Friday, October 6, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री को 'बेहोशी' की हालत से बाहर लाने की लीडरशिप की कोशिशों में, वीके हंस को डिस्ट्रिक्ट गवर्नरी की कुर्सी मिलने का संकेत भी छिपा है क्या ?

नई दिल्ली । विक्रम शर्मा के क्लब को फिर से 'जिंदा' करने के लीडरशिप के फैसले को देखते/'पढ़ते' हुए डिस्ट्रिक्ट के लोगों को वीके हंस को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की 'गद्दी' मिलने के सपने दिखने लगे हैं । विक्रम शर्मा के क्लब का फिर से 'जिंदा' होना यूँ तो कोई बड़ी बात नहीं है; लेकिन विक्रम शर्मा की जो 'राजनीति' रही और जिसके चलते उनके क्लब को बंद किया गया और तमाम कोशिशों के बावजूद जिसे पुनर्जीवन न मिलता देख विक्रम शर्मा को डिस्ट्रिक्ट 321 ए वन के एक क्लब में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा - उन सब बातों को याद करें तो पायेंगे कि विक्रम शर्मा के क्लब के 'जिंदा' होने की बात कोई साधारण बात नहीं है; और वास्तव में यह बात किसी बड़ी हलचल की आहट है । इस आहट का महत्त्व अगले महीने होने वाली इंटरनेशनल बोर्ड की मीटिंग के एजेंडे में डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के मामले के शामिल होने से बढ़ जाता है । वीके हंस और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों को लग रहा है कि अगले महीने हो रही इंटरनेशनल बोर्ड की मीटिंग में उन्हें अपने लिए अच्छी खबर सुनने को मिल सकती है ।
वीके हंस और उनके समर्थकों को ऐसा इसलिए भी लग रहा है, क्योंकि डिस्ट्रिक्ट के नेताओं के बीच वीके हंस के विरोध के स्वर काफी धीमे हुए हैं । उल्लेखनीय है कि पिछले लायन वर्ष में भी डिस्ट्रिक्ट की 'बेहोशी' को दूर करने की बात चली थी, लेकिन उस समय वीके हंस को गवर्नर बनाने के मुद्दे पर कई पूर्व गवर्नर्स के रवैये को देखते हुए मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था । उससे डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच संदेश यह गया है कि लीडरशिप वीके हंस के साथ 'न्याय' करना चाहती है, और पूर्व गवर्नर्स यदि वीके हंस के साथ न्याय करने में सहयोग नहीं करते हैं - तो लीडरशिप डिस्ट्रिक्ट को फिर बेहोशी की हालत में ही पड़े रहने देगी । समझा जाता है कि लीडरशिप की तरफ से यह संकेत मिलने पर वीके हंस को गवर्नरी 'मिलने' का विरोध कर रहे अधिकतर पूर्व गवर्नर्स ने अपने कदम पीछे खींच लिए हैं और अब वह वीके हंस को गवर्नरी 'देने' को लेकर विरोध करने के मूड में नहीं दिख रहे हैं । वीके हंस के विरोध को लेकर हर्ष बंसल अब पूरी तरह अकेले पड़ गए दिख रहे हैं । केएम गोयल की खिलाफत के मुद्दे पर हर्ष बंसल जिस तरह से अलग-थलग पड़े हैं, उससे भी लगता है कि हर्ष बंसल की नकारात्मक राजनीति को डिस्ट्रिक्ट में अब कोई समर्थन नहीं रह गया है । दरअसल अधिकतर लोग डिस्ट्रिक्ट की बेहोशी की हालत से अब उकता गए हैं और जल्दी से जल्दी डिस्ट्रिक्ट को बेहोशी की हालत से बाहर निकालना/निकलवाना चाहते हैं - और इसलिए अब ऐसा कोई काम नहीं करना चाहते हैं कि जिससे लीडरशिप को डिस्ट्रिक्ट को बेहोशी की हालत में ही डाले रखने का बहाना मिले ।
वीके हंस को अगले लायन वर्ष की गवर्नरी देने के मुद्दे पर लीडरशिप के बीच हालाँकि इसे लेकर जरूर असमंजस है कि उन्हें नोमीनेट किया/करवाया जाए, और या इलेक्ट करवाया जाए । कुछेक को लगता है कि वीके हंस को इलेक्ट करवाने के प्रयासों पर कोई बबाल कर सकता है, जिसे लेकर खामखाँ का बखेड़ा होगा; इसलिए मामले को अभी लटकाए रखा जाए - और जून की इंटरनेशनल बोर्ड मीटिंग में वीके हंस को नोमीनेट किया/करवाया जाए । लीडरशिप के कुछेक लोगों की राय लेकिन यह है कि अगले माह होने वाली बोर्ड की मीटिंग में ही वीके हंस के लिए 'रास्ता' खोला जाए - और उन्हें अगले लायन वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में इलेक्ट करवाने की तैयारियाँ शुरू की जाएँ; और देखा जाए कि कौन विरोध करता है और उसके विरोध को डिस्ट्रिक्ट में कितना समर्थन मिलता है ? इससे यह तय करने में भी आसानी होगी कि डिस्ट्रिक्ट की बेहोशी को अभी बनाए रखा जाए - या उसे बेहोशी से बाहर लाया/निकाला जाए । लीडरशिप के रवैये को देखते हुए लग रहा है कि जैसे वीके हंस को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की गद्दी सौंपने को उसने भी अपनी प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लिया है । ऐसे में, डिस्ट्रिक्ट के कई लोग वीके हंस को गवर्नरी की कुर्सी की तरफ बढ़ता देख रहे हैं - तो यह बहुत स्वाभाविक सी बात है ।

Wednesday, October 4, 2017

रोटरी इंडिया विन्स कमेटी के सबसे बड़े पदाधिकारी सुशील गुप्ता को अपने ही डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3011 के विन्स सेमीनार में बिना एक शब्द बोले, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी के 'फ्लर्टिंग' कार्यक्रम में तालियाँ बजा कर वापस लौटना पड़ा

