Tuesday, October 4, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080, यानि राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को रोटरी इंटरनेशनल से एक बार फिर मार पड़ी

चंडीगढ़ । दमन बावेजा ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा को आज शाम साढ़े चार बजे जो ईमेल भेजा है, वह रोटरी क्लब हिमालयन रेंजेस मनसा देवी द्धारा की गई चुनावी शिकायत पर लिए गए फैसले की जानकारी भर नहीं है - बल्कि राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के लिए चुल्लू भर पानी भी है । दमन बावेजा रोटरी इंटरनेशनल के दिल्ली स्थित साऊथ एशिया ऑफिस में क्लब व डिस्ट्रिक्ट सपोर्ट टीम के को-ऑर्डीनेटर हैं । राजा साबू और उनके गिरोह के लोगों ने जिस तरह की बेईमानियाँ करके टीके रूबी को चुनाव हरवाया था, दमन बावेजा ने अपने ईमेल संदेश में बताया है कि रोटरी इंटरनेशनल के तीन सदस्यीय पैनल ने उस चुनावी नतीजे को पलट दिया है - और वर्ष 2017-18 के लिए टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर घोषित किया है । पैनल ने उक्त चुनाव की निगरानी करने वाले तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डेविड हिल्टन की जिन शब्दों में भर्त्सना की है, वह किसी भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के लिए बेहद शर्म की बात होनी चाहिए । डेविड हिल्टन के बारे में पैनल द्धारा की गई टिप्पणी वास्तव में इस बात का सुबूत है कि डेविड हिल्टन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारियाँ निभाने की बजाए राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स के हाथों की कठपुतली बने हुए थे - और उनका हुक्म बजा रहे थे । उनसे पहले, इसी मामले में दिलीप पटनायक ने खासी फजीहत झेली । इस मामले ने अब जो टर्न लिया है, उसमें तीसरे गवर्नर के रूप में रमन अनेजा के लिए भी फजीहत के संकेत नज़र आ रहे हैं । तीन तीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के लिए जिल्लत और बदनामी का सबब बने इस सारे तमाशे में बेचारे डीसी बंसल की और फजीहत हो रही है - जिन्हें राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स की हरकतों के चलते 'गवर्नर' की कुर्सी से बेइज्जत होकर दूसरी बार उतरना पड़ा है ।
राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के लिए टीके रूबी के मामले में मुसीबत की बात यह हुई है कि उन्हें डिस्ट्रिक्ट के लोगों की तरफ से भी और रोटरी इंटरनेशनल की तरफ से भी - लगातार मार पड़ रही है । डिस्ट्रिक्ट के लोगों की तरफ से पड़ने वाली मार से बचने और उसे छिपाने के लिए वह बेईमानी करते हैं, तो रोटरी इंटरनेशनल उनकी बजा देता है । उनकी बेशर्मी की लेकिन तारीफ करनी पड़ेगी कि इतनी थुक्का -फजीहत के बाद भी वह बाज नहीं आ रहे हैं । यही कारण है कि वर्ष 2017-18 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का जो फैसला फरवरी 2015 में हो जाना चाहिए था, वह राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में बीस महीने के बाद भी अभी अनिश्चय में पड़ा है । रोटरी इंटरनेशनल के 34 जोन्स में फैले करीब 530 डिस्ट्रिक्ट्स में इस समय, अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार सँभालने वाले अपने अपने उद्देश्य/लक्ष्य तय कर रहे हैं और अपनी अपनी टीम के लिए लोगों को चयन कर रहे हैं; किंतु राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में अभी तक भी यही तय नहीं हो सका है कि अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होगा कौन ? वर्ष 2017-18 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद को लेकर जिन कुछेक डिस्ट्रिक्ट्स में विवाद या झगड़े थे भी, वह सुलट गए हैं - लेकिन राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में इस बात को लेकर शुरू हुआ झगड़ा सुलटने की बजाए उलझता और जा रहा है । इसे लेकर रोटरी समुदाय में राजा साबू तथा उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की भारी बदनामी हो रही है, और लोग उनके नाम ले ले कर चुस्कियाँ ले रहे हैं - लेकिन वह निर्लज्ज किस्म की बेशर्मी के साथ अपनी हरकतों को जारी रखे हुए हैं । राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने अपनी हरकतों से सिर्फ अपना ही नहीं - डिस्ट्रिक्ट का और रोटरी का भी मजाक बना/बनवा दिया है ।
राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स जब कहीं रोटेरियंस के बीच भाषण देते हैं - तो उच्च आचरण, सदाचार, नियमों के पालन, नैतिकता आदि की ऐसी ऊँची ऊँची बातें कहते/करते हैं, जिन्हें सुन कर लगता है जैसे कि यह लोग ऋषियों/मुनियों के सगे वाले नाना/फूफा/मामा हैं; लेकिन इनकी कारस्तानियाँ देख/जान का साबित होता है कि 'शैतान' को भी इनसे ट्रेनिंग लेने की जरूरत पड़ जाए । वर्ष 2017-18 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के चुनाव को लेकर पिछले करीब बीस महीनों में जो जो हुआ है, उससे इनका असली रूप लोगों के सामने आ गया है । कई लोग हैं जो इस बात को पूरी स्पष्टता के साथ और दो टूक तरीके से कहते हैं कि राजा साबू के प्रति उनके मन में बड़ा सम्मान था, लेकिन अब उन्हें पता चला है कि उनसे घटिया आदमी तो कोई हो ही नहीं सकता है । उल्लेखनीय है कि राजा साबू ने अपने डिस्ट्रिक्ट में यह प्रथा स्थापित की थी कि नोमीनेटिंग कमेटी द्धारा चुने गए अधिकृत उम्मीदवार को चेलैंज नहीं किया जायेगा और उसे ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बनने दिया जायेगा । राजा साबू ने पिछले तमाम वर्षों में बहुत सुनियोजित तरीके से यह दिखाने का प्रयास किया कि वह डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में किसी का पक्ष नहीं लेते हैं, और जो फैसला होता है उसका सम्मान करते हैं । वर्ष 2017-18 के लिए लेकिन नोमीनेटिंग कमेटी ने उनके पसंदीदा व्यक्ति की बजाए जब टीके रूबी को अधिकृत उम्मीदवार चुन लिया, तो राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में न सिर्फ अधिकृत उम्मीदवार के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बनने की प्रथा टूट गई और अधिकृत उम्मीदवार चेलैंज हुआ - बल्कि लोगों ने यह भी देखा कि राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स चेलैंज करने वाले उम्मीदवार की हर तरीके से मदद करने के लिए खुलकर सामने आ गए ।
टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की कुर्सी तक पहुँचने से रोकने के लिए राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स ने जो कुछ किया, उससे उनकी कलई तो उतरी ही है - साथ ही निवर्तमान इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन की भी पोल खुली है । उल्लेखनीय है कि रोटरी में राजनीति को हतोत्साहित करने के लिए पिछले रोटरी वर्ष में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट के रूप में केआर रवींद्रन ने बड़े कठोर मानक बनाए थे; और राजनीति करने वाले पदाधिकारियों पर तेजी से हंटर चलाए थे । डिस्ट्रिक्ट 3100 और डिस्ट्रिक्ट 3011 के कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को उनके हंटर की चोट भी पड़ी, और डिस्ट्रिक्ट 3100 तो नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में भी चला गया था । किंतु डिस्ट्रिक्ट 3080 के मामले में लोगों ने केआर रवींद्रन की सारी हंटरबाजी की फूँक सरकते हुए देखी । डिस्ट्रिक्ट 3011 के मामले में तो पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के खिलाफ कोई औपचारिक शिकायत भी नहीं थी, फिर भी उन्हें केआर रवींद्रन के कोप का शिकार होना पड़ा । राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में राजा साबू सहित अन्य कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की चुनावी धांधलियों की सुबूतों के साथ औपचारिक शिकायतें हैं; उन शिकायतों और सुबूतों के आधार पर ही रोटरी इंटरनेशनल की विभिन्न कमेटियों ने फैसले लिए हैं - लेकिन फिर भी केआर रवींद्रन की हिम्मत नहीं हो पाई कि वह राजा साबू और या उनके गिरोह के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स पर  कार्रवाई कर सकें । इस प्रकरण से लोगों ने मान/समझ लिया है कि केआर रवींद्रन सिर्फ उन लोगों पर ही हंटर चला सकते हैं, जिनके कोई 'माई-बाप' नहीं हैं; और राजा साबू तो दूर की बात, उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स तक के खिलाफ कार्रवाई कर सकने की केआर रवींद्रन की 'औकात' नहीं है । राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में पिछले करीब बीस महीने से जो तमाशा हो रहा है, उससे परिचित लोगों का मानना और कहना है कि केआर रवींद्रन यदि शुरू में ही राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में भी अपने द्धारा तय किए गए मानकों का पालन करवाते, तो मामला यहाँ तक नहीं खिंचता ।
अभी भी कोई बहुत देर नहीं हुई है ! केआर रवींद्रन यदि अभी भी इस बात की जरूरत समझ लें कि उनके द्धारा तय मानकों का पालन राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में भी होगा - तो मामला और खराब होने से बच सकता है । अन्यथा राजा साबू के गिरोह के पूर्व गवर्नर्स की बयानबाजियाँ संकेत दे रही हैं कि लगातार पड़ती मार से भी उन्होंने कोई सबक नहीं सीखा है । यानि अभी और तमाशे देखने को मिलेंगे ।

Monday, October 3, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में ई-वोटिंग से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव होने की तैयारी ने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की मुसीबतों को बढ़ाया

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव ई-वोटिंग से कराने की तैयारी शुरू करने से दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को तगड़ा वाला झटका लगा है । उल्लेखनीय है कि रोटरी इंटरनेशनल की डायरेक्टर्स बोर्ड मीटिंग में इस आशय का फैसला हो जाने के बाद से ही मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल दावा करते रहे हैं कि मौजूदा वर्ष से ई-वोटिंग करा पाना व्यावहारिक कारणों से संभव ही नहीं होगा, इसलिए इस वर्ष तो डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में ही चुनाव होगा - और पहले से चले आ रहे तरीके से ही होगा । किंतु डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन ने क्लब्स के पदाधिकारियों के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट के अन्य लोगों को भी रोटरी इंटरनेशनल की डायरेक्टर्स बोर्ड मीटिंग में हुए फैसले से अवगत कराते हुए जरूरी कार्रवाई शुरू करने के संकेत देकर मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल के दावों को झूठा ठहरा दिया है । ई-वोटिंग को लेकर लोगों के बीच फैले असमंजस को दूर करने के लिए शरत जैन ने जिस तरह की पहल की है, उससे दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को यह अहसास तो हो गया है कि शरत जैन इसी वर्ष से ई-वोटिंग से चुनाव कराने का काम शुरू कर देंगे । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों के ही अनुसार, शरत जैन की इस तैयारी को देखते हुए दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को अपनी चुनावी रणनीति पर पुनर्विचार करने की जरूरत महसूस हुई है ।
दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों ने ही इन पँक्तियों के लेखक को बताया है कि मुकेश अरनेजा को लगता है कि ई-वोटिंग के कारण चुनाव में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की भूमिका बढ़ जायेगी, और इस बढ़ी भूमिका के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुनाव व चुनावी नतीजे को प्रभावित करने की स्थिति में आ जायेगा । मुकेश अरनेजा का साफ कहना है कि इस स्थिति का सीधा फायदा अशोक जैन को मिलेगा । मुसीबत की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पास अपने उम्मीदवार को फायदा पहुँचाने का जो 'मौका' होगा, वह बेईमानी की श्रेणी में भी नहीं आयेगा - इसलिए उसकी कहीं कोई शिकायत भी नहीं हो सकेगी । ई-वोटिंग में चुनावी बेईमानी करने की गुंजाइश तो - शायद - नहीं होगी; लेकिन चुनाव व चुनावी नतीजे को प्रभावित करने के मौके बहुत होंगे । पिछले रोटरी वर्ष के अंतिम महीनों में ई-वोटिंग से हुए इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में सी बासकर से पराजित हुए सुनील जचारिआ के समर्थकों का रोना रहा कि उनके लिए चुनावी नतीजा बहुत ही अप्रत्याशित रहा और उन्हें यह समझ में ही नहीं आया कि जो हुआ, वह आखिर हुआ क्यों और कैसे ? उल्लेखनीय है कि सुनील जचारिआ को रोटरी के तमाम बड़े तुर्रमखाओं का समर्थन था, और इस आधार पर उनके ही जीतने की उम्मीद व घोषणा की जा रही थी; लेकिन फिर भी वह चुनाव हार गए - सुनील जचारिआ के नजदीकियों और समर्थकों ने उनकी हार के लिए ई-वोटिंग को जिम्मेदार ठहराया ।
दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को भी डर हुआ है कि ई-वोटिंग से चुनाव होने की बात ने उनकी मुश्किलों को बढ़ाने का काम किया है । उनके लिए मुसीबत की बात यह है कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के मुकेश अरनेजा जैसे समर्थक दरअसल अभी तक प्रचलित चुनावी प्रक्रिया में ही तिकड़में करने के उस्ताद हैं; किंतु ई-वोटिंग में उनकी उक्त उस्तादी तो काम आने वाली नहीं है । पिछली बार मुकेश अरनेजा जैसे अस्वस्थ केके भटनागर को गाड़ी में लाद कर वोट डलवाने ले आए थे, वैसी हरकतें कर पाना तो अब उनके लिए मुश्किल क्या, असंभव ही होगा । ई-वोटिंग की प्रक्रिया में वह क्या क्या बदमाशियाँ कर सकते हैं - इसका उन्हें अभी पता नहीं है । ई-वोटिंग की प्रक्रिया को लेकर हालाँकि अभी सभी असमंजस में हैं; और कोई भी अभी बहुत दावे से यह नहीं कह सकता है कि इस प्रक्रिया के जेनुइन और बेईमानी वाले फायदे या नुकसान आखिर क्या हैं ? इस असमंजस की स्थिति में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की भूमिका बढ़ जाती है - वास्तव में किसी को कुछ जानना/पूछना/समझना है तो वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर से ही संपर्क करेगा; और किसी को कुछ बताना/समझाना है तो यह काम भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ही करेगा । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की इस बढ़ी हुई भूमिका में अपने लिए खतरे और नुकसान के संकेत दिख/मिल रहे हैं ।
दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं के लिए इससे भी बड़ी मुसीबत की बात यह हुई है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की भूमिका को लेकर वह कहीं कोई शिकायत भी नहीं कर सकते हैं । शिकायतबाजी के काम में मुकेश अरनेजा वास्तव में कुख्याति की हद तक एक्सपर्ट हैं; पर यहाँ इस मामले में उनके हाथ बुरी तरह बँधे हुए हैं । इसका एक कारण तो यह है कि ई-वोटिंग से चुनाव कराने का फैसला इंटरनेशनल डायरेक्टर्स बोर्ड ने लिया है, और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर तो बस उस फैसले को क्रियान्वित करने का काम कर रहा है - ऐसे में, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की कार्रवाई की शिकायत करने का अर्थ इंटरनेशनल डायरेक्टर्स बोर्ड के फैसले को चुनौती देने वाला माना/समझा जायेगा । रोटरी में राजनीति करने वालों पर हंटर बरसाने वाले के रूप में मशहूर निवर्तमान इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन इस वर्ष भी जिस भूमिका में हैं, उसे देखते/जानते हुए मुकेश अरनेजा अपनी 'एक्सपर्टीज' दिखाने से बचने का ही प्रयास करेंगे । दूसरा कारण यह भी है कि मुकेश अरनेजा पहले से ही रोटरी के बड़े नेताओं के बीच काफी बदनाम हैं, जिसके चलते इस वर्ष के रोटरी इंस्टीट्यूट की तैयारियों के लिए बनी करीब 170 लोगों की टीम में मुकेश अरनेजा को कोई जगह नहीं मिली । इंस्टीट्यूट के कन्वेनर इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई हैं, जिनके साथ अपनी नजदीकियत के किस्से सुनाते/बताते मुकेश अरनेजा थकते नहीं हैं । मुकेश अरनेजा के लिए शर्मनाक स्थिति यह हुई है कि मनोज देसाई ने टीम में जेके गौड़ को तो जगह दे दी है, लेकिन मुकेश अरनेजा को जगह नहीं दी है । ऐसे में, मुकेश अरनेजा को डर यह है कि ई-वोटिंग को लेकर उन्होंने यदि कोई चूँ-चपड़ की तो उनकी बची-खुची पहुँच भी खतरे में पड़ जाएगी ।
इसलिए मुकेश अरनेजा तथा दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के दूसरे समर्थक नेताओं के सामने ई-वोटिंग की व्यवस्था को - तथा इस व्यवस्था को क्रियान्वित करती डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शरत जैन की भूमिका को चुपचाप देखते रहने का ही विकल्प बचा है । इस अकेले विकल्प को देखते हुए दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को ई-वोटिंग के जरिए चुनाव होने की तैयारी देख/जान कर तगड़ा वाला झटका महसूस हो रहा है, तो बहुत स्वाभाविक बात है ।

Sunday, October 2, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में राजा साबू 'गिरोह' के सामने जितेंद्र ढींगरा की उम्मीदवारी का मुकाबला करने के लिए उम्मीदवार तय करना चुनौती और मुसीबत बना

चंडीगढ़ । प्रमोद विज को अपने ही क्लब - रोटरी क्लब पानीपत मिडटाउन में टीके रूबी को मुख्य अतिथि के रूप में आने से रोकने के लिए क्लब के पदाधिकारियों के साथ बड़ी कठिन लड़ाई लड़नी पड़ी - इस लड़ाई को अंततः वह क्लब के प्रेसीडेंट के पिता से गुहार लगा कर ही जीत सके । इस पूरी लड़ाई में प्रमोद विज की बस एक ही रट रही कि टीके रूबी उनके क्लब में मुख्य अतिथि के रूप में यदि आए, तो राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू के सामने उनकी नाक कट जायेगी । प्रमोद विज रोटरी में और डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच में यूँ तो अपने आप को एक बड़े नेता के रूप में प्रोजेक्ट करते हैं, किंतु यह जान कर उनकी साँस थम गई कि उनके क्लब के एक कार्यक्रम में टीके रूबी को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया जा रहा है । पहले तो उन्होंने धौंस-डपट से क्लब के पदाधिकारियों पर दबाव डाला कि वह टीके रूबी को क्लब के कार्यक्रम में न बुलाएँ; धौंस-डपट से बात नहीं बनी, तो वह खुशामद पर उतरे; तब भी असफल रहने पर उन्होंने क्लब में झगड़ा करवाने की तरकीब लगाई; बदकिस्मती ने वहाँ भी उनका काम नहीं बनने दिया । प्रमोद विज तब फिर क्लब अध्यक्ष के पिता की शरण में गए, और वर्षों के परिचय का वास्ता देकर उनसे अनुरोध किया कि वह अपने बेटे को समझाएँ कि वह क्यों उनकी नाक कटवाने पर तुला है । क्लब अध्यक्ष को अपने पिता की बात मानने पर मजबूर होना पड़ा, और इस तरह टीके रूबी को दिया गया निमंत्रण वापस हुआ - और प्रमोद विज की नाक कटने से बची ।
टीके रूबी डिस्ट्रिक्ट के गवर्नर्स खेमे के लोगों के लिए ऐसी हड्डी बन गए हैं, जो रह रह कर उनके चुभती रहती है, और जिसके चुभने के दर्द से वह लगातार कराहते रहते हैं । रोटरी क्लब पानीपत मिडटाउन में अभी हाल ही में जो उक्त तमाशा हुआ, वह दरअसल इसी चुभन और कराह का नया उदाहरण है । अधिकतर पूर्व गवर्नर्स बेचारों की यह सोच सोच कर ही साँस अटकी रहती है कि उनके क्लब के पदाधिकारी अपने किसी कार्यक्रम में कहीं टीके रूबी को न आमंत्रित कर लें । दरअसल पिछले दिनों कैथल में आयोजित हुए इंटरसिटी कार्यक्रम में रोटेरियंस की जो भारी भीड़ जुटी, उसे देख कर राजा साबू गिरोह के सदस्यों के कान फिर से खड़े हो गए हैं । कैथल में आयोजित हुए इंटरसिटी कार्यक्रम के आयोजन की जिम्मेदारी टीके रूबी के नजदीकियों व समर्थकों के पास थी । इस कार्यक्रम के प्रमुख कर्ताधर्ता जितेंद्र ढींगरा थे । इससे पहले, पिंजौर और सहारनपुर में इंटरसिटी के जो कार्यक्रम हुए, वह रोटेरियंस की उपस्थिति के लिहाज से बुरी तरह फ्लॉप रहे थे । इसी कारण से, कैथल में रोटेरियंस के ज्यादा संख्या में मौजूद होने को टीके रूबी और उनके साथियों के बने रहने वाले तथा बढ़ते प्रभाव के सुबूत के रूप में देखा/पहचाना गया - और गवर्नर्स खेमे के लोगों के बीच किसी भी तरह से अपनी अपनी नाक बचाने की कोशिशें एक बार फिर से तेज हुईं । इस चक्कर में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा को यशपाल दास व मधुकर मल्होत्रा से फटकार तक सुनने को मिली कि कैथल में इंटरसिटी की जिम्मेदारी जितेंद्र ढींगरा को कैसे और क्यों दे दी गई ?
