Thursday, December 13, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 और इसके तीन पूर्व गवर्नर्स पर इंटरनेशनल बोर्ड द्वारा लगाए गए 'चुनावी अपराधी' होने के आरोप को रद्द करने/करवाने में इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी के रूप में सुशील गुप्ता सचमुच कोई प्रयास करेंगे क्या ?

नई दिल्ली । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता रोटरी इंटरनेशनल से जुड़े अदालती मामलों को खत्म करवाने के अभियान में तो सफल हो रहे हैं, लेकिन अपने ही डिस्ट्रिक्ट और उसके तीन पूर्व गवर्नर्स को रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड द्वारा 'चुनावी अपराधी' घोषित किए जाने के 'आरोप' से मुक्त करवा पाने का मामला उनके लिए भारी चुनौती बना हुआ है । उल्लेखनीय है कि मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर बासकर चॉकलिंगम डिस्ट्रिक्ट 3100 से जुड़े जिन अदालती मामलों को वापस करवाने के लिए जी-जान से लगे रहने के बावजूद कामयाब नहीं हो पा रहे थे, उन्हें सुशील गुप्ता ने तत्काल प्रभाव से वापस करवा दिया है । दरअसल सुशील गुप्ता का प्रयास है कि रोटरी इंटरनेशनल में जिस समय वह सर्वोच्च पद पर हों, उस समय उनके अपने देश में रोटरी इंटरनेशनल के लिए फजीहत खड़ी करने वाला कोई काम न हो । इसी प्रयास के तहत सबसे पहले तो उन्होंने रोटरी इंटरनेशनल को अदालती मामलों में घसीटे जाने की कार्रवाईयों को थामने पर ध्यान दिया, और इस मामले में डिस्ट्रिक्ट 3100 के झगड़े को निपटाने में बड़ी सफलता प्राप्त की । सुशील गुप्ता के इस प्रयास को और इस प्रयास में मिल रही उनकी कामयाबी को देखते हुए उनके अपने डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट और उसके तीन पूर्व गवर्नर्स पर रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड द्वारा लगाए गए 'चुनावी अपराधी' के दाग को धोने के लिए भी सक्रिय होने तथा कुछ करने की माँग उठने लगी है । उल्लेखनीय है कि तीन वर्ष पहले डिस्ट्रिक्ट 3011 में हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में दीपक तलवार, सुशील खुराना व विनोद बंसल की मिलीभगत से हुई बेईमानी का संज्ञान लेते हुए रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने बहुत ही सख्त टिप्पणी की थी, और इन तीनों पूर्व गवर्नर्स को 'दोषी' ठहराते हुए चेतावनी दी थी कि लिखित शिकायत न मिलने के कारण बोर्ड अभी तो कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है, लेकिन भविष्य में यदि ऐसी कोई घटना हुई और शिकायत मिली तो डिस्ट्रिक्ट को तथा घटना में शामिल लोगों को बख्शा नहीं जायेगा । उक्त चुनाव में बेईमानी करके मौजूदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विनय भाटिया को चुनाव जितवाया गया था । 
रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड का उक्त फैसला डिस्ट्रिक्ट 3011 पर वास्तव में एक कलंक की तरह है । इंटरनेशनल बोर्ड के उस फैसले को तत्कालीन इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन की खुराफाती हरकत के रूप में देखा/पहचाना गया था । याद रखने तथा गौर करने वाली बात यह है कि रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड के उक्त फैसले का विरोध करते हुए डिस्ट्रिक्ट 3011 में काउंसिल ऑफ गवर्नर्स ने तुरंत बुलाई अपनी मीटिंग में एक प्रस्ताव पास किया था, जिसे उस समय भेजा इसलिए नहीं गया था क्योंकि केआर रवींद्रन के प्रेसीडेंट रहते काउंसिल ऑफ गवर्नर्स को न्याय मिलने की उम्मीद नहीं थी । उक्त मीटिंग में इस बात को बाकायदा रेखांकित किया गया कि रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड ने डिस्ट्रिक्ट 3011 के खिलाफ जो फैसला दिया है, वह चूँकि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन की खुराफाती सोच का नतीजा है - इसलिए उनके प्रेसीडेंट रहते विरोध प्रस्ताव भेजने का कोई फायदा नहीं होगा, इसलिए विरोध प्रस्ताव भेजने के लिए केआर रवींद्रन का कार्यकाल पूरा हो जाने तक इंतजार किया जाए । 