Tuesday, October 10, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल की बेईमानीपूर्ण हरकतों का रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों द्वारा संज्ञान लिए जाने की खबर से आलोक गुप्ता की चुनावी जीत के रंग में भंग पड़ा और उनकी जीत विवाद के घेरे में आ गई

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव जल्दी कराए जाने के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल के फैसले के पीछे बेईमानी और बदनीयती के आरोपों का रोटरी इंटरनेशनल द्वारा संज्ञान लिए जाने की खबर ने आलोक गुप्ता की जीत के जोश को ठंडा करने तथा 'आगे' के लिए उनकी मुश्किलों का बढ़ाने का काम किया है । उल्लेखनीय है कि आज सुबह आलोक गुप्ता की चुनावी जीत की खबर मिलने के साथ ही सतीश सिंघल को दिल्ली स्थित रोटरी इंटरनेशनल के साऊथ एशिया ऑफिस से यह खबर भी मिली कि रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों ने जल्दी चुनाव करवाए जाने के पीछे उनकी पक्षपातपूर्ण बेईमानी और बदनीयती को पहचाना है और अपने स्तर पर इसकी जाँच करवाने का निश्चय किया है । सतीश सिंघल ने अपनी तरफ से तो खबर को छिपाने की कोशिश की, लेकिन साऊथ एशिया ऑफिस से ही डिस्ट्रिक्ट 3011 के कुछेक पूर्व गवर्नर्स को भी यह खबर मिली, तब फिर सतीश सिंघल के लिए इसे छिपाए रखना मुश्किल हो गया । सतीश सिंघल ने हालाँकि यह कहते हुए बेफिक्री दिखाने/जताने का प्रयास जरूर किया कि रोटरी इंटरनेशनल के नियमों के अनुसार ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को यह अधिकार प्राप्त है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव वह कब करवाए, इसलिए इस संबंध में की गई शिकायत और या होने वाली जाँच का कोई अर्थ नहीं है - लेकिन मामले में रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों के दिलचस्पी लेने की खबर के कारण आलोक गुप्ता की चुनावी जीत के रंग में भंग जरूर पड़ गया है और उनकी जीत विवाद के घेरे में आ गई है ।
मजे की बात यह है कि जल्दी चुनाव करवाए जाने को लेकर रोटरी इंटरनेशनल में कोई ऑफिशियल शिकायत नहीं की गई है । साऊथ एशिया ऑफिस से भी जो जानकारी मिली है, उसके अनुसार भी जल्दी चुनाव करवाने के पीछे बेईमानी और बदनीयती का संज्ञान रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों ने खुद से ही लिया है । दरअसल, सतीश सिंघल का यह फैसला रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों के संज्ञान में खुद-ब-खुद रोटरी में सतीश सिंघल की कुख्याति के कारण आया जान पड़ता है । रोटरी नोएडा ब्लड बैंक में हिसाब-किताब की गड़बड़ियों के कारण सतीश सिंघल को रोटरी में रोटरी के नाम पर धंधा करने वाले व्यक्ति के रूप में देखा/पहचाना जाता है । इस 'पहचान' के कारण - 'बद अच्छा बदनाम बुरा' वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए उनके हर कदम को संदेह की निगाह से देखा जाता है । संभवतः यही वजह रही कि जल्दी चुनाव करवाने की सतीश सिंघल की घोषणा को संदेह की निगाह से देखा गया, और रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों ने अपने स्तर पर सतीश सिंघल के असली इरादे को भाँपने/समझने की कोशिश की । पिछले दिनों दिल्ली में आयोजित हुए रोटरी के बड़े कार्यक्रमों में रोटरी इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारी और नेता शामिल हुए तो उन्हें सतीश सिंघल की हरकतों और बेईमानियों के तरह तरह के किस्से सुनने को मिले । इन्हीं किस्सों में आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी को प्रमोट करने तथा क्लब्स के प्रेसीडेंट्स पर आलोक गुप्ता को तवज्जो देने के लिए दबाव बनाने के उनके प्रयासों का भी जिक्र हुआ । समझा जाता है कि इसके बाद से ही रोटरी इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारियों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सतीश सिंघल की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव से जुड़ी कारगुजारियों पर निगाह रखना शुरू किया ।
डिस्ट्रिक्ट 3012 में चुनावी विवादों का हाल का रिकॉर्ड कुछ अच्छा नहीं है । पीछे संपन्न हुए सीओएल तथा इंटरनेशनल डायरेक्टर के चुनाव के लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव विवाद और आरोपों में पड़े और मामला रोटरी इंटरनेशनल तक पहुँचा । डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर मुकेश अरनेजा की बदनामी का आलम यह है कि पिछली रोटरी इंस्टीट्यूट की कमेटी में तत्कालीन इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई ने उन्हें जगह तक नहीं दी । सतीश सिंघल के साथ उन्हीं मुकेश अरनेजा ने भी आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी की कमान सँभाली हुई थी और आरोप सुने जा रहे थे कि डीआरएफसी के रूप में मुकेश अरनेजा ने आलोक गुप्ता के लिए वोट जुटाने के  उद्देश्य से डीडीएफ की सौदेबाजी की । मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल की भरपूर बदनामी के कारण, आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी को सफल बनाने के लिए उनके द्वारा अपनाए जा रहे हथकंडों ने उनकी बदनामी की आग को घी डाल कर भड़काने का काम किया । यही कारण रहा कि रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों ने कोई ऑफिशियल शिकायत हुए बिना, खुद से संज्ञान लेकर जल्दी चुनाव करवाने के पीछे छिपी बेईमानी और बदनीयती की जाँच करने का फैसला लिया है । उल्लेखनीय है कि पड़ोसी डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट विनय भाटिया के चुनाव के मामले में भी रोटरी इंटरनेशनल ने बिना ऑफिशियल शिकायत हुए, खुद से संज्ञान लेकर चुनावी बेईमानी की जाँच की थी और जाँच में आरोपों को सच पाए जाने पर इंटरनेशनल बोर्ड ने तीन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के खिलाफ सख्त टिप्पणियाँ की थीं ।
मजे की बात है कि सतीश सिंघल डिस्ट्रिक्ट 3011 के उक्त मामले को अपनी और आलोक गुप्ता की ढाल के रूप में देख रहे हैं और आश्वस्त हैं कि चुनावी बेईमानी के दोषी पाए जाने के बावजूद जैसे वहाँ 'वास्तव' में किसी का कुछ नहीं बिगड़ा, वैसे ही यहाँ भी नहीं बिगड़ेगा - बदनामी से डरना क्या ? बदनाम हैं तो क्या, नाम तो है । दरअसल मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल ने तो अपने आप को बदनामी के कीचड़ में 'एडजस्ट' कर लिया है; आलोक गुप्ता के लिए लेकिन 'सिर मुंडाते ओले पड़ने' वाली बात हो गयी है । एक अच्छी जीत की खबर के साथ-साथ, उनकी चुनावी जीत को 'मैनेज' करने के मामले को इंटरनेशनल पदाधिकारियों द्वारा संज्ञान में लेने की खबर भी आने से उनकी जीत का उत्साह तो ठंडा पड़ा है - रोटरी इंटरनेशनल पदाधिकारियों और नेताओं के बीच उनका नाम मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल जैसे पहले से बदनाम लोगों के साथ सीधे-सीधे और जुड़ गया है ।

