Friday, November 17, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी का नामांकन भरने के बाद भी मुनीश गौड़ को कार्यक्रम करने देने तथा उसमें बढ़चढ़ कर शिरकत करने की रवि चौधरी की हरकत डॉक्टर सुब्रमणियन से क्लीन चिट पाने के लिए हुई डील का नतीजा है क्या ?

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी को जिस दिन वरिष्ठ रोटेरियन आभा झा चौधरी से बदतमीजी करने के मामले में निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियन की तरफ से क्लीन चिट मिली, उसी दिन डॉक्टर सुब्रमणियन के उम्मीदवार के रूप में देखे/पहचाने जा रहे मुनीश गौड़ के एक सरकारी कार्यक्रम में चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए रवि चौधरी का उपस्थित होना मात्र एक संयोग है - या यह दोनों के बीच हुई किसी 'डील' का सुबूत है ? रवि चौधरी और मुनीश गौड़ कार्यक्रम के दौरान जहाँ बैठे, वहाँ लगे हुए बैकड्रॉप की इबारत बता रही है कि वह एक सरकारी कार्यक्रम था, जिसके आयोजक मुनीश गौड़ थे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रवि चौधरी के पास उसके तीन दिन पहले तक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के लिए मुनीश गौड़ का नामांकन आ चुका था - इस नाते रवि चौधरी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की गरिमा तथा चुनावी आचार संहिता का ध्यान रखते हुए उक्त कार्यक्रम में शामिल नहीं होना चाहिए था; किंतु डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रवि चौधरी ने चूँकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की गरिमा तथा रोटरी के नियमों के पालन को तिलांजली देते हुए साजिशों, तिकड़मों, बेईमानियों व बदतमीजियों को ही अपना ध्येय/लक्ष्य बनाया हुआ है - इसलिए रवि चौधरी ने जो किया, वह उनकी हरकतों के अनुरूप ही था । रवि चौधरी की इस हरकत ने लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के एक दूसरे उम्मीदवार संजीव राय मेहरा को तगड़ा झटका दिया है । संजीव राय मेहरा और उनके साथी उम्मीद कर रहे थे कि चुनावी लड़ाई में रवि चौधरी उनका सहयोग और समर्थन करेंगे, इसलिए रवि चौधरी को मुनीश गौड़ की तरफ झुका देख कर उन्हें लगा है कि रवि चौधरी ने उनके साथ धोखा कर दिया है । संजीव राय मेहरा के कुछेक नजदीकियों का हालाँकि यह भी कहना है कि रवि चौधरी अंततः मुनीश गौड़ के साथ भी ज्यादा देर नहीं टिकेंगे और धोखेबाजीभरा अपना असली वाला रंग दिखाते हुए उन्हें भी धोखा ही देंगे ।
संजीव राय मेहरा के नजदीकियों का ही विश्वास है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की गरिमा और चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए रवि चौधरी ने मुनीश गौड़ के एक सरकारी कार्यक्रम में शामिल होना डॉक्टर सुब्रमणियन के साथ हुई एक डील के तहत ही स्वीकार किया होगा । वरिष्ठ रोटेरियन आभा झा चौधरी के साथ बदतमीजी करने के मामले में फँसी अपनी गर्दन को बाहर निकालने के लिए रवि चौधरी को डॉक्टर सुब्रमणियन की मदद की जरूरत थी ही, और इस जरूरत को पूरा करने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की गरिमा तथा चुनावी आचार संहिता को ठेंगे पर रखना रवि चौधरी के लिए कोई मुश्किल बात नहीं थी । मजे की बात यह देखने को मिली है कि रवि चौधरी की डिस्ट्रिक्ट टीम की प्रमुख पदाधिकारी के रूप में आभा झा चौधरी द्वारा वर्ल्ड पोलियो डे पर कार्यक्रम आयोजित करना और उसमें प्रेसीडेंट्स की भागीदारी को सुनिश्चित करना तो रवि चौधरी को नागवार गुजरा था, और इसके लिए उन्होंने आभा झा चौधरी के साथ बदतमीजी तक कर डाली थी; लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवारी का नामांकन प्रस्तुत कर देने के बाद मुनीश गौड़ द्वारा एक सरकारी कार्यक्रम की आड़ में रोटेरियंस को लेकर आयोजन करने, उसमें रोटरी क्लब्स को शामिल करने तथा प्रेसीडेंट्स को आमंत्रित करने पर रवि चौधरी को कोई आपत्ति नहीं हुई । चुनावी आचार संहिता के संबंध में रोटरी इंटरनेशनल के नियमों व दिशा-निर्देशों के पालन को लेकर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रवि चौधरी को यदि जरा सी भी समझ और तमीज होती, तो वह यह कार्यक्रम नहीं होने देते - लेकिन समझ व तमीज के मामले में लगातार फेल साबित होते रहे रवि चौधरी एक बार फिर फेल हो गए, और उन्होंने न सिर्फ यह कार्यक्रम होने दिया बल्कि बढ़चढ़ कर इसमें भाग भी लिया ।
चुनावी आचार संहिता के संबंध में रोटरी इंटरनेशनल के नियमों व दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करती तथा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की गरिमा को छिन्न-भिन्न करती रवि चौधरी की इस हरकत के पूरा होते ही कुछ घंटों के अंदर ही रवि चौधरी को चूँकि डॉक्टर सुब्रमणियन की तरफ से क्लीन चिट मिल गई - इससे लोगों को डॉक्टर सुब्रमणियन व रवि चौधरी के बीच डील होने का शक हुआ है । मुनीश गौड़ और डॉक्टर सुब्रमणियन एक ही क्लब के सदस्य हैं, तथा मुनीश गौड़ को डॉक्टर सुब्रमणियन के उम्मीदवार के रूप में ही देखा/पहचाना जा रहा है । एक उम्मीदवार के रूप में मुनीश गौड़ की सक्रियता का कोई खास नोटिस अभी तक नहीं लिया जा सका था । लोगों को लगता है कि आभा झा चौधरी के साथ बदतमीजी करने के मामले में रवि चौधरी की गर्दन फँसी, और मामले की जाँच कमेटी का मुखिया पद डॉक्टर सुब्रमणियन को मिला - तो मुनीश गौड़ और डॉक्टर सुब्रमणियन को रवि चौधरी को अपने 'पक्ष' में लाने का मौका नजर आया । रवि चौधरी वैसे तो घोषणा करते रहते हैं कि उम्मीदवारों की गतिविधियों पर उनकी पूरी निगाह है, और कोई भी उम्मीदवार उन्हें यदि चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन करता हुआ दिखा तो वह उसका नामांकन रद्द कर देंगे - लेकिन मुनीश गौड़ के मामले में 14 नवंबर के कार्यक्रम में उन्हें चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन होता हुआ नहीं नजर आया; तो इसका कारण यही समझा जा रहा है कि उनकी डॉक्टर सुब्रमणियन के साथ यही डील हुई होगी कि वह मुनीश गौड़ के कार्यक्रम को न सिर्फ होने देंगे बल्कि उसमें बढ़चढ़ कर शिरकत भी करेंगे, और इसके बदले में डॉक्टर सुब्रमणियन उन्हें आभा झा चौधरी के साथ बदतमीजी करने के मामले में तमाम साक्ष्य होने के बावजूद क्लीन चिट दे देंगे । यह दोनों 'काम' एक ही दिन में कुछ घंटों के अंतराल पर जिस तरह संपन्न हुए, उससे भी डील होने की बात विश्वसनीय लगती है ।
डिस्ट्रिक्ट में कई लोगों के बीच सवाल उठा है कि डिस्ट्रिक्ट के वरिष्ठ पूर्व गवर्नर और पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता वैसे तो डिस्ट्रिक्ट व रोटरी की छवि को लेकर बहुत चिंतित रहते हैं, लेकिन चुनावी आचार संहिता के खुल्लमखुल्ला उल्लंघन में भागीदार बनने की रवि चौधरी की हरकत पर उन्होंने क्या किया है ? इसका एक ही जबाव सुनने को मिल रहा है कि उन्होंने न कुछ किया है और न वह कुछ करेंगे; वह तो बस धृतराष्ट्र की तरह आँखों पर पट्टी बाँध कर रवि चौधरी को दुर्योधन और दुःशासन की भूमिका एक साथ निभाने का मौका देते रहेंगे ।
कार्यक्रम के बैकड्रॉप की तस्वीर :

Thursday, November 16, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में इंटरनेशनल बोर्ड सदस्यों के साथ डिनर में शामिल होने के खर्च के हिसाब-किताब में घपलेबाजी के आरोपों के बीच विनय गर्ग द्वारा सुशील अग्रवाल के लिए बनाई गई फजीहत की स्थिति मल्टीपल की राजनीति में क्या सचमुच एक बड़ी 'घटना' है ?

