Friday, August 5, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू में अधिष्ठापन समारोह के नाम पर होने वाले दुबई दौरे के महँगे पैकेज की आड़ में जेपी सिंह और विनय गर्ग की अपनी अपनी जेबें भरने की कोशिशों ने यशपाल अरोड़ा के लिए मुसीबत खड़ी की

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय गर्ग ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार यशपाल अरोड़ा को दुबई जाने के लिए पचास लोगों को तैयार करने का जिम्मा देकर उन्हें तो खासी मुसीबत में फँसा ही दिया है, साथ ही अपने लिए भी फजीहत का मौका बना लिया है । विनय गर्ग डिस्ट्रिक्ट के अधिकारियों का अधिष्ठापन समारोह दुबई में कर रहे हैं, जिसमें जाने के लिए लोग लेकिन तैयार ही नहीं हो रहे हैं । लोगों का कहना है कि विनय गर्ग ने प्रति व्यक्ति साढ़े 49 हजार रुपए का जो पैकेज दिया है, वह बहुत ही महँगा है - और इसी आधार पर लोग अधिष्ठापन समारोह में जाने के लिए उत्सुक नहीं दिख रहे हैं । लोगों का कहना है कि दुबई का पैकेज आमतौर पर 40 हजार रुपए में मिल जाता है, ऐसे में वह करीब दस हजार रुपए ज्यादा क्यों दें ? विनय गर्ग ने कम से कम ढाई सौ लोगों की बुकिंग का लक्ष्य तय किया है, जिसे पूरा करने के लिए पिछले तीन महीने से प्रयास किया जा रहा है - लेकिन खुद उनके ही अनुसार अभी तक करीब सवा सौ लोगों की ही बुकिंग हो पाई है । पिछले दिनों विनय गर्ग ने रीजन चेयरपरसंस को तीस तीस बुकिंग करवाने का लक्ष्य दिया था, किंतु रीजन चेयरपरसंस ने साफ बता दिया कि लोगों को पैकेज महँगा लग रहा है - इसलिए कोई तैयार नहीं हो रहा है । अधिष्ठापन समारोह का दिन जैसे जैसे नजदीक आ रहा है, विनय गर्ग पर निर्धारित लक्ष्य के ढाई सौ लोगों को जुटाने के लिए दबाव बढ़ता जा रहा है । ऐसे में, विनय गर्ग ने यशपाल अरोड़ा को घेरा है । विनय गर्ग को उम्मीद है कि यशपाल अरोड़ा को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में चूँकि उनका समर्थन चाहिए होगा, इसलिए वह पचास बुकिंग करवाने में अवश्य ही दिलचस्पी लेंगे । यशपाल अरोड़ा की समस्या लेकिन यह है कि करीब दस हजार रुपए महँगे पैकेज के लिए वह लोगों को कैसे तैयार करें ? और यदि वह बुकिंग नहीं करवाते हैं, तो सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उनकी उम्मीदवारी को विनय गर्ग का समर्थन गड़बड़ा सकता है ।
यशपाल अरोड़ा को यह डर इसलिए भी है, क्योंकि डिस्ट्रिक्ट में उन्हें फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इंद्रजीत सिंह के 'आदमी' के रूप में देखा/पहचाना जाता है; और माना जाता है कि इंद्रजीत सिंह ने यशपाल अरोड़ा को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेपी सिंह से अपनी निजी खुन्नस निकालने के उद्देश्य से उम्मीदवार बना/बनवा दिया है । यशपाल अरोड़ा अपनी सक्रियता से लोगों के बीच पैठ बनाने की हालाँकि कोशिश तो बहुत कर रहे हैं, किंतु उनकी स्वीकार्यता को लेकर मामला अभी संदेहास्पद ही बना हुआ है । ले दे कर उन्हें उम्मीद सिर्फ इस बात की है कि उनके प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार रमेश अग्रवाल को जेपी सिंह के 'आदमी' के रूप में देखा/पहचाना जाता है - और डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में जेपी सिंह के 'भाव' आजकल जरा ढीले चल रहे हैं । जेपी सिंह की कमजोरी में अपनी ताकत देखने वाले यशपाल अरोड़ा को हालाँकि अलग अलग मिजाज के तथा अलग अलग खेमों में बंटे जेपी सिंह के विरोधी नेताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाने की चुनौती से अभी निपटना है । जेपी सिंह के विरोधी नेताओं का शक दरअसल इंद्रजीत सिंह के रवैये के कारण हैं - वह देखते हैं कि इंद्रजीत सिंह 'प्राइवेट' में तो तो जेपी सिंह विरोधी तेवर 'दिखाते' हैं, लेकिन सार्वजनिक रूप से उनकी खुशामद में रहते हैं; इसलिए लोगों को लगता है कि इंद्रजीत सिंह पता नहीं कब सचमुच में फिर से 'पूर्ण रूप से' जेपी सिंह के आदमी बन जाएँ ? ऐसे में, लोगों को लगता है कि अब उन्हें यदि जेपी सिंह के ही आदमी को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुनना है, तो रमेश अग्रवाल क्या बुरे हैं ?
यशपाल अरोड़ा के नजदीकियों का कहना है कि यशपाल अरोड़ा इस 'समस्या' को पहचान रहे हैं, और इसीलिए वह जेपी सिंह विरोधी नेताओं का विश्वास और समर्थन जुटाने के प्रयासों में लगे हुए हैं । यशपाल अरोड़ा को यह बात अच्छी तरह से समझ में आ रही है कि इस वर्ष के चुनाव में जेपी सिंह विरोधी नेताओं का राजनीतिक पलड़ा ही भारी रहना है, इसलिए उनका समर्थन जुटा कर ही वह आसानी से सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का चुनाव जीत लेंगे । यशपाल अरोड़ा को जेपी सिंह विरोधी नेताओं का समर्थन जुटाने का रास्ता डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय गर्ग की 'परिक्रमा' से गुजरता हुआ दिखता है, इसलिए वह हरदम विनय गर्ग के नजदीक होने और 'दिखने' का मौका पहचानते और बनाते रहते हैं । इसी बात का फायदा उठाते हुए विनय गर्ग ने यशपाल अरोड़ा पर दुबई की पचास बुकिंग का बोझ डाल दिया है । विनय गर्ग ने यशपाल अरोड़ा के कुछेक नजदीकियों के बीच तर्क भी दिया है कि दुबई में यशपाल अरोड़ा को अपनी उम्मीदवारी के समर्थन में माहौल बनाने के लिए जो खास मौका मिलेगा, तो उस मौके को संभव बनाने के लिए उन्हें कुछ 'काम' तो करना पड़ेगा न ! यशपाल अरोड़ा इस मामले में हालाँकि खुल कर तो कुछ नहीं कह पा रहे हैं, लेकिन अपने कुछेक नजदीकियों से उन्होंने तथा उनके नजदीकियों ने दूसरे कुछेक लोगों के बीच विनय गर्ग के रवैये पर सवाल उठाए हैं - और शिकायती अंदाज़ में कहा है कि विनय गर्ग ने बड़ी संख्या में फ्री टिकट पाने के चक्कर में पैकेज भी महँगा ले लिया है, और बुकिंग के नंबर भी ज्यादा तय कर लिए हैं; और इसका बोझ वह लायन सदस्यों पर डाल रहे हैं ।
टूरिज्म बिजनेस से जो लोग परिचित हैं, उनका स्पष्ट कहना है कि विनय गर्ग ने दुबई का जो पैकेज ऑफर लिया/दिया है, वह वास्तव में बहुत ही महँगा है । क्यों महँगा है - इसे लेकर तरह तरह की बातें हो रही हैं । पहला कारण तो यही बताया जा रहा है कि इस टूर की जिम्मेदारी जेपी सिंह निभा रहे हैं - जो लहरें गिनने के काम में भी पैसे 'बनाने' का हुनर रखने के कारण कुख्यात हैं । लोगों को याद है कि कुछ ही वर्ष पहले जेपी सिंह का शान ट्रेवल्स के साथ बड़ा भारी झगड़ा हुआ था, जिसमें जेपी सिंह ने शान ट्रेवल्स के कर्ता-धर्ताओं को खुली धमकी दी थी कि लायंस का काम नहीं कर पाओगे । लेकिन बाद में फिर दोनों में ठीक सेटिंग हो गई और शान ट्रेवल्स जेपी सिंह की खास पसंद बन गई । लोगों का कहना है कि जेपी सिंह ने शान ट्रेवल्स के साथ कोई पैकेज फिक्स किया है, तो समझ लो कि वह दस प्रतिशत तो महँगा पड़ेगा ही । इसके बाद विनय गर्ग का नंबर आता है : उन्हें पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को, अपने कुछेक नजदीकियों को और अपने परिवार के सदस्यों को ले चलने की 'व्यवस्था' करनी है; और यह व्यवस्था पैकेज को महँगा करके ही हो सकती है । विनय गर्ग पर इससे भी बड़ा आरोप यह लग रहा है कि अधिष्ठापन समारोह के इंतजाम के खर्चे को भी पैकेज में जोड़ लेने के कारण पैकेज और भी ज्यादा महँगा हो गया है । लोगों का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में विनय गर्ग ने जो 25 से 30 लाख रुपए जुटाए हैं, उसमें से उन्हें अधिष्ठापन का खर्च देना चाहिए । आरोप यह लग रहा है कि उस पैसे को बचाने की तिकड़म लगाते हुए विनय गर्ग ने पैकेज को और ज्यादा महँगा बना दिया है । दरअसल उन्हें पता है कि लायन सदस्य रोना रोयेंगे, आपस में फुसफुसा कर एक-दूसरे से शिकायतें करेंगे - लेकिन पैकेज लेंगे; जो कमी रह जायेगी, उसे पूरा करने में यशपाल अरोड़ा जैसे लोग काम आयेंगे । विनय गर्ग के प्रति हमदर्दी रखने वाले लोगों का कहना है कि अधिष्ठापन समारोह के नाम पर होने वाला दुबई दौरा जेपी सिंह और विनय गर्ग की जेबें भरने के काम भले आए - लेकिन इसे लेकर विनय गर्ग अपने गवर्नर-काल के शुरू में ही जिस तरह के आरोपों में फँसे हैं, वह कोई अच्छी बात नहीं है ।