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी के जल्दबाजी मचाने के कारण देश के 'विन्स' के सबसे बड़े पदाधिकारी सुशील गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट विन्स सेमीनार में दो शब्द कहने का मौका नहीं मिल सका । रोटरी इंडिया विन्स कमेटी के चेयरमैन सुशील गुप्ता को दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में तो खूब तवज्जो मिलती है; दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में होने वाले कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी को संभव बनाने के लिए हर संभव प्रयत्न किए जाते हैं और उनकी उपलब्धता के समय के हिसाब से कार्यक्रमों के समय तय होते हैं - लेकिन उन्हें अपने ही डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के 'कठोर अनुशासन' का शिकार होना पड़ा । कार्यक्रम में मौजूद निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियन ने रवि चौधरी को बताया भी कि सुशील गुप्ता ने उन्हें मैसेज किया है कि वह बस दो मिनट में पहुँचने वाले हैं, लेकिन रवि चौधरी ने उनसे साफ कह दिया कि किसी का भी इंतजार नहीं किया  जाएगा, और सुशील गुप्ता के लिए भी कार्यक्रम के समय को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा । ऐसा नहीं है कि रवि चौधरी के पास समय की कमी थी - क्योंकि सेमीनार खत्म होने के बाद उन्होंने फ्लर्ट करने में खूब समय लगाया । डिस्ट्रिक्ट विन्स सेमीनार में शामिल हुए लोगों को ट्रेजडी और कॉमेडी का इकट्ठा नजारा यह देखने को मिला कि देश में 'विन्स' के सबसे बड़े पदाधिकारी सुशील गुप्ता को अपने ही डिस्ट्रिक्ट के विन्स सेमीनार में बिना एक शब्द बोले, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के फ्लर्टिंग कार्यक्रम में तालियाँ बजा कर वापस लौटना पड़ा ।
रोटरी इंडिया विन्स कमेटी के चेयरमैन सुशील गुप्ता की ऐसी बेइज्जती इससे पहले शायद ही कभी हुई हो । सुशील गुप्ता के लिए इससे भी ज्यादा फजीहत की बात यह रही कि कार्यक्रम में उपस्थित रोटरी इंडिया विन्स कमेटी के जोनल कोऑर्डीनेटर तथा सेक्रेटरी रमेश अग्रवाल ने भी कार्यक्रम में सुशील गुप्ता की मौजूदगी को संभव बनाने के लिए रवि चौधरी को राजी करने का कोई प्रयास नहीं किया । डॉक्टर सुब्रमणियन ने रमेश अग्रवाल से भी कहा/बताया था कि सुशील गुप्ता बस पहुँचने ही वाले हैं, लेकिन रमेश अग्रवाल ने उनकी बात को अनसुना कर दिया । सुशील गुप्ता सिर्फ रोटरी इंडिया विन्स कमेटी के चेयरमैन ही नहीं हैं, बल्कि पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर हैं और इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने की जुगाड़ में हैं - इसके बावजूद वह अपने ही डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी के हाथों बेइज्जत होते हैं, और विन्स कमेटी में अपने ही सहयोगी पदाधिकारी रमेश अग्रवाल को उसमें 'सहयोगी' बनते हुए पाते/देखते हैं । मजे की बात यह रही कि रवि चौधरी ने सेमीनार में अपने संबोधन में खुद स्वीकार किया कि विन्स कार्यक्रम को लेकर वह वास्तव में बहुत कन्फ्यूज हैं - इसके बावजूद इंडिया विन्स के चेयरमैन की बात सुनने में उन्होंने कोई दिलचस्पी नहीं ली; शायद उन्हें डर लगा होगा कि सुशील गुप्ता भी बोलेंगे, तो समय खराब होगा और फिर उन्हें लोगों के साथ फ्लर्ट करने के लिए समय नहीं मिलेगा ।
रवि चौधरी इससे पहले रोटरी ब्लड बैंक की मीटिंग में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल तथा पड़ोसी डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3012 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सतीश सिंघल को यह कहते हुए निशाना बना चुके हैं कि ब्लड बैंक के नाम पर इन्होंने 'दुकानें' खोली हुई हैं । रवि चौधरी के इस आरोप पर सतीश सिंघल तो चुप बने रहे, लेकिन विनोद बंसल ने कड़ा प्रतिवाद किया और बताया कि उनकी देखरेख में चल रहे ब्लड बैंक का पूरा हिसाब-किताब हर समय अपडेट रहता है - जिसे कोई भी कभी भी देख सकता है । उक्त मीटिंग में रवि चौधरी दरअसल इस बात पर अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे थे कि रोटरी के नाम पर चल रहे प्रोजेक्ट्स के कर्ता-धर्ता डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को कामकाज की और हिसाब/किताब की कोई रिपोर्ट नहीं देते हैं । उनकी इस शिकायत पर लोगों का कहना रहा कि विभिन्न प्रोजेक्ट्स के कामकाज और हिसाब/किताब की रिपोर्ट लेने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रवि चौधरी ने कभी कोई प्रयास तो किया नहीं, और अब अचानक से शिकायत करने बैठ गए हैं । बड़े पदाधिकारियों और नेताओं को रवि चौधरी के हाथों निशाना बनता देख डिस्ट्रिक्ट के कई लोग वैसे खुश भी हैं; खुश होने वाले लोगों का कहना है कि रवि चौधरी को गवर्नर बनवाने/चुनवाने में इन्हीं लोगों ने दिलचस्पी ली थी - इन्हें पता तो चलना ही चाहिए कि एक घटिया सोच रखने वाले व्यक्ति को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनवाने/चुनवाने का खामियाजा उन्हें भी भुगतना पड़ सकता है ।

Tuesday, October 3, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू में हो रहे इंटरनेशनल बोर्ड सदस्यों के डिनर में, जितेंद्र चौहान की सलाहानुसार फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को आमंत्रित करके पारस अग्रवाल ने जैसे मुसीबतों को आमंत्रित कर लिया है

