Thursday, August 3, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में गुरनाम सिंह और उनके लोगों की चालबाजियों ने कमल शेखर गुप्ता को क्या सचमुच केएस लूथरा खेमे से बाहर करवा दिया है ?

लखनऊ । अशोक अग्रवाल को लखनऊ में आयोजित डिस्ट्रिक्ट के तीज फंक्शन में मिली तवज्जो को देख कर कमल शेखर गुप्ता को केएस लूथरा खेमे से उम्मीदवारी का टिकट मिलने की उम्मीद को तगड़ा झटका लगा है, जिसकी प्रतिक्रिया में उनके नजदीकियों ने केएस लूथरा पर धोखाधड़ी का आरोप तक लगाना शुरू कर दिया है । समझा जाता है कि यह गुरनाम सिंह और उनके लोगों की चाल है, जिसके तहत पहले तो उन्होंने केएस लूथरा खेमे में कमल शेखर गुप्ता के प्रति संदेह की बीज डाले और अब वह कमल शेखर गुप्ता को केएस लूथरा के खिलाफ भड़का रहे हैं । कमल शेखर गुप्ता के नजदीकियों का कहना है कि अभी तक तो केएस लूथरा का रवैया सकारात्मक ही दिख रहा था - वह कमल शेखर गुप्ता को सलाह और निर्देश दे रहे थे तथा कमल शेखर गुप्ता भी उनकी बातें और उनके निर्देश मान रहे थे; ऐसे में उनके लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि डिस्ट्रिक्ट के तीज फंक्शन में उन्होंने अचानक से अशोक अग्रवाल को 'सिर' पर क्यों उठा लिया ?
डिस्ट्रिक्ट के तीज फंक्शन में अशोक अग्रवाल को जो इम्पोर्टेंस मिली, उसे देख/जान कर हर किसी को लगा है कि जैसे इस वर्ष होने वाले सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव के लिए केएस लूथरा ने अशोक अग्रवाल को अपना उम्मीदवार बनाने का निश्चय कर लिया है । चूँकि हर किसी को ऐसा लगा है, इसलिए कमल शेखर गुप्ता और उनके संगी-साथियों ने अपने आप को मुसीबत में घिरा पाया है - क्योंकि केएस लूथरा का समर्थन पाने की उन्होंने काफी उम्मीद लगाई हुई थी । उन्हें पिछले कुछ दिनों से यह तो सुनने को मिल रहा था कि केएस लूथरा उनसे इस बात पर खफा हैं कि वह गुपचुप रूप से गुरनाम सिंह तथा उनके लोगों से तार जोड़े हुए हैं । हालाँकि कमल शेखर गुप्ता की तरफ से केएस लूथरा को समझाने की कोशिश हो रही थी कि हाल-फिलहाल में उनकी गुरनाम सिंह और या उनके लोगों से जो बातें/मुलाकातें हुई हैं, वह संयोगवश हुई हैं और उनका कोई राजनीतिक अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए । लेकिन लगता है कि वह केएस लूथरा को समझा सकने में असफल रहे हैं ।
मजे की बात यह रही कि इस वर्ष सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने के लिए जो तीन लोग सामने आए वह सभी केएस लूथरा का समर्थन पाने के लिए प्रयास करते नजर आए । केएस लूथरा ने भी इस स्थिति का फायदा उठाया और जल्दी से किसी एक को अपनाने का फैसला करने से उन्होंने इंकार किया - उनकी तरफ से कहा/बताया गया कि वह उचित समय पर 'अपने उम्मीदवार' के बारे में फैसला करेंगे । समझा गया कि इस तरकीब से उन्होंने तीनों संभावित उम्मीदवारों को अपनी मुट्ठी में बनाए रखने और उन्हें अपने तरीके से इस्तेमाल करते रहने का प्रयास किया । पीएसटी स्कूलिंग में कुछ छिपाने और कुछ दिखाने वाले अंदाज में मीरा सेठ से स्पॉन्सर कराई गयी शराब को लेकर जो बबाल मचा, उससे लगा कि केएस लूथरा के लिए अपनी तरकीब को ज्यादा समय तक चला पाना संभव नहीं होगा । उस बबाल के चलते मीरा सेठ अपनी उम्मीदवारी से पीछे सरकती हुईं नजर आईं तो मुकाबले में अशोक अग्रवाल और कमल शेखर गुप्ता बचे रह गए । क्लब के अधिष्ठापन समारोहों में कमल शेखर गुप्ता को जो तवज्जो मिलती दिखी, उससे लगा कि वह केएस लूथरा के उम्मीदवार हो सकते हैं । लेकिन इसी बीच इन खबरों ने चर्चा पकड़ी कि कमल शेखर गुप्ता ने गुरनाम सिंह के साथ भी तार जोड़े हुए हैं, और वह शायद इस प्रयास में हैं कि पिछले लायन वर्ष में जिस तरह मनोज रुहेला को दोनों खेमों का समर्थन मिला और वह चुनाव का सामना किए बिना ही सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बन गए - वैसे ही उनका काम भी बन जाए और वह भी बिना चुनाव के ही सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुन लिए जाएँ ।
गुरनाम सिंह के साथ कमल शेखर गुप्ता के मेलमिलाप की खबरों को लगता है कि केएस लूथरा ने गंभीरता से लिया । कुछेक लोगों का कहना है कि गुरनाम सिंह ने ही अपने लोगों के जरिए केएस लूथरा तक कमल शेखर गुप्ता की मेलमिलाप की खबरों को पहुँचवाया, ताकि कमल शेखर गुप्ता का पत्ता वहाँ से कटे और कमल शेखर गुप्ता अपनी उम्मीदवारी को झंडा उनके हवाले करें । गुरनाम सिंह और उनके लोग चाहते ही थे कि केएस लूथरा 'अपने उम्मीदवार' का फैसला जल्दी करें, ताकि दूसरा उम्मीदवार उनके पास आए । केएस लूथरा उन्हें यह मौका दे नहीं रहे थे; तब गुरनाम सिंह और उनके लोगों ने कमल शेखर गुप्ता की भलमनसाहत का फायदा उठाया और उन्हें बताए बिना उनका इस्तेमाल करते हुए उन्हें केएस लूथरा खेमे में बदनाम कर दिया । केएस लूथरा को कमल शेखर गुप्ता के गुरनाम सिंह के साथ मेलमिलाप करने की खबरें मिलीं, तो उन्होंने अशोक अग्रवाल पर ध्यान केंद्रित किया और उन्हें बढ़ावा देना शुरू किया - जिसकी परिणति तीज फंक्शन में देखने को मिली । कमल शेखर गुप्ता के लिए यह समझना ही मुश्किल हुआ कि उनके साथ हुआ क्या; और उनके साथ खेल कौन रहा है - केएस लूथरा या गुरनाम सिंह ? कमल शेखर गुप्ता के नजदीकियों को अभी तो केएस लूथरा ही खलनायक नजर आ रहे हैं, और इस स्थिति में गुरनाम सिंह और उनके लोगों को 'अपना काम' बनता हुआ दिख रहा है । 

