Wednesday, May 10, 2017

लायंस इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी की डिस्ट्रिक्ट अकाउंट में चोरी-चकारी करने की हरकतों के खुलासे ने डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन ही नहीं, बल्कि लायनिज्म की भी साख व प्रतिष्ठा को दाँव पर लगाया

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी ने दूसरों के बैंक अकाउंट की डिटेल्स देने/बताने का जो खेल शुरू किया, उसमें अब वह खुद ही बुरी तरह फँस गए हैं । उन्होंने दूसरों के बैंक अकाउंट के कुछेक डिटेल्स दिए, तो दूसरों ने डिस्ट्रिक्ट अकाउंट के डिटेल्स खंगाल डाले । डिस्ट्रिक्ट अकाउंट के जो डिटेल्स अभी तक सामने आए हैं, उससे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में शिव कुमार चौधरी द्वारा पैसों की हेराफेरी करने के बड़े संगीन भेद खुले हैं - और पता चला है कि उन्होंने मल्टीपल ड्यूज और लायंस क्लब्स इंटरनेशनल फाउंडेशन के साथ-साथ एमजेएफ के कुल मिलाकर करीब 19 लाख रुपए डकार लिए हैं । उन्हें डिस्ट्रिक्ट की तरफ से इन 19 लाख रुपयों का भुगतान अभी करना है, जबकि डिस्ट्रिक्ट अकाउंट में अभी कुल एक लाख तीस हजार रुपए ही हैं । गंभीर बात यह है कि पिछले कई दिनों से मल्टीपल और फाउंडेशन की तरफ से ड्यूज चुकाने के लिए उन्हें लगातार पत्र लिखे जा रहे हैं, जिनका न वह जबाव दे रहे हैं और न ड्यूज जमा कर रहे हैं । मल्टीपल और फाउंडेशन को ड्यूज देने की बजाए डिस्ट्रिक्ट अकाउंट से उन्होंने किसी विशाल चौधरी को फरवरी, मार्च और अप्रैल में कुल मिला कर करीब साढ़े छह लाख रुपए दिए हैं । डिस्ट्रिक्ट अकाउंट से ही एक वस्त्र भंडार को करीब सवा दो लाख रुपए दिए गए हैं । जबसे यह पोल खुली है, तभी से लोग मजाक उड़ा रहे हैं और पूछ रहे हैं कि शिव कुमार चौधरी ने डिस्ट्रिक्ट अकाउंट में जमा हुए मल्टीपल और फाउंडेशन के ड्यूज के पैसों से अपने और अपने परिवार के सदस्यों के लिए कपड़े खरीद लिए हैं क्या ?
डिस्ट्रिक्ट अकाउंट में 9 दिन पहले की, एक मई की करीब साढ़े तीन लाख रुपए की एंट्री भी रहस्यमयी है । इस एंट्री में लेह में हो रही डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को देहरादून में शिफ्ट कर देने का राज छिपा है । उल्लेखनीय है कि पहले से चर्चा रही है कि लेह में डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस करने का शिगुफा छोड़ने के पीछे शिव कुमार चौधरी का असल उद्देश्य उम्मीदवारों को ब्लैकमेल करके उनसे पैसे ऐंठना था । देहरादून में डिस्ट्रिक्ट अकाउंट में करीब साढ़े तीन लाख रुपए किसने जमा करवाए हैं और क्यों जमा करवाए हैं - शिव कुमार चौधरी इस बात को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे लोगों के बीच अनुमान लगाया जा रहा है कि उक्त रकम देहरादून से सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार अश्वनी काम्बोज की तरफ से जमा करवाई हो सकती है । लोगों के बीच सवाल चर्चा में है कि तो क्या शिव कुमार चौधरी ने खुद को अश्वनी काम्बोज को करीब साढ़े तीन लाख रुपए में बेच दिया है ? डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की मर्यादा को छिन्न-भिन्न करते हुए शिव कुमार चौधरी जिस तरह से अश्वनी काम्बोज के लिए समर्थन जुटाने में लगे हुए हैं, उससे भी लोगों को विश्वास हो रहा है कि अश्वनी काम्बोज ने पैसे देकर शिव कुमार चौधरी को ड्यूटी पर लगा दिया है, शिव कुमार चौधरी भी और कुछ ईनाम/विनाम की उम्मीद में अश्वनी काम्बोज की ड्यूटी को बहुत मेहनत से कर रहे हैं । लायन राजनीति में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर और पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के 'इस' या 'उस' उम्मीदवार के समर्थन में होने की बात बहुत आम है, यह कोई आरोप वाली बात भी नहीं रह गई है - लेकिन शिव कुमार चौधरी इस काम को जिस निर्लज्जता के साथ अंजाम दे रहे हैं, वह डिस्ट्रिक्ट ही नहीं - लायनिज्म के इतिहास में जरूर नयी बात है । लोगों का मानना और कहना है कि उनकी इस नयी बात में एक मई को डिस्ट्रिक्ट एकाउंट में देहरादून में जमा हुए करीब साढ़े तीन लाख रुपयों का बड़ा योगदान है ।
डिस्ट्रिक्ट अकाउंट में हुए फर्जीवाड़े के तथ्य सामने आने के बाद शिव कुमार चौधरी ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों से वायदा किया है कि वह उचित समय पर अपने गवर्नर-काल का हिसाब देंगे । लोगों का कहना है कि शिव कुमार चौधरी के वायदों की असलियत जाननी हो तो लोगों को लायंस क्लब मसूरी के अध्यक्ष सतीश अग्रवाल से मिल लेना चाहिए, जिनके पैसे वह बार-बार तकादा करने के बावजूद नहीं लौटा रहे हैं । जो सतीश अग्रवाल से न मिल सकें, वह मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन जेसी वर्मा और या इंटरनेशनल डायरेक्टर तथा लायंस को-ऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ इंडिया के चेयरमैन जीएस होरा से मिल लें - जिनके बार बार लिखने के बावजूद शिव कुमार चौधरी मल्टीपल और फाउंडेशन के ड्यूज नहीं दे रहे हैं । हिसाब देने के वायदे की बात जाने दो, क्योंकि हिसाब तो कोई माँग ही नहीं रहा - हिसाब की बात तो शिव कुमार चौधरी ने मूल मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए कर दी है । मूल मुद्दे की बात तो यह है कि मल्टीपल ड्यूज, फाउंडेशन और एमजेएफ के जो करीब 19 लाख रुपए डिस्ट्रिक्ट में जमा हुए, वह शिव कुमार चौधरी ने आखिर कहाँ ठिकाने लगा दिए हैं - क्योंकि उक्त रकम न तो वहाँ पहुँची है, जहाँ उसे पहुँचना चाहिए था; और न वह डिस्ट्रिक्ट एकाउंट में है । मुद्दे का सवाल यह है कि डिस्ट्रिक्ट अकाउंट से मल्टीपल को और फाउंडेशन को पैसा देने की बजाए किसी विशाल चौधरी को तीन बार में करीब साढ़े छह लाख रुपए तथा किसी वस्त्र भंडार को करीब सवा दो लाख रुपए का भुगतान क्यों और कैसे किया गया ?
शिव कुमार चौधरी ने अपने आपको जब गंभीर आरोपों के घेरे में फँसा पाया, तो आरोपों का जबाव देने की बजाए वह दूसरों पर आरोप लगाने लगे । दूसरों पर आरोप लगा कर अपने आपको आरोपों से बचाने की उनकी कोशिश ने उन्हें और भी हास्यास्पद बना दिया है । उनकी हरकतों को लायनिज्म के लिए बहुत ही शर्मनाक घटना-चक्र के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । देश में और खासतौर से मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में नरेश अग्रवाल के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट बनने को लेकर जहाँ उत्साह का माहौल है, वहाँ एक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में शिव कुमार चौधरी की डिस्ट्रिक्ट अकाउंट में चोरी-चकारी करने की हरकतों के खुलासे ने डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन ही नहीं, बल्कि लायनिज्म की भी साख व प्रतिष्ठा को दाँव पर लगा दिया है ।

Monday, May 8, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3030 के निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर निखिल किबे पर घपलेबाजी के चलते जो गाज गिरी है, उसका अगला निशाना बनने से डिस्ट्रिक्ट 3012 के जेके गौड़ और सतीश सिंघल अपने को बचा लेंगे क्या ?

