Saturday, August 18, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल में पुनर्वापसी करने तथा प्रेसीडेंट बनने के नाम पर चुनाव में उतरे अतुल गुप्ता अपने अवसरवादी व घमंडी व्यवहार से तथा प्रशासनिक अक्षमता की पोल खुलने के कारण मुसीबत में फँसे

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल में छठवाँ वर्ष गुजार रहे अतुल गुप्ता को हाल-फिलहाल के दिनों में जिस तरह की प्रतिकूल स्थितियों और आरोपों-शिकायतों का सामना करना पड़ा है, उसने उन्हें सेंट्रल काउंसिल में अपने पुनर्निर्वाचन के प्रति शंकालु बना दिया है; और अपनी ही शंका को दूर करने के लिए उन्होंने सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में अपनी सक्रियताओं व उपलब्धियों को लेकर एक लंबा-चौड़ा खत लिखा और लोगों को भेजा है । अतुल गुप्ता के इस खत को लेकर भी लोग मजे ले रहे हैं और चर्चा कर रहे हैं कि अतुल गुप्ता की सक्रियता व उपलब्धियाँ इतनी 'खुफिया' रही हैं क्या, कि किसी को दिखी ही नहीं - और इसीलिए अपनी सक्रियताओं व उपलब्धियों के बारे में उन्हें लोगों को बताना पड़ रहा है । अतुल गुप्ता ने अपने इस खत में 'प्रोफेशन की समृद्धि के लिए मिलजुल कर काम करने' के सिद्धांत को अपनी प्रेरणा के रूप में रेखांकित किया है । लोगों का कहना है कि अतुल गुप्ता काश इस सिद्धांत को व्यवहार में भी उतार पाते, तो उन्हें अपने ही साथी/सहयोगी रहे लोगों के विरोध और आरोप नहीं देखने/सुनने पड़ते । मजे की बात यह है कि एक तरफ तो अतुल गुप्ता की पहचान एक 'पढ़े-लिखे' और 'विषयों' को गंभीरता से समझने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट की रही है, लेकिन दूसरी तरफ उन्हें बहुत स्वार्थी, घमंडी और अवसरवादी व्यक्ति के रूप में देखा/पहचाना जाता है । उनकी खूबियों के कारण बहुत से, खासकर युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स उनसे प्रभावित हुए और उनके साथ जुड़े; लेकिन जल्दी ही जब उन्होंने अतुल गुप्ता का स्वार्थी, घमंडी और अवसरवादी रूप देखा - तो उन्होंने अतुल गुप्ता के खिलाफ होने में भी देर नहीं लगाई । शुरू के वर्षों में तो अतुल गुप्ता अपने व्यवहार के चलते पैदा हुई नाराजगी को मैनेज करने में सफल रहे, लेकिन समय बढ़ने के साथ-साथ उनके खिलाफ लोगों का, खासकर युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का गुस्सा उनके खिलाफ और मुखर व संगठित होता गया है ।
इसी का नतीजा रहा कि अंबाला, भटिंडा, लुधियाना, जालंधर आदि में अतुल गुप्ता को अपने ही साथी/सहयोगी रहे लोगों, खासकर युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से खूब खूब खरी-खोटी सुननी पड़ी । लोगों ने इस बात को लेकर सवाल पूछे और नाराजगी दिखाई कि पिछले चुनाव से पहले उन्होंने रेलवे का काम आने/निकलने का वास्ता देकर लोगों को काम मिलने/दिलवाने का जो वायदा किया था, बाद में उसकी सुध लेने की कोशिश उन्होंने क्यों नहीं की ? उल्लेखनीय है कि पिछले चुनाव से पहले अतुल गुप्ता ने लोगों को, खासकर युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को रेलवे का काम मिलने/दिलवाने का वास्ता देकर खूब वोट बटोरे थे । उन्हें वोट देने वाले तथा उनकी उम्मीदवारी को वोट दिलवाने के लिए रात-दिन एक करने वाले लोगों ने बाद में लेकिन अपने आप को ठगा हुआ पाया । कईयों की शिकायत रही कि चुनाव के बाद तो अतुल गुप्ता सीधे मुँह बात तक नहीं करने को तैयार होते थे, तथा उनके वायदे की याद दिलाने पर बदतमीजी और करने लगते थे । अपने घमंडी और अवसरवादी व्यवहार के चलते अतुल गुप्ता को चंडीगढ़ में तो बहुत ही बुरी स्थिति का सामना करना पड़ा । चंडीगढ़ में नॉर्दर्न रीजन की पहली फोरेंसिक लैब के उद्घाटन अवसर पर इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता के साथ अतुल गुप्ता भी इस उम्मीद में गए कि वहाँ उन्हें बड़ी भीड़ के सामने बोलने का मौका मिलेगा, लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि अतुल गुप्ता का जब बोलने का नंबर आया तो सुनने वालों की संख्या कुल दस/बारह के करीब थी । हालाँकि उक्त कार्यक्रम ही बुरी तरह फ्लॉप रहा । प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता के बोलते समय उपस्थित लोगों की संख्या मुश्किल से सौ के करीब थी, जिनमें आधे के लगभग छात्र थे । अतुल गुप्ता के लिए शर्मनाक स्थिति यह बनी/रही कि उन्हें तो एक अच्छे वक्ता के रूप में देखा/पहचाना जाता है, लेकिन फिर भी उनको सुनने में किसी ने दिलचस्पी नहीं ली । कुछेक लोगों ने कहा भी कि उन्होंने पहचान लिया है कि सेंट्रल काउंसिल सदस्य के रूप में अतुल गुप्ता एक बहुत मतलबी और धोखेबाज व्यक्ति है, ऐसे व्यक्ति की बातों को सुनने का क्या फायदा ?
अतुल गुप्ता के लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि जब चंडीगढ़ में उन्हें सुनने के लिए दस/बारह लोग भी 'मजबूरी' में जुटे, लगभग उसी समय उसी चंडीगढ़ में आयोजित हुई सुधीर अग्रवाल की मीटिंग में तीन सौ के करीब लोग थे । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पूर्व चेयरमैन सुधीर अग्रवाल सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार हैं । उनकी मीटिंग में इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट वेद जैन मुख्य वक्ता के रूप में मौजूद थे । सुधीर अग्रवाल की मीटिंग की सफलता के शोर के बीच अतुल गुप्ता को श्रोता न मिलने से जो झटका लगा, उसने वास्तव में अतुल गुप्ता की बुरी हालत का ही सुबूत पेश किया है । इस बीच, नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की सेक्रेटरी पूजा अग्रवाल बंसल ने सेंट्रल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी के संदर्भ में प्रस्तुत की गई अपनी उपलब्धियों की रिपोर्ट में रीजनल काउंसिल के स्टॉफ के प्रोवीडेंट फंड व सर्विस टैक्स से जुड़ी वर्ष 2010-11 से चली आ रही समस्या के हल के लिए किए गए उपाय का जिक्र करके अतुल गुप्ता की प्रशासनिक क्षमता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं । उल्लेखनीय है कि वर्ष 2010-11 में अतुल गुप्ता नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन थे; चेयरमैन के रूप में स्टॉफ की नियुक्ति और उनके अधिकारों से जुड़े कामों की व्यवस्था के लिए अतुल गुप्ता ने एक बेंडर की नियुक्ति की थी, जो स्टाफ के प्रोवीडेंट फंड व सर्विस टैक्स के करीब 25 लाख रुपए लेकर भाग गया था । अतुल गुप्ता अपनी तीन-तिकड़मों से उस बेंडर के खिलाफ कार्रवाई को टलवाते रहे और इंस्टीट्यूट को करीब 25 लाख रुपए की चपत की बात को छिपाए रखने/रखवाने में सफल रहे; लेकिन दो वर्ष पहले कार्यकारी चेयरपरसन के रूप में काम करते हुए पूजा अग्रवाल बंसल ने वर्षों से लटके चल रहे इस मामले में कार्रवाई की । अपनी कार्रवाई को अपनी उपलब्धियों में शामिल करने और उसे लोगों के सामने लाने की पूजा अग्रवाल बंसल की कार्रवाई ने वास्तव में अतुल गुप्ता की प्रशासनिक अक्षमता को सामने लाने का काम किया है, और इस तरह अतुल गुप्ता के लिए फजीहत वाली स्थिति बनाई है ।
अतुल अग्रवाल इस बार का चुनाव इंस्टीट्यूट का प्रेसीडेंट बनने के नाम पर लड़ रहे हैं । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के रूप में उनके द्वारा की गई 'घपलेबाजी' और फिर उसे छिपाने को लेकर की गई उनकी कार्रवाई ने लेकिन उनकी अक्षमताओं की जो पोल खोली है, उससे उनके सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है । अपने आपको चारों तरफ से संकटों और मुसीबतों से घिरा पाकर अतुल गुप्ता ने अपनी सक्रियताओं और उपलब्धियों का सहारा लेने की सोची है, और लोगों के बीच उनका लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है । अपनी सक्रियताओं और उपलब्धियों के विवरण से अतुल गुप्ता अपने अवसरवादी और घमंडी व्यवहार से पैदा हुई मुसीबतों का मुकाबला सचमुच कर सकेंगे क्या - यह देखना दिलचस्प होगा ।