30 जून को केआर रवींद्रन का प्रेसीडेंट-काल तो पूरा गया, लेकिन डिस्ट्रिक्ट 3011 तथा इसके 'आरोपी' पूर्व गवर्नर्स के लिए मुसीबत की बात यह रही कि केआर रवींद्रन दक्षिण एशिया में रोटरी के झगड़ों/मामलों को देखने के इंचार्ज बना दिए गए । इस कारण डिस्ट्रिक्ट 3011 तथा उसके आरोपी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के लिए मामला जहाँ का तहाँ ही बना रह गया है, और इसके चलते काउंसिल ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में पास हुए विरोध प्रस्ताव को रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय भेजने की बजाए धूल खाने के लिए छोड़ दिया गया । लेकिन अब जब सुशील गुप्ता इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी हो गए हैं, तब डिस्ट्रिक्ट में लोगों को उम्मीद बँधी है कि अब सुशील गुप्ता ही इंटरनेशनल बोर्ड के उस फैसले को रद्द करवायेंगे तथा डिस्ट्रिक्ट व तीनों पूर्व गवर्नर्स को 'चुनावी अपराधी' के कलंक से मुक्ति दिलवायेंगे । इस मामले में सबसे ज्यादा उत्सुक व सक्रिय विनोद बंसल बताए/सुने जा रहे हैं । 
विनोद बंसल दरअसल इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उम्मीदवार बनने की तैयारी कर रहे हैं; जिस कारण उन्हें लगता है कि इंटरनेशनल बोर्ड के फैसले में दर्ज 'आरोप' कहीं उनके लिए समस्या न खड़ी करे - इसलिए उक्त आरोप से मुक्त हो लेने में ही भलाई है । विनोद बंसल की चूँकि सुशील गुप्ता के साथ अच्छी ट्यूनिंग भी बताई/सुनी जाती है, इसलिए लोगों को लग रहा है कि विनोद बंसल की कोशिश कुछ ज्यादा है कि सुशील गुप्ता उक्त मामले में दिलचस्पी लें - और इंटरनेशनल बोर्ड के उक्त फैसले को रद्द करवाएँ । मजे की बात यह है कि रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड के उक्त फैसले से सबक किसी ने भी नहीं लिया और डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में स्थितियाँ जस की तस जैसी ही बनी रही हैं । हद की बात यह तक रही कि पप्पूजीत सिंह सरना के मामले में इंटरनेशनल बोर्ड के उक्त फैसले का पालन नहीं किया गया । उल्लेखनीय है कि उक्त फैसले में तीन पूर्व गवर्नर्स के अलावा पप्पूजीत सिंह सरना की भूमिका की आलोचना की गई थी, और साफ फैसला सुनाया गया था कि भविष्य में पप्पूजीत सिंह सरना को डिस्ट्रिक्ट में कोई महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी न दी जाए । इसके बावजूद, मौजूदा रोटरी वर्ष में पप्पूजीत सिंह सरना को महत्त्वपूर्ण भूमिका मिली । इसमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में विनय भाटिया की अहसान चुकाने वाली भूमिका को यदि अनदेखा भी कर दें, तो डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के रूप में विनोद बंसल की भूमिका सवालों के घेरे में है - उन्होंने आखिर किस मजबूरी में पप्पूजीत सिंह सरना के मामले में रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड के फैसले का उल्लंघन होने दिया ? गौर करने वाला तथ्य यह भी है कि इस वर्ष हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में एक प्रेसीडेंट को अपह्यत करके उसका वोट डलवाने का जो किस्सा सामने आया था, उसके 'संयोजक' के रूप में पप्पूजीत सिंह सरना के नाम की ही चर्चा रही है । ऐसे में, यह देखना सचमुच दिलचस्प होगा कि तीन वर्ष पहले के इंटरनेशनल बोर्ड के जिस फैसले से डिस्ट्रिक्ट 3011 में कोई सबक नहीं लिया गया, उस फैसले को रद्द करवा कर डिस्ट्रिक्ट तथा उसके तीन पूर्व गवर्नर्स को 'आरोप'मुक्त करवाने के लिए सुशील गुप्ता क्या करते हैं ?