Sunday, October 8, 2017

थैंक्यू मिस्टर राजा साबू और मिस्टर यशपाल दास, काफी हील-हुज्जत के बाद आखिरकार आपने रोटरी उत्तराखंड डिजास्टर रिलीफ ट्रस्ट के अकाउंट तो दे दिए हैं; लेकिन रिस्टेब्लिशमेंट के नाम पर 'निकाले' गए दो करोड़ 83 लाख रुपए कहाँ और कैसे खर्च हुए - यह आपने क्यों नहीं बताया ?

अंबाला । 'रचनात्मक संकल्प' को अंबाला के एक अज्ञात/अनजान नंबर से आई फोन कॉल पर थोड़ी खीज, थोड़े गुस्से और थोड़ी ठसक से भरी आवाज में बताया गया कि 'आपको रोटरी उत्तराखंड डिजास्टर रिलीफ ट्रस्ट के अकाउंट देखने हैं तो रोटरी न्यूज ऑनलाइन पर देख लीजिये ।' उक्त आवाज से अभी उसका परिचय ही पूछा गया था, कि फोन काट कर उक्त आवाज चुप हो गई । तब 'रचनात्मक संकल्प' के पास रोटरी न्यूज ऑनलाइन पर जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा । 'रचनात्मक संकल्प' यूँ तो खोजबीन करने में अपने आप को बड़ा होशियार मानता/समझता है, लेकिन रोटरी न्यूज ऑनलाइन की भूल-भुलैय्या में रोटरी उत्तराखंड डिजास्टर रिलीफ ट्रस्ट के अकाउंट वाली पोस्ट खोजने में उसके लिए नाकों चने चबाने वाली स्थिति बन गई । खासी मशक्कत के बाद आखिरकार उक्त पोस्ट खोज ली गई । इस मशक्कत में बार बार इस सवाल ने भी परेशान किया कि उक्त ट्रस्ट के मुख्य कर्ताधर्ता पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर यशपाल दास ने वायदा तो उक्त ट्रस्ट के हिसाब/किताब को जीएमएल में प्रकाशित करवाने का किया था, फिर उन्होंने हिसाब/किताब ऐसी भूल-भुलैय्या वाली जगह पर प्रकाशित क्यों किया/करवाया है - जहाँ उसे देख पाना आसान न हो । यशपाल दास ने आखिर यह परस्पर विरोधी रवैया क्यों अपनाया - जिसमें एक तरफ तो वह हिसाब/किताब प्रकाशित करवाने का दावा कर सकें; और दूसरी तरफ उन्होंने ऐसी जगह हिसाब/किताब प्रकाशित किए/करवाए, जहाँ कोई आसानी से देख न सके ।
रोटरी के बड़े नेताओं व पदाधिकारियों द्वारा संचालित एक बड़े और महत्त्वपूर्ण प्रोजेक्ट के पूरे होने की खबर गुमनाम तरीके से प्रकाशित किए/करवाए जाने का नतीजा यह है कि खबर को प्रकाशित हुए एक सप्ताह से अधिक का समय हो जाने के बाद भी पोस्ट पर सिर्फ एक कमेंट आया है - और वह भी मधुकर मल्होत्रा का । उक्त ट्रस्ट को 33 डिस्ट्रिक्ट्स से पैसे मिले हैं । किसी डिस्ट्रिक्ट के किसी भी रोटेरियन ने उक्त हिसाब/किताब को नहीं देख पाया है क्या, या इस हिसाब/किताब को मधुकर मल्होत्रा के अलावा अन्य किसी ने तारीफ के लायक नहीं समझा है ? वास्तव में एक अकेले मधुकर मल्होत्रा के प्रशंसा भरे कमेंट ने हिसाब/किताब वाली उक्त पोस्ट को और भी संदेहास्पद बना दिया है । उल्लेखनीय है कि रोटरी उत्तराखंड डिजास्टर रिलीफ ट्रस्ट के हिसाब-किताब में हेराफेरी के आरोपों को लेकर जो राजा साबू और यशपाल दास लोगों के निशाने पर रहे हैं, मधुकर मल्होत्रा को उनके ही संगी-साथी के रूप में देखा/पहचाना जाता है । सेवा कार्यों की आड़ में मौज-मजा और तफ़रीह करने के आरोपों के घेरे में मधुकर मल्होत्रा का नाम भी सुना जाता रहा है । ऐसे में, रोटरी उत्तराखंड डिजास्टर रिलीफ ट्रस्ट की गुमनाम तरीके से प्रकाशित की/करवाई गई रिपोर्ट पर एक अकेले मधुकर मल्होत्रा द्वारा ही की गई प्रशंसा ने दाल में कुछ ज्यादा ही काला होने का संकेत दिया ।
