Wednesday, June 4, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री की कैबिनेट मीटिंग में डिस्ट्रिक्ट में नियमानुसार कामकाज न होने की शिकायत करने वाले चार्टर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डीके अग्रवाल के हर्ष बंसल और नरेश गुप्ता की करतूत पर चुप बने रहने का कारण आखिर क्या है ?

नई दिल्ली । भिवानी में आयोजित हुई डिस्ट्रिक्ट कैबिनेट मीटिंग में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डीके अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट में नियमानुसार कामकाज न होने की जो शिकायत मंच से सार्वजनिक रूप से की, उसे लेकर डिस्ट्रिक्ट के लोगों में एक दिलचस्प किस्म की बहस तेजी से छिड़ गई है । बहस इस बात की कि यह कहने के पीछे डीके अग्रवाल का असली इरादा आखिर क्या था ? कुछ लोगों का कहना है कि यह कह कर डीके अग्रवाल ने दरअसल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा को निशाना बनाया और लोगों के बीच उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश की; कुछेक अन्य लोगों का कहना लेकिन यह है कि डीके अग्रवाल इस तरह की टुच्ची हरकतें नहीं करते हैं और इसीलिए डिस्ट्रिक्ट में उन्हें उन लोगों का भी सम्मान प्राप्त है जो खेमेबाजी के लिहाज से दूसरे खेमे के माने जाते हैं और इसी कारण से मल्टीपल में भी उन्हें अहमियत मिलती है - भिवानी में आयोजित कैबिनेट मीटिंग में उन्होंने जो कहा उसमें उन्होंने अपनी एक सामान्य चिंता ही प्रकट की थी । यह कहने वालों का तर्क है कि इस समय डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद पर चूँकि विजय शिरोहा हैं और उनके गवर्नर-काल में कुछेक काम तो ऐसे हुए ही हैं जो न हुए होते तो डीके अग्रवाल ने जो कहा उसे कहने की जरूरत उन्हें न पड़ती - इसलिए डीके अग्रवाल के कहे हुए को विजय शिरोहा पर आरोपित के रूप में देखा जाना स्वाभाविक ही है; लेकिन इसके पीछे डीके अग्रवाल की बदनियती को नहीं देखा/पहचाना जाना चाहिए । उनका कहना है कि डीके अग्रवाल डिस्ट्रिक्ट के चार्टर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने के नाते सबसे वरिष्ठ हैं और इसलिए उनके कहे हुए को एक वरिष्ठ की पीड़ा के उद्गार के रूप में लिया जाना चाहिए और उसे सकारात्मक भाव से देखना चाहिए ।
भिवानी में आयोजित कैबिनेट मीटिंग में डीके अग्रवाल के कहे हुए में जो लोग लेकिन बदनियती देख/पहचान रहे हैं, उनका तर्क है कि डीके अग्रवाल ने पिछले लायन वर्ष में राकेश त्रेहन के गवर्नर-काल में तो कभी इस तरह की शिकायत नहीं की थी - तब उन्हें क्या सभी कुछ ठीक और नियमानुसार होता हुआ दिखा था क्या ? इनका कहना है कि डीके अग्रवाल 'जिन' लोगों के साथ हैं उन लोगों की कारस्तानियों पर जिस तरह से चुप्पी साधे रहते हैं उससे भी यही साबित होता है कि कैबिनेट मीटिंग में उन्होंने जो कहा उसके पीछे उनका उद्देश्य डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा को निशाना बनाना ही था । अगर ऐसा नहीं है - इनका कहना है कि - तो डीके अग्रवाल 'अपने' साथियों द्धारा की जा रही अभी की हरकतों पर भी चुप क्यों हैं ? 'अभी की हरकतों' से आशय 17 क्लब्स में अभी हाल ही में बढ़ाई गई फर्जी सदस्यता से है । इस मामले में डीके अग्रवाल की चुप्पी ने सभी को हैरान किया हुआ है - क्योंकि डीके अग्रवाल फर्जी क्लब्स और फर्जी वोटों को ख़त्म करने पर लगातार जोर देते रहे हैं ।
डीके अग्रवाल फर्जी क्लब्स और फर्जी वोटों को ख़त्म करने पर लगातार जोर देते रहने के बावजूद 17 क्लब्स में अभी हाल ही में बढ़ाई गईं फर्जी सदस्यता को लेकर क्या सिर्फ इसलिए चुप हैं, क्योंकि यह काम उनके 'अपने' लोगों ने किया है ? उल्लेखनीय है कि अभी हाल ही में दिल्ली आनंद निकेतन में 13, दिल्ली अशोक फोर्ट में 20, दिल्ली भगवान नगर में 26, दिल्ली जेपी कैम्पस में 15, दिल्ली किरण गैलेक्सी में 20, दिल्ली कृष्णा में 22, दिल्ली महानगर रॉयल में 27, दिल्ली मंथन में 10, दिल्ली नारायण विहार में 24, दिल्ली राइजिंग सन में 18, दिल्ली सहयोग में 19, दिल्ली समर्पण में 20, दिल्ली सुविधाकुंज में 20, हाँसी प्रेरणा में 13, हाँसी युवा में 20, जींद एक्टिव में 23 और नई दिल्ली गीतांजली में 21 सदस्य फर्जी तरीके से जोड़े गए हैं । यहाँ यह गौर करना प्रासंगिक होगा कि इन क्लब्स में से अधिकतर फर्जी किस्म के क्लब ही हैं । नए बने इन कुल 331 सदस्यों में से अधिकतर फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नरेश गुप्ता के उत्तर प्रदेश के गजरौला स्थित शिक्षण संस्थान के छात्र हैं - क्योंकि छात्रों को सदस्य बनाने में कुछ कम पैसे लगते हैं । इनमें से अधिकतर को हर्ष बंसल ने स्पॉन्सर किया है । समझने की बात है कि जो छात्र दिल्ली से करीब दो सौ किलोमीटर दूर पढ़ता/रहता है, वह दिल्ली के क्लब में क्या करेगा - जाहिर है कि वह तो डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के चुनावी खिलाड़ियों की राजनीति का मोहरा बना है । इन नए सदस्यों की तरफ से अभी तक किसी भी तरह के ड्यूज जमा नहीं किए गए हैं ।
अगले लायन वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारी सँभालने की तैयारी कर रहे नरेश गुप्ता और हर्ष बंसल की जोड़ी का प्लान यह बताया जा रहा है कि अभी यह इन नए बने सदस्यों को ड्रॉप दिखायेंगे ताकि डिस्ट्रिक्ट में सदस्यता वृद्धि का फायदा विजय शिरोहा को न मिल सके । इन फर्जी सदस्यों की पुनःसदस्यता अगले लायन वर्ष में तब ली जाएगी जब किसी उम्मीदवार से इनके ड्यूज खसोटने का मौका बनेगा । जाहिर है कि इन नए सदस्यों के इस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट ड्यूज तो बट्टे-खाते में ही गए । हर्ष बंसल तो इस तरह की हरकतों को ही लायनिज्म समझता है, इसलिए उसकी तो बात ही क्या करना; लेकिन सवाल यहाँ यह है कि नरेश गुप्ता उसके साथ मिल गए हैं तो भी डीके अग्रवाल चुपचाप तमाशा क्यों देख रहे हैं - वह डीके अग्रवाल जो फर्जी क्लब्स और फर्जी वोटों को ख़त्म करने की लगातार वकालत करते हैं और जो कैबिनेट मीटिंग में बाकायदा कुछ कहने की अनुमति लेकर नियमानुसार कामकाज न होने की शिकायत करते हैं । कैबिनेट मीटिंग में नियमानुसार कामकाज न होने की शिकायत करने वाले डीके अग्रवाल यदि सचमुच चाहते हैं कि डिस्ट्रिक्ट में नियमानुसार कामकाज हों तो क्या उन्हें यह जरूरी नहीं लगता कि वह इन नए सदस्यों के ड्यूज तो कम से कम तुरंत जमा करवाने की माँग करें और व्यवस्था करवाएँ ?
इस मामले में डीके अग्रवाल की चुप्पी ने कुछेक लोगों को यह कहने का मौका दिया है कि नरेश गुप्ता और हर्ष बंसल की जोड़ी ने यह जो फर्जीवाड़ा किया है, उसके पीछे 'दिमाग' डीके अग्रवाल का ही है । हालाँकि कई लोगों का कहना/मानना है कि हर्ष बंसल और नरेश गुप्ता की जोड़ी ने यह जो फर्जीवाड़ा किया है, डीके अग्रवाल उससे खुश नहीं हैं - किंतु राजनीतिक मजबूरी के चलते उन्हें चुप रहना पड़ रहा है । इन्हीं लोगों का साथ ही लेकिन यह भी मानना और कहना है कि राजनीतिक मजबूरियों के कारण डीके अग्रवाल को यदि अपने पक्ष की बेईमानियों पर चुप रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है तो फिर उन्हें कैबिनेट मीटिंग में यह शिकायत नहीं करना चाहिए थी कि डिस्ट्रिक्ट में नियमानुसार कामकाज नहीं होता है । विजय शिरोहा का गवर्नर-काल तो पूरा हो चला है, उसमें जो होना था वह हो चुका है - डीके अग्रवाल को यदि सचमुच नियमानुसार काम न होने को लेकर चिंता है तो उन्हें नरेश गुप्ता के कामकाज पर निगाह रखना चाहिए । नरेश गुप्ता की हरकतों पर तो डीके अग्रवाल ने लेकिन चुप्पी साध ली है । इसीलिए कैबिनेट मीटिंग में व्यक्त की गई डीके अग्रवाल की चिंता संदेह के घेरे में है ।