आगरा । लायंस इंटरनेशनल बोर्ड के सदस्यों के साथ डिनर में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को शामिल करने को लेकर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पारस अग्रवाल अपने डिस्ट्रिक्ट के साथ-साथ मल्टीपल के दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारियों तथा नेताओं के निशाने पर आ गए हैं । इस मामले में पारस अग्रवाल अपने डिस्ट्रिक्ट में कुछ ज्यादा ही फजीहत का शिकार हो रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट के एक पूर्व गवर्नर ने इन पंक्तियों के लेखक को बताया कि पारस अग्रवाल अभी तक आगरा में 14 नवंबर को होने वाले उक्त डिनर का निमंत्रण चाह रहे लोगों को यह कहते/बताते हुए टरका रहे थे कि ऊपर से उन्हें उक्त डिनर में बीस और लोगों को निमंत्रित कर लेने की अनुमति मिली है - इसलिए चाहते हुए भी वह तय सीमा से ज्यादा लोगों को निमंत्रण नहीं दे सकते हैं । किंतु जब से लोगों को पता चला है कि पारस अग्रवाल ने फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अपने जीवन साथी के साथ उक्त डिनर में शामिल होने का निमंत्रण दिया है, और उनके एक रात आगरा में ठहरने की व्यवस्था करने की बात कही है - तभी से डिस्ट्रिक्ट के बड़े नेताओं का पारा चढ़ा हुआ है । पारस अग्रवाल के अपने डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स तथा अन्य प्रमुख नेताओं का कहना है कि पारस अग्रवाल ने इंटरनेशनल बोर्ड सदस्यों के डिनर को मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की अपनी चुनावी राजनीति का जरिया बना लिया है, और इस काम को करते हुए वह डिस्ट्रिक्ट के तथा मल्टीपल के अन्य डिस्ट्रिक्ट्स के बड़े और प्रमुख लोगों को उपेक्षित तथा अपमानित कर रहे हैं ।
इंटरनेशनल बोर्ड सदस्यों के डिनर में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अचानक से और खासतौर से निमंत्रित करने का पारस अग्रवाल का फैसला इसलिए भी लोगों की नोटिस में आया, क्योंकि डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अजय सिंघल के भाई के निधन की खबर आने/मिलने के बाद से पारस अग्रवाल को अप्रत्याशित रूप से अत्यंत सक्रिय होता हुआ देखा/पाया गया है । मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की चुनावी राजनीति के बनते/बिगड़ते ताने-बाने में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को लगता है कि अजय सिंघल के भाई के निधन से मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन की चुनावी राजनीति के समीकरण जिस तरह प्रभावित होते हुए नजर आ रहे हैं, उसमें पारस अग्रवाल को अपनी 'राह' आसान होती हुई दिखी है और इसीलिए उन्होंने अप्रत्याशित रूप से अपनी सक्रियता बढ़ा दी है, और इसके लिए इंटरनेशनल बोर्ड सदस्यों के डिनर के अवसर को भी भुना लेने की तैयारी शुरू कर दी । उल्लेखनीय है कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए इस वर्ष अजय सिंघल का पलड़ा भारी देखा/समझा जा रहा था; लेकिन उनके भाई के निधन से उनकी सारी तैयारी पर पानी पड़ता नजर आ रहा है । दरअसल जिनका निधन हुआ है, वह अजय सिंघल के सिर्फ भाई ही नहीं थे - बल्कि उनके बिजनेस पार्टनर भी थे; इसलिए उनके निधन से अजय सिंघल चौतरफा चुनौतियों से घिर गए हैं । माना/समझा जा रहा है कि चौतरफा चुनौतियों के दबाव के चलते अजय सिंघल के लिए मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन की चुनावी राजनीति के समीकरणों को साधना मुश्किल हो जाएगा, और इसलिए उन्हें मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की चुनावी दौड़ से बाहर हुआ ही देखा/माना जा रहा है - और इस स्थिति को पारस अग्रवाल ने अपने लिए एक मौके के रूप में देखा/पहचाना है ।  
इस मौके को और पुख्ता करने के लिए पारस अग्रवाल को इंटरनेशनल बोर्ड सदस्यों के आगरा में हो रहे डिनर का 'सहारा' भी मिल गया है । पारस अग्रवाल के नजदीकियों का कहना है कि डिनर का राजनीतिक फायदा उठाने का आईडिया उन्हें पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर व पूर्व मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन जितेंद्र चौहान से मिला । सुना और समझा जाता है कि पारस अग्रवाल में मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की उम्मीदवारी की हवा भरने का काम जितेंद्र चौहान ने ही किया है, और जितेंद्र चौहान के 'नेतृत्व' में ही पारस अग्रवाल चेयरमैन पद के लिए राजनीति कर रहे हैं । पारस अग्रवाल के नजदीकियों के अनुसार, फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को इंटरनेशनल बोर्ड सदस्यों के डिनर का निमंत्रण दिलवाने के बाद जितेंद्र चौहान विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के कुछेक अन्य नेताओं को भी निमंत्रण दिलवाने/भिजवाने के लिए पारस अग्रवाल पर दबाव बना रहे हैं । दरअसल विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के कुछेक नेताओं ने जितेंद्र चौहान को उलाहना दिया है कि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को निमंत्रण दिलवा कर ही पारस अग्रवाल को मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए उनका वोट मिल जाएगा क्या ? जितेंद्र चौहान की सलाहानुसार, पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को इग्नोर करके और उनका 'हक' मारकर फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को इंटरनेशनल बोर्ड सदस्यों के साथ डिनर के लिए आमंत्रित करने का जो काम पारस अग्रवाल ने किया है - वह मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के चुनाव में उन्हें फायदा पहुँचायेगा या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा; अभी लेकिन इस कदम ने पारस अग्रवाल के लिए भारी मुसीबतें पैदा कर दी हैं ।

Monday, October 2, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 के गवर्नर के रूप में टीके रूबी को 'बेस्ट क़्वालीफाइड' घोषित करते हुए रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने पूर्व प्रेसीडेंट राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स के जले पर जैसे नमक ही रगड़ दिया है