नई दिल्ली । लायंस इंटरनेशनल के बोर्ड सदस्यों के साथ डिनर में शामिल होने वाले लोगों से पैसे लेने या न लेने के मामले में असमंजस के चलते कोऑर्डीनेटर की भूमिका निभा रहे पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील अग्रवाल को भारी फजीहत का सामना करना पड़ा - और उनकी इस फजीहत का ठीकरा मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन विनय गर्ग के सिर फोड़े जाने के चलते मामला और गर्मा गया है । मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में इस वर्ष एक अजब-गजब तमाशा यह चल रहा है कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के पद पर तो विनय गर्ग हैं, लेकिन मल्टीपल की कमान तेजपाल खिल्लन और सुशील अग्रवाल के हाथों में ही देखी/पहचानी जाती है - जिस कारण कई बार ऐसे फैसले हो जाते हैं, जो विनय गर्ग की किरकिरी का कारण बनते हैं । लेकिन इंटरनेशनल बोर्ड सदस्यों के साथ डिनर कराने का मौका देने के लिए पैसे लेने या न लेने के मामले में विनय गर्ग ने अपने चेयरमैन होने की दबंगई दिखाई, तो बेचारे सुशील अग्रवाल को भारी फजीहत का सामना करना पड़ा । मल्टीपल काउंसिल के ही कुछेक पदाधिकारियों ने, जो डिनर का मुफ्त निमंत्रण पाने की कोशिशों के असफल हो जाने के कारण विनय गर्ग से खफा हुए हैं, सुशील अग्रवाल को विनय गर्ग के खिलाफ भड़काने का काम किया - लेकिन सुशील अग्रवाल भी चूँकि मौके की नजाकत समझ रहे हैं, इसलिए उन्होंने फिलहाल भड़काने वाली बातों को दरकिनार कर फजीहत का घूँट चुपचाप गटक जाने में ही अपनी भलाई देखी/पहचानी है ।
इंटरनेशनल बोर्ड सदस्यों के साथ डिनर में मल्टीपल के पदाधिकारियों और लोगों को शामिल करने को लेकर चूँकि कोई स्पष्ट नीति नहीं थी, इसलिए भी इस मामले में मनमानियाँ चलीं - और पैसों के घपले तक के आरोप चर्चा में हैं । उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पहले इंटरनेशनल डायरेक्टर विजय राजू की तरफ से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स तथा अन्य पदाधिकारियों को संदेश मिला था कि जो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अपने डिस्ट्रिक्ट में पाँच सौ या उससे अधिक नए सदस्य जोड़ चुका होगा, उसे इंटरनेशनल बोर्ड सदस्यों के साथ डिनर में शामिल होने का मौका मुफ्त में मिलेगा । मजे की बात यह रही कि उनके इस ऑफर को किसी ने भी गंभीरता से नहीं लिया । डिनर के एक दिन पहले तक यही स्पष्ट नहीं था कि किस से पैसे लेने हैं और किस से नहीं लेने हैं । इसी असमंजसता के चलते दिल्ली में आयोजित हुई बोर्ड मीटिंग की तैयारी करने/करवाने में दिन/रात एक करने वाले डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के पूर्व गवर्नर दीपक तलवार से पैसे देने को कह दिया गया । तैयारी में हाथ बँटाने वाले डिस्टिक्ट 321 ए थ्री के ही एक अन्य पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश त्रेहन से भी जब पैसे देने के लिए कहा गया तो वह बुरी तरह नाराज हो गए, और उन्होंने यह कहते हुए बबाल काटा कि यहाँ काम भी करो, और रोटी खाने के लिए पैसे भी दो - तब उनके पैसे माफ कर दिए गए । उनके डिनर के पैसे माफ करने का फैसला हुआ, तब फिर दीपक तलवार से भी पैसे नहीं लेने का फैसला हुआ । इस तरह राकेश त्रेहन के बबाल से दीपक तलवार को भी फायदा हो गया । यह हालाँकि किसी की भी समझ में नहीं आया कि इनके डिनर का पैसा माफ करने का फैसला किस स्तर की अथॉरिटी ने किया और इनका पैसा आखिर किस 'अकाउंट' में एडजस्ट हुआ ?