Thursday, May 29, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में वोटों की खरीद-फ़रोख्त के सहारे मिली दीपक बाबू की जीत को रोटरी इंटरनेशनल में चेलैंज करके दिवाकर अग्रवाल ने दीपक बाबू की जीत के जश्न की तैयारी के जोश में खलल डाला

मुरादाबाद । दीपक बाबू ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए मिली अप्रत्याशित जीत का जश्न मनाने की जो तैयारी की है, दिवाकर अग्रवाल ने उसमें खलल डाल दिया है । दिवाकर अग्रवाल ने रोटरी इंटरनेशनल में दीपक बाबू को मिली जीत को चेलैंज किया है और आरोप लगाया है कि दीपक बाबू ने अपनी इस जीत को क्लब्स के पदाधिकारियों से वोटों को खरीद कर प्राप्त किया है । जीत का जश्न मनाने की तैयारी कर रहे दीपक बाबू और उनके समर्थकों को यह बात जानकर खासा तगड़ा झटका लगा है । यह पता चलने पर तो उन्हें अपनी जीत हार में बदलती हुई दिख रही है कि दिवाकर अग्रवाल ने रोटरी इंटरनेशनल में जो शिकायत दर्ज की है, उसमें शिकायत के साथ कुछेक क्लब्स के पदाधिकारियों के हलफनामे भी उन्होंने दिए हैं - जिन्हें दीपक बाबू द्धारा की गई वोटों की खरीद-फरोख्त के सुबूत के रूप में पेश किया गया है ।
दिवाकर अग्रवाल द्धारा रोटरी इंटरनेशनल में दर्ज कराई गई शिकायत की खबर मिलने के बाद से 31 मई को जीत का जश्न मनाने की तैयारी कर रहे दीपक बाबू और उनके समर्थकों का जोश ठंडा पड़ गया है । दीपक बाबू के कुछेक समर्थकों ने तो कहा भी है कि दीपक बाबू को 31 मई का आयोजन रद्द कर देना चाहिए और इस तरह के जश्न के लिए रोटरी इंटरनेशनल के फैसले का इंतजार करना चाहिए । ऐसा कहने वाले दीपक बाबू के समर्थकों का तर्क है कि पैसा देकर खरीदी गई जीत का जश्न मनाना अपनी ही खिल्ली उड़वाना होगा । इनका कहना है कि इस तरह की बातें जब तक लोगों के बीच खुसर-पुसर के रूप में थीं, तब तक तो वह ज्यादा गंभीर नहीं थीं - लेकिन अब जब इस तरह की बातें रिकॉर्ड पर आ गई हैं और कुछेक क्लब्स के पदाधिकारियों द्धारा दिए गए हलफनामों के जरिये सुबूत के रूप में सामने आ गईं हैं तो अब मामला गंभीर हो गया है । दीपक बाबू के कुछेक समर्थकों का ही सुझाव है कि दीपक बाबू को मामले की गंभीरता को समझना चाहिए और 31 मई का जश्न का आयोजन रद्द देना चाहिए - अन्यथा उस दिन उन्हें जश्न मनाने की बजाये लोगों को सफाईयाँ ही देनी पड़ेगी ।
मजे की बात है कि यह जो स्थिति बनी है, उसे 'बनाने' का श्रेय खुद दीपक बाबू को ही है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में वोटों की खरीद-फ़रोख्त के आरोप पहले भी लगते रहे हैं - लेकिन दीपक बाबू पहले उम्मीदवार हैं जिन्होंने इस आरोप के लिए लोगों को बाकायदा 'मौका दिया' । दीपक बाबू ने कई बार लोगों के बीच 'वोटों की खरीद' को चुनाव जीतने की अपनी तरकीब के रूप में व्याख्यायित किया था । उन्होंने कई मौकों पर लोगों को बताया था कि चुनाव के समय, यानि वोट देने के समय वह क्लब-अध्यक्षों को मोटी मोटी रकम ऑफर करेंगे और बदले में उनसे वोट पा लेंगे और इस तरह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बन जायेंगे । दीपक बाबू जब खुद ही इस तरह की बातें करते थे, तो उनके जीत जाने के बाद लोगों को यह कहने का मौका मिला ही है कि उनकी जीत तो वोटों की खरीद के जरिये मिली जीत है । कुछेक क्लब्स के पदाधिकारियों ने हलफनामे देकर दीपक बाबू द्धारा की गई वोटों की खरीद-फ़रोख्त के सुबूत भी दे दिए हैं । इन्हीं हलफनामों को आधार बना कर दिवाकर अग्रवाल ने रोटरी इंटरनेशनल में दीपक बाबू की जीत को चेलैंज कर दिया है ।
दीपक बाबू द्धारा की गई वोटों की खरीद-फ़रोख्त के जो किस्से लोगों के बीच चर्चा में हैं, उनसे पता चल रहा है कि दीपक बाबू ने वोटों को 'खरीदने' के लिए बड़ी हार्ड बारगेनिंग की । कुछेक क्लब के पदाधिकारियों को वोट के बदले साठ हजार रुपये के ऑफर से सौदा करना शुरू किया गया, जो फिर दस-दस हजार रुपये बढ़ता हुआ एक लाख रुपये और उससे भी अधिक तक पहुँचा । कुछेक क्लब के पदाधिकारियों ने मौके की नजाकत से फायदा उठाने की कोशिश करते हुए ज्यादा 'मुँह खोले', तो दीपक बाबू को फिर वह सौदे बीच में ही छोड़ने पड़े । जीत का नतीजा आने के बाद दीपक बाबू ने कुछेक लोगों के बीच बड़े घमंड के साथ कहा भी कि कुछेक क्लब्स से बात बनते बनते 'रह गई', अन्यथा उनकी जीत का अंतर और बड़ा होता ।
जीत का तमगा मिलते ही दीपक बाबू को आशंका हुई थी कि दिवाकर अग्रवाल उनकी जीत के नतीजे को रोटरी इंटरनेशनल में चेलैंज करेंगे; इसीलिए उन्होंने तुरंत से दिवाकर अग्रवाल को घेरना/घिरवाना शुरू कर दिया था कि वह इस फैसले को स्वीकार कर लें । दीपक बाबू ने दिवाकर अग्रवाल को ऑफर दिया कि अगले वर्ष डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उनकी उम्मीदवारी का झंडा लेकर वह खुद आगे-आगे चलेंगे । दिवाकर अग्रवाल के कुछेक समर्थकों ने भी उस समय राय व्यक्त की थी कि दिवाकर अग्रवाल को चुनावी नतीजे के फैसले को स्वीकार करके बड़प्पन का परिचय देना चाहिए । दिवाकर अग्रवाल अपने कुछेक समर्थकों की इस सलाह को मानने के संकेत दे भी रहे थे, लेकिन तभी उन्हें दीपक बाबू द्धारा की गई वोटों की खरीद-फ़रोख्त के सुबूत मिल गए और फिर उन्होंने दीपक बाबू की जीत की पोल खोलते हुए रोटरी इंटरनेशनल में उनकी जीत को चेलैंज कर दिया । उनके चेलैंज पर फैसला आने में तो देर लगेगी, लेकिन अभी उनके चेलैंज ने 31 मई के दीपक बाबू की जीत के जश्न की तैयारी के जोश में तो खलल डाल ही दिया है । दिवाकर अग्रवाल के चेलैंज के मद्देनजर दीपक बाबू के ही कुछेक सलाहकारों ने 31 मई के आयोजन को रद्द कर देने का सुझाव दिया है । दीपक बाबू के लिए यह फैसला करना लेकिन खासा मुश्किल हो रहा है कि अपने ही सलाहकारों की इस सलाह को वह माने या न माने !  