चंडीगढ़ । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अरुण होनी और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी जितेंद्र ढींगरा के बीच रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड के फैसले को लेकर सोशल मीडिया में चले संक्षिप्त वाक्-युद्ध ने रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड द्वारा राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स के मुँह पर पड़े झन्नाटेदार 'थप्पड़' से पैदा हुए फ्रस्ट्रेशन को सामने लाने का काम किया है । राजा साबू गिरोह के एक सक्रिय सदस्य के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले अरुण होनी ने रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड के एक फैसले से परिचित कराते इंटरनेशनल प्रेसीडेंट इआन रिसले के पत्र को सोशल मीडिया में शेयर करने के जितेंद्र ढींगरा के कदम पर ऐतराज करते हुए टिप्पणी की कि डिस्ट्रिक्ट के आने वाले पदाधिकारी को ऐसा नहीं करना चाहिए । जितेंद्र ढींगरा ने उनकी टिप्पणी के जबाव में उन्हें बताया कि उक्त पत्र को पहले तो आपके ही लोगों ने सोशल मीडिया में शेयर किया है । जितेंद्र ढींगरा के इस जबाव से बेचारे अरुण होनी तो चुप हो गए - लेकिन लोगों के बीच यह सवाल जरूर पैदा हो गया कि राजा साबू गिरोह के 'बड़े लोग' रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड के फैसले को डिस्ट्रिक्ट के लोगों से छिपाना क्यों चाहते हैं ? राजा साबू गिरोह के बड़े नेताओं के लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट इआन रिसले के जिस पत्र को वह डिस्ट्रिक्ट के लोगों से छिपाना चाहते थे, उसे उनके ही 'कार्यकर्ताओं' ने सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक पहुँचा दिया । वैसे इसमें कार्यकर्ताओं की भी कोई गलती नहीं थी - बड़े नेताओं ने अपने ही कार्यकर्ताओं के बीच इस बात का दावा किया कि रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने टीके रूबी से अंडरटेकिंग ली है और इस तरह उनके खिलाफ फैसला दिया है; कार्यकर्ता बेचारे मासूमियत से भरे मूर्ख किस्म के लोग हैं; उन्होंने अपने बड़े नेताओं की 'बात' पर भरोसा किया और जोश में आकर इंटरनेशनल प्रेसीडेंट इआन रिसले के पत्र को सोशल मीडिया में चिपका दिया । जितेंद्र ढींगरा ने जब देखा कि उक्त पत्र को चिपकाने की गंगा बह ही रही है, तो उन्होंने भी उसमें हाथ 'धो' लिए ।
राजा साबू गिरोह के गवर्नर्स के लिए उक्त पत्र सार्वजनिक होने से समस्या की बात यह हुई है कि टीके रूबी से अंडरटेकिंग लिए जाने की बात को लेकर गवर्नर्स के लिए मनमाना झूठ बोलने का मौका अब नहीं बचा है । इआन रिसले के पत्र के अनुसार, टीके रूबी ने इंटरनेशनल बोर्ड को लिख कर दिया है कि वह डिस्ट्रिक्ट में सभी को लेकर काम करेंगे और कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग बुलायेंगे तथा उसमें इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम को भी आमंत्रित करेंगे । इसमें भला ऐसी  क्या बात है जो टीके रूबी अभी तक नहीं कर रहे थे, या जिसे करने से वह इंकार कर रहे थे ? उल्लेखनीय है कि गवर्नर के रूप में काम करना शुरू करते ही टीके रूबी ने सबसे पहले पूर्व गवर्नर्स से विभिन्न जिम्मेदारियों में शामिल होने के लिए अनुरोध किया - लेकिन किसी ने उनके अनुरोध का जबाव तक नहीं दिया, और किसी ने बहानेबाजी से अनुरोध स्वीकार करने से इंकार कर दिया । राजा साबू के क्लब के पदाधिकारी तो अभी तक डिस्ट्रिक्ट के किसी कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए हैं, और इस कारण से क्लब के पदाधिकारी के रूप में अधिकृत रूप से मान्य नहीं हैं । टीके रूबी ने पिछले वर्षों में डिस्ट्रिक्ट तथा अन्य प्रोजेक्ट्स में हिसाब-किताब में गड़बड़ी के आरोपों के चलते हुई डिस्ट्रिक्ट और रोटरी की बदनामी को देखते हुए हिसाब-किताब दुरुस्त करने के प्रयास शुरू किए -  तो राजा साबू से लेकर यशपाल दास, मधुकर मल्होत्रा, रमन अनेजा तक उनके प्रयासों को सफल करने में सहयोग करने की बजाए विफल करने में जुट गए और लोगों को बरगलाने वाली बयानबाजी करने लगे । ऐसे में, इआन रिसले के पत्र के अनुसार टीके रूबी को जो काम सौंपे गए हैं, या जिन कामों को करने के लिए टीके रूबी ने अंडरटेकिंग दी है - उससे तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में टीके रूबी के ही हाथ मजबूत हुए हैं, और उनके लिए बेईमान गवर्नर्स की गर्दन दबोचना और आसान हो गया है ।
गौर करने की बात यह है कि निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमन अनेजा के नेतृत्व में राजा साबू सहित पूर्व गवर्नर्स ने तथा छह क्लब्स के प्रेसीडेंट्स ने रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड को जो पत्र भेजा था, उसमें निवर्त्तमान इंटरनेशनल प्रेसीडेंट जोन जर्म द्वारा टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नियुक्त करने के फैसले को चुनौती दी गयी थी । इन्हीं लोगों द्वारा पिछले दिनों डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच इस बात को जोरशोर से प्रचारित किया गया कि टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नियुक्त करके जोन जर्म ने रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड द्वारा पहले लिए गए फैसले का उल्लंघन किया है, इसलिए अपनी शिकायत में उन्होंने इसी तथ्य को मुद्दा बनाया है - और लोगों को बताया कि देखियेगा, इंटरनेशनल बोर्ड जोन जर्म के फैसले को पलट देगा, यानि टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद से हटा देगा । रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने लेकिन जो फैसला दिया है, वह वास्तव में राजा साबू तथा उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स के मुँह पर ऐसा झन्नाटेदार तमाचा है जिसकी गूँज सिर्फ डिस्ट्रिक्ट 3080 के लोगों के बीच ही नहीं, बल्कि पूरे रोटरी जगत में सुनी गई है । रोटरी के कई बड़े नेताओं ने इन पँक्तियों के लेखक से बात करते हुए कहा है कि टीके रूबी के मामले में इंटरनेशनल बोर्ड की तरफ से इस बार राजा साबू की जैसी फजीहत हुई है, इससे पहले किसी पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट की नहीं हुई है ।
मजे की बात यह हुई है कि राजा साबू गिरोह की तरफ से की गई शिकायत पर इंटरनेशनल बोर्ड के फैसले से अवगत करवाते हुए दो पत्र सामने आये हैं - 29 सितंबर के पत्र में तो शिकायतकर्ताओं के जले पर नमक रगड़ते हुए बताया है कि जोन जर्म ने टीके रूबी के रूप में एक 'बेस्ट क़्वालीफाइड' व्यक्ति को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनाया है । समझा जाता है कि पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट होने का वास्ता देकर राजा साबू ने जले पर नमक रगड़ते उक्त पत्र पर  रोना-धोना मचाया होगा, जिसके बाद 30 सितंबर को दूसरा संशोधित पत्र सामने आया - जिसमें लीपापोती-सी करते हुए राजा साबू और उनके गिरोह के सदस्यों को थोड़ी राहत देने की कोशिश तो की गई है, लेकिन इस कोशिश ने वास्तव में टीके रूबी को राजा साबू गिरोह के गवर्नर्स की गर्दन और ज्यादा सख्ती से दबोचने का मौका दे दिया है । राजा साबू और उनके गिरोह के गवर्नर्स के लिए मुसीबत को लगातार बढ़ाने वाली बात यह हुई है कि वह जितना ही टीके रूबी को दबाने की कोशिश करते हैं, टीके रूबी उतने ही और ज्यादा ताकतवर 'बन' जाते हैं । सोशल मीडिया में इंटरनेशनल बोर्ड के फैसले को लेकर पूर्व गवर्नर अरुण होनी को एक घुड़की में ही जितेंद्र ढींगरा ने जिस तरह से चुप कर दिया, उससे राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स की बेचारगी को पहचाना जा सकता है ।

