Sunday, November 18, 2012

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में नवीन गुप्ता को बचाने के लिए उनके पापा ने एक फिर मोर्चा संभाल लिया है

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स के पूर्व प्रेसीडेंट एनडी गुप्ता को इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में एक बार फिर खुल कर मैदान में आने के लिए मजबूर होना ही पड़ा है । अपने बेटे नवीन गुप्ता को चुनावी हार की तरफ बढ़ता देख कर एनडी गुप्ता को अभी तक पर्दे के पीछे से किये जा रहे अपने प्रयत्न नाकाफी लग रहे थे और इसीलिये अपने नजदीकियों की सलाह को अनदेखा करके उन्हें खुल कर मैदान में आने का फैसला करना ही पड़ा । उल्लेखनीय है कि एनडी गुप्ता अभी तक पर्दे के पीछे से ही नवीन गुप्ता के चुनाव का संचालन कर रहे थे - क्योंकि उन्हें खुद भी लग रहा था और उनके नजदीकियों की भी सलाह थी कि चुनावी झमेले में उनकी खुली सक्रियता उनकी साख और प्रतिष्ठा को - उनके ऑरा (आभामंडल) को धूमिल ही करेगी । एनडी गुप्ता के नजदीकियों ने भी उन्हें कहा/बताया था और उन्हें खुद भी भरोसा था कि उनकी खुली सक्रियता न होने के बावजूद नवीन अपनी सीट बचा लेंगे और अच्छे खासे वोट जुटा ही लेंगे ।
एनडी गुप्ता को हालाँकि अपने लोगों से जो फीडबैक मिल रहा था, वह एक अलग ही कहानी कह रहा था । उन्हें बताया जा रहा था कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में नवीन गुप्ता का लोगों के साथ जिस तरह का अनफ्रेंडली संबंध रहा है, अपने व्यवहार और अपने रवैये से नवीन गुप्ता ने जिस तरह से लोगों को हर्ट और निराश किया हुआ है - उसके चलते इस बार नवीन गुप्ता का चुनाव जीतना मुश्किल ही होगा; लेकिन एनडी को अपने संबधों का, लोगों के साथ अपने रिश्तों का भरोसा था । उन्हें भरोसा था कि नवीन गुप्ता ने अपने रवैये से लोगों को चाहें जितना भी निराश किया हुआ हो, लेकिन उनका बेटा होने के कारण नवीन की हरकतों को लोग माफ़ कर देंगे ।
एनडी गुप्ता ने इस भरोसे के बावजूद हालाँकि पर्दे के पीछे से नवीन के चुनाव की कमान संभाली हुई थी । उन्होंने गणित यह बैठाया था कि वह पर्दे के पीछे से सक्रिय रहेंगे और टेलीफोन पर लोगों से बातचीत करते रहेंगे तो नवीन के प्रति लोगों की नाराजगी को कम और ख़त्म करने का काम कर लेंगे । शुरू में उन्हें यह लगा भी कि उनकी यह योजना सफल हो रही है । कोई उनसे नवीन के रवैये की शिकायत करता तो वह उसे अपनेपन का अहसास कराते हुए मीठा-सा उलाहना देते कि नवीन की शिकायत अब तुम मुझसे करोगे, तुम उसके बड़े भाई हो, वह तुम्हारी बात नहीं सुनता तो उसके कान उमेठों ! सुनने वाला यह सुन कर लाज़बाब हो जाता । एनडी गुप्ता को लगा कि उनका यह फार्मूला काम कर रहा है और लोग उनकी मीठी बातों में आकर मूर्ख बन रहे हैं । लेकिन जल्दी ही एनडी गुप्ता को सुनने को मिलने लगा कि कान किसके उमेंठे, नवीन तो मिलता ही नहीं है, वह तो फोन भी नहीं उठाता ।
इस तरह के जबावों से एनडी गुप्ता ने भांप लिया कि नवीन ने अपनी हरकतों से और अपने रवैये से लोगों को ज्यादा ही नाराज किया हुआ है; और मामला उतना आसान है नहीं, जितना कि वह समझ रहे हैं । ऐसे में उन्होंने नवीन की उम्मीदवारी के समर्थन में खुल कर आने की जरूरत को पहचाना । हालाँकि उनके नजदीकियों ने भी उन्हें समझाया और उन्होंने खुद भी समझा कि खुल कर चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बन कर वह हो सकता है कि नवीन के चुनाव को तो बचा लें, लेकिन अपनी साख और प्रतिष्ठा को वह गँवा देंगे । लोग क्या कहेंगे कि इंस्टीट्यूट का प्रेसीडेंट रह चुका व्यक्ति इंस्टीट्यूट की और प्रोफेशन की फिक्र नहीं कर रहा है, अपने बेटे की चुनावी जीत को सुनिश्चित करने की फिक्र में सड़कों पर उतरा हुआ है ।
एनडी गुप्ता को अपने बेटे को चुनावी हार से बचाने के लिए खुद मैदान में उतरने का फैसला करने में मुश्किल तो हुई - लेकिन उन्हें यह फैसला करना ही पड़ा; क्योंकि उन्होंने आकलन यह किया कि साख और प्रतिष्ठा बचाने के चक्कर में वह यदि नवीन की मदद के लिए आगे नहीं आये और नवीन चुनाव हार गया तो उनकी ज्यादा किरकिरी होगी । उनके लिए 'एक तरफ कुआँ तो दूसरी तरफ खाई' वाली स्थिति थी । एनडी गुप्ता ने 'सीए गेट टुगेदर' के नाम से जिस आयोजन का निमंत्रण लोगों को भेजा है उसके डिटेल्स बताते हैं कि नवीन गुप्ता को चुनावी हार से बचाने के लिए एनडी गुप्ता ने एक तरफ यदि इंस्टीट्यूट से जुड़े बड़े नामों को अपने साथ मिलाया है, तो दूसरी तरफ ऐसे लोगों को भी अपने साथ खड़ा किया है जो कभी उनकी भ्रष्ट कारस्तानियीं का खुला विरोध किया करते थे । 'सीए गेट टुगेदर' का आयोजन दिखाता/बताता है कि अपने बेटे की चुनावी हार की आशंका से डरा हुआ एक बाप कैसे अपनी, अपने प्रोफेशन की और अपने इंस्टीट्यूट की साख व प्रतिष्ठा को खुले में चीथड़े - चीथड़े करने को मजबूर हो जाता है ।

Saturday, November 17, 2012

सरोज जोशी की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद की उम्मीदवारी के मुद्दे पर, सुशील गुप्ता के समर्थन के बावजूद रमेश अग्रवाल को यश पाल दास से लताड़ खानी पड़ी है

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल को अभी थोड़ी देर पहले ही इंटरनेशनल डायरेक्टर यश पाल दास का यहाँ नीचे प्रस्तुत ई मेल पत्र मिला है । डिस्ट्रिक्ट 3010 के रोटेरियंस अपने गवर्नर रमेश अग्रवाल को इंटरनेशनल डायरेक्टर यश पाल दास द्धारा लिखे गए इस पत्र को पढ़ कर पता नहीं कैसा महसूस करेंगे । क्योंकि यह कोई सामान्य पत्र नहीं है । मुहावरे की भाषा में बात करें तो यह यश पाल दास की तरफ से रमेश अग्रवाल को 'भिगो कर मारा गया जूता है' । पहले आप पत्र पढ़ लीजिये, बाकी बातें उसके बाद करते हैं ।

Dear DG Ramesh,
I am surprised to learn that you are not accepting
the Candidature of Rtn. Saroj Joshi on the pretext
that I gave an opinion that her candidature should
be accepted. Please note that it is my decision
that Rtn Saroj Joshi is eligible to file her name
for DGN Candidate.

