Thursday, September 7, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में रवि चौधरी का डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनना, बंदर के हाथ में उस्तरा आ जाने जैसा मामला है क्या - जहाँकि पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता तक को अपनी 'नाक' बचाना मुश्किल हो रहा हो

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रवि चौधरी की एक बेवकूफीभरी लापरवाही ने एक नॉन-इश्यू को इश्यू बना दिया है; और रोटरी क्लब दिल्ली राजधानी के पूर्व प्रेसीडेंट राजेश गुप्ता, पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल तथा पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता तक के लिए खासी मुसीबत खड़ी कर दी है । मामला रोटरी क्लब दिल्ली राजधानी को मिली एक करीब सवा चार करोड़ रुपए की मैचिंग ग्रांट से जुड़े प्रोजेक्ट का है, जो लगातार विवाद तथा संदेह के घेरे में रहा है - जिस कारण रोटरी इंटरनेशनल को इस ग्रांट का तीन बार ऑडिट करवाना पड़ा है । इस ग्रांट से जुड़े विवाद में चूँकि सुशील गुप्ता को भी तरह तरह से लपेटा गया, इसलिए तीसरी बार का ऑडिट तो उनकी सिफारिश और कोशिश से ही हुआ । ग्रांट से जुड़े पदाधिकारियों को इस बात से बड़ी राहत मिली कि ग्रांट के इस्तेमाल में एक नए पैसे की भी चोरी या बेईमानी नहीं पकड़ी गई, और बात सिर्फ कुछेक व्यवस्था संबंधी अनिमितताओं तक ही सीमित रही । जाहिर है कि मामले का पटापेक्ष हो ही रहा था । लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रवि चौधरी की एक मामूली सी बेवकूफीभरी लापरवाही ने मामले को फिर से भड़का दिया और ग्रांट से जुड़े लोगों को मिल रही राहत को फिर से छीन लिया है ।
हुआ दरअसल यह कि उक्त ग्रांट से जुड़ी तीसरी ऑडिट रिपोर्ट के निष्कर्षों के साथ कुछ सवाल और सुझाव देते हुए एक पत्र रोटरी इंटरनेशनल से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय को मिला । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रवि चौधरी ने बिना पूरा पढ़े और समझे उस पत्र को रोटरी क्लब फरीदाबाद सेंट्रल के पदाधिकारियों को भेज दिया । दरअसल रोटरी क्लब दिल्ली राजधानी द्वारा 'जन्मी' उस ग्रांट से जुड़े प्रोजेक्ट को पालने-पोसने की जिम्मेदारी रोटरी क्लब फरीदाबाद सेंट्रल को मिली हुई है । फरीदाबाद सेंट्रल के मौजूदा पदाधिकारी पहले तो रोटरी इंटरनेशनल का पत्र देख कर चकराए, तिस पर रवि चौधरी के रवैये ने उन्हें भड़काया । रवि चौधरी ने गवर्नर वाले 'तेवर' दिखाते हुए फरीदाबाद सेंट्रल के पदाधिकारियों को यह कहते हुए धमकाया कि तुम लोग ग्रांट के नाम पर पता नहीं क्या क्या बेईमानियाँ करते हो, और रोटरी इंटरनेशनल मुझसे सवाल पूछता है । रवि चौधरी के इस रवैये से फरीदाबाद सेंट्रल के मौजूदा और पिछले पदाधिकारी भड़क गए । उन्होंने लोगों के बीच रोना रोया कि इस प्रोजेक्ट में पता नहीं क्या गड़बड़झाला है कि रोटरी इंटरनेशनल उनसे ऐसी पूछताछ करता है, जैसी अपराधियों से की जाती है । यह रोना उन्होंने चूँकि डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख लोगों के बीच रोया, तो फिर बात तो फैलनी ही थी और इस ग्रांट-प्रोजेक्ट से जुड़े 'बड़े' लोगों को निशाने पर आना ही था ।
बड़े लोगों ने ही मामले में नए सिरे से पैदा हुए झमेले का ठीकरा रवि चौधरी के सिर फोड़ा है । उनका कहना है कि रवि चौधरी की बेवकूफीभरी लापरवाही से बात का बतंगड़ बन गया है । इस तरह एक बार फिर साबित हुआ है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारियाँ क्या होती हैं और उन्हें किस होशियारी से निभाना होता है, यह जानने/समझने में रवि चौधरी पूरी तरह विफल रहे हैं; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उन्होंने सिर्फ लोगों पर रौब जमाना और कार्यक्रमों में फूहड़ प्रदर्शन करना ही जाना/सीखा है । इसीलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रवि चौधरी की कारस्तानियाँ आम रोटेरियंस और क्लब्स के प्रेसीडेंट्स के लिए ही मुसीबतभरी और अपमानजनक साबित नहीं हो रही हैं, बल्कि पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता जैसे बड़े लोगों के लिए भी फजीहत का कारण बन रही हैं ।