Thursday, August 4, 2016

रोटरी इंटरनेशनल के वर्ष 2018-19 के प्रेसीडेंट चुनाव में राजा साबू और सुदर्शन अग्रवाल के भरोसे सफलता का ख़्वाब देख रहे अशोक महाजन के नोमीनेटिंग कमेटी की मीटिंग होने से पहले ही मुकाबले से बाहर हो जाने के हालात ने कल्याण बनर्जी के सामने राजा साबू के लिए फजीहत का मौका बनाया

मुंबई । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के लिए प्रस्तुत अशोक महाजन की उम्मीदवारी के प्रति सुदर्शन अग्रवाल के रूखे/ठंडे रवैये के चलते नोमीनेटिंग कमेटी की मीटिंग होने के चार दिन पहले ही अशोक महाजन के लिए मौका बिलकुल खत्म सा हो गया है । उल्लेखनीय है कि वर्ष 2018-19 के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट को चुनने के लिए 17 सदस्यीय नोमीनेटिंग कमेटी की मीटिंग आठ अगस्त को हो रही है । नोमीनेटिंग कमेटी में अमेरिका के पाँच जोन के अलावा जापान, थाईलैंड, आस्ट्रेलिया, ताईवान, इटली, जर्मनी, नार्वे, इंग्लैंड, तुर्की, ब्राजील, कनाडा और भारत के एक एक जोन का प्रतिनिधित्व है । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी में भारत के जोन 4 का प्रतिनिधित्व पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुदर्शन अग्रवाल कर रहे हैं । अशोक महाजन ने अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने वास्ते नोमीनेटिंग कमेटी के कई सदस्यों को साधने का जो प्रयास किया, उसमें उन्हें सफलता मिलती तो दिख रही थी - लेकिन जैसे जैसे फैसले का दिन नजदीक आ रहा है, सुदर्शन अग्रवाल के कारण अशोक महाजन को सारा गुड़ गोबर होता हुआ नजर आ रहा है । दरअसल नोमीनेटिंग कमेटी के कई सदस्यों ने अशोक महाजन को बताया है कि जब आपका अपना 'आदमी' ही आपकी वकालत करता हुए नहीं दिख रहा है, तो दूसरे लोग कैसे और क्यों आपकी उम्मीदवारी में दिलचस्पी लेंगे ? इस प्रतिक्रिया ने खेल शुरू होने से पहले ही अशोक महाजन का खेल बिगाड़ दिया है । यहाँ मजे की यह बात नोट करने वाली है कि अशोक महाजन और सुदर्शन अग्रवाल - दोनों ही पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू के 'आदमी' हैं । नोमीनेटिंग कमेटी में सुदर्शन अग्रवाल को रखवाने के लिए लॉबिंग ही इसलिए की गई थी, ताकि वह अशोक महाजन की उम्मीदवारी के पक्ष में माहौल बना सकें; लेकिन जो बातें सुनने को मिल रही हैं - उनसे पता चल रहा है कि खुद कुछ करना तो दूर, सुदर्शन अग्रवाल ने अशोक महाजन की मेहनत पर पानी और फेर दिया है । अशोक महाजन ने राजा साबू से भी कहा कि वह सुदर्शन अग्रवाल को सक्रिय होने के लिए कहें, लेकिन उसका भी कोई असर नहीं हुआ है - हालाँकि यह पता नहीं चला है कि राजा साबू ने सुदर्शन अग्रवाल से कहा नहीं, या सुदर्शन अग्रवाल ने उनकी बात भी नहीं सुनी ।
मजेदार सीन यह देखने में आ रहा है कि राजा साबू और सुदर्शन अग्रवाल की तरफ से अशोक महाजन को मिलने जा रही असफलता के लिए उलटे अशोक महाजन को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है । कहीं कहीं इन्होंने कहा/बताया है कि पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट कल्याण बनर्जी का समर्थन जुटाने में विफल होने के कारण अशोक महाजन का रास्ता पहले ही बंद हो गया था । उल्लेखनीय है कि कल्याण बनर्जी स्पेन के रोटरी डिस्ट्रिक्ट 2210 के जूलियो सोरजस की उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे हैं । एक वही नहीं, रोटरी इंटरनेशनल के तमाम 'चौधरी' जूलियो सोरजस की उम्मीदवारी के पक्ष में हैं । कल्याण बनर्जी चूँकि रोटरी इंटरनेशनल के 'चौधरियों' के साथ हैं - जिनके समर्थन के चलते उन्हें टीआरएफ ट्रस्टी चेयरमैन का पद मिला है - इसलिए वह भी जूलियो सोरजस की उम्मीदवारी के समर्थक बन गए हैं । कल्याण बनर्जी सहित रोटरी इंटरनेशनल के कई प्रमुख चौधरी इस बार जूलियो सोरजस को इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुनवाना चाहते हैं - इसी तथ्य को भाँप कर डिस्ट्रिक्ट 3011 के सुशील गुप्ता ने इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं की । कल्याण बनर्जी से मिले इशारे को समझने में सुशील गुप्ता ने कोई गलती नहीं की, किंतु अशोक महाजन ने राजा साबू और सुदर्शन अग्रवाल पर भरोसा किया - और झटका खा गए ।
मजेदार तथ्य यह है कि अशोक महाजन और जूलियो सोरजस - दोनों ही रोटरी फाउंडेशन (टीआरएफ) में अभी हाल तक साथ साथ ट्रस्टी रहे हैं; और टीआरएफ ट्रस्टी के रूप में दोनों ने ही अपनी अपनी राजनीति की जड़ें मजबूत करने/बनाने की कोशिशें कीं । अशोक महाजन के नजदीकी बताते रहे हैं कि अशोक महाजन ने रोटरी इंटरनेशनल के सेट-अप में अपनी अच्छी स्थिति बनाई है । किंतु उनकी स्थिति की परीक्षा की अब जब घड़ी आई - तब भेद खुला कि उनकी अच्छी स्थिति की जड़ें ज्यादा गहरी और मजबूत नहीं थीं । जूलियो सोरजस उनसे ज्यादा स्मार्ट साबित हुए । आठ अगस्त को नोमीनेटिंग कमेटी क्या फैसला करेगी और जूलियो सोरजस इंटरनेशनल प्रेसीडेंट चुन ही लिए जायेंगे - यह अभी कोई भी दावे के साथ नहीं कह सकता है । नोमीनेटिंग कमेटी के अमेरिकी प्रतिनिधियों के तेवर जूलियो सोरजस के विरोध के संकेत दे रहे हैं; हालाँकि दूसरा कोई उम्मीदवार उनके विरोधी तेवरों का फायदा उठाता हुआ दिख नहीं रहा है - फिर भी चुनाव तो चुनाव ही है, नतीजे का ऊँठ न जाने किस करवट बैठे ? आठ अगस्त को नोमीनेटिंग कमेटी की बैठक में क्या फैसला निकलेगा, यह तो आठ अगस्त को ही पता चलेगा - किंतु राजा साबू और सुदर्शन अग्रवाल के भरोसे इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने का ख़्वाब देख रहे अशोक महाजन के नोमीनेटिंग कमेटी की मीटिंग होने से पहले ही मुकाबले से बाहर हो जाने के हालात ने उनके साथ साथ राजा साबू के लिए भी फजीहत के मौके बना दिए हैं ।

Tuesday, August 2, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग का झंडा अपने पास बनाए रखने के लिए अपनाई गई अरुण मित्तल की 'तरकीब' ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी की बेचारगी को उजागर किया