गाजियाबाद । रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3030 में प्रोजेक्ट के पैसों की हेराफेरी के आरोप में पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर निखिल किबे सहित तीन वरिष्ठ रोटेरियंस को रोटरी से निकाल देने तथा डिस्ट्रिक्ट को अगले पाँच वर्षों के लिए रोटरी फाउंडेशन की गतिविधियों से अलग कर देने के रोटरी इंटरनेशनल के फैसले ने डिस्ट्रिक्ट 3012 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सतीश सिंघल के सामने भी संकट खड़ा कर दिया है । दरअसल इन दोनों पर भी लगभग उसी प्रकृति के आरोप हैं, जिस आरोप के चलते निखिल किबे को अपनी रोटरी सदस्यता से हाथ धोना पड़ा है । दिलचस्प संयोग यह है कि डिस्ट्रिक्ट 3030 में निखिल किबे पिछले ही रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर थे, जबकि डिस्ट्रिक्ट 3012 में जेके गौड़ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर थे । एक और दिलचस्प संयोग यह है कि निखिल किबे मेडीकल प्रोफेशन में हैं और रोटरी में घपला उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में किया है; जबकि जेके गौड़ शिक्षा के प्रोफेशन में हैं और ब्लड बैंक के नाम पर जिस घपले के आरोप की चपेट में वह हैं - वह मेडीकल का क्षेत्र है । निखिल किबे के मुकाबले जेके गौड़ लेकिन खुशकिस्मत जरूर हैं, और वह इसलिए कि उनके घपले को लेकर अभी रोटरी इंटरनेशनल में शिकायत नहीं हुई है । रोटरी में लोगों का कहना है कि निखिल किबे इसलिए पकड़ में आ गए और रोटरी से बाहर हो गए - क्योंकि उनके मामले में शिकायत हो गई और वह अपने गवर्नर-काल के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन की निगाह में चढ़ गए; जबकि जेके गौड़ के मामले में शिकायत नहीं हुई और वह केआर रवींद्रन की निगाह में चढ़ने से बच गए ।
जेके गौड़ ने अपनी देखरेख में अपने गवर्नर-काल में गाजियाबाद में जिस रोटरी ब्लड बैंक को बनाने की तैयारी की थी, उसका उद्घाटन इंटरनेशनल प्रेसीडेंट के रूप में केआर रवींद्रन को ही करना था, लेकिन एक वर्ष से भी अधिक समय बीत जाने के बावजूद उक्त रोटरी ब्लड बैंक अभी तक भी शुरू नहीं हो सका है । खास बात यह है कि इस ब्लड बैंक के लिए रोटरी फाउंडेशन से मोटी रकम लेने/मिलने के लिए जरूरी कार्रवाई वर्ष 2015 में कर ली गई थी, और तभी आवश्यक मशीनों की भी पहचान कर ली गई थी और मशीनों की सप्लाई के लिए सप्लायर से सौदा भी तय हो गया था । इसके बाद से 16 महीने बीत चुके हैं, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में जेके गौड़ द्वारा बनवाए जा रहे ब्लड बैंक के शुरू होने का कोई अता-पता नहीं है । उल्लेखनीय है कि पहले ब्लड बैंक के लिए खरीदी जाने वाली मशीनों की कीमतों में घपलेबाजी के आरोपों के कारण ब्लड बैंक का काम पिछड़ा; इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई और पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के हस्तक्षेप के बाद वह मामला किसी तरह सुलझा, तो लगा कि अब जल्दी ही ब्लड बैंक शुरू हो जाएगा । लेकिन मामला अभी भी जहाँ का तहाँ ही अटका पड़ा है और कोई नहीं जानता कि करीब सवा करोड़ रुपए की लागत की रूपरेखा वाला ब्लड बैंक आखिर कब शुरू होगा ? उल्लेखनीय तथ्य यह है कि जेके गौड़ और ब्लड बैंक के कामकाज से जुड़े लोग इस बात को छिपाने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं कि ब्लड बैंक का काम किस दशा में है, और किस कारण से उसके शुरू होने में देर हो रही है ?
डिस्ट्रिक्ट के कुछेक लोगों के बीच की चर्चाओं के अनुसार, लाइसेंस न मिल पाने के कारण ब्लड बैंक का काम शुरू नहीं हो पा रहा है । इस मामले में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सतीश सिंघल पर दोष मढ़ा जा रहा है । जेके गौड़ के नजदीकियों की तरफ से कहा/बताया जा रहा है कि गाजियाबाद में रोटरी ब्लड बैंक शुरू हो जाने से चूँकि सतीश सिंघल की देखरेख में चल रहे नोएडा ब्लड बैंक के कामकाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, इसलिए सतीश सिंघल अपने परिचय का इस्तेमाल करते हुए गाजियाबाद के ब्लड बैंक के शुरू होने में रोड़े अटका रहे हैं । मजे की बात यह है कि गाजियाबाद के ब्लड बैंक के बनने की कागजी कार्रवाई शुरू करने/करवाने में सतीश सिंघल की ही मदद ली गई थी । उल्लेखनीय तथ्य यह है कि जेके गौड़ और ब्लड बैंक बनवा रहे उनके साथियों ने पहले डीआरएफसी मुकेश अरनेजा को लेटलतीफी के लिए जिम्मेदार ठहराया था; उनका साफ आरोप था कि वह चूँकि मुकेश अरनेजा की 'डिमांड' पूरी नहीं कर रहे हैं, इसलिए तरह तरह की बहानेबाजियों से वह ब्लड बैंक के काम को लटका रहे हैं । मुकेश अरनेजा से मामला निपटा, तो सतीश सिंघल गाजियाबाद में बनने वाले रोटरी ब्लड बैंक के रास्ते में आ गए । जेके गौड़ के नजदीकियों की तरफ से लोगों को बताया जाता है कि सतीश सिंघल तरह तरह की अड़ंगेबाजियों से गाजियाबाद के रोटरी ब्लड बैंक को शुरू नहीं होने देना चाहते हैं, ताकि उनकी देखरेख में चल रहे नोएडा रोटरी ब्लड बैंक का काम निर्बाध रूप से चलता रह सके - और उनकी कमाई बनी रह सके ।
