Monday, September 12, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट रवि चौधरी पर चुनावी गिरोहबाजी का वास्ता देकर उम्मीदवारों से स्पॉन्सरशिप झटकने, और इस तरह इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई की चेतावनी को अनदेखा करने का आरोप

नई दिल्ली । रवि चौधरी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों पर दबाव बना कर पेम वन के लिए स्पॉन्सरशिप के नाम पर उनसे पैसे झटकने का जो काम किया है, उसके कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में किया गया उनका पहला कार्यक्रम ही विवाद के घेरे में आ गया है । संजीव राय मेहरा ने रवि चौधरी के दबाव में आने से इंकार करके इस विवाद को और हवा दी है । जो सुरेश भसीन, रवि दयाल, अतुल गुप्ता, अमरजीत सिंह - रवि चौधरी के दबाव में फँसने से अपने आप को बचा नहीं सके, उन्होंने पेम वन में कोई खास तवज्जो न मिलने के कारण अपने आप को ठगा हुआ महसूस किया है - जिससे विवाद और भड़का है । रोटरी में और डिस्ट्रिक्ट में शायद यह पहला मौका है जब मौजूदा वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के हाथों अपनी 'जेब कटवाई' । रोटरी में और डिस्ट्रिक्ट में चलती आ रही 'प्रथा' के अनुसार डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों की जेब पर उस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का ही 'हक़' माना जाता है; रवि चौधरी पहले ऐसे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट हैं, जिन्होंने इस प्रथा को तोड़ने का काम किया है - और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के 'माल' पर ही हाथ साफ कर दिया है । रवि चौधरी ने एक बड़ा काम और किया है : रोटरी और डिस्ट्रिक्ट की प्रथा के अनुसार, उम्मीदवार लोग पेट्स में पैसा लगाते हैं; रवि चौधरी ने लेकिन पेम में ही उम्मीदवारों से पैसा लगवा लिया है । इन बातों पर पेम में उपस्थित लोगों के बीच चर्चा छिड़ी, तो एक गंभीर आरोप यह भी सुनने को मिला कि रवि चौधरी ने कोर टीम के पद 'बेचे' हैं, और कोर टीम के कुछेक सदस्यों से तो एक एक लाख रुपए तक लिए हैं । प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि इन चर्चाओं और आरोपों की जानकारी रवि चौधरी को भी मिली, तो पोल खुलने के डर से उनका मूड ऐसा उखड़ा कि फिर वह पेम वन में अपना भाषण भी ठीक से नहीं दे सके ।
चर्चा/आलोचना बढ़ी, तो फिर रवि चौधरी की तरफ से भी मोर्चा संभाला गया और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों ने जबाव में बताया कि कोर टीम के जिन सदस्यों से एक एक लाख रुपए लिए गए हैं, वह वास्तव में उधार लिए गए हैं - जिसकी जरूरत पेम वन के आयोजन के शुरुआती खर्चों को पूरा करने के लिए पड़ी । बताया गया है कि जिन लोगों से एक एक लाख रुपए लिए गए हैं, उन्हें यह बात बता भी दी गई है - इसलिए कोर टीम के पद बेचे जाने का आरोप पूरी तरह झूठा है । रवि चौधरी की बदकिस्मती है कि यह जबाव किसी के गले नहीं उतर रहा है । लोगों का कहना है कि पेम वन के आयोजन के शुरुआती खर्चे रवि चौधरी को या तो अपनी जेब से करने चाहिए थे, और या डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियम को विश्वास में लेकर डिस्ट्रिक्ट फंड से उन खर्चों को पूरा करना चाहिए था - यह पैसे सचमुच में यदि वापस हो जाने थे, तब फिर इन दोनों विकल्पों का इस्तेमाल करने की बजाए कोर टीम के सदस्यों से पैसे क्यों लिए गए ? डिस्ट्रिक्ट में चूँकि अधिकतर लोगों को रवि चौधरी के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर असित मित्तल के साथ हुए लेनदेन तथा उसके ऑफ्टर इफेक्ट्स की जानकारी है, इसलिए पेम वन के आयोजन के शुरुआती खर्चों को पूरा करने के नाम पर लिए गए पैसों को विवाद छिड़ने के बाद उधार बताने के तर्क को हजम कर पाना लोगों के लिए मुश्किल हो रहा है । दरअसल यह विवाद शुरू ही इस कारण से हुआ - क्योंकि पेम वन के शुरुआती खर्चों को पूरा करने के नाम पर कोर टीम के जिन सदस्यों से एक एक लाख रुपए लिए गए, खुद उन्होंने ही मान लिया और लोगों के बीच कहना/बताना शुरू कर दिया कि उनसे तो उन्हें कोर टीम का सदस्य बनाने की कीमत ले ली गई है ।
रवि चौधरी के समर्थकों व शुभचिंतकों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों से पैसे लेने के आरोपों का तकनीकी आधार पर बचाव करते हुए दावा किया कि किसी भी उम्मीदवार से व्यक्तिगत रूप में कोई पैसा नहीं लिया गया है; उम्मीदवारों के क्लब्स ने पेम वन को स्पॉन्सर किया है । तकनीकी रूप से यह बात सही भी है । रोटरी में वास्तव में व्यक्ति का, व्यक्ति के रूप में रोटेरियन का कोई महत्त्व नहीं है; महत्त्व क्लब का है; इसलिए कोई भी काम व्यक्ति ही करते हैं, लेकिन वह होता है क्लब के नाम पर । इसी 'व्यवस्था' का फायदा उठा कर रवि चौधरी के समर्थक व शुभचिंतक रवि चौधरी को आरोपों से बचाने की कोशिश रहे हैं । उनकी इस कोशिश से हालाँकि कोई फायदा होता हुआ दिखा नहीं है, क्योंकि हर कोई इतनी सी बात समझता है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का 'इस वर्ष का' कोई भी उम्मीदवार और या उनका क्लब अगले रोटरी वर्ष के क्लब-अध्यक्षों के कार्यक्रम में 'बिना किसी दबाव' के पैसा भला क्यों खर्च करेगा ? जाहिर है कि रवि चौधरी ने यह जता/बता कर कि भले ही वह अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद पर होंगे - लेकिन वह इस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को भी प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं, इसलिए इस वर्ष के उम्मीदवारों को भी उन्हें गंभीरता से लेना होगा - उम्मीदवारों से उन्होंने स्पॉन्सरशिप जुटा ली । रवि चौधरी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी विनय भाटिया तथा पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स दीपक तलवार, सुशील खुराना, विनोद बंसल सहित अन्य कई प्रमुख रोटेरियंस के समर्थन का दावा करते हुए बताते हैं कि अगला डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी भी वही बनेगा - जिसे 'हम' समर्थन देंगे । इस तरह के दावों के बीच डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के इस बार के उम्मीदवार रवि चौधरी के कार्यक्रम पेम वन को स्पॉन्सर करने के लिए मजबूर हुए, जिसमें हालाँकि उनके लिए फजीहत की बात यह रही कि उन्हें कोई तवज्जो भी नहीं मिली । 
यहाँ इस तथ्य पर गौर करना प्रासंगिक होगा कि पिछले वर्ष तक पेम वन के आयोजन के लिए छह/आठ और ज्यादा से ज्यादा दस क्लब्स की स्पॉन्सरशिप काफी होती थी; रवि चौधरी ने लेकिन 19 क्लब्स की स्पॉन्सरशिप जुटाई । उनके समर्थकों व शुभचिंतकों का कहना है कि किसी काम को अच्छे से करने के लिए पैसे तो ज्यादा लगते ही हैं । कुछेक लोगों को यह तर्क उस तर्ज का लगता है, जो अक्सर ही अख़बारों में पढ़ने को मिलता है - जिसके अनुसार गर्लफ्रेंड्स को महँगे गिफ्ट देने की व्यवस्था करने के लिए लड़कों को झपटमारी, चोरी और लूट करने के लिए 'मजबूर' होना पड़ता है । रवि चौधरी के समर्थकों व शुभचिंतकों के तर्क सुन कर लोगों का कहना रहा कि अपने आयोजनों को पहले तो महँगा करने/बनाने और फिर उसके लिए खर्चा जुटाने के लिए रवि चौधरी यदि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों पर दबाव बनायेंगे और चुनावी गिरोहबाजी करेंगे, तो यह डिस्ट्रिक्ट के लिए बहुत ही आत्मघाती होगा । इस तरह की हरकतों के चलते पिछले रोटरी वर्ष में ही डिस्ट्रिक्ट ने बड़ी बदनामी कमाई है । अभी पिछले सप्ताह ही इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई ने डिस्ट्रिक्ट में राजनीति करने वाले रोटेरियंस के लिए एक बड़ा कर्रा सा पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने साफ शब्दों में चेतावनी दी है - उसके बावजूद डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में रवि चौधरी ने चुनावी राजनीति की आड़ में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों से जेब ढीली करवा ली है । जाहिर है कि मनोज देसाई की चेतावनी को रवि चौधरी गीदड़ भभकी समझ रहे हैं, और चेतावनी की उन्हें कोई परवाह नहीं है ।