Kind regards

Y. P. Das
RI Director

यश पाल दास को - इंटरनेशनल डायरेक्टर यश पाल दास को रमेश अग्रवाल को ऐसा पत्र इसलिए लिखना पड़ा, क्योंकि रमेश अग्रवाल ने बेहद धूर्तता और तिकड़म के साथ अपनी मनमानी व्याख्या करते हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के लिए सरोज जोशी की उम्मीदवारी को लेकर यश पाल दास द्धारा दिए गए निर्देश को मानने से इंकार कर दिया था । उल्लेखनीय है कि सरोज जोशी की उम्मीदवारी को लेकर रमेश अग्रवाल ने जो बखेड़ा खड़ा किया था, उस पर इंटरनेशनल डायरेक्टर के रूप में यश पाल दास ने बहुत पहले ही अपना स्पष्ट फैसला बता दिया था । अपना फैसला बताने में यस पाल दास से बस एक गलती हो गई - उन्होंने गलती से यह मान/समझ लिया कि रमेश अग्रवाल एक पढ़े/लिखे व्यक्ति हैं और पढ़े/लिखे लोगों की संस्था में एक-दूसरे का सम्मान करते/रखते हुए उनके लिए तमीजपूर्ण शब्दों का इस्तेमाल करना काफी होगा । अपनी इस समझ के चलते यश पाल दास ने रमेश अग्रवाल को जो निर्देश दिया, उसे उन्होंने 'ओपिनियन' के रूप में प्रस्तुत किया । यश पाल दास यह समझने में चूक गए कि रमेश अग्रवाल एक बहुत ही धूर्त और पाजी किस्म का व्यक्ति है और मुहावरे की भाषा में कहें तो सिर्फ 'जूते की भाषा' ही समझता है । रमेश अग्रवाल पहले और अकेले गवर्नर हैं जो अपने व्यवहार के कारण एक वरिष्ठ रोटेरियन राजेंद्र जैना से सार्वजानिक रूप से पिटे और एक अन्य वरिष्ठ रोटेरियन केके भटनागर से पिटते हुए बचाए गए । यश पाल दास को रमेश अग्रवाल की करतूतों के बारे में शायद पता न हो । लेकिन ललित खन्ना की उम्मीदवारी को रोकने के लिए रमेश अग्रवाल ने जो नौटंकी की थी, उसकी जानकारी तो यश पाल दास को थी ही । उल्लेखनीय है कि ललित खन्ना के मामले में भी यश पाल दास के हस्तक्षेप के बाद रमेश अग्रवाल को ललित खन्ना की उम्मीदवारी को स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ा था । हो सकता है कि यश पाल दास ने समझा हो कि उस अनुभव से सबक लेकर रमेश अग्रवाल सुधर गए हों और पढ़े-लिखे लोगों के 'व्यवहार' को समझने लगे हों । यश पाल दास से दरअसल यही गलती हो गई; वह यह समझने से चूक गए कि रमेश अग्रवाल सुधरने वाली चीज नहीं हैं ।
रमेश अग्रवाल खुशकिस्मत निकले कि सरोज जोशी की उम्मीदवारी को लेकर अपनी धूर्तता को अंजाम देने के लिए उन्हें पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता का साथ भी मिल गया । सुशील गुप्ता अपने आप को डिस्ट्रिक्ट का स्वयं-भू ठेकेदार समझते हैं और विश्वास करते हैं कि डिस्ट्रिक्ट में फैसले करने का अधिकार उन्हें मिला हुआ है । वह यह नहीं बताते कि फैसले करने का अधिकार उन्हें दिया किसने है ? सुशील गुप्ता इंटरनेशनल डायरेक्टर रहे हैं । इस नाते उनसे इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है कि वह यह बात अच्छी तरह जानते ही होंगे कि रोटरी इंटरनेशनल में फैसले करने की एक व्यवस्था है, और उसी व्यवस्था में हुए फैसले मान्य होते हैं । सुशील गुप्ता से इतनी उम्मीद तो की ही जानी चाहिए कि उनका चहेता डिस्ट्रिक्ट गवर्नर यदि मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर द्धारा लिए गए किसी फैसले से असंतुष्ट है तो वह उसे सलाह दें कि वह उस फैसले के खिलाफ और ऊपर की अथॉरिटी में शिकायत दर्ज करे । सुशील गुप्ता ने यह किस अधिकार से कर लिया कि मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर के फैसले को मनमाने तरीके से एक फर्जी कमेटी बना कर पलट दें । सुशील गुप्ता ने जिस तथाकथित ओवरसाईट कमेटी में सरोज जोशी की उम्मीदवारी के बारे में यश पाल दास द्धारा लिए गए फैसले को पलट देने का फैसला किया, उस ओवरसाईट कमेटी को न तो रोटरी इंटरनेशनल मान्यता देता है और न ही रमेश अग्रवाल के गवर्नर-काल की डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में उसका कोई जिक्र है । रोटरी के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक बात शायद नहीं हो सकती कि उसके यहाँ इंटरनेशनल डायरेक्टर पद पर रह चुका व्यक्ति अपनी चौधराहट दिखाने के चक्कर में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की इस तरह से अवमानना करे । रमेश अग्रवाल की धूर्तता यह कि जिस तथाकथित कमेटी का उन्होंने अपनी डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में जिक्र तक करना जरूरी नहीं समझा, उसके पास वह सरोज जोशी की उम्मीदवारी जैसे मामले को लेकर चले गए । वैसे देखा जाये तो इसमें रमेश अग्रवाल की भी क्या गलती है ? उन्हें जब पता है कि सुशील गुप्ता को 'अक्ल' नहीं है और वह खुशी-खुशी इस्तेमाल हो सकते हैं तो उन्होंने सुशील गुप्ता का इस्तेमाल कर लिया ।
यहाँ मजे की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के लिए सरोज जोशी की उम्मीदवारी के बारे में इंटरनेशनल डायरेक्टर यश पाल दास द्धारा लिए गए फैसले को मानने से इंकार करने की तथाकथित ओवरसाईट कमेटी की कार्रवाई की शिकायत जब रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय में की गई, तो वहाँ से डिप्टी जनरल कोंसेल एण्ड्रू मेक्डोनल्ड का रमेश अग्रवाल को पत्र आया कि सरोज जोशी की उम्मीदवारी के बारे में उन्हें अपने जोन के इंटरनेशनल डायरेक्टर यश पाल दास के निर्देश का पालन करना चाहिए तथा इस मामले में यदि उन्हें कोई और क्लेरिफिकेशन चाहिए तो उन्हें यश पाल दास से ही बात करना चाहिए । रमेश अग्रवाल ने लेकिन इस पत्र पर भी कोई ध्यान नहीं दिया और वह तरह-तरह से सरोज जोशी की उम्मीदवारी के पेपर्स को स्वीकार करने को लेकर टाल-मटोल करते रहे और उनके क्लब के पदाधिकारियों पर नोमीनेटिंग कमेटी के लिए नाम भेजने का दबाव बनाते रहे । रमेश अग्रवाल की चाल थी कि वह किसी तरह धोखे से सरोज जोशी के क्लब से नोमीनेटिंग कमेटी के लिए नाम ले लें तो फिर उनके लिए सरोज जोशी की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद की उम्मीदवारी के दावे को पचड़े में डालने में आसानी हो जायेगी । सरोज जोशी के क्लब के पदाधिकारी लेकिन उनके किसी झांसे में या धोखे में नहीं आये । इतने सब के बावजूद, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के लिए आवेदन करने के अंतिम दिन तक रमेश अग्रवाल ने जब सरोज जोशी की उम्मीदवारी को लेकर अपना टाल-मटोल बाला रवैया जारी रखा, तब यश पाल दास ने भी समझ लिया कि - मुहाबरे की भाषा में कहें तो - रमेश अग्रवाल को 'जूते की भाषा' ही समझ में आती है; और उन्होंने दो-टूक शब्दों में लिख दिया कि यह उनकी ओपिनियन नहीं है, बल्कि यह उनका फैसला है कि सरोज जोशी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के योग्य हैं ।
यश पाल दास द्धारा लिख कर बताये गये इस स्पष्ट फैसले के बाद उम्मीद तो की जाती है कि रमेश अग्रवाल के पास सरोज जोशी की उम्मीदवारी पर टाल-मटोल करने का अब कोई मौका नहीं बचा है; लेकिन जैसा कि बार-बार की घटनाओं से साबित होता रहा है कि रमेश अग्रवाल बहुत ही धूर्त किस्म की खूबियाँ रखते हैं - इसलिए हो सकता है कि वह और कोई तिकड़म भिड़ाने की कोशिश करें । यश पाल दास के रवैये से भी लेकिन एक बात साफ नज़र आ रही है कि सरोज जोशी की उम्मीदवारी के मुद्दे पर वह रमेश अग्रवाल को बख्शने के मूड में नहीं हैं । ललित खन्ना की उम्मीदवारी के मामले में यश पाल दास एक बार रमेश अग्रवाल के 'कान उमेठ कर उन्हें सीधा कर चुके हैं' । सरोज जोशी की उम्मीदवारी के मामले में भी लगता है कि उन्होंने वही कहानी दोहराने का मन बना लिया है और रमेश अग्रवाल को सबक सिखाने का फैसला कर लिया है । ऐसे में, तमाम धूर्त किस्म की खूबियाँ रखने के बावजूद रमेश अग्रवाल के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के लिए सरोज जोशी की उम्मीदवारी को लेकर टाल-मटोल कर पाना अब संभव नहीं होगा और उन्हें सरोज जोशी की उम्मीदवारी को स्वीकार करना ही पड़ेगा जैसे कि तमाम नौटंकी के बाद भी उन्हें ललित खन्ना की उम्मीदवारी को स्वीकार करना पड़ा था ।