Wednesday, December 12, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में वर्ष 2020-21 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव की तारीख को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक जैन फिर से आरोपों में घिरे

मेरठ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक जैन ने वर्ष 2020-21 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव की प्रक्रिया पर ब्रेक लगा कर एक बार फिर रोटरी व डिस्ट्रिक्ट की विश्वसनीयता पर संकट खड़ा कर दिया है । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता और रोटरी इंटरनेशनल के दिल्ली स्थित साऊथ एशिया ऑफिस के पदाधिकारी जितेंद्र सिंह के आगाह करने के बावजूद दीपक जैन ने जिस तरह से उक्त चुनाव की प्रक्रिया को मजाक बनाया हुआ है, उसके कारण रोटरी इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारियों को लग रहा है कि डिस्ट्रिक्ट 3100 को नॉन डिस्ट्रिक्ट स्टेटस से बाहर लाकर इंटरनेशनल प्रशासन ने जैसे बड़ी गलती कर दी है । उल्लेखनीय है कि प्रत्येक डिस्ट्रिक्ट में वर्ष 2020-21 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पिछले रोटरी वर्ष में ही तय हो चुके थे । नॉन डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में होने के कारण डिस्ट्रिक्ट 3100 में यह नहीं हो पाया था; लेकिन मौजूदा रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट 3100 को डिस्ट्रिक्ट का स्टेटस मिला तो उम्मीद की गई थी कि सितंबर/अक्टूबर तक डिस्ट्रिक्ट 3100 को भी वर्ष 2020-21 का गवर्नर मिल जायेगा । दीपक जैन यदि सचमुच डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में व्यवहार करते तो यह हो भी जाता, लेकिन दीपक जैन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की बजाये कुछेक लोगों की 'कठपुतली' बन गए - इसलिए उक्त मामला लटक गया । इस मामले को लेकर होने वाली चौतरफा फजीहत को देख कर दीपक जैन ने अक्टूबर के तीसरे सप्ताह में नामांकन की प्रक्रिया शुरू की, तो लगा कि उन्होंने कठपुतली का चोगा उतार कर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में व्यवहार करना शुरू किया है - लेकिन यह भ्रम साबित हुआ । 
दीपक जैन नामांकन करवा कर फिर 'सो' गए । रोटरी में आम रिवाज है कि नामांकन की प्रक्रिया शुरू होने के बाद निरंतरता में ही चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो जाती है । हाल ही के दिनों में डिस्ट्रिक्ट 3011 और डिस्ट्रिक्ट 3012 में इसी रिवाज का पालन करते हुए चुनाव या तो हो चुके हैं और या हो रहे हैं - लेकिन डिस्ट्रिक्ट 3100 में नामांकन हो जाने के बाद किसी को भी पता नहीं है कि चुनाव आखिर कब होंगे ? मजे की बात यह है कि दीपक जैन ने यह कहते हुए ठीकरा रोटरी इंटरनेशनल के सिर फोड़ा हुआ है कि वह जब लिंक भेज देगा, तब चुनाव शुरू हो जायेंगे; व्यवस्था जबकि यह होती है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को चुनाव की तारीख सुनिश्चित करना होती है - रोटरी इंटरनेशनल उसी तारीख के हिसाब से लिंक भेजता है । चुनाव की तारीख का डिस्ट्रिक्ट में किसी को पता नहीं है । डिस्ट्रिक्ट के कुछेक प्रमुख लोगों के अनुसार यह मामला दीपक जैन की काबिलियत की कमी से जुड़ा है । उनका कहना है कि दीपक जैन तीन-तिकड़म और वोटों की खरीद-फरोख्त से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर तो बन गए, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की जिम्मेदारी का निर्वाह कर पाने की काबिलियत उनमें नहीं है और इसीलिए जो चुनाव सितंबर/अक्टूबर तक हो जाना चाहिए था - उसका अभी दिसंबर में भी कोई अता-पता नहीं है । यह मामला इसलिए भी गंभीर है कि वर्ष 2021-22 के गवर्नर पद के लिए भी इसी वर्ष चुनाव होने हैं । लोगों का कहना/पूछना है कि दीपक जैन