Saturday, April 16, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट प्रोजेक्ट के रूप में स्थापित होने वाले रोटरी वरदान ब्लड बैंक के घपले के लिए अजय सिन्हा व जेएस शेरावत के साथ-साथ अशोक अग्रवाल को भी जिम्मेदार 'दिखाने/बताने' के रवैये के चलते जेके गौड़ का मतलबी व अवसरवादी रूप सामने आया

गाजियाबाद । रोटरी वरदान ब्लड बैंक के घपले में अशोक अग्रवाल, अजय सिन्हा व जेएस शेरावत को 'दागी' बना/दिखा कर जेके गौड़ ने जिस तरह 'अकेला' छोड़ दिया है, उससे जेके गौड़ का अवसरवादी रूप एक बार फिर सामने आया है । उल्लेखनीय है कि रोटरी वरदान ब्लड बैंक की आड़ में कमाई करने की तैयारी कर चुके जेके गौड़ ने जब अपने आप को चारों तरफ से घिरा पाया, और वह ब्लड बैंक के लिए प्रस्तावित मशीनों की कीमत को एक लाख 70 हजार डॉलर से घटा कर मात्र एक लाख डॉलर पर ले आने के लिए मजबूर हुए; और इस तरह 70 हजार डॉलर, यानि 45 लाख रुपए से अधिक की रकम डकार जाने का उनका 'इंतजाम' फेल हो गया - तो सवाल खड़ा हुआ कि इस 'लूट' का इंतजाम करने के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए और किसे सजा दी जाए ? डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में जेके गौड़ ने रोटरी वरदान ब्लड बैंक की कमेटी से अशोक अग्रवाल, अजय सिन्हा व जेएस शेरावत को बाहर करके यह साफ संदेश दिया है कि 45 लाख रुपए की रकम फर्जीवाड़ा करके डकारे जाने की 'योजना' इन तीनों ने ही बनाई थी, और सजा के तौर पर इन्हें कमेटी से बाहर कर दिया । मजे की बात यह है कि जिस कमेटी ने ब्लड बैंक के नाम पर 45 लाख रुपए की हेराफेरी करने की योजना बनाई थी, उसके मुख्य कर्ताधर्ता तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट शरत जैन व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी सतीश सिंघल थे - इस योजना को 'सफल' बनाने के दाँव-पेंच डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में खुद जेके गौड़ चल रहे थे; लेकिन जब जिम्मेदारी तय करने का समय आया तो जेके गौड़ ने बदनामी का दाग अशोक अग्रवाल, अजय सिन्हा व जेएस शेरावत पर लगा दिया ।
जेके गौड़ का कहना है कि डीआरएफसी के रूप में मुकेश अरनेजा ने उनसे इन तीनों को कमेटी से बाहर करने की माँग की थी, जिसे मानने के लिए वह मजबूर हुए । डीआरएफसी के रूप में मुकेश अरनेजा तो लेकिन ब्लड बैंक के लिए खरीदी जाने वाली मशीनों की खरीद से संबंधित डिटेल्स देने की माँग कर रहे थे - जिसे मानने व पूरा करने में जेके गौड़ ने कभी भी दिलचस्पी नहीं ली, और तरह तरह की बहानेबाजी करके वह जिसे लगातार अनसुना करते रहे तथा उससे बचने की तिकड़में लगाते रहे । इस चक्कर में उन्होंने अपने गवर्नर-काल में डिस्ट्रिक्ट प्रोजेक्ट के रूप में स्थापित होने वाले ब्लड बैंक का उद्घाटन इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन से करवाने की महत्वाकांक्षी तैयारी तक को धूल में मिल जाने दिया । ऐसे में सवाल यह है कि मुकेश अरनेजा की माँग मानने की बजाए, रोटरी में और शहर/समाज में अपना नाम बनाने/दिखाने के मौके की बलि चढ़ाने के लिए तैयार हो जाने वाले जेके गौड़ - इस बार तीन लोगों को कमेटी से बाहर करने की मुकेश अरनेजा की माँग मानने के लिए मजबूर क्यों हो गए ? जो हुआ, उससे लोगों को प्रथम दृष्टया यही लगा कि ब्लड बैंक के लिए खरीदी जाने वाली मशीनों की आड़ में जेके गौड़ ने हेराफेरी की जो योजना बनाई थी, उसके आरोपों से खुद को बचाने के लिए जेके गौड़ ने अशोक अग्रवाल, अजय सिन्हा व जेएस शेरावत को फँसा दिया - और इसका आरोप भी वह मुकेश अरनेजा के सिर मढ़ने का प्रयास कर रहे हैं । इस मामले में लोगों को हैरानी इस बात पर है कि जेके गौड़ ने अशोक अग्रवाल तक का भी कोई लिहाज नहीं किया और ब्लड बैंक की 'लूट' के लिए उन्होंने अशोक अग्रवाल को भी 'जिम्मेदार' बताने/दिखाने से परहेज नहीं किया ।
अजय सिन्हा व जेएस शेरावत के साथ जेके गौड़ ने जो किया, उसे लेकर किसी को कोई हैरानी नहीं है - किंतु अशोक अग्रवाल को भी उन्होंने अजय सिन्हा व जेएस शेरावत के साथ 'खड़ा' दिया, यह जरूर लोगों के लिए हैरानी की बात है । जेके गौड़ ने यूँ तो बहुत से लोगों के साथ 'यूज एंड थ्रो' वाला फार्मूला अपनाया है, किंतु अशोक अग्रवाल के साथ भी वह अपना यह फार्मूला अपनायेंगे - इसका किसी को विश्वास तो क्या, आभास तक नहीं था । जो लोग जेके गौड़ के प्रति दुर्भावना रखते रहे हैं, उनका भी मानना और कहना रहा कि जैसे डायन के पड़ोस का एक घर छोड़ने की बात मानी/कही जाती रही है - ठीक उसी तर्ज पर जेके गौड़ भी अशोक अग्रवाल को 'छोड़े' रखेंगे । किंतु अब जब मौका आया, तो पता चला कि जेके गौड़ ने अशोक अग्रवाल को भी नहीं छोड़ा । अशोक अग्रवाल के साथ किए गए व्यवहार ने जेके गौड़ के 'असली चरित्र' को उद्घाटित किया है । उल्लेखनीय है कि जेके गौड़ आज रोटरी में जो कुछ भी हैं, उसमें अशोक अग्रवाल का बहुत बड़ा रोल है - सिर्फ बड़ा ही नहीं, प्रमुख व निर्णायक रोल है । जेके गौड़ जब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार थे, तब भी; और अब जब जेके गौड़ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हैं, तब भी अशोक अग्रवाल उनके साथ जिस तरह से कंधे से कंधा मिला कर खड़े रहे हैं - डिस्ट्रिक्ट में व रोटरी में वैसा दूसरा उदाहरण मिलना मुश्किल क्या, असंभव ही है । जो लोग अशोक अग्रवाल को नजदीक से जानते/पहचानते हैं, वह भी इस बात पर हैरान रहे हैं कि अशोक अग्रवाल तो किसी को कुछ न समझें, फिर वह जेके गौड़ के साथ इस हद तक इन्वॉल्व कैसे हो गए ? जेके गौड़ और अशोक अग्रवाल के दूसरों के साथ भले ही कैसे भी संबंध रहे हों, और अपने अपने व्यवहार व रवैये के चलते दोनों चाहें कितने ही बदनाम रहे हों - लेकिन एक दूसरे के साथ निभाने के मामले में दोनों ने ही अपने नजदीकियों व जानने वालों को हैरान ही किया ।
लेकिन जेके गौड़ ने अंततः दिखा/बता दिया है कि उनका 'चरित्र' बिलकुल भी नहीं बदला है और अशोक अग्रवाल भी उनके लिए दूसरों जैसे ही हैं । कुछेक लोगों को लगता है कि जेके गौड़ के लिए अशोक अग्रवाल की जरूरत चूँकि अब पूरी हो गई है, अशोक अग्रवाल उनके लिए अब ज्यादा काम के नहीं रह गए हैं - इसलिए उन्होंने अशोक अग्रवाल को भी 'थ्रो' करने में  हिचक नहीं दिखाई है । डिस्ट्रिक्ट प्रोजेक्ट के रूप में स्थापित होने वाले रोटरी वरदान ब्लड बैंक के घपले तथा इस घपले के लिए अजय सिन्हा व जेएस शेरावत के साथ-साथ अशोक अग्रवाल को भी जिम्मेदार 'दिखाने/बताने' के जेके गौड़ के रवैये ने जेके गौड़ के मतलबी और अवसरवादी रूप को सामने लाने का काम किया है ।

Friday, April 15, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में संजीवा अग्रवाल की उम्मीदवारी को मुकेश गोयल की हरी झंडी मिलने पर डीआर गोयल द्वारा दिखाई जा रही नाराजगी ने अजय सिंघल को मुसीबत में फँसाने के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट के राजनीतिक खिलाड़ियों के बीच फिलहाल तो गर्मी पैदा कर दी है

