Friday, December 2, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में मुकेश अरनेजा के बदनाम करने वाले व्यवहार पर सतीश सिंघल क्या अमित जैन की तरह की कार्रवाई करने की हिम्मत दिखा पायेंगे ?

नई दिल्ली । मुकेश अरनेजा ने सतीश सिंघल तथा उनके फैसलों व काम करने के तरीकों की ठीक वैसे ही खिल्ली उड़ाना शुरू कर दिया है, जैसा उन्होंने करीब छह वर्ष पहले अमित जैन के साथ किया था - और जिसके चलते अमित जैन ने उन्हें दो महीने के भीतर ही डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद से हटा दिया था । रोटरी इंटरनेशनल के इतिहास में मुकेश अरनेजा ने अपने नाम यह एक अनोखा फजीहतभरा रिकॉर्ड लिखवाया हुआ है, जिसमें अपनी खुद की कारस्तानियों के चलते उन्हें कुछ ही दिनों के भीतर डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद के पद से हाथ धोना पड़ा था । रोटरी इंटरनेशनल के इतिहास में, ऐसी दशा को प्राप्त होने वाले मुकेश अरनेजा पहले और अकेले रोटेरियन हैं । इस दशा को प्राप्त होने के लिए मुकेश अरनेजा ने किया यह था कि अमित जैन द्धारा डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाए जाने के बाद वह खुद को सुपर गवर्नर समझने लगे, और अमित जैन के हर फैसले तथा काम में टाँग अड़ाने लगे; अमित जैन ने उनकी इन हरकतों की अनदेखी करते हुए अपना काम करना जारी रखा, तो मुकेश अरनेजा ने लोगों के बीच उनके खिलाफ बातें करना और उनकी खिल्ली उड़ाना शुरू कर दिया । मुकेश अरनेजा की हरकतों को काबू से बाहर जाता देख, अमित जैन ने मुकेश अरनेजा को कान पकड़ कर डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद से हटा दिया । मुकेश अरनेजा ने लगता है कि छह वर्ष पहले के उस प्रकरण से कोई सबक नहीं सीखा है - क्योंकि जिस तरह की हरकतों के कारण मुकेश अरनेजा को अमित जैन ने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद से हटाया था, ठीक वैसी ही हरकतें मुकेश अरनेजा ने अब सतीश सिंघल के साथ करना शुरू कर दिया है ।
मुकेश अरनेजा को जहाँ मौका मिलता है, वह वहाँ सतीश सिंघल की बुराई करना तथा उनके फैसलों व उनकी बातों की खिल्ली उड़ाना शुरू कर देते हैं । कई लोगों ने पाया/सुना है और बताया है कि हाल-फिलहाल के दिनों में मुकेश अरनेजा को कई जगह यह कहते हुए सुना गया है कि सतीश सिंघल को रोटरी के बारे में न तो कुछ पता है, और न ही वह कुछ जानना/सीखना ही चाहते हैं; मुकेश अरनेजा को इस बात की बड़ी शिकायत है कि वह डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर पद की अपनी भूमिका का निर्वाह करते हुए सतीश सिंघल को जो कुछ उपयोगी सुझाव देते हैं, सतीश सिंघल उन सुझावों पर कोई ध्यान ही नहीं देते हैं और बेवकूफीभरी मनमानी करते हैं । मुकेश अरनेजा कहते/बताते हैं कि उनसे कई लोग शिकायत करते हैं कि उनके डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर रहते हुए सतीश सिंघल कोई भी काम ढंग से क्यों नहीं कर पा रहे हैं । मुकेश अरनेजा का रोना है कि वह किस किस को बताएँ कि वह तो बस कहने भर को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर हैं, और सतीश सिंघल उनकी तो कुछ सुनते ही नहीं हैं । मुकेश अरनेजा का आरोप है कि एक तो सतीश सिंघल ने अपनी टीम में कई ऐसे लोगों को रख लिया है, जो किसी काम के नहीं हैं, दूसरे अपने कार्यक्रमों को संभव बनाने के लिए वह ऐसे लोगों पर निर्भर करते हैं जिन्हें रोटरी का बिलकुल भी अतापता नहीं है, और तीसरी बात यह कि किसी भी कार्यक्रम में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में लोगों के बीच उन्हें क्या बातें कहना/करना चाहिए - इसकी सतीश सिंघल को कोई समझ नहीं है; और इस कारण से वह कार्यक्रमों में अनाप-शनाप बातें करते हुए मजाक का पात्र बनते हैं । मुकेश अरनेजा कई लोगों को बता चुके हैं कि उन्होंने कई बार सतीश सिंघल को भाषण के टिप्स दिए हैं, लेकिन सतीश सिंघल ने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया और अपने भाषण में बेमतलब तथा बेसिरपैर की बातें करते हुए अपनी ही हँसी उड़वाते हैं और अपने साथ साथ उनकी भी बदनामी करवाते हैं ।
हद की बात तो यह है कि मुकेश अरनेजा कहीं कहीं यह भी कहते हुए सुने गए हैं कि सतीश सिंघल को पहचानने में उनसे भारी गलती हो गई है, और उनके गवर्नर-काल के लिए डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बन कर उन्होंने अपने लिए मुसीबत ही मोल ले ली है । इसकी प्रतिक्रिया में मुकेश अरनेजा को किसी ने कहा भी कि यदि ऐसी बात है तो डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद छोड़ क्यों नहीं देते हो ? मुकेश अरनेजा ने इसे लेकिन अनसुना कर दिया । लोगों का कहना है कि मुकेश अरनेजा है ही ऐसा दोमुहाँ व्यक्ति - वह पद को कस के पकड़े भी रहेगा, और बुराई भी करेगा । कुछेक लोगों ने मुकेश अरनेजा को आगाह भी किया कि उनकी बातों से खफ़ा होकर सतीश सिंघल कहीं अमित जैन की तरह उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद से हटा न दें । मुकेश अरनेजा इसका दोटूक जबाव देते हैं कि अमित जैन जैसी हिम्मत सतीश सिंघल में नहीं है । वह इसका कारण भी बताते हैं कि अमित जैन को रोटरी की समझ भी है और डिस्ट्रिक्ट में लोगों के साथ उनका जुड़ाव भी रहा है; इसके साथ-साथ उन्हें केके गुप्ता जैसे वरिष्ठ रोटेरियन की मदद भी मिल गई - लिहाजा अमित जैन ने तो उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद से हटाने का साहस कर लिया; किंतु सतीश सिंघल को न तो कुछ पता है और न डिस्ट्रिक्ट में उनके किसी के साथ विश्वास के संबंध हैं; मुकेश अरनेजा का कहना है कि जो लोग सतीश सिंघल के साथ काम कर रहे हैं, वह सतीश सिंघल के नहीं बल्कि वास्तव में उनके 'आदमी' हैं - इसलिए सतीश सिंघल उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद से हटाने की हिम्मत नहीं करेंगे ।