जब अभी पहला चुनाव ही नहीं करवा पा रहे हैं, तो दूसरा चुनाव कब और कैसे करवा सकेंगे ? इसी सवाल के जबाव में उनके 'कठपुतली' होने के आरोप को बल मिलता है । लोगों का कहना है कि एक कठपुतली की यही तो खूबी होती है - उसकी डोर खींची रखी जाये तो वह कुछ नहीं करती है और ढीली छोड़ दी जाये, तो वह आनन-फानन में जल्दी से काम निबटा देगी । वर्ष 2020-21 के गवर्नर पद के चुनाव में दीपक जैन भले ही छह महीने से ज्यादा का समय ले रहे हों; लेकिन आप देखियेगा - वर्ष 2021-22 के गवर्नर पद के चुनाव वह आनन-फानन में संपन्न कर/करवा देंगे ।  
दीपक जैन दो वर्षों के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के चुनावों को लेकर अपने साथ-साथ डिस्ट्रिक्ट व रोटरी की जो फजीहत कर/करवा रहे हैं; उसमें डिस्ट्रिक्ट के कुछेक लोगों को कमाई करने का ऐंगल भी लग रहा है । लोगों का सीधा/साफ आरोप है कि दीपक जैन ने वर्ष 2020-21 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के चुनाव की प्रक्रिया को जिस तरह से बीच अधर में लटका दिया है, उससे लगता है कि वह उम्मीदवारों से पैसे ऐंठने के जुगाड़ में हैं और इसीलिए चुनावी प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ा रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में दीपक जैन का रवैया प्रायः संदेहास्पद तथा आरोपों से परिपूर्ण रहा है, इसलिए उम्मीदवारों से पैसे ऐंठने के आरोप को लोगों के बीच स्वीकार्यता मिलती दिख रही है । डिस्ट्रिक्ट से लेकर रोटरी की बड़ी दुनिया तक में वर्ष 2020-21 के गवर्नर पद के चुनाव को न करवाने को लेकर दीपक जैन की भारी फजीहत हो रही है, लेकिन वह इसकी कोई परवाह करते हुए नहीं दिख रहे हैं - इससे भी लोगों को आभास हो रहा है कि उक्त चुनाव को लेकर दीपक जैन किसी बड़ी सौदेबाजी के चक्कर में हैं, और उसके चक्कर में किसी भी तरह की बदनामी उठा लेने के लिए तैयार हैं । दीपक जैन के रवैये से स्पष्ट है कि उन्होंने सुनील गुप्ता के हुए हश्र से कोई सबक नहीं सीखा है, और डिस्ट्रिक्ट 3100 को दो वर्षों तक नॉन डिस्ट्रिक्ट स्टेटस में डालने का कोई फायदा नहीं मिला है ।

Tuesday, December 11, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन की प्रबंधकीय कुशलता और अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी को मिलते दिख रहे जोरदार समर्थन ने चुनावी राजनीति के भरोसे ही रोटरी में 'गुजर बसर' करने वाले नेताओं को ठंडा किया और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव बिना हुड़दंग के संपन्न होता नजर आ रहा है

गाजियाबाद । इस तथ्य को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन की रणनीतिक कुशलता और प्रशासनिक क्षमता के उदाहरण व सुबूत के रूप में ही देखा/पहचाना जा रहा है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए तीन तीन उम्मीदवार चुनावी दौड़ में हैं,  और उनके अपने अपने समर्थक नेता हैं - उसके बावजूद चुनावी माहौल 'ठंडा' पड़ा हुआ है और चुनावी प्रक्रिया विवादहीन व शांत रूप में पूरी होने की दिशा में बढ़ती नजर आ रही है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सुभाष जैन ने ऐसी 'व्यवस्था' बना दी हुई है कि रोटरी में चुनावी राजनीति के भरोसे ही 'गुजर बसर' करने वाले नेता लोग तक ढीले पड़े हुए हैं, और सभी को हैरान करते हुए भले लोगों जैसी बातें कर रहे हैं । राजनीति से दूर रहने और किसी का भी पक्ष न लेने जैसी बातें खुर्राट नेताओं के मुँह से निकलती देख लोगों को सहसा विश्वास तो नहीं हो रहा है, लेकिन सच्चाई यही देखने में आ रही है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति में बढ़चढ़ कर भूमिका निभाते रहे नेता लोग इस वर्ष के चुनाव में 'बेचारे' बने बैठे हैं, और चुपचाप बैठ कर नजारा देखने के लिए मजबूर हुए हैं । प्रत्येक वर्ष चुनावी राजनीति के जोड़तोड़ भरे तमाशे को देखते रहे लोग इस स्थिति का श्रेय डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन को दे रहे हैं । उनका कहना है कि सुभाष जैन ने साबित कर दिया है कि कोई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर यदि चाहे और प्रयास करे तो चुनावी प्रक्रिया को निष्पक्ष तरीके से और बिना हुड़दंगबाजी के संपन्न करा सकता है ।
