Tuesday, October 11, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी को लायंस क्लब संभल के लोगों की तरफ से क्लब के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने से बाज आने तथा डिस्ट्रिक्ट की गतिविधियों में ध्यान केंद्रित करने की नसीहत लायंस इंटरनेशनल के इतिहास की पहली और अनोखी घटना है

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी को डिस्ट्रिक्ट के एक क्लब - लायंस क्लब संभल की तरफ से सार्वजनिक रूप से अप्रत्याशित चेतावनी मिली है कि वह 'हमारे क्लब के आंतरिक मामलों में बेवजह हस्तक्षेप न करें ।' क्लब की तरफ से शिव कुमार चौधरी को यह नसीहत भी दी गई है कि वह 'बेतुकी बातों में समय जाया न करते हुए अपने डिस्ट्रिक्ट की गतिविधियों में ज्यादा ध्यान केंद्रित करें ।' यह इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में अपनी हरकतों और कारस्तानियों से शिव कुमार चौधरी ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच अपनी क्या गत बना ली है । उनसे पहले भी हालाँकि घटिया सोच और व्यवहार के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हुए हैं, लेकिन अभी तक किसी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को सार्वजनिक रूप से लताड़ पड़ती नहीं सुनी गई । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रवैये के प्रति अलग अलग कारणों से अधिकतर लोगों के बीच नाराजगी व असंतोष रहता ही है; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बना व्यक्ति भी इस बात को जानता/समझता है - और इसलिए वह प्रयास करता है कि वह ऐसा कुछ न करे जिससे कि लोगों की नाराजगी व असंतोष ज्यादा भड़के तथा मुखर बने । शिव कुमार चौधरी के साथ लेकिन उल्टा ही हो रहा है । उन्हें जानने वालों का कहना है कि दरअसल घटियापन उनकी सोच व उनके व्यवहार में इतना कूट कूट कर भरा है कि वह जो कुछ भी करते हैं - उससे अपनी फजीहत में और इजाफा ही कर/करवा लेते हैं । यही कारण है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नरी के चौथे महीने में ही उनके लिए यह नौबत आ गई है कि एक क्लब के लोग उन्हें वॉट्स-ऐप पर सार्वजनिक रूप से लताड़ लगाते हुए क्लब के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने से बाज आने तथा डिस्ट्रिक्ट की गतिविधियों में ध्यान केंद्रित करने की नसीहत दे रहे हैं ।
यह इस बात का भी पुख्ता सुबूत है कि अपने आचरण और अपने व्यवहार से शिव कुमार चौधरी ने अपनी ही फजीहत नहीं कराई है, बल्कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की गरिमा व प्रतिष्ठा को भी नीचे गिरा लिया है ।
डिस्ट्रिक्ट में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर व सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के साथ टकराव बनाने/बढ़ाने में भी शिव कुमार चौधरी ने अनोखा रिकॉर्ड बनाया है । इस मामले में भी इस तथ्य को रेखांकित किया जा सकता है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के अपने वाइस के साथ उचित तालमेल के न होने के उदाहरण दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में भी मिल जायेंगे; ऐसे उदाहरण भी मिल जायेंगे जिनमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर और उनके वाइस एक दूसरे को फूटी आँख न देख रहे हों - लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का अपने वाइस के साथ खुला टकराव हो, यह 'कमाल' सिर्फ और सिर्फ शिव कुमार चौधरी के नाम पर है । शिव कुमार चौधरी के लिए फ्रस्ट्रेशन का और चिढ़न का कारण वास्तव में यह है कि उनके दोनों वाइस एक साथ हैं, एकजुट हैं और डिस्ट्रिक्ट के लोगों को अपने साथ जोड़ने में सफल हैं । डिस्ट्रिक्ट के दोनों वाइस गवर्नर्स की देख/रेख में मसूरी में आयोजित हो रहे सेमीनार को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में शिव कुमार चौधरी द्धारा तमाम रोड़े डालने के बावजूद डिस्ट्रिक्ट के लोगों की तरफ से जो जबर्दस्त समर्थन मिला है, उसके कारण शिव कुमार चौधरी का फ्रस्ट्रेशन तथा उनकी चिढ़न और बढ़ गई है । कुछेक लोगों ने शिव कुमार चौधरी को सुझाव भी दिया कि डिस्ट्रिक्ट के दोनों वाइस द्धारा किए जा रहे आयोजन और उसे मिल रहे व्यापक समर्थन से यदि इतना ही जल-भुन रहे हो, तो उनसे भी बड़ा आयोजन करके उन्हें जबाव दो । इस सुझाव पर अमल कर पाना लेकिन शिव कुमार चौधरी के बस की बात नहीं है । उनके द्धारा किए गए डिस्ट्रिक्ट के आयोजनों की जैसी जो भद्द पिटी है और व्यवस्था तथा उपस्थिति के लिहाज से उनका हर आयोजन जिस तरह से फ्लॉप साबित हुआ है, उससे शिव कुमार चौधरी ने इतना सबक तो सीख ही लिया है कि कुछ करने की बजाए - जो हो रहा है, उसे बिगाड़ने की कोशिश करने का काम करना ही उनके लिए संभव है ।
बिगाड़ने का काम भी चूँकि एक काम होता है, इसलिए शिव कुमार चौधरी को उसमें भी कोई सफलता नहीं मिल रही है । मसूरी में हो रहे आयोजन के खिलाफ लोगों को भड़काने की शिव कुमार चौधरी ने जो कोशिश की, उसका वास्तव में उल्टा ही असर हुआ, और उक्त आयोजन के प्रति लोगों का जोश व समर्थन और ज्यादा बढ़ा नजर आया । शिव कुमार चौधरी ने डिस्ट्रिक्ट के विभाजन की जो चाल चली है, वह भी औंधे मुँह गिरती दिख रही है । इस मामले में शिव कुमार चौधरी को जितने समर्थन की उम्मीद थी भी, वह भी उन्हें मिलता हुआ नहीं दिख रहा है । इस मामले में शिव कुमार चौधरी के लिए भारी फजीहत का कारण यह तथ्य भी बना है कि उनकी अपनी कैबिनेट के सदस्यों और उनके क्लब्स का समर्थन भी उन्हें मिलता हुआ नहीं नजर आ रहा है । इस मामले में शिव कुमार चौधरी को सबसे बड़ा झटका पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स अरुण मित्तल व अनीता गुप्ता की तरफ से लगा है । उन्हें उम्मीद थी कि इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने की इच्छा रखने वाले यह दोनों पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अलग अलग डिस्ट्रिक्ट में हो जाने को अपने अपने लिए फायदेमंद समझेंगे, और इस कारण से डिस्ट्रिक्ट विभाजन के उनके अभियान को बढ़-चढ़ कर आगे बढ़ायेंगे; किंतु इन दोनों ने ही डिस्ट्रिक्ट विभाजन मुद्दे पर ठंडा रुख अपनाया है । समझा जाता है कि अरुण मित्तल और अनीता गुप्ता को दरअसल भरोसा नहीं है कि डिस्ट्रिक्ट में शिव कुमार चौधरी की जैसी फजीहत हो रही है, उसके चलते डिस्ट्रिक्ट विभाजन का उनका अभियान सफल हो भी पायेगा; दोनों वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने जिस तरह से डिस्ट्रिक्ट विभाजन की बात का दो-टूक विरोध किया है - उसके कारण डिस्ट्रिक्ट विभाजन के मुद्दे की पूरी तरह से हवा निकल गई है । ऐसे में, अरुण मित्तल और अनीता गुप्ता को डर है कि उनके विभाजन के पक्ष में उतरने के बाद भी विभाजन नहीं हुआ तो वह 'दूसरे' क्षेत्र के क्लब्स में तो मुँह दिखाने लायक भी नहीं रहेंगे - इसी डर की वजह से अरुण मित्तल तथा अनीता गुप्ता ने विभाजन के मुद्दे से दूरी बनाई हुई है; उनके इस रवैये ने शिव कुमार चौधरी को पूरी तरह अलग-थलग कर दिया है ।
शिव कुमार चौधरी ने आपदा पीड़ितों की मदद के नाम पर झूठ बोल कर और नरेश अग्रवाल तथा नेविल मेहता जैसे बड़े नेताओं को चकमा देकर एलसीआईएफ एमरजेंसी ग्रांट की पाँच हजार अमेरिकी डॉलर की रकम हड़पने की जो कोशिश की, उसके कारण लायंस इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारियों को भी उनकी ठगीबाजी के 'सुबूत' मिल गए हैं । शिव कुमार चौधरी की ठगीबाजी के एक शिकार सतीश अग्रवाल जब-तब वाट्स-ऐप पर शिव कुमार चौधरी की फजीहत करते ही रहते हैं । इस तरह, चौतरफा मुसीबतों में घिरे शिव कुमार चौधरी का फ्रस्ट्रेशन व चिढ़न इस हद तक बढ़ गई है कि वह क्लब्स के लोगों से खुन्नस निकालने लगे हैं । लायंस क्लब संभल के लोगों की तरफ से लेकिन उन्हें जो करारा जबाव मिला है, वह उनकी फजीहत में और इजाफा करने वाला तो है ही, साथ ही लायंस इंटरनेशनल के इतिहास की पहली और अनोखी घटना भी है, जिसमें एक क्लब के लोग एक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को क्लब के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने से बाज आने तथा डिस्ट्रिक्ट की गतिविधियों में ध्यान केंद्रित करने की नसीहत दे रहे हैं ।

Sunday, October 9, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के दबाव में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा रोटरी इंटरनेशनल के फैसले का मजाक बनायेंगे क्या ?

