Thursday, November 9, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स में नीलेश विकमसे के प्रेसीडेंट-काल में बना अराजकता और अनिर्णय का माहौल, नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में राकेश मक्कड़ एंड टीम की मनमानियों और लूट-खसोट के लिए वरदान बना

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ और उनके साथी पदाधिकारियों ने स्टूडेंट कन्वेंशन के नाम पर रुपए हड़पने की योजना पर काम करना शुरू किया है, और इसके तहत करीब 35 लाख रुपए का बजट बना कर तैयार किया है । पिछले वर्ष स्टूडेंट कन्वेंशन में करीब 20 लाख रुपए खर्च हुए थे । इसी से लोगों को लगता है कि राकेश मक्कड़ एंड टीम के सदस्यों के पेट कुछ ज्यादा बड़े हैं, और इसीलिए उन्होंने स्टूडेंट कन्वेंशन के खर्चे में जोर का उछाल 'पैदा' कर दिया है । इस उछाल को तर्कसंगत बनाने/दिखाने के लिए कन्वेंशन में दो हजार छात्रों की भागीदारी होने/कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जो पिछले वर्ष एक हजार छात्रों का था । अब पिछले वर्ष यदि एक हजार छात्रों के लिए इंतजाम करने में 20 लाख रुपए खर्च हुए थे, तो इस वर्ष दो हजार छात्रों के लिए इंतजाम करने में 35 लाख का खर्चा तो उचित ही लगता है । लेकिन यहाँ एक पेंच है - पिछले वर्ष इंतजाम भले ही एक हजार छात्रों के लिए किया गया था, लेकिन कन्वेंशन में छात्र कुल 400/500 के बीच ही पहुँचे थे । पिछले वर्ष की कन्वेंशन के लिए तैयार की/करवाई गयी तमाम स्टेशनरी अभी भी धूल खा रही है । पिछले वर्ष की कन्वेंशन आयोजित करने वाले भी राकेश मक्कड़ और उनके संगी-साथी ही थे - इसलिए एक स्वाभाविक सा सवाल बनता है कि पिछले वर्ष यही लोग स्टूडेंट कन्वेंशन में जब एक हजार छात्रों को जुटाने का लक्ष्य ही पूरा नहीं कर पाए थे, तब इस वर्ष दो हजार छात्रों का लक्ष्य क्यों निर्धारित कर लिया गया है ? राकेश मक्कड़ तथा काउंसिल में पदाधिकारी उनके साथियों की हरकतों को देखते/पहचानते हुए लोगों को इस सवाल का उचित जबाव यही समझ में आता है कि इंस्टीट्यूट के पैसे की ज्यादा से ज्यादा लूट को संभव बनाने के लिए ही राकेश मक्कड़ एंड टीम ने यह ऊँचा लक्ष्य निर्धारित किया है ।
उल्लेखनीय है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के रूप में राकेश मक्कड़ एंड टीम पर काउंसिल के हिसाब-किताब में गड़बड़ियाँ करने तथा हिसाब-किताब को काउंसिल सदस्यों से ही छिपाने को लेकर गंभीर आरोप और भारी विवाद रहे हैं; जिन्हें लेकर चारों तरफ से घिर जाने के बाद वह जो थोड़ा-बहुत हिसाब दिखाने को मजबूर हुए तो उसमें बहुत सी 'हेरा-फेरियाँ' पकड़ी गईं - और जिसके चलते पूर्व चेयरमैन दीपक गर्ग और मौजूदा ट्रेजरर सुमित गर्ग काउंसिल के 'लूटे गए' पैसे काउंसिल को वापस करने के लिए मजबूर तक हुए । पोल खुलती तथा लूटे गए पैसे वापस करने की नौबत आते देख राकेश मक्कड़ और उनके साथी पदाधिकारियों ने हिसाब-किताब फिर से छिपा लिया और बेईमानीपूर्ण तरीके से 'जबरदस्ती' बजट पास करवाया, और षड्यंत्रपूर्ण तरीके से डेढ़ मिनट में एजीएम कर ली । राकेश मक्कड़ एंड टीम की इन हरकतों पर काउंसिल के ही सदस्यों की तरफ से इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को शिकायत की हुई है । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे की तरफ से कई कारणों से चूँकि कोई निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई, इसलिए राकेश मक्कड़ एंड टीम को मनमानियाँ करने का और बल मिला है । नीलेश विकमसे के प्रेसीडेंट-काल में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट में जो अराजकता और अनिर्णय का माहौल बना है, वह नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में राकेश मक्कड़ एंड टीम की मनमानियों और लूट-खसोट के लिए वरदान बना है ।
इसी वरदान का प्रसाद पाने के लिए, पिछले वर्ष एक हजार छात्रों की भागीदारी के लक्ष्य-निर्धारण के साथ की गई स्टूडेंट कन्वेंशन में मुश्किल से 400/500 छात्रों को इकट्ठा कर पाने वाली राकेश मक्कड़ एंड टीम ने इस वर्ष की स्टूडेंट कन्वेंशन के लिए दो हजार छात्रों की भागीदारी का लक्ष्य निर्धारित कर अपनी अपनी जेबें भरने का इंतजाम कर लिया है । मजे की बात यह है कि काउंसिल के चेयरमैन के रूप में राकेश मक्कड़ ने स्टूडेंट कन्वेंशन के लिए काउंसिल सदस्यों तक से बात करने की जरूरत तक नहीं समझी है । उनकी मनमानी का इससे भी बड़ा सुबूत यह मिला है कि कन्वेंशन के लिए जगह बुक करवाने का काम गुपचुप रूप से जून में ही कर लिया गया था, और जिसके लिए किसी से पूछे या किसी को बताए बिना ही तीन लाख रुपए एडवांस के रूप में भी दे दिए गए थे । राकेश मक्कड़ और काउंसिल में पदाधिकारी उनके साथियों की सोच और उनके व्यवहार का दिलचस्प नजारा यह है कि पदाधिकारी के रूप में उनके पास लाइब्रेरीज के खर्चे पूरे करने के लिए पैसे नहीं हैं, और इसलिए पिछले दिनों उन्होंने लाइब्रेरीज को बंद कर देने के फैसले कर लिए - लेकिन फालतू के कामों में खर्च करने के लिए उनके पास पैसे की कोई कमी नहीं है । दरअसल फालतू के कामों में खर्च हुए 'दिखाए' गए पैसे से चूँकि अपनी अपनी जेबें भरने का मौका मिलता है, इसलिए चेयरमैन राकेश मक्कड़ और उनके साथी पदाधिकारियों का सारा ध्यान जरूरी कामों की बजाए उन्हीं पर रहता है ।
राकेश मक्कड़ के चेयरमैन-काल में नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में सिर्फ पैसों की ही बेईमानी नहीं हो रही है, बल्कि प्रोफेशन के नाम पर भी जमकर धोखाधड़ी हो रही है । इसका बिलकुल नया उदाहरण लुधियाना में होने वाला सेमीनार है - जिसके लिए पहले तो बताया गया था कि सेमीनार में 'एमिनेंट' स्पीकर्स आयेंगे, लेकिन जब स्पीकर्स के नाम सामने आए तो 'खोदा पहाड़, निकला चूहा' वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए काउंसिल में पदाधिकारी नितिन कँवर और राजेंद्र अरोड़ा के नाम सामने आए । इस हरकत को सरासर धोखाधड़ी मानते/बताते हुए राकेश मक्कड़ को लोगों की तरफ से जब लताड़ पड़ी, तो उन्होंने बहानेबाजी लगाई कि उन्हें कोई एमिनेंट स्पीकर मिला ही नहीं, इसलिए ऐन मौके पर उन्हें काउंसिल के इन पदाधिकारियों को ही स्पीकर्स के रूप में तय करना पड़ा है । यह हरकत कोई पहली बार नहीं हुई है; काउंसिल पदाधिकारी ब्रांचेज के कार्यक्रमों में स्पीकर्स के रूप में पहले भी जाते रहे हैं - काउंसिल के सदस्यों के आरोपों के ही अनुसार, वह इसलिए स्पीकर बनते रहे हैं, ताकि आने/जाने/ठहरने/खाने का खर्चा वह काउंसिल से बसूल सकें । राकेश मक्कड़ और उनके साथी पदाधिकारी अपनी छोटी छोटी जरूरतों और स्वार्थों को पूरा करने के लिए सेमिनार्स के आयोजन तक में जिस तरह की हेराफेरियाँ कर रहे हैं, उससे सेमिनार्स के स्तर बुरी तरह से घटे हैं और वह मजाक बन कर रह गए हैं ।

Wednesday, November 8, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में बदतमीजी मामले में रोटरी इंटरनेशनल की जाँच में फँसे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी की डॉक्टर सुब्रमणियन के सहारे बचने की उम्मीद टूट रही है क्या ?

