Saturday, October 21, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के सेक्रेटरी वी सागर के सख्त दिशा-निर्देशों ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ और उनके 'लुटेरे गिरोह' के सदस्यों की मनमानियों पर रोक लगाने के साथ उनकी मुसीबतें भी बढ़ाई

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग दिल्ली में ही करने को लेकर जो कोड़ा फटकारा है, तो रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ और उनके संगी-साथी मीटिंग से बचने/भागने के लिए बहाने खोजने लगे हैं । बहाने खोजने में पूर्व चेयरमैन दीपक गर्ग ने जिस बेशर्मी का परिचय दिया, उसे देख कर बेशर्मी को भी शर्म आ गई होगी - दीपक गर्ग ने ऑडिट-सीजन का वास्ता देते हुए रीजनल काउंसिल की मीटिंग को स्थगित कर देने का सुझाव दिया है । मजे की बात है कि मीटिंग का समय तो उन्हीं लोगों ने तय किया है, समय तय करते हुए उन्हें ऑडिट-सीजन का ध्यान नहीं आया । ऑडिट-सीजन का ध्यान पिछले दस दिनों में उन्हें तब भी नहीं आया, जब रीजनल काउंसिल की मीटिंग लुधियाना में करने की तैयारी की जा रही थी । लुधियाना की बजाये दिल्ली में मीटिंग करने की बात आते ही दीपक गर्ग को ऑडिट-सीजन का ध्यान आ गया । दीपक गर्ग के बाद रीजनल काउंसिल के लुटेरे गिरोह के दूसरे सदस्यों ने भी जिस तरह से ऑडिट-सीजन का रोना शुरू किया है, उससे लग रहा है कि राकेश मक्कड़ इसी को बहाना बना कर ऐन मौके पर मीटिंग को स्थगित कर देने के चक्कर में हैं । राकेश मक्कड़ और उनके लुटेरे गिरोह के दूसरे सदस्य हालाँकि इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में नॉमिनेटेड सदस्य विजय झालानी की उस धमकी से भी डरे हुए हैं, जिसमें कहा गया है कि रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों ने यदि नियमानुसार काम नहीं किया तो वह इंस्टीट्यूट में औपचारिक शिकायत दर्ज करवायेंगे ।
चेयरमैन राकेश मक्कड़ और उनके लुटेरे गिरोह के दूसरे सदस्यों को इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर के उस फैसले से भी तगड़ा झटका लगा है, जिसमें राजेश अग्रवाल की लगातार अनुपस्थिति का हवाला देते हुए रीजनल काउंसिल की सदस्यता को समाप्त करने के फैसले को निरस्त कर दिया गया है । उल्लेखनीय है कि रीजनल काउंसिल के कुल 13 सदस्यों में सात सदस्यों के खिलाफ हो जाने की स्थिति को बैलेंस करने के लिए राकेश मक्कड़ ने राजेश अग्रवाल की सदस्यता समाप्त करने की चाल चली । इसके लिए उन्हें इंस्टीट्यूट के एक नियम का सहारा भी मिल गया, जिसमें लंबे समय तक लगातार अनुपस्थित रहने वाले सदस्य की सदस्यता समाप्त करने का प्रावधान है । लेकिन इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर ने राजेश अग्रवाल की सदस्यता समाप्त करने के राकेश मक्कड़ के फैसले को मान्य नहीं किया । उनका तर्क है कि राजेश अग्रवाल जिस परिस्थिति में लगातार अनुपस्थित रहे, उस परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए वह संदर्भित नियम के दायरे में नहीं आते हैं । इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर ने राजेश अग्रवाल की सदस्यता के मुद्दे पर झटका देने के साथ-साथ ही रीजनल काउंसिल की मीटिंग दिल्ली में ही करने का फरमान जारी करके राकेश मक्कड़ और उनके लुटेरे गिरोह के सदस्यों की सारी योजना पर पानी फेरने का काम किया है । इसके बाद से ही राकेश मक्कड़ और उनके लुटेरे गिरोह के सदस्यों ने नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग से बचने और मीटिंग को स्थगित कर देने के बहाने खोजना शुरू कर दिया है ।
उल्लेखनीय है कि राकेश मक्कड़ और उनके लुटेरे गिरोह के सदस्यों ने पहले तो रीजनल काउंसिल के 13 में से सात सदस्यों द्वारा की गई मीटिंग बुलाने की मांग को अनसुना करने का प्रयास किया; चौतरफा दबाव पड़ने पर जब रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की माँग को अनसुना करना उनके लिए संभव नहीं रहा - तो उन्होंने मीटिंग दिल्ली में करने की बजाये लुधियाना में करने के जरिये अपने को बचाने की रणनीति बनाई । इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर ने लेकिन राकेश मक्कड़ और उनके गिरोह के सदस्यों की लगातार जारी 'हरकतों' से तंग आकर जो सख्त रवैया अपनाया - उसके चलते राकेश मक्कड़ और उनके लुटेरे गिरोह के सदस्यों ने अपने आप को चारों तरफ से घिरा पाया है । उन्होंने जान/समझ लिया है कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा की सरपरस्ती भी अब उन्हें नहीं बचा पा रही है । कई लोगों को तो लगता है कि राकेश मक्कड़ और उनके संगी-साथियों की लगातार जो फजीहत और बदनामी हो रही है, उसके असली जिम्मेदार राजेश शर्मा ही हैं । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की घटनाओं पर नजर रखने वाले लोगों का कहना है कि राकेश मक्कड़ और उनके साथी मीटिंग को स्थगित करने के लिए जो चालबाजियाँ कर रहे हैं, उससे उनकी मुश्किलें और बढ़ेंगी ही । राजेश शर्मा की सलाहानुसार, राकेश मक्कड़ और उनके लुटेरे गिरोह के सदस्यों ने पिछले दिनों में अपने को बचाने के लिए जो भी हथकंडे आजमाये हैं, वह सभी न सिर्फ फेल हुए हैं - बल्कि उनकी परेशानियों को बढ़ाने और उनकी बदनामी करवाने वाले ही साबित हुए हैं । इसी से लगता है कि राकेश मक्कड़ 23 अक्टूबर की घोषित मीटिंग चाहें कर लें, या चाहें स्थगित कर दें - आगे का रास्ता उनके लिए मुसीबत और फजीहत भरा ही है ।

Friday, October 20, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री की चुनावी राजनीति में सीमेंट की एजेंसी दिलवाने की बात को मुद्दा बना कर सुरेश बिंदल क्या सचमुच संकरन जयरमन की उम्मीदवारी को केएल खट्टर का समर्थन दिलवा सकेंगे ?