Saturday, September 10, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में रोटरी क्लब गाजियाबाद नॉर्थ में मचे बबाल ने आलोक गर्ग के साथ-साथ अशोक जैन की उम्मीदवारी के अभियान के लिए भी मुसीबत खड़ी कर दी है

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार अशोक जैन की मीटिंग के आयोजनकर्ता की भूमिका निभाने के कारण आलोक गर्ग अपने ही क्लब - रोटरी क्लब गाजियाबाद नॉर्थ में मुसीबत में फँस गए हैं । क्लब के पदाधिकारियों व वरिष्ठ सदस्यों ने इस बात पर नाराजगी और क्षोभ व्यक्त किया है कि उन्हें पूरी तरह से अँधेरे में रख कर आलोक गर्ग ने जिस तरह की सक्रियता के साथ अशोक जैन की उम्मीदवारी के प्रमोशन हेतु शहर के एक होटल में मीटिंग आयोजित की, वह सीधे सीधे क्लब की पहचान व प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ करना है और क्लब को धोखा देना है । आलोक गर्ग को संकेत दे दिया गया है कि इस तरह का काम उन्होंने यदि दोबारा किया, तो उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी - जिसके तहत क्लब से उनका निष्कासन भी हो सकता है । आलोक गर्ग ने हालाँकि यह तर्क देते हुए अपना बचाव करने की कोशिश की कि उन्होंने जो कुछ भी किया, वह व्यक्तिगत हैसियत में किया और कहीं भी क्लब का नाम इस्तेमाल नहीं किया । उनका कहना रहा कि रोटरी और डिस्ट्रिक्ट को प्रभावित करने वाले किसी भी काम में व्यक्तिगत रूप में शामिल होने का उन्हें पूरा अधिकार है, और इसके लिए क्लब के पदाधिकारियों से अनुमति लेने की और उन्हें सूचित करने की कोई जरूरत नहीं है । आलोक गर्ग ने शिकायती अंदाज़ में यह भी कहा कि क्लब के दूसरे वरिष्ठ सदस्य भी मनमाने तरीके से और क्लब के पदाधिकारियों की अनुमति लिए बिना अपनी अपनी 'राजनीति' करते ही हैं, ऐसे में आखिर सिर्फ़ उन्हें ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है ?
आलोक गर्ग की इन बातों ने मामले को और भड़का दिया है । क्लब के पदाधिकारियों व वरिष्ठ सदस्यों ने साफ कह दिया है कि व्यक्तिगत अधिकार के नाम पर किसी को भी निर्णायक और/या 'निर्णायक-से दिखते' काम करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता है । उनका कहना है कि रोटरी और डिस्ट्रिक्ट को प्रभावित करने वाले किसी काम को लेकर क्लब का कौन सदस्य क्या सोच रखता है, या डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के संदर्भ में सदस्य की क्या राय या पसंद है - इससे क्लब को कोई मतलब नहीं है; क्लब का कौन सदस्य किस राजनीति के साथ है, किससे मिलता/जुलता है, किसके साथ उठता/बैठता है, क्या बात करता है - इससे क्लब को कोई मतलब नहीं है; लेकिन किसी भी काम में निर्णायक और/या 'निर्णायक-से दिखते' रवैए को अपनाने का अधिकार किसी भी सदस्य को नहीं दिया जा सकता है । क्लब के वरिष्ठ सदस्यों पर मनमाने तरीके से और क्लब के पदाधिकारियों की अनुमति लिए बिना 'राजनीति' करने का आलोक गर्ग ने जो आरोप लगाया है, क्लब के पदाधिकारियों ने उसे बहुत गंभीरता से लिया है और आलोक गर्ग से पूछा है कि जिस तरह की भूमिका उन्होंने अशोक जैन की मीटिंग को लेकर निभाई है, वैसी भूमिका क्लब के किस सदस्य ने किस संदर्भ में कब कहाँ निभाई है ? क्लब के पदाधिकारियों की तरफ से आलोक गर्ग को बता दिया गया है कि दूसरों पर झूठा आरोप लगा कर, अपने पर लगे आरोप से बचने की उनकी कोशिश सफल नहीं हो पाएगी ।
क्लब के पदाधिकारियों व वरिष्ठ सदस्यों के कड़े रवैए के चलते आलोक गर्ग क्लब में पूरी तरह अलग-थलग पड़ गए हैं, और अन्य कोई सदस्य उनका बचाव करता हुआ नहीं दिख रहा है । क्लब में जिन्हें आलोक गर्ग के नजदीकियों के रूप में देखा/पहचाना भी जाता है, उनका भी मानना और कहना है कि आलोक गर्ग को अशोक जैन की उम्मीदवारी के प्रमोशन के संबंध में होने वाली मीटिंग की इस तरह खुल्लमखुल्ला जिम्मेदारी नहीं लेनी/निभानी चाहिए थी; आलोक गर्ग को समझना चाहिए कि रोटरी क्लब गाजियाबाद नॉर्थ की डिस्ट्रिक्ट में एक खास पहचान और प्रतिष्ठा है - अपनी राजनीति के चलते आलोक गर्ग को क्लब की इस पहचान व प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ करते हुए उसे दाँव पर लगाने का कोई काम नहीं करना चाहिए । क्लब के सदस्यों का कहना है कि आलोक गर्ग को राजनीति करना है और अशोक जैन की उम्मीदवारी को प्रमोट करना है, तो जरूर करें और खूब करें - लेकिन ऐसी होशियारी से करें कि अशोक जैन की उम्मीदवारी के लिए समर्थन  भी बढ़े और क्लब की पहचान व प्रतिष्ठा पर भी आँच न आए । क्लब के लोगों ने ही बताया कि क्लब के कुछेक सदस्य दीपक गुप्ता की तो अन्य कुछेक लोग ललित खन्ना की उम्मीदवारी के समर्थन की बातें करते ही हैं, लेकिन कोई भी आलोक गर्ग की तरह अपने समर्थन वाले उम्मीदवार का झंडा नहीं उठाए हुए है - और आलोक गर्ग की तरह क्लब को बदनाम नहीं करवा रहा है ।
आलोक गर्ग पर आरोप है कि अभी हाल ही में गाजियाबाद के एक होटल में अशोक जैन की उम्मीदवारी के लिए 'लाइक मांइडेड' लोगों को 'चार्ज' करने के उद्देश्य से आयोजित हुई मीटिंग के निमंत्रण उन्होंने दिए । उल्लेखनीय है कि कुछेक लोगों को मीटिंग का निमंत्रण अशोक जैन की तरफ से तो मिला ही, आलोक गर्ग की तरफ से यह कहते हुए भी उन्हें निमंत्रण मिला कि 'लाइक माइंडेड' लोग तथा कोर टीम के लोग अशोक जैन की उम्मीदवारी को समर्थन दिलवाने के तरीकों पर विचार करेंगे । मीटिंग को संयोजित करने का काम भी आलोक गर्ग ही कर रहे थे । मीटिंग में किसी ने चुटकी लेते हुए आलोक गर्ग से पूछा भी कि क्या वह अपने क्लब का वोट अशोक जैन को दिलवा सकेंगे ? प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, आलोक गर्ग ने अपने जबाव में विश्वास बनाने की कोशिश करते हुए कहा कि जब मैं अशोक जैन के साथ हूँ, तो समझिए कि मेरा क्लब भी उनके साथ है । आलोक गर्ग की इस सक्रियता और इस तरह की बातों की जानकारी जब उनके क्लब के पदाधिकारियों तथा वरिष्ठ सदस्यों को लगी, तो उनके बीच नाराजगी पैदा हुई । उनका कहना है कि क्लब में बात और फैसला हुए बिना आलोक गर्ग चुनावी राजनीति में अपनी सक्रियता तथा अपनी बातों से क्लब को जिस तरह एक पक्ष की तरफ 'दिखाने' की कोशिश कर रहे हैं, उसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा । आलोक गर्ग की भूमिका को लेकर रोटरी क्लब गाजियाबाद नॉर्थ में जो बबाल मचा है, उसने आलोक गर्ग के साथ-साथ अशोक जैन की उम्मीदवारी के अभियान के लिए भी बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है ।