नई दिल्ली । रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ मेट्रोपोलिटन के हाल ही में संपन्न हुए एक कार्यक्रम में निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियन के शामिल होने को लेकर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी बुरी तरह भड़के हुए हैं । रवि चौधरी ने अपने नजदीकियों के बीच बताया कि उन्होंने डॉक्टर सुब्रमणियन से इस बात को लेकर नाराजगी व्यक्त की है कि वह एक ऐसे कार्यक्रम में क्यों शामिल हुए, जिसमें आभा झा चौधरी भी उपस्थित थीं । रवि चौधरी ने रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ मेट्रोपोलिटन के पदाधिकारियों से भी यह कहते हुए नाराजगी व्यक्त की कि उन्होंने आभा झा चौधरी को अपने कार्यक्रम में आमंत्रित क्यों किया - जबकि आभा झा चौधरी अब डिस्ट्रिक्ट टीम की सदस्य नहीं रही हैं । रवि चौधरी दरअसल यह देख कर बुरी तरह बौखलाए हुए हैं कि वह और उनके नजदीकी तो क्लब्स के प्रेसीडेंट्स से आभा झा चौधरी के खिलाफ चिट्ठियाँ लिखवा कर आभा झा चौधरी को डिस्ट्रिक्ट में अलग-थलग करने की जो कोशिशें कर रहे हैं, उस पर रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ मेट्रोपोलिटन के पदाधिकारियों ने पानी फेर दिया है । रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ मेट्रोपोलिटन का पाँच नवंबर को हुआ कार्यक्रम खास मेहमानों की उपस्थिति के लिहाज से महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम था । इसमें कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स उपस्थित थे, तथा डिस्ट्रिक्ट के कुछेक प्रमुख रोटेरियन थे । मजे की बात यह है कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मंजीत साहनी के क्लब के इस कार्यक्रम में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी नहीं थे - यह बात हालाँकि कंफर्म नहीं हो पाई है कि रवि चौधरी को इस कार्यक्रम का निमंत्रण नहीं दिया, या निमंत्रण के बावजूद उन्होंने कार्यक्रम में पहुँचने की जरूरत नहीं समझी । इस मामले में सच्चाई चाहे जो हो, साऊथ मेट्रोपोलिटन के कार्यक्रम की जो रिपोर्ट रवि चौधरी को मिली है - वह उन्हें झटका देने वाली साबित हुई है । 
रवि चौधरी के लिए सबसे तेज झटके की बात तो यह हुई कि इस कार्यक्रम में आभा झा चौधरी को खासी तवज्जो मिली । कार्यक्रम के आयोजक, रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ मेट्रोपोलिटन के पदाधिकारियों तथा सदस्यों ने तो आभा झा चौधरी को महत्ता दी ही - कार्यक्रम में पहुँचे अन्य प्रमुख रोटेरियंस ने भी उन्हें खास सम्मान दिया । रवि चौधरी के लिए जले पर नमक छिड़कने वाली बात यह हुई कि इस कार्यक्रम में शामिल हुए निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियन ने आभा झा चौधरी के साथ सहानुभूतिपूर्वक बातचीत की । डॉक्टर सुब्रमणियन रोटरी इंटरनेशनल में रवि चौधरी द्वारा की गई बदतमीजी की आभा झा चौधरी की शिकायत की जाँच/पड़ताल के लिए बनी कमेटी के मुखिया हैं । रवि चौधरी दावा करते रहे हैं कि डॉक्टर सुब्रमणियन तो उनके ही 'आदमी' हैं, और जाँच कमेटी के मुखिया के रूप में वह आभा झा चौधरी की शिकायत तथा उनके तथ्यों को रद्दी की टोकरी में ही डालेंगे और मुझे क्लीन चिट देंगे । डिस्ट्रिक्ट में लोगों ने डॉक्टर सुब्रमणियन और रवि चौधरी की दोस्ती को चूँकि देखा भी है, इसलिए लोगों ने रवि चौधरी के दावे पर विश्वास भी कर लिया - और मान लिया कि डॉक्टर सुब्रमणियन की मुखियागिरी में आभा झा चौधरी को न्याय नहीं ही मिल पायेगा । लोगों ने देखा/पाया भी कि इसी भरोसे, आभा झा चौधरी के गंभीर आरोपों - और रोटरी इंटरनेशनल द्वारा उनके आरोपों को प्रथम दृष्टया सही मान लेने के चलते जाँच कराने के फैसले के बावजूद रवि चौधरी बेशर्मी का प्रदर्शन करते रहे हैं, और 'चोरी व सीनाजोरी' वाले मुहावरे को चरितार्थ करते चले आ रहे हैं । लेकिन रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ मेट्रोपोलिटन के कार्यक्रम में आभा झा चौधरी के साथ सहानुभूतिपूर्वक बातचीत करने की डॉक्टर सुब्रमणियन की 'हरकत' पर रवि चौधरी का माथा लेकिन ठनका है ।
दरअसल रवि चौधरी भी जानते हैं और समझ रहे हैं कि तथ्यों को यदि ईमानदारी से देखा गया तो वह पक्के ही दोषी साबित होंगे । अपने समर्थन में रवि चौधरी ने जिन कुछेक लोगों से चिट्ठियाँ लिखवाई हैं, उनमें जिस तरह की बेमतलब और बेसिरपैर की बातें कहीं गई हैं - उनसे ही साबित है कि रवि चौधरी के पास घटना-क्रम में अपने बचाव को लेकर कहने के लिए कुछ है ही नहीं, इसीलिए वह फिजूल की बातों का शोर मचा कर मामले को डायवर्ट करने का प्रयास कर रहे हैं । रवि चौधरी ने अपने समर्थन में जो चिट्ठियाँ लिखवाई हैं, उनमें अधिकतर में एक ही बात कही गई है और वह यह कि रवि चौधरी एक बहुत ही सज्जन व्यक्ति हैं, जिन्होंने उनके साथ कभी भी दुर्व्यवहार नहीं किया है । मान लेते हैं कि जिन्होंने भी यह कहा है, सच ही कहा है - लेकिन इससे रवि चौधरी अपराधमुक्त कैसे हो जाते हैं ? कोई भी व्यक्ति पहला अपराध करने - या पहली बार पकड़े जाने से पहले सज्जन ही होता है और उसके खिलाफ दुर्व्यवहार की कोई शिकायत नहीं हुई होती है । कई बार उसके परिचितों और मुहल्लेवालों को विश्वास भी नहीं होता है कि यह ऐसा अपराध कर सकता है । दिल्ली में हुए कुख्यात निर्भया कांड को याद करें, तो उसमें अपराधियों के परिचितों और पास-पड़ोस वालों के लिए विश्वास करना मुश्किल हुआ था कि यह लोग ऐसा घिनौना काम कर सकते हैं । आजकल सुर्ख़ियों में बने गुरुग्राम के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में एक मासूम बच्चे की हत्या के आरोप में गिरफ्तार स्कूल के ही ग्यारहवीं में पढ़ने वाले छात्र को लेकर भी स्कूल के लोग और उसकी कालोनी में रहने वाले लोग हैरान हैं कि यह एक मासूम की हत्या कैसे कर सकता है ? इसीलिए इस आधार पर कि डिस्ट्रिक्ट में कुछेक लोग ऐसे सौभाग्यशाली हैं जिनके साथ रवि चौधरी ने कभी कोई दुर्व्यवहार नहीं किया है - आभा झा चौधरी के साथ दुर्व्यवहार करने के मामले से रवि चौधरी बरी नहीं हो जाते हैं ।