देहरादून । अरुण मित्तल से डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग का झंडा छीन लेने में असफल रहने के बाद अनीता गुप्ता के सुर फिर कुछ बदले बदले से सुनाई दे रहे हैं, जिस कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी तथा उनके साथी अपने आप को मुसीबत में पा रहे हैं । उल्लेखनीय है कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनीता गुप्ता करीब तीन महीने पहले तक मुकेश गोयल खेमे में थीं, और पिछले लायन वर्ष में हुए चुनाव में शिव कुमार चौधरी के उम्मीदवार को हरवाने तथा शिव कुमार चौधरी के खिलाफ रिकॉर्ड नेगेटिव वोट डलवाने में उन्होंने बहुत ही सक्रिय और प्रभावी भूमिका निभाई थी । चुनाव में बुरी तरह चिथड़ा चिथड़ा हुई अपनी 'दुनिया' को फिर से बसाने की कोशिश करते हुए शिव कुमार चौधरी ने खुशामद करके और पदों का लालच देकर अनीता गुप्ता को अपनी तरफ कर लेने में सफलता हासिल कर ली थी । अनीता गुप्ता को लगा था कि शिव कुमार चौधरी जिस तरह से डिस्ट्रिक्ट में बुरी तरह बदनाम हो गए हैं और बदनामी के चलते अकेले पड़ गए हैं, उसके चलते उन्हें अपनी नेतागिरी दिखाने का भरपूर मौका मिलेगा । उन्हें जिस तरह से किसी न किसी बहाने से शिव कुमार चौधरी के खुशामदभरे फोन आ रहे थे, उससे उन्हें उम्मीद बनी थी कि चौधरी शब्द भले ही शिव कुमार के नाम में लगा हो, डिस्ट्रिक्ट की 'चौधरी' लेकिन वही बनेंगी । इसी उम्मीद में अनीता गुप्ता ने पाला बदलने में देर नहीं की । लेकिन जल्दी ही उन्हें अहसास हो गया कि शिव कुमार चौधरी ने उन्हें एक बार फिर धोखा दिया है, और शिव कुमार चौधरी की खुशामदभरी बातों में आकर उन्होंने बड़ी गलती की । शिव कुमार चौधरी के नजदीकियों के अनुसार, अनीता गुप्ता दरअसल डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग की जिम्मेदारी चाहती थीं, जिसे 'देने' के लिए शिव कुमार चौधरी पहले तैयार भी हो गए थे - लेकिन बाद में फिर वह मुकर गए । शिव कुमार चौधरी की इस 'पलटीबाजी' ने अनीता गुप्ता को बुरी तरह से निराश किया है, और उनकी बातों व उनके रवैये में उनकी इस निराशा को लोगों के बीच तीखे स्वरों में 'सुना' जा रहा है ।
डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग का झंडा लेने की अनीता गुप्ता की कोशिश को फेल करने का काम वास्तव में किया तो पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अरुण मित्तल की 'राजनीति' ने, लेकिन इस मामले को शिव कुमार चौधरी और खुद को चाणक्य समझने वाले उनके एक सलाहकार ने जिस तरह से हैंडल किया - उससे ठीकरा फूटा शिव कुमार चौधरी के सिर । दरअसल, पारिवारिक समस्या में फँसने के कारण अरुण मित्तल पीएसटी स्कूलिंग में अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा सके थे - जिस कारण पीएसटी स्कूलिंग का आयोजन बुरी तरह फ्लॉप हुआ और मजाक बन कर रह गया था । शिव कुमार चौधरी और उनके तथाकथित चाणक्य ने पीएसटी स्कूलिंग को सफल बताने/दिखाने के लिए फर्जीबाड़े तो खूब किए, लेकिन सच्चाई पर पर्दा डाल पाने में वह असफल रहे । इस दोहरी असफलता की खीझ उन्होंने अरुण मित्तल पर उतारी । 'चाणक्य जी' कुछ ज्यादा जोश में आ गए और इसी जोश में उन्होंने अनीता गुप्ता से कह दिया कि डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग की जिम्मेदारी अरुण मित्तल की बजाए उन्हें निभानी चाहिए । इस तरह की बातों से अनीता गुप्ता को लगा कि डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग का झंडा उन्हें मिल जायेगा - और इस तरह डिस्ट्रिक्ट पर छा जाने का अवसर उनके हाथ लगेगा ।
अरुण मित्तल को इसकी भनक लगी, तो उन्होंने अपनी 'राजनीति' खेल दी : उन्होंने मुकेश गोयल के साथ हुई अपनी एक मुलाकात की सूचना खुद से लीक कर दी । यह मुलाकात क्यों हुई थी और इसमें क्या बात हुई - इसका तो किसी को नहीं पता; लेकिन अरुण मित्तल की तरफ से इस मुलाकात का जिस तरह से जिक्र हुआ, उसमें यह संदेश छिपा देखा/सुना गया कि शिव कुमार चौधरी ने यदि उनसे डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग का झंडा वापस ले लिया - तो वह मुकेश गोयल के साथ चले जायेंगे । शिव कुमार चौधरी के नजदीकियों के अनुसार, शिव कुमार चौधरी ने इस संदेश को पढ़ने में कोई गलती नहीं की और अपने 'चाणक्य जी' को साफ साफ बता दिया कि अपनी चाणक्यबाजी अपने पास रखो और इज्जत का बिलकुल फालूदा ही मत बनवाओ । शिव कुमार चौधरी को डर हुआ कि डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग की जिम्मेदारी छिनने पर अरुण मित्तल यदि मुकेश गोयल के साथ चले गए - तो वह एक एक व्यक्ति को जोड़ कर अपनी उजड़ी पड़ी 'दुनिया' को बसाने की जो कोशिश रहे हैं, वह फिर से बिखर जायेगी । नेताओं को अपने साथ जोड़ने तथा बनाए रखने की कवायद उनके लिए वैसे ही मेढकों को तोलने जैसी कार्रवाई हो गई है । उन्होंने बड़ी मुश्किलों से सुशील अग्रवाल को अपने निकट लाने - या 'दिखाने' में सफलता प्राप्त की थी, इसके लिए उन्हें सुशील अग्रवाल की पत्नी अर्चना अग्रवाल को जोन चेयरपरसन बनाना पड़ा - उन्होंने उम्मीद की थी कि इसके बदले में सुशील अग्रवाल वर्ष भर 'दुश्मनों' से उनकी रक्षा करेंगे; लेकिन सुशील अग्रवाल ने पहली डिस्ट्रिक्ट कैबिनेट मीटिंग में ही अनुपस्थित होकर शिव कुमार चौधरी को धोखा दे दिया ।   
शिव कुमार चौधरी के गवर्नर-काल की पहली डिस्ट्रिक्ट कैबिनेट मीटिंग की जैसी जो बुरी गत बनी, जिसमें कैबिनेट के मुश्किल से पंद्रह प्रतिशत पदाधिकारी ही शामिल हुए - उसने शिव कुमार चौधरी के सामने विकट संकट पैदा कर दिया । एक के बाद एक जिस तरह से उनके कार्यक्रम पिटते जा रहे हैं, और वह अपने कार्यक्रमों में लोगों को जोड़ने व शामिल करने में विफल साबित होते जा रहे हैं - उससे सबक लेते हुए शिव कुमार चौधरी ने डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग का झंडा अरुण मित्तल के पास ही बने रहने देने का फैसला किया । सुशील अग्रवाल के असहयोगात्मक रवैये को देखते हुए उन्होंने अरुण मित्तल को दूर कर लेने का खतरा उठाना ठीक नहीं समझा । शिव कुमार चौधरी ने एक बात और समझी कि जोन/रीजन स्कूलिंग की जिम्मेदारी अनीता गुप्ता ठीक से नहीं निभा सकेंगी, और उनके भरोसे जिम्मेदारी छोड़ी तो जोन/रीजन स्कूलिंग का हाल भी पीएसटी स्कूलिंग की तरह बेहाल ही होगा । अरुण मित्तल की यह खूबी तो सभी जानते ही हैं, कि वह जिस जिम्मेदारी को लेते हैं - उसे प्रभावी तरीके से पूरा करते हैं; और फिर स्कूलिंग का उनका खासा अनुभव भी है । अनीता गुप्ता में राजनीतिक जोश चाहें जितना भी हो, लेकिन किसी काम को संयोजित कर सकने का हुनर वह अभी तक नहीं दिखा सकी हैं - इसलिए शिव कुमार चौधरी को उनके भरोसे रिस्क लेना उचित नहीं लगा ।
डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग की जिम्मेदारी न मिलने से अनीता गुप्ता को जोर का झटका लगा । चाणक्य जी की तमाम कोशिशों के बावजूद अनीता गुप्ता को यह जिम्मेदारी नहीं मिली - यह देख/जान कर अनीता गुप्ता को गहरी निराशा हुई है । यह सुन/जान कर तो अनीता गुप्ता का पारा और चढ़ गया है कि डिस्ट्रिक्ट ऑफीसर्स स्कूलिंग का झंडा अपने पास बनाए रखने के लिए अरुण मित्तल ने मुकेश गोयल के साथ चले जाने की 'धमकी' का इस्तेमाल किया है - और उनकी धमकी कामयाब रही । अनीता गुप्ता का कहना है कि शिव कुमार चौधरी यह क्यों समझ रहे हैं कि जो 'काम' अरुण मित्तल कर सकते थे, उसे वह नहीं कर सकती हैं । अनीता गुप्ता के तेवरों ने शिव कुमार चौधरी के लिए मामले को ढाक के तीन पात वाली स्थिति में ला दिया है - वह खुशामद कर/करा कर किसी एक को अपने साथ लाते हैं, तो दूसरा उछल कर अलग हो जाता है; और जो साथ आता भी है, वह मुसीबतों को कम करने की बजाए बढ़ाने का काम ज्यादा करता है ।