नई दिल्ली । फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी के मामले में विपिन शर्मा को पीछे हटता देख सुरेश बिंदल ने संकरन जयरमन की उम्मीदवारी को हवा दी है, और दावा करना शुरू किया है कि केएल खट्टर अपना और हरियाणा के दूसरे पूर्व गवर्नर्स का समर्थन संकरन जयरमन को दिलवायेंगे । सुरेश बिंदल के दावे के अनुसार तो उनकी केएल खट्टर से इस बारे में बात भी हो गई है, और उनसे आश्वासन मिलने के बाद ही वह जयरमन की उम्मीदवारी को लेकर आगे बढ़े हैं । अपने दावे को विश्वसनीय बनाने/दिखाने के लिए सुरेश बिंदल ने तर्क भी जोरदार दिया है और वह यह कि केएल खट्टर को जेके सीमेंट की एजेंसी जयरमन के कारण ही मिली है, इसलिए केएल खट्टर उस अहसान का बदला चुकाने के लिए क्या इतना भी नहीं करेंगे ? सुरेश बिंदल का दावा भले ही है, लेकिन केएल खट्टर के लिए सीमेंट की एजेंसी मिलने के अहसान के ऐवज में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए जयरमन की उम्मीदवारी का सचमुच समर्थन करना और दूसरे नेताओं से भी समर्थन दिलवाना आसान नहीं होगा ।
दरअसल केएल खट्टर के लिए प्राथमिकता सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हरियाणा से 'अपना' उम्मीदवार तय करने - और उसे जितवाने की है । हरियाणा में लोगों के बीच की चर्चाओं के अनुसार, केएल खट्टर की पसंद तो सुरेश जिंदल हैं - लेकिन वहाँ 'दम' पुनीत बंसल में नजर आ रहा है । ऐसे में, केएल खट्टर के सामने दिल्ली के ऐसे उम्मीदवार का समर्थन करने की मजबूरी आएगी, जिसके समर्थक नेता सुरेश जिंदल को 'जितवा' सकते हों । सुरेश बिंदल पर तो केएल खट्टर को भरोसा नहीं है; उन्हें दूर दूर तक यह उम्मीद नहीं है कि सुरेश जिंदल दिल्ली में सुरेश जिंदल को इतना समर्थन दिलवा सकेंगे कि सुरेश जिंदल की चुनावी नैय्या पार हो जाए । केएल खट्टर को इस बारे में यदि जरा सी भी उम्मीद होती तो सुरेश बिंदल के साथ उनका 'समझौता' हो गया होता और सुरेश बिंदल को अकेले ही दावा नहीं करना पड़ता । जयरमन की उम्मीदवारी के संदर्भ में सुरेश जिंदल के दावे पर चूँकि केएल खट्टर ने ही चुप्पी साधी हुई है, इसलिए उनका दावा लोगों के बीच संदेहास्पद ही बना हुआ है ।
सुरेश बिंदल के लिए मुसीबत की बात यह बनी हुई है कि विपिन शर्मा ने अपनी उम्मीदवारी को अभी पूरी तरह से वापस नहीं लिया है, और वह पुनर्वापसी के मौके की तलाश में हैं । उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों रामलीला के एक आयोजन में पूर्व गवर्नर्स के सम्मान का जो एक कार्यक्रम उन्होंने रखा था, उसके फ्लॉप होने पर विपिन शर्मा को यह बात तो अच्छे से समझ में आ गई थी कि सुरेश बिंदल के भरोसे तो वह गवर्नर नहीं बन सकेंगे - और इसीलिए उन्होंने अपनी उम्मीदवारी से पीछे हटने के संकेत दे दिए थे । डिस्ट्रिक्ट के चुनावी महाभारत में पाँच पाँडवों वाली भूमिका निभा रहे डीके अग्रवाल, दीपक तलवार, अजय बुद्धराज, अरुण पुरी और दीपक टुटेजा ने उक्त कार्यक्रम का बहिष्कार करके यह स्पष्ट संकेत दे दिया था कि सुरेश बिंदल के उम्मीदवार के रूप में विपिन शर्मा को वह कतई कोई तवज्जो नहीं देंगे । विपिन शर्मा ने भी उनके इस संकेत को 'सम्मान' देते हुए 'जता' दिया कि उनसे तवज्जो नहीं मिलने की सूरत में वह भी उम्मीदवार नहीं बनेंगे । विपिन शर्मा के नजदीकियों का कहना है कि उनके इस 'रिएक्शन' को पाँडवों वाली टीम ने सकारात्मक तरीके से लिया है, और उनकी तरफ से विपिन शर्मा को संदेश भिजवाया गया है कि उन्हें विपिन शर्मा से कोई समस्या नहीं है । इस बात से विपिन शर्मा को उम्मीद बनी है कि वह यदि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में पाँडवों वाली टीम का समर्थन जुटा लें, तो फिर सुरेश बिंदल को भी अपनी उम्मीदवारी के लिए राजी कर ही लेंगे ।
पाँडवों वाली टीम का समर्थन जुटाने के लिए आरके शाह और राजीव अग्रवाल भी प्रयास कर रहे हैं । पूर्व गवर्नर राजिंदर बंसल के 'आदमी' के रूप में देखे/पहचाने जाने के कारण आरके शाह दिल्ली और हरियाणा के नेताओं के बीच फुटबॉल बने हुए हैं - दिल्ली के नेता उनसे कह रहे हैं कि पहले राजिंदर बंसल के जरिए हरियाणा के नेताओं का समर्थन घोषित करवाओ, उधर हरियाणा के नेता कह रहे हैं कि पहले दिल्ली में तो अपने लिए समर्थन घोषित करवाओ । नेताओं के इस रवैये से तंग आकर ही आरके शाह ने घोषित कर दिया है कि उन्हें चाहें किसी का भी समर्थन न मिले, वह तो उम्मीदवार बनेंगे ही । चुनावी नजरिये से सबसे अनुकूल स्थिति राजीव अग्रवाल की समझी जा रही है, हालाँकि इस अनुकूल स्थिति में भी उनके लिए आश्वस्त और सुरक्षित होने वाला मौका अभी नहीं बन सका है - और उनकी अनुकूल स्थिति पर तलवार लगातार लटकी हुई भी है । दरअसल तमाम अनुकूल स्थिति के बावजूद राजीव अग्रवाल अपना कोई 'वकील' तैयार नहीं कर सके हैं, जो नेताओं के बीच उनकी उम्मीदवारी की जोरशोर से वकालत करे । स्थितियाँ फिलहाल राजीव अग्रवाल के अनुकूल हैं, लेकिन बनते/बिगड़ते समीकरणों के बीच कौन जानता है कि स्थितियाँ कब पलटी मार जाएँ ? राजीव अग्रवाल के लिए तो मुसीबत व चुनौती की बात यह हुई है कि उनके 'क्षेत्र' से ही दो दो और उम्मीदवार मैदान में हैं, जो दिख भले ही कमजोर रहे हों - लेकिन चुनावी समीकरणों को बनाने/बिगाड़ने का काम तो कर ही सकते हैं ।