Tuesday, August 1, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ की वकालत करने के कारण नॉमिनेटेड सदस्य विजय झालानी को लेकर विवाद भड़का

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ की वकालत के चक्कर में विजय झालानी खासे विवाद में फँस गए हैं । राकेश मक्कड़ की तरफ से सुनने को मिला कि 4 अगस्त को होने वाली रीजनल काउंसिल की मीटिंग में विजय झालानी उनकी मदद के लिए उपस्थित रहेंगे, तो काउंसिल के कुछेक सदस्य भड़क उठे और उनकी तरफ से सुनाई दिया कि विजय झालानी यदि उक्त मीटिंग में आए और उन्होंने राकेश मक्कड़ का बचाव करने का प्रयास किया तो उनका विरोध किया जाएगा । इन बातों के बीच विजय झालानी ने लोगों को कहा/बताया है कि 4 अगस्त को दिल्ली से बाहर होने के कारण उनका मीटिंग में शामिल हो सकना संभव ही नहीं होगा । इन पँक्तियों के लेखक से बात करते हुए विजय झालानी ने यह भी साफ कहा कि उनका राकेश मक्कड़ से कोई संबंध नहीं है और उन्होंने कभी भी राकेश मक्कड़ का बचाव करने का प्रयास नहीं किया है । उनका कहना है कि उन्हें नहीं पता कि राकेश मक्कड़ अपने साथ उनका नाम क्यों जोड़ते हैं, और क्यों कुछेक सदस्य उन्हें बदनाम करने का प्रयास करते हैं ? इन पँक्तियों के लेखक से बात करते हुए उन्होंने दृढ़ता से कहा और दावा किया कि 4 अगस्त को वह यदि दिल्ली में होते भी, तो भी वह रीजनल काउंसिल की मीटिंग में शामिल नहीं होते ।
विजय झालानी के स्पष्ट इंकार के बावजूद उन्हें लेकर विवाद यदि भड़का हुआ है, तो इसका कारण यह है कि सेंट्रल काउंसिल के कुछेक सदस्य भी इस विवाद को हवा देने में लगे हैं - जिनका कहना है कि कॉमन सेंस की बात है कि विवाद का यदि धुँआ है तो आग कहीं न कहीं तो होगी ही न ! विजय झालानी इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में नॉमिनेटेड सदस्य हैं । रीजनल काउंसिल के साथ-साथ सेंट्रल काउंसिल के भी कई सदस्यों का आरोप है कि नॉमिनेटेड सदस्य को अपनी जिस विशेष स्थिति तथा गरिमा का ध्यान रखना चाहिए, विजय झालानी प्रायः उसका उल्लंघन करते हैं और रीजनल काउंसिल के कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप करते हैं । इस चक्कर में पिछली एक मीटिंग में रीजनल काउंसिल के वरिष्ठ सदस्य राजिंदर नारंग के साथ उनकी खासी झड़प भी हो गयी थी । काउंसिल सदस्यों का कहना है कि दूसरे नॉमिनेटेड सदस्य यदा-कदा ही इंस्टीट्यूट के मुख्यालय में नजर आते हैं, लेकिन विजय झालानी यहाँ अक्सर ही मौजूद रहते हैं और अपना ज्यादातर समय नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के कार्यालय में बिताते हैं । राकेश मक्कड़ के चेयरमैन बनने के बाद से तो विजय झालानी का इंस्टीट्यूट के मुख्यालय में नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के कार्यालय में उठना-बैठना और बढ़ गया है; राकेश मक्कड़ को उनके खाने-पीने की व्यवस्था करते/करवाते अक्सर ही देखा गया है ।
राकेश मक्कड़ की बड़ी समस्या यह है कि वह बेईमानियाँ और साजिशें तो कर सकते हैं, लेकिन अपने बचाव में अपनी वकालत नहीं कर सकते - इसलिए उन्हें हमेशा एक 'वकील' की जरूरत पड़ती है । विजय झालानी को उन्होंने अपने एक वकील के रूप में कुछेक मौकों पर इस्तेमाल किया । उनकी वकालत करने के कारण विजय झालानी की एक मीटिंग में राजिंदर नारंग से जो झड़प हुई थी, उसके बाद विजय झालानी हालाँकि राकेश मक्कड़ की वकालत करते हुए कहीं नहीं सुने/देखे गए हैं । किंतु 4 अगस्त को होने वाली मीटिंग में उनकी उपस्थिति की बात करके राकेश मक्कड़ ने उन्हें लेकर विवाद को खासा भड़का दिया है । उक्त मीटिंग में राकेश मक्कड़ के वकील की भूमिका सेंट्रल काउंसिल के सदस्य राजेश शर्मा निभा सकते थे, लेकिन सीए डे फंक्शन में हुई बदइंतजामी और बेईमानी के आरोपों में राजेश शर्मा इस कदर घिरे हुए हैं कि अभी वह पर्दे के पीछे रहने में ही अपनी भलाई देख रहे हैं । ऐसे में, राकेश मक्कड़ ने 4 अगस्त की मीटिंग में विजय झालानी को आगे रखने की योजना बनाई थी; उनकी इस योजना की भनक काउंसिल के दूसरे सदस्यों को लगी तो उन्होंने भी विजय झालानी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया । विजय झालानी ने 4 अगस्त की रीजनल काउंसिल की मीटिंग से दूर रहने की घोषणा करके इस विवाद को थामने का प्रयास तो किया है, लेकिन नॉमिनेटेड सदस्य होने के बावजूद नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के कामकाज में उनके द्वारा दिखाई जाती रही दिलचस्पी को देखते तथा याद करते हुए काउंसिल सदस्य विवाद को हवा देते हुए नजर आ रहे हैं - ताकि वह विजय झालानी को रीजनल काउंसिल के कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप करने से सचमुच में रोके रख सकें ।

Monday, July 31, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में तेजपाल खिल्लन की मनमानी हरकतों से विनय गर्ग क्या एक कागजी और कठपुतली चेयरमैन साबित होते जा रहे हैं ?