Thursday, September 8, 2016

तो क्या सचमुच में रोटरी इंटरनेशनल के मौजूद डायरेक्टर मनोज देसाई ने अशोक गुप्ता और कमल सांघवी को अगले इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवाने की जिम्मेदारी ले ली है ?

नई दिल्ली । दुबई में 16 से 18 दिसंबर के बीच हो रहे साऊथ एशिया जोन इंस्टीट्यूट के आयोजन में भूमिका निभाने वाले पदाधिकारियों की सूची का यदि कोई 'राजनीतिक मतलब' सचमुच होता है, तो माना जाना चाहिए कि इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई ने अगले रोटरी वर्ष में होने वाले इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनावों में अशोक गुप्ता और कमल सांघवी की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है । उल्लेखनीय है कि अशोक गुप्ता जोन 4 से तथा कमल सांघवी जोन 6 ए से इंटरनेशनल डायरेक्टर चुने जाने के लिए कमर कस चुके हैं । दुबई इंस्टीट्यूट के कन्वेनर के रूप में मनोज देसाई ने इन दोनों को कोर कमेटी में काउंसलर का पद तो दिया ही है, कुछेक और कमेटियों में भी इन्हें जगह दी है । मनोज देसाई ने अशोक गुप्ता पर कुछ ज्यादा ही मेहरबानी बरसाई है : उन्होंने अशोक गुप्ता को तो कई जगहें दी ही हैं, उनके 'आदमी' के रूप में पहचाने जाने वाले अजय काला, रत्नेश कश्यप, आशीष देसाई को भी विभिन्न कमेटियों में सटाया है । सिर्फ इतना ही नहीं, अशोक गुप्ता के दबाव में मनोज देसाई को अनिल अग्रवाल को कमेटियों से बाहर रखने के लिए मजबूर तक होना पड़ा । अशोक गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट के ही पूर्व गवर्नर अनिल अग्रवाल ने पिछले महीनों में रोटरी इंडिया लिटरेसी मिशन में बहुत ही बढ़-चढ़ कर काम किया है, और इस कारण से वह जोन 4 के डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों के बीच तो खासतौर से पहचाने जाते हैं । रोटेरियंस के बीच उनकी पहचान अजय काला, रत्नेश कश्यप, आशीष देसाई से तो बहुत बहुत ज्यादा है - इन तीनों से वह बस एक ही बात में पिछड़े हुए हैं, वह अशोक गुप्ता के 'मैन फ्राइडे' नहीं बन पाए; और इस कारण से वह अशोक गुप्ता को फूटी आँख भी नहीं सुहाते हैं । मनोज देसाई ने किसी किसी से कहा भी कि वह तो अनिल अग्रवाल को इंस्टीट्यूट की किसी कमेटी में रखना चाहते थे, किंतु अशोक गुप्ता के विरोध को देखते हुए फिर उन्होंने अपना विचार त्याग दिया ।
कमल सांघवी अपने 'आदमियों' को तो कमेटियों में जगह नहीं दिलवा सके - हालाँकि इस बात को वह यह कहते हुए अनदेखा करने की कोशिश कर रहे हैं कि कमेटियों में जो लोग हैं, वह सब उन्हीं के तो 'आदमी' हैं - किंतु कमल सांघवी पर मनोज देसाई ने एक अलग तरीके से मेहरबानी की है । जोन 6 ए में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए कमल सांघवी के जो संभावित प्रतिद्धंद्धी हैं, मनोज देसाई ने उन्हें कमेटियों से दूर ही रखा है । इससे कमल सांघवी को अपने मतदाताओं को यह समझाना आसान होगा कि जो लोग इंस्टीट्यूट जैसे महत्त्वपूर्ण आयोजन की करीब 170 सदस्यीय टीम में जगह नहीं बना सके, वह इंटरनेशनल डायरेक्टर कैसे बनेंगे ? अशोक गुप्ता को यह 'सुविधा' नहीं मिल पाई है । उनके संभावित प्रतिद्धंद्धियों के रूप में देखे/पहचाने जा रहे भरत पांड्या और रंजन ढींगरा को कमेटियों में जगह मिली है - रंजन ढींगरा को तो कई जगहों के साथ-साथ 28 सदस्यीय कोर टीम में भी जगह मिली है ।
दुबई इंस्टीट्यूट के लिए टीम गठित करने में मनोज देसाई ने सबसे बड़ा झटका मुकेश अरनेजा को दिया है । पिछले चौदह महीने से, जबसे मनोज देसाई ने इंटरनेशनल डायरेक्टर का पदभार संभाला है - डिस्ट्रिक्ट 3012 के पूर्व गवर्नर मुकेश अरनेजा उनके साथ अपनी नजदीकी का बख़ान करते रहे हैं, किंतु अब वह मनोज देसाई को कोसते हुए सुने जा रहे हैं । यह स्वाभाविक भी है । मनोज देसाई ने जिस बेरहमी के साथ मुकेश अरनेजा को दूध में पड़ी मक्खी की तरह अपनी गुड बुक से निकाल बाहर फेंका है, वह मुकेश अरनेजा के लिए भारी फजीहत की बात है । उनकी फजीहत इस कारण से भी है, क्योंकि आजकल डिस्ट्रिक्ट में उनके चिर प्रतिद्धंद्धी के रूप में देखे/पहचाने जा रहे रमेश अग्रवाल को इंस्टीट्यूट की टीम में जगह मिली है । मुकेश अरनेजा के लिए इससे भी ज्यादा शर्मनाक बात यह हुई है कि जिन निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ को वह कुछ समझते ही नहीं हैं और जिन पर कुछेक अहसान करने उन्हें अपनी 'तरफ' करने की कोशिशों में लगे हैं, उन जेके गौड़ तक को इंस्टीट्यूट टीम में जगह मिल गई है । मुकेश अरनेजा दावा करते रहे हैं कि नोमीनेटिंग कमेटी के अत्यंत सक्रिय सदस्य के रूप में उन्होंने मनोज देसाई को इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनने/चुनवाने में जो भूमिका निभाई थी, मनोज देसाई उसके लिए उनका बहुत अहसान मानते हैं, और उनके काम आते हैं । मुकेश अरनेजा लेकिन अब मनोज देसाई को अहसान फरामोश की उपाधि देते फिर रहे हैं । समझा जाता है कि पिछले दिनों ही मुकेश अरनेजा ने अपने क्लब में वरिष्ठ पदाधिकारियों व सदस्यों के साथ जिस तरह की ब्लैकमेलिंग करने की कोशिश की, और जिससे पैदा हुए विवाद के कारण वह अंततः क्लब से निकल भागने के लिए मजबूर हुए - उससे मुकेश अरनेजा की रोटरी समुदाय में बहुत ही बदनामी हुई है, जो अभी तक की उनकी बदनामी पर काफी भारी पड़ी है । मुकेश अरनेजा की इस नई हरकतपूर्ण बदनामी को देखते हुए ही मनोज देसाई ने उन्हें इंस्टीट्यूट की टीम से बाहर रखने में ही अपनी भलाई देखी है ।
दुबई इंस्टीट्यूट के लिए गठित टीम की सूची विनोद बंसल के लिए भी खतरे की घंटी बजाती हुई सी लगती है । इंस्टीट्यूट टीम में डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व गवर्नर विनोद बंसल को एक कमेटी में हालाँकि को-चेयरमैनी तो मिली है - लेकिन इस पद को रोटरी में उनकी सक्रियता, पहचान व प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं देखा/पहचाना जा रहा है । को-चेयरमैनी तो एक अन्य कमेटी में जेके गौड़ को भी मिली है - जो रोटरी में सक्रियता, पहचान व प्रतिष्ठा के मामले में उनके सामने कहीं नहीं ठहरते हैं । विनोद बंसल के मनोज देसाई के साथ अच्छे संबंध भी देखे/समझे जाते हैं; इसलिए भी किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल हो रहा है कि मनोज देसाई की टीम में विनोद बंसल को उनकी उचित जगह आखिर क्यों नहीं मिली ? ऐसे में, विनोद बंसल के साथ हुई इस नाइंसाफी को पिछले रोटरी वर्ष में रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड द्धारा उन्हें 'चुनावी अपराधी' घोषित करने के फैसले के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है । रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड का उक्त फैसला लगता है कि अभी विनोद बंसल का पीछा नहीं छोड़ रहा है, और उन्हें अभी वह और परेशान करेगा । दुबई इंस्टीट्यूट की टीम में विनोद बंसल के साथ जो नाइंसाफी हुई है, उसका असर इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता के लिए होने वाले चुनाव में उनकी उम्मीदवारी पर भी पड़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है । उक्त पद के लिए विनोद बंसल का मुकाबला मंजीत साहनी से होने की संभावना दिख रही है । मंजीत साहनी को मनोज देसाई ने दुबई इंस्टीट्यूट के लिए डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर्स ट्रेनिंग सेमीनार कमेटी का काउंसलर बनाया है । जाहिर तौर पर इसमें डिस्ट्रिक्ट के लोगों के लिए मंजीत साहनी के पक्ष में एक इशारा छिपा है, जो विनोद बंसल के लिए चुनावी मुकाबले को थोड़ा चुनौतीपूर्ण तो बनाता ही है ।
दुबई इंस्टीट्यूट के लिए गठित टीम में मनोज देसाई की मेहरबानियों की वास्तविक बारिश लेकिन डिस्ट्रिक्ट 3131 के अभय गाडगिल पर हुई है । अभय गाडगिल हैं तो अभी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट - लेकिन उन्हें दुबई इंस्टीट्यूट की कोर कमेटी में जगह मिलने के साथ-साथ ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी जैसा प्रमुख पद भी मिला है । सिर्फ इतना ही नहीं, उनकी पत्नी दीपा गाडगिल को भी शर्मिष्ठा देसाई के नेतृत्व वाली सात सदस्यीय स्पाउस प्रोग्राम कमेटी में जगह मिली है । इस तरह मनोज देसाई ने अभय गाडगिल को रोटरी इंटरनेशनल के साऊथ एशिया जोन के रोटेरियंस के बीच बड़ी ऊँचाई पर प्रतिष्ठित करने का काम तो कर दिया है - पर अभय गाडगिल इस ऊँचाई पर बने/टिके रहेंगे, यह देखने की बात होगी ।

