Wednesday, May 14, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में चेयरपरसन पद के लिए सहजीव रतन जैन की उम्मीदवारी का समर्थन करके मल्टीपल में धाक जमाने की दिशा में बढ़ रहे जितेंद्र चौहान को तटस्थता का दिखावा कर रहे नरेश अग्रवाल ने अपनी मीठी बातों से फुसलाया

नई दिल्ली । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट 'बनने' की तैयारी कर रहे नरेश अग्रवाल ने मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन जितेंद्र चौहान को ठिकाने लगाने के लिए जो रणनीति बनाई है, उसे 'साँप भी मर जाए, और लाठी भी न टूटे' वाले मुहावरे को व्याख्यायित करने के लिए एक प्रभावी उदाहरण के रूप में नोट किया जा सकता है । जितेंद्र चौहान के साथ नरेश अग्रवाल का कोई झगड़ा/लफड़ा नहीं है, लेकिन फिर भी नरेश अग्रवाल ने उन्हें निपटाने की जो बात सोची है वह उनमें दूरदृष्टि होने का परिचायक है । नरेश अग्रवाल दरअसल मल्टीपल में ज्यादा नेता नहीं चाहते हैं; वह जान/समझ रहे हैं कि मल्टीपल में जितने ज्यादा नेता होंगे उतना ही उनकी नाक में दम रहेगा । इसीलिए उन्होंने जितेंद्र चौहान के नेता बनने से पहले ही पर कतर देने की योजना बना डाली है । मजे की बात यह हुई है कि मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के जिस चुनाव के जरिये जितेंद्र चौहान ने मल्टीपल में नेता बनने की तैयारी की थी, मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के उसी चुनाव को नरेश अग्रवाल ने जितेंद्र चौहान के पर कतर देने के मौके के रूप में इस्तेमाल किया है ।
इस प्रसंग में गौर करने वाला तथ्य यह है कि डिस्ट्रिक्ट में जितेंद्र चौहान के सहजीव रतन जैन के साथ यूँ तो तनातनी वाले संबंध ही थे, लेकिन जब मौका आया तब मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद की सहजीव रतन जैन की उम्मीदवारी की डोर जितेंद्र चौहान के हाथ में ही दिखी । जितेंद्र चौहान ने दरअसल समझ लिया था कि उन्हें यदि अपने आप को मल्टीपल में नेता बनाना/साबित करना है तो उन्हें यह दिखाना/जताना होगा कि अगला मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन तो वह बनेगा, जिसे वह चाहेंगे । मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के लिए सहजीव रतन जैन की उम्मीदवारी का झँडा उठाना उनके लिए मजबूरी इसलिए भी बना, क्योंकि एक तो सहजीव रतन जैन उनके ही डिस्ट्रिक्ट के हैँ; और दूसरे, मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के लिए अन्य जो उम्मीदवार थे उनकी उम्मीदवारी के झंडे दूसरे नेताओं ने थाम रखे थे; और तीसरी बात यह कि मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के लिए जो भी उम्मीदवार थे उनमें सहजीव रतन जैन का पलड़ा भारी दिख रहा था । जितेंद्र चौहान ने मौका ताड़ा और यह समझने में कोई देर नहीं की कि सहजीव रतन जैन की उम्मीदवारी के सहारे वह मल्टीपल में अपनी नेतागिरी का जलवा दिखा देंगे । डिस्ट्रक्ट में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद पर अपने उम्मीदवार को जितवा पाने में असफल रहने के बाद तो जितेंद्र चौहान ने सहजीव रतन जैन की उम्मीदवारी का झँडा और भी कसकर पकड़ लिया । जितेंद्र चौहान को लगा कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में उनकी जो फजीहत हुई है उसकी भरपाई वह मल्टीपल की चुनावी राजनीति में कर लेंगे । यह भरपाई करने के लिए ही जितेंद्र चौहान कुछेक जगह सहजीव रतन जैन के चुनाव अभियान में उनके साथ गए ।
नरेश अग्रवाल ने जितेंद्र चौहान की इस सक्रियता में मल्टीपल की चुनावी राजनीति में एक और नेता के 'पैदा' होने को देखा । नरेश अग्रवाल की दूरदृष्टि ने उन्हें आगाह किया कि जितेंद्र चौहान को उन्होंने यदि यहीं नहीं रोका तो फिर भविष्य में उनके लिए समस्या होगी । नरेश अग्रवाल ने यह भी समझ लिया कि जितेंद्र चौहान को वह मीठे सपने दिखा कर ही सहजीव रतन जैन की उम्मीदवारी के समर्थन से अलग और दूर कर सकते हैं । चूहेदानी में लगे रोटी के टुकड़े की तरफ बढ़ते हुए बेचारे चूहे को यह आभास भी नहीं होता है कि यह जाल उसे पकड़ने के लिए बिछाया गया है । नरेश अग्रवाल ने जितेंद्र चौहान को ज़िम्मेदारी सौंपी कि उन्हें प्रयास करना चाहिए कि मल्टीपल में काउंसिल चेयरपरसन पद के लिए चुनाव नहीं होना चाहिए, क्योंकि चुनाव से लोगों के बीच मनमुटाव होगा और मल्टीपल की बदनामी होगी । नरेश अग्रवाल ने यह कहकर जितेंद्र चौहान में हवा भरी कि उन्हें विश्वास है कि वह यह 'काम' कर सकते हैं - तो जितेंद्र चौहान तो उड़ने लगे । उन्हें लगा कि नरेश अग्रवाल उन्हें इतनी तवज्जो दे रहे हैं, तो वह तो बिना कुछ किए-धरे ही नेता बन गये । जितेंद्र चौहान यह समझ ही नहीं पाए, या उन्होंने समझने की जरुरत ही नहीं समझी कि नरेश अग्रवाल लोगों में हवा भर कर उन्हें 'उड़ाने' की कला के बड़े ऊँचे कलाकार हैं ।
नरेश अग्रवाल यूँ तो मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के चुनाव में तटस्थ दिखने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन जितेंद्र चौहान को जिस कलाकारी के साथ उन्होंने सहजीव रतन जैन की उम्मीदवारी के समर्थन से अलग किया, वह उनकी पक्षपाती भूमिका का नजारा पेश करता है । कई लोगों का कहना है कि नरेश अग्रवाल यदि सचमुच यह चाहते हैं कि मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के चुनाव में राजनीति न हो तो जो पट्टी वह जितेंद्र चौहान को पढ़ा रहे हैं, उसे वह विनोद खन्ना और जेपी सिंह को क्यों नहीं पढ़ाते, जिन्होंने मल्टीपल को राजनीति का अखाड़ा बनाया हुआ है । नरेश अग्रवाल ऐसा इसलिए नहीं करेंगे क्योंकि विनोद खन्ना और जेपी सिंह की राजनीति उन्हेंं सूट करती है । जगदीश राय गोयल मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन बनेंगे तो नरेश अग्रवाल को कोई समस्या नहीं होगी, क्योंकि जगदीश राय गोयल तो सिर्फ़ रबड़ स्टैम्प बन कर रहेंगे और इस रबड़ स्टैम्प का इस्तेमाल करने वाले विनोद खन्ना और जेपी सिंह वही करेंगे जो उन्हें सूट करेगा । लेकिन यदि सहजीव रतन जैन मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन बनेंगे तो एक तो वह रबड़ स्टैम्प नहीं बनेंगे और दूसरे मल्टीपल में जितेंद्र चौहान के रुप में एक नेता और 'पैदा' हो जायेगा ।