Saturday, September 30, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने के मामले में राकेश मक्कड़ और उनके साथियों द्वारा दिखाई जा रही निर्लज्ज किस्म की बेशर्मी के सामने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट, वाइस प्रेसीडेंट व सेक्रेटरी जैसे प्रमुख पदाधिकारी आखिर कब तक असहाय बने रहेंगे ?

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे, वाइस प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता तथा सेक्रेटरी वी सागर की बेपरवाही और कानों में तेल डाले बैठे होने की धृतराष्ट्री प्रवृत्ति ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन राकेश मक्कड़ को निर्लज्ज किस्म की बेशर्मी दिखाने का सुनहरा अवसर प्रदान किया हुआ है । गौरतलब है कि रीजनल काउंसिल के 13 में से सात सदस्यों ने रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने के लिए नोटिस दिया हुआ है, नॉर्दर्न रीजन का प्रतिनिधित्व करने वाले सेंट्रल काउंसिल के तीन सदस्यों तथा एक नोमीनेटेड सदस्य ने उक्त नोटिस का समर्थन किया हुआ है - लेकिन फिर भी राकेश मक्कड़ रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की माँग पर बेशर्मी भरी चुप्पी साधे हुए हैं । इंस्टीट्यूट के नियमानुसार, रीजनल काउंसिल के तीन सदस्य रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की माँग कर सकते हैं । चेयरमैन के रूप में राकेश मक्कड़ इस नियम का खुल्लमखुल्ला मजाक बनाए हुए हैं - और चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट, वाइस प्रेसीडेंट व सेक्रेटरी आँखों पर पट्टी बाँध धृतराष्ट्र बने हुए हैं । राकेश मक्कड़ को अपनी इस बेशर्मीभरी निर्लज्जता में अपने साथी पदाधिकारियों का पूरा पूरा समर्थन मिला हुआ है । नियमानुसार, रीजनल काउंसिल के सेक्रेटरी या ट्रेजरर में से किसी एक के समर्थन से वाइस चेयरमैन भी रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुला सकता है - लेकिन इस संबंध में वाइस चेयरमैन विवेक खुराना के प्रयासों को न तो सेक्रेटरी राजेंद्र अरोड़ा से और न ट्रेजरर सुमित गर्ग से समर्थन मिला है ।
उल्लेखनीय है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के वाइस चेयरमैन सहित सात सदस्यों - विवेक खुराना, राजिंदर नारंग, राजेश अग्रवाल, स्वदेश गुप्ता, आलोक जैन, योगिता आनंद और पूजा बंसल ने 17 सितंबर को सेक्रेटरी राजेंद्र अरोड़ा को संबोधित पत्र के जरिए 4 अक्टूबर को रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की माँग की । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में हाल ही के दिनों में घटी घटनाओं के संदर्भ में विचार करने तथा जरूरी फैसले लेने का वास्ता देते हुए उक्त माँग की गई । उक्त माँग के साथ, बुलाई जाने वाली रीजनल काउंसिल की मीटिंग के लिए रीजनल काउंसिल की कमेटियों के पुनर्गठन तथा चेयरमैन सहित रीजनल काउंसिल के अन्य पदाधिकारियों को दिए गए विशेषाधिकारों पर पुनर्विचार को प्रमुख एजेंडे के रूप में रेखांकित किया गया है । रीजनल काउंसिल के 13 सदस्यों में से सात सदस्यों द्वारा की जा रही इस माँग से स्वतः ही साबित है कि मीटिंग में राकेश मक्कड़ की मनमानी भरी लूट-खसोट पर लगाम लगना निश्चित ही है । पिछली एक मीटिंग में जिस तरह पूर्व चेयरमैन दीपक गर्ग तथा मौजूदा ट्रेजरर सुमित गर्ग द्वारा की गई लूट को पकड़ा गया था, जिसके चलते यह दोनों काउंसिल के खजाने से 'लूटी' गई रकम को वापस करने के लिए मजबूर हुए - उससे राकेश मक्कड़ बुरी तरह घबराए हुए हैं । अपनी बेईमानीभरी हरकतों के कारण राकेश मक्कड़ रीजनल काउंसिल में बहुमत सदस्यों का समर्थन खो चुके हैं, इसलिए वह चुपचाप चेयरमैन पद पर कुंडली मार कर बैठे हुए हैं और रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की माँग पर चुप्पी ओढ़े हुए हैं ।
राकेश मक्कड़ के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि रीजनल काउंसिल में बहुमत बनाते सात सदस्यों की रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की माँग को सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की तरफ से जोरदार और सक्रिय समर्थन मिला है । सेंट्रल काउंसिल में नॉर्दर्न रीजन का प्रतिनिधित्व करने वाले संजय अग्रवाल, संजीव चौधरी तथा संजय वासुदेवा ने इंस्टीट्यूट के नियमों का हवाला देते हुए रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाए जाने की माँग का जोरदार तरीके से समर्थन किया । सेंट्रल काउंसिल में नॉमिनेटेड सदस्य विजय झालानी का रवैया तो राकेश मक्कड़ के लिए खासा अप्रत्याशित रहा है । उल्लेखनीय है कि विजय झालानी कुछ समय पहले तक राकेश मक्कड़ के लिए संकटमोचक की भूमिका निभाते रहे हैं, जिसके चलते उनकी राजिंदर नारंग से झड़प भी हो गई थी - लेकिन राकेश मक्कड़ के लिए मुसीबत बनी रीजनल काउंसिल की मीटिंग बुलाने की माँग का विजय झालानी ने खासी मुखरता के साथ समर्थन किया है । और सिर्फ समर्थन ही नहीं किया है, बल्कि इस मामले में लीपापोती-सी करते दिख रहे इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर तक से भिड़ गए । दरअसल, मामले में सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की सक्रियता से दबाव बढ़ता देख वी सागर ने राकेश मक्कड़ को संदेश लिखा/भेजा और उनसे मीटिंग बुलाने का अनुरोध किया । इस पर विजय झालानी ने उन्हें तुरंत लिखा कि आप अनुरोध क्यों कर रहे हैं, नियमों के हवाले से आप मीटिंग बुलाने के लिए निर्देश दीजिए ।
राकेश मक्कड़ लेकिन तमाम हील-हुज्जत के बावजूद मीटिंग बुलाने की माँग पर बेशर्मों की तरह चुप्पी साधे हुए हैं । दरअसल वह समझ रहे हैं कि रीजनल काउंसिल की इस बार की मीटिंग उनकी और उनके साथियों की लूट-खसोट पर पूरी तरह रोक लगाने का काम करेगी - इसलिए वह किसी भी तरह मीटिंग करने से बचना चाहते हैं और इसके लिए अपनी फजीहत करवाने से लेकर इंस्टीट्यूट और उसके पदाधिकारियों तक की किरकिरी करवाने के लिए तैयार हैं । यह देखना दिलचस्प होगा कि राकेश मक्कड़ और उनके साथियों की निर्लज्ज किस्म की बेशर्मी के सामने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट, वाइस प्रेसीडेंट व सेक्रेटरी जैसे प्रमुख पदाधिकारी आखिर कब तक असहाय बने रहते हैं ?