रोटरी क्लब दिल्ली राजधानी के पूर्व प्रेसीडेंट राजेश गुप्ता के ऑर्च क्लम्प सोसायटी के सदस्य बनने के 'ऐवज' में मिली बताई गई संदर्भित ग्रांट के मामले में झोलझाल तो हालाँकि रहा है, लेकिन उक्त ग्रांट से जुड़े लोग झोलझाल पर मिट्टी डाल कर उसे दबा देने में सफल रहे थे - रवि चौधरी की लापरवाही ने किंतु उस मिट्टी को हटा देने का काम किया है । यह मामला दरअसल शुरू से ही विवाद और आरोपों के घेरे में रहा है - राजेश गुप्ता ने जिस तरह से एक हाथ से ऑर्च क्लम्प सोसायटी की सदस्यता के लिए करीब पौने दो करोड़ रुपए दिए और दूसरे हाथ से 'अपने' एक अस्पताल के लिए रोटरी से करीब सवा चार करोड़ रुपए झटक लिए, उसके चलते यह मामला खासा संदेहास्पद रहा । राजेश गुप्ता के लिए फजीहत की बात यह रही कि वह अपने प्रेसीडेंट-वर्ष के बाद अपने ही क्लब के प्रेसीडेंट अमर कुंडलिया को ग्रांट और उसके उपयोग में कोई झोलझाल न होने का विश्वास दिलाने में असफल रहे, जिस कारण राजेश गुप्ता को उक्त प्रोजेक्ट अपने क्लब से निकाल कर रोटरी क्लब फरीदाबाद सेंट्रल में ले जाना पड़ा । राजेश गुप्ता की इससे भी ज्यादा फजीहत तब हुई, जब रोटरी इंटरनेशनल द्वारा नियुक्त किए गए ऑडीटर ने इस बात पर आपत्ति जताई कि उक्त प्रोजेक्ट जब रोटरी क्लब फरीदाबाद सेंट्रल का है - तब राजेश गुप्ता ग्रांट के हिसाब/किताब के रखवाले आखिर क्यों बने हुए हैं, और उसके बाद राजेश गुप्ता को ग्रांट के प्रबंधन की जिम्मेदारी से हटने के लिए मजबूर होना पड़ा ।
इस ग्रांट-प्रोजेक्ट से जुड़े पदाधिकारियों के इस दावे पर यदि यकीन कर भी लिया जाए कि इसमें एक नए पैसे की भी हेराफेरी नहीं हुई है, तब भी यह सवाल तो बना ही रहता है कि राजेश गुप्ता अपने ही क्लब के अध्यक्ष अमर कुंडलिया को ग्रांट-प्रोजेक्ट में ईमानदारी से काम होने का भरोसा आखिर क्यों नहीं दिला पाए और क्यों यह ग्रांट-प्रोजेक्ट रोटरी क्लब रोटरी क्लब फरीदाबाद सेंट्रल को देना पड़ा, और वहाँ भी वह ग्रांट-प्रोजेक्ट के हिसाब-किताब से क्यों जुड़े रहे ? दरअसल इस तरह की बातों ने ही इस ग्रांट-प्रोजेक्ट को विवाद और आरोपों के घेरे में बनाए रखा । इस ग्रांट-प्रोजेक्ट से तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में चूँकि विनोद बंसल और डिस्ट्रिक्ट के प्रमुख होने के नाते सुशील गुप्ता का नाम भी जुड़ा रहा है, इसलिए विवाद में इनका नाम घसीटने के भी प्रयास हुए । समय बीतने के साथ-साथ विवाद के कारण लेकिन काफी हद तक दफ़्न होते गए थे और मामला पूरी तरह लगभग सेटल हो गया था । जो थोड़ा बहुत झाम/झमेला था भी, वह ग्रांट-प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों और रोटरी इंटरनेशनल के बीच ही सिमट कर रह गया था - जिसके चलते विवाद व आरोपों की जद में आने वाले लोगों ने भी चैन की साँस ले ली थी । किंतु रवि चौधरी की लापरवाही और बेवकूफाना हरकत ने सारे मामले को फिर से खोल कर विवाद और आरोपों को नए सिरे से हवा दे दी है । मामले से जुड़े लोगों का कहना है कि रोटरी इंटरनेशनल से आए पत्र को रवि चौधरी यदि पढ़ लेते और समझ लेते तथा मामले से जुड़े लोगों से उस पर बात कर लेते - और यदि इतना नहीं, तो कम से कम फरीदाबाद सेंट्रल के पदाधिकारियों को अपनी चौधराहट दिखाए बिना ही पत्र सौंप देते तो इतना बड़ा बबाल न होता । लोगों का कहना है कि रवि चौधरी के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नरी कुछ ऐसी है, जैसे बंदर के हाथ में उस्तरा आ गया हो - और वह किसी की भी हजामत बना देने के लिए हमेशा तैयार रहता हो ।

Wednesday, September 6, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में चुनाव पर लगी अदालती रोक ने दीपक जैन की चुनाव जीतने की व्यूह रचना को छिन्न भिन्न कर दिया, और श्रीहरी गुप्ता के समर्थकों को राहत दी

मेरठ । अदालती आदेश के कारण वर्ष 2018-19 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए हो रहे चुनाव पर लगी रोक ने दीपक जैन और उनके समर्थकों को निराश किया है, जबकि श्रीहरी गुप्ता और उनके समर्थकों ने राहत की साँस ली है । उल्लेखनीय है कि आज सुबह सुबह चुनावी माहौल में उस समय खासी गर्मी पैदा हो गई थी जब डिस्ट्रिक्ट के लोगों को दीपक जैन के समर्थकों की तरफ से सुनने को मिला कि उन्होंने मेरठ में श्रीहरी गुप्ता के पक्के समझे जाने वाले छह वोटों को 'तोड़' लिया है; और श्रीहरी गुप्ता के समर्थकों की तरफ से आरोप सुना गया कि दीपक जैन पचास हजार से लेकर एक लाख रुपए तक का ऑफर देकर वोट खरीद रहे हैं । इन दावों और आरोपों को लेकर माहौल गर्मा ही रहा था कि अदालती आदेश आ गया और चुनावी प्रक्रिया जहाँ की तहाँ थम गई । वोटिंग लाइंस करीब चालीस घंटे ही खुली रह पाईं । इन करीब चालीस घंटों में कितने क्लब्स के वोट पड़े, इसकी कोई अधिकृत जानकारी तो नहीं है - लेकिन अलग अलग लोगों की चर्चाओं के अनुसार, इन करीब चालीस घंटों में कुछ ही क्लब्स के वोट पड़ सके हैं ।