रवि चौधरी के पक्ष में एक अकेले अरविंद कनौजिया ने तथ्यों के हवाले से बात करने की कोशिश की है, लेकिन उनके तर्क इतने लचर हैं कि वह रवि चौधरी को बचाने से ज्यादा फँसाने का काम करते हैं । रोटरी क्लब दिल्ली वसंत वैली के सदस्य अरविंद कनौजिया ने लिखा/बताया है कि उन्होंने रोटरी इंटरनेशनल की साईट देखी है और पाया है कि आभा झा चौधरी जिस 'डब्ल्यूजीमील' नाम के प्रोजेक्ट के लिए काम करती हैं, वह रोटरी इंटरनेशनल का प्रोजेक्ट नहीं है । अरविंद कनौजिया ने यह बात बताते हुए जताने की कोशिश तो यह की है कि लोगों, देखो मैं कितनी अक्ल की बात कर रहा हूँ और मैंने आभा झा चौधरी की बेईमानी पकड़ ली है; लेकिन वह यह नहीं देख पा रहे हैं कि यह जताने की कोशिश में वह कितने बड़े वाले बेवकूफ साबित हो रहे हैं । वह रोटरी की यह छोटी सी बुनियादी बात नहीं समझ सके हैं कि रोटरी जैसे सामाजिक व सेवा संगठन को नए नए क्षेत्रों में नई नई संभावनाओं को प्रेरित करने से बल मिलता है, और रोटरी यदि आज सौ वर्षों के बाद भी दुनिया भर में जगमगा रही है तो इसलिए ही क्योंकि यहाँ लकीर के फ़कीर बन कर काम नहीं किया जाता है । अरविंद कनौजिया को रोटरी इंटरनेशनल की साईट देखने का बहुत शौक है, तो उन्होंने उस साईट में कहाँ उन पदों को देखा है, जिन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रवि चौधरी ने अपनी टीम बनाते हुए सृजित किया है । अरविंद कनौजिया के तर्क से ही यदि बात करें, तो रवि चौधरी ने अपनी टीम में करीब तीन सौ लोगों की जो फौज खड़ी की है - उसमें करीब नब्बे प्रतिशत पद फर्जी हैं । अरविंद कनौजिया को ही जो 'डिस्ट्रिक्ट आईटी एंड रोटरी क्लब सेंट्रल चेयर' मिली हुई है, वह रोटरी इंटरनेशनल की साईट में उन्हें कहीं दिख रही है क्या ? और यदि नहीं दिख रही है, तो क्या वह फर्जी पद लिए हुए बैठे हैं और कोई बेईमानी कर रहे हैं ? रोटरी को सचमुच जानने/समझने वाला ऐसा नहीं कहेगा, और इसी तर्क से रोटरी को सचमुच जानने/समझने वाला 'डब्ल्यूजीमील' प्रोजेक्ट पर सवाल नहीं उठा सकता है - यह काम रवि चौधरी की भक्ति में लीन कोई अरविंद कनौजिया ही कर सकता है ।
जाहिर तौर पर अपने समर्थकों से अपने बचाव में चिट्ठियाँ लिखवाने के बावजूद रवि चौधरी अपने बचने की कोई संभावना नहीं देख रहे हैं, और ऐसे में उनकी सारी उम्मीद डॉक्टर सुब्रमणियन के रवैये पर टिकी हुई है । अभी तक, डॉक्टर सुब्रमणियन के साथ अपने संबंधों के भरोसे रवि चौधरी आश्वस्त थे और मानने के साथ साथ दावा भी कर रहे थे कि आभा झा चौधरी की शिकायत पर बनी जाँच टीम का मुखिया पद डॉक्टर सुब्रमणियन को मिलना उनके लिए तो वरदान बना है; लेकिन रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ मेट्रोपोलिटन के कार्यक्रम में डॉक्टर सुब्रमणियन के आभा झा चौधरी के साथ सहानुभूतिपूर्वक बात करने की मिली सूचनाओं के बाद से रवि चौधरी को लगने लगा है कि डॉक्टर सुब्रमणियन तथ्यों की अनदेखी शायद नहीं करेंगे । इसीलिए डॉक्टर सुब्रमणियन भी अब रवि चौधरी के निशाने पर आ गए हैं । यह देखना दिलचस्प होगा कि डॉक्टर सुब्रमणियन तथ्यों पर गौर करते हुए आभा झा चौधरी की शिकायत के साथ न्याय करेंगे, और या रवि चौधरी की धमकी में आकर उनसे अपनी दोस्ती निभायेंगे ?

Tuesday, November 7, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी को लेकर कपिल गुप्ता असमंजस में हैं, या टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा की जोड़ी के ऑल्टरनेटिव उम्मीदवार बन कर अगले वर्ष की दावेदारी को सुरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं ?

पानीपत । डिस्ट्रिक्ट फाउंडेशन सेमीनार में इकट्ठा हुए डिस्ट्रिक्ट के रोटेरियंस के बीच अपनी उम्मीदवारी की छाप छोड़ने और प्रभाव बनाने के मामले में असफल रहने के कारण कपिल गुप्ता की उम्मीदवारी का दावा कमजोर पड़ गया है । कपिल गुप्ता एक उम्मीदवार के रूप में अपनी धमक और अपना प्रभाव दिखाने में तो असफल रहे ही, उनके संभावित समर्थक नेताओं ने भी मौके का फायदा उठाने का कोई प्रयास तक नहीं किया - जिसके चलते लोगों के बीच चर्चा चली कि कपिल गुप्ता के पास अपनी उम्मीदवारी को सफल बनाने के लिए कोई योजना अभी तक भी है ही नहीं । इसका पूरा पूरा फायदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के एक अन्य संभावित उम्मीदवार रमेश बजाज को मिला । मजे की बात यह रही कि मौके का फायदा उठाने/लेने के लिए रमेश बजाज की तरफ से भी लोगों को कोई प्रयास होते हुए नहीं नजर आए - उन्हें जो फायदा मिला, वह वास्तव में सत्ता के नजदीकी होने तथा संभावित प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार कपिल गुप्ता की कमजोरी के कारण मिला । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के प्रबल दावेदारों के रूप में देखे/पहचाने जा रहे कपिल गुप्ता और रमेश बजाज के ढीले/ढाले रवैये ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी परिदृश्य के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट की राजनीति को भी असमंजस में डाला हुआ है । मजे की और विडंबना की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट की राजनीति का पारा तो पूरी तरह से चढ़ा हुआ है, जिसके चलते डिस्ट्रिक्ट के नेताओं के बीच आग खासी भड़की हुई है - पर इस भड़की हुई आग में कुछ 'पकता' या 'जलता' हुआ नहीं दिख रहा है ।
डिस्ट्रिक्ट में टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा की जोड़ी ने राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स की जैसी 'बैंड बजाई' हुई है, और प्रतिक्रिया में राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स के बीच जिस तरह की बेचैनीभरी हलचल है - उसके कारण उम्मीद की जा रही थी कि राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स इस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में 'अपने' उम्मीदवार को जितवाने के लिए पूरी ताकत से सक्रिय होंगे । डिस्ट्रिक्ट में नेतागिरी करने तथा हावी होने का रास्ता 'अपने आदमी' को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की कुर्सी पर बैठाने के प्रयासों के बीच से ही होकर गुजरता है । डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले हर किसी व्यक्ति का मानना और कहना है कि इस वर्ष यदि टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा की जोड़ी का उम्मीदवार जीत गया तो डिस्ट्रिक्ट में राजा साबू और उनके गिरोह के सदस्यों का धंधा-पानी तो बंद ही हुआ समझो; इसीलिए हर किसी को लगता है कि राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स इस वर्ष के चुनाव को बहुत ही गंभीरता से लेंगे और 'अपने' उम्मीदवार को चुनाव जितवाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे । कपिल गुप्ता को उनके उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । सुधीर चौधरी और पूनम सिंह भी हालाँकि राजा साबू गिरोह का समर्थन पाने की कोशिशें करते सुने तो जा रहे हैं, लेकिन लोगों के बीच की चर्चाओं के अनुसार - इनके मुकाबले कपिल गुप्ता का ही पलड़ा भारी दिख रहा है । राजा साबू गिरोह के कुछेक नेता भी इन पँक्तियों के लेखक को पिछले कुछ समय से लगातार बताते रहे हैं कि टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा की जोड़ी से मुकाबला जीतने के लिए कपिल गुप्ता ही उनके उपयुक्त उम्मीदवार हो सकते हैं ।