यह संकेत रोटरी उत्तराखंड डिजास्टर रिलीफ ट्रस्ट के अकाउंट पर सरसरी निगाह डालते ही 'तथ्य' में बदलता हुआ नजर आया । और यह तथ्य इस बात का सुबूत भी है कि राजा साबू और यशपाल दास लोगों की आँखों में धूल झौंकने का कैसा कैसा साहस रखते हैं । वर्ष 2015-16 की बैलेंस शीट में दो करोड़ 83 लाख रुपए स्कूल रिस्टेब्लिशमेंट फंड में ट्रांसफर दिखाए गए हैं । रिस्टेब्लिशमेंट फंड में इससे पहले के दो वर्षों में क्रमशः 28 लाख रुपए तथा दो करोड़ 55 लाख रुपए, यानि कुल दो करोड़ 83 लाख रुपए 'खर्च' किए हुए दिखाए गए हैं । ऐसे में सवाल यह है कि वर्ष 2013-14 और वर्ष 2014-15 में रिस्टेब्लिशमेंट फंड में जब दो करोड़ 83 लाख रुपए के खर्च का हिसाब 'बराबर' हो गया था, तब वर्ष 2015-16 में उक्त मद में और दो करोड़ 83 लाख रुपए ट्रांसफर करने का क्या मतलब है ? यह 'क्या मतलब' इसलिए और बड़ा हो जाता है कि वर्ष 2015-16 की बैलेंस शीट में ट्रस्टियों में से किसी के हस्ताक्षर नहीं हैं । नियमानुसार, ट्रस्टियों के हस्ताक्षर के बिना बैलेंसशीट मान्य ही नहीं है । तो क्या यशपाल दास और राजा साबू ने जानबूझ वर्ष 2015-16 की बैलेंसशीट पर इसीलिए हस्ताक्षर नहीं किए हैं, कि कहीं दो करोड़ 83 लाख रुपए का मामला 'पकड़ा' गया तो वह अपने आप को बचा लें ? उल्लेखनीय है कि बाकी तीन वर्षों की बैलेंसशीट में यशपाल दास के तीन तथा दो में राजा साबू के हस्ताक्षर हैं ।
रोटरी उत्तराखंड डिजास्टर रिलीफ ट्रस्ट के हिसाब-किताब में एक और मजेदार चीज देखने को मिली - इसमें एक तरफ तो फोटोस्टेट करवाने में खर्च हुए 140 रुपए और बैंक चार्ज में खर्च हुए 56 रुपए तक का हिसाब देते हुए दिखाने/जताने का प्रयास किया गया है कि जैसे एक एक पैसे का हिसाब दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन और बिल्डिंग रिस्टेब्लिशमेंट के नाम पर बिना कोई डिटेल्स दिए हुए लाखों और करोड़ों रुपए खर्च हुए दिखा दिए गए हैं । उल्लेखनीय है कि रोटरी उत्तराखंड डिजास्टर रिलीफ ट्रस्ट के हिसाब/किताब में गड़बड़ी के जो संदेह पैदा हुए और आरोप लगने शुरू हुए, वह वास्तव में इसलिए ही गहराते गए क्योंकि हिसाब/किताब को छिपाने की कोशिश की जाती रही - और हिसाब/किताब पूछने वालों से चिढ़ने, नाराज होने तथा उनको 'दुश्मन' समझने का व्यवहार प्रदर्शित किया गया । तमाम हील-हुज्जत के बाद अब जब हिसाब/किताब सामने आए भी हैं, तो उनमें भी बताने/दिखाने से ज्यादा 'छिपाने' का प्रयास नजर आ रहा है । गुमनाम और भूल-भुलैय्या वाली जगह पर दिए गए हिसाब/किताब में ट्रस्ट को पैसे कहाँ कहाँ से और कितने कितने मिले हैं, इसका तो बड़ा विस्तृत विवरण दिया गया है, लेकिन पैसे खर्च कहाँ और कैसे हुए हैं - इसका विस्तृत विवरण छिपा लिया गया है । बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन और बिल्डिंग रिस्टेब्लिशमेंट के नाम पर विभिन्न वर्षों में जो लाखों और करोड़ों रुपए खर्च दिखाए गए हैं, उनके भी विस्तृत विवरण यदि दे दिए जाते, तो ट्रस्ट के पैसों में हेराफेरी और गड़बड़ी का संदेह करने वाले लोगों के मुँह अपने आप बंद हो जाते । इसकी बजाए, पहले तो हिसाब/किताब देने में तरह तरह की बहानेबाजी करने, दबाव पड़ने पर घोषित जगह की बजाए गुमनाम और भूल-भुलैय्या वाली जगह पर हिसाब/किताब देने, और वह भी आधे-अधूरे ढंग से और अमान्य बैलेंसशीट से देने की कोशिश ने ट्रस्ट के पैसों में गड़बड़ी और हेराफेरी के संदेहों और आरोपों को और हवा देने का ही काम किया है । ट्रस्टियों के हस्ताक्षर के बिना दिखाई जा रही वर्ष 2015-16 की बैलेंसशीट में दो करोड़ 83 लाख रुपयों के ट्रांसफर के तथ्य ने मामले को खासा गंभीर बना दिया है ।

Saturday, October 7, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में रमेश अग्रवाल से हुए 'सौदे' के चलते मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल ने यदि अशोक जैन को समर्थन दिया, तो अमित गुप्ता की उम्मीदवारी का क्या होगा ?