नई दिल्ली । मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट के पदाधिकारियों के चयन को लेकर तेजपाल खिल्लन और जेपी सिंह के बीच जो साँप-छुछुंदर की सी लड़ाई चल रही है, उसने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन विनय गर्ग के लिए भारी मुसीबत पैदा कर दी है । एसके मधोक को जीएलटी एरिया लीडर तथा अनिल तुलस्यान को जीएमटी एरिया लीडर बनवा कर जेपी सिंह ने तेजपाल खिल्लन को नीचा दिखाने का जो काम किया, उसका बदला लेते हुए तेजपाल खिल्लन ने मल्टीपल के पदाधिकारियों का मनमाने तरीके से जो चयन किया - उससे जेपी सिंह तथा उनके साथियों का तो शायद ही कुछ बिगड़े, लेकिन विनय गर्ग के लिए जरूर आफत खड़ी होती नजर आ रही है । विनय गर्ग ने विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के गवर्नर्स से मल्टीपल टीम के लिए नाम देने के लिए कहा था और उन्हें आश्वस्त किया था कि उन्हें विश्वास में लेकर ही वह उनके डिस्ट्रिक्ट से पदाधिकारियों का चयन करेंगे । लेकिन मल्टीपल पदाधिकारियों का जो चयन हुआ है, उसमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की नहीं चली है और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने अपने आपको ठगा हुआ पाया है । डिस्ट्रिक्ट 321 एफ के जिन पूर्व गवर्नर किशोर वर्मा को मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट गेस्ट बनाया गया है, उन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर आनंद साहनी ने डिस्ट्रिक्ट कैबिनेट सदस्यों व पीएसटी के स्कूलिंग कार्यक्रम में आमंत्रित तक नहीं किया । और तो और, ड्यूज तक हड़प जाने वाले चोट्टे किस्म के लोगों को मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट में पदाधिकारी बना लिया गया है, जो पिछले मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के लिए भी बोझ थे और जाहिर तौर पर जो मौजूदा चेयरमैन विनय गर्ग पर भी बोझ ही साबित होंगे ।
तेजपाल खिल्लन के लिए दिन कुछ अच्छे नहीं चल रहे हैं । उनके धुर विरोधी विनोद खन्ना डायरेक्टर अपॉइंटी बन गए हैं, जेपी सिंह इंटरनेशनल डायरेक्टर बन गए हैं, केएम गोयल को डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के प्रबंधक के रूप में विस्तार मिल गया है, एसके मधोक जीएलटी एरिया लीडर बन गए हैं - यानि चारों तरफ से तेजपाल खिल्लन को निराश करने वाली खबरें ही मिली हैं । ऐसे में, उम्मीद की गयी थी कि मल्टीपल काउंसिल के पदाधिकारी चुनने का उनके पास जो मौका है, उसका वह बेहतर इस्तेमाल करेंगे और अपनी स्थिति को सुधारने और मजबूत करने/बनाने का काम करेंगे । किंतु पैसों की लूट-खसोट और चोरी-चकारी के आरोपों में घिरे लोगों को चुनने के कारण तेजपाल खिल्लन विरोधियों के साथ-साथ अपने लोगों के निशाने पर भी आ गए हैं । तेजपाल खिल्लन की इस सोच और हरकत से मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन विनय गर्ग के लिए मुश्किलें बढ़ने का अनुमान लगाया जा रहा है - काउंसिल पदाधिकारी के रूप में जो नाकारा और चोट्टे किस्म के लोग तेजपाल खिल्लन ने विनय गर्ग के सिर पर बैठा दिए हैं, उनसे किसी भी तरह का सहयोग मिल पाना तो विनय गर्ग के लिए मुश्किल होगा ही, उनके रहते दूसरे लोग - खासकर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स भी सहयोग करने से बचेंगे ।
मल्टीपल काउंसिल के पदाधिकारियों का चयन करने में तेजपाल खिल्लन ने जैसी जो मनमानी की है, उसकी मल्टीपल के नेताओं के बीच तीखी प्रतिक्रिया हुई है - जिसका खामियाजा विनय गर्ग को भुगतना पड़ सकता है । मजे की बात यह है कि तेजपाल खिल्लन की हरकत के लिए सत्ता पक्ष के लोग ही इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल को ही कोस रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि नरेश अग्रवाल की कमजोरी ने मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 को मजाक का विषय बना दिया है । विनय गर्ग के पहले के विरोधी और नए बने विरोधी लेकिन खुश हैं कि तेजपाल खिल्लन की हरकत से विनय गर्ग एक कठपुतली चेयरमैन बन जा रहे हैं । तेजपाल खिल्लन ने हालाँकि विनय गर्ग को आश्वस्त किया है कि मल्टीपल काउंसिल की टीम के सदस्यों के चयन से जो लोग खुश नहीं हैं, उनके बस की कुछ करना है नहीं और वह बस रो-धो कर चुप हो जायेंगे । तेजपाल खिल्लन की यह बात काफी हद तक सच भी है - केएम गोयल, विनोद खन्ना, जगदीश गुलाटी, जेपी सिंह, जितेंद्र चौहान, मुकेश गोयल आदि अभी भले ही मल्टीपल काउंसिल की टीम के सदस्यों के चयन से खुश न हों; लेकिन अंततः इनके लिए कुछ कर पाना भी संभव नहीं होगा । समस्या लेकिन दूसरी है और वह यह कि तेजपाल खिल्लन की हरकत से खफा मल्टीपल के नेताओं और डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारियों ने यदि असहयोग का रवैया अपनाया तब विनय गर्ग तो एक कागजी चेयरमैन बन कर ही रह जायेंगे । यह देखना दिलचस्प होगा कि विनय गर्ग एक कागजी और तेजपाल खिल्लन के हाथों की कठपुतली साबित होते हैं, या इससे बचने की कोशिश करते हैं ।