Monday, May 26, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 में अमित जैन के गवर्नर-काल में अधूरे छूटे डिस्ट्रिक्ट विभाजन के काम को पूरा करने में विनोद बंसल द्धारा दिखाई जा रही दिलचस्पीपूर्ण सक्रियता को देख कर अरनेजा गिरोह के नेताओं को तो अपनी राजनीतिक 'दुकान' बंद होती नजर आ रही है

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल ने डिस्ट्रिक्ट के विभाजन को लेकर कार्रवाई करने की जो तेजी दिखाई है, उसने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के समीकरणों में खासा उलट-फेर होने के संकेत दिए हैं और इन संकेतों में डॉक्टर सुब्रमणियन तथा दीपक गुप्ता के लिए खासे उत्साहपूर्ण नतीजे देखे/पहचाने जा रहे हैं । विनोद बंसल के प्रयास यदि सचमुच में सफल रहे तो अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए दो चुनाव हो सकते हैं । डिस्ट्रिक्ट के विभाजन को लेकर जिस फार्मूले को अभी तक व्यापक स्वीकृति मिल रही है उसमें डॉक्टर सुब्रमणियन और दीपक गुप्ता अलग-अलग डिस्ट्रिक्ट में होंगे; और इस हिसाब से दीपक गुप्ता तो - अभी तक की स्थिति के अनुसार - हो सकता है कि बिना किसी मुकाबले के ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी हो जाएँ और तब फिर डॉक्टर सुब्रमणियन के लिए भी मुकाबला उतना चुनौतीपूर्ण नहीं रह जायेगा । विभाजित डिस्ट्रिक्ट में घाटा शरत जैन को उठाना पड़ेगा, क्योंकि तब उनके समर्थक नेता तो अपनी तमाम बदनामी के साथ उनके साथ रह जायेंगे, लेकिन उनका समर्थन-आधार दूसरे डिस्ट्रिक्ट में चला जायेगा । दरअसल डिस्ट्रिक्ट के विभाजन की स्थिति में तगड़ी चोट अरनेजा गिरोह पर ही पड़ेगी । इस चोट से बचने के लिए अरनेजा गिरोह के सदस्य डिस्ट्रिक्ट के विभाजन की कार्रवाई में बाधा डाल सकते हैं ।
उल्लेखनीय है कि पिछली बार, अमित जैन ने अपने गवर्नर-काल में डिस्ट्रिक्ट के विभाजन को लेकर जब यही कार्रवाई करनी चाही थी, तब अरनेजा गिरोह ने ही उसमें अड़ंगा डाला था । मजे की बात लेकिन यह हुई है कि उस समय विनोद बंसल नए-नए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुने गए थे और वह अरनेजा गिरोह के साथ थे, किंतु अब विनोद बंसल को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में अरनेजा गिरोह के षड्यंत्रों का सामना करना है । विनोद बंसल डिस्ट्रिक्ट के विभाजन को लेकर कुछ करने के संकेत तो हालाँकि काफी दिनों से दे रहे थे, लेकिन किसी को विश्वास हो नहीं रहा था कि वह इस बाबत सचमुच कुछ करेंगे ? इसीलिए अब जब विनोद बंसल ने इस मामले में फैसला करने को लेकर काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की इमरजेंसी मीटिंग बुला ली है, तो अब लोगों को लग रहा है कि विनोद बंसल शायद कुछ कर ही देंगे । विनोद बंसल ने जिस अचानक तरीके से इस मामले में तेजी दिखाई है, उससे अधिकतर लोग हतप्रभ हैं - लेकिन मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल परेशान हैं ।
इनकी परेशानी का कारण डिस्ट्रिक्ट के विभाजन का स्वरूप है । दरअसल बहुत माथापच्ची के बाद डिस्ट्रिक्ट के विभाजन का जो स्वरूप स्वीकृति पाता दिख रहा है उसमें उत्तर प्रदेश के संपूर्ण और हरियाणा व दिल्ली के सटे हुए क्षेत्र के क्लब्स मिल कर एक डिस्ट्रिक्ट बनाते हैं और दिल्ली व हरियाणा के बाकी बचे क्लब्स दूसरा डिस्ट्रिक्ट बनाते हैं । मुकेश अरनेजा व रमेश अग्रवाल के लिए मुसीबत की बात यह है कि उनकी टुच्चई की हरकतों को समर्थन तो मिलता है पहले वाले संभावित डिस्ट्रिक्ट के क्लब्स में, लेकिन वह रहना चाहते हैं दूसरे वाले संभावित डिस्ट्रिक्ट में, जहाँ उनकी हरकतें उनके काम नहीं आयेंगी । इसीलिए माना/समझा जा रहा है कि डिस्ट्रिक्ट के विभाजन की स्थिति में मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की तो राजनीतिक 'दुकान' ही बंद हो जायेगी ।
डिस्ट्रिक्ट के विभाजन को लेकर जिस तरह की सक्रियता बनी है, उसमें संभावना व्यक्त की जा रही है कि अगले रोटरी वर्ष में विभाजन के बाद बनने वाले दोनों डिस्ट्रिक्ट के लिए अलग-अलग चुनाव हो जाएँ । यह संभावना दीपक गुप्ता के लिए तो लॉटरी लगने जैसी स्थिति होगी । क्योंकि अगले रोटरी वर्ष के लिए जो उम्मीदवार हैं उनमें अकेले दीपक गुप्ता उस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जो विभाजन के बाद एक डिस्ट्रिक्ट बनता/बनाता है । यानि - आज के सीन में - 'उस' नए डिस्ट्रिक्ट के चुनाव के लिए तो दीपक गुप्ता ही एकमात्र उम्मीदवार होंगे, ऐसा होने पर तो वह निर्विरोध ही चुन लिए जा सकेंगे । सोने पर सुहागे वाली बात यह भी होगी कि वह एक वर्ष पहले ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बन सकेंगे । हालाँकि यह फायदा सुधीर मंगला को भी मिलेगा और विभाजन के बाद बनने वाले दूसरे डिस्ट्रिक्ट के लिए होने वाले चुनाव के विजेता को भी मिलेगा । विभाजन की स्थिति में होने वाले चुनाव में दीपक गुप्ता को चुनौती देने के लिए सकता है कि कोई उम्मीदवार आ भी जाये, लेकिन उसके आने में इतनी देर हो चुकी होगी कि दीपक गुप्ता से मुकाबला करना उसके लिए मुश्किल ही होगा ।
विभाजन के बाद बनने वाले दूसरे डिस्ट्रिक्ट के लिए जो चुनाव होगा उसमें डॉक्टर सुब्रमणियन के लिए इसलिए आसानी होगी क्योंकि उन्हें जो क्षेत्र/जो क्लब्स मिलेंगे, उनमें उनकी स्थिति अच्छी है ही । उत्तर प्रदेश के संपूर्ण और हरियाणा व दिल्ली के सटे हुए क्षेत्र के जो क्लब्स अलग डिस्ट्रिक्ट के हिस्सा हो जायेंगे, उनमें ही डॉक्टर सुब्रमणियन को दीपक गुप्ता और या शरत जैन से तगड़ी चुनौती मिल रही है - ऐसे क्लब्स जब अलग डिस्ट्रिक्ट का हिस्सा हो जायेंगे तब डॉक्टर सुब्रमणियन के लिए चुनौती खुद-ब-खुद ही दूर हो जाएगी । जाहिर है कि डिस्ट्रिक्ट के विभाजन की स्थिति में, नुकसान उम्मीदवार के रूप में शरत जैन का और नेताओं के रूप में अरनेजा गिरोह के नेताओं का ही होना है । अरनेजा गिरोह के नेताओं की समस्या यह है कि वह खुद ही अपनी ताकत उत्तर प्रदेश के संपूर्ण और हरियाणा व दिल्ली के सटे हुए क्षेत्र के क्लब्स में ही देखते/पहचानते हैं - लेकिन यह क्लब्स दूसरे डिस्ट्रिक्ट के हिस्सा हो जायेंगे; उन्हें जो क्लब्स मिलेंगे उनमें उनकी टुच्ची और घटिया स्तर की राजनीति के लिए समर्थन नहीं मिलेगा । उम्मीदवार के रूप में शरत जैन के लिए समस्या यह होगी कि उन्हें रमेश अग्रवाल का 'आदमी' होने की सजा मिलेगी । डॉक्टर सुब्रमणियन के लिए मजे की स्थिति यह होगी कि अभी उन्हें जिन दीपक गुप्ता से तगड़ी चुनौती मिल रही है, वह दीपक गुप्ता दूसरे डिस्ट्रिक्ट में होंगे; और जिन शरत जैन से उन्हें मुकाबला करना होगा, वह शरत जैन अपने समर्थक अरनेजा गिरोह के नेताओं की करतूतों के बोझ के नीचे दबे होंगे ।
समझा जाता है कि अपनी राजनीतिक 'दुकान' को बंद होने से बचाने के लिए अरनेजा गिरोह के नेता डिस्ट्रिक्ट के विभाजन को लेकर किए जा रहे विनोद बंसल के प्रयासों में फच्चर फँसा सकते हैं । हालाँकि काउंसिल ऑफ गवर्नर्स के कई सदस्यों का मानना और कहना है कि डिस्ट्रिक्ट जितना बड़ा हो गया है, और बड़ा होने के कारण उसे सँभालना जितना मुश्किल होता जा रहा है, उसे देखते हुए डिस्ट्रिक्ट को विभाजित हो ही जाना चाहिए; और यहाँ विभाजन को टालना अब ज्यादा संभव है नहीं । यह विश्वास इसलिए भी है क्योंकि विभाजन की प्रक्रिया में विनोद बंसल ने दिलचस्पी लेना शुरू किया है । अपनी दिलचस्पी को उन्होंने जिस तरह से अपनी सक्रियता में बदल दिया है और काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की इमरजेंसी मीटिंग तक बुला ली है, उससे लग रहा है कि डिस्ट्रिक्ट के विभाजन को लेकर वह वास्तव में गंभीर हैं और इस बाबत उन्होंने अच्छी तैयारी की है । उम्मीद की जा रही है कि विनोद बंसल की इस तैयारी के चलते अमित जैन के गवर्नर-काल में जो काम अधूरा छूट गया था, अब उनके गवर्नर-काल में वह पूरा हो जायेगा ।

