Tuesday, November 6, 2012

कल पता चलेगा कि ललित खन्ना के खिलाफ मुकेश अरनेजा के पास सचमुच कोई तिकड़म है या केके गुप्ता की रणनीति के सामने उनकी सारी तिकड़मबाजी हवा हो गई है

नई दिल्ली | ललित खन्ना क्या डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के वास्ते अपनी उम्मीदवारी के लिए अपने क्लब की हरी झंडी प्राप्त कर लेंगे ? इस बात में यूँ तो किसी को भी कोई शक नहीं होना चाहिए, क्योंकि क्लब में ललित खन्ना की उम्मीदवारी को लेकर पर्याप्त समर्थन है; लेकिन फिर भी यदि यह सवाल चर्चा में है तो इसका कारण मुकेश अरनेजा का रवैया है | यह सच है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी के खिलाफ मुकेश अरनेजा कुछ भी करते हुए नहीं दिखे हैं: लेकिन सच यह भी है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी के समर्थन में भी मुकेश अरनेजा कुछ करते हुए नहीं दिखे हैं | यह दूसरा सच इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मुकेश अरनेजा चुपचाप बैठ कर तमाशा देखने वाले लोगों में से नहीं हैं; और ललित खन्ना उनके थोड़े से खास लोगों में एक रहे हैं | दरअसल इसी नाते से लोगों को उम्मीद रही कि मुकेश अरनेजा हर तरह से ललित खन्ना की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के अभियान में जुटेंगे | पर जब मुकेश अरनेजा ऐसा करते हुए नहीं नज़र आये तो सभी का माथा ठनका और तब पता चला कि मुकेश अरनेजा तो ललित खन्ना की उम्मीदवारी के पूरी तरह खिलाफ हैं |
मुकेश अरनेजा के खिलाफ होने के बावजूद ललित खन्ना ने अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में अपने क्लब में हालाँकि समर्थन जुटा लिया है | क्लब के अध्यक्ष राकेश मल्होत्रा यूँ तो मुकेश अरनेजा के आदमी के रूप में जाने/पहचाने जाते हैं - लेकिन इस मामले में वह भी मुकेश अरनेजा के साथ नहीं, बल्कि ललित खन्ना के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं | देखा/पाया जा रहा है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी का विरोध करने के कारण मुकेश अरनेजा अपने ही क्लब में अलग-थलग हो गए हैं और अकेले पड़ गए हैं | इसके बावजूद, ललित खन्ना की उम्मीदवारी को लेकर संशय यदि बना हुआ है तो इसका कारण यही है कि मुकेश अरनेजा को आसानी से हार मानने वाला नहीं माना जाता है | लोगों को लगता है कि मुकेश अरनेजा क्लब की हरी झंडी ललित खन्ना को आसानी से नहीं मिलने देंगे और उन्होंने अवश्य ही कोई तिकड़म सोच रखी होगी, जिसके भरोसे वह ललित खन्ना का रास्ता रोक लेंगे | ललित खन्ना ने भी अपनी उम्मीदवारी को क्लब के समर्थन के बाबत हालाँकि चाक-चौबंद व्यवस्था की हुई है | मुकेश अरनेजा की तिकड़मों से निपटने के लिए ललित खन्ना ने केके गुप्ता से पहले ही तार जोड़ लिया हुआ है | केके गुप्ता ने ललित खन्ना की उम्मीदवारी के संदर्भ में मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की चालबाजियों को जिस तरह से विफल किया और ललित खन्ना के समर्थन में विभिन्न खेमों में बँटे क्लब को एकजुट किया है, उसके कारण मुकेश अरनेजा को और झटका लगा है |
ललित खन्ना की उम्मीदवारी मुकेश अरनेजा के लिए दरअसल इसलिए भी गंभीर चुनौती बनी है, क्योंकि ललित खन्ना की उम्मीदवारी के नाम पर क्लब में जो राजनीति हुई है उसमें मुकेश अरनेजा यदि अलग-थलग और अकेले पड़े हैं तो केके गुप्ता की साख तो बनी ही है, साथ ही उनकी चौधराहट भी स्थापित हुई है | मुकेश अरनेजा जानते हैं कि उनके विरोध के बावजूद - उनकी और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल की तमाम चालबाजियों के बावजूद - केके गुप्ता ने जिस तरह ललित खन्ना की उम्मीदवारी को क्लब से लेकर इंटरनेशनल डायरेक्टर तक के यहाँ स्वीकार्य बनाया, उससे लोगों को केके गुप्ता के रणनीतिक कौशल का और उनकी पहुँच का सुबूत मिला है | ललित खन्ना की उम्मीदवारी के नाम पर जो राजनीति हुई, उसके कारण क्लब में केके गुप्ता की जो धाक बनी है उसे देख/जान कर मुकेश अरनेजा को डर यह पैदा हुआ है कि केके गुप्ता अब इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चयन करने के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की उनकी उम्मीदवारी में रोड़ा डालेंगे |
केके गुप्ता ने इस मामले को उठाना शुरू भी कर दिया है | केके गुप्ता ने क्लब के सदस्यों के बीच उन चर्चाओं पर गौर करने की जरूरत पर बल दिया है जिनमें कहा/बताया गया है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चयन करने के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की अपनी उम्मीदवारी का इस्तेमाल करके मुकेश अरनेजा सौदेबाजी करने की जुगाड़ में हैं | केके गुप्ता का कहना है कि इस तरह की बातों से क्लब का नाम बदनाम होता है और किसी मुकेश अरनेजा को यह हक़ नहीं दिया जाना चाहिए कि वह अपने निजी स्वार्थ में क्लब का नाम बदनाम करे | केके गुप्ता ने लोगों को याद दिलाया है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चयन करने के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की उम्मीदवारी के नाम पर मुकेश अरनेजा पहले भी सौदेबाजी कर चुके हैं |        
केके गुप्ता के इन तेवरों ने मुकेश अरनेजा को वास्तव में संकट में डाल दिया है | केके गुप्ता के इन तेवरों में मुकेश अरनेजा अपने लिए जिस संकट को देख/पहचान रहे हैं, उसकी जड़ में वह ललित खन्ना की उम्मीदवारी को ही पा रहे हैं | मुकेश अरनेजा के नजदीकियों की बातों पर विश्वास करें तो मुकेश अरनेजा मान रहे हैं कि वह यदि ललित खन्ना की उम्मीदवारी में किसी भी तरह फच्चर फँसा दें, तो उनके सारे संकट समाप्त हो जायेंगे | मुकेश अरनेजा के एक नजदीकी ने कुछ दिन पहले इन पंक्तियों के लेखक से कहा था कि क्लब में ललित खन्ना के आलावा एक और उम्मीदवार लाने की तैयारी की जा रही है, ताकि उम्मीदवारी के नाम पर झगड़ा दिखा कर ललित खन्ना की उम्मीदवारी को ख़त्म कर/करा दिया जा सके | अभी तक ऐसा नहीं हो सका है - इससे यह तो पता चल रहा है कि मुकेश अरनेजा की कोई तिकड़म काम नहीं कर रही है | लेकिन इससे यह भी पता चल रहा है कि मुकेश अरनेजा ने अभी उम्मीद नहीं छोड़ी है और ललित खन्ना की उम्मीदवारी में रोड़ा डालने की कोई न कोई तिकड़म लगा रहे होंगे | यह देखना दिलचस्प होगा कि तिकड़मबाज मुकेश अरनेजा के पास सचमुच कोई तिकड़म है या केके गुप्ता की रणनीति के सामने उनकी सारी तिकड़मबाजी हवा हो गई है |

Monday, October 29, 2012

रिक्शेवाले को भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुनवा देने का दावा करने वाले मुकेश अरनेजा को इस बार के चुनाव से पहले 'बुखार' चढ़ा और 'दस्त' लगे