Wednesday, September 7, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 की चुनावी राजनीति में मुकेश अरनेजा व रमेश अग्रवाल को अप्रासंगिक बना देने की रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ की कोशिशें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को भी प्रभावित करेंगी क्या ?

नई दिल्ली । रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ ने सीओएल तथा इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता के लिए फार्मूला प्रस्तुत करके मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की राजनीति को तो ठिकाने लगाने का इंतजाम कर ही दिया है, साथ ही साथ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी समीकरणों को भी प्रभावित करने के लिए जाल बिछाया है । रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के लोगों ने उक्त दोनों पदों के लिए काउंसिल और गवर्नर्स में वरिष्ठता के आधार पर चयन करने का फार्मूला सुझाया है । यह फार्मूला सुझाते हुए तर्क दिया गया है कि उक्त दोनों पद महत्त्वपूर्ण पद हैं, इसलिए इन पदों के चयन के लिए अपनाई गई प्रक्रिया पर रोटरी इंटरनेशनल के बड़े और प्रमुख पदाधिकारियों व नेताओं की निगाह रहती है - इस कारण से इन पदों के चयन को लेकर कोई राजनीति यदि नहीं होगी, तो यह डिस्ट्रिक्ट की पहचान व प्रतिष्ठा के लिए अच्छा होगा । काउंसिल ऑफ गवर्नर्स में वरिष्ठता के आधार पर उक्त दोनों पदों के लिए चयन होने के फार्मूले को यदि स्वीकार कर लिया जाता है, तो उससे डिस्ट्रिक्ट की पहचान और प्रतिष्ठा भले ही बढ़े - लेकिन मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की राजनीति तो पूरी तरह चौपट हो जाएगी । इन दोनों की निगाह इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता पर है; किंतु वरिष्ठता के अनुसार फैसला होने पर इनका नंबर तो आएगा ही नहीं - और किसी को सीओएल के लिए चुनवा कर अपनी चौधराहट दिखाने का मौका भी इन्हें नहीं मिल पाएगा । वरिष्ठता के आधार पर फैसला हुआ तो एमएल अग्रवाल, एसपी सचदेवा, एसपी मैनी, केके गुप्ता और रूपक जैन के बीच ही उक्त दोनों पद बँट जायेंगे और मुकेश अरनेजा व रमेश अग्रवाल के हाथ में सिर्फ झुनझुना ही बचा रह जाएगा । यदि सचमुच ऐसा हो सका, तो यह 'घटना' डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में मुकेश अरनेजा व रमेश अग्रवाल के अप्रासंगिक होने/पड़ने की शुरुआत का 'उद्घाटन' करेगी ।
उम्मीद है कि मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल इस फार्मूले का विरोध करेंगे और इसे कामयाब नहीं होने देंगे । समस्या उनके सामने लेकिन यह है कि फिर वह करेंगे क्या ? उनके पास कोई विकल्प भी नहीं है । ग्यारह सदस्यीय काउंसिल ऑफ गवर्नर्स में दोनों बुरी तरह से अल्पमत में हैं । मुकेश अरनेजा को रूपक जैन और सतीश सिंघल का समर्थन मिल सकता है; जबकि रमेश अग्रवाल के पास सिर्फ शरत जैन और सुभाष जैन का समर्थन है । एमएल अग्रवाल और केके गुप्ता इन दोनों के ही पूरी तरह खिलाफ हैं । यूँ यह हैं दो ही - लेकिन किसी एक तरफ होकर दूसरे का खेल तो यह बिगाड़ ही सकते हैं । ऐसे में एसपी सचदेवा, एसपी मैनी और जेके गौड़ में से किसी को फुसला/ललचा कर यदि अपने साथ कर भी लेते हैं - तो उससे भी काम तो बनता नहीं है । यह काम बनाने की सोचें भी, तो उसका जबाव भी रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ की तरफ से दिया गया है : वरिष्ठता वाला फार्मूला क्रियान्वित न हो पाने की स्थिति में उन्होंने सुझाव रखा है कि बाकी सभी पूर्व गवर्नर्स तो किसी न किसी रूप में डिस्ट्रिक्ट का प्रतिनिधित्व कर ही चुके हैं, इसलिए अब की बार उक्त दोनों पद रूपक जैन और जेके गौड़ के बीच ही तय कर दिए जाएँ । यह सुझाव मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल की राजनीति के लिए और भी ज्यादा खतरनाक है । उक्त दोनों पद यदि रूपक जैन और जेके गौड़ को मिल जाते हैं - और बिना मुकेश अरनेजा व रमेश अग्रवाल के 'समर्थन' के मिल जाते हैं, तो यह बात तो मुकेश अरनेजा व रमेश अग्रवाल की राजनीति के लिए बिलकुल ही डूब मरने वाली बात होगी ।
समझा जाता है कि यह सुझाव रूपक जैन और जेके गौड़ को भी पसंद आ रहा है । रूपक जैन की समस्या यह है कि रोटरी में उनका 'कद' मुकेश अरनेजा से बहुत बड़ा है, लेकिन डिस्ट्रिक्ट में उनकी पहचान मुकेश अरनेजा के 'आदमी' की है । रूपक जैन, मुकेश अरनेजा से ग्यारह वर्ष पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बने थे; पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के साथ उनके बहुत ही नजदीकी और विश्वास के संबंध हैं - लेकिन फिर भी डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच उन्हें मुकेश अरनेजा के पिछलग्गू के रूप में देखा/पहचाना जाता है । इस बार उन्हें मौका मिलता दिख रहा है कि वह अपने ऊपर लगे मुकेश अरनेजा के 'आदमी' के टैग को उतार फेंक सके । जेके गौड़ का मामला तो और भी संगीन व दिलचस्प है : यूँ तो वह रमेश अग्रवाल के खेमे में माने/देखे जाते हैं; लेकिन रमेश अग्रवाल और शरत जैन उन्हें अपमानित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं । जेके गौड़ की बदकिस्मती यह है कि इस स्थिति का लाभ उठाने की कोशिश करते हुए मुकेश अरनेजा और उनके समर्थक भी उन्हें अपनी तरफ मिलाने और उन्हें तवज्जो देने का कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं - बल्कि जहाँ मौका दिखता है, वहाँ बेइज्जत और कर देते हैं । रोटरी क्लब गाजियाबाद सफायर के अधिष्ठापन समारोह में जेके गौड़ को दोनों खेमों के लोगों ने एकसाथ मिलकर ऐसा 'धोया' था, कि जेके गौड़ को कार्यक्रम के बीच से ही निकल भागने के लिए मजबूर होना पड़ा था । मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल ही नहीं, बल्कि उनके समर्थक लोगों ने भी जेके गौड़ को गरीब की ऐसी बछिया समझा हुआ है, कि कोई भी कहीं भी कभी भी उन्हें हुँकार देता है । ऐसा इसलिए है, क्योंकि सभी को लगता है कि जेके गौड़ के बस की कुछ है नहीं, और  अपमानित होते हुए भी वह उनके साथ रहने को मजबूर होंगे । ऐसे में, रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ का सुझाव जेके गौड़ के मन में भी गुदगुदी कर रहा हो - तो कोई हैरानी की बात नहीं होगी ।
रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के लोगों के सुझावानुसार यदि मुकेश अरनेजा व रमेश अग्रवाल की 'छाया' से बाहर निकल कर रूपक जैन और जेके गौड़ उक्त दोनों पद पा लेते हैं, तो इसका सीधा असर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव पर पड़ेगा - और मुकेश अरनेजा के उम्मीदवार के रूप में दीपक गुप्ता को तथा रमेश अग्रवाल के उम्मीदवार के रूप में अशोक जैन को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा । यह सुझाव किसी और क्लब की तरफ से आता और सफल होता, तो कोई फर्क नहीं पड़ता; लेकिन रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ - जिसके वरिष्ठ सदस्य ललित खन्ना भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी दौड़ में हैं - की तरफ से आने के कारण यह सुझाव और इसकी संभावित सफलता डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई के समीकरणों पर निश्चित रूप से गुणात्मक असर डालेगी ही । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल के पास एक ही रास्ता बचता है, और वह रास्ता है - सीओएल तथा इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता के लिए सीधे चुनाव का रास्ता; इन दोनों पदों के लिए काउंसिल ऑफ गवर्नर्स में वह कोई फैसला होने ही न दें और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के साथ-साथ वह इन दोनों पदों के लिए भी चुनाव की स्थितियाँ पैदा करें ।
रमेश अग्रवाल पहले एक बार इस तरह का दुस्साहस कर मजा चख चुके हैं, और सीओएल के चुनाव में आशीष घोष से पराजित होकर अपनी फजीहत करवा चुके हैं - इसलिए उम्मीद है कि उस फजीहत को याद करते/रखते हुए वह दोबारा से उस तरह की हरकत नहीं करेंगे । मुकेश अरनेजा को भी डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच अपनी राजनीतिक 'हैसियत' का अंदाजा है; पिछले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में उनके उम्मीदवार दीपक गुप्ता को मिली करारी हार में उस 'हैसियत' का सुबूत भी उनके सामने है - इसलिए उम्मीद है कि वह भी चुनाव का रास्ता शायद ही अपनाना चाहें । इससे जाहिर है कि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में अपनी अहमियत और प्रासंगिकता बचाने/दिखाने के लिए मुकेश अरनेजा और रमेश अग्रवाल के पास वास्तव में कोई मौका/तरीका नहीं रह गया है; और इन्हें इस दशा में पहुँचाने का काम चूँकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार ललित खन्ना के क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ की तरफ से हुआ है, इसलिए इनकी यह दशा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी समीकरणों को भी प्रभावित करेगी ही । कैसे और कितना प्रभावित करेगी - यह आने वाले दिनों में पता चलेगा ।

Tuesday, September 6, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में विजय झालानी के साथ मिलकर तिकड़म लगाने की राकेश मक्कड़ की कोशिशों के बावजूद दीपक गर्ग के 'इस्तिफित चेयरमैन' बने रहने का रास्ता साफ होता नजर आ रहा है