Saturday, May 24, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 में अरनेजा गिरोह के 'पापों का घड़ा' शरत जैन के सिर फूटने की संभावनाओं के बीच डॉक्टर सुब्रमणियन और दीपक गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की त्रिकोणीय लड़ाई जीतने के लिए क्लब्स के बीच अपनी अपनी पैठ बनाने के प्रयास तेज किए

नई दिल्ली । डॉक्टर सुब्रमणियन और उनके समर्थकों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए लोगों के बीच जो संपर्क-अभियान चलाया है, उसमें उन्हें दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी में अपने लिए फायदा नजर आने लगा है । उल्लेखनीय है कि अभी तक डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी के समर्थक इस जुगाड़ में थे कि किसी भी तरह से वह दीपक गुप्ता को अपनी उम्मीदवारी वापस लेने के लिए राजी कर लें; इसके लिए दीपक गुप्ता को संजय खन्ना की टीम  में महत्वपूर्ण पद दिलवाने का ऑफर भी दिया गया - इस सुझाव के साथ कि उस महत्वपूर्ण पद पर काम करते हुए वह लोगों के बीच अपनी पहचान को और व्यापक बनायें तथा उसके बाद फिर अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करें । दीपक गुप्ता ने लेकिन इस तरह के सुझाव को स्वीकार करने से इंकार कर दिया और दावा किया कि अपनी उम्मीदवारी के बाबत उन्हें लोगों से अच्छा रेस्पोंस मिल रहा है, इसलिए उन्हें लगता है कि अबकी बार लिए अच्छा मौका है; और इस बिना पर उन्होंने अपनी उम्मीदवारी को बनाये रखने पर जोर दिया । दीपक गुप्ता के इस फैसले से डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी के समर्थकों को झटका तो लगा, लेकिन उन्होंने इसे एक तात्कालिक झटके के रूप में ही लिया और उम्मीद की कि आगे फिर कभी वह दीपक गुप्ता को मनाने का दोबारा प्रयास करेंगे ।
डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी के समर्थकों को अब लेकिन यह महसूस हो रहा है कि दीपक गुप्ता ने अच्छा किया कि उनकी सलाह नहीं मानी । डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी के समर्थकों ने अभी तक जो संपर्क-अभियान चलाया है, उसमें उन्होंने पाया है कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी कई जगह शरत जैन की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचा रही है - जिसमें प्रकारांतर से कुल मिलाकर डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी का ही फायदा है । इस 'तथ्य' को जानने/पहचानने के बाद डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी के समर्थकों को दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी में फायदा ही फायदा दिखने लगा है - लेकिन साथ ही उनमें से कुछ को यह डर भी सताने लगा है कि अगले रोटरी वर्ष में होने वाला चुनाव अगर डॉक्टर सुब्रमणियन और दीपक गुप्ता के बीच 'आ' गया तो क्या होगा ? उल्लेखनीय है कि डॉक्टर सुब्रमणियन के समर्थक अभी तक तो यही समझ रहे हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव डॉक्टर सुब्रमणियन और शरत जैन के बीच होगा; और इसीलिए पहले वह दीपक गुप्ता को अपने पक्ष में लाने का प्रयास कर रहे थे, और अब वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी से खुश हो रहे हैं । लेकिन डॉक्टर सुब्रमणियन के कुछेक समर्थकों को यह डर भी सताने लगा है कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी जिस तरह कई जगह शरत जैन की उम्मीदवारी को चोट पहुँचा रही है, उसके नतीजे के रूप में कहीं शरत जैन की उम्मीदवारी वापस ही न हो जाये और या कहीं इतनी कमजोर न पड़ जाये कि फिर उनके मुख्य प्रतिद्धंद्धी दीपक गुप्ता हो जाएँ ? दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की उपस्थिति में शरत जैन की उम्मीदवारी से निपटना डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी के समर्थकों को आसान काम नजर आ रहा है; लेकिन दीपक गुप्ता के मुख्य प्रतिद्धंद्धी होने की स्थिति उन्हें अपने लिए मुश्किल लग रही है ।
मजे की बात यह है कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों को भी यह त्रिकोणीय लड़ाई 'सूट' कर रही है । सूट न कर रही होती तो डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होते ही दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी वापस हो गई होती । डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी प्रस्तुत होते ही दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के 'बड़े' समर्थकों को जिस तरह एक झटके में अपनी तरफ ले गई थी, उसके बाद दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के बने रह पाने को लेकर लोगों के बीच संदेह पैदा हो गया था । लेकिन दो बातों ने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के बने रहने का 'मौका' बनाया - एक बात तो यह हुई कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी से 'बड़े' नेताओं ने भले ही हाथ खींच लिया हो, किंतु क्लब्स के स्तर पर उनके लिए समर्थन न सिर्फ बना रहा बल्कि वह बढ़ता हुआ भी दिखा; दीपक गुप्ता को स्वाभाविक रूप से इससे हौंसला मिला । दूसरी बात जेके गौड़ के अनुभव की थी - पिछले रोटरी वर्ष में जब जेके गौड़ उम्मीदवार थे, तब मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल ने आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी को समर्थन दिया हुआ था और डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी को बाकी लोगों का समर्थन था; जेके गौड़ के साथ 'कोई' नहीं था । जेके गौड़ ने क्लब्स में अपनी पैठ बना कर स्थितियों को अपने पक्ष में किया । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों ने जेके गौड़ के इसी अनुभव से सबक लेते हुए माना कि महत्व क्लब्स में पैठ बनाने का होता है - और इसी सबक के चलते दीपक गुप्ता ने अपनी उम्मीदवारी को बनाये रखने का फैसला किया । उनके इस फैसले को इस बात से और बल मिला कि डॉक्टर सुब्रमणियन ने अपनी उम्मीदवारी को लेकर सक्रिय न हो पाने की तमाम आशंकाओं को गलत साबित कर दिया है । दरअसल डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने को अरनेजा गिरोह ने अपनी जीत के रूप में देखा था - उन्हें लगा था कि डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी आने से दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी वापस हो जाएगी; और डॉक्टर सुब्रमणियन एक उम्मीदवार के रूप में सक्रिय नहीं हो पायेंगे; और फिर उनके लिए मैदान जीतने में कोई दिक्कत नहीं होगी ।
अरनेजा गिरोह के लिए मुसीबत की बात यह हुई कि उनके अनुमानानुसार न तो दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी वापस हुई और न डॉक्टर सुब्रमणियन ने पहले जैसी ढीलमढाल दिखाई । सभी को हैरान और चकित करते हुए डॉक्टर सुब्रमणियन ने अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु प्रयास किए और लोगों के बीच अच्छी पैठ बनाई । इसका एक और फायदा डॉक्टर सुब्रमणियन और उनके समर्थकों को यह हुआ कि उन्हें त्रिकोणीय लड़ाई में अपने फायदे के प्वाइंट नजर आये । त्रिकोणीय लड़ाई में दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों को भी चूँकि फायदा दिख रहा है - तो इसका कारण यह है कि दोनों के समर्थन-आधार का बड़ा हिस्सा कॉमन है और वह अरनेजा गिरोह के खिलाफ अपने विरोध के कारण इनके साथ है । यह कॉमन हिस्सा सचमुच में किसके साथ जायेगा, यह इस पर निर्भर करेगा कि किसका पलड़ा भारी दिखेगा ।
यहाँ इस तथ्य को याद करना प्रासंगिक होगा कि अगले वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के संदर्भ में सबसे पहले शरत जैन का नाम आया था और आज जो लोग डॉक्टर सुब्रमणियन और या दीपक गुप्ता के साथ दिख रहे हैं वह उस समय शरत जैन के साथ ही थे; किंतु सीओएल के चुनाव में रमेश अग्रवाल और अरनेजा गिरोह ने जो कारस्तानी की, उसके कारण डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के समीकरण उलट-पुलट गए और रमेश अग्रवाल तथा अरनेजा गिरोह से बदला लेने वाले लोगों ने शरत जैन का साथ छोड़ कर डॉक्टर सुब्रमणियन का और या दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया । हाल के समय में देखा गया है कि अरनेजा गिरोह के खुले समर्थन के बावजूद रवि चौधरी को चुनावी हार का सामना करना पड़ा था; आलोक गुप्ता का कुछ बनता न देख, हार का बोझ ढोने से बचने लिए अरनेजा गिरोह उन्हें धोखा देते हुए उन्हें बीच में छोड़ कर जीतते दिख रहे जेके गौड़ के साथ जा मिला था; और अभी हाल ही में सीओएल के लिए अरनेजा गिरोह रमेश अग्रवाल को जितवाने में विफल रहा है । इन उदाहरणों से 'दिख' रहा है कि अरनेजा गिरोह के 'पापों का घड़ा' अबकी बार शरत जैन के सिर पर ही फूटेगा ।
इस स्थिति को डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी के समर्थक भी और दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक भी अपने अपने अनुकूल पा रहे हैं । मजे की बात यह है कि दोनों ही साथ ही साथ यह भी मना रहे हैं कि शरत जैन की उम्मीदवारी बनी भी रहे, क्योंकि तभी अरनेजा गिरोह अपनी बदतमीजियाँ करेगा, जिसका फायदा यह उठायेंगे । शरत जैन की उम्मीदवारी यदि वापस हुई और या आलोक गुप्ता की तरह शरत जैन को अरनेजा गिरोह ने धोखा दिया; और डॉक्टर सुब्रमणियन व दीपक गुप्ता के बीच सीधे मुकाबले का मौका बना तब फिर दोनों के लिए ही मामला ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो जायेगा ।  