इन स्थितियों के कारण गवर्नर्स खेमे में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए 'अपना' उम्मीदवार चुनने का काम और उलझ गया है । गवर्नर्स खेमे को इस वर्ष एक बार फिर से जितेंद्र ढींगरा से मुकाबला करना है; और इसके लिए उनके सामने सुधीर चौधरी, नवजीत सिंह औलख और गुरदीप सिंह दीप में से किसी एक को चुनने की जिम्मेदारी है । सुधीर चौधरी के लिए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हेमंत अरोड़ा बैटिंग कर रहे हैं । हेमंत अरोड़ा का तर्क है कि गवर्नर्स खेमे की काली करतूतों पर पर्दा डालने के लिए उन्होंने चार्टर्ड एकाउंटेंट के रूप में अपनी जो सेवाएँ दी हैं और अपनी प्रोफेशनल पहचान तक को जिस तरह से खतरे में डाला है, उसके बदले में गवर्नर्स खेमा उनके उम्मीदवार के रूप में सुधीर चौधरी को गवर्नर नहीं बनवा सकता क्या ? हेमंत अरोड़ा की राह में सबसे बड़ा रोड़ा लेकिन मधुकर मल्होत्रा ने अटका रखा है । मधुकर मल्होत्रा ने नवजीत सिंह औलख की उम्मीदवारी का झंडा उठा रखा है । मधुकर मल्होत्रा लोगों के बीच डिस्ट्रिक्ट के सबसे ताकतवर पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने का प्रभाव बनाए हुए हैं, और अपने आप को राजा साबू व यशपाल दास के बाद तीसरे नंबर का नेता मानते/जताते हैं । उन्होंने नवजीत सिंह औलख की उम्मीदवारी का झंडा पिछले वर्ष भी उठाया था, लेकिन फिर ऐन मौके पर उन्हें यह झंडा छोड़ना पड़ा था । मधुकर मल्होत्रा के सामने मुसीबत की बात यह है कि यदि इस वर्ष भी वह नवजीत सिंह औलख को गवर्नर्स खेमे का समर्थन नहीं दिलवा सके, तो फिर लोगों के बीच उनकी भारी फजीहत होगी । गुरदीप सिंह दीप अपने ही क्लब के सदस्य और पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शाजु पीटर के भरोसे हैं, लेकिन शाजु पीटर उनके लिए कुछ करते हुए नज़र ही नहीं आ रहे हैं । इस कारण से शाजु पीटर अपने ही क्लब के सदस्यों के निशाने पर हैं ।
गवर्नर्स खेमे के लिए समस्या और चुनौती की बात यह है कि पिछले वर्ष तो क्लब्स के पदाधिकारियों की खुशामद करके और उन्हें तरह तरह से डरा-धमका कर उन्होंने जितेंद्र ढींगरा को चुनाव हरवा दिया था, इस वर्ष लेकिन कोई जरूरी नहीं है कि वही फार्मूला फिर से सफल हो जाए । सयानों ने कहा भी है कि काठ की हांडी चूल्हे पर बार-बार थोड़े ही चढ़ती है । उम्मीदवार के रूप में जितेंद्र ढींगरा ने जिस तरह से अपनी सक्रियताओं को संयोजित किया है, तथा क्लब्स के पदाधिकारियों व अन्य प्रमुख लोगों के बीच अपनी पैठ बनाई है; उसका मुकाबला करने के लिए बाकी के संभावित उम्मीदवारों में से किसी ने भी अभी तक कोई तैयारी या सक्रियता नहीं दिखाई है । सभी अभी दरअसल गवर्नर्स खेमे की तरफ से हरी झंडी मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं । सुधीर चौधरी ने पिछले दिनों जरूर लोगों के साथ मेल-मुलाकात का सिलसिला शुरू किया था और अपने चुनाव अभियान में तेजी दिखाई थी, किंतु फिर वह भी घर बैठ गए । उनके नजदीकियों का कहना है कि सुधीर चौधरी को लगा कि गवर्नर्स खेमे की तरफ से उन्हें यदि हरी झंडी नहीं मिली, तो यह मेल-मुलाकातें क्या करेंगी - इसलिए अभी चुपचाप घर बैठना ही ठीक है ।
राजा साबू गिरोह के नेता लोग जितेंद्र ढींगरा को रोकने के लिए इस वर्ष भी अपनी अपनी फजीहत करवायेंगे क्या - यह देखना वास्तव में दिलचस्प होगा ।

Friday, September 30, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन के अधिष्ठापन समारोह में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की अनुपस्थिति ने विशाल सिन्हा की उम्मीदों को तगड़ा झटका दिया

लखनऊ । डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन के अधिष्ठापन समारोह से मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 के अधिकतर फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने जिस तरह से दूरी बना कर रखी, उसे देख/जान कर विशाल सिन्हा का मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने का सपना शुरू में ही चूर चूर होता नजर आ रहा है । हालाँकि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स किसी भी डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में ज्यादा संख्या में नहीं पहुँचे हैं; लेकिन लखनऊ में उनकी अनुपस्थिति पर लोगों का ध्यान इसलिए गया क्योंकि विशाल सिन्हा ने उनकी उपस्थिति को संभव बनाने के लिए एड़ी-चोटी को जोर लगाया हुआ था । फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को विशाल सिन्हा की तरफ से विशेष निमंत्रण मिले थे; उनसे बार बार पूछा गया था कि वह कब लखनऊ पहुँचेंगे और कब तक लखनऊ रहना चाहेंगे; उन्हें आश्वस्त किया गया था कि लखनऊ में उनके ठहरने का बढ़िया इंतजाम किया जायेगा । इतनी बातें अन्य आमंत्रितों से नहीं की गईं थीं । विशाल सिन्हा ने अपने डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में मल्टीपल के तमाम लोगों को बुलाया हुआ था, और बहुत से लोग समारोह में पहुँचे भी थे; किंतु इस 'शो' के पीछे विशाल सिन्हा का जो वास्तविक उद्देश्य था, उस उद्देश्य को पूरा करने में जिन पदाधिकारियों की निर्णायक भूमिका होगी - उन फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने विशाल सिन्हा के निमंत्रण को ठेंगा दिखा दिया ।    
विशाल सिन्हा का प्रयास दरअसल यह था कि नरेश अग्रवाल से लेकर मल्टीपल के दूसरे बड़े नेताओं तथा अन्य प्रमुख लोगों को अपने कार्यक्रम में इकट्ठा करके वह फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के बीच अपना प्रभाव स्थापित करेंगे । फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के अनुपस्थित होने के कारण विशाल सिन्हा का यह प्रयास लेकिन विफल हो गया । फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के हवाले से यह बात सामने आई है कि विशाल सिन्हा के तौर-तरीकों को फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के बीच पसंद नहीं किया जा रहा है; और कोई भी फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर उनके साथ अपना नाम नहीं जोड़ना चाहता है । कई लोगों की शिकायतें हैं कि विशाल सिन्हा इधर की बात उधर करने; फोन के स्पीकर पर दूसरों को बातें सुनवाने तथा दूसरों के द्धारा भेजी गई सूचनाओं को मनमाने तरीके से व्याख्यायित करने का काम धड़ल्ले से करते हैं - इसलिए लोग उनके साथ विश्वास का संबंध बनाने से बचते हैं । बचने की कोशिश में वह विशाल सिन्हा से दूर रहने का ही प्रयास करते हैं । इसी प्रयास के चलते अधिकतर फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने उनके कार्यक्रम से दूर रहने में ही अपनी भलाई देखी/समझी । मल्टीपल के फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को हर समय दरअसल यही डर बना रहता है कि उनके द्धारा कही गई किसी बात को विशाल सिन्हा दूसरों के सामने कब कहाँ पता नहीं किस रूप में पेश कर दें ।