मामले का सनसनीखेज पहलू यह है कि सतीश सिंघल खुद नोएडा रोटरी ब्लड बैंक की कमाई हड़पने के आरोपों के घेरे में हैं । आरोप है कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल की देखरेख में चल रहा दिल्ली स्थित रोटरी ब्लड बैंक करीब ढाई हजार यूनिट बेच कर प्रति माह 15 लाख रुपए के करीब का लाभ कमा लेता है, जबकि सतीश सिंघल की देखरेख में चलने वाले ब्लड बैंक की कमाई ढाई हजार यूनिट ब्लड बेचने के बाद भी 34/35 हजार रुपए के आसपास ही ठहर जाती है । लाभ के इस भारी अंतर ने नोएडा ब्लड बैंक के कर्ता-धर्ता के रूप में सतीश सिंघल की भूमिका को न सिर्फ संदेहास्पद बना दिया है, बल्कि गंभीर वित्तीय आरोपों के घेरे में भी ला दिया है । यह आरोप नोएडा ब्लड बैंक के ट्रस्टियों की इस शिकायत के चलते और गंभीर हो गया है कि सतीश सिंघल ब्लड बैंक का हिसाब-किताब देने/बताने में हमेशा आनाकानी करते हैं, और पूछे जाने पर नाराजगी दिखाने लगते हैं । सतीश सिंघल के इस व्यवहार और रवैये से लोगों को लगता है कि सतीश सिंघल ब्लड बैंक में ऐसा कुछ करते हैं, जिसे दूसरों से छिपाकर रखना चाहते हैं । ब्लड बैंक के कुछेक ट्रस्टियों का ही आरोप भी रहा है कि सतीश सिंघल ब्लड बैंक को अपने निजी संस्थान के रूप में इस्तेमाल करते हैं, और उसकी कमाई हड़प जाते हैं । दरअसल इसलिए भी गाजियाबाद में बनने वाले रोटरी ब्लड बैंक के शुरू होने में उनके द्वारा अड़ंगा डालने की बात लोगों को सच लगने लगती है । कुछेक लोगों को हालाँकि यह भी लगता है कि जेके गौड़ और उनकी टीम ही नहीं चाहती है कि उनका ब्लड बैंक शुरू हो - क्योंकि शुरू होगा, तो उसकी खामियाँ सामने आयेंगी और तब उनकी घपलेबाजियों की पोल खुलेगी; इसलिए ही लाइसेंस लेने के काम को वह खुद ही लटकाए हुए हैं, और ठीकरा सतीश सिंघल के सिर पर फोड़ रहे हैं ।
सतीश सिंघल की देखरेख में चल रहे नोएडा ब्लड बैंक तथा जेके गौड़ द्वारा बनवाए जा रहे गाजियाबाद ब्लड बैंक से जुड़े आरोप अभी तक इधर से उधर उछलते रहे हैं; आरोपों पर कोई निर्णायक कार्रवाई होती हुई अभी तक नहीं दिखी है । लेकिन जेके गौड़ के कलीग रहे डिस्ट्रिक्ट 3030 के निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर निखिल किबे घपलेबाजी के आरोप में जिस तरह रोटरी से नपे हैं, उसके कारण जेके गौड़ और सतीश सिंघल पर भी खतरा मंडरा उठा है ।

Saturday, May 6, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में इंटरनेशनल डायरेक्टर के चुनाव में वीएस कुकरेजा सचमुच उम्मीदवार बने रहेंगे, या जेपी सिंह के साथ कोई सौदा करके तेजपाल खिल्लन उनकी उम्मीदवारी वापस करवा देंगे

नई दिल्ली । इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडॉर्सी पद के लिए चुनाव अभियान पर निकलने की तैयारी कर रहे वीएस कुकरेजा के 'चुनावी रथ' के चोरी हो जाने को उनके शुभचिंतकों और समर्थकों ने एक बुरे संकेत के रूप में देखा/पहचाना है - और चुनाव के प्रति और गंभीर व सतर्क होने की जरूरत को रेखांकित किया है । उल्लेखनीय है कि अपनी जिस इनोवा कार के सहारे वीएस कुकरेजा को अपने चुनाव अभियान पर निकलना था, उसके चोरी हो जाने की खबर उन्होंने खुद ही लोगों को दी है । यह ठीक है कि उनके समर्थकों व शुभचिंतकों को विश्वास है कि चुनावी जरूरत के बीच इस मुसीबत को वीएस कुकरेजा हैंडल कर लेंगे और इसके कारण अपने चुनाव अभियान को प्रभावित नहीं होने देंगे, लेकिन फिर भी उन्हें यह भी आशंका हुई है कि किन्हीं अदृश्य शक्तियों ने वीएस कुकरेजा के चुनाव अभियान में बाधा खड़ी करने के उद्देश्य से तो उनकी इनोवा की चोरी नहीं करवा दी । हालाँकि लायन राजनीति बहुत गंदी होती जा रही है और उसमें बहुत बहुत घटियापन भी होने लगा है - किंतु शुक्र है कि वीएस कुकरेजा या उनके समर्थक/शुभचिंतक इनोवा की चोरी को दिल्ली में होने वाली वाहन-चोरी की घटनाओं की श्रृंखला के रूप में ही देख/पहचान रहे हैं और उनकी तरफ से इसके पीछे विरोधियों का हाथ होने का शक प्रकट नहीं किया गया है ।
इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए मल्टीपल में एंडोर्स होने के लिए यूँ तो कई उम्मीदवार हैं, लेकिन अभी मुख्य मुकाबला वीएस कुकरेजा और जेपी सिंह के बीच होने की संभावना व्यक्त की जा रही है । वीएस कुकरेजा को हालाँकि एक डमी उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है, और लोगों के बीच चर्चा रही है कि उन्हें तेजपाल खिल्लन ने अपने कई कई कारनामों को संभव करने के लिए विजुका के रूप में रूप 'खड़ा' किया हुआ है, और वह कभी भी वीएस कुकरेजा को पीछे खींच सकते हैं - लेकिन अभी उनकी तरफ से जिस तरह की तैयारी होती सुनी गई है, उससे लग रहा है कि तेजपाल खिल्लन इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के एंडोर्समेंट को लेकर गंभीर हैं । तेजपाल खिल्लन की गंभीरता को देखते हुए भी जेपी सिंह लेकिन चूँकि अभी तक गंभीर होते हुए नहीं दिख रहे हैं, इसलिए लोगों को हैरानी है । इस हैरानी में लोगों को लग रहा है कि जेपी सिंह ने शायद तेजपाल खिल्लन की 'गंभीरता' को खत्म करने का कोई रामबाण खोजा हुआ है, और उन्हें विश्वास है कि उचित समय पर वह उसका इस्तेमाल करेंगे - और तेजपाल खिल्लन का 'गुस्सा' शांत कर देंगे । जेपी सिंह अभी 'उस' रामबाण का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, तो शायद इसलिए कि वह देख लेना चाहते हैं कि तेजपाल खिल्लन के भरोसे वीएस कुकरेजा कितना ऊपर तक उड़ पाते हैं ? जेपी सिंह के नजदीकियों के अनुसार, जेपी सिंह को लगता है कि हो सकता है कि वीएस कुकरेजा ज्यादा ऊपर तक न उड़ पाएँ और खुद ही नीचे बैठ जाएँ ?