Wednesday, May 21, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में डिस्ट्रिक्ट डिस्प्यूट मामले में जगदीश गुलाटी की कार्रवाई को विश्वासघात बताते हुए हर्ष बंसल ने उम्मीद जताई है कि उनका अहसान जगदीश गुलाटी भले ही भूल गए हों, लेकिन नरेश अग्रवाल नहीं भूले होंगे; इसलिए जगदीश गुलाटी से अब नरेश अग्रवाल ही निपटेंगे

नई दिल्ली । हर्ष बंसल को पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर जगदीश गुलाटी को देने के लिए आज नई गालियाँ सीखने की जरूरत महसूस हो रही है - क्योंकि उन्हें लग रहा है कि उन्हें अभी जितनी गालियाँ आती हैं वह जगदीश गुलाटी के लिए कम हैं । लायन सदस्यों के बीच हर्ष बंसल हर उस शख्स को गालियाँ देने के लिए (कु)ख्यात हैं जो उनकी उम्मीद और अपेक्षा के अनुसार काम नहीं करता है - जगदीश गुलाटी ने तो आज वह कर दिया, हर्ष बंसल ने जिसकी सपने में भी उम्मीद नहीं की थी । डिस्ट्रिक्ट डिस्प्यूट रिजोल्यूशन प्रोसीजर में कॉन्सीलेटर-चेयरपरसन के रूप में जगदीश गुलाटी ने शिकायती पक्ष की तरफ से कॉन्सीलेटर के रूप में दिए गए हर्ष बंसल के नाम को स्वीकार करने से इंकार कर दिया है । इससे हर्ष बंसल की बेइज्जती हुई है । हर्ष बंसल लेकिन इस बेइज्जती से नाराज नहीं हैं - हर्ष बंसल की दरअसल इतनी बेइज्जती हुई है, लखनऊ में हुई मल्टीपल काउंसिल की कॉन्फ्रेंस में तो सार्वजानिक रूप से उनकी पिटाई-ठुकाई भी हो चुकी है कि वह बेचारे इज्जत-बेइज्जती में फर्क करना ही भूल गए हैं; लेकिन फिर भी जगदीश गुलाटी के फैसले से वह नाराज हैं तो इस कारण से हैं कि जगदीश गुलाटी को 'उन्होंने' ही तो कॉन्सीलेटर-चेयरपरसन बनवाया है और वही जगदीश गुलाटी कॉन्सीलेटर के रूप में हर्ष बंसल की नियुक्ति का विरोध कर रहे हैं । हर्ष बंसल का कहना है कि जगदीश गुलाटी की यह कार्रवाई धोखाधड़ी और विश्वासघात है और इसके लिए उन्हें जितनी भी गालियाँ दी जाएँ वह कम होंगी । इसीलिए हर्ष बंसल को जगदीश गुलाटी को देने के लिए नई गालियाँ सीखने की जरूरत आ पड़ी है ।
हर्ष बंसल को हालाँकि उम्मीद है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की तैयारी कर रहे नरेश अग्रवाल के साथ हुई जिस 'डील' के चलते जगदीश गुलाटी को चेयरपरसन-कॉन्सीलेटर बनाया गया है, वह नरेश अग्रवाल उनकी मदद करेंगे और जगदीश गुलाटी के कान उमेठेंगे और जगदीश गुलाटी को राजी करेंगे कि वह हर्ष बंसल को शिकायती पक्ष की तरफ से कॉन्सीलेटर के रूप में स्वीकार कर लें । नरेश अग्रवाल जब तक यह नहीं करते हैं, तब तक लेकिन हर्ष बंसल को जगदीश गुलाटी को गाली देते रहना जरूरी लग रहा है । लोगों को गालियाँ देते रहना हर्ष बंसल को प्रिय शौक भी है ।
किस्सा क्या है, इसे भी जान लीजिये :
डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विजय शिरोहा के कुछेक फैसलों को लेकर कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की तरफ से लायंस इंटरनेशनल कार्यालय में शिकायत की गई, जहाँ से उन्हें जबाव मिला कि इस तरह की शिकायतों का निपटारा करने के लिए डिस्ट्रिक्ट डिस्प्यूट रिजोल्यूशन प्रोसीजर अपनाया जाये । इस प्रोसीजर को अपनाने के लिए कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स द्धारा की गई शिकायत को दो क्लब्स की शिकायत में बदल दिया गया । इस प्रोसीजर के तहत दोनों पक्षों को - शिकायत करने वाले पक्ष को और जिस पक्ष के खिलाफ शिकायत है उसको - एक एक कॉन्सीलेटर चुनना होता है और इन दोनों की सहमति से डिस्ट्रिक्ट में से ही एक तीसरे कॉन्सीलेटर का चुनाव करना होता है जो कॉन्सीलेटर टीम का चेयरपरसन भी होगा । दोनों पक्षों की तरफ से पहली बार कॉन्सीलेटर के जो नाम आये, उनके बीच तीसरे कॉन्सीलेटर के नाम पर सहमति नहीं बन पाई । लायंस इंटरनेशनल द्धारा तय किए गए प्रोसीजर के तहत नियम यह है कि पहली बार दोनों पक्षों द्धारा चुने गए कॉन्सीलेटर के बीच तीसरे कॉन्सीलेटर के नाम पर यदि सहमति नहीं बन पायेगी तो स्वतः यह मान लिया जायेगा कि उन दोनों कॉन्सीलेटर ने अपने अपने पद छोड़ दिए हैं और इसके बाद दोनों पक्ष अपने अपने कॉन्सीलेटर के रूप में नए नाम तय करेंगे । दोनों पक्षों द्धारा चुने गए नए कॉन्सीलेटरों के तीसरे कॉन्सीलेटर के लिए डिस्ट्रिक्ट के किसी नाम पर सहमति बनाने में विफल रहने पर प्रोसीजर में तीसरे कॉन्सीलेटर के चयन के संदर्भ में व्यवस्था यह है कि दूसरे डिस्ट्रिक्ट के इंटरनेशनल डायरेक्टर रहे लायन को तीसरे कॉन्सीलेटर के रूप में चुना जाए । शिकायत पक्ष की तरफ से तीसरे कॉन्सीलेटर के रूप में जगदीश गुलाटी का नाम आया । दूसरे पक्ष ने उनके नाम पर सहमति दे दी ।
यहाँ तक जो हुआ, सो हुआ; इसके आगे लेकिन शिकायत पक्ष की होशियारी उनकी बेवकूफी साबित होती हुई दिखी ! दरअसल हुआ यह कि चेयरपरसन-कॉन्सीलेटर के रूप में जगदीश गुलाटी को शिकायती पक्ष की तरफ से कॉन्सीलेटर के रूप में हर्ष बंसल का नाम मिला । जबकि शिकायती पक्ष की तरफ से दूसरी बार कॉन्सीलेटर के रूप में गगनजोत सिंह का नाम दिया गया था । यहाँ एक बात समझ लें कि शिकायती पक्ष तकनीकी रूप से एक क्लब जरूर है, लेकिन क्लब को तो बस मोहरा बनाया हुआ है, सारी लड़ाई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स लड़ रहे हैं क्योंकि सबसे पहले शिकायत उन्होंने ही की थी । यह लड़ाई लड़ने वाले पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का नेतृत्व हर्ष बंसल ने संभाला हुआ है, जो अपने आप को समझते तो बड़ा होशियार हैं लेकिन करते बेवकूफ़ियाँ हैं और जिनके चलते लगातार 'पिटते/कुटते' रहते हैं । यहाँ भी जगदीश गुलाटी से उनके 'पिटने' की नौबत खुद उनकी ही 'होशियारी' से पैदा हुई है । डिस्ट्रिक्ट डिस्प्यूट रिजोल्यूशन प्रोसीजर के अनुसार कॉन्सीलेटर्स की जो तीन सदस्यीय कमेटी बनेगी, उसमें दोनों पक्षों की तरफ से कॉन्सीलेटर वह होंगे, जिनके नाम दूसरी बार प्रस्तावित हुए थे । शिकायती पक्ष की तरफ से दूसरी बार कॉन्सीलेटर के रूप में गगनजोत सिंह का नाम आया था; नियमानुसार चेयरपरसन के रूप में जगदीश गुलाटी को उनका ही नाम देना चाहिए था; लेकिन हर्ष बंसल ने गगनजोत सिंह की जगह अपना नाम दे दिया ।