नरेश अग्रवाल ने जितेंद्र चौहान को जिस तरह से फाँसा है उसमें उनका स्वार्थ तो दिखता है, लेकिन जितेंद्र चौहान उनके जाल में क्या सोच कर फँसे हैं यह उनके नजदीकियों की भी समझ में नहीं आ रहा है । जितेंद्र चौहान के नजदीकियों का ही कहना है कि जितेंद्र चौहान यदि यह सोच कर नरेश अग्रवाल के जाल में फँसे हैं कि ऐसा करके वह नरेश अग्रवाल की गुडबुक में आ जायेंगे, तो वह बड़े भ्रम में हैं । नरेश अग्रवाल की गुडबुक में तो वह आ जायेंगे - लेकिन वहाँ उनका नंबर सौवाँ होगा या पाँच सौवाँ, कौन जानता है; और फिर नरेश अग्रवाल की गुडबुक में दस नंबर के बाद जिनका भी नाम होता है - नरेश अग्रवाल उन्हें सिर्फ इस्तेमाल करते हैं, उनके काम नहीं आते । जितेंद्र चौहान के शुभचिंतकों का कहना है कि जितेंद्र चौहान को समझना चाहिए कि वह यदि नरेश अग्रवाल की गुडबुक के पहले दस नामों में अपना नाम लिखवाना चाहते हैं तो पहले उन्हें अपने आप को साबित करना होगा । मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के लिए होने जा रहा चुनाव उन्हें अपने आप को साबित करने का मौका दे रहा है - चाहें तो वह इस मौके का फायदा उठा सकते हैं । अन्यथा उनके जैसे को - जो डिस्ट्रिक्ट में अपने उम्मीदवार को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का चुनाव न जितवा सके और मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के 'अपने' उम्मीदवार को बीच में ही छोड़ कर निकल ले - नरेश अग्रवाल ही क्या, कोई भी भला नेता क्यों मानेगा ? जितेंद्र चौहान के साथ हमदर्दी ऱखने वाले लोगों का यही कहना है कि जितेंद्र चौहान को यदि मल्टीपल में अपनी धाक जमानी है और डिस्ट्रिक्ट में झटका खाई अपनी पहचान पर पड़ी धूल को साफ करना है तो उन्हें सहजीव रतन जैन की उम्मीदवारी का झँडा फिर से उठा लेना चाहिए और इस बात को समझना चाहिए कि मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के चुनाव में जीत के साथ मुकुट भले ही सहजीव रतन जैन के माथे पर सजेगा, लेकिन नेतागिरी उनकी जमेगी ।

Monday, May 12, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में चेयरपरसन पद के चुनाव में सहजीव रतन जैन का समर्थन करने के जरिये डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के नरेश गुप्ता अपने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा को पद मिलने की सँभावना खत्म करने का सौदा कर सकते हैं

नई दिल्ली । मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के चुनाव के शुभ-अवसर पर डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नरेश गुप्ता और उनकी नकेल थामे रखने वाले डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर अजय बुद्धराज तथा राकेश त्रेहन बड़े असमंजस में फँस गए हैं । इस शुभ-अवसर ने उनके सामने एक 'बलि' लेने का मौक़ा बनाया है; समस्या उनके सामने लेकिन यह फैसला करने की आ पड़ी है कि वह किसकी 'बलि' लें - अभी इस वर्ष सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुने गये आरके शाह की, या डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा की ? उल्लेखनीय है कि अभी तक उन्होंने आरके शाह की 'बलि' लेने का फैसला किया हुआ था, और इसके लिए उनका पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर विनोद खन्ना के साथ सौदा हो चुका था । विनोद खन्ना ने जगदीश राय गोयल को मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन चुनवाने का ठेका लिया हुआ है । नरेश गुप्ता का वोट अपनी जेब में लिए घूम रहे अजय बुद्धराज और राकेश त्रेहन ने विनोद खन्ना के साथ सौदा किया - जिसके तहत नरेश गुप्ता के वोट के बदले में विनोद खन्ना ने उन्हें भरोसा दिलाया कि आरके शाह के चुने जाने को लायंस इंटरनेशनल से वह निरस्त करवायेंगे । अजय बुद्धराज और राकेश त्रेहन को विनोद खन्ना के इस भरोसे पर इसलिए भरोसा हुआ क्योंकि वही क्या, सभी जानते हैं कि विनोद खन्ना के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की लाइन में लगने जा रहे नरेश अग्रवाल के साथ बहुत ही खास संबंध हैं । ऐसे में, नरेश अग्रवाल के जरिये लायंस इंटरनेशनल में कोई भी फैसला करवा लेना तो विनोद खन्ना के लिए जरा भी मुश्किल नहीं होगा ।
विनोद खन्ना से मिले इस भरोसे के कारण ही अजय बुद्धराज और राकेश त्रेहन अपने डिस्ट्रिक्ट में लोगों को यकीन दिला रहे हैं कि लायंस इंटरनेशनल का फैसला आरके शाह के खिलाफ ही आयेगा । आरके शाह से चुनाव में पराजित हुए विक्रम शर्मा को तो विनोद खन्ना से मिले भरोसे पर इतना ज्यादा भरोसा है कि वह बाकायदा ईमेल करके लोगों को आगाह कर रहे हैं कि आरके शाह को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मत मानों क्योंकि लायंस इंटरनेशनल उनके ख़िलाफ ही फैसला देगा ।
मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के लिए होने वाली जिस चुनावी लड़ाई ने आरके शाह की 'बलि' लेने का मौका बनाया है, उसी चुनावी लड़ाई ने लेकिन मामला गड़बड़ा भी दिया है । हुआ यह कि सहजीव रतन जैन को मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन बनाने/बनवाने वाले खेमे के नेताओं ने विजय शिरोहा को वाइस चेयरपरसन या सेक्रेटरी बनाने की बात शुरू की । यह बात सुनकर अजय बुद्धराज और राकेश त्रेहन के तो तोते उड़ गए । अब वह इस कोशिश में जुटे कि उन्हें चाहें कुछ भी करना पड़े, विजय शिरोहा को मल्टीपल काउंसिल में कोई भी पद न मिले । इसके लिए उन्होंने सहजीव रतन जैन की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं से संपर्क किया और उन्हें नरेश गुप्ता का वोट ऑफर करते हुए उनसे वायदा लेने का प्रयास करना शुरु किया कि विजय शिरोहा को वह मल्टीपल काउंसिल में कोई जगह नहीं देंगे । विनोद खन्ना को जब इसकी भनक लगी तो वह भड़के और अजय बुद्धराज व राकेश त्रेहन से पूछ बैठे कि आरके शाह को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद से नहीं हटवाना है क्या ?
अजय बुद्धराज और राकेश त्रेहन के सामने यही समस्या पैदा हो गई है । उनके लिए यह फैसला करना मुश्किल हो रहा है कि मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के लिए नरेश गुप्ता के वोट के बदले में वह क्या पाने का सौदा करें - वह आरके शाह को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद से हटवाने का सौदा करें या विजय शिरोहा को मल्टीपल काउंसिल में कोई पद न मिलने का ?