नई दिल्ली | आलोक गुप्ता के क्लब के चार्टर डे समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किये गए मुकेश अरनेजा ने अनुपस्थित रह कर जेके गौड़ को जहाँ राहत और बढ़त दी, वहीं डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को आश्चर्य में डाला | हर किसी को हैरानी हुई है कि रग-रग से राजनीति करने वाले मुकेश अरनेजा ने राजनीति करने का इतना सुनहरा मौका छोड़ क्यों दिया ? कुछेक लोगों ने अनुमान भी लगाया कि मुकेश अरनेजा शायद सुधर गए हैं और अब उन्होंने राजनीति करने से तौबा कर ली है - लेकिन जिन लोगों ने ऐसा अनुमान लगाया, उन्होंने ही फिर स्वीकार भी किया कि मुकेश अरनेजा सुधरने वाली चीज़ हैं नहीं | मुकेश अरनेजा ने राजनीति यदि छोड़ दी, तो राजनीति तो बेचारी अनाथ हो जायेगी | मुकेश अरनेजा को जानने वाले लोगों का कहना है कि मुकेश अरनेजा में लाख ऐब सही, लेकिन इतने निर्दयी वह नहीं हो सकते कि अपनी 'जान' को वह अनाथ हो जाने दें | राजनीति उनकी जान है; या कहें कि राजनीति में ही उनकी जान बसती है |
तब फिर, आलोक गुप्ता के क्लब के समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आकर राजनीति करने का जो मौका उनके सामने था - उसे उन्होंने गवाँ क्यों दिया ?
या, इस मौके को गवाने के पीछे उनकी कोई राजनीति थी ?
यह जानना/समझना दिलचस्प होगा कि मुकेश अरनेजा ने आलोक गुप्ता के क्लब के समारोह में आना स्वीकार करके ऐन मौके पर गच्चा क्यों दे दिया ? आलोक गुप्ता ने मुकेश अरनेजा के न आने का लोगों को जो कारण बताया उसके अनुसार मुकेश अरनेजा बुखार की चपेट में आ जाने के कारण समारोह में नहीं पहुँच सके | ऐन मौके पर मुकेश अरनेजा ने आलोक गुप्ता को ऐसा ही बताया था | रोटरी क्लब गाज़ियाबाद आईडियल के अध्यक्ष को मुकेश अरनेजा ने न आने का कारण लेकिन दस्त होना बताया | सयानों ने पहले से ही कहा/बताया हुआ है कि झूठ बोलने वाला अक्सर यह गलती करता है कि वह यह याद नहीं रख पाता कि पहले उसने क्या कहा है | मुकेश अरनेजा ने जिस तरह न आने का कारण किसी को बुखार आना तो किसी को दस्त होना बताया - उससे जाहिर है कि मुकेश अरनेजा ने झूठ बोला | तो क्या मुकेश अरनेजा इसलिए नहीं आये क्योंकि उन्होंने जाना/समझा कि वह आये तो मुसीबत में फँसेंगे ? मुसीबत में फँसने से बचने की कोशिश में ही उन्होंने आलोक गुप्ता के क्लब के समारोह से दूर रहने का फैसला किया - और इसका कारण किसी को कुछ तो किसी को कुछ और बताया | यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि आलोक गुप्ता के क्लब के अभी तक जितने भी चार्टर डे समारोह हुए हैं, मुकेश अरनेजा सभी में उपस्थित रहे हैं | पिछले दिनों आलोक गुप्ता के क्लब के अधिष्ठापन समारोह में दिए अपने भाषण में मुकेश अरनेजा ने खुद भी इस बात का खुलासा किया था और घोषणा की थी कि वह आगे भी - आमंत्रित न भी किये जाये, तो भी - इस क्लब के चार्टर डे समारोह में आते रहेंगे | लेकिन जब मौका आया तो आमंत्रित होने और मुख्य अतिथि होना स्वीकार करने के बावजूद वह नहीं आये | किसी को उन्होंने बताया कि उन्हें बुखार आ गया तो किसी को बताया कि उन्हें दस्त लग गए |
यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि पहले कई बार ऐसे मौके आये हैं - और यह बात खुद मुकेश अरनेजा ने ही लोगों को बताई है - कि बुखार में होने के बावजूद मुकेश अरनेजा कार्यक्रमों में शामिल हुए हैं | जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि राजनीति उनकी जान है या कहें कि राजनीति में उनकी जान बसती है - जिस कारण कोई बुखार या ख़राब तबियत उन्हें कार्यक्रम में शामिल होने से नहीं रोक सका है | इस बार, लेकिन पता नहीं 'कैसा' बुखार था या 'कैसे' दस्त थे कि मुकेश अरनेजा को कार्यक्रम में शामिल होना स्थगित करना पड़ा | मुकेश अरनेजा को जानने वाले लोगों को लगता है कि 'बुखार' और 'दस्त' की आड़ में मुकेश अरनेजा ने राजनीति से बचने की कोशिश नहीं की है, बल्कि राजनीति की है - और उनकी इस राजनीति का शिकार बने आलोक गुप्ता | उल्लेखनीय है कि आलोक गुप्ता डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की अपनी उम्मीदवारी के लिए मुकेश अरनेजा की मदद पर निर्भर हैं और अलग-अलग मौकों पर मुकेश अरनेजा के साथ अपनी नज़दीकी दिखाने का प्रयास करते रहे हैं | अपने क्लब के चार्टर डे समारोह में मुकेश अरनेजा को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करने के पीछे भी आलोक गुप्ता का यही उद्देश्य देखा/पहचाना जा रहा था | इस वर्ष मुकेश अरनेजा हालाँकि दावा तो करते रहे हैं कि वह चुनाव के पचड़े में नहीं पड़ेंगे लेकिन आलोक गुप्ता के क्लब के चार्टर डे समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने की स्वीकृति देकर उन्होंने एक बार फिर जता/बता दिया कि उनके कहे हुए पर जो विश्वास करे उससे बड़ा मूर्ख कोई नहीं होगा |
