Sunday, January 7, 2018

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में डायबिटीज की बेईमानी के भुगतान को लेकर इंटरनेशनल डायरेक्टर वीके लूथरा की धमकीभरी 'स्मार्टनेस' पर विनय गर्ग द्वारा किए गए पलटवार ने जगदीश गुलाटी और ग्रांट की रकम को ठिकाने लगा चुके उनके साथियों को सांसत में डाला

नई दिल्ली । इंटरनेशनल डायरेक्टर वीके लूथरा की झूठी धमकीभरी 'स्मार्टनेस' ने डायबिटीज प्रोजेक्ट के लिए एक करोड़ 31 लाख रुपए की रकम से जुड़े विवाद को और गंभीर बना दिया है । मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 के पदाधिकारियों की तरफ से स्पष्ट कर दिया गया है कि वीके लूथरा लायंस इंटरनेशनल के आदेश की झूठी व्याख्या करके उन पर दबाव नहीं बना सकते हैं, और डायबिटीज प्रोजेक्ट के नाम पर हुई लूट में मददगार बनने के लिए उन्हें मजबूर नहीं कर सकते हैं । उल्लेखनीय है कि डाटबिटीज प्रोजेक्ट के लिए आई एक करोड़ 31 लाख रुपए की ग्रांट के अनाप-शनाप खर्च को लेकर मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 के पदाधिकारियों तथा बड़े नेताओं के बीच भुगतान को लेकर पिछले कुछ समय से विवाद चल रहा है । प्रोजेक्ट चेयरमैन जगदीश गुलाटी ने अपने साथी बड़े नेताओं के साथ मिल कर आनन-फानन में उक्त रकम ठिकाने लगा दी है और अब वह चाहते हैं कि मल्टीपल पदाधिकारी उक्त रकम का भुगतान कर दें । मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन विनय गर्ग कह रहे हैं कि जहाँ जो रकम खर्च हुई है, उसका पूरा हिसाब दे कर उसकी जाँच करवा लें और भुगतान ले लें । जगदीश गुलाटी और उनके साथी बड़े नेता इसके लिए तैयार नहीं हैं; वह चाहते हैं कि वह जिस किसी को जितनी रकम देने को कहें, काउंसिल चेयरमैन विनय गर्ग बिना चूँ-चपड़ किए उतनी रकम उसे दे दें । विनय गर्ग इसके लिए तैयार नहीं हैं ।
विनय गर्ग का कहना है कि डायबिटीज प्रोजेक्ट के नाम पर जो खर्चा किया गया है और उसकी जो बिलिंग है, वह काफी संदेहास्पद है और प्रोजेक्ट की रकम में बड़ी लूट-खसोट का आभास देती है । विनय गर्ग ने यह कहते/बताते हुए मामले को खासा गंभीर बना दिया है कि प्रोजेक्ट के तहत जो उपकरण छह से आठ लाख रुपए में खरीदे दिखाए गए हैं, वह खुले बाजार में चार से पाँच लाख रुपए में उपलब्ध सुने जा रहे हैं । इसी तरह कई चीजों के खर्च अनाप-शनाप वृद्धि के साथ दिखाए/बताए गए हैं और ऐसा लगता है कि प्रोजेक्ट की रकम का एक बड़ा हिस्सा प्रोजेक्ट करने वालों ने अपनी जेबों में भर लिया है । विनय गर्ग का कहना है कि वह ऐसे किसी काम में सहभागी नहीं बनेंगे, जिसमें बेईमानी करने के आरोप लगें और लोग उन पर भी उँगलियाँ उठाएँ । विनय गर्ग ने प्रस्ताव रखा कि मल्टीपल में एक कमेटी बनाई जाए, जो खर्च हुए पैसे का वास्तविक मूल्याँकन करे - और वह जो रकम बताए, प्रोजेक्ट की रकम के अकाउंट से उसका भुगतान कर दिया जाए । प्रोजेक्ट चेयरमैन जगदीश गुलाटी और प्रोजेक्ट 'करने' में उनके सहयोगी रहे बड़े नेता इसके लिए राजी नहीं हैं । मजे की बात यह है कि उक्त प्रोजेक्ट मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट के लिए ग्रांट हुआ था, लेकिन इस प्रोजेक्ट को करने में मल्टीपल के सभी डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारियों को शामिल नहीं किया गया, और मनमाने तरीके से कुछ ही लोगों ने इस प्रोजेक्ट की बंदरबाँट कर ली । प्रोजेक्ट को जल्दी से जल्दी पूरा करने की हड़बड़ी में प्रोजेक्ट पूरा करने की सामान्य प्रक्रिया का भी पालन नहीं किया गया; जिसके चलते प्रोजेक्ट में हुए खर्च को एलसीसीआई से पैसा उधार लेकर पूरा किया गया । लायंस इंटरनेशनल के इतिहास में किसी प्रोजेक्ट को पूरा करने में ऐसी हड़बड़ी दिखाने का दूसरा उदाहरण शायद ही मिले, जिसमें प्रोजेक्ट ग्रांट की रकम आ चुकने के बावजूद - उसे खर्च करने की नियमबद्ध प्रक्रिया अपनाने की बजाए कहीं और से उधार लेकर प्रोजेक्ट का खर्च पूरा किया जाए । विवाद और झगड़ा वास्तव में इसी बात का है कि जगदीश गुलाटी और उनके साथी माँग कर रहे हैं कि ग्रांट का पैसा एलसीसीआई को दे दिया जाए, जो प्रोजेक्ट में खर्च हुआ है; विनय गर्ग कह रहे हैं कि पहली बात तो यह कि प्रोजेक्ट ग्रांट का पैसा इस तरह ट्रांसफर नहीं किया जा सकता है, और दूसरी बात यह कि चलो इस बात का तो कोई तोड़ निकाल भी लिया जायेगा - लेकिन मनमाने तरीके से किए/हुए खर्च का आँख मूँद कर तो भुगतान किसी भी तरह से नहीं ही किया जा सकेगा ।
इस विवाद के लायंस इंटरनेशनल कार्यालय में पहुँच जाने से मामला थोड़ा ट्रिकी भी हो गया है । तकनीकी रूप से देखें तो तथ्य यह है कि डायबिटीज प्रोजेक्ट की ग्रांट की रकम अभी खर्च नहीं हुई है । इस तथ्य का संज्ञान लेते हुए एलसीआईएफ कार्यालय ने काउंसिल चेयरमैन विनय गर्ग को पत्र लिख कर उक्त रकम वापस करने के लिए कहा है । एलसीआईएफ कार्यालय की तरफ से लिखे पत्र में साफ कहा गया है कि उक्त ग्रांट की रकम यदि वापस नहीं की गई, तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी और यह मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट को मिलने वाली ग्रांट्स पर पाबंदी के रूप में भी हो सकती है । एलसीआईएफ के इस पत्र की झूठी व्याख्या करते हुए इंटरनेशनल डायरेक्टर वीके लूथरा ने विनय गर्ग को पत्र लिख कर 'धमकाया' है कि उन्होंने यदि जल्दी ही ग्रांट का पैसा रिलीज नहीं किया, तो मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट पर पाबंदी लग जाएगी । विनय गर्ग ने उनकी इस धमकी पर कुछेक लोगों के बीच चुटकी लेते हुए कहा कि थोड़ी अंग्रेजी तो हमें भी आती है और हम भी समझ रहे हैं कि एलसीआईएफ ने मल्टीपल पर नहीं, बल्कि मल्टीपल को मिलने वाली ग्रांट्स पर पाबंदी लगाने की बात कही है । विनय गर्ग की तरफ से कहा जा रहा है कि प्रोजेक्ट के नाम पर हुए खर्च का उन्हें यदि उचित हिसाब-किताब नहीं मिला, तो वह ग्रांट की रकम एलसीआईएफ को वापस भेज देंगे । वीके लूथरा की 'स्मार्टनेस' पर विनय गर्ग द्वारा किए गए पलटवार ने जगदीश गुलाटी और ग्रांट की रकम को ठिकाने लगा चुके उनके साथियों को सांसत में डाल दिया है । उन्हें डर हुआ है कि विनय गर्ग ने यदि सचमुच ग्रांट की रकम को एलसीआईएफ को वापस कर दिया, तो फिर क्या होगा ? वीके लूथरा की धमकी का असर उल्टा पड़ने के बाद जगदीश गुलाटी और उनके संगी-साथी एक बार फिर तेजपाल खिल्लन के साथ सौदेबाजी करने का मौका बनाने की कोशिशों में जुटे हैं । तेजपाल खिल्लन चूँकि लायन लीडर के भेष में एक सौदेबाज व्यवसायी हैं - इसलिए जगदीश गुलाटी और उनके संगी-साथियों को लगता है कि तेजपाल खिल्लन से सौदेबाजी करके ही वह विनय गर्ग से भुगतान ले सकेंगे । ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि विनय गर्ग बिना उचित रिकॉर्ड मिले भुगतान न करने के अपने रवैये पर टिके/बने रहते हैं, और या जगदीश गुलाटी व तेजपाल खिल्लन के बीच होने वाली सौदेबाजी के शिकार बन जाते हैं ।
विनय गर्ग को एलसीआईएफ पदाधिकारी का पत्र :