मजे की बात यह भी देखने में आई है कि सतीश सिंघल की बुराई करते हुए मुकेश अरनेजा को जब कभी यह आभास होता है कि सामने वालों को उनकी बातें हजम नहीं हो रही हैं, तब कभी कभी वह यह भी कहने लगते हैं कि मैं कोई सतीश की बुराई या शिकायत नहीं कर रहा हूँ, यह बातें मैं इसलिए बता रहा हूँ कि यदि किसी को सतीश की टीम के चयन से, और या उनके कार्यक्रमों से कोई शिकायत हो तो उसके लिए वह मुझे जिम्मेदार न माने/समझे - क्योंकि सतीश तो मेरी कुछ सुनता ही नहीं है । मुकेश अरनेजा की नकारात्मक बातों पर सतीश सिंघल की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आने/मिलने पर कई लोगों को आश्चर्य है, और इस आश्चर्य में उन्हें मुकेश अरनेजा का यह दावा उचित जान पड़ रहा है कि सतीश सिंघल में अमित जैन की तरह की कार्रवाई करने की हिम्मत ही नहीं है; किंतु अन्य कुछेक लोगों को लगता है और वह इसे कहते भी हैं कि सतीश सिंघल की चुप्पी से मुकेश अरनेजा की और फजीहत ही हो रही है : क्योंकि लोग खुद ही कह/पूछ रहे हैं कि मुकेश अरनेजा को यदि सचमुच लग रहा है कि सतीश सिंघल उनकी बात नहीं सुन/मान रहे हैं, और अपने फैसलों व अपनी कार्रवाइयों से अपनी और उनकी बदनामी करवा रहे हैं - तो मुकेश अरनेजा डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद छोड़ क्यों नहीं देते ? मुकेश अरनेजा के इस अंतर्विरोधी 'व्यवहार' से लोग दरअसल यह समझने लगे हैं कि उन्हें हरेक पद चाहिए भी, और उसके लिए वह तिकड़म से लेकर खुशामद करने तक से पीछे नहीं हटेंगे - लेकिन पद मिलते ही फिर वह पद देने वाले की बुराई भी शुरू कर देंगे ।
मुकेश अरनेजा ने अपने इस व्यवहार का शिकार इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई तक को बना डाला । पहले तो उनकी खुशामद कर कर के मुकेश अरनेजा ने उनसे अपने लिए कुछेक फेवर ले लिए, और फिर वह लोगों को यह बताते फिरे कि मनोज देसाई तो चूँकि उनकी मेहरबानी से इंटरनेशनल डायरेक्टर बने हैं, इसलिए वह उन्हें हर जगह आगे रख/कर देते हैं । मनोज देसाई तक उनकी इस तरह की बातें पहुँची तो मनोज देसाई ने दुबई में हो रहे रोटरी जोन इंस्टीट्यूट के लिए कमेटियाँ बनाते समय मुकेश अरनेजा को उनकी हैसियत बता/दिखा दी । दुबई में हो रहे रोटरी जोन इंस्टीट्यूट की तैयारी के लिए मनोज देसाई ने 170 के करीब रोटेरियंस को लेकर कमेटी बनाई, लेकिन मुकेश अरनेजा को इससे बाहर रखा । मुकेश अरनेजा के लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि रोटरी जोन इंस्टीट्यूट की कमेटी में रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ तो हैं, लेकिन मुकेश अरनेजा नहीं हैं । सतीश सिंघल को लेकर मुकेश अरनेजा आजकल जिस तरह की बातें करते हुए सुने जा रहे हैं, उन्हें सुनने वाले लोगों में से कुछेक को आशंका है कि इन बातों के चक्कर में कहीं सतीश सिंघल भी अमित जैन और मनोज देसाई की तरह मुकेश अरनेजा को उनकी हैसियत बताने/दिखाने के लिए मजबूर ही न हो जाएँ - और इस कारण से मुकेश अरनेजा डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद एक बार फिर से कहीं गँवा न दें ।

Wednesday, November 30, 2016

लायंस इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में मुकेश गोयल के नेतृत्व में आयोजित हुए लीडरशिप सेमीनार की कामयाबी ने डिस्ट्रिक्ट, मल्टीपल और लायंस इंटरनेशनल के पदाधिकारियों व नेताओं तक को प्रभावित किया

गाजियाबाद । मुकेश गोयल की प्रेरणा से और उनके नेतृत्व में संपन्न हुए लीडरशिप सेमीनार की सफलता की लगातार फैलती खबरों ने लायंस इंटरनेशनल के पदाधिकारियों तक को जिस तरह से चौंकाया और प्रभावित किया है - उसके चलते लायन लीडर के रूप में अजय सिंघल, विनय मित्तल तथा संजीवा अग्रवाल की पहचान व साख में गुणात्मक वृद्धि हुई है । अजय सिंघल व विनय मित्तल क्रमशः फर्स्ट व सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हैं, जबकि संजीवा अग्रवाल इस वर्ष सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार हैं । इन तीनों ने मुकेश गोयल के दिशा-निर्देशन में जिस तरह से लीडरशिप सेमीनार की व्यवस्था को अंजाम दिया और तमाम प्रतिकूल चुनौतियों के बावजूद उसे कामयाब बनाया, उसे देख/जान कर लायंस इंटरनेशनल के वरिष्ठ पदाधिकारी व लीडर्स डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के भविष्य के प्रति आश्वस्त हुए हैं । लायंस इंटरनेशनल के पदाधिकारियों व लीडर्स के लिए चौंकने व प्रभावित होने का कारण दरअसल यह रहा कि जिस परिस्थिति में मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 के पदाधिकारियों को अपनी मीटिंग को कर सकना मुश्किल हुआ, और मुश्किलों के कारण जिन्हें मल्टीपल काउंसिल की मीटिंग को स्थगित कर देने के लिए मजबूर होना पड़ा - ठीक उसी परिस्थिति में डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में मुकेश गोयल तथा डिस्ट्रिक्ट के भावी पदाधिकारियों ने एक बड़ा सेमीनार पूरी गरिमा, व्यवस्था तथा लोगों की सक्रिय संलग्नता के साथ संभव कर लिया । मजे की बात यह भी रही कि डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में ही, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के आयोजनों में जहाँ उपस्थिति कभी भी डेढ़ सौ - दो सौ से ज्यादा नहीं हो पाई, वहाँ लीडरशिप सेमीनार में 407 लोग शामिल हुए - और अपनी जेब से पैसा देकर शामिल हुए ।
दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स, दूसरे मल्टीपल्स तथा लायंस इंटरनेशनल के पदाधिकारियों के सामने यही सवाल चुनौती बना हुआ है कि जिस परिस्थिति में मल्टीपल काउंसिल की मीटिंग कर पाना संभव नहीं हो सका, ठीक उसी परिस्थिति में मुकेश गोयल और उनके सहयोगियों ने इतना बड़ा आयोजन कैसे कर लिया ? कार्यक्रम हुए दस दिन होने जा रहे हैं, लेकिन उसकी कामयाबी के चर्चे थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं - बल्कि हो यह रहा है कि चर्चे रोज़ नई नई जगह तथा नए नए लोगों के पास पहुँच रहे हैं । दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स व दूसरे मल्टीपल्स के प्रमुख लोगों का कहना है कि उन्होंने लायन-व्यवस्था में बड़े बड़े आयोजन होते हुए देखे/सुने हैं, लेकिन मसूरी में आयोजित हुए लीडरशिप सेमीनार को जैसी कामयाबी मिली है - वह लायनिज्म के इतिहास का अनोखा और ऐतिहासिक उदाहरण है । लायंस इंटरनेशनल के बड़े और प्रमुख पदाधिकारियों ने इस कामयाबी को लायनिज्म के प्रति लोगों के लगाव व जुड़ाव से जोड़ कर देखा/पहचाना है । उनके अनुसार, 19/20 नवंबर को मसूरी में हुए लीडरशिप सेमीनार की सफलता का आधार सिर्फ यह नहीं है कि इंतजाम अच्छा था और वहाँ बहुत से लोग जुटे/पहुँचे; बल्कि सफलता का आधार यह है कि लीडरशिप के मुद्दों पर बात करने के लिए दो दिवसीय आवासीय कार्यक्रम करने के बारे में पहले तो सोचा गया, और फिर इस सोच को क्रियान्वित किया गया - यह बात इसलिए बड़ी है क्योंकि अधिकतर डिस्ट्रिक्ट्स में इस तरह के उपयोगी व प्रासंगिक विषयों पर चर्चा के लिए दो-तीन घंटे के कार्यक्रम ही होते देखे/सुने गए हैं ।