राजा साबू गिरोह के नेताओं को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में हालात अपने अनुकूल भी 'दिख' रहे हैं; इस बारे में उनकी तरफ से जो कुछ कहा/बताया जा रहा है, उसमें तीन प्रमुख कारण गौर करने वाले हैं : एक तो यह कि उन्होंने रोटरी इंटरनेशनल में शिकायत कर कर के टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा पर इतना दबाव तो बना ही दिया है कि यह चुनाव में कोई पक्षपाती भूमिका खुल कर नहीं निभा सकेंगे; दूसरी बात यह कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में प्रवीन चंद्र गोयल का समर्थन उन्हें मिलेगा; तीसरी तथा सबसे महत्त्व की बात यह कि सत्ता का पूरा समर्थन होने के बावजूद रमेश बजाज अपनी उम्मीदवारी को लेकर अभी तक भी कोई स्ट्रॉंग फीलिंग लोगों के बीच नहीं स्थापित कर सके हैं, और वह पूरी तरह से टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा पर ही निर्भर नजर आ रहे हैं, और इस तरह तेवर और बॉडी लैंग्वेज के मामले में वह 'कमजोर' ही दिख रहे हैं । इन परिस्थितियों की चर्चाओं के चलते उम्मीद की जा रही थी कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के बाद डिस्ट्रिक्ट के पहले बड़े कार्यक्रम के रूप में पानीपत में होने वाले फाउंडेशन सेमीनार में कपिल गुप्ता और उनके संभावित समर्थक के रूप में राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स अपनी 'राजनीति' का जोरदार प्रदर्शन करेंगे । लेकिन यह उम्मीद रखने वाले लोगों को यह देख कर गहरी निराशा हुई कि मौके का फायदा उठाने का प्रयास न कपिल गुप्ता की तरफ से हुआ, और न उनके संभावित समर्थक पूर्व गवर्नर्स की तरफ से हुआ । उनके रवैये को देख कर लगा ही नहीं कि वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को लेकर जरा भी गंभीर हैं । हालाँकि किया तो रमेश बजाज ने भी कुछ नहीं; उन्होंने भी सिर्फ उतना ही किया जितना करने का मौका उन्हें 'सत्ता' की तरफ से मिला - लेकिन उनका कुछ न करना तब मायने रखता, जब कपिल गुप्ता कुछ करते; रमेश बजाज को तो सत्ता का समर्थन है, इसलिए उन्हें ज्यादा कुछ करने की जरूरत भी तभी पड़ेगी, जब दूसरे उम्मीदवार कुछ करेंगे ।
फाउंडेशन सेमीनार में अपनी उम्मीदवारी के अभियान को लेकर अपनाए गए कपिल गुप्ता के ढीले/ढाले रवैये पर राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स ने कपिल गुप्ता को ही जिम्मेदार ठहराया है । उनका कहना है कि कपिल गुप्ता ही अपनी उम्मीदवारी को लेकर जब गंभीर नहीं हैं, तब वही क्या कर सकते हैं । कपिल गुप्ता के रवैये को देख कर राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स को तो यह भी शक होने लगा है कि कपिल गुप्ता कहीं टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा की जोड़ी के ऑल्टरनेटिव उम्मीदवार तो नहीं हैं, और इस वर्ष की उम्मीदवारी के जरिये कहीं वह अगले वर्ष की दावेदारी को सुरक्षित करने की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं ? दरअसल डिस्ट्रिक्ट में राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी के खिलाफ जिस तरह का मोर्चा खोला हुआ है, उससे आभास मिल रहा है कि इस वर्ष डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव खासा महत्त्वपूर्ण होगा; ऐसे में टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा को शायद डर होगा कि चुनावी घमासान का दबाव रमेश बजाज यदि नहीं झेल सके और बीच में ही मैदान छोड़ते या पिछड़ते हुए दिखे - तो वह कपिल गुप्ता को आगे कर देंगे । और यदि ऐसी नौबत नहीं आई और रमेश बजाज आराम से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुन लिए गए, तो कपिल गुप्ता अगले वर्ष इनके उम्मीदवार हो जायेंगे । डिस्ट्रिक्ट में अधिकतर लोग हालाँकि यही मान/समझ रहे हैं कि इस वर्ष का चुनाव रमेश बजाज और कपिल गुप्ता के बीच ही होना है, किंतु कपिल गुप्ता जिस तरह से परिस्थितिजन्य तमाम अनुकूलताओं का फायदा उठाने का भी प्रयास नहीं कर रहे हैं, उससे कुछ लोगों को - और इन कुछ लोगों में राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स भी शामिल हैं - संदेह हो रहा है कि कपिल गुप्ता कहीं टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा से मिले हुए ही तो नहीं हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के एक मजबूत समझे जाने वाले उम्मीदवार के रूप में कपिल गुप्ता को लेकर बन रहे इस संदेह ने इस वर्ष के चुनावी परिदृश्य को खासा दिलचस्प बना दिया है ।

Sunday, November 5, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए मदन बत्रा की उम्मीदवारी एक तरफ जेपी सिंह के लिए, तो दूसरी तरफ विनय गर्ग के नेतृत्व वाले सत्ता खेमे के लिए चुनौती की तरह प्रस्तुत हुई है

अंबाला । एक लंबी ना-नुकुर के बाद मदन बत्रा ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी की अंततः जो घोषणा की है, उसने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में गर्मी पैदा करने के साथ-साथ फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि मेहरा के लिए भी बड़ी मुसीबत और चुनौती भी खड़ी कर दी है । मदन बत्रा की उम्मीदवारी इस उम्मीद और माँग के साथ प्रस्तुत हुई है कि पिछली बार उन्होंने डिस्ट्रिक्ट में शांति और भाईचारा बनाने के उद्देश्य से अपनी उम्मीदवारी का त्याग किया था, और उनके इस त्याग का सभी ने स्वागत करते हुए उन्हें अगली बार निर्विरोध चुनवाने का आश्वासन व भरोसा दिया था । उनके 'त्याग' के चलते चूँकि रवि मेहरा को फायदा हुआ था, इसलिए त्याग के बदले में दिए गए आश्वासन और भरोसे को पूरा करने की जिम्मेदारी भी रवि मेहरा की ही ज्यादा है - इसलिए मदन बत्रा और उनके समर्थक नेता रवि मेहरा पर ही दबाव बनायेंगे कि वह अपना समर्थन तो मदन बत्रा को दे हीं, अपने 'साथियों' का समर्थन भी मदन बत्रा को दिलवाएँ । ऐसा हो पाना चूँकि असंभव ही है, इसलिए रवि मेहरा के ऊपर एक नैतिक दबाव तो होगा ही । यह दबाव इसलिए और ज्यादा गंभीर होगा क्योंकि उन पर अपने खेमे के उम्मीदवार के रूप में रमन गुप्ता के लिए 'काम' करना जरूरी होगा । लायन राजनीति में आश्वासनों व भरोसों का यूँ तो कोई मूल्य नहीं है, और कोई इनकी परवाह भी नहीं करता है - लेकिन विरोधियों को चित करने के लिए इनकी बातें तो की ही जाती हैं, और विरोधियों के लिए इस तरह की बातें मुसीबत भी बनती ही हैं । मदन बत्रा की उम्मीदवारी के संदर्भ में पिछली बार किया गया उनका 'त्याग' और उन्हें दिया गया आश्वासन व भरोसा इस वर्ष के सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में एक प्रमुख मुद्दा तो बनेगा ही ।
डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में विनय गर्ग के नेतृत्व वाले सत्ता खेमे के नेताओं को भी इस बात का - और इस बात की गंभीरता का अहसास है और इसीलिए उन्होंने इस बात की हवा के सहारे फुलाए जा रहे गुब्बारे को फोड़ने की तैयारी शुरू कर दी है । उनकी तरफ से कहा जा रहा है कि मदन बत्रा को यदि पिछली बार किए गए 'त्याग' का ही फायदा लेना था, तो इस बार अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत करने में उन्होंने देर क्यों कर दी ? कहा जा रहा है कि मौजूदा लायन वर्ष के अभी तक के बीते चार महीनों में मदन बत्रा ने न तो अपनी उम्मीदवारी को लेकर कोई दिलचस्पी दिखाई और न डिस्ट्रिक्ट के आयोजनों में ही अपनी उपस्थिति या सक्रियता प्रदर्शित की - इसलिए मान लिया गया कि लायनिज्म में अब उनकी कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है, और इस कारण से रमन गुप्ता ने अपनी उम्मीदवारी को लेकर काम शुरू कर दिया है तथा अब वह इतना आगे बढ़ गए हैं कि उनसे पीछे लौटने के लिए कहना संभव नहीं होगा । इस तर्क का हालाँकि मदन बत्रा और उनके समर्थक नेताओं की तरफ से बड़ा जोरदार जबाव दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि पिछली बार मदन बत्रा जब पीछे लौटे थे, तब वह काफी आगे बढ़ चुके थे और मोटी रकम खर्च कर चुके थे; उसके बाद भी डिस्ट्रिक्ट में शांति और भाईचारा बनाने के लिए उन्होंने त्याग किया था और वह पीछे लौटे थे । उनका कहना है कि रमन गुप्ता ने तो अभी कोई ज्यादा काम भी नहीं किया है, और अभी उनका कोई खास पैसा भी खर्च नहीं हुआ है - इसलिए अभी वह आराम से पीछे लौट सकते हैं ।
रमन गुप्ता को पीछे लौटना नहीं है, इसलिए उन्होंने और विनय गर्ग के नेतृत्व वाले सत्ता खेमे के नेताओं ने मदन बत्रा और उनके समर्थक नेताओं पर सीधा हमला बोला है । इस हमले में कहा/बताया जा रहा है कि पिछली बार मदन बत्रा ने अपनी उम्मीदवारी वापस लेकर कोई त्याग नहीं किया था और डिस्ट्रिक्ट में शान्ति व भाईचारे की बातें सिर्फ जुमला थीं - मदन बत्रा चुनाव के बीच में इसलिए पीछे हट गए थे, क्योंकि चुनाव में उन्हें अपनी पराजय सुनिश्चित लग रही थी । इसके अलावा, जेपी सिंह ने अपने राजनीतिक स्वार्थ में उनकी उम्मीदवारी की बलि ले ली - जेपी सिंह को उम्मीद रही थी कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में मदन बत्रा को मुकाबले से हटा कर, वह इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में निर्विरोध चुने जाने की स्थिति बना लेंग; किंतु उनकी उम्मीद पूरी नहीं हो सकी । उल्लेखनीय है कि दो वर्ष पहले, प्रमोद सपरा के गवर्नर-काल में यह प्रयास हुआ था कि डिस्ट्रिक्ट के दोनों खेमे के लोग कुछ 'छोड़ेंगे' और कुछ 'पायेंगे' - यह प्रयास लेकिन कुछेक नेताओं के जेपी सिंह के साथ चलने वाले 'झगड़े' के कारण सफल नहीं हो सका था, और उस वर्ष हुए राजनीतिक घमासान में जेपी सिंह को भारी फजीहत का सामना करना पड़ा था । उससे लेकिन जेपी सिंह को यह सबक मिला कि लायन-राजनीति में समझौता करने के लिए उत्सुक होने को वास्तव में कमजोरी का संकेत समझा जाता है; इसलिए यहाँ समझौता करो भी तो भी 'लड़ते' हुए 'दिखते' रहो; इस फार्मूले पर जेपी सिंह ने पिछले लायन वर्ष में अमल किया और 'दोनों' मोर्चों पर विजय पताका फहराई ।
पिछले वर्ष मिली दोहरी जीत जेपी सिंह के लिए लेकिन तब तक अधूरी है, जब तक कि मदन बत्रा को 'त्याग' का फल नहीं मिलता । दो वर्ष पहले के घटनाचक्र में मदन बत्रा की उम्मीदवारी को वापस करवाने में चूँकि जेपी सिंह का अपना स्वार्थ देखा/पहचाना जा रहा है, इसलिए मदन बत्रा को चुनावी जीत दिलवाने के लिए जेपी सिंह पर बड़ा नैतिक दबाव है । विरोधी खेमे के नेताओं को पिछले वर्ष जेपी सिंह से मिली दोहरी 'मार' का बदला लेने के लिए मदन बत्रा की राह में रोड़ा बनने का मौका दिख रहा है, लिहाजा वह योजनाबद्द तरीके से रमन गुप्ता की उम्मीदवारी को ले आए हैं । मदन बत्रा को सक्रिय तथा अपनी उम्मीदवारी के प्रति ज्यादा उत्सुक न पाते/देखते हुए जेपी सिंह किसी दूसरे को उम्मीदवार के रूप में तो खोज रहे थे, लेकिन मदन बत्रा के लिए वह मौका भी छोड़े हुए थे - ताकि मदन बत्रा बाद में शिकायत न करें । इस बीच मदन बत्रा ने अपने आप को उम्मीदवारी के लिए तैयार कर लिया; उन्हें समझाया गया है कि पिछले वर्ष जब गुरचरण सिंह भोला जैसे अपेक्षाकृत अपरिचित उम्मीदवार से यशपाल अरोड़ा जैसे खासे सक्रिय उम्मीदवार को बड़े अंतर से हराया जा सकता है, तो रमन गुप्ता उनके सामने कहाँ टिकेंगे ? रमन गुप्ता की अभी तक की सक्रियता को देखते हुए यह भी माना जा रहा है कि एक उम्मीदवार के रूप में यशपाल अरोड़ा की जो कमजोरियाँ थीं, रमन गुप्ता भी उन्हीं कमजोरियों के शिकार हैं; इसलिए जितनी आसानी से यशपाल अरोड़ा को पछाड़ दिया गया, उतनी ही आसानी से रमन गुप्ता को भी हरा दिया जायेगा । विनय गर्ग के नेतृत्व वाले सत्ता खेमे के नेताओं के लिए भी इस वर्ष का चुनाव खासा महत्त्वपूर्ण है, और इसलिए वह पिछले वर्ष जैसी गलतियाँ नहीं दोहराना चाहेंगे । यही कारण है कि मदन बत्रा को कमजोर उम्मीदवार के रूप में मानते/देखते हुए भी वह चुनावी मुकाबले को लेकर सतर्क हुए हैं, और मदन बत्रा की उम्मीदवारी के पक्ष में चलने/चलाये जाने वाले दाँव-पेंचों पर शुरू से ही उनका पूरा ध्यान है ।

Saturday, November 4, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में आभा झा चौधरी के साथ बदतमीजी मामले में रोटरी इंटरनेशनल द्वारा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी के खिलाफ जाँच बैठाए जाने के फैसले ने मलेशिया में होने वाले एशिया जोन इंस्टीट्यूट में डिस्ट्रिक्ट और डिस्ट्रिक्ट के लोगों के लिए फजीहत का मौका बनाया