Friday, August 17, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर मुकेश अरनेजा की बदनामी और कभी किसी के काम न आने वाली अपनी छवि/पहचान के चलते डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता के लिए अपने पहले ही कार्यक्रम पेम वन के लिए स्पॉन्सरशिप जुटाना मुश्किल हो रहा है

गाजियाबाद । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता के लिए पेम वन के रूप में किया जाने वाला अपना पहला कार्यक्रम ही भारी मुसीबत बन गया है । उल्लेखनीय है कि 23 सितंबर को प्रस्तावित पेम वन के आयोजन के लिए करीब एक महीने का ही समय बचा रह गया है, लेकिन दीपक गुप्ता अभी तक पेम वन को स्पॉन्सर करने वाले क्लब्स ही तय नहीं कर पाए हैं, और जो क्लब स्पॉन्सर करने के लिए जबर्दस्ती राजी भी हुए हैं - या राजी करवाए गए हैं, वह पूरे दो लाख रुपए देने में आना-कानी कर रहे हैं । दीपक गुप्ता के नजदीकियों का ही कहना है कि पेम वन की स्पॉन्सरशिप को लेकर माहौल सब्जी बाजार जैसा बना हुआ है, जहाँ पैसों को लेकर भारी बारगेनिंग हो रही है - अधिकतर क्लब्स दो लाख रुपए देने को तैयार ही नहीं हो रहे हैं । कई लोगों का कहना/पूछना है कि दीपक गुप्ता एक तरफ तो यह कहते/बताते हैं कि वह अपने कार्यक्रमों में सुभाष जैन के कार्यक्रमों जैसी तड़क-भड़क नहीं करेंगे - लेकिन पेम वन के लिए पैसे उनकी तुलना में करीब तीन गुना ले रहे हैं । उल्लेखनीय है कि सुभाष जैन ने अपने पेम वन के आयोजन को स्पॉन्सर करने वाले क्लब्स से 75 हजार रुपए लिए थे । लोगों का कहना है कि दीपक गुप्ता को जब अपना कार्यक्रम सुभाष जैन की तरह भव्य तरीके से नहीं करना है, तो उन्हें तो उनसे भी कम पैसे लेने चाहिए - लेकिन वह उल्टा कर रहे हैं । कुछेक लोगों को लगता है कि दो लाख रुपए की रकम डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर मुकेश अरनेजा ने दीपक गुप्ता को सुझाई होगी, और इस तरह अपनी जेब भरने का जुगाड़ किया होगा - लेकिन जो अब दीपक गुप्ता के लिए परेशानी का सबब बन गई है ।
दीपक गुप्ता को इस मामले में सबसे बड़ा झटका रोटरी क्लब दिल्ली विकास के प्रेसीडेंट सुनील मल्होत्रा से लगा है । सुनील मल्होत्रा से अपनी नजदीकी का वास्ता देकर मुकेश अरनेजा ने उन्हें आश्वस्त किया था कि उनसे तो स्पॉन्सरशिप एक बार कहने से ही मिल जाएगी । दीपक गुप्ता और मुकेश अरनेजा की जोड़ी ने सुनील मल्होत्रा को अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवार बनाने और समर्थन देने का लालच भी दिया हुआ है । इसके बावजूद, सुनील मल्होत्रा से उन्हें स्पॉन्सरशिप मिलती नहीं दिख रही है । रोटरी क्लब दिल्ली विकास में दरअसल प्रथा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के कार्यक्रमों में जो भी पैसा देना होता है, वह प्रेसीडेंट और प्रेसीडेंट इलेक्ट आधा-आधा अपनी अपनी जेब से देते हैं । दीपक गुप्ता के लिए बदकिस्मती की बात यह हुई है कि पेम वन के लिए प्रेसीडेंट इलेक्ट अरुण गुप्ता भी अपने हिस्से के एक लाख रुपए देने को तैयार नहीं हो रहे हैं । अरुण गुप्ता और सुनील मल्होत्रा ने दीपक गुप्ता और मुकेश अरनेजा को बता दिया है कि वह दोनों मिल कर एक लाख रुपए ही दे पायेंगे । रोटरी क्लब दिल्ली विकास को डिस्ट्रिक्ट के एक बड़े और अच्छे क्लब के रूप में देखा/पहचाना जाता है, जो अपने कार्यक्रमों को तो खासी भव्यता के साथ आयोजित करता ही है, डिस्ट्रिक्ट के कार्यक्रमों में भी बढ़-चढ़ कर भाग लेता है । प्रत्येक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अपने विभिन्न कार्यक्रमों में मदद और सहभागिता के लिए सबसे पहले रोटरी क्लब दिल्ली विकास के पदाधिकारियों की तरफ ही देखता है । इस नाते भी, और प्रेसीडेंट सुनील मल्होत्रा की सक्रियता तथा अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने को लेकर उनकी चाहत को देखते हुए और मुकेश अरनेजा के साथ उनकी नजदीकी के चलते दीपक गुप्ता को पूरा विश्वास था कि रोटरी क्लब दिल्ली विकास से तो उन्हें पेम वन के लिए स्पॉन्सरशिप की पूरी रकम आराम से मिल ही जाएगी । लेकिन उसमें भी उन्हें अड़ंगा लगता दिख रहा है ।
रोटरी क्लब दिल्ली विकास से मिले इस झटके का असर यह होता दिख रहा है कि स्पॉन्सरशिप के लिए राजी हुए अन्य क्लब्स के पदाधिकारियों ने भी दो लाख रुपए देने में आनाकानी करना शुरू कर दिया है और कोई पचास हजार तो कोई पिचहत्तर हजार और कोई एक लाख रुपए ही देने की बात कर रहा है । दीपक गुप्ता के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि उन्होंने जिन मुकेश अरनेजा को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाया है, डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच उनकी छवि बहुत ही खराब है, और लोगों को लगता है कि मुकेश अरनेजा ने रोटरी को जैसे अपना धंधा बना लिया है । डीआरएफसी के रूप में उन पर क्लब्स से पैसे ऐंठने के गंभीर आरोप रहे हैं । मुकेश अरनेजा दूसरों से तो हिसाब-किताब माँगने और दूसरों के हिसाब-किताब जाँचने में खूब दिलचस्पी लेते हैं, लेकिन अपने हिसाब-किताब देने में बचते-छिपते हैं । मुकेश अरनेजा पिछले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर थे; पिछले रोटरी वर्ष में शरत जैन के गवर्नर-काल के हिसाब-किताब को लेकर तो मुकेश अरनेजा रोटरी इंटरनेशनल तक जा पहुँचे थे, लेकिन सतीश सिंघल के गवर्नर-काल के हिसाब-किताब को लेकर वह चुप्पी साधे हुए हैं । पेम वन के स्पॉन्सरशिप के लिए दो लाख रुपए प्रति क्लब की रकम तय करने में भी मुकेश अरनेजा की मिलीभगत को देखा/पहचाना जा रहा है । दीपक गुप्ता को इस मामले में 'अपने' असिस्टेंट गवर्नर्स से भी अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है । इसके अलावा, लोगों के बीच अपनी बुरी पहचान के चलते भी दीपक गुप्ता को स्पॉन्सरशिप जुटाना मुश्किल हो रहा है । लोगों का कहना है कि दीपक गुप्ता खुद चूँकि कभी किसी के काम नहीं आए हैं, इसलिए उनकी मदद करने तथा उनके कार्यक्रमों में सहभागिता करने को लेकर किसी में कोई उत्साह नहीं है । पेम वन के रूप में अपने पहले ही कार्यक्रम को लेकर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता जिस तरह से मुसीबत में घिर गए हैं, उसे देखते हुए उनके गवर्नर-काल को लेकर उनके अपने ही नजदीकी और शुभचिंतक आशंकित हो गए हैं ।

Wednesday, August 15, 2018

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वीके हंस की लूट-खसोट के प्रति हरियाणा के नेताओं की नाराजगी के चलते ओंकार सिंह रेनु को मिले मौके ने सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव को दिलचस्प बनाया और आरके शाह के लिए मुसीबत खड़ी की