Saturday, January 6, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए धीरज खंडेलवाल की सक्रियता के पीछे प्रफुल्ल छाजेड़ को 'रोकने' के साथ-साथ वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन विष्णु अग्रवाल से भी निपटने की तैयारी है क्या ?

मुंबई । धीरज खंडेलवाल ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट का आगामी वाइस प्रेसीडेंट बनने/चुनने के लिए जिस तरह से कमर कसी है, उसके चलते वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए वेस्टर्न रीजन में मजबूत समझे/देखे जा रहे प्रफुल्ल छाजेड़ और निहार जम्बूसारिया के लिए गंभीर चुनौती तो पैदा हुई ही है, वाइस प्रेसीडेंट पद का चुनावी परिदृश्य भी दिलचस्प हो उठा है । वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए सदर्न रीजन से अब्राहम बाबु तथा एमपी विजय कुमार की उम्मीदवारी को भी गंभीरता से लिया जा रहा है । उम्मीदवारी के लिए हाथ-पैर तो और भी कई सेंट्रल काउंसिल सदस्य चला रहे हैं और अपने अपने जुगाड़ बैठाने में लगे हैं, लेकिन सतत प्रयासों और सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में अपनी सक्रियता व सदस्यों के बीच अपनी पहचान और खेमेबाजी के समीकरणों के हिसाब से आकलन करने वाले लोग वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए अभी चार लोगों - प्रफुल्ल छाजेड़, निहार जम्बूसारिया, अब्राहम बाबु और एमपी विजय कुमार के बीच ही मुकाबले को देख रहे हैं । प्रफुल्ल छाजेड़ को इंस्टीट्यूट के मौजूदा प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे का समर्थन माना/सुना जा रहा है, तो अब्राहम बाबु के साथ पिछले वर्ष प्रेसीडेंट रहे देवराज रेड्डी के समर्थन की चर्चा सुनी जा रही है । एमपी विजय कुमार को हर वर्ष वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में टाँग अड़ाने वाले पूर्व प्रेसीडेंट उत्तम अग्रवाल के भरोसे देखा/पहचाना जा रहा है, तो निहार जम्बूसारिया दूसरे रीजंस के कुछेक सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के साथ बने अपने संबंधों के भरोसे चुनावी मैदान में हैं । इन चारों को सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के बीच की अलग-अलग तरह की खेमेबाजी का सहयोग/समर्थन तो है ही, साथ ही इनका अपना अपना कार्य-व्यवहार भी है - जिसके चलते वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए इनकी उम्मीदवारी को गंभीरता के साथ देखा जा रहा है ।
लेकिन वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए अचानक से वेस्टर्न रीजन के धीरज खंडेलवाल ने जो सक्रियता दिखाई है, उसने वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव में खासी गर्मी पैदा कर दी है । धीरज खंडेलवाल ने सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में करीब दो वर्षों के अभी तक के अपने कार्यकाल में हालाँकि ऐसी कोई छाप नहीं छोड़ी है, जिसके चलते उनकी उम्मीदवारी को कोई गंभीरता से - लेकिन अचानक से बढ़ी उनकी सक्रियता के पीछे पूर्व प्रेसीडेंट उत्तम अग्रवाल को देखे जाने के कारण मामला थोड़ा रोचक जरूर हो गया है । धीरज खंडेलवाल की लोगों के बीच उत्तम अग्रवाल का 'आदमी' होने की एक बहुत ही मजबूत छवि है - यह छवि धीरज खंडेलवाल की ताकत भी है, और साथ ही साथ उनकी कमजोरी भी है । दरअसल इस छवि के चक्कर में उनकी अपनी पहचान और उनका अपना व्यक्तित्व दब गया है, और इस कारण से उनकी अपनी 'भूमिका' बहुत सिमटी हुई सी रह गई है । इस वजह से, उत्तम अग्रवाल के समर्थन के बावजूद धीरज खंडेलवाल की उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से नहीं देख रहा है, और हर कोई मान/समझ रहा है कि उत्तम अग्रवाल ने प्रफुल्ल छाजेड़ का काम बिगाड़ने के लिए धीरज खंडेलवाल को सक्रिय किया है । उत्तम अग्रवाल को प्रफुल्ल छाजेड़ से यूँ तो कोई समस्या नहीं है; लेकिन प्रफुल्ल छाजेड़ की जीत में चूँकि नीलेश विकमसे की जीत समझी जाएगी - इसलिए उत्तम अग्रवाल को प्रफुल्ल छाजेड़ का काम बिगाड़ने के लिए धीरज खंडेलवाल को सक्रिय करना पड़ा है । उल्लेखनीय है कि वेस्टर्न रीजन में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में उत्तम अग्रवाल का विकमसे भाइयों के साथ पुराना बैर है, और जब जब भी उनके बीच सीधी चुनावी टक्कर हुई है - उत्तम अग्रवाल को हमेशा ही विकमसे भाइयों से हारना ही पड़ा है । इसी बात से पैदा हुई खुन्नस में उत्तम अग्रवाल ने प्रफुल्ल छाजेड़ की उम्मीदवारी के लिए वेस्टर्न रीजन में ही मुसीबत खड़ी करने के उद्देश्य से धीरज खंडेलवाल को सक्रिय कर दिया है ।
धीरज खंडेलवाल को सक्रिय करने की उत्तम अग्रवाल की कार्रवाई से उनके समर्थन के भरोसे बैठे एमपी विजय कुमार को तो झटका लगा ही है, निहार जम्बूसारिया को भी अपना गेमप्लान बिगड़ता हुआ लगा/दिखा है । दरअसल उन्हें उम्मीद थी कि ऐन मौके पर प्रफुल्ल छाजेड़ को बढ़त मिलती दिखी, तो उत्तम अग्रवाल उन्हें समर्थन दे/दिलवा देंगे । निहार जम्बूसारिया के लिए मुसीबत और चुनौती की बात यह है कि उनकी न नीलेश विकमसे से बनती है, और न उत्तम अग्रवाल से । इसके बावजूद उन्हें उत्तम अग्रवाल से 'मदद' मिलने की उम्मीद रही तो इसका कारण यही रहा कि उन्हें पता है कि उत्तम अग्रवाल नकारात्मक राजनीति करते हैं और तात्कालिक हानि-लाभ को देखते हुए अपने पैंतरे बदलते रहते हैं । दीनल शाह को उत्तम अग्रवाल ने हालाँकि कभी पसंद नहीं किया, लेकिन नीलेश विकमसे को रोकने के लिए उन्होंने दीनल शाह से हाथ मिला लेने में कोई गुरेज नहीं किया था - यह बात अलग है कि उसके बावजूद भी वह नीलेश विकमसे को नहीं रोक सके थे । क्या होता, और क्या नहीं होता - यह तो आगे पता चलता; अभी लेकिन उत्तम अग्रवाल की शह पर शुरू हुई धीरज खंडेलवाल की सक्रियता ने निहार जम्बूसारिया की उम्मीदों को वेस्टर्न रीजन में ही झटका जरूर दिया है ।
धीरज खंडेलवाल को वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए उम्मीदवार के रूप में सक्रिय करने के पीछे कुछेक लोगों के बीच उत्तम अग्रवाल की एक अन्य 'जरूरत' को कारण के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । उत्तम अग्रवाल और धीरज खंडेलवाल के कुछेक नजदीकियों का ही कहना है कि यह दोनों वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मौजूदा चेयरमैन विष्णु अग्रवाल की संभावित उम्मीदवारी से डरे हुए हैं । इन्हें डर है कि विष्णु अग्रवाल ने यदि सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत की, तो उसका सीधा असर धीरज खंडेलवाल की सदस्यता पर पड़ेगा । धीरज खंडेलवाल पिछली बार ग्यारह सदस्यों में दसवें नंबर पर रहे थे; सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में भी धीरज खंडेलवाल ने ऐसा कुछ नहीं किया है, जिससे उनके समर्थन-आधार में बढ़ोत्तरी होती हुई देखी जाए । उधर रीजनल काउंसिल चेयरमैन के रूप में विष्णु अग्रवाल के कामकाज की काफी तारीफ हो रही है और रीजन में उनकी पहचान व समर्थन का दायरा खासा बढ़ा है ।  इसलिए विष्णु अग्रवाल की संभावित उम्मीदवारी में धीरज खंडेलवाल के लिए सीधा खतरा देखा/पहचाना जा रहा है । विष्णु अग्रवाल चूँकि उत्तम अग्रवाल के नजदीकी रिश्तेदार हैं, इसलिए दोनों का काफी समर्थन-आधार कॉमन है; यह तथ्य धीरज खंडेलवाल के लिए और भी मुसीबत भरा है । उत्तम अग्रवाल हालाँकि कई मौकों पर कह तो चुके हैं कि विष्णु अग्रवाल सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार नहीं बनेंगे, वह उन्हें नहीं बनने देंगे - और यदि बनेंगे तो वह उनकी उम्मीदवारी का खुला विरोध करेंगे । विष्णु अग्रवाल के नजदीकियों का कहना है कि विष्णु अग्रवाल सेंट्रल काउंसिल के लिए अवश्य ही अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे । ऐसे में, समझा जाता है कि वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए धीरज खंडेलवाल को उम्मीदवार बनवा कर उत्तम अग्रवाल ने उम्मीद यह की है कि इससे धीरज खंडेलवाल की सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता में कुछ 'वजन' बढ़ेगा । बाद में वह लोगों के बीच कह/बता सकेंगे कि धीरज खंडेलवाल तो बस मामूली अंतर से ही वाइस प्रेसीडेंट बनने से रह गए हैं । उन्हें उम्मीद है कि इससे लोगों के बीच धीरज खंडेलवाल की सेंट्रल काउंसिल की सदस्यता को लेकर विश्वास बनेगा/बढ़ेगा - और यह विश्वास ही विष्णु अग्रवाल की उम्मीदवारी से मिलने वाली चुनौती में उनकी मदद करेगा ।