मजे की बात है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी के चयन को लेकर नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले में किसी की भी ज्यादा दिलचस्पी नहीं है, और प्रायः सभी उम्मीदवार खुले चुनाव को अपने लिए अनुकूल पा/बता रहे हैं

गाजियाबाद/नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के लिए नामांकन प्रस्तुत होने के साथ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद को लेकर होने वाली चुनावी लड़ाई अब निर्णायक मोड़ की तरफ बढ़ती हुई दिखने लगी है । इस वर्ष हो रही इस चुनावी लड़ाई का दिलचस्प पहलू यह है कि चुनावबाज नेता घर बैठने को मजबूर हुए हैं क्योंकि उन्हें यह समझ ही नहीं आ रहा है कि वह करें तो क्या करें ? डिस्ट्रिक्ट के चुनावबाज नेता इतने असहाय शायद कभी नहीं हुए होंगे, जितने इस वर्ष वह हुए नज़र आ रहे हैं । इसीलिये सारा दारोमदार उम्मीदवारों के सिर ही आ पड़ा है । उम्मीदवारों ने भी लगता है कि इस बात को समझ लिया है कि इस बार उन्हें अपने आप ही चुनावी लड़ाई लड़नी पड़ेगी । इस बात को सबसे पहले चूंकि जेके गौड़ ने समझा इसलिए उन्होंने अपने ऊपर किसी नेता की छाप नहीं लगने देने का प्रयास किया और लोगों से सीधे संपर्क स्थापित किया । डॉक्टर सुब्रमणियन ने डॉक्टर सुशील खुराना पर और आलोक गुप्ता ने रमेश अग्रवाल तथा मुकेश अरनेजा पर भरोसा किया, लेकिन जब यह देखा/पाया कि यह नेता लोग तो कोई मदद नहीं कर रहे हैं, तब यह अपने-अपने तरीके से जुटे । सुधीर मंगला के साथ ज्यादा बुरा हुआ । उन्होंने लोगों के बीच दावा तो यह किया था कि उन्हें कई पूर्व गवर्नर्स का समर्थन मिलेगा भी और 'दिखेगा' भी । किन्तु जब दिखने/दिखाने का समय आया तो पता चला कि उनके समर्थन में तो कोई भी सक्रिय नहीं है, लेकिन विनोद बंसल उनकी खिलाफत करने में जरूर दिलचस्पी ले रहे हैं ।
चुनावी राजनीति तथ्यों से नहीं होती, वह परसेप्शन से - धारणा से होती है; धारणा के मामले में भी नकारात्मक धारणा का ज्यादा प्रभाव पड़ता है । इसीलिये विनोद बंसल ने जब अलग-अलग तरह के इशारों में सुधीर मंगला के प्रति अपनी नाराजगी और अपने विरोध का संकेत दिया तो सुधीर मंगला के लिए अपने समर्थन-आधार को बचाए रखना मुश्किल हो गया । आलोक गुप्ता उनके समर्थन-आधार में लगातार सेंध लगाते हुए उन्हें जो झटके पर झटके दे रहे थे, विनोद बंसल के संकेतों ने उन झटकों की रेंज को जैसे कई गुना बढ़ा दिया । रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा से आलोक गुप्ता को जो धोखा मिला, उसकी भरपाई आलोक गुप्ता ने सुधीर मंगला के समर्थन-आधार में सेंध लगा कर की । डॉक्टर सुब्रमणियन के लिए यह समझ पाना मुश्किल हुआ कि डॉक्टर सुशील खुराना से उन्हें जब पर्याप्त मदद नहीं मिली, तो वह क्या करें ? डॉक्टर सुब्रमणियन एक उम्मीदवार के रूप में संपर्क अभियान तो ज्यादा नहीं चला पाए हैं, लेकिन रोटरी को एक इलीट या क्लासी किस्म के संगठन के रूप में देखने वाले लोगों के बीच उनके लिए समर्थन को देखा/पहचाना जा सकता है । इसके बावजूद डॉक्टर सुब्रमणियन के समर्थक चाहते हैं कि नोमिनेटिंग कमेटी अधिकृत उम्मीदवार का चयन न करे - वह डॉक्टर सुब्रमणियन को भी अधिकृत उम्मीदवार के रूप में चुने जाते हुए नहीं देखना चाहते हैं । डॉक्टर सुब्रमणियन के समर्थक जान और मान रहे हैं कि वह यदि अधिकृत उम्मीदवार चुन लिए गए तो उन्हें एक प्रतिद्धन्द्धी उम्मीदवार से मुकाबला करना होगा, जो उनके लिए मुश्किल होगा । डॉक्टर सुब्रमणियन के लिए, उनके समर्थकों के अनुसार आसान स्थिति तभी होगी जब छह उम्मीदवार मैदान में होंगे - और यह तब होगा जब नोमीनेटिंग कमेटी कोई फैसला न करे ।
सुधीर मंगला के नजदीकी भी यही चाहते हैं कि नोमीनेटिंग कमेटी कोई फैसला न करे । किन्तु ऐसा चाहने का उनका कारण थोड़ा अलग है । वह जान/समझ रहे हैं कि उन्होंने लोगों के बीच काम चाहें कितना ही क्यों न किया हो, किन्तु विनोद बंसल के रवैये के कारण न तो उनका नोमीनेट होना संभव होगा और न ही उन्हें चेलेंजिंग उम्मीदवार के रूप में क्लब्स का समर्थन मिल पायेगा । किसी तीन-तिकड़म से वह यदि नोमीनेट हो भी गए तो - उनके समर्थकों को डर है कि विनोद बंसल के विरोध के कारण उनका विरोध ही ज्यादा होगा । इसलिए अच्छा है कि खुला चुनाव हो और मैदान में छह उम्मीदवार हों - तब विनोद बंसल भी कुछ नहीं कर पाएंगे । आलोक गुप्ता के समर्थकों की चाहत है कि या तो आलोक गुप्ता नोमीनेट हों, और या फिर कोई भी नोमीनेट न हो । आलोक गुप्ता के समर्थकों का मानना और समझना है कि आलोक गुप्ता यदि नोमीनेट होते हैं तो फिर चाहें कोई भी चेलैंज करें, वह फायदे में ही रहेंगे । खुला चुनाव हुआ तो भी आलोक गुप्ता को लाभ में रहने का भरोसा है । कोई और नोमीनेट होता है, तब लेकिन आलोक गुप्ता को एक मुश्किल लड़ाई लड़नी पड़ सकती है ।