अजय बुद्धराज और राकेश त्रेहन के नजदीकियों की बात मानें तो उन्हें सहजीव रतन जैन के समर्थकों के साथ सौदेबाजी करना ज्यादा जरूरी लग रहा है । दरअसल उनकी लड़ाई है ही विजय शिरोहा के साथ । आरके शाह को निशाने पर लेकर तो वास्तव में वह विजय शिरोहा को ही 'हराना' चाहते हैं । इसके अलावा, अजय बुद्धराज और राकेश त्रेहन भी जानते/समझते हैं कि आरके शाह का कुछ भी बिगड़ने नहीं जा रहा है; लायंस इंटरनेशनल को प्रत्येक वर्ष कई एक डिस्ट्रिक्ट्स से चुनाव के खिलाफ शिकायतें मिलती हैं और लायंस इंटरनेशनल के लोग भी जानते/समझते हैं कि शिकायत करने वाले लोग नकारात्मक सोच रखने वाले और रोना-धोना मचाने वाले लोग होते हैं जिनकी शिकायतों पर ध्यान न देने में ही लायनिज्म की भलाई है । जहाँ तक विनोद खन्ना की मदद का सवाल है तो अभी तक तो विनोद खन्ना द्धारा मदद होती हुई दिखी नहीं है । जिन नरेश अग्रवाल के भरोसे विनोद खन्ना मदद करने की बात कर रहे हैं वह नरेश अग्रवाल जहाँ मौका मिलता है - आरके शाह को अपनी बगल में बैठाते हैं । आरके शाह को मल्टीपल काउंसिल की मीटिंग में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उचित पहचान और सम्मान मिलने जा रहा है; लायंस इंटरनेशनल की तरफ से होने जा रही स्कूलिंग का निमंत्रण उन्हें मिला है - इस सबसे स्पष्ट है कि लायंस इंटरनेशनल भी और मल्टीपल काउंसिल भी आरके शाह को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मान रहे हैं । अजय बुद्धराज और राकेश त्रेहन अपने नज़दीकियों से कह भी देते हैं कि आरके शाह के चुनाव को निरस्त करवाने का जो शोर उन्होंने मचा/मचवा रक्खा है वह तो बस विक्रम शर्मा को उल्लू बनाने की उनकी योजना का हिस्सा है । उनके लिए तो खुशी की बात यही है कि विक्रम शर्मा उन पर अभी भी भरोसा कर रहे हैं ।
मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के लिए सहजीव रतन जैन की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने लेकिन विजय शिरोहा को मल्टीपल काउंसिल में लेने को लेकर जो बात चलाई है, उसके चलते विक्रम शर्मा को उल्लू बनाये रखने खातिर चलाये जा रहे नाटक को जारी रखने में अजय बुद्धराज और राकेश त्रेहन को मुश्किल आ पड़ी है । उन्हें लग रहा है कि आरके शाह का तो वह कुछ नहीं बिगाड़ पायेंगे - लेकिन अगर यह नाटक करने के चक्कर में विनोद खन्ना के साथ रहे तो विजय शिरोहा मल्टीपल काउंसिल में जगह ज़रुर पा जायेंगे । उन्हें हकीकत समझ में आ रही है कि वह आरके शाह का तो कुछ नहीं बिगाड़ सकेंगे, लेकिन यदि जोर-शोर से प्रयास करें तो विजय शिरोहा को मल्टीपल काउंसिल में पद मिलने से तो जरूर रोक सकते हैं ।
मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद की चुनावी लड़ाई के संदर्भ में अजय बुद्धराज और राकेश त्रेहन के सामने सचमुच यह फैसला करने की चुनौती पैदा हो गई है कि नरेश गुप्ता के वोट के सहारे वह किसे निशाने पर लें - आरके शाह को या विजय शिरोहा को ।

Sunday, May 11, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के चुनाव में जगदीश राय गोयल की जीत को मुश्किल में फँसा देख कर विनोद खन्ना तरह-तरह के हथकंडे अपना कर सहजीव रतन जैन की उम्मीदवारी को वापस कराने के अभियान में जुटे

नई दिल्ली । मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद की चुनावी लड़ाई में जगदीश राय गोयल के मुकाबले सहजीव रतन जैन का पलड़ा भारी देख कर जगदीश राय गोयल की उम्मीदवारी का 'ठेका' लिए पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर विनोद खन्ना अब ब्लैकमेलिंग पर उतर आये हैं । विनोद खन्ना ने मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के लिए सहजीव रतन जैन की उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन के नेताओं के सामने प्रस्ताव रखा है कि वह यदि मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के लिए जगदीश राय गोयल का समर्थन करते हैं, तो उसके बदले में वह मल्टीपल विभाजन के उनके प्रस्ताव में अड़ंगा नहीं डालेंगे । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन के नेताओं के लिए मल्टीपल विभाजन का मुद्दा इस समय सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा है । विनोद खन्ना ने इस बात को समझा/पहचाना और डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन के नेताओं की इस कमजोर नस को दबा दिया है । विनोद खन्ना की इस 'चाल' ने 'काम' तो कुछ किया, लेकिन उनकी (कु)ख्याति ने उनकी चाल को सफल होने का पूरा भरोसा अभी भी नहीं दिया है ।
विनोद खन्ना के नजदीकियों का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन के नेताओं को विनोद खन्ना का ऑफर अच्छा तो लगा है, किंतु अॉफर को स्वीकार करने को लेकर उनमें अभी हिचक भी बनी हुई है । उनकी हिचक का कारण विनोद खन्ना खुद हैं । दरअसल डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन के नेता जानते हैं कि विनोद खन्ना एक बहुत ही धूर्त और झूठा किस्म का व्यक्ति है - इसलिए उन्हें डर है कि विनोद खन्ना की बातों में आकर उन्होंने मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के लिए जगदीश राय गोयल का समर्थन यदि कर भी दिया तब भी कोई जरूरी नहीं है कि मल्टीपल विभाजन के मुद्दे को किसी न किसी बहाने से विनोद खन्ना अटका न दे । असल में, मल्टीपल विभाजन के मुद्दे पर विनोद खन्ना का अभी तक जो रवैया रहा है; उससे लोगों के बीच यही संदेश है कि विनोद खन्ना किसी भी तरह से मल्टीपल को विभाजित नहीं होने देना चाहते हैं । इसीलिए डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन के नेताओं के गले यह बात नहीं उतर रही है कि जगदीश राय गोयल को मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन बनवाने के लिए विनोद खन्ना मल्टीपल को विभाजित होता देखने के लिए तैयार हो जायेंगे । इस तर्क के साथ, विनोद खन्ना के अभी तक के 'चरित्र' को याद करते हुए डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन के नेताओं को लग रहा है कि उक्त अॉफर की आड़ में विनोद खन्ना उनके साथ कोई खेल खेल रहे हैं - और इसी कारण से विनोद खन्ना के अॉफर को आकर्षक मानने और उसे स्वीकार कर लेने के प्रति झुकाव दिखाने के बावजूद डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन के नेताओं ने उक्त ऑफर को अभी स्वीकार करने की घोषणा नहीं की है ।
डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन के नेताओं ने विनोद खन्ना के ऑफर को स्वीकार करने की घोषणा अभी इसलिए भी नहीं की है - क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके समर्थन न करने के बाद भी सहजीव रतन जैन को यदि पर्याप्त समर्थन मिल गया और वह मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन बन गए और उसके बाद विनोद खन्ना ने भी उन्हें धोखा दे दिया - तो वह तो कहीं के भी नहीं रहेंगे । गौर करने की बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन के नेताओं को विनोद खन्ना द्धारा दिए गए ऑफर की बात सामने आने के बाद सहजीव रतन जैन ने साफ घोषणा कर दी है कि वह किसी भी हालत में मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को नहीं छोड़ेंगे । सहजीव रतन जैन को यह घोषणा दरअसल इसलिए करनी पड़ी, क्योंकि डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन के नेताओं को ऑफर देने के बाद; अपने ऑफर के प्रति डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन के नेताओं को फिसलता देख कर विनोद खन्ना ने दावा करना शुरु कर दिया था कि डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन के नेताओं के समर्थन से पीछे हटने के बाद सहजीव रतन जैन के सामने अपनी उम्मीदवारी को वापस लेने के अलावा कोई चारा ही नहीं बचेगा । सहजीव रतन जैन ने लेकिन अपनी उम्मीदवारी से पीछे न हटने का फैसला सुना कर विनोद खन्ना के दावे की हवा निकाल दी है ।
मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के इस बार के चुनावी परिदृश्य पर निगाह लगाए लोगों का मानना और कहना है कि विनोद खन्ना को चुनाव होने की स्थिति में जगदीश राय गोयल को जितवाना मुश्किल दिख रहा है - इसलिए वह किसी भी तरह से चुनाव की स्थिति को टालना चाहते हैं और इसके लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना कर वह सहजीव रतन जैन की उम्मीदवारी को वापस कराना चाहते हैं । इसीलिए सहजीव रतन जैन के समर्थकों को तरह-तरह के ऑफर देकर वह ऐसे हालात बना देने का प्रयास कर रहे हैं, जिससे कि सहजीव रतन जैन खुद ही अपनी उम्मीदवारी से पीछे हट जाएँ और वाइस चेयरपरसन या सेक्रेटरी बनने को राजी हो जाएँ । सहजीव रतन जैन के अभी तक के तेवरों से और डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन के नेताओं के विनोद खन्ना पर भरोसा न करने के संकेतों से तो यही लग रहा है कि विनोद खन्ना की दाल गल नहीं रही है । विनोद खन्ना लेकिन इससे अभी निराश नहीं हुए हैं और अपनी चालबाजियों को आजमाना उन्होंने जारी रखा हुआ है - इसलिए आगे कुछ दिलचस्प दृश्य देखने को अभी मिलते रहेंगे ।

Friday, May 9, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 में काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में विनोद बंसल और संजय खन्ना को नीचा दिखाने की कोशिश उल्टी पड़ने के कारण रमेश अग्रवाल की जैसी जो फजीहत हुई, उससे यह साफ हो गया है कि रमेश अग्रवाल अपने जैसी बदनामी जेके गौड़ की भी करवायेंगे

नई दिल्ली । सुशील गुप्ता के जिस सुझाव को मुद्दा बना कर रमेश अग्रवाल ने विनोद बंसल और संजय खन्ना को अपमानित करने की कोशिश की, वह रमेश अग्रवाल को उल्टी पड़ी और फिर कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने रमेश अग्रवाल को बुरी तरह 'धोया' । रमेश अग्रवाल लेकिन चूँकि बेशर्म किस्म का व्यक्ति है, इसलिए यह उम्मीद तो किसी को नहीं रही कि जो हुआ उससे रमेश अग्रवाल ने कोई सबक लिया होगा - किंतु हर किसी ने इस बात पर बड़ी निराशा-सी व्यक्त की कि रमेश अग्रवाल को ऐसा शौक आखिर क्यों है कि अपनी 'पिटाई' के मौके वह खुद बनाता रहता है और अपनी खिल्ली उड़वाता है ।
मामला पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के एक सुझाव का था । सुशील गुप्ता ने एक पत्र लिख कर काउंसिल ऑफ गवर्नर्स के सदस्यों के बीच सुझाव रखा कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर (इलेक्ट) को अपने कार्यक्रमों को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों और उनके क्लब्स से स्पॉन्सर नहीं कराना चाहिए । काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में रमेश अग्रवाल को पता नहीं क्यों ऐसा लगा कि सुशील गुप्ता के इस सुझाव की आड़ में वह विनोद बंसल और संजय खन्ना को अपमानित कर सकते हैं । रमेश अग्रवाल को किसी भी विषय पर चूँकि बेसिरपैर की बकवास करने की आदत है, इसलिए वह सुशील गुप्ता के सुझाव का समर्थन करते हुए तरह-तरह की बकवास करने लगे और किसी न किसी तरह से विनोद बंसल और संजय खन्ना को लपेटने की कोशिश करने लगे । उन्हें रोकने की कोशिश करते हुए किसी ने उनसे कहा भी कि सुशील गुप्ता का जो सुझाव है, उसका यहाँ कोई भी विरोध नहीं कर रहा है इसलिए इस बारे में इतना हल्ला करने की क्या जरूरत है । किसी ने रमेश अग्रवाल को याद दिलाया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उन्होंने भी तो उम्मीदवारों से पैसे लिए थे, तो अब इस मामले में इतना क्यों बोल रहे हो ? यह बात मुहावरे की भाषा में कहें तो रमेश अग्रवाल के मुँह पर सीधा तमाचा था - लेकिन जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि वह इतना बेशर्म किस्म का व्यक्ति है कि उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ा और उसने उक्त मुद्दे पर अपनी बकवास करना जारी रखा । दूसरे लोगों ने इससे यही निष्कर्ष निकाला कि रमेश अग्रवाल इस तरह से दरअसल सुशील गुप्ता को खुश करने की कोशिश कर रहे हैं ।
उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार और उनके क्लब्स डिस्ट्रिक्ट के कार्यक्रमों को स्पॉन्सर करते ही रहे हैं । और ऐसा सिर्फ डिस्ट्रिक्ट 3010 में ही नहीं, बल्कि सभी डिस्ट्रिक्ट्स में होता है । और ऐसा सिर्फ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार ही नहीं करते हैं, बल्कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के और इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद के उम्मीदवार भी करते हैं । माना/समझा जाता है कि महत्वाकांक्षी और आगे बढ़ने की इच्छा रखने वाले रोटेरियन ही कार्यक्रमों को स्पॉन्सर करने के लिये आगे आयेंगे - और इसीलिए इस 'व्यवस्था' को स्वीकार कर लिया गया है । रोटरी में जो व्यवस्था सर्वमान्य रूप से स्वीकार है - और पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में, तथा फिर इंटरनेशनल डायरेक्टर के रूप में जो सुशील गुप्ता खुद इस व्यवस्था को अपनाये रहे हैं वही अचानक से इस व्यवस्था के खिलाफ क्यों हो गये; यह किसी के लिए भी समझना मुश्किल रहा । अधिकतर लोगों का यही मानना/कहना रहा कि सुशील गुप्ता को समय-समय पर अपनी अहमियत दिखाने का जो शौक है, उसे पूरा करने के लिए वह इसी तरह की 'हरक़तें' करते रहते हैं । दरअसल इसीलिए किसी ने भी सुशील गुप्ता के इस सुझाव को कोई तवज्जो ही नहीं दी - न विरोध किया और न समर्थन किया । रमेश अग्रवाल ने मौका ताड़ा और सुशील गुप्ता को खुश करने के लिए भारी नाटक कर डाला । इस नाटक के जरिये रमेश अग्रवाल ने एक तरफ़ सुशील गुप्ता को खुश करने की कोशिश की तो दूसरी तरफ विनोद बंसल और संजय खन्ना को नीचा दिखाने की कोशिश की ।
इस कोशिश में लेकिन रमेश अग्रवाल ने अपना तमाशा बनवा लिया । उनका तमाशा दो कारणों से बना - एक कारण तो यह रहा कि उन्होंने मामले को 'आउट ऑफ प्रोपोर्शन' प्रोजेक्ट किया; और दूसरा कारण उनके खिलाफ हुई वह छींटाकशी बनी जिसमें कहा/सुना गया कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में अभी पिछले रोटरी वर्ष में खुद उन्होंने क्या किया था ? काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में कहा/सुना गया कि उम्मीदवार और उनके क्लब्स से 'काम' तो कई गवर्नर्स ने लिए हैं, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रमेश अग्रवाल ने तो उम्मीदवारों से सिर्फ़ काम नहीं निकाले बल्कि उन्हें जमकर लूटा । पहले समर्थन का सब्जबाग दिखा कर आलोक गुप्ता की 'जेब काटी' और फिर जब आलोक गुप्ता का कुछ बनता हुआ नहीं दिखा तो गिरगिट की तरह रंग बदल कर जेके गौड़ का समर्थन करना शुरु किया और जेके गौड़ को बुरी तरह लूटा । रमेश अग्रवाल अकेले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हैं जिन्होंने बाकायदा घोषणा की थी कि वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों को पेट्स में नहीं ले जायेंगे - लेकिन फिर अपने ही फैसले को पलटते हुए वह उम्मीदवारों को पेट्स में ले गये, और सिर्फ इसलिए ले गए ताकि उनसे पैसे बसूल कर सकें । सरोज जोशी और ललित खन्ना से चूँकि वह पेट्स में पैसे नहीं ले सके इसलिए उनकी उम्मीदवारी को ही निरस्त करने की नीचता तक करने पर रमेश अग्रवाल उतरे । वह तो जब तत्कालीन इंटरनेशनल डायरेक्टर यशपाल दास ने रमेश अग्रवाल के 'कान उमेठे' तब रमेश अग्रवाल ने सरोज जोशी और ललित खन्ना की उम्मीदवारी को स्वीकार किया । इस प्रसंग के कारण पूरे रोटरी समाज में रमेश अग्रवाल की भारी थू-थू हुई और हर किसी का कहना रहा कि ऐसा लालची गवर्नर तो उन्होंने कहीं नहीं देखा । यह सच है कि पेट्स में गए उम्मीदवारों से पैसे लेने का काम कुछेक दूसरे गवर्नर्स ने भी किया है, लेकिन रमेश अग्रवाल ने इस काम को जिस शेखचिल्लीपने और बेशर्मी के साथ किया - वैसा उदाहरण रोटरी में दूसरा नहीं मिलेगा । काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में यही बात हुई कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में जिस रमेश अग्रवाल ने अभी मात्र एक वर्ष पहले शर्मनाक कारस्तानियाँ की थीं और जिनके कारण भारी बदनामी पाई है - वह रमेश अग्रवाल अब इस मुद्दे पर किस मुँह से बोल रहा है ?
काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में रमेश अग्रवाल की जो फजीहत हुई उसने जेके गौड़ के लिए अजीब-सा संकट खड़ा कर दिया है । अपनी हरकतों के कारण रमेश अग्रवाल को जिस तरह काउंसिल ऑफ गवर्नर्स के सदस्यों के बीच ही नहीं, बल्कि डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच भी विरोध का सामना करना पड़ रहा है - जिसकी बानगी अभी हाल ही में सीओएल के चुनाव में उनकी दोहरी हार के रूप में देखी गई; जिसमें पहले तो वह काउंसिल ऑफ गवर्नर्स के बीच हुए चुनाव में हारे, और फ़िर लोगों के बीच हुए चुनाव में लोगों ने भी उन्हें दुत्कार दिया । जेके गौड़ को जैसे आभास है कि वह अपना गवर्नर-काल जिस रमेश अग्रवाल के भरोसे चलाना चाहते हैं उस रमेश अग्रवाल के कारण उन्हें सिर्फ़ बदनामी ही मिलने का खतरा है । सीओएल के चुनाव में रमेश अग्रवाल का समर्थन करके जेके गौड़ ने इसे भुगत भी लिया है । रमेश अग्रवाल को लेकर जेके गौड़ दूसरों के सामने रोना तो रोते हैं, लेकिन रमेश अग्रवाल का साथ छोड़ते हुए भी नहीं दिखते हैं । जिन लोगों के सामने जेके गौड़ ने रमेश अग्रवाल का रोना रोया है, उनके लिए हैरानी की बात यही है कि जेके गौड़ को जब रमेश अग्रवाल का साथ नहीं छोड़ना है तब फ़िर वह उनका रोना रोते ही क्यों हैं ? कई लोगों ने इस सवाल पर खासी माथापच्ची की है कि जेके गौड़ का रमेश अग्रवाल के साथ आखिर ऐसा कौन सा 'रिश्ता' है जिसने उन्हें मजबूर किया हुआ है कि वह बदनाम होने, अलग-थलग पड़ने और रोना रोने के बावजूद रमेश अग्रवाल से अलग नहीं हो सकते हैं । काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में रमेश अग्रवाल की जैसी जो फजीहत हुई उसने जेके गौड़ के लिए भी खतरे की घंटी बजा दी है - लोगों ने मान लिया है कि रमेश अग्रवाल ने रोटरी में अपने लिए जिस तरह की बदनामी कमाई है, उसी तरह की बदनामी वह जेके गौड़ को भी दिलवायेंगे ।

Sunday, May 4, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में शिव कुमार चौधरी के किस्से से सबक लेते हुए सुरेंद्र गर्ग और अजय सिंघल ने मुकेश गोयल का अभिनंदन करने का कार्यक्रम बना डाला है