क्लब्स के प्रेसीडेंट्स के वोट देने में जल्दबाजी नहीं दिखाने को चुनाव के 'बाजार में' बदल जाने के संकेत और सुबूत के रूप में देखा जा रहा है । दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में अमूमन देखा गया है कि वोटिंग लाइंस खुलने के पहले चौबीस घंटे में साठ प्रतिशत वोटिंग हो जाती है - लेकिन डिस्ट्रिक्ट 3100 की बात खासी निराली है, और इसी निरालेपन के कारण डिस्ट्रिक्ट नॉन-डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में है । उम्मीद की गई थी कि नॉन-डिस्ट्रिक्ट होने की फजीहत से डिस्ट्रिक्ट के लोग सबक लेंगे - लेकिन चुनावी गहमागहमी में हो रही चर्चाओं और लग रहे आरोपों से साफ हो गया है कि किसी ने कोई सबक नहीं सीखा है और पहले की ही तरह हरकतें लगातार जारी हैं और रोटरी इंटरनेशनल से 'सजा' तक पा चुके लोग ही पूरी बेशर्मी से अब भी अपनी हरकतों को जारी रखे हुए हैं । चुनावी बेईमानी के आरोप पर रोटरी इंटरनेशनल से 'सजा' पाए लोगों पर निर्भर होने/रहने के कारण दीपक जैन का उम्मीदवारी-अभियान लगातार चर्चा और आरोपों के घेरे में रहा, तथा उनके उम्मीदवारी-अभियान पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के चुनाव को वोटों की 'खरीद-फरोख्त का बाजार' बना देने के गंभीर आरोप सुनाई दिए ।
समझा जाता है कि संभवतः इसी कारण से प्रेसीडेंट्स ने वोट देने में जल्दबाजी नहीं दिखाई; उन्होंने इंतजार करना जरूरी समझा ताकि अपने वोट की वह और बढ़ी हुई कीमत पा सकें । दीपक जैन के नजदीकियों की तरफ से वोटिंग लाइन खुलने के समय प्रति वोट पचास से साठ हजार रुपए का जो रेट सुना जा रहा था, वह 24 घंटे बाद एक लाख रुपए तक जा पहुँचा था - प्रेसीडेंट्स को उम्मीद थी कि यह रेट अभी और बढ़ेगा । अदालती फैसले के कारण चुनाव पर लगी रोक ने लेकिन उनकी उम्मीदों पर फिलहाल पानी फेर दिया है । चुनाव पर लगी रोक ने दीपक जैन के समर्थकों को निराश किया है; उनकी तरफ से सुना जा रहा है कि चुनाव जीतने के लिए उन्होंने पूरी व्यूह रचना कर ली थी - और उसे सफलतापूर्वक क्रियान्वित किया जा रहा था; लेकिन चुनाव पर लगी रोक ने उनकी सारी व्यूह रचना को छिन्न भिन्न कर दिया है । मजे की बात यह है कि चुनाव पर लगी रोक ने श्रीहरी गुप्ता के समर्थकों को खुश किया है । उनकी तरफ से सुना जा रहा है कि दीपक जैन की तरफ से उनके वोटों को छीनने/हथियाने की जिस तरह की जो कोशिश की गई, उससे निपटने की उनके पास कोई तैयारी नहीं थी - चुनाव स्थगित होने से उन्हें वह तैयारी करने का मौका मिल गया है । मेरठ के वोटों को लेकर दीपक जैन और श्रीहरी गुप्ता के बीच जो घमासान मचा है, उसे देख कर चक्रेश लोहिया के समर्थकों को अपनी राह आसान होती हुई दिखी है । दरअसल चक्रेश लोहिया के समर्थकों का मानना और कहना है कि वर्ष 2018-19 के गवर्नर पद का चुनावी मुकाबला वास्तव में चक्रेश लोहिया और श्रीहरी गुप्ता के बीच ही है; ऐसे में दीपक जैन की तरफ से श्रीहरी गुप्ता को जो नुकसान पहुँचाया जायेगा, उससे वास्तव में चक्रेश लोहिया का रास्ता आसान बनेगा । चुनाव को लेकर होने वाले तरह तरह के आकलनों के बीच, चुनाव पर लगी रोक ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के परिदृश्य को फिलहाल तो लेकिन और उलझा दिया है ।

Tuesday, September 5, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में सुशील अग्रवाल की सरपरस्ती में हुए जेपी सिंह के अपमान के घाव पर एपी सिंह के रवैये ने मरहम लगाने का काम किया

नई दिल्ली । पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील अग्रवाल की सरपरस्ती में नियमों का उल्लंघन करते हुए मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में पदों की बंदरबाँट में हुई हेकड़ी की एक दूसरे पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर एपी सिंह ने जैसी हवा निकाली है, उससे सुशील अग्रवाल और उनके साथ लगे लग्गे-भग्गे हैरान/परेशान हैं और मनमसोसे हुए हैं । इस सारे किस्से में फजीहत का शिकार बने हैं बेचारे गुरचरण घई; और खुश होने का मौका मिला है इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडॉर्सी जेपी सिंह को ! अभी हाल ही में आगरा में संपन्न हुई मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 की मौजूदा वर्ष की पहली मीटिंग में बेइज्जती का शिकार बन कर लौटे जेपी सिंह को यह सुन/जान कर बड़ी राहत मिली कि एपी सिंह ने अपने एक स्ट्रोक से ही सुशील अग्रवाल और उनकी सरपरस्ती में जुटे लोगों को उनकी 'औकात' दिखा दी है । मामला 14 अक्टूबर को दिल्ली में होने जा रहे ऑल इंडिया साईट फर्स्ट कॉन्क्लेब का है, जिसकी तैयारी में मुख्य और केंद्रीय भूमिका निभाते हुए एपी सिंह ने मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट विजन चेयरपरसन के रूप में गुरचरण घई को तवज्जो देना तो दूर रिकॉगनाइज तक करने से इंकार किया हुआ है ।