नई दिल्ली । वरिष्ठ रोटेरियन आभा झा चौधरी ही नहीं, बल्कि रोटरी के प्रति भी बदतमीजी करने/दिखाने के आरोपों का संज्ञान लेते हुए रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी के खिलाफ जाँच कमेटी गठित करने का फैसला किया है । इस तरह अपनी हरकतों के चलते रवि चौधरी डिस्ट्रिक्ट के पहले और एशिया जोन के इस वर्ष के 42 डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स में अकेले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बने हैं - जो अपनी करतूतों के चलते रोटरी इंटरनेशनल की जाँच के दायरे में आये हैं । किसी भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के लिए यह शर्म की बात होनी चाहिए, किंतु रवि चौधरी तो निराले व्यक्ति हैं - शर्मसार होने की बजाये वह अभी भी मामले की नजाकत और रोटरी समाज में हो रही अपनी बेइज्जती को गंभीरता से लेने की बजाये निरंतर बेहूदगी ही दिखाए/किए जा रहे हैं । रोटरी इंटरनेशनल द्वारा जाँच बैठाये जाने के लिए एक तरफ तो वह पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता को कोस रहे हैं, तथा दूसरी तरफ वह दावा कर रहे हैं कि जाँच कमेटी के सामने वह अपने इतने समर्थक और गवाह खड़े कर देंगे कि जाँच कमेटी उनके खिलाफ कुछ कर ही नहीं पाएगी । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का दुरुपयोग करते और रौब दिखाते हुए रवि चौधरी की समर्थक और गवाह तैयार करने की कोशिशों को देखते हुए आभा झा चौधरी ने भी स्पष्ट कह दिया है कि जाँच कमेटी में उन्हें यदि न्याय होता हुआ नहीं दिखा, तो फिर वह देश के कानूनों का सहारा लेंगी और जरूरत पड़ी तो पुलिस में भी रिपोर्ट करेंगी । जाँच को प्रभावित करने की रवि चौधरी की कोशिशों तथा उस पर आभा झा चौधरी के आक्रामक तेवरों ने मामले को और जटिल बना दिया है ।
रवि चौधरी ने पहले तो बदतमीजी की, और अब निर्लज्ज तरीके से वह अपनी बदतमीजी को उचित ठहराने की जो कोशिश कर रहे हैं - उसने डिस्ट्रिक्ट के बड़े और प्रमुख पूर्व गवर्नर्स को डिस्ट्रिक्ट की साख व प्रतिष्ठा को लेकर चिंतित बना दिया है । उन्हें डर है कि 27 दिन बाद एक से तीन दिसंबर के बीच मलेशिया में जो एशिया जोन इंस्टीट्यूट होना है, और जिसमें रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों के साथ-साथ एशिया जोन के डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारी और प्रमुख लोग उपस्थित होंगे - वहाँ रवि चौधरी की करतूत के कारण कहीं डिस्ट्रिक्ट को और डिस्ट्रिक्ट के लोगों को फजीहत का शिकार न होना पड़े । रवि चौधरी ने मामले को लेकर अकड़भरी बेशर्मी का जो रवैया अपनाया है, उसके चलते उनके समर्थक और नजदीकी पूर्व गवर्नर्स ने भी उनसे दूरी बना ली है । डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर दमनजीत सिंह और विनोद बंसल को रवि चौधरी के बड़े समर्थकों के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है, किंतु अपनी जली-कटी बातों और अकड़ भरे रवैये से रवि चौधरी इन्हें पहले ही अपने से दूर कर चुके हैं, और आभा झा चौधरी के साथ की गई उनकी बदतमीजी के मामले ने तो उन्हें रवि चौधरी से और बचने के लिए मजबूर कर दिया है । जाँच बैठाने के लिए रवि चौधरी ने सुशील गुप्ता को जिम्मेदार ठहराते हुए जिस तरह से कोसना शुरू किया है, उसके चलते रवि चौधरी और भी अकेले पड़ गए हैं । कई लोगों का मानना और कहना है कि रवि चौधरी होशियारी से कोशिश करते तो आभा झा चौधरी के साथ उनका विवाद सम्मानजनक तरीके से समाप्त हो सकता था, लेकिन अपनी अकड़भरी निर्लज्ज बेवकूफी के चलते उन्होंने अपने आप को बुरी तरह फँसा लिया है ।
रवि चौधरी को लगता है कि यह विश्वास रहा कि इससे पहले जब वह डिस्ट्रिक्ट में बड़े बड़े लोगों के साथ बदतमीजी करते रहे हैं, और उनका कुछ नहीं बिगड़ा - तो आभा झा चौधरी के साथ बदतमीजी करने के मामले में ही उनका कोई क्या बिगाड़ लेगा ? उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार सँभालते ही रवि चौधरी ने जिस तरह का व्यवहार दिखाया - उससे उन्होंने अपने आप को 'सीरिअल' बदतमीज होने की संज्ञा से ही सुशोभित करवाया । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश चंद्र, जो रवि चौधरी के क्लब के ही सदस्य हैं - रवि चौधरी के पहले शिकार बने । छोटे क्लब्स को 'कमजोर' क्लब बताते हुए उनके पदाधिकारियों को बेइज्जत करना तथा कार्यक्रमों में न पहुँचने पर असिस्टेंट गवर्नर्स को लताड़ लगाना तो रवि चौधरी के लिए मामूली बातें रहीं, उन्होंने तो पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक तलवार के क्लब, रोटरी क्लब दिल्ली चाणक्यपुरी के अधिष्ठापन समारोह तक में अपनी बदतमीजी का जलवा दिखाया । इसके आलावा, राजेश बत्रा के क्लब, रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ सेंट्रल द्वारा सुल्तानपुरी स्कूल में आयोजित हो रहे विन्स कार्यक्रम में तो रवि चौधरी की ऐसी हरकतें रहीं कि क्लब के वरिष्ठ सदस्यों को गुस्से में 'गेट आउट' जैसा शब्द इस्तेमाल करते हुए उन्हें मौके से चले जाने के लिए कहना पड़ा; ब्लड बैंक की मीटिंग में दिल्ली में रोटरी के प्रतिष्ठित ब्लड बैंक की जिम्मेदारी सँभाल रहे पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल पर उन्होंने 'दुकान चलाने' का आरोप लगा दिया; कैंसर फाउंडेशन की मीटिंग को लेकर रवि चौधरी का जो रवैया रहा, उसे देख कर फाउंडेशन के पदाधिकारियों को कहना पड़ा कि इससे पहले उन्हें किसी गवर्नर से इतना अपमानित नहीं होना पड़ा; डिस्ट्रिक्ट विन्स सेमीनार को इंडिया विन्स के चेयरमैन सुशील गुप्ता का संबोधन करवाए बिना समाप्त करके रवि चौधरी ने सुशील गुप्ता को अपमानित किया । इन 'सीरिअल' हरकतों के बावजूद, रवि चौधरी की बदतमीजी पर चूँकि कोई संज्ञान नहीं लिया जा रहा था, इसलिए उनके हौंसले बुलंद थे - और बुलंद हौंसलों की धमक में ही उन्होंने आभा झा चौधरी के साथ बदतमीजी करने में कोई संकोच नहीं किया । लोगों को हैरानी इस बात की है कि पहले के मामलों में बचते रहे, रवि चौधरी अपनी नई करतूत को लेकर लेकिन जिस तरह फँसे हैं और फँसते जा रहे हैं - उसकी गंभीरता को वह नहीं समझ रहे हैं, और लगातार छिछोरपन से ही मामले को हैंडल कर रहे हैं ।
डिस्ट्रिक्ट के लोगों का ही कहना है कि रवि चौधरी इस बात को नहीं समझ रहे हैं कि इस मामले को उन्हें एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि रोटरी के एक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में देखना और हैंडल करना चाहिए । वह इस बात को शायद समझ ही नहीं रहे हैं कि इस मामले में लगातार उनके द्वारा अपनाये जा रहे रवैये से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनकी खुद की पहचान और साख के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट व रोटरी की पहचान व साख भी दाँव पर लग गई है । जाँच बैठाने के लिए सुशील गुप्ता जैसे वरिष्ठ पदाधिकारी को कोसने के साथ-साथ जाँच को प्रभावित करने के लिए रवि चौधरी जिस तरह से अपने गवाह और समर्थक तैयार कर रहे हैं, उस पर आभा झा चौधरी की तरफ से मिली प्रतिक्रिया से मामले के और भड़कने के संकेत दिख रहे हैं । लग रहा है कि आभा झा चौधरी के साथ बदतमीजी करना रवि चौधरी को भारी पड़ रहा है ।