आलोक गुप्ता के क्लब के चार्टर डे समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने की अनुमति देकर मुकेश अरनेजा चुनाव के पचड़े में न पड़ने के अपने ही दावे से पलटे - लेकिन फिर जल्दी ही जैसे ही उन्हें यह लगा कि उनका यह दांव कहीं उल्टा न पड़ जाये, लिहाजा वह एक बार फिर पलट गए और समारोह में पहुँचे ही नहीं | पिछली बार मुकेश अरनेजा ने रवि चौधरी को जितवाने का ठेका लिया था और सार्वजानिक रूप से घोषणा की थी कि वह तो किसी रिक्शेवाले को भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुनवा सकते हैं | इस घोषणा के बावजूद वह रवि चौधरी को चुनाव नहीं जितवा सके और अपनी मिट्टी कुटवा बैठे | मुकेश अरनेजा के समर्थन के बावजूद रवि चौधरी का क्या हुआ, यह देखते हुए भी आलोक गुप्ता ने मुकेश अरनेजा के समर्थन पर निर्भर होने का फैसला किया - यह आलोक गुप्ता का साहस है; लेकिन मुकेश अरनेजा इस बार वह गलती नहीं करना चाहते हैं जो उन्होंने पिछली बार की | आलोक गुप्ता ने तो हर संभव कोशिश की है कि मुकेश अरनेजा उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में 'दिखें' - लेकिन मुकेश अरनेजा ने इससे बचने का ही प्रयास किया है | आलोक गुप्ता के क्लब के समारोह में शामिल होने के ऐन मौके पर उन्हें जो बुखार आया या दस्त लगे - उसके पीछे के प्रेशर में उनके इसी प्रयास को देखा/पहचाना गया है |
आलोक गुप्ता के क्लब के समारोह में आने से बचने की मुकेश अरनेजा की कार्रवाई ने जेके गौड़ को न सिर्फ बड़ी राहत दी, बल्कि बढ़त भी दी | दरअसल जेके गौड़ भी मुकेश अरनेजा के समर्थन का दावा करते हैं | मुकेश अरनेजा के साथ जेके गौड़ के सहयोगात्मक संबंध रहे भी हैं - जिन्हें ध्यान में रखते हुए लोगों को उनके दावे में सच्चाई भी महसूस होती है | लेकिन आलोक गुप्ता के क्लब के समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में मुकेश अरनेजा की उपस्थिति जेके गौड़ के दावे को संदेह के घेरे में लाती और उनकी स्थिति को कमजोर बनाती | आलोक गुप्ता के क्लब के समारोह में न शामिल होकर मुकेश अरनेजा ने जेके गौड़ के दावे को विश्वसनीय बना दिया है | मुकेश अरनेजा की इस कार्रवाई में लोगों ने यह सन्देश भी पढ़ा कि मुकेश अरनेजा की निगाह में आलोक गुप्ता के मुकाबले जेके गौड़ की स्थिति ज्यादा मजबूत है - इसीलिये मुकेश अरनेजा ने आलोक गुप्ता के साथ खड़े दिखने से बचने का प्रयास किया | आलोक गुप्ता को लोग समय-समय पर सावधान करते रहे हैं कि मुकेश अरनेजा के भरोसे रहोगे तो धोखा ही खाओगे - आलोक गुप्ता ने लेकिन किसी की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया और अंततः धोखा खाया |
मुकेश अरनेजा का सहारा लेकर जेके गौड़ से आगे निकलने की आलोक गुप्ता की रणनीति को भले ही चोट पहुँची हो, लेकिन सुधीर मंगला के समर्थक समझे जाने वाले लोगों को अपने साथ दिखा कर आलोक गुप्ता ने सुधीर मंगला को तगड़ी चोट दी है | संभवतः सुधीर मंगला को इसका डर था - इसीलिये आलोक गुप्ता के क्लब के इस समारोह को न होने देने के लिए उन्होंने रोड़े अटकाने की कोशिश की थी | सुधीर मंगला के लिए निराशा की बात यह रही कि वह इस समारोह को होने से नहीं रोक सके | सुधीर मंगला के लिए दोहरी चोट यह रही कि उनके समर्थक के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले कई लोग आलोक गुप्ता के साथ खड़े नज़र आये | चार्टर डे समारोह के जरिये हुई राजनीति में आलोक गुप्ता को जो मिलाजुला नतीजा प्राप्त हुआ है - उसमें उनके लिए भी सन्देश छिपा है : जहाँ सुधीर मंगला से निपटने में उन्होंने अपने से प्रयास किया, उसमें उन्हें सफलता मिली; लेकिन जहाँ जेके गौड़ से निपटने में उन्होंने मुकेश अरनेजा की मदद ली, वहाँ उन्हें झटका लगा और मुकेश अरनेजा उनकी मदद करने की बजाये जेके गौड़ की मदद करते हुए नज़र आये |