Friday, January 5, 2018

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संदीप सहगल ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव जल्दी करवाने की घोषणा करके कमल शेखर को 'हलाल' करने की विशाल सिन्हा की योजना पर पानी फेरा

लखनऊ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संदीप सहगल की जल्दी चुनाव कराने की घोषणा से विशाल सिन्हा के लिए कमल शेखर को 'लूटना' मुश्किल हुआ है, और इसी मुश्किल में विशाल सिन्हा ने लायन सदस्यों और लायंस क्लब्स की अपनी 'उधारी' चुकाने के लिए कमल शेखर पर दबाव बढ़ा दिया है - जिसके चलते कमल शेखर अपने आप को घिरा/फँसा हुआ महसूस कर रहे हैं । उल्लेखनीय है कि पिछले लायन वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में विशाल सिन्हा को एमजेएफ बने लोगों को बीस-बीस हजार रुपए वापस करना थे, जो उन्होंने अभी तक वापस नहीं किए हैं । इसके अलावा अम्ब्रेला प्रोजेक्ट के नाम पर विशाल सिन्हा ने कई क्लब्स से पैसे तो ले लिए थे, लेकिन उन्हें उसके बदले अम्ब्रेला नहीं दिए - वह क्लब्स लगातार अपना पैसा वापस माँग रहे हैं, लेकिन विशाल सिन्हा उन्हें लगातार 'गोली' देते आ रहे हैं । अब जब सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार के रूप में कमल शेखर पूरी तरह विशाल सिन्हा की गिरफ्त में फँस गए हैं, तो विशाल सिन्हा उन पर लायन सदस्यों और क्लब्स की उक्त 'उधारी' चुकाने के लिए दबाव बना रहे हैं । कमल शेखर के नजदीकियों के अनुसार, उन्होंने हालाँकि कमल शेखर को समझाया हुआ है कि उन्हें विशाल सिन्हा के झाँसे में नहीं आना चाहिए, वह एक बार फँसे तो फिर विशाल सिन्हा उन्हें फँसाता ही जायेगा; लेकिन नजदीकियों को भी लग रहा है कि 'बकरे की माँ आखिर कब तक ख़ैर मनाएगी' । मजे की बात है कि कमल शेखर को हर किसी ने समझाया है कि विशाल सिन्हा की लप्पेबाजी और लफ्फाजी में मत फँसना; क्योंकि उसका उद्देश्य सिर्फ पैसे ऐंठना ही रहेगा - जैसे उसने पिछली बार अशोक अग्रवाल से ऐंठे थे । पिछली बार 'ठोकर' खा कर और 'ठगी' का शिकार बन कर अशोक अग्रवाल तो संभल गए, और इस बार विशाल सिन्हा के चक्कर में फँसने से अपने आपको बचा ले गए । लेकिन जिस तरह शिकारी को और ठग को 'शिकार' मिल ही जाता है, उसी तरह विशाल सिन्हा को भी कमल शेखर मिल गए ।
विशाल सिन्हा को कमल शेखर मिल तो गए, लेकिन कमल शेखर उनके कहे अनुसार अपनी जेब ढीली करने के लिए अभी तक तैयार नहीं हो रहे हैं । विशाल सिन्हा हालाँकि आश्वस्त थे कि अप्रैल में जब तक चुनाव होने का मौका आएगा, वह कमल शेखर को 'तैयार' कर लेंगे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संदीप सहगल ने लेकिन फरवरी में ही चुनाव की घोषणा कर के विशाल सिन्हा की योजना पर पानी फेर दिया है । विशाल सिन्हा ने कमल शेखर को 'हलाल' करने की योजना बनाई थी, लेकिन संदीप सहगल की चाल ने उनके सामने कमल शेखर को 'झटके' का शिकार बनाने की मजबूरी पैदा कर दी है । इसी मजबूरी में विशाल सिन्हा को कमल शेखर से अभी ही कहना पड़ा है कि एमजेएफ बने सदस्यों और अम्ब्रेला प्रोजेक्ट में पैसे देने वाले क्लब्स के पैसे वापस नहीं किए गए, तो उन क्लब्स के वोट लेने मुश्किल हो जायेंगे । विशाल सिन्हा को विश्वास है कि कमल शेखर उनकी 'उधारी' भरेगा, नहीं भरेगा तो 'मरेगा' - उनका क्या जायेगा । कमल शेखर के नजदीकियों के अनुसार, कमल शेखर के लिए चिंता और सोचने की बात यह है कि विशाल सिन्हा की 'उधारी' चुकाने के बाद भी क्या वह चुनाव जीत सकेंगे ? लोगों ने पहले भी उन्हें समझाया है और अब फिर उन्हें समझा रहे हैं कि जो विशाल सिन्हा अपना खुद का चुनाव नहीं जीत सका था, वह उन्हें क्या चुनाव जितवायेगा ? पिछले कुछेक वर्षों का रिकॉर्ड देख लो - सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वही बन सका है, जिसको केएस लूथरा का समर्थन मिला है । विशाल सिन्हा सिर्फ सब्ज़बाग दिखायेगा, ताकि पैसे ऐंठ सके - जैसा कि उसने अशोक अग्रवाल के साथ किया था ।
कमल शेखर की उम्मीदवारी को दो कारणों से भारी मुश्किल में देखा/पहचाना जा रहा है - एक कारण तो यही जो पीछे बताया गया है कि पिछले वर्षों में वही उम्मीदवार, जिनमें खुद विशाल सिन्हा भी शामिल है, सफल हुआ है - जिसे केएस लूथरा का समर्थन मिला है; यह कारण और गहरा व मजबूत बना है क्योंकि लगातार मिलती पराजयों से गुरनाम सिंह खेमे की ताकत और घट गई है । दूसरा कारण डिस्ट्रिक्ट का चुनावी इतिहास है : इसके अनुसार, हारा हुआ उम्मीदवार अगली बार अवश्य ही कामयाब होता है । यह इतिहास गुरनाम सिंह से शुरू हुआ; पहली बार वह हारे, लेकिन अगले वर्ष वह सफल हुए । यह इतिहास फिर विनय भारद्वाज, मंजु सक्सेना, जीएल गुप्ता से होता हुआ विशाल सिन्हा तक चला आया है - और अब अशोक अग्रवाल के साथ फिर घटित होने की तैयारी में है । कमल शेखर को उनके शुभचिंतकों की तरफ से समझाया जा रहा है कि उन्हें यह मान/समझ कर चुनाव लड़ना चाहिए कि उन्हें हारना ही है, ताकि वह अगली बार के लिए अपनी जीत को सुनिश्चित कर सकें - विशाल सिन्हा उन्हें जीत का सपना दिखाते हुए उनसे अनाप-शनाप पैसे खर्च करवाने की कोशिश करेगा, उससे उन्हें बचना चाहिए । कमल शेखर के नजदीकियों के अनुसार, कमल शेखर सावधान तो बहुत हैं - लेकिन चुनाव जल्दी होने की घोषणा के कारण विशाल सिन्हा ने उन पर दबाव बनाना भी तेज कर दिया है । देखना दिलचस्प होगा कि विशाल सिन्हा की लूट-खसोट से कमल शेखर बच पाते हैं या उसका 'शिकार' बनते हैं ।