गाजियाबाद । मुकेश गोयल की तो निकल पड़ी है । अभी कुछ समय पहले तक डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में अलग-थलग कर दिए - और मान लिए गए - मुकेश गोयल के दिन ऐसे फिरे हैं कि लायंस क्लब गाजियाबाद के पूर्व अध्यक्ष अजय सिंघल अपने क्लब के एक अन्य प्रमुख सदस्य सुरेंद्र गर्ग के साथ मिलकर मुकेश गोयल का अभिनंदन समारोह आयोजित कर रहे हैं । लायंस क्लब गाजियाबाद के दो प्रमुख सदस्यों का मुकेश गोयल के लिए अभिनंदन समारोह आयोजित करना एक बड़ी राजनीतिक घटना इस कारण से है - क्योंकि इस क्लब में आरएन गुटगुटिया और मलकीत सिंह जस्सर नाम के जो दो पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हैं, उनका मुकेश गोयल के साथ खुले विरोध का रिश्ता कोई छिपी हुई बात नहीं है; और मुकेश गोयल के लिए हो रहे अभिनंदन समारोह के निमंत्रण पत्र में पचास लोगों के नाम छपे हैं, लेकिन अभिनंदन समारोह आयोजित करने वाले क्लब के दो पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के नाम के लिए उसमें जगह नहीं बन सकी । मुकेश गोयल के अभिनंदन समारोह में क्लब के दो प्रमुख लोगों के साथ किया जाने वाला यह सौतेलापन इसलिए भी उल्लेखनीय है - क्योंकि मुकेश गोयल के इस अभिनंदन समारोह को अगले लायन वर्ष मैं सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अजय सिंघल की उम्मीदवारी के लॉन्चिंग पैड के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है ।
यहाँ यह याद करना भी प्रासंगिक होगा कि लायंस क्लब गाजियाबाद के दो पूर्व गवर्नर्स का ही मुकेश गोयल के साथ बैर नहीं हैँ; खुद लायंस क्लब गाजियाबाद के भी मुकेश गोयल के साथ खुले विरोध के संबंध रहे हैं । लायंस क्लब गाजियाबाद में एक से अधिक बार बोर्ड मीटिंग में बाकायदे प्रस्ताव पास हुए हैं कि मुकेश गोयल को क्लब के किसी कार्यक्रम में घुसने नहीं देना है । क्लब में मुकेश गोयल के खिलाफ विरोध का झंडा कई बार सुरेंद्र गर्ग के हाथों में ही रहा है । लेकिन समय ने पलटा खाया है; राजनीति में वैसे भी दोस्तियाँ और दुश्मनियाँ अपने अपने स्वार्थों के हिसाब से अदलती/बदलती रहती हैं । इसलिए यह देख कर किसी को भी आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि पीछे कई मौकों पर मुकेश गोयल के विरोध का झँडा उठाते रहे सुरेंद्र गर्ग अब माला लिए मुकेश गोयल का अभिनंदन करने को प्रस्तुत नजर आ रहे हैं ।
यह देख कर आश्चर्य भले ही न हो, लेकिन यह कहना तो बनता ही है - जैसा कि इस रिपोर्ट के शुरु में कहा गया है - कि मुकेश गोयल की तो निकल पड़ी है ।
यहाँ इस तथ्य को याद करना पूरे प्रसंग को समझने में मदद ही करेगा कि लायंस क्लब गाजियाबाद में जो दो पूर्व गवर्नर हैं, वह अभी भले ही मुकेश गोयल के खिलाफ हों लेकिन जब उम्मीदवार थे तब मुकेश गोयल की शरण में ही थे ।
अभी, इस वर्ष सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुने गये शिव कुमार चौधरी का मामला भी दिलचस्प है । शिव कुमार चौधरी की उम्मीदवारी पहली बार प्रकट ही इस उद्घोषणा के साथ हुई थी कि उन्हें डिस्ट्रिक्ट में मुकेश गोयल की राजनीति खत्म करनी है । अपना पहला चुनाव सुनील निगम से बुरी तरह हारने के बाद भी शिव कुमार चौधरी के मुकेश गोयल विरोधी तेवरों में कोई कमी नहीं थी । करीब छह महीने तक वह मुकेश गोयल को गालियाँ देते रहे और दावा करते रहे कि मुकेश गोयल की मदद के बिना ही वह जीत के दिखायेंगे और मुकेश गोयल की राजनीति को हमेशा हमेशा के लिए खत्म करेंगे । लेकिन फिर उनके दिमाग की बत्ती जली और उसके जलने से जो रोशनी हुई उससे उन्हेँ समझ में आ गया कि इस तरह की डीगों से कुछ नहीं होगा और मुकेश गोयल की शरण में जाये बिना उनका काम नहीं बनेगा । सो शिव कुमार चौधरी ने फटाक से गुलाटी खाई और मुकेश गोयल को गालियाँ देना छोड़ उनकी शरण में जा पहुँचे । कई लोगों ने कहा भी कि यह तो दोगलापन दिखाना होगा; थूक के चाटने जैसी बात होगी - अभी तक मुकेश गोयल को गाली दे रहे थे और अब उनकी जयजयकार करोगे । शिव कुमार चौधरी ने लेकिन इस तरह की बातें करने वाले लोगों को यह कह कर चुप कर दिया कि इसमें क्या है, अपना थूका हुआ ही तो चाटना है, उसमें क्या दिक्कत है, उसमें कैसी शर्म ? चुनावी नतीजे ने साबित किया कि शिव कुमार चौधरी ने दिमाग की बत्ती जलने के बाद मुकेश गोयल को लेकर जो फैसला किया, वह सही था ।
शिव कुमार चौधरी का यह जो किस्सा रहा, उससे सबक लेने में सुरेंद्र गर्ग और अजय सिंघल ने कोई देर नहीं की । जिस 'गलती' के कारण शिव कुमार चौधरी और उनके सलाहकारों को पहला चुनाव बुरी तरह से हारना पड़ा था, उस गलती का लोगों के बीच कोई आभास भी न पैदा हो - इसका ख्याल रखते हुए ही सुरेंद्र गर्ग और अजय सिंघल ने मुकेश गोयल का अभिनंदन करने का कार्यक्रम बना डाला । इन्होंने, लगता है कि अपनी पिछली गलतियों से भी सबक सीखा है । सुरेंद्र गर्ग ने क्लब में अध्यक्ष बनने की 'लाइन' को तोड़ कर अजय सिंघल को अध्यक्ष बनाने की जो कोशिश की थी, उसमें उन्हें एक से अधिक बार मात खानी पड़ी थी । अजय सिंघल अंततः तब ही क्लब के अध्यक्ष बन सके थे, जब वह 'लाइन' में आये थे । उस अनुभव से उन दोनों को ही 'तरीके' से काम करने की नसीहत निश्चित ही मिली होगी । मुकेश गोयल का अभिनंदन समारोह आयोजित करके अजय सिंघल और सुरेंद्र गर्ग ने जता/दिखा दिया है कि 'तरीके' से काम करना उन्होंने सीख़ लिया है ।

Saturday, May 3, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 में छह मई को होने जा रही काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल बेनामी अपमानपूर्ण ईमेल भेजने वाले हरकती का नाम सचमुच में सामने लायेंगे क्या ?

नई दिल्ली । विनोद बंसल छह मई को होने जा रही काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में रोटरी, डिस्ट्रिक्ट और उनके खुद के साथ किए गए 'अपराध' के अपराधी का नाम उजागर सचमुच में करेंगे क्या ? विनोद बंसल के नजदीकियों ने बताया है कि छह मई की काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में विनोद बंसल ऐसा कुछ विस्फोटक काम करेंगे, जैसा इस डिस्ट्रिक्ट में पहले कभी नहीं हुआ है - और अपने इस काम के जरिये वह डिस्ट्रिक्ट में गंदी राजनीति करने वाले चेहरों को बेनकाब करेंगे । विनोद बंसल के कुछेक ज्यादा नजदीक लोगों ने बताया है कि इस वर्ष डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए हुए चुनाव से पहले विनोद बंसल और उनकी पत्नी संगीता बंसल को बदनाम करने वाली जो बेनामी ईमेल निकली थी, विनोद बंसल ने उसे निकालने वाले का नाम पता कर लिया है - और इसी नाम का खुलासा वह छह मई की काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में करेंगे । विनोद बंसल के इन्हीं नजदीकियों का दावा है कि विनोद बंसल ने उक्त हरकत करने वाले नेता को यह बता भी दिया है, और उक्त हरकती ने अपना अपराध स्वीकार भी कर लिया है; उक्त हरकती ने अपने किये-धरे के लिए विनोद बंसल से माफी भी माँग ली है और उनसे वायदा किया है कि आगे कभी वह इस तरह की हरकत नहीं करेगा । विनोद बंसल के नजदीकियों का कहना है कि विनोद बंसल ने पहले उसे माफ कर देने और उसका नाम सार्वजनिक न करने का फैसला लिया था, और इसीलिए करीब दो महीने पहले पता चल गये उक्त हरकती के नाम को उन्होंने दबा लिया था; लेकिन अब उन्होंने विचार बनाया है कि इस तरह की हरकत करने वाले का नाम सभी के सामने तो आना ही चाहिए, ताकि उसकी और उसके दूसरे संगी-साथियों की हिम्मत आगे ऐसा कुछ करने की न हो ।