गाजियाबाद । अशोक जैन द्वारा अगले रोटरी वर्ष की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी में दिलचस्पी लेने तथा उनकी उम्मीदवारी को मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल का भी समर्थन होने की खबरों ने अमित गुप्ता की सारी प्लानिंग को चौपट करने का खतरा पैदा कर दिया है । उल्लेखनीय है कि अमित गुप्ता की तरफ से लगातार यह दावा किया/सुना जाता रहा है कि अगले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल ने उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने का आश्वासन उन्हें दिया हुआ है । माना/समझा तो यहाँ तक जाता है कि उनके समर्थन के भरोसे ही अमित गुप्ता ने अगले रोटरी वर्ष की उम्मीदवारी के लिए तैयारी की हुई है; और उनके समर्थन के भरोसे ही अमित गुप्ता ने अगले वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन और क्लब के प्रमुख सदस्यों के ऐतराज तक को नजरअंदाज किया हुआ है । अमित गुप्ता चूँकि सुभाष जैन के क्लब के ही सदस्य हैं, इसलिए सुभाष जैन और क्लब के अन्य प्रमुख लोगों का लगातार कहना रहा कि अगले रोटरी वर्ष में सुभाष जैन और क्लब के प्रमुख सदस्य गवर्नरी 'करने/चलाने' के काम में व्यस्त रहेंगे, इसलिए अमित गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में काम करने के लिए वह समय नहीं निकाल सकेंगे - और इस कारण से अमित गुप्ता अगले रोटरी वर्ष की बजाए उससे आगे के वर्ष में उम्मीदवारी प्रस्तुत करें । अमित गुप्ता की तरफ से लोगों को लेकिन हमेशा ही इस बात का यही जबाव सुनने को मिला कि अगले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में वह स्वयं ही काम कर लेंगे और सुभाष जैन या क्लब के लोगों से सहयोग लेने/मिलने की कोशिश या उम्मीद वह नहीं करेंगे - और सहयोग न मिलने की किसी से कोई शिकायत भी वह नहीं करेंगे ।
अपने क्लब के लोगों के ऐतराज के बाद भी अमित गुप्ता के अगले वर्ष के लिए ही अपनी उम्मीदवारी पर डटे रहने के पीछे मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल के समर्थन को ही देखा/पहचाना जा रहा है । अमित गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार ही, अगले रोटरी वर्ष की सिचुऐशन अमित गुप्ता को पूरी तरह अपने अनुकूल लग रही है - अमित गुप्ता को लग रहा है कि अगले रोटरी में सुभाष जैन चूँकि गवर्नरी करने में व्यस्त रहेंगे इसलिए उनकी मदद भले ही न कर सकें, लेकिन उनकी उम्मीदवारी का विरोध भी नहीं कर सकेंगे । दरअसल अमित गुप्ता को डर यह है कि सुभाष जैन कभी भी उनकी उम्मीदवारी को स्वीकार नहीं कर पायेंगे - उनके नजदीकियों को ही लगता है कि उन्हें यह बात मुकेश अरनेजा ने ही समझाई होगी कि सुभाष जैन कभी भी नहीं चाहेंगे कि क्लब में उनके अलावा और कोई भी गवर्नर हो जाए; इसलिए सुभाष जैन का गवर्नर-वर्ष ही उनके लिए उम्मीदवार बनने का बढ़िया मौका है । नजदीकियों की मानें तो मुकेश अरनेजा की समझाइस के अनुसार, अगले वर्ष की चुनावी राजनीति के परिदृश्य को लेकर अमित गुप्ता का आकलन यह है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने के नाते सुभाष जैन उनकी उम्मीदवारी में कोई समस्या पैदा नहीं करेंगे और मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल के समर्थन के बूते वह आसानी से अपनी उम्मीदवारी की नाव को पार करा लेंगे ।
अमित गुप्ता इस आकलन के भरोसे अपनी उम्मीदवारी को लेकर बेहद आश्वस्त रहे और इसी आश्वस्ति के चलते उन्होंने अपने क्लब के लोगों की भी एक नहीं सुनी । किंतु अब जब वह अशोक जैन की संभावित उम्मीदवारी को मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल के समर्थन की बात सुन रहे हैं, तो उन्हें चिंता हुई है । सुना/बताया जा रहा है कि मुकेश अरनेजा ने मौजूदा वर्ष के चुनाव में आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए रमेश अग्रवाल का समर्थन जुटाने के ऐवज में रमेश अग्रवाल से सौदा किया था, जिसके तहत अशोक जैन को अगले वर्ष समर्थन देने की बात है । उक्त सौदे के अनुरूप ही अशोक जैन ने अपनी उम्मीदवारी के लिए तैयारी करना शुरू कर दी है - हालाँकि वास्तविक खेल इस वर्ष के चुनाव का नतीजा आने के बाद ही शुरू होगा । आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी को सफल बनाने के लिए मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल ने जो चौतरफा 'फील्डिंग' लगाई थी, उसके चलते उन्हें आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के सफल होने की उम्मीद तो पूरी है; और सफल होने पर रमेश अग्रवाल तथा अन्य लोगों से किए गए सौदों का 'भुगतान' भी हो जाएगा - लेकिन किसी कारण से चुनावी नतीजा मनमाफिक नहीं आया तो उसका खामियाजा रमेश अग्रवाल और अशोक जैन को भी भुगतना पड़ेगा । अमित गुप्ता इसीलिए अशोक जैन की उम्मीदवारी को मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल के समर्थन की बात से निराश महसूस करने के बावजूद उम्मीद की लौ भी जलाए हुए हैं; वह इस बात को भी जानते ही हैं कि रोटरी की चुनावी राजनीति में वायदों और आश्वासनों की उम्र ज्यादा लंबी नहीं होती है । देखना दिलचस्प होगा कि मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल से अमित गुप्ता को मिला आश्वासन सच्चा साबित होता है, या झाँसा - और यदि झाँसा साबित हुआ तो अमित गुप्ता की उम्मीदवारी का क्या होगा ?

Friday, October 6, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री को 'बेहोशी' की हालत से बाहर लाने की लीडरशिप की कोशिशों में, वीके हंस को डिस्ट्रिक्ट गवर्नरी की कुर्सी मिलने का संकेत भी छिपा है क्या ?