हर्ष बंसल ने यह जो हरकत की, यह सिर्फ उनकी मनमानी का ही नहीं बल्कि उनकी बेवकूफी का भी सुबूत है । शिकायती पक्ष के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का ही कहना है कि हर्ष बंसल ने दूसरी बार कॉन्सीलेटर के रूप में गगनजोत सिंह का नाम दरअसल यह सोच कर भेजा था कि गगनजोत सिंह तीसरे कॉन्सीलेटर के नाम पर सहमति बनने ही नहीं देंगे और उनकी भूमिका पहले कॉन्सीलेटर की तरह वहीं पर ख़त्म हो जायेगी; हर्ष बंसल ने सोचा यह कि उसके बाद फिर आगे का मोर्चा वह खुद संभाल लेंगे । डिस्ट्रिक्ट डिस्प्यूट रिजोल्यूशन प्रोसीजर का नियम या तो हर्ष बंसल ने ठीक से पढ़ा नहीं और या उसे समझा नहीं । उसमें तीसरे कॉन्सीलेटर के नाम पर सहमति न बनने की स्थिति में पहली बार चुने गए दोनों पक्षों के कॉन्सीलेटरों के 'तो' स्वतः पदमुक्त होने की बात कही गई है, लेकिन दूसरी बार चुने गए कॉन्सीलेटरों के लिए ऐसा नहीं कहा गया है । प्रोसीजर में साफ कहा गया है कि दूसरी बार चुने गए कॉन्सीलेटर यदि तीसरे कॉन्सीलेटर के रूप में डिस्ट्रिक्ट के किसी नाम पर सहमत नहीं हो पाते हैं तो वह पड़ोसी या निकट के डिस्ट्रिक्ट से नाम चुनेंगे । नियमानुसार तीसरे कॉन्सीलेटर के नाम पर सहमति बनने के बाद जो तीन सदस्यीय कमेटी होगी, उसमें दोनों पक्षों की तरफ से कॉन्सीलेटर के रूप में वह लोग होंगे, जिनके नाम दूसरी बार कॉन्सीलेटर के रूप में आये थे ।
इसीलिए चेयरपरसन-कॉन्सीलेटर के रूप में जगदीश गुलाटी ने शिकायती पक्ष की तरफ से कॉन्सीलेटर के रूप में हर्ष बंसल के नाम को स्वीकार करने से इंकार कर दिया है और गगनजोत सिंह का नाम अधिकृत रूप से दर्ज करने की बात कही है । जगदीश गुलाटी की यह कार्रवाई हर्ष बंसल को ऐसी लगी है जैसे जगदीश गुलाटी ने सरे-बाजार उनके कपड़े उतार लिए हैं । हर्ष बंसल के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि उनकी इस बेवक़ूफीभरी होशियारी से डिस्ट्रिक्ट डिस्प्यूट रिजोल्यूशन प्रोसीजर में शिकायती पक्ष कमजोर पड़ गया है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की तरफ से कॉन्सीलेटर राजिंदर बंसल है, जिनके धाकड़पने के सामने गगनजोत सिंह का टिक पाना शिकायती पक्ष को ही मुश्किल लग रहा है । इसीलिए शिकायती पक्ष के लोग हर्ष बंसल को कोस रहे हैं, और हर्ष बंसल - जगदीश गुलाटी को कोस रहे हैं । हर्ष बंसल ने कॉन्सीलेटर में उनके नाम को ख़ारिज कर देने की जगदीश गुलाटी की कार्रवाई को विश्वासघात कहा है । उनका कहना है कि उन्होंने ही तो जगदीश गुलाटी को चेयरपरसन-कॉन्सीलेटर बनवाया है, और जगदीश गुलाटी उन्हें ही कॉन्सीलेटर-टीम से बाहर रखने की बात कह रहे हैं । जगदीश गुलाटी का कहना है कि वह तो वही कर रहे हैं जो नियमानुसार उन्हें करना चाहिए । जगदीश गुलाटी के इस तर्क ने हर्ष बंसल को और ज्यादा आगबबूला कर दिया है । दरअसल इसीलिए हर्ष बंसल को जगदीश गुलाटी को देने के लिए और ज्यादा गालियों की इमरजेंसी-जरूरत आ पड़ी है ।
जगदीश गुलाटी को गालियाँ देने के साथ-साथ हर्ष बंसल का यह भी दावा है कि वह नरेश अग्रवाल से कह कर जगदीश गुलाटी को 'सीधा' करवायेंगे । हर्ष बंसल का तर्क है कि जगदीश राय गोयल को मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन बनवाने की नरेश अग्रवाल और जगदीश गुलाटी की स्कीम में उन्होंने जितनी/जो मदद की, उसका अहसान नरेश अग्रवाल और जगदीश गुलाटी इतनी जल्दी भूल गए हैं क्या ? हर्ष बंसल को विश्वास है कि उनका अहसान जगदीश गुलाटी भले ही भूल गए हों, लेकिन नरेश अग्रवाल नहीं भूले होंगे; इसलिए जगदीश गुलाटी से अब नरेश अग्रवाल ही निपटेंगे । हर्ष बंसल का कहना है कि मल्टीपल की चुनावी राजनीति में नरेश अग्रवाल और जगदीश गुलाटी की मदद करने के चक्कर में उनके फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नरेश गुप्ता को आर्थिक नुकसान होने का खतरा पैदा हो गया है, क्योंकि उन पर मल्टीपल काउंसिल चेयरपरसन पद के दूसरे उम्मीदवार सहजीव रतन जैन से मिले महँगे उपहार को वापस करने के लिए दबाव पड़ रहा है ।  हर्ष बंसल का कहना है कि इतने सब के बाद भी जगदीश गुलाटी उनके साथ विश्वासघात करने पर आमादा हैं तो वह चुप नहीं बैठेंगे ।
हर्ष बंसल के चुप न बैठने की स्थिति में जगदीश गुलाटी क्या करेंगे - यह देखना दिलचस्प होगा । यह देखना इसलिए भी दिलचस्प होगा, क्योंकि इससे यह भी पता चलेगा कि मल्टीपल की चुनावी राजनीति में हर्ष बंसल से मिली मदद का बदला जगदीश गुलाटी और इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की तैयारी कर रहे नरेश अग्रवाल कैसे उन्हें चुकाते हैं ।

Tuesday, May 20, 2014

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी की संभावना को धक्का पहुँचाने के जरिये अजय सिंघल की उम्मीदवारी की प्रस्तुति ने अजय सिंघल को अगले लायन वर्ष में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के एक मजबूत उम्मीदवार के रूप में स्थापित किया