इसके अलावा, फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को चूँकि अच्छे से पता है कि विशाल सिन्हा को अपने ही डिस्ट्रिक्ट के फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संदीप सहगल का समर्थन नहीं मिलेगा; इसलिए मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए उनकी उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है । उल्लेखनीय है कि दो वर्ष पहले संदीप सहगल को चुनाव हरवाने के लिए विशाल सिन्हा ने खूब जोर लगाया था - संदीप सहगल उस बात को कोई भूले थोड़े ही होंगे ! विशाल सिन्हा हालाँकि उन्हें पटाने और उन्हें अपने समर्थन के लिए राजी करने के लिए कोशिश तो बहुत कर रहे हैं, लेकिन उनके नजदीकियों को वह जिस तरह से अपमानित करते रहते हैं - उससे बात बनती हुई दिख नहीं रही है । संदीप सहगल के खासमखास निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार गुप्ता को नीचा दिखाने के लिए विशाल सिन्हा ने पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर जगदीश गुलाटी के साथ षड्यंत्र करके जिस तरह से लालजी वर्मा और एचएन सिंह को प्रेसीडेंट पिन दिलवाया - उससे संदीप सहगल के साथ विशाल सिन्हा की दूरी और बढ़ी ही है । अधिष्ठापन कार्यक्रम में विशाल सिन्हा यदि यह हरकत नहीं करते तो हो सकता है कि आगे चल कर संदीप सहगल का समर्थन दिलवाने में निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार गुप्ता ही उनकी मदद करते, जिसकी संभावना अब लेकिन पूरी तरह खत्म ही हो गई है ।
विशाल सिन्हा का हर काम किस तरह बेवकूफीभरा और खुद उन्हीं को नुकसान पहुँचाने वाला साबित हो रहा है - इसका एक दिलचस्प उदाहरण डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय गर्ग के रवैये से देखा/पहचाना जा सकता है । अधिष्ठापन समारोह में शामिल होने लखनऊ आए विनय गर्ग को विशाल सिन्हा ने एक दिन और लखनऊ में रोका तो इसलिए ताकि वह अगले दिन पड़ने वाले अपने जन्मदिन की पार्टी विनय गर्ग के साथ भी मना लें; विशाल सिन्हा के आग्रह पर विनय गर्ग ने लखनऊ में एक दिन और रुक कर विशाल सिन्हा के साथ पार्टी तो की, लेकिन इस दौरान उन्होंने लखनऊ में विशाल सिन्हा के विरोधियों के साथ मिल कर मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के चुनाव में विशाल सिन्हा का काम बिगाड़ने की संभावनाओं को तलाशने व पुख्ता करने का काम भी किया । जाहिर तौर पर इससे यही लग रहा है कि विशाल सिन्हा की हरकतें और कारस्तानियाँ ही नहीं, अच्छी भावना के साथ किए जा रहे 'काम' भी उन्हें ही चोट पहुँचा रहे हैं । अधिष्ठापन समारोह के साथ भी यही हुआ : विशाल सिन्हा ने बड़ी तैयारी के साथ अधिष्ठापन समारोह का आयोजन किया; देखने में आयोजन अच्छे से हुआ भी, बहुत लोग आए भी - लेकिन वह लोग नहीं आए, जिनके आने का विशाल सिन्हा को खासा इंतज़ार था; इसलिए अधिष्ठापन समारोह का कुल नतीजा विशाल सिन्हा की उम्मीदों को ध्वस्त करने वाला ही रहा ।

Wednesday, September 28, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल मीटिंग में विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों की वकालत करके संजीव चौधरी अलग-थलग पड़े और भारी फजीहत का शिकार बने

नई दिल्ली । विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों को देश में काम करने की अनुमति देने के मामले में संजीव चौधरी ने विदेशी फर्मों के समर्थन में शॉट तो जोर का लगाया, लेकिन बहस में वह जिस तरह से अलग-थलग पड़े दिखाई दिए - उससे खुद उन्हें ही डर हो गया है कि उनकी बॉल गोल में जाएगी भी और या उन्हीं को चोट पहुँचाएगी ? अपनी संभावित फजीहत से बचने के लिए उन्होंने बिग फोर के एक अन्य सदस्य एनसी हेगड़े के रूप में हालाँकि एक बलि का बकरा ढूँढ़ लिया है । इससे पहले भी इंस्टीट्यूट के चुनावों में, खासतौर से सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवारों के लिए समय-सीमा के निर्धारण के मुद्दे पर संजीव चौधरी को बुरी तरह से मुँहकी खानी पड़ी थी । उस मामले में भी संजीव चौधरी जोश में होश खो बैठे थे, और उन्होंने अपनी स्वार्थी व्यक्तिवादी सोच काउंसिल व इंस्टीट्यूट पर लादने की कोशिश की थी; इस बार भी उनका रवैया काउंसिल, इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन को अपनी मर्जी से हाँकने की कोशिश करने वाला था - जिसका नतीजा यह हुआ कि काउंसिल में वह पूरी तरह अकेले पड़ गए; यहाँ तक कि इस मामले में जिन एनसी हेगड़े का समर्थन मिलने की उन्होंने खासी उम्मीद की थी, उन एनसी हेगड़े की तरफ से भी उन्हें सक्रिय व पर्याप्त समर्थन नहीं मिला ।
उल्लेखनीय है कि विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों को देश में काम करने की अनुमति देने या न देने को लेकर कंपनी मामलों के मंत्रालय द्धारा माँगी गई सलाह पर विचार के लिए इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की पिछली मीटिंग में विचार विमर्श किया गया था । विचार विमर्श शुरू होते ही संजीव चौधरी ने विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों के पक्ष में शॉट पर शॉट लगाना शुरू कर दिया । उक्त मीटिंग में मौजूद सदस्यों के अनुसार, संजीव चौधरी के तेवर दिखा/बता रहे थे जैसे कि वह खुद विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों को अनुमति देने के आदेश पर दस्तख़त कर दें । संजीव चौधरी के रवैये ने मीटिंग में मौजूद काउंसिल के दूसरे सदस्यों का पारा गर्म किया, और फिर उन्होंने संजीव चौधरी के तर्कों की धज्जियाँ उड़ाईं । नवीन गुप्ता, विजय गुप्ता, मुकेश कुशवाह, प्रफुल्ल छाजेड़ आदि ने खासी मुखरता के साथ विदेशी फर्मों को देश में अनुमति देने से पैदा होने वाले खतरों को रेखांकित किया । इन सभी का अपने अपने तरीके से कहना रहा कि विदेशी फर्मों के देश में काम करने से देश की फर्मों और चार्टर्ड एकाउंटेंट्स पर बहुत ही बुरा असर पड़ेगा तथा उनके सामने अपनी पहचान व प्रतिष्ठा के साथ काम करना संभव ही नहीं रह जायेगा और उनके सामने विदेशी फर्मों में नौकरी करने का ही विकल्प बचा रह जायेगा । इनका कहना रहा कि विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों के देश में काम करने से सिर्फ देश की चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों पर ही असर नहीं पड़ेगा, बल्कि देश के उद्योग जगत को भी इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी - और इस तरह से विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों का देश में प्रवेश देश की जनता के लिए और देश के लिया आत्मघाती होगा ।