Monday, October 16, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में अनूप मित्तल के हाथों पोपट बनने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी ने पूर्व गवर्नर दीपक तलवार को कोसा तथा विनोद बंसल को जिम्मेदार ठहराया

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी ने अनूप मित्तल को रोटरी से बाहर करने के लिए उनके क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली प्राइड को बंद करवाने के लिए चार महीने जो मेहनत की, अनूप मित्तल ने उनकी उस मेहनत पर चार दिन में पानी फेर दिया है । अनूप मित्तल ने रोटरी क्लब दिल्ली चाणक्यपुरी जैसे डिस्ट्रिक्ट के प्रतिष्ठित क्लब में प्रवेश लेकर न सिर्फ रवि चौधरी की सारी योजना को ध्वस्त कर दिया, बल्कि यह भी दिखा/जता दिया कि रवि चौधरी के विरोध के बावजूद डिस्ट्रिक्ट के बड़े और प्रतिष्ठित क्लब्स में उनके लिए जोरदार समर्थन है । मजे की बात यह रही कि रवि चौधरी और उनके 'कमांडर-इन-चीफ' की पदवी सँभाले बैठे अशोक कंटूर ने उन क्लब्स को कड़ी निगरानी में रखा हुआ था, जिनमें अनूप मित्तल के जाने की आशंका या संभावना थी - और उनके प्रेसीडेंट्स तथा अन्य पदाधिकारियों व प्रमुख लोगों पर इस बात के लिए दबाव बनाया हुआ था कि अनूप मित्तल को अपने क्लब में प्रवेश नहीं देंगे । रवि चौधरी और अशोक कंटूर ने अनूप मित्तल के प्रवेश को रोकने के लिए कई क्लब्स में बाड़ लगाई हुई थी, उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि अनूप मित्तल का चाणक्यपुरी जैसे प्रतिष्ठित क्लब में इंडक्शन हो जाएगा ।
पिछले करीब पंद्रह दिनों की घटनाओं को देखें तो समझ सकते हैं कि अनूप मित्तल ने डिस्ट्रिक्ट के कई क्लब्स के साथ मिल कर रवि चौधरी और अशोक कंटूर का पोपट बना दिया । कई क्लब्स के पदाधिकारियों की तरफ से रवि चौधरी को 'लीक' मिलीं कि अनूप मित्तल अपने साथियों के साथ उनका क्लब ज्वाइन करने की तैयारी कर रहे हैं - जिसके बाद अशोक कंटूर को साथ ले जा कर रवि चौधरी वहाँ 'छापेमारी' करते और  अपनी पीठ थपथपाते कि यहाँ से तो उन्होंने अनूप मित्तल का पत्ता साफ कर दिया है । उनके लिए फजीहत की बात यह भी रही कि अपनी इस वीरता की कहानी वह लोगों को सुनाते, तो कई बार उन्हें लोगों से सुनना पड़ता कि इस तरह की हरकतों से वह क्लब्स की कार्रवाईयों में गैरजरूरी हस्तक्षेप कर रहे हैं, और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की गरिमा को नीचे गिरा रहे हैं । इस बात को लेकर कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने भी रवि चौधरी को समझाया/हड़काया - हालाँकि गवर्नरी के नशे में धुत रवि चौधरी पर इसका असर नहीं हुआ । उनका नशा 'उतारने' का काम अनूप मित्तल ने ही किया । अनूप मित्तल ने कई क्लब्स के पदाधिकारियों के साथ मिल कर रवि चौधरी को दूसरी जगहों पर उलझाए रखा, और चुपचाप तरीके से चाणक्यपुरी में अपने और अपने साथियों के इंडक्शन की कार्रवाई को पूरा किया/करवाया - जिसकी भनक तक रवि चौधरी और उनके 'कमांडर' अशोक कंटूर को नहीं लगी ।
अनूप मित्तल की रणनीति के चलते रवि चौधरी का जो पोपट बना, रवि चौधरी उसके लिए अब पूर्व गवर्नर विनोद बंसल और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट विनय भाटिया को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं । रवि चौधरी का कहना है कि विनोद बंसल ने पहले तो उन्हें अनूप मित्तल के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए प्रोत्साहित किया, लेकिन बाद में फिर वह पीछे हट गए और उन्हें अकेला छोड़ दिया । रवि चौधरी को शक है कि रोटरी क्लब दिल्ली चाणक्यपुरी की सदस्यता के लिए अनूप मित्तल और उनके साथियों ने जिस तरह की गुपचुप तैयारी की, उसकी जानकारी विनोद बंसल को तो निश्चित रूप से होगी ही - और विनोद बंसल के जरिए विनय भाटिया को भी उक्त जानकारी पक्के तौर पर होगी; लेकिन दोनों ने ही उन्हें धोखा दिया ।
रवि चौधरी ने अनूप मित्तल के क्लब को बंद करवाने के लिए पहले तो केस को मजबूत 'बनाया', और फिर मामले को लोगों के बीच प्रचारित करने में गैरजरूरी दिलचस्पी दिखाई । रोटरी में क्लब बंद होने तथा उनके चार्टर वापस होने की घटना कोई ऐसी 'घटना' नहीं है, जिसे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के लिए डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच प्रचारित करने की कोई जरूरत हो । इससे पहले क्या क्लब बंद नहीं हुए हैं ? इससे पहले किस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों को किसी क्लब के बंद होने की सूचना - और वह भी दो दो बार दी है ? वास्तव में यह एक सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई होती है, जो संबंधित पदाधिकारियों तक ही सीमित होती है । किंतु रवि चौधरी ने रोटरी क्लब दिल्ली प्राइड के बंद होने की बात को जिस तरह से प्रचारित किया, उससे यही साबित हुआ है कि इस मामले में उनकी दिलचस्पी उनकी बदनीयतभरी छोटी सोच का नतीजा है । रवि चौधरी के लिए बदकिस्मती की बात यह हुई है कि उन्होंने जाल बिछाया तो था अनूप मित्तल को फाँसने के लिए, लेकिन उस जाल में वह फँस खुद गए ।