Monday, August 1, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ई के वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमाशंकर अग्रवाल को अपमानित करने के कारण इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल की दोहरी पोल खुली और लोगों के बीच उनकी खासी फजीहत हुई

वाराणसी । इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट 321 ई के अधिष्ठापन समारोह में डिस्ट्रिक्ट के एक वरिष्ठ पूर्व गवर्नर रमाशंकर अग्रवाल की जिस तरीके से सार्वजनिक रूप से बेइज्जती की - उससे नरेश अग्रवाल का असली चेहरा लोगों के सामने आया है, जिसे देख कर लोग सचमुच हैरान हैं । अधिष्ठापन समारोह में डिस्ट्रिक्ट के तमाम पदाधिकारियों तथा प्रमुख लोगों के साथ साथ दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारी व अन्य प्रमुख लोग उपस्थित थे - जिनके बीच दिए अपने भाषण में नरेश अग्रवाल ने रमाशंकर अग्रवाल को पूरी निर्लज्जता के साथ अपमानित किया । नरेश अग्रवाल ने न तो इस बात का कोई लिहाज किया कि वह जिस डिस्ट्रिक्ट में मुख्य अतिथि के रूप में आए हैं, रमाशंकर अग्रवाल उस डिस्ट्रिक्ट के एक वरिष्ठ पूर्व गवर्नर हैं - और न रमाशंकर अग्रवाल की उम्र का, उनके वृद्ध होने की उन्होंने कोई परवाह की । नरेश अग्रवाल ने रमाशंकर अग्रवाल का नाम लेकर कहा कि इनके जैसे बूढ़े लोग अब किसी काम के नहीं रह गए हैं और इन्हें तो लायनिज्म से और डिस्ट्रिक्ट से निकाल देना चाहिए । रमाशंकर अग्रवाल का 'अपराध' यह था कि कार्यक्रम शुरू होते समय उन्होंने मंच पर प्रोटोकॉल के हिसाब से पदाधिकारियों को बैठाने की तरफ ध्यान खींचने का प्रयास किया था । उस समय भी नरेश अग्रवाल ने मंच से चिल्लाते हुए रमाशंकर अग्रवाल को चुपचाप बैठने तथा कार्यक्रम को डिस्टर्ब न करने के लिए फटकार लगाई थी । रमाशंकर अग्रवाल भी चुप हो गए थे, और सभी ने मान लिया था कि मामला खत्म हो गया है । इस तरह के 'सीन' किसी भी कार्यक्रम में बन जाते हैं, इसलिए किसी ने भी यह कल्पना नहीं की थी कि नरेश अग्रवाल जब अपना भाषण करने के लिए खड़े होंगे - तो वह रमाशंकर अग्रवाल को और भी अभद्र व अशालीन तरीके से संबोधित करेंगे । रमाशंकर अग्रवाल वर्ष 1993- 94 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर थे । बढ़ती उम्र के कारण होने वाली शारीरिक व्याधियों के चलते उन्हें चलने-फिरने में दिक्कत होती है, लेकिन फिर भी लायनिज्म के प्रति अपने लगाव के कारण वह व्हीलचेयर पर प्रमुख आयजनों में पहुँचते हैं । इस बात को ध्यान में रखते हुए, रमाशंकर अग्रवाल के प्रति प्रकट किए गए नरेश अग्रवाल के बर्ताव के लिए अधिकतर लोगों ने नरेश अग्रवाल को खूब धिक्कारा भी । लोगों के बीच डिस्ट्रिक्ट के बड़े पदाधिकारियों के प्रति भी नाराजगी देखी/सुनी गई, जो रमाशंकर अग्रवाल के अपमान को चुपचाप बैठे देखते रहे और उन्होंने एक बार भी नरेश अग्रवाल को टोकने/रोकने का प्रयास नहीं किया ।
नरेश अग्रवाल का सामने सामने विरोध भले ही किसी न न किया हो, किंतु नरेश अग्रवाल के रवैये पर अधिकतर लोगों ने उनकी थू थू ही की । वाराणसी के कुछेक वरिष्ठ लायन सदस्यों ने याद किया कि नरेश अग्रवाल जब इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उम्मीदवार थे, तब वाराणसी में रमाशंकर अग्रवाल की मदद से ही वह लोगों से मिले थे । कई लोगों का कहना रहा कि रमाशंकर अग्रवाल के प्रति नरेश अग्रवाल का जो व्यवहार रहा, वह उनकी अहसानफरामोशी का सुबूत तो है ही, साथ ही इस बात का भी सुबूत है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की 'गर्मी' नरेश अग्रवाल के दिमाग में जा घुसी है । जो हुआ, उससे नरेश अग्रवाल की दरअसल दोहरी पोल खुली । रमाशंकर अग्रवाल ने जो मुद्दा उठाया था, वह प्रोटोकॉल का एक सामान्य सा मामला था, जिसे नरेश अग्रवाल चाहते तो सेकेंड्स में हल कर सकते थे । रमाशंकर अग्रवाल ने कार्यक्रम शुरू होते समय जब निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रकाश जी अग्रवाल को मंच की बजाए दर्शक दीर्घा में बैठे देखा, तो उन्होंने मंच पर बैठे लोगों का ध्यान खींचते हुए प्रोटोकॉल की बात उठाई और प्रकाश जी अग्रवाल को मंच पर बुलाने/बैठाने की माँग की । उनके अलावा, कार्यक्रम में मौजूद डिस्ट्रिक्ट के तथा दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के कई पदाधिकारियों को भी यह देख कर अचरज हुआ था कि प्रकाश जी अग्रवाल मंच की बजाए दर्शक दीर्घा में क्यों बैठे हैं ? लोगों का कहना रहा कि डिस्ट्रिक्ट के आधिकारिक कार्यक्रमों में निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के ठीक बगल में बैठने का अधिकार लायंस इंटरनेशनल द्वारा निर्धारित प्रोटोकॉल देता है । कई लोगों ने प्रकाश जी अग्रवाल से कहा भी कि वह मंच पर क्यों नहीं बैठते ? प्रकाश जी अग्रवाल का कहना होता कि वह अपने आप मंच पर जाकर तो नहीं बैठ सकते हैं, उन्हें बुलाया जायेगा - तो वह जायेंगे । लोगों के लिए हैरानी की बात यह रही कि मंच पर नरेश अग्रवाल के होते हुए भी प्रोटोकॉल का पालन क्यों नहीं हो रहा है ? रमाशंकर अग्रवाल ने इसी बात की तरफ ध्यान खींचने के लिए दर्शक दीर्घा से सवाल उठाया - लेकिन उनके सवाल पर ध्यान देने व कार्रवाई करने की बजाए नरेश अग्रवाल ने उन्हें बहुत ही बुरी तरह से डपटते हुए चुप करा दिया ।
मजे की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनिल तुल्सियान ने डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह की तैयारी शुरू करते समय प्रकाश जी अग्रवाल के लिए मंच पर जगह सुनिश्चित की थी । इसका सुबूत यह है कि मंच पर बैठने वाले पदाधिकारियों के लिए उन्होंने एक ड्रेसकोड तय किया था, और उसके लिए कोट का कपड़ा पहले से ही उन पदाधिकारियों को उपलब्ध करवा दिया था । यह कपड़ा और ड्रेसकोड का विवरण प्रकाश जी अग्रवाल को भी मिला था । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनिल तुल्सियान से प्राप्त दिशा-निर्देश के अनुसार ही तैयार होकर प्रकाश जी अग्रवाल अधिष्ठापन समारोह में पहुँचे थे, किंतु फिर भी अनिल तुल्सियान ने उन्हें मंच पर जगह देने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई । अनिल तुल्सियान के नजदीकियों का कहना है कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स दीपक वधावन तथा मंगल सोनी की शह पर अनिल तुल्सियान ने प्रकाश जी अग्रवाल को मंच पर जगह न देने का फैसला किया । अनिल तुल्सियान के नजदीकियों के अनुसार, अनिल तुल्सियान दरअसल पहले से ही प्रकाश जी अग्रवाल से कुछ खिंचे खिंचे से थे । हुआ असल में यह कि अनिल तुल्सियान ने अपनी कैबिनेट के सदस्यों से पदों के बदले में मोटी मोटी 'कीमतें' माँगना शुरू किया, तो लोगों ने उनसे सवाल किया कि प्रकाश जी अग्रवाल जब कैबिनेट सदस्यों से बिना पैसा लिए काम कर सकते हैं, तो उन्हें पैसा क्यों चाहिए ? उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में प्रकाश जी अग्रवाल के कामकाज को लोगों से बहुत ही प्रशंसा मिली है, और लोगों को पहली बार इस बात का पता चला कि कैबिनेट सदस्यों से मनमाने पैसे लिए बिना भी डिस्ट्रिक्ट का काम किया जा सकता है - और अच्छे से किया जा सकता है । लोगों के बीच होने वाली इस तरह की बातों से अनिल तुल्सियान ने अपने आपको प्रकाश जी अग्रवाल के सामने बहुत 'छोटा' पाया । अपने आप को 'बड़ा' साबित करने के लिए वह किसी भी तरह से प्रकाश जी अग्रवाल को अपमानित करना चाहते थे ।