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वीके हंस ने पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राजिंदर बंसल से मिली फटकार के लिए आरके शाह को जिम्मेदार ठहरा कर ओंकार सिंह रेनु को जो 'हौंसला' दिया है, उससे डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में एक नया समीकरण बनता दिख रहा है । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारियों के गोवा में हुए अधिष्ठापन समारोह के लिए वीके हंस ने जिस तरह से कई लोगों से स्पॉन्सरशिप के नाम पर पैसे उगाहे, उसे लेकर राजिंदर बंसल ने उन्हें जोरदार तरीके से फटकारा । राजिंदर बंसल का कहना रहा कि इस तरह की हरकतों से लायनिज्म का, डिस्ट्रिक्ट का और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद पर रहे लोगों का नाम खराब होता है, इसलिए इस तरह की हरकतों से बचा जाना चाहिए । वीके हंस की पैसा उगाहु हरकत पर कई लोगों की नाराजगी रही, और सभी का कहना रहा कि वीके हंस ने गोवा का जो पैकेज दिया/लिया, वह वैसे ही खासा महँगा था - वीके हंस को उसके बाद भी लोगों से स्पॉन्सरशिप के नाम पर पैसे लेने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी ? लोगों ने खुलकर आरोप लगाए कि वीके हंस ने अधिष्ठापन समारोह को अपनी जेब भरने के कार्यक्रम में बदल दिया, और महँगे पैकेज के बावजूद स्पॉन्सरशिप के नाम पर जमकर पैसे बसूले । वीके हंस की हरकत के चलते लोगों के बीच पैदा हुई नाराजगी को पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राजिंदर बंसल ने 'आवाज' दी और इस मामले में वीके हंस को फटकार लगाई । अधिष्ठापन समारोह में गैरहाजिर होकर भी राजिंदर बंसल ने वीके हंस के प्रति अपनी नाराजगी को जाहिर किया । वीके हंस ने राजिंदर बंसल से मिली फटकार के लिए आरके शाह को जिम्मेदार ठहराया है । वीके हंस का कहना है कि आरके शाह ने ही राजिंदर बंसल से उनकी शिकायत की और उनके कान भरे । 
आरके शाह को सबक सिखाने के लिए ही वीके हंस ने अधिष्ठापन समारोह में ओंकार सिंह रेनु को ज्यादा तवज्जो दी । ओंकार सिंह रेनु को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । हालाँकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की तरफ से इस वर्ष आरके शाह को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुने जाने का भरोसा दिया गया है । ओंकार सिंह रेनु की सक्रियता भरी तैयारी के पीछे पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश त्रेहन को देखा/पहचाना जा रहा है । उनके नजदीकियों का कहना है कि उन्हें उम्मीद है कि आरके शाह अवश्य ही ऐसी हरकतें करेंगे, जिनसे पूर्व गवर्नर्स नाराज होंगे और तब ओंकार सिंह रेनु के लिए मौका बन जायेगा । राकेश त्रेहन और ओंकार सिंह रेनु के लिए खुशकिस्मती की बात यह रही कि डिस्ट्रिक्ट के पहले ही आयोजन में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वीके हंस, राजिंदर बंसल से मिली फटकार के चलते आरके शाह से नाराज हो गए । आरके शाह के लिए मुसीबत की बात यह रही कि उन्होंने स्पॉन्सरशिप के नाम पर वीके हंस को मुँहमाँगा पैसा भी दिया, और उनसे नाराजगी के चलते वीके हंस ने अधिष्ठापन समारोह में कोई तवज्जो भी नहीं दी । राजिंदर बंसल के साथ-साथ केएल खट्टर और चंद्रशेखर मेहता ने भी अधिष्ठापन समारोह का जो बहिष्कार किया, और अपने लोगों से भी बहिष्कार करवाया - उसे राकेश त्रेहन और ओंकार सिंह रेनु ने अपनी 'रणनीति' के लिए उत्साहजनक माना/पाया है । उन्हें लगता है कि हरियाणा के नेता लोग डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वीके हंस को यदि इसी तरह से अपमानित करते रहेंगे, तो वीके हंस भी प्रतिक्रिया में जबाव देंगे और इससे डिस्ट्रिक्ट के चुनावी राजनीति के समीकरण नए सिरे से बनेंगे - जिसमें उन्हें सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के लिए अपनी राजनीति करने का मौका मिल सकेगा ।
अधिष्ठापन समारोह में वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर डीके अग्रवाल और उनके साथी अजय बुद्धराज जिस तरह से वीके हंस को हर मुद्दे पर समर्थन देते हुए उनके 'नजदीक' बने रहने की कोशिश करते देखे गए, उससे भी लग रहा है कि वीके हंस के बहाने से डिस्ट्रिक्ट के चुनावी राजनीतिक समीकरण में एक नया ध्रुवीकरण होगा - जो सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव की दशा और दिशा तय करेगा । डिस्ट्रिक्ट में कुछेक नेताओं को लगता है कि ओंकार सिंह रेनु चुनाव लड़ने का साहस नहीं दिखा सकेंगे, और इसलिए आरके शाह के 'चयन' को कोई खतरा नहीं है; हालाँकि यह मानने/समझने और कहने वालों की भी कमी नहीं है कि चुनाव लड़ना तो आरके शाह के भी बस की नहीं है, चुनाव लड़ने का दिखावा करके पिछले वर्ष उन्होंने पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को समझौते के लिए मजबूर तो कर दिया था, लेकिन यदि सचमुच चुनाव की नौबत आती - तो वह मैदान छोड़ जाते । इसीलिए लोगों को लगता है कि आरके शाह और ओंकार सिंह रेनु में से जो भी ज्यादा देर तक उम्मीदवार बने रहने का दिखावा कर लेगा, वह बाजी मार लेगा । ओंकार सिंह रेनु की सक्रियता और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर वीके हंस का 'समर्थन' जुटा लेने से आरके शाह की उम्मीदवारी की सफलता पर कोई प्रतिकूल असर पड़ेगा या नहीं, यह तो बाद में पता चलेगा - अभी लेकिन उसके चलते आरके शाह के लिए मुसीबत जरूर खड़ी हो गई है ।

Tuesday, August 14, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में केरल के बाढ़/बारिश पीड़ितों के नाम पर डिस्ट्रिक्ट सर्विस ट्रस्ट के एकाउंट में पैसा इकट्ठा करने की यशपाल दास की तैयारी आरोपों के घेरे में