लोगों को इससे भी बड़ी बात यह लगी है कि इस लीडरशिप सेमीनार के आयोजन से जुड़े लोगों ने अपनी अपनी मुश्किलों के बीच इस तरह के आयोजन के बारे में सोचा और फिर उसे संभव बनाया : आयोजन के प्रेरणास्रोत मुकेश गोयल गंभीर रूप से अस्वस्थ हैं; फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अजय सिंघल को सात महीने में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारी सँभालनी है, जिसके लिए उन्हें अभी से तैयारी में जुटना है; लायन-व्यवस्था में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की कोई खास भूमिका न होने के कारण विनय मित्तल के पास न कोई अधिकार हैं और न  जिम्मेदारी; इस वर्ष के सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार के रूप में संजीवा अग्रवाल के सामने चुनौती बिलकुल अलग तरह की है । अलग अलग तरह की चुनौतियों व मुश्किलों का सामना करते हुए भी इन चारों का 'लीडरशिप' जैसे महत्त्वपूर्ण व गूढ़ विषय पर सेमीनार करने के बारे में सोचना, विषय पर गंभीरता से बात हो सके इसके लिए दो दिन का समय निर्धारित करना, आयोजन के खर्चे में भागीदारों की हिस्सेदारी तय करना, आदि बड़े 'खतरे' के काम थे । 'खतरे' का यह काम ऐसे समय करने के बारे में सोचना - जबकि डिस्ट्रिक्ट में पैसे उगाहने और बकलोली करने को ही लायनिज्म समझा और बनाया हुआ है । डर यही था कि डिस्ट्रिक्ट में लायनिज्म के नाम पर ठगे जा रहे तथा लफंगई का शिकार बन रहे लोग एक गंभीर किस्म के आयोजन में शामिल होना भी चाहेंगे क्या ? लीडरशिप सेमीनार में 407 लोगों की उपस्थिति यह बताने के लिए पर्याप्त है कि डिस्ट्रिक्ट के लोगों ने न सिर्फ मुकेश गोयल, अजय सिंघल, विनय मित्तल और संजीवा अग्रवाल पर भरोसा किया/दिखाया - बल्कि यह भी साबित किया कि लायनिज्म की बुनियादी व वास्तविक पहचान के प्रति उनमें गहरी आस्था है ।
खास बात यह रही कि लायनिज्म के प्रति लोगों की इस आस्था को डिगाने के प्रयास भी खूब हुए और खुद डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी ने झूठ और फरेब का सहारा लेकर लोगों को लीडरशिप सेमीनार में जाने से रोकने की कोशिश की । लीडरशिप सेमीनार में लोगों को जाने से रोकने के लिए डिस्ट्रिक्ट 321 एफ के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर योगेश सोनी के नाम पर फर्जीवाड़ा करके उन्हीं तारीखों में ताशकंद/उज़्बेकिस्तान के एक फेलोशिप टूर की योजना बना डाली । शिव कुमार चौधरी की कोशिश तो सफल नहीं ही हुई, अपनी धोखाधड़ी की योजना में अपने एक कलीग डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के नाम को इस्तेमाल करने के कारण मल्टीपल के पदाधिकारियों तथा अन्य लोगों के बीच उनकी फजीहत हुई - सो अलग ।
तमाम प्रतिकूल दबावों के बावजूद लीडरशिप सेमीनार को जो सफलता मिली, उसकी चर्चा में संजीवा अग्रवाल की भूमिका को भी खासी दिलचस्पी के साथ देखा/पहचाना जा रहा है । लायन राजनीति में आमतौर पर सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार को लोगों के बीच 'गुडी गुडी' बने रहने का प्रयास करते हुए देखा जाता है, जो लायनिज्म के बुनियादी व वास्तविक सरोकार से दूर रहने में ही अपनी 'भलाई' देखता है - लेकिन इसके ठीक विपरीत आचरण करते/दिखाते हुए संजीवा अग्रवाल ने लीडरशिप सेमीनार में अपनी सक्रिय संलग्नता का उदाहरण प्रस्तुत किया । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार के रूप में संजीवा अग्रवाल ने चूँकि शुरू से ही डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच अपनी उपस्थिति व सक्रियता को दिखाया हुआ है, इसलिए लीडरशिप सेमीनार के आयोजन में उनकी संलग्नता पर डिस्ट्रिक्ट में तो किसी को हैरानी नहीं हुई - किंतु लीडरशिप सेमीनार की सफलता से परिचित होने वाले दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों तथा लायंस इंटरनेशनल के पदाधिकारियों ने उनकी संलग्नता को विशेष रूप से रेखांकित किया है । संजीवा अग्रवाल दूसरे कुछेक डिस्ट्रिक्ट्स के अधिष्ठापन समारोहों में भी चूँकि शामिल हुए हैं, इसलिए मल्टीपल के लोगों के बीच वह सक्रिय लायन के रूप में पहले से भी पहचाने जाते हैं । लीडरशिप सेमीनार में उनकी सक्रिय संलग्नता ने उनकी पहचान को और गाढ़ा बनाने का ही काम किया है ।
लीडरशिप सेमीनार की जोरदार और बहुआयामी कामयाबी ने डिस्ट्रिक्ट के राजनीतिक परिदृश्य में भी खासी हलचल मचाई है । इसकी कामयाबी को लेकर सशंकित रहने के चलते जो नेता इस आयोजन से दूर रहे, उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ है । इसे मिली कामयाबी के राजनीतिक 'संदेश' को पढ़ते/समझते हुए कई नेताओं के बीच पाला बदलने की सरसराहट सुनी जा रही है । लायन व्यवस्था में कम ही आयोजन हुए हैं, जिन्होंने चौतरफा अपना प्रभाव बनाया/छोड़ा हो । लीडरशिप सेमीनार की कामयाबी को डिस्ट्रिक्ट में, मल्टीपल में और लायंस इंटरनेशनल के पदाधिकारियों व नेताओं के बीच जिस प्रकार की चर्चा मिली है - उससे जाहिर/साबित है कि लीडरशिप सेमीनार की सफलता ने डिस्ट्रिक्ट के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट की सीमाओं से परे भी लोगों को प्रभावित किया है ।

Friday, November 25, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए मुकेश गोयल की उम्मीदवारी आने से जेपी सिंह के लिए अपनी राजनीति चलाने और उसके लिए खर्चा जुटाने का काम थोड़ा आसान हो गया है

नई दिल्ली । यशपाल अरोड़ा की जगह मुकेश गोयल के सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार हो जाने से जेपी सिंह और उनके समर्थकों को गुरचरण सिंह भोला के लिए उम्मीद नजर आने लगी है । गुरचरण सिंह सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए जेपी सिंह के उम्मीदवार हैं । जेपी सिंह की तरफ से पहले रमेश अग्रवाल की उम्मीदवारी थी, किंतु अचानक से उनके पीछे हटने के बाद जेपी सिंह को अपने ही क्लब के सदस्य गुरचरण सिंह को उम्मीदवार बनाना पड़ा । गुरचरण सिंह जब उम्मीदवार बने, तब प्रतिद्धंद्धी खेमे की तरफ से यशपाल अरोड़ा उम्मीदवार थे - जो पिछले करीब पाँच-छह महीने से अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के अभियान में लगे हुए थे । यशपाल अरोड़ा के सामने गुरचरण सिंह की उम्मीदवारी को किसी ने भी उत्साह और/या उम्मीद के साथ नहीं लिया; और हर किसी का मानना व कहना रहा कि गुरचरण सिंह को जेपी सिंह अपने राजनीतिक स्वार्थ में इस्तेमाल कर रहे हैं । जेपी सिंह के नजदीकियों की तरफ से ही सुना गया कि जेपी सिंह को अपनी राजनीति के लिए बलि का एक बकरा चाहिए, जो उन्हें गुरचरण सिंह के रूप में मिल गया है । चर्चा तो यह भी सुनी/सुनाई गई कि रमेश अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी वापस ही इसलिए ली, क्योंकि उन्होंने समझ लिया था कि जेपी सिंह उनकी उम्मीदवारी को लेकर जरा भी गंभीर नहीं हैं, तथा उनकी उम्मीदवारी की आड़ में वास्तव में अपना उल्लू सीधा करने के चक्कर में हैं ।