Sunday, October 7, 2012

आलोक गुप्ता ने सुधीर मंगला के 'कार्ड्स' छीन कर सुधीर मंगला को उनके अपने ही लोगों के बीच बेगाना सा बना दिया है

नई दिल्ली | आलोक गुप्ता ने रिश्तेदारी और बनियावाद के सुधीर मंगला के कार्ड्स को ऐसा छीना है कि विकास गुप्ता और राजीव गुप्ता की सक्रियता के साथ हुए कार्यक्रम का सुधीर मंगला को निमंत्रण तक नहीं मिला | उल्लेखनीय है कि सुधीर मंगला ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अपनी उम्मीदवारी का अभियान 'रिश्तेदारी' की नींव पर खड़ा करने का प्रयास किया था | प्रयास उनका अच्छा था - क्योंकि रोटरी की चुनावी राजनीति में उम्मीदवार को समय इतना 'कम' मिलता है कि दूसरी चीजों/बातों से मतदाताओं के बीच पैठ बनाना थोड़ा मुश्किल होता है; और ऐसे में 'रिश्तेदारी' और 'जाति' काम आती है | तीन वर्ष पहले रमेश अग्रवाल ने इसका बड़े सुनियोजित तरीके से इस्तेमाल किया था | उनसे पहले भी हालाँकि कई लोगों ने रिश्तेदारी और जाति का सहारा लिया था और सफल हुए थे - लेकिन रमेश अग्रवाल ने जिस खुले तौर पर इनका इस्तेमाल किया, उसका असर यह हुआ कि इनके इस्तेमाल को बुरा मानना/समझना कुछ दूर हुआ | रमेश अग्रवाल की सफलता से प्रेरित होकर विनोद बंसल ने इनका और भी होशियारी से इस्तेमाल किया | पिछले वर्ष का मामला बिल्कुल अलग था | पिछले वर्ष चूँकि सत्ता खेमे की पक्षपातपूर्ण मनमानी और खुली बदमाशी से लड़ाई थी, इसलिए रिश्तेदारी और जाति का मामला पीछे छूट गया था | इस वर्ष चूँकि कोई खास मुद्दा नहीं है, इसलिए उम्मीदवार हवा में हाथ-पैर चला रहे हैं | ऐसे में, सुधीर मंगला ने रिश्तेदारी और जाति का सहारा लेने का जो दांव चला, वह बड़ा हिट रहा | यह हिट इसलिए भी रहा क्योंकि सुधीर मंगला इस दांव को लेकर बहुत सक्रिय भी हुए और जब सक्रिय हुए तो लोगों के बीच उन्होंने अपने रिश्तेदारों की पहचान भी करवाई |
सुधीर मंगला के इस हिट अभियान को लेकिन आलोक गुप्ता ने ग्रहण लगा दिया है | आलोक गुप्ता ने भी उन्हीं कार्ड्स को इस्तेमाल करना शुरू किया, जो सुधीर मंगला इस्तेमाल कर रहे थे, तो नतीजा यह निकलता दिखा कि सुधीर मंगला अपने ही लोगों के बीच बेगाने हो गए | सुधीर मंगला के लिए सबसे बड़ा झटका यह रहा कि उन्हें विकास गुप्ता और राजीव गुप्ता की पहलभरी सक्रियता के साथ हुए कार्यक्रम का निमंत्रण तक नहीं मिला | सुधीर मंगला के लिए यह झटका इसलिए और बड़ा रहा क्योंकि इस कार्यक्रम में आलोक गुप्ता उपस्थित थे - न सिर्फ उपस्थित थे, बल्कि आयोजक लोगों के साथ उनकी नजदीकी भी दिख रही थी | उक्त कार्यक्रम में हालंकि डॉक्टर सुब्रमणियन और सरोज जोशी के रूप में दूसरे उम्मीदवार भी थे, लेकिन सुधीर मंगला की अनुपस्थिति के कुछ अलग ही मतलब निकाले गए | लोगों को जब यह पता चला कि सुधीर मंगला को इस कार्यक्रम का निमंत्रण ही नहीं दिया गया, तब उस 'मतलब' के अर्थ और बड़े हो गए | यह तो पता नहीं चल पाया कि सुधीर मंगला को उक्त कार्यक्रम का निमंत्रण न मिलने के पीछे आलोक गुप्ता का कोई 'मूव' काम कर रहा था या नहीं; लेकिन जो 'दिख' रहा था उससे लोगों के बीच यह संदेश जरूर गया कि जिन कार्ड्स के भरोसे सुधीर मंगला अपनी उम्मीदवारी के समर्थन का आधार बना रहे थे, वह कार्ड्स अब आलोक गुप्ता के हाथों में हैं | इससे पहले फरीदाबाद में सुधीर मंगला द्धारा आयोजित मीटिंग फ्लॉप हो चुकी थी और गाजियाबाद में चार अक्टूबर को प्रस्तावित मीटिंग भी खतरे में नजर आ रही थी - जिसे खतरे से उबारने के लिए उसे चार की बजाये आठ अक्टूबर को आयोजित करने का फैसला लिया जा रहा था | फरीदाबाद और गाजियाबाद में सुधीर मंगला को जो झटका लगा, उसके लिए सुधीर मंगला ने औपचारिक रूप से तो टी20 विश्व कप को जिम्मेदार ठहराया, लेकिन अपने निशाने पर उन्होंने आलोक गुप्ता को लेना शुरू किया |
सुधीर मंगला ने जिस तरह आलोक गुप्ता को निशाने पर लेना शुरू किया है, उससे लोगों को यही लगा है कि पहले फरीदाबाद में, फिर दिल्ली में और फिर गाजियाबाद में सुधीर मंगला को जो झटका लगा है - सुधीर मंगला उसके लिए आलोक गुप्ता को ही जिम्मेदार मानते हैं | डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई को दिलचस्पी के साथ देखने वाले लोगों का मानना और कहना है कि आलोक गुप्ता ने सुधीर मंगला को कितना क्या नुकसान पहुँचाया है - यह कहना तो अभी मुश्किल है, लेकिन यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि सुधीर मंगला के 'कार्ड्स' आलोक गुप्ता ने अवश्य ही उनसे छीन लिए हैं | आलोक गुप्ता को चूँकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल का नजदीकी समझा जाता है, और इन कार्ड्स को इस्तेमाल करने की महारत का ख़िताब चूँकि रमेश अग्रवाल के पास ही है - इसलिए यह कहने वालों की भी कमी नहीं है कि सुधीर मंगला से इन 'कार्ड्स' को छीनने में कहीं रमेश अग्रवाल ने तो आलोक गुप्ता की मदद नहीं की है ?
आलोक गुप्ता ने सुधीर मंगला के समर्थन-आधार पर जिस तरह का 'हमला' बोला है तथा जिस तरह उनके 'कार्ड्स' अपने हाथ में ले लिए हैं, सुधीर मंगला उससे गंभीर दवाब में आ गए हैं | आलोक गुप्ता की इस कार्रवाई के पीछे रमेश अग्रवाल के होने की संभावनाओं ने तो उन्हें और चिंता में डाल दिया है | आलोक गुप्ता के इस हमले से निपटने के लिए सुधीर मंगला ने फ़िलहाल तो जेके गौड़ को अपनी ढाल बनाया है | आलोक गुप्ता ज्यादा बढ़त न बना सकें, इसके लिए सुधीर मंगला ने कहना/बताना शुरू किया है कि आलोक गुप्ता की इस कार्रवाई से जेके गौड़ को ही फायदा होगा | सुधीर मंगला की निगाह दरअसल ऐसे लोगों पर है जो किसी न किसी कारण से जेके गौड़ के साथ नहीं जाएँगे | 'ऐसे' लोगों को आलोक गुप्ता अपने पक्ष में न कर लें, इसलिए ही सुधीर मंगला ने लोगों को यह बताना/समझाना शुरू किया है कि आलोक गुप्ता के झांसे में मत आना - क्योंकि यदि आयोगे तो जेके गौड़ को फायदा पहुँचेगा | आलोक गुप्ता और उनके समर्थक व शुभचिंतक लेकिन फरीदाबाद, दिल्ली और गाजियाबाद में सुधीर मंगला को मिले झटके से उत्साहित हैं और मान कर चल रहे हैं कि आलोक गुप्ता ने सुधीर मंगला के 'कार्ड्स' अभी तो छीने ही हैं - सुधीर मंगला जब अभी ही दबाव में आ गए हैं तो आगे जब वह उन कार्ड्स को और ज्यादा तैयारी के साथ इस्तेमाल करना शुरू करेंगे, तब क्या होगा ? सुधीर मंगला और आलोक गुप्ता के बीच समर्थन-आधार को लेकर यह जो लड़ाई छिड़ी है, उसने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई को और रोचक बना दिया है |