Thursday, November 2, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में उद्घाटित हुए ग्लोबल ग्राँट के विवरण में राजा साबू के क्लब के किस्से किसी तिलस्मी कहानी जैसा ही रोमांच देने के साथ-साथ किसी तिलस्मी कहानी के 'रोटरी के लुटेरे' जैसे किसी शीर्षक का फील दे रहे हैं

चंडीगढ़ । डिस्ट्रिक्ट जीएमएल के नए अंक में डिस्ट्रिक्ट में आने वाले ग्लोबल ग्रांट के पैसों का विवरण प्रकाशित होने से राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स जिस बुरी तरह से भड़के हुए हैं, उससे ही जाहिर हो रहा है कि राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स को क्यों डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में कठपुतलियाँ ही चाहिए होती हैं - और क्यों उन्होंने पिछले करीब ढाई वर्षों से टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर न बनने देने के लिए तरह तरह की अड़ंगेबाजी के जरिए मोर्चा खोला हुआ था ? ग्लोबल ग्रांट के नाम पर डिस्ट्रिक्ट में कितनी रकम आ रही है, किसके पास आ रही है, और किस उद्देश्य के लिए आ रही है - इसे डिस्ट्रिक्ट के लोगों से छिपाकर रखना राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स के लिए जरूरी क्यों है; और इसके जाहिर होने पर वह इतने भड़के हुए क्यों हैं ? इस सवालों का जबाव डिस्ट्रिक्ट जीएमएल के नए अंक में ग्लोबल ग्रांट के विवरणों पर सरसरी सी नजर डाल कर ही मिल जाता है । यह विवरण तिलस्मी कहानियों के किस्सों से कम रोचक नहीं है । आखिर कौन यह जान कर रोमांचित नहीं होगा कि राजा साबू के क्लब ने यूगाँडा में ब्लड बैंक खोलने के लिए 4 लाख 94 हजार 804 डॉलर इकट्ठा किए, जिसकी आधी रकम ग्लोबल ग्राँट के रूप में है । डिस्ट्रिक्ट तो छोड़िये, राजा साबू के क्लब में अधिकतर लोगों को यह नहीं पता होगा कि यूगाँडा आखिर है कहाँ और वहाँ ब्लड बैंक खोलने की क्या/क्यों जरूरत है ? मानवीय आधार पर सोचें तो मान सकते हैं कि निश्चित ही जरूरत होगी, ब्लड बैंक की जरूरत आखिर कहाँ नहीं है ? पर सवाल यह है कि राजा साबू के क्लब के सदस्यों को आखिर कैसे पता चला कि यूगाँडा में ब्लड बैंक की जरूरत है ? क्लब के सदस्यों का कहना है कि इस तरह की बातें राजा साबू ही 'तय' करते हैं; राजा साबू ने कह दिया कि यूगाँडा में ब्लड बैंक बनवाना है, तो बस ग्लोबल ग्राँट के लिए आवेदन कर दिया गया और पैसे निकलवाने का काम अपनी पहुँच का इस्तेमाल करते हुए राजा साबू ने कर दिया ।
मजे की बात यह है कि राजा साबू के क्लब ने यूगाँडा में ब्लड बैंक बनवाने के लिए अपनी तरफ से कुल 10 हजार डॉलर ही दिए हैं । राजा साबू के क्लब का यह किस्सा लेकिन निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा की कारस्तानी के सामने कुछ भी नहीं - उन्होंने तो राजा साबू को भी पीछे छोड़ दिया है । ग्लोबल ग्राँट के विवरण बता रहे हैं कि रमन अनेजा ने तो अपने क्लब - रोटरी क्लब पानीपत मिडटाउन में यूगाँडा मेडीकल मिशन के नाम पर एक लाख 92 हजार डॉलर झटक लिए । पानीपत मिडटाउन के सदस्य बेचारे पूछ रहे हैं कि यूगाँडा है कहाँ ?  क्लब के सदस्यों को यूगाँडा मेडीकल मिशन के नाम पर इकट्ठा की गई रकम की भनक न मिल सके, इसके लिए रमन अनेजा ने इस मिशन के लिए क्लब से लेकिन इकन्नी भी नहीं ली । रमन अनेजा के इस मिशन के पीछे भी 'प्रेरणा' राजा साबू की ही बताई जा रही है । राजा साबू का यह 'यूगाँडा प्रेम' डिस्ट्रिक्ट में किसी को समझ नहीं आया, लेकिन रोटरी के बड़े नेता इस प्रेम की जो कहानी सुनाते हैं - वह राजा साबू के खेल को बेनकाब करती है । राजा साबू की यह प्रेम कहानी वास्तव में, वर्ष 2018-19 के लिए इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुने गए सेमुअल ओवोरि से तार जोड़ने की राजा साबू की कोशिश की कहानी है । यूगाँडा के प्रमुख रोटेरियन सेमुअल ओवोरि के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की लाइन में लगते ही राजा साबू ने उनसे नजदीकी बनाने के प्रयास तेज कर दिए और इसके लिए उन्होंने यूगाँडा में सेवा कार्य 'करने' को जरिया बनाया । मेडीकल मिशन और ब्लड बैंक के नाम पर राजा साबू को सेमुअल ओवोरि से यूगाँडा में बार-बार मिलने का और बात करने का मौका मिलता - और इस तरह वह सेमुअल ओवोरि के निकट आते और उनके प्रेसीडेंट-काल में फायदा उठाते । लेकिन सेमुअल ओवोरि के साथ-साथ राजा साबू की भी बदकिस्मती यह रही कि सेमुअल ओवोरि की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई - और तब राजा साबू की बड़ी होशियारी से तैयार की गयी सारी योजना भी मिट्टी में दफ़्न हो गई ।
राजा साबू के लिए दोहरी मुसीबत की बात यह रही कि एक तरफ तो उनकी योजना पिट गई, और दूसरी तरफ ग्लोबल ग्राँट का विवरण सामने आने से डिस्ट्रिक्ट के लोगों के सामने उनकी योजना की पोल-पट्टी भी खुल गई । लोगों को तथ्यों के साथ पहली बार पता चला कि राजा साबू कैसे रोटरी के पैसे पर अपनी राजनीति करते हैं ? सेमुअल ओवोरि रोटरी के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने जा रहे थे, तो क्या उनकी ऐसी हैसियत नहीं थी कि वह यूगाँडा में एक ब्लड बैंक बनवा लेते ? रोटरी के अलावा, वह यूगाँडा की एक बड़ी हस्ती थे - वहाँ वह एक सेलीब्रिटी बैंकर थे, जो देश के नामी बैंकों में डायरेक्टर, एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर तथा मैनेजिंग डायरेक्टर जैसे प्रमुख पदों पर रह चुके थे । ऐसे में सहज ही समझा जा सकता है कि यूगाँडा में ब्लड बैंक या मेडीकल मिशन के नाम पर कुछ करने की जरूरत होती तो क्या सेमुअल ओवोरि को सचमुच राजा साबू और रमन अनेजा जैसे लोगों से कहना पड़ता । राजा साबू ने जो किया, वह तो सेमुअल ओवोरि के जबर्दस्ती गले पड़ने जैसी बात हुई । इसमें भी राजा साबू यदि अपने पैसे खर्च करते, तो भी चलो कोई बात होती - रोटरी के पैसों पर अपना राजनीतिक भविष्य सँवारने की राजा साबू की कोशिश की पोल खोलता ग्लोबल ग्राँट का विवरण किसी तिलस्मी कहानी से कम रोचक नहीं है, जिसका शीर्षक 'रोटरी के लुटेरे' जैसा कुछ हो सकता है ।