दिल्ली में होने वाले साईट फर्स्ट कॉनक्लेब की तैयारी के लिए एपी सिंह दरअसल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के पूर्व गवर्नर दीपक तलवार पर निर्भर हैं । यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट विजन चेयरपरसन का पद नियमानुसार तीन वर्ष के लिए दीपक तलवार के पास ही था, और नियमानुसार इस वर्ष भी उन्हें ही इस पद पर रहना था । लेकिन हमेशा नियमों की बात और वकालत करते रहने वाले सुशील अग्रवाल ने नियमों को धता बताते हुए दीपक तलवार की जगह गुरचरण घई को इस पद पर बैठवा दिया । गुरचरण घई को पद रूपी झुनझुना तो मिल गया है, लेकिन उसे बजाने का उन्हें कोई मौका नहीं मिल रहा है । मल्टीपल के डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारी ही उन्हें गंभीरता से नहीं ले रहे हैं, और इस चक्कर में डिस्ट्रिक्ट्स के विजन चेयरपर्सन्स के नाम उन्हें नहीं मिल पा रहे हैं । इससे भी बड़ी चोट उन्हें लेकिन एपी सिंह की तरफ से मिली है । उन्होंने खुद ही लोगों को बताया है कि दिल्ली में होने वाले साईट फर्स्ट कॉन्क्लेब के मुखिया एपी सिंह को मेल लिख कर उन्होंने बताया कि दिल्ली में साईट फर्स्ट से जुड़े कामकाज को देखने की जिम्मेदारी उन्हें मिली है, इसलिए कॉन्क्लेब से संबंधित किसी भी जिम्मेदारी को निभाने के लिए उन्हें कहा/बताया जाए । गुरचरण घई लेकिन यह देख कर हैरान/परेशान हो उठे कि एपी सिंह ने उनकी मेल का जबाव तक नहीं दिया, और कॉन्क्लेब के काम के लिए वह दीपक तलवार से ही संपर्क कर रहे हैं । गुरचरण घई ने दीपक तलवार से भी बात की और उन्हें कहा कि ऑल इंडिया साईट फर्स्ट कॉन्क्लेब के काम अब आपको नहीं, बल्कि मुझे करने हैं । दीपक तलवार ने उन्हें टका-सा जबाव दे दिया कि यह बात मुझसे नहीं, बल्कि एपी सिंह से कहो ।
एपी सिंह और दीपक तलवार के इस रवैये की शिकायत गुरचरण सिंह ने सुशील अग्रवाल से की और मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट के अन्य पदाधिकारियों के बीच भी रखी - मल्टीपल के बड़बोले और बद्तमीज किस्म के सदस्यों की तरफ से सुझाव भी आया कि एपी सिंह को बता देना चाहिए कि उनके रवैये के चलते दिल्ली में उक्त कॉन्क्लेब नहीं होने दिया जायेगा । सुशील अग्रवाल लेकिन इस मामले में चुप ही रहे और उनकी तरफ से यही सुझाव सुनने को मिला कि जैसे चल रहा है, वैसे ही चलने दो - अन्यथा और ज्यादा फजीहत होगी । सुशील अग्रवाल ने मल्टीपल काउंसिल के पदाधिकारियों की जैसी जो 'बारात' तैयार की/करवाई है, जिसमें लायंस इंटरनेशनल के पैसों को हड़प जाने वाले चोट्टे के रूप में पहचाने जाने वाले तक को शामिल कर लिया गया है - उसके कारण वैसे ही मल्टीपल के लोगों के साथ-साथ बड़े लायन लीडर्स के बीच भी सुशील अग्रवाल की खासी फजीहत हो रही है । वीएस कुकरेजा जिस तरह से एरिया लीडर के पद पर रहने के बाद मल्टीपल लीडर बनने को राजी हो गए, उससे उन्होंने यही साबित किया है कि वह पद के कितने बड़े लालची हैं; उनके लालच को पूरा करने/करवाने में भूमिका निभाने के चलते भी सुशील अग्रवाल को निशाना बनना पड़ रहा है । उल्लेखनीय है कि मल्टीपल जीएलटी कोऑर्डीनेटर पद के लिए डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के पूर्व गवर्नर अरुण पुरी के नाम पर सहमति बनी थी । अरुण पुरी फैकल्टी डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट से प्रशिक्षित वरिष्ठ और अनुभवी फैकल्टी हैं, और इसी कारण से उक्त पद के लिए उनके चयन को सभी का समर्थन था - लेकिन ऐन मौके पर वीएस कुकरेजा का पद का लालच हावी हो गया और सुशील अग्रवाल ने भी वीएस कुकरेजा के लालच के सामने समर्पण कर दिया ।
सुशील अग्रवाल ने चोट्टे, पदों के लालची और नाकारा लोगों की बारात तो तैयार कर/करवा दी; लेकिन अब एपी सिंह के एक स्ट्रोक से बारातियों की फजीहत हो रही है - तो वह मुँह छिपा रहे हैं । गुरचरण घई के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि न तो एपी सिंह उन्हें रिकॉगनाइज कर रहे हैं, और उन्हें रिकॉग्नीशन दिलवाने के लिए न सुशील अग्रवाल कोई प्रयत्न कर रहे हैं । नियमों की अनदेखी करके बड़बोले और बद्तमीज और बेईमान लोगों को लेकर मनमाने तरीके से बनाई गई मल्टीपल पदाधिकारियों की टीम की इस फजीहत और बेचारगी को देख कर जेपी सिंह को बड़ी राहत मिली है । उल्लेखनीय है कि जेपी सिंह को आगरा में हुई मल्टीपल की मीटिंग में दोहरी फजीहत का शिकार होना पड़ा था - सुशील अग्रवाल की सलाहानुसार हो रही मीटिंग में जेपी सिंह को मंच पर जगह न देकर मल्टीपल के सत्ताधारियों ने तो उन्हें बेइज्जत किया ही, केएम गोयल और जगदीश गुलाटी जैसे पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर्स तक ने जेपी सिंह को इज्जत दिलवाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया । ऐसे में, एपी सिंह का रवैया जेपी सिंह को अपने घाव पर मरहम लगाता हुआ महसूस हो रहा है ।

Sunday, September 3, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में मुरादाबाद में आज हुई डिस्ट्रिक्ट इंटरसिटी में चारों उम्मीदवारों के शक्ति-प्रदर्शन में बाजी जीतने वाले चक्रेश लोहिया के सामने इस 'जीत' को चुनावी जीत में बदल पाने की चुनौती लेकिन अभी बाकी है