नई दिल्ली । विक्रम शर्मा के क्लब को फिर से 'जिंदा' करने के लीडरशिप के फैसले को देखते/'पढ़ते' हुए डिस्ट्रिक्ट के लोगों को वीके हंस को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की 'गद्दी' मिलने के सपने दिखने लगे हैं । विक्रम शर्मा के क्लब का फिर से 'जिंदा' होना यूँ तो कोई बड़ी बात नहीं है; लेकिन विक्रम शर्मा की जो 'राजनीति' रही और जिसके चलते उनके क्लब को बंद किया गया और तमाम कोशिशों के बावजूद जिसे पुनर्जीवन न मिलता देख विक्रम शर्मा को डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन के एक क्लब में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा - उन सब बातों को याद करें तो पायेंगे कि विक्रम शर्मा के क्लब के 'जिंदा' होने की बात कोई साधारण बात नहीं है; और वास्तव में यह बात किसी बड़ी हलचल की आहट है । इस आहट का महत्त्व अगले महीने होने वाली इंटरनेशनल बोर्ड की मीटिंग के एजेंडे में डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के मामले के शामिल होने से बढ़ जाता है । वीके हंस और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों को लग रहा है कि अगले महीने हो रही इंटरनेशनल बोर्ड की मीटिंग में उन्हें अपने लिए अच्छी खबर सुनने को मिल सकती है ।
वीके हंस और उनके समर्थकों को ऐसा इसलिए भी लग रहा है, क्योंकि डिस्ट्रिक्ट के नेताओं के बीच वीके हंस के विरोध के स्वर काफी धीमे हुए हैं । उल्लेखनीय है कि पिछले लायन वर्ष में भी डिस्ट्रिक्ट की 'बेहोशी' को दूर करने की बात चली थी, लेकिन उस समय वीके हंस को गवर्नर बनाने के मुद्दे पर कई पूर्व गवर्नर्स के रवैये को देखते हुए मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था । उससे डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच संदेश यह गया है कि लीडरशिप वीके हंस के साथ 'न्याय' करना चाहती है, और पूर्व गवर्नर्स यदि वीके हंस के साथ न्याय करने में सहयोग नहीं करते हैं - तो लीडरशिप डिस्ट्रिक्ट को फिर बेहोशी की हालत में ही पड़े रहने देगी । समझा जाता है कि लीडरशिप की तरफ से यह संकेत मिलने पर वीके हंस को गवर्नरी 'मिलने' का विरोध कर रहे अधिकतर पूर्व गवर्नर्स ने अपने कदम पीछे खींच लिए हैं और अब वह वीके हंस को गवर्नरी 'देने' को लेकर विरोध करने के मूड में नहीं दिख रहे हैं । वीके हंस के विरोध को लेकर हर्ष बंसल अब पूरी तरह अकेले पड़ गए दिख रहे हैं । केएम गोयल की खिलाफत के मुद्दे पर हर्ष बंसल जिस तरह से अलग-थलग पड़े हैं, उससे भी लगता है कि हर्ष बंसल की नकारात्मक राजनीति को डिस्ट्रिक्ट में अब कोई समर्थन नहीं रह गया है । दरअसल अधिकतर लोग डिस्ट्रिक्ट की बेहोशी की हालत से अब उकता गए हैं और जल्दी से जल्दी डिस्ट्रिक्ट को बेहोशी की हालत से बाहर निकालना/निकलवाना चाहते हैं - और इसलिए अब ऐसा कोई काम नहीं करना चाहते हैं कि जिससे लीडरशिप को डिस्ट्रिक्ट को बेहोशी की हालत में ही डाले रखने का बहाना मिले ।
वीके हंस को अगले लायन वर्ष की गवर्नरी देने के मुद्दे पर लीडरशिप के बीच हालाँकि इसे लेकर जरूर असमंजस है कि उन्हें नोमीनेट किया/करवाया जाए, और या इलेक्ट करवाया जाए । कुछेक को लगता है कि वीके हंस को इलेक्ट करवाने के प्रयासों पर कोई बबाल कर सकता है, जिसे लेकर खामखाँ का बखेड़ा होगा; इसलिए मामले को अभी लटकाए रखा जाए - और जून की इंटरनेशनल बोर्ड मीटिंग में वीके हंस को नोमीनेट किया/करवाया जाए । लीडरशिप के कुछेक लोगों की राय लेकिन यह है कि अगले माह होने वाली बोर्ड की मीटिंग में ही वीके हंस के लिए 'रास्ता' खोला जाए - और उन्हें अगले लायन वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में इलेक्ट करवाने की तैयारियाँ शुरू की जाएँ; और देखा जाए कि कौन विरोध करता है और उसके विरोध को डिस्ट्रिक्ट में कितना समर्थन मिलता है ? इससे यह तय करने में भी आसानी होगी कि डिस्ट्रिक्ट की बेहोशी को अभी बनाए रखा जाए - या उसे बेहोशी से बाहर लाया/निकाला जाए । लीडरशिप के रवैये को देखते हुए लग रहा है कि जैसे वीके हंस को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की गद्दी सौंपने को उसने भी अपनी प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लिया है । ऐसे में, डिस्ट्रिक्ट के कई लोग वीके हंस को गवर्नरी की कुर्सी की तरफ बढ़ता देख रहे हैं - तो यह बहुत स्वाभाविक सी बात है ।

Wednesday, October 4, 2017

रोटरी इंडिया विन्स कमेटी के सबसे बड़े पदाधिकारी सुशील गुप्ता को अपने ही डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3011 के विन्स सेमीनार में बिना एक शब्द बोले, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी के 'फ्लर्टिंग' कार्यक्रम में तालियाँ बजा कर वापस लौटना पड़ा