वीएस कुकरेजा को लेकर दरअसल उनके हो सकने वाले समर्थकों को भी शक है कि वह मुकाबले में बने भी रह सकेंगे क्या ? जो लोग उन्हें जानते हैं, उनका कहना है कि एक उम्मीदवार के रूप में व्यवहार कर सकना उनके लिए संभव ही नहीं है, और इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव को अफोर्ड करना उनके बस की बात नहीं है । वीएस कुकरेजा के पास बस एक ही ताकत है - और वह है तेजपाल खिल्लन का संग/साथ । लेकिन चूँकि वह पूरी तरह से तेजपाल खिल्लन के भरोसे हैं - इसलिए लोगों के बीच लाख टके का सवाल यह है कि तेजपाल खिल्लन का संग/साथ वीएस कुकरेजा की ताकत साबित होगा, या उनकी कमजोरी । दरअसल हर किसी को लग रहा है कि वीएस कुकरेजा की उम्मीदवारी को तेजपाल खिल्लन अपने स्वार्थ के लिए बनाए हुए हैं, और जब भी उन्हें यह लगेगा कि वीएस कुकरेजा की उम्मीदवारी को छोड़ देने से उनका स्वार्थ पूरा हो जाएगा - वह वीएस कुकरेजा की उम्मीदवारी को छोड़ देने में देर नहीं लगायेंगे ।
तेजपाल खिल्लन का स्वार्थ क्या है - इसे लेकर जितने मुँह उतनी बातें हैं । तेजपाल खिल्लन के 'व्यवहार' को देखते रहे लोगों को कहना है कि वह वास्तव में हीनग्रंथि का शिकार हैं । उनके साथ बिडंवना यह है कि हालाँकि मल्टीपल में वह सबसे समर्थ लायन नेता हैं - लायन राजनीति करने के लिए जो कुछ भी चाहिए होता है, वह उनके पास प्रचुर मात्रा में है; लेकिन फिर भी उनकी राजनीतिक पहचान और हैसियत एक डिस्ट्रिक्ट के एक नेता भर की है - दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के साथ साथ उनके अपने डिस्ट्रिक्ट में लोग उन्हें लायनिज्म के एक व्यापारी के रूप में जानते/पहचानते हैं और इसी नाते लीडरशिप भी उन्हें कोई खास तवज्जो नहीं देती है । तेजपाल खिल्लन ने अपने डिस्ट्रिक्ट में पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर केएम गोयल की बुरी हालत कर रखी है; लायन राजनीति करने के लिए जो कुछ भी चाहिए होता है, केएम गोयल के पास उसमें से कुछ भी नहीं है - लेकिन फिर भी लोगों के बीच और लीडरशिप में केएम गोयल की पहचान और हैसियत तेजपाल खिल्लन से कहीं कहीं ज्यादा है । तेजपाल खिल्लन के फ्रस्ट्रेशन का आलम यह है कि अपने डिस्ट्रिक्ट में वह अपनी मर्जी से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनाते/बनवाते हैं, लेकिन फिर भी वह दोबारा से खुद डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने के लिए लाइन में लग गए हैं । यह बात वास्तव में उनकी छोटी सोच और विकल्पहीनता के शिकार होने का ही सुबूत है । दरअसल इसीलिए हर तरह से समर्थ होने के बावजूद वह ऐसा कोई काम नहीं कर सके हैं, जिससे लोगों के बीच उनकी खास पहचान बन सके और उनके लिए सम्मान बने । कुल मिलाकर लायन राजनीति में भी वह सिर्फ एक सौदागर ही बन सके हैं - राजनीति के खिलाड़ी जानते हैं कि राजनीति के सौदागरों के साथ कैसे सौदा किया जाता है ।
तेजपाल खिल्लन के तौर-तरीकों से परिचित लोगों को इसीलिए लगता है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में भी तेजपाल खिल्लन कोई न कोई सौदा कर लेंगे और तब वीएस कुकरेजा के सामने अपनी उम्मीदवारी से पीछे हटने के अलावा कोई चारा नहीं रह जाएगा । जेपी सिंह जिस तरह से वीएस कुकरेजा की उम्मीदवारी के प्रति निश्चिन्त से बने नजर आ रहे हैं, उससे भी लोगों को लग रहा है कि उन्हें विश्वास है कि वीएस कुकरेजा के साथ चुनाव की नौबत नहीं आएगी । लोगों को भी लगता है कि जेपी सिंह जिस दिन नरेश अग्रवाल से तेजपाल खिल्लन की बात/मुलाकात करवा देंगे और उनसे तेजपाल खिल्लन को 'तवज्जो' दिलवा देंगे, उस दिन तेजपाल खिल्लन - वीएस कुकरेजा की उम्मीदवारी को वापस करवा कर जेपी सिंह की उम्मीदवारी का झंडा उठा लेंगे । हालाँकि तेजपाल खिल्लन के नजदीकियों का कहना है कि इस बार जेपी सिंह और या नरेश अग्रवाल के लिए तेजपाल खिल्लन से सौदा करना आसान नहीं होगा, और तेजपाल खिल्लन आसानी से जेपी सिंह को सफल नहीं होने देंगे । लोगों के अपने अपने दावे हैं - उन दावों की सच्चाई अगले कुछ दिनों में जेपी सिंह और वीएस कुकरेजा की तरफ की तैयारी को देख कर ही पहचानी जा सकेगी; और तभी संकेत मिलेगा कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी लड़ाई किस दिशा में आगे बढ़ती है ।

Friday, May 5, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में सीओएल के लिए सुधीर मंगला की संभावित उम्मीदवारी के जरिए विनोद बंसल को सुशील खुराना से बदला लेने का मौका मिला

नई दिल्ली । विनोद बंसल ने सीओएल की चुनावी राजनीति में सुशील खुराना के साथ 'जैसे को तैसा' वाला रवैया अपना कर डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में खासी हलचल मचा दी है । पहले सुशील खुराना ने संजय खन्ना को अपने साथ मिला कर सीओएल की चुनावी प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही विनोद बंसल को मुकाबले से बाहर हो जाने के लिए मजबूर कर दिया था, जिसका बदला अब विनोद बंसल ने सुशील खुराना के सीओएल के रास्ते में सुधीर मंगला रूपी काँटा बो कर ले लिया है । सीओएल के लिए सुधीर मंगला की उम्मीदवारी जिस अचानक और अप्रत्याशित तरीके से सामने आयी है, उसने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के प्रत्येक खिलाड़ी को हैरान किया है । इसी हैरानी में हर किसी को लगता है कि सुधीर मंगला को इस उम्मीदवारी के लिए उकसाने का काम विनोद बंसल ने किया है - हालाँकि कुछेक लोगों को लगता है कि उम्मीदवार तो सुधीर मंगला अपने आप बने हैं, विनोद बंसल ने तो सिर्फ उनकी पीठ थपथपाई है । अब पर्दे के पीछे का सच चाहें जो हो, पर्दे के सामने का सच यह है कि विनोद बंसल की घेराबंदी करके उन्हें मुकाबले से बाहर करके सुशील खुराना ने सीओएल के चुनाव को लेकर जो चैन की साँस ली थी - उसमें पूरी तरह खलल पड़ गया है, और उनके इस खलल के इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव को भी अपने प्रभाव में ले लेने के संकेत मिल रहे हैं ।
दरअसल सुशील खुराना अभी तक सीओएल की अपनी उम्मीदवारी को लेकर निश्चिन्त थे, और इस निश्चिन्तता के चलते ही उन्होंने अपना सारा ध्यान इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए प्रस्तुत दमनजीत सिंह की उम्मीदवारी को सफल बनाने पर लगाया हुआ था - और इस काम में वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट रवि चौधरी तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी विनय भाटिया की 'ड्यूटियाँ' तय कर रहे थे । सीओएल के लिए सुधीर मंगला की उम्मीदवारी की आहट ने लेकिन उनकी निश्चिंतता और योजना की सारी हवा निकाल दी है । रवि चौधरी और विनय भाटिया के भरोसे उन्हें अब दमनजीत सिंह की उम्मीदवारी के बजाए अपनी उम्मीदवारी की फिक्र करना पड़ रही है । इस वर्ष डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में जो 'अनहोनी' हुई है, उसने सुशील खुराना और रवि चौधरी व विनय भाटिया जैसे उनके सेनापतियों को और डराया हुआ है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में इन तीनों ने अन्य कई पूर्व गवर्नर्स के साथ मिलकर संजीव राय मेहरा को चुनाव जितवाने का बीड़ा उठाया हुआ था, लेकिन नतीजे में संजीव राय मेहरा तीसरे स्थान पर रहे - जिससे तुर्रमखाँ समझे जाने वाले उनके समर्थक नेताओं और पदाधिकारियों की पोल और खुल गई ।