पानीपत । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा के लिए यह तय करना एक बड़ी भारी मुसीबत बन गया है कि वह रोटरी इंटरनेशनल की बात मानें या राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की ? हालाँकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में वह प्रतिनिधि/पदाधिकारी तो रोटरी इंटरनेशनल के हैं, गवर्नरी करने के लिए उन्हें पैसे भी रोटरी इंटरनेशनल से मिलते हैं या मिलेंगे - इसलिए बात तो उन्हें रोटरी इंटरनेशनल की ही माननी चाहिए; लेकिन डिस्ट्रिक्ट में राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का जैसा 'आतंक' हैं और बात न मानने वालों के खिलाफ वह नीचता की जिस हद तक जाने में गुरेज नहीं करते हैं - उसे देखते/जानते हुए रमन अनेजा के लिए उनकी बात मानने से इंकार करना भी आसान नहीं है । रमन अनेजा के सामने अपने पूर्ववर्ती दो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स - डेविड हिल्टन और दिलीप पटनायक का उदाहरण भी है; जिन्होंने राजा साबू और उनके गिरोह के चक्कर में अपनी जो फजीहत और बदनामी कराई - रमन अनेजा उससे भी डरे हुए हैं । राजा साबू और उनके गिरोह के रवैये ने रमन अनेजा के सामने सचमुच  विकल्प नहीं छोड़ा है । दिलीप पटनायक और डेविड हिल्टन की तरह वह राजा साबू और उनके गिरोह की कठपुतली बनते हैं, तो फजीहत व बदनामी का शिकार बनते हैं; रोटरी इंटरनेशनल के फैसले को यदि वह नहीं मानते हैं, तो रोटरी इंटरनेशनल पता नहीं उनके साथ क्या करेगा; राजा साबू और उनके गिरोह की यदि नहीं मानते हैं, तो वह उनका और भी बुरा हाल करेंगे । ऐसे में, रमन अनेजा के लिए यह समझना वास्तव में मुश्किल बना हुआ है कि वह आखिर करें तो क्या करें ?
मामला वर्ष 2017-18 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का है । रोटरी इंटरनेशनल ने हाल ही में अपने एक फैसले में वर्ष 2017-18 के लिए टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर घोषित किया है । रोटरी इंटरनेशनल के इस फैसले के चलते टीके रूबी अब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट हुए । राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स ने लेकिन घोषणा की है कि वह रोटरी इंटरनेशनल के इस फैसले को नहीं मानेंगे और टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में मान्यता नहीं देंगे । उन्होंने रमन अनेजा से भी साफ बता दिया है कि वह टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में कतई तवज्जो न दें । यह राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के नीचता की हद की नई ऊँचाई पर पहुँचने का उदाहरण है, जहाँ से वह रोटरी इंटरनेशनल के फैसले को भी मानने से इंकार कर रहे हैं । इस बारे में दिया जा रहा उनका तर्क भी मजेदार है : उनका कहना है कि फैसला करने वाली कमेटी के जो सदस्य हैं, वह बहुत ही इम्मैच्योर किस्म के लोग हैं और रोटरी के बारे में सही समझ नहीं रखते हैं, इसलिए उनके द्धारा लिए गए फैसले को स्वीकार व लागू नहीं किया जा सकता है । अब यदि इस तर्क को और आगे बढ़ाएँ, तो यह भी कहा जा सकता है कि रोटरी की सही समझ न रखने वाले इम्मैच्योर किस्म के लोगों को कमेटी का सदस्य नियुक्त करने वाले वरिष्ठ रोटरी पदाधिकारी तो और भी ज्यादा इम्मैच्योर तथा रोटरी की सही समझ न रखने वाले हुए । ऐसे वरिष्ठ पदाधिकारियों को कमेटी सदस्य नियुक्त करने की जिम्मेदारी देने वाले रोटरी इंटरनेशनल के और बड़े अधिकारी तो और भी ज्यादा इम्मैच्योर तथा रोटरी की सही समझ न रखने वाले हुए । यानि रोटरी इंटरनेशनल में ऊपर से नीचे तक हर कोई इम्मैच्योर तथा रोटरी की सही समझ न रखने वाला है । यानि रोटरी में मैच्योर तथा रोटरी की सही समझ रखने वाले सिर्फ राजा साबू और उनकी हाँ में हाँ मिलाने वाले उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स ही हैं बस !