अंबाला । पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर यशपाल दास उत्तराखंड व हिमाचल के बाढ़/बारिश पीड़ितों की बजाये केरल के बाढ़/बारिश पीड़ितों के लिए पैसे इकट्ठे करने के मामले में अपने डिस्ट्रिक्ट के लोगों के निशाने पर आ गए हैं, और लूट-खसोट के आरोपों में एक बार फिर से घिर गए हैं । उल्लेखनीय है कि देश के कई राज्य इन दिनों भारी बारिश और बाढ़ की चपेट में हैं; केरल, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश में सबसे ज्यादा तबाही होने की खबरें आ रही हैं । आमतौर पर इस तरह की विपदा के शिकार लोगों की मदद के लिए सामाजिक संस्थाएँ आगे आती हैं । इस तरह के मौकों पर रोटरी भी अक्सर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाती है, और इसके लिए वरिष्ठ पदाधिकारी पहल करते हैं और रोटेरियंस को मदद करने के लिए प्रेरित करने का काम करते हैं । लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रवीन गोयल को डिस्ट्रिक्ट की भौगोलिक सीमा में पड़ने वाले उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश के बाढ़/बारिश पीड़ितों की मदद के लिए कोई पहल करते हुए नहीं देखा गया; डिस्ट्रिक्ट के वरिष्ठ पूर्व गवर्नर्स भी उत्तराखंड व हिमाचल के बाढ़/बारिश पीड़ितों की तरफ से आँखें मूँदे रहे । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रवीन गोयल और पूर्व गवर्नर्स के इस रवैये को लेकर डिस्ट्रिक्ट के रोटेरियंस के बीच रोष तो था, लेकिन वह मुखर रूप में प्रकट नहीं हो रहा था । लेकिन केरल के बाढ़/बारिश पीड़ितों की मदद की अपील करके यशपाल दास और उनकी अपील को आगे बढ़ा कर प्रवीन गोयल ने लोगों के 'जले' पर जैसे नमक रगड़ने का काम किया । डिस्ट्रिक्ट के वरिष्ठ सदस्यों ने सीधे सीधे आरोप लगाए कि अपने 'घर' के लोगों की मुसीबतों की सुध लेने की बजाये दूसरों की मदद करने के नाम पर कुछेक लोग अपनी जेब भरने की तैयारी कर रहे हैं ।
इस मामले में यशपाल दास ने ज्यादा 'स्मार्ट' बनने/दिखने की कोशिश की, जिसके चलते वह लोगों के आरोपों के निशाने पर आ गए । यशपाल दास ने यह जो सक्रियता दिखाई, वह दरअसल डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को संबोधित इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम की अपील आने के बाद दिखाई । मजे की बात यह रही कि बासकर चॉकलिंगम ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को मदद की जो अपील संबोधित की, डिस्ट्रिक्ट 3080 के गवर्नर प्रवीन गोयल ने उसका संज्ञान नहीं लिया - उन्होंने संज्ञान तब लिया जब यशपाल दास ने उन्हें 'जगाया' । लोगों ने सवाल उठाये कि यशपाल दास किस हैसियत से केरल के बाढ़/बारिश पीड़ितों के लिए पैसा इकट्ठा कर रहे हैं ? दरअसल यशपाल दास पर उत्तराखंड डिजास्टर रिलीफ फंड तथा रोटरी डिस्ट्रिक्ट 3080 सर्विस ट्रस्ट के एकाउंट्स में हेराफेरी करने के गंभीर आरोप रहे हैं, जिन्हें लेकर रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड तक में शिकायत हुई है । उन्हीं आरोपों का हवाला देते हुए यशपाल दास को यह कहते हुए घेरा गया कि उनके जैसे लोग प्राकृतिक आपदा को अपने लिए पैसा इकट्ठा करने के मौके के रूप में देखते हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रवीन गोयल की यह कहते हुए आलोचना की गई कि उन्होंने केरल में बाढ़/बारिश पीड़ितों की मदद के लिए सक्रिय हुए वहाँ के डिस्ट्रिक्ट्स - डिस्ट्रिक्ट 3201 तथा डिस्ट्रिक्ट 3202 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से भी कोई सीख और प्रेरणा नहीं ली, और उत्तराखंड व हिमाचल के बाढ़/बारिश पीड़ितों के लिए कुछ करने को लेकर सक्रिय नहीं हुए । लोगों का कहना है कि प्रवीन गोयल को खुद से उत्तराखंड व हिमाचल के बाढ़/बारिश पीड़ितों की सुध लेना चाहिए थी, लेकिन उन्होंने खुद तो सुध नहीं ही ली - डिस्ट्रिक्ट 3201 तथा डिस्ट्रिक्ट 3202 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से भी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के कर्तव्य और जिम्मेदारियों का सबक नहीं सीखा । प्रवीन गोयल ने सिर्फ यह किया कि यशपाल दास ने उनसे केरल के बाढ़/बारिश पीड़ितों की मदद करने की अपील को दोहराने के लिए कहा, जिसे उन्होंने दोहरा दिया ।
यशपाल दास की केरल के बाढ़/बारिश पीड़ितों के लिए दी जाने वाली मदद के पैसे रोटरी डिस्ट्रिक्ट 3080 सर्विस ट्रस्ट के एकाउंट में जमा करवाने की अपील ने डिस्ट्रिक्ट के लोगों को और गुस्सा दिलाया है । दरअसल इस ट्रस्ट के एकाउंट पर यशपाल दास और डिस्ट्रिक्ट के तमाम फंड्स व प्रोजेक्ट के 'मास्टरमाइंड' पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ राजा साबू कुंडली मारे बैठे हैं । ट्रस्ट के नियमानुसार, ट्रस्ट का चेयरमैन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होता है, और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट सेक्रेटरी तथा निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर ट्रेजरर होता है - लेकिन राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स इस ट्रस्ट के एकाउंट पर कब्जा जमाये बैठे हैं, और ट्रस्ट के वाजिब पदाधिकारियों को उनका हक देने को तैयार नहीं हैं । पिछले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी ने इस मामले में रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड तक गुहार लगाई, लेकिन राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स बेशर्मी धारण करते हुए ट्रस्ट के एकाउंट पर कुंडली मारे बैठे हुए हैं । लोगों का कहना है कि पिछले वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी ने ट्रस्ट का चेयरमैन पद का अधिकार पाने का प्रयास तो किया था, इस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रवीन गोयल से तो उस तरह का प्रयास किए जाने की उम्मीद करना/रखना ही बेकार है । ऐसे ही संदर्भों के साथ, लोगों को शक है और उनका आरोप है कि केरल के बाढ़/बारिश पीड़ितों के नाम पर पैसा इकट्ठा करने के पीछे असल उद्देश्य अपनी जेब भरना है । डिस्ट्रिक्ट के लोगों के लिए यह समझना भी मुश्किल हो रहा है कि राजा साबू और यशपाल दास तथा उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स अपने यहाँ के पीड़ितों की मदद करने की बजाये दूसरे दूसरे देशों और प्रदेशों के पीड़ितों की मदद करने में दिलचस्पी क्यों लेते हैं ? जिन लोगों ने इस बात को समझने की कोशिश की है, उन्हें लगता है कि राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स पीड़ितों की मदद के नाम पर अपनी ब्रॉन्डिंग करने, मौज-मजा करने, राजनीति करने, बिजनेस करने तथा अपनी जेब भरने का उद्देश्य पूरा करते हैं ।

Sunday, August 12, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में अशोक अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए रोटरी में अपनी सक्रियताओं व उपलब्धियों का सहारा लेना शुरू किया