इससे भी बड़ा तमाशा डिस्ट्रिक्ट्स के तीनों/तीनों पदाधिकारी गवर्नर्स के मामले में हुआ । कार्यक्रम के कोऑर्डीनेटर के रूप में सुशील अग्रवाल ने कार्यक्रम से दो दिन पहले मेल लिख कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को बाकायदा सूचना दी कि जो भी गवर्नर डिनर में शामिल होना चाहता है, वह साढ़े नौ हजार रुपये देकर अपना रजिस्ट्रेशन करवा ले । जिस किसी ने सुशील अग्रवाल से यह कंफर्म करने की कोशिश भी की कि क्या डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को भी पैसे देने होंगे, तो उसे यही सुनने को मिला कि हाँ, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को भी पैसे देने होंगे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने लेकिन जब विनय गर्ग से इस बारे में बात की, तो विनय गर्ग का कहना रहा कि अरे आप सुशील अग्रवाल की बात छोड़ो, उनके चक्कर में न पड़ो - मैं आपको पास देता/दिलवाता हूँ । विनय गर्ग की पहल पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर तथा फर्स्ट व सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को उनके जीवन साथी के साथ डिनर शामिल होने का मौका मुफ्त में मिला । ऐसे में, लोगों के बीच सवाल उठा कि विनय गर्ग की पहल से यदि डिस्ट्रिक्ट के पदाधिकारियों को इंटरनेशनल बोर्ड सदस्यों के साथ डिनर में शामिल होने का मौका मुफ्त में मिल सकता था, तो फिर सुशील अग्रवाल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से प्रति व्यक्ति साढ़े नौ हजार रुपये देने/जमा कराने के लिए दबाव क्यों बना रहे थे ? गौर करने वाला तथ्य यह है कि इंटरनेशनल बोर्ड सदस्यों के 13 नवंबर के डिनर को लायंस कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ इंडिया एसोसिएशन (एलसीसीआईए) द्वारा स्पॉन्सर करने का तो जिक्र मिलता है, लेकिन इस बात का कहीं कोई जिक्र नहीं है कि बाकी लोगों के डिनर का खर्च कौन उठायेगा । यह अनुमान की बात रही कि साढ़े नौ हजार रुपये का रजिस्ट्रेशन इसीलिए रखा गया है कि डिनर में शामिल होने वाले लोग अपना खर्चा स्वयं करेंगे । यहाँ तक कोई समस्या नहीं हुई । समस्या तब शुरू हुई जब अलग अलग कारणों से तथा अलग अलग परिस्थितियों के चलते कई लोगों को इंटरनेशन बोर्ड सदस्यों के साथ मुफ्त में डिनर करने का मौका मिला । सवाल यह उठा कि इनका खर्चा कहाँ से मिला, और जिन लोगों से पैसे लिए गए - वह किस अकाउंट में गए ?
यह सामान्य से सवाल इसलिए बबाल बनते नजर आ रहे हैं, क्योंकि इनका जबाव किसी से नहीं मिल पा रहा है । पैसे भी अलग अलग पदाधिकारियों ने लिए - किसी ने केएम गोयल को पैसे दिए, किसी ने सुशील अग्रवाल को तथा किसी ने विनय गर्ग को पैसे देकर डिनर का टिकट लिया । एक डिनर की कीमत साढ़े नौ हजार रुपये रखे जाने को लेकर भी कई लोगों की आपत्ति रही और उन्होंने इसे काफी महँगा आँका/बताया । इससे भी हिसाब/किताब में घपलेबाजी होने के आरोप लगे हैं । हिसाब-किताब में घपलेबाजी के आरोपों के बीच मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन होने का रुतबा दिखा/जता कर विनय गर्ग ने पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील अग्रवाल के लिए जो फजीहत वाली स्थिति बनाई है - उसे मल्टीपल की राजनीति में एक बड़ी 'घटना' के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है ।

Wednesday, November 15, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल का रीजनल रोटरी फाउंडेशन का कोऑर्डीनेटर बनना क्या सचमुच खटाई में पड़ गया है, या यह सुशील गुप्ता को झटका देने के लिए रचा गया सिर्फ एक तमाशा है ?

नई दिल्ली । रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर पद के लिए आवेदन माँगने की रोटरी इंटरनेशनल की कार्रवाई और इस कार्रवाई के चलते करीब बीस लोगों के आवेदनों के आ जाने से डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनोद बंसल को तगड़ा झटका लगा है, और इस पद पर उनकी नियुक्ति को लेकर लगाई जा रही उम्मीदें ध्वस्त होती हुई दिख रही हैं । रोटरी के बड़े नेताओं के बीच इस स्थिति को उनके पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर्स सुशील गुप्ता और शेखर मेहता के नजदीक होने के दंड के रूप में भी देखा/पहचाना जा रहा है । दरअसल इन दोनों पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर्स के साथ नजदीकी के चलते विनोद बंसल की रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर पद पर नियुक्ति पक्की समझी जा रही थी, पर अब लग रहा है कि इन्हीं दोनों की वजह से उक्त पद पर विनोद बंसल की नियुक्ति को लेकर खतरा खड़ा हो गया है । विनोद बंसल के लिए पैदा हुआ यह खतरा सुशील गुप्ता के लिए भी बड़ी चुनौती के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । दरअसल विनोद बंसल को आजकल सुशील गुप्ता की 'आँख के तारे' के रूप में देखा/पहचाना जाता है - ऐसे में विनोद बंसल की एक पद पर स्वाभाविक रूप से होने जा रही नियुक्ति को रोकने के लिए नियुक्ति-प्रक्रिया का पैटर्न ही बदल दिया जाए, तो यह विनोद बंसल के साथ-साथ उनके सबसे बड़े समर्थक के लिए भी झटके वाली बात तो है ही । कुछेक लोगों को हालाँकि यह भी लग रहा है कि उक्त पद पर नियुक्ति अंततः तो विनोद बंसल की ही होगी; लोगों से इस पद के लिए आवेदन माँगने का नाटक शेखर मेहता द्वारा रचा गया है - और इसके पीछे कुछ उनके कुछ गहरे राजनीतिक उद्देश्य हैं । इस नाटक के जरिए शेखर मेहता ने वास्तव में एक तीर से कई शिकार कर लेने की व्यूह रचना की है ।
रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर का पद अभी कुछ दिन पहले तक कमल सांघवी के पास था, जो जोन 6 ए में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार के रूप में चुने जाने पर उन्होंने हाल ही में छोड़ दिया है । विनोद बंसल चूँकि उनके साथ असिस्टेंट रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर के पद पर रहे हैं, इसलिए माना/समझा जा रहा था कि कमल सांघवी द्वारा खाली की गई कुर्सी उन्हें स्वतः ही मिल जाएगी । लोग तो कमल सांघवी द्वारा खाली की गई कुर्सी पर विनोद बंसल की ताजपोशी होने का इंतजार ही कर रहे थे - लेकिन मामले में अचानक से ट्विस्ट आ गया है । रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर पद के लिए आवेदन माँगने की कार्रवाई वास्तव में एक अप्रत्याशित कार्रवाई है । रोटरी में रिसोर्स ग्रुप के पदों के लिए आवेदन माँगने का रिवाज नहीं है, यहाँ तो लॉबिइंग से ही पद मिलते हैं । विनोद बंसल के लिए लॉबिइंग भी तगड़ी ही देखी/समझी जा रही थी, लेकिन जिस अचानक तरीके से रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर पद के लिए आवेदन माँगने का फरमान आया - उक्त पद पर विनोद बंसल की ताजपोशी होने की सारी तैयारी धरी रह गई ।
रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर पद पर रहते हुए कमल सांघवी के इंटरनेशनल डायरेक्टर 'बनने' से इस पद की महत्ता अचानक से बढ़ गई है । इस महत्ता को बढ़ाने में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए विनोद बंसल की संभावित उम्मीदवारी की चर्चा ने भी बड़ा योगदान दिया है । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए जोन 4 में होने वाले अगले चुनाव में विनोद बंसल की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने की चर्चा है - इस चर्चा की पृष्ठभूमि में उन्हें रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर की कुर्सी मिलने का एक अलग और खास महत्त्व स्वाभाविक रूप से हो गया । ऐसे में उनके विरोधियों का सक्रिय होना भी स्वाभाविक है । कुछेक लोगों को लगता है कि विरोधियों के साथ-साथ समर्थकों ने भी विनोद बंसल की राह को मुश्किल बनाने का काम किया है, और इसलिए उनकी राह सचमुच में मुश्किल हो गई है । यह जो अचानक से झमेला पैदा हो गया है, उसके लिए कुछेक लोग शेखर मेहता को भी जिम्मेदार ठहराते हैं । शेखर मेहता को यूँ तो विनोद बंसल के समर्थक के रूप में ही देखा/पहचाना जाता है, लेकिन सुशील गुप्ता के साथ विनोद बंसल की बढ़ती नजदीकी को देख/जान कर शेखर मेहता उनके प्रति कुछ अनमने से हुए प्रतीत दिखे हैं । कुछेक अन्य लोगों को हालाँकि यह बात समझ में नहीं आती है क्योंकि शेखर मेहता को सुशील गुप्ता के खेमे के ही सदस्य के रूप में देखा जाता है; लेकिन 'इस' बात को कहने वाले लोगों का तर्क है कि एक खेमे में भी तो कई कई उपखेमे होते ही हैं और एक खेमे के लोगों के बीच टाँग-खिंचाई होती ही है । दरअसल चुनावी राजनीति के समीकरणों का ताना-बाना कुछ तो यूँ भी उलझा हुआ होता ही है, जिसे चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों के बीच की होड़ और उलझा देती है - जिसके चलते कई बार बड़े आश्चर्यकारी तमाशे देखने को मिलते हैं । रीजनल रोटरी फाउंडेशन कोऑर्डीनेटर की नई नियुक्ति को लेकर शुरू हुआ तमाशा एक ऐसा ही तमाशा है । उम्मीद की जा रही है कि इस तमाशे के अभी और कुछ रंग देखने को मिलेंगे ।

Tuesday, November 14, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी द्वारा की गई बदतमीजी के मामले में जाँच अधिकारी के रूप में निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियन ने तथ्यों की जैसी जो अनदेखी की है, उसने जाँच के काम को पूरी तरह मजाक बनाते हुए मामले को बिगाड़ और दिया है

नई दिल्ली । वरिष्ठ रोटेरियन आभा झा चौधरी के साथ की गई बदतमीजी के मामले में रोटरी इंटरनेशनल द्वारा गठित की गई जाँच कमेटी का जिम्मा डॉक्टर सुब्रमणियन को मिलने से आरोपी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी ने जिस तरह से राहत महसूस की थी, वह सचमुच उन्हें मिल भी गई है । रवि चौधरी की उम्मीदों के अनुसार, डॉक्टर सुब्रमणियन ने अपनी जाँच में रवि चौधरी को तो क्लीन चिट दे ही दी है, उलटे आभा झा चौधरी को ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की गरिमा को गिराने का जिम्मेदार ठहरा दिया है । डॉक्टर सुब्रमणियन के इस फैसले से उन रोटेरियंस को गहरी निराशा हुई है जो ईमानदारी से और जी-जान लगाकर रोटरी का काम करते हैं और उसके बाद भी बड़े पदाधिकारियों की प्रताड़ना का शिकार होते हैं - और फिर जिन्हें न्याय भी नहीं मिलता है; तथा अपने साथ हुए दुर्व्यवहार की शिकायत करने के लिए दोषी और ठहरा दिए जाते हैं। इस प्रकरण ने असित मित्तल कांड की याद को पुनर्जीवित कर दिया है । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर असित मित्तल ने अपनी प्रोफेशनल लूट-खसोट में रोटेरियंस को भी शिकार बनाया था; रोटरी के नेताओं और पदाधिकारियों के बीच कई बार बात हुई थी कि असित मित्तल की हरकतें रोटरी को बदनाम करने वाली हैं, इसलिए रोटरी में उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए - किंतु रोटरी के तुर्रमखाँ समझे जाने वाले नेता कार्रवाई करने का साहस नहीं कर सके और आँखों पर पट्टी बाँधे धृतराष्ट्र बने रहे । लेकिन पाप का घड़ा तो फूटता ही है - असित मित्तल की हरकतों के प्रति रोटरी के नेताओं ने भले ही आँखें बंद कर ली हों, लेकिन देश के कानून ने असित मित्तल को जेल के सींखचों के पीछे पहुँचा दिया । रोटरी के लिए शर्मनाक स्थिति यह बनी कि एक 'अपराधी' को उसने पालने/पोसने और बचाने का काम किया - जो अब अपनी करतूतों के कारण जेल में बंद होने के चलते डिस्ट्रिक्ट के साथ-साथ रोटरी की पहचान, गरिमा और प्रतिष्ठा को कलंकित करने का कारण बन रहा है ।
मजेदार संयोग है कि रवि चौधरी उसी असित मित्तल के बड़े नजदीकी यार रहे हैं । असित मित्तल के गवर्नर-काल में ही रवि चौधरी पहली बार उम्मीदवार बने थे, और रवि चौधरी को चुनवाने के लिए असित मित्तल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की सारी मर्यादा को तार-तार कर दिया था - और इस प्रक्रिया में प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार संजय खन्ना को तरह तरह से नीचा दिखाने और अपमानित करने की हद तक गए थे । तमाम तिकड़मों के बावजूद रवि चौधरी उस वर्ष लेकिन चुनाव नहीं जीत पाए थे, और संजय खन्ना अच्छे बहुमत से चुनाव जीते थे । यह तथ्य क्या यह संकेत दे रहा है कि असित मित्तल के मामले में रोटरी पदाधिकारी जिस तरह से न्याय करने और अपनी गरिमा व प्रतिष्ठा बचाने में असफल रहे थे, ठीक वही कहानी अब रवि चौधरी के मामले में दोहराई जा रही है । असित मित्तल के मामले में न्याय की गुहार लगाने वालों को जिस तरह से देश के कानून से मदद मिली थी, रवि चौधरी के मामले में भी न्याय अब क्या देश का कानून ही करेगा ? आभा झा चौधरी की तरफ से संकेत मिले हैं कि रोटरी में न्याय न मिलने की सूरत में वह देश के कानून से न्याय पाने की कोशिश करेंगी ।
