Wednesday, December 6, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम के नाम पर इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति में बढ़त बनाने की भरत पांड्या की योजना को पड़ी दोतरफा चोट ने अशोक गुप्ता के मुकाबले उनकी स्थिति को डाँवाडोल बनाया

मुंबई । कुआलालुम्पुर में आयोजित हुए रोटरी इंस्टीट्यूट में प्रतिनिधियों के रहने की जगह को लेकर तथा अगले रोटरी वर्ष में चेन्नई में आयोजित होने वाले इंस्टीट्यूट की आयोजन समिति के लिए पदाधिकारियों के चयन को लेकर उत्तर व पश्चिम भारत के रोटेरियंस के साथ जो भेदभाव हुआ है, वह जोन 4 में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में मुद्दा बन रहा है - और इस मुद्दे ने भरत पांड्या और उनके साथियों को लोगों के निशाने पर ला दिया है । रोमांचक बात यह है कि इस मुद्दे पर जो बबाल पैदा हुआ है, उसमें भरत पांड्या और उनके साथी दोनों तरफ से - लीडरशिप की तरफ से भी और लोगों की तरफ से भी - 'मार' खा रहे हैं । मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम ने अपना नाम इस्तेमाल करने और घसीटे जाने के लिए भरत पांड्या और उनके साथियों की 'खबर' भी ली । मजे की बात यह है कि यह स्थिति खुद भरत पांड्या और उनके साथियों ने ही बनाई है । दरअसल, कुआलालुम्पुर में भरत पांड्या और उनके समर्थकों ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए समर्थन जुटाने वास्ते जो खेल खेला, वह उन्हें उल्टा पड़ गया है - जिसकी भरपाई करना उनके लिए खासा मुश्किल हो उठा है । कुआलालुम्पुर में भरत पांड्या और उनके साथियों ने जोन 4 के विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के महत्त्वपूर्व पूर्व गवर्नर्स का समर्थन जुटाने के लिए योजना तो बहुत अच्छी बनाई थी, लेकिन परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनीं कि उनकी योजना उन्हीं के गले पड़ गई है । योजना के अनुसार, भरत पांड्या और उनके समर्थकों ने जोन 4 के पूर्व गवर्नर्स का समर्थन जुटाने के लिए उन्हें यह आभास और अहसास कराने का प्रयास किया कि इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम उनकी उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे हैं, और इसके लिए वह उनके कहने से रोटरी रिसोर्स ग्रुप के पदों का बँटवारा करने के लिए भी तैयार हैं । उनके इन प्रयासों की भनक जब इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम को लगी, तब बासकर चॉकलिंगम ने उनसे अपना नाम घसीटे जाने पर गंभीर नाराजगी दिखाई ।
कुआलालुम्पुर में भरत पांड्या और उनके साथियों ने लोगों के साथ एक नाटक खेला - जिसके तहत भरत पांड्या के कुछेक साथी जोन 4 के विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में राजनीतिक रूप से सक्रिय रहने तथा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पूर्व गवर्नर्स को घेरघार कर भरत पांड्या से मिलवाने ले जाते, जहाँ भरत पांड्या उनसे बासकर चॉकलिंगम तथा अन्य बड़े पदाधिकारियों से अपनी निकटता का बखान करते हुए पूछते कि रोटरी रिसोर्स ग्रुप में उन्हें जो कोई भी पद चाहिए, वह बताएँ - बासकर चॉकलिंगम से कह कर वह उनसे उन्हें पद दिलवा देंगे । इस तरह भरत पांड्या की तरफ से कोशिश की गई कि रोटरी रिसोर्स ग्रुप के पद 'लेकर' विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के नेता अपने अपने डिस्ट्रिक्ट्स में उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में वोट दिलवाएँ । भरत पांड्या और उनके साथियों को इस बात का शायद जरा भी अंदाजा नहीं था कि वोट के लिए वह जब जोन 4 के पूर्व गवर्नर्स को बासकर चॉकलिंगम से पद दिलवाने की बात कर रहे थे, तब जोन 4 के पूर्व गवर्नर्स बासकर चॉकलिंगम की एक पक्षपातपूर्ण कार्रवाई से जूझ रहे थे । दरअसल कुआलालुम्पुर इंस्टीट्यूट में पहुँचे जोन 4 के कई पूर्व गवर्नर्स यह देख कर परेशान हो रहे थे कि उनके ठहरने के लिए मुख्य होटल की बजाए दूसरे होटल में व्यवस्था की गई थी । लोगों का ध्यान गया कि दक्षिण भारत के प्रतिनिधियों को तो मुख्य होटल में ही ठहराया गया, जबकि उत्तर व पश्चिम भारत के डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों को दूसरे होटल में जगह दी गई । सभी लोग मुख्य होटल में ही जगह चाहते थे । यह ठीक है कि मुख्य होटल में कमरों की सीमित उपलब्धता के कारण सभी को उसमें जगह नहीं मिल सकती थी - लेकिन जगह देने में दक्षिण और उत्तर का जो भेदभाव 'दिखा' उसने लोगों को भड़का दिया । जोन 4 के डिस्ट्रिक्ट्स के जिन लोगों को भरत पांड्या, बासकर चॉकलिंगम से निकटता का वास्ता देकर रोटरी रिसोर्स ग्रुप में पद दिलवा रहे थे, उन लोगों ने भरत पांड्या से अनुरोध किया कि रोटरी रिसोर्स ग्रुप के पद/वद तो बाद में देखेंगे, पहले तो बासकर चॉकलिंगम से कह कर मुख्य होटल में कमरा दिलवाओ ।
जोन 4 के डिस्ट्रिक्ट्स के पूर्व गवर्नर्स की इस माँग पर भरत पांड्या फँस गए । उनकी फँसावट को लोगों ने यह कह कर और बढ़ाया कि आप तो कहते/बताते हो कि बासकर चॉकलिंगम आपके बहुत नजदीक हैं और समर्थक हैं और कुआलालुम्पुर की व्यवस्था में आपकी भी भूमिका है - और फिर भी आप इतना सा काम भी नहीं करवा सकते हैं । इसी बहसबाजी में कई एक लोगों ने जयपुर और दुबई इंस्टीट्यूट की व्यवस्था को याद किया और कहा/दोहराया कि जयपुर में तो अशोक गुप्ता की ही पूरी व्यवस्था थी, जबकि दुबई इंस्टीट्यूट की व्यवस्था में भी उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी - और दोनों ही जगह उन्होंने किसी भी आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया और किसी को भी जरा भी परेशान नहीं होने दिया था । जयपुर और दुबई इंस्टीट्यूट और उसमें अशोक गुप्ता की भूमिका की तारीफें सुनकर भरत पांड्या और उनके समर्थकों को समझ में आ गया कि उनका दाँव उल्टा पड़ गया है, और उनकी होशियारी ने उन्हें ही लपेटे में ले लिया है । भरत पांड्या के लिए इससे भी बड़ी मुसीबत की बात तब हुई, जब इस मामले की जानकारी बासकर चॉकलिंगम को हुई । उनकी तरफ से इस बात पर गहरी नाराजगी जाहिर की गई कि भरत पांड्या और उनके साथी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में उनका नाम क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं ? बासकर चॉकलिंगम ने यह बात कई लोगों के सामने जिस तरह से कही, उससे भरत पांड्या और उनके साथियों को तगड़ा झटका लगा । बासकर चॉकलिंगम ने इस झटके की तीव्रता को बढ़ाते हुए एक काम यह और कर डाला कि अगले रोटरी वर्ष में चेन्नई में होने वाले इंस्टीट्यूट के लिए जो टीम घोषित की, उसमें अशोक गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट के तथा उनके नजदीकी को भी महत्त्वपूर्ण भूमिका दे दी । बासकर चॉकलिंगम के तेवर को देखते हुए भरत पांड्या और उनके समर्थकों की चेन्नई इंस्टीट्यूट की मैनेजिंग कमेटी में पद दिलवाने का वायदा करके समर्थन जुटाने की योजना ने भी दम तोड़ दिया । बासकर चॉकलिंगम के नाम पर इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति में बढ़त बनाने की भरत पांड्या की योजना को जो दोतरफा चोट पड़ी है, उसने अशोक गुप्ता के मुकाबले उनकी स्थिति को फिलहाल डाँवाडोल तो बना ही दिया है ।

Tuesday, December 5, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी कुआलालुम्पुर में आयोजित हुई इंस्टीट्यूट में वरिष्ठ पदाधिकारियों की कड़ी फटकार के बाद काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की पहली मीटिंग बुलाने के लिए मजबूर तो हुए हैं, लेकिन क्या वह अपने रवैये और व्यवहार को भी सुधारेंगे ?