ऐसे में उन्हें दीपक वधावन और मंगल सोनी से सुझाव मिला कि वह अधिष्ठापन समारोह में प्रकाश जी अग्रवाल को मंच पर जगह न दें । दीपक वधावन की प्रकाश जी अग्रवाल के साथ पुरानी खुन्नस है : दीपक वधावन के गवर्नर-काल में प्रकाश जी अग्रवाल उम्मीदवार बने थे; डिस्ट्रिक्ट के 'रिवाज' के अनुसार डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के कुछेक खर्चों के लिए उन्होंने दीपक वधावन को मोटी रकम दी थी । किंतु कॉन्फ्रेंस से कुछ ही दिन पहले दीपक वधावन के रवैये से परेशान व निराश होकर उन्होंने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली थी । प्रकाश जी अग्रवाल चूँकि उम्मीदवार के रूप में डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के लिए दी गई अपनी रकम वापस माँग रहे हैं, इसलिए रकम वापस करना तो दूर की बात - दीपक वधावन उनसे खुन्नस और रखने लगे । कई बार लोगों ने उनसे कहा भी कि भई, खुन्नस रखो तो रखो - प्रकाश जी अग्रवाल के पैसे तो वापस कर दो; पर दीपक वधावन पर इसका कोई असर नहीं पड़ा । मंगल सोनी की नाराजगी का कारण बिलकुल नया है । मंगल सोनी अभी पिछले दिनों अपनी हरकतों के चलते वाराणसी की प्रतिष्ठित संस्था - प्रभुनारायण यूनियन क्लब के पद से हटा दिए गए हैं । मंगल सोनी इस बात को पहले से जानते हैं कि उक्त क्लब के प्रमुख लोगों के साथ प्रकाश जी अग्रवाल के अच्छे संबंध हैं - सो, मंगल सोनी इस बात पर खफा हैं कि प्रकाश जी अग्रवाल ने उक्त क्लब में उनका पद बचवाने में कोई दिलचस्पी क्यों नहीं ली ? इन्हीं अलग अलग कारणों से मंगल सोनी, दीपक वधावन व अनिल तुल्सियान ने प्रकाश जी अग्रवाल को डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में मंच न देने का फैसला किया । अनिल तुल्सियान के नजदीकियों के अनुसार, पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर जगदीश गुलाटी ने अनिल तुल्सियान को समझाने की बहुत कोशिश की, कि निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को मंच पर जगह नहीं दोगे - तो यह लायंस इंटरनेशनल के प्रोटोकॉल का तो उल्लंघन होगा ही, साथ ही मल्टीपल में बहुत बदनामी भरा काम भी होगा । लेकिन अनिल तुल्सियान ने जगदीश गुलाटी की भी नहीं सुनी और वह प्रकाश जी अग्रवाल को मंच पर जगह देने के लिए तैयार नहीं हुए ।
प्रकाश जी अग्रवाल को अपमानित करके लोगों की निगाह में प्रकाश जी अग्रवाल से 'बड़ा' बनने/दिखने की कोशिश में अनिल तुल्सियान ने जगदीश गुलाटी को तो धता बता दी, किंतु उन्हें नरेश अग्रवाल की तरफ से डर था - उन्हें लगता था कि नरेश अग्रवाल इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की राह पर हैं, वह कम से कम अपने सामने तो लायंस इंटरनेशनल के प्रोटोकॉल व परंपरा का उल्लंघन नहीं होने देंगे और प्रकाश जी अग्रवाल मंच पर बुलवा ही लेंगे । अनिल तुल्सियान के डर को दूर किया मंगल सोनी ने । मंगल सोनी ने उन्हें आश्वस्त किया कि वह नरेश अग्रवाल की एक ऐसी कमजोरी जानते हैं, कि उसके डर से नरेश अग्रवाल वही करेंगे - जैसे हम चाहेंगे । मंगल सोनी को भरोसा था, किंतु दूसरे लोगों को नहीं था - डिस्ट्रिक्ट के वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमाशंकर अग्रवाल को तो बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी कि नरेश अग्रवाल अपने सामने लायंस इंटरनेशनल के प्रोटोकॉल को तथा लायनिज्म की परंपरा को भंग होने देंगे । इसीलिए उन्होंने नरेश अग्रवाल का ध्यान खींचने का प्रयास किया - किंतु अपने इस प्रयास में उन्हें नरेश अग्रवाल के हाथों जिस तरह अपमानित होना पड़ा, उससे साबित हुआ कि नरेश अग्रवाल सचमुच ही मंगल सोनी व अनिल तुल्सियान के हाथों इस कदर मजबूर हुए कि अपनी हरकत के चलते लोगों की आलोचना का और उनकी थू थू का शिकार बने ।

Sunday, July 31, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में सुभाष जैन के वृंदावन जाने के छोटे से काफिले को कारवाँ बनता देख डिस्ट्रिक्ट के हर खेमे के नेता को अपनी जमीन खिसकती नजर आ रही है

गाजियाबाद । सुभाष जैन का अपने कुछेक नजदीकियों के साथ वृंदावन स्थित बाँके बिहारी मंदिर जाने का एक निजी कार्यक्रम जिस तरह से डिस्ट्रिक्ट का एक बड़ा कार्यक्रम बन गया है, उसे देख कर डिस्ट्रिक्ट के नेताओं के बीच खासी खलबली मच गई है । इस 'आयोजन' को डिस्ट्रिक्ट में - और जाहिर है कि डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में भी - सुभाष जैन की एक बड़ी 'छलाँग' के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है, जिसमें डिस्ट्रिक्ट के दूसरे नेता अपने आप को पीछे धकेले जाते पा रहे हैं । मजे की बात यह है कि यह कोई स्पॉन्सर्ड कार्यक्रम नहीं है; सुभाष जैन ने कोई आह्वान नहीं किया है कि वह वृंदावन जा रहे हैं, जो जो साथ चलना चाहें - चले । वास्तव में हुआ यह कि सुभाष जैन के अपने कुछेक नजदीकियों के साथ वृंदावन जाने के कार्यक्रम के बारे में जैसे जैसे लोगों को जानकारी मिलती गई, वैसे वैसे लोग खुद से प्रेरित होकर सुभाष जैन के साथ चलने के लिए 'तैयार' होते गए - और सुभाष जैन के साथ जाने वाला एक छोटा सा काफिला जल्दी ही एक बड़ा कारवाँ बन गया है । इस कारवाँ ने और इसके अपने आप बनने की प्रक्रिया ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच सुभाष जैन की अहमियत व पोजीशन को बहुत ऊँचा कर दिया है । सुभाष जैन को डिस्ट्रिक्ट में कई लोग चूँकि डिस्ट्रिक्ट के भावी नेता के रूप में देख रहे हैं, इसलिए लोगों के बीच उनकी अहमियत व पोजीशन को ऊँचा होता देख डिस्ट्रिक्ट के मौजूदा नेताओं तथा भावी नेता बनने की फिराक में लगे लोगों को अपनी अपनी जमीन खिसकती दिखाई देने लगी है, और उनके बीच घबराहट पैदा हुई है । अपनी जमीन बचाने तथा अपनी घबराहट को दूर करने के लिए कुछेक नेताओं ने सुभाष जैन के इस कार्यक्रम को बदनाम करने का प्रयास शुरू तो किया था, लेकिन जल्दी ही उनकी समझ में आ गया कि उनका प्रयास सुभाष जैन का कोई नुकसान करने की बजाए, उलटे उन्हें ही चोट पहुँचा सकता है - और इसीलिए झटका महसूस कर रहे नेता अपने प्रयासों को बंद करके अपनी अपनी पोजीशन के बर्बाद होने का तमाशा चुपचाप देखने के लिए मजबूर हुए हैं ।