बात दरअसल मैच्योर/इम्मैच्योर या रोटरी की सही समझ रखने या न रखने की नहीं है; बात सिर्फ इतनी है कि कमेटी ने ऐसा फैसला दिया है, जो राजा साबू और उनके गुर्गे पूर्व गवर्नर्स को पसंद नहीं है - और इसलिए उन्होंने रोटरी इंटरनेशनल को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है । इनका दोगलापन इससे भी जाहिर है कि फैसले के एक हिस्से को स्वीकार करने से तो यह इंकार कर रहे हैं, लेकिन फैसले के दूसरे हिस्से को यह शब्दशः स्वीकार कर रहे हैं । उल्लेखनीय है कि रोटरी इंटरनेशनल के दिल्ली स्थित साऊथ एशिया ऑफिस में क्लब व डिस्ट्रिक्ट सपोर्ट टीम के को-ऑर्डीनेटर दमन बावेजा ने रमन अनेजा को भेजे ईमेल संदेश में रोटरी इंटरनेशनल के तीन सदस्यीय पैनल द्धारा लिए गए फैसले के बारे में जो जानकारी दी है, उसमें दो बातें मुख्य हैं : पहली के अनुसार, वर्ष 2017-18 के लिए टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर घोषित करना; और दूसरी के अनुसार, इस फैसले को 21 दिन के भीतर रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड में चेलैंज करने का अधिकार देना । राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स बता रहे हैं कि वह डीसी बंसल से इस फैसले को चेलैंज करवायेंगे । इनसे कोई पूछे कि आप जब कमेटी के फैसले को स्वीकार ही नहीं कर रहे हैं, तो फिर कमेटी ने फैसले को चेलैंज करने का जो अधिकार दिया है, उसे क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं ? इन्हें यदि सचमुच कमेटी का फैसला न मानने की अपनी बात और अपना तर्क सही लगता है, तो यह कहें कि फैसले को न स्वीकार करने के कारण यह डीसी बंसल को ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर (इलेक्ट) मानेंगे और उनसे फैसले को चेलैंज नहीं करवायेंगे । राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि मनमानी करने के नाम पर निरंतर दोगलापन दिखाते रहना ही इनका असली चरित्र है ।
राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स दोगलापन चाहें जितना दिखाएँ, वह भी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि कमेटी का जो फैसला है उसकी पूरी पूरी अहमियत और मान्यता है - इसीलिए वह डीसी बंसल से फैसले को अवश्य ही चेलैंज करवायेंगे । डीसी बंसल को इसका पूरा अधिकार है । कमेटी का फैसला भी डीसी बंसल को यह अधिकार देता है । लेकिन कमेटी का फैसला यह भी कहता/बताता है कि इस समय टीके रूबी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट हैं । यह फैसला चेलैंज होगा, इस आधार पर टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट मानने से इंकार नहीं किया जा सकता है । टीके रूबी की तरफ से डीसी बंसल के चुने जाने को चेलैंज करने के बावजूद डीसी बंसल को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट माना जाता रहा था न; उसी तर्क और व्यवस्था से डीसी बंसल की तरफ से चेलैंज होने के बावजूद टीके रूबी ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट होने चाहिए । राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा पर दबाव बनाए हुए हैं कि वह डीसी बंसल को ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट मानें/समझें और टीके रूबी को कोई तवज्जो न दें । उन्होंने रमन अनेजा को आश्वस्त किया है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई और या रोटरी इंटरनेशनल के किसी अन्य पदाधिकारी से डरने की कोई जरूरत नहीं है; और जैसा हम कह रहे हैं, वैसा ही करो । जो लोग रमन अनेजा को जानते हैं, उनका कहना है कि रमन अनेजा भी दिलीप पटनायक और डेविड हिल्टन के 'रास्ते'  पर ही चलेंगे और वही करेंगे जो राजा साबू और उनके गिरोह के गवर्नर उनसे करने के लिए कहेंगे ।
राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स ने रोटरी इंटरनेशनल के फैसले को न मानने के जो तेवर दिखाएँ हैं - और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रमन अनेजा की तरफ से भी रोटरी इंटरनेशनल के फैसले की अवमानना करने के जो संकेत मिल/दिख रहे हैं, उस पर इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई, रोटरी में नियम-कानून के पालन होने की चिंता करने वाले निवर्त्तमान इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन और रोटरी इंटरनेशनल के अन्य पदाधिकारी क्या प्रतिक्रिया देते हैं - यह देखना दिलचस्प होगा ।

Saturday, October 8, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पूजा बंसल को चेयरपरसन पद की मिली जिम्मेदारी ने रीजन काउंसिल के सत्ता समीकरणों का नए सिरे से गठित होने का मौका बनाया, और उसमें नए गुल खिलने की उम्मीद पैदा की

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की 13 सदस्यीय मैनेजमेंट कमेटी ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के इतिहास में पहला कलंकित अध्याय जोड़ा है, जिसमें वह खुद बिना पूर्णकालिक चेयरमैन के बिना पाँच महीने काम करेगी - इस कलंकित इतिहास को रचने के लिए कई लोग इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य राजेश शर्मा को भी कोस रहे हैं । लोगों का कहना है कि अपनी बेवकूफीभरी छोटी सोच से राजेश शर्मा ने रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों व सदस्यों को न केवल रीजन के लोगों के बीच, बल्कि दूसरे रीजन्स के पदाधिकारियों के बीच भी 'कार्टून' बना कर रख दिया है । जो कोई भी पूरे प्रसंग का रिकॉर्डेड घटनाक्रम देखता/सुनता/जानता है, वह इसी बात पर आश्चर्य करता है कि - नॉर्दर्न रीजन के लोगों ने करीब दस महीने पहले अपनी काउंसिल के लिए प्रतिनिधि चुने थे, या कार्टून चुने थे । रिकॉर्डेड घटनाक्रम के अनुसार, नॉदर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन दीपक गर्ग 22 अगस्त को इंस्टीट्यूट प्रशासन पर सहयोग न करने के गंभीर आरोप लगाते हुए चेयरमैन के रूप में काम करने में असमर्थता व्यक्त करते हुए इस्तीफा दे देते हैं । 9 सितंबर को बुलाई गई रीजनल काउंसिल की मीटिंग में - आश्चर्यजनक रूप से, न दीपक गर्ग के इस्तीफे पर और न इंस्टीट्यूट प्रशासन पर सहयोग न करने के उनके आरोपों पर कोई चर्चा नहीं होती है । इसके बाद, 7 अक्टूबर को रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाई जाती है, जिसमें दीपक गर्ग के इस्तीफे को स्वीकार करके वाइस चेयरपरसन पूजा बंसल को चेयरपरसन पद का भी कामकाज देखने के लिए अधिकृत करने का फैसला लिया जाता है ।
रीजनल काउंसिल सदस्यों के कार्टूनपने का पुख़्ता सुबूत इस सवाल में ही छिपा है कि 7 अक्टूबर को जो फैसला हुआ है, वह 9 सितंबर की मीटिंग में ही क्यों नहीं ले लिया गया था ? इस सवाल का सबसे दिलचस्प जबाव यही सुनने को मिल रहा है कि 7 अक्टूबर को लिया गया फैसला यदि 9 सितंबर की मीटिंग में ले लेते, तो काउंसिल सदस्य और पदाधिकारी अपना कार्टूनपना कैसे दिखाते और साबित करते ? अब ज़रा इस बात पर भी गौर करें कि दीपक गर्ग के इस्तीफ़ा देने के दिन से लेकर उनका इस्तीफा स्वीकार होने वाले दिन तक के 45 दिनों में रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों व सदस्यों ने किया क्या ? बेहिचक सीधा सा जबाव है कि इन दिनों में भी उन्होंने वही कुछ किया, जो यह पहले करते थे : इस्तीफ़ा देने के बावजूद दीपक गर्ग काउंसिल के कार्यक्रमों में चेयरमैन के रूप में खुशी खुशी शामिल होते रहे, और उनके संगी-साथी मीटिंग्स में सेल्फियाँ खींचते रहे । जाहिर है कि न दीपक गर्ग ने और न उनके संगी-साथियों ने और न दूसरे सदस्यों ने इंस्टीट्यूट प्रशासन पर लगाए दीपक गर्ग के आरोपों को गंभीरता से लिया । दीपक गर्ग का इस्तीफ़ा और उनके लगाए आरोप वास्तव में एक गंभीर मुद्दा है : दीपक गर्ग के आरोप यदि झूठे हैं, तो इस बात की जाँच होनी ही चाहिए कि आखिर किस स्वार्थ और षड्यंत्र के चलते उन्होंने इंस्टीट्यूट प्रशासन को बदनाम करने का काम किया; और यदि उनके आरोप सच हैं तो यह रीजनल काउंसिल के प्रत्येक सदस्य के लिए चिंता की बात होनी चाहिए । पर पिछले 45/47 दिनों में ऐसे कोई संकेत देखने को नहीं मिले हैं, जिनसे लगता हो कि किसी को भी दीपक गर्ग के आरोपों को लेकर ज़रा सी भी फ़िक्र हो । रीजनल काउंसिल के मौजूदा सदस्यों को वोट देने वाले लोगों को सोचना चाहिए कि उन्होंने इन्हें क्या इसलिए वोट दिए थे कि काउंसिल में जा कर यह सेल्फियाँ खींचे और इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन को बदनाम करें, उनका मजाक बनाएँ ?
नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में जो ड्रामा चला, उसके रिकॉर्डेड पक्ष से काउंसिल सदस्यों के 'कार्टून' होने का पता चला, तो पर्दे के पीछे की कहानी उनका और भी घटिया रूप सामने लाती है । रिकॉर्डेड पक्ष में जो तमाम 'छेद' हैं, वह आभास देते हैं कि मामला सिर्फ उतना ही नहीं है - जितना कि दिख रहा है; बल्कि उससे कहीं ज्यादा बड़ा और गंभीर है । लोगों के बीच की चर्चाओं के अनुसार इस सारे तमाशे के वास्तविक सूत्रधार सेंट्रल काउंसिल के सदस्य राजेश शर्मा हैं, जिन्होंने भाँप लिया कि रीजनल काउंसिल के अधिकतर सदस्य निरे मूर्ख किस्म के हैं, और इन्हें जैसे चाहें वैसे हाँका जा सकता है । राजेश शर्मा ने इन्हें पट्टी पढ़ाई कि चेयरमैन बनने के लिए ज्यादा इंतजार क्यों करते हो; छह-छह महीने के हिसाब से तीन वर्ष में छह लोग चेयरमैन बन जाओ ! चेयरमैन बनने की दौड़ में लगे लोगों को यह फार्मूला तुरंत से पसंद भी आ गया, और वह राजेश शर्मा को अपना गुरु घोषित कर उनके बताए रास्ते पर चल पड़े । राजेश शर्मा खुद भी बड़ी अनोखी चीज हैं : आमतौर पर जो लोग बड़े बनना चाहते हैं, वह बड़े काम करने और बड़ी सोच रखने की जरूरत समझते हैं; राजेश शर्मा इस पचड़े में पड़ने की जरूरत नहीं समझते - बड़ा 'बनने' का उनका बड़ा आसान सा फार्मूला है और वह यह कि 'बड़े' लोगों के पीछे या दाएँ या बाएँ जबर्दस्ती घुस/घुसा कर फोटो खिंचवाओ और फिर उस फोटो को लोगों को दिखाओ - बस बड़े बन गए, और देखिए कितनी आसानी से बन गए । इसी तर्ज पर उन्होंने रीजनल काउंसिल के चेयरमैन-लोभी सदस्यों को जोड़ा और उन्हें बताया कि छह छह महीने के लिए चेयरमैन बनोगे, तो ज्यादा काम भी नहीं करना पड़ेगा और चेयरमैन भी कहलाने लगोगे । दीपक गर्ग का इस्तीफ़ा दरअसल इसी फार्मूले को क्रियान्वित करने के लिए उठाया गया कदम था ।
राजेश शर्मा के कहने में आकर रीजनल काउंसिल के सत्ता खेमे के लोगों ने कदम तो बढ़ा दिया - चर्चा तो यहाँ तक सुनी गई कि राजेश शर्मा की बातों में आकर पंकज पेरिवाल ने तो चेयरमैन पद की शपथ लेने के दौरान पहनने के लिए सूट चूज कर लिया था और उसे फिटिंग के अनुसार ऑल्टर करने के लिए भी दे दिया था - लेकिन इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट देवराज रेड्डी ने इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन को मज़ाक बनाने की कोशिश करने वाले लोगों के ऐसे कान उमेंठे कि बेचारे न तो दर्द से कराह पाए और न कान छुड़ा पाए । इस बीच नॉर्दर्न रीजन की चंडीगढ़ ब्रांच में भी कुछ इसी तरह का तमाशा हुआ, और उन्होंने थोड़ी बहुत 'हेकड़ी' दिखाने की भी कोशिश की - जिसे देख कर राजेश शर्मा और उनके चंगु-मंगुओं को भी उम्मीद बँधी कि शायद उनके लिए भी कोई सम्मानजनक रास्ता निकल आए । दरअसल इसी उम्मीद में 9 सितंबर की मीटिंग में दीपक गर्ग के इस्तीफे को लेकर कोई बात या फैसला नहीं लिया गया । लेकिन इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया । राजेश शर्मा और उनके चंगु-मंगुओं के लिए मुसीबत की बात यह भी हुई कि सेंट्रल काउंसिल में नॉर्दर्न रीजन का प्रतिनिधित्व करने वाले बाकी सदस्यों ने उनकी हरकत की भर्त्सना ही की और उन्हें किसी भी तरह से समर्थन देने से साफ इंकार कर दिया । 'मरता क्या न करता' वाली तर्ज पर राजेश शर्मा और उनके चंगु-मंगुओं ने 7 अक्टूबर को आखिरकार वह फैसला कर लिया, जिसे वह 9 सितंबर को भी कर सकते थे - और जिसने न सिर्फ उनके सारे प्लान को चौपट कर दिया, बल्कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल और इंस्टीट्यूट के इतिहास में काला और कलंकित करने वाला अध्याय जोड़ दिया ।
वाइस चेयरपरसन पूजा बंसल को बाकी के पाँच महीनों में चेयरपरसन पद की जिम्मेदारियाँ निभाने का जो मौका मिला है, उसमें रीजन काउंसिल के सत्ता समीकरणों को नए सिरे से गठित होने के अवसर के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । पूजा बंसल दरअसल सत्ता खेमे का हिस्सा थीं तो, लेकिन सत्ता खेमे में उनकी भूमिका एक किनारे खड़े मूक दर्शक की और समर्थक की ही थी - अब लेकिन सत्ता खेमे में उनकी भूमिका न सिर्फ महत्त्वपूर्ण बल्कि निर्णायक भी हो गई है । इससे स्वाभाविक ही है कि उनकी महत्त्वाकांक्षाओं को हवा मिलेगी । यही चीज नॉर्दर्न रीजन की चुनावी राजनीति में नए गुल खिलाएगी और उसके परिदृश्य को दिलचस्प बनाएगी ।

Wednesday, October 5, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी की सुशील गुप्ता द्धारा की जा रही वकालत में अशोक गुप्ता को अपने साथ धोखा क्यों नज़र आ रहा है ?

नई दिल्ली । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के संदर्भ में पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के विरोधाभासी रवैये ने अशोक गुप्ता और उनके नजदीकियों व समर्थकों को चक्कर में डाला हुआ है । डिस्ट्रिक्ट 3052 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अशोक गुप्ता अगले रोटरी वर्ष में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी करते हुए सुने/बताए जा रहे हैं, और इसके लिए वह पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट कल्याण बनर्जी, पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता और मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई के समर्थन का दावा करते हैं । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी भी आने की चर्चा से सुशील गुप्ता का अशोक गुप्ता को समर्थन संदेह के घेरे में आ गया है । रंजन ढींगरा को सुशील गुप्ता के बड़े खास नजदीकियों के रूप में देखा/पहचाना जाता है; और इसी बिना पर माना/समझा गया कि रंजन ढींगरा यदि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उम्मीदवार हो रहे हैं - तो निश्चित ही सुशील गुप्ता के साथ विचार-विमर्श करके और उनके समर्थन का आश्वासन मिलने के बाद ही हो रहे हैं । हालाँकि इस मानने/समझने को गलत साबित करने के लिए इस बीच सुशील गुप्ता ने रंजन ढींगरा के कुछेक असाइनमेंट दूसरे पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को दिलवा दिए । सुशील गुप्ता की इस कार्रवाई ने लोगों को हैरान भी किया । दरअसल रोटरी में कोई इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकता कि सुशील गुप्ता, रंजन ढींगरा से असाइनमेंट वापस ले/लिबवा कर किसी दूसरे को दे/दिलवा देंगे । पर सुशील गुप्ता की इस कार्रवाई ने अशोक गुप्ता को राहत की साँस दी थी और उन्होंने विश्वास कर लिया था कि रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी में सुशील गुप्ता का कोई हाथ नहीं है, और सुशील गुप्ता का समर्थन उनकी उम्मीदवारी को ही मिलेगा । अभी पिछले दिनों लेकिन अशोक गुप्ता को यह जान/सुन कर चक्कर सा आ गया कि सुशील गुप्ता रोटरी इंटरनेशनल के जोन 4 के विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी की वकालत कर रहे हैं ।