जेके गौड़ के नजदीकी लेकिन हर स्थिति का सामना करने की तैयारी किये हुए हैं । जेके गौड़ के नजदीकियों का मानना और कहना है कि जेके गौड़ ने लोगों के बीच जो सघन और व्यापक अभियान चलाया है उसका प्रतिफल उन्हें नोमीनेट होकर मिलेगा ही; और यदि किसी कारण से कोई गड़बड़ हुई और वह नोमीनेट नहीं भी हुए तो वह चुनाव के लिए भी तैयार हैं । जेके गौड़ के नजदीकियों का मानना है कि उन्हें यह अच्छी तरह पता है कि यदि जेके गौड़ नोमीनेट भी होते हैं, तो भी उन्हें चेलैंज किया ही जायेगा और चुनाव का सामना उन्हें करना ही पड़ेगा । नजदीकियों के अनुसार जेके गौड़ चुनाव के लिए तैयार हैं और वह इस बात से जरा भी चिंतित नहीं हैं कि उनका चुनाव किसी एक से होता है या पाँच लोगों से । उम्मीदवारों की सूची में ललित खन्ना और सरोज जोशी का भी नाम है - लेकिन उम्मीदवार के रूप में इनके नाम की लोगों के बीच ज्यादा चर्चा है नहीं । इसके बावजूद, कुछेक लोगों को लगता है कि नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले में हो सकता है कि इन दोनों की उम्मीदवारी किसी का काम बनाने या बिगाड़ने का 'काम' करें ।

Friday, November 16, 2012

हरित अग्रवाल की जीत में राजेश शर्मा को अपनी 'तैयारी' के लिए खतरा दिखाई दे रहा है

नई दिल्ली । हरित अग्रवाल के समर्थकों के बीच राजेश शर्मा की भूमिका को लेकर संदेह लगातार गहराता जा रहा है । उल्लेखनीय है कि नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पूर्व चेयरमैन राजेश शर्मा घोषित रूप से तो नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की सदस्यता के लिए चुनाव लड़ रहे हरित अग्रवाल की उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे हैं; लेकिन हरित अग्रवाल के कुछेक समर्थकों को लग रहा है कि राजेश शर्मा उन्हें जितवाने के लिए नहीं, बल्कि हरवाने के लिए काम कर रहे हैं । हरित अग्रवाल के इन समर्थकों को राजेश शर्मा की हाल की कुछेक गतिविधियों से संदेह हुआ है कि राजेश शर्मा जैसे हरित अग्रवाल को नुकसान पहुँचाने वाले काम कर रहे हैं । अन्य कुछेक लोगों का कहना हालाँकि यह है कि राजेश शर्मा भले ही नार्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन बन और रह चुके हैं, लेकिन उनकी ऐसी फोलोइंग नहीं है कि वह किसी उम्मीदवार को फायदा या नुकसान पहुँचा सकें । इन लोगों का कहना है कि राजेश शर्मा जिस ग्रुप के सदस्य समझे जाते हैं, उस ग्रुप के कुछेक सदस्य हरित अग्रवाल की खिलाफत कर रहे हों और हो सकता है कि राजेश शर्मा उनकी हाँ में हाँ मिला रहे हों । इन लोगों के अनुसार राजेश शर्मा के इस रवैये को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है ।
लेकिन जो लोग राजेश शर्मा के इस रवैये को गंभीरता से ले रहे हैं उनका कहना है कि राजेश शर्मा चूंकि कुछेक जगह हरित अग्रवाल को अपनी 'राजनीति' के लिए खतरे के रूप में बता रहे हैं, इसलिए उनके रवैये की अनदेखी करना हरित अग्रवाल को मुश्किल में डाल सकता है । उल्लेखनीय है कि हरित अग्रवाल रीजनल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी को बहुत ही गंभीरता से ले रहे हैं और एक अकेले वही पूरी तैयारी से चुनाव लड़ते देखे जा रहे हैं । लेकिन उनकी इसी 'गंभीरता' और 'तैयारी' ने राजेश शर्मा को डरा दिया है । राजेश शर्मा इस बार के चुनाव में सेंट्रल काउंसिल के लिए चरनजोत सिंह नंदा का समर्थन इस उम्मीद में कर रहे हैं कि अगली बार चरनजोत सिंह नंदा सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत होने वाली उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे । राजेश शर्मा रीजनल काउंसिल में हरित अग्रवाल की उम्मीदवारी के साथ होने का दावा करते सुने गए हैं । लेकिन अब राजेश शर्मा को यह डर सताने लगा है कि हरित अग्रवाल रीजनल काउंसिल में जीत कर अपनी पहली ही टर्म में चेयरमैन बन गए तो फिर अगली बार वह सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे और अगली बार के लिए की जा रही उनकी तैयारी को नुकसान पहुँचायेंगे । इसी डर से राजेश शर्मा अब इस कोशिश में जुटे बताये जा रहे हैं कि हरित अग्रवाल को वह इस बार रीजनल काउंसिल में जीतने न दें ।
हरित अग्रवाल के समर्थकों को यह तो विश्वास है कि राजेश शर्मा चाहेंगे और कोशिश भी करेंगे तो भी हरित अग्रवाल को जीतने से नहीं रोक सकेंगे । लेकिन हरित अग्रवाल के कुछेक समर्थक राजेश शर्मा की गतिविधियों से सावधान रहने की जरूरत को जरूर पहचानने लगे हैं ।