आभा झा चौधरी की शिकायत पर रोटरी इंटरनेशनल ने न्याय करने के नाम पर जो तमाशा किया, वह इस बात का सुबूत भी है कि इस मामले में रोटरी के जिन भी पदाधिकारियों ने फैसला किया/लिया - उनकी मंशा न्याय करने की थी ही नहीं । न्याय करने के 'काम' की पहली जरूरत यही समझी/पहचानी जाती है कि न्याय हो - और न्याय होता हुआ 'दिखे' भी । आभा झा चौधरी की शिकायत की जाँच करवाने के मामले में पहला घपला तो यही हुआ कि जाँच की जिम्मेदारी रवि चौधरी से ठीक पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रहे डॉक्टर सुब्रमणियन को सौंप दी गई । इस फैसले पर लोगों को हैरानी भी हुई - क्योंकि न्याय करते हुए 'दिखने' के लिए जरूरी था कि जाँच का काम किसी दूसरे डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर को सौंपा जाता । और यदि घटना वाले डिस्ट्रिक्ट में ही किसी को जिम्मेदारी सौंपनी थी, तो किसी वरिष्ठ पूर्व गवर्नर को सौंपनी चाहिए थी । डॉक्टर सुब्रमणियन और रवि चौधरी पिछले तीन वर्षों से डिस्ट्रिक्ट की प्रशासनिक व्यवस्था साथ-साथ देखते/सँभालते रहे हैं; ऐसे में रवि चौधरी पर लगे आरोपों के मामले में डॉक्टर सुब्रमणियन से निष्पक्ष जाँच की उम्मीद कैसे की जा सकती है ? इससे भी बड़े झमेले का कारण यह रहा कि रवि चौधरी के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद पर रहते हुए जाँच की गई । जाँच न्यायपूर्ण और पक्षपातरहित होते हुए 'दिखे' - इसके लिए जरूरी था कि जाँच की कार्रवाई होने तक की अवधि के लिए रवि चौधरी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद से हटाया जाता । आभा झा चौधरी ने इसकी माँग भी की थी, लेकिन उनकी माँग को यह कहते हुए अनसुना कर दिया गया कि रोटरी में इस तरह की व्यवस्था नहीं है । अब होने या न होने की बात तो यह है कि रोटरी में तो यह व्यवस्था भी नहीं है कि कोई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अपनी ही टीम की वरिष्ठ महिला पदाधिकारी के साथ बदतमीजी करे । इसलिए यदि ऐसी स्थिति बनती है तो उससे निपटने के लिए भी तो रोटरी को व्यवस्था करना पड़ेगी ।
जाँच अधिकारी के रूप में निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डॉक्टर सुब्रमणियन ने तथ्यों की जैसी जो अनदेखी की है, उसने रवि चौधरी द्वारा की गई बदतमीजी की शिकायत की जाँच को पूरी तरह मजाक बना दिया है । रवि चौधरी को उन्होंने जिस एकतरफा तरीके से क्लीन चिट दे दी है, उससे साबित हुआ है कि जाँच अधिकारी के रूप में उन्होंने न तो घटना की परिस्थिति पर गौर किया है और न ही मौके पर मौजूद लोगों की गवाही का संज्ञान लिया है । कुछ लोगों को उम्मीद थी कि रवि चौधरी पर बदतमीजी करने के आरोप की जाँच के जरिए/बहाने दोनों पक्षों के सम्मान को बनाये रखते हुए मामले को वास्तव में निपटाने की कोशिश की जाएगी - लेकिन जिस एकतरफा तरीके से रवि चौधरी को क्लीन चिट देने तथा उलटे आभा झा चौधरी पर ही आरोप मढ़ देने का काम किया गया है - उससे मामला हल होने की बजाये और बिगड़ता नजर आ रहा है ।

Sunday, November 12, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू में जेपी सिंह से 'मनचाही' मदद न मिलती देख अपनी उम्मीदवारी के प्रति ढीले पड़ते मदन बत्रा ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए रमन गुप्ता की राह को आसान बनाने का काम किया

सोनीपत । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए करीब दो सप्ताह पहले मदन बत्रा की उम्मीदवारी प्रस्तुत होने के साथ जेपी सिंह खेमे के लोगों में जो जोश पैदा हुआ था, मदन बत्रा का रवैया देखते हुए वह सिर्फ दो सप्ताह में ही न सिर्फ ठंडा पड़ गया है - बल्कि खेमे के लोगों के बीच कलह भी पैदा कर गया है । जेपी सिंह खेमे के लोगों ने अभी से मानना/कहना शुरू कर दिया है कि मदन बत्रा को उम्मीदवार बना कर खेमे के नेताओं ने अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मार ली है, और मदन बत्रा की उम्मीदवारी सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में खेमे के लिए आत्मघाती साबित होगी । अलग अलग क्लब्स व शहरों में जेपी सिंह खेमे के जो लोग हैं, पिछले दो सप्ताह में उनके साथ घटे/हुए अनुभवों के आधार पर खेमे के नेताओं ने पाया कि मदन बत्रा ने न तो अपनी खुद की तरफ से सक्रिय होने को लेकर दिलचस्पी दिखाई है और न ही किसी की सलाह पर अमल करने का प्रयास किया - हर किसी को वह यही कहते हुए टरका रहे हैं कि जेपी सिंह से बात करो । जिन लोगों ने जेपी सिंह से बात की, उनका कहना है कि जेपी सिंह ने भी यह कहते हुए बात को टाला कि - मैं देखता हूँ । मदन बत्रा अपनी उम्मीदवारी के अभियान को चलाने के मामले में अपने ही क्लब के सदस्य और पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनिल सेठ तक को विश्वास में नहीं ले रहे हैं । जेपी सिंह की तरफ से उन्हें सलाह मिली थी कि वह सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर गुरचरण सिंह भोला के साथ तालमेल बनाएँ और काम करें, मदन बत्रा लेकिन गुरचरण सिंह भोला को भी तवज्जो देते हुए नहीं दिख रहे हैं ।
मदन बत्रा के नजदीकियों के अनुसार, मदन बत्रा चाहते हैं कि उनकी उम्मीदवारी के अभियान की कमान जेपी सिंह खुद सँभाले । जेपी सिंह लेकिन अभी फिलहाल किसी ऐसे झमेले में नहीं फँसना चाहते हैं, जिसके चलते उनका विनय गर्ग एंड टीम से टकराव पैदा हो और बढ़े । जेपी सिंह को अभी अपनी इंटरनेशनल डायरेक्टर(ई) पर मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट की पक्की वाली मोहर लगवानी है, और मीसल्स रूबेला के नाम पर चलाए जा रहे कार्यक्रमों के खर्चों के लिए रकम जुटाने वाले चेक्स पर मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के रूप में विनय गर्ग के बार-बार हस्ताक्षर करवाते रहने हैं । इन दोनों कामों में कोई विवाद और या अड़चन पैदा न हो - इसलिए जेपी सिंह अभी डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के पचड़े में पड़ने से बचना चाहते हैं, और इसलिए अभी वह मदन बत्रा की उम्मीदवारी के अभियान की बागडोर को सीधे सीधे पकड़ने से बच रहे हैं । जेपी सिंह के इस 'बचने' को मदन बत्रा शक की निगाह से देख रहे हैं, और आशंकित बने हुए