यहाँ गौर करने वाला तथ्य यह है कि सुभाष जैन की यह पोजीशन कोई अचानक से नहीं बनी या सामने आई है, बल्कि निरंतर चलती चली आ रही प्रक्रिया का एक बड़ा और - राजनीतिक शब्दावली में कहें तो विस्फोटक - प्रकटीकरण है । यह प्रक्रिया सुभाष जैन की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी जीत के साथ ही शुरू हो गई थी । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुने जाने के बाद सुभाष जैन का स्वागत-सम्मान करने के लिए डिस्ट्रिक्ट के क्लब्स के बीच जैसी होड़ मची थी, वैसी होड़ इससे पहले कभी कहीं देखने/सुनने को नहीं मिली । ज्यादा पुरानी बातें न भी याद करें, तो सुभाष जैन से पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बने सतीश सिंघल का मामला याद किया ही जा सकता है - डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बनने पर जिनका स्वागत-सम्मान किसी इक्के-दुक्के क्लब में हुआ हो तो हुआ हो, जिसका कोई नोटिस भी नहीं लिया गया । सुभाष जैन के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुने जाने के बाद डिस्ट्रिक्ट में लेकिन अनोखा नजारा देखने को मिला । क्लब्स के कुछेक मठाधीशों ने कुछ-कुछ क्लब्स को जोड़ कर संयुक्त रूप से स्वागत-सम्मान समारोह करने की योजना बनाना शुरू किया था, किंतु क्लब्स के पदाधिकारियों व दूसरे सदस्यों का जोश ऐसे हिलोरे मार रहा था कि उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि वह संयुक्त रूप से नहीं, बल्कि अलग अलग ही सुभाष जैन का स्वागत-सम्मान करेंगे । याद करने और रखने की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस हो जाने के बाद क्लब्स की गतिविधियाँ ठप्प सी हो जाती हैं; जो क्लब्स मीटिंग्स करते भी हैं, वह बड़ी लो-प्रोफाइल किस्म की मीटिंग्स करके महज खानापूर्ति ही करते हैं - लेकिन पिछले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस हो जाने के बाद भी क्लब्स ने तड़क-भड़क तथा जोरशोर के साथ मीटिंग्स सिर्फ इसलिए की, ताकि वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी सुभाष जैन का स्वागत-सम्मान भव्य तरीके से कर सकें ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए मिली चुनावी जीत पर सुभाष जैन का डिस्ट्रिक्ट के क्लब्स ने जैसा स्वागत-सम्मान किया, उसके विवरण और तस्वीरें चूँकि सोशल मीडिया में भी प्रसारित हुए - जिससे दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारियों/नेताओं तथा रोटरी के बड़े पदाधिकारियों व नेताओं की जानकारी में भी यह बात आई; और उन्हें भी इस बात पर आश्चर्य हुआ कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुने गए किसी पदाधिकारी की अपने डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच इतनी ज्यादा लोकप्रियता और पसंदगी भी हो सकती है क्या ? उल्लेखनीय है कि हर डिस्ट्रिक्ट में हर वर्ष डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुना ही जाता है - रोटरी के वरिष्ठ नेताओं ने ही इस तथ्य को रेखांकित किया कि अपने डिस्ट्रिक्ट में जैसा स्वागत-सम्मान सुभाष जैन का हुआ, वैसा स्वागत-सम्मान किसी और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी का होता हुआ नहीं सुना/देखा गया है । एक बड़े रोटरी नेता ने तो और भी उल्लेखनीय सच्चाई की तरफ ध्यान दिलाते हुए बताया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी को तो छोड़िए, बास्कर चोकालिंगम पीछे इंटरनेशनल डायरेक्टर चुने गए हैं - किंतु उनका भी अपने डिस्ट्रिक्ट में वैसा स्वागत-सम्मान नहीं हुआ, जैसा स्वागत-सम्मान सुभाष जैन का अपने डिस्ट्रिक्ट में हुआ दिखा है । स्वागत-सम्मान के चलते सुभाष जैन को अपने डिस्ट्रिक्ट के साथ साथ दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में और रोटरी के बड़े नेताओं के बीच जो ख्याति मिली, वह वास्तव में लोगों के साथ बराबर का दोस्ताना व्यवहार करने/रखने तथा लोगों को उचित सम्मान देने के उनके व्यवहार का ही नतीजा है । दरअसल अधिकतर लोग पद पाने में सफल तो हो जाते हैं, लेकिन सफल हो जाने के बाद ऐसी अकड़ में आ जाते हैं कि फिर दूसरों को कुछ समझते ही नहीं हैं; और इसीलिए बड़े बड़े पदों पर पहुँचे हुए लोगों को - पद तो मिल जाता है, पर सम्मान नहीं मिलता है । जिन्हें सम्मान नहीं मिलता, वह अपनी कमियाँ/गलतियाँ तो देखते नहीं हैं - दूसरों को कोसते हैं ।
सुभाष जैन ने लेकिन अपने व्यवहार से लोगों का दिल जीता, तो उन्हें चुनावी जीत के साथ-साथ लोगों का प्रेम और सम्मान भी मिला, जिसके कारण लोगों का उनके साथ गहरा लगाव बना । लोगों का उनके प्रति यह लगाव सिर्फ स्वागत-सम्मानों में ही नहीं दिखा है, बल्कि मौजूदा रोटरी वर्ष में हो रहे क्लब्स के अधिष्ठापन समारोहों में भी देखने को मिला है - जहाँ कि लोगों के बीच डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सतीश सिंघल के मुकाबले उनकी ज्यादा माँग, पूछ और संलग्नता रहती है । सुभाष जैन ने अपने व्यवहार से लोगों का जो दिल जीता है, और नतीजे के रूप में लोगों की तरफ से उन्हें जो प्रेम व सम्मान मिला है - वृंदावन जाने के उनके कार्यक्रम के साथ लोगों का जुड़ाव उसकी ही संगठित व मुखर प्रतिक्रिया है । यह सिर्फ एक धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होना भर नहीं है । उल्लेखनीय है कि इससे पहले भी कई मौके आए हैं, जबकि रोटरी पदाधिकारियों व नेताओं के यहाँ हुए धार्मिक आयोजनों में रोटेरियंस आमंत्रित हुए हैं, लेकिन उन आमंत्रणों के जबाव में ऐसा जोश और उत्साह कभी भी नहीं देखा गया । सुभाष जैन के वृंदावन स्थित बाँके बिहारी मंदिर जाने के कार्यक्रम का तो लोगों को निमंत्रण भी नहीं मिला है, लोगों को सिर्फ जानकारी मिली - और वह ऐसे जोश व उत्साह के साथ कार्यक्रम में शामिल होने के लिए तैयार हो गए, जैसे यह उनका खुद का कार्यक्रम है । इस कार्यक्रम में लोगों का जैसा जोश और जैसी संलग्नता देखने को मिली है, उसका राजनीतिक भावार्थ 'पढ़ना' शुरू कर दिया है - और यही कारण है कि इस यात्रा को लेकर नेताओं के बीच भारी खलबली मची है । डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में दिलचस्पी व सक्रियता रखने वाले लोगों का मानना और कहना है कि स्वागत-समारोहों से और फिर अधिष्ठापन समारोहों में डिस्ट्रिक्ट के भावी नेता के रूप में सुभाष जैन की जो 'जमीन' तैयार हो रही थी, वृंदावन यात्रा के प्रति लोगों के जोश तथा उनकी संलग्नता ने उस जमीन को ठोस आधार में बदल दिया है । ऐसे में हर खेमे के नेताओं को यदि अपनी अपनी जमीन खिसकती नजर आ रही है, और उनके बीच खलबली मच गई है - तो यह बहुत स्वाभाविक बात भी है ।

Thursday, July 28, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल पर काबिज दीपक गर्ग के नेतृत्व वाली चौकड़ी के सदस्यों की करतूतों के कारण हो रही बदनामी से सत्ता खेमे के ही दूसरे सदस्यों के बीच बेचैनी

नई दिल्ली । चेयरमैन दीपक गर्ग, सेक्रेटरी सुमित गर्ग, ट्रेजरार नितिन कँवर और निकासा चेयरमैन राजेंद्र अरोड़ा की चौकड़ी को अपनी अकर्मण्यता, मूर्खता और टुच्ची नेतागिरी से रीजनल काउंसिल के कामकाज और उसकी पहचान व प्रतिष्ठा को धूल में मिला देने के जिस तरह के गंभीर आरोपों का सामना कर पड़ रहा है - उसके चलते रीजनल काउंसिल के सत्ता खेमे में फूट पड़ने के संकेत मिलने लगे हैं । सत्ता खेमे के बाकी चार सदस्य - विवेक खुराना, राकेश मक्कड़, पूजा बंसल और पंकज पेरिवाल अपने आपको न सिर्फ ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, बल्कि चौकड़ी की कारस्तानियों के चलते मिलने वाली बदनामी को ढोने की बेचैनी भी महसूस कर रहे हैं । इन चारों की तरफ से अलग अलग मौकों पर सुनने को मिल रहा है कि चौकड़ी के लोगों ने इनका समर्थन लेकर कुर्सियाँ तो प्राप्त कर लीं, लेकिन कामकाज में और फैसलों में उन्हें किसी भी स्तर पर शामिल नहीं किया जाता है । सत्ता में होने का जो 'सुख' उन्हें भी मिलना चाहिए था, वह तो उन्हें नहीं ही मिल पा रहा है; यह देख कर उन्हें और चोट पहुँची है कि