मेरठ । रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों की तरफ से मिले कड़े 'संदेशों' के कारण वोटों की खरीद-फरोख्त के भरोसे चुनाव जीतने की तैयारी कर रहे दीपक जैन की योजना को थोड़ा धक्का तो लगा है, लेकिन उनके समर्थक पूर्व गवर्नर्स उन्हें भरोसा दे रहे हैं कि वोटों की खरीद-फरोख्त को इतनी होशियारी से अंजाम दिया जायेगा कि कोई पकड़ ही नहीं पायेगा । दीपक जैन के कुछेक नजदीकी लेकिन उन्हें सलाह दे रहे हैं कि वोटों की खरीद-फरोख्त के आरोपों को रोटरी इंटरनेशनल ने यदि कहीं गंभीरता से ले लिया, और चुनाव के नतीजे को ही रद्द कर दिया - तो वोटों को खरीदने में खर्च हुए पैसे बेकार ही जायेंगे, इसलिए भलाई इसी में है कि चुनाव ईमानदारी से ही लड़ो । दीपक जैन के इन्हीं नजदीकियों का कहना है कि उन्होंने दीपक जैन को सलाह दी है कि कुछेक बदनाम पूर्व गवर्नर्स की बातों में आकर उन्होंने नाहक ही अपनी बदनामी करवा ली है; उन्हें सबसे पहले तो उन पूर्व गवर्नर्स की 'गिरफ्त' से बाहर निकलना चाहिए और अपनी एक स्वतंत्र पहचान बनानी चाहिए तथा गंभीरता के साथ अपनी उम्मीदवारी को लोगों के बीच रखना चाहिए - इससे निश्चित ही उन्हें फायदा होगा; उन्हें गौर करना चाहिए कि वह यदि इस बार के चुनाव में सफल नहीं भी हो पाते हैं तो अभी के क्लब-प्रेसीडेंट्स को ही एक या दो गवर्नर अभी और चुनने का मौका मिलेगा ।
नजदीकियों के ही दावे के अनुसार, उनकी समझाइस का दीपक जैन पर कुछ असर होता हुआ तो उन्हें दिखा है - लेकिन पक्के तौर पर वह नहीं कह सकते हैं कि दीपक जैन ने वोटों की खरीद-फरोख्त के जरिए जीत हासिल करने के कुछेक पूर्व गवर्नर्स के सुझाव से पूरी तरह किनारा कर लिया है। दरअसल, दीपक जैन को बताया गया है कि डिस्ट्रिक्ट में करीब आठ/दस क्लब्स तो अपने अपने वोट बेचने के लिए तैयार ही रहते हैं; चर्चा है कि दीपक जैन के साथ उन क्लब्स का 'सौदा' करवा भी दिया गया है - सौदा करवाने वाले पूर्व गवर्नर्स ने दीपक जैन को साफ साफ बता भी दिया है कि 'सौदे' पर यदि वह आगे नहीं बढ़े, तो फिर उनकी विश्वसनीयता संकट में पड़ेगी । दीपक जैन ने मुजफ्फरनगर के कुछेक क्लब्स को प्रोजेक्ट्स में 'सहयोग' करने तथा उनके ड्यूज चुकाने का ऑफर देकर, उनके वोट खरीदने का जो प्रयास किया था - उसका भी उल्टा असर हुआ है, और दीपक जैन की इस तरह की तरकीबों ने अच्छे क्लब्स के पदाधिकारियों को नाराज करने का ही काम किया है ।
दीपक जैन ने अपनी बढ़ती बदनामी से निपटने के लिए दूसरों पर आरोप लगाने का तरीका अपनाया - पर उनकी बदकिस्मती यह रही कि उनके समर्थक पूर्व गवर्नर्स पहले से ही खासे बदनाम रहे हैं, और रोटरी इंटरनेशनल से फटकार खा चुके हैं और उनकी कारस्तानियों के कारण ही डिस्ट्रिक्ट मौजूदा दुर्गति का शिकार है । इसलिए दूसरों पर आरोप लगा कर अपने 'अपराधों' पर पर्दा डालने की दीपक जैन की कोशिश कामयाब नहीं हो पा रही है । दीपक जैन की इस फजीहत का फायदा श्रीहरी गुप्ता को हो सकता है, लेकिन मेरठ के अधिकतर पूर्व गवर्नर्स ने चूँकि श्रीहरी गुप्ता के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है - इसलिए श्रीहरी गुप्ता को अपने ही क्षेत्र में गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ रहा है । इस स्थिति में चक्रेश लोहिया ने अपने समर्थन-आधार को बढ़ाने का जो प्रयास किया है, उन्हें उसका फायदा मिलता दिख रहा है । मुरादाबाद में आज हुई इंटरसिटी में चक्रेश लोहिया के समर्थकों की जैसी जो उपस्थिति रही, और रजिस्ट्रेशन व उपस्थिति के आधार पर उनके क्लब को जो अवॉर्ड मिला - उसके कारण चुनावी मुकाबले में चक्रेश लोहिया को बढ़त मिलने का आभास लोगों ने महसूस किया । दरअसल, आज हुई इंटरसिटी में चारों उम्मीदवारों ने अपना अपना जो शक्ति-प्रदर्शन किया, उसमें बाजी चक्रेश लोहिया ने जीती और उनकी इस जीत ने उन्हें बाकी तीनों उम्मीदवारों से आगे 'दिखाने' का काम किया । देखना दिलचस्प होगा कि आज की इस 'जीत' को वह चुनावी जीत में बदल पाते हैं या नहीं ?

Friday, September 1, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में छोटे क्लब्स के प्रेसीडेंट्स को इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम के नाम पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी से मिले अपमान ने डिस्ट्रिक्ट के अन्य दूसरे क्लब्स के प्रेसीडेंट्स को भी नाराज किया और भड़काया

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम का नाम लेकर क्लब्स के प्रेसीडेंट्स पर रौब जमाने/दिखाने और उन्हें धमकाने के आरोप में बुरी तरह घिर गए हैं । क्लब्स के प्रेसीडेंट्स के आरोप हैं कि रवि चौधरी तरह तरह की बातों के बहाने उन पर रौब गाँठने की कोशिश करते रहते हैं, और हद की बात तो अभी हाल ही में तब हुई जब उन्होंने कई एक प्रेसीडेंट्स को बासकर चॉकलिंगम का नाम लेकर धमकी दी कि 'सुधर जाओ, नहीं तो तुम्हारे क्लब बंद कर/करवा दूँगा ।' कुछेक प्रेसीडेंट्स ने रवि चौधरी के रवैये और व्यवहार की शिकायत कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से की, तो उन्होंने यह कहते हुए मामले से पल्ला झाड़ लिया कि काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग हो तो उसमें वह इस मामले को उठाये भी, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रवि चौधरी तो काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग बुलाने/करने में कोई दिलचस्पी ही नहीं ले रहे हैं । कुछेक क्लब्स के प्रेसीडेंट्स ने इस मामले में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर दमनजीत सिंह से भी बात की, लेकिन उन्होंने भी यह कहते/बताते हुए किनारा कर लिया कि रवि चौधरी उनकी सुनता कहाँ है, वह तो बस कहने/दिखाने भर के लिए डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर हैं ।
