झावर व मनोज फडनिस की हार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । 

Friday, January 1, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में रमन अनेजा की बदनामी से जुड़े मामले में राजा साबू को शामिल कर लेने से रमन अनेजा के लिए स्थिति और विवादपूर्ण व फजीहतभरी बनी

पानीपत । राजेंद्र उर्फ राजा साबू को संबोधित एक पत्र के मजमून ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी रमन अनेजा के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है । इस पत्र ने करीब चार वर्ष पहले की रमन अनेजा की बदनामी से जुड़ी धूल खा रही एक घटना की धूल को झाड़ कर एक बार फिर रमन अनेजा के सामने ला खड़ा किया है । पत्र में राजा साबू से अनुरोध किया गया है कि वह रमन अनेजा से उक्त घटना के सही सही तथ्य जानें और उन्हें लोगों के बीच प्रसारित करें, ताकि उस घटना को लेकर चल रही बदनामीपूर्ण चर्चाओं पर विराम लग सके । अपने आप को पानीपत में पिछले कई वर्षों से सक्रिय रोटेरियन बताने वाले लोगों की तरफ से लिखे इस पत्र में कहा गया है कि उक्त घटना की चर्चा से न सिर्फ रमन अनेजा की बदनामी हो रही है, बल्कि डिस्ट्रिक्ट व रोटरी का भी नाम खराब हो रहा है । पत्र में कहा गया है कि उक्त घटना की चर्चा से चूँकि डिस्ट्रिक्ट व रोटरी की भी बदनामी हो रही है, इसलिए हम आपसे अनुरोध कर रहे हैं कि आपको इस मामले से जुड़े सही तथ्यों को सामने लाने के लिए कार्रवाई करना चाहिए और रमन अनेजा से कहना चाहिए कि इस मामले में वह अपना पक्ष स्पष्ट रूप से लोगों के बीच रखें - जिससे कि लोगों द्वारा की जा रही बदनामीपूर्ण चर्चाओं पर विराम लग सके । पत्र में कहा गया है कि उक्त घटना को लेकर चूँकि रमन अनेजा ने पूरी तरह से चुप्पी साधी हुई है, और उनकी चुप्पी के कारण उक्त घटना की चर्चा को और बल मिल रहा है, इसलिए मामले में हस्तक्षेप करने के लिए हमें आपसे अनुरोध करना पड़ रहा है । 
लोगों के बीच जो चर्चा है उसके अनुसार करीब चार वर्ष पहले रमन अनेजा पानीपत में एक होटल में पकड़े गए थे - क्यों पकड़े गए थे, इसे लेकर जितने मुँह उतनी बातें हैं । उनके पकड़े जाने की बात चूँकि रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हुई थी, इसलिए रमन अनेजा की तरफ से औपचारिक तरीके से कभी भी उसका कोई जबाव नहीं दिया गया । औपचारिक रूप से जबाव देने की हालाँकि उन्हें कभी जरूरत भी नहीं पड़ी । लोग उनके पकड़े जाने की बात पर चर्चा करते रहे, और रमन अनेजा इस चर्चा को इग्नोर करते रहे । दो वर्ष पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उन्होंने जब अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की, तब यह मामला पानीपत की सीमा से बाहर निकल कर डिस्ट्रिक्ट में चर्चा का विषय बना । रमन अनेजा की तरफ से हालाँकि तब भी औपचारिक रूप से इस मामले में कुछ नहीं कहा/बताया गया । उनकी उम्मीदवारी के समर्थकों ने अपनी अपनी समझ के हिसाब से जरूर इसका जबाव दिया : किसी ने कहा कि पानीपत में रमन अनेजा के विरोधियों ने षड्यंत्र करके उन्हें पकड़वा दिया था; किसी ने कहा कि पुलिस की गलतफहमी के चलते वह पुलिस का शिकार हो गए थे; किसी ने कहा कि उनके पकड़े जाने की बात जब रिकॉर्ड पर ही नहीं है तो इसे लेकर बात क्यों की जा रही है; आदि-इत्यादि । डिस्ट्रिक्ट के बड़े नेताओं/पदाधिकारियों के सामने भी यह मामला आया और उनसे माँग की गई कि रमन अनेजा की बदनामी को देखते हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत उनकी उम्मीदवारी के नामांकन को रद्द किया जाए । रमन अनेजा के समर्थकों की तरफ से इस माँग का विरोध करने के लिए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मनमोहन सिंह का उदाहरण दिया गया । कहा गया कि मनमोहन सिंह के खिलाफ तो रिपोर्ट दर्ज है और उनके खिलाफ तो कोर्ट में केस चल रहा है, लेकिन फिर भी उन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने ने नहीं रोका गया; रमन अनेजा के खिलाफ तो कोई रिपोर्ट भी दर्ज नहीं है - लिहाजा उनकी उम्मीदवारी को कैसे रोका जा सकता है ? 
बदनामीपूर्ण चर्चाओं के बावजूद रमन अनेजा की उम्मीदवारी का नामांकन न सिर्फ स्वीकार हुआ, बल्कि उनकी उम्मीदवारी सफल भी हुई । बदनामीपूर्ण चर्चा डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में रमन अनेजा के बढ़ते कदमों को तो नहीं रोक पाई; लेकिन उनके लिए बुरी बात यह हुई कि जैसे जैसे उन्होंने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति की सीढ़ियाँ चढ़ना शुरू कीं, वैसे वैसे उक्त घटना के संदर्भ में उनकी बदनामी का दायरा भी फैलता गया । पहले यह बात पानीपत में कुछेक लोगों को पता थी और उनके बीच चर्चा का विषय थी । रमन अनेजा ने लेकिन जैसे ही रोटरी में अपने कदम पानीपत से बाहर निकाले और डिस्ट्रिक्ट में उन्होंने अपनी जगह व पोजीशन पाने के प्रयास शुरू किए, वैसे ही यह मामला भी डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच अपनी जगह बनाता गया । राजा साबू को लिखे पत्र में कहा गया है कि डिस्ट्रिक्ट में अनौपचारिक बातचीत में लोग रमन अनेजा के लिए प्रायः 'होटल वाले' संबोधन का प्रयोग करते हैं । 
रमन अनेजा से सहानुभूति रखने वाले लोगों का कहना है कि रमन अनेजा की सफलता को हजम न कर पाने वाले लोग अब रमन अनेजा को बदनाम करने पर उतर आए हैं, और किसी न किसी तरह से मामले को चर्चा में बनाए रखने का प्रयत्न कर रहे हैं । ऐसे लोगों ने ही राजा साबू को पत्र लिख कर इस मामले में अब राजा साबू को भी घसीट लिया है । सहानुभूति रखने वाले ही कुछेक लोगों का यह भी मानना और कहना है कि इस मामले में रमन अनेजा की होशियारी ही अब उन्हें महँगी पड़ रही है । उनके लिए एक समय तक तो चर्चा को इग्नोर करना ठीक फैसला था; लेकिन जब वह आगे बढ़े तो उन्हें समझना चाहिए कि उनके साथ साथ यह चर्चा आगे न बढ़े और इसके लिए उन्हें अपनी तरफ से सही तथ्य प्रस्तुत करना चाहिए था । उन्होंने सोचा था कि मामले को लेकर वह चुप बने रहेंगे तो मामला अपने आप शांत हो जायेगा । उनकी बदकिस्मती से लेकिन ऐसा नहीं हो सका । रमन अनेजा की इस चुप्पी ने उक्त घटना को लेकर उनकी स्थिति को और विवादपूर्ण बना दिया है, जो उनके लिए भारी फजीहत का सबब बन सकती है ।