उनके हिस्से का सुख चौकड़ी के लोगों ने ही छीना हुआ है । राकेश मक्कड़ के साथ तो बहुत ही बुरी बीत रही है - सत्ता खेमे के लोगों को जोड़ने का काम उन्होंने ही किया था; यानि उनकी बदौलत ही चौकड़ी के लोग कुर्सियों पर बैठे होने का सुख भोग रहे हैं, किंतु उन्हें ही दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका गया है । उनकी और उनके बाकी तीन साथियों की समस्या यह भी है कि चौकड़ी के लोगों की करतूतों से लोगों के बीच जो नाराजगी व बदनामी हो रही है, उसके लिए उन्हें भी जिम्मेदार ठहराया जा रहा है और बदनामी के कीचड़ से बच पाना उनके लिए मुश्किल हो रहा है । पूजा बंसल ने हाल ही के दिनों में कई बार इस बात का प्रयास किया कि रीजनल काउंसिल में जो गड़बड़ियाँ हो रही हैं, और जिनके कारण सत्ता खेमे के लोगों की बदनामी हो रही है - उन पर सत्ता खेमे के सभी आठों सदस्यों के बीच चर्चा हो और हालात को सँभालने को लेकर आपस में विचार विमर्श किया जाए । पूजा बंसल काउंसिल में वाइस चेयरपरसन के पद पर हैं, किंतु फिर भी चौकड़ी के सदस्य उनके प्रयासों को कोई तवज्जो नहीं दे रहे हैं । चौकड़ी के सदस्यों का यह रवैया सत्ता खेमे में कभी भी बड़ा बबाल पैदा कर/करवा सकता है ।
नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल पर कब्ज़ा जमाए चौकड़ी के काम करने के तरीके का हाल देखने का मौका इसी महीने आयोजित हुई सीए छात्रों की दो दिवसीय नेशनल कन्वेंशन में देखने को मिला । हर वर्ष होने वाली इस कन्वेंशन में 1500 के करीब छात्र शामिल होते हैं - लेकिन इस वर्ष की कन्वेंशन में पहले दिन मुश्किल से 500 छात्र और दूसरे दिन करीब 150 छात्र ही शामिल हुए । आयोजकों ने 1200 छात्रों के लिए खाने की व्यवस्था की थी । यह कन्वेंशन काउंसिल पर काबिज चौकड़ी के नाकारापन का जीता-जागता सुबूत बन गई है, जिसके चलते इंस्टीट्यूट को करीब बीस लाख रुपए का नुकसान हुआ है । इंस्टीट्यूट के पदाधिकारियों को भी हैरानी है कि पिछले दिनों लुधियाना में इसी तरह की कन्वेंशन हुई तो उसमें एक हजार से अधिक छात्र जुटे, और दिल्ली में कन्वेंशन के आयोजक इतने गए-गुजरे हैं कि उनके लिए दो सौ छात्रों को जुटाना मुश्किल हो गया । रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के इससे भी बड़े नाकारापन का उदाहरण यह है कि दिल्ली में लक्ष्मीनगर स्थित इंस्टीट्यूट की लाइब्रेरी का बिजली बिल पिछले तीन-चार महीनों से नहीं दिया जा रहा था, जिसके नतीजे के रूप में लाइब्रेरी की बिजली कट गई और जिसके चलते छात्रों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा । यह पढ़ते/जानते हुए कृपया यह बिलकुल मत सोचियेगा कि दीपक गर्ग, सुमित गर्ग, नितिन कँवर और राजेंद्र अरोड़ा की चौकड़ी कुछ करती ही नहीं है : 30 जून को 'सीए उत्सव' के नाम पर इन्होंने नाच-गाने का जैसा जो धूम-धड़ाका करवाया, उसमें इनकी आयोजन-प्रतिभा का सुबूत देखा/पाया जा सकता है । इस पर किसी ने चुटकी भी ली कि यह लोग नाच-गाना करवाने वाली भांड पार्टी के पदाधिकारी होने की काबिलियत रखते हैं, काउंसिल में बेचारे पता नहीं क्यों और कैसे आ गए ?
दीपक गर्ग, सुमित गर्ग, नितिन कँवर और राजेंद्र अरोड़ा की चौकड़ी पर आरोप सिर्फ यही नहीं है कि यह काउंसिल/इंस्टीट्यूट के कामकाज की जिम्मेदारी ठीक तरीके से निभा नहीं पा रहे हैं; इससे भी ज्यादा गंभीर आरोप इन पर यह है कि इंस्टीट्यूट के जो काम ठीक तरीके से हो रहे हैं - यह लोग उन्हें डिस्टर्ब व खराब करने की कोशिश करने तक की हरकत करते हैं । इस हरकत के लिए इन्हें इंस्टीट्यूट की इंटरनेशनल टैक्सेशन कमेटी के वाइस चेयरमैन संजीव चौधरी से लताड़ तक खाना पड़ी है । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट इंटरनेशनल टैक्सेशन पर क्लासेस चलाता है, जिसके लिए मोटी फीस ली जाती है । क्लासेस करने वाले लोगों ने इंटरनेशनल टैक्सेशन कमेटी के वाइस चेयरमैन संजीव चौधरी से इन चारों की शिकायत की कि यह लोग बीच क्लासेस में आकर भाषणबाजी करते हैं, और इस तरह क्लास डिस्टर्ब करते हैं । शिकायत करने वाले लोगों का कहना रहा कि वह क्लासेस के लिए अपना कीमती समय और मोटी फीस इनकी बकवासबाजी सुनने के लिए थोड़े ही देते हैं । संजीव चौधरी ने पहले तो इन्हें इशारे से समझाने की कोशिश की कि यह लोग इस तरह की हरकतें न किया करें; किंतु उन्होंने जब देखा कि इशारे से समझाने की उनकी कोशिशों को यह लोग गंभीरता से नहीं ले रहे हैं, तो संजीव चौधरी ने इन्हें कस कर लताड़ा । संजीव चौधरी की लताड़ से अपमान और दुख फील करते हुए दीपक गर्ग ने प्रेसीडेंट को मेल लिख कर पूछा कि रीजनल काउंसिल के पदाधिकारी के रूप में वह इंटरनेशनल टैक्सेशन की क्लासेस करने वाले लोगों से कैसे बात कर सकते हैं ? प्रेसीडेंट की तरफ से दीपक गर्ग को उनकी मेल का कोई औपचारिक जबाव मिला है या नहीं, इसका तो नहीं पता; किंतु कई वरिष्ठ लोगों की तरफ से उन्हें इस बारे में खरी-खोटी सुनने को जरूर मिली है कि तुम लोगों को इतनी सी अक्ल सचमुच नहीं है क्या कि क्लास को डिस्टर्ब किए बिना क्लास के लोगों से कब और कैसे बात कर सकते हो ?
चौकड़ी के सदस्यों, खासकर चेयरमैन दीपक गर्ग और ट्रेजरार नितिन कँवर पर गंभीर आरोप यह भी लगा है कि जीएमसीएस की फैकल्टी में इन्होंने मनमाने तरीके से अपने अपने नाकाबिल किस्म के लोगों को घुसा दिया है, और इस तरह से जीएमसीएस की पढ़ाई व्यवस्था को खासी चोट पहुँचाई है । इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ सदस्य अविनाश गुप्ता के खिलाफ की गई हरकत को लेकर दीपक गर्ग और नितिन कँवर पहले से ही आरोपों व विवादों के घेरे में हैं । चर्चा है कि उस मामले में माफी माँग कर यह लोग मामले को ख़त्म करवाने के प्रयासों में हैं । उनके प्रयास सफल होंगे या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा; अभी लेकिन यह हो रहा है कि दीपक गर्ग के नेतृत्व में नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल पर कब्ज़ा जमाए बैठी चौकड़ी की कारस्तानियों को लेकर इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट एम देवराज रेड्डी को कई कई शिकायतें मिली हैं - उन्होंने जिनकी जाँच-पड़ताल करने/करवाने को लेकर दिलचस्पी दिखाई है । चौकड़ी के सदस्यों की करतूतों से हो रही बदनामी ने सबसे ज्यादा चौकड़ी के समर्थक सदस्यों को ही परेशान किया हुआ है । उनकी समस्या का कारण यह भी है कि रीजनल काउंसिल में जो कुछ भी मनमानियाँ और बेवकूफियाँ हो रही हैं, उनसे उनका कोई लेना-देना नहीं है - किंतु सत्ता खेमे का सदस्य होने के नाते उनकी जिम्मेदारी उनके सिर पर भी पड़ रही है । सबसे ज्यादा मुसीबत पूजा बंसल की है । वाइस चेयरपरसन होने के नाते वह यदि यह कहते हुए बचने की कोशिश करती हैं कि उनकी सुनी ही नहीं जा रही है, तो लोगों को पूछना होता है कि इतने बड़े पद पर होने के बावजूद वह यदि कोई हस्तक्षेप नहीं कर पा रही हैं - तो क्या यह उनकी प्रशासनिक अक्षमता नहीं है ? इस तरह की बातों/स्थितियों ने सत्ता खेमे के लोगों को प्रेरित किया है कि वह चौकड़ी की हरकतों पर लगाम लगाएँ । यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी लगाम लगाने की कोशिशों का चौकड़ी पर कोई असर होता भी है, या चौकड़ी की हरकतें बदस्तूर जारी रहती हैं ?