Sunday, July 30, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में टीके रूबी व जितेंद्र ढींगरा की जोड़ी के सामने अपनी उम्मीदवारी को समर्पित कर कपिल गुप्ता ने राजा साबू गिरोह की राजनीति को तगड़ी चोट पहुँचाई

यमुना नगर । कपिल गुप्ता को टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा की जोड़ी के सामने अपनी उम्मीदवारी को समर्पित करता देख राजा साबू गिरोह के लोगों की राजनीति को तगड़ा झटका लगा है, जिससे उबरने की कोशिश में उनकी तरफ से कपिल गुप्ता को तरह तरह से उकसाने और भड़काने के प्रयास हो रहे हैं । मजे की बात यह है कि पिछले दिनों, वर्ष 2018-19 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हो रहे चुनाव में तो कपिल गुप्ता की उम्मीदवारी का विरोध करने में राजा साबू गिरोह के कुछेक नेता आगे-आगे थे, लेकिन अब वर्ष 2020-21 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए होने वाले चुनाव को लेकर कपिल गुप्ता जब पीछे हटते दिख रहे हैं - तो उनका विरोध करने वाले वही नेता अचानक से कपिल गुप्ता की उम्मीदवारी में संभावना देखने लगे हैं । उल्लेखनीय है कि वर्ष 2020-21 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए होने वाले चुनाव में टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा की जोड़ी की तरफ से रमेश बजाज की उम्मीदवारी को जहाँ पक्का सा माना जा रहा है, वहाँ राजा साबू गिरोह की तरफ से उम्मीदवारी को लेकर अभी असमंजस बना हुआ है । उम्मीद की जा रही थी कि उनकी तरफ से पूनम सिंह और कपिल गुप्ता में से कोई एक उम्मीदवार बनेगा/रहेगा । कपिल गुप्ता लेकिन जिस तरह से टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा की जोड़ी के सामने अपनी उम्मीदवारी को समर्पित करते नजर आ रहे हैं, उससे राजा साबू गिरोह को अपना गेम-प्लान बिगड़ता दिख रहा है ।
कपिल गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार, टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा की जोड़ी ने उन्हें अगले रोटरी वर्ष में 'अपना' उम्मीदवार बनाने का भरोसा दे दिया है, जिसके चलते कपिल गुप्ता ने इस वर्ष रमेश बजाज की उम्मीदवारी की राह में काँटा बनने का इरादा त्याग दिया है । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सलूजा तो कपिल गुप्ता को इस समर्पण के लिए राजी करने का प्रयास कर ही रहे थे, प्रमोद विज और रंजीत भाटिया जैसे पूर्व गवर्नर्स को भी कमजोर पड़ता देख कपिल गुप्ता को भी अपनी उम्मीदवारी समर्पित करने में ही अपनी भलाई दिखी । कपिल गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार, प्रमोद विज और रंजीत भाटिया ने पहले तो कपिल गुप्ता में उम्मीदवारी के लिए हवा भरने की कोशिश की थी, लेकिन फिर धीरे धीरे वह ठंडे पड़ते गए । दरअसल उन्होंने समझ लिया कि जब वर्ष 2018-19 के लिए चुनाव हो रहा था, तब हालात अलग थे और उस समय टीके रूबी व जितेंद्र ढींगरा के उम्मीदवार के रूप में रमेश बजाज की उम्मीदवारी से मुकाबला किया जा सकता था, लेकिन अब के हालात में रमेश बजाज की उम्मीदवारी से निपटना मुश्किल होगा । प्रमोद विज और रंजीत भाटिया को ठंडा पड़ता देख, कपिल गुप्ता के सामने टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा की जोड़ी के सामने अपनी उम्मीदवारी का समर्पण करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा ।
कपिल गुप्ता को अपनी उम्मीदवारी से पीछे हटता देख राजा साबू गिरोह के नेताओं को दोहरा झटका लगा है - एक तरफ तो उनके पास उम्मीदवारों की कमी हो गयी, और दूसरी तरफ डिस्ट्रिक्ट में लोगों को टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा की राजनीतिक ताकत और बढ़ती हुई दिखी है । राजा साबू गिरोह के लोगों ने हालाँकि अभी भी टीके रूबी के गवर्नर-काल के प्रति असहयोग व उपेक्षा का रवैया अपनाया हुआ है, लेकिन धीरे धीरे पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स राजा साबू की छत्र-छाया से बाहर निकल कर इस 'सच्चाई' को स्वीकारने लगे हैं कि टीके रूबी ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर 'हैं' । राजा साबू, यशपाल दास और शाजु पीटर ही अभी इस 'सच्चाई' को हजम कर पाने में दर्द महसूस कर रहे हैं और उनकी मरोड़े कम नहीं हो रही हैं । उन्हें उम्मीद थी कि प्रमोद विज और रंजीत भाटिया भी उनके जैसे तेवर बनाए रहेंगे; किंतु कपिल गुप्ता के उम्मीदवारी से पीछे हटने में उन्हें कपिल गुप्ता के साथ-साथ प्रमोद विज और रंजीत भाटिया भी टीके रूबी व जितेंद्र ढींगरा की जोड़ी के आगे समर्पण करते नजर आ रहे हैं । दरअसल इसीलिए, कपिल गुप्ता को अपनी उम्मीदवारी से पीछे हटता तथा उन्हें टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा की जोड़ी के साथ जुड़ता देख राजा साबू और उनके नजदीकियों की बेचैनी बढ़ गयी है ।