मीटिंग में मौजूद बाकी सदस्यों का रवैया भी विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों के विरोध का ही था । एनसी हेगड़े ने जरूर मामले को संतुलित ढंग से विवेचित करने का प्रयास किया और उनकी बातों को सुनते हुए वहाँ मौजूद सदस्यों को कभी कभी ऐसा लगा कि जैसे एनसी हेगड़े विदेशी फर्मों की वकालत कर रहे हैं, लेकिन उनकी वकालत का स्वर काफी नीचा था; और इसलिए उनकी वकालत के बावजूद संजीव चौधरी को कोई मदद और सहारा नहीं मिल पाया । संजीव चौधरी की बातों और उनके तर्कों को 'पीटने' में नवीन गुप्ता, विजय गुप्ता, मुकेश कुशवाह, प्रफुल्ल छाजेड़ आदि ने जिस तरह की तेजी और आक्रामकता दिखाई - उससे मीटिंग में खासी गर्मी पैदा हो गई और विचार-विमर्श के लिए समय कम पड़ गया, लिहाज़ा इस विचार-विमर्श को अगली मीटिंग के लिए स्थगित कर दिया गया । पिछली मीटिंग में हुई बातें बाहर आईं तो काउंसिल सदस्यों पर दबाव बनना शुरू हुआ है, और लोग उनसे सवाल पूछने लगे हैं कि प्रोफेशन को विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों को बेच ही दोगे क्या ? संजीव चौधरी के रवैये पर तमाम लोगों को नाराजगी है; लोगों का कहना है कि संजीव चौधरी चुनाव के समय तो चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के भले के लिए न जाने क्या क्या करने की बातें कर रहे थे, और अब वह विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों के 'प्रतिनिधि' के रूप में ऐसे काम कर रहे हैं - जैसे कि काउंसिल में वह उन्हीं की 'नौकरी' बजाने के लिए आए हैं । काउंसिल के भीतर और बाहर आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच संजीव चौधरी की जैसी फजीहत हुई है और हो रही है, उसे देखते हुए लग रहा है कि काउंसिल की मीटिंग में विदेशी चार्टर्ड अकाउंटेंट फर्मों की वकालत उन्हें बहुत भारी पड़ रही है ।
इससे पहले, सेंट्रल काउंसिल के सदस्यों/उम्मीदवारों के लिए समय-सीमा के निर्धारण के मुद्दे पर संजीव चौधरी को उस समय बुरी तरह से मुँहकी खानी पड़ी थी, जब उनके नेतृत्व में बनी कमेटी द्धारा की गईं कुछेक खास सिफारिशें काउंसिल सदस्यों के बीच हुई सीक्रेट वोटिंग में समर्थन पाने में विफल रहीं थीं । उस विफलता, और विफलता के कारण होने वाली फजीहत की चर्चा हालाँकि सिर्फ काउंसिल सदस्यों तक ही सीमित थी । इसलिए विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों को देश में काम करने की अनुमति देने या न देने के मामले में उनकी जो फजीहत हुई है, उसने उन्हें ज्यादा गंभीर चोट पहुँचाई है । विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों की वकालत करने के कारण काउंसिल सदस्यों के साथ-साथ आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच उनकी प्रोफेशन व चार्टर्ड एकाउंटेंट्स विरोधी जो छवि बनी है, वह उनके भारी मुसीबतें खड़ी कर सकती हैं । संजीव चौधरी के लिए परेशानी की बात यह है कि काउंसिल में बिग फोर के जो दूसरे सदस्य हैं, उनका भी उन्हें वैसा सहयोग व समर्थन मिलता हुआ नहीं दिख रहा है, जैसा कि वह चाहते हैं । एनसी हेगड़े के रवैये का जिक्र इस रिपोर्ट में पहले किया ही जा चुका है; दीनल शाह पिछली मीटिंग में तो नहीं थे, लेकिन उनकी तरफ से संजीव चौधरी को ऐसे कोई संकेत नहीं मिले हैं जिनसे वह अगली मीटिंग में उनके सहयोग/समर्थन की उम्मीद कर सकें । दीनल शाह को दरअसल अहमदाबाद में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति करनी है, और वहाँ अपनी राजनीतिक विरासत को मजबूत करना है - इसलिए उम्मीद की जाती है कि वह विदेशी चार्टर्ड एकाउंटेंट फर्मों की वैसी खुल्लमखुल्ला वकालत नहीं करेंगे, जैसी वकालत संजीव चौधरी ने की है और अपनी फजीहत करवाई है ।
काउंसिल में अलग-थलग पड़ जाने तथा आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच हो रही फजीहत को देखते हुए उनके नजदीकियों को भी लग रहा है कि संजीव चौधरी ने इस बार बहुत ही गलत शॉट खेल दिया है । इससे संजीव चौधरी कोई सबक लेंगे या नहीं, और काउंसिल की अगली मीटिंग में वह क्या करेंगे - यह देखना दिलचस्प होगा ।

Sunday, September 25, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में कुछेक घंटों के लिए पैरोल पर आए असित मित्तल के बेमतलब के समर्थन पर उत्साह दिखा कर दीपक गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी उम्मीदवारी की कमजोरी को ज़ाहिर किया है क्या ?

नोएडा । दीपक गुप्ता की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के समर्थन में जेल में बंद होकर सजा काट रहे 'नेता' के उतर आने से डिस्ट्रिक्ट के चुनावी माहौल में एक अलग तरह की रंगत तो आ ही गई है - साथ ही लेकिन डिस्ट्रिक्ट की पहचान और छवि पर कलंक लगने का खतरा भी पैदा हो गया है । देश की चुनावी राजनीति में जब तब सुनने/देखने को मिलता है कि किस तरह जेल में बंद अपराधी अपने 'आदमी' को चुनाव जितवाने के लिए जेल से ही फरमान जारी करते हैं; दीपक गुप्ता की मेहरबानी से लगभग वही 'सीन' अब रोटरी में डिस्ट्रिक्ट 3012 की पहचान बनेगा । दीपक गुप्ता और उनके समर्थक खासे उत्साहित हैं कि जेल में बंद असित मित्तल ने जिस तरह से उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में कैम्पेन चलाया है, उसके चलते वह चुनावी जीत के और नजदीक पहुँच गए हैं । असित मित्तल पाँच वर्ष पूर्व, वर्ष 2011-12 में डिस्ट्रक्ट गवर्नर होते थे । किंतु पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने के कुछ ही दिनों के भीतर वह अपने बड़े भाई के साथ दिल्ली के तिहाड़ जेल में पहुँच गए । कहने को तो वह बिल्डर कहलाते थे, लेकिन धीरे-धीरे बात खुली और पता चला कि बिल्डर की आड़ में उनका मुख्य धंधा ठगी का था; और उन्होंने व्यक्तियों से लेकर बैंकों व वित्तीय संस्थाओं तक से ठगी व धोखाधड़ी की । कई रोटेरियंस भी उनकी ठगी का शिकार बने हैं । इस कारण से रोटेरियंस के बीच असित मित्तल के प्रति विरोध पैदा हुआ, जो फिर उनकी उपेक्षा में बदल गया । उनके 'राजनीतिक' समर्थन और या असर की हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अपने गवर्नर-काल में उन्होंने संजय खन्ना व रवि चौधरी के बीच हुए चुनाव में रवि चौधरी का बहुत खुल कर समर्थन किया था और उन्हें जितवाने की हर संभव कोशिश की थी, उसके बावजूद लेकिन रवि चौधरी बुरी तरह चुनाव हार गए थे । जेल जाने के बाद तो फिर असित मित्तल का डिस्ट्रिक्ट में कोई नामलेवा भी नहीं रह गया । उन्हें क्लब से निकाल दिया गया और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ने डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनका नाम तक छापना बंद कर दिया । लेकिन फिर भी दीपक गुप्ता और उनके समर्थक असित मित्तल के समर्थन को महत्त्वपूर्ण मान रहे हैं ।