जेपी सिंह को दरअसल डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में वापसी करने के लिए इस वर्ष सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए एक उम्मीदवार की जरूरत महसूस हुई । उनका आकलन है कि पिछले लायन वर्ष में उनकी जो ऐतिहासिक फजीहत हुई है, उसका कारण सिर्फ यह है कि उनके पास सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का उम्मीदवार नहीं था । इस कारण उनके समर्थक डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में नहीं पहुँचे, और विरोधी खेमे के लोगों ने इसी बात का फायदा उठा कर उनकी ऐसी गत बना दी, जैसी कि लायन-इतिहास में किसी की नहीं बनी होगी । पिछले वर्ष हुई दुर्गति के अनुभव से जेपी सिंह ने समझ लिया है कि उन्हें यदि सचमुच इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी बनना है, तो सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए होने वाले चुनाव में उन्हें अपना एक प्यादा खड़ा करना ही होगा । इससे वह दो फायदे एकसाथ उठा सकते हैं : एक तो यह कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी लड़ाई के चक्कर में वह अपने समर्थकों को एकजुट व सक्रिय रख सकेंगे, तथा दूसरा यह कि अपने चुनाव का खर्चा भी वह सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार के मत्थे मढ़ सकेंगे । ब्लड बैंक की जिम्मेदारी छिन जाने से जेपी सिंह की कमाई पर जो प्रतिकूल असर पड़ा है, उसके बाद तो जेपी सिंह को इस बात की और ज्यादा जरूरत पड़ी है कि कोई दूसरा उनकी राजनीति का खर्चा वहन करे । इसी आधार पर, गुरचरण सिंह की उम्मीदवारी को जेपी सिंह की इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी चुने जाने की रणनीतिक व 'आर्थिक' तैयारी के रूप में देखा गया । 
प्रतिद्धंद्धी खेमे में यशपाल अरोड़ा की जगह मुकेश गोयल के उम्मीदवार बनने से गुरचरण सिंह की उम्मीदवारी को लोग लेकिन थोड़ी गंभीरता से देखने लगे हैं । यशपाल अरोड़ा के मुकाबले गुरचरण सिंह को जहाँ चुनावी मुकाबले से कतई बाहर देखा/पहचाना जा रहा था; वहाँ मुकेश गोयल के सामने उन्हें मुकाबले में देखा/पहचाना जाने लगा है । दरअसल लोगों के बीच एक्सपोजर के मामले में मुकेश गोयल और गुरचरण सिंह की स्थिति लगभग एक जैसी ही है; इसलिए इन दोनों के बीच उतना फर्क नहीं है, जितना फर्क यशपाल अरोड़ा और गुरचरण सिंह में था । यशपाल अरोड़ा ने लोगों के बीच जो काम किया हुआ था, उसका फायदा मुकेश गोयल को मिलेगा जरूर - और उसी फायदे के चलते वह गुरचरण सिंह से आगे भी नज़र आ रहे हैं । गुरचरण सिंह के समर्थकों को लेकिन लग रहा है कि मुकेश गोयल अभी आगे भले ही दिख रहे हों, किंतु वह इतना आगे भी नहीं हैं कि गुरचरण सिंह के लिए उन्हें 'पकड़ना' बिलकुल असंभव ही हो । मुकेश गोयल की उम्मीदवारी को हालाँकि सत्ता खेमे के उम्मीदवार होने का एक बड़ा फायदा भी है । इसीलिए कई लोगों को लग रहा है कि चुनावी मुकाबले में आ जाने के बाद भी गुरचरण सिंह के लिए मुकेश गोयल से आगे निकल पाना मुश्किल ही होगा । 
सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए मुकेश गोयल और गुरचरण सिंह के बीच होते दिख रहे चुनाव में किसका पलड़ा भारी साबित होगा, यह तो इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों उम्मीदवार अपने अपने प्रचार-अभियान को किस प्रकार आगे बढ़ाते हैं और अपने अपने मौकों का किस प्रकार फायदा उठाते हैं; लेकिन यशपाल अरोड़ा की जगह मुकेश गोयल की उम्मीदवारी आने से जेपी सिंह को एक बड़ा फायदा यह जरूर होता हुआ देखा जा रहा है कि अब उन्हें गुरचरण सिंह को झाँसे में रखने के लिए ज्यादा माथापच्ची नहीं करना पड़ेगी । जेपी सिंह के नजदीकियों का ही कहना/बताना है कि गुरचरण सिंह को उम्मीदवारी के लिए राजी कर लेने के बाद भी जेपी सिंह को भरोसा नहीं था कि वह गुरचरण सिंह की उम्मीदवारी को ज्यादा दिनों तक 'बनाए' रख सकेंगे; लेकिन यशपाल अरोड़ा के चुनावी मैदान से हटने के बाद जो स्थितियाँ बनी हैं, उसमें अब गुरचरण सिंह को भी अपने लिए उम्मीद दिखने लगी है - और इस बात ने जेपी सिंह को बड़ी राहत दी है । इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी पद के लिए अपनी राजनीति चलाने और उसके लिए खर्चा जुटाने के लिए गुरचरण सिंह को राजी करना अब जेपी सिंह के लिए आसान हो गया है ।

Thursday, November 24, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में पारिवारिक जिम्मेदारियों की व्यस्तता के चलते प्रभावित होते चुनाव अभियान के कारण दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए संकट और गहराया

नई दिल्ली । दीपक गुप्ता का अमेरिका से कुछेक लोगों को फोन करना मुसीबत बढ़ाने वाला साबित हो रहा है । दरअसल जिन लोगों को उनके फोन नहीं आए हैं, उन्हें लग रहा है कि दीपक गुप्ता उन्हें ज्यादा तवज्जो देने लायक नहीं मान/समझ रहे हैं, तथा उनकी तुलना में उन्हें ज्यादा महत्त्व दे रहे हैं - जिन्हें उन्होंने अमेरिका से फोन किए हैं । मजेदार संयोग है कि पिछले रोटरी वर्ष में भी चुनाव से कुछ समय पहले दीपक गुप्ता पारिवारिक कारणों से अमेरिका गए थे, और तब भी वहाँ (से) उन्होंने जो तमाशा किया था - उसके कारण वह मजाक का विषय बनते हुए विवाद में फँसे थे । इस वर्ष भी लगभग पिछले वर्ष जैसी ही कहानी दोहराई जा रही है । कई लोगों का मानना और कहना है कि इस बात से ही जाहिर है कि दीपक गुप्ता ने पिछले वर्ष के अपने ही अनुभवों से कोई सबक नहीं सीखा है; और लगातार दूसरे वर्ष भी वही गलती दोहरा रहे हैं, जिस गलती के कारण पिछले वर्ष उन्हें अपना चुनाव हारना पड़ा था । पिछले वर्ष और इस वर्ष के मामले में हालाँकि एक अंतर जरूर है - और वह यह कि पिछले वर्ष अति उत्साह में उन्होंने अपने लिए मुसीबतों को आमंत्रित किया था, जबकि इस वर्ष अतिरिक्त सावधानी के कारण मुसीबतों ने उन्हें घेर लिया है ।