अशोक गुप्ता दरअसल यह देख/जान कर हैरान हुए कि पिछले दिनों जोन 4 के कुछेक डिस्ट्रिक्ट्स के महत्त्वपूर्ण आयोजनों में रंजन ढींगरा को बहुत अहमियत देते हुए निमंत्रण मिले और रंजन ढींगरा उन आयोजनों में शामिल हुए । डिस्ट्रिक्ट 3080 का समर्थन एक अन्य संभावित उम्मीदवार दीपक कपूर को मिलने का अनुमान लगाया जाता है, किंतु उसके एक प्रमुख आयोजन में रंजन ढींगरा की उल्लेखनीय उपस्थिति और संलग्नता देखी गई । जोन 4 के डिस्ट्रिक्ट्स में रंजन ढींगरा की अचानक से बढ़ी सक्रियता के बारे में जान/सुन कर अशोक गुप्ता का माथा ठनका, तो उन्होंने अपने स्तर पर सारे माजरे को जानने/समझने की कोशिश की, और अपनी कोशिश में उन्हें पता चला कि रंजन ढींगरा की इस अचानक बढ़ी सक्रियता में सुशील गुप्ता का भी 'योगदान' है । यह पता चलने पर अशोक गुप्ता को सुशील गुप्ता के रवैये पर हैरानी भी हुई, और साथ ही उन्होंने यह भी समझ लिया कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति में सुशील गुप्ता दोहरा खेल खेल रहे हैं ।
इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति के समीकरण को जानने/समझने वाले तथा बदलते समीकरणों पर निगाह रखने वाले लोगों का मानना और कहना है कि अगले रोटरी वर्ष में होने वाला इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चुनाव सुशील गुप्ता के 'भविष्य' के लक्ष्य के लिहाज से बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं, और अपने 'भविष्य' के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए ही वह इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में अपनी भूमिका निभायेंगे । इसी लिहाज से माना जा रहा है कि 'सारे अण्डे एक ही टोकरी में न रखने' के सिद्धांत पर विश्वास और अमल करते हुए सुशील गुप्ता किसी एक उम्मीदवार की ही सरपरस्ती नहीं करेंगे । सुशील गुप्ता के नजदीकियों का भी कहना है कि सुशील गुप्ता अभी अशोक गुप्ता और रंजन ढींगरा - दोनों के ही साथ खड़े हैं; और वह देखेंगे कि चुनाव अभियान में किसका पलड़ा भारी रहता है । स्वाभाविक रूप से जिसका पलड़ा भारी दिखेगा - अंततः वह उसके साथ हो लेंगे । अभी सुशील गुप्ता ने एक सुरक्षित रास्ता यह निकाला/बनाया हुआ है कि वह रंजन ढींगरा के प्रति हमदर्दी रखने वालों के सामने रंजन ढींगरा की बात करते हैं, और अशोक गुप्ता के प्रति सहानुभूति रखने वाले लोगों के सामने अशोक गुप्ता की बात करते हैं । उनकी इस रणनीति में वह यदि रंजन ढींगरा के ज्यादा समर्थन में दिख रहे हैं, तो इसका कारण यही माना/समझा जा रहा है कि जोन 4 के अधिकतर डिस्ट्रिक्ट्स में रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी के प्रति हमदर्दी रखने वाले लोग ज्यादा हैं; और आश्चर्य की बात यह है कि कई डिस्ट्रिक्ट्स में लोग अशोक गुप्ता को ज्यादा जानते/पहचानते भी नहीं हैं ।
इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति के समीकरणों पर निगाह रखने वाले लोगों का मानना और कहना है कि अशोक गुप्ता जिस तरह से अपनी उम्मीदवारी को बड़े नेताओं के भरोसे टिकाए/बनाए हुए हैं, और उम्मीद लगाए हुए हैं कि उन्हें तो मनोज देसाई ही इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवा देंगे - उसके कारण अशोक गुप्ता अपने समर्थन-आधार को और कमजोर करने का ही काम कर रहे हैं । लोगों को हैरानी है कि अशोक गुप्ता इंटरनेशनल डायरेक्टर बनना चाहते हैं, लेकिन जोन 4 के अधिकतर डिस्ट्रिक्ट्स में न तो उनकी कोई सक्रियता है, और न उनके भरोसे के कोई लोग हैं । आईआईएस यूनीवर्सिटी के स्वयंभू उपकुलपति के रूप में अशोक गुप्ता ने रोटरी के बड़े नेताओं को डॉक्टरेट बाँट कर उन्हें खुश करने का तो प्रयास किया, लेकिन रोटेरियंस के बीच जाने की उन्होंने कभी कोई कोशिश नहीं की । अशोक गुप्ता ने 'मैं तुम्हें डॉक्टरेट दूँगा, तुम मुझे इंटरनेशनल डायरेक्टर का पद देना' फार्मूले को अपना कर इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने की जो योजना बनाई थी, वह तो काम करती हुई दिख नहीं रही है; और भरत पांड्या के मुकाबले उनकी स्थिति को बहुत ही कमजोर माना/समझा जा रहा है । दरअसल इसी कारण से सुशील गुप्ता ने रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी को हवा दी है । रोटरी के विभिन्न प्रोजेक्ट्स में अपनी संबद्धता के चलते रंजन ढींगरा का अपना जो काम है, तथा विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में रोटेरियंस के बीच अपनी जो पहचान व सक्रियता है - उसमें सुशील गुप्ता के समर्थन के कारण और इजाफ़ा ही हुआ है । इस बात ने अशोक गुप्ता के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है; उन्हें और उनके समर्थकों को लग रहा है कि सुशील गुप्ता उनके साथ धोखा कर रहे हैं : सुशील गुप्ता एक तरफ तो अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी का समर्थन करने की बात कर रहे हैं; लेकिन व्यवहार में वह रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी को प्रमोट कर रहे हैं । सुशील गुप्ता के इस विरोधाभासी व्यवहार का कारण दूसरों को भले ही समझ में आ रहा हो - किंतु अशोक गुप्ता और उनके नजदीकी इस 'कारण' को तो पहचानने/देखने को तैयार नहीं हैं । वह तो बस सुशील गुप्ता को ही कोसने में लगे हैं ।

Tuesday, October 4, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080, यानि राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को रोटरी इंटरनेशनल से एक बार फिर मार पड़ी

चंडीगढ़ । दमन बावेजा ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा को आज शाम साढ़े चार बजे जो ईमेल भेजा है, वह रोटरी क्लब हिमालयन रेंजेस मनसा देवी द्धारा की गई चुनावी शिकायत पर लिए गए फैसले की जानकारी भर नहीं है - बल्कि राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के लिए चुल्लू भर पानी भी है । दमन बावेजा रोटरी इंटरनेशनल के दिल्ली स्थित साऊथ एशिया ऑफिस में क्लब व डिस्ट्रिक्ट सपोर्ट टीम के को-ऑर्डीनेटर हैं । राजा साबू और उनके गिरोह के लोगों ने जिस तरह की बेईमानियाँ करके टीके रूबी को चुनाव हरवाया था, दमन बावेजा ने अपने ईमेल संदेश में बताया है कि रोटरी इंटरनेशनल के तीन सदस्यीय पैनल ने उस चुनावी नतीजे को पलट दिया है - और वर्ष 2017-18 के लिए टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर घोषित किया है । पैनल ने उक्त चुनाव की निगरानी करने वाले तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डेविड हिल्टन की जिन शब्दों में भर्त्सना की है, वह किसी भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के लिए बेहद शर्म की बात होनी चाहिए । डेविड हिल्टन के बारे में पैनल द्धारा की गई टिप्पणी वास्तव में इस बात का सुबूत है कि डेविड हिल्टन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारियाँ निभाने की बजाए राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स के हाथों की कठपुतली बने हुए थे - और उनका हुक्म बजा रहे थे । उनसे पहले, इसी मामले में दिलीप पटनायक ने खासी फजीहत झेली । इस मामले ने अब जो टर्न लिया है, उसमें तीसरे गवर्नर के रूप में रमन अनेजा के लिए भी फजीहत के संकेत नज़र आ रहे हैं । तीन तीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के लिए जिल्लत और बदनामी का सबब बने इस सारे तमाशे में बेचारे डीसी बंसल की और फजीहत हो रही है - जिन्हें राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स की हरकतों के चलते 'गवर्नर' की कुर्सी से बेइज्जत होकर दूसरी बार उतरना पड़ा है ।
राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के लिए टीके रूबी के मामले में मुसीबत की बात यह हुई है कि उन्हें डिस्ट्रिक्ट के लोगों की तरफ से भी और रोटरी इंटरनेशनल की तरफ से भी - लगातार मार पड़ रही है । डिस्ट्रिक्ट के लोगों की तरफ से पड़ने वाली मार से बचने और उसे छिपाने के लिए वह बेईमानी करते हैं, तो रोटरी इंटरनेशनल उनकी बजा देता है । उनकी बेशर्मी की लेकिन तारीफ करनी पड़ेगी कि इतनी थुक्का -फजीहत के बाद भी वह बाज नहीं आ रहे हैं । यही कारण है कि वर्ष 2017-18 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का जो फैसला फरवरी 2015 में हो जाना चाहिए था, वह राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में बीस महीने के बाद भी अभी अनिश्चय में पड़ा है । रोटरी इंटरनेशनल के 34 जोन्स में फैले करीब 530 डिस्ट्रिक्ट्स में इस समय, अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार सँभालने वाले अपने अपने उद्देश्य/लक्ष्य तय कर रहे हैं और अपनी अपनी टीम के लिए लोगों को चयन कर रहे हैं; किंतु राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में अभी तक भी यही तय नहीं हो सका है कि अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होगा कौन ? वर्ष 2017-18 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद को लेकर जिन कुछेक डिस्ट्रिक्ट्स में विवाद या झगड़े थे भी, वह सुलट गए हैं - लेकिन राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में इस बात को लेकर शुरू हुआ झगड़ा सुलटने की बजाए उलझता और जा रहा है । इसे लेकर रोटरी समुदाय में राजा साबू तथा उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की भारी बदनामी हो रही है, और लोग उनके नाम ले ले कर चुस्कियाँ ले रहे हैं - लेकिन वह निर्लज्ज किस्म की बेशर्मी के साथ अपनी हरकतों को जारी रखे हुए हैं । राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने अपनी हरकतों से सिर्फ अपना ही नहीं - डिस्ट्रिक्ट का और रोटरी का भी मजाक बना/बनवा दिया है ।
राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स जब कहीं रोटेरियंस के बीच भाषण देते हैं - तो उच्च आचरण, सदाचार, नियमों के पालन, नैतिकता आदि की ऐसी ऊँची ऊँची बातें कहते/करते हैं, जिन्हें सुन कर लगता है जैसे कि यह लोग ऋषियों/मुनियों के सगे वाले नाना/फूफा/मामा हैं; लेकिन इनकी कारस्तानियाँ देख/जान का साबित होता है कि 'शैतान' को भी इनसे ट्रेनिंग लेने की जरूरत पड़ जाए । वर्ष 2017-18 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के चुनाव को लेकर पिछले करीब बीस महीनों में जो जो हुआ है, उससे इनका असली रूप लोगों के सामने आ गया है । कई लोग हैं जो इस बात को पूरी स्पष्टता के साथ और दो टूक तरीके से कहते हैं कि राजा साबू के प्रति उनके मन में बड़ा सम्मान था, लेकिन अब उन्हें पता चला है कि उनसे घटिया आदमी तो कोई हो ही नहीं सकता है । उल्लेखनीय है कि राजा साबू ने अपने डिस्ट्रिक्ट में यह प्रथा स्थापित की थी कि नोमीनेटिंग कमेटी द्धारा चुने गए अधिकृत उम्मीदवार को चेलैंज नहीं किया जायेगा और उसे ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बनने दिया जायेगा । राजा साबू ने पिछले तमाम वर्षों में बहुत सुनियोजित तरीके से यह दिखाने का प्रयास किया कि वह डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में किसी का पक्ष नहीं लेते हैं, और जो फैसला होता है उसका सम्मान करते हैं । वर्ष 2017-18 के लिए लेकिन नोमीनेटिंग कमेटी ने उनके पसंदीदा व्यक्ति की बजाए जब टीके रूबी को अधिकृत उम्मीदवार चुन लिया, तो राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में न सिर्फ अधिकृत उम्मीदवार के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बनने की प्रथा टूट गई और अधिकृत उम्मीदवार चेलैंज हुआ - बल्कि लोगों ने यह भी देखा कि राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स चेलैंज करने वाले उम्मीदवार की हर तरीके से मदद करने के लिए खुलकर सामने आ गए ।
टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की कुर्सी तक पहुँचने से रोकने के लिए राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स ने जो कुछ किया, उससे उनकी कलई तो उतरी ही है - साथ ही निवर्तमान इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन की भी पोल खुली है । उल्लेखनीय है कि रोटरी में राजनीति को हतोत्साहित करने के लिए पिछले रोटरी वर्ष में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट के रूप में केआर रवींद्रन ने बड़े कठोर मानक बनाए थे; और राजनीति करने वाले पदाधिकारियों पर तेजी से हंटर चलाए थे । डिस्ट्रिक्ट 3100 और डिस्ट्रिक्ट 3011 के कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को उनके हंटर की चोट भी पड़ी, और डिस्ट्रिक्ट 3100 तो नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में भी चला गया था । किंतु डिस्ट्रिक्ट 3080 के मामले में लोगों ने केआर रवींद्रन की सारी हंटरबाजी की फूँक सरकते हुए देखी । डिस्ट्रिक्ट 3011 के मामले में तो पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के खिलाफ कोई औपचारिक शिकायत भी नहीं थी, फिर भी उन्हें केआर रवींद्रन के कोप का शिकार होना पड़ा । राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में राजा साबू सहित अन्य कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की चुनावी धांधलियों की सुबूतों के साथ औपचारिक शिकायतें हैं; उन शिकायतों और सुबूतों के आधार पर ही रोटरी इंटरनेशनल की विभिन्न कमेटियों ने फैसले लिए हैं - लेकिन फिर भी केआर रवींद्रन की हिम्मत नहीं हो पाई कि वह राजा साबू और या उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स पर  कार्रवाई कर सकें । इस प्रकरण से लोगों ने मान/समझ लिया है कि केआर रवींद्रन सिर्फ उन लोगों पर ही हंटर चला सकते हैं, जिनके कोई 'माई-बाप' नहीं हैं; और राजा साबू तो दूर की बात, उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स तक के खिलाफ कार्रवाई कर सकने की केआर रवींद्रन की 'औकात' नहीं है । राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में पिछले करीब बीस महीने से जो तमाशा हो रहा है, उससे परिचित लोगों का मानना और कहना है कि केआर रवींद्रन यदि शुरू में ही राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में भी अपने द्धारा तय किए गए मानकों का पालन करवाते, तो मामला यहाँ तक नहीं खिंचता ।
अभी भी कोई बहुत देर नहीं हुई है ! केआर रवींद्रन यदि अभी भी इस बात की जरूरत समझ लें कि उनके द्धारा तय मानकों का पालन राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में भी होगा - तो मामला और खराब होने से बच सकता है । अन्यथा राजा साबू के गिरोह के पूर्व गवर्नर्स की बयानबाजियाँ संकेत दे रही हैं कि लगातार पड़ती मार से भी उन्होंने कोई सबक नहीं सीखा है । यानि अभी और तमाशे देखने को मिलेंगे ।