खास बात यह है कि चुनावी राजनीति में भूमिका निभाने को ही रोटरी 'समझने' वाले कुछेक नेताओं ने समय समय पर इस या उस उम्मीदवार का झंडा उठा कर अपनी सक्रियता बनाने/दिखाने का प्रयास हालाँकि किया था, लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सुभाष जैन ने जो जाल फैलाया हुआ था, उसमें फँस कर कोई भी नेता ज्यादा दूर तक चल नहीं पाया और फिर हर कोई सीधी/सच्ची बात करने के लिए मजबूर हो उठा । मजे की बात यह भी रही कि किन्हीं किन्हीं नेताओं ने चुनावी राजनीति के चक्कर में सुभाष जैन को ही फँसाने का प्रयास किया, लेकिन सुभाष जैन ने रणनीतिक कुशलता के साथ न सिर्फ अपने आपको बचा लिया, बल्कि षड्यंत्रकारियों को यह संदेश भी दे दिया कि उनके षड्यंत्र उलटे उन्हें ही मुश्किल में फँसा देंगे । यही कारण रहा कि चुनावी राजनीति के बदनाम खिलाड़ियों ने हालात को प्रतिकूल पा कर अपने कदम जल्दी ही पीछे खींच लिए - और डिस्ट्रिक्ट में बड़े ही सद्भाव व शांति के साथ चुनाव होने का माहौल बना । लोगों के बीच हालाँकि चर्चा तो हो जाती है कि फलाँ नेता फलाँ उम्मीदवार के समर्थन में है, लेकिन नेता बेचारा कुछ करता/कहता हुआ नहीं दिख रहा है । बदनाम नेता तक सज्जनता की ऐसी मूर्ति बने दिख रहे हैं, कि बेचारी सज्जनता भी लजा रही है । नौ सौ चूहे खा चुकी बिल्ली के हज पर जाने वाले मुहावरे को यदि कोई व्यावहारिक रूप में चरितार्थ होते देखना चाहता है, तो उसे डिस्ट्रिक्ट के चुनावबाज नेताओं को देखना चाहिए ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी माहौल के ठंडा रहने का एक कारण हालाँकि अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी में भी देखा/पहचाना जा रहा है । दरअसल अशोक अग्रवाल की रोटरी में तमाम वर्षों की जो सक्रियता है, और प्रायः हर गवर्नर के साथ उनका सहयोग व समर्थन का जो संबंध रहा है. उसके कारण प्रत्येक पूर्व या भावी गवर्नर उनके खिलाफ सक्रिय होने और 'दिखने' से बचा है । राजनीतिक खेमेबाजी व राजनीतिक उठापटक की 'जरूरतों' के चलते जो पूर्व व भावी गवर्नर्स अशोक अग्रवाल की उम्मीदवारी के खिलाफ होना भी चाहते थे, वह एक उम्मीदवार के रूप में अशोक अग्रवाल की लोकप्रियता व स्वीकार्यता को देख/पहचान कर पीछे हट गए । वास्तव में दूसरे उम्मीदवार कभी भी यह समझ ही नहीं सके कि अशोक अग्रवाल से वह कैसे 'लड़ें' - अशोक अग्रवाल से मुकाबला करने के लिए उनके पास चूँकि कोई रणनीति ही नहीं थी, इसलिए वह डिस्ट्रिक्ट के चुनावबाज नेताओं को अपने साथ जोड़ ही नहीं सके । चुनावबाज नेताओं की तरफ से समय समय पर यह शिकायत भी सुनने को मिली कि अशोक अग्रवाल का मुकाबला करने की इच्छा रखने वाले उम्मीदवारों को उनकी मदद तो चाहिए थी, लेकिन वह उन पर भरोसा नहीं कर रहे थे - जिस कारण उम्मीदवारों और उनके संभावित समर्थक नेताओं के बीच विश्वास का संबंध नहीं बन सका । इसमें डिस्ट्रिक्ट के चुनावबाज नेताओं की बदनामी ने भी निर्णायक भूमिका निभाई । डिस्ट्रिक्ट के चुनावबाज नेताओं की बदनामी को देखते/समझते हुए उनके समर्थन की इच्छा रखने वाले उम्मीदवारों ने उनके साथ दूरी बनाए रखते हुए ही उनके समर्थन की उम्मीद की, जिससे बात लेकिन बनी नहीं । डिस्ट्रिक्ट के नेताओं ने कहना भी शुरू कर दिया है कि चुनाव में उन्हें जब अशोक अग्रवाल की स्पष्ट जीत 'दिखाई' दे रही है, तो वह 'इस' या 'उस' उम्मीदवार के समर्थन में जा कर अपनी राजनीतिक फजीहत क्यों करवाएँ ?