गाजियाबाद । संजीवा अग्रवाल को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी के लिए मुकेश गोयल की हरी झंडी मिल जाने से खफा डीआर गोयल ने इसके लिए अजय सिंघल को जिम्मेदार ठहराया है, और आरोप लगाया है कि अजय सिंघल ने उनकी बजाए संजीवा अग्रवाल की वकालत की - जिसके चलते मुकेश गोयल ने उनकी बजाए संजीवा अग्रवाल की उम्मीदवारी के दावे को प्राथमिकता दी । डीआर गोयल तथा उनके शुभचिंतकों का कहना है कि वह तो पिछली बार ही अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करना चाह रहे थे, किंतु मुकेश गोयल ने उन्हें अगली बार समर्थन देने का भरोसा देकर उनकी 'चाह' को वापस करवा दिया था । डीआर गोयल तथा उनके शुभचिंतकों का कहना है कि इस 'काम' में अजय सिंघल ने भी अपनी दिलचस्पी व सक्रियता दिखाई थी - लेकिन जब 'अगली बार' के उम्मीदवार का फैसला करने का समय आया, तो अजय सिंघल को डीआर गोयल को दिया गया भरोसा याद नहीं आया; और मुकेश गोयल के सामने अजय सिंघल ने संजीवा अग्रवाल की वकालत की । डीआर गोयल तथा उनके शुभचिंतकों की शिकायत यह है कि अजय सिंघल यूँ तो उनके ही कैम्प के 'आदमी' हैं, लेकिन इसके बावजूद जरूरत पड़ने पर अजय सिंघल ने उनकी मदद से मुँह मोड़ लिया । अजय सिंघल के नजदीकियों का कहना लेकिन यह है कि डीआर गोयल की उम्मीदवारी को यदि तवज्जो नहीं मिली है, तो इसके लिए खुद डीआर गोयल ही जिम्मेदार हैं - और वह नाहक ही अजय सिंघल पर आरोप मढ़ रहे हैं । ऐसा कहने वालों का कहना यह भी है कि इस बार का चुनाव हो जाने के बाद अगली बार के लिए अपनी उम्मीदवारी को लेकर डीआर गोयल को सक्रिय होना चाहिए था, लेकिन वह सक्रिय नहीं हुए और अपनी सक्रियता के बल पर संजीवा अग्रवाल ने बाजी मार ली - तो अब डीआर गोयल को इसके लिए अजय सिंघल को दोषी नहीं ठहराना चाहिए ।
मजे की बात यह है कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के अगले दावेदार को लेकर जिन संजीवा अग्रवाल, डीआर गोयल और अजय सिंघल के बीच आरोपों-प्रत्यारोपों का परिदृश्य देखने को मिल रहा है - वह तीनों लायंस क्लब गाजियाबाद के सदस्य हैं, तथा अजय सिंघल अगले लायन वर्ष में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होंगे । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी को लेकर संजीवा अग्रवाल से मात खाए डीआर गोयल को लगता है कि अजय सिंघल यदि उनकी मदद करें, तो उनका काम अभी भी बन सकता है । अजय सिंघल लेकिन इस पचड़े में पड़ने में दिलचस्पी लेते हुए नहीं दिख रहे हैं । क्लब में उनके नजदीकियों का कहना है कि पिछले चुनाव का जो नतीजा रहा, उसे देखते हुए अजय सिंघल को मुकेश गोयल के खिलाफ खड़े होने में कोई फायदा नहीं नजर आ रहा है और वह वैसी बेवकूफी हरगिज नहीं करना चाहेंगे, जैसी शिव कुमार चौधरी ने की और डिस्ट्रिक्ट में पूरी तरह अलग-थलग पड़ गए । इसके अलावा, अजय सिंघल के लिए डीआर गोयल पर भरोसा करना भी संभव नहीं है । उल्लेखनीय है कि पिछले वर्षों में डीआर गोयल की उम्मीदवारी की चर्चा कई बार छिड़ चुकी है - लेकिन डीआर गोयल अपनी उम्मीदवारी को लेकर जितनी तेजी से आगे बढ़ते हैं, उससे दुगनी तेजी से फिर पीछे हटते हुए नजर आते हैं; यही कारण है कि उनकी उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से नहीं लेता है । इस बार भी यही हुआ : इस बार के चुनाव से पहले तो डीआर गोयल उम्मीदवार बनने के लिए बहुत बेताब थे; इतने बेताब कि उन्हें मनाने/बैठाने के लिए मुकेश गोयल को काफी मशक्कत करना पड़ी और धमकाने व पुचकारने तक के हथकंडे आजमाने पड़े । 'अगली बार' का आश्वासन लेकर डीआर गोयल मान/बैठ भी गए, किंतु अगली बार की उम्मीदवारी को सचमुच क्लियर करवाने का मौका आया तो डीआर गोयल 'सोते' पाए गए । उनकी नींद तब टूटी, जब अगली बार का झंडा संजीवा अग्रवाल के हाथों में आ गया ।
संजीवा अग्रवाल से मिली चोट डीआर गोयल और उनके संगी-साथियों को लगता है कि कुछ ज्यादा चुभ रही है, इसलिए उनकी तरफ से गर्मी दिखाई जा रही है - अपनी इस गर्मी में हालाँकि अभी वह अजय सिंघल को ही झुलसाने का काम कर रहे हैं; लेकिन उनकी गर्मी 'देख' कर उन्हें लोगों से तरह तरह की सलाहें भी मिलने लगी हैं । इसमें एक सलाह को तो डीआर गोयल की तरफ से सिरे से नकार दिया गया है, जिसमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में शिव कुमार चौधरी के समर्थन से उम्मीदवार बन जाने की बात कही गई है । इस बार के चुनाव में शिव कुमार चौधरी के उम्मीदवार के रूप में रेखा गुप्ता की जो बुरी गत बनी, उससे सबक लेकर डीआर गोयल किसी भी हालत में शिव कुमार चौधरी के उम्मीदवार बनने को तो राजी नहीं हैं । किंतु एक दूसरी सलाह में उन्हें दम दिखता है - जिसमें बताया गया है कि इस बार के चुनावी नतीजे से यह नहीं मान लेना चाहिए कि मुकेश गोयल के समर्थन के बिना चुनाव जीतना असंभव ही है । ऐसा कहने वालों का तर्क है कि इस बार के चुनाव में विनय मित्तल को जो जोरदार ऐतिहासिक जीत मिली है, वह वास्तव में विनय मित्तल की खुद की जीत है । यह ठीक है कि विनय मित्तल को मुकेश गोयल का समर्थन था; रेखा गुप्ता के रूप में उनके सामने एक कमजोर उम्मीदवार था; डिस्ट्रिक्ट में शिव कुमार चौधरी की बदनामियाँ रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी को और कमजोर कर रही थीं - लेकिन फिर भी विनय मित्तल को जो रिकॉर्ड-तोड़ बम्पर जीत मिली, वह सिर्फ उन्हीं को मिल सकती थी; उनकी जगह कोई और उम्मीदवार होता, तो ऐसी जीत नहीं प्राप्त कर पाता । जीत प्राप्त कर भी पाता - यह भी कौन दावे के साथ कह सकता है ? इसी बिना पर डीआर गोयल के नजदीकियों को समझाया जा रहा है कि संजीवा अग्रवाल, विनय मित्तल नहीं हैं और डीआर गोयल, रेखा गुप्ता नहीं हैं - इसलिए यदि शिव कुमार चौधरी की छाया से बचकर उम्मीदवार बनते हैं तो मौका अच्छा है ।