चुनावी राजनीति के संदर्भ में लोग इसे - डूबते को तिनके का सहारा ढूँढ़ने के उदाहरण और सुबूत के रूप में देख रहे हैं ।
दरअसल असित मित्तल पिछले दिनों अपने पिता के निधन के बाद के क्रियाकर्म पूरे करने के लिए कुछेक दिन कुछ कुछ घंटों के लिए पैरोल पर जेल से बाहर निकले थे । उस दौरान अपनी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त करने के लिए कुछेक रोटेरियंस उनसे मिले थे, जिनसे बात करते हुए असित मित्तल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए दीपक गुप्ता का समर्थन करने की बात कही । असित मित्तल का कहना रहा कि दीपक गुप्ता की जीत ग्रुप को मजबूत करने और बनाए रखने के लिए जरूरी है । दीपक गुप्ता और उनके समर्थकों की तो यह बातें देख/सुन कर बाँछे ही खिल गईं हैं । उन्हें विश्वास है कि डिस्ट्रिक्ट के लोग उनके दूसरे समर्थक नेताओं की बात भले ही न मानें/सुने, लेकिन जेल में बंद एक 'अपराधी' की बात जरूर मानेंगे/सुनेंगे । असित मित्तल के कैम्पेन पर दीपक गुप्ता ने जिस तरह का उत्साह दिखाया है, उससे हालाँकि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रति सहानुभूति का भाव रखने वाले कई लोग चौंके भी हैं । दीपक गुप्ता के इस उत्साह को वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की कमजोरी के रूप में देख/पहचान रहे हैं । उनके बीच सवाल उठा है कि दीपक गुप्ता अपनी उम्मीदवारी के कैम्पेन को क्या इतना कमजोर पा रहे हैं, कि उन्हें एक सजायाफ़्ता के समर्थन की जरूरत पड़ी - और उसका समर्थन मिलने पर वह खुश हुए हैं ।
यह ठीक है कि चुनावी मुकाबले में कोई भी उम्मीदवार हर किसी का समर्थन पाने का प्रयास करता ही है, और किसी का सक्रिय समर्थन मिलने/दिखने पर खुश होता ही है । किंतु कोई भी होशियार उम्मीदवार किसी बदनाम व्यक्ति का समर्थन खुल्लमखुल्ला लेने और मिलने पर खुश 'दिखने' से बचने की कोशिश भी करता है । दरअसल वह जानता/समझता है कि एक बदनाम व्यक्ति का खुल्ला संग-साथ फायदा कम नुकसान ज्यादा पहुँचाता है । दीपक गुप्ता इतनी सावधानी नहीं रख सके, जिसका नतीजा यह देखने में आ रहा है कि असित मित्तल के समर्थन पर दीपक गुप्ता द्धारा व्यक्त की गई खुशी ने उनकी उम्मीदवारी की स्थिति को और ज्यादा संदेहास्पद बना दिया है । लोगों का सहज पूछना है कि जिस असित मित्तल के समर्थन को दीपक गुप्ता अपने लिए बड़ी उपलब्धि मान रहे हैं, वह असित मित्तल जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर थे और जब उनकी ज्यादा पोल-पट्टी भी नहीं खुली थी, तब वह जब रवि चौधरी को चुनाव नहीं जितवा सके थे - तो फिर अब जब वह अपनी कारस्तानियों के चलते जेल की हवा खा रहे हैं, तब दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की भला क्या मदद कर सकेंगे ? असित मित्तल के समर्थन पर खुशी प्रकट करके दीपक गुप्ता ने वास्तव में अपनी उम्मीदवारी की कमजोरी को ही जाहिर किया है; और इस तरह अपना नुक्सान ही किया है ।
असित मित्तल के समर्थन के कारण एक और तथ्य पर लोगों का ध्यान गया है; लोगों के बीच चर्चाभरे सवाल हैं कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के जितने समर्थक नेता हैं, वह सब घपलेबाजियों में क्यों फँसे/घिरे हुए हैं ? असित मित्तल का मामला तो उनके जेल में होने के कारण जगजाहिर है ही; मुकेश अरनेजा भी अपनी कारस्तानियों के कारण अपने ही भाई-भतीजों के द्धारा अपनी कंपनी से निकाले जा चुके हैं । सतीश सिंघल पर नोएडा रोटरी ब्लड बैंक की कमाई हड़पने के गंभीर आरोप हैं । इन चर्चाओं के चलते, समर्थक नेताओं की कारस्तानियों के दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए बड़ी मुसीबत बनने का खतरा पैदा हो गया है । मजे की बात है कि इस खतरे को जेल से कुछेक घंटों के लिए पैरोल पर आए असित मित्तल के बेमतलब के समर्थन पर उत्साह दिखा कर दीपक गुप्ता ने खुद ही आमंत्रित किया है ।

Saturday, September 24, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में होने जा रहा डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारियों का अधिष्ठापन समारोह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विशाल सिन्हा की हरकतों के कारण नरेश अग्रवाल के लिए परीक्षा का मौका होगा क्या ?

लखनऊ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ऑनरेरी कमेटी की मीटिंग में कुछेक वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को डिस्ट्रिक्ट अधिष्ठापन समारोह का निमंत्रण न मिलने का संदर्भ देते हुए जिस तरह से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विशाल सिन्हा पर वरिष्ठ पूर्व गवर्नर्स को अपमानित करने के आरोप लगे, उसे देखते हुए इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल के सामने लखनऊ में भी भी वाराणसी जैसे हालात बनते दिख रहे हैं । उल्लेखनीय है कि वाराणसी में आयोजित हुए डिस्ट्रिक्ट 321 ई के अधिष्ठापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए नरेश अग्रवाल को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अपमानित किये जाने की शिकायतें मिलीं थीं, जिन्हें लेकिन नरेश अग्रवाल ने गंभीरता से नहीं लिया था । वाराणसी में नरेश अग्रवाल ने जो रवैया दिखाया था, उसे लेकर मल्टीपल में ही नहीं बल्कि मल्टीपल के बाहर के लायंस पदाधिकारियों के बीच उनकी भारी फजीहत और थू थू हुई थी । नरेश अग्रवाल और दूसरे लोग उस किस्से को अभी पूरी तरह से भूल भी नहीं पाए हैं, कि डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विशाल सिन्हा ने नरेश अग्रवाल के लिए फिर से वैसे ही हालात पैदा कर दिए हैं । नरेश अग्रवाल को 25 सितंबर को लखनऊ में आयोजित हो रहे डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन के अधिष्ठापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने आना/पहुँचना है । विशाल सिन्हा ने उनके स्वागत के लिए अच्छी तैयारी की है; विशाल सिन्हा दरअसल नरेश अग्रवाल को खुश करके लायन व्यवस्था में अपने लिए अच्छी पोजीशन की जुगाड़ में हैं । असल में, विशाल सिन्हा को यह बात बहुत ही अपमानजनक लगती है कि हाल-फिलहाल के वर्षों में उनके आगे-पीछे जो लोग गवर्नर बने हैं, वह तो एक बार में ही गवर्नर बन गए - जबकि उन्हें एक बार पराजित होकर दूसरी बार में गवर्नर बनने का मौका मिल पाया । इस 'कलंक' के दाग को हल्का करने के लिए विशाल सिन्हा को जरूरी लगता है कि वह लायन व्यवस्था में ऐसा कुछ प्राप्त करें, जिससे वह अपने आगे-पीछे गवर्नर बने लोगों के बीच अपना कद ऊँचा कर सकें । यह वह नरेश अग्रवाल की मदद से करना चाहते हैं, और इसीलिए डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में वह नरेश अग्रवाल के स्वागत-सम्मान में कोई कमी नहीं रहने देना चाहते हैं ।