गाजियाबाद । अजय सिंघल को अगले लायन वर्ष में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार बनाये जाने के संकेत देने के उद्देश्य से गाजियाबाद में आयोजित हुए कार्यक्रम को जिस तरह की कामयाबी मिली, उसका नतीजा यह हुआ कि अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी की संभावना को बनाये रखने के उद्देश्य से देहरादून में विजेताओं के स्वागत-सम्मान के बहाने सुनील जैन द्धारा किए जाने वाले कार्यक्रम को ही तिलांजली दे दी गई और सुनील जैन ने स्वागत-सम्मान का कार्यक्रम बस जैसे-तैसे निपटाया । उल्लेखनीय है कि अवतार कृष्ण ने अगले लायन वर्ष में अपनी उम्मीदवारी की संभावना को बनाये रखने के लिए एसएमएस के जरिए लोगों के बीच अपनी सक्रियता दिखाने का प्रयास जारी कर दिया था । उनके इस प्रयास को और मजबूती देने तथा विश्वसनीय बनाने के लिए सुनील जैन ने देहरादून में नए विजेताओं के स्वागत-सम्मान के लिए एक कार्यक्रम करने की तैयारी शुरू की । तैयारी यह थी कि विजेताओं के स्वागत-सम्मान के लिए इकठ्ठा हुए लोगों के बीच कार्यक्रम में अवतार कृष्ण को खूब तवज्जो दी जायेगी, जिससे लोगों के बीच अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी की चर्चा को खुद-ब-खुद हवा मिलेगी - और जब हवा मिलेगी तो उक्त चर्चा अपने आप ही भड़केगी ।
सुनील जैन देहरादून में इस कार्यक्रम को कर पाते, उससे पहले मुकेश गोयल ने गाजियाबाद में लायंस क्लब गाजियाबाद के अजय सिंघल की उम्मीदवारी को प्रमोट करते हुए एक कार्यक्रम कर डाला । मजे की बात यह रही कि गाजियाबाद के कार्यक्रम की आनन-फानन में जो योजना बनी उसका प्रारंभिक उद्देश्य सिर्फ इतना तय किया गया था कि अगले उम्मीदवार के रूप में अजय सिंघल की संभावना को 'देखा/दिखाया' जाए । मुकेश गोयल लेकिन चूँकि 'हल्दी की गाँठ भर मिल जाने पर पंसारी की दुकान खोल लेने' का हुनर रखते हैं, लिहाजा कार्यक्रम की तैयारी जैसे-जैसे परवान चढ़ी और कार्यक्रम हुआ तो वह अजय सिंघल की उम्मीदवारी का बाकायदा प्रमोशनल आयोजन बन गया । अगले लायन वर्ष में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अजय सिंघल की उम्मीदवारी की चर्चा तो कार्यक्रम की तैयारी के दौरान ही जंगल की आग की तरह डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच फैल चुकी थी; कार्यक्रम की जोरदार सफलता ने अजय सिंघल को एक प्रभावी उम्मीदवार के रूप में भी स्थापित कर दिया । कार्यक्रम में पैंतीस से अधिक क्लब्स का प्रतिनिधित्व होने का जो दावा किया गया, उसने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों को भी खासा चक्कर में डाल दिया । अजय सिंघल की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से हुए इस कार्यक्रम की सफलता ने सुनील जैन द्धारा देहरादून में अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी की संभावना को जिंदा रखने के उद्देश्य से किए जाने वाले कार्यक्रम की तैयारी को तगड़ा झटका दिया ।
अजय सिंघल की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से हुए कार्यक्रम की सफलता की चमक देख कर सुनील जैन को अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी की संभावना को जिंदा रखने का प्रयत्न करना भी गैरजरूरी लगने लगा । अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी के दूसरे संभावित समर्थकों ने भी सुनील जैन के प्रस्तावित कार्यक्रम से हाथ खींच लिए । इसके बाद - सुनील जैन ने हालाँकि कार्यक्रम तो किया, लेकिन बस जैसे-तैसे ही 'किया' और उसमें अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी को लेकर कोई संकेत-वंकेत नहीं दिया । उल्लेखनीय है कि अजय सिंघल की उम्मीदवारी को प्रमोट करने वाला कार्यक्रम जब तक नहीं हुआ था, तब तक अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी के समर्थक नेता अगले लायन वर्ष में अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने के संकेत दे रहे थे । उनका मानना और कहना था कि एक बार चुनाव में हारने वाला उम्मीदवार जब लगातार दूसरी बार उम्मीदवारी प्रस्तुत करता है और लोगों के बीच अपने लिए सहानुभूति जुटाने की कोशिश करता है तो प्रायः सफल हो ही जाता है । अजय सिंघल की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के कार्यक्रम की तैयारी लेकिन जिस अंदाज में हुई और कार्यक्रम को जो सफलता मिली, उसमें सिर्फ सहानुभूति के भरोसे अवतार कृष्ण के लिए उम्मीद बनाए रखना संभव नहीं दिखा; और उसके चलते अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी के संभावित समर्थकों के बीच जो हलचल हुई उसमें सुनील जैन द्धारा अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी की संभावना को जिंदा रखने के उद्देश्य से प्लान किया जा रहा कार्यक्रम बैठ गया ।
इसे अगले लायन वर्ष में होने वाले सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित चुनाव के संदर्भ में अजय सिंघल की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । माना/समझा जा रहा है कि अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी की संभावना को जिंदा रखने के उद्देश्य से किया जाने वाला कार्यक्रम यदि होता, तो उससे अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी को मनोवैज्ञानिक बढ़त तो मिलती ही और वह बढ़त अजय सिंघल के लिए एक बड़ी चुनौती होती । अजय सिंघल की उम्मीदवारी को प्रमोट करने के उद्देश्य से हुए पहले ही कार्यक्रम ने उस संभावित चुनौती को लेकिन झटका तो दे ही दिया है । इस उपलब्धि से हालाँकि कोई निर्णायक नतीजा निकालना जल्दबाजी करना होगा, क्योंकि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद तक की राह बड़ी रपटीली है और अभी वह लंबी भी है ।
अजय सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट की राजनीति के संदर्भ में भले ही धमाकेदार शुरुआत की है, लेकिन क्लब के स्तर पर कुछेक चुनौतियों से निपटना उनके लिए अभी बाकी है । अजय सिंघल की उम्मीदवारी के प्रकट होते ही क्लब के कुछेक असंतोषी किस्म के लोगों ने डीआर गोयल की उम्मीदवारी का राग छेड़ने की कोशिश की है । लायंस क्लब गाजियाबाद में डीआर गोयल की उम्मीदवारी की चर्चा वर्षों पहले चलती रही तरुण कंसल की उम्मीदवारी की चर्चा की तरह एक मजाक बनी हुई है । क्लब के लोगों का कहना है कि जो हाल तरुण कंसल का रहता था, वही हाल डीआर गोयल का बना हुआ है - गवर्नरी के लड्डू तो उनके मन में फूटते हैं, किंतु उम्मीदवार बनने की उनकी हिम्मत नहीं होती है । इस समय भी क्लब के जो लोग डीआर गोयल की उम्मीदवारी का नाम ले रहे हैं, उनका उद्देश्य सचमुच में डीआर गोयल की उम्मीदवारी को प्रस्तुत करने का नहीं है, उनका उद्देश्य तो बस अजय सिंघल की राह में रोड़े अटकाने का है । क्लब में जो लोग अजय सिंघल की उम्मीदवारी के साथ हैं, उनका कहना है कि डीआर गोयल की उम्मीदवारी का नाम लेने वाले लोग कुछ समय शोर-शराबा करके शांत हो जायेंगे क्योंकि डीआर गोयल उम्मीदवार बनने के लिए खुद ही तैयार नहीं होंगे । इसीलिए क्लब में अजय सिंघल की उम्मीदवारी के समर्थक डीआर गोयल की उम्मीदवारी की बात पर चुप्पी साधे हुए हैं और कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं - शायद वह समझ रहे हैं कि कुछ कहने से बात कहीं बढ़ या बिगड़ न जाए ।
अजय सिंघल की उम्मीदवारी जिस सावधानी और जिस तैयारी के साथ प्रस्तुत हुई है, और उसकी प्रस्तुति ने अवतार कृष्ण की उम्मीदवारी की संभावना को जिंदा रखने की कोशिश को जो धक्का पहुँचाया है उसके चलते अजय सिंघल अगले लायन वर्ष में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के एक मजबूत उम्मीदवार तो बन ही गए हैं । अपनी इस मजबूती को वह कैसे आगे भी बनाये रख पाते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा ।