विनोद बंसल के नजदीकियों की मानें तो छह मई को होने जा रही काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में विनोद बंसल उस हरकती का नाम जाँच के पूरे तथ्यों के साथ सामने रखेंगे और इस तरह डिस्ट्रिक्ट में पहली बार एक हरकती के चेहरे से मुखौटा हटेगा ।
विनोद बंसल को 'जानने' का दावा करने वाले दूसरे लोगों को लेकिन लगता है कि विनोद बंसल ऐसा कुछ नहीं करेंगे, जैसा कुछ करने का दावा उनके नजदीकी कर रहे हैं । उनका तर्क है कि विनोद बंसल को यदि सचमुच ऐसा कुछ करना होता, तो वह अब तक कर चुके होते - दो महीने से जाँच रिपोर्ट को दबाये बैठे नहीं होते और काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग का इंतजार नहीं कर रहे होते । कई लोगों का कहना है कि 'देख लूँगा' 'देख लूँगा' तो विनोद बंसल उस दिन से कर रहे हैं जिस दिन वह बेनामी ईमेल सामने आई थी; लेकिन जब 'देख लेने' का मौका आया तो विनोद बंसल चुप लगा गये हैं - लगता है कि वह इतने मात्र से ही संतुष्ट हो गए हैं कि उक्त हरकत करने वाले ने उनसे तो माफी माँग ही ली है । कुछेक लोगों को तो शक यह भी है कि विनोद बंसल को सच में उक्त हरकती का पता चला भी है या वह झूठे ही यह दावा करके अपना रौब बना रहे हैं ? यह शक करने वालों का तर्क है कि उक्त बेनामी ईमेल में विनोद बंसल और उनकी पत्नी संगीता बंसल के लिए जिस तरह की अपमानजनक बातें कहीं गईं थीं, उन्हें देखते/पढ़ते हुए उक्त बेनामी ईमेल के पीछे छिपे चेहरे को विनोद बंसल द्धारा जान लेने के बाद भी छिपाए रखने की बात हजम कर पाना मुश्किल है ।
विनोद बंसल के नजदीकियों के दावे के विपरीत, जिन भी लोगों को लगता है कि विनोद बंसल छह मई की काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में कुछ नहीं करेंगे - उनका एक तर्क यह भी है कि विनोद बंसल जिन कुछेक पूर्व गवर्नर्स की बदतमीजी का लगातार शिकार रहे, उनका कभी भी प्रतिवाद नहीं कर सके - प्रतिवाद करना तो दूर की बात, उनके साथ अपनी दूरी तक नहीं बना/दिखा सके । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में रमेश अग्रवाल, विनय कुमार अग्रवाल और मुकेश अरनेजा ने उन्हें लगातार तरह-तरह से परेशान और अपमानित किया, लेकिन वह कभी भी जबावी कार्रवाई करते हुए नहीं दिखे । जेके गौड़ जैसे व्यक्ति तक ने - जिसे लोग न तीन में मानते हैं न तेरह में - उन्हें बुरी तरह खिजाया । इन लोगों से विनोद बंसल हमेशा 'हारते' हुए से नजर आए - तो इसका कारण कुछ लोगों की निगाह में यह रहा कि विनोद बंसल को जबाव देना नहीं आया, तो अन्य कुछेक की निगाह में यह रहा कि विनोद बंसल भले व्यक्ति हैं और उन्होंने घटिया लोगों से निपटने के लिए घटियापन पर उतरने की जरूरत नहीं समझी ।
लेकिन अब - जैसा कि विनोद बंसल के नजदीकियों का दावा है कि विनोद बंसल के लिए यह बताने/दिखाने का समय आ गया कि उन्हें कमजोर समझने वाले कितनी गलतफहमी में थे । नजदीकियों का कहना है कि विनोद बंसल ने दरअसल टकराव को टालने की गरज से अभी तक भले ही बातों को इग्नोर करने वाला रवैया अपनाया हुआ हो, लेकिन अब चूँकि उनके हाथ ऐसा मौका लगा है जिसमें 'साँप भी मरेगा और उनकी लाठी भी नहीं टूटेगी' - लिहाजा वह यह मौका नहीं गँवायेंगे । नजदीकियों के अलावा भी कुछेक अन्य लोगों को भी विनोद बंसल ने चूँकि छह मई को होने जा रही काउंसिल में कुछ विस्फोटक करने/होने के संकेत दिए हैं, इसलिए विनोद बंसल से नाउम्मीद रहने वाले कुछेक लोगों को भी आशा बँधी हैं कि विनोद बंसल अब की बार शायद कुछ कर ही गुजरेंगे । इसी आशा/उम्मीद के चलते छह मई को होने जा रही काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग को लेकर डिस्ट्रिक्ट में खासी उत्सुकता है । छह मई की काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में एक काम तो हालाँकि यह होना है कि संजय खन्ना को अगले रोटरी वर्ष के अपने गवर्नर-काल के लिए बजट पास करवाना है । इस काम में संजय खन्ना के अलावा और किसी की शायद ही कोई दिलचस्पी हो - सभी की दिलचस्पी तो सिर्फ़ इस बात में है कि अपने खिलाफ प्रसारित की गई बेनामी अपमानपूर्ण ईमेल के पीछे छिपे चेहरे से पर्दा हटाने का काम विनोद बंसल करते हैं - और या उस चेहरे को देखने को उत्सुक लोगों को वह निराश छोड़ जाते हैं ।

Thursday, May 1, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 में रोटरी क्लब गाजियाबाद आईडियल के डॉक्टर राजीव गोयल के लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि जिन जेके गौड़ के लिए उन्होंने अपने ही क्लब में अपने विरोधी बना लिए हैं, उन जेके गौड़ ने भी पेट्स में उन्हें महत्व दिलवाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया

गाजियाबाद । पेट्स से लौटने के बाद डॉक्टर राजीव गोयल को अपने क्लब - रोटरी क्लब गाजियाबाद आईडियल - में हवा अपने खिलाफ बहती हुई-सी महसूस हो रही है । क्लब के लोगों का ही कहना है कि डिस्ट्रिक्ट के बड़े नेताओँ तथा पदाधिकारियों तक पहुँच के हवाले से डॉक्टर राजीव गोयल का क्लब में जो एक रुतबा था, पेट्स ने उनके उस रुतबे को गहरी चोट पहुँचाई है । क्लब के लोगों को दरअसल यह जान कर गहरा धक्का लगा है कि डॉक्टर राजीव गोयल की पेट्स में कोई भूमिका ही नहीं थी, और वह वहाँ सिर्फ एक स्पाउस के रूप में उपस्थित थे - उनकी पत्नी चूँकि एक क्लब की अध्यक्ष हैं, इसलिए डॉक्टर राजीव गोयल उनके पति के रुप में ही वहाँ देखे गये । उल्लेखनीय है कि डॉक्टर राजीव गोयल पिछले तीन-चार वर्ष से डिस्ट्रिक्ट में काफी सक्रिय हैं और इन वर्षों में प्रायः प्रत्येक गवर्नर की गुडबुक मैं रहे हैं । अपने व्यक्तित्व, अपने व्यवहार और रोटरी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के चलते वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की ही नहीं, बल्कि डिस्ट्रिक्ट के दूसरे प्रमुख लोगों की निगाह में बसे । इसी कारण से वह डिस्ट्रिक्ट में क्लब के 'ब्रांड एम्बेसेडर' बने - और इस वजह से क्लब में उनका रुतबा बना । क्लब के लोगों को हैरानी की बात यह लगी है कि ऐसे मैं अब अचानक से ऐसा क्या हो गया है कि संजय खन्ना ने उन्हें पेट्स में कोई तवज्जो देने लायक तक नहीं समझा ।