ग्लोबल ग्राँट की तिलस्मी कहानी में रोचक किस्से और भी हैं । एक किस्सा यह भी है कि राजा साबू के क्लब ने कोरिया में गार्डनिंग इकोनॉमिक एक्टिविटीज के नाम पर ग्राँट सहित एक लाख 66 हजार डॉलर इकट्ठा किए, जिसमें क्लब का सहयोग मात्र तीन हजार डॉलर का है । राजा साबू के क्लब के दूसरे पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मधुकर मल्होत्रा ने एक लाख 88 हजार 500 डॉलर मंगोलिया मेडीकल मिशन के नाम पर ग्राँट सहित लिए, अपने क्लब से लेकिन इस मिशन में उन्होंने इकन्नी भी नहीं दी । मंगोलिया मेडीकल मिशन के लिए क्लब से इकन्नी भले ही न ली गई हो, लेकिन मंगोलिया के हवाई टिकिट क्लब की एक अन्य पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कवल बेदी की कंपनी से खरीदे सुने गए हैं । मंगोलिया मेडीकल मिशन में मधुकर मल्होत्रा अपनी पत्नी और राजा साबू के साथ वॉलिंटियर के रूप में गए, जहाँ पर 'पिकनिक' मनाते हुए इनकी तस्वीरों को देख कर डिस्ट्रिक्ट के लोग पहले से ही भड़के हुए थे । जीएमएल में ग्राँट के विवरण देख कर लोगों को लग रहा है कि राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स ने रोटरी के नाम पर रोटरी के पैसों से अपने बिजनेस बढ़ाने, पिकनिक मनाने तथा अपना राजनीतिक भविष्य सँवारने को ही अपना प्रमुख उद्देश्य बना लिया है ।

Wednesday, November 1, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में ग्लोबल ग्रांट को ठिकाने लगाने के उद्देश्य से रमेश अग्रवाल के क्लब के 'पहले' प्रोजेक्ट के दूसरी बार हो रहे उद्घाटन में सुशील गुप्ता की मिलीभगत ने 'वॉश इन स्कूल' प्रोग्राम को ही संदेहास्पद बना दिया है

नई दिल्ली । रमेश अग्रवाल ने अपने क्लब के पहले वॉश इन स्कूल प्रोजेक्ट के तीन नबंवर को होने वाले उद्घाटन का जो निमंत्रण लोगों को दिया है, वह 'वॉश इन स्कूल' प्रोजेक्ट के नाम पर होने वाली धोखाधड़ी का बड़ा दिलचस्प और गंभीर उदाहरण बन गया है । इस उदाहरण में पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता की मिलीभगत ने मामले को और भी ज्यादा गंभीर बना दिया है । सुशील गुप्ता और रमेश अग्रवाल चूँकि 'रोटरी इंडिया वॉश इन स्कूल प्रोग्राम' के क्रमशः चेयरमैन और सेक्रेटरी हैं, इसलिए रमेश अग्रवाल के क्लब द्वारा की जा रही धोखाधड़ी ने पूरे प्रोग्राम को ही संदेहास्पद बना दिया है । उल्लेखनीय है कि रमेश अग्रवाल ने अपने क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली अशोका के पहले वॉश इन स्कूल प्रोजेक्ट के उद्घाटन के नाम पर नोएडा के सेक्टर 93 स्थित गेझा गाँव के स्कूल में तीन नबंवर के जिस कार्यक्रम का निमंत्रण लोगों को दिया है, उस प्रोजेक्ट का उद्घाटन तो दो वर्ष पहले, 7 अगस्त 2015 को तत्कालीन इंटरनेशनल प्रेसीडेंट और तत्कालीन इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई कर चुके हैं । निवर्त्तमान इंटरनेशनल प्रेसीडेंट जोन जर्म जब प्रेसीडेंट इलेक्ट थे, तब रमेश अग्रवाल उन्हें भी इस स्कूल में किए गए अपने क्लब के 'पहले' प्रोजेक्ट का अवलोकन करा चुके हैं । मजे की बात यह है कि गेझा गाँव के स्कूल में रमेश अग्रवाल के क्लब के 'पहले' प्रोजेक्ट का अवलोकन करते जोन जर्म की तस्वीर रमेश अग्रवाल के संपादन में प्रकाशित हो रहे 'रोटरी इंडिया वॉश इन स्कूल प्रोग्राम' के बुलेटिन 'विंस टाइम्स' के मई 2016 के अंक में प्रकाशित भी हो चुकी है ।
दो वर्ष पहले उद्घाटित हो चुके अपने क्लब के 'पहले' वॉश इन स्कूल प्रोजेक्ट का दोबारा उद्घाटन करवाने की जरूरत रमेश अग्रवाल को आखिर क्यों पड़ी ? इस बारे में क्लब के पदाधिकारियों के बीच जो चर्चा है, वह और भी ज्यादा चौंकाने वाली है । क्लब के पदाधिकारियों का ही मानना और कहना है कि दोबारा उद्घाटन का यह नाटक रमेश अग्रवाल को ऑस्ट्रेलियाई डिस्ट्रिक्ट 9810 के क्लब - रोटरी क्लब बॉक्स हिल सेंट्रल के सहयोग से मिली ग्लोबल ग्रांट को ठिकाने लगाने के लिए करना पड़ रहा है । दरअसल ग्लोबल ग्रांट को जस्टिफाई करने के लिए प्रोजेक्ट को वर्ष 2016-17 में पूरा हुआ दिखाना था; लिहाजा रमेश अग्रवाल ने 7 अगस्त 2015 को उद्घाटित हुए प्रोजेक्ट में ही लीपापोती करके उसे और डेकोरेट कर उसे दोबारा उद्घाटन के लिए तैयार कर दिया । मजे की बात यह है कि क्लब के पदाधिकारियों को लेकिन इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि ग्लोबल ग्रांट के तहत इस प्रोजेक्ट के नाम पर कितना पैसा आया है, और वह कहाँ कैसे खर्च हुआ है ? उल्लेखनीय है कि मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम ने निर्देश दिया हुआ है कि डिस्ट्रिक्ट्स में रोटरी के नाम पर चल रहे प्रोजेक्ट्स के हिसाब-किताब की जानकारी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय को दी जानी चाहिए, रमेश अग्रवाल ने लेकिन ग्लोबल ग्रांट के हिसाब-किताब की जानकारी अपने क्लब के पदाधिकारियों तक को नहीं दी है । क्लब के पदाधिकारी इस बात पर भी खफा हैं कि प्रोजेक्ट जब क्लब का है, तो उसके उद्घाटन कार्यक्रम का निमंत्रण उनकी तरफ से जाना चाहिए था, लेकिन रमेश अग्रवाल ने अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए निमंत्रण अपने नाम से भेजा है ।
रमेश अग्रवाल द्वारा अपने क्लब के 'पहले' वॉश इन स्कूल प्रोजेक्ट के दूसरी बार करवाए जा रहे उद्घाटन के मामले में पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता की मिलीभगत ने मामले को और गंभीर बना दिया है । केआर रवींद्रन और मनोज देसाई द्वारा 7 अगस्त 2015 को किए गए उद्घाटन कार्यक्रम में तथा उसके बाद जोन जर्म द्वारा किए गए अवलोकन कार्यक्रम में सुशील गुप्ता भी शामिल तो हुए ही होंगे; न भी हुए हों, तो उन कार्यक्रमों की जानकारी तो उन्हें निश्चित ही होगी; 'विंस टाइम्स' में प्रकाशित तस्वीर भी उन्होंने देखी होगी - उसके बाद भी वह उसी प्रोजेक्ट को दोबारा उद्घाटित करने के लिए आखिर कैसे तैयार हो गए हैं ? गेझा गाँव के स्कूल में रमेश अग्रवाल के क्लब के 'पहले' प्रोजेक्ट का दूसरी बार उद्घाटन करने के लिए सुशील गुप्ता के साथ केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा भी आ रहे हैं । महेश शर्मा को तो रमेश अग्रवाल की इस धोखाधड़ी का पता नहीं होगा, सुशील गुप्ता से तो उम्मीद की जाती है कि उन्हें तो यह पता होना ही चाहिए कि वह जिस प्रोजेक्ट का उद्घाटन करने के लिए तैयार हो गए हैं, वह दो वर्ष पहले ही उद्घाटित हो चुका है । रोटरी इंडिया विंस प्रोग्राम घपलेबाजियों के आरोपों के घेरे में पहले से ही रहा है; उसके बावजूद लेकिन कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था कि प्रोग्राम के सेक्रेटरी रमेश अग्रवाल अपने ही क्लब के प्रोजेक्ट में हेराफेरी के साथ-साथ धोखाधड़ी भी कर लेंगे, और प्रोग्राम के चेयरमैन सुशील गुप्ता आँखें बंद कर उनकी इस धोखाधड़ी में उनका साथ देंगे ।