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी को आखिरकार काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग करने की सुध आई और उन्होंने अपने गवर्नर-काल के छठे महीने में यह मीटिंग करने/बुलाने की जहमत उठाई है । हालाँकि एक पूर्व गवर्नर ने भेद खोला और बताया कि रवि चौधरी को यह सुध खुद से नहीं आई है, बल्कि कुआलालुम्पुर में आयोजित हुई रोटरी इंस्टीट्यूट में पड़ी कड़ी फटकार के बाद वह यह मीटिंग बुलाने के लिए मजबूर हुए हैं । कुआलालुम्पुर से लौटे कुछेक अन्य पूर्व गवर्नर्स ने भी बताया कि वहाँ विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के तथा रोटरी इंटरनेशनल के वरिष्ठ पदाधिकारियों तथा नेताओं के बीच रवि चौधरी की कारस्तानियों की खासी चर्चा थी; पूर्व गवर्नर्स ने बताया कि वह यह देख कर हैरान थे कि रवि चौधरी के पहुँचने से पहले तो वहाँ रवि चौधरी की कारस्तानियों की (कु)ख्याति पहुँची हुई थी । दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों ने रवि चौधरी की हरकतों का जिक्र करते हुए चुस्कियाँ लीं, तो रोटरी इंटरनेशनल के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने यह कहते हुए उनकी 'क्लास' ली कि वही एक अकेले गवर्नर हैं जिनके कार्य-व्यवहार को लेकर लगातार शिकायतें मिल रही हैं और जिनकी हरकतों से रोटरी की बदनामी हो रही है । रवि चौधरी ने अपनी तरफ से भी डिस्ट्रिक्ट के कुछेक पूर्व गवर्नर्स की तथा अन्य कुछेक लोगों की शिकायत की और कहा कि यह लोग उन्हें बदनाम करते/करवाते रहते हैं । रोटरी इंटरनेशनल के वरिष्ठ पदाधिकारियों तथा नेताओं ने लेकिन उनकी शिकायतों को यह कहते हुए तवज्जो देने से बचने की कोशिश की कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद पर होने के कारण उनकी जिम्मेदारी है कि वह लोगों को साथ लेकर चलें और किसी को शिकायत करने का मौका न दें । 
कुआलालुम्पुर में रवि चौधरी की आभा झा चौधरी के मामले में भी खासी फजीहत हुई । वरिष्ठ पदाधिकारियों का कहना रहा कि आभा झा चौधरी उनसे पहले के गवर्नर्स के साथ काम कर चुकीं हैं, और उनसे पहले के किसी गवर्नर के साथ उनका कोई विवाद नहीं हुआ - बल्कि सभी गवर्नर्स ने उनके कामकाज की प्रशंसा ही की है, और उन्हें महत्त्वपूर्ण सम्मानों से सम्मानित ही किया है । रवि चौधरी से कहा/पूछा गया कि उनकी प्रतिभा और उनकी कार्य-क्षमताओं को देखते/समझते हुए ही आपने उन्हें अपनी डिस्ट्रिक्ट-टीम में महत्त्वपूर्ण पद देने का फैसला किया होगा - फिर ऐसा क्या हो गया कि आभा झा चौधरी को उनके व्यवहार और रवैये की शिकायत करते हुए रोटरी इंटरनेशनल को एक लंबा-चौड़ा पत्र लिखना पड़ा । कुआलालुम्पुर से लौटे पूर्व गवर्नर्स के अनुसार, वहाँ वरिष्ठ पदाधिकारियों की तरफ से रवि चौधरी को साफ शब्दों में कहा/बताया गया कि उन्हें स्वयं इस बात पर विचार करना चाहिए कि दूसरे गवर्नर्स की तुलना में एक अकेले उनके ही खिलाफ इतनी शिकायतें क्यों हैं, और उनके डिस्ट्रिक्ट के कई पूर्व गवर्नर्स भी उनके कार्य-व्यवहार को लेकर असंतुष्ट और शिकायती क्यों हैं ? रवि चौधरी की इस बात के लिए बहुत फजीहत हुई कि वह अपने डिस्ट्रिक्ट में पूर्व गवर्नर्स को साथ लेकर क्यों नहीं चल पा रहे हैं, और क्यों पूर्व गवर्नर्स उनके गवर्नर-काल में अपने आप को उपेक्षित व अपमानित महसूस कर रहे हैं । इन्हीं बातों के बीच काउंसिल और गवर्नर्स की मीटिंग की बात आई - और रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारी यह जान कर हैरान रह गए कि गवर्नर-काल के पाँच महीने पूरे होने के बाद तक भी रवि चौधरी के एक बार भी काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग नहीं की/बुलाई है । इस बात पर रवि चौधरी की कड़ी फटकार लगी और कहा गया कि यह इस बात का सुबूत है कि पूर्व गवर्नर्स को उपेक्षित किए हुए हैं और उन्हें साथ लेकर नहीं चल रहे हैं - और जिसके कारण वह रोटरी के आदर्शों व नियमों का पालन नहीं कर पा रहे हैं । वरिष्ठ पदाधिकारियों की तरफ से रवि चौधरी को सख्त हिदायत दी गई कि वह काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग जल्द बुलाएँ और डिस्ट्रिक्ट व रोटरी के कामकाज को पटरी पर लाने का प्रयास करें ।
'मरता, क्या न करता' वाली तर्ज पर, वरिष्ठ पदाधिकारियों से फटकार खाने के बाद रवि चौधरी ने कुआलालुम्पुर से लौट कर पहला काम काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग बुलाने का ही किया । आठ दिसंबर को काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग बुलाने की घोषणा करने के बाद रवि चौधरी की चिंता लेकिन यह है कि उक्त मीटिंग में वह अपनी कारस्तानियों तथा उलटे-सीधे फैसलों व कार्रवाइयों को पूर्व गवर्नर्स के बीच कैसे उचित ठहरायेंगे ? रवि चौधरी के गवर्नर-काल में सबसे बड़ी बेवकूफी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव की प्रक्रिया की टाइमिंग को लेकर हुई है । रवि चौधरी ने इस बात की बिलकुल भी चिंता/परवाह नहीं की कि चुनावी प्रक्रिया के बारे में नियम-कानून क्या कहते हैं, और पूरी प्रक्रिया को मनमाने तरीके से चलाया है । डिस्ट्रिक्ट में कई कमेटियाँ बननी होती हैं, जिन्हें बनाने को लेकर रवि चौधरी ने कोई रुचि नहीं दिखाई - इलेक्शन कमेटी ही अभी हाल ही में तब बनी है, जब इलेक्शन की प्रक्रिया शुरू हो गई । उल्लेखनीय है कि रोटरी में होशियार गवर्नर्स यह करते हैं कि अपनी बेवकूफियों और कमजोरियों पर पर्दा डालने के लिए शुरू में ही काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग कर लेते हैं, जिसमें सभी फैसले करने के अधिकार वह खुद ले लेते हैं - और फिर मनमानियाँ करते रहते हैं । लेकिन जैसा कि कहा गया है कि होशियार गवर्नर्स ऐसा करते हैं - रवि चौधरी जैसे लोग ऐसा नहीं करते । सामान्य समझ की बात है कि रवि चौधरी यदि अपने गवर्नर-काल के शुरू में ही काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग कर लेते और सभी अधिकार अपने जिम्मे कर लेते, तब फिर वह जो कुछ भी करते - उस पर विवाद और या शिकायत नहीं होती और वह बदनामी से बच जाते ।
काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग बुलाए जाने की कार्रवाई पर संतुष्ट दिख रहे पूर्व गवर्नर्स का कहना है कि कुआलालुम्पुर में रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों से मिली कड़ी फटकार के बाद रवि चौधरी यह मीटिंग करने/बुलाने के लिए जिस तरह तैयार हो गए हैं, उससे लग रहा है कि उक्त फटकार का उन पर असर हुआ है । कुछेक पूर्व गवर्नर्स को तो यह तक उम्मीद बँधी है कि कुआलालुम्पुर में रवि चौधरी को इस बात का पता चल ही गया है कि अपने डिस्ट्रिक्ट के बाहर के रोटेरियंस के बीच और खासकर वरिष्ठ व प्रमुख रोटरी पदाधिकारियों के बीच उनकी कितनी बदनामी है, इससे सबक लेकर रवि चौधरी शायद अपने व्यवहार और रवैये को सुधारें और आगे ऐसा कुछ न करें - जिससे कि डिस्ट्रिक्ट व रोटरी के साथ-साथ खुद उनकी भी बदनामी हो । कुछेक पूर्व गवर्नर्स की यह उम्मीद सचमुच पूरी होगी या सिर्फ खामख्याली ही साबित होगी - इसका संकेत आठ दिसंबर को होने वाली काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में भी हालाँकि मिल जायेगा ।

Monday, December 4, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी के लिए आरके अग्रवाल और आनंद दुआ के बीच चल रही होड़ में हालात बदलने के बाद भी असमंजसता अभी बनी हुई है

नई दिल्ली । सुरेश बिंदल द्वारा आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी का झंडा उठा लेने तथा आनंद दुआ द्वारा अपनी उम्मीदवारी के लिए संपर्क अभियान शुरू कर देने से डिस्ट्रिक्ट में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए गहमागहमी बढ़ भी गई है और थोड़ा उलझ भी गई है - इस उलझन में अपनी अलग अलख जलाए बैठे आरके शाह के लिए भी मौका बनता नजर आने लगा है । उल्लेखनीय है कि अभी तक फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की सर्वसम्मत उम्मीदवारी को लेकर दिल्ली में ऊपरी तौर पर तो अनिश्चितता नजर आ रही थी, लेकिन भीतर ही भीतर आरके अग्रवाल और आनंद दुआ के बीच होड़ भी छिड़ी हुई थी । आरके अग्रवाल का समर्थन करने वाले तो कई थे, लेकिन सुरेश बिंदल के विरोध के चलते उनके नाम पर पूर्ण सहमति बनने में दिक्कत आती दिख रही थी; आनंद दुआ के नाम पर विरोध करने वाला तो कोई नहीं था, लेकिन उनकी सक्रियता के अभाव में उनका नाम आगे बढ़ाने वाला - यानि उनकी जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं था । आनंद दुआ को एक आदर्श उम्मीदवार के रूप में तो देखा/पहचाना जा रहा था, लेकिन उन्हें व्यावहारिक उम्मीदवार के रूप में स्वीकार नहीं किया जा पा रहा था । इसका एक बड़ा कारण यह था कि वह खुद अपनी उम्मीदवारी को लेकर कोई उत्साह नहीं दिखा रहे थे । उनके नजदीकियों का कहना/बताना था कि आनंद दुआ उम्मीदवार तो बनना चाहते हैं, लेकिन वह किसी नेता से यह कहना नहीं चाहते हैं - क्योंकि वह जानते हैं कि वह यदि अपनी उम्मीदवारी के लिए पहल करेंगे और नेताओं से समर्थन मागेंगे, तो उम्मीदवार के रूप में उन्हें पैसे खर्च करने पड़ेंगे; वह लेकिन 'मुफ्त' में गवर्नर बनना चाहते हैं । इस चक्कर में कोई भी नेता आनंद दुआ की उम्मीदवारी का झंडा उठाने के लिए तैयार नहीं हुआ । आरके अग्रवाल और आनंद दुआ के बीच उलझे मामले को उलझा हुआ छोड़ कर नेताओं ने कोई और उम्मीदवार खोजने की कोशिश भी की, लेकिन जो मिला नहीं ।
इस बीच हालात ने पलटा खाया । आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी का विरोध कर रहे सुरेश बिंदल ने अंततः मन बदला और आरके अग्रवाल की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया । इससे आरके अग्रवाल का पलड़ा भारी होता हुआ नजर आया, तो आनंद दुआ ने भी 'किसी से न कहने' की जिद छोड़ी और अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के लिए निकल पड़े । हालात बदलने के बाद भी नतीजा लेकिन अभी भी उलझन भरा ही है और नेताओं के लिए किसी भी नतीजे पर पहुँचना मुश्किल बना हुआ है । एक पूर्व गवर्नर का कहना है कि किसी उम्मीदवार पर सर्वसम्मति बनाने के लिए कोई पहल नहीं करना चाहता है । नेताओं की स्थिति की सच्चाई दरअसल इसी बात में छिपी हुई है । इस बात से लग रहा है कि नेताओं ने अपने अपने उम्मीदवार तो चुन लिए हैं, लेकिन वह अपने अपने उम्मीदवारों पर भरोसा नहीं कर रहे हैं  इसलिए वह अपने उम्मीदवार के साथ आगे नहीं बढ़ना चाहते हैं । असल में, आरके अग्रवाल और आनंद दुआ में से किसी ने भी यह संकेत नहीं दिए हैं कि उनके नाम पर नेताओं के बीच यदि सर्वसम्मति नहीं बनी - तो भी वह किसी एक खेमे के भरोसे ही उम्मीदवार बनने को तैयार हैं । इसलिए उनके समर्थक नेता उनके नाम पर ज्यादा आगे बढ़ने को तैयार नहीं हैं, और मामला जहाँ का तहाँ ही अटका पड़ा है । सुरेश बिंदल की चंद्र शेखर मेहता के साथ अच्छी बनती है; समझा जाता है कि चंद्र शेखर मेहता ने हरियाणा में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हरदीप सरकारिया के नाम पर मोहर लगवाने से पहले सुरेश बिंदल सहित दिल्ली के दो-तीन अन्य नेताओं को विश्वास में ले लिया था - इससे एक संभावना यह बन रही है कि सुरेश बिंदल दिल्ली में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए आरके अग्रवाल का नाम घोषित करवा लें । हालाँकि कइयों को इस बात पर शक भी है कि दिल्ली में सुरेश बिंदल की ऐसी स्थिति है कि वह अपनी बात मनवा लें, इसलिए शक यही है कि दिल्ली में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए जो भी उम्मीदवार 'घोषित' होगा - वह वास्तव में एक खेमे का ही होगा, और दूसरे नेता तो उसे मजबूरी में ही समर्थन देंगे ।
इस स्थिति ने आरके शाह के लिए उम्मीदों के द्वार खोल दिए हैं । उल्लेखनीय है कि आरके शाह अकेले ऐसे उम्मीदवार हैं जो अपनी उम्मीदवारी के लिए डटे हुए हैं और उसके लिए समर्थन जुटाने में लगे हुए हैं । समर्थन जुटाने की आरके शाह की कोशिशें हालाँकि अभी तक सफल नहीं हो सकी हैं, लेकिन जमीनी हालात उनके लिए अनुकूल बनते दिख रहे हैं । दरअसल हरियाणा में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हरदीप सरकारिया का जिस मनमाने तरीके से चयन हुआ है, और जिसके चलते हरियाणा में लोग लीडरशिप के खिलाफ हो गए दिख रहे हैं - उसमें आरके शाह के लिए समर्थन बनने जैसे हालात छिपे नजर आ रहे हैं । हरियाणा में कई लोग लीडरशिप के नाम पर 'चार लोगों की मनमानी' के खिलाफ नाराजगी व्यक्त करते हुए सुने जा रहे हैं । दिल्ली में भी, फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए यदि 'सचमुच' सर्वसम्मति नहीं बनी, तो विरोधी नेता आरके शाह की उम्मीदवारी को समर्थन दे सकते हैं । आरके शाह के रवैये से यह तो तय ही माना जा रहा है कि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए दिल्ली में दो उम्मीदवार तो होंगे ही, जिसके चलते हरियाणा की लीडरशिप पर दबाव होगा कि वह अपना ध्यान 'अपने' उम्मीदवार पर ही दे, और दिल्ली के झगड़े के पचड़े में न पड़े । यह स्थिति आरके शाह के अनुकूल बैठती है । स्थिति तो अनुकूल बैठी नजर आ रही है, लेकिन इस अनुकूल स्थिति को मैनेज करने तथा वोट में बदलने के लिए प्रेरित करने का काम आरके शाह कर पायेंगे या नहीं - यह सवाल जरूर लोगों को असमंजस में डाले हुए है । जाहिर है कि हालात साफ/स्पष्ट होने के लिए अभी थोड़ा और इंतज़ार करना पड़ेगा ।