गाजियाबाद । अशोक अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई में अपने आप को आगे रखने के लिए अपनी सक्रियताओं और अपनी उपलब्धियों से रोटेरियंस को परिचित करवाने का जो काम शुरू किया है, उसने कई नए रोटेरियंस को चकित किया है और उन्हें लगा है कि इतना कुछ करने/पाने वाले अशोक अग्रवाल अभी तक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर आखिर क्यों नहीं बने ? नए रोटेरियंस के बीच सवाल यही है कि कमजोर बैकग्राउंड और ज्यादा कुछ न करने वाले लोग भी जब गवर्नर बन गए हैं, तब अशोक अग्रवाल गवर्नर बनने के मामले में पीछे क्यों रह गए हैं ? अशोक अग्रवाल का रोटरी बैकग्राउंड और रोटरी में उनकी निरंतर सक्रियता का इतिहास वास्तव में प्रेरणापूर्ण है और किसी को भी प्रभावित कर सकता है । अशोक अग्रवाल वर्ष 2003-04 में अपने क्लब - रोटरी क्लब गाजियाबाद ग्रेटर के प्रेसीडेंट बने थे, और उसके दूसरे वर्ष में ही, वर्ष 2005-06 में वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्य बन गए थे । उन वर्षों में जो लोग डिस्ट्रिक्ट में सक्रिय थे, वह जानते हैं और बताते हैं कि सात/आठ क्लब्स का प्रतिनिधित्व करने वाले जोन में नोमीनेटिंग कमेटी की सदस्यता के लिए चुनाव कितना चुनौतीपूर्ण था, जिसे जीतने के लिए अशोक अग्रवाल को अपने साथियों/समर्थकों के साथ-साथ अपने विरोधियों को भी अपनी उम्मीदवारी के समर्थन में बनाए रखने को लेकर मेहनत तो करना ही पड़ी थी, साथ ही अपनी रणनीतिक कुशलता का भी इस्तेमाल करना पड़ा था ।
अशोक अग्रवाल ने नोमीनेटिंग कमेटी का उक्त चुनाव जिस रणनीतिक कुशलता के साथ लड़ा था, उसमें 'पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं' वाली कहावत को चरितार्थ होते देख कई लोगों ने मान/समझ लिया था कि अशोक अग्रवाल को रोटरी की राजनीति में काफी आगे तक जाना है । रोटरी की राजनीति में आगे तक जाने का मतलब डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने से होता है, इसलिए कई लोग अशोक अग्रवाल को भावी उम्मीदवार/गवर्नर के रूप में देखने लगे । अशोक अग्रवाल ने लेकिन सभी को निराश किया और उम्मीदवारी के पचड़े से दूर ही रहने की घोषणा की । उनके क्लब से जेके गौड़ की उम्मीदवारी प्रस्तुत होने से लोगों ने मान लिया कि अशोक अग्रवाल गवर्नर बनने की बजाये, गवर्नर 'बनाने' के खेल में हिस्सेदारी करेंगे । जेके गौड़ को अशोक अग्रवाल के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना गया था; और जेके गौड़ पूरी तरह उन्हीं पर निर्भर रहे थे । जेके गौड़ की उम्मीदवारी की दौड़ के दौरान एक मजेदार किस्सा हुआ था - जेके गौड़ उम्मीदवार के रूप में वरिष्ठ रोटेरियन राजीव वशिष्ठ से मिलने पहुँचे थे; राजीव वशिष्ठ ने बातों बातों में उनसे कहा/बताया कि उनके सुनने में आया है कि अशोक अग्रवाल उनकी उम्मीदवारी से खुश नहीं हैं और उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में नहीं हैं । यह सुनकर जेके गौड़ के तो जैसे होश ही उड़ गए । वह अगले ही दिन अशोक अग्रवाल को लेकर राजीव वशिष्ठ के यहाँ फिर पहुँचे - यह बताने/दिखाने के लिए कि देखिये, अशोक अग्रवाल उनकी उम्मीदवारी से बहुत खुश हैं और पूरी तरह से उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में हैं । बाद के वर्षों में अशोक अग्रवाल ने कहीं यह कह दिया था कि वह उस वर्ष उम्मीदवार बनेंगे, जिस वर्ष आलोक गुप्ता उम्मीदवार बनेंगे । यह उस समय की बात है, जब अशोक अग्रवाल और आलोक गुप्ता के बीच संबंध गड़बड़ चल रहे थे । अशोक अग्रवाल की उक्त घोषणा का असर यह था कि पिछले रोटरी वर्ष में आलोक गुप्ता ने जब अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी शुरू की, तो सबसे पहला काम यह सुनिश्चित करने का किया कि अशोक अग्रवाल उनके साथ-साथ अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत न करें ।
यह दो किस्से अशोक अग्रवाल की राजनीतिक व रणनीतिक कुशलता की ठोस गवाही देते हैं । हालाँकि कुछेक लोग इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ के बीच हुए चुनाव में जेके गौड़ की पराजय के लिए अशोक अग्रवाल को जिम्मेदार ठहराते हुए कहते/बताते हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में जेके गौड़ की हरकतों का बचाव करने के कारण अशोक अग्रवाल ने कई लोगों को नाराज किया है, जिसके चलते अब उनका पहले जैसा जलवा नहीं रह गया है । कुछेक लोगों को यह भी लगता है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में जेके गौड़ की हरकतों को देखते हुए लोग रमेश अग्रवाल की बद्तमीजियों को भी भूल गए और 'ट्रबल शूटर' के रूप में अशोक अग्रवाल उस स्थिति को हैंडल नहीं कर सके । उस झटके ने अशोक अग्रवाल के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के अपने चुनाव को खासा चुनौतीपूर्ण बना दिया है । अशोक अग्रवाल ने पिछले वर्षों में हुए चुनावों में सक्रिय भूमिका निभाई है, और अधिकतर बार अपनी भूमिका से 'अपने' उम्मीदवारों को सफलता दिलवाई है, कुछेक बार हालाँकि उनके तमाम प्रयत्नों के बावजूद 'उनके' उम्मीदवारों को पराजय का मुँह भी देखना पड़ा है । अशोक अग्रवाल के लिए चुनौती की बात यह है कि जो लोग उनकी सक्रियता के इतिहास से पूरी तरह परिचित हैं, वह तो जानते हैं कि रोटरी की चुनावी राजनीति में अशोक अग्रवाल के हिस्से में सफलताएँ ज्यादा हैं, असफलताएँ कम हैं; लेकिन जो लोग उनकी सक्रियता के इतिहास को पूरी तरह नहीं जानते हैं, वह आधी-अधूरी बातों के आधार पर ही उम्मीदवार के रूप में उनका मूल्याँकन करेंगे ।
अशोक अग्रवाल ने इसी चुनौती से निपटने के लिए अपनी सक्रियताओं और उपलब्धियों से लोगों को परिचित करने/करवाने का काम शुरू किया है । पुराने रोटेरियंस तो अशोक अग्रवाल को जानते ही हैं; नए रोटेरियंस को यह जान कर लेकिन जरूर आश्चर्य हुआ है कि अशोक अग्रवाल दो बार असिस्टेंट गवर्नर रहे हैं और तीन बार डिस्ट्रिक्ट पोलियो कमेटी के चेयरमैन रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट पब्लिक इमेज कमेटी और डिस्ट्रिक्ट मेंबरशिप कमेटी के चेयरमैन रहने के साथ-साथ वह डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन कमेटी के प्रमुख तथा डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी के पद की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं । इस वर्ष वह डिस्ट्रिक्ट एडवाईजर हैं ही । रोटरी में अपनी सेवाओं के लिए अशोक अग्रवाल बेस्ट रोटेरियन अवॉर्ड से भी नवाजे जा चुके हैं । अशोक अग्रवाल और उनके समर्थकों व शुभचिंतकों को उम्मीद है कि उनकी सक्रियता और उपलब्धियों की बात लोग जानेंगे, तो उससे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत उनकी उम्मीदवारी को फायदा पहुँचेगा । अपनी सक्रियताओं और उपलब्धियों को अशोक अग्रवाल सचमुच अपनी उम्मीदवारी के समर्थन में ट्रांसफर कर/करवा सकेंगे या नहीं, यह देखना दिलचस्प होगा ।

Saturday, August 11, 2018

इंटरनेशनल प्रेसीडेंट इलेक्ट चुने गए सुशील गुप्ता को फजीहत से बचाने के लिए डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव से 'बचने' और या चुनाव को ईमानदारी से करवाए जाने की कोशिशें सचमुच सफल हो सकेंगी क्या ?