Thursday, January 4, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के नॉर्दर्न रीजन में स्टूडेंट कन्वेंशन करवाने को लेकर नितिन कँवर की आड़ में बोर्ड ऑफ स्टडीज के चेयरमैन अतुल गुप्ता द्वारा चली गई चाल ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सत्ता खेमे को भी विभाजन किया, जिसके चलते मीटिंग स्थगित करने की नौबत आई

नई दिल्ली । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की बोर्ड ऑफ स्टडीज कमेटी के चेयरमैन अतुल गुप्ता ने निकासा चेयरमैन नितिन कँवर को शिखंडी की तरह इस्तेमाल करके स्टूडेंट कन्वेंशन को नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की अनुमति दिलवाने की जो चाल चली, उसके चलते रीजनल काउंसिल के सत्ता खेमे में ही फूट पड़ गई है - जिसका नतीजा यह देखने में आया कि सत्ता खेमे में अगले वर्ष चेयरमैन बनने की तैयारी कर रहे पंकज पेरिवाल ने ही काउंसिल की मीटिंग का बहिष्कार कर दिया । पंकज पेरिवाल की अनुपस्थिति के कारण मीटिंग में सत्ता खेमे की 'ताकत' और घट गई, जिसके चलते उसके प्रस्तावों के पास होने की संभावना भी घट गई - फलस्वरूप फजीहत से बचने के लिए चेयरमैन राकेश मक्कड़ ने मीटिंग ही स्थगित कर दी । मीटिंग स्थगित करने के उनके फैसले से पहले स्टूडेंट कन्वेंशन के लिए काउंसिल की अनुमति लेने का प्रस्ताव और बजट पास करने का प्रस्ताव फेल हो ही चुका था । उल्लेखनीय है कि नितिन कँवर द्वारा तैयार किया गया स्टूडेंट कन्वेंशन का प्रस्ताव अनाप-शनाप और महँगे बजट के कारण पहले से ही रीजनल काउंसिल के बहुमत सदस्यों के निशाने पर है; लेकिन जब से यह बात सामने आई है कि स्टूडेंट कन्वेंशन नितिन कँवर से भी ज्यादा सेंट्रल काउंसिल सदस्य अतुल गुप्ता की 'जरूरत' है, तब से स्टूडेंट कन्वेंशन को लेकर सत्ता खेमे में भी विभाजन हो गया है । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सत्ता खेमे के सदस्य दरअसल इस बात पर भड़के हुए हैं कि बोर्ड ऑफ स्टडीज के चेयरमैन के रूप में अतुल गुप्ता पहले तो अनाप-शनाप व महँगे बजट को लेकर राकेश मक्कड़ व नितिन कँवर की गर्दन दबोचने में विरोधी खेमे के सदस्यों के सुर में सुर मिला रहे थे, लेकिन अब वह राकेश मक्कड़ व नितिन कँवर की खुशामद में लगे हुए हैं । गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले अतुल गुप्ता के इस रवैये को लेकर सत्ता खेमे के सदस्यों के बीच ही जिस तरह की नाराजगी पैदा हुई है, उसके कारण स्टूडेंट कन्वेंशन को लेकर रीजनल काउंसिल में वास्तव में अब किसी को भी दिलचस्पी नहीं रह गई है । 
उल्लेखनीय है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के पाँचों रीजंस में नॉर्दर्न रीजन ही अकेला रीजन बचा रह गया है, जहाँ स्टूडेंट कन्वेंशन नहीं हो सकी है । इंस्टीट्यूट में अतुल गुप्ता इसी नॉर्दर्न रीजन का प्रतिनिधित्व करते हैं । स्टूडेंट कन्वेंशन बोर्ड ऑफ स्टडीज का एक महत्त्वपूर्ण आयोजन होता है । ऐसे में, अतुल गुप्ता के लिए शर्मनाक स्थिति यह बनी है कि बोर्ड ऑफ स्टडीज के चेयरमैन होते हुए उनके अपने ही रीजन में स्टूडेंट कन्वेंशन नहीं हो पा रही है । अतुल गुप्ता वैसे तो बड़े जुगाड़ु व्यक्ति के रूप में देखे/पहचाने जाते हैं, और जिसके चलते चारों दिशाओं में उनका डंका बजता हुआ सुनाई देता है । लेकिन अपने ही रीजन में, स्टूडेंट कन्वेंशन न करवा पाने के रूप में - अपने ही 'घर' में जो 'मार' पड़ रही है, वह उनकी तमाम उपलब्धियों पर भारी पड़ रही है, और इस बात ने उन्हें सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के बीच बेहद शर्मिंदगी की स्थिति में ला दिया है । नितिन कँवर ने अपने नजदीकियों को ही बताया है कि इस शर्मिंदगी से बचने के लिए अतुल गुप्ता किसी भी तरह से स्टूडेंट कन्वेंशन कर लेने के जुगाड़ में लगे हैं । नितिन कँवर के अनुसार, अतुल गुप्ता तो एक मौके पर इस बात के लिए भी राजी हो गए थे कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल को किनारे रख कर - बोर्ड ऑफ स्टडीज व निकासा मिल कर स्टूडेंट कन्वेंशन का आयोजन कर लें । नितिन कँवर ने ही लोगों को बताया है कि अतुल गुप्ता स्टूडेंट कन्वेंशन करने के लिए जुगाड़ बैठाने हेतु उनकी खुशामद में लगे हुए हैं । मजे की बात यह है कि अभी कुछ ही दिन पहले अतुल गुप्ता लोगों के बीच नितिन कँवर की बदतमीजियों का रोना रोते फिर रहे थे और बता रहे थे कि कैसे नितिन कँवर ने उन्हें भी अपनी बदतमीजी का शिकार बना लिया है ।
नितिन कँवर द्वारा की गई बदतमीजी का शिकार होने के बाद से ही अतुल गुप्ता उनसे बुरी तरह खफा चल रहे थे, किंतु अब जब अपने ही रीजन में स्टूडेंट कन्वेंशन करवाने की जरूरत उनके सामने आ पड़ी तो अतुल गुप्ता ने पलटी मारी और वह नितिन कँवर की खुशामद में लग गए । अतुल गुप्ता का समर्थन मिला तो नितिन कँवर और ज्यादा जोशोखरोश के साथ स्टूडेंट कन्वेंशन के लिए रीजनल काउंसिल की अनुमति लेने की कोशिशों में जुट गए । अनाप-शनाप और महँगे बजट के नाम पर हो रहे विरोध को देखते हुए नितिन कँवर ने बजट को 35 लाख से घटा कर करीब 25 लाख का भी कर लिया, लेकिन विरोधियों की आपत्तियां जहाँ की तहाँ ही बनी हुई हैं । उन्हें 25 लाख का बजट भी ज्यादा लग रहा है । उनका कहना है कि स्टूडेंट कन्वेंशन में जितने स्टूडेंट्स आते हैं, उतने स्टूडेंट्स के लिए आठ/दस लाख में बढ़िया तैयारी की जा सकती है । विरोधियों का आरोप है कि स्टूडेंट्स की ज्यादा संख्या और कई चीजों के खर्च को बढ़ा-चढ़ा कर दिखा कर नितिन कँवर कन्वेंशन के नाम पर दरअसल अपनी और अपने साथियों की जेबें भरने का इंतजाम कर रहे हैं । पिछले वर्ष हुए घाटे का उदाहरण सामने रख कर विरोधियों का कहना है कि अनाप-शनाप खर्चों के कारण काउंसिल का बजट गड़बड़ाता है, और फिर जरूरी काम तक करना मुश्किल हो जाता है । विरोधियों का कहना है कि नितिन कँवर और काउंसिल में पदाधिकारी उनके साथी एक तरफ तो पैसे की कमी का रोना रोते हुए लाइब्रेरीज बंद करने के प्रयास कर रहे हैं, और दूसरी तरफ कन्वेंशन के नाम पर पैसा लुटाने/बहाने की योजना बना रहे हैं ।
बोर्ड ऑफ स्टडीज के चेयरमैन के रूप में अतुल गुप्ता के रवैये पर भी रीजनल काउंसिल के अधिकतर सदस्यों को हैरानी है । उनका कहना है कि रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों की लूट-खसोट पर अतुल गुप्ता पहले तो ऐतराज करते थे, लेकिन अब उन्होंने जिस तरह से न सिर्फ चुप्पी साध ली है बल्कि उनके समर्थक भी बन गए हैं, उसके चलते रीजनल काउंसिल के 'लुटेरे' पदाधिकारियों के हौंसले और बढ़ गए हैं । रीजनल काउंसिल के अधिकतर सदस्यों का कहना है कि अतुल गुप्ता क्यों नहीं नितिन कँवर और उनके साथी पदाधिकारियों को समझाते कि कन्वेशन के नाम पर फालतू पैसा बहाने की बजाए यदि लाइब्रेरीज को सुचारू रूप से चलाने का काम किया जायेगा, तो स्टूडेंट्स का ज्यादा फायदा होगा । इस तरह की बातों से लग रहा है कि स्टूडेंट कन्वेंशन के नाम पर नितिन कँवर और अतुल गुप्ता जिस तरह पुराने बैर-भाव भूल कर गले मिल रहे हैं, उसके चलते दोनों को ही अलग अलग मोर्चों पर फजीहत का शिकार होना पड़ रहा है ।