Thursday, September 28, 2017

रोटरी फाउंडेशन के ट्रस्टी पद पर अचानक से गुलाम वहनवती की नियुक्ति करवा कर, जोन 4 तथा जोन 6 ए में हो रहे इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को प्रभावित करने के साथ साथ इंडिया के प्रमुख रोटरी नेताओं को असहाय बना देने का, केआर रवींद्रन ने मास्टरस्ट्रोक चला है क्या ?

मुंबई । गुलाम वहनवती को अचानक से रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी बनाए जाने की घोषणा ने जोन 4 में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी लड़ाई के अंतिम चरण को रोमांचक बना दिया है । उल्लेखनीय है कि नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले तक के चरण में गुलाम वहनवती दूसरे नंबर पर रहे थे और भरत पांड्या से मामूली अंतर से ही वह पिछड़े थे । उम्मीद की जा रही थी कि नोमीनेटिंग कमेटी द्वारा अधिकृत उम्मीदवार के रूप में चुने गए भरत पांड्या को वह चेलैंज करेंगे और इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए होने वाले फाइनल मुकाबले में वह भरत पांड्या को तगड़ी टक्कर देंगे । भरत पांड्या के समर्थकों की तरफ से हालाँकि यह दावा भी किया/सुना जा रहा था कि गुलाम वहनवती को चेलैंज न करने के लिए अंततः राजी कर लिया जायेगा, और गुलाम वहनवती किसी के उकसावे में आकर भरत पांड्या के लिए मुसीबत नहीं बनेंगे । भरत पांड्या के कुछेक नजदीकियों को लेकिन यह डर जरूर रहा कि गुलाम वहनवती भले ही भरत पांड्या की अधिकृत उम्मीदवारी को चेलैंज न करें, लेकिन चेलैंज करने वाले उम्मीदवार का उन्होंने यदि समर्थन किया - तो भरत पांड्या के लिए फाइनल मुकाबला मुसीबत भरा हो सकता है । गुलाम वहनवती के रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी नियुक्त होने से लेकिन भरत पांड्या के लिए उनकी तरफ से मिल सकने वाली चुनौती पूरी तरह खत्म हो गयी लगती है ।
गुलाम वहनवती की चुनौती खत्म होने - या 'करने' - से भरत पांड्या के लिए दूसरी तरह की मुसीबतें पैदा हो गईं हैं । दरअसल गुलाम वहनवती के रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी बनने से शेखर मेहता, यशपाल दास और पीटी प्रभाकर को जो जोर का झटका लगा है - उससे देश में रोटरी की राजनीति की खेमेबाजी के समीकरण को पूरी तरह से उलट-पलट दिया है । उल्लेखनीय है कि रोटरी फाउंडेशन के ट्रस्टी पद पर शेखर मेहता, यशपाल दास और पीटी प्रभाकर की निगाह थी और तीनों ही अपने अपने तरीके से ट्रस्टी पद पर काबिज होने के लिए जुगाड़ बैठा रहे थे - और इनमें भी शेखर मेहता का दाँव बाकी दोनों से ऊँचा माना/पहचाना जा रहा था । माना/पहचाना जा रहा था कि पीटी प्रभाकर और यशपाल दास की दाल तो पूर्व प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन नहीं गलने देंगे - इसलिए शेखर मेहता के लिए ट्रस्टी पद प्राप्त करना आसान हो जाएगा । लेकिन ट्रस्टी पद पर गुलाम वहनवती की नियुक्ति ने सभी को हैरान किया है । नियुक्ति से भी ज्यादा - नियुक्ति होने में हुई जल्दबाजी ने और उसकी 'टाइमिंग' ने लोगों को ज्यादा हैरान किया है । इंडिया में रोटरी के बड़े नेताओं के बीच होने वाली चर्चा में सुना जा रहा है कि यह खेल पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन का है और इस खेल के जरिए उन्होंने वास्तव में इंडिया की रोटरी की व्यवस्था और राजनीति पर अपनी पकड़ को और मजबूत करने का दाँव चला है ।