नई दिल्ली । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी चुने जाने के बाद सुशील गुप्ता को देश/विदेश में/से बधाईयाँ भले ही खूब मिल रही हों, और देश/विदेश के लोग उनके प्रति भले ही सम्मान उड़ेले दे रहे हों - लेकिन अपने ही डिस्ट्रिक्ट में उन्हें बहुत ही प्रतिकूल चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है । सुशील गुप्ता के नजदीक समझे जाने वाले कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के डिस्ट्रिक्ट में कम से कम दो-तीन वर्ष तक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद पर आपसी सहमति से चयन करने के सुझाव को जिस तरह से नकारने का काम हुआ है, उससे संकेत मिल रहा है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट इलेक्ट चुने जाने के बाद सुशील गुप्ता के साथ नजदीकी 'दिखाने' को लेकर डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच होड़ भले ही मची हो, लेकिन उनके मान/सम्मान को बनाये रखने को लेकर किसी को फिक्र नहीं है । सुशील गुप्ता के कुछेक नजदीकियों का मानना और कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को लेकर पिछले रोटरी वर्ष में जिस तरह और जिस स्तर की बेईमानी हुई और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर व कुछेक पूर्व गवर्नर्स की उसमें खुली भागीदारी रही, उसके कारण डिस्ट्रिक्ट का माहौल काफी विषाक्त हो गया है । पिछले वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी इस वर्ष भी जिस तरह से अपनी हरकतों को जारी रखे हुए हैं, और मौजूदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय भाटिया का छिपा तथा उनके साथियों का खुला सहयोग/समर्थन रवि चौधरी की हरकतों को मिलता दिख रहा है - उससे लग रहा है कि पिछले वर्ष जैसी ही हरकतें इस वर्ष भी हो सकती हैं । अब जब हरकतें होंगी, तो उसकी चर्चाएँ भी होंगी - और तब डिस्ट्रिक्ट व सुशील गुप्ता के बड़े 'दुश्मनों' को उन्हें बदनाम करने का मौका मिलेगा; और यह स्थिति इंटरनेशनल प्रेसीडेंट इलेक्ट सुशील गुप्ता के लिए फजीहत वाली होगी ।
कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स याद दिलाते हैं कि एक बार पहले भी, विनय भाटिया के चुनाव में हुई बेईमानी को लेकर रोटरी इंटरनेशनल के तत्कालीन पदाधिकारियों ने खुद से संज्ञान लेकर डिस्ट्रिक्ट 3011 के राजनीतिक माहौल पर चर्चा की थी, और तीन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स तथा पप्पूजीत सिंह सरना की भूमिका की आलोचना करते हुए तीखी टिप्पणी की थी । उसी प्रकरण को याद करते हुए कुछेक पूर्व गवर्नर्स का कहना है कि सुशील गुप्ता के प्रेसीडेंट होते हुए डिस्ट्रिक्ट में चुनावी राजनीति को लेकर यदि गंदी हरकतें होती हैं, तो सुशील गुप्ता के प्रेसीडेंट इलेक्ट चुने जाने से नाखुश हुए बड़े नेताओं को उन्हें और डिस्ट्रिक्ट को बदनाम करने का मौका मिलेगा । इस स्थिति से बचने के लिए ही सुशील गुप्ता के नजदीकियों के रूप में देखे जाने वाले पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को तरकीब सूझी कि क्यों न अगले दो-तीन वर्षों में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए आपसी विचार-विमर्श से सहमति बनाई जाए, ताकि कोई विवाद पैदा न हो सके - और सुशील गुप्ता के प्रेसीडेंट इलेक्ट चुने जाने से नाखुश हुए बड़े नेताओं को उन्हें और डिस्ट्रिक्ट को बदनाम करने का मौका न मिल सके । डिस्ट्रिक्ट, सुशील गुप्ता और उनके नजदीकी पूर्व गवर्नर्स की बदकिस्मती लेकिन यह रही कि इस विचार को कोई खास समर्थन मिलता हुआ दिख नहीं रहा है, और इस विचार की भ्रूण हत्या ही होती नजर आ रही है । 
दरअसल डिस्ट्रिक्ट के कुछेक चुनावबाज नेताओं को डर है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए चुनाव यदि नहीं हुए, तो उनके सामने तो अस्तित्व का ही संकट खड़ा हो जायेगा । कुछेक 'नेताओं' की तो वास्तव में समस्या ही यह है कि उनका रोटरी और डिस्ट्रिक्ट में कोई सकारात्मक योगदान तो है नहीं, वह राजनीति व बदतमीजी के जरिये ही अपनी 'चौधराहट' जमाने की कोशिश करते हैं - उन्हें जब राजनीति करने का मौका नहीं मिलेगा, तो उनके लिए तो रोटरी का 'मतलब' ही खत्म हो जायेगा । ऐसे लोगों ने ही विचार-विमर्श के जरिये डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सहमति बनाने के विचार को सिरे से ही नकार दिया है । इसके लिए उन्होंने तर्क भी जोरदार गढ़ लिया है और वह यह कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी कौन हो, इसका फैसला कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को नहीं - बल्कि क्लब्स के प्रेसीडेंट्स को ही करने देना चाहिए । कुछेक वरिष्ठ रोटेरियंस का कहना यह भी है कि चुनाव से 'बचने' की बजाये चुनाव को ईमानदारी से करवाए जाने का प्रयास किया जाना चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर और या उसके संगी-साथी और पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स चुनाव के नाम पर अपनी गंदी राजनीति और हरकतें न कर सकें - जिससे कि डिस्ट्रिक्ट की पहचान को कलंकित होने से और सुशील गुप्ता को फजीहत का शिकार होने से बचाया जा सके । डिस्ट्रिक्ट में लेकिन जिस तरह का माहौल है, और डिस्ट्रिक्ट टीम के कुछेक पदाधिकारियों ने जिस तरह से अपने आपको 'सुपर गवर्नर' समझा हुआ है, और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय भाटिया जिनके सामने असहाय व मजबूर से बने हुए हैं - उसके चलते ऐसा हो सकेगा, यह देखना दिलचस्प होगा ।

Thursday, August 9, 2018

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद को लेकर वीके हंस तथा बिरिंदर सोहल की उम्मीदवारी पर लीडरशिप खेमे की असमंजसता का फायदा उठाने के लिए तेजपाल खिल्लन ने लीडरशिप के लोगों के साथ नजदीकी बनाना शुरू की