क्लब्स के प्रेसीडेंट्स को धमकाने तथा उन पर रौब जमाने/दिखाने की रवि चौधरी की हरकत दरअसल उस समय संगठित और मुखर रूप में सामने आई, जब रवि चौधरी ने डिस्ट्रिक्ट के 14/15 क्लब्स को 'कमजोर क्लब' के रूप में चिन्ह्यित करते हुए उनके प्रेसीडेंट्स की मीटिंग ली । मीटिंग में उपस्थित हुए प्रेसीडेंट्स का कहना/बताना रहा कि मीटिंग में रवि चौधरी के व्यवहार और रवैये को देख कर वह बहुत हैरान/परेशान तो हुए ही, अपमानित भी हुए - क्योंकि मीटिंग में रवि चौधरी खुद को मास्टर और उन्हें फेल हुए छात्र मान कर व्यवहार कर रहे थे; और उनके क्लब्स को कमजोर क्लब्स के रूप में संबोधित कर रहे थे । मीटिंग में उपस्थित हुए प्रेसीडेंट्स ने उन्हें बार बार यह बताने/समझाने की कोशिश की कि उनके क्लब 'कमजोर' नहीं, बल्कि 'छोटे' क्लब हैं - और क्लब्स का मूल्याँकन उनकी सदस्य संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि उनके कामकाज के आधार पर किया जाना चाहिए । प्रेसीडेंट्स ने रवि चौधरी से बार बार अनुरोध किया कि वह यदि उन्हें ऐसे कोई सुझाव दे सकें, जिन्हें अपना कर वह 'छोटे' होने के बावजूद भी और बेहतर काम कर सकें, तो उनके लिए और डिस्ट्रिक्ट के लिए भी अच्छा होगा । रवि चौधरी लेकिन उन पर अपना रौब जमाते हुए एक ही रट लगाए रहे कि 'सुधर जाओ, नहीं तो क्लब बंद कर/करवा दूँगा' - और प्रेसीडेंट्स को लगातार अपमानित करते रहे ।
गंभीर बात यह रही कि रवि चौधरी ने सारा तमाशा इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम के नाम पर किया । मीटिंग में बुलाए गए प्रेसीडेंट्स को रवि चौधरी ने बताया कि बासकर चॉकलिंगम ने सभी डिस्ट्रिक्ट्स के गवर्नर्स को निर्देश दिए हैं कि वह अपने अपने डिस्ट्रिक्ट में क्लब्स की स्ट्रेंगथनिंग पर ध्यान दें, और इसी काम को करने के लिए उन्होंने कमजोर क्लब्स के प्रेसीडेंट्स की यह मीटिंग बुलाई है । कुछेक प्रेसीडेंट्स ने उन्हें यह बताने/समझाने की कोशिश भी की कि क्लब्स की स्ट्रेंगथनिंग पर ध्यान देने का मतलब यह है कि सभी क्लब्स को इस तरह से प्रेरित और प्रोत्साहित किया जाए कि वह अपनी अपनी क्षमताओं का बेहतर और अधिकतम इस्तेमाल कर सकें । रवि चौधरी मीटिंग में लेकिन यह मान कर बैठे थे कि चूँकि वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हैं, इसलिए अक्ल सिर्फ उन्हीं के पास है और क्लब्स के प्रेसीडेंट्स तो बेवकूफ हैं और इस कारण से उन्हें प्रेसीडेंट्स की बात नहीं सुननी है - बल्कि उन्हें प्रेसीडेंट्स को बात सुनानी है; और वह प्रेसीडेंट्स को लगातार सुनाते रहे कि 'सुधर जाओ, नहीं तो क्लब बंद कर/करवा दूँगा ।' मीटिंग में मौजूद प्रेसीडेंट्स ने रवि चौधरी के इस रवैये के चलते अपने आप को बेहद अपमानित महसूस किया । अधिकतर प्रेसीडेंट्स का कहना रहा कि उन्हें यदि एक छोटे क्लब का प्रेसीडेंट बनने का मौका मिला है, तो इसमें भला उनका क्या कुसूर है - और रवि चौधरी अपने से पहले के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से क्यों नहीं पूछते कि उन्होंने अपने अपने गवर्नर-काल में छोटे क्लब्स को बड़ा करने/बनाने के लिए प्रयास आखिर क्यों नहीं किए ?
उक्त मीटिंग में रवि चौधरी द्वारा की गयी हरकत की खबर जब डिस्ट्रिक्ट में फैली, तब हर किसी ने माथा ही पीटा - अधिकतर लोगों का कहना यही रहा कि रवि चौधरी जैसे लोग जब गवर्नर बनेंगे, तो इसी तरह के तमाशे होंगे । लोगों ने उक्त मीटिंग में मौजूद डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट विनय भाटिया और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी सुरेश भसीन की भूमिका पर भी सवाल उठाए, हालाँकि कुछेक लोगों का यह भी कहना है कि यह बेचारे करते भी तो क्या ? प्रेसीडेंट्स की इज्जत लुटते देख इन्होंने अपनी अपनी इज्जत बचाने की कोशिश में चुप रहने में ही अपनी भलाई देखी, तो यह बहुत स्वाभाविक बात ही है । छोटे क्लब्स के प्रेसीडेंट्स के साथ रवि चौधरी द्वारा की गई बदतमीजी की खबर ने दूसरे क्लब्स के प्रेसीडेंट्स को भी डरा दिया है; उन्हें भय हुआ है कि वह भी किसी न किसी कारण से कभी भी रवि चौधरी की धौंस-डपट का शिकार हो सकते हैं । कई लोगों का कहना है कि प्रेसीडेंट्स को नसीहत देने से पहले रवि चौधरी को यह भी देखना चाहिए कि खुद उन्होंने रोटरी में छिछोरपन करने के अलावा और क्या किया है ?