डॉक्टर राजीव गोयल के लिये इससे भी ज्यादा झटके की बात यह रही कि पेट्स में संजय शर्मा और देवेंद्र चौहान को बड़ी सक्रिय भूमिका मिली हुई थी - जिनकी डिस्ट्रिक्ट में कोई ज्यादा सक्रियता भी नहीं रही है । संजय शर्मा हालाँकि अध्यक्ष होने के नाते डिस्ट्रिक्ट के कुछेक कार्यक्रमों मैं सक्रिय रहे भी, लेकिन उसके बावजूद रोटरी में उनकी कोई बहुत महत्वाकाँक्षा को नहीं देखा/पहचाना गया । उनके नजदीकियों का ही कहना रहा है कि उन्होंने अध्यक्ष पद की जिम्मेदारियों का निर्वाह तो बहुत दिलचस्पी और संलग्नता के साथ किया, लेकिन ऐसा कभी आभास नहीं होने दिया कि रोटरी में इसके आगे भी वह कुछ करना चाहते हैं । देवेंद्र चौहान तो इस वर्ष वाइस प्रेसीडेंट ही हैं । इसके बावजूद संजय शर्मा और देवेंद्र चौहान को पेट्स में महत्वपूर्ण भूमिका मिली । क्लब के लोगों में इससे यही संदेश गया है कि डिस्ट्रिक्ट में डॉक्टर राजीव गोयल का कद घटा है और संजय शर्मा को उनकी जगह मिलती दिख रही है । क्लब में और गाजियाबाद में जिन लोगों की डॉक्टर राजीव गोयल के साथ नजदीकी और हमदर्दी है उनका कहना है कि डॉक्टर राजीव गोयल ने जेके गौड़ का साथ देकर अपने क्लब में, अपने शहर के दूसरे क्लब्स के लोगों के बीच और डिस्ट्रिक्ट में अपने आप को बदनाम कर लिया है - और पेट्स में उनके साथ जो हुआ वह इसी बदनामी का नतीजा है ।
जेके गौड़ के कहने में आकर डॉक्टर राजीव गोयल ने पहले तो - दो वर्ष पहले संजय खन्ना और रवि चौधरी के बीच हुए चुनाव में क्लब के तत्कालीन अध्यक्ष अतुल सालवान पर रवि चौधरी का समर्थन करने के लिये दबाव बनाया, लेकिन अतुल सालवान ने जब उनकी बात नहीं मानी तो षड्यंत्र करके उन्हें क्लब से निकलने के लिये मजबूर कर दिया था । अभी, इस वर्ष हुए सीओएल के चुनाव में जेके गौड़ के कहने पर क्लब के वोट रमेश अग्रवाल को दिलवाने के लिए तो डॉक्टर राजीव गोयल ने हद ही कर दी । उन्होंने जो किया उससे क्लब के अध्यक्ष संजय शर्मा की लोगों के बीच भारी बेइज्जती हुई । उल्लेखनीय है कि जेके गौड़ को खुश करने के चक्कर में डॉक्टर राजीव गोयल ने क्लब में सीओएल के लिए रमेश अग्रवाल को वोट देने का फैसला करवा लिया । क्लब में सबकुछ ठीकठाक था - क्लब में डॉक्टर राजीव गोयल का रूतबा था ही; लिहाजा यह फैसला होने मैं कोई दिक्कत नहीं हुई । अध्यक्ष संजय शर्मा भी इस फैसले का पालन करने के लिए तैयार दिख रहे थे । वोट डालने के लिए पहुँचने में कोई अड़चन न आ जाये, इसलिए संजय शर्मा पिछली रात घर नहीं लौटे और दूसरे रोटेरियंस के साथ ही ठहरे । अगले दिन, लेकिन जब वोट डालने का मौका आया तो वहाँ मौजूद हर कोई यह देख कर हैरान रह गया कि रोटरी क्लब गाजियाबाद आईडियल का वोट क्लब के अध्यक्ष संजय शर्मा की बजाये डॉक्टर राजीव गोयल डाल रहे हैं ।
रोटरी के चुनावों में यह हालाँकि होता है - और इस 'होने' को मान्यता भी प्राप्त है - कि अध्यक्ष की बजाये क्लब का कोई दूसरा सदस्य वोट डाले; लेकिन यह तब होता है जब अध्यक्ष किसी कारण से मौके पर उपस्थित न हो पा रहा हो । डॉक्टर राजीव गोयल ने जो किया, उसे देख कर लोगों के हैरान होने का कारण लेकिन यह था कि उनके क्लब के अध्यक्ष संजय शर्मा वहाँ मौके पर मौजूद थे - लेकिन फिर भी वोट देने का काम अध्यक्ष की बजाये डॉक्टर राजीव गोयल कर रहे थे । चर्चा यह सुनी गई कि रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ को चूँकि शक हुआ कि संजय शर्मा उन्हें वोट नहीं देंगे, इसलिए उनके कहने पर डॉक्टर राजीव गोयल ने वोट देने का अधिकार संजय शर्मा से छीन कर खुद ले लिया । चर्चा चली तो उसमें यह भी सुना गया कि डॉक्टर राजीव गोयल ने संजय शर्मा को रमेश अग्रवाल के पैसों पर होटल में ठहरवा कर मौज करवा दी और उसके बदले में उनसे वोट का अधिकार ले लिया - यानि संजय शर्मा ने अपना वोट बेचा । इस तरह की बातें सुनकर संजय शर्मा ने स्वाभाविक ही अपने आप को अपमानित महसूस किया । उन्होंने लोगों को बताने की कोशिश भी की कि होटल में ठहरने का बिल उन्होंने खुद दिया है - रमेश अग्रवाल ने नहीं दिया; लेकिन उनकी बात चर्चा के शोर-शराबे में अनसुनी ही रह गई । किसी किसी ने यह जरूर कहा कि संजय शर्मा को वोट जब नहीँ देना था, तो वह होटल में रुके ही क्यों थे ? संजय शर्मा ने समझ लिया कि वह जिस स्थिति में फँसे हैं उसमें उनके हाथ सिर्फ़ बदनामी ही लगनी है ।
संजय शर्मा ने ही नहीं, संजय शर्मा के नजदीकियों तथा क्लब के लोगों ने भी - और दूसरे लोगों ने भी इस स्थिति के लिये डॉक्टर राजीव गोयल को ही ज़िम्मेदार ठहराया । हर किसी का यही कहना रहा कि जेके गौड़ को खुश करने/रखने के चक्कर में डॉक्टर राजीव गोयल को क्लब के लोगों को और पदाधिकारियों को इस तरह अपमानित नहीं करना चाहिए । संजय शर्मा के साथ हुई हरकत के चलते क्लब में भी - और गाजियाबाद में भी - डॉक्टर राजीव गोयल के खिलाफ माहौल बना । समझा जाता है कि इसी स्थिति को भाँप/पहचान कर संजय खन्ना ने डॉक्टर राजीव गोयल की बजाये संजय शर्मा को तवज्जो देना ज्यादा उपयोगी समझा । पेट्स में लोगों ने जो देखा - वह संभवतः इसी समझ का नतीज़ा था । डॉक्टर राजीव गोयल के लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि जिन जेके गौड़ के लिए उन्होंने अपने ही क्लब में अपने विरोधी बना लिए; उन जेके गौड़ ने भी उनकी मदद नहीं की, और पेट्स में उन्हें महत्व दिलवाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया । डॉक्टर राजीव गोयल के नज़दीकियों का कहना है कि जेके गौड़ यदि चाहते और प्रयास करते तो डॉक्टर राजीव गोयल पेट्स में यूँ अलग-थलग न पड़ते और सिर्फ़ स्पाउस बनके न रह जाते । तो क्या जेके गौड़ ने भी डॉक्टर राजीव गोयल को इस्तेमाल किया - और छोड़ दिया है ?