हैं कि कहीं जेपी सिंह पिछली बार की तरह इस बार भी तो उन्हें इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं । दूसरे लोगों की तरह मदन बत्रा भी जानते हैं कि इस वर्ष सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी के लिए जेपी सिंह की पहली पसंद हरीश वाधवा थे, जो काफी हद तक अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए तैयार भी हो गए थे - लेकिन ऐन मौके पर फिर वह पीछे हट गए थे; दरअसल उनके कुछेक खास राजनीतिक दोस्तों/समर्थकों ने उन्हें साफ कह/बता दिया था कि वह इस वर्ष रमन गुप्ता की उम्मीदवारी को ही समर्थन देंगे, इसलिए हरीश वाधवा ने फिर उम्मीदवारी प्रस्तुत करने का विचार त्याग दिया - और तब जेपी सिंह ने मदन बत्रा को उम्मीदवार बनने के लिए राजी किया । जाहिर है कि मदन बत्रा, उम्मीदवारी के मामले में जेपी सिंह की सेकेंड के साथ-साथ मजबूरी की भी च्वाइस हैं । यह जानते/समझते हुए भी मदन बत्रा उम्मीदवार तो बन गए, लेकिन वह जेपी सिंह की ही निगरानी में अपना अभियान चलाना चाहते हैं - उन्हें लगता है कि इस तरीके से वह जेपी सिंह पर निगरानी रख सकेंगे, और 'इस्तेमाल' होने से बचे रहेंगे ।
मदन बत्रा जिस तरीके से दूसरे प्रमुख नेताओं और लोगों को इग्नोर कर रहे हैं, उससे उन्होंने अपने ही खेमे के लोगों को अपने से दूर कर लिया है । लोगों को मदन बत्रा का सबसे बुरा सुलूक तो सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर गुरचरण सिंह भोला के साथ देखने/सुनने को मिला है । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने के नाते गुरचरण सिंह भोला उनके प्रभावशाली मददगार हो सकते थे, जेपी सिंह ने भी उन्हें गुरचरण सिंह भोला के साथ मिल कर काम करने का सुझाव दिया था - मदन बत्रा लेकिन इस अकड़ में हैं कि वह लायनिज्म में गुरचरण सिंह भोला से चूँकि सीनियर हैं, इसलिए गुरचरण सिंह भोला को खुद उनकी मदद करने के लिए उनके पास आना चाहिए । लोगों का कहना लेकिन यह है कि मदन बत्रा लायनिज्म में भले ही गुरचरण सिंह भोला से सीनियर हों, लेकिन उन्हें अब यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने के नाते लायनिज्म में गुरचरण सिंह भोला की हैसियत अब उनसे बड़ी हो गई है - और इसके अलावा अब जरूरत मदन बत्रा की है, प्यासे वह हैं - प्यासे को ही कुएँ के पास जाना होता है, कुआँ प्यासे के पास नहीं जाता है; इसलिए मदन बत्रा को अपनी अकड़ छोड़ कर मदद लेने के लिए जूनियर्स के पास जाना ही होगा । मदन बत्रा के इसी तरह के रवैये को देखते हुए उनके अपने खेमे के नेताओं तथा अन्य लोगों ने ही कहना शुरू कर दिया है कि इस तरह के बर्ताव के चलते मदन बत्रा के लिए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए इस वर्ष होने वाले चुनाव में सत्ता खेमे के उम्मीदवार के रूप में रमन गुप्ता का मुकाबला कर पाना मुश्किल ही होगा ।
मदन बत्रा अपने रवैये और - अपने रवैये पर जाहिर हो रही अपने ही खेमे के लोगों की प्रतिक्रिया के चलते सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की इस वर्ष की चुनावी दौड़ में शामिल होने के साथ ही उससे बाहर होते हुए नजर आ रहे हैं । उनके अपने खेमे के लोगों का ही मानना और कहना है कि इस वर्ष के चुनाव को लेकर सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के सत्ता खेमे के उम्मीदवार के रूप में रमन गुप्ता ने जिस तरह की तैयारी दिखाई है, और अपनी तैयारी से लोगों के बीच जैसी पैठ बनाई है - उसका मुकाबला कर पाना मदन बत्रा के बस की बात नहीं है । मदन बत्रा के राजनीतिक उस्ताद जेपी सिंह अपने चक्करों में फँसे हैं, और ऐसे में वह मदन बत्रा के लिए उस तरह से कुछ नहीं कर सकते हैं - जिस तरह से मदन बत्रा सोचते और चाहते हैं । यह बात शायद मदन बत्रा ने भी समझ ली है, और इसीलिए वह घोषणा करने के बावजूद अपनी उम्मीदवारी को लेकर आशंकित हैं और कुछ करने से बच रहे हैं । यह स्थिति रमन गुप्ता की राह को और आसान बनाती नजर आ रही है ।

Saturday, November 11, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की एक्जामिनेशन कमेटी के सदस्य के रूप में राजेश शर्मा की चार्टर्ड एकाउंटेंट्स परीक्षाओं को मजाक बना देने की हरकत ने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे और वाइस प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता की कार्य व निर्णय क्षमता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य राजेश शर्मा द्वारा की गई एक हरकत के पकड़ में आने से अभी भी चल रही चार्टर्ड एकाउंटेंट्स परीक्षा की पूरी प्रक्रिया संदेह के घेरे में आ गई है, और यह साबित हो गया है कि परीक्षाओं को ईमानदारी से करवा सकने की इंस्टीट्यूट की व्यवस्था को 'बेईमान' बने रखवालों ने ही छिन्न-भिन्न कर दिया है । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच पिछले कुछ समय से चर्चा तो गर्म थी कि नबंवर/दिसंबर में हो रही परीक्षाओं में राजेश शर्मा ने कई परीक्षा केंद्रों पर अपने चहेतों को ऑब्जर्वर के रूप में नियुक्ति दिलवाई है, लेकिन इस चर्चा को सिर्फ एक आरोप के रूप में देखा जा रहा था । चूँकि प्रोफेशन के लोगों के बीच राजेश शर्मा की खासी बदनामी है, और प्रोफेशन के लोगों के बीच उन्हें एक 'दलाल' के रूप में देखा/पहचाना जाता है; पिछले ही दिनों दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट के मुख्यालय में उनकी उपस्थिति में 'राजेश शर्मा चोर है' जैसे नारे गूँजे थे - इसलिए उक्त चर्चा पर किसी को हैरानी नहीं हुई थी, लेकिन उक्त आरोप को पुष्ट करने के लिए किसी के पास चूँकि कोई ठोस सुबूत नहीं था, जिसके कारण उक्त आरोप सिर्फ चर्चा का हिस्सा ही बना रहा । लेकिन 'रचनात्मक संकल्प' को इस बात का जो ठोस सुबूत मिला है, वह चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की परीक्षा-व्यवस्था में बेईमानीभरी सेंध लगाने की राजेश शर्मा की हरकत को सामने लाता है । सुबूत के रूप में सामने आए राजेश शर्मा द्वारा कुछेक खास खास लोगों को किए गए वाट्स-ऐप संदेश से साबित है कि राजेश शर्मा ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स परीक्षा की व्यवस्था को जैसे हाई-जैक कर लिया है और पूरी व्यवस्था को वह अपने बेईमानीभरे तरीके से संचालित कर रहे हैं ।