Friday, October 5, 2012

डॉक्टर सुब्रमणियन ने अपनी सक्रियता से लोगों पर जो छाप छोड़ी है - उसने उनकी उम्मीदवारी को लोगों के बीच गंभीर तो बनाया ही है, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी के चुनाव को वास्तव में दिलचस्प भी बना दिया है

नई दिल्ली | डॉक्टर सुब्रमणियन ने जिस तेजी और जिस सक्रियता के साथ अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का काम शुरू किया है, उसने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों को अचरज में तो डाला ही है, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की राजनीति को दिलचस्प भी बना दिया है | डॉक्टर सुब्रमणियन अभी तक चूँकि सक्रिय नहीं हुए थे, और अपनी उम्मीदवारी को लेकर जरा भी गंभीर नज़र नहीं आ रहे थे - उसके कारण हर किसी को लग रहा था कि डॉक्टर सुब्रमणियन के लिए चुनावी तौर-तरीकों का पालन करना मुश्किल ही होगा और इस बजह से उनके लिए लोगों का समर्थन जुटा पाना एक बड़ी चुनौती होगा | लेकिन पिछले करीब एक महीने में डॉक्टर सुब्रमणियन ने जो किया है उससे लोगों को लगने लगा है कि डॉक्टर सुब्रमणियन में चुनावी चुनौतियों से निपटने का दम भी है |
डॉक्टर सुब्रमणियन ने इस बीच एक बड़ा काम पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रंजन ढींगरा को साधने और अपने पक्ष में करने का किया है | रंजन ढींगरा उनके ही क्लब के सदस्य हैं और डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच यह चर्चा बहुत आम रही थी कि रंजन ढींगरा का डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी से खुला विरोध है | रंजन ढींगरा ने रवि भाटिया की उम्मीदवारी का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया था और रवि भाटिया की उम्मीदवारी की जोरदार वकालत की थी | बात सिर्फ इतनी ही नहीं थी कि रंजन ढींगरा का समर्थन डॉक्टर सुब्रमणियन की बजाये रवि भाटिया को था - यह बात इस कारण से और बड़ी हो गई थी कि डॉक्टर सुब्रमणियन के समर्थकों ने बढ़त बनाने के लिए रंजन ढींगरा को अलग-थलग तक कर दिया था | रंजन ढींगरा के डॉक्टर सुब्रमणियन के साथ कुछ पुराने झंझट भी सुने/बताये जाते थे | इन्हीं बातों के चलते माना जा रहा था कि रंजन ढींगरा को जब भी मौका मिलेगा, वह डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने का प्रयास जरूर ही करेंगे - वह नहीं करेंगे, तो उनका नाम लेकर दूसरे करेंगे | डॉक्टर सुब्रमणियन ने लेकिन इस आशंका को रहने ही नहीं दिया और सभी को हैरान करते हुए रंजन ढींगरा को अपने साथ कर लिया | इससे भी बड़ी बात जो डॉक्टर सुब्रमणियन ने की - वह यह कि उन्होंने न सिर्फ रंजन ढींगरा को अपने साथ कर लिया, बल्कि मौका निकाल/बना कर लोगों को यह 'दिखा' भी दिया कि रंजन ढींगरा उनकी उनके साथ हैं | राजनीति में, खासकर चुनावी राजनीति में 'होने' से ज्यादा 'दिखने' का जो असर होता है - डॉक्टर सुब्रमणियन ने उसे समझा/पहचाना और उसे क्रियान्वित किया | निश्चित रूप से यह उन्होंने एक बड़ा काम किया |
रंजन ढींगरा के साथ डॉक्टर सुब्रमणियन ने संबंध सुधारने की जरूरत को समझा और फिर संबंध सुधार लिए और लोगों को सुधरे हुए संबंध 'दिखा' भी दिए - प्रतीकात्मक रूप से इस बात के बड़े अर्थ हैं | इस प्रसंग से स्पष्ट है कि डॉक्टर सुब्रमणियन ने चुनाव में असर डालने और/या डाल सकने वाली छोटी-छोटी बातों को गंभीरता से पहचाना है, और उन्हें अपने अनुकूल बनाने के प्रयास किए हैं तथा कामयाब होने के बाद अपनी कामयाबी को 'प्रदर्शित' करने पर भी ध्यान दिया है | रंजन ढींगरा ही नहीं, और कई लोग भी अचानक से डॉक्टर सुब्रमणियन की सक्रियता और उनकी सक्रियता के पीछे की सोच व तैयारी की तारीफ करने लगे हैं | जो लोग अभी कुछ समय पहले तक यह शिकायत करते हुए नहीं थकते थे कि डॉक्टर सुब्रमणियन को न तो चुनावी राजनीति की जरूरतों के बारे में पता है और न ही वह पता करने की जरूरत को ही समझ रहे हैं; वही लोग अब बताते हैं कि डॉक्टर सुब्रमणियन बड़ी होशियारी से चाल चल रहे हैं और लोगों पर अपनी छाप छोड़ रहे हैं | कई लोग जो पहले शिकायत करते थे कि डॉक्टर सुब्रमणियन उन्हें पहचानते ही नहीं हैं और या पर्याप्त तवज्जो नहीं दे रहे हैं, अब इस बात पर अपनी खुशी जताते हैं कि डॉक्टर सुब्रमणियन का अच्छा होमवर्क है | जिन भी लोगों से डॉक्टर सुब्रमणियन मिले हैं या जिनसे उनकी बात हुई है, उनमें से जिन भी लोगों से इन पंक्तियों के लेखक से बात हुई है वह सभी यह कहते और स्वीकार करते हैं कि डॉक्टर सुब्रमणियन की अच्छी तैयारी है और चुनावी राजनीति की तिकड़मों तथा उसके समीकरणों की उन्हें खूब पहचान है | कुछेक लोगों ने दूसरे उम्मीदवारों के साथ उनकी तुलना करते हुए इस बात पर भी गौर किया है कि डॉक्टर सुब्रमणियन में यह एक विलक्षण गुण भी है कि वह दूसरों की बातों व सुझावों को भी बहुत ध्यान से सुनते हैं तथा उनके अनुरूप अपनी रणनीति को व्यावहारिक बनाने का प्रयास करते हैं | यह बताते हुए एक वरिष्ट रोटेरियन ने चुटकी भी ली कि लगता कि डॉक्टर होने के नाते उनके जो अनुभव हैं, उन्हें वह यहाँ - अपनी उम्मीदवारी के लिए चलाये जा रहे अपने अभियान में वह इस्तेमाल कर रहे है : एक डॉक्टर को मरीज की बात को ध्यान से सुनना ही होता है, और उसकी बात को सुन कर ही एक डॉक्टर उसके इलाज की रणनीति बनाता है | चुनावी अभियान में यदि कोई उम्मीदवार लोगों की बातों पर गौर करता है और उनके अनुरूप अपनी रणनीति बनाता है - तो यह उस उम्मीदवार के लिए तो फायदे की बात होती ही है, लोगों को भी प्रभावित करती है और उन्हें अहसास कराती है कि उक्त उम्मीदवार उन्हें गंभीरता से ले रहा है | डॉक्टर सुब्रमणियन ने इसी फंडे का इस्तेमाल करके लोगों को प्रभावित किया है |
डॉक्टर सुब्रमणियन ने जबसे अपनी उम्मीदवारी को गंभीरता से लेना शुरू किया है, तभी से डिस्ट्रिक्ट के लोगों ने भी उनकी उम्मीदवारी को गंभीरता से देखना/पहचानना शुरू किया है | इससे आभास मिलता है कि डॉक्टर सुब्रमणियन ने शुरू में बहुत सा समय भले ही बर्बाद कर दिया हो, लेकिन अब जब वह सक्रिय हुए हैं तो लोगों को प्रभावित करने की तैयारी के साथ सक्रिय हुए हैं | डॉक्टर होने - एक बड़ा डॉक्टर होने के नाते डॉक्टर सुब्रमणियन का डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच एक ऑरा (आभामंडल) तो है ही - लेकिन उम्मीदवार के रूप में सक्रियता के अभाव में उन्हें अपने ऑरा का फायदा नहीं मिल रहा था | लोगों को लग रहा था कि डॉक्टर सुब्रमणियन अपने ऑरा के भरोसे ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुन लिए जाने की उम्मीद कर रहे थे | या तो उन्हें उनके शुभचिंतकों ने समझाया होगा कि सिर्फ ऑरा के भरोसे चुनाव नहीं जीता जा सकेगा और या फिर शायद यह उनकी रणनीति ही हो कि चुनाव से कुछ पहले ही वह सक्रिय होंगे - चूँकि लोगों के बीच उनका ऑरा है इसलिए उन्हें दूसरे उम्मीदवारों जितनी मेहनत करने की जरूरत नहीं है | कारण चाहे जो भी हो, डॉक्टर सुब्रमणियन ने सक्रिय होते ही डिस्ट्रिक्ट के लोगों पर जो छाप छोड़ी है - उसके कारण उनकी उम्मीदवारी को गंभीरता से लिया जाने लगा है | डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी की गंभीरता ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी के चुनाव को वास्तव में दिलचस्प बना दिया है |

Sunday, September 23, 2012

रमेश अग्रवाल ने ललित खन्ना की उम्मीदवारी के मामले में जो शीर्षासन किया, मुहावरे की भाषा में उसे - 'थूक कर चाटना' कहते हैं