इस अच्छे 'मौके' को और अच्छा बनाने का काम शिव कुमार चौधरी की छाया संजीवा अग्रवाल पर पड़ने की संभावना करती है : लोगों के बीच चर्चा है कि संजीवा अग्रवाल के शिव कुमार चौधरी के साथ बिजनेस रिलेशन रहे हैं जो उनके बीच अच्छे संबंध होने/रहने का सुबूत हैं । उम्मीदवार के रूप में संजीवा अग्रवाल ने अपनी उम्मीदवारी का झंडा भले ही मुकेश गोयल को थमा दिया है, लेकिन वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में शिव कुमार चौधरी का भी सहयोग/समर्थन लेने का प्रयास करेंगे । संजीवा अग्रवाल के इस प्रयास के चलते, अपनी अपनी मजबूरियों और जरूरतों के चलते मुकेश गोयल और शिव कुमार चौधरी के तार एक बार फिर जुड़ सकते हैं । यह संभावना डीआर गोयल के लिए 'वरदान' बन सकती है - क्योंकि मुकेश गोयल के कई साथियों ने उन्हें खुली चेतावनी दी हुई है कि उन्होंने यदि अब फिर शिव कुमार चौधरी को तवज्जो दी, तो वह उनका साथ छोड़ देंगे । यानि, शिव कुमार चौधरी का सहयोग/समर्थन पाने की संजीवा अग्रवाल की कोशिश अंततः उनका काम बिगाड़ने का ही 'काम' करेगी । इसी तर्क के आधार पर कुछेक नेता डीआर गोयल की उम्मीदवारी को हवा देने की कोशिश कर रहे हैं; और इसी बिना पर डीआर गोयल व उनके शुभचिंतक अजय सिंघल पर दबाव बना कर उन्हें अपने साथ करने की कोशिश कर रहे हैं । लायंस क्लब गाजियाबाद के कई लोगों का कहना लेकिन यह है कि डीआर गोयल की उम्मीदवारी को हवा देने की चाहें जो कोई भी कोशिश कर रहा हो, तथा स्थितियाँ चाहें कितना ही डीआर गोयल की उम्मीदवारी के अनुकूल हों - लेकिन डीआर गोयल की उम्मीदवारी इतनी सीली हुई है कि वह कोई आग पकड़ ही नहीं सकेगी; दरअसल इसलिए भी अजय सिंघल ने डीआर गोयल कैम्प का 'आदमी' होने के बावजूद उनकी उम्मीदवारी की प्रस्तुति में अपनी तरफ से कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है ।
यही कारण है कि संजीवा अग्रवाल की उम्मीदवारी को मुकेश गोयल की तरफ से हरी झंडी मिल जाने पर डीआर गोयल और उनके समर्थकों द्वारा दिखाई जा रही नाराजगी ने फिलहाल भले ही अजय सिंघल को मुसीबत में फँसाने के साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों के बीच गर्मी पैदा कर दी हो - लेकिन किसी को भी उम्मीद नहीं है कि यह गर्मी ज्यादा दिन तक बनी रह सकेगी । अजय सिंघल भी इसीलिए डीआर गोयल व उनके शुभचिंतकों की अभी की नाराजगी को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं ।

Saturday, April 9, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080, यानि राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में प्रवीन चंद्र गोयल को अपने क्लब की कॉन्करेंस दिलवाने में यशपाल दास द्वारा की गई मशक्कत की मधुकर मल्होत्रा द्वारा उड़ाई गई खिल्ली के कारण बने माहौल में डीसी बंसल की उम्मीदवारी के लिए मुसीबत बढ़ी

चंडीगढ़ । राजेंद्र उर्फ राजा साबू के नेतृत्व में डिस्ट्रिक्ट के गवर्नर्स को एक तरफ तो वर्ष 2018-19 के गवर्नर पद के चुनाव के संदर्भ में प्रवीन चंद्र गोयल की उम्मीदवारी के पक्ष में कॉन्करेंस जुटाने में पसीने छूट रहे हैं, और दूसरी तरफ वर्ष 2017-18 के गवर्नर पद के चुनाव को जल्दी करा लेने की अपनी तैयारी उन्हें विफल होती हुई दिख रही है - इससे उनके बीच आपस में ही सिर-फुटौव्वल की स्थिति पैदा हो रही है, और अपनी नाकामियों के लिए वह एक दूसरे को ही जिम्मेदार ठहराने लगे हैं । पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर यशपाल दास को प्रवीन चंद्र गोयल को अपने ही क्लब की कॉन्करेंस दिलवाने में जो मशक्कत करना पड़ी है, उसके कारण वह दूसरे गवर्नर्स - खासकर मधुकर मल्होत्रा के निशाने पर आ गए हैं । मधुकर मल्होत्रा को कहते सुना गया है कि यशपाल दास ख्बाव तो इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने का देख रहे हैं, लेकिन राजनीतिक हैसियत उनकी यह है कि अपने ही क्लब में मनमाफिक फैसला करवाने के लिए उन्हें राजा साबू का नाम लेकर क्लब के पदाधिकारियों के सामने गिड़गिड़ाना पड़ रहा है । प्रवीन चंद्र गोयल के लिए कॉन्करेंस जुटाने वास्ते गवर्नर्स को जिस तरह की तिकड़में करना पड़ रही हैं, और फजीहतें झेलना पड़ रही हैं - उससे डीसी बंसल की उम्मीदवारी के समर्थकों की बेचैनी बढ़ती जा रही है । उनकी तरफ से शिकायतें सुनने को मिल रही हैं कि 22 अप्रैल से पहले उनका चुनाव करवा लेने की तैयारी के फेल हो जाने से उनकी मुश्किलें पहले से ही बढ़ गईं हैं, तिसपर कॉन्करेंस जुटाने के काम में आ रही मुसीबतों की खबरों से डीसी बंसल के चुनाव पर खतरा और मंडराने लगा है ।
उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट में अभी वर्ष 2017-18 के गवर्नर पद के लिए टीके रूबी और डीसी बंसल के बीच चुनाव होना है, तथा वर्ष 2018-19 के गवर्नर पद के लिए चुने गए अधिकृत उम्मीदवार जितेंद्र ढींगरा के खिलाफ प्रवीन चंद्र गोयल के चेलैंज को मान्यता दिलवाने का काम होना है - इसमें सफलता मिली तो फिर उनके बीच चुनाव होगा । प्रवीन चंद्र गोयल के चेलैंज को मान्यता दिलवाने के लिए जरूरी कॉन्करेंस इकठ्ठा करने व जमा करने की अंतिम तारीख 22 अप्रैल है । राजा साबू ने गवर्नर्स को जितेंद्र ढींगरा व टीके रूबी को हरवाने की जिम्मेदारी सौंपी हुई है । राजा साबू हालाँकि इस बात से इंकार करते हैं, और कुछेक मौकों पर उन्होंने कहा/दोहराया भी है कि चुनाव से उनका कोई मतलब नहीं है - लेकिन मधुकर मल्होत्रा और यशपाल दास जिस तरह से जब तब राजा साबू का नाम लेकर समर्थन जुटाने का प्रयास करते और माहौल बनाते देखे गए हैं, उससे यह जानने/समझने में किसी को भी शक नहीं रह गया है कि डिस्ट्रिक्ट में चुनावी गंदगी करने/फैलाने के मुख्य प्रेरणा-स्रोत राजा साबू ही हैं । क्या कोई विश्वास कर सकता है कि जो राजा साबू अपने डिस्ट्रिक्ट में और दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में चुनाव के खिलाफ बात करते रहे हों, और अधिकृत उम्मीदवार को चेलैंज करने की कोशिशों का विरोध करते रहे हों, उन्हीं राजा साबू के क्लब से - उनकी सहमति के बिना - अधिकृत उम्मीदवार चेलैंज हो जाए ? पर्दे के पीछे से राजा साबू द्वारा मोर्चा सँभाले रखने के बावजूद प्रवीन चंद्र गोयल के लिए कॉन्करेंस जुटाना मुश्किल हो रहा है, और उधर 22 अप्रैल से पहले वर्ष 2017-18 का चुनाव कराने की योजना को सफल बनाने की तैयारी भी कामयाब होती हुई नजर नहीं आ रही है ।
उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट के गवर्नर्स खेमे ने वर्ष 2017-18 के गवर्नर का चुनाव 22 अप्रैल से पहले करा लेने की पूरी पूरी तैयारी थी । इसके लिए मनमाने तरीके से गवर्नर डेविड हिल्टन के साथ चार पूर्व गवर्नर्स - प्रेम भल्ला, शाजु पीटर, प्रमोद विज व जीके ठकराल - को लेकर बैलेटिंग कमेटी बना ली गई थी, और उसने काम करना शुरू कर दिया था । टीके रूबी के क्लब की तरफ से इस बैलेटिंग कमेटी के खिलाफ रोटरी इंटरनेशनल में आपत्ति की गई और इसे रोटरी इंटरनेशनल के नियमों के खिलाफ गठित हुआ बताया गया । रोटरी इंटरनेशनल ने इस आपत्ति को सही पाया तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डेविड हिल्टन को हिदायत दी कि वह रोटरी इंटरनेशनल के नियमानुसार बैलेटिंग कमेटी का गठन करें । डेविड हिल्टन इस हिदायत को मानने के लिए मजबूर हुए और फिर उन्होंने उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों को लेकर बैलेटिंग कमेटी बनाई - जिसमें पूर्व गवर्नर प्रेम भल्ला के साथ पूर्व क्लब अध्यक्ष वीके शर्मा व अजय मदान हैं । इस झमेले में एक तो समय बर्बाद हुआ, और दूसरी बात यह हुई कि नई बनी बैलेटिंग कमेटी में राजा साबू और उनके 'दूतों' के लिए मनमानी करना संभव नहीं रह गया । इसका नतीजा यह हुआ है कि वर्ष 2017-18 का चुनाव 22 अप्रैल से पहले कराने की पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स खेमे की योजना पर पानी फिर गया है । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स खेमे को दरअसल पता था कि प्रवीन चंद्र गोयल के लिए कॉन्करेंस जुटाने में इन्हें फजीहत का सामना करना पड़ेगा - इसलिए ही इन्होंने 22 अप्रैल तक टीके रूबी व डीसी बंसल वाला चुनाव करा लेने की योजना बनाई थी । इससे इन्हें दो फायदे होने थे - एक तो कॉन्करेंस जुटाने में होने वाली फजीहत की पोल खुलने से पहले ही यह डीसी बंसल को चुनाव जितवा लेते; और दूसरा फायदा यह होता कि इस जीत का मनोवैज्ञानिक लाभ उठाते हुए यह कॉन्करेंस भी आसानी से जुटा लेते और फिर प्रवीन चंद्र गोयल को चुनाव भी जितवा लेते ।