समझा जाता है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में डिस्ट्रिक्ट के राजनीतिक चौधरियों की असलियत की जो पोल खुली, उसके चलते ही सुधीर मंगला को सीओएल के लिए उम्मीदवार बनने की प्रेरणा मिली । मजे की बात है कि राजनीतिक रूप से सुधीर मंगला को कोई भी हालाँकि गंभीरता से नहीं लेता है, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद पर इस वर्ष सुरेश भसीन को जो जीत मिली है - उसके कारण सुधीर मंगला की उम्मीदवारी को गंभीरता से लिया जाने लगा है । उल्लेखनीय है कि सुरेश भसीन की उम्मीदवारी को भी कोई गंभीरता से नहीं ले रहा था, और सभी लोग उनकी उम्मीदवारी का मजाक ही बना रहे थे - लेकिन उनकी जीत ने उनकी उम्मीदवारी का मजाक बनाने वालों का ही मजाक बना दिया । सुधीर मंगला के पक्ष में एक बात और जाती है - डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अचानक से प्रस्तुत हुई अनूप मित्तल की उम्मीदवारी के पीछे सुधीर मंगला को ही देखा/पहचाना गया था; अनूप मित्तल ने अच्छा प्रदर्शन करते हुए मामूली अंतर से चुनाव गँवाया और दूसरे स्थान पर रहे । माना/समझा जा रहा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अनूप मित्तल को जिन लोगों का समर्थन मिला है, सीओएल के चुनाव में उन लोगों का समर्थन सुधीर मंगला को मिल सकता है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में सुरेश भसीन और अनूप मित्तल को जो बम्पर वोट मिले, उन्हें डिस्ट्रिक्ट के राजनीतिक चौधरियों के प्रति डिस्ट्रिक्ट के लोगों की नाराजगी की अभिव्यक्ति के रूप में देखा/पहचाना गया है । इसी अभिव्यक्ति के चलते सुधीर मंगला की उम्मीदवारी महत्त्वपूर्ण हो उठी है ।
सुधीर मंगला की उम्मीदवारी को विनोद बंसल का समर्थन होने का जो अंदेशा लगाया जा रहा है, उसके कारण सुधीर मंगला की उम्मीदवारी का वज़न और बढ़ जाता है । रवि चौधरी और विनय भाटिया को चूँकि विनोद बंसल के 'आदमियों' के रूप में भी देखा/पहचाना जाता है, इसलिए इनकी भूमिका भी सुशील खुराना के लिए सशंकित हो उठी है । रवि चौधरी हालाँकि पहले कुछेक मौकों पर सुशील खुराना के बरक्स विनोद बंसल को गच्चा दे चुके हैं - लेकिन अभी रवि चौधरी को चूँकि इंटरनेशनल डायरेक्टर का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए दमनजीत सिंह के लिए विनोद बंसल का समर्थन चाहिए होगा, इसलिए अभी उनके लिए विनोद बंसल के साथ बेईमानी करना संभव नहीं होगा । इन स्थितियों ने ही सीओएल के लिए सुशील खुराना के आसान समझे जा रहे और दिख रहे सफ़र को मुश्किल बनाने का काम किया है - और इन्हीं स्थितियों में विनोद बंसल को सुशील खुराना से बदला लेने का मौका मिला है । सीओएल की चुनावी राजनीति में सुशील खुराना ने जिस षड्यंत्र के जरिए विनोद बंसल को घेरा और मुकाबला शुरू होने से पहले ही जिस तरह से उनसे 'समर्पण' करवा लिया, उसे डिस्ट्रिक्ट में विनोद बंसल की राजनीति के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था । सुधीर मंगला की उम्मीदवारी से विनोद बंसल को डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में वापसी करने और 'दिखाने' का जो मौका मिला है, उससे डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति का परिदृश्य खासा रोचक हो गया है ।

Thursday, May 4, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में इंद्रजीत सिंह और स्वर्ण सिंह खालसा के तेवरों ने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के चुनाव में तेजपाल खिल्लन को झटका देते हुए एक अलग समीकरण बनने के संकेत दिए

नई दिल्ली । विनय गर्ग को धोखा देकर मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए विशाल सिन्हा को तवज्जो देने की तेजपाल खिल्लन की कार्रवाई इंद्रजीत सिंह तथा स्वर्ण सिंह खालसा के रवैये के चलते भारी मुसीबत में फँस गई है । इंद्रजीत सिंह की तरफ से संदेश दिया गया है कि चेयरमैन बनने/बनाने के फार्मूले में यदि विनय गर्ग फिट नहीं हुए तो वह मल्टीपल काउंसिल के चुनाव में हिस्सा नहीं लेंगे और अपना वोट नहीं डालेंगे; दूसरी तरफ स्वर्ण सिंह खालसा ने विशाल सिन्हा के गिफ्ट को लेने से इंकार कर दिया है । डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू तथा डिस्ट्रिक्ट 321 डी के फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में क्रमशः इंद्रजीत सिंह और स्वर्ण सिंह खालसा की इन कार्रवाइयों ने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए बिछाई जा रही तेजपाल खिल्लन की बिसात को पलट देने का काम किया है - क्योंकि तेजपाल खिल्लन ने अपनी बिसात में इन दोनों को अपने साथ 'माना' है, इन दोनों के रवैये में लेकिन बगावत के तेवर देखे/पहचाने जा रहे हैं मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के चुनाव के संदर्भ में तेजपाल खिल्लन ने विनय गर्ग का शिकार सबसे आसान समझा था - इसलिए पहले तो तेजपाल खिल्लन ने विनय गर्ग को चेयरमैन बनवाने/चुनवाने का झाँसा दिया, लेकिन फिर उन्हें किनारे करके विशाल सिन्हा का हाथ पकड़ लिया । लेकिन इंद्रजीत सिंह ने उन्हें धीरे से जो जोर का झटका दिया है, उसने तेजपाल खिल्लन का खेल बिगाड़ दिया है । समझा जाता है कि विशाल सिन्हा को रास्ते से हटाने के लिए ही इंद्रजीत सिंह और डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर केएस लूथरा ने स्वर्ण सिंह खालसा को अपने साथ मिलाया, जिसके चलते तेजपाल खिल्लन की सलाहानुसार गिफ्ट देने आए विशाल सिन्हा से स्वर्ण सिंह खालसा ने गिफ्ट लेने से ही इंकार कर दिया - और विशाल सिन्हा को अपना गिफ्ट वापस लेकर लौटना पड़ा