Thursday, August 31, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अमित गुप्ता की उम्मीदवारी की तैयारी को उनके अपने ही क्लब में तगड़ा झटका लगा

गाजियाबाद । अमित गुप्ता को अपने क्लब की बोर्ड मीटिंग में अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अपनी उम्मीदवारी की बात करने पर जो रिएक्शन मिला, उसने उनके लिए 'फिंगर्स क्रॉस्ड' वाली स्थिति पैदा कर दी है । अमित गुप्ता को उम्मीद थी कि क्लब की बोर्ड मीटिंग में उनकी उम्मीदवारी की बात को उत्साहपूर्ण समर्थन मिलेगा, लेकिन उन्हें यह देख कर झटका लगा कि मीटिंग में उपस्थित अधिकतर लोगों ने उन्हें हतोत्साहित ही किया । लोगों का कहना रहा कि अगले रोटरी वर्ष में चूँकि क्लब के सदस्य सुभाष जैन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद पर होंगे, इसलिए क्लब के सदस्य उनके गवर्नर-काल को महत्त्वपूर्ण बनाने की जिम्मेदारी निभाने में व्यस्त होंगे, और इसलिए वह अमित गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए काम नहीं कर सकेंगे । इस पर अमित गुप्ता की तरफ से उन्हें सुनने को मिला कि उम्मीदवार के रूप में वह खुद ही सारा काम कर लेंगे, और क्लब के सदस्यों को उनकी उम्मीदवारी के लिए कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी - दरअसल अगला वर्ष उनकी उम्मीदवारी के लिए बहुत ही अनुकूल है । अमित गुप्ता का कहना रहा कि इस वर्ष सतीश सिंघल के साथ उन्होंने जो काम किया है, उसके कारण लोगों के बीच उनकी अच्छी गुडबिल बनी है, जिसका फायदा उन्हें अगले वर्ष ही मिल सकता है; इसके अलावा सतीश सिंघल ने अगले वर्ष में उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने का आश्वासन उन्हें दिया है; अगले वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के क्लब के सदस्य के रूप में उम्मीदवार होने का भी उन्हें मनोवैज्ञानिक फायदा मिल सकेगा - इसलिए अगला वर्ष ही उनकी उम्मीदवारी के लिए परफेक्ट है । अमित गुप्ता के लिए राहत की बात यह रही कि उनके यह तर्क सुन कर उनके अपने क्लब - रोटरी क्लब गाजियाबाद सेंट्रल की बोर्ड मीटिंग में मौजूद लोगों ने फिर अगले वर्ष की उनकी उम्मीदवारी को लेकर विरोध के स्वर धीमे जरूर कर लिए ।
अमित गुप्ता को नसीहतें हालाँकि फिर भी मिलीं । उन्हें महत्त्वपूर्ण नसीहत यह मिली कि सतीश सिंघल पर ज्यादा भरोसा न करना - उन्होंने तो आशीष मखीजा और अजय गर्ग को भी अगले वर्ष अपना उम्मीदवार बनाने का आश्वासन दिया हुआ है । इसके अलावा, सतीश सिंघल ने यह घोषणा भी की हुई है कि वह यदि आलोक गुप्ता को इस वर्ष चुनाव नहीं जितवा सके, तो अगले वर्ष आलोक गुप्ता को जरूर ही उम्मीदवार बनाये/बनवायेंगे और जितवायेंगे - जैसा कि उन्होंने दीपक गुप्ता के साथ किया । दीपक गुप्ता को अपने समर्थन के बावजूद जब वह पहली बार चुनाव नहीं जितवा सके थे, तो उन्होंने तुरंत ही दीपक गुप्ता को अगले वर्ष उम्मीदवार बनाया/बनवाया और जितवाया । अमित गुप्ता का इस तथ्य की तरफ भी ध्यान दिलाया गया कि आलोक गुप्ता इस वर्ष यदि जीत गए, तो अगले वर्ष 'हर बार गाजियाबाद से ही गवर्नर क्यों' जैसा सवाल उनके  लिए मुसीबत बनेगा, और यदि आलोक गुप्ता नहीं जीते तो सतीश सिंघल उन्हें फिर से उम्मीदवार बनाये/बनवायेंगे - ऐसे में, उन्हें दिए गए सतीश सिंघल के आश्वासन का क्या होगा ? अमित गुप्ता को यह बताने/समझाने की भी कोशिश की गयी कि इस वर्ष के चुनाव में अब हालाँकि ज्यादा दिन नहीं बचे हैं, लेकिन फिर भी अमित गुप्ता यदि हिम्मत करें तो यह वर्ष अगले वर्ष की तुलना में उनकी उम्मीदवारी के लिए ज्यादा 'आसान' रहेगा । इस बात पर अमित गुप्ता लेकिन कोई तवज्जो देते हुए नहीं दिखे । बोर्ड मीटिंग में कुल मिलाकर दोनों 'पक्षों' ने अमित गुप्ता की अगले वर्ष की उम्मीदवारी के मामले को आगे के लिए छोड़ दिया । अमित गुप्ता को क्लब की बोर्ड मीटिंग के नजारे को देख कर तगड़ा झटका तो लगा कि अगले वर्ष की अपनी उम्मीदवारी को लेकर वह अपने ही क्लब में अकेले और अलग-थलग पड़ गए हैं, लेकिन उनके लिए 'फिंगर्स क्रॉस्ड' वाली स्थिति यह रही कि उनकी 'तैयारी' का कोई मुखर और स्पष्ट विरोध नहीं हुआ ।
अमित गुप्ता पिछले कुछ समय से अगले वर्ष की अपनी उम्मीदवारी को लेकर इधर-उधर बातें तो कर रहे हैं, और उनके क्लब के लोगों को भी निजी स्तर पर होने वाली बातचीत के आधार पर अमित गुप्ता की 'योजना' और 'तैयारी' की जानकारी थी - और इस पर लोगों की मिलीजुली राय थी । इस आधार पर अमित गुप्ता को उम्मीद थी कि क्लब में जब वह औपचारिक रूप से अपनी उम्मीदवारी की बात रखेंगे, तो उन्हें क्लब के सदस्यों की तरफ से उत्साहजनक प्रतिक्रिया मिलेगी । अभी दो-तीन दिन पहले ही संपन्न हुई क्लब की बोर्ड मीटिंग में अगले वर्ष की उनकी उम्मीदवारी की बात पर लेकिन जो हुआ, उससे अमित गुप्ता को यह तो समझ में आ गया है कि अगले वर्ष को वह अपनी उम्मीदवारी के लिए जितना अनुकूल समझ रहे हैं, उतना अनुकूल वह है नहीं - तथा इस मामले में सबसे बड़ी चुनौती उन्हें अपने ही क्लब में मिलने वाली है ।

Wednesday, August 30, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में वोटों की खरीद के जरिए दीपक जैन को चुनाव जितवाने की तैयारी करने वाले पूर्व गवर्नर्स की असली मंशा कहीं अपनी अपनी जेबें भरना तो नहीं हैं ?