इंडिया में रोटरी के बड़े नेताओं के बीच पिछले काफी समय से चर्चा रही है कि केआर रवींद्रन रोटरी इंटरनेशनल में अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए इंडिया के प्रभावी नेताओं के पर कतरने तथा ऐसे लोगों को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं जो उनके लिए किसी भी तरह से चुनौती न बन सकें - ताकि इंडिया में रोटरी की व्यवस्था और राजनीति पर उनकी पकड़ मजबूत हो सके । इंडिया के रोटरी नेताओं के आपसी झगड़ों ने केआर रवींद्रन को अपने लक्ष्य तक पहुँचने में मदद भी की है । झगड़ों के फैसले करवाने के नाम पर किसी को 'गिराने' और किसी को 'उठाने' का खेल खेलते हुए केआर रवींद्रन ने इंडिया के अधिकतर नेताओं को अपना पिछलग्गू तो बना ही लिया है । जोन 4 और जोन 6 ए में हो रहे इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनावों में भी केआर रवींद्रन के रवैये से 'आग' लगी हुई है । जोन 6 ए में कमल सांघवी के नजदीकियों का ही आरोप है कि कमल सांघवी को अधिकृत उम्मीदवार चुने जाने के नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले को विवादास्पद बनाने के प्रयासों के पीछे केआर रवींद्रन की ही शह है । कमल सांघवी के नजदीकियों का कहना है कि उनके जोन में जो तमाशा हो रहा है, उसे देख कर लगता है कि जैसे कोशिश यह हो रही है कि या तो कमल सांघवी की सफलता को बीच रास्ते में ही रोक दिया जाए - और या उन्हें केआर रवींद्रन की शरण में पहुँचा दिया जाए ।
कमल सांघवी के नजदीकी मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम के चुनाव में डाली गई अड़चनों को कमल सांघवी के मामले में दोहराया जाता देख रहे हैं । वह यह भी समझ रहे हैं कि बासकर चॉकलिंगम के मामले में केआर रवींद्रन को जो पराजय मिली थी, उससे सबक लेकर उन्होंने अब अपनी रणनीति में फेरबदल किया है - और बदली रणनीति के तहत ही कमल सांघवी को गिराने और या समर्पित होने के विकल्प दिए जा रहे हैं । समझा जा रहा है कि जोन 4 में तो केआर रवींद्रन ने और भी सफाई से 'काम' किया है - गुलाम वहनवती को रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी बनवा कर केआर रवींद्रन ने एक तरफ तो भरत पांड्या का बड़ा सिरदर्द दूर किया है और इस तरह भरत पांड्या को मददगार होने का संकेत दिया है; और दूसरी तरफ शेखर मेहता व यशपाल दास को एक साथ झटका दे दिया है । भरत पांड्या और गुलाम वहनवती दूसरों के मुकाबले 'कूल' टाइप के व्यक्ति भी हैं और किसी भी तरह की खेमेबाजी के कोई बहुत मजबूत 'खंबे' भी नहीं हैं - इसलिए इन्हें केआर रवींद्रन इंडिया में अपने लिए किसी चुनौती की तरह नहीं देखते हैं । जोन 4 में अशोक गुप्ता और रंजन ढींगरा को चैलेंजिंग उम्मीदवार के रूप में देखा/समझा जा रहा है - हालाँकि इनकी तरफ से फैसले का इंतजार अभी किया ही जा रहा है । इन दोनों को पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता है । समझा जा रहा है कि भरत पांड्या की अधिकृत उम्मीदवारी चेलैंज हो या न हो, और यदि हो तो किसकी तरफ से हो - इस बारे में अंतिम फैसला सुशील गुप्ता को ही करना है । गुलाम वहनवती को अचानक और अप्रत्याशित रूप से रोटरी फाउंडेशन में ट्रस्टी बनवा कर केआर रवींद्रन ने जो 'सीन' बनाया है, उससे सुशील गुप्ता के सामने मुश्किल तो पैदा हुई है - लेकिन वह यदि 'लड़ने' का फैसला करें तो इस मुश्किल में एक मौका भी छिपा है । देखना दिलचस्प होगा कि जोन 4 और जोन 6 ए में हो रहे इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में केआर रवींद्रन द्वारा खेली जा रही चाल को मात देने के लिए इंडिया के रोटरी नेता सचमुच कोई योजना बना पाते हैं - या केआर रवींद्रन के सामने असहाय से साबित होते हैं ।

Wednesday, September 27, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में मीरा सेठ को, केएस लूथरा का समर्थन प्राप्त अशोक अग्रवाल के मुकाबले, चुनावी लड़ाई में कूदने से डरता देख गुरनाम सिंह खेमा कमल शेखर का समर्थन करने को मजबूर हुआ