उल्लेखनीय है कि पिछले रोटरी वर्ष में चुनाव से कुछ समय पहले दीपक गुप्ता अमेरिका गए थे, और वहाँ से फोन कर कर के उन्होंने लोगों से पूछा था कि वह उनके लिए अमेरिका से गिफ्ट के रूप में क्या लाएँ ? उनकी इस कार्रवाई का लोगों के बीच बहुत मजाक बना और इसे लोगों के बीच अपना समर्थन बनाने की उनकी एक फूहड़ कोशिश के रूप में देखा/पहचाना गया । दीपक गुप्ता के समर्थकों ने भी माना और कहा था कि दीपक गुप्ता ने जो किया, उसके पीछे की उनकी 'रणनीति' तो ठीक थी किंतु उसका क्रियान्वन करने में वह सावधानी नहीं रख सके - जिस कारण उनकी रणनीति मजाक बन गई और वह मजाक के पात्र बन गए । पिछले वर्ष के इस अनुभव को याद करते/रखते हुए दीपक गुप्ता ने अब की बार हालाँकि कोई फूहड़ प्रदर्शन तो नहीं किया, किंतु उन्होंने जो किया उससे उनके लिए पिछले वर्ष से भी बुरी स्थिति बन गई है । दरअसल अभी जब वह अमेरिका में हैं, तो वहाँ से उन्होंने कुछेक लोगों से बात की है - जिनसे उनकी बात हुईं हैं, उन्होंने ही दूसरे लोगों से यह बताया है । जिन 'दूसरे' लोगों को यह बताया गया, उन्हें स्वाभाविक रूप से बुरा लगा और उन्होंने अपनी अपनी नाखुशी व्यक्त करते हुए टिप्पणियाँ भी की हैं कि लगता है कि दीपक गुप्ता की निगाह में उनकी कोई अहमियत नहीं है, जिस कारण से उन्होंने उनसे बात करना जरूरी नहीं समझा है । कुछेक लोगों ने तो कहा भी है कि वह दीपक गुप्ता को चुनाव में इसका मजा चखायेंगे ।
दीपक गुप्ता के लिए समस्या की बात यह रही कि पिछले वर्ष के बुरे अनुभव को दोहराने से बचते हुए उन्होंने इस वर्ष ज्यादा 'नाटक' न करने का तो निश्चय किया था, किंतु नाटक फिर भी 'हो गया' । लोग इस वर्ष के क्लब-अध्यक्षों से चटखारे ले ले कर पूछ रहे हैं कि दीपक गुप्ता ने फोन करके उनसे पूछा नहीं है क्या कि वह उनके लिए क्या गिफ्ट लाएँ ? इस तरह की बातें क्लब-अध्यक्षों के जले पर नमक छिड़कने जैसा काम कर रही हैं । कई क्लब-अध्यक्ष तो इसी बात से दुखी और निराश हैं कि दीपक गुप्ता ने अमेरिका से कुछेक लोगों को तो फोन किया है, किंतु उन्हें फोन नहीं किया; उस पर पिछले वर्ष की दीपक गुप्ता की हरकत का संदर्भ लेकर कई लोग गिफ्ट की बात करके उनके साथ मजाक और कर रहे हैं । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक भी रेखांकित कर रहे हैं कि अमेरिका से कुछेक लोगों को फोन करके दीपक गुप्ता ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है, तथा अपने और अपनी उम्मीदवारी के लिए पिछले वर्ष जैसे हालात बना लिए हैं । समर्थकों का कहना है कि पिछले वर्ष के अनुभव को याद और ध्यान करते हुए दीपक गुप्ता को अमेरिका से किसी को फोन करना ही नहीं चाहिए था; करते भी तो ऐसी 'व्यवस्था' से करते कि फोन पाने वाले को यह आभास ही नहीं होता कि दीपक गुप्ता उन्हें अमेरिका से फोन कर रहे हैं ।
इस मामले ने दीपक गुप्ता के लिए एक अलग तरह की मुसीबत और खड़ी कर दी है । बच्चों के कारण दीपक गुप्ता को जिस तरह से जल्दी जल्दी अमेरिका जाने की जरूरत पड़ती है, उससे लोगों के बीच सवाल उठ रहा है कि ऐसे में दीपक गुप्ता रोटरी की जिम्मेदारियों को कैसे उठा/निभा पायेंगे ? कई लोग कहने भी लगे हैं कि दीपक गुप्ता को पहले अपने बच्चों की जिम्मेदारियों को पूरा कर लेना चाहिए, फिर उसके बाद रोटरी की जिम्मेदारियों के बारे में सोचना चाहिए । दीपक गुप्ता के नजदीकियों का भी कहना है कि दीपक गुप्ता ने अपने आप को जिस स्थिति में डाल लिया है, वहाँ वह किसी के साथ भी न्याय नहीं कर पायेंगे - न अपने बच्चों के साथ, और न रोटरी के साथ । उनके नजदीकियों को तथा दूसरे लोगों को भी आशंका है कि कभी वह रोटरी के कारण अपने बच्चों की जिम्मेदारियों को निभाने से चूकेंगे, तो कभी अपने बच्चों की जिम्मेदारियों के कारण रोटरी का काम करने से पिछड़ेंगे । दीपक गुप्ता के साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों की तरफ से कहा/सुना जा रहा है कि दीपक गुप्ता को अभी चार-छह वर्ष रोटरी की राजनीति से तथा 'व्यवस्था' से दूर रहना चाहिए तथा अपना सारा ध्यान अपने बच्चों की जिम्मेदारियों पर देना चाहिए । उनकी उम्मीदवारी के समर्थकों का तो कहना यह भी है कि बच्चों की जिम्मेदारी निभाने के कारण जल्दी जल्दी अमेरिका जाने से दीपक गुप्ता के चुनाव अभियान में बाधा भी पड़ती रही है, तथा उनका अभियान मजाक व फजीहत का शिकार भी होता रहा है । ऐसे में डिस्ट्रिक्ट के लोगों को भी लग रहा है कि पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाने में व्यस्त दीपक गुप्ता को कुछेक वर्ष रोटरी से दूर ही रहना/रखना चाहिए । इस तरह की बातों से दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच जो नकारात्मक भाव बनता दिख रहा है, उससे दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए संकट और गहराता नजर आ रहा है ।

Monday, November 21, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में विनोद बंसल से निपटने की तैयारी में संजय खन्ना के साथ राजनीतिक गठजोड़ बनाने की सुशील खुराना की कोशिश कामयाब होगी क्या ?

नई दिल्ली । सुशील खुराना ने संजय खन्ना को आगे करके विनोद बंसल का 'शिकार' करने की जो योजना बनाई है, उसने दीपक तलवार को भड़काने के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट के राजनीतिक समीकरणों में भी हलचल सी पैदा कर दी है - जिसका असर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव पर भी पड़ने का अनुमान लगाया जा रहा है । दरअसल सुशील खुराना के सामने सीओएल पद के लिए विनोद बंसल से मुकाबला करने की जो चुनौती है, उससे निपटने के लिए वह अगले रोटरी वर्ष में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के इस वर्ष होने वाले चुनाव में संजय खन्ना को उम्मीदवार बनाने/बनवाने की योजना बना रहे हैं । सुशील खुराना को लगता है कि वह यदि संजय खन्ना को उक्त नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता के लिए उम्मीदवार बनने को राजी कर लेते हैं, तो संजय खन्ना सहित उनके नजदीकी चार-पाँच पूर्व गवर्नर्स का समर्थन सीओएल के लिए उन्हें मिल जाएगा - और तब वह आसानी से विनोद बंसल को ढहा लेंगे । सुशील खुराना की इस योजना की भनक दीपक तलवार को मिली, तो वह बुरी तरह भड़क उठे हैं । दरअसल दीपक तलवार खुद उक्त नोमीनेटिंग कमेटी में जाने की तैयारी कर रहे हैं, जिसके लिए उनका मुकाबला मंजीत साहनी से होने की चर्चा सुनी जा रही है । मजे की बात यह हुई है कि दीपक तलवार 'अपनी' तैयारी में सुशील खुराना से मदद मिलने की उम्मीद कर रहे थे - सिर्फ उम्मीद ही नहीं कर रहे थे, बल्कि अपने सबसे भरोसे के सहयोगी के रूप में सुशील खुराना को देख रहे थे; लेकिन उन्हें पता चला है कि सुशील खुराना तो उनके लिए शेक्सपियर के विश्वप्रसिद्ध नाटक 'जूलियस सीजर' के पात्र ब्रूटस वाली भूमिका निभा रहे हैं । नाटक में अचानक से और विश्वास तोड़ते से ब्रूटस से मिले धोखे को लेकर जैसे जूलियस सीजर भौंचक था; सुशील खुराना की योजना के बारे में जानकर लगभग वैसी ही दशा दीपक तलवार की हुई है ।