नई दिल्ली | रमेश अग्रवाल ने करीब चार महीने पहले ललित खन्ना की उम्मीदवारी को लेकर जो तड़ी दिखाई थी, ललित खन्ना ने उसका उन्हें सटीक जबाव दे दिया है | नतीजा यह हुआ है कि रमेश अग्रवाल की सारी तड़ी निकल गई और अब उन्होंने मान लिया है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए ललित खन्ना की उम्मीदवारी प्रस्तुत हो सकती है | इस प्रसंग से एक बार फिर साबित हुआ है कि रमेश अग्रवाल को अपनी फजीहत कराने का कुछ ज्यादा ही शौक है | शौक क्या है - वह बिना सोचे-विचारे तड़ी दिखाते हैं और फिर फजीहत का शिकार होते हैं | ललित खन्ना के मामले में उन्होंने जो किया, मुहावरे की भाषा में उसे - 'थूक कर चाटना' कहते हैं | उल्लेखनीय है कि मई में रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड द्धारा तय किए गए दिशा-निर्देशों को बिना समझे-बूझे रमेश अग्रवाल ने ललित खन्ना को फरमान सुना दिया कि चूँकि उन्होंने डिस्ट्रिक्ट का एक असाइनमेंट स्वीकार किया हुआ है, इसलिए वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवार नहीं हो सकेंगे | रमेश अग्रवाल ने जो कुछ कहा, ललित खन्ना ने उसका मतलब यही समझा था जैसे कि वह उन्हें सलाह दे रहे हैं कि उन्हें यदि सचमुच उम्मीदवार होना है तो जो असाइनमेंट उनके पास है उसे छोड़ दें | ललित खन्ना ने रमेश अग्रवाल की सलाह मानने में जरा सी भी देर नहीं लगाई और तुरंत अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया | बात यहीं ख़त्म हो जानी चाहिए थी | लेकिन वह यदि यहीं ख़त्म हो जाती तो रमेश अग्रवाल को अपना घटियापन दिखाने का मौका कैसे मिलता और कैसे वह अपनी फजीहत के लिए स्थितियां बनाते ?
रमेश अग्रवाल ने ललित खन्ना को तुरंत यह बताना जरूरी समझा कि वह यह न समझ लें कि अपने पद से इस्तीफ़ा देने के बाद वह उम्मीदवार हो जायेंगे | यह जून 2012 की बात है - जबकि न तो इस तरह की बातें करने का समय था और न ही कोई जरूरत थी और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में रमेश अग्रवाल को इस बात को कहने का न कोई अधिकार था | लेकिन रमेश अग्रवाल इस तरह की बातों की परवाह नहीं करते हैं और अपनी तड़ीबाजी दिखाने के लिए कभी भी कोई भी बात करना अपना अधिकार समझते हैं | इसी तड़ीबाजी में रमेश अग्रवाल ने जून में ललित खन्ना को बाकायदा लिख कर बता दिया कि वह उम्मीदवार नहीं हो सकते | ललित खन्ना को दिखाई गई रमेश अग्रवाल की इस तड़ीबाजी से निपटने का जिम्मा पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर केके गुप्ता ने संभाला | केके गुप्ता उसी रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के सदस्य हैं, जिसमें ललित खन्ना हैं | ललित खन्ना के साथ की जा रही रमेश अग्रवाल की बदतमीजी को केके गुप्ता ने क्लब पर हमले के रूप में देखा/पहचाना और क्लब की इज्ज़त व साख बचाने के उद्देश्य से उन्होंने इस मामले में आगे आने का फैसला किया | यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मुकेश अरनेजा भी इसी क्लब के सदस्य हैं, और वह इस वर्ष डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद पर भी हैं - लेकिन उन्होंने ललित खन्ना को दिखाई जा रही रमेश अग्रवाल की तड़ीबाजी का कोई नोटिस नहीं लिया | मुकेश अरनेजा ने न ललित खन्ना के साथ हो रहे अन्याय की परवाह की, और न क्लब की इज्ज़त व साख की ही चिंता की | मुकेश अरनेजा को जानने वालों का कहना रहा कि मुकेश अरनेजा अपने को चाहे जितना तीसमारखां समझते/दिखाते हों, लेकिन वह भी जानते/समझते हैं कि रमेश अग्रवाल की बदतमीजी का विरोध करने की उनकी 'औकात' है नहीं |
रमेश अग्रवाल का 'नशा' उतारने के लिए केके गुप्ता ने रोटरी इंटरनेशनल के जिम्मेदार पदाधिकारियों से बात करने का जिम्मा संभाला, तो ललित खन्ना ने डिस्ट्रिक्ट के वरिष्ठ सदस्यों - खासकर पूर्व गवर्नर्स से बात की और उन्हें अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में तैयार करने का काम किया | रमेश अग्रवाल द्धारा खड़ी की गई प्रतिकूल स्थिति का सामना करने के मौके का ललित खन्ना ने बड़ी होशियारी के साथ इस्तेमाल किया | अपनी उम्मीदवारी के खिलाफ रमेश अग्रवाल के रवैये को लेकर ललित खन्ना ने पूर्व गवर्नर्स के बीच जो गुहार लगाई - उसका उन्होंने दो तरह से फायदा उठाया : एक तरफ तो उन्होंने अपनी उम्मीदवारी को संभव बनाने का काम किया, और साथ ही साथ दूसरी तरफ अपनी उम्मीदवारी के प्रति पूर्व गवर्नर्स के बीच विश्वास और समर्थन पैदा करने का काम भी किया | ललित खन्ना की समस्या थी कि उनकी उम्मीदवारी को लेकर जो असमंजस बना हुआ था, उसके चलते वह अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का काम कर ही नहीं पा रहे थे | लिहाजा अपनी उम्मीदवारी को संभव बनाने के लिए उनको जो कोशिश करनी थी, उस कोशिश को उन्होंने इस तरह से संयोजित किया कि वह उनका समर्थन जुटाने का अभियान भी बन गई | दरअसल अपनी उम्मीदवारी को संभव बनाने के लिए ललित खन्ना ने जो प्रयास किए, उन्हें आक्रामक तेवर इसी रणनीति के तहत दिए ताकि लोगों के बीच उनकी उम्मीदवारी के प्रति भरोसा पैदा हो | अपनी उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच भरोसा पैदा करने में ललित खन्ना को जो सफलता मिल रही थी, उसका ही नतीजा था कि दूसरे संभावित उम्मीदवारों के बीच घबराहट फैली और इसी घबराहट में ललित खन्ना की उम्मीदवारी की खिलाफत करते हुए उन्होंने भी इंटरनेशनल डायरेक्टर यश पाल दास के सामने ललित खन्ना की उम्मीदवारी को स्वीकृत न करने की मांग रखी | कई लोगों को लगता है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी के विरोध में यश पाल दास के साथ संभावित उम्मीदवारों की मुलाकात का 'स्टेज' पर्दे के पीछे से रमेश अग्रवाल ने ही सजाया था | रमेश अग्रवाल का यह टुच्चापन भी लेकिन उनके काम नहीं आया |
ललित खन्ना की उम्मीदवारी को रोकने की रमेश अग्रवाल की हर कोशिश जब पिट गई तब रमेश अग्रवाल यह स्वीकार करने के लिए मजबूर हुए कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी को प्रस्तुत होने से नहीं रोका जा सकता है | 'थूक के चाटना' वाला मुहावरा किसने बनाया था और किस घटना से प्रेरित होकर बनाया था - यह तो पता नहीं, लेकिन रमेश अग्रवाल ने ललित खन्ना की उम्मीदवारी को लेकर जो शीर्षासन किया, उस पर पूरी तरह फिट जरूर बैठता है | रमेश अग्रवाल की तड़ीबाजी से निपटने में ललित खन्ना ने जिस तरह से केके गुप्ता का सक्रिय समर्थन जुटाया, मुकेश अरनेजा के खुले विरोध के बावजूद अपने क्लब के पदाधिकारियों व अन्य सदस्यों का समर्थन प्राप्त किया और रमेश अग्रवाल की हर तिकड़म को फेल किया - उससे उन्होंने अपनी 'लड़ने' की सामर्थ्य का तथा प्रतिकूल स्थितियों को अनुकूल बना सकने के अपने हुनर का सुबूत ही पेश किया है | ललित खन्ना के शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि अपनी उम्मीदवारी को संभव बनाने की जो लड़ाई ललित खन्ना ने जीती है उसका उनकी उम्मीदवारी के संदर्भ में एक प्रतीकात्मक महत्व है; और उनकी यह जीत डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उनकी उम्मीदवारी के दावे को गंभीर बनाती है |

Saturday, September 22, 2012

राजेश बत्रा को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बना कर विनोद बंसल ने कहीं मुसीबत तो मोल नहीं ले ली है ?