रवि चौधरी की चार महीनों से चली आ रही हरकतों का उद्देश्य तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव से अनूप मित्तल की उम्मीदवारी को हटाने का था, लेकिन रवि चौधरी की हरकतों ने काम किया अनूप मित्तल की उम्मीदवारी को मजबूत करने का । दरअसल एक तरफ तो रवि चौधरी की हरकतों के चलते डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच अनूप मित्तल के प्रति सहानुभूति पैदा हुई है; और दूसरी तरफ अनूप मित्तल ने जिस रणनीति से रवि चौधरी की योजना को फेल किया - उससे उन्होंने एक कुशल रणनीतिकार व एक प्रभावी लीडर होने का सुबूत दिया और इसके चलते डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच उनकी स्वीकार्यता में वृद्धि हुई । अनूप मित्तल की इस दोहरी उपलब्धि पर रवि चौधरी बुरी तरह बौखला गए हैं, और बौखलाहट में वह पूर्व गवर्नर दीपक तलवार को भी कोसने लगे हैं । उनकी बौखलाहट को देख कर डिस्ट्रिक्ट में लोगों को लग रहा है कि रवि चौधरी अभी चुप नहीं बैठेंगे और अनूप मित्तल के खिलाफ वह अवश्य ही कोई और षड्यंत्र रचेंगे - इसलिए उम्मीद की जा रही है कि रवि चौधरी का अभी और घटियापन देखने को मिलेगा ।

Sunday, October 15, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने के लिए मजबूर हुए चेयरमैन राकेश मक्कड़ ने लुधियाना में मीटिंग रख कर सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के सामने चुनौती खड़ी की और उन पर तंज कसा

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ ने एक फैसला करने में दिखाए अपने व्यवहार से 'प्याज भी खाए और जूते भी खाए' वाली मशहूर कहावत को चरितार्थ किया है । उल्लेखनीय है कि रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाए जाने की माँग पर पहले तो उन्होंने चुप्पी साधे रखी, लेकिन जब चारों तरफ से इस चुप्पी को लेकर उन पर 'जूते' पड़े तब फिर वह मीटिंग बुलाने के रूप में 'प्याज' खाने को तैयार हो गए । इस तैयारी में भी राकेश मक्कड़ ने एक अन्य मशहूर कहावत को चरितार्थ किया - 'चोर चोरी से जाए, पर हेराफेरी से न जाए ।' रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने को लेकर मजबूर हुए राकेश मक्कड़ ने यह मीटिंग दिल्ली में करने की बजाए लुधियाना में करने का फैसला लिया है । मजे की बात यह भी है कि पैसों की कमी का वास्ता देकर राकेश मक्कड़ ने अभी हाल ही में लायब्रेरीज बंद करने का फैसला किया था, लेकिन लुधियाना में रीजनल काउंसिल की मीटिंग करने में लाखों रूपया बहाने में उनके सामने कोई समस्या नहीं है । रीजनल काउंसिल के 13 में से 7 सदस्यों को इस पर ऐतराज है, लेकिन नियमों का हवाला देते हुए राकेश मक्कड़ लुधियाना में रीजनल काउंसिल की मीटिंग करने के अपने फैसले को सही ठहरा रहे हैं । राकेश मक्कड़ को इस नियम का तो पता है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की एक मीटिंग दिल्ली से बाहर की जा सकती है, लेकिन नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल को लोकतांत्रिक, पारदर्शी और ईमानदार तरीके से चलाए जाने के नियमों को लेकर चेयरमैन के रूप में उन्होंने अपनी आँखें बंद की हुई हैं ।
चेयरमैन के रूप में राकेश मक्कड़ रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की काउंसिल सदस्यों के बहुमत की माँग पर पहले तो चुप्पी साधे रहे, लेकिन चारों तरफ से दबाव पड़ने के कारण अब जब वह मीटिंग बुलाने के लिए मजबूर हुए हैं - तब वह बहुमत सदस्यों की दिल्ली में मीटिंग बुलाने की माँग को अनसुना कर रहे हैं । चेयरमैन के रूप में राकेश मक्कड़ ने मीटिंग के एजेंडे में बहुमत सदस्यों द्वारा प्रस्तुत किए गए मुद्दों को भी शामिल करने से इंकार कर दिया है । यह गहरे अफसोस की और बिडंवना की बात है कि रीजनल काउंसिल के 13 में से 7 सदस्यों को लग रहा है कि लुधियाना में मीटिंग करने के पीछे राकेश मक्कड़ और उनके साथी पदाधिकारियों का वास्तविक उद्देश्य यह है कि वह मीटिंग को मनमाने तरीके से चला सकें, तथा बहुमत सदस्यों को अपनी बात न करने/कहने दें । इसी कारण से, काउंसिल के बहुमत सदस्यों ने मीटिंग के लिए ऑब्जर्वर की माँग की है । यहाँ इस बात को याद करना प्रासंगिक होगा कि पिछले दिनों दिल्ली में हुई रीजनल काउंसिल की मीटिंग में ऑब्जर्वर की उपस्थिति के बावजूद राकेश मक्कड़ और उनके साथी पदाधिकारियों की तरफ से इतनी बदतमीजी हुई थी कि काउंसिल सदस्यों को पुलिस बुलाने की धमकी देनी पड़ी थी । काउंसिल के बहुमत सदस्यों का मानना/कहना है कि जब दिल्ली में राकेश मक्कड़ और उनके साथी पदाधिकारियों के हौंसले इतने बुलंद थे, तो लुधियाना में तो फिर वह मनमानी करने से भला क्यों चूकेंगे ?      