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी के जल्दबाजी मचाने के कारण देश के 'विन्स' के सबसे बड़े पदाधिकारी सुशील गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट विन्स सेमीनार में दो शब्द कहने का मौका नहीं मिल सका । रोटरी इंडिया विन्स कमेटी के चेयरमैन सुशील गुप्ता को दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में तो खूब तवज्जो मिलती है; दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में होने वाले कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी को संभव बनाने के लिए हर संभव प्रयत्न किए जाते हैं और उनकी उपलब्धता के समय के हिसाब से कार्यक्रमों के समय तय होते हैं - लेकिन उन्हें अपने ही डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के 'कठोर अनुशासन' का शिकार होना पड़ा । कार्यक्रम में मौजूद निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियन ने रवि चौधरी को बताया भी कि सुशील गुप्ता ने उन्हें मैसेज किया है कि वह बस दो मिनट में पहुँचने वाले हैं, लेकिन रवि चौधरी ने उनसे साफ कह दिया कि किसी का भी इंतजार नहीं किया  जाएगा, और सुशील गुप्ता के लिए भी कार्यक्रम के समय को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा । ऐसा नहीं है कि रवि चौधरी के पास समय की कमी थी - क्योंकि सेमीनार खत्म होने के बाद उन्होंने फ्लर्ट करने में खूब समय लगाया । डिस्ट्रिक्ट विन्स सेमीनार में शामिल हुए लोगों को ट्रेजडी और कॉमेडी का इकट्ठा नजारा यह देखने को मिला कि देश में 'विन्स' के सबसे बड़े पदाधिकारी सुशील गुप्ता को अपने ही डिस्ट्रिक्ट के विन्स सेमीनार में बिना एक शब्द बोले, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के फ्लर्टिंग कार्यक्रम में तालियाँ बजा कर वापस लौटना पड़ा ।
रोटरी इंडिया विन्स कमेटी के चेयरमैन सुशील गुप्ता की ऐसी बेइज्जती इससे पहले शायद ही कभी हुई हो । सुशील गुप्ता के लिए इससे भी ज्यादा फजीहत की बात यह रही कि कार्यक्रम में उपस्थित रोटरी इंडिया विन्स कमेटी के जोनल कोऑर्डीनेटर तथा सेक्रेटरी रमेश अग्रवाल ने भी कार्यक्रम में सुशील गुप्ता की मौजूदगी को संभव बनाने के लिए रवि चौधरी को राजी करने का कोई प्रयास नहीं किया । डॉक्टर सुब्रमणियन ने रमेश अग्रवाल से भी कहा/बताया था कि सुशील गुप्ता बस पहुँचने ही वाले हैं, लेकिन रमेश अग्रवाल ने उनकी बात को अनसुना कर दिया । सुशील गुप्ता सिर्फ रोटरी इंडिया विन्स कमेटी के चेयरमैन ही नहीं हैं, बल्कि पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर हैं और इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की जुगाड़ में हैं - इसके बावजूद वह अपने ही डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी के हाथों बेइज्जत होते हैं, और विन्स कमेटी में अपने ही सहयोगी पदाधिकारी रमेश अग्रवाल को उसमें 'सहयोगी' बनते हुए पाते/देखते हैं । मजे की बात यह रही कि रवि चौधरी ने सेमीनार में अपने संबोधन में खुद स्वीकार किया कि विन्स कार्यक्रम को लेकर वह वास्तव में बहुत कन्फ्यूज हैं - इसके बावजूद इंडिया विन्स के चेयरमैन की बात सुनने में उन्होंने कोई दिलचस्पी नहीं ली; शायद उन्हें डर लगा होगा कि सुशील गुप्ता भी बोलेंगे, तो समय खराब होगा और फिर उन्हें लोगों के साथ फ्लर्ट करने के लिए समय नहीं मिलेगा ।
रवि चौधरी इससे पहले रोटरी ब्लड बैंक की मीटिंग में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल तथा पड़ोसी डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3012 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल को यह कहते हुए निशाना बना चुके हैं कि ब्लड बैंक के नाम पर इन्होंने 'दुकानें' खोली हुई हैं । रवि चौधरी के इस आरोप पर सतीश सिंघल तो चुप बने रहे, लेकिन विनोद बंसल ने कड़ा प्रतिवाद किया और बताया कि उनकी देखरेख में चल रहे ब्लड बैंक का पूरा हिसाब-किताब हर समय अपडेट रहता है - जिसे कोई भी कभी भी देख सकता है । उक्त मीटिंग में रवि चौधरी दरअसल इस बात पर अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे थे कि रोटरी के नाम पर चल रहे प्रोजेक्ट्स के कर्ता-धर्ता डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को कामकाज की और हिसाब/किताब की कोई रिपोर्ट नहीं देते हैं । उनकी इस शिकायत पर लोगों का कहना रहा कि विभिन्न प्रोजेक्ट्स के कामकाज और हिसाब/किताब की रिपोर्ट लेने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रवि चौधरी ने कभी कोई प्रयास तो किया नहीं, और अब अचानक से शिकायत करने बैठ गए हैं । बड़े पदाधिकारियों और नेताओं को रवि चौधरी के हाथों निशाना बनता देख डिस्ट्रिक्ट के कई लोग वैसे खुश भी हैं; खुश होने वाले लोगों का कहना है कि रवि चौधरी को गवर्नर बनवाने/चुनवाने में इन्हीं लोगों ने दिलचस्पी ली थी - इन्हें पता तो चलना ही चाहिए कि एक घटिया सोच रखने वाले व्यक्ति को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनवाने/चुनवाने का खामियाजा उन्हें भी भुगतना पड़ सकता है ।

Tuesday, October 3, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू में हो रहे इंटरनेशनल बोर्ड सदस्यों के डिनर में, जितेंद्र चौहान की सलाहानुसार फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को आमंत्रित करके पारस अग्रवाल ने जैसे मुसीबतों को आमंत्रित कर लिया है