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के 'इस्तिफित चेयरमैन' दीपक गर्ग के चेहरे पर वापस लौटी रौनक को देख कर लोगों ने अनुमान लगाया है कि उन्हें अपनी कुर्सी बचने का पूरा भरोसा हो गया है । समझा जाता है कि दीपक गर्ग के इस्तीफे से शुरू हुए नाटक की रूपरेखा तैयार करने वाले मुख्य सूत्रधार राजेश शर्मा को इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट देवराज रेड्डी के कड़े रवैए के कारण अपनी योजना समेटनी पड़ रही है, और मामले को 'जहाँ जो जैसा है उसे वहीं पड़ा रहने देने' के लिए मजबूर होना पड़ा है । राजेश शर्मा के पीछे हटने से पंकज पेरिवाल के चेयरमैन बनने की संभावना पर तो ग्रहण लग ही गया है, चेयरमैन बनने की जुगाड़ में लगे दूसरे लोगों को भी अपनी दाल गलती हुई नहीं दिख रही है - और इसलिए वह भी अपनी अपनी कोशिशों को विराम देते हुए नहीं लग रहे हैं । राकेश मक्कड़ को हालाँकि अभी भी उम्मीद लगाए 'उम्मीदवार' के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । दरअसल पिछले दिनों उन्हीं की तरफ से यह बात लोगों को सुनने को मिली थी कि वह अभी हाल ही में सेंट्रल काउंसिल में नोमिनेट हुए विजय झालानी को नौ सितंबर की मीटिंग में लायेंगे तथा सत्ता गिरोह के बहुमत को और बढ़ायेंगे । उस बात से तथा उनकी कुछेक दूसरी बातों से लोगों को लगता है कि विजय झालानी के जरिए वह कोई चक्कर चलाने की फ़िराक में हैं और प्रेसीडेंट के दबाव के बावजूद नया चेयरमैन चुनवाने के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं । राकेश मक्कड़ को लगता है कि प्रेसीडेंट के कोड़ा फटकारने के बाद चेयरमैन बनने/बनवाने वाले सारे सूरमा जब बिलों में दुबक गए हैं, तब सेंट्रल काउंसिल में नॉमिनेटेड सदस्य विजय झालानी की मदद से वह चेयरमैन पद पा सकते हैं ।
इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में विजय झालानी के नोमीनेट होने से इंस्टीट्यूट की राजनीति में और 'रंगीनियत' व रोचकता आ गई है । इंस्टीट्यूट की राजनीति में नोमिनेटेड सदस्यों की और या उनकी किसी भूमिका की कभी कोई चर्चा नहीं सुनी गई, किंतु विजय झालानी नोमीनेट होते ही चर्चा में आ गए हैं - इससे ही साबित है कि विजय झालानी की बात ही कुछ खास है । वर्ष 1999-2000 में नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन रह चुके विजय झालानी इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में काफी सक्रिय रहे हैं, और एनडी गुप्ता खेमे के 'आदमी' के रूप में पहचाने जाते हैं । सेंट्रल काउंसिल के पिछले तीनों चुनावों में उन्होंने एनडी गुप्ता के बेटे नवीन गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में जमकर काम किया था । अगले चुनाव में उन्हें एनडी गुप्ता खेमे के संभावित उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था । विजय झालानी ने लेकिन सामने के रास्ते से आने की बजाए चोरी-छिपे खिड़की के रास्ते से सेंट्रल काउंसिल में आने का फैसला किया, और आ पहुँचे । इसके लिए उन्हें अपने चार्टर्ड एकाउंटेंट रजिस्ट्रेशन को छोड़ने की जरूरत थी - जिसे छोड़ने में उन्होंने कोई हिचक नहीं दिखाई । यानि जिस प्रोफेशन से उन्हें नाम और पहचान मिली, उस प्रोफेशन की गवर्निंग बॉडी में पद पाने के लिए उन्होंने उस प्रोफेशन को ही लात मार देने में देर नहीं लगाई । यह कुछ थोड़े से तथ्य जानना इसलिए जरूरी हैं, ताकि इस बात को समझा जा सके कि नोमिनेटेड सदस्य होने के बावजूद सेंट्रल काउंसिल में विजय झालानी की मौजूदगी क्यों कुछ खास है ? खास होने के कारण ही विजय झालानी के सहारे राकेश मक्कड़ यदि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट के दबाव के बावजूद रीजनल काउंसिल के चेयरमैन बनने की तिकड़म लगा रहे हैं, तो यह बहुत स्वाभाविक सी बात है ।
विजय झालानी के साथ मिलकर राकेश मक्कड़ जो खिचड़ी पकाने की कोशिश कर रहे हैं, दीपक गर्ग और उनके नजदीकी उसे लेकिन गंभीरता से नहीं ले रहे हैं । दीपक गर्ग के नियमित संपर्क में रहने वाले लोगों में से उन कुछेक का, जिनसे बात हो सकी है, कहना है कि दीपक गर्ग के चेहरे पर वापस लौटी खुशी से संकेत मिल रहा है कि चेयरमैन पद से इस्तीफ़ा देने के बावजूद दीपक गर्ग को चेयरमैन पद पर बने रहने का भरोसा मिल गया है । राजेश शर्मा की योजना में पंक्चर हो जाने को दीपक गर्ग अपनी एक बड़ी जीत के रूप में देख रहे हैं । दीपक गर्ग के चेयरमैन बने रहने की 'स्थितियाँ' बनाए रखने के लिए जो फार्मूला अपनाए जाने की चर्चा है, उसके अनुसार नौ सितंबर को होने वाली मीटिंग में दीपक गर्ग के इस्तीफे पर विचार ही नहीं किया जाएगा : इस तरफ न इस्तीफ़ा अस्वीकार करने की जरूरत पड़ेगी, और न दीपक गर्ग के लिए इस्तीफ़ा वापस लेने की नौबत होगी; और इस्तीफ़ा देने के बावजूद दीपक गर्ग चेयरमैन पर बने रहेंगे । दीपक गर्ग ने इस्तीफ़ा देने के लिए पाँच पृष्ठों में जो कारण बताए हैं, उन्हें देखते हुए तो दीपक गर्ग को चेयरमैन पद पर एक भी दिन बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है; लेकिन जहाँ पद पाने के लिए लोग ईमान और प्रोफेशन छोड़ने को तैयार बैठे हों, वहाँ दीपक गर्ग को नैतिकता की परवाह करने की जरूरत ही क्या है ?
राजेश शर्मा द्धारा संयोजित और निर्देशित नाटक को फेल करने के लिए इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट द्धारा जो फार्मूला बताया गया है, उसे नौ सितंबर की मीटिंग में यदि सफलतापूर्वक अपना लिया जाता है; और दीपक गर्ग के चेयरमैन पद पर बने रहने का रास्ता यदि साफ हो जाता है तो चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट में एक नया पद देखने को मिलेगा : इंस्टीट्यूट में चेयरमैन अभी तक दो ही तरह के हैं - एक 'चेयरमैन' और दूसरा 'भूतपूर्व चेयरमैन'; दीपक गर्ग लेकिन तीसरी तरह के चेयरमैन होंगे - 'इस्तिफित चेयरमैन' यानि इस्तीफ़ा देने के बावजूद बना रहने वाला चेयरमैन । इंस्टीट्यूट के इतिहास में ऐसा चेयरमैन पहली बार देखने को मिलेगा ।

Saturday, September 3, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 एफ में अधिष्ठापन समारोह के प्रभावी तरीके से हो जाने के कारण योगेश सोनी की बनी धाक ने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की चुनावी लड़ाई में विनय गर्ग और अनिल तुल्सियान के सामने मुश्किल खड़ी की