किंतु बैलेटिंग कमेटी के मुद्दे पर गवर्नर्स खेमे को जो मात मिली, उससे उनकी सारी रणनीति गड़बड़ाती दिख रही है । डीसी बंसल के समर्थकों व शुभचिंतकों को भी अब लगने लगा है कि प्रवीन चंद्र गोयल के पक्ष में कॉन्करेंस जुटाने में गवर्नर्स को जिस तरह से मुसीबतों के पापड़ बेलने पड़ रहे हैं, उसके चलते उनका चुनाव भी खतरे की तरफ बढ़ता नजर आ रहा है । यशपाल दास के क्लब में जो हुआ, उसकी बात डिस्ट्रिक्ट में फैल जाने के बाद तो मामला और बिगड़ गया है । डिस्ट्रिक्ट में हो रही चर्चा के अनुसार, यशपाल दास के क्लब के पदाधिकारियों ने प्रवीन चंद्र गोयल के पक्ष में कॉन्करेंस देने से साफ इंकार कर दिया था । यह देख कर यशपाल दास ने अपनी इज्जत की दुहाई देना शुरू किया और कहा कि यदि कॉन्करेंस नहीं मिली तो मैं राजा साबू को कैसे मुँह दिखाऊँगा; राजा साबू ने मुझसे कहा है कि तुम्हारे क्लब की कॉन्करेंस तो आराम से मिल ही जायेगी । यशपाल दास ने क्लब के पदाधिकारियों को भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करते हुए यह भी कहा कि मुझे इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनना है, और इसके लिए राजा साबू की मदद की जरूरत होगी; ऐसे में यदि उनके क्लब के उम्मीदवार को हमने कॉन्करेंस नहीं दी तो फिर राजा साबू मेरी मदद भी नहीं करेंगे । इस तरह की बातों से यशपाल दास को प्रवीन चंद्र गोयल के पक्ष में अपने क्लब की कॉन्करेंस दिलवाने में तो कामयाबी मिल गई - लेकिन इस प्रकरण से यह पोल भी खुल गई कि प्रवीन चंद्र गोयल की उम्मीदवारी गवर्नर्स खेमे के लिए बोझ बन गई है, और उनके लिए कॉन्करेंस जुटाने में ही गवर्नर्स नेताओं के छक्के छूट रहे हैं । इस मामले में यशपाल दास की खिल्ली उड़ाने का मधुकर मल्होत्रा को जो मौका मिला है, जिसे इस्तेमाल करने में उन्होंने जरा सी भी देर नहीं लगाई - उसने डिस्ट्रिक्ट में एक अलग रौनक लगाई है ।
डीसी बंसल की उम्मीदवारी के समर्थकों का ही कहना है कि प्रवीन चंद्र गोयल की उम्मीदवारी के समर्थन में कॉन्करेंस जुटाने के चक्कर में गवर्नर्स खेमे की तरफ से क्लब्स के पदाधिकारियों पर जो दबाव पड़/बन रहे हैं, उसके कारण डिस्ट्रिक्ट में गवर्नर्स खेमे के प्रति नाराजगी व विरोध बढ़/फैल रहा है और इसका खामियाजा डीसी बंसल की उम्मीदवारी को भुगतना पड़ सकता है । डीसी बंसल की उम्मीदवारी के समर्थकों व शुभचिंतकों को लगने लगा है कि प्रवीन चंद्र गोयल के चक्कर में कहीं उनके हाथ आया सुनहरा मौका उनकी पहुँच से दूर न निकल जाए । अभी कुछ दिन पहले तक डिस्ट्रिक्ट के जो लोग टीके रूबी व डीसी बंसल के बीच होने वाले चुनाव में डीसी बंसल का पलड़ा भारी बता रहे थे, वही लोग अब डीसी बंसल की उम्मीदवारी को मुसीबत में फँसा देख/बता रहे हैं । डीसी बंसल की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन का भाव रखने वाले लोगों का भी मानना और कहना है कि गवर्नर्स खेमे को प्रवीन चंद्र गोयल की उम्मीदवारी को छोड़कर डीसी बंसल की उम्मीदवारी पर ध्यान देना चाहिए, जिससे कि डीसी बंसल की उम्मीदवारी को कामयाब बनाया जा सके - अन्यथा कहीं ऐसा न हो कि प्रवीन चंद्र गोयल के चक्कर में डीसी बंसल का भी काम बिगड़ जाए । प्रवीन चंद्र गोयल की उम्मीदवारी के पक्ष में कॉन्करेंस जुटाने के लिए गवर्नर्स खेमे को जिस तरह से पक्के वाले क्लब्स में भी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, उससे दोहरा खतरा पैदा हुआ है : एक तरफ तो डर यह हुआ है कि तमाम धींगामुश्ती के बाद भी प्रवीन चंद्र गोयल को जरूरी कॉन्करेंस मिले ही न, दूसरा डर यह है कि कॉन्करेंस तो किसी तरह से जुटा ली जाएँ - लेकिन इसके लिए की गई धींगामुश्ती में क्लब्स नाराज हो जाएँ, और नाराजगी का बदला वह चुनाव में लें । दोनों ही स्थितियों में डीसी बंसल की उम्मीदवारी के लिए भारी खतरा है । इस खतरे से बचने/निपटने के लिए डीसी बंसल के समर्थकों व शुभचिंतकों को एक ही रास्ता समझ में आ रहा है, और वह यह कि गवर्नर्स खेमा प्रवीन चंद्र गोयल की उम्मीदवारी से हाथ खींच ले तथा पूरी तरह से डीसी बंसल की उम्मीदवारी पर ध्यान लगाए । गवर्नर्स खेमे में शुरू हुई आपसी सिर-फुटौब्बल की इस स्थिति ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के परिदृश्य को खासा दिलचस्प बना दिया है ।

Wednesday, April 6, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080, यानि राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग से चुनाव कराने के मामले में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डेविड हिल्टन के अड़ियल रवैये के सामने इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई लाचार और असहाय बने हुए हैं

देहरादून । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डेविड हिल्टन ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग के मुद्दे पर इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई की जैसी फजीहत की है, वह रोटरी के इतिहास की अनोखी और दिलचस्प घटना के रूप में याद रखी जाएगी । रोटरी के इतिहास में किसी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के हाथों किसी इंटरनेशनल डायरेक्टर की ऐसी फजीहत शायद ही हुई होगी, जैसी डिस्ट्रिक्ट 3080 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डेविड हिल्टन ने मनोज देसाई की कर दी है । मजे की बात यह हुई है कि रोटरी न्यूज व रोटरी समाचार के अप्रैल अंक में मनोज देसाई ने क्रमशः अंग्रेजी व हिंदी में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग के बहुत सारे फायदे गिनाते/बताते हुए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग को रोटरी के लिए वक्त की जरूरत बताते हुए उसकी वकालत की है, किंतु डेविड हिल्टन को बात न अंग्रेजी में समझ में आई, और न हिंदी में । मनोज देसाई ने इस अपने लंबे-चौड़े आलेख में यह भी बताया है कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग को अपनाने की योजना को इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन तथा इंटरनेशनल बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने बहुत सोच-विचार कर प्रस्तावित किया है तथा अभी हाल ही में जोन 5ए में बास्कर चोकालिंगम व सुनील जचारिआ के बीच संपन्न हुए इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग का तरीका ही अपनाया गया था । इतनी सब जानकारियों के बावजूद डेविड हिल्टन के कानों पर जूँ नहीं रेंगी और वह अपने गवर्नर-काल में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए होने वाले दोनों चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग कराने के लिए तैयार नहीं हुए हैं ।