Wednesday, July 27, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में रोटरी क्लब गाजियाबाद सफायर के अधिष्ठापन समारोह में हुई जेके गौड़ की खुल्लमखुल्ला फजीहत को शरत जैन ने भी चुपचाप बैठ कर तमाशे की तरह देखा और मजा लिया

गाजियाबाद । जेके गौड़ को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद से हटे अभी एक महीना पूरा नहीं हुआ है, कि लोगों के बीच उनकी असल 'औकात' सामने आने लगी है - कल रात रोटरी क्लब गाजियाबाद सफायर के अधिष्ठापन समारोह में उनकी ऐसी गत बनी कि खुद उनके लिए कार्यक्रम में ठहर पाना मुश्किल हुआ, और अपमान की ज्वाला में जलते हुए उन्हें बीच कार्यक्रम में से निकल जाना पड़ा । इस बात को अभी एक वर्ष पूरा नहीं हुआ है - पिछले रोटरी वर्ष के इन्हीं दिनों जेके गौड़ क्लब्स के पदाधिकारियों को इस बात के लिए हड़का रहे होते थे कि 'इसे' बुलाओ, 'उसे' मत बुलाओ, 'उसे' बुलाया तो मैं नहीं आऊँगा, आदि-इत्यादि । इस बात को एक वर्ष पूरा होने से पहले पहले ही अब नौबत यह आ गई है कि जेके गौड़ को अपमानित होने का दंश झेलना पड़ रहा है, और जब उनसे अपना अपमान बर्दाश्त नहीं हुआ तो उन्हें कार्यक्रम बीच में ही छोड़ कर उठ जाना पड़ा । जेके गौड़ के लिए फजीहत की बात यह भी रही कि रोटरी क्लब गाजियाबाद सफायर के पदाधिकारियों ने उनके साथ जो किया, सो तो किया ही - डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन भी उनके साथ हो रहे अपमान को चुपचाप बैठे देखते रहे और उन्होंने भी इस बात की कोई कोशिश नहीं की कि उनके पूर्ववर्ती डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ का इतना खुल्लमखुल्ला कचरा न हो । कुछेक लोगों ने तो यह कहते हुए मजे भी लिए कि जेके गौड़ इसी लायक हैं, और उनके साथ जो हुआ ठीक ही हुआ ।
रोटरी क्लब गाजियाबाद सफायर के पदाधिकारियों ने कार्यक्रम की शुरुआत में ही जेके गौड़ को उनकी असली 'जगह' तब दिखा दी, जब उन्हें मंच पर बैठाने की बजाए श्रोताओं के बीच बैठा दिया । रोटरी इंटरनेशनल के प्रोटोकॉल के हिसाब से निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को मंच पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के साथ ही जगह मिलना चाहिए । इस प्रोटोकॉल का पालन करने का ध्यान न तो क्लब के पदाधिकारियों ने रखा और न डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन ने ही उन्हें इसका पालन करने के लिए कहा । जेके गौड़ के आसपास बैठे लोगों के अनुसार, इसी बात से कार्यक्रम की शुरुआत में ही जेके गौड़ सुलग तो गए थे - लेकिन अपमान का घूँट पीकर वह फिर भी बैठे रहे । उधर रोटरी क्लब गाजियाबाद सफायर के पदाधिकारियों ने भी जैसे ठान रखा था कि उन्हें आज जेके गौड़ को पूरी तरह 'धोना' है । कार्यक्रम के अंतिम चरण में इसका मौका आया : मंच पर बैठे सारे लोग भाषण कर चुके थे, यहाँ तक कि असिस्टेंट गवर्नर पराग सिंघल भी बोल चुके थे - तब निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ को भाषण देने के लिए आमांत्रित किया गया । यह सरासर घोषित रूप से और सार्वजनिक रूप से जेके गौड़ का अपमान था - खुद जेके गौड़ ने भी इसे अपने अपमान के रूप में ही देखा/पहचाना और फिर इस पर वह अपनी नाराजगी दिखाते हुए कार्यक्रम के बीच से ही चले गए ।
यह नजारा देख रहे लोगों में अधिकतर के लिए यह समझना मुश्किल हुआ कि रोटरी क्लब गाजियाबाद सफायर के पदाधिकारियों ने जेके गौड़ की ऐसी खुल्ली फजीहत क्यों की ? क्लब की अध्यक्ष सिम्मी अग्रवाल हैं, जो अमित अग्रवाल की पत्नी हैं । अमित अग्रवाल ने जेके गौड़ को गवर्नर चुनवाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, लेकिन बाद में फिर वह जेके गौड़ से इस बात के लिए खफा हो गए थे कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में जेके गौड़ ने उन्हें उतनी तवज्जो नहीं दी, जितनी की उन्हें मिलना चाहिए थी । अमित अग्रवाल इस बात से भी जेके गौड़ से उखड़े हुए हैं कि वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का समर्थन करने को राजी नहीं हो रहे हैं । समझा गया है कि अमित अग्रवाल ने अपनी पत्नी के जरिए जेके गौड़ से इन्हीं बातों का बदला लिया है । जेके गौड़ के लिए ज्यादा फजीहत की बात यह रही कि इस क्लब में उनके नजदीक समझे जाने वाले राजीव गोयल व आलोक गर्ग की पत्नियाँ महत्त्वपूर्ण पदों पर हैं, किंतु फिर भी उनके साथ वह हुआ - जिसे वह खुद बर्दाश्त नहीं कर पाए । मजे की बात यह रही कि अमित अग्रवाल ने जेके गौड़ के साथ जो हुआ उसकी नहीं; बल्कि जेके गौड़ ने जो किया - उसकी आलोचना की । अमित अग्रवाल का तर्क रहा कि यह महिलाओं का क्लब है, इसलिए इसमें यदि कुछ गलत हो भी जाता है तो उसे अनदेखा किया जाना चाहिए और उस पर ऐसे रिएक्ट नहीं करना चाहिए - जैसे जेके गौड़ ने किया है । उनके इस तर्क पर प्रति-तर्क रहा कि क्लब के पदाधिकारियों के परिचय में तो बड़ी बड़ी बातें की जाती हैं : बताया जाता है कि 'ये' डायरेक्टर हैं, 'ये' कंसलटेंट हैं, 'ये' एंत्रेप्रेनॉर' हैं, 'ये' यह हैं, 'ये' वह हैं, आदि-इत्यादि; लेकिन जब यह देखो कि इन्होंने डिलीवर क्या किया है - तो हर जगह फूहड़पन और मूर्खता का संगम देखने को मिलता है; ऐसे में आलोचना तो होगी ही ।
जेके गौड़ के लिए फजीहत की बात यह रही कि एक तरफ तो वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों से 'पिटे', और दूसरी तरफ अशोक जैन की उम्मीदवारी के समर्थकों ने भी उन्हें 'बचाने' की कोशिश नहीं की । शरत जैन के रवैये पर हर किसी को हैरानी है । हर किसी का मानना और कहना है कि शरत जैन यदि वास्तव में चाहते और हस्तक्षेप करते तो जेके गौड़ का ऐसा अपमान नहीं होता । शरत जैन के रवैये से उन खबरों को और हवा मिली है, जिनमें कहा/बताया जा रहा है कि रमेश अग्रवाल व शरत जैन की जोड़ी ने समझ लिया है कि जेके गौड़ अब उनके लिए ज्यादा काम के नहीं रह गए हैं, और इसलिए उन्होंने जेके गौड़ से दूरी बनाना/दिखाना शुरू कर दिया है । सत्ता खेमे के लोगों के बीच डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति को लेकर पिछले दिनों जो बातचीतें हुईं हैं, उनमें जेके गौड़ ने जिस तरह से अशोक जैन की बजाए ललित खन्ना की वकालत की, शरत जैन उससे भी चिढ़े हुए हैं । शरत जैन को लगता है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी को खाद-पानी देने का काम जेके गौड़ ही कर रहे हैं । इसीलिए रोटरी क्लब गाजियाबाद सफायर के अधिष्ठापन समारोह में जब जेके गौड़ की खुल्लमखुल्ला फजीहत हो रही थी, तब शरत जैन ने चुपचाप बैठ कर तमाशा देखा और मजा लिया । विडंबना की बात यह रही कि रोटरी क्लब गाजियाबाद सफायर के पदाधिकारियों ने जेके गौड़ के साथ जो किया, उसकी प्रायः हर किसी ने आलोचना ही की है; किंतु फिर भी जेके गौड़ के साथ शायद ही किसी को हमदर्दी हुई हो - अधिकतर लोगों का मानना और कहना है कि जेके गौड़ ऐसे ही व्यवहार के लायक हैं, और उनके साथ यह ठीक ही हुआ है । गवर्नर के रूप में जेके गौड़ ने जिस तरह का आचरण किया और अपने व्यवहार से अपने ही कई नजदीकियों को जिस तरह से पराया कर लिया - उसी का नतीजा है कि उनकी फजीहत में हर कोई मजा लेने वाले मूड में है ।