Thursday, May 15, 2014

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी लड़ाई को जारी रखने की दीपक बाबू की 'जिद' के बीच वोटों की ख़रीद-फ़रोख्त के उनके फार्मूले ने दिवाकर अग्रवाल के मुकाबले हारी दिख रही बाजी को दीपक बाबू की झोली में ला दिया

मुरादाबाद । दीपक बाबू ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव जीतने के लिए जो फार्मूला बाकायदा घोषित किया था, वह अंततः कामयाब साबित हुआ । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में दीपक बाबू ने कोई संपर्क अभियान नहीं चलाया; अपनी तरफ से लोगों से संपर्क करना तो दूर की बात थी, लोगों ने उनसे संपर्क करने की कोशिश की तो लोगों की कोशिश तक को भी उन्होंने कोई तवज्जो नहीं दी । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार हमेशा इस ताक में रहते हैं कि डिस्ट्रिक्ट का कोई आयोजन हो तो वह उसमें सबसे पहले पहुँचे और सबसे अंत तक उस आयोजन में उपस्थित दिखें ताकि वहाँ उन्हें डिस्ट्रिक्ट के लोगों से मिलने का मौका तो मिले ही, साथ ही लोगों को यह 'दिखाने' का अवसर भी मिले कि एक उम्मीदवार के रूप में वह कितने कंसर्न हैं और कितने सक्रिय हैं - लेकिन दीपक बाबू ने ऐसा कोई भी काम नहीं किया । डिस्ट्रिक्ट के कई आयोजनों में तो उन्होंने उपस्थित रहने तक की जरूरत नहीं समझी - डिस्ट्रिक्ट के आयोजनों में दर्ज होने वाली उनकी लंबी अनुपस्थिति के कारण कई बार तो लोगों ने उनकी उम्मीदवारी को लेकर भी संदेह करना शुरू कर दिया था । डिस्ट्रिक्ट के जिन कुछेक आयोजनों में दीपक बाबू उपस्थित भी हुए, वहाँ भी उन्होंने लोगों से मिलने-जुलने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई । उनके व्यवहार को देख कर लोगों ने - यहाँ तक कि कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स तक ने मजाक में कहना शुरू कर दिया था कि दीपक बाबू ने तो अपने आप को गवर्नर मान लिया है और इसीलिए उम्मीदवार होने के बावजूद वह एक उम्मीदवार के रूप में नहीं, बल्कि चुने हुए गवर्नर की तरह व्यवहार कर रहे हैं ।
दीपक बाबू का 'कॉन्फिडेंस लेबल' देख कर उनके समर्थक और उनके नजदीकी तक हैरान थे और फुसफुसाहटों में एक-दूसरे से पूछते थे कि दीपक बाबू आखिर हैं किसके भरोसे ? डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के दूसरे उम्मीदवार दिवाकर अग्रवाल के प्रति जिस तरह के विरोध का रवैया अपनाया हुआ था, उससे हर किसी को यह तो महसूस हो रहा था कि दीपक बाबू को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल का भरोसा है और राकेश सिंघल ने दाँव भी चला था जिससे दीपक बाबू को बिना चुनाव लड़े ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बन जाना था । लेकिन राकेश सिंघल के हथकंडे भी फेल हो रहे थे । राकेश सिंघल के हथकंडे को सफल बनाने के लिए दीपक बाबू की तरफ से रोटरी इंटरनेशनल में आधिकारिक रूप से शिकायत भी दर्ज करवाई गई, किंतु वहाँ से भी दीपक बाबू को कोई मदद नहीं मिली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के दूसरे उम्मीदवार दिवाकर अग्रवाल को रास्ते से हटाने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल द्धारा अपनाये गए हथकंडे फेल हो रहे थे, और रोटरी इंटरनेशनल से मदद पाने की उम्मीदें भी ध्वस्त हो रही थीं - लेकिन फिर भी दीपक बाबू का कॉन्फिडेंस लेबल खासा हाई दिख रहा था । उस सवाल का जबाव लेकिन किसी को नहीं मिल रहा था कि दीपक बाबू आखिर हैं किसके भरोसे ?
मजे की बात यह रही कि दीपक बाबू लोगों को बता रहे थे कि वह किसके भरोसे हैं । किंतु कोई भी उनके भरोसे पर भरोसा ही नहीं कर रहा था ।
दीपक बाबू लोगों को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव जीतने का फार्मूला बता रहे थे । उनका फार्मूला बड़ा सीधा था - वह लोगों को बता रहे थे कि जब चुनाव का समय आयेगा तब क्लब-अध्यक्षों को वह मोटी मोटी रकम ऑफर करेंगे और बदले में उनसे वोट पा लेंगे और इस तरह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बन जायेंगे । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में वोटों की ख़रीद-फ़रोख्त का यूँ तो पुराना इतिहास है, और कई जीतों में ख़रीद-फ़रोख्त की निर्णायक भूमिका देखी गई है; लेकिन सिर्फ - सिर्फ ख़रीद-फ़रोख्त के भरोसे चुनाव जीतने का भरोसा दीपक बाबू ही दिखा रहे थे । यही कारण था कि किसी को भी उनके इस फार्मूले के सफल होने का विश्वास नहीं था । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में वोटों की ख़रीद-फ़रोख्त की महत्ता से परिचित लोगों का भी मानना और कहना था कि सिर्फ ख़रीद-फ़रोख्त के भरोसे चुनाव जीतने की उम्मीद करना गले नहीं उतर रहा है ।
दीपक बाबू की चुनावी जीत ने लेकिन साबित कर दिया है कि उनका फार्मूला अचूक था और डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति का उनका 'अनुभव' आखिरकार उनके काम आया । दीपक बाबू की चुनावी जीत ने साबित कर दिया है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद पाने के लिए डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच काम करने की, लोगों से संपर्क बनाने/रखने की, लोगों को तवज्जो देने की, विभिन्न मौकों पर उनके लिए सुविधाएँ जुटाने की कोई जरूरत नहीं है - चुनाव का जब समय आये तो वोट खरीदने निकल पड़ो : जीत तुम्हारी झोली में खुद-ब-खुद आ गिरेगी ।
बात लेकिन इतनी सीधी-सरल भी नहीं है । दीपक बाबू की जीत को सिर्फ ख़रीद-फ़रोख्त से मिली जीत मानना दीपक बाबू के साथ अन्याय करना भी होगा । दीपक बाबू की एक बात के लिए तो तारीफ की ही जानी चाहिए कि तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद वह मैदान में लगातार डटे रहे । चुनाव उन्होंने अपने 'तरीके' से लड़ा; उनकी तरकीबें लगातार फेल होती जा रही थीं और उनके समर्थकों के बीच ही सवाल उठ रहे थे कि दीपक बाबू आखिर क्यों अपनी फजीहत कराने पर तुले हुए हैं - लेकिन दीपक बाबू कभी भी मैदान छोड़ते हुए नहीं 'दिखे' । दीपक बाबू अपने जिस फार्मूले के भरोसे जीतने का दावा कर रहे थे, उनके उस दावे पर दूसरों को तो छोड़िये - खुद दीपक बाबू को भरोसा नहीं हो पा रहा था । अपने फार्मूले पर दीपक बाबू को यदि सचमुच पूरा भरोसा होता तो ठीक चुनावी प्रक्रिया के बीच में वह प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करवाने के लिए रोटरी इंटरनेशनल की और ऊँची 'अदालत' में तीन हजार डॉलर की मोटी फीस देकर शिकायत दर्ज नहीं करवाते । ठीक चुनावी प्रक्रिया के बीच में उन्होंने शिकायत दर्ज करवाई, इससे जाहिर है कि उन्हें भी अपने 'फार्मूले' के सफल होने को लेकर संदेह था । शिकायत दर्ज करवाने की उनकी कार्रवाई से केवल एक बात साबित होती है और वह यह कि चुनावी नतीजा प्रतिकूल आने के बाद भी वह लड़ाई को जारी रखने की तैयारी कर रहे थे । तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद अपनी लड़ाई को जारी रखने की दीपक बाबू की इस 'जिद' को नोट किया जाना चाहिए और उन्हें मिली चुनावी जीत में उनकी इस 'जिद' की भूमिका को समझना/पहचानना चाहिए ।
दीपक बाबू की इस जिद ने दरअसल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी प्रक्रिया को खासा लंबा करने का काम किया, जिसने लगता है कि दिवाकर अग्रवाल और उनकी टीम के सदस्यों को थका दिया और जिसके चलते चुनाव के आख़िरी दिनों में होने वाले उलट-फेर को काबू में करने के लिए जरूरी तैयारी करने में वह चूक गए और जिसके नतीजे के रूप में जीती-जिताई समझी जा रही बाजी दिवाकर अग्रवाल अंततः दीपक बाबू से हार गए ।