उल्लेखनीय है कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए जिन तीन उम्मीदवारों के नाम चर्चा में हैं, उनमें सबसे कमजोर स्थिति विनय गर्ग की ही देखी/पहचानी जा रही है । परिस्थितियाँ और चुनावी गणित हालाँकि सबसे ज्यादा उनके ही पक्ष में हैं - लेकिन फिर भी उनकी स्थिति सबसे ज्यादा कमजोर समझी/पहचानी जा रही है, तो इसलिए कि वह अपनी उम्मीदवारी को लेकर जरा भी सक्रिय 'दिखाई' नहीं दे रहे हैं । विनय गर्ग की तरफ से सुनने को मिला है कि वह चेयरमैन पद की दौड़ में काबिलियत के भरोसे हैं, और 'हॉर्स-ट्रेडिंग' के खेल में वह नहीं पड़ेंगे । उनकी तरफ से कहा/सुना जा रहा है कि लोग यदि मल्टीपल के लीडर के रूप में उन्हें चुनना चाहते हैं, जिनकी लीडरशिप क्वालिटी की हालत यह है कि वह अपने फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का समर्थन नहीं ले पा रहे हैं, तो फिर उन्हें कुछ नहीं कहना/करना इसके अलावा, पिछले वर्षों के घटना-चक्र से विनय गर्ग और उनके साथियों ने यह सबक भी सीखा है कि मल्टीपल की राजनीति में जो ज्यादा तेज चलता है, वह अंततः लुढ़क पड़ता है - इसलिए पीछे रहो और मौके पर नजर रखो । विनय गर्ग और उनके साथियों का तर्क है कि वह चेयरमैन पद की लड़ाई में हैं, और मानते/समझते हैं कि स्थितियाँ उनके अनुकूल हैं - बस स्थितियों को उचित तरीके से इस्तेमाल करने की जरूरत है । इंद्रजीत सिंह की तरफ से 'विनय गर्ग नहीं, तो उनका वोट नहीं' का जो संदेश आया/मिला है, उसके पीछे दरअसल मल्टीपल काउंसिल के चेयरमैन पद को लेकर बन रहे मौजूदा समीकरणों को तहस-नहस करने का उद्देश्य छिपा है
यह संदेश देना वास्तव में इंद्रजीत सिंह की मजबूरी भी है । उनके अपने डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में दरअसल पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेपी सिंह ने उन्हें ठिकाने लगाने का जो बीड़ा उठाया हुआ है, उसके तहत जेपी सिंह यह 'दिखाने' और साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि इंद्रजीत सिंह अगले वर्ष खुद मल्टीपल चेयरमैन बनना चाहते हैं, और इसलिए वह इस वर्ष विनय गर्ग को चेयरमैन नहीं बनने देंगे । इंद्रजीत सिंह ने भी जेपी सिंह के इस प्रचार को झूठा साबित करने के लिए कमर कस ली है । इसके तहत ही, इंद्रजीत सिंह ने यह संदेश दिया है कि विनय गर्ग के अलावा किसी और के चेयरमैन बनने/बनवाने के 'फार्मूले' में वह शामिल नहीं होंगे इंद्रजीत सिंह दरअसल 'दिखाना' यह चाहते हैं कि उन्होंने विनय गर्ग की बजाए किसी और को मल्टीपल चेयरमैन बनाने/बनवाने में दिलचस्पी नहीं ली है - और इसलिए विनय गर्ग के प्रति उनके समर्थन पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है । समझा जाता है कि अपने इस संदेश के जरिए इंद्रजीत सिंह ने तेजपाल खिल्लन को भी आगाह कर दिया है कि वह यदि विनय गर्ग से किए गए वायदे को भूलने की तैयारी कर रहे हैं, तो फिर उनके समर्थन और वोट की उम्मीद न करें । इंद्रजीत सिंह के इस तेवर ने तेजपाल खिल्लन के लिए भारी मुसीबत खड़ी कर दी है ।
इंद्रजीत सिंह ने तेजपाल खिल्लन के लिए जो मुसीबत खड़ी की है, उसे और बढ़ाने का काम किया है स्वर्ण सिंह खालसा ने । दरअसल स्वर्ण सिंह खालसा ने विशाल सिन्हा से गिफ्ट लेने से इंकार करके विशाल सिन्हा और तेजपाल खिल्लन की निगाह में अपनी भूमिका को संदेहास्पद बना लिया है । विशाल सिन्हा, तेजपाल खिल्लन की सलाह पर ही संभावित समर्थक फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को गिफ्ट देने निकले थे । मजे की बात यह है कि उनसे गिफ्ट लेने से स्वर्ण सिंह खालसा के इंकार करने की बात लोगों को खुद विशाल सिन्हा ने ही बताई - कुछ को इस आशंका के साथ कि स्वर्ण सिंह खालसा साथ रहेंगे या नहीं; और कुछ को यह विश्वास दिलाने के लिए कि स्वर्ण सिंह खालसा के साथ तो उनके कितने अच्छे संबंध हैं ! विशाल सिन्हा लोगों के बीच भले ही यह दावा कर रहे हों कि स्वर्ण सिंह खालसा तो उन्हें अपना भाई जैसा मानते हैं, और इसीलिए उन्होंने उनसे गिफ्ट नहीं लिया; लेकिन यह दावा करने के साथ-साथ विशाल सिन्हा ने गुरनाम सिंह और तेजपाल खिल्लन को यह कहते/बताते हुए सावधान भी किया है कि स्वर्ण सिंह खालसा पर ज्यादा भरोसा मत करना, वह धोखा दे सकते हैं । विशाल सिन्हा को लगता है कि स्वर्ण सिंह खालसा, केएस लूथरा और इंद्रजीत सिंह के संपर्क में हैं और उनके ही कहने पर उन्होंने उनसे गिफ्ट नहीं लिया है । केएस लूथरा की सक्रियता और इंद्रजीत सिंह और स्वर्ण सिंह खालसा के तेवरों ने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के चुनाव में एक अलग समीकरण बनने के संकेत दिए हैं - और इन संकेतों ने विशाल सिन्हा के पक्ष में बिछाई जा रही तेजपाल खिल्लन की बिसात को उलट-पलट देने का काम किया है ।

Wednesday, May 3, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 की पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संगीता कुमार के बेटे के विदेशी हथियारों का तस्कर होने के खुलासे के बाद डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत श्रीहरी गुप्ता की उम्मीदवारी के सामने दोहरा संकट खड़ा हुआ

मेरठ । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संगीता कुमार के बेटे के विदेशी हथियारों का तस्कर होने की बात सामने आने से मेरठ के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स जिस शर्मिंदगी में फँसे हैं, उसके कारण वर्ष 2018-19 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए होने वाले चुनाव में श्रीहरी गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए अजीब सा संकट खड़ा हो गया है । दरअसल श्रीहरी गुप्ता को उम्मीद थी कि मेरठ के सभी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के अभियान में लगेंगे, तो उनकी उम्मीदवारी की नैय्या आसानी से पार हो जाएगी । पिछले वर्षों में यह देखा गया है कि मेरठ से यदि एक उम्मीदवार रहा है, तो चाहे/अनचाहे उसे मेरठ के सभी पूर्व गवर्नर्स का समर्थन मिला है । श्रीहरी गुप्ता के तो फिर अधिकतर पूर्व गवर्नर्स के साथ अच्छे संबंध रहे हैं, और उन्होंने अधिकतर पूर्व गवर्नर्स के लिए काम किया हुआ है । संजीव रस्तोगी की तो डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के वह चेयरमैन थे । संगीता कुमार के गवर्नर-काल में भी उन्होंने अत्यंत सक्रिय भूमिका निभाई थी । एक अच्छा कार्यकर्ता होने के कारण श्रीहरी गुप्ता उन गवर्नर्स के साथ भी तालमेल बैठाने में सफल रहे, जिनकी आपस में नहीं भी बनती थी और जो एक-दूसरे के धुर-विरोधी रहे थे । इस कारण से श्रीहरी गुप्ता को उम्मीद थी कि मेरठ के पूर्व गवर्नर्स उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु अपने अपने तरीके से काम करेंगे श्रीहरी गुप्ता को चक्रेश लोहिया से मुकाबला करने के लिए मेरठ के पूर्व गवर्नर्स के समर्थन की जरूरत भी है । चक्रेश लोहिया भी डिस्ट्रिक्ट में एक अत्यंत सक्रिय और समर्पित कार्यकर्ता के रूप में जाने/पहचाने जाते हैं । मेरठ के कुछेक पूर्व गवर्नर्स के लिए उन्होंने भी अपना खूब पसीना बहाया है । उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए मुरादाबाद के कुछेक पूर्व गवर्नर्स अपने अपने तरीके से काम करते हुए भी सुने गए हैं । ऐसे में, चक्रेश लोहिया की उम्मीदवारी को टक्कर देने के लिए श्रीहरी गुप्ता को अपनी उम्मीदवारी के लिए मेरठ के पूर्व गवर्नर्स के समर्थन की जरूरत है ही