Thursday, November 15, 2012

विजय कुमार गुप्ता को सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में अपने दोहरे रवैये के कारण जिस अविश्वास का सामना करना पड़ रहा है; उसका शिकार एम के अग्रवाल को भी होना पड़ रहा है

नई दिल्ली । एम के अग्रवाल और विजय कुमार गुप्ता की सक्रियता ने चार्टर्ड अकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल की चुनावी गहमागहमी में खासी गर्मी तो पैदा कर दी है, लेकिन यह गर्मी कोई बड़ा उलट-फेर करती हुई नहीं दिख रही है । एम के अग्रवाल ने इस बार अपने चुनाव अभियान को जिस आक्रामकता के साथ प्रस्तुत किया उसे देख कर कई लोगों को हैरानी हुई; क्योंकि एम के अग्रवाल ने इससे पहले जब चुनाव लड़ा था तब बहुत ही लो-प्रोफाइल उम्मीदवार के रूप में वह लोगों के बीच उपस्थित हुए थे । इस बार लेकिन उन्होंने पहले से ही तैयारी की हुई है और लोगों तक पहुँच बनाने के लिए अलग-अलग तरह के और हर तरह के संभव 'माध्यम' तैयार किये हुए हैं । प्रोफेशन में मुश्किलों का सामना करने वाले या कर रहे युवा चार्टर्ड अकाउंटेंट्स के बीच पैठ बनाने के लिए मुद्दे भी एम के अग्रवाल ने ऐसे तैयार किये जो हर किसी को प्रभावित करें । हर तरह से चाक-चौबंद व्यवस्था के साथ एम के अग्रवाल ने सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के उद्देश्य से जब अभियान शुरू किया तो दूसरे उम्मीदवारों में खलबली मच गई । इसका कारण यह था कि किसी को भी यह उम्मीद नहीं थी कि एम के अग्रवाल 'ऐसा' तंत्र खड़ा कर लेंगे और अपने चुनाव अभियान को प्रभावी रूप दे लेंगे ।
विजय कुमार गुप्ता का चुनाव अभियान भी शुरू में सुस्ती दिखाने के बावजूद जब तेजी दिखाने लगा तो चुनावी माहौल में गर्मी पैदा हुई । विजय कुमार गुप्ता के चुनाव अभियान में हालाँकि वह तेजी अभी भी नहीं आ पाई है जिसके लिए विजय कुमार गुप्ता कुछेक लोगों की निगाह में प्रख्यात तो कुछेक लोगों की निगाह में कुख्यात रहे हैं - लेकिन जैसी जो तेजी उनके चुनाव अभियान में दिखी है, उसे प्रतिद्दन्द्दी उम्मीदवारों की नींद उड़ाने के लिये पर्याप्त माना/देखा गया । विजय कुमार गुप्ता ने अपनी आक्रामक प्रचार शैली के भरोसे ही इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में अपनी जगह और अपना मुकाम बनाया/पाया है । सेंट्रल काउंसिल का अपना पहला चुनाव विजय कुमार गुप्ता ने अपनी इसी आक्रामक प्रचार शैली के भरोसे जीता था । इसी आक्रामक प्रचार शैली के बावजूद हालाँकि वह अपना दूसरा चुनाव हार गए थे - कुछेक लोगों की राय में ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि 'आक्रामक प्रचार शैली' को उन्होंने 'काठ की हांडी' के रूप में देखा/पहचाना और याद किया कि काठ की हांडी तो एक ही बार चढ़ती है, बार-बार नहीँ; लेकिन अन्य कुछेक लोगों के अनुसार विजय कुमार गुप्ता अपना दूसरा चुनाव अपनी प्रचार शैली के कारण नहीं, बल्कि अति आत्मविश्वास के कारण हारे । विजय कुमार गुप्ता के लिए अपनी हार को पचा पाना बहुत ही मुश्किल हुआ और हार के कारण मिले सदमे से वह अभी तक ऊबर नहीं पाए हैं । इसी कारण, इस बार उनका अभियान असमंजस का शिकार रहा । असमंजस के कारण ही, अब जब उनके अभियान में तेजी आई है तो उसका वैसा प्रभाव नहीं दिख रहा है जैसा दिखना चाहिए था ।
एम के अग्रवाल और विजय कुमार गुप्ता की सक्रियता ने चुनाव में गर्मी तो पैदा की है - लेकिन इस गर्मी में यह दोनों एक-दूसरे को ही झुलसाते दिख रहे हैं । दरअसल, इन दोनों ने ही प्रोफेशन में की, प्रोफेशन से जुड़े लोगों की मुश्किलों को अपना चुनावी मुद्दा बनाया हुआ है । नए बने चार्टर्ड अकाउंटेंट्स को किन और किस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है और प्रोफेशन के सामने किस तरह की चुनौतियाँ हैं - इसे ही यह लोगों के सामने जोरशोर से रख रहे हैं और लोगों को यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि यह यदि सेंट्रल काउंसिल में आये तो इन समस्याओं को हल करेंगे/करवाएंगे । लोगों को इस तरह की बातें पसंद तो आती हैं, लेकिन उनके लिए यह भरोसा करना मुश्किल होता है कि यह मौजूदा मुश्किलों को हल कर/करवा सकेंगे । विजय कुमार गुप्ता जब इस तरह की बातें करते हैं, तो लोग पूछने से नहीं चूकते कि जब आप काउंसिल में थे, तब आपने क्या किया था; और यदि सचमुच कुछ किया था तो फिर लोगों का पर्याप्त समर्थन क्यों नहीं मिला और पिछला चुनाव आप क्यों हार गए थे ? इसी कारण से विजय कुमार गुप्ता के लिए अभियान चलाना मुश्किल हो रहा है । उनकी कोई भी बात, उनका कोई भी तर्क लोगों के गले नहीं उतर रहा है ।
विजय कुमार गुप्ता की इस हालत ने एम के अग्रवाल के लिए भी मुसीबत खड़ी कर दी है । असल में विजय कुमार गुप्ता के मामले ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि चुनाव से पहले उम्मीदवार लोग बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और चुने जाने के बाद फिर उन सब बातों को भूल जाते हैं । इसीलिये इनकी बातें महत्वपूर्ण होते हुए भी लोगों के बीच इनकी उम्मीदवारी के प्रति विश्वास नहीं बना पा रही हैं । यह विजय कुमार गुप्ता के साथ तो हो ही रहा है, साथ ही एम के अग्रवाल के साथ भी हो रहा है । एम के अग्रवाल के समर्थकों को भी लगता है और वह कहते भी हैं कि एम के अग्रवाल की बातें लोगों को अपील तो कर रही हैं लेकिन इसके बावजूद वह लोगों के बीच अपनी उम्मीदवारी के प्रति विश्वास और स्वीकार्यता का भाव पैदा नहीं कर पा रहे हैं । लोगों को लगता है कि एम के अग्रवाल भी वैसे ही हैं जैसे विजय कुमार गुप्ता जो जब काउंसिल में होते हैं तब तो लोगों को यह बताते हैं कि काउंसिल कितना कितना काम करती है, और जब काउंसिल में नहीं होते हैं तब लोगों को बताते हैं कि काउंसिल तो कुछ करती ही नहीं । इसी तरह के दोहरे रवैये के कारण विजय कुमार गुप्ता और एम के अग्रवाल द्धारा की जा रही अच्छी अच्छी बातें लोगों को विश्वास नहीं दिला पा रही हैं कि काउंसिल में जा कर यह प्रोफेशन के लिए और प्रोफेशन से जुड़े लोगों के लिए सचमुच कुछ करेंगे भी । यही कारण है कि अपनी बातों से आकर्षित करने के बावजूद लोगों को प्रभावित कर पाना इनके लिए मुश्किल बना हुआ है । एम के अग्रवाल के समर्थकों को लगता है कि विजय कुमार गुप्ता के कारण उनका मामला ख़राब हुआ है; विजय कुमार गुप्ता यदि चुनाव में नहीं होते तो लोगों को कथनी और करनी में भेद करने का आसान अवसर नहीं मिलता । एम के अग्रवाल के समर्थकों का कहना है कि विजय कुमार गुप्ता के खिलाफ लोगों के बीच जो नाराजगी है, उसका निशाना एम के अग्रवाल को भी बनना पड़ रहा है । एम के अग्रवाल के लिए यह दिखाना/जताना मुश्किल बना हुआ है कि वह विजय कुमार गुप्ता की तरह का रवैया नहीं अपनाएंगे ।