Wednesday, January 3, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में हुई बेईमानी पर दीपक तलवार के क्लब की तरफ से हुई शिकायत में अपना नाम होने से भड़के सुशील खुराना ने विनोद बंसल को भी लपेटे में लिया

गुरुग्राम । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में वोटर्स को प्रभावित करने तथा उनके वोट अपने यहाँ और अपने सामने डलवाने के आरोप में घिरे पूर्व गवर्नर सुशील खुराना ने अन्य दो पूर्व गवर्नर्स - दीपक तलवार और विनोद बंसल के खिलाफ जिस तरह से मोर्चा खोल दिया है, उसके चलते डिस्ट्रिक्ट का माहौल खासा गर्मा गया है । उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब दिल्ली चाणक्यपुरी के प्रेसीडेंट एसएन चतुर्वेदी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में पक्षपातपूर्ण तरीके से बेईमानी होने का आरोप लगाते हुए जो आरोप-पत्र दिया है, उसमें सुशील खुराना की भूमिका का खासतौर से जिक्र करते हुए बताया गया है कि उन्होंने रोटरी क्लब गुरुग्राम के प्रेसीडेंट त्रिलोक गर्ग तथा रोटरी क्लब गुरुग्राम मिलिनियम के प्रेसीडेंट दीपांकर सेठी को अपने कल्याणी अस्पताल में बुलाया और उन्हें अपने सामने वोट डालने के लिए मजबूर किया । आरोप पत्र में दावा किया गया है कि दोनों क्लब्स के पड़े वोटों की टाईमिंग, लोकेशन तथा आईपी ऐड्रेस में इस बात का सुबूत देखा जा सकता है । सुशील खुराना पर रोटरी क्लब गुरुग्राम क़ुतुब के प्रेसीडेंट विमल सिंघानिया को संजीव राय मेहरा को वोट देने के लिए धमकाने का भी आरोप लगाया गया है । यह आरोप पत्र चूँकि दीपक तलवार के क्लब के प्रेसीडेंट की तरफ से दिया गया है, इसलिए सुशील खुराना ने आरोप पत्र में उनका नाम भी घसीटे जाने के लिए दीपक तलवार को जिम्मेदार ठहराया है । सुशील खुराना का कहना है कि दीपक तलवार अपने उम्मीदवार की हार से बौखला गए हैं, और इसलिए उन्होंने आरोपों के घेरे में उन्हें भी शामिल कर/करवा दिया है । मजे की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में अभी तक सुशील खुराना और दीपक तलवार को एकसाथ देखा जाता रहा है, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में दीपक तलवार की तरफ से सुशील खुराना पर धोखा देने का आरोप सुना जा रहा है, तो सुशील खुराना की तरफ से दीपक तलवार पर उन्हें बदनाम करने का आरोप मढ़ा जा रहा है ।
सुशील खुराना और दीपक तलवार के बीच खिंची तलवारों ने डिस्ट्रिक्ट के राजनीतिक माहौल को रोमांचक बनाया हुआ है । हालाँकि बहुत से लोगों के लिए यह समझना मुश्किल बना हुआ है कि सुशील खुराना ने ऐन मौके पर दीपक तलवार को आखिर धोखा क्यों दिया ? सुशील खुराना शुरू से ही दीपक तलवार के उम्मीदवार के रूप में देखे जा रहे अनूप मित्तल की उम्मीदवारी का समर्थन करने का संकेत दे रहे थे । दीपक तलवार के साथ सुशील खुराना की जिस तरह की 'दोस्ती' रही है, उसके चलते किसी को कभी उनके संकेतों पर शक भी नहीं हुआ - इसलिए ऐन मौके पर सुशील खुराना को जब अचानक से संजीव राय मेहरा के पक्ष में वोट इकट्ठा करते और डलवाते देखा गया, तो दीपक तलवार सहित दूसरे लोगों का भी माथा ठनका । किसी के लिए भी समझना मुश्किल हुआ कि ऐन मौके पर सुशील खुराना को पलटी मारने का हुनर दिखाने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी ? यह सवाल अनसुलझा ही रह जाता, यदि सुशील खुराना डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में हुई बेईमानी के आरोपों के झमेले में विनोद बंसल को भी निशाने पर न ले लेते । सुशील खुराना ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया है कि रोटरी क्लब दिल्ली चाणक्यपुरी के प्रेसीडेंट के आरोप पत्र में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट विनय भाटिया और पप्पूजीत सिंह सरना व अमित जोनेजा जैसे सिपहसालारों पर तो पक्षपातपूर्ण ढंग से सक्रिय होने का आरोप लगाया गया है, लेकिन इनके 'रिंग मास्टर' विनोद बंसल को छोड़ दिया गया है । सुशील खुराना का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट में क्या कोई विश्वास कर सकता है कि विनोद बंसल की सहमति के बिना यह तीनों सक्रिय हुए होंगे ? सुशील खुराना की इस बात को 'आधा सच और आधा फ़साना' की तरह देखा/समझा जा रहा है । लोगों का कहना है कि हो सकता है कि विनय भाटिया, पप्पूजीत सिंह सरना और अमित जोनेजा की सक्रियता विनोद बंसल के निर्देश तथा उनकी सहमति से ही हुई हो; लेकिन किसी प्रेसीडेंट ने विनोद बंसल पर धमकाने और या अपने ऑफिस में बुलवा कर अपने सामने वोट डलवाने का आरोप तो नहीं लगाया है - इसलिए चुनावी बेईमानी के आरोप पत्र के तथ्यात्मक विवरण में उनका नाम न होने पर आश्चर्य कैसा ?