आगरा । लायंस इंटरनेशनल बोर्ड के सदस्यों के साथ डिनर में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को शामिल करने को लेकर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पारस अग्रवाल अपने डिस्ट्रिक्ट के साथ-साथ मल्टीपल के दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारियों तथा नेताओं के निशाने पर आ गए हैं । इस मामले में पारस अग्रवाल अपने डिस्ट्रिक्ट में कुछ ज्यादा ही फजीहत का शिकार हो रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट के एक पूर्व गवर्नर ने इन पंक्तियों के लेखक को बताया कि पारस अग्रवाल अभी तक आगरा में 14 नवंबर को होने वाले उक्त डिनर का निमंत्रण चाह रहे लोगों को यह कहते/बताते हुए टरका रहे थे कि ऊपर से उन्हें उक्त डिनर में बीस और लोगों को निमंत्रित कर लेने की अनुमति मिली है - इसलिए चाहते हुए भी वह तय सीमा से ज्यादा लोगों को निमंत्रण नहीं दे सकते हैं । किंतु जब से लोगों को पता चला है कि पारस अग्रवाल ने फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अपने जीवन साथी के साथ उक्त डिनर में शामिल होने का निमंत्रण दिया है, और उनके एक रात आगरा में ठहरने की व्यवस्था करने की बात कही है - तभी से डिस्ट्रिक्ट के बड़े नेताओं का पारा चढ़ा हुआ है । पारस अग्रवाल के अपने डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स तथा अन्य प्रमुख नेताओं का कहना है कि पारस अग्रवाल ने इंटरनेशनल बोर्ड सदस्यों के डिनर को मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की अपनी चुनावी राजनीति का जरिया बना लिया है, और इस काम को करते हुए वह डिस्ट्रिक्ट के तथा मल्टीपल के अन्य डिस्ट्रिक्ट्स के बड़े और प्रमुख लोगों को उपेक्षित तथा अपमानित कर रहे हैं ।
इंटरनेशनल बोर्ड सदस्यों के डिनर में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अचानक से और खासतौर से निमंत्रित करने का पारस अग्रवाल का फैसला इसलिए भी लोगों की नोटिस में आया, क्योंकि डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अजय सिंघल के भाई के निधन की खबर आने/मिलने के बाद से पारस अग्रवाल को अप्रत्याशित रूप से अत्यंत सक्रिय होता हुआ देखा/पाया गया है । मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की चुनावी राजनीति के बनते/बिगड़ते ताने-बाने में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को लगता है कि अजय सिंघल के भाई के निधन से मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन की चुनावी राजनीति के समीकरण जिस तरह प्रभावित होते हुए नजर आ रहे हैं, उसमें पारस अग्रवाल को अपनी 'राह' आसान होती हुई दिखी है और इसीलिए उन्होंने अप्रत्याशित रूप से अपनी सक्रियता बढ़ा दी है, और इसके लिए इंटरनेशनल बोर्ड सदस्यों के डिनर के अवसर को भी भुना लेने की तैयारी शुरू कर दी । उल्लेखनीय है कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए इस वर्ष अजय सिंघल का पलड़ा भारी देखा/समझा जा रहा था; लेकिन उनके भाई के निधन से उनकी सारी तैयारी पर पानी पड़ता नजर आ रहा है । दरअसल जिनका निधन हुआ है, वह अजय सिंघल के सिर्फ भाई ही नहीं थे - बल्कि उनके बिजनेस पार्टनर भी थे; इसलिए उनके निधन से अजय सिंघल चौतरफा चुनौतियों से घिर गए हैं । माना/समझा जा रहा है कि चौतरफा चुनौतियों के दबाव के चलते अजय सिंघल के लिए मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन की चुनावी राजनीति के समीकरणों को साधना मुश्किल हो जाएगा, और इसलिए उन्हें मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की चुनावी दौड़ से बाहर हुआ ही देखा/माना जा रहा है - और इस स्थिति को पारस अग्रवाल ने अपने लिए एक मौके के रूप में देखा/पहचाना है ।  
इस मौके को और पुख्ता करने के लिए पारस अग्रवाल को इंटरनेशनल बोर्ड सदस्यों के आगरा में हो रहे डिनर का 'सहारा' भी मिल गया है । पारस अग्रवाल के नजदीकियों का कहना है कि डिनर का राजनीतिक फायदा उठाने का आईडिया उन्हें पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर व पूर्व मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन जितेंद्र चौहान से मिला । सुना और समझा जाता है कि पारस अग्रवाल में मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की उम्मीदवारी की हवा भरने का काम जितेंद्र चौहान ने ही किया है, और जितेंद्र चौहान के 'नेतृत्व' में ही पारस अग्रवाल चेयरमैन पद के लिए राजनीति कर रहे हैं । पारस अग्रवाल के नजदीकियों के अनुसार, फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को इंटरनेशनल बोर्ड सदस्यों के डिनर का निमंत्रण दिलवाने के बाद जितेंद्र चौहान विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के कुछेक अन्य नेताओं को भी निमंत्रण दिलवाने/भिजवाने के लिए पारस अग्रवाल पर दबाव बना रहे हैं । दरअसल विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के कुछेक नेताओं ने जितेंद्र चौहान को उलाहना दिया है कि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को निमंत्रण दिलवा कर ही पारस अग्रवाल को मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए उनका वोट मिल जाएगा क्या ? जितेंद्र चौहान की सलाहानुसार, पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को इग्नोर करके और उनका 'हक' मारकर फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को इंटरनेशनल बोर्ड सदस्यों के साथ डिनर के लिए आमंत्रित करने का जो काम पारस अग्रवाल ने किया है - वह मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के चुनाव में उन्हें फायदा पहुँचायेगा या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा; अभी लेकिन इस कदम ने पारस अग्रवाल के लिए भारी मुसीबतें पैदा कर दी हैं ।

Monday, October 2, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 के गवर्नर के रूप में टीके रूबी को 'बेस्ट क़्वालीफाइड' घोषित करते हुए रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने पूर्व प्रेसीडेंट राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स के जले पर जैसे नमक ही रगड़ दिया है