रोटरी इंटरनेशनल में गुलाम वहनवती और विजय जालान की बढ़ी हैसियत के कारण भरत पांड्या की इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की उम्मीदवारी के सामने गंभीर संकट आ खड़ा हुआ है, जिसके चलते उनके लिए चैलेंजिंग उम्मीदवार अशोक गुप्ता द्वारा प्रस्तुत की गई चुनौती और बड़ी तथा संकटपूर्ण हो गई है

मुंबई । कुआलालुम्पुर में आयोजित हुए रोटरी इंस्टीट्यूट में अन्य बातों के साथ-साथ जोन 4 में हो रहे इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को लेकर जिस तरह की बातें और सक्रियता सुनने/देखने को मिली हैं, उसने भरत पांड्या के लिए मुश्किलों को बढ़ाने का काम किया है । भरत पांड्या के नजदीकियों और शुभचिंतकों को यह देख कर खासी हैरानी हुई कि विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के जिन प्रमुख लोगों को भरत पांड्या के समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जाता है, वह कुआलालुम्पुर में भरत पांड्या को अधिकृत उम्मीदवार चुनने के लिए नोमीनेटिंग कमेटी में अपनाई गई प्रक्रिया की आलोचना कर रहे थे, और इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उपयुक्तता तथा उपयोगिता के लिहाज से अशोक गुप्ता को भरत पांड्या से बेहतर आँक रहे थे । भरत पांड्या के ही एक नजदीकी का कहना रहा कि कुआलालुम्पुर में चूँकि सभी लोग एक-दूसरे की नज़रों के सामने थे और यह देख/जान सकते थे कि कौन क्या कर रहा है, इसलिए यह बात सामने आई कि सीधे होने वाले चुनाव में भरत पांड्या के लिए मुकाबला आसान नहीं होगा - और उनके लिए सबसे पहली जरूरत तो अपने समर्थकों को ही राजनीतिक रूप से ट्रेंड करने और राजनीतिक रूप से ईमानदार 'बनाने' की जरूरत है । कुआलालुम्पुर जैसा नजारा ही यदि बना रहा, जहाँ कि दूसरे लोगों के साथ-साथ भरत पांड्या के समर्थक और शुभचिंतक भी भरत पांड्या की बजाए अशोक गुप्ता के रोटरी जीवन की तथा उनके कामों का बखान करते देखे/सुने गए - तो इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के संदर्भ में भरत पांड्या के लिए वास्तव में मुसीबत की बात होगी । 
भरत पांड्या के समर्थकों का कहना है कि हाल ही के दिनों में गुलाम वहनवती की रोटरी फाउंडेशन ट्रस्टी पद पर तथा विजय जालान की रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर पद पर जो नियुक्तियाँ हुईं हैं, उसने जोन के राजनीतिक समीकरण को पूरी तरह उलट-पलट दिया है - और इस स्थिति ने भरत पांड्या के लिए दो तरफा संकट पैदा किया है । इन नियुक्तियों ने एक तरफ तो ऐसे कई लोगों को नाराज किया है, जो इन पदों के दावेदार थे और भरत पांड्या के समर्थक के रूप में देखे पहचाने जाते हैं, और दूसरी तरफ उनके अपने डिस्ट्रिक्ट में उनके विरोधी के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले गुलाम वहनवती और विजय जालान का रोटरी में 'कद' बढ़ा । पहली वाली स्थिति को समझने के लिए एक उदाहरण देना काफी होगा - डिस्ट्रिक्ट 3080 में यशपाल दास रोटरी फाउंडेशन ट्रस्टी पद के लिए तथा मधुकर मल्होत्रा रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर पद के लिए उम्मीदवार थे, और यह दोनों भरत पांड्या के समर्थक के रूप में देखे/पहचाने जाते हैं; लेकिन यह दोनों ही जिस तरह से भरत पांड्या के डिस्ट्रिक्ट के गुलाम वहनवती और विजय जालान से 'हार' गए, उसके कारण अब यह भरत पांड्या की उम्मीदवारी को समर्थन दिलवाने के लिए ज्यादा उत्साहित नजर नहीं आ रहे हैं । जोन 4 के दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में भी इसी तरह के नज़ारे हैं । सिर्फ यही नहीं, रोटरी के बड़े नेताओं पर भी इन नियुक्तियों का बहुत ही प्रतिकूल असर पड़ा है । इसका एक दिलचस्प उदाहरण पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर शेखर मेहता हैं । शेखर मेहता खुद फाउंडेशन ट्रस्टी पद के उम्मीदवार थे, पर पद पाने में असफल रहे; उसके बाद उन्होंने अपने डिस्ट्रिक्ट के देवाशीष मित्रा को रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर का पद दिलवाने का प्रयास किया, लेकिन उसमें भी वह असफल रहे - अपनी इन दोहरी असफलतताओं से पैदा हुई नाराजगी का ठीकरा वह भरत पांड्या की उम्मीदवारी पर फोड़ते नजर आ रहे हैं ।
रोटरी फाउंडेशन ट्रस्टी पद पर गुलाम वहनवती तथा रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर पद पर विजय जालान की नियुक्ति ने जिन जिन लोगों को नाराज किया है, वह सब अपनी अपनी नाराजगी भरत पांड्या की उम्मीदवारी के साथ दिखाने में लग गए हैं - और इस नज़ारे में भरत पांड्या के समर्थकों व विरोधियों का फर्क मिट सा गया है । भरत पांड्या पर दोहरी चोट यह पड़ी है कि रोटरी फाउंडेशन ट्रस्टी पद और रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर पद मिलने से उनके विरोधी के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले गुलाम वहनवती और विजय जालान काफी मजबूत हो गए हैं, और इनकी मजबूती भरत पांड्या के लिए सिर दर्द बन गई है । उल्लेखनीय है कि गुलाम वहनवती ने तो एक ही डिस्ट्रिक्ट में होने के बावजूद भरत पांड्या के साथ ही इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत की थी, और नोमीनेटिंग कमेटी में वह थोड़े से अंतर से ही भरत पांड्या से पिछड़े थे । उम्मीद की जा रही थी कि वह चेलैंज करेंगे और यदि वह अपने चेलैंज को मान्य नहीं करवा सके, तो चैलेंजिंग उम्मीदवार की मदद तो जरूर ही करेंगे । इस 'उम्मीद' को देखते/समझते हुए भरत पांड्या ने गुलाम वहनवती को कंट्रोल में करने की व्यवस्था हालाँकि कर ली थी - किंतु उनकी बदकिस्मती रही कि गुलाम वहनवती ट्रस्टी बन गए । गुलाम वहनवती यदि सिर्फ एक पूर्व गवर्नर ही रहते तो इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में कोई खास भूमिका नहीं निभा पाते, लेकिन ट्रस्टी बनने से रोटरी में उनका कद खासा बड़ा हो गया है और अब वह बड़ी भूमिका निभा सकने की हैसियत में हो गए हैं । भरत पांड्या के ही नजदीकियों को लगता है कि जोन के डिस्ट्रिक्ट्स में हर कोई जानता है कि गुलाम वहनवती का भरत पांड्या के साथ विरोध का संबंध है; रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी होने के बाद गुलाम वहनवती को हर कोई खुश करने की कोशिश भी करेगा - और इस कोशिश में वह गुलाम वहनवती के कुछ कहे बिना ही भरत पांड्या के खिलाफ रहेगा और काम करेगा । इस तरह गुलाम वहनवती के ट्रस्टी बनने से भरत पांड्या के लिए बैठे-बिठाए मुसीबत गले आ पड़ी है ।