राकेश मक्कड़ और उनके साथी पदाधिकारियों पर आरोप है कि रीजनल काउंसिल की मीटिंग से सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को दूर रखने के उद्देश्य से ही उन्होंने दिल्ली की बजाए लुधियाना में मीटिंग करने का फैसला किया है । दरअसल उन्हें डर है कि दिल्ली में मीटिंग होने पर उनकी मनमानियों पर सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की निगाह रहेगी और जरूरत पड़ने पर वह हस्तक्षेप कर सकते हैं । उन्हें यह डर इसलिए भी है क्योंकि मीटिंग से बचने की उनकी कोशिश सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की सक्रियताभरे हस्तक्षेप के कारण ही विफल हुई है । राकेश मक्कड़ हालाँकि इस आरोप को बेबुनियाद बताते हुए तर्क करते हैं कि सेंट्रल काउंसिल सदस्यों पर लुधियाना में हो रही मीटिंग में शामिल होने पर कोई रोक नहीं है; लुधियाना में हो रही मीटिंग में शामिल होने के लिए सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को लुधियाना जाने की परेशानी उठानी पड़ेगी - जैसी बातों पर तंज कसते हुए राकेश मक्कड़ और उनके साथियों का कहना है कि चुनाव के समय तो यह लोग दौड़ दौड़ कर लुधियाना जाते रहते हैं, तब तो इन्हें किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं होती है; अब मीटिंग में शामिल होने को लेकर इन्हें क्यों परेशानी होगी ?
सेंट्रल काउंसिल सदस्यों द्वारा की गई घेराबंदी के बाद रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने के लिए मजबूर हुए राकेश मक्कड़ ने सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के प्रति जो तंजभरी बातें कहना शुरू की हैं, और इसके जरिए सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के सामने जो चुनौती खड़ी की है - उससे मामला और दिलचस्प हो उठा है । उल्लेखनीय है कि राकेश मक्कड़ के एक साथी-पदाधिकारी नितिन कँवर ने पहले अतुल गुप्ता और फिर विजय गुप्ता के साथ अलग अलग कार्यक्रमों में जो बदतमीजी तथा तू तू मैं मैं की, और राकेश मक्कड़ ने इन 'कामों' के लिए नितिन कँवर को जिस तरह का संरक्षण दिया, उससे सेंट्रल काउंसिल के सदस्य नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मामलों को लेकर पहले से ही दबाव में हैं । लुधियाना में रीजनल काउंसिल की मीटिंग करने का दाँव चल कर राकेश मक्कड़ ने रीजनल काउंसिल के बहुमत सदस्यों की माँग और कोशिश का 'दलिया' बनाने के साथ-साथ सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के सामने भी जो चुनौती खड़ी की है - उससे लग रहा है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की कार्रवाइयों में पटाखे अभी फूटते रहेंगे ।

Saturday, October 14, 2017

रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की लाइन में लगने की तैयारी कर रहे पूर्व डायरेक्टर सुशील गुप्ता के पीछे हटने के कारण, इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार को चेलैंज करने की अशोक गुप्ता की तैयारी मँझधार में फँसी

जयपुर । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए चुने गए अधिकृत उम्मीदवार भरत पांड्या को चेलैंज करने की तैयारी के तहत अशोक गुप्ता ने समर्थन जुटाने का जो प्रयास शुरू किया है, उसे कोई खास समर्थन न मिलता देख अशोक गुप्ता और उनके नजदीकियों को तगड़ा झटका लगा है । पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के रवैये ने तो उन्हें सदमे जैसी हालत में पहुँचा दिया है । निवर्त्तमान इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई उनके चेलैंज में उन्हें दिलचस्पी लेते/दिखाते हुए तो लग रहे हैं, लेकिन कुछ करते और कोई नतीजा दिखाते हुए नजर नहीं आए हैं । अशोक गुप्ता ने विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से समर्थन जुटाने हेतु बात की है, लेकिन अधिकतर पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने उनके चेलैंज को लेकर कोई खास उत्साह नहीं जताया/दिखाया । 17 सितंबर को नोमीनेटिंग कमेटी द्वारा फैसला करने की प्रक्रिया में बुरी तरह पराजित होने के बाद अशोक गुप्ता और उनके नजदीकियों ने पहला सप्ताह तो शोक मनाने में बिता दिया, उसके बाद फिर उन्होंने चेलैंज करने के बारे में सोचना शुरू किया । पिछले दो सप्ताहों में अशोक गुप्ता और उनके नजदीकियों ने विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में समर्थन जुटाने के लिए कई बड़े/छोटे नेताओं के दरवाजे खटखटाए हैं, लेकिन इस कोशिश में उन्हें जो प्रतिक्रिया मिली है - उसने उन्हें हतोत्साहित ही किया है । अशोक गुप्ता के कुछेक नजदीकी और समर्थक तो कहने भी लगे हैं कि अशोक गुप्ता को चेलैंज/फैलेंज के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए, अन्यथा उनकी और ज्यादा फजीहत होगी ।
अशोक गुप्ता के लिए फजीहत की बात यह भी हुई है कि चेलैंज न करने के लिए रोटरी के बड़े नेता उन्हें मनाने का कोई प्रयास भी नहीं कर रहे हैं । उल्लेखनीय है कि भरत पांड्या की अधिकृत उम्मीदवारी को चेलैंज कर सकने को लेकर और जिन जिन उम्मीदवारों से खतरा था, उन सभी को 'मैनेज' कर लेने की बातें सुनी जा रही हैं । गुलाम वहनवती को रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी बना दिया गया है; रंजन ढींगरा और दीपक कपूर को भी आकर्षक ऑफर के साथ-साथ 'अगली बार' का झुनझुना दिया/दिखाया जा रहा है - लेकिन अशोक गुप्ता को कोई 'मैनेज' करने का प्रयास ही नहीं कर रहा है । इससे लगता है कि रोटरी के बड़े नेता और पदाधिकारी भी चाहते हैं कि भरत पांड्या की अधिकृत उम्मीदवारी को अशोक गुप्ता चेलैंज करें : हालाँकि उनकी चाहना है अलग अलग कारणों से - कुछ नेता लोग तो इसलिए चाहते हैं, ताकि उन्हें अपनी राजनीति दिखाने/जताने का मौका मिले, और कुछ इसलिए चाहते हैं ताकि अशोक गुप्ता यह भी करके देख लें और बाहर निकलें तथा दूसरों के लिए मौका छोड़ें ।