लुधियाना । डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह में जिस तरह से लायंस पदाधिकारियों तथा आम सदस्यों की भीड़ जुटी और समारोह में उपस्थित हुए लोगों ने समारोह की व्यवस्था की जैसी भूरि भूरि प्रशंसा की - उसके चलते डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में योगेश सोनी को अपने डिस्ट्रिक्ट में भी और दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों से भी काफी तारीफ सुनने को मिली है । मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 के विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारियों के बीच तथा उनके जरिए योगेश सोनी को मिल रही इस तारीफ ने लेकिन मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की चुनावी लड़ाई की अभी तक दबी-छुपी सी सुलग रही आग को भड़काने का काम किया है । डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह को गरिमापूर्ण तथा प्रभावी तरीके से संपन्न कर लेने के कारण योगेश सोनी को मल्टीपल के प्रमुख लोगों के बीच जो तारीफ मिल रही है, उसके कारण मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए उनके 'भाव' अचानक से बढ़े हुए 'दिखने' लगे हैं । यह सीन 'बनने' का कारण दरअसल यह रहा कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए अन्य जिन दो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर - विनय गर्ग और अनिल तुल्सियान का नाम सुना जा रहा है, उन दोनों को अपने अपने डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह के कारण भारी फजीहत का सामना करना पड़ रहा है । उल्लेखनीय है कि लायनिज्म में डिस्ट्रिक्ट का अधिष्ठापन समारोह पहला ऐसा कार्यक्रम होता है, जिसमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की लीडरशिप क्वालिटी और संगठन क्षमता की परीक्षा होती है; ऐसे में डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह की सफलता/असफलता से ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की 'काबिलियत' का संकेत मिलता है । काबिलियत दिखाने के इस मौके का 'वह' डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अच्छे से फायदा उठाते हैं, जो मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की दौड़ में अपने आप को 'दिखाना' चाहते हैं । मौजूद लायन वर्ष में मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए अभी तक विनय गर्ग, अनिल तुल्सियान और योगेश सोनी के नाम चर्चा में हैं - इसलिए मल्टीपल के लोगों की इनके डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोहों पर खास निगाह रही है ।
डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय गर्ग के लिए मुसीबत की बात यह हुई कि उनके डिस्ट्रिक्ट का अधिष्ठापन समारोह - होने से पहले ही विवादों व आरोपों के घेरे में फँस गया । विनय गर्ग के नजदीकियों का ही कहना है कि डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह को दुबई में करने का फैसला करके विनय गर्ग ने खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली । दुबई में अधिष्ठापन समारोह की तैयारी करने के कारण विनय गर्ग को लायनिज्म में अधिष्ठापन समारोह के महत्त्व तथा उसके बुनियादी उद्देश्य की ही ऐसीतैसी करने के आरोप का सामना करना पड़ा । दुबई के तुलनात्मक रूप से महँगे दिखने वाले पैकेज के कारण उन पर पैसे बनाने के आरोप लगे; कोढ़ में खाज वाली बात यह हुई कि दुबई की बुकिंग के लक्ष्य को पूरा करने के लिए उन पर सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार यशपाल अरोड़ा सहित अन्य कुछेक लोगों पर दबाव बनाने के आरोप लगे । इतने गंभीर आरोपों के चलते पैदा हुए विवाद में डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह को लेकर बनने वाला उत्साह ख़त्म सा ही हो गया है, और उसमें अब सिर्फ तमाशेबाजों की तथा लायनिज्म को तफ़रीह का अड्डा समझने वालों की ही दिलचस्पी बची रह गई नजर आ रही है । डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन जैसे महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम की इस फजीहत के लिए विनय गर्ग को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है । उनके नजदीकियों का ही मानना और कहना है कि विनय गर्ग लायनिज्म जैसे महत्त्वपूर्ण अभियान को जिस हल्केपन से ले रहे हैं, उसका ही नतीजा है कि उनके डिस्ट्रिक्ट का अधिष्ठापन समारोह सबसे ज्यादा महँगा/खर्चीला और - अगर माना जाए तो - ग्लैमरस होने के बावजूद सबसे ज्यादा फजीहत का शिकार हुआ है; और यह विनय गर्ग की लीडरशिप क्वालिटी को संदेहास्पद बनाता है ।