Monday, October 3, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में ई-वोटिंग से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव होने की तैयारी ने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की मुसीबतों को बढ़ाया

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव ई-वोटिंग से कराने की तैयारी शुरू करने से दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को तगड़ा वाला झटका लगा है । उल्लेखनीय है कि रोटरी इंटरनेशनल की डायरेक्टर्स बोर्ड मीटिंग में इस आशय का फैसला हो जाने के बाद से ही मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल दावा करते रहे हैं कि मौजूदा वर्ष से ई-वोटिंग करा पाना व्यावहारिक कारणों से संभव ही नहीं होगा, इसलिए इस वर्ष तो डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में ही चुनाव होगा - और पहले से चले आ रहे तरीके से ही होगा । किंतु डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन ने क्लब्स के पदाधिकारियों के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट के अन्य लोगों को भी रोटरी इंटरनेशनल की डायरेक्टर्स बोर्ड मीटिंग में हुए फैसले से अवगत कराते हुए जरूरी कार्रवाई शुरू करने के संकेत देकर मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल के दावों को झूठा ठहरा दिया है । ई-वोटिंग को लेकर लोगों के बीच फैले असमंजस को दूर करने के लिए शरत जैन ने जिस तरह की पहल की है, उससे दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को यह अहसास तो हो गया है कि शरत जैन इसी वर्ष से ई-वोटिंग से चुनाव कराने का काम शुरू कर देंगे । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों के ही अनुसार, शरत जैन की इस तैयारी को देखते हुए दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को अपनी चुनावी रणनीति पर पुनर्विचार करने की जरूरत महसूस हुई है ।
दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों ने ही इन पँक्तियों के लेखक को बताया है कि मुकेश अरनेजा को लगता है कि ई-वोटिंग के कारण चुनाव में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की भूमिका बढ़ जायेगी, और इस बढ़ी भूमिका के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुनाव व चुनावी नतीजे को प्रभावित करने की स्थिति में आ जायेगा । मुकेश अरनेजा का साफ कहना है कि इस स्थिति का सीधा फायदा अशोक जैन को मिलेगा । मुसीबत की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पास अपने उम्मीदवार को फायदा पहुँचाने का जो 'मौका' होगा, वह बेईमानी की श्रेणी में भी नहीं आयेगा - इसलिए उसकी कहीं कोई शिकायत भी नहीं हो सकेगी । ई-वोटिंग में चुनावी बेईमानी करने की गुंजाइश तो - शायद - नहीं होगी; लेकिन चुनाव व चुनावी नतीजे को प्रभावित करने के मौके बहुत होंगे । पिछले रोटरी वर्ष के अंतिम महीनों में ई-वोटिंग से हुए इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में सी बासकर से पराजित हुए सुनील जचारिआ के समर्थकों का रोना रहा कि उनके लिए चुनावी नतीजा बहुत ही अप्रत्याशित रहा और उन्हें यह समझ में ही नहीं आया कि जो हुआ, वह आखिर हुआ क्यों और कैसे ? उल्लेखनीय है कि सुनील जचारिआ को रोटरी के तमाम बड़े तुर्रमखाओं का समर्थन था, और इस आधार पर उनके ही जीतने की उम्मीद व घोषणा की जा रही थी; लेकिन फिर भी वह चुनाव हार गए - सुनील जचारिआ के नजदीकियों और समर्थकों ने उनकी हार के लिए ई-वोटिंग को जिम्मेदार ठहराया ।
दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को भी डर हुआ है कि ई-वोटिंग से चुनाव होने की बात ने उनकी मुश्किलों को बढ़ाने का काम किया है । उनके लिए मुसीबत की बात यह है कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के मुकेश अरनेजा जैसे समर्थक दरअसल अभी तक प्रचलित चुनावी प्रक्रिया में ही तिकड़में करने के उस्ताद हैं; किंतु ई-वोटिंग में उनकी उक्त उस्तादी तो काम आने वाली नहीं है । पिछली बार मुकेश अरनेजा जैसे अस्वस्थ केके भटनागर को गाड़ी में लाद कर वोट डलवाने ले आए थे, वैसी हरकतें कर पाना तो अब उनके लिए मुश्किल क्या, असंभव ही होगा । ई-वोटिंग की प्रक्रिया में वह क्या क्या बदमाशियाँ कर सकते हैं - इसका उन्हें अभी पता नहीं है । ई-वोटिंग की प्रक्रिया को लेकर हालाँकि अभी सभी असमंजस में हैं; और कोई भी अभी बहुत दावे से यह नहीं कह सकता है कि इस प्रक्रिया के जेनुइन और बेईमानी वाले फायदे या नुकसान आखिर क्या हैं ? इस असमंजस की स्थिति में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की भूमिका बढ़ जाती है - वास्तव में किसी को कुछ जानना/पूछना/समझना है तो वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर से ही संपर्क करेगा; और किसी को कुछ बताना/समझाना है तो यह काम भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ही करेगा । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की इस बढ़ी हुई भूमिका में अपने लिए खतरे और नुकसान के संकेत दिख/मिल रहे हैं ।
दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं के लिए इससे भी बड़ी मुसीबत की बात यह हुई है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की भूमिका को लेकर वह कहीं कोई शिकायत भी नहीं कर सकते हैं । शिकायतबाजी के काम में मुकेश अरनेजा वास्तव में कुख्याति की हद तक एक्सपर्ट हैं; पर यहाँ इस मामले में उनके हाथ बुरी तरह बँधे हुए हैं । इसका एक कारण तो यह है कि ई-वोटिंग से चुनाव कराने का फैसला इंटरनेशनल डायरेक्टर्स बोर्ड ने लिया है, और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर तो बस उस फैसले को क्रियान्वित करने का काम कर रहा है - ऐसे में, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की कार्रवाई की शिकायत करने का अर्थ इंटरनेशनल डायरेक्टर्स बोर्ड के फैसले को चुनौती देने वाला माना/समझा जायेगा । रोटरी में राजनीति करने वालों पर हंटर बरसाने वाले के रूप में मशहूर निवर्तमान इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन इस वर्ष भी जिस भूमिका में हैं, उसे देखते/जानते हुए मुकेश अरनेजा अपनी 'एक्सपर्टीज' दिखाने से बचने का ही प्रयास करेंगे । दूसरा कारण यह भी है कि मुकेश अरनेजा पहले से ही रोटरी के बड़े नेताओं के बीच काफी बदनाम हैं, जिसके चलते इस वर्ष के रोटरी इंस्टीट्यूट की तैयारियों के लिए बनी करीब 170 लोगों की टीम में मुकेश अरनेजा को कोई जगह नहीं मिली । इंस्टीट्यूट के कन्वेनर इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई हैं, जिनके साथ अपनी नजदीकियत के किस्से सुनाते/बताते मुकेश अरनेजा थकते नहीं हैं । मुकेश अरनेजा के लिए शर्मनाक स्थिति यह हुई है कि मनोज देसाई ने टीम में जेके गौड़ को तो जगह दे दी है, लेकिन मुकेश अरनेजा को जगह नहीं दी है । ऐसे में, मुकेश अरनेजा को डर यह है कि ई-वोटिंग को लेकर उन्होंने यदि कोई चूँ-चपड़ की तो उनकी बची-खुची पहुँच भी खतरे में पड़ जाएगी ।