इसी तरह का मामला विजय जालान के मामले में भी हुआ है । विजय जालान जब तक सिर्फ पूर्व गवर्नर थे, तब तक वह भरत पांड्या के लिए कोई समस्या नहीं थे - और इसीलिए भरत पांड्या ने भी उनके विरोध की  परवाह नहीं की हुई थी । विजय जालान के विरोध का कारण दरअसल यह रहा है कि विजय जालान को भी अगली बार इंटरनेशनल डायरेक्टर बनना है । वह जान/समझ रहे हैं कि यह तभी संभव होगा जब कि भरत पांड्या इस बार इंटरनेशनल डायरेक्टर न बनें; भरत पांड्या यदि इस बार बनेंगे, तो अगली बार विजय जालान के लिए तो मौका ख़त्म ही हो जायेगा । अपना मौका बनाए रखने के लिए विजय जालान के लिए जरूरी है कि वह किसी भी तरह भरत पांड्या को इस बार इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने से रोकें । विजय जालान जब तक सिर्फ पूर्व गवर्नर थे, तब तक इस संबंध में कुछ कर सकना उनके लिए मुश्किल था; किंतु अब रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर बनने के बाद उनकी रोटरी हैसियत में जो बड़ा उछाल आया है - उससे भरत पांड्या और उनके समर्थक सकते में हैं । भरत पांड्या और उनके समर्थक अभी तक विजय जालान को जरा भी गंभीरता से नहीं ले रहे थे, लेकिन बदली परिस्थिति में उनके लिए अब विजय जालान को गंभीरता से लेने की जरूरत आ पड़ी है । गुलाम वहनवती और विजय जालान की बढ़ी रोटरी हैसियत के कारण भरत पांड्या की उम्मीदवारी के सामने जो दोतरफा गंभीर संकट आ खड़ा हुआ है, उसके परिणामस्वरूप भरत पांड्या के लिए अपने डिस्ट्रिक्ट और अपने क्षेत्र के डिस्ट्रिक्ट्स में ही अपने समर्थन-आधार को बचाए रखना मुश्किल हो गया है; और इस मुश्किल के चलते उनके लिए इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चैलेंजिंग उम्मीदवार अशोक गुप्ता द्वारा प्रस्तुत की गई चुनौती और बड़ी तथा संकटपूर्ण हो गई है ।

Saturday, December 2, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में पूर्व गवर्नर चंद्र शेखर मेहता की दिल्ली के लीडर्स के समर्थन के भरोसे सुरेश जिंदल और पुनीत बंसल का पत्ता कटवा कर हरदीप सरकारिया को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का उम्मीदवार बनवा लेने की कार्रवाई पर हरियाणा में नाराजगी और विरोध

सिरसा । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हरदीप सरकारिया को उम्मीदवार घोषित करने के साथ ही हरियाणा लायंस फोरम में बिखराव और टकराव के संकेत मिलने शुरू हो गए हैं । उल्लेखनीय है कि हरियाणा लायंस फोरम की मीटिंग में ही हरदीप सरकारिया को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार चुना गया है, लेकिन इस फैसले के सार्वजनिक होने के साथ ही हरियाणा के लायंस सदस्यों की तरफ से न सिर्फ इस फैसले की आलोचना होने लगी है, बल्कि हरियाणा लायंस फोरम के सांगठनिक स्वरूप पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं । इस फैसले को लेकर सुरेश जिंदल और पुनीत बंसल के नजदीकियों व समर्थकों में गहरी नाराजगी है - और इनकी तरफ से हरदीप सरकारिया को उम्मीदवार बनाए जाने के फैसले को पक्षपातपूर्ण बताया जा रहा है । दिलचस्प नजारा यह देखने को मिल रहा है कि हरदीप सरकारिया के समर्थकों की तरफ से फैसले के विरोध में उठ रही आवाज़ों को दिल्ली के लायन नेताओं की शह और प्रेरणा के रूप में देखा/पहचाना और बताया जा रहा है । हरदीप सरकारिया के समर्थकों की तरफ से कहा/बताया जा रहा है कि दिल्ली के लायन लीडर्स हरियाणा में भी अपना दखल बनाए रखना चाहते हैं, और इसलिए वह नहीं चाहते हैं कि हरियाणा में लायंस सदस्यों के बीच एकता स्थापित हो - और इसीलिए वह हरदीप सरकारिया के नाम पर बनी एकता को तोड़ने की कोशिशों में जुट गए हैं । हालाँकि हरियाणा के ही कई नेताओं का मानना/कहना है कि दिल्ली के लायन लीडर्स का नाम लेकर हरदीप सरकारिया की उम्मीदवारी तय करने के मनमाने और पक्षपातपूर्ण फैसले को सही नहीं ठहराया जा सकता और हरियाणा की एकता के नाम पर इस फैसले को हरियाणा के लायंस सदस्यों के सिर जबर्दस्ती नहीं थोपा जा सकता है ।
उल्लेखनीय है कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हरियाणा में सुरेश जिंदल और पुनीत बंसल के नाम चर्चा में थे । सुरेश जिंदल और उनके समर्थकों का तर्क था कि वह चूँकि एक बार चुनाव लड़ चुके हैं, इसलिए अब जब मौका आया है तब उन्हें उम्मीदवार होना चाहिए और पिछली बार जो चंद्रशेखर मेहता और केएल खट्टर जैसे पूर्व गवर्नर्स उन्हें सफलता नहीं दिलवा सके थे, उन्हें इस बार उनकी उम्मीदवारी की वकालत करना चाहिए । पुनीत बंसल पिछले दो-तीन वर्षों की अपनी निरंतर सक्रियता के भरोसे अपनी उम्मीदवारी का दावा ठोक रहे थे । उनका और उनके समर्थकों का कहना रहा कि डिस्ट्रिक्ट को इस समय ऐसे लीडर की जरूरत है, जिसका लोगों के बीच संपर्क और संलग्नता है -  इसलिए पुनीत बंसल ही उपयुक्त उम्मीदवार हो सकते हैं । इन दोनों की दावेदारी के बीच एक बात यह भी लोगों के बीच सुनी/कही जा रही थी कि पूर्व गवर्नर चंद्र शेखर मेहता किसी भी कीमत पर पुनीत बंसल को तो उम्मीदवार नहीं बनने देंगे । इस बात से सुरेश जिंदल और उनके समर्थकों को अपनी दाल गलती हुई दिख रही थी । लेकिन चंद्र शेखर मेहता ने अचानक से हरदीप सरकारिया का नाम आगे बढ़ा कर सुरेश जिंदल की दाल को गलने से पहले ही बिखेर देने का काम कर दिया । हरदीप सरकारिया का नाम आगे बढ़ा कर चंद्र शेखर मेहता ने पुनीत बंसल का शिकार करने के लिए घेराबंदी की । पुनीत बंसल की यह घेराबंदी करने के बाद भी उन्हें डर था कि दिल्ली के लायन लीडर्स पुनीत बंसल को शह और समर्थन देकर यदि उम्मीदवार बना/बनवा देते हैं, तब फिर उनके लिए मुसीबत हो जाएगी । वह भी मानते/जानते हैं कि चुनाव की नौबत यदि आई तो पुनीत बंसल और या सुरेश जिंदल के सामने हरदीप सरकारिया का टिक पाना मुश्किल क्या असंभव ही होगा ।