राजेश शर्मा ने अपने व्यवहार से 'रखवाले ही चोर बने' मुहावरे को चरितार्थ किया है । दरअसल राजेश शर्मा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की उस एक्जामिनेशन कमेटी के ही सदस्य हैं, जिस पर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स परीक्षाओं को ईमानदारी से करवाने की जिम्मेदारी है । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट में 39 कमेटियाँ हैं, जिनमें कुल चार कमेटियों को स्टैंडिंग कमेटी का दर्जा प्राप्त है - इन चार कमेटियों में एक एक्जामिनेशन कमेटी है । इस तथ्य से ही इस कमेटी की महत्ता समझ में आ जाती है । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे इस कमेटी के मुखिया हैं; तथा उनके और इंस्टीट्यूट के वाइस प्रेसीडेंट के अलावा पाँच अन्य सदस्य इस कमेटी में हैं । इस कमेटी की ही अनुशंसा पर नवंबर/दिसंबर में होने वाली परीक्षाओं के लिए ऑब्जर्वर्स के मनोनयन हेतु 10 अगस्त को इंस्टीट्यूट ने नियमों की घोषणा की थी । यह घोषणा होने के बाद से ही राजेश शर्मा अपने चहेतों से संपर्क करने में जुट गए और उन्हें उनकी पसंद का परीक्षा-केंद्र दिलवाने तक का ऑफर देने लगे । 'दलाल'रूपी यह ऑफर इसलिए और ज्यादा गंभीर है - क्योंकि यह इंस्टीट्यूट की एक्जामिनेशन कमेटी के ही एक सदस्य की तरफ से दिया गया । इस ऑफर से सिर्फ राजेश शर्मा का ही करेक्टर सामने नहीं आया है, बल्कि इंस्टीट्यूट की परीक्षा-व्यवस्था का असली रूप भी सामने आया है । राजेश शर्मा द्वारा भेजे गए वाट्स-ऐप संदेश का स्क्रीन-शॉट राजेश शर्मा की ही करतूत को सामने नहीं ला रहा है, बल्कि इस तथ्य को भी उजागर कर रहा है कि नीलेश विकमसे और नवीन गुप्ता की सरपरस्ती में 'आस्तीन के साँपों' ने कैसे अपनी ऊँची पहुँच बना ली है - और परीक्षा जैसे अत्यंत महत्त्व के काम को कैसे मजाक बना दिया है ।
मजे की और राजेश शर्मा की तरफ से बेशर्मी की बात यह हुई कि राजेश शर्मा की इस हरकत को लेकर लोगों के बीच जब चर्चा शुरू हुई, तब राजेश शर्मा ने यह कहते हुए मामले को दबाने का प्रयास किया कि एक्जामिनेशन कमेटी के बाकी सदस्यों ने भी तो अपने अपने नजदीकियों और चहेतों को उनकी पसंद के परीक्षा केंद्र दिलवाने के लिए काम किए हैं । यह कहते/बताते हुए उनका आशय दरअसल यह रहा कि इस मामले में अकेले उन्हीं को निशाना क्यों बनाया जा रहा है । राजेश शर्मा की यह बात यदि सच है, तो समझा जा सकता है कि हालात आखिर किस कदर बिगड़े हुए हैं ? एक्जामिनेशन कमेटी में मंगेश किनरे, सुशील गोयल, केमिशा सोनी और पीसी जैन भी हैं । राजेश शर्मा अपनी करतूत पर पर्दा डाल कर अपने आप को बचाने तथा मामले को रफा-दफा करने/करवाने के लिए जिस तरफ से एक्जामिनेशन कमेटी के बाकी सदस्यों को भी 'आरोपी' बनाने का प्रयास कर रहे हैं, उसने मामले को दिलचस्प मोड़ दे दिया है । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स परीक्षाओं के साथ-साथ इंस्टीट्यूट की एक्जामिनेशन कमेटी को ही मजाक बना देने की राजेश शर्मा की हरकत ने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट और वाइस प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता की कार्य व निर्णय क्षमता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं ।

 

Friday, November 10, 2017

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की जयपुर ब्राँच में अपने लोगों को न जितवा पाने की खुन्नस में नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी का उसका अधिकार छिनवा कर प्रकाश शर्मा ने जयपुर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के गौरव पर तो चोट की ही है, इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की साख को भी दाँव पर लगा दिया है

जयपुर । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की कन्टीन्यूइंग प्रोफेशनल एजुकेशन कमेटी द्वारा जयपुर में आयोजित की जा रही दो दिवसीय नेशनल कॉन्फ्रेंस इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे की फजीहत का कारण बन रही है । विवादपूर्ण मुद्दों पर नीलेश विकमसे के फैसला न करने के रवैये के चलते इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी बेचारे वी सागर की बड़ी आफत हो जाती है - क्योंकि अक्सर उनकी सुनी नहीं जाती है और कोई भी उन्हें कभी भी लताड़ देता है । रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों ने समझ लिया है कि नीलेश विकमसे इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट बन जरूर गए हैं, लेकिन प्रेसीडेंट पद की जिम्मेदारी सँभाल और निभा पाना उनके बस की बात है नहीं, और इसलिए वह इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी को भी कुछ नहीं समझते और मनमानियों पर उतरे रहते हैं । जयपुर में 24/25 नबंवर को हो रही नेशनल कॉन्फ्रेंस इंस्टीट्यूट में फैली अराजकता का दिलचस्प उदाहरण है । इस नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी को लेकर विवाद है - इंस्टीट्यूट के नियमानुसार, जयपुर में आयोजित हो रहे इंस्टीट्यूट के कार्यक्रम की मेज़बानी इंस्टीट्यूट की जयपुर ब्राँच को करनी/मिलनी चाहिए; लेकिन मेज़बानी निभा रही है सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल । मजे की बात यह है कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में इस बारे में जो विचार-विमर्श हुआ, उसमें भी नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी जयपुर ब्रांच को सौंपने का फैसला हुआ - लेकिन उसके बाद भी मेज़बानी का अधिकार जयपुर ब्राँच से छीन कर सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल को सौंप दिया गया है ।