सुशील खुराना की मुसीबत वास्तव में दोहरी है - सीओएल के लिए एक तरफ तो उन्हें विनोद बंसल से मुकाबला करना है; दूसरी तरफ उनका नाम दीपक तलवार के साथ ऐसे चिपका हुआ है कि दीपक तलवार की बदनामी का ठीकरा उनके सिर पर भी फूटता है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट में दीपक तलवार की इस बात के लिए बड़ी बदनामी है कि उन्हें करना-धरना तो कुछ होता नहीं है, प्रत्येक पद लेकिन उन्हें जरूर चाहिए होता है । दीपक तलवार को सुशील खुराना के साथ जोड़ी के रूप में भी देखा जाता है, इसलिए डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच यह धारणा भी बनी है कि सभी पदों पर यह दोनों ही काबिज़ होना चाहते हैं । इस बदनामी - और इस बदनामी के चक्कर में होने वाले नुकसान से बचने लिए सुशील खुराना ने दीपक तलवार से पीछा छुड़ाने की योजना बनाई, और अपनी इस योजना को क्रियान्वित करने के लिए उन्होंने संजय खन्ना का सहारा लिया । उनके नजदीकियों का कहना है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए संजय खन्ना को आगे करके सुशील खुराना एक तीर से दो शिकार करने की ताक में हैं : संजय खन्ना के साथ 'जुड़' कर एक तरफ तो वह दीपक तलवार के साथ बनी अपनी जोड़ी की धारणा को तोड़ेंगे और इस तरह दीपक तलवार की बदनामी के कारण होने वाले नुकसान से बचने का इंतजाम करेंगे, और दूसरी तरफ अपने सीओएल के चुनाव में संजय खन्ना तथा उनके नजदीकी पूर्व गवर्नर्स के समर्थन को पक्का करने का काम करेंगे ।
सुशील खुराना को लगता है कि काउंसिल ऑफ गवर्नर्स में विनोद बंसल को यूँ तो ज्यादा लोगों का समर्थन नहीं मिल पायेगा, लेकिन सुशील गुप्ता तथा सुदर्शन अग्रवाल जैसे बड़े नेताओं पर विनोद बंसल ने जो जादू-सा किया हुआ है - उसके चलते यह दोनों कहीं विनोद बंसल की खुली वकालत कर बैठे, तो फिर विनोद बंसल के लिए समर्थन जुटने में मुश्किल नहीं होगी । यह मुश्किल इसलिए भी नहीं होगी, क्योंकि काउंसिल ऑफ गवर्नर्स में खुद सुशील खुराना के लिए भी कोई खास समर्थन या उत्साह नहीं है । डिस्ट्रिक्ट के महत्त्वपूर्ण पदों को सुशील खुराना ने जिस तरह से कब्जाया हुआ है, उसके कारण पूर्व गवर्नर्स के बीच उन्हें लेकर विरोध का भाव जरूर है । दूसरे लोगों का भी मानना और कहना है कि काउंसिल ऑफ गवर्नर्स में हालाँकि दोनों की स्थिति एक जैसी ही है - दोनों के लिए ही ज्यादा समर्थन व उत्साह नहीं है; किंतु सुशील गुप्ता व सुदर्शन अग्रवाल के कारण विनोद बंसल का पलड़ा भारी हो जाता है । हालाँकि सारा मामला इस पर निर्भर करेगा कि सुशील गुप्ता और सुदर्शन अग्रवाल मामले में कोई पहल करते हैं या नहीं । इनको पहल करने से रोकने के लिए और या इनकी पहल से उत्पन्न वाली स्थिति का मुकाबला करने के लिए सुशील खुराना को एक मजबूत 'वकील' की जरूरत है ।
सुशील खुराना के नजदीकियों का कहना है कि उन्हें संजय खन्ना में वह वकील 'दिखाई' देता है । दरअसल रोटरी इंटरनेशनल की तरफ से संजय खन्ना को जिस तरफ से डिस्ट्रिक्ट 3100 का मामला सुलझाने की जिम्मेदारी मिली है, और जिस तरह से उन्हें डिस्ट्रिक्ट 3250 की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में रोटरी इंटरनेशनल के प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित होने का मौका मिला है - उससे रोटरी में और डिस्ट्रिक्ट में उनका कद बढ़ा है । उनके इस बढ़े कद का फायदा सुशील खुराना अपनी उम्मीदवारी के लिए उठाना चाहते हैं । सुशील खुराना को लगता है कि वह यदि संजय खन्ना को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए उम्मीदवार बनने को राजी कर लेते हैं, तो काउंसिल ऑफ गवर्नर्स में सत्ता समीकरण पूरी तरह बदल जायेंगे - जिसमें सीओएल के लिए उनकी दाल आसानी से गल जाएगी । सुशील खुराना के नजदीकियों ने बताया है कि उम्मीदवार बनने के सुशील खुराना के ऑफर को संजय खन्ना ने अभी स्वीकार तो नहीं किया है, लेकिन चूँकि स्पष्ट रूप से ठुकराया भी नहीं है - इसलिए सुशील खुराना को विश्वास है कि वह संजय खन्ना को उम्मीदवारी के लिए अंततः राजी कर लेंगे । समझा जाता है कि रोटरी के कई कामों में अपनी संलग्नता व व्यस्तता के कारण संजय खन्ना अभी उम्मीदवार बनने को लेकर थोड़ा हिचक रहे हैं, और यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि सभी कामों के लिए वह समय निकाल भी पायेंगे या नहीं । संजय खन्ना के साथ सुशील खुराना के बनते दिख रहे राजनीतिक गठजोड़ ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में रवि दयाल के समर्थकों को भी उत्साहित किया है; उन्हें लगता है कि सुशील खुराना व संजय खन्ना के बीच यदि सचमुच राजनीतिक गठजोड़ बन जाता है, तो डिस्ट्रिक्ट में जो समीकरण बनेगा - वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत रवि दयाल की उम्मीदवारी को भी मदद पहुँचायेगा ।

Saturday, November 19, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू में मुकेश गोयल को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का उम्मीदवार बनाने की आड़ में चौधराहट दिखाने की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय गर्ग की कोशिश में इंदरजीत सिंह ने अड़ंगा डाला

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय गर्ग ने यशपाल अरोड़ा के सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी से पीछे हटते ही जिस फुर्ती के साथ उनकी जगह मुकेश गोयल को उम्मीदवार के रूप में प्रोजेक्ट करना शुरू कर दिया है, उस पर फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इंदरजीत सिंह द्धारा अपनी नाराजगी दिखाए जाने के कारण सत्ता खेमे में मुकेश गोयल की उम्मीदवारी को लेकर असमंजस पैदा हो गया है । सत्ता खेमे के एक बड़े नेता ने इन पंक्तियों के लेखक को बताया कि इंदरजीत सिंह की तरफ से कहा गया है कि मुकेश गोयल की उम्मीदवारी को लेकर लोगों के बीच जो सवाल उठ रहे हैं, उन पर विचार किए बिना उन्हें उम्मीदवार बनाए जाने से लोगों के बीच गलत संदेश जायेगा और उसका नुकसान उठाना पड़ सकता है । इंदरजीत सिंह चाहते हैं कि मुकेश गोयल की उम्मीदवारी को लेकर उठने वाले सवालों पर खुले मन से विचार-विमर्श करके तथा संभावित लाभ-हानी