विनोद बंसल का नाम आरोप पत्र में न होने पर लोगों को आश्चर्य भले न हो, पर सुशील खुराना को है - और उन्होंने इसे जाहिर भी किया है तो इसे विनोद बंसल के प्रति सुशील खुराना की खुन्नस के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । लोगों को लगा है कि विनोद बंसल के साथ सीओएल चुनाव को लेकर उनकी जो खुन्नस थी, वह अभी भी हिलोरे में है और इसी बात का फायदा उठा कर रवि चौधरी ने उन्हें अपने साथ कर लिया । समझा जा रहा है कि सीओएल के चुनाव में विनोद बंसल से मिलने वाली चुनौती से निपटने में रवि चौधरी ने उनकी जो मदद की थी, उसका ही एहसान चुकाने के लिए वह दीपक तलवार के साथ धोखा करने को तैयार हो गए । दीपक तलवार के साथ धोखा करने की स्थिति के बीज भी वास्तव में सीओएल के चुनाव के दौरान ही पड़ गए थे । दरअसल विनोद बंसल से मिलने वाली चुनौती से निपटने के मामले में सुशील खुराना को दीपक तलवार से कोई मदद नहीं मिली थी; बल्कि दीपक तलवार ने तो उन्हें समझाने की कोशिश की थी कि चुनाव की स्थिति में विनोद बंसल का पलड़ा भारी रहेगा और इसलिए उन्हें सीओएल का चक्कर छोड़ ही देना चाहिए । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रवि चौधरी भी उस समय विनोद बंसल के नजदीक थे, इसलिए सुशील खुराना को सीओएल दूर दिख रही थी - लेकिन फिर अचानक रवि चौधरी ने सुशील खुराना की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया । रवि चौधरी की इस हरकत से विनोद बंसल का हौंसला टूट गया और फिर वह सीओएल की चुनावी दौड़ से ही बाहर हो गए, और सुशील खुराना के लिए सीओएल का रास्ता आसान हो गया । सीओएल के चुनाव में रवि चौधरी ने सुशील खुराना की मदद की थी, तो उसके ऐवज में सुशील खुराना ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में रवि चौधरी की मदद की - और अपने पुराने साथी रहे दीपक तलवार के साथ धोखा करने से भी उन्होंने कोई परहेज नहीं किया ।
सुशील खुराना ने रवि चौधरी के साथ मिल कर पहले विनोद बंसल को और अब दीपक तलवार को राजनीतिक रूप से 'मार' तो लिया, लेकिन पक्षपातपूर्ण चुनावी बेईमानी में नाम आने से वह मुसीबत में भी फँस गए हैं । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में पक्षपातपूर्ण भूमिका निभाने के कारण 'चुनावी अपराधी' के रूप में सुशील खुराना रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड की लताड़ खा चुके हैं । लताड़ लगाते हुए बोर्ड के फैसले में कहा गया था कि अभी तो सिर्फ चेतावनी दे कर छोड़ा जा रहा है, लेकिन यदि दोबारा 'ऐसी' शिकायत मिली, तो आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी । सुशील खुराना के लिए चिंता और परेशानी की बात यह है कि रोटरी क्लब दिल्ली चाणक्यपुरी के प्रेसीडेंट द्वारा तैयार किया गया और डिस्ट्रिक्ट की इलेक्शन ग्रीवेंस कमेटी को भेजा गया आरोप पत्र यदि रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों को भी भेजा गया तो वह वहाँ एक ऐसे 'चुनावी अपराधी' के रूप में 'पेश' होंगे, जिन पर इंटरनेशनल बोर्ड की चेतावनी का भी कोई असर नहीं हुआ है । ऐसे में, सुशील खुराना को डर है कि रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड कहीं उनके खिलाफ सचमुच कड़ी कार्रवाई न कर दे । हाल-फिलहाल के दिनों में कई एक पूर्व गवर्नर अलग अलग तरह की हरकतों के चलते जिस तरह से रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों के कठोर फैसलों के शिकार हो चुके हैं, उसके कारण सुशील खुराना का डर और बढ़ गया है । सुशील खुराना के लिए फजीहत की बात यह और है कि पिछली बार जब इंटरनेशनल बोर्ड की लताड़ पड़ी थी, तब 'चुनावी अपराधी' के रूप में उनके साथ दीपक तलवार और विनोद बंसल का नाम भी था - अब लेकिन यह दोनों तो चतुराई से बच गए हैं, और सुशील खुराना अकेले फँस गए हैं । इसलिए सुशील खुराना यह कोशिश भी करते सुने जा रहे हैं कि वह दीपक तलवार को इस बात के लिए राजी करने में भी जुटे हैं कि वह एसएन चतुर्वेदी के आरोप पत्र से उनका नाम हटवा/निकलवा दें ।

Tuesday, January 2, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट प्रवीन गोयल द्वारा ग्लोबल ग्रांट के प्रस्ताव लेने की हड़बड़ी के पीछे राजा साबू की छत्रछाया में ग्लोबल ग्रांट हड़पने की योजना को पूरा करने की तरकीब को देखा/पहचाना जा रहा है