श्रीहरी गुप्ता की यह जरूरत पूरी हो भी जाती, लेकिन संगीता कुमार के बेटे के विदेशी हथियारों तथा वन्य जीवों के अवशेषों के तस्कर होने की बात सामने आने से सब गुड़ गोबर हो गया । राजस्व गुप्तचर निदेशालय (डीआरआई) और वन विभाग की छापेमारी में पता चला कि संगीता कुमार का बेटा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हथियारों की तस्करी करने वाले सिंडीकेट से जुड़ा है । संगीता कुमार के बेटे की यह कारस्तानी सामने आने से आम तौर पर डिस्ट्रिक्ट 3100 के तथा खासतौर पर मेरठ के रोटेरियंस भौंचक रह गए । मेरठ में जो रोटेरियंस संगीता कुमार और उनके परिवार को नजदीक से जानते/देखते रहे हैं, उन्हें पिछले कुछ वर्षों में संगीता कुमार और उनके परिवार की अचानक और अप्रत्याशित रूप से बढ़ी समृद्धि को देख कर हैरानी तो हुई और कई एक को दाल में काला/पीला होने का भी शक हुआ - लेकिन किसी को यह अंदाजा नहीं हो सका कि अचानक और अप्रत्याशित रूप से बढ़ी उनकी तड़क-भड़क के पीछे उनके बेटे की तस्करी से मिली कमाई है । छापेमारी और जाँच में पता चला है कि संगीता कुमार के बेटे ने घर में ही कारतूस और हथियार बनाने का साजो-सामान फिट किया हुआ था । छापेमारी और जाँच में जिस तरह की सूचनाएँ आ रही हैं, उनसे साफ आभास मिल रहा है कि बेटे की कारस्तानियों की संगीता कुमार को न सिर्फ पूरी जानकारी रही होगी, बल्कि उनकी मिलीभगत भी रही होगी । इस तरह की चर्चाओं ने मेरठ के रोटेरियंस, खासकर पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के सामने एक बड़ा नैतिक संकट खड़ा कर दिया है । संगीता कुमार काफी सक्रिय पूर्व गवर्नर रही हैं, और प्रायः प्रत्येक गवर्नर के कार्यक्रमों में सक्रियता और दिलचस्पी के साथ भूमिका निभाती रही हैं । ऐसे में, संगीता कुमार के बेटे से जुड़े मामले में आम रोटेरियंस की तरफ से उनसे भी सवाल पूछे जाने लगे । पूर्व गवर्नर्स के लिए मुसीबत की बात यह हुई कि पूछे गए सवालों का वह क्या जबाव दें; लिहाजा उन्होंने चुप रहने और आम रोटेरियंस से बच कर रहने में ही अपनी अपनी भलाई देखी/पहचानी । पूर्व गवर्नर्स के इस रवैये ने श्रीहरी गुप्ता की उम्मीदों को तगड़ा झटका दिया है ।
संगीता कुमार के बेटे की कारस्तानी ने वर्ष 2018-19 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए होने वाले चुनाव को दिलचस्प तरीके से प्रभावित किया है । डिस्ट्रिक्ट 3100 में रोटेरियंस की जुबान पर संगीता कुमार के बेटे के कारनामे ही हैं - ऐसे में, मेरठ का होने के कारण श्रीहरी गुप्ता के लिए किसी से रोटरी की और चुनाव की बात तक कर पाना मुश्किल हो रहा है । उनके नजदीकियों के अनुसार, वह जिससे भी अपनी उम्मीदवारी के संबंध में बात करने की कोशिश करते हैं, संगीता कुमार के बेटे का जिक्र छेड़ देता है और उलटे श्रीहरी गुप्ता से ही सवाल पूछने लगता है । श्रीहरी गुप्ता को इस बात का भी ध्यान रखना पड़ता है कि वह किसी से कहीं कोई ऐसी बात न कह दें, जो उनकी चुनावी राजनीति के लिए मुसीबत बन जाए डिस्ट्रिक्ट 3100 की पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संगीता कुमार के बेटे की कारस्तानी के खुलासे ने देशभर में तो बबाल मचाया हुआ है, लेकिन डिस्ट्रिक्ट 3100 के प्रमुख लोगों ने मुँह पर ताले डाले हुए हैं । आम रोटेरियन लेकिन सवाल पूछना चाहता है और जब भी उसे मेरठ का कोई प्रमुख रोटेरियन हाथ लगता है, तो वह सवाल जरूर पूछता है । मेरठ के पूर्व गवर्नर्स तो आम रोटेरियंस के हाथ आने से बच रहे हैं, लेकिन श्रीहरी गुप्ता को तो आम रोटेरियंस के पास जाना ही है - आम रोटेरियंस से लेकिन उन्हें जब संगीता कुमार के बेटे के कारनामों से जुड़े सवाल सुनने को मिलते हैं, तो उन्हें अपनी उम्मीदवारी मुसीबत में फँसती हुई महसूस होती है इस तरह, संगीता कुमार के बेटे की पोल-पट्टी खुलने से डिस्ट्रिक्ट में जो माहौल बना है - उसके कारण श्रीहरी गुप्ता की उम्मीदवारी के सामने दोहरा संकट खड़ा हो गया है ।

Monday, May 1, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में एक महिला प्रेसीडेंट के साथ अभद्र और अशालीन व्यवहार के आरोप के चलते मुकेश अरनेजा की हुई फजीहत के कारण सीओएल तथा इंटरनेशनल डायरेक्टर का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी का चुनावी परिदृश्य दिलचस्प बना

नई दिल्ली । मुकेश अरनेजा पर एक वरिष्ठ रोटेरियन द्वारा अपनी पत्नी से अभद्रता करने का आरोप लगाए जाने के मामले के तूल पकड़ने से रूपक जैन और जेके गौड़ अजीब मुसीबत में फँस गए हैं, और इस मुसीबत से बचने के लिए उन्होंने मुकेश अरनेजा से अपनी दूरी बनाना और दिखाना शुरू कर दिया है । उल्लेखनीय है कि रूपक जैन सीओएल का तथा जेके गौड़ इंटरनेशनल डायरेक्टर का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी का चुनाव जीतने के लिए मुकेश अरनेजा के समर्थन और सहयोग से प्रेसीडेंट्स को अपनी तरफ करने की कोशिशों में लगे हैं, लेकिन मुकेश अरनेजा के एक महिला प्रेसीडेंट से ही अशालीन हरकत करने के आरोप की गिरफ्त में आने के कारण उनकी कोशिशें मुसीबत में फँस गई हैं । इंटरनेशनल डायरेक्टर का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव में जेके गौड़ के प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार रमेश अग्रवाल के समर्थकों ने प्रेसीडेंट्स के बीच यह सवाल उछाल भी दिया है कि एक प्रेसीडेंट, और वह भी महिला प्रेसीडेंट के साथ अशालीन हरकत करने के आरोपी के समर्थक उम्मीदवार को वह यदि समर्थन देते हैं तो रोटरी समुदाय में डिस्ट्रिक्ट की कैसी छवि बनेगी ? मुकेश अरनेजा यूँ तो किसी के साथ भी बदतमीजी करने के मामले में खासे कुख्यात हैं, पर अपनी बदतमीजियों का शिकार बनाने के मामले में वह महिलाओं को भी नहीं छोड़ेंगे - इसकी उम्मीद उनके घनघोर विरोधियों को भी नहीं थी । रोटरी में सक्रिय महिलाओं के प्रति मुकेश अरनेजा अभद्र व अशालीन किस्म की बातें तो करते रहे हैं; अपने द्वारा ही समर्थित एक उम्मीदवार की पत्नी के बारे में मुकेश अरनेजा कहते/बताते रहे हैं कि अपने पति के लिए वोट जुटाने के लिए उसने तो दूसरे के घरों में पराठे तक सेंके हैं । लेकिन उनके द्वारा किसी महिला, और वह भी रोटरी पदाधिकारी से सामने सामने बदतमीजी करने का मामला पहली बार ही सामने आया है ।