चंडीगढ़ । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अरुण होनी और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी जितेंद्र ढींगरा के बीच रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड के फैसले को लेकर सोशल मीडिया में चले संक्षिप्त वाक्-युद्ध ने रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड द्वारा राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स के मुँह पर पड़े झन्नाटेदार 'थप्पड़' से पैदा हुए फ्रस्ट्रेशन को सामने लाने का काम किया है । राजा साबू गिरोह के एक सक्रिय सदस्य के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले अरुण होनी ने रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड के एक फैसले से परिचित कराते इंटरनेशनल प्रेसीडेंट इआन रिसले के पत्र को सोशल मीडिया में शेयर करने के जितेंद्र ढींगरा के कदम पर ऐतराज करते हुए टिप्पणी की कि डिस्ट्रिक्ट के आने वाले पदाधिकारी को ऐसा नहीं करना चाहिए । जितेंद्र ढींगरा ने उनकी टिप्पणी के जबाव में उन्हें बताया कि उक्त पत्र को पहले तो आपके ही लोगों ने सोशल मीडिया में शेयर किया है । जितेंद्र ढींगरा के इस जबाव से बेचारे अरुण होनी तो चुप हो गए - लेकिन लोगों के बीच यह सवाल जरूर पैदा हो गया कि राजा साबू गिरोह के 'बड़े लोग' रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड के फैसले को डिस्ट्रिक्ट के लोगों से छिपाना क्यों चाहते हैं ? राजा साबू गिरोह के बड़े नेताओं के लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट इआन रिसले के जिस पत्र को वह डिस्ट्रिक्ट के लोगों से छिपाना चाहते थे, उसे उनके ही 'कार्यकर्ताओं' ने सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक पहुँचा दिया । वैसे इसमें कार्यकर्ताओं की भी कोई गलती नहीं थी - बड़े नेताओं ने अपने ही कार्यकर्ताओं के बीच इस बात का दावा किया कि रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने टीके रूबी से अंडरटेकिंग ली है और इस तरह उनके खिलाफ फैसला दिया है; कार्यकर्ता बेचारे मासूमियत से भरे मूर्ख किस्म के लोग हैं; उन्होंने अपने बड़े नेताओं की 'बात' पर भरोसा किया और जोश में आकर इंटरनेशनल प्रेसीडेंट इआन रिसले के पत्र को सोशल मीडिया में चिपका दिया । जितेंद्र ढींगरा ने जब देखा कि उक्त पत्र को चिपकाने की गंगा बह ही रही है, तो उन्होंने भी उसमें हाथ 'धो' लिए ।
राजा साबू गिरोह के गवर्नर्स के लिए उक्त पत्र सार्वजनिक होने से समस्या की बात यह हुई है कि टीके रूबी से अंडरटेकिंग लिए जाने की बात को लेकर गवर्नर्स के लिए मनमाना झूठ बोलने का मौका अब नहीं बचा है । इआन रिसले के पत्र के अनुसार, टीके रूबी ने इंटरनेशनल बोर्ड को लिख कर दिया है कि वह डिस्ट्रिक्ट में सभी को लेकर काम करेंगे और कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग बुलायेंगे तथा उसमें इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम को भी आमंत्रित करेंगे । इसमें भला ऐसी  क्या बात है जो टीके रूबी अभी तक नहीं कर रहे थे, या जिसे करने से वह इंकार कर रहे थे ? उल्लेखनीय है कि गवर्नर के रूप में काम करना शुरू करते ही टीके रूबी ने सबसे पहले पूर्व गवर्नर्स से विभिन्न जिम्मेदारियों में शामिल होने के लिए अनुरोध किया - लेकिन किसी ने उनके अनुरोध का जबाव तक नहीं दिया, और किसी ने बहानेबाजी से अनुरोध स्वीकार करने से इंकार कर दिया । राजा साबू के क्लब के पदाधिकारी तो अभी तक डिस्ट्रिक्ट के किसी कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए हैं, और इस कारण से क्लब के पदाधिकारी के रूप में अधिकृत रूप से मान्य नहीं हैं । टीके रूबी ने पिछले वर्षों में डिस्ट्रिक्ट तथा अन्य प्रोजेक्ट्स में हिसाब-किताब में गड़बड़ी के आरोपों के चलते हुई डिस्ट्रिक्ट और रोटरी की बदनामी को देखते हुए हिसाब-किताब दुरुस्त करने के प्रयास शुरू किए -  तो राजा साबू से लेकर यशपाल दास, मधुकर मल्होत्रा, रमन अनेजा तक उनके प्रयासों को सफल करने में सहयोग करने की बजाए विफल करने में जुट गए और लोगों को बरगलाने वाली बयानबाजी करने लगे । ऐसे में, इआन रिसले के पत्र के अनुसार टीके रूबी को जो काम सौंपे गए हैं, या जिन कामों को करने के लिए टीके रूबी ने अंडरटेकिंग दी है - उससे तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में टीके रूबी के ही हाथ मजबूत हुए हैं, और उनके लिए बेईमान गवर्नर्स की गर्दन दबोचना और आसान हो गया है ।
गौर करने की बात यह है कि निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा के नेतृत्व में राजा साबू सहित पूर्व गवर्नर्स ने तथा छह क्लब्स के प्रेसीडेंट्स ने रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड को जो पत्र भेजा था, उसमें निवर्त्तमान इंटरनेशनल प्रेसीडेंट जोन जर्म द्वारा टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नियुक्त करने के फैसले को चुनौती दी गयी थी । इन्हीं लोगों द्वारा पिछले दिनों डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच इस बात को जोरशोर से प्रचारित किया गया कि टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नियुक्त करके जोन जर्म ने रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड द्वारा पहले लिए गए फैसले का उल्लंघन किया है, इसलिए अपनी शिकायत में उन्होंने इसी तथ्य को मुद्दा बनाया है - और लोगों को बताया कि देखियेगा, इंटरनेशनल बोर्ड जोन जर्म के फैसले को पलट देगा, यानि टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद से हटा देगा । रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने लेकिन जो फैसला दिया है, वह वास्तव में राजा साबू तथा उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स के मुँह पर ऐसा झन्नाटेदार तमाचा है जिसकी गूँज सिर्फ डिस्ट्रिक्ट 3080 के लोगों के बीच ही नहीं, बल्कि पूरे रोटरी जगत में सुनी गई है । रोटरी के कई बड़े नेताओं ने इन पँक्तियों के लेखक से बात करते हुए कहा है कि टीके रूबी के मामले में इंटरनेशनल बोर्ड की तरफ से इस बार राजा साबू की जैसी फजीहत हुई है, इससे पहले किसी पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट की नहीं हुई है ।
मजे की बात यह हुई है कि राजा साबू गिरोह की तरफ से की गई शिकायत पर इंटरनेशनल बोर्ड के फैसले से अवगत करवाते हुए दो पत्र सामने आये हैं - 29 सितंबर के पत्र में तो शिकायतकर्ताओं के जले पर नमक रगड़ते हुए बताया है कि जोन जर्म ने टीके रूबी के रूप में एक 'बेस्ट क़्वालीफाइड' व्यक्ति को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनाया है । समझा जाता है कि पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट होने का वास्ता देकर राजा साबू ने जले पर नमक रगड़ते उक्त पत्र पर  रोना-धोना मचाया होगा, जिसके बाद 30 सितंबर को दूसरा संशोधित पत्र सामने आया - जिसमें लीपापोती-सी करते हुए राजा साबू और उनके गिरोह के सदस्यों को थोड़ी राहत देने की कोशिश तो की गई है, लेकिन इस कोशिश ने वास्तव में टीके रूबी को राजा साबू गिरोह के गवर्नर्स की गर्दन और ज्यादा सख्ती से दबोचने का मौका दे दिया है । राजा साबू और उनके गिरोह के गवर्नर्स के लिए मुसीबत को लगातार बढ़ाने वाली बात यह हुई है कि वह जितना ही टीके रूबी को दबाने की कोशिश करते हैं, टीके रूबी उतने ही और ज्यादा ताकतवर 'बन' जाते हैं । सोशल मीडिया में इंटरनेशनल बोर्ड के फैसले को लेकर पूर्व गवर्नर अरुण होनी को एक घुड़की में ही जितेंद्र ढींगरा ने जिस तरह से चुप कर दिया, उससे राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स की बेचारगी को पहचाना जा सकता है ।