नई दिल्ली । मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 के दो गवर्नर्स - डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के वीके हंस और डिस्ट्रिक्ट 321 एफ के बिरिंदर सोहल ने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने के लिए अपनी अपनी इच्छा जाहिर करते हुए कोशिशें तो शुरू कर दी हैं, लेकिन दोनों को ही अपने अपने फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रवैये से अपनी कोशिशें धूल में मिलती हुई भी दिख रही हैं । मल्टीपल की चुनावी राजनीति के जानकारों का कहना है कि वीके हंस को अपने फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राजीव अग्रवाल की अतिरिक्त महत्वाकांक्षा का तथा बिरिंदर सोहल को अपने फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर गोपाल कृष्ण शर्मा की खेमेबाजी की राजनीति का शिकार होना पड़ सकता है । डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री के लोगों का भी मानना और कहना है कि राजीव अग्रवाल ने लायनिज्म में जिस तरह की सक्रियता बनाई है और जिस 'स्तर' पर अपने आपको पहुँचाया है, उसे देखते हुए लगता है कि वह लायनिज्म में लंबी पारी खेलना चाहते हैं, और इसके लिए  मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनना चाहेंगे - और अपना मौका वीके हंस के चक्कर में नहीं गँवाना चाहेंगे । लोगों को यह भी लगता है कि हालाँकि इसके लिए राजीव अग्रवाल को वीके हंस को लंगड़ी लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि बहुत संभव है कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने की वीके हंस की हसरत खुद ही दम तोड़ दे । दरअसल वीके हंस को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है; हर किसी का मानना और कहना यही है कि वीके हंस में लीडरशिप की कोई सी भी खूबी नहीं है, और यही बहुत है कि वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बन गए । वीके हंस को हालाँकि उम्मीद है कि लीडरशिप मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए उन्हें समर्थन दिलवाएगी और वही राजीव अग्रवाल को भी उनका समर्थन करने के लिए राजी करेगी ।
मजे की बात है कि लीडरशिप के समर्थन के भरोसे ही बिरिंदर सोहल मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने की तैयारी कर रहे हैं । उनका दावा है कि पारस अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए उन्होंने लीडरशिप को समर्थन ही इस आश्वासन के बाद दिया था कि अगली बार लीडरशिप उन्हें चेयरमैन बनवाएगी । बिरिंदर सोहल को विश्वास है कि लीडरशिप अपने आश्वासन को पूरा करेगी । लीडरशिप को बचने का कोई बहाना न मिले, इसके लिए बिरिंदर सोहल ने अपने फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर गोपाल कृष्ण शर्मा को अपने साथ करने/रखने के प्रयत्न किए हुए हैं । उनके डिस्ट्रिक्ट के नेताओं का कहना लेकिन यह है कि बिरिंदर सोहल और गोपाल कृष्ण शर्मा के बीच खेमेबाजी की जो विभाजक रेखा है, उसे मिटा पाना बिरिंदर सोहल के बस की बात नहीं है । इस मामले में बिरिंदर सोहल के सबसे बड़े समर्थक एचजेएस खेड़ा ही उनके सबसे बड़े 'दुश्मन' साबित हो रहे हैं । दरअसल गोपाल कृष्ण शर्मा की एचजेएस खेड़ा से बिलकुल भी नहीं पटती है; इसका कारण सिर्फ इतना है कि गोपाल कृष्ण शर्मा को एचजेएस खेड़ा की मनमानियाँ और चौधरीपना दिखाने वाला रवैया कतई बर्दाश्त नहीं है । इसके चलते दोनों के बीच कई बार झड़प हो चुकी है । बिरिंदर सोहल के समर्थकों व शुभचिंतकों को ही लगता है कि बिरिंदर सोहल और गोपाल कृष्ण शर्मा के बीच खेमेबाजी की जो दीवार है, उसे ढहाने की बिरिंदर सोहल कोशिश भी करें - तो एचजेएस खेड़ा और गोपाल कृष्ण शर्मा के बीच की लगातार चलती रहने वाली तनातनी बिरिंदर सोहल की मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने की कोशिशों की तैयारी को तबाह करने का ही काम करेगी । 
मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए कुछेक लोगों को तेजपाल खिल्लन की उम्मीदवारी आने का भी इंतजार है । उन्हें लगता है कि तेजपाल खिल्लन ने हाल के दिनों में डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू के अपने साथियों से दूरी बनाने और 'दिखाने' तथा लीडरशिप के लोगों के साथ नजदीकी बनाने की कोशिश करते हुए जो रंग बदला है, उसमें मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने की उनकी ख्वाहिश ही छिपी है । तेजपाल खिल्लन ने कई मौकों पर कहा है कि उनका लीडरशिप के साथ कोई झगड़ा न था और न है, वह तो डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू के झगड़े का बेकार में ही शिकार बन गए । तेजपाल खिल्लन की इस तरह की बातों और उनकी कोशिशों को देख कर लोगों ने यही माना और समझा है कि तेजपाल खिल्लन अब लीडरशिप के लोगों के साथ दोस्ती करना चाहते हैं, ताकि उनके धंधे पर और खराब असर न पड़े । तेजपाल खिल्लन के नजदीकियों का ही कहना/बताना है कि धंधा बचाने के साथ-साथ तेजपाल खिल्लन मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन की कुर्सी पर भी निगाह लगाए हुए हैं । हालाँकि अधिकतर लोगों का मानना और कहना है कि लीडरशिप के लोगों के साथ तेजपाल खिल्लन यदि संबंध सुधार भी लें, तो भी मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के मामले में उनकी दाल नहीं ही गलेगी । इसका कारण यही है कि लीडरशिप के लोग अभी तेजपाल खिल्लन पर भरोसा नहीं करना चाहेंगे । तेजपाल खिल्लन के नजदीकियों का कहना है कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद को लेकर लीडरशिप खेमे में जो असमंजसता है, उसका फायदा तेजपाल खिल्लन उठा सकते हैं । अधिकतर लोगों को लेकिन यह बात भी हजम नहीं हो रही है । उनका कहना है कि पहली बात तो यह है कि तेजपाल खिल्लन के पास अपने फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के अलावा और किसी का समर्थन नहीं है, और दूसरी बात यह कि लीडरशिप किसी भी हाल में मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन का पद उनके पास नहीं जाने देगी । मजे की बात यह है कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद को लेकर तेजपाल खिल्लन अभी खुद कुछ नहीं कह रहे हैं; अभी वह अपने लोगों से अपने नाम की चर्चा चलवा रहे हैं और देख/समझ रहे हैं कि चेयरमैन पद को लेकर वह आखिर क्या चाल चलें - और या पीछे ही रहें ?