दरअसल डेविड हिल्टन के डिस्ट्रिक्ट के कुछेक क्लब्स के पदाधिकारियों ने मनोज देसाई से अनुरोध किया था कि आप लोग जब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग के इतने फायदे बता रहे हो तथा उसकी इतनी वकालत कर रहे हो, तो उनके डिस्ट्रिक्ट में होने वाले चुनाव इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग से ही करवाईयेगा । यह अनुरोध करने वाले क्लब्स के पदाधिकारियों ने मनोज देसाई से साफ साफ कहा/बताया भी कि उनके डिस्ट्रिक्ट में जो चुनाव होने हैं, उनमें उन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की तरफ से बेईमानी होने की आशंका है; इसलिए वह चाहते हैं कि उनके डिस्ट्रिक्ट में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग हो - जिससे कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को बेईमानी करने का मौका न मिल सके और चुनाव निष्पक्ष हो सकें । उल्लेखनीय तथ्य यह है कि खुद मनोज देसाई ने अपने आलेख में बताया है कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग से चुनाव निष्पक्ष तरीके से हो सकेंगे तथा चुनावी शिकायतें दर्ज नहीं करना पड़ेंगी । इसी बिना पर, क्लब्स के पदाधिकारियों की माँग पर मनोज देसाई ने डेविड हिल्टन को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग अपनाने को कहा, डेविड हिल्टन ने पहले तो इस पर चुप्पी साधने व टालमटोल वाला रवैया अपनाया - मनोज देसाई ने लेकिन जब यह कहना जारी रखा, तो डेविड हिल्टन ने उनकी बात मानने से साफ इंकार कर दिया । मनोज देसाई ने कुछेक लोगों से कहा भी कि अब मैं क्या करूँ, डेविड हिल्टन मेरी सुन ही नहीं रहे हैं ? यहाँ हैरानी डेविड हिल्टन के रवैये पर नहीं है, बल्कि मनोज देसाई की लाचारगी और बेचारगी पर है । मनोज देसाई इंटरनेशनल डायरेक्टर हैं, और वह इंटरनेशनल प्रेसीडेंट व इंटरनेशनल बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के फैसले को लागू करवाने के मामले में एक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के सामने असहाय बने हुए हैं - यह एक दिलचस्प नजारा है ।
ऐसा नहीं है कि मनोज देसाई देसाई में किसी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के खिलाफ कार्रवाई करने का दम या अधिकार नहीं है । अभी पिछले दिनों ही उन्होंने डिस्ट्रिक्ट 3100 के गवर्नर सुनील गुप्ता का 'सिर कलम' किया है । सुनील गुप्ता पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में मनमानियाँ करने, चुनाव संबंधी पक्षपातपूर्ण बेईमानियाँ करने तथा रोटरी इंटरनेशनल के पदाधिकारियों के आदेशों का पालन न करने के आरोप थे । मनोज देसाई ने 'झटके' के साथ उनकी गवर्नरी छीन ली । सुनील गुप्ता गुहार लगाते रहे कि उनकी गवर्नरी उतने दिन तो बनी रहने दो, जितने दिन में वह 'पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर' बनने के अधिकारी बन जाए । मनोज देसाई ने लेकिन स्पाइन सर्जन के अपने अनुभव का फायदा उठाते हुए सुनील गुप्ता की ऐसी सर्जरी की, कि वह न गवर्नर रहे और न 'पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर' कहलाने के अधिकारी रहे । रोटरी में लोगों के बीच हैरानी इसी बात की है कि डिस्ट्रिक्ट 3100 के गवर्नर सुनील गुप्ता पर दम दिखाने वाले मनोज देसाई का डिस्ट्रिक्ट 3080 के गवर्नर डेविड हिल्टन के सामने दम फूला/निकला क्यों पड़ा है ? क्या इसका कारण यह है कि सुनील गुप्ता की वकालत करने वाला चूँकि कोई नहीं था, तो उन पर तो मनोज देसाई ने अपनी बहादुरी दिखा दी; लेकिन डेविड हिल्टन के पीछे पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ राजा साबू का दम है, तो इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई अपनी फजीहत होने के बाद भी बगले झाँक रहे हैं ?
उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट 3080 में नोमीनेटिंग कमेटी द्वारा चुने गए अधिकृत उम्मीदवारों - टीके रूबी तथा जितेंद्र ढींगरा को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर न बनने देने की जिद पर अड़े राजा साबू ने जिस जिस तरह की हरकतें कीं और करवाई हैं - उससे रोटरी में उनके डिस्ट्रिक्ट की तथा खुद उनकी भारी फजीहत हुई है । राजा साबू ने हालाँकि इससे कोई सबक नहीं सीखा है, और इसीलिए उनकी ही शह पर उनके डिस्ट्रिक्ट का गवर्नर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मामले में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट व इंटरनेशनल बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा लिए गए फैसले को क्रियान्वित करने के इंटरनेशनल डायरेक्टर के अनुरोध को मानने से इंकार कर दे रहा है । इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग की वकालत व माँग करने वाले लोगों का आरोप है कि राजा साबू एंड कंपनी को डर है कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग में उन्हें बेईमानी करने का मौका नहीं मिलेगा और तब टीके रूबी व जितेंद्र ढींगरा चुनाव जीत जायेंगे । इन दोनों को चूँकि बेईमानी से ही हराया जा सकता है, और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग में बेईमानी करने की गुंजाइश नहीं मिलेगी/रहेगी - इसलिए राजा साबू की शह पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डेविड हिल्टन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग से चुनाव कराने के मनोज देसाई के आदेशपूर्ण सुझाव को स्वीकार करने से साफ इंकार कर रहे हैं; और मामला चूँकि राजा साबू का है - इसलिए मनोज देसाई भी अपनी बेचारगी व लाचारगी दिखा कर अपनी फजीहत झेल रहे हैं ।
ऐसे में, डिस्ट्रिक्ट 3080 में वर्ष 2017-18 के तथा वर्ष 2018-19 के गवर्नर के लिए होने वाले चुनाव ईमानदारी व निष्पक्ष तरीके से हो सकने को लेकर संदेह पैदा हो गया है, तथा रोटरी व उसके बड़े पदाधिकारियों के लिए इन दोनों चुनावों को निष्पक्ष तरीके से करवा पाना एक बड़ी चुनौती बन गया है ।

Tuesday, April 5, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में निलंबित रोटरी क्लब वैशाली का कार्यभार मनोज भदोला को पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता की बदौलत क्या सचमुच वापस मिलने जा रहा है ?