बढ़ती बेचैनी में राजा साबू के नजदीकी एक तरफ कपिल गुप्ता और उनके साथ-साथ प्रमोद विज व रंजीत भाटिया को कोसने में लगे हैं, तथा दूसरी तरफ उन्हें भड़काने व उकसाने के प्रयास भी कर रहे हैं । उनका कहना है कि कपिल गुप्ता अगले रोटरी वर्ष में टीके रूबी और जितेंद्र ढींगरा की मदद से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुने जाने का जो ख्बाव देख रहे हैं, वह कभी पूरा नहीं होगा - क्योंकि वह लोग उन्हें प्रमोद विज व रंजीत भाटिया के 'आदमी' के रूप में देखते हैं और इसलिए उन्हें कभी समर्थन नहीं देंगे । कपिल गुप्ता को यह याद दिलाते हुए भी भड़काने/उकसाने का प्रयास किया जा रहा है कि उन्होंने रमेश बजाज से पहले अपनी उम्मीदवारी घोषित की थी, इसलिए रमेश बजाज उनसे पहले कैसे गवर्नर बन सकते  हैं ? समझा जाता है कि कपिल गुप्ता की उम्मीदवारी जब पहली बार सामने आई थी, तब उन्हें सतीश सलूजा के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना गया था और जितेंद्र ढींगरा का समर्थन भी उनके साथ बताया गया था । समस्या लेकिन तब पैदा हुई, जब कपिल गुप्ता ने पानीपत में अपने आप को प्रमोद विज व रणजीत भाटिया के साथ खड़ा कर लिया । उनकी इस कार्रवाई के विरोध में ही रमेश बजाज की उम्मीदवारी प्रकट हुई । अचानक प्रकट हुई रमेश बजाज की उम्मीदवारी से जितेंद्र ढींगरा खुश नहीं थे और वह मजबूरी में ही रमेश बजाज की उम्मीदवारी के साथ बने हुए थे ।
जितेंद्र ढींगरा को उस समय दरअसल अपनी चिंता थी । राजा साबू के चक्रव्यूह को भेद कर जितेंद्र ढींगरा सत्ता के निकट तो पहुँच गए थे, लेकिन वह देख रहे थे कि राजा साबू की 'कौरव सेना' ने उन्हें चारों तरफ से घेरा हुआ है और उन्हें 'कुरुक्षेत्र' में ही निपटा देने की कोशिश की जाएगी । इसलिए जितेंद्र ढींगरा को डर हुआ था कि रमेश बजाज की उम्मीदवारी के चक्कर में कहीं वह अपने लिए मुसीबतों को न बढ़ा लें । बाद के हालात में जब टीके रूबी के हाथ सत्ता की सीधी बागडोर आ गयी तो राजा साबू की कौरव सेना का घेरा अपने आप दरक उठा और कमजोर पड़ गया । इससे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति के समीकरण भी बदल गए हैं और राजा साबू गिरोह के भरोसे उम्मीदवार बनने वाले लोग अपनी अपनी उम्मीदवारी से पीछे हटते नजर आए । ऐसे में, कपिल गुप्ता ने होशियारी दिखाई और टीके रूबी व जितेंद्र ढींगरा की जोड़ी के साथ समझौता कर लिया । कपिल गुप्ता के इस फैसले ने राजा साबू गिरोह की राजनीति को तगड़ी चोट पहुँचाई है और उनके लिए आगे की राह को और ज्यादा मुश्किल बना दिया है ।

Friday, July 28, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ को भरोसा है कि उन पर लग रहे मनमानी बेईमानियों के आरोपों से उन्हें इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे अवश्य ही बचा लेंगे

नई दिल्ली । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की पूर्व चेयरपरसन पूजा अग्रवाल बंसल की लगातार दोहराई जाती माँग के दबाव में मौजूदा चेयरमैन राकेश मक्कड़ अंततः रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने के लिए मजबूर हुए हैं - और 4 अगस्त को रीजनल काउंसिल की मीटिंग के लिए घोषणा हो गयी है । इस माँग के चलते लगातार फजीहत का शिकार बन रहे राकेश मक्कड़ हालाँकि अभी भी अपनी मनमानी बेईमानियों को छिपाने और दबाने की कोशिशों से बाज नहीं आ रहे हैं - और इसी कोशिश के चलते 4 अगस्त की मीटिंग के लिए उन्होंने कोई एजेंडा तय तथा घोषित नहीं किया है । इंस्टीट्यूट के नियमानुसार, रीजनल काउंसिल का कोई सदस्य एजेंडे में कुछ जोड़ता है और काउंसिल के दो-तिहाई सदस्य उसका विरोध नहीं करते हैं, तो वह बात एजेंडे में शामिल होती है - लेकिन राकेश मक्कड़ किसी भी नियम को स्वीकारने तथा अपनाने से बचने का प्रयास कर रहे हैं और अपने ही मनमाने एजेंडे पर रीजनल काउंसिल की मीटिंग करना चाहते हैं । उन्हें अच्छी तरह पता है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्यों के बीच उनकी हरकतों के खिलाफ बेहद नाराजगी है और मीटिंग में उनकी मनमानी चलेगी नहीं, जिस कारण मीटिंग में बबाल हो सकता है - इसके बावजूद राकेश मक्कड़ एजेंडे के मामले में नियमों का पालन करने के लिए तैयार नहीं हैं ।
राकेश मक्कड़ चेयरमैन के रूप में मनमानी करने तथा काउंसिल में लूट-खसोट मचाने, और अपनी मनमानी लूट-खसोट को छिपाने/दबाने के लिए इंस्टीट्यूट के नियमों के साथ खिलवाड़ करने की ताकत सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा से प्राप्त कर रहे हैं । अपने नजदीकियों को उन्होंने आश्वस्त किया है कि रीजनल काउंसिल में वह भले ही अल्पमत में हैं, लेकिन अंततः मामला तो फिर इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी और प्रेसीडेंट के पास ही जायेगा न, जहाँ राजेश शर्मा मामले को संभाल लेंगे । सीए डे फंक्शन के बबाल में इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी और प्रेसीडेंट ने जिस तरह से राजेश शर्मा का बचाव किया, उसका उदाहरण देते हुए राकेश मक्कड़ लोगों को आश्वस्त कर रहे हैं कि राजेश शर्मा के होते हुए इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी और प्रेसीडेंट उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेंगे । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट जैसे देश के प्रतिष्ठित संस्थान के सेक्रेटरी वी सागर और प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे ने अपने व्यवहार और रवैये से अपनी ऐसी पहचान और औकात बना ली है कि एक रीजनल काउंसिल का एक बेईमान पदाधिकारी मनमानी कर रहा है और काउंसिल सदस्यों के आरोपों पर ही दावा भी कर रहा है कि इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी और प्रेसीडेंट भी उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकेंगे ।