लखनऊ । मीरा सेठ की तरफ से गुरनाम सिंह के समर्थन का दावा करते हुए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए केएस लूथरा का समर्थन प्राप्त करने का जो प्रयास किया जा रहा है, उसे देख/जान कर कमल शेखर खुद को बुरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं । उल्लेखनीय है कि कमल शेखर भी लोगों के बीच गुरनाम सिंह और उनके नजदीकियों के समर्थन का दावा कर रहे हैं, और गुरनाम सिंह के प्रमुख सिपहसालार के रूप में विशाल सिन्हा ने उनसे पैसे खर्च करवाना भी शुरू कर दिया है । इसीलिए कमल शेखर को हैरानी हुई है कि गुरनाम सिंह खेमे के लोगों ने जब उनकी उम्मीदवारी के साथ रहने का उनसे वायदा कर लिया है, तब मीरा सेठ उनके समर्थन का दावा कैसे कर रही हैं ? कमल शेखर को डर हुआ है कि गुरनाम सिंह खेमे के लोग उनके साथ कहीं कोई धोखा तो नहीं कर रहे हैं - पैसे उनसे खर्च करवा रहे हैं, और पर्दे के पीछे से मीरा सेठ को प्रमोट कर रहे हैं । यह बात कमल शेखर और उनके नजदीकी समझ भी रहे हैं कि मीरा सेठ ने अपनी उम्मीदवारी यदि सचमुच प्रस्तुत की, तो गुरनाम सिंह खेमा उनका ही समर्थन करेगा । गुरनाम सिंह के कुछेक नजदीकियों ने कमल शेखर को हालाँकि तर्क दिया है कि मीरा सेठ चुनाव लड़ने का साहस नहीं करेंगी, और अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी को लेकर केएस लूथरा खेमा अब इतना आगे बढ़ चुका है कि वह मीरा सेठ को समर्थन देने के बारे में अब सोचना/विचारना भी नहीं चाहेगा - इसलिए गुरनाम सिंह खेमे के पास तुम्हें समर्थन देने के अलावा कोई चारा भी नहीं होगा । 
इस तर्क से कमल शेखर को लेकिन इस बात का पक्का सुबूत मिल गया है कि गुरनाम सिंह खेमे का उन्हें मिल रहा समर्थन मजबूरी का सौदा है, जो सिर्फ इसलिए है ताकी खेमे के विशाल सिन्हा जैसे लोगों को उनके पैसे पर खाने और 'पीने' का मौका मिलता रहे । मजे की बात यह है कि कमल शेखर और उनके साथी कुछ समय पहले तक केएस लूथरा के नजदीकी हुआ करते थे, लेकिन सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी राजनीति के चक्कर में वह गुरनाम सिंह खेमे के साथ चले गए हैं । उल्लेखनीय है कि अशोक अग्रवाल ने भी पिछला चुनाव गुरनाम सिंह खेमे के समर्थन से लड़ा था और हासिल हुए नतीजे के बाद उन्होंने यह समझ लिया था कि गुरनाम सिंह खेमे के भरोसे रहे तो वह जीवन में कभी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नहीं बन पायेंगे - लिहाजा तभी से वह केएस लूथरा के नजदीक आ गए । हालाँकि केएस लूथरा ने इस वर्ष के उम्मीदवार के चयन में मीरा सेठ और कमल शेखर की तुलना में यदि अशोक अग्रवाल को वरीयता दी तो इसका प्रमुख कारण यह रहा कि उन्होंने भी समझा/पहचाना कि डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच उन दोनों की बजाए अशोक अग्रवाल के प्रति ही सहानुभूति और समर्थन का भाव है । 
मजे की बात यह है कि गुरनाम सिंह खेमे की तरफ से भी अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी का झंडा उठाने की तैयारी की जा रही थी, क्योंकि उन्हें भी लग रहा था कि इस वर्ष हालात चूँकि अशोक अग्रवाल के पक्ष में हैं इसलिए अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी के सहारे/भरोसे वह अपनी राजनीति की लगातार डूबती जा रही नाव को बचा लेंगे । अशोक अग्रवाल ने लेकिन उनकी बजाए केएस लूथरा पर भरोसा किया और उनके उम्मीदवार के रूप में मैदान में आ गए । गुरनाम सिंह खेमे के लोगों को तब मजबूरी में कमल शेखर की उम्मीदवारी का झंडा उठाना पड़ा । गुरनाम सिंह खेमे के नेताओं को हालाँकि यह भी लगता है कि कमल शेखर के लिए अशोक अग्रवाल के सामने टिक पाना मुश्किल ही होगा, और इसीलिए वह मीरा सेठ को उम्मीदवार होने के लिए प्रेरित कर रहे हैं । मीरा सेठ लेकिन चुनाव लड़ने से बचना चाहती हैं - और वह भी केएस लूथरा खेमे के मुकाबले; इसलिए ही वह केएस लूथरा का समर्थन पाने की जुगत में हैं । मीरा सेठ को विश्वास है कि उन्हें यदि केएस लूथरा का समर्थन मिल जाता है, तो गुरनाम सिंह खेमा कमल शेखर को छोड़ने में सेकेंड नहीं लगायेगा - और तब उनका काम आसानी से बन जाएगा । केएस लूथरा लेकिन अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी का झंडा लेकर काफी आगे बढ़ चुके हैं ।
इस परिस्थिति में कमल शेखर के लिए परेशानी की बात यह हुई है कि उनकी उम्मीदवारी का झंडा उठा लेने के बावजूद गुरनाम सिंह खेमे के नेताओं को जब उन पर भरोसा नहीं हो पा रहा है - तब वह उनकी उम्मीदवारी की नैय्या को पार कैसे लगायेंगे ? गुरनाम सिंह खेमे में जब से विशाल सिन्हा का वर्चस्व बढ़ा है, तब से काम करने और लोगों के बीच साख रखने वाले लोगों की बजाए खाने और 'पीने' वाले लोगों का जमावड़ा बढ़ा है - और इसी कारण से खेमे की राजनीतिक साख लगातार घटती ही जा रही है । डिस्ट्रिक्ट में विशाल सिन्हा की बदनामी की स्थिति का आलम यह है कि अपने जिस चुनाव में उन्हें केएस लूथरा का समर्थन नहीं मिला था, उस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था; और पिछले लायन वर्ष के अपने गवर्नर-काल में उन्हें उम्मीदवार का टोटा पड़  गया था तथा उन्हें केएस लूथरा के उम्मीदवार मनोज रुहेला का समर्थन करने के लिए मजबूर होना पड़ा था । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में जब से केएस लूथरा ने मोर्चा संभाला है, तब से जीत उसी को मिली है - जिसके साथ केएस लूथरा  का समर्थन रहा है । ऐसे में, कमल शेखर के लिए रास्ता वैसे ही मुश्किलों भरा है - उस पर उनकी उम्मीदवारी का समर्थन कर रहे नेता बेमन से और मजबूरी में उनके साथ हैं, और विशाल सिन्हा जैसे लोगों का पूरा ध्यान सिर्फ उनसे पैसा खर्च करवाने पर है । कमल शेखर के नजदीकियों को भी लग रहा है कि कमल शेखर गलत जगह फँस गए हैं - उनके अनुसार, सोचने की बात यह है कि अशोक अग्रवाल जिनके चंगुल से निकल भागे हैं, और मीरा सेठ जिन पर भरोसा नहीं कर पा रही हैं, वह कमल शेखर के ही क्या काम आयेंगे ?