गाजियाबाद । रोटरी क्लब वैशाली का मामला पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के गले की फाँस बनता दिख रहा है । उल्लेखनीय है कि रोटरी क्लब वैशाली अपने पदाधिकारियों के आपसी झगड़ों तथा रोटरी विरोधी गतिविधियों में संलग्न रहने के कारण निलंबित है, जिस कारण क्लब के सदस्यों के ड्यूज लेना/जमा करना बंद कर दिया गया है । क्लब के पदाधिकारियों के एक गुट ने होशियारी दिखाते हुए रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय में ड्यूज जमा कराने की कोशिश की, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय ने लेकिन जिसे कामयाब नहीं होने दिया । क्लब के पदाधिकारियों के इसी गुट के लोगों की तरफ से अब दावा किया जा रहा है कि पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता ने उन्हें आश्वासन दिया है कि वह जल्दी ही उनके क्लब का निलंबन खत्म करवायेंगे । इन्हीं लोगों की तरफ से यह दावा भी किया जा रहा है कि सुशील गुप्ता ने इनकी माँग भी मान ली है कि जिन पाँच/छह लोगों को यह क्लब में नहीं रखना चाहते हैं, उन्हें यह क्लब से निकाल सकते हैं । क्लब के दूसरे सदस्यों व पदाधिकारियों की तरफ से डिस्ट्रिक्ट के लोगों को लेकिन यह सुनने को भी मिल रहा है कि यदि ऐसा हुआ तो वह इस अन्याय के खिलाफ रोटरी इंटरनेशनल से लेकर देश की अदालतों तक का दरवाजा खटखटायेंगे । इनका कहना है कि पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता की न्यायप्रियता पर उन्हें पूरा भरोसा है, और उन्हें उम्मीद है कि किन्हीं सिफारिशों के चलते वह क्लब पर उन लोगों को फिर से काबिज नहीं होने देंगे, जिन्होंने रोटरी इंटरनेशनल के नियम-कानूनों का तो पालन नहीं ही किया - अपनी हरकतों से क्लब में झगड़ा पैदा किया तथा रोटरी को बदनाम किया ।
रोटरी क्लब वैशाली का जो झगड़ा है, उसके घटना-क्रम को यदि सिलसिलेवार तरीके से देखें, तो यह सीधे सीधे निलंबित क्लब के अध्यक्ष मनोज भदोला की मनमानी, बेबकूफीभरी, सौदेबाजीपूर्ण तथा रोटरी विरोधी कार्यप्रणाली का नतीजा है । मनोज भदोला न अध्यक्ष पद की जिम्मेदारियों का निर्वाह कर सके और न अध्यक्ष पद की गरिमा को बनाए/बचाए रख सके । हालाँकि यह सच है कि उनके अध्यक्ष-काल में क्लब में रोटरी नियमों व रोटरी भावनाओं के जो घुर्रे बिखरे और क्लब में रोटरी मजाक बन कर रह गई, उसमें क्लब के दूसरे पदाधिकारियों तथा सदस्यों की भी भूमिका व जिम्मेदारी रही है - लेकिन यह सब हुआ इसलिए ही क्योंकि अध्यक्ष के रूप में मनोज भदोला स्थितियों को सँभालने की बजाए खुद एक पक्ष बन गए तथा रोटरी नियमों का उल्लंघन करने व रोटरी के उच्च आदर्शों व भावनाओं की ऐसी-तैसी करने में शामिल हो गए । मजे की बात यह है कि अब वही मनोज भदोला तथा उनके साथी लोगों को बता रहे हैं कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मुकेश अरनेजा तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी सतीश सिंघल ने मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई तथा पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता को 'सेट' कर लिया है, और फैसला करने की जिम्मेदारी सुशील गुप्ता को मिल गई है - और सुशील गुप्ता न सिर्फ क्लब का निलंबन वापस करवायेंगे, बल्कि मनोज भदोला को अध्यक्ष पद भी वापस दिलवायेंगे और क्लब के कुछेक पदाधिकारियों व सदस्यों को क्लब से निकलवाने का अधिकार भी उन्हें दिलवायेंगे ।
मनोज भदोला व उनके साथियों की तरफ से डिस्ट्रिक्ट के लोगों को बताया जा रहा है कि सुशील गुप्ता इस बात से बहुत प्रभावित हैं कि क्लब के सदस्यों का बहुमत उनके साथ है । डिस्ट्रिक्ट में जो लोग रोटरी क्लब वैशाली के मनोज भदोला के अध्यक्ष-काल की गतिविधियों व हरकतों से परिचित हैं, उन्हें हैरानी इस बात की है कि बहुमत के तथाकथित समर्थन की आड़ में सुशील गुप्ता क्या सचमुच मनोज भदोला की कार्रवाइयों व हरकतों को स्वीकृति प्रदान कर देंगे ? उल्लेखनीय है कि मनोज भदोला क्लब के अध्यक्ष बने थे - जिससे यह बात स्वतः जाहिर है कि क्लब के सदस्यों का उन्हें पूरा पूरा समर्थन प्राप्त था । क्लब में जो बबाल मचा, उसका संबंध उन्हें मिलने वाले समर्थन से बिलकुल भी नहीं था - उसका संबंध उनकी कार्रवाइयों व हरकतों से था । क्लब के पदाधिकारियों व सदस्यों का ही आरोप रहा कि अध्यक्ष के रूप में मनोज भदोला क्लब में सदस्यों के बीच व्यावहारिक सौहार्द बनाए रखने का कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं तथा पक्षपातपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, रोटरी इंटरनेशनल के नियमों का कोई पालन नहीं कर रहे हैं, क्लब के खर्चों का कोई हिसाब-किताब नहीं रख/कर रहे हैं, पिछले वर्ष किए गए प्रोजेक्ट के खर्चों का हिसाब देने/लेने में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अपना समर्थन व वोट बेचने के लिए सौदेबाजी कर रहे हैं - और सबसे गंभीर आरोप यह कि फैलोशिप के नाम पर क्लब में शराबबाजी व लफंगई को बढ़ावा दिया जा रहा है । कोढ़ में खाज की बात यह कि शराबबाजी व लफंगे एक्शन वाली तस्वीरें सोशल साइट्स पर प्रसारित की जाती रहीं - जिससे कि न सिर्फ क्लब का बल्कि दूसरे आम लोगों के बीच रोटरी का और डिस्ट्रिक्ट का नाम भी खराब हुआ ।
इन्हीं आरोपों के चलते, मनोज भदोला व उनके साथियों के सुशील गुप्ता को 'सेट' कर लेने के दावे पर डिस्ट्रिक्ट के लोगों को हैरानी हुई है । वह आपस में एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि सुशील गुप्ता एक वरिष्ठ रोटेरियन हैं, इंटरनेशनल डायरेक्टर रहे हैं - क्या वह मुकेश अरनेजा व सतीश सिंघल की सिफारिश पर मनोज भदोला तथा उनके साथियों की रोटरी विरोधी हरकतों को बिलकुल ही नजरअंदाज कर देंगे और क्लब को उन्हीं लोगों को सौंप देने की वकालत करेंगे ? सुशील गुप्ता को रोटरी क्लब वैशाली के फेसबुक पेज पर लगाई गईं कुछेक बेहूदा व अशालीन किस्म की तस्वीरें भेजी गईं हैं - यह बताने के लिए कि मनोज भदोला अपने अध्यक्ष-काल में यह रोटरी का आखिर कौन सा प्रोजेक्ट कर रहे हैं, और या फैलोशिप के नाम पर किस तरह की लफंगई को शह दे रहे हैं । क्लब के ही नहीं, डिस्ट्रिक्ट के कई लोगों का मानना और कहना है कि सुशील गुप्ता ने इन तथ्यों को अनदेखा करते हुए रोटरी क्लब वैशाली यदि सचमुच उन्हीं लोगों को वापस दिलवा दिया, जो क्लब में बबाल करवाने तथा क्लब को मटरगश्ती का अड्डा समझने/बनाने के काम में लगे रहे - तो यह डिस्ट्रिक्ट के लिए, रोटरी के लिए - और खुद उनकी प्रतिष्ठा के लिए आत्मघाती होगा ।

Monday, April 4, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में दीपक गर्ग का बदला बदला रवैया विजय गुप्ता और राजेश शर्मा के लिए मुसीबतों के साथ साथ नई चुनौतियों को आमंत्रित करने वाला भी बन गया है