अशोक गुप्ता और उनके नजदीकियों को पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता का रवैया काफी हैरान/परेशान करने वाला लगा है । उन्हें सबसे ज्यादा उम्मीद सुशील गुप्ता से ही थी; सुशील गुप्ता की तरफ से जब रंजन ढींगरा को चेलैंज न करने के लिए राजी कर लिया गया था, तब अशोक गुप्ता और उनके नजदीकियों की उम्मीद और बढ़ गई थी - लेकिन सुशील गुप्ता उनकी मदद करते हुए भी नहीं दिख रहे हैं । इसका एक प्रमुख कारण यह सुना/बताया जा रहा है कि सुशील गुप्ता चूँकि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के लिए लाइन में लगना चाहते हैं, इसलिए वह किसी भी तरह के विवाद में पड़ने/फँसने से बचना चाहते हैं - और इसलिए ही उन्होंने अशोक गुप्ता की चेलैंज करने की तैयारी से अपने आपको दूर किया/दिखाया हुआ है । अशोक गुप्ता के लिए मुसीबत की बात यह बनी है कि जिन सुशील गुप्ता पर वह सबसे ज्यादा भरोसा कर रहे थे, उन सुशील गुप्ता ने इस बार तो उन्हें बीच मँझधार में छोड़ ही दिया है - दो/तीन वर्ष में ही मिलने वाले अगली बार के मौके के लिए भी वह कोई झूठा-मूठा भरोसा तक उन्हें नहीं दे रहे हैं । सुना जा रहा है कि सुशील गुप्ता अगली बार के लिए अपने ही डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर विनोद बंसल को 'हवा' दे रहे हैं । उनके डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स के बीच चर्चा है कि विनोद बंसल आजकल सुशील गुप्ता की 'आँख का तारा' बने हुए हैं, जो अभी तक रंजन ढींगरा हुआ करते थे ।
सुशील गुप्ता के पीछे हटने से अशोक गुप्ता के चैलेंजिंग अभियान को जो धक्का लगा है, उससे उबरने का वह कोई तरीका नहीं खोज पा रहे हैं । निवर्त्तमान इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई की तरफ से उन्हें उत्साहित किए जाने की बातें तो सुनी जा रही हैं, लेकिन मनोज देसाई वास्तव में उनकी मदद करते हुए नहीं नजर आ रहे हैं । इसका एक बड़ा कारण यह माना/समझा जा रहा है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर के रूप में मनोज देसाई ने विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में लोगों को अलग अलग कारणों से नाराज किया हुआ है, और इसलिए वह किसी से ज्यादा कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं । अशोक गुप्ता ने हाल ही के दिनों में विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के पूर्व गवर्नर्स से खुद भी बात की है, और अपने चेलैंज के लिए समर्थन जुटाने का प्रयास किया है - पर अपने प्रयासों के नतीजों से वह खुद ही बहुत आश्वस्त नहीं हैं । अशोक गुप्ता के नजदीकियों का कहना है कि उनके कई समर्थकों ने हालात की प्रतिकूलता का हवाला देते हुए उन्हें चेलैंज को लेकर आगे न बढ़ने का सुझाव भी दिया है, लेकिन चेलैंज को लेकर अशोक गुप्ता जितना आगे बढ़ चुके हैं - उससे पीछे हटना भी उनके लिए फजीहतभरा होगा । नोमीनेटिंग कमेटी की चुनावी प्रक्रिया में सबसे पहले चुनावी दौड़ से बाहर होने के कारण अशोक गुप्ता की एक बार किरकिरी हो चुकी है, चेलैंज को लेकर वह जिस मँझधार में फँसे नजर आ रहे हैं - उससे लग रहा है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने के लिए अपनाई गई उनकी कोई भी तरकीब उनके काम नहीं आ पा रही है, और इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने का उनका सपना एक बुरा सपना साबित होने जा रहा है ।

Thursday, October 12, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में राजनीतिक रूप से लगातार 'पिट' रहे राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स को, कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में टीके रूबी और अजय मदान पर हुए 'हमलों' को चुपचाप देखते रहे, जितेंद्र ढींगरा के रवैये में उम्मीद और उत्साह का 'टॉनिक' मिला

चंडीगढ़ । इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम की मौजूदगी में हुई कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी पर हुए 'हमलों' के बीच जितेंद्र ढींगरा के चुप बने रहने को राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स अपने लिए उम्मीद की किरण के रूप में देख/पहचान रहे हैं । राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स को यह बात बहुत ही उल्लेखनीय और महत्त्वपूर्ण लगी है कि मीटिंग में टीके रूबी को तरह तरह के आरोपों के जरिए जब घेरा जा रहा था, तब मीटिंग में मौजूद जितेंद्र ढींगरा ने न तो आरोपों का कोई विरोध किया और न ही टीके रूबी का बचाव करने का कोई प्रयास किया । यहाँ तक कि राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स द्वारा मीटिंग में डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी अजय मदान की उपस्थिति का आक्रामक ढंग से विरोध किए जाने के मुद्दे पर भी जितेंद्र ढींगरा चुप बने रहे । अजय मदान, जितेंद्र ढींगरा के ही क्लब के सदस्य हैं और समझा जाता है कि जितेंद्र ढींगरा के सुझाव पर ही उन्हें टीके रूबी की टीम में डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी जैसा महत्त्वपूर्ण पद मिला है । इसके बावजूद, उनके साथ राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स द्वारा की गई बदतमीजी पर जितेंद्र ढींगरा चुप बने रहे - तो इसे राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स अपने लिए एक संभावित अनुकूल स्थिति के रूप में देख रहे हैं ।