नई दिल्ली | राजेश बत्रा ने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के रूप में विनोद बंसल की ऐसी दशा कर दी है कि विनोद बंसल के लिए न कुछ कहते बन रहा है और न कुछ करते | राजेश बत्रा के दबावपूर्ण व्यवहार के चलते विनोद बंसल को ऐसे लोगों को महत्वपूर्ण पद देने पड़े हैं, जिन्होंने न तो उनके चुनाव में उनकी सक्रिय मदद की थी, और न उनके कहने के बावजूद पिछले वर्ष रवि चौधरी का समर्थन किया था | जो लोग विनोद बंसल के किसी भी तरह से काम नहीं आये, विनोद बंसल को उन्हें जिस तरह से महत्वपूर्ण पद देने के लिए मजबूर होना पड़ा है - उससे लोगों के बीच यही संदेश गया है कि उनकी टीम का गठन वह नहीं, बल्कि राजेश बत्रा कर रहे हैं | इसका नतीजा यह है कि विनोद बंसल के चुनाव में खुल कर उनका साथ देने वाले लोग अपने आपको उपेक्षित पा रहे हैं | ऐसे लोगों का 'दर्द' यह याद करके और टीस मार उठता है कि अपने चुनाव के समय तो विनोद बंसल उन्हें 'खुल कर' साथ आने के लिए प्रेरित करते थे, लेकिन अब उनसे बात करने से भी कतराते हैं और दूसरों के जरिये संदेश भिजवाते हैं | विनोद बंसल की मौजूदा दशा से परिचित लोग इस स्थिति के लिए लेकिन राजेश बत्रा को जिम्मेदार ठहराते हैं | उनका कहना है कि राजेश बत्रा ने विनोद बंसल के लिए वास्तव में कोई मौका ही नहीं छोड़ा है, ताकि वह 'अपने' लोगों का ख्याल रख सकें - और चूँकि वह अपने लोगों के काम नहीं आ पा रहे हैं इसलिए वह उनसे बात करने से भी बच रहे हैं | राजेश बत्रा को हावी देख कर विनोद बंसल के हाथ-पैर ऐसे फूल गए हैं कि उनके लिए छोटे-मोटे दबावों से बच पाना भी मुश्किल बना हुआ है, जिस कारण अपने फैसलों को क्रियान्वित कर पाने में भी वह लाचार से बने हुए हैं | रोटरी क्लब गाजियाबाद प्लेटिनम के अमित अग्रवाल को असिस्टेंट गवर्नर बनाने का विनोद बंसल ऐलान कर चुके हैं, लेकिन अपने इस ऐलान को क्रियान्वित कर पाने को लेकर उनके पसीने छूटे हुए हैं | विनोद बंसल ने जो फैसले किए हैं उन्हें दबाव में लिए फैसले के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है, और जिस एक फैसले को वह क्रियान्वित नहीं कर पा रहे हैं - उसके पीछे भी दबाव बताया जा रहा है |
राजेश बत्रा के चौधराहटपूर्ण रवैये ने विनोद बंसल को सहयोगी आम रोटेरियन ही नहीं, सहयोगी रहे रोटेरियन नेताओं के निशाने पर भी ला दिया है | सबसे ज्यादा क्रोध में असित मित्तल हैं | विनोद बंसल को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर 'बनवाने' का असित मित्तल चूँकि अकेले ही श्रेय लेते हैं, इसलिए वह विनोद बंसल से खास व्यवहार की उम्मीद रखते हैं | विनोद बंसल के लिए असित मित्तल लेकिन 'दूध में पड़ी मक्खी' बने हुए हैं | इसके लिए कुछ तो विनोद बंसल का अपना स्वभाव जिम्मेदार है, और कुछ राजेश बत्रा का रवैया | विनोद बंसल ने पीछे अपना जो पहला कार्यक्रम किया था - उसमें राजेश बत्रा के रवैये के चलते असित मित्तल को मंच की बजाये, आम रोटेरियंस के बीच जगह मिली थी | कार्यक्रम ख़त्म हो जाने और अधिकतर लोगों के चले जाने के बाद, जब मुश्किल से छह-आठ लोग बचे रह गए थे तब विनोद बंसल ने असित मित्तल की सुध ली थी | असित मित्तल ने नोट किया और कई लोगों से कहा भी कि विनोद बंसल उन्हें जानबूझ कर किनारे लगाये हुए हैं | असित मित्तल का कष्ट यह है कि वह उम्मीद लगाये हुए थे कि विनोद बंसल उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनायेंगे - लेकिन जो हुआ उसमें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाना तो दूर, विनोद बंसल उन्हें किनारे/ठिकाने लगाने में लगे हुए हैं | विनोद बंसल ने असित मित्तल को दोहरी चोट दी - डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर न बना कर उनकी उम्मीदों पर तो पानी फेरा ही; असित मित्तल को फूटी आँख न देख पाने वाले राजेश बत्रा को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बना दिया | असित मित्तल के प्रति राजेश बत्रा के रवैये ने विनोद बंसल का 'काम' आसान और कर दिया है - असित मित्तल इसी बात से भड़के हुए हैं |  
राजेश बत्रा के रवैये ने विनोद बंसल के लिए अजीब-अजीब तरह की मुसीबतें पैदा कर दी हैं | जैसे राजेश बत्रा ने घोषणा कर दी है कि वह हैदराबाद में आयोजित हो रहे इंस्टीट्यूट में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर की ट्रेनिंग कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगे | क्यों नहीं होंगे ? क्योंकि उक्त ट्रेनिंग कार्यक्रम के ट्रेनर अशोक घोष बनाये गए हैं | राजेश बत्रा को अशोक घोष से ट्रेनिंग लेने में अपनी नाक नीची होती हुई लगती है | अपनी नाक को नीची होने से बचाने के लिए ही राजेश बत्रा ने रोटरी इंटरनेशनल द्धारा डिजाइन किए गए महत्वपूर्ण ट्रेनिंग कार्यक्रम से गायब रहने का फैसला किया है | राजेश बत्रा को लगता है और उन्होंने कहा है कि जब वह उक्त कार्यक्रम में शामिल ही नहीं होंगे, तो अशोक घोष से ट्रेनिंग लेने से नाक नीची होने के 'खतरे' से बच जायेंगे | राजेश बत्रा के इस रवैये पर लोगों का कहना है कि राजेश बत्रा को अपनी नाक की यदि इतनी ही चिंता है तो उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद नहीं स्वीकार करना चाहिए था | राजेश बत्रा ने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद क्यों स्वीकार किया - इसका उन्होंने बड़ा दिलचस्प और बचकाना-सा जबाव दिया है | उन्होंने कहा है कि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद पाने के लिए उन्होंने कोई लॉबिंग नहीं की; विनोद बंसल ने उनसे डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद स्वीकार करने का अनुरोध किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया | राजेश बत्रा बताते/कहते हैं कि वह 'इस' पद पर रह चुके हैं, 'उस' पद पर रह चुके हैं; दो बार डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर रह चुके हैं - तीसरी बार डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी | कुर्सी का मोह दरअसल होता ही ऐसा है | सयाने लोग 'दिखाते' तो यह हैं कि उन्हें कुर्सी का कोई मोह नहीं है - लेकिन कुर्सी जब उन्हें मिल रही होती है तो उसे लेने से वह बेचारे इंकार नहीं कर पाते | डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद तो बेचारे राजेश बत्रा को विनोद बंसल के अनुरोध पर स्वीकार करने के लिए 'मजबूर' होना पड़ा - लेकिन अपनी टीम अपने आप चुनने और हैदराबाद में आयोजित हो रहे इंस्टीट्यूट में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर की ट्रेनिंग कार्यक्रम में शामिल होने का विनोद बंसल का 'अनुरोध' राजेश बत्रा को न सुनाई दे रहा है और न समझ आ रहा है | डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर की ट्रेनिंग कार्यक्रम में शामिल होने से राजेश बत्रा के इंकार ने विनोद बंसल को अशोक घोष तथा उनके नजदीकियों के साथ-साथ रोटरी के बड़े नेताओं व दूसरे डिस्ट्रिक्ट के पदाधिकारियों के सामने अजीब-सी स्थिति में ला दिया है; और उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि वह इस स्थिति से कैसे निपटे ?
इन्हीं सब बातों व तथ्यों के संदर्भ में, विनोद बंसल के शुभचिंतकों को लग रहा है कि राजेश बत्रा को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बना कर विनोद बंसल ने कहीं मुसीबत तो मोल नहीं ले ली है ?