डिस्ट्रिक्ट 321 ई के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनिल तुल्सियान की कहानी और भी विचित्र है : हालाँकि अपने डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह को बहुत ही प्रभावी बनाने के लिए उन्होंने वास्तव में कल्पनाशील और रचनात्मक दिमाग लगाया था । इसे साबित करने के लिए एक ही उदाहरण देना काफी होगा : और वह यह कि उन्होंने महीनों पहले ही अधिष्ठापन समारोह की मंच सज्जा की रूपरेखा तैयार कर ली थी, मंच पर बैठने वाले लोगों के लिए ड्रेस कोड सोच लिया था और ड्रेस कोड का कपड़ा अपनी तरफ से मंच के लोगों को उपलब्ध करवा दिया था - ताकि वह समय रहते अपनी नाप की ड्रेस सिलवा लें । इस एक उदाहरण से जाहिर है कि डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह को लेकर अनिल तुल्सियान की सोच, योजना और तैयारी कितनी परफेक्ट थी । लेकिन अधिष्ठापन समारोह का दिन नजदीक आते-आते पता नहीं उनका दिमाग खुद पलटा और या उन्हें किसी ने उकसाया - कि निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रकाश जी अग्रवाल को नीचा दिखाने को ही उन्होंने अपना मुख्य उद्देश्य बना लिया । इसके चलते जो हालात बने, वह अधिष्ठापन समारोह में मुख्य अतिथि नरेश अग्रवाल के वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अपमानित करने वाले रवैये में प्रकट हुए - और अधिष्ठापन समारोह की सारी तैयारी तथा भव्यता बर्बाद हो गई । वाराणसी में नरेश अग्रवाल का जो रवैया लोगों को देखने को मिला, उसने लायनिज्म की महान परंपरा और प्रतिष्ठा को तो तार-तार किया ही, नरेश अग्रवाल का भी वास्तविक रूप लोगों को 'दिखाया' - और अनिल तुल्सियान के कार्यक्रम पर जो कालिख पोती, वह अलग । अनिल तुल्सियान और उनके नजदीकियों ने अधिष्ठापन समारोह को कीचड़ बना देने के लिए फर्स्ट इंटरनेशनल वाइस प्रेसीडेंट नरेश अग्रवाल को जिम्मेदार ठहराया, लेकिन अधिकतर लोगों का मानना और कहना यही रहा कि निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रकाश जी अग्रवाल के प्रति निजी खुन्नसबाजी में अनिल तुल्सियान ने अपने ही अधिष्ठापन समारोह को फजीहत का शिकार बना दिया । जो हुआ, उससे लोगों को यही संदेश मिला है कि बेशक अनिल तुल्सियान में काम अच्छे से कर लेने की तैयारी करने का हुनर है - लेकिन साथ साथ बनते हुए काम को अपनी ही हरकत से बिगाड़ लेने की अनोखी काबिलियत भी उनमें है; जिसके चलते उन पर भरोसा करना आत्मघाती भी हो सकता है ।
डिस्ट्रिक्ट 321 एफ में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर योगेश सोनी के लिए हालात चुनौतीपूर्ण हैं । पिछले लायन वर्ष में उनके डिस्ट्रिक्ट में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए खासा घमासानभरा चुनाव हुआ है, और इस वर्ष के लिए भी चुनावी रणभेरी बज चुकी है । जाहिर है कि डिस्ट्रिक्ट में जबर्दस्त खेमेबाजी है । स्वाभाविक रूप से योगेश सोनी को भी एक खेमे के सदस्य के रूप में देखा/पहचाना जाता है । इसी बिना पर उनके डिस्ट्रिक्ट में अधिष्ठापन समारोह पर संकट के गहरे बादलों को मंडराते/गरजते 'देखा' जा रहा था । उनके नजदीकियों व शुभचिंतकों के साथ-साथ, डिस्ट्रिक्ट के वरिष्ठ लायन सदस्यों को भी डिस्ट्रिक्ट के अधिष्ठापन समारोह को लेकर चिंता थी । उनकी चिंता यह देख/जान कर और बढ़ी थी कि इस वर्ष मल्टीपल के जिन भी डिस्ट्रिक्ट में अधिष्ठापन समारोह हुए हैं, सभी किसी न किसी कारण से आरोपों व विवादों के घेरे में रहे हैं : कहीं अव्यवस्था का प्रदर्शन था; कहीं डिस्ट्रिक्ट की खेमेबाज़ी अपना रंग दिखा रही थी; कहीं डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की अपनी खुन्नस और या प्रदर्शनप्रियता बबाल काटे/कटवाए हुए थी । डिस्ट्रिक्ट 321 एफ में तो बबाल होने के स्पष्ट कारण थे । लेकिन यहाँ अधिष्ठापन समारोह जिस शालीनता, लोगों की संलग्नता और भव्यता के साथ संपन्न हुआ - उसने हर किसी को वास्तव में चौंकाया । इस सफलता के लिए हर किसी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर योगेश सोनी को जिम्मेदार बताया । दरअसल योगेश सोनी ने अपने आप को किसी एक खेमे के नेता के तौर पर नहीं, बल्कि डिस्ट्रिक्ट के गवर्नर के तौर पर लोगों के बीच प्रस्तुत किया - और हर किसी को उचित सम्मान और तवज्जो दी । अधिष्ठापन समारोह में ज्यादा से ज्यादा लोगों की शिरकत को संभव बनाने के लिए योगेश सोनी ने खुद प्रयत्न किए । इसका उन्हें सुफल मिला - डिस्ट्रिक्ट के लोगों ने खेमेबाजी की हदों को तोड़ कर और पिछले लड़ाई-झगड़ों को भूल कर भारी रिकॉर्ड संख्या में अधिष्ठापन समारोह में अपनी अपनी भागीदारी को और अपनी संलग्नता को जाहिर किया । डिस्ट्रिक्ट 321 एफ में अधिष्ठापन समारोह अच्छे से संपन्न हो सका - इसमें यूँ तो बहुत से लोगों की भूमिका रही; किंतु लोगों की भूमिका को संभव करने तथा व्यवस्थित करने का श्रेय डिस्ट्रिक्ट गवर्नर योगेश सोनी को ही मिला ।
अधिष्ठापन समारोह को अच्छे से संपन्न कर/करा लेने के कारण मल्टीपल के पदाधिकारियों व नेताओं के बीच योगेश सोनी को जो प्रशंसा मिल रही है, और उनकी लीडरशिप क्षमता का लोहा जिस तरह से माना जा रहा है - उसके बावजूद मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की तरफ के रास्ते विनय गर्ग और अनिल तुल्सियान के लिए एकदम से बंद नहीं हो गए हैं । मल्टीपल की राजनीति में दखल रखने वाले नेताओं का कहना है कि इन दोनों में ही अच्छी एनर्जी है, और यह अभी हुए नुकसान की भरपाई कर सकते हैं - लेकिन इसके लिए इन्हें अपनी गलतियों से सबक सीखना होगा और आगे की अपनी योजनाओं को किंचित होशियारी के साथ लागू करना होगा । विनय गर्ग और अनिल तुल्सियान ऐसा कर पायेंगे या नहीं, और योगेश सोनी द्धारा प्रस्तुत की गई चुनौती से निपट सकेंगे या नहीं - यह देखना दिलचस्प होगा ।


Thursday, September 1, 2016

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रेसीडेंट देवराज रेड्डी नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के सत्ता गिरोह की मनमानी को रोकने में सचमुच सफल हो सकेंगे, और या गिरोह के लोगों की चालबाज़ियों का खुद ही शिकार हो जायेंगे ?