का आकलन करके ही मुकेश गोयल की उम्मीदवारी को प्रोजेक्ट करने का काम शुरू किया जाए । इंदरजीत सिंह के इस रवैये से सत्ता खेमे के लोगों में ही मुकेश गोयल की उम्मीदवारी को लेकर असमंजसता पैदा हो गई है । सत्ता खेमे के ही कुछेक लोगों का कहना हालाँकि यह भी है कि इंदरजीत सिंह दरअसल अपनी इंपोर्टेंस दिखाने/जताने के लिए यह नाटक कर रहे हैं, और सभी जल्दी ही देखेंगे कि उनके हाथ में भी मुकेश गोयल की उम्मीदवारी का झंडा होगा । इंदरजीत सिंह के नजदीकियों का कहना है कि वास्तव में मुकेश गोयल की उम्मीदवारी को लेकर इंदरजीत सिंह को कोई समस्या या शिकायत नहीं है; उनका दुःख और विरोध सिर्फ इस बात को लेकर है कि उन्हें अलग-थलग रख कर विनय गर्ग ने अकेले ही मुकेश गोयल की उम्मीदवारी को प्रमोट करना शुरू कर दिया । विनय गर्ग की इस कार्रवाई में इंदरजीत सिंह को अपनी तौहीन लगी, जिसकी प्रतिक्रिया में उन्हें यह दिखाना/जताना जरूरी लगा कि विनय गर्ग उन्हें अलग-थलग करके अकेले ही कोई फैसला नहीं ले सकते हैं ।
इस कारण से इंदरजीत सिंह के अड़ंगा डालने के रवैये को मुकेश गोयल के लिए नहीं, बल्कि विनय गर्ग के लिए झटके के रूप में देखा जा रहा है । सत्ता खेमे के दूसरे कई लोगों का भी मानना/कहना है कि विनय गर्ग को अकेले ही मनमाने तरीके से मुकेश गोयल की उम्मीदवारी को हरी झंडी नहीं दे देनी चाहिए थी - और मुकेश गोयल की उम्मीदवारी को सत्ता खेमे के सामूहिक फैसले के रूप में ही 'दिखना' चाहिए था । विनय गर्ग ने मुकेश गोयल की उम्मीदवारी को घोषित करने में जो जल्दीबाजी व मनमानी की, उसके लिए दो कारणों को पहचाना गया है : ऐसा करके विनय गर्ग एक तो डिस्ट्रिक्ट में अपनी चौधराहट दिखाना चाहते थे, और दूसरे उन्हें 27 नवंबर को करनाल में होने वाली सेकेंड कैबिनेट मीटिंग के लिए 'मददगार' जुटाने की जल्दी थी । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मददगार के रूप में सबसे पहले उम्मीदवार को ही 'पकड़ता' है । अभी तक यशपाल अरोड़ा ने विनय गर्ग के मददगार की भूमिका निभाई हुई थी, किंतु अचानक से स्वास्थ्य बिगड़ जाने से उनके उम्मीदवारी छोड़ देने से विनय गर्ग के सामने एक अदद मददगार की जरूरत आन पड़ी । लिहाजा जैसे ही मुकेश गोयल ने मददगार 'बनने' का ऑफर दिया, विनय गर्ग ने आव देखा न ताव - फौरन से मुकेश गोयल की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया । जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि विनय गर्ग के इस रवैये में इंदरजीत सिंह को अपनी तौहीन दिखी, फलस्वरूप उन्होंने इसमें अड़ंगा डाल दिया ।
इंदरजीत सिंह को अड़ंगा डालने का मौका भी आसानी से मिल गया । मुकेश गोयल की उम्मीदवारी को लेकर मुख्यतः दो आपत्तियाँ चर्चा में रहीं - गंभीर आपत्ति यह रही कि उम्मीदवार बनने के लिए उन्होंने हरियाणा के क्लब से दिल्ली के क्लब में ट्रांसफर लिया है, और इस तरह डिस्ट्रिक्ट में बने हरियाणा व दिल्ली के बीच बारी बारी से गवर्नर बनने के फार्मूले के साथ उन्होंने धोखा किया । मुकेश गोयल की तरफ से जो तथ्य दिए/बताए गए, उन्होंने इस आरोप की धार को हालाँकि कुंद कर दिया है । बताया गया कि मुकेश गोयल करीब डेढ़ वर्ष पहले ही सोनीपत से दिल्ली आ गए थे, और सोनीपत की बजाए, दिल्ली में ज्यादा सक्रिय थे । दिल्ली में उनकी सक्रियता के कारण ही वह लायंस ब्लड बैंक के ट्रेजरार बने/बनाए गए । दिल्ली में सक्रियता के कारण ही उन्होंने लायंस क्लब दिल्ली नॉर्थ एक्स में ट्रांसफर ले लिया था, और यह तभी ले लिया था जब यशपाल अरोड़ा ही उम्मीदवार थे । इन तथ्यों का हवाला देते हुए मुकेश गोयल की तरफ से कहा गया कि इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि उन्होंने उम्मीदवार बनने के लिए क्लब बदला है । दूसरी आपत्ति यह रही कि लायंस ब्लड बैंक के ट्रेजरार पद की जिम्मेदारी संभालते हुए वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की भी जिम्मेदारी कैसे सँभालेंगे ? इसका जबाव मुकेश गोयल के नजदीकियों की तरफ से आया; जिनका कहना रहा कि उन्होंने मुकेश गोयल की क्षमताओं को नजदीक से देखा/पहचाना है, और जानते हैं कि मुकेश गोयल ने अपना जीवन जिस तरह से सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित किया हुआ है - उसके कारण उनके लिए दोनों पदों की जिम्मेदारी सँभालना उनके लिए मुश्किल नहीं होगा । अन्य कई लोगों का यह भी कहना रहा कि मुकेश गोयल दोनों पदों को एक दूसरे के पूरक के रूप में इस्तेमाल करने की काबिलियत भी रखते हैं, और उनके गवर्नर होने से लायंस ब्लड बैंक का काम बढ़ेगा भी और व्यवस्थित भी होगा । इस तरह, मुकेश गोयल की उम्मीदवारी को लेकर जो दो प्रमुख आपत्तियाँ चर्चा में आईं - वह ज्यादा समय टिक तो नहीं पाईं; लेकिन विनय गर्ग को झटका देने के लिए इंदरजीत सिंह ने उनका बेहतर इस्तेमाल जरूर कर लिया ।
सत्ता खेमे के लोगों का भी मानना और कहना है कि इंदरजीत सिंह के रवैये से सत्ता खेमे में मुकेश गोयल की उम्मीदवारी को लेकर थोड़ा असमंजस जरूर पैदा हुआ है, लेकिन इस असमंजस को जल्दी ही दूर कर लिया जाएगा । सत्ता खेमे के लोगों का ही मानना और कहना है कि इंदरजीत सिंह के निशाने पर चूँकि मुकेश गोयल की उम्मीदवारी नहीं, बल्कि विनय गर्ग की चौधराहट है - और विनय गर्ग की तरफ से भी इंदरजीत सिंह के रवैये को लेकर कोई तीखी टिप्पणी नहीं आई है, इसलिए उम्मीद की जाती है कि मामले को जल्दी ही हल कर लिया जाएगा । दरअसल विनय गर्ग भी इस मामले को बढ़ाना/बढ़वाना नहीं चाहते हैं और वह इंदरजीत सिंह की इस बात को मानने के लिए राजी हैं कि मुकेश गोयल की उम्मीदवारी को लेकर जो सवाल हैं, उन पर सामूहिक रूप से बात कर ली जाए । असल में, विनय गर्ग मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की अपनी उम्मीदवारी के चक्कर में इंदरजीत सिंह से ज्यादा पंगा लेने की स्थिति में हैं भी नहीं, और वह खुशी खुशी इंदरजीत सिंह की बात को मान ही लेंगे । इससे सत्ता खेमे के लोगों के साथ-साथ मुकेश गोयल की उम्मीदवारी के समर्थकों को भी विश्वास हो चला है कि मुकेश गोयल की उम्मीदवारी पर छाए असमंजसता के बादल जल्दी ही छंट जायेंगे । लोगों का यह भी कहना है कि विनय गर्ग जल्दीबाजी न करते और चतुराई न दिखाते, तो मामला बिगड़ता भी नहीं ।

Thursday, November 17, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में जेके गौड़ इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता के सहारे रमेश अग्रवाल को सबक सिखाने का काम करेंगे क्या ?