राकेश मक्कड़ पर इंस्टीट्यूट के नियमों की अवहेलना करते हुए इंस्टीट्यूट के पैसे को अपने भाई के हाथों लुटवा देने का गंभीर आरोप है । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सदस्यों ने ही इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे को संबोधित ज्ञापन में खुलासा करते हुए आरोप लगाया है कि काउंसिल की तरफ से चलाई जा रही कोचिंग क्लासेस में फैकल्टी नियुक्त करने के मामले में भारी बेईमानी की जा रही है, नियुक्ति के जरिए कमीशन खाया जा रहा है और चेयरमैन के रूप में राकेश मक्कड़ ने इंस्टीट्यूट के नियमों की अवहेलना करते हुए मनमानी शर्तों पर अपने भाई को भी फैकल्टी नियुक्त कर दिया । ज्ञापन में इंस्टीट्यूट के उक्त नियम को रेखांकित करते हुए - जिसके अनुसार काउंसिल के पदाधिकारी अपने रिश्तेदारों, पार्टनर्स व क्लाइंट्स को लाभ का कोई काम अलॉट नहीं कर सकते हैं - बताया गया है कि राकेश मक्कड़ ने अपने भाई राजेश मक्कड़ को काउंसिल द्वारा चलाई जा रही बहुत सी क्लासेस दीं, और उन्हें भुगतान करने के मामले में भी नियमों व चली आ रही व्यवस्था में मनमाने तरीके से परिवर्तन किया गया - जिसमें राजेश मक्कड़ को ज्यादा पैसा दिया गया, और काउंसिल को मिलने वाला पैसा घट गया है । इसके साथ-साथ, आरोप है कि चेयरमैन के रूप में राकेश मक्कड़ अपने भाई की कोचिंग को प्रमोट करने के काम में लगे हुए हैं, और इसमें वह अलग अलग तरीके से इंस्टीट्यूट के नाम को भी इस्तेमाल कर रहे हैं - और इस तरह इंस्टीट्यूट के नियम-कानूनों का उन्होंने मजाक बना कर रख दिया है । कोचिंग क्लासेस तथा नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के प्रिंटिंग व फोटोकॉपी के काम देने में भी धाँधली के आरोप ज्ञापन में लगाए गए हैं ।
आरोपों की गंभीरता इस आरोप से लगाई/समझी जा सकती है कि कोचिंग क्लासेस में कैसे क्या हो रहा है, इस बात को काउंसिल सदस्यों से भी छिपाया जा रहा है - काउंसिल के ही सदस्यों का कहना है कि वह कई दिनों से पदाधिकारियों से पूछ/कह रहे हैं कि काउंसिल द्वारा चलाई जा रही कोचिंग क्लासेस में किस तरह से नियुक्तियाँ और भुगतान हुए हैं, लेकिन उन्हें जबाव नहीं दिया जा रहा है । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे को संबोधित ज्ञापन में कहा गया है कि काउंसिल के अकाउंट उन्हें दिखाने/बताने से तो बचा ही जा रहा है, उनके सवालों के जबाव भी नहीं दिए जाते हैं । यहाँ तक कि पिछले कार्यकारी वर्ष के आखिरी कुछ महीनों में कार्यकारी चेयरपरसन रहीं पूजा अग्रवाल बंसल तक से खर्चों के विवरण तथा अकाउंट छिपाए गए हैं । समझा जा सकता है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में राकेश मक्कड़ और उनके दो-तीन साथी पदाधिकारियों ने किस तरह से कब्जा किया हुआ है और वह मनमानी लूट-खसोट मचाए हुए हैं कि काउंसिल के दूसरे सदस्यों से ही उन्हें तथ्य छिपाने पड़ रहे हैं । चेयरमैन राकेश मक्कड़ की बेशर्मी और निर्लज्जता का आलम यह है कि अपने टीए/डीए के बिल उन्होंने नगद तक ले लिए हैं, जो काउंसिल के नियमों का खुला उल्लंघन है ।
राकेश मक्कड़ का प्रयास यह है कि रीजनल काउंसिल की मीटिंग में यह आरोप रिकॉर्ड पर न आ सकें, और इसके लिए ही वह मीटिंग के एजेंडे को अपने मनमाने तरीके से तय करना चाहते हैं । उनकी इस हरकत से मीटिंग में बबाल हो, और काउंसिल व इंस्टीट्यूट की फजीहत हो - उन्हें इसकी चिंता नहीं है । उन्हें भरोसा है कि राजेश शर्मा के साथ उनके कनेक्शन के कारण इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर और प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे अंततः उन्हें बचा लेंगे । राकेश मक्कड़ के भरोसे के बावजूद काउंसिल के सदस्यों ने भी उम्मीद और कोशिश नहीं छोड़ी है कि राकेश मक्कड़ जैसे बेईमान की दाल अब ज्यादा दिन तक गलती नहीं रह सकेगी । उनका कहना है कि राकेश मक्कड़ को आखिरकार रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने के लिए मजबूर होना पड़ा है न - जिससे कि वह लगातार बचते और इंकार करते आ रहे थे । उल्लेखनीय है कि रीजनल काउंसिल की पूर्व चेयरपरसन पूजा अग्रवाल बंसल ने इंस्टीट्यूट प्रशासन को 12वीं मेल लिखी थी, जिसके बाद राकेश मक्कड़ के लिए रीजनल काउंसिल की मीटिंग से बचना/भागना संभव नहीं रह गया । इस तरह राकेश मक्कड़ की मनमानी बेईमानियों के खिलाफ काउंसिल सदस्यों ने अपनी लड़ाई का पहला चरण जीत लिया है, उन्हें उम्मीद है कि आगे भी सच्चाई की ही जीत होगी ।