Wednesday, December 5, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के पूर्व प्रेसीडेंट एनडी गुप्ता ने चुनाव से ऐन पहले विजय गुप्ता के समर्थकों के बीच पहुँच कर चुनावी परिदृश्य को रोमांचपूर्ण बनाया, जिसमें विजय गुप्ता के साथ अतुल गुप्ता, संजय वासुदेवा व हंसराज चुग को अगली सेंट्रल काउंसिल के सदस्य के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है

नई दिल्ली । इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट एनडी गुप्ता ने इंस्टीट्यूट की काउंसिल के लिए हो रहे चुनाव के अंतिम चरण में एक नाटकीय कदम उठाया, जिसने नॉर्दर्न रीजन के चुनावी परिदृश्य में एक नया रोमांच भर दिया है । दिल्ली में जनपथ पर स्थित मॅसोनिक क्लब में आयोजित हो रही 'सीए मीट ऑन इन्सॉल्वेंसी' - जिसमें सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार विजय गुप्ता के समर्थकों का जमावड़ा था, और जिन्होंने विजय गुप्ता को भी मीटिंग में बुला लिया था - में अचानक से पहुँच कर एनडी गुप्ता ने सभी को हतप्रभ कर दिया । एनडी गुप्ता चूँकि सेंट्रल काउंसिल के एक अन्य उम्मीदवार सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी के समर्थन में होने वाली मीटिंग्स में शामिल होते रहे हैं; इस कारण से विजय गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों की मीटिंग में उपस्थित होकर उन्होंने हर किसी को चौंकाया - फलस्वरूप विजय गुप्ता के समर्थकों की मीटिंग में एनडी गुप्ता के उपस्थित होने की खबर जंगल में आग की तरह नॉर्दर्न रीजन में फैल गई । दरअसल उक्त मीटिंग में नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के पाँच/छह पूर्व चेयरमैन मौजूद थे, और रीजनल काउंसिल के बारह/पंद्रह उम्मीदवार अपनी अपनी उम्मीदवारी का प्रचार करने में लगे थे - जिन्हें एनडी गुप्ता को वहाँ पहुँचा देख कर घोर आश्चर्य हुआ और उनके द्वारा ही फिर यह आश्चर्य पूरे रीजन के लोगों के बीच पहुँचा । एनडी गुप्ता ने मीटिंग में हालाँकि कहा कुछ नहीं; सुधीर अग्रवाल की मीटिंग्स में भी वह कभी कुछ कहते हुए नहीं सुने गए हैं - और उनकी उपस्थिति से ही लोग 'मतलब' निकालते/लगाते रहे हैं । 'मतलब' निकालने/लगाने की प्रक्रिया में ही लोगों के बीच सवाल के रूप में चर्चा रही कि एनडी गुप्ता जब सुधीर अग्रवाल की उम्मीदवारी का समर्थन करने का संकेत दे रहे थे, तो उन्हें चुनाव से ठीक पहले विजय गुप्ता की उम्मीदवारी का भी समर्थन देने का संकेत देने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी ?
इस चर्चा में एक मजेदार बात यह सुनने को मिली कि हो सकता है कि दो उम्मीदवारों का एक साथ समर्थन करके एनडी गुप्ता ने एक दूसरे पूर्व प्रेसीडेंट अमरजीत चोपड़ा की बराबरी करने की कोशिश की हो । उल्लेखनीय है कि इस बार के चुनाव में अमरजीत चोपड़ा भी दो उम्मीदवारों के समर्थन में दिख रहे हैं - एक संजीव सिंघल के और दूसरे हंसराज चुग के । अमरजीत चोपड़ा के कई एक नजदीकी और समर्थक हंसराज चुग की उम्मीदवारी के समर्थन में जिस तरह से सक्रिय हैं, उसे देख/जान कर लोगों को लग रहा है कि इसके लिए निश्चित ही उन्हें अमरजीत चोपड़ा की तरफ से निर्देश दिए गए होंगे । लोगों को लगता है कि अमरजीत चोपड़ा को दो दो उम्मीदवारों के समर्थन में देख एनडी गुप्ता को भी प्रेरणा मिली होगी, और फिर उन्होंने भी सुधीर अग्रवाल के साथ-साथ विजय गुप्ता की भी उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया । उल्लेखनीय है कि सुधीर अग्रवाल के साथ-साथ विजय गुप्ता भी एनडी गुप्ता के 'राजनीतिक शिष्यों' में रहे हैं, और एनडी गुप्ता की छत्रछाया में दोनों ने ही अपनी अपनी राजनीतिक यात्राओं को आगे बढ़ाया है । राजनीतिक संदर्भ में विजय गुप्ता चूँकि सुधीर अग्रवाल के मुकाबले ज्यादा 'कामयाब' हुए हैं, इसलिए हो सकता है कि विजय गुप्ता के प्रति एनडी गुप्ता का पुराना स्नेह पुनः जागा हो और उन्हें लगा हो कि चुनावी दौर में उन्हें विजय गुप्ता के साथ भी खड़ा होना चाहिए और 'दिखना' भी चाहिए । दिलचस्प संयोग है कि अभी कुछ ही दिन पहले नफरा (एनएफआरए - नेशनल