इसलिए मुकेश अरनेजा तथा दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के दूसरे समर्थक नेताओं के सामने ई-वोटिंग की व्यवस्था को - तथा इस व्यवस्था को क्रियान्वित करती डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन की भूमिका को चुपचाप देखते रहने का ही विकल्प बचा है । इस अकेले विकल्प को देखते हुए दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को ई-वोटिंग के जरिए चुनाव होने की तैयारी देख/जान कर तगड़ा वाला झटका महसूस हो रहा है, तो बहुत स्वाभाविक बात है ।

Sunday, October 2, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में राजा साबू 'गिरोह' के सामने जितेंद्र ढींगरा की उम्मीदवारी का मुकाबला करने के लिए उम्मीदवार तय करना चुनौती और मुसीबत बना

चंडीगढ़ । प्रमोद विज को अपने ही क्लब - रोटरी क्लब पानीपत मिडटाउन में टीके रूबी को मुख्य अतिथि के रूप में आने से रोकने के लिए क्लब के पदाधिकारियों के साथ बड़ी कठिन लड़ाई लड़नी पड़ी - इस लड़ाई को अंततः वह क्लब के प्रेसीडेंट के पिता से गुहार लगा कर ही जीत सके । इस पूरी लड़ाई में प्रमोद विज की बस एक ही रट रही कि टीके रूबी उनके क्लब में मुख्य अतिथि के रूप में यदि आए, तो राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू के सामने उनकी नाक कट जायेगी । प्रमोद विज रोटरी में और डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच में यूँ तो अपने आप को एक बड़े नेता के रूप में प्रोजेक्ट करते हैं, किंतु यह जान कर उनकी साँस थम गई कि उनके क्लब के एक कार्यक्रम में टीके रूबी को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया जा रहा है । पहले तो उन्होंने धौंस-डपट से क्लब के पदाधिकारियों पर दबाव डाला कि वह टीके रूबी को क्लब के कार्यक्रम में न बुलाएँ; धौंस-डपट से बात नहीं बनी, तो वह खुशामद पर उतरे; तब भी असफल रहने पर उन्होंने क्लब में झगड़ा करवाने की तरकीब लगाई; बदकिस्मती ने वहाँ भी उनका काम नहीं बनने दिया । प्रमोद विज तब फिर क्लब अध्यक्ष के पिता की शरण में गए, और वर्षों के परिचय का वास्ता देकर उनसे अनुरोध किया कि वह अपने बेटे को समझाएँ कि वह क्यों उनकी नाक कटवाने पर तुला है । क्लब अध्यक्ष को अपने पिता की बात मानने पर मजबूर होना पड़ा, और इस तरह टीके रूबी को दिया गया निमंत्रण वापस हुआ - और प्रमोद विज की नाक कटने से बची ।
टीके रूबी डिस्ट्रिक्ट के गवर्नर्स खेमे के लोगों के लिए ऐसी हड्डी बन गए हैं, जो रह रह कर उनके चुभती रहती है, और जिसके चुभने के दर्द से वह लगातार कराहते रहते हैं । रोटरी क्लब पानीपत मिडटाउन में अभी हाल ही में जो उक्त तमाशा हुआ, वह दरअसल इसी चुभन और कराह का नया उदाहरण है । अधिकतर पूर्व गवर्नर्स बेचारों की यह सोच सोच कर ही साँस अटकी रहती है कि उनके क्लब के पदाधिकारी अपने किसी कार्यक्रम में कहीं टीके रूबी को न आमंत्रित कर लें । दरअसल पिछले दिनों कैथल में आयोजित हुए इंटरसिटी कार्यक्रम में रोटेरियंस की जो भारी भीड़ जुटी, उसे देख कर राजा साबू गिरोह के सदस्यों के कान फिर से खड़े हो गए हैं । कैथल में आयोजित हुए इंटरसिटी कार्यक्रम के आयोजन की जिम्मेदारी टीके रूबी के नजदीकियों व समर्थकों के पास थी । इस कार्यक्रम के प्रमुख कर्ताधर्ता जितेंद्र ढींगरा थे । इससे पहले, पिंजौर और सहारनपुर में इंटरसिटी के जो कार्यक्रम हुए, वह रोटेरियंस की उपस्थिति के लिहाज से बुरी तरह फ्लॉप रहे थे । इसी कारण से, कैथल में रोटेरियंस के ज्यादा संख्या में मौजूद होने को टीके रूबी और उनके साथियों के बने रहने वाले तथा बढ़ते प्रभाव के सुबूत के रूप में देखा/पहचाना गया - और गवर्नर्स खेमे के लोगों के बीच किसी भी तरह से अपनी अपनी नाक बचाने की कोशिशें एक बार फिर से तेज हुईं । इस चक्कर में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा को यशपाल दास व मधुकर मल्होत्रा से फटकार तक सुनने को मिली कि कैथल में इंटरसिटी की जिम्मेदारी जितेंद्र ढींगरा को कैसे और क्यों दे दी गई ?
इन स्थितियों के कारण गवर्नर्स खेमे में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए 'अपना' उम्मीदवार चुनने का काम और उलझ गया है । गवर्नर्स खेमे को इस वर्ष एक बार फिर से जितेंद्र ढींगरा से मुकाबला करना है; और इसके लिए उनके सामने सुधीर चौधरी, नवजीत सिंह औलख और गुरदीप सिंह दीप में से किसी एक को चुनने की जिम्मेदारी है । सुधीर चौधरी के लिए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हेमंत अरोड़ा बैटिंग कर रहे हैं । हेमंत अरोड़ा का तर्क है कि गवर्नर्स खेमे की काली करतूतों पर पर्दा डालने के लिए उन्होंने चार्टर्ड एकाउंटेंट के रूप में अपनी जो सेवाएँ दी हैं और अपनी प्रोफेशनल पहचान तक को जिस तरह से खतरे में डाला है, उसके बदले में गवर्नर्स खेमा उनके उम्मीदवार के रूप में सुधीर चौधरी को गवर्नर नहीं बनवा सकता क्या ? हेमंत अरोड़ा की राह में सबसे बड़ा रोड़ा लेकिन मधुकर मल्होत्रा ने अटका रखा है । मधुकर मल्होत्रा ने नवजीत सिंह औलख की उम्मीदवारी का झंडा उठा रखा है । मधुकर मल्होत्रा लोगों के बीच डिस्ट्रिक्ट के सबसे ताकतवर पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने का प्रभाव बनाए हुए हैं, और अपने आप को राजा साबू व यशपाल दास के बाद तीसरे नंबर का नेता मानते/जताते हैं । उन्होंने नवजीत सिंह औलख की उम्मीदवारी का झंडा पिछले वर्ष भी उठाया था, लेकिन फिर ऐन मौके पर उन्हें यह झंडा छोड़ना पड़ा था । मधुकर मल्होत्रा के सामने मुसीबत की बात यह है कि यदि इस वर्ष भी वह नवजीत सिंह औलख को गवर्नर्स खेमे का समर्थन नहीं दिलवा सके, तो फिर लोगों के बीच उनकी भारी फजीहत होगी । गुरदीप सिंह दीप अपने ही क्लब के सदस्य और पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शाजु पीटर के भरोसे हैं, लेकिन शाजु पीटर उनके लिए कुछ करते हुए नज़र ही नहीं आ रहे हैं । इस कारण से शाजु पीटर अपने ही क्लब के सदस्यों के निशाने पर हैं ।
गवर्नर्स खेमे के लिए समस्या और चुनौती की बात यह है कि पिछले वर्ष तो क्लब्स के पदाधिकारियों की खुशामद करके और उन्हें तरह तरह से डरा-धमका कर उन्होंने जितेंद्र ढींगरा को चुनाव हरवा दिया था, इस वर्ष लेकिन कोई जरूरी नहीं है कि वही फार्मूला फिर से सफल हो जाए । सयानों ने कहा भी है कि काठ की हांडी चूल्हे पर बार-बार थोड़े ही चढ़ती है । उम्मीदवार के रूप में जितेंद्र ढींगरा ने जिस तरह से अपनी सक्रियताओं को संयोजित किया है, तथा क्लब्स के पदाधिकारियों व अन्य प्रमुख लोगों के बीच अपनी पैठ बनाई है; उसका मुकाबला करने के लिए बाकी के संभावित उम्मीदवारों में से किसी ने भी अभी तक कोई तैयारी या सक्रियता नहीं दिखाई है । सभी अभी दरअसल गवर्नर्स खेमे की तरफ से हरी झंडी मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं । सुधीर चौधरी ने पिछले दिनों जरूर लोगों के साथ मेल-मुलाकात का सिलसिला शुरू किया था और अपने चुनाव अभियान में तेजी दिखाई थी, किंतु फिर वह भी घर बैठ गए । उनके नजदीकियों का कहना है कि सुधीर चौधरी को लगा कि गवर्नर्स खेमे की तरफ से उन्हें यदि हरी झंडी नहीं मिली, तो यह मेल-मुलाकातें क्या करेंगी - इसलिए अभी चुपचाप घर बैठना ही ठीक है ।
राजा साबू गिरोह के नेता लोग जितेंद्र ढींगरा को रोकने के लिए इस वर्ष भी अपनी अपनी फजीहत करवायेंगे क्या - यह देखना वास्तव में दिलचस्प होगा ।