चंडीगढ़ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट प्रवीन गोयल की अगले रोटरी वर्ष की टीम का 'परिचय' शीर्षक से हो रहा पहला कार्यक्रम ग्लोबल ग्रांट के लिए प्रस्ताव माँगने तथा निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा का मौजूदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी से पैसे ऐंठने की कोशिश के चलते विवाद में पड़ गया है । प्रवीन गोयल ने अपने पहले कार्यक्रम का निमंत्रण देते हुए प्रेसीडेंट्स इलेक्ट को संबोधित जो पत्र लिखा है, उसमें ग्लोबल ग्रांट के लिए आवेदन देने पर जिस तरह से जोर दिया है - उससे आभास मिला है कि डिस्ट्रिक्ट में ग्लोबल ग्रांट्स के बल-बूते राजनीति, धंधा और मौज-मजा करने वाले गिरोह ने प्रवीन गोयल को अपनी गिरफ्त में ले लिया है और प्रवीन गोयल ने उनके 'एजेंडे' पर अमल करना शुरू कर दिया है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट 3080 में पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू की छत्रछाया में ग्लोबल ग्रांट्स 'हड़पने' के काम को संगठित रूप दे दिया गया है । इसके तहत ग्लोबल ग्रांट 'बटोरने' और मनमाने तरीके से उसका इस्तेमाल अपनी राजनीति करने में, अपने धंधे को बढ़ाने में और अपना मौज-मजा करने में किया जाता रहा है । पिछले दिनों राजा साबू की छत्रछाया में चलने वाले इस संगठित 'धंधे' के जो कुछ तथ्य सामने आये हैं, वह हैरान करने वाले हैं - और जो ग्लोबल ग्रांट जैसे रोटरी इंटरनेशनल की महत्त्वपूर्ण योजना को रोटरी इंटरनेशनल के ही एक पूर्व प्रेसीडेंट द्वारा मजाक और 'लूट' का जरिया बना देने के उदाहरण और सुबूत पेश करते हैं । राजा साबू की छत्रछाया में चलने वाले इस संगठित धंधे में यह कमाल भी हुआ कि खुद राजा साबू के क्लब में कई कई ग्लोबल ग्रांट्स ली गईं, जिनके पैसों पर खुद राजा साबू दूसरे देशों में बाज उड़ाते और मधुकर मल्होत्रा अपनी पत्नी के साथ दूसरे देशों में सैरसपाटा करते देखे/पाए गए । कुछेक ग्लोबल ग्रांट्स में तो यहाँ तक हुआ कि क्लब की तरफ से बिना इकन्नी दिए ही ग्रांट हड़प ली गई । यानि राजा साबू की छत्रछाया में ग्लोबल ग्रांट के बलबूते 'हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा' का पूरा इंतजाम कर लिया गया । इस सब की पोल खुलने के बाद उम्मीद की गई थी कि राजा साबू की छत्रछाया में चलने वाले इस संगठित धंधे पर रोक लगेगी और ग्लोबल ग्रांट्स का नियमानुसार बेहतर इस्तेमाल हो सकेगा ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट प्रवीन गोयल ने लेकिन अपने पहले ही कार्यक्रम में जिस तरह से ग्लोबल ग्रांट के लिए प्रस्ताव माँगे हैं, उससे संकेत मिले हैं कि राजा साबू की छत्रछाया में ग्लोबल ग्रांट हड़पने का खेल अभी बंद नहीं हुआ है - बल्कि प्रवीन गोयल के जरिए ग्लोबल ग्रांट को हड़पने के खेल को तेज और कर दिया गया है । यहाँ ध्यान में रखने की बात यह है कि प्रवीन गोयल, राजा साबू के क्लब के ही सदस्य हैं । अपने पहले कार्यक्रम का निमंत्रण देते हुए, प्रेसीडेंट्स इलेक्ट को संबोधित पत्र में प्रवीन गोयल ने कहा है कि वह 14 जनवरी को इंटरनेशनल असेंबली के लिए रवाना हो रहे हैं, इसलिए 'जरूरी' है कि ग्लोबल ग्रांट के लिए प्रस्ताव 6 जनवरी के उक्त कार्यक्रम में सौंप दिए जाएँ । अपने पत्र में प्रवीन गोयल का यह कहना इस बात का सुबूत है कि ग्लोबल ग्रांट के लिए अप्लाई करने की प्रक्रिया का खुद उन्हें भी कोई ज्ञान नहीं है, और वह 'किसी और के' निर्देश पर ग्लोबल ग्रांट के प्रस्ताव लेने की खानापूरी करने की हड़बड़ी में हैं ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट प्रवीन गोयल ग्लोबल ग्रांट के लिए अप्लाई करने की प्रक्रिया का यदि प्रारंभिक ज्ञान भी प्राप्त कर लेते तो उन्हें इतना तो पता हो ही जाता कि इंटरनेशनल असेंबली में शामिल होने जा रहे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट को अपने साथ ग्लोबल ग्रांट्स के प्रस्ताव ले जाना कतई 'जरूरी' नहीं है । दो व्यावहारिक बातें भी हैं : पहली यह कि अभी खुद प्रवीन गोयल की और 'उनके' प्रेसीडेंट्स की ट्रेनिंग होनी है, प्रेसीडेंट इलेक्ट से यह उम्मीद करना कि वह अपने 'परिचय' कार्यक्रम में ग्लोबल ग्रांट का प्रस्ताव तैयार करके ले आएगा - बताता/दिखाता है कि प्रवीन गोयल को अभी बहुत ट्रेनिंग की जरूरत है; दूसरी बात यह कि रोटरी की व्यवस्था और नियमों के अनुसार किसी भी वर्ष रोटरी का अधिकृत काम उस वर्ष के क्लब-प्रेसीडेंट तथा उस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के मार्फ़त ही हो सकता है, प्रवीन गोयल लेकिन दोनों को ही किनारे करके ग्लोबल ग्रांट के प्रस्ताव माँगने को जिस तरह जरूरी बता रहे हैं उससे साबित कर रहे हैं कि उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार संभालने के लिए तैयारी भले ही शुरू कर दी है - लेकिन वह रोटरी का बुनियादी ज्ञान और समझ अभी तक भी प्राप्त नहीं कर सके हैं । रोटरी इंटरनेशनल की व्यवस्था और उसके नियमों की अनदेखी करते हुए प्रवीन गोयल ने प्रेसीडेंट्स इलेक्ट के लिए 6 जनवरी के कार्यक्रम में ग्लोबल ग्रांट के प्रस्ताव देने को जिस हड़बड़ी के साथ 'जरूरी' करार दिया है, उसके पीछे राजा साबू की छत्रछाया में ग्लोबल ग्रांट हड़पने की संगठित योजना को पूरा करने की तरकीब को छिपा देखा/पहचाना जा रहा है ।
प्रवीन गोयल के 6 जनवरी के कार्यक्रम की आड़ में निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा ने मौजूदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी से करीब 80 हजार रुपए ऐंठने की जो कोशिश की है, वह और भी मजेदार किस्सा है । उल्लेखनीय है डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रमन अनेजा ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में टीके रूबी द्वारा किए गए पेट्स के आयोजन में तो एक नए पैसे का सहयोग नहीं दिया - डिस्ट्रिक्ट की व्यवस्था के अनुसार जो उन्हें देना चाहिए था, लेकिन अब रमन अनेजा माँग कर रहे हैं कि प्रवीन गोयल के कार्यक्रम के लिए दिया जाने वाला पैसा टीके रूबी उन्हें दे दें । टीके रूबी का कहना रहा है कि जिस तरह से उन्होंने अपने खर्चे स्वयं वहन किए हैं, उसी तरह से प्रवीन गोयल को भी अपने खर्चे स्वयं करने चाहिएँ - प्रवीन गोयल ने 1300 रुपए और 2250 रुपए का रजिस्ट्रेशन चार्ज बसूल करके अपने कार्यक्रम के खर्चे की व्यवस्था कर भी ली है, लेकिन रमन अनेजा को फिर भी टीके रूबी से करीब 80 हजार रुपए चाहिए हीं । दरअसल रमन अनेजा ने पिछले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में प्रवीन गोयल द्वारा किए गए कार्यक्रम के खर्च के लिए कुछ पैसे खर्च किए थे, लेकिन डिस्ट्रिक्ट में हुए उलटफेर के चलते फिर वह कार्यक्रम हुआ ही नहीं, जिसके चलते रमन अनेजा के करीब 80 हजार रुपए फँसे । रमन अनेजा को वह रकम प्रवीन गोयल से माँगनी चाहिए, जो अपने कार्यक्रम का खर्च पूरा करने के लिए रजिस्ट्रेशन चार्ज बसूल रहे हैं - और लोगों के कहे अनुसार ज्यादा ही बसूल रहे हैं; रमन अनेजा उक्त रकम लेकिन टीके रूबी से झटकने की कोशिश कर रहे हैं ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में प्रवीन गोयल द्वारा ग्लोबल ग्रांट के प्रस्ताव सौंपने को जरूरी बताने तथा निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा द्वारा मौजूदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी से रकम ऐंठने की कोशिश ने प्रवीन गोयल के पहले ही कार्यक्रम को विवादस्पद बना दिया है । इन बातों से लगता है कि प्रवीन गोयल के गवर्नर-काल में रोटरी की व्यवस्थाओं और नियम-कानूनों का मजाक बनना देखने के मजेदार मौके मिलते रहेंगे ।