यह पूछना बेकार है कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन दीप मिश्र आखिर काउंसिल की मीटिंग में ही हुए फैसले पर अमल क्यों नहीं कर रहे हैं ? यह पूछना इसलिए बेकार है क्योंकि दीप मिश्र को एक 'कठपुतली' चेयरमैन के रूप में ही देखा/पहचाना जाता है, और माना/समझा जाता है कि उन्हें चेयरमैन की कुर्सी दिलवाने वाले ऊपर के लोग जैसे 'नचाते' हैं, वह वैसे ही 'नाचते' हैं । दरअसल दीप मिश्र ऐसे अनोखे चेयरमैन हैं, जिन्हें काउंसिल के दस सदस्यों में से कुल चार का समर्थन है, और जिन्हें चेयरमैन का पद एक्सऑफिसो सदस्य के रूप में सेंट्रल काउंसिल के पाँच में से चार सदस्यों के समर्थन के चलते मिला है । ऐसे में, बेचारे दीप मिश्र की मजबूरी और व्यथा को समझा जा सकता है । संदर्भित मामले में दरअसल हुआ यह कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में उपस्थित हुए सदस्यों के बहुमत ने मेज़बानी की जिम्मेदारी जयपुर ब्राँच को सौंपने का फैसला लिया; लेकिन इस फैसले को मानने से यह कहते/बताते हुए इंकार कर दिया गया कि काउंसिल का बहुमत इस फैसले से सहमत नहीं है । निश्चित रूप से बहुमत को अपना फैसला लागू करने का अधिकार है, लेकिन यह तथाकथित बहुमत है कहाँ ? यह तथाकथित बहुमत उस मीटिंग में नजर क्यों नहीं आया, जिस मीटिंग में जयपुर में हो रही नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी सुनिश्चित करने का मामला तय हो रहा था ? कम से कम न्याय का दिखावा ही कर लिया जाता और यह तथाकथित बहुमत दूसरी मीटिंग करके पहली मीटिंग के फैसले को पलट देता - लेकिन ऐसा करने की जरूरत भी नहीं समझी गई । असल में, ऐसा करने में एक समस्या यह भी थी कि तथाकथित बहुमत के ठेकेदार सेंट्रल काउंसिल सदस्य मनु अग्रवाल को अपने साथ मान रहे हैं, लेकिन मनु अग्रवाल जयपुर ब्राँच को मेज़बानी देने का फैसला करने वाली मीटिंग में मौजूद थे और इस फैसले के साथ थे - ऐसे में यदि इसी मुद्दे पर सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की दूसरी मीटिंग होती तो पहले हुए फैसले को बदलने के लिए मनु अग्रवाल को अपना स्टैंड बदलना होता, और तब उनका दोहरा चरित्र 'रिकॉर्ड' पर आता ।
मनु अग्रवाल के दोहरे चरित्र को रिकॉर्ड पर आने से तो बचा लिया गया है, लेकिन सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में हुए फैसले को खुद सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल द्वारा ठेंगा दिखाए जाने की हरकत पर उनकी चुप्पी से उनका दोहरा चरित्र लोगों के सामने तो आ ही गया है । क्योंकि मनु अग्रवाल यदि अभी भी मीटिंग में लिए गए अपने स्टैंड पर कायम हैं तो तथाकथित बहुमत का दावा झूठा है; बहुमत का दावा करने वाले लोग मनु अग्रवाल की चुप्पी के सहारे/भरोसे ही अपने दावे को सच 'दिखा' रहे हैं । बहुमत की इस तरह की मनमानी व्याख्या और दिखावेबाजी से सवाल पैदा हुआ है कि बहुमत यदि 'ऐसे' ही तय होना है, तो फिर मीटिंग आदि की जरूरत ही क्या है ? और क्यों मीटिंग के रिकॉर्ड और मिनिट्स तैयार करने व रखने की जरूरत है ? इस मामले को लेकर इंस्टीट्यूट में जो शिकायतें हुई हैं, उन्हें प्रथम दृष्टया उचित मानते/देखते हुए इंस्टीट्यूट के सेक्रेटरी वी सागर ने संबंधित पार्टियों से जबाव तलब किया है । वी सागर की इस कार्रवाई से लेकिन सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में हो रही मनमानियों पर कोई फर्क पड़ता नहीं दिखा है । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे को इस बात से जैसे कोई मतलब ही नहीं है कि उनके प्रेसीडेंट-काल में हर कोई मनमानी कर रहा है, जिसके चलते नाहक ही विवाद पैदा हो रहे हैं - और इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की बदनामी हो रही है । जयपुर में नेशनल कॉन्फ्रेंस का आयोजन कर रही इंस्टीट्यूट की कन्टीन्यूइंग प्रोफेशनल एजुकेशन कमेटी के चेयरमैन विजय गुप्ता से भी मेज़बानी के मामले में हो रहे नियम के उल्लंघन को लेकर शिकायत की गई, लेकिन विजय गुप्ता ने जब देखा/पाया कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को ही कोई फिक्र नहीं है - तो वह ही मामले में क्यों पड़ें ? विजय गुप्ता इसलिए भी मामले से दूर रहना और बचना चाहते हैं, क्योंकि इस सारे झमेले के पीछे सेंट्रल काउंसिल सदस्य हैं - जिन्हें नाराज करना सेंट्रल काउंसिल की अंदरूनी राजनीति के समीकरणों को नुकसान पहुँचाना हो सकता है ।
नेशनल कॉन्फ्रेंस की मेज़बानी के मामले में इंस्टीट्यूट के नियम की और सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मीटिंग में लिए गए फैसले की ऐसी-तैसी करने के पीछे सेंट्रल काउंसिल सदस्य प्रकाश शर्मा की निजी खुन्नस को देखा/पहचाना जा रहा है । जयपुर ब्राँच के सदस्यों के अनुसार, प्रकाश शर्मा को लगता है कि जयपुर ब्राँच के पदाधिकारी उनके कहे में नहीं चलते हैं, और उनकी बजाए सेंट्रल काउंसिल के ही एक दूसरे सदस्य श्याम लाल अग्रवाल को ज्यादा तवज्जो देते हैं । सेंट्रल काउंसिल के इन दोनों ही सदस्यों के बीच जयपुर में अपने अपने प्रभाव को बढ़ाने को लेकर एक स्वाभाविक सी होड़ रहती ही है; इस होड़ में श्याम लाल गुप्ता का पलड़ा इसलिए भारी दिखता है, क्योंकि जयपुर से रीजनल काउंसिल के तीन सदस्यों में दो - प्रमोद बूब और रोहित रुवाटिया उनके साथ देखे/पहचाने जाते हैं तथा जयपुर ब्राँच के पदाधिकारी उनके नजदीक हैं । प्रकाश शर्मा को जयपुर से रीजनल काउंसिल के तीसरे सदस्य गौतम शर्मा का ही समर्थन है । जयपुर ब्राँच और रीजनल काउंसिल में प्रकाश शर्मा भले ही श्याम लाल अग्रवाल से पिछड़ रहे हैं, लेकिन सेंट्रल काउंसिल में सेंट्रल रीजन का प्रतिनिधित्व करने वाले पाँच सदस्यों में प्रकाश शर्मा का पलड़ा फिलहाल भारी है । खेमेबाजी के चलते कहीं कभी 'जीत' कभी कहीं 'हार' का नजारा बनता/दिखता रहता ही है - लेकिन जयपुर में अपनी 'हार' का बदला लेने के लिए प्रकाश शर्मा इस स्तर तक जायेंगे कि इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की साख को ही दाँव पर लगा देंगे, इसकी किसी को उम्मीद नहीं थी । जयपुर ब्राँच जयपुर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए गौरव का प्रतीक है - राजनीति में आगे/पीछे होता ही रहता है; जयपुर ब्राँच में प्रकाश शर्मा यदि 'अपने' लोगों को नहीं जितवा सके और इस कारण से उन्हें ब्राँच में अपनी मनमानियाँ करने/थोपने का अवसर यदि नहीं मिल पा रहा है, तो इसकी खुन्नस में वह जयपुर ब्राँच का हक़ ही छिनवा देंगे - इसकी कल्पना उनके नजदीकियों और शुभचिंतकों तक ने नहीं की थी । जयपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का कहना है कि जयपुर ब्राँच के पदाधिकारियों के साथ प्रकाश शर्मा की नाराजगी हो सकती है, लेकिन उनसे बदला लेने के लिए वह जयपुर ब्राँच की पहचान और प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ करेंगे - यह प्रकाश शर्मा की छोटी सोच का सुबूत और उदाहरण है ।