Thursday, August 30, 2012

नोमीनेटिंग कमेटी के लिए अचानक और आश्चर्यजनक रूप से प्रस्तुत हुई दमनजीत सिंह की उम्मीदवारी ने बड़े रोटरी नेताओं की सक्रियता का खेल उजागर किया

नई दिल्ली/मुंबई | दमनजीत सिंह ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करके अपने डिस्ट्रिक्ट के लोगों को तो चक्कर में डाल ही दिया है, पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता की राजनीति के लिए भी गंभीर संकट पैदा कर दिया है | दमनजीत सिंह राजनीति से कोसों दूर रहने वाले एक भले रोटेरियन के रूप में डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच पहचाने जाते हैं; लेकिन 'राजनीति से कोसों दूर रहने वाले' दमनजीत सिंह की एक चाल ने डिस्ट्रिक्ट ही नहीं देश की रोटरी की राजनीति की चाल बिगाड़ दी है | चूँकि सच यही है कि दमनजीत सिंह राजनीति से कोसों दूर रहने वाले रोटेरियन हैं, इसलिए इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए जैसे ही दमनजीत सिंह की उम्मीदवारी की प्रस्तुति की चर्चा चली, जूलियस सीजर के 'यू टू ब्रूटस' वाली स्टाइल में डिस्ट्रिक्ट के लोगों ने जैसे एक-दूसरे से पूछा - 'दमनजीत सिंह भी !' एक तरफ सच यदि यह है कि दमनजीत सिंह राजनीति से कोसों दूर रहने वाले रोटेरियन हैं, तो दूसरी तरफ सच यह भी है कि कोयले की खदान में रहते हुए कोई कब तक अपने हाथ काले होने से बचा सकता है | सो, डिस्ट्रिक्ट के लोगों के सामने एक ऐसा सच सामने था जिसे स्वीकार करते हुए उन्हें चक्कर आ रहा था - इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए दमनजीत सिंह भी उम्मीदवार बनने की तैयारी कर रहे हैं | जो लोग सिर्फ दमनजीत सिंह को जानते हैं उन्हें इस जानकारी से आश्चर्य हो रहा था; लेकिन जो लोग मानते हैं कि हर 'घटना' के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है उन्होंने समझने की कोशिश की कि राजनीति से कोसों दूर रहने वाले दमनजीत सिंह के राजनीति के मैदान में उतरने के पीछे कारण आखिर क्या है ?
दमनजीत सिंह के निकटवर्तियों के हवाले से ऐसे लोगों ने जाना/पाया कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए प्रस्तुत होने वाली दमनजीत सिंह की उम्मीदवारी के पीछे भरत पांड्या और मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर यशपाल दास तथा पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर अशोक महाजन हैं | यहाँ यह जानना महत्वपूर्ण है कि भरत पांड्या इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवार हैं और यशपाल दास व अशोक महाजन ने उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवाने का बीड़ा उठाया हुआ है | डिस्ट्रिक्ट 3010 में अशोक महाजन का काम अभी कुछ समय पहले तक मुकेश अरनेजा देखते थे, लेकिन 'जहाँ देखी तवा परांत, वहीं बिताई सारी रात' जैसी अपनी फितरत के चलते मुकेश अरनेजा ने अब शेखर मेहता से अपने तार जोड़े हुए हैं; लिहाजा अशोक महाजन को डिस्ट्रिक्ट 3010 में अपनी राजनीति चलाने के लिए कोई और 'आधार' चाहिए | दमनजीत सिंह पर हाथ रख कर अशोक महाजन ने वास्तव में डिस्ट्रिक्ट 3010 में अपनी पैठ बनाने की कोशिश की है | अशोक महाजन और शेखर मेहता की निगाह रोटरी इंटरनेशनल के प्रेसीडेंट पद पर है, और इसीलिए उन्हें प्रत्येक डिस्ट्रिक्ट में 'अपने' आदमी चाहिए हैं | डिस्ट्रिक्ट 3010 की चौधराहट सुशील गुप्ता अपने पास रखना चाहते हैं - उनका राजनीतिक गठजोड़ शेखर मेहता के साथ तो बनता है, लेकिन अशोक महाजन के साथ नहीं बनता |
इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव के जरिये डिस्ट्रिक्ट 3010 को इन तीनों ने अपनी अपनी प्रयोगशाला बना लिया है | सुशील गुप्ता अपने डिस्ट्रिक्ट की चौधराहट को अपने पास बनाये रखने के लिए रंजन ढींगरा पर दांव लगाना चाहते हैं; शेखर मेहता को लगता है कि मुकेश अरनेजा इस डिस्ट्रिक्ट में 'उनकी' राजनीति करेंगे; उन्हें दरअसल एक 'खाड़कू' किस्म का व्यक्ति चाहिए और वह मुकेश अरनेजा को इसके लिए बिलकुल फिट पाते हैं - इसलिए वह सुशील गुप्ता को मुकेश अरनेजा का समर्थन करने के लिए समझा रहे हैं | सुशील गुप्ता उन्हें मुकेश अरनेजा पर भरोसा करने से सावधान करने की कोशिश कर रहे हैं | कुछेक और लोगों ने भी शेखर मेहता को मुकेश अरनेजा जैसे अवसरवादी से बचने की सलाह दी है - शेखर मेहता को बताया/समझाया गया है कि मुकेश अरनेजा ने हर किसी को अपने स्वार्थ में इस्तेमाल ही किया है और हर किसी को धोखा ही दिया है | डिस्ट्रिक्ट 3010 में सुशील गुप्ता और शेखर मेहता के बीच इस मत-भिन्नता में आशोक महाजन ने अपनी दाल गलाने के लिए दमनजीत सिंह पर हाथ रखा है - उन्हें विश्वास है कि दमनजीत सिंह की साफ छवि उनका काम आसान बनायेगी | अशोक महाजन को विश्वास है कि दमनजीत सिंह को आगे करके वह डिस्ट्रिक्ट 3010 के उन नेताओं को भी अपने पाले में ले आयेंगे, जो राजा साबू के आदमी के रूप में जाने/पहचाने/समझे जाते हैं |
राजा साबू और कल्याण बनर्जी के बीच पिछले कुछ समय से जो 'सीजफायर' बना हुआ है, उसके चलते उम्मीद है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव बहुत दूर तक नहीं जायेगा और ज्यादा घमासान नहीं मचेगा और सारा खेल नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले तक ही चलेगा | इसलिए रोटरी की राजनीति में राजा साबू और कल्याण बनर्जी की छाया से निकल कर अपना अपना झंडा फहराने की तैयारी कर रहे सुशील गुप्ता, शेखर मेहता और अशोक महाजन ने अपनी सारी ताकत इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव में लगा दी है | नोमीनेटिंग कमेटी का चुनाव इस कारण से भी महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवारों की पसंद और भरोसा उन्हें चुनवाने/जितवाने का 'ठेका' लिए नेताओं की पसंद और भरोसे से अलग भी दिख रहा है | इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए भरत पांड्या यदि राजा साबू/अशोक महाजन ग्रुप के भरोसे हैं तो उन्हीं के डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3140 - के गुलाम वहनवती को कल्याण बनर्जी ग्रुप की शह है | कल्याण बनर्जी ग्रुप से लेकिन डिस्ट्रिक्ट 3060 के मनोज देसाई का पलड़ा भारी दिखता है, क्योंकि उनकी उम्मीदवारी में मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर शेखर मेहता दिलचस्पी लेते सुने गए हैं | डिस्ट्रिक्ट 3131 के विनय कुलकर्णी को भरोसा है कि राजा साबू/अशोक महाजन ग्रुप उन पर भी दांव लगा सकता है | डिस्ट्रिक्ट 3132 के राजीव प्रधान और उनके समर्थकों को उम्मीद है कि रोटरी के भले के लिए दोनों ग्रुप के नेता उन्हें ही इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवायेंगे | डिस्ट्रिक्ट 3040 के आलोक बिल्लोरे तथा डिस्ट्रिक्ट 3030 के मधु रुघवानी भी अपनी उम्मीदवारी के लिए माहौल बनाने की जुगत में लगे हैं, लेकिन अभी उन्हें अपनी उम्मीदवारी के प्रति लोगों को आश्वस्त करने का काम ही करना पड़ रहा है |
दमनजीत सिंह की अचानक और आश्चर्यजनक रूप से इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने नोमीनेटिंग कमेटी के लिए होने वाले चुनाव में पर्दे के पीछे चलने वाले खेल का एक संकेत भर दिया है | लेकिन यह ऐसा संकेत है जो बताता है कि नोमीनेटिंग कमेटी का चुनाव खासा दिलचस्प होने जा रहा है, क्योंकि इसमें बड़े नेताओं की सक्रिय भूमिका रहेगी |