Monday, January 1, 2018

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में दिल्ली में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार चुनने में हो देरी से बनी स्थिति ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के समीकरणों में उलटफेर होने की परिस्थितियाँ बनाते हुए आरके शाह को चुनावी मुकाबले में 'स्पेस' दिया और महत्त्वपूर्ण बना दिया है

नई दिल्ली । आनंद दुआ और आरके अग्रवाल में से किसी एक को फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार चुनने के मामले में दिल्ली के पूर्व गवर्नर्स नेताओं की बढ़ती असमंजसता ने डिस्ट्रिक्ट के चुनावी समीकरणों में उलटफेर का माहौल बनाना शुरू कर दिया है, जिसका फायदा उठाने के लिए आरके शाह की तरफ से तैयारी होती सुनी जा रही है । यही कारण है कि अभी तक जिन आरके शाह को 'न तीन में और न तेरह में' माना/देखा जा रहा था, वही आरके शाह अब एक महत्त्वपूर्ण कारक बन गए हैं - और दिल्ली के पूर्व गवर्नर्स नेता उम्मीदवार चुनने में इस तथ्य को भी सामने रख रहे हैं कि आरके शाह की तरफ से मिलने वाली चुनौती से आनंद दुआ और आरके शाह में से कौन प्रभावी तरीके से निपट सकेगा । उम्मीदवार चुनने में देरी करके उम्मीदवारों को 'थका' देने और विरोध की संभावना को खत्म करने का जो फार्मूला दिल्ली के पूर्व गवर्नर्स नेताओं ने अपनाया, वही फार्मूला दरअसल अब उनके लिए मुसीबत बन गया है । दिल्ली में वास्तव में खतरा यह था कि आनंद दुआ और आरके अग्रवाल में से वह जिस किसी को उम्मीदवार नहीं चुनेंगे, वह बागी उम्मीदवार के रूप में खड़ा हो जायेगा - और तब दिल्ली में दो खेमे बन जायेंगे और अपनी अपनी जीत को लेकर खेमेबाजी शुरू हो जाएगी । इस संभावना को खत्म करने के लिए ही सोचा यह गया कि उम्मीदवार चुनने में देरी करके वह किसी एक को बागी हो सकने की तैयारी करने के लिए समय ही नहीं देंगे, और इस तरीके से दिल्ली में एकता 'बना' कर वह आरके शाह को भी अलग-थलग कर देंगे । पूर्व गवर्नर्स नेता अपने इस फार्मूले को कामयाब होते हुए तो देख रहे हैं, लेकिन उनकी इस कामयाबी ने एक अलग तरह का जो समीकरण बनाया है - उससे फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार चुनने को लेकर दिल्ली के पूर्व गवर्नर्स नेताओं की मुश्किलें कम होने की बजाए बढ़ और गई हैं ।
आनंद दुआ और आरके अग्रवाल में से किसी एक के बागी हो सकने की संभावनाओं को तो मामले को घसीट कर पूर्व गवर्नर्स नेताओं ने फ्यूज कर दिया है, लेकिन इस प्रक्रिया में दोनों की इतनी 'फजीहत' भी हो चुकी है कि दोनों में से कोई भी - और उसके समर्थक नेता भी - दूसरे की उम्मीदवारी को सहज रूप में स्वीकार नहीं कर सकेगा । अब जो स्थिति बनी है, आशंका है कि उसमें जो उम्मीदवार नहीं चुना जायेगा - वह घोषित रूप में तो बागी नहीं बनेगा, लेकिन उसका और उसके समर्थक नेताओं का व्यवहार जरूर बागियों जैसा हो जायेगा । यह स्थिति आरके शाह की 'राजनीतिक पूँजी' बनती है । आरके शाह इस राजनीतिक पूँजी को इस्तेमाल कर सकेंगे या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा; लेकिन इस स्थिति ने चुने जाने वाले उम्मीदवार के सामने अभी से ही मुसीबत तो खड़ी कर ही दी है । इस स्थिति ने उम्मीदवारों से भी ज्यादा नेताओं को मुसीबत में फँसा दिया है । नेताओं के लिए मुसीबत की बात यह हो गई है कि बड़े सोच-विचार के बाद वह जिस उम्मीदवार को चुनें, वह कहीं हालात का मुकाबला कर सकने में विफल रहा तो - उम्मीदवार से ज्यादा तो नेताओं की फजीहत होगी । हरियाणा के पूर्व गवर्नर्स नेता जिस तरह से दिल्ली के उम्मीदवारों में दिलचस्पी 'दिखा' रहे हैं, उसके कारण भी फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के मामले में दिल्ली के पूर्व गवर्नर्स नेताओं के लिए मुसीबत बढ़ी है ।
केएल खट्टर ने सुरेश बिंदल के साथ दोस्ती निभाने के चक्कर में आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी के प्रति दिलचस्पी दिखाई है, तो राजिंदर बंसल ने आरके शाह के प्रति अपने समर्थन को छिपाने का प्रयास तक नहीं किया है । अभी हाल ही में रोहतक में आयोजित हुए राजिंदर बंसल के क्लब के अधिष्ठापन समारोह में दिल्ली से डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डीनेटर केएम गोयल के अलावा एक सिर्फ आरके शाह को ही निमंत्रण मिला था और वह शामिल हुए थे । उक्त समारोह में - हरियाणा के बाकी पूर्व गवर्नर्स नेताओं के भी शामिल होने के कारण - आरके शाह की मौजूदगी का खास राजनीतिक संदेश तो लोगों के बीच गया ही है । दिल्ली के पूर्व गवर्नर्स नेताओं को हालाँकि यह विश्वास है कि हरियाणा के पूर्व गवर्नर्स नेता 'उनके' और उनके उम्मीदवार के साथ ही रहेंगे । संभव है कि घोषित रूप में यह स्थिति बनी रहे, लेकिन चुनावी राजनीति के खिलाड़ी इस बात को अच्छी तरह से जानते/समझते हैं कि चुनावी राजनीति का परिणाम इससे तय नहीं होता है कि ऊपर ऊपर क्या हो रहा है या दिख रहा है - परिणाम इससे तय होता है कि अंदरूनी तौर पर क्या हो रहा है और वास्तविक सच्चाई क्या है । हरियाणा में वैसे भी आरके शाह के लिए अच्छा समर्थन आधार देखा/पहचाना जाता है । इसका नजारा विक्रम शर्मा और आरके शाह के बीच हुए पिछले चुनाव में देखा भी जा चुका है, जबकि पूर्व गवर्नर्स नेताओं का समर्थन विक्रम शर्मा के साथ था - लेकिन वोट आरके शाह को मिले थे और चुनाव वह जीते थे । इन हालातों में, दिल्ली में उम्मीदवार चुनने में हो देरी से बनी स्थिति ने आरके शाह को जिस तरह से चुनावी मुकाबले में 'स्पेस' दे दिया है, उससे डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के समीकरणों में उलटफेर होने की परिस्थितियाँ बनी हैं और माहौल थोड़ा रोमांचपूर्ण होता दिख रहा है ।