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में दीपक गर्ग जो तेवर दिखा रहे हैं, उससे विजय गुप्ता और राजेश शर्मा के सामने अजीब सी दुविधा और गंभीर किस्म का संकट खड़ा हो गया है । उल्लेखनीय है कि दीपक गर्ग को चेयरमैन बनवाने में विजय गुप्ता और राजेश शर्मा ने ही 'मेहनत' व तिकड़म की थी - और इस उम्मीद व विश्वास के साथ की थी कि चेयरमैन बनने के बाद दीपक गर्ग उनके कहे अनुसार ही चलेंगे । दीपक गर्ग ने भी इनका समर्थन और सहयोग पाने के लिए इन्हें हर तरह से आश्वस्त किया था कि वह इनके हितों का पूरा पूरा ध्यान रखेंगे तथा इनके सलाह-सुझाव के अनुसार ही काम करेंगे । दोनों तरफ से बनी इसी अंडरस्टैंडिंग के चलते दीपक गर्ग के चेयरमैन बनने पर विजय गुप्ता और राजेश शर्मा को अपार प्रसन्नता हुई थी और उन्हें लगा था कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में अब उन्हीं की मर्जी से फैसले होंगे । किंतु चेयरमैन बनने के बाद से दीपक गर्ग के तेवर जिस तरह से बदले बदले हुए लग रहे हैं, उसे देख कर विजय गुप्ता और राजेश शर्मा सन्नाटे में आ गए हैं - और उनके लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि बदले तेवर वाले दीपक गर्ग के साथ वह करें तो आखिर क्या करें ? यदि वह दीपक गर्ग के खिलाफ कुछ कहते/करते हैं, तो दूसरों को कहने का मौका मिलेगा कि उन्हें पहले ही समझाया गया था कि दीपक गर्ग भरोसा करने लायक व्यक्ति नहीं है, और वह अपने स्वार्थ में लोगों को सिर्फ इस्तेमाल करता है, तथा काम निकल/बन जाने के बाद फिर वह उनकी परवाह भी नहीं करता है; इसके अलावा, फिर दीपक गर्ग भी खुल कर उनके खिलाफ हो जायेगा । और यदि वह दीपक गर्ग के खिलाफ कुछ नहीं करते हैं, तो दीपक गर्ग इसे उनकी कमजोरी समझेंगे, तथा फिर उलटे उनपर ही हावी होने की कोशिश करेंगे ।
दीपक गर्ग के बदले रवैये ने विजय गुप्ता के लिए ज्यादा बड़ा संकट खड़ा किया है - दीपक गर्ग को जानने वालों का कहना है कि चेयरमैन बनने के बाद दीपक गर्ग ने 2018 में होने वाले इंस्टीट्यूट के अगले चुनाव में सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी शुरू कर दी है । उनकी इस तैयारी की खबर विजय गुप्ता के लिए सदमे जैसी बात है, क्योंकि यदि दीपक गर्ग अगले चुनाव में सचमुच में सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बने - तो विजय गुप्ता के लिए सेंट्रल काउंसिल की अपनी सीट बचा पाना मुश्किल होगा । दीपक गर्ग को जानने वाले लोगों का कहना हालाँकि यह है कि सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी दीपक गर्ग अफोर्ड नहीं कर पायेंगे, और यह बात दीपक गर्ग खुद भी जानते हैं - इसलिए भले ही उनकी इच्छा हो, तब भी वह सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार नहीं बनेंगे । विजय गुप्ता के नजदीकियों का कहना है कि विजय गुप्ता के उम्मीदवार होते हुए तो दीपक गर्ग सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं करेंगे; और दीपक गर्ग को सेंट्रल काउंसिल के लिए यदि आना भी होगा - तो वह विजय गुप्ता के चुनावी मैदान से बाहर होने तक इंतजार करेंगे, तथा विजय गुप्ता की उम्मीदवारी की अनुपस्थिति में ही अपनी उम्मीदवारी पेश करेंगे । दीपक गर्ग को जानने का दावा करने वाले कई लोगों का कहना लेकिन यह है कि विजय गुप्ता और उनके नजदीकी यदि यही सोचते बैठे रहे, तो निश्चित ही धोखा खायेंगे - क्योंकि दीपक गर्ग अपने स्वार्थ के सामने किसी का भी साथ छोड़ देने के लिए खासे बदनाम हैं, और उनके भुक्तभोगियों की एक बड़ी संख्या है । विजय गुप्ता और उनके नजदीकी यूँ तो इस बात पर विश्वास न करते और कहते रहते कि दीपक गर्ग दूसरों को भले ही धोखा देते रहे हों, किंतु विजय गुप्ता के साथ धोखा नहीं करेंगे - लेकिन चेयरमैन बनने के बाद से दीपक गर्ग के तेवर जिस तरह से बदले हुए हैं, उसे देख/जान कर विजय गुप्ता और उनके नजदीकियों के बीच घबराहट पैदा हुई है ।
राजेश शर्मा का मामला थोड़ा अलग है : इस बार के सेंट्रल काउंसिल के चुनाव में वह मामूली अंतर से अंतिम सीट जीत पाए थे । इस बार के चुनाव में उन्हें चरनजोत सिंह नंदा का सक्रिय सहयोग व समर्थन मिला था । राजेश शर्मा के लिए समस्या की बात यह है कि चरनजोत सिंह नंदा की तरफ से अगले चुनाव में उम्मीदवार बनने की बात सुनी जा रही है । ऐसे में, राजेश शर्मा के सामने अगले चुनाव में अपनी सीट बचाने की गंभीर चुनौती होगी । इस चुनौती से निपटने की तैयारी के लिए वह दीपक गर्ग की चेयरमैनी से उम्मीद लगाए हुए थे । राजेश शर्मा तथा उनके कुछेक नजदीकी हालाँकि यह दावा भी करते हैं कि चरनजोत सिंह नंदा से उन्हें वास्तव में कोई सहयोग व समर्थन नहीं मिला, और वह अपने दम पर ही चुनाव जीते हैं - इसलिए उन्हें अगले चुनाव में चरनजोत सिंह नंदा के उम्मीदवार बनने से कोई फर्क नहीं पड़ता । राजेश शर्मा तथा उनके कुछेक नजदीकी यह दावा भले ही करें, लेकिन वह भी जानते/समझते हैं कि चरनजोत सिंह नंदा के समर्थन ने उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में माहौल बनाने का काम तो किया ही है; और अगले चुनाव में चरनजोत सिंह नंदा की उम्मीदवारी उनकी उम्मीदवारी को मनोवैज्ञानिक झटका तो देगी ही । इस झटके को झेलने के लिए राजेश शर्मा अभी से तैयारी कर लेना चाहते हैं । दीपक गर्ग की चेयरमैनी के सहारे वह यह तैयारी करने की 'तैयारी' में थे, लेकिन दीपक गर्ग के बदले बदले तेवरों से उन्हें अपनी तैयारी खटाई में पड़ती दिख रही है ।
दीपक गर्ग की अपनी समस्या है : उन पर विजय गुप्ता के 'आदमी' होने का ठप्पा तो पहले से ही लगा है; चेयरमैन बनने के लिए उन्हें राजेश शर्मा की जो मदद मिली है - उसके कारण माना गया कि चेयरमैनी का ताज भले ही उनके सिर पर है, लेकिन असली चेयरमैनी चलेगी विजय गुप्ता और राजेश शर्मा की । दीपक गर्ग नहीं चाहते हैं कि ऐसा माना जाए । वह अपने काम और अपने फैसलों से दिखा देना चाहते हैं कि चेयरमैन का ताज भी उनके सिर पर है, और चेयरमैनी भी वही कर रहे हैं । इस चक्कर में वह कोई भी ऐसा काम करने या फैसला लेने/करने से बच रहे हैं, जिसमें विजय गुप्ता और या राजेश शर्मा की छाप 'दिखाई' देती हो । हालाँकि चेयरमैन दीपक गर्ग के कुछेक कामों और फैसलों में विजय गुप्ता और या राजेश शर्मा की 'छाप' बताई तो जा रही है, लेकिन दूसरी तरफ विजय गुप्ता और राजेश शर्मा को यह शिकायतें करते हुए भी सुना जा रहा है कि दीपक गर्ग उन्हें तवज्जो नहीं दे रहे हैं, और उनसे बचने व दूर दूर रहने की कोशिश कर रहे हैं । चेयरमैन के रूप में दीपक गर्ग का बदला बदला रवैया विजय गुप्ता और राजेश शर्मा के लिए मुसीबत तो बन ही गया है, साथ ही साथ नई चुनौतियों को आमंत्रित करने वाला भी बन गया है ।

Saturday, April 2, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू में इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी बनने के चक्कर में जेपी सिंह द्वारा मदन बत्रा के साथ की गई धोखाधड़ी को देखते हुए यशपाल अरोड़ा को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की अपनी 'तैयारी' इंद्रजीत सिंह के भरोसे सफल होती दिख रही है