Wednesday, November 7, 2012

अनूप मित्तल की चेयरमैनी में होने वाला डिस्ट्रिक्ट 3010 का दीवाली मेला झगड़ों और विवादों के कारण ज्यादा चर्चा में है

नई दिल्ली | रोटरी क्लब दिल्ली विकास के दीवाली मेले ने डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले की तैयारी में जुटे लोगों की फूट को सामने ला दिया है | उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब दिल्ली विकास डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले की आयोजन समिति का एक प्रमुख सदस्य है; और प्रमुख सदस्य होने के नाते इस क्लब के अध्यक्ष शिव शंकर अग्रवाल डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले की आयोजन समिति में को-चेयरमैन के पद पर हैं | इस कारण से उम्मीद की जाती थी कि वह अपना समय, अपनी एनर्जी और अपने साधन डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले में लगायेंगे - लेकिन शिव शंकर अग्रवाल डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले की तैयारी में जुटने की बजाये अपने क्लब के दीवाली मेले को आयोजित करने में जुटे नज़र आये | इस बाबत, उनकी तरफ से लोगों को सफाई सुनने को मिली कि उनका क्लब बड़ा क्लब है, उनके क्लब के सदस्य डिस्ट्रिक्ट के कार्यक्रमों में शामिल नहीं हो पाते हैं, उनके क्लब के लोग अपने ही कार्यक्रम करने पर जोर देते हैं, आदि-इत्यादि | लोगों को शिव शंकर अग्रवाल के यह तर्क हजम नहीं हुए हैं | हालाँकि एक तरह से देखें तो यह तर्क सही दीखते हैं; लेकिन लोगों का कहना है कि शिव शंकर अग्रवाल ने जब डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले की आयोजन समिति का हिस्सा होना स्वीकार कर लिया था, तो उन्हें उसी की तैयारी में जुटना चाहिए था | अध्यक्ष होने के नाते वह क्लब के लीडर हुए और एक लीडर होने के नाते उन्हें अपने क्लब के लोगों को डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले में शामिल होने के लिए ही प्रेरित करना चाहिए था | लोगों का कहना है कि इसके आलावा, उन्हें यदि अपने क्लब में दीवाली के नाम पर कुछ करना ही था, तो ऐसा कुछ करते या ऐसे समय करते जिससे कि डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले की तैयारी डिस्टर्ब न होती और उसकी तैयारी में उनकी पूरी सामर्थ्य लगती |
शिव शंकर अग्रवाल ने ऐसा कुछ नहीं किया, इससे लोगों को लगा कि बात दरअसल कुछ और है | डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले की तैयारी में चूँकि शुरू से ही खटपट देखी/सुनी जा रही थीं - इसलिए लोगों को और भी विश्वास हुआ कि शिव शंकर अग्रवाल का अपने क्लब का अलग से दीवाली मेला आयोजित करने के फैसले का उसी खटपट से संबंध है | बात निकलना शुरू हुई तो फिर निकलती ही चली गई और पता चला कि डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले की तैयारी को लेकर शुरू से ही झगड़े थे | पहली बार यह झगड़ा तब सामने आया जब रोटरी क्लब दिल्ली मयूर विहार के अध्यक्ष अनूप मित्तल को चेयरमैन चुन लिया गया | कुछेक अध्यक्षों ने आरोप लगाया कि अनूप मित्तल ने उन्हें धोखे में रखकर षड़यंत्रपूर्वक अपने आप को चेयरमैन चुनवा लिया और इस तरह दीवाली मेले को हाईजैक कर लिया | जबावी कार्रवाई  में, इस आरोप के पीछे शिव शंकर अग्रवाल को बताया गया और कहा गया कि वह चूंकि खुद चेयरमैन नहीं बन सके इसलिए इस तरह की बातें फैला रहे हैं | शिव शंकर अग्रवाल ने इसका जबाव यह कर दिया कि अनूप मित्तल चेयरमैन बने हैं, इस पर उन्हें आपत्ति नहीं है; उनकी आपत्ति लेकिन चेयरमैन चुने जाने के तरीके को लेकर है | शिव शंकर अग्रवाल की नाराजगी को दूर करने के लिए उन्हें को-चेयरमैन बना दिया गया | झगड़े लेकिन तब भी दूर नहीं हुए | एक बड़ा झगड़ा मेले के आयोजन स्थल को लेकर हुआ | शिव शंकर अग्रवाल और अन्य कुछेक लोगों की शिकायत रही कि मेला जहाँ हो रहा है, वहाँ तक पहुँचना आसान नहीं होगा, इसलिए मेला किसी ऐसी जगह पर होना चाहिए जहाँ लोग आसानी से पहुँच सकें | अनूप मित्तल का आरोप रहा कि मेला स्थल का चयन जब सभी लोगों की रजामंदी लेकर ही किया गया था, तब फिर उसका विरोध करने की जरूरत क्यों आ पड़ी - इससे ही समझा जा सकता है कि कुछेक लोगों का काम सिर्फ विरोध करना ही है | अनूप मित्तल ने यह आरोप भी लगाया है कि उन्हें सिर्फ दो-चार अध्यक्षों से ही मदद मिल रही है और बाकी लोग झगड़े पैदा करने की ही कोशिशों में ही लगे हुए हैं |