दरअसल, राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स को लगता है कि उनकी आक्रामक रवैये भरी रणनीति के कारण टीके रूबी जिस तरह अलग अलग किस्म की 'मुसीबतों' में फँसे हैं, उसे देख कर जितेंद्र ढींगरा सावधान और बचाव की मुद्रा में आ गए हैं । उन्हें लगता है कि जितेंद्र ढींगरा को महसूस हो रहा होगा कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में टीके रूबी को जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ा है, या पड़ रहा है - वैसी मुश्किलें उनके सामने न आएँ;  इसीलिए जितेंद्र ढींगरा, टीके रूबी के 'साथ' होते हुए भी उनसे दूर 'दिखने' का भी प्रयास कर रहे हैं । हालाँकि टीके रूबी चूँकि एक अलग परिस्थिति में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर 'बने' हैं, इसलिए उन्हें परेशान करने के लिए राजा साबू गिरोह के लोगों को कई मौके स्वतः ही मिल गए हैं - जो जितेंद्र ढींगरा के मामले में नहीं मिल सकेंगे; लेकिन राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स ने पिछले दिनों बार बार जिस तरह की नॉनसेंस हरकतें की हैं, उससे लगता नहीं है कि मौके 'बनाने' में उन्हें कोई समस्या आएगी । इस बात को जितेंद्र ढींगरा भी समझ रहे होंगे; और इसी बिना पर राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स को लग रहा है कि जितेंद्र ढींगरा संभावित मुसीबतों से बचने के लिए ही उनके साथ टकराव को टालना चाहते हैं और इसीलिए टीके रूबी पर हो रहे शाब्दिक हमलों को लेकर वह चुप ही बने रहे ।
यहाँ इस तथ्य को रेखांकित करना प्रासंगिक होगा कि पिछले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए नोमीनेटिंग कमेटी द्वारा अधिकृत उम्मीदवार चुने जाने के  बाद जितेंद्र ढींगरा को राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स के प्रति लचीला रवैया अपनाते हुए 'देखा' गया था, जिसका उन्हें सुफल भी मिला - राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स की तरफ से उनके डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बनने में कोई बाधा खड़ी नहीं की गई । हालाँकि गिरोह के दो नेताओं - मधुकर मल्होत्रा और प्रमोद विज ने लोगों के बीच स्पष्ट घोषणा की हुई थी कि वह किसी भी कीमत पर जितेंद्र ढींगरा को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की कुर्सी तक नहीं पहुँचने देंगे । उन दिनों राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स तथा जितेंद्र ढींगरा के बीच शांति स्थापित होती हुई नजर आ रही थी । वास्तव में, इस शांति की दोनों को ही जरूरत थी - राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स लड़ाई/झगड़े के चलते अपनी भारी फजीहत करवा चुके थे, तो जितेंद्र ढींगरा भी समझ रहे थे कि शांति करके ही वह गवर्नरी कर सकेंगे । जितेंद्र ढींगरा चूँकि कुछ समय पहले तक राजा साबू गिरोह के प्रमुख 'लड़ाकुओं' में थे, लिहाजा उनके बीच शांति स्थापित होने में ज्यादा समस्या भी नहीं आई । लेकिन अप्रत्याशित रूप से घटे घटनाचक्र में जब टीके रूबी को वर्ष 2017-18 की गवर्नरी मिल गई, तब अचानक से हालात फिर पहले वाली स्थिति में पहुँच गए ।
टीके रूबी को गवर्नरी मिलने से राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स की छाती पर जो साँप लोटा, उसकी फुँकार ने राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स की तरफ बढ़ते जितेंद्र ढींगरा के कदमों को रोकने का भी काम किया । गवर्नर बनने के बाद से टीके रूबी को राजा साबू गिरोह की तरफ से जिन भी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, वह यूँ तो उन्होंने अकेले ही भोगी/निपटाई हैं - लेकिन जितेंद्र ढींगरा हमेशा ही उनके सहयोगी बने भी दिखाई दिए हैं; किंतु इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम की मौजूदगी में संपन्न हुई कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में पहली बार  जितेंद्र ढींगरा और टीके रूबी के बीच कुछ 'गैप' देखा गया । राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स को इस गैप में अपनी साँसे वापस मिलती दिख रही हैं, और जिसे वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में भुनाना चाहेंगे । राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स के लिए इस वर्ष होने वाला डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव बिलकुल जीने/मरने जैसा मामला है । हालाँकि वह अभी तक कोई ऐसा उम्मीदवार नहीं खोज पाए हैं, जो टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा की मिलीजुली ताकत का मुकाबला करने का साहस दिखा सके । इस मामले में राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स के लिए राहत और उम्मीद की बात सिर्फ यही है कि टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा के उम्मीदवार के रूप में देखे/पहचाने जा रहे रमेश बजाज का चुनाव अभियान ढीला/ढाला ही है, और वह पूरी तरह टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा के भरोसे हैं; ऐसे में टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा के बीच दिख रहा गैप रमेश बजाज के लिए मुसीबत बढ़ाने वाला भी साबित हो सकता है - रमेश बजाज की उम्मीदवारी को लेकर जितेंद्र ढींगरा की असहमति की चर्चा पहले से है भी ।