Thursday, July 27, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 के जेके गौड़, मुकेश अरनेजा, सतीश सिंघल जैसे पदाधिकारियों और नेताओं के निकम्मेपन और भ्रष्टाचार का स्मारक बने रोटरी वरदान ब्लड बैंक के उद्घाटन अवसर को उनकी छाया से भी बचाया गया

गाजियाबाद । रोटरी वरदान ब्लड बैंक का उद्घाटन रोटरी के पदाधिकारियों और सदस्यों की अनुपस्थिति में आज हो गया । रोटरी के पदाधिकारियों और सदस्यों की अनुपस्थिति का कारण यह रहा कि उन्हें आज हुए उद्घाटन कार्यक्रम की हवा भी नहीं लग सकी थी - और उन्हें पूरी तरह दरकिनार कर ब्लड बैंक का उद्घाटन कर लिया गया । रोटरी के पैसे से वरदान हॉस्पिटल में बने ब्लड बैंक के उद्घाटन अवसर से रोटरी के पदाधिकारियों और सदस्यों को ही दूर रख कर - उनका जो सार्वजनिक अपमान किया गया, वह समाज में रोटरी पदाधिकारियों और सदस्यों की 'औकात' का एक उदाहरण भी है । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि वरदान हॉस्पिटल में रोटरी क्लब्स प्रोजेक्ट के नाम पर प्रायः पैसे देते रहते हैं; करीब सवा करोड़ रुपए के खर्चे से लगने वाले ब्लड बैंक को लगाने के लिए भी वरदान हॉस्पिटल को चुना गया - लेकिन वरदान हॉस्पिटल के पदाधिकारियों ने ब्लड बैंक के उद्घाटन अवसर पर रोटरी पदाधिकारियों और सदस्यों को कोई तवज्जो देने की जरूरत तक नहीं समझी । मजेदार दृश्य यह देखने में आ रहा है कि उपेक्षा के अपमान से तिलमिलाए रोटरी डिस्ट्रिक्ट 3012 के पदाधिकारी और सदस्य तो वरदान हॉस्पिटल के पदाधिकारियों को कोसने में लगे हैं; लेकिन वरदान के पदाधिकारियों का कहना है कि रोटरी के पदाधिकारियों के भरोसे रहते तो ब्लड बैंक कभी उद्घाटित न हो पाता ।
उल्लेखनीय है कि रोटरी ग्लोबल ग्रांट नंबर 1527923 के तहत एक लाख 90 हजार डॉलर से अधिक रकम की लागत वाले रोटरी वरदान ब्लड बैंक की रूपरेखा रोटरी क्लब साहिबाबाद, रोटरी क्लब गाजियाबाद ग्रेटर और रोटरी क्लब गाजियाबाद इंडस्ट्रियल टाउन ने संजय खन्ना के गवर्नर-काल में तैयार की थी; जिसे जेके गौड़ के गवर्नर-काल में पूरा होना था । जेके गौड़ ने अपने गवर्नर-काल की 10 फरवरी को रोटरी इंटरनेशनल के तत्कालीन प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन के हाथों इसका उद्घाटन करवाने की योजना भी बना ली थी । लेकिन ब्लड बैंक की आड़ में 'लूट के बँटवारे' को लेकर ब्लड बैंक का काम देख रहे जेके गौड़ तथा उनके साथियों और डीआरएफसी के रूप में मुकेश अरनेजा के बीच जो झगड़ा फैला, तो फिर उसे सँभलते सँभलते ब्लड बैंक का काम पिछड़ता ही गया । झगड़े के फैलने और सँभलने के बीच ही आरोप सुनाई दिए कि इस ब्लड बैंक की आड़ में इसके काम से जुड़े रोटरी नेताओं ने 45 लाख रुपए से ज्यादा की रकम हड़प कर अपनी अपनी अंटी में कर ली है । रकम हड़प लेने के बाद रोटरी नेताओं और पदाधिकारियों ने इस ब्लड बैंक में दिलचस्पी लेना ही बंद कर दिया ।
वरदान हॉस्पिटल से जुड़े लोगों ने ब्लड बैंक से जुड़े रोटरी पदाधिकारियों से बार बार गुजारिश की कि वह इसका काम पूरा करें/करवाएँ, ताकि यह चालू हो सके - रोटरी पदाधिकारी लेकिन तरह तरह की बहानेबाजियों से उनकी गुजारिश को अनसुना करते रहे । इस कारण लाइसेंस लेने का काम भी काफी पिछड़ गया । रोटरी पदाधिकारियों ने उचित समय से - और जल्दी से जल्दी ब्लड बैंक का काम करने/करवाने में तो दिलचस्पी नहीं ली, लेकिन एक दूसरे पर दोषारोपण करने में उन्होंने अपनी काफी एनर्जी लगाई । जेके गौड़ और मुकेश अरनेजा के साथ साथ सतीश सिंघल भी आरोपों की चपेट में आए और उन पर आरोप लगा कि वह इस ब्लड बैंक पर कब्ज़ा करने की फ़िराक में हैं, ताकि इसकी कमाई भी हड़पने का मौका उन्हें मिले । रोटरी पदाधिकारियों के निकम्मेपन और लूट खसोट की जुगाड़ में रहने की 'सोच' को देखते हुए वरदान हॉस्पिटल वालों को समझ में आ गया कि रोटरी वरदान ब्लड बैंक को यदि बचाना और चलाना है, तो उन्हें खुद ही इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी । लिहाजा, बाकी बचे जरूरी कामों को उन्होंने खुद ही पूरा किया/करवाया । वरदान हॉस्पिटल के पदाधिकारियों ने रोटरी वरदान ब्लड बैंक के उद्घाटन अवसर से ब्लड बैंक की योजना से जुड़े तथा इसके लिए रकम देने/दिलवाने वाले रोटरी पदाधिकारियों को दूर रखने का काम इसीलिए किया, ताकि रोटरी पदाधिकारी इसकी कमाई में हिस्सा माँगने/लूटने के लिए तैयार न हो जाएँ ।
रोटरी वरदान ब्लड बैंक रोटरी डिस्ट्रिक्ट 3012 के जेके गौड़, मुकेश अरनेजा, सतीश सिंघल जैसे पदाधिकारियों और नेताओं के निकम्मेपन और भ्रष्टाचार का एक ऐसा स्मारक है, जिसके उद्घाटन अवसर को उनकी छाया से भी बचाने की कोशिश की गयी है - और इस तरह से इन्हें इनकी 'असली पहचान' से परिचित कराया गया ।