नई दिल्ली । रमेश अग्रवाल के साथ समय बड़ा क्रूर मज़ाक कर रहा है - जिन जेके गौड़ को उन्होंने कभी भी पैर की जूती से ज्यादा तवज्जो नहीं दी, उन्हीं जेके गौड़ के कारण उनका राजनीतिक भविष्य चौपट होने की कगार पर आ पहुँचा है और जिसे बचाने के लिए उन्हें जेके गौड़ को मनाने/फुसलाने में 'लगना' पड़ रहा है । रमेश अग्रवाल अगले रोटरी वर्ष में रोटरी जोन 4 और 6ए में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के इस वर्ष होने वाले चुनाव में उम्मीदवार बनने की तैयारी कर रहे हैं; किंतु उनकी इस तैयारी को जेके गौड़ ने तगड़ा झटका दिया हुआ है । दरअसल जेके गौड़ ने भी उक्त नोमीनेटिंग कमेटी के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी दिखाई है । नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता का फैसला पहले काउंसिल ऑफ गवर्नर्स में होगा, जहाँ लेकिन जेके गौड़ के मुकाबले रमेश अग्रवाल की हालत बहुत ही पतली है । काउंसिल ऑफ गवर्नर्स के दस प्रभावी सदस्यों में रमेश अग्रवाल को कुल दो सदस्यों - शरत जैन और सुभाष जैन का ही समर्थन मिल सकता है । जाहिर तौर पर इससे तो उनकी दाल गलेगी नहीं । इसके बाद, रमेश अग्रवाल के पास सीधे चुनाव में जाने का विकल्प ही बचता है । रमेश अग्रवाल को लोगों के बीच अपनी स्थिति/हैसियत का अंदाजा है, इसलिए उक्त विकल्प अपनाने का दुस्साहस वह नहीं करेंगे । इस तरह का दुस्साहस करने का मजा वह पहले एक बार चख चुके हैं । पैतृक डिस्ट्रिक्ट 3010 में सीओएल के चक्कर में वह आशीष घोष से जा भिड़े थे और अपनी नाक कटवा बैठे थे । उनके नजदीकियों का कहना है कि उस तरह की शेख़ीबाजी में वह इस बार नहीं पड़ेंगे; और प्रयास सिर्फ यह करेंगे कि किसी तरह जेके गौड़ को फुसला/समझा कर वह रास्ते से हटा/हटवा दें ।
रमेश अग्रवाल के लिए इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी में जाना दरअसल रोटरी में अपने राजनीतिक भविष्य को बचाने/सँवारने के लिए बहुत ही जरूरी है । तमाम तिकड़मों व जुगाड़ों के बावजूद रमेश अग्रवाल डिस्ट्रिक्ट के ऊपर की रोटरी की व्यवस्था व राजनीति में अपनी जगह नहीं बना सके हैं । ले दे कर रोटरी विन्स में उन्हें 'मजदूरी' करने का मौका भर मिला हुआ है, जिसमें भी कुछ करते दिखने की तस्वीरें खिंचवाने के लिए उन्हें विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के गवर्नर्स की खुशामद और करना पड़ती हैं । अपने अपने डिस्ट्रिक्ट में बुलाने की ऐवज में गवर्नर्स उन्हें जिस तरह से खिजाते और अपमानित करते हैं, इसे सिर्फ वही जानते हैं । दूसरों ने तो इसे तब जाना, जब पिछले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट 3011 के तत्कालीन गवर्नर सुधीर मंगला ने कई लोगों के सामने उन्हें बुरी तरह फटकारा था । रमेश अग्रवाल के नजदीकी बताते हैं कि रोटरी विन्स का काम तो वह इस मजबूरी में कर रहे हैं, क्योंकि उनके पास और कोई असाइनमेंट ही नहीं है । ऐसे में, रमेश अग्रवाल को लगता है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता उनके सारे संकट दूर कर देगी और रोटरी में उनके 'भविष्य' को सुरक्षित कर देगी । उल्लेखनीय है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव एक बड़ा चुनाव होता है, और उसमें रोटरी के तमाम बड़े नेता इन्वॉल्व होते हैं । रमेश अग्रवाल को लगता है - और स्वाभाविक रूप से ठीक ही लगता है कि वह नोमीनेटिंग कमेटी में होंगे तो रोटरी के तमाम बड़े नेताओं के साथ असाइनमेंट के लिए सौदेबाजी कर सकेंगे; और इस तरह से रोटरी की ऊपर की 'व्यवस्था' में उनकी गाड़ी चल निकलेगी ।
रमेश अग्रवाल के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि जैसा वह सोच रहे हैं, ठीक वैसा ही जेके गौड़ भी सोच रहे हैं । जेके गौड़ रोटरी में कोई घास छीलने ही - या रमेश अग्रवाल की 'गुलामी' करने ही थोड़े ही आए हैं । उनका भी 'आगे बढ़ने' का मन होगा ही । यह जेके गौड़ की खुशकिस्मती है कि उन्हें एक ऐसा सुनहरा मौका मिला है, जिसमें कुछ किए बिना ही इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता खुद-ब-खुद उनकी जेब में आ रही है । जेके गौड़ डिस्ट्रिक्ट की राजनीतिक खेमेबाज़ी में हालाँकि अभी भी हैं तो उसी खेमे में, जिसे रमेश अग्रवाल के खेमे के रूप में देखा/पहचाना जाता है - लेकिन रमेश अग्रवाल के लिए वह रास्ता छोड़ेंगे, इसकी उम्मीद कम देखी जा रही है । वास्तव में इस स्थिति के लिए रमेश अग्रवाल खुद ही जिम्मेदार हैं । रमेश अग्रवाल ने जेके गौड़ को हर कदम पर इतना सताया और बार बार अपमानित किया है कि जेके गौड़ उनके लिए अपने हाथ में आए सुनहरे मौके को छोड़ने के लिए शायद ही तैयार होंगे । लोगों को लगता है कि जेके गौड़ को रोटरी की ऊपर की व्यवस्था व राजनीति में बड़ी भूमिका ही पाने का मौका नहीं मिला है, बल्कि रमेश अग्रवाल से मिले अपमान का बदला लेने का अवसर भी मिला है । यूँ तो रमेश अग्रवाल राजनीतिक हैसियत और चतुराई के मामले में जेके गौड़ को अपने सामने कुछ नहीं समझते, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें जेके गौड़ के सामने मजबूर व असहाय बना दिया है ।
रमेश अग्रवाल ने हालाँकि अभी हिम्मत नहीं हारी है, और उनकी तरफ से तरह तरह से जेके गौड़ को पटाने/फुसलाने के प्रयास किए जा रहे हैं; तथा उनके साथ सौदेबाजी करने के 'मौके' खोजे/बनाए जा रहे हैं - लेकिन जेके गौड़ की तरफ से अभी पीछे हटने का संकेत उन्हें नहीं मिला है । जेके गौड़ के नजदीकियों का कहना है कि जेके गौड़ के मन में अभी रमेश अग्रवाल के प्रति जो नाराजगी है, उसे देखते हुए तो यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि वह रमेश अग्रवाल के लिए रास्ता छोड़ेंगे । उनका कहना है कि बात यदि सिर्फ एक पद पाने की होती, तो जेके गौड़ से उम्मीद की जा सकती थी कि  वह रमेश अग्रवाल की राह का रोड़ा न बनते; किंतु जेके गौड़ के सामने चूँकि रमेश अग्रवाल से बदला लेने और उन्हें सबक सिखाने का मौका है - इसलिए उम्मीद नहीं है कि जेके गौड़ मौका छोड़ेंगे । जेके गौड़ चूँकि यह भी अच्छे से जानते/समझते हैं कि रमेश अग्रवाल का स्वभाव कुत्ते की उस दुम की तरह है जिसे सीधा करने का चाहें जितना प्रयास करो, वह सीधी नहीं होती है; पटाने/फुसलाने की कोशिशों तथा सौदेबाजी के चक्कर में वह यदि रमेश अग्रवाल के लिए मौका यदि छोड़ भी देते हैं, तो भी रमेश अग्रवाल आगे उन्हें अपमानित करने की हरकतों से बाज नहीं आयेंगे - लिहाजा जेके गौड़ उन्हें सबक सिखाना ही चाहेंगे । तमाम प्रतिकूल स्थितियों के बावजूद रमेश अग्रवाल चूँकि अभी भी जेके गौड़ को रास्ते से हटाने की मुहिम में लगे हुए हैं, इसलिए देखना दिलचस्प होगा कि जेके गौड़ उनकी मुहिम में फँसने से अपने आपको बचा पाते हैं या नहीं ?