रोटरी क्लब दादरी के वरिष्ठ सदस्य कुलदीप गर्ग ने एक वाट्स-ऐप ग्रुप में लिखा कि मुकेश अरनेजा ने उनकी पत्नी, जो एक क्लब की अध्यक्ष भी हैं, से एक कार्यक्रम में जिस लहजे में बात की उससे वह बहुत दुखी हैं । कुलदीप गर्ग के आरोप पर अपना पक्ष रखने तथा अपनी कारस्तानी पर शर्मिंदा होने और माफी माँगने की बजाए मुकेश अरनेजा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरुपयोग का राग आलापने लगे । हो सकता है कि कुलदीप गर्ग झूठ बोल रहे हों, या उन्हें कोई गलतफहमी हुई हो - लेकिन इसका फैसला तो लोग तब करेंगे जब मुकेश अरनेजा यह बतायेंगे कि उनके अनुसार वास्तव में हुआ क्या था ? यह बताने और अपना पक्ष रखने की बजाए मुकेश अरनेजा दार्शनिक अंदाज़ में बातें करने लगे, जिससे लोगों ने कुलदीप गर्ग के आरोप को सच मान लिया । मुकेश अरनेजा की जैसी हरकतें रहीं हैं, और जैसी उनकी छवि है - उसके कारण भी कुलदीप गर्ग के आरोप को विश्वसनीयता मिली । वाट्स-ऐप ग्रुप में मुकेश अरनेजा की खिंचाई होना शुरू हुई, तो ग्रुप के एडमिन ने ग्रुप ही बंद कर दिया । उल्लेखनीय है कि उक्त वाट्स-ऐप ग्रुप डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सतीश सिंघल ने बनाया था, और वही इसे चलवा रहे थे । मुकेश अरनेजा उनके डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर हैं । एक महिला पदाधिकारी के साथ की गई हरकत के सामने आने से मुकेश अरनेजा की हो रही फजीहत के छींटों से बचने के लिए सतीश सिंघल ने उक्त ग्रुप को ही बंद करवा दिया । सतीश सिंघल को कई लोगों ने सावधान किया है कि मुकेश अरनेजा जैसे व्यक्ति को आपने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर तो बना दिया है, लेकिन आपको यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि आपके गवर्नर-काल में मुकेश अरनेजा के कारण किसी महिला का अपमान न हो सके और कोई महिला मुकेश अरनेजा की अभद्र व अशालीन फ़ब्तियों का शिकार न बने यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि मुकेश अरनेजा को अमित जैन ने भी डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाया था, लेकिन मुकेश अरनेजा की हरकतों से तंग आकर अमित जैन ने उन्हें जल्दी ही डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद से हटा दिया था ।
मजे की बात यह है कि जिन मुकेश अरनेजा पर महिलाओं के प्रति अभद्र व अशालीन फ़ब्तियाँ कसने तथा अभी एक महिला पदाधिकारी को सामने सामने अपने व्यंग-वाणों का निशाना बनाने का आरोप लगा है, वही मुकेश अरनेजा खुद भी रोटरी में महिलाओं के लिए माहौल अनुकूल न रह जाने की शिकायत करते रहे हैं । वह कहते/बताते रहे हैं कि वह इसीलिए अपनी पत्नी को कम ही कार्यक्रमों में साथ ले जाते हैं; और 'इसीलिए' उन्होंने अपनी बेटी को रोटरी में आगे नहीं बढ़ने दिया । उल्लेखनीय है कि उनकी बेटी छह/सात वर्ष पहले डिस्ट्रिक्ट इंटरेक्ट रिप्रेजेंटेटिव के रूप में अच्छा काम करने के लिए प्रशंसा पा चुकी हैं, और उन्हें भावी रोटरी पदाधिकारी के रूप में देखा/पहचाना जा चुका है; लेकिन खुद मुकेश अरनेजा ने ही कई बार जिक्र किया है कि रोटरी के माहौल को देखते हुए ही उन्होंने अपनी बेटी को रोटरी से दूर तथा अलग कर दिया है । इस तरह की बातों पर लोगों का कहना रहा है कि मुकेश अरनेजा ने अपनी पत्नी और बेटी को तो 'बचा' लिया; लेकिन दूसरों की पत्नियों और बेटियों को वह क्यों निशाना बनाते रहते हैं ? कुछेक लोगों का तो यह भी कहना है कि अपनी पत्नी को वह इसलिए ही अधिकतर कार्यक्रमों में नहीं ले जाते हैं, ताकि अन्य महिलाओं के प्रति बदतमीजी पूर्ण बातें करने/बनाने के मौके बनाने में उनके सामने कोई बाधा न पड़े ।
कुलदीप गर्ग के आरोप के बाद महिलाओं के प्रति रवैये को लेकर मुकेश अरनेजा की जो छीछालेदर शुरू हुई है, उसने सीओएल तथा इंटरनेशनल डायरेक्टर का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनावी परिदृश्य को खासा दिलचस्प बना दिया है । इन दोनों चुनावों में क्रमशः रूपक जैन और जेके गौड़ की तरफ से ज्यादा सक्रियता है - इनके प्रतिद्धंद्धियों के रूप में क्रमशः केके गुप्ता और रमेश अग्रवाल अपनी वरिष्ठता और वरिष्ठता के नाते अपने 'अधिकार' के तर्क और वोट देने वाले प्रेसीडेंट्स के विवेक और समझदारी के भरोसे हैं केके गुप्ता और रमेश अग्रवाल को विश्वास है कि वोट देते समय प्रेसीडेंट्स इस प्रभाव में बिलकुल नहीं आयेंगे कि वोट लेने के लिए किस उम्मीदवार ने उनकी ज्यादा खुशामद की है और खुशामद करने के लिए किस उम्मीदवार ने उन्हें कितनी बार फोन किए हैं, या कौन उम्मीदवार उनसे कितनी बार मिला है; इसके बजाए वह देखेंगे और इस बात का अध्ययन व मूल्यांकन करेंगे कि उनके सामने जो उम्मीदवार हैं, उनमें से किसे रोटरी का ज्यादा अनुभव है और किसने रोटरी के लिए कितना और क्या काम किया है - और इस आधार पर कौन डिस्ट्रिक्ट व रोटरी का नाम आगे बढ़ा सकेगा ? मजेदार किस्म का उल्लेखनीय तथ्य यह है कि केके गुप्ता और रमेश अग्रवाल अपने अपने प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार के गवर्नर-काल में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर रहे हैं - यानि रूपक जैन और जेके गौड़ को अपना अपना गवर्नर-काल अच्छे से चलाने के लिए तो क्रमशः केके गुप्ता और रमेश अग्रवाल की मदद की जरूरत पड़ी और इनकी मदद के सहारे ही उन्होंने अपना अपना गवर्नर-काल पूरा किया - लेकिन उसके बाद रूपक जैन और जेके गौड़ इतने अहसानफरामोश हो गए कि क्रमशः केके गुप्ता और रमेश अग्रवाल से मिली मदद को पूरी तरह से भुला बैठे हैं । केके गुप्ता और रमेश अग्रवाल को उम्मीद है कि रूपक जैन और जेके गौड़ भले ही उनके योगदान तथा उनकी मदद को भुला बैठे हों, लेकिन वोट देने वाले प्रेसीडेंट्स अवश्य ही इस बात का ध्यान रखेंगे कि वरिष्ठ होने, निरंतर सक्रिय रहने तथा अनुभवी होने के नाते सीओएल तथा इंटरनेशनल डायरेक्टर का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए कौन उचित दावेदार है ?
रूपक जैन और जेके गौड़ को उम्मीद रही कि वरिष्ठता, सक्रियता और अनुभव में वह भले ही क्रमशः केके गुप्ता और रमेश अग्रवाल के सामने कहीं न ठहर रहे हों; लेकिन अपने खुशामदी व्यवहार तथा मुकेश अरनेजा के सहयोग व समर्थन से वह अपना बेड़ा पार करवा लेंगे । लेकिन कुलदीप गर्ग के आरोप के चलते मुकेश अरनेजा की जो नई हरकत सामने आई है और जिसके चलते उनकी जो फजीहत हुई है, उसके कारण मुकेश अरनेजा का सहयोग और समर्थन उनका काम बिगाड़ने का ही काम करेगा - इसलिए रूपक जैन और जेके गौड़ ने मुकेश अरनेजा से पीछा छुड़ाना भी शुरू कर दिया है यह नजारा देख कर ही लग रहा है कि कुलदीप गर्ग के आरोप ने सीओएल तथा इंटरनेशनल डायरेक्टर का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनावी परिदृश्य को दिलचस्प बना दिया है ।