Wednesday, July 26, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल के प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल के धंधेबाजों, दंगाईयों और ब्लैकमेलरों के सामने कमजोर पड़ने से डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री से निकाले गए विक्रम शर्मा को लायनिज्म में वापसी का मौका मिला

नई दिल्ली । विक्रम शर्मा के वीएस कुकरेजा के क्लब का सदस्य बनने के जरिए लायनिज्म को पुलिस थानों और अदालतों तक ले जाने वाले लोगों ने एक बार फिर लायंस इंटरनेशनल की लीडरशिप को तमाचा जड़ा है - और लायंस इंटरनेशनल की लीडरशिप तमाचे की चोट को चुपचाप सहलाने पर मजबूर हुई है । उल्लेखनीय है कि विक्रम शर्मा डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में थे, जहाँ उन्होंने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने के लिए तीन-चार बार प्रयास किये थे । उनके आखिरी प्रयास में ही जो भीषण ड्रामा हुआ था, उसकी सजा के कारण डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री फिर डिस्ट्रिक्ट नहीं रहा - और अभी तक डिस्ट्रिक्ट का अधिकार प्राप्त नहीं कर सका है । डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में अपने आपको महारथी समझने वाले पूर्व गवर्नर्स डीके अग्रवाल और हर्ष बंसल ने लायंस इंटरनेशनल के नियमों और कायदों से बेईमानी और धोखाधड़ी करते हुए विक्रम शर्मा को फर्जी तरीके से गवर्नर तो 'चुनवा' दिया था, लेकिन लायंस इंटरनेशनल के प्रकोप से वह उन्हें नहीं बचवा सके - बल्कि डीके अग्रवाल, हर्ष बंसल और विक्रम शर्मा की कारस्तानी ने डिस्ट्रिक्ट को ही 'सड़क' पर ला दिया । पहले चुनावी लड़ाई में और फिर नियम-कायदों की लड़ाई में हार का मुँह देखने वाले विक्रम शर्मा ने उस प्रकरण में फिर थाना और अदालत का सहारा लेने का प्रयास भी किया था - नतीजा लेकिन यह हुआ कि उन्हें लायनिज्म से ही निकाल दिया गया था । डीके अग्रवाल और हर्ष बंसल ने अपने अपने तरीके से प्रयास तो बहुत किए कि विक्रम शर्मा को लायनिज्म में फिर से शामिल कर लिया जाए, लेकिन डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री की जिम्मेदारी संभाल रहे पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर केएम गोयल ने उनके प्रयासों को सफल नहीं होने दिया ।
लेकिन यह तब तक की बात थी, जब कि लायंस इंटरनेशनल की लीडरशिप में दम होता और 'दिखता' था ! नरेश अग्रवाल के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने के साथ लायंस इंटरनेशनल की लीडरशिप ने जिस तरह अपाहिज होना शुरू किया और धंधेबाजों, दंगाईयों और ब्लैकमेलरों के सामने समर्पण करना शुरू किया - तो विक्रम शर्मा को लायनिज्म में लौटने का सुनहरा मौका दिखा । यह एक मजेदार तुलना होगी कि करीब दो वर्ष पहले लायनिज्म की चुनावी लड़ाई को थाना और अदालत ले गए विक्रम शर्मा को लायंस इंटरनेशनल की तत्कालीन लीडरशिप ने एक झटके में बाहर का रास्ता दिखा दिया था, लेकिन ठीक वही हरकत करने वाले वीएस कुकरेजा के खिलाफ कार्रवाई करने में नरेश अग्रवाल के नेतृत्व वाली लीडरशिप की कंपकंपी छूट गयी है । ऐसे में, डीके अग्रवाल और हर्ष बंसल ने भी समझ लिया कि विक्रम शर्मा से लायनिज्म की 'सेवा' करवाने के लिए उन्हें वीएस कुकरेजा की शरण में ही भेजना उचित होगा । लायनिज्म से बाहर कर दिए गए विक्रम शर्मा की चोर दरवाजे से हुई वापसी ने लोगों को कहने का मौका दिया है कि डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन में वीएस कुकरेजा के क्लब में विक्रम शर्मा की मौजूदगी लायन राजनीति में मात और लताड़ खाने वाले लोगों को थानों और अदालतों में जाने के लिए प्रेरित करने का काम भी करेगी । यह प्रसंग इस बात का भी उदाहरण बन गया है कि नरेश अग्रवाल की स्वार्थपूर्ण 'कमजोरी' लायनिज्म को पता नहीं कैसे कैसे दिन दिखवाएगी ?
विक्रम शर्मा को वीएस कुकरेजा के क्लब में प्रवेश दिलवाने में सफल हो कर डीके अग्रवाल और हर्ष बंसल ने अपने लिए भी मल्टीपल में अहम् पद पाने की उम्मीद बढ़ा ली है । दरअसल इन दोनों के लिए ही समस्या और चुनौती की बात यह हो गयी है कि वैसे तो यह बड़े नेता हैं लेकिन मल्टीपल में इनकी कोई पूछ ही नहीं हो रही है । मल्टीपल में राजनीति का जो खाका बना है और नए नए लोग मुखर व सक्रिय हैं - वह इन्हें या तो पहचानते ही नहीं हैं और पहचानते भी हैं तो कोई तवज्जो नहीं देते हैं । अपने लिए जगह बनाने के लिए इन्हें तेजपाल खिल्लन की शरण में आना जरूरी लगा होगा और इसके लिए ही इन्होंने विक्रम शर्मा रूपी अपने मोहरे के जरिए पहली चाल चली है । इस चाल के सफल हो जाने से डीके अग्रवाल और हर्ष बंसल को भी उम्मीद बँधी है कि जैसे विक्रम शर्मा को दोबारा से लायनिज्म की 'सेवा' करने का मौका मिल गया है, ठीक उसी तरह से उन्हें भी नेतागिरी करने/दिखाने का मौका मिल जायेगा । धंधेबाजों, दंगाईयों और ब्लैकमेलरों के सामने नरेश अग्रवाल ने जिस तरह से अपने आप को कमजोर और असहाय साबित किया है - उससे विक्रम शर्मा, डीके अग्रवाल और हर्ष बंसल को भी अपने दिन फिरने का संकेत मिला है; और उन्होंने प्रयास शुरू कर दिए हैं ।