लेकिन डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह से चार दिन पहले हुई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ऑनरेरी कमेटी की मीटिंग में जो हुआ, उसने विशाल सिन्हा के लिए खतरे की घंटी बजा दी है । मीटिंग में कुछेक वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने शिकायत की कि कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अभी तक भी अधिष्ठापन समारोह के निमंत्रण नहीं मिले हैं । यह शिकायत करते हुए विशाल सिन्हा से पूछा गया कि क्या वह कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अधिष्ठापन समारोह से दूर रखना चाहते हैं ? विशाल सिन्हा ने इस सवाल के पीछे छिपे खतरे को पहचानते हुए तुरंत सफाई दी कि उन्होंने तो सभी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को निमंत्रण भेजे हैं; उन्होंने साथ ही यह भी जोड़ा कि किन्हीं कारणों से हो सकता है कि कुछेक पूर्व गवर्नर्स तक निमंत्रण न पहुँचा हो, इसलिए इस मीटिंग के माध्यम से वह सभी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से अधिष्ठापन समारोह में शामिल होने का अनुरोध करते हैं । विशाल सिन्हा में यह बड़ा अच्छा हुनर है कि वह किसी को कितनी भी और कैसी भी गालियाँ दे रहे हों, बुरा-भला कह रहे हों - लेकिन जैसे ही उन्हें आभास होता है कि उनकी यह हरकत उन्हें  नुकसान पहुँचाएगी, वह तुरंत से खुशामद में जुट जायेंगे । विशाल सिन्हा कुछेक पूर्व गवर्नर्स के खिलाफ जमकर गालियाँ बकते हैं, उन्हें लायनिज्म से निकालने तक की बात करते हैं - लेकिन अधिष्ठापन समारोह से ठीक पहले हुई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ऑनरेरी कमेटी की मीटिंग में जैसे ही उन्हें आभास हुआ कि उनकी हरकत अधिष्ठापन समारोह में बबाल कर सकती है और नरेश अग्रवाल के सामने उनकी फजीहत कर/करा सकती है, वह तुरंत गिरगिट की तरह रंग बदल कर पूर्व गवर्नर्स की खुशामद पर उतर आए ।
विशाल सिन्हा ने मौके की नजाकत को पहचान कर भले ही रंग बदल लिया हो, किंतु विशाल सिन्हा की हरकतों से अपमानित महसूस कर रहे पूर्व गवर्नर्स की नरेश अग्रवाल के सामने उनकी असलियत लाने की कोशिशों का खतरा पूरी तरह टला नहीं है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद को विशाल सिन्हा ने जिस तरह से पैसा बनाने का जरिया बना लिया है; और इस चक्कर में जिस तरह से गैर लायन सदस्यों तक को न सिर्फ अपनी कैबिनेट का सदस्य बना लिया है बल्कि डिस्ट्रिक्ट लायंस लीडरशिप इंस्टीट्यूट में भी शामिल कर लिया - उसे देख कर पूर्व गवर्नर्स के बीच भारी असंतोष व नाराजगी है । विशाल सिन्हा के मनमाने तरीके से काम करने और पूर्व गवर्नर्स के प्रति गाली-गलौच भरे शब्दों का प्रयोग करने के रवैये के कारण ही वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नीरज बोरा ने बीस दिन के भीतर ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ऑनरेरी कमेटी के चेयरमैन का पद छोड़ दिया था । दरअसल नीरज बोरा को पता चला था कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय में उनके बारे में बहुत ही ख़राब तरीके से बातें होती हैं और उनके लिए गाली-गलौच पूर्ण शब्दों का इस्तेमाल होता है । विशाल सिन्हा ने इस तरह 'सामने कुछ और पीछे कुछ' वाला अपना दो-रंगी रूप दिखाया, तो नीरज बोरा ने व्यस्तता का वास्ता देकर उनके गवर्नर-काल में किसी भी पद पर रहने से तौबा कर ली । किसी डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के व्यवहार व रवैये के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ऑनरेरी कमेटी का चेयरमैन एक महीने से भी कम समय में अपना पद छोड़ दे, तो यह डिस्ट्रिक्ट और लायनिज्म के लिए बहुत ही अपमानजनक बात है - इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल इस बात को कैसे लेते हैं, यह देखना अभी बाकी है ।
विशाल सिन्हा की हरकतों के कारण ही एक अन्य पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनुपम बंसल ग्लोबल लीडरशिप टीम (जीएलटी) के डिस्ट्रिक्ट को-ऑर्डीनेटर होने के बावजूद अभी हाल ही संपन्न हुए डिस्ट्रिक्ट लायन लीडरशिप इंस्टीट्यूट में शामिल नहीं हुए । मजे की बात यह है कि नीरज बोरा और अनुपम बंसल - दोनों ही विशाल सिन्हा के या तो बहुत खास हैं और या उनकी राजनीति के खेमे के समर्थक हैं । पिछले वर्ष डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में जो खेमेबाजी थी, उसमें नीरज बोरा उस तरफ थे - जिस तरफ विशाल सिन्हा थे । अनुपम बंसल तो विशाल सिन्हा के 'शाम' के पक्के वाले साथी हैं । इसके बावजूद विशाल सिन्हा ने उनके प्रति कोई रियायत नहीं बरती और उनके साथ ऐसा व्यवहार किया कि उन्होंने विशाल सिन्हा के एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम से दूर रहने में ही अपनी भलाई देखी/पहचानी । इन दो उदाहरणों से समझा जा सकता है कि विशाल सिन्हा अपनी कारस्तानियों से जब अपने ही खास व नजदीकी लोगों के साथ बदतमीजी कर सकते हैं और उन्हें उपेक्षित तथा अपमानित तक कर सकते हैं, तो फिर अपने से असहमत और अपने विरोधियों के प्रति उनका रवैया क्या होता होगा ?
डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आने वाले इंटरनेशनल फर्स्ट वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल के सामने कुछेक लोग विशाल सिन्हा के इस रवैये को रखने की तैयारी कर रहे हैं । उनका कहना है कि वह नरेश अग्रवाल को बताना चाहेंगे कि विशाल सिन्हा को किसी भी तरह की तवज्जो देकर वह सिर्फ लायनिज्म को ही बदनाम नहीं करवायेंगे, बल्कि अपनी छवि को भी कलंकित करेंगे । विशाल सिन्हा हालाँकि आश्वस्त हैं; उनका कहना है कि नरेश अग्रवाल को उनके बारे में अच्छी तरह पता है और वह गुरनाम सिंह के साथ उनके रिश्ते को जानते/पहचानते हैं, इसके अलावा वह लखनऊ में नरेश अग्रवाल की सेवा में कोई कमी नहीं रहने देंगे - इसलिए उनकी शिकायत करने वालों की दाल नरेश अग्रवाल के सामने नहीं गलेगी । नरेश अग्रवाल यूँ भी घटिया लोगों को प्रश्रय देने के मामले में खासे बदनाम हैं, और इस चक्कर में अपनी छीछालेदर भी कराते रहते हैं । हालाँकि कुछेक लोगों को लगता है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की तरफ बढ़ रहे नरेश अग्रवाल अब शायद थोड़ा सावधान हों, और लायनिज्म की नहीं तो कम से कम अपनी छवि की तो फ़िक्र करेंगे - और इस फ़िक्र में विशाल सिन्हा के मंसूबों को पूरा करने में सहायक नहीं बनेंगे । इस पृष्ठभूमि में, लखनऊ में होने जा रहा अधिष्ठापन समारोह विशाल सिन्हा के लिए ही नहीं - बल्कि नरेश अग्रवाल के लिए भी परीक्षा की घड़ी है ।