नई दिल्ली । जेपी सिंह ने इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी बनने के लिए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद पर मदन बत्रा की उम्मीदवारी की जिस तरह से बलि चढ़ाई है, उसे 'देख' कर रमेश अग्रवाल को अगले लायन वर्ष में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुने जाने की अपनी 'तैयारी' खतरे में पड़ी नजर आने लगी है । रमेश अग्रवाल अगले लायन वर्ष में जेपी सिंह के भरोसे सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की 'तैयारी' में सुने/देखे जा रहे हैं, लेकिन मदन बत्रा के हश्र के देखते हुए उनके नजदीकियों को डर हो गया है कि रमेश अग्रवाल का हाल कहीं मदन बत्रा जैसा ही न हो - और कहीं उन्हें भी जेपी सिंह से धोखा न मिले । उल्लेखनीय है कि मौजूदा लायन वर्ष में मदन बत्रा ने जेपी सिंह के भरोसे ही सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की तैयारी की हुई थी । जेपी सिंह उनके लिए 'बैटिंग' कर भी रहे थे; डिस्ट्रिक्ट में जेपी सिंह की जो राजनीतिक साख है - उससे खुद मदन बत्रा तथा उनके नजदीकियों सहित दूसरे लोगों को भी मदन बत्रा की दाल गल जाने का भरोसा था । लेकिन फैसले की घड़ी आते आते पलड़ा जिस तरह रवि मेहरा के पक्ष में झुक गया, उससे सभी को झटका लगा और जेपी सिंह की भूमिका संदेह के घेरे में आ गई । मदन बत्रा के साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों का कहना है कि जेपी सिंह ऐन मौके पर मदन बत्रा को धोखा नहीं देते, तो मदन बत्रा - रवि मेहरा को अच्छी चुनावी टक्कर देते । जेपी सिंह के पलटी मारने से मदन बत्रा को भी अपने पैर पीछे खींचने के लिए मजबूर होना पड़ा ।
डिस्ट्रिक्ट में हर किसी का मानना और कहना है कि जेपी सिंह ने इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी बनने के लिए रवि मेहरा के समर्थकों के साथ सौदा कर लिया, तथा मदन बत्रा को उन्होंने बीच मँझदार में ही छोड़ दिया । लोगों के बीच की चर्चाओं के अनुसार, रवि मेहरा के समर्थकों ने जेपी सिंह को साफ साफ बता दिया कि उन्होंने यदि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए मदन बत्रा का समर्थन करना जारी रखा, तो वह इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी के लिए उम्मीदवार खड़ा करेंगे - और जेपी सिंह को फिर चुनाव लड़ना होगा । रवि मेहरा के समर्थकों की यह धमकी काम कर गई, और जेपी सिंह ने मदन बत्रा की उम्मीदवारी के समर्थन से तुरंत हाथ खींच लिए । जेपी सिंह के नजदीकियों का कहना है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी के लिए अपने ही डिस्ट्रिक्ट में चुनाव का सामना करने की संभावना ने जेपी सिंह को वास्तव में डरा दिया : जेपी सिंह को डर यह हुआ कि चुनाव में वह यदि हार गए, तो इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने का उनका सपना चकनाचूर हो जायेगा; और यदि नहीं भी हारे, तो भी मल्टीपल में यह संदेश तो जायेगा ही कि जेपी सिंह को अपने ही डिस्ट्रिक्ट में पूरा पूरा समर्थन नहीं है । इसलिए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी राजनीति में समर्पण कर देने तथा मदन बत्रा की उम्मीदवारी के समर्थन से पीछे हट जाने में ही उन्हें अपनी भलाई नजर आई । पिछले लायन वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में नरेंद्र गोयल ने जेपी सिंह की जैसी फजीहत की थी, उसका सबक याद रखने के कारण ही जेपी सिंह ने इस वर्ष पंगा लेने का साहस नहीं किया - जिसका नतीजा यह हुआ कि मदन बत्रा की नाव बीच मँझदार में डूब बैठी ।
मदन बत्रा के साथ जो हुआ, उसे देख कर रमेश अग्रवाल और उनके नजदीकियों को अगले लायन वर्ष की अपनी 'तैयारी' खतरे में पड़ती दिख रही है । दरअसल अगले लायन वर्ष में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए यशपाल अरोड़ा भी तैयारी करते हुए सुने/देखे जा रहे हैं - जिन्हें विनय गर्ग और इंद्रजीत सिंह का समर्थन बताया जाता है । यशपाल अरोड़ा को इंद्रजीत सिंह के 'आदमी' के रूप में पहचाना जाता है । वैसे तो इंद्रजीत सिंह भी जेपी सिंह के 'आदमी' के रूप में देखे/समझे जाते रहे हैं, लेकिन इंद्रजीत सिंह तथा यशपाल अरोड़ा के नजदीकियों का कहना है कि इंद्रजीत सिंह उनके गुलाम बन कर तो नहीं ही रहेंगे । कुछेक मौकों पर इंद्रजीत सिंह को जेपी सिंह से 'दूर जाते' देखा/पाया भी गया है । ऐसे मौकों पर जेपी सिंह के 'लोगों' ने जब इंद्रजीत सिंह को याद दिलाया कि वह जेपी सिंह के कारण ही गवर्नर बने हैं, तो इंद्रजीत सिंह से उन्हें सुनने को मिला कि - लेकिन जेपी सिंह उसकी पूरी कीमत बसूल तो चुके हैं । इस तरह की बातों से ही डिस्ट्रिक्ट में लोगों को लगता है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में इंद्रजीत सिंह किसी भी तरह से जेपी सिंह के 'यस मैन' बनकर तो नहीं ही रहेंगे । विनय गर्ग तो घोषित रूप से जेपी सिंह विरोधी खेमे के हैं । यही चीज अगले लायन वर्ष में रमेश अग्रवाल पर यशपाल अरोड़ा का पलड़ा भारी बनाती है । रमेश अग्रवाल को ले दे कर एक जेपी सिंह का ही भरोसा है - लेकिन इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी के चक्कर में जेपी सिंह द्वारा मदन बत्रा के साथ की गई धोखाधड़ी को देखते हुए रमेश अग्रवाल को वह भरोसा भी छिनता हुआ नजर आ रहा है ।       
डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति से परिचित लोगों के अनुसार हालाँकि अभी से इस तरह का नतीजा निकालना जल्दबाजी करना होगा । उनका कहना है कि अगले लायन वर्ष की चुनावी राजनीति का सारा खेल इस बात पर निर्भर करेगा कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में विनय गर्ग कैसा काम करते हैं, और किस किस के साथ अच्छे संबंध बना कर रखते हैं; तथा इंद्रजीत सिंह व यशपाल अरोड़ा का वह कैसे इस्तेमाल करते हैं ? पिछले लायन वर्ष में जेपी सिंह की फजीहत करने में नरेंद्र गोयल भले ही कामयाब रहे थे; और इस वर्ष सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव के संदर्भ में रवि मेहरा के समर्थक जेपी सिंह को झुकाने में भले ही सफल रहे हों - लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि विनय गर्ग और इंद्रजीत सिंह भी जेपी सिंह को 'गरीब की जोरू' समझ लेंगे ? विनय गर्ग, इंद्रजीत सिंह और यशपाल अरोड़ा की कोई भी गलती जेपी सिंह को खेल कर देने का पर्याप्त मौका देगी - और जेपी सिंह के मौके में से ही फिर रमेश अग्रवाल के लिए भी रास्ता निकल सकेगा । यद्यपि यह भी सच है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी बनने के चक्कर में जेपी सिंह डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में भारी दबाव में आ गए हैं, और ऐसे में कोई भी उन्हें आँखें दिखाने लगा है । जेपी सिंह की इस मजबूरी ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को दिलचस्प मोड़ पर तो ला ही दिया है ।