अनूप मित्तल से नाराज लोगों का कहना लेकिन यह रहा है कि अनूप मित्तल की कार्यशैली ने ही झगड़े पैदा करने के मौके बनाये हैं | मेले के आयोजन की तैयारी के लिए जब कमेटी बनी हुई है तो उन्हें सभी फैसले कमेटी के सदस्यों के साथ विचार-विमर्श करके ही करने चाहिए - लेकिन वह मनमाने तरीके से फैसले कर लेते हैं और अपने फैसलों से वह बस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल को खुश करने का प्रयास करते हैं | एक सीधा आरोप यह लगा है कि अनूप मित्तल ने दीवाली मेले को अपने लिए 'बेस्ट प्रेसीडेंट' का अवार्ड लेने का जरिया मान/बना लिया है | इसी कारण से मेले की तैयारी में रमेश अग्रवाल का हस्तक्षेप बढ़ गया और झगड़े पैदा हुए | मेले की आयोजन समिति के लेटर पेड और मेले के निमंत्रण पत्र में किसके नाम छपेंगे या नहीं छपेंगे जैसी बातों पर झगड़ा रमेश अग्रवाल के हस्तक्षेप के कारण ही हुआ | समिति के सदस्यों का ही आरोप रहा कि चेयरमैन के रूप में अनूप मित्तल ने समिति के लोगों से बात न करके, रमेश अग्रवाल से बात की और रमेश अग्रवाल ने उन्हें लेटर पेड पर विनोद बंसल और संजय खन्ना के नाम न प्रकाशित करने की हिदायत दी | कुछेक अध्यक्षों ने इस पर बबाल मचा दिया | उनका कहना रहा कि पहली बात तो यह कि रमेश अग्रवाल होता कौन है यह तय करने वाला कि लेटर पेड पर किसका नाम छपेगा या नहीं छपेगा; और दूसरी बात यह कि अनूप मित्तल ने रमेश अग्रवाल से इस बारे में पूछा ही क्यों ? रमेश अग्रवाल और अनूप मित्तल ने पहले तो इस बबाल की अनदेखी करने और अपनी मनमानी करने की कोशिश की, लेकिन जब विरोध करने वाले अध्यक्षों ने खुली धमकी दी कि लेटर पेड पर विनोद बंसल और संजय खन्ना के नाम नहीं छपे तो वह दीवाली मेले के आयोजन से अलग हो जायेंगे, तब रमेश अग्रवाल का दिमाग ढीला हुआ और उन्होंने अनूप मित्तल को अनुमति दी कि वह वैसा कर लें जैसा दूसरे अध्यक्ष कह रहे हैं | इस झमेले में लेटर पेड छपने में काफी देर हो गई | मेले के निमंत्रण पत्र को लेकर तो रमेश अग्रवाल ने और तमाशा खड़ा कर दिया - मेले की तैयारी से जुड़े अध्यक्षों के यह देख/जान कर और बुरा लगा कि अनूप मित्तल भी उनकी हाँ में हाँ मिला रहे हैं | रमेश अग्रवाल ने फ़रमान जारी किया कि निमंत्रण पत्र पर सिर्फ उनका ही नाम होगा और आयोजन समिति के सदस्यों - यानि अध्यक्षों का नाम नहीं होगा | अध्यक्षों ने इस पर साफ कह दिया कि यदि ऐसा होगा तो फिर मेले का आयोजन रमेश अग्रवाल खुद ही कर लें | रमेश अग्रवाल को एक बार फिर वह करना पड़ा - मुहावरे की भाषा में जिसे 'थूक कर चाटना' कहते हैं |
इससे पहले रमेश अग्रवाल लेकिन दीवाली मेले की तैयारी में जुटे लोगों - यानि अध्यक्षों के बीच झगड़ा बढ़ा चुके थे | अधिकतर अध्यक्षों को विश्वास हो चला कि अनूप मित्तल दीवाली मेले को अपने प्रमोशन के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं; और इसी विश्वास के चलते वह मेले की तैयारी में दिलचस्पी लेने से बचने लगे | शिव शंकर अग्रवाल ने अपने क्लब का अलग से दीवाली मेला आयोजित करने का फैसला किया तो यह साफ हो गया कि डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले में अब उनकी ज्यादा दिलचस्पी नहीं रह गई | ऐसे में डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले के आयोजन की जिम्मेदारी पूरी तरह अनूप मित्तल पर आ पड़ी | अनूप मित्तल ने मेले के आयोजन की जिम्मेदारी तो जैसी कि लोगों के बीच चर्चा है कि अच्छे से संभाली और निभाई है, लेकिन आयोजन समिति के लोगों को साथ रखने में वह जिस तरह से विफल रहे - उससे डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले के आयोजन में 'रोटरी' वाला जो तत्व होता है, वह गायब हो गया है | कहा/माना जा रहा है कि वह इवेंट तो मैनेज कर सकते हैं, लेकिन साथियों को साथ बनाये रखने का हुनर उन्हें अभी सीखना है | इस हुनर के अभाव के चलते ही, अनूप मित्तल की चेयरमैनी में होने वाला डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेला झगड़ों और विवादों के कारण ज्यादा चर्चा में है |

Tuesday, November 6, 2012

कल पता चलेगा कि ललित खन्ना के खिलाफ मुकेश अरनेजा के पास सचमुच कोई तिकड़म है या केके गुप्ता की रणनीति के सामने उनकी सारी तिकड़मबाजी हवा हो गई है