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रेसीडेंट देवराज रेड्डी ने नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन दीपक गर्ग के इस्तीफे से शुरू हुए 'नाटक' पर जो सख़्त रवैया अपनाया है, उससे नाटक के रचयिता और उसके कलाकारों के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है - और उन्हें अपना नाटक पिटता हुआ दिख रहा है । नाटक के कुछेक कलाकारों ने हालाँकि यह कहते हुए नाटक को अंजाम तक पहुँचाने का दावा तो किया है - कि नाटक की जब अच्छे से रिहर्सल हो चुकी है, नाटक के कलाकार अपनी अपनी भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं; और 'दर्शक' भी, चाहे खुशी से और चाहे मजबूरी से, नाटक देखने के लिए तैयार हैं - तो फिर हम नाटक को बीच में ही क्यों रोक दें ? लेकिन सुना जा रहा है कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट ने कोड़ा जोर से फटकारा है - और यह स्पष्ट कर दिया है कि वह नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल को ऐसी स्टेज नहीं बनने देंगे, जहाँ कोई भी मनमाने तरीके से कैसा भी नाटक खेल जाए । 'दर्शकों' को लेकिन निराश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि मामला जहाँ है - वहाँ नाटक तो होगा ही; देखने की बात सिर्फ यह है कि किसकी स्क्रिप्ट के अनुसार होगा ? नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा की स्क्रिप्ट के अनुसार शुरू हुए नाटक से पैदा हुए बबाल ने हालात तो ऐसे बना ही दिए हैं - कि अब यहाँ से आगे जो कुछ भी होगा, वह खासा नाटकीय और अभूतपूर्व होगा ।
राजेश शर्मा की स्क्रिप्ट को पसंद न करते हुए इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट देवराज रेड्डी ने नाटक के अगले दृश्य के लिए अपनी स्क्रिप्ट दी है - जिसके अनुसार या तो दीपक गर्ग अपना इस्तीफ़ा बिना शर्त वापस लें और चेयरमैन पद का अपना कार्यकाल पूरा करें; अन्यथा इंस्टीट्यूट प्रशासन रीजनल काउंसिल को एक प्रशासक के सहारे चलायेगा । देवराज रेड्डी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दीपक गर्ग के इस्तीफ़े के जरिए चेयरमैन पद के कार्यकाल को छह-छह महीने कर देने की जिस योजना को क्रियान्वित करने की बात सुनी जा रही है, उसे किसी भी दशा में क्रियान्वित नहीं होने दिया जायेगा । रीजनल काउंसिल में सत्ता गिरोह के लोग प्रेसीडेंट के इस रवैए को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं : इस संबंध में उनका बड़ा मासूम सा तर्क है और वह यह कि चेयरमैन यदि अपने पद पर नहीं बने रहना चाहता है और वह अपना पद छोड़ देता है, तो बाकी सदस्य काउंसिल का नया चेयरमैन चुनेंगे ही न ? इसमें गलत क्या है ? चालाकी भरी इस मासूमियत को दरअसल भरोसा है कि चेयरमैन के चुनाव में बहुमत का ही पलड़ा भारी होता है, और बहुमत उनके पास है । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट का मानना और कहना किंतु यह है कि बहुमत के नाम पर किसी को भी नंगा नाच करने का अधिकार तो लेकिन नहीं दिया जा सकता है न ? देवराज रेड्डी को एक कठोर प्रशासक के रूप में देखा/पहचाना जाता है; और माना जाता है कि वह एक बार जो करने की ठान लेते हैं, उसे फिर पूरा करके ही दम लेते हैं । इसीलिए माना/समझा जा रहा है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में जो सत्ता गिरोह है, उसकी मनमानी नहीं चल पायेगी और उन्होंने जो नाटक शुरू किया है, वह इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट के कारण पूरा नहीं हो पायेगा ।
मजे की बात यह भी है कि रीजनल काउंसिल में सत्ता गिरोह के कुछेक सदस्य देवराज रेड्डी के इस सुझाव को स्वीकार कर लेने की भी बात करने लगे हैं, जिसमें दीपक गर्ग के इस्तीफ़े के वापस होने का विकल्प दिया गया है । दीपक गर्ग भी यही चाहते हैं, और सत्ता गिरोह के सदस्यों में उन्हें कुछेक समर्थक भी मिल गए हैं । यहाँ इस बात को याद करना प्रासंगिक होगा कि दीपक गर्ग ने अपने इस्तीफ़े के साथ ही इस तरह का माहौल बनाना और लोगों को यह बताना शुरू कर दिया था कि उनसे जबर्दस्ती इस्तीफ़ा लिखवाया गया है । दीपक गर्ग ने स्वेच्छा से इस्तीफ़ा नहीं दिया है, और देवराज रेड्डी के रवैए से उन्हें अपना चेयरमैन का पद बचता हुआ दिख रहा है - लेकिन वह सचमुच पद बचा पायेंगे, इसमें कुछ मुश्किलें हैं । उनके नजदीकियों के बीच ही सवाल है कि दीपक गर्ग अपना इस्तीफ़ा यदि वापस लेते हैं, तो क्या लोगों के बीच इसे अपने ही थूके हुए को चाटने जैसे मामले के रूप में नहीं देखा जायेगा ? दीपक गर्ग के लिए इस्तीफ़ा वापस लेने का सिर्फ एक ही 'रास्ता' है - और वह यह कि अपने इस्तीफ़े के लिए उन्होंने जिस इंस्टीट्यूट प्रशासन यानि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को जिम्मेदार ठहराया है, वह उनसे माफी माँगे और इस्तीफ़ा वापस लेने के लिए अनुरोध करे । ऐसा हो पाना असंभव है । दीपक गर्ग के लिए मुसीबत की बात यह है कि अपने इस्तीफ़े में उन्होंने जिस इंस्टीट्यूट प्रशासन यानि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को जिम्मेदार ठहराया है - वह उनके आरोपों को सच मानने, स्वीकार करने तथा माफी माँगने की बजाए उनसे कह रहा है कि - बकवास बंद करो, इस्तीफ़ा वापस लो और अपना काम करो । ऐसे में, दीपक गर्ग यदि काउंसिल के चेयरमैन पद से अपना इस्तीफ़ा वापस लेते हैं, तो यह उनके लिए और भी ज्यादा फजीहत की बात होगी ।
ऐसे में, नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल को इंस्टीट्यूट प्रशासन द्धारा थोपे गए किसी प्रशासक के हाथों में जाने से रोकने के एक सम्मानजनक तरीके के रूप में कुछेक लोगों की तरफ से आए इस सुझाव की चर्चा भी जोरों पर है - जिसमें कहा गया है कि रीजनल काउंसिल का सत्ता गिरोह बहुमत में होने का घमंड छोड़े और रीजन के सभी चुने हुए सदस्यों की आपसी सहमति से चेयरमैन का चुनाव करे, तथा उस चुनाव को स्वीकार करने के लिए प्रेसीडेंट को राजी करे । यह सुझाव देने/रखने वाले लोगों का विश्वास है कि रीजन के सभी चुने हुए सदस्य जब मिलजुल कर लिए गए अपने किसी फैसले के साथ प्रेसीडेंट से बात करेंगे, तो प्रेसीडेंट उनके फैसले को स्वीकार करने के लिए राजी हो जायेंगे । इस तरीके से सभी का सम्मान भी बचा/बना रहेगा, और रीजनल काउंसिल किसी प्रशासक के हाथों में जाने से भी बच जाएगी । यह देखना दिलचस्प होगा कि रीजनल काउंसिल का सत्ता गिरोह अपने आपको और ज्यादा फजीहत से बचाने के लिए इस तरह के किसी सर्वसम्मत फैसले पर पहुँचने के सुझाव पर काम करेगा, या बहुमत की दादागिरी के नाम पर इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट देवराज रेड्डी से दो-दो हाथ करने की तैयारी करेगा ?