फाइनेंशियल रिपोर्टिंग अथॉरिटी) मामले में दिल्ली हाईकोर्ट में दर्ज अपील की सुनवाई में पार्टी बनाए गए इंस्टीट्यूट का प्रतिनिधित्व करने का सवाल आया तो एनडी गुप्ता के बेटे और इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता ने विजय गुप्ता की काबिलियत और क्षमताओं पर भरोसा किया और उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट में मामले को देखने और फैसला लेने की पूरी स्वतंत्रता दी । समझा जाता है कि नवीन गुप्ता ने विजय गुप्ता पर यह भरोसा अपने पिता एनडी गुप्ता के साथ बने विजय गुप्ता के काबिलियत व जिम्मेदारी के संबंधों को देखते/समझते हुए  ही लिया होगा । विजय गुप्ता के समर्थकों की मीटिंग में उपस्थित होकर एनडी गुप्ता ने विजय गुप्ता की काबिलियत तथा जिम्मेदारीभरी क्षमताओं से जुड़ी बातों को जिस तरह से चुनाव से ऐन पहले चर्चा के केंद्र में ला दिया है, उससे विजय गुप्ता की उम्मीदवारी को और ताकत मिली दिख रही है ।          
यूँ भी संजय वासुदेवा के साथ-साथ विजय गुप्ता ही अकेले ऐसे सेंट्रल काउंसिल सदस्य हैं, जिन्हें लेकर कोई नकारात्मक बात चर्चा में नहीं है । इन्हें नापसंद करने वाले लोग तो हैं, लेकिन इनकी राजनीतिक केमिस्ट्री को नकारात्मक रूप से प्रभावित करने वाली स्थितियाँ नहीं हैं; और इसीलिए सेंट्रल काउंसिल में इनकी पुनर्वापसी करने को लेकर किसी को संदेह नहीं है । अतुल गुप्ता की जान को हालाँकि बहुत सी मुसीबतें हैं, लेकिन किसी को भी उनकी पुनर्वापसी को लेकर संदेह नहीं है, और हर किसी का मानना/कहना है कि तमाम मुसीबतों के बीच भी अतुल गुप्ता अपनी सीट आसानी से बचा लेंगे । सेंट्रल काउंसिल के मौजूदा सदस्यों में राजेश शर्मा ही ऐसे हैं, जिन्हें काउंसिल में हुए तो सिर्फ तीन वर्ष ही हैं, लेकिन जिन्होंने इन तीन वर्षों में ही इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन को तरह तरह से न सिर्फ बदनामी ही दिलवाई है, बल्कि खुद के लिए भी बदनामी ही कमाई है । इसलिए उनकी पुनर्वापसी को लेकर न सिर्फ संदेह है, बल्कि कई लोगों का तो मानना/कहना है कि राजेश शर्मा यदि जीते तो यह इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन के लिए बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा । नए उम्मीदवारों में हंसराज चुग अकेले ऐसे हैं, जिनके समर्थन-आधार को कहीं किसी की चुनौती नहीं है और जिन्होंने वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के साथ-साथ युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच भी अपनी पहचान बनाई है और अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन की अपील पैदा की है । सक्रियता के लिहाज से संजीव सिंघल, प्रमोद जैन और सुधीर अग्रवाल ने भी अपने आपको लोगों  के बीच संभावित विजेताओं के रूप में स्थापित किया है - लेकिन इनके मामलों में सकारात्मक पक्षों के साथ-साथ नकारात्मक पक्षों का भी जोर रहा है, जिस कारण इनके सामने गंभीर चुनौतियाँ हैं । हंसराज चुग इस मामले में भाग्यशाली रहे हैं कि उन्हें नकारात्मक पक्षों से मुठभेड़ नहीं करना पड़ी, और इस तथ्य को लोगों के बीच उनकी नेतृत्व-कुशलता के रूप में देखा/पहचाना गया है । संभावित मुश्किलों को हंसराज चुग तथा उनके समर्थकों ने जिस कुशलता के साथ संभाला और उन्हें बढ़ने से रोका - तथा जिसके चलते उन्हें अपनी सकारात्मक पहचान बनाने व उसे स्थापित करने का प्रभावी मौका मिला, उससे उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में लोगों के बीच अच्छी हवा बनी है । आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स एक अच्छे लीडर से उम्मीद करते हैं कि उसे प्रोफेशन से जुड़े विषयों की भी उपयोगी जानकारी हो तथा उस जानकारी को बढ़ाने के प्रति उसमें दिलचस्पी भी हो, और साथ-साथ ही उसमें संगठनात्मक स्थितियों को मैनेज करने की काबिलियत भी हो - लोगों ने हंसराज चुग में इन दोनों ही खूबियों को देखा/पाया है; और यह भी देखा/पाया है कि हंसराज चुग को इन दोनों खूबियों के बीच तालमेल बैठाना भी आता है । अधिकतर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का मानना/कहना है कि हंसराज चुग जैसे व्यक्ति को तो सेंट्रल काउंसिल में होना ही चाहिए । आम चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के इस मूड को भाँपते/देखते हुए इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ियों को हंसराज चुग सेंट्रल काउंसिल के चौथे सदस्य के रूप में नजर आ रहे हैं । बाकी दो सीटों के लिए संजीव सिंघल, सुधीर अग्रवाल, प्रमोद जैन और राजेश शर्मा के बीच काँटे का मुकाबला होता हुआ माना/पहचाना जा रहा है । 