नई दिल्ली | ललित खन्ना क्या डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के वास्ते अपनी उम्मीदवारी के लिए अपने क्लब की हरी झंडी प्राप्त कर लेंगे ? इस बात में यूँ तो किसी को भी कोई शक नहीं होना चाहिए, क्योंकि क्लब में ललित खन्ना की उम्मीदवारी को लेकर पर्याप्त समर्थन है; लेकिन फिर भी यदि यह सवाल चर्चा में है तो इसका कारण मुकेश अरनेजा का रवैया है | यह सच है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी के खिलाफ मुकेश अरनेजा कुछ भी करते हुए नहीं दिखे हैं: लेकिन सच यह भी है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी के समर्थन में भी मुकेश अरनेजा कुछ करते हुए नहीं दिखे हैं | यह दूसरा सच इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मुकेश अरनेजा चुपचाप बैठ कर तमाशा देखने वाले लोगों में से नहीं हैं; और ललित खन्ना उनके थोड़े से खास लोगों में एक रहे हैं | दरअसल इसी नाते से लोगों को उम्मीद रही कि मुकेश अरनेजा हर तरह से ललित खन्ना की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के अभियान में जुटेंगे | पर जब मुकेश अरनेजा ऐसा करते हुए नहीं नज़र आये तो सभी का माथा ठनका और तब पता चला कि मुकेश अरनेजा तो ललित खन्ना की उम्मीदवारी के पूरी तरह खिलाफ हैं |
मुकेश अरनेजा के खिलाफ होने के बावजूद ललित खन्ना ने अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में अपने क्लब में हालाँकि समर्थन जुटा लिया है | क्लब के अध्यक्ष राकेश मल्होत्रा यूँ तो मुकेश अरनेजा के आदमी के रूप में जाने/पहचाने जाते हैं - लेकिन इस मामले में वह भी मुकेश अरनेजा के साथ नहीं, बल्कि ललित खन्ना के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं | देखा/पाया जा रहा है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी का विरोध करने के कारण मुकेश अरनेजा अपने ही क्लब में अलग-थलग हो गए हैं और अकेले पड़ गए हैं | इसके बावजूद, ललित खन्ना की उम्मीदवारी को लेकर संशय यदि बना हुआ है तो इसका कारण यही है कि मुकेश अरनेजा को आसानी से हार मानने वाला नहीं माना जाता है | लोगों को लगता है कि मुकेश अरनेजा क्लब की हरी झंडी ललित खन्ना को आसानी से नहीं मिलने देंगे और उन्होंने अवश्य ही कोई तिकड़म सोच रखी होगी, जिसके भरोसे वह ललित खन्ना का रास्ता रोक लेंगे | ललित खन्ना ने भी अपनी उम्मीदवारी को क्लब के समर्थन के बाबत हालाँकि चाक-चौबंद व्यवस्था की हुई है | मुकेश अरनेजा की तिकड़मों से निपटने के लिए ललित खन्ना ने केके गुप्ता से पहले ही तार जोड़ लिया हुआ है | केके गुप्ता ने ललित खन्ना की उम्मीदवारी के संदर्भ में मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की चालबाजियों को जिस तरह से विफल किया और ललित खन्ना के समर्थन में विभिन्न खेमों में बँटे क्लब को एकजुट किया है, उसके कारण मुकेश अरनेजा को और झटका लगा है |
ललित खन्ना की उम्मीदवारी मुकेश अरनेजा के लिए दरअसल इसलिए भी गंभीर चुनौती बनी है, क्योंकि ललित खन्ना की उम्मीदवारी के नाम पर क्लब में जो राजनीति हुई है उसमें मुकेश अरनेजा यदि अलग-थलग और अकेले पड़े हैं तो केके गुप्ता की साख तो बनी ही है, साथ ही उनकी चौधराहट भी स्थापित हुई है | मुकेश अरनेजा जानते हैं कि उनके विरोध के बावजूद - उनकी और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल की तमाम चालबाजियों के बावजूद - केके गुप्ता ने जिस तरह ललित खन्ना की उम्मीदवारी को क्लब से लेकर इंटरनेशनल डायरेक्टर तक के यहाँ स्वीकार्य बनाया, उससे लोगों को केके गुप्ता के रणनीतिक कौशल का और उनकी पहुँच का सुबूत मिला है | ललित खन्ना की उम्मीदवारी के नाम पर जो राजनीति हुई, उसके कारण क्लब में केके गुप्ता की जो धाक बनी है उसे देख/जान कर मुकेश अरनेजा को डर यह पैदा हुआ है कि केके गुप्ता अब इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चयन करने के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की उनकी उम्मीदवारी में रोड़ा डालेंगे |
केके गुप्ता ने इस मामले को उठाना शुरू भी कर दिया है | केके गुप्ता ने क्लब के सदस्यों के बीच उन चर्चाओं पर गौर करने की जरूरत पर बल दिया है जिनमें कहा/बताया गया है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चयन करने के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की अपनी उम्मीदवारी का इस्तेमाल करके मुकेश अरनेजा सौदेबाजी करने की जुगाड़ में हैं | केके गुप्ता का कहना है कि इस तरह की बातों से क्लब का नाम बदनाम होता है और किसी मुकेश अरनेजा को यह हक़ नहीं दिया जाना चाहिए कि वह अपने निजी स्वार्थ में क्लब का नाम बदनाम करे | केके गुप्ता ने लोगों को याद दिलाया है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चयन करने के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की उम्मीदवारी के नाम पर मुकेश अरनेजा पहले भी सौदेबाजी कर चुके हैं |        
केके गुप्ता के इन तेवरों ने मुकेश अरनेजा को वास्तव में संकट में डाल दिया है | केके गुप्ता के इन तेवरों में मुकेश अरनेजा अपने लिए जिस संकट को देख/पहचान रहे हैं, उसकी जड़ में वह ललित खन्ना की उम्मीदवारी को ही पा रहे हैं | मुकेश अरनेजा के नजदीकियों की बातों पर विश्वास करें तो मुकेश अरनेजा मान रहे हैं कि वह यदि ललित खन्ना की उम्मीदवारी में किसी भी तरह फच्चर फँसा दें, तो उनके सारे संकट समाप्त हो जायेंगे | मुकेश अरनेजा के एक नजदीकी ने कुछ दिन पहले इन पंक्तियों के लेखक से कहा था कि क्लब में ललित खन्ना के आलावा एक और उम्मीदवार लाने की तैयारी की जा रही है, ताकि उम्मीदवारी के नाम पर झगड़ा दिखा कर ललित खन्ना की उम्मीदवारी को ख़त्म कर/करा दिया जा सके | अभी तक ऐसा नहीं हो सका है - इससे यह तो पता चल रहा है कि मुकेश अरनेजा की कोई तिकड़म काम नहीं कर रही है | लेकिन इससे यह भी पता चल रहा है कि मुकेश अरनेजा ने अभी उम्मीद नहीं छोड़ी है और ललित खन्ना की उम्मीदवारी में रोड़ा डालने की कोई न कोई तिकड़म लगा रहे होंगे | यह देखना दिलचस्प होगा कि तिकड़मबाज मुकेश अरनेजा के पास सचमुच कोई तिकड़म है या केके गुप्ता की रणनीति के सामने उनकी सारी तिकड़मबाजी हवा हो गई है |