ऐसे में, हरदीप सरकारिया के जरिए पुनीत बंसल को 'ठिकाने' लगाने के लिए चंद्र शेखर मेहता को दिल्ली के लीडर्स के समर्थन की जरूरत थी । वह जान/समझ रहे थे कि दिल्ली के लीडर्स के समर्थन के बिना पुनीत बंसल या सुरेश जिंदल के लिए उम्मीदवार बनना असंभव होगा । चंद्र शेखर मेहता ने दिल्ली के लीडर्स का मूड भाँपने की जो कोशिश की, उसमें उन्हें यह जान/देख कर राहत मिली कि दिल्ली के हर प्रभावी लीडर ने उन्हें आश्वस्त किया कि हरियाणा को लेकर वह जो फैसला करेंगे, वह उन्हें मान्य होगा । दिल्ली के लायन लीडर्स से आश्वासन मिलने के बाद चंद्र शेखर मेहता निश्चिन्त हो गए और फिर उन्होंने सुरेश जिंदल को इग्नोर करके तथा पुनीत बंसल को फुसला करके हरदीप सरकारिया की उम्मीदवारी के नाम पर मोहर लगवा ली । हरियाणा लायंस फोरम के फैसले का दिलचस्प पक्ष यह है कि उसे फैसला अभी होने वाले सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए करना था, लेकिन उसने हरियाणा से अगले उम्मीदवार बारे में भी फैसला कर डाला । चंद्र शेखर मेहता ने पुनीत बंसल को फुसलाने के लिए उनसे वायदा कर दिया है कि हरियाणा का अगला नंबर जब आएगा, तब वह उनकी उम्मीदवारी को समर्थन देंगे - और इस वायदे के आधार पर हरियाणा लायंस फोरम ने अपने अगले उम्मीदवार के रूप में पुनीत बंसल के नाम की घोषणा कर दी है । यह कुछ कुछ ऐसा ही मामला है जैसे रोते बच्चे को चुप करवाने के लिए उसे झुनझुना पकड़ा दिया जाता है । पुनीत बंसल की भी मजबूरी है कि अगले उम्मीदवार रूपी झुनझुने को लेकर वह शांत हो जाएँ ।
हरदीप सरकारिया को उम्मीदवारी चुनने/बनाने के फैसले पर पुनीत बंसल और सुरेश जिंदल के समर्थकों व नजदीकियों के बीच तुरंत से जो नाराजगी देखने/सुनने को मिली है, वह हरदीप सरकारिया की उम्मीदवारी के लिए अभी तो कोई संकट बनती नहीं दिख रही है - दरअसल इसीलिए हरदीप सरकारिया के समर्थकों ने तुरंत से जबावी कार्रवाई करते हुए दिल्ली के लायन लीडर्स को निशाने पर ले लिया है । इसके जरिए उनकी कोशिश वास्तव में दिल्ली के लायन लीडर्स को हरियाणा से दूर करने/रखने की है । अपनी इस कोशिश में अभी वह सफल भी नजर आ रहे हैं । दिल्ली के लायन लीडर्स ने हरियाणा लायंस फोरम के फैसले का स्वागत ही किया है । लेकिन डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों का मानना/कहना है कि यह 'स्वागत' तभी तक है, जब तक कि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए दिल्ली वाले एक उम्मीदवार का चयन नहीं कर लेते हैं । राजनीति जानने/समझने वाले लोगों को लगता है कि दिल्ली में भी यदि एकमत से किसी उम्मीदवार के बारे में फैसला हो गया, तब तो बबाल नहीं होगा और हरदीप सरकारिया को कोई चुनौती नहीं मिलेगी । लेकिन यदि दिल्ली में दो उम्मीदवार हो गए, जिनके पीछे दो खेमे बने - तब हरियाणा की राजनीति में भी पलटी लगेगी । क्योंकि तब चंद्र शेखर मेहता के सामने किसी एक उम्मीदवार और उसके खेमे को समर्थन देने की मजबूरी पैदा होगी, और तब दूसरा खेमा हरियाणा में किसी दूसरे उम्मीदवार को शह और समर्थन दे देगा । हरियाणा में भी और दिल्ली में भी हर कोई जानता/समझता है कि हरियाणा में यदि दो उम्मीदवार हुए और चुनाव की नौबत आई तो हरदीप सरकारिया के लिए मामला खासा मुश्किल हो जाएगा । वास्तव में इसीलिए हरियाणा लायंस फोरम में उम्मीदवारी के लिए हरी झंडी मिल जाने के बाद भी हरदीप सरकारिया के लिए रास्ता अभी भी पूरी तरह क्लियर नहीं हुआ है ।

Friday, December 1, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में क्लब्स के प्रेसीडेंट्स को अवॉर्ड का लालच देकर अपने सामने वोट डालने के लिए मजबूर करने की कार्रवाई के जरिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में संजीव राय मेहरा की जीत को सचमुच पक्की कर सकेंगे क्या ?

नई दिल्ली । संजीव राय मेहरा को उनके अपने समर्थकों और शुभचिंतकों ने आगाह किया है कि रवि चौधरी जिस तरह से उन्हें वोट दिलवाने के लिए प्रेसीडेंट्स पर दबाव बना रहे हैं, उसके कारण प्रेसीडेंट्स के बीच गहरी नाराजगी है - और उनकी यह नाराजगी संजीव राय मेहरा की उम्मीदवारी के लिए घातक साबित हो सकती है; किंतु संजीव राय मेहरा को विश्वास है कि रवि चौधरी को चाहें जो करना पड़े, वह उन्हें चुनाव में जीत दिलवा कर ही मानेंगे । समर्थकों और शुभचिंतकों ने संजीव राय मेहरा को सावधान किया है कि रवि चौधरी का खुल्लम-खुल्ला समर्थन उन्हें फायदे की जगह नुकसान पहुँचाने का काम कर रहा है । समर्थकों व शुभचिंतकों ने संजीव राय मेहरा से कहा/बताया है कि वह रवि चौधरी से साफ-साफ बात कर लें और उनसे कहें कि वह यदि वास्तव में उनकी मदद करना चाहते हैं, तो बस एक काम यह करें कि वह उनकी कोई मदद न करें । दरअसल रवि चौधरी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में की गईं अपनी हरकतों से डिस्ट्रिक्ट में लोगों को बुरी तरह खिझाया हुआ है, तथा अलग-अलग कारणों से लोग उनसे बुरी तरह नाराज हैं । रवि चौधरी ने व्यक्तिगत स्तर पर तो कई लोगों को अपमानित तथा परेशान किया ही है, रोटरी तथा डिस्ट्रिक्ट की गरिमा व प्रतिष्ठा को गिराने/घटाने का भी जो काम किया है - उसके कारण वह डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच बुरी तरह बदनाम हुए हैं । इस बदनामी का लबादा ओढ़े जब वह संजीव राय मेहरा की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का काम करते हैं, तो संजीव राय मेहरा के पक्ष में वोट जुटने की बजाए घट और जाते हैं । रवि चौधरी की बदनामी तथा उनकी हरकतों के कारण संजीव राय मेहरा के कईएक संभावित समर्थकों ने संजीव राय मेहरा से धीरे धीरे करके दूरी बना ली है । यहाँ तक कि जिन कुछेक पूर्व गवर्नर्स को संजीव राय मेहरा के समर्थक के रूप देखा/पहचाना जाता भी रहा है, उन्होंने भी संजीव राय मेहरा से दूर दूर रहने में ही अपनी भलाई देखी/पहचानी है । संजीव राय मेहरा के नजदीकियों का कहना/बताना है कि संजीव राय मेहरा को इस बात का अहसास तो हो रहा है कि रवि चौधरी के समर्थन के कारण उनके कई समर्थक और शुभचिंतक उनसे दूर हो गए हैं, लेकिन फिर भी चूँकि उन्हें लग रहा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रवि चौधरी ही इस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में उन्हें जीत दिलवा सकते हैं - इसलिए वह रवि चौधरी का साथ छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं ।