डिस्ट्रिक्ट में कई लोगों का मानना और कहना लेकिन यह भी है कि कुछेक मौकों पर टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा के व्यवहार और रवैये में फर्क भले ही नजर आता हो, किंतु उसे दोनों के बीच बनते/बढ़ते गैप के रूप में देखना राजनीतिक नासमझी और जल्दबाजी में निर्णय पर पहुँचने का सुबूत है । इसके अलावा, राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स खुद बुरी तरह बँटे हुए हैं - वह टीके रूबी के सामने मुसीबत खड़ी करने के मामले में तो आपसी बैरभाव भूल कर एकसाथ हो जाते हैं, लेकिन सत्ता में अपनी वापसी करने को लेकर किसी रोडमैप पर उनके बीच सचमुच एकता हो सकना अभी तो मुश्किल क्या, असंभव ही दिख रहा है । राजनीतिक रूप से लगातार 'पिट' रहे राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स को बासकर चॉकलिंगम की मौजूदगी में हुई कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में टीके रूबी और अजय मदान पर हुए 'हमलों' को चुपचाप देखते रहे जितेंद्र ढींगरा के रवैये में उम्मीद और उत्साह का 'टॉनिक' जरूर मिला है ।

Wednesday, October 11, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 की मुकदमेबाजी में नैनीताल हाई कोर्ट का फैसला गवर्नरी पाने के लिए तरह तरह के फार्मूलों पर काम कर रहे दिनेश शर्मा के लिए खासा फजीहत भरा है

सिकंदराबाद । दिनेश शर्मा ने जिस कोर्ट-कचहरी के जरिए अपनी उम्मीदों और सपनों को पूरा करने, अन्यथा रोटरी को ही भाड़ में भेजने की तैयारी की हुई थी - उसी कोर्ट-कचहरी ने न सिर्फ उनकी उम्मीदों और सपनों पर पानी फेर दिया है, बल्कि पटरी पर लौटते 'दिख' रहे डिस्ट्रिक्ट में उनकी स्थिति को और कमजोर बना दिया है । नैनीताल हाई कोर्ट के फैसले के बाद वर्ष 2018-19 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हो रहे चुनाव पर छाए संकट के बादल पूरी तरह छंट गए हैं, और जल्दी ही अगले रोटरी वर्ष के लिए डिस्ट्रिक्ट को गवर्नर मिल जाने का रास्ता साफ हो गया है । नैनीताल हाई कोर्ट ने जिस सख्त 'लहजे' में फैसला सुनाया है और निचली अदालत के 'तरीके' पर टिप्पणी की है, उससे निचली अदालत से अपनी जीत का फैसला ला कर गवर्नर बनने का दिनेश शर्मा का दावा भी कमजोर पड़ गया है । उल्लेखनीय है कि दिनेश शर्मा और उनके संगी-साथी लगातार यह दावा करते रहे हैं कि निचली अदालत में तो उनके पक्ष में फैसला आएगा ही, और तब वह गवर्नर भी बन जायेंगे । पिछले दिनों निचली अदालत से वह जिस तरह से वर्ष 2018-19 के गवर्नर के लिए हो रहे चुनाव को रुकवाने का फैसला करवा लाए थे, उससे उन्हें और उन्हें भड़का कर अपनी राजनीति चमका रहे लोगों को तो विश्वास भी हो चला था कि अब वह रोटरी इंटरनेशनल को 'घुटनों' पर ले आयेंगे और अपने पक्ष में मनमाने फैसले करवा लेंगे । लेकिन नैनीताल हाई कोर्ट के फैसले के बाद दिनेश शर्मा और उन्हें भड़काने वाले नेताओं का सारा विश्वास डोल गया है । इस फैसले से यह भी स्पष्ट हो गया है कि कोर्ट-कचहरी के जरिए दिनेश शर्मा ने जो नाटक फैलाया हुआ था, वह भी अब ज्यादा दिन नहीं चलेगा ।
नैनीताल हाई कोर्ट के फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि दिनेश शर्मा की अदालती कार्रवाई अगले रोटरी वर्षों के गवर्नर के लिए होने वाले चुनावों की प्रक्रिया के लिए कोई बाधा नहीं बनेगी । अगले दो सप्ताह में डिस्ट्रिक्ट को अगले रोटरी वर्ष का गवर्नर मिल जायेगा, और अगले चार-छह महीने में वर्ष 2019-2020 के गवर्नर पद के लिए भी चुनावी प्रक्रिया शुरू हो जाने की उम्मीद है । दिनेश शर्मा रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों के साथ सौदेबाजी में लगे हुए थे और अगले रोटरी वर्ष की गवर्नरी पाने की उम्मीद लगाए हुए थे - वह यदि उचित समय पर सौदेबाजी को अंजाम दे दिए होते, और डिस्ट्रिक्ट के गिरोहबाज पूर्व गवर्नर्स पर निर्भर होने की बजाए डिस्ट्रिक्ट के लोगों के साथ भरोसे के संबंध बनाने का प्रयास करते - तो बहुत संभावना थी कि अगले रोटरी वर्ष में उन्हें गवर्नरी मिल जाती । लेकिन वह जिस बेवकूफीभरी अकड़ में रहे, और डिस्ट्रिक्ट के गिरोहबाज पूर्व गवर्नर्स के साथ मिल कर न सिर्फ रोटरी इंटरनेशनल की तरफ से नियुक्त किए गए पदाधिकारी संजय खन्ना से, बल्कि इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम तक से लुकाछिपी खेलते हुए भिड़ते रहे - उससे उन्होंने कुल मिलाकर अपना ही नुकसान कर लिया है और अब लग यही रहा है कि डिस्ट्रिक्ट में अपने लिए कोई हैसियत या सम्मानजनक स्थान पाने/लेने की स्थिति से भी वह दूर होते जा रहे हैं ।
दिनेश शर्मा ने जो नया शगूफा छोड़ा है, उससे उन्होंने खुद को और फजीहत में फँसा लिया है । रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों से वह सौदेबाजीभरी गुजारिश कर रहे हैं कि वह अपना मुकदमा वापस ले लेते हैं, जिसके बदले में वर्ष 2018-19 के गवर्नर के लिए हो रहे चुनाव को रोक कर दोबारा से चुनावी प्रक्रिया शुरू हो - जिसमें अभी के चारों उम्मीदवारों को उम्मीदवारी न प्रस्तुत करने के लिए वह राजी कर लेंगे और वह अकेले ही उम्मीदवार होंगे और इस तरह वर्ष 2018-19 के लिए वह गवर्नर चुन लिए जायेंगे । उनकी इस बात पर रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारी हँस ही रहे हैं, और सोच रहे हैं कि दिनेश शर्मा खुली आँखों से भी कैसे कैसे सपने देख लेते हैं ? कुछेक लोग मजे भी ले रहे हैं । उनकी तरफ से दिनेश शर्मा को कहा गया है कि अब जो स्थिति है उसमें उनके अगले रोटरी वर्ष का गवर्नर बनने की एक ही सूरत है और वह यह कि चुनावी प्रक्रिया के बीच में ही सही, चारों उम्मीदवार अपनी अपनी उम्मीदवारी वापस लेने के साथ साथ यह घोषणा भी कर दें कि अभी तक की वोटिंग के आधार पर उनकी जीत यदि घोषित भी की गई, तो वह उसे स्वीकार नहीं करेंगे - तब रोटरी इंटरनेशनल को झक मार कर दोबारा चुनाव करवाना ही पड़ेगा । यह सुझाव देने वाले लोग कोई सुझाव नहीं दे रहे हैं, बल्कि वास्तव में दिनेश शर्मा की फिरकी ले रहे हैं । इस तरह की बातों के बीच, दिनेश शर्मा के नजदीकियों को लग रहा है कि डिस्ट्रिक्ट के गिरोहबाज पूर्व गवर्नर्स ने अपने चक्कर में फँसा कर दिनेश शर्मा की खासी फजीहत करवा दी है ।