मेरठ । दीपक जैन की उम्मीदवारी के लिए वोट जुटाने हेतु पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर योगेश मोहन गुप्ता तथा एमएस जैन ने वोटों की खरीद-फरोख्त का रास्ता अपनाने के जो संकेत दिए हैं, उसने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के परिदृश्य को रोचक तो बना दिया है, लेकिन साथ ही डिस्ट्रिक्ट को फिर से पहले वाली दलदल की ओर धकेलना भी शुरू कर दिया है । उल्लेखनीय है कि दीपक जैन की उम्मीदवारी के इन दोनों सक्रिय समर्थकों ने पहले श्रीहरी गुप्ता और राजकमल गुप्ता को चुनावी मुकाबले से बाहर करने के लिए तिकड़में की थीं, लेकिन उनकी तिकड़में बुरी तरह फेल रही हैं । श्रीहरी गुप्ता को डराने तथा दबाव में लेने के लिए इन्होंने दावा किया कि मेरठ के अधिकतर पूर्व गवर्नर्स दीपक जैन की उम्मीदवारी के साथ हैं, इसलिए मेरठ में श्रीहरी गुप्ता को खास समर्थन नहीं मिलेगा - और जब उन्हें मेरठ में समर्थन नहीं मिलेगा, तो फिर दूसरी जगह कहाँ/क्या समर्थन मिलेगा ? श्रीहरी गुप्ता और उनके समर्थकों ने लेकिन इस दावे को कोई तवज्जो नहीं दी; उनका कहना रहा कि रोटरी में नेतागिरी और रोटरी के नाम पर धंधा करने वाले पूर्व गवर्नर्स नेताओं की पोल पूरी तरह खुल गई है, और दीपक जैन की उम्मीदवारी को समर्थन देने की आड़ में अपनी राजनीति जमाने की कोशिश करने वाले पूर्व गवर्नर्स नेताओं को मेरठ में अपने ही क्लब्स का समर्थन मिल जाए - तो बहुत समझा जाए ।
दरअसल, दीपक जैन की उम्मीदवारी के समर्थक पूर्व गवर्नर्स नेताओं के क्लब्स के पदाधिकारियों को भी लगने लगा है कि दीपक जैन से पैसे ऐंठने के लिए इन पूर्व गवर्नर्स ने अपने-अपने क्लब्स को बेचने का सौदा कर लिया है । वास्तव में किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल बना हुआ है कि दीपक जैन की जब रोटरी में और डिस्ट्रिक्ट में ज्यादा सक्रियता और संलग्नता नहीं रही है, जब न वह लोगों को जानते हैं और न लोग उन्हें जानते हैं - तब फिर कुछेक पूर्व गवर्नर्स उन्हें डिस्ट्रिक्ट का गवर्नर क्यों चुनवाना/बनवाना चाहते हैं ? डिस्ट्रिक्ट की अभी जो हालत है, उसमें डिस्ट्रिक्ट को एक ऐसे गवर्नर की जरूरत है जिसकी रोटरी और डिस्ट्रिक्ट में लंबी सक्रियता और संलग्नता रही हो, तथा जो डिस्ट्रिक्ट की तथा डिस्ट्रिक्ट के लोगों की जरूरतों व समस्याओं को जानता/पहचानता हो । इस लिहाज से लोगों को श्रीहरी गुप्ता और चक्रेश लोहिया ही उचित उम्मीदवार लग रहे हैं, लेकिन डिस्ट्रिक्ट की बर्बादी के लिए जिम्मेदार रहे पूर्व गवर्नर्स इन दोनों की बजाए अपने अपने 'कठपुतली-उम्मीदवार' लेकर चुनावी मैदान में आ डटे हैं ।
इसके चलते सबसे रोचक स्थिति राजकमल गुप्ता और उनके समर्थकों की बनी है । बेचारे राजकमल गुप्ता के समर्थकों को ही उनके मुकाबले में होने का कोई भरोसा नहीं है, और उनका साफ कहना है कि राजकमल गुप्ता की उम्मीदवारी तो उन्होंने चक्रेश लोहिया को नुकसान पहुँचाने के लिए प्रस्तुत की हुई है - उनका मानना/कहना है कि राजकमल गुप्ता की उम्मीदवारी के न रहने पर मुरादाबाद क्षेत्र के सभी वोट चक्रेश लोहिया को मिल जायेंगे । मजे की बात यह है कि राजकमल गुप्ता और उनके समर्थकों को उन पूर्व गवर्नर्स के नजदीक देखा/समझा जाता है, जो दीपक जैन की उम्मीदवारी का झंडा उठाए हुए हैं - इसके बावजूद उक्त पूर्व गवर्नर्स राजकमल गुप्ता की उम्मीदवारी को वापस नहीं करवा सके हैं । राजकमल गुप्ता और उनके समर्थकों का कहना है कि ऐन मौके पर वह अपना समर्थन उसे देंगे, जो चक्रेश लोहिया को हरा सकने में समर्थ दिखेगा । अभी चूँकि श्रीहरी गुप्ता के मुकाबले दीपक जैन की चुनावी स्थिति उन्हें बहुत ही कमजोर नजर आ रही है, इसलिए अभी से वह दीपक जैन की उम्मीदवारी का समर्थन करने की घोषणा करके अपने वोटों को खराब नहीं कर सकते हैं ।   
इस तरह दीपक जैन की उम्मीदवारी के समर्थक पूर्व गवर्नर्स को 'अपने' लोगों को ही दीपक जैन की उम्मीदवारी की मजबूती को लेकर आश्वस्त करना मुश्किल हो रहा है । उनकी यह मुश्किल इसलिए भी बढ़ी है, क्योंकि वह अपनी गवर्नरी को लेकर रोटरी इंटरनेशनल से कानूनी लड़ाई लड़ रहे डीके शर्मा का समर्थन पाने के अपने दावे को भी सच साबित करने में विफल रहे हैं । दीपक जैन की उम्मीदवारी के समर्थक पूर्व गवर्नर्स का दावा था कि कानूनी लड़ाई की तैयारी करने/करवाने में उन्होंने चूँकि डीके शर्मा की बहुत मदद की है, इसलिए डीके शर्मा का समर्थन उन्हें ही मिलेगा । डीके शर्मा के कहने में छह से आठ वोटों का अनुमान लगाया जा रहा है; और डीके शर्मा की तरफ से लोगों को जो संकेत मिल रहे हैं - उनमें यह तो साफ नहीं है कि उनका समर्थन किसे मिलेगा, लेकिन यह बहुत साफ है कि उनका समर्थन दीपक जैन को तो नहीं ही मिलेगा ।
दीपक जैन की उम्मीदवारी के समर्थक पूर्व गवर्नर्स को जिस तरह हर तरफ से धक्का और निराशा ही मिल रही है, उसके चलते उन्हें अब वोटों की खरीद-फरोख्त का ही विकल्प सूझ रहा है । उनके नजदीकियों का कहना है कि उन्होंने दीपक जैन को बता दिया है कि चुनाव जीतना है तो अब वोटों की खरीदारी ही करनी पड़ेगी । दीपक जैन के कुछेक शुभचिंतकों ने दीपक जैन को आगाह भी किया है कि वोटों की खरीदारी के नाम पर उनके समर्थक पूर्व गवर्नर्स अपनी अपनी जेबें भरने का काम कर सकते हैं, इसलिए जो भी करना - सोच/समझ कर और आँखें खोल कर करना । वोट खरीद कर दीपक जैन को चुनाव जितवाने की तैयारी शुरू हो जाने से रोटरी के बुनियादी सिद्धांतों तथा आदर्शों के साथ डिस्ट्रिक्ट में एक बार फिर खिलवाड़ तो शुरू हो ही गया है, साथ ही साथ डिस्ट्रिक्ट में चुनावी परिदृश्य खासा दिलचस्प हो उठा है ।