संजीव राय मेहरा के नजदीकियों का कहना/बताना है कि रवि चौधरी जिस तरह तमाम बदनामी के बावजूद खुल्लमखुल्ला संजीव राय मेहरा की उम्मीदवारी को समर्थन दिलवाने के लिए काम कर रहे हैं, उससे संजीव राय मेहरा बहुत प्रभावित हैं और विश्वास कर रहे हैं कि रवि चौधरी न तो रोटरी इंटरनेशनल की किसी गाइडलाइन की परवाह करेंगे और न किसी बड़े नेता या पदाधिकारी के निर्देशों को मानेंगे । रवि चौधरी ने अभी से कहना शुरू भी कर दिया है कि रोटरी में उन्हें मिला क्या है, और वह तो रोटरी छोड़ ही देंगे - इसलिए उन्हें इस बात की चिंता नहीं है कि उनके किसी काम या फैसले को रोटरी इंटरनेशनल कैसे देखेगा या परखेगा ? उन्हें तो जो करना है, उसे वह करेंगे और खुल कर करेंगे । रवि चौधरी के इस रवैये में ही संजीव राय मेहरा को अपनी जीत मिलती नजर आ रही है । संजीव राय मेहरा के नजदीकियों के अनुसार, रवि चौधरी ने संजीव राय मेहरा को आश्वस्त किया है कि जिन प्रेसीडेंट्स पर उन्हें शक है कि वह उनके कहने के बावजूद संजीव राय मेहरा को वोट नहीं देंगे, उनसे तो वह अपने सामने वोट डलवायेंगे - और इस तरह वह संजीव राय मेहरा की जीत को सुनिश्चित करेंगे । डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच सुनी जा रही चर्चाओं में कहा/बताया जा रहा है कि रवि चौधरी ने क्लब्स के प्रेसीडेंट्स से कहना शुरू कर दिया है कि जो उनके सामने वोट देगा, और या वोट डालने के बाद मिलने वाली पर्ची उन्हें सौपेंगा - उसका नाम ही अवॉर्ड के लिए तय होगा । रवि चौधरी को उम्मीद है कि इस तरह से वह अधिकतर प्रेसीडेंट्स को संजीव राय मेहरा के पक्ष में वोट डालने के लिए मजबूर कर सकेंगे ।
संजीव राय मेहरा के समर्थकों व शुभचिंतकों का कहना लेकिन यह है कि रवि चौधरी की डिस्ट्रिक्ट में जिस तरह की बदनामी है, उसे देखते हुए इस बात की संभावना कम ही है कि वह चुनाव में कोई बहुत मनमानी कर पायेंगे । क्लब्स के प्रेसीडेंट्स के साथ समय समय पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में वह जिस जिस तरह की बद्तमीज़ियाँ करते रहे हैं, और उन पर अपना रौब झाड़ते रहे हैं - उसके कारण अधिकतर प्रेसीडेंट्स रवि चौधरी से नाराज़ ही हैं । कुछेक प्रेसीडेंट्स की तरफ से तो सुना भी गया है कि रवि चौधरी की तरफ से आने वाली फोन-कॉल्स को उन्होंने रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया है, ताकि जरूरत पड़ने पर रोटरी इंटरनेशनल में सुबूतों के साथ उनकी शिकायत की जा सके । उल्लेखनीय है कि पिछले से पिछले रोटरी वर्ष में रवि चौधरी जैसी हरकतें करने के कारण डिस्ट्रिक्ट 3100 के तत्कालीन गवर्नर सुनील गुप्ता को तुरंत प्रभाव से गवर्नर पद से हटा दिया गया था; उसी वर्ष डिस्ट्रिक्ट 3011 में भी चुनावी भूमिका निभाने के कारण पप्पू जीत सिंह सरना सहित तीन पूर्व गवर्नर्स को इंटरनेशनल बोर्ड से लताड़ पड़ी थी और चेतावनी दी गई थी कि डिस्ट्रिक्ट 3011 से आगे कोई चुनावी शिकायत मिली तो आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी । इस पृष्ठभूमि में इस बात की संभावना न के बराबर ही है कि रवि चौधरी की चुनावी बेईमानी की हरकत को डिस्ट्रिक्ट के किसी भी प्रभावी पूर्व गवर्नर का समर्थन मिल सकेगा, और इसलिए रवि चौधरी के लिए चुनावी बेईमानी कर पाना मुश्किल ही होगा । वरिष्ठ रोटेरियन आभा झा चौधरी के साथ बदतमीजी करने के मामले में शिकायत होने पर रोटरी इंटरनेशनल ने रवि चौधरी की हरकत की जाँच के लिए जिस तत्परता के साथ कमेटी गठित की, उससे यह तो जाहिर है ही कि रवि चौधरी की शिकायत होने पर रोटरी इंटरनेशनल तुरंत कार्रवाई करेगा - उस मामले में तो डॉक्टर सुब्रमणियन ने रवि चौधरी को बचा लिया; लेकिन चुनावी बेईमानी वाले मामले में कोई भी पूर्व गवर्नर उन्हें बचाने की कोशिश करेगा, इसकी उम्मीद कम ही है । इसी तरह के तर्कों का वास्ता देकर संजीव राय मेहरा के समर्थकों व शुभचिंतकों का कहना है कि रवि चौधरी के भरोसे चुनावी जीत पाने की कोशिश करना संजीव राय मेहरा के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है - इसलिए संजीव राय मेहरा को रवि चौधरी की हरकतों के प्रति सावधान रहना चाहिए ।

Wednesday, November 29, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3141 के विजय जालान को रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर का पद मिलने से इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए भरत पांड्या की उम्मीदवारी पर संकट मँडराया, और अशोक गुप्ता के पक्ष में मनोवैज्ञानिक माहौल बना

मुंबई/जयपुर । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए प्रस्तुत किए गए चेलैंज को मान्य करवाने के लिए अशोक गुप्ता को अपने डिस्ट्रिक्ट में मिले जोरदार समर्थन, रंजन ढींगरा के चेलैंज के वापस होने तथा रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर (आरआरएफसी) पद पर विजय जालान की नियुक्ति ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद पर भरत पांड्या के दावे पर गंभीर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने का काम किया है - जिसके चलते इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए जो लड़ाई उन्हें अभी तक आसान लग रही थी, वह उनके लिए मुश्किलोंभरी हो गई लग रही है । विजय जालान के आरआरएफसी बनने पर भरत पांड्या तथा उनके समर्थकों को अपने ही लोगों से सुनने को मिल रहा है कि रोटरी में सभी पद क्या एक ही डिस्ट्रिक्ट के लोगों को मिलेंगे ? उल्लेखनीय है कि अभी पिछले दिनों ही गुलाम वहनवती की रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी पद पर नियुक्ति हुई है, और अब उनके ही डिस्ट्रिक्ट के विजय जालान आरआरएफसी नियुक्त हो गए हैं । भरत पांड्या भी इन्हीं के डिस्ट्रिक्ट के हैं । ऐसे में, इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में भूमिका निभाने वाले आम और खास रोटेरियंस के बीच यह सवाल उठने लगा है कि रोटरी में सभी बड़े और महत्त्वपूर्ण पद किसी एक ही डिस्ट्रिक्ट के लोगों को ही क्यों मिलने चाहिए ? यह सवाल भरत पांड्या के समर्थन-आधार को डिस्टर्ब करने के साथ घटाने का काम भी करता दिख रहा है । भरत पांड्या के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि उनके डिस्ट्रिक्ट के 'जुड़वाँ भाई' जैसे डिस्ट्रिक्ट 3142 और उनके अपने डिस्ट्रिक्ट में उनके जो विरोधी इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के संदर्भ में अभी तक नैतिक व मनोवैज्ञानिक कारणों से चुप लगाए बैठे थे, वह अचानक से मुखर होने लगे हैं और 'एक ही डिस्ट्रिक्ट में सभी पद क्यों' जैसे सवाल को हवा दे कर इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी दौड़ में भरत पांड्या के सामने मुश्किलें खड़ी करने के अभियान में लग गए हैं ।
इसी के साथ-साथ भरत पांड्या और उनके चुनावी रणनीतिकारों को यह देख/जान कर तगड़ा झटका लगा है कि अशोक गुप्ता को अपने डिस्ट्रिक्ट में जोरदार समर्थन मिला है । भरत पांड्या और उनके नजदीकियों को हालाँकि यह विश्वास तो था ही कि अशोक गुप्ता के चेलैंज को अपने डिस्ट्रिक्ट में पर्याप्त समर्थन मिल जाएगा - लेकिन इतना जोरदार समर्थन मिलने की उन्हें उम्मीद नहीं थी । डिस्ट्रिक्ट के करीब 125 क्लब्स में से 110/112 क्लब्स की तरफ से अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में कॉन्करेंस मिली हैं । कॉन्करेंस देने के मामले में जो क्लब्स बचे रह गए हैं, वह भी इसलिए बचे रह गए क्योंकि उनमें से अधिकतर की कॉन्करेंस उचित समय पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय में पहुँच नहीं सकी, और बाकी कुछ क्लब्स कॉन्करेंस को अधिकृत करवाने की प्रक्रिया को पूरा नहीं कर सके । इस स्थिति ने जता/दिखा दिया है कि डिस्ट्रिक्ट के मामलों में लोगों की राय और पक्ष भले ही अलग अलग रहते रहे हों, लेकिन अशोक गुप्ता की इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की उम्मीदवारी के मामले में पूरा डिस्ट्रिक्ट उनके समर्थन में है । यह परिदृश्य भरत पांड्या की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं के लिए चिंता का विषय इसलिए है, क्योंकि पहली बात तो यह कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि अशोक गुप्ता को अपने डिस्ट्रिक्ट में इतना व्यापक समर्थन प्राप्त है, और दूसरी बात यह कि अशोक गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट में अशोक गुप्ता विरोधी जिन नेताओं पर वह भरोसा कर रहे थे - वह नेता निष्प्रभावी साबित हुए हैं और उनके भरोसे पर खरे नहीं उतरे हैं । इससे भरत पांड्या की उम्मीदवारी के समर्थक नेता यह सोचने के लिए मजबूर हुए हैं कि वह कहीं अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन-आधार की पहुँच को कम आँकने की गलती तो नहीं कर रहे हैं, और अशोक गुप्ता के साथ निजी खुन्नस रखने वाले विरोधियों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा तो नहीं कर रहे हैं ?
भरत पांड्या की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की रणनीति दरअसल नकारात्मक तिकड़मों पर ही आधारित रही है । अशोक गुप्ता को घेर लेने, उन्हें अपने ही डिस्ट्रिक्ट में 'कमजोर' करने/दिखाने तथा उनके समर्थन-आधार में विभाजन करने पर ही भरत पांड्या की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं का जोर रहा है । इसके तहत अशोक गुप्ता पर रोटरी रिसोर्स ग्रुप के पदाधिकारी के रूप में काम करने पर रोक लगा दी गई, जिसके चलते डिस्ट्रिक्ट 3080 में आयोजित हुए इंटरसिटी सेमीनार में मुख्य अतिथि के रूप में मिले निमंत्रण को स्वीकार करने के बाद उन्हें वापस करने के लिए मजबूर होना पड़ा । अशोक गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट में कोशिश की गई कि उन्हें अपनी उम्मीदवारी के समर्थन में ज्यादा कॉन्करेंस न मिल सकें; भरत पांड्या की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने यह तो मान लिया था कि अशोक गुप्ता अपनी उम्मीदवारी को मान्य करवाने के लिए जरूरी कॉन्करेंस तो जुटा ही लेंगे, लेकिन उनकी घेरेबंदी के जरिए कोशिश की गई थी कि उन्हें ज्यादा कॉन्करेंस न मिलें - ताकि जोन के दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों के बीच यह प्रचारित किया जा सके कि अशोक गुप्ता को तो अपने ही डिस्ट्रिक्ट में समर्थन नहीं है, और उन्होंने तो बस जैसे-तैसे जरूरी कॉन्करेंस जुटाई हैं । अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में दर्ज हुईं 90 प्रतिशत से अधिक क्लब्स की कॉन्करेंस ने लेकिन भरत पांड्या की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं की चाल को फेल कर दिया है । भरत पांड्या की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन-आधार में विभाजन करने के लिए रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी के जरिए बड़ी चाल चली थी, लेकिन रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी के वापस हो जाने से उनकी उस चाल ने बीच रास्ते में ही दम तोड़ दिया है ।
मजे की बात यह देखने में आई है कि अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के खिलाफ चली गईं नकारात्मक चालें स्वतः ही फेल होती गईं हैं; उन्हें फेल करने के लिए अशोक गुप्ता और या उनके समर्थक नेताओं को कुछ करना नहीं पड़ा है । अशोक गुप्ता और उनके समर्थकों पर गंभीर आरोप बल्कि यही है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को उन्हें जिस गंभीरता से लेना चाहिए, उतनी गंभीरता से वह ले नहीं रहे हैं - यदि ले रहे हैं, तो लेते हुए 'दिख' नहीं रहे हैं । संभवतः यह भरत पांड्या के समर्थक नेताओं के द्वारा की गई उनकी घेराबंदी का नतीजा भी हो । इसलिए अशोक गुप्ता और उनके समर्थकों द्वारा बिना कुछ किए ही भरत पांड्या के समर्थक नेताओं की चालबाजियों के फेल होने को किस्मत की बात के रूप में भी देखा/पहचाना जा रहा है । लोगों को लग रहा है कि अशोक गुप्ता और उनके समर्थकों की तुलना में तो उनकी किस्मत ज्यादा तेज चल रही है । इससे लोगों को यह उम्मीद भी बँधी है कि इसे एक सकारात्मक संदेश के रूप में लेते/देखते हुए अशोक गुप्ता और उनके समर्थक/साथी अब ज्यादा जोश और तैयारी के साथ जुटेंगे । भरत पांड्या के समर्थक नेताओं के लिए मुसीबत और चिंता की बात वास्तव में यही है कि हाल-फिलहाल की घटनाओं से अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में जो एक वातावरण बना है, उससे उनके समर्थक नेताओं में खासा जोश पैदा हुआ है और उन्हें लगने लगा है कि माहौल उनके पक्ष में है - उन्हें जरूरत सिर्फ उसे संयोजित व संगठित करने की है । समय ने भरत पांड्या और उनके समर्थक नेताओं के सामने दोहरी मुसीबत खड़ी कर दी है - एक तरफ तो अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए चुनौती बनती स्थितियाँ खुद-ब-खुद सुलझती जा रही हैं और उनके रास्ते की बाधाएँ अपने आप से दूर हो रही हैं; और दूसरी तरफ विजय जालान को आरआरएफसी का पद मिलने से उनके लिए लोगों को यह समझाना मुश्किल हुआ है कि रोटरी के सभी बड़े और महत्त्वपूर्ण पद एक ही डिस्ट्रिक्ट के लोगों को क्यों मिलने चाहिए ? इसलिए विजय जालान के रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर बनने ने भरत पांड्या की इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की उम्मीदवारी के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है ।