Tuesday, December 4, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में अनूप मित्तल के स्वागत समारोह के बहाने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति जो नई करवट लेती हुई दिखी है, उसमें अशोक कंतूर तथा अजीत जालान की उम्मीदवारी की तैयारी मुश्किलों में घिरती नजर आ रही है

नई दिल्ली । रोटरी क्लब दिल्ली चाणक्यपुरी द्वारा आयोजित अनूप मित्तल के सम्मान-समारोह में अशोक कंतूर तथा अजीत जालान की अनुपस्थिति को उन दोनों के लिए बड़े राजनीतिक झटके के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । अशोक कंतूर इस वर्ष अनूप मित्तल से चुनाव हारने के बाद अगले रोटरी वर्ष में फिर से अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की घोषणा कर चुके हैं, तो अजीत जालान बहुत पहले से ही अगले रोटरी वर्ष में उम्मीदवार होने/बनने का ऐलान करते आ रहे हैं । ऐसे में उन्हें डिस्ट्रिक्ट में होने वाले हर छोटे/बड़े आयोजन में 'दिखना' चाहिए - रोटरी क्लब दिल्ली चाणक्यपुरी के एक बड़े आयोजन में लेकिन दोनों ही नहीं दिखे - खुद उनकी तरफ से बताया गया है कि उन्हें 'उचित' तरीके से समारोह में निमंत्रित ही नहीं किया गया ।सामान्य स्थिति होती, तो उनकी अनुपस्थिति और या उचित तरीके से उन्हें निमंत्रित न किए जाने की बात का कोई विशेष मतलब नहीं होता; डिस्ट्रिक्ट लेकिन चूँकि इस समय राजनीतिक रूप से एक असामान्य स्थिति में है - इसलिए यह बात अशोक कंतूर और अजीत जालान के लिए खासी अहम् है और मुसीबत का संकेत है । उक्त समारोह हालाँकि था तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुने जाने के उपलक्ष्य में अनूप मित्तल के स्वागत-सम्मान में; लेकिन एक तरह से इसे अनूप मित्तल की उम्मीदवारी का समर्थन करने वाले खेमे के शक्ति-प्रदर्शन के रूप में देखा/पहचाना गया; उपस्थितों/अनुपस्थितों की पहचान करते हुए साफ पहचाना जा सकता है कि उक्त आयोजन को खास उद्देश्य के साथ डिजाईन किया गया था और यह विजेता उम्मीदवार द्वारा दी गई पार्टी ही नहीं थी - कई लोगों को लगता है कि उक्त आयोजन वास्तव में डिस्ट्रिक्ट की भविष्य की चुनावी राजनीति का संकेत देता है, और संकेत देने का काम जैसे जानबूझ कर किया गया है । अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए संभावित उम्मीदवारों के रूप में देखे/पहचाने जा रहे महेश त्रिखा तथा रवि गुगनानी की उपस्थिति ने मामले को और स्पष्ट कर दिया है ।
अनूप मित्तल के स्वागत-सम्मान समारोह में कुछेक विरोधियों को जिस तरह से दूर रखा गया तथा कुछेक को शामिल होने का मौका मिला, उससे डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति एक नई करवट लेती हुई दिख रही है । इस नई करवट में ही अशोक कंतूर तथा अजीत जालान के लिए मुश्किलों के संकेत नजर आ रहे हैं । दरअसल डिस्ट्रिक्ट में चुनावी राजनीति का जो सीन बनता हुआ दिख रहा है, उसमें यह बात साफ जाहिर होती हुई नजर आ रही है कि अशोक कंतूर को अगली बार उन लोगों का समर्थन मिलना ही मुश्किल क्या, असंभव ही होगा जिन्होंने इस बार उनकी उम्मीदवारी का समर्थन किया था और जिनके समर्थन के बावजूद वह जीत नहीं पाए थे । उल्लेखनीय है कि रोटरी की चुनावी राजनीति में हर कहीं प्रायः देखा जाता है कि चुनाव हारने वाले के साथ उसके विरोधी रहे लोगों के बीच भी हमदर्दी पैदा हो जाती है, जिसका फायदा उसे अगली बार मिल जाता है; लेकिन अशोक कंतूर के मामले में ऐसा होता हुआ नजर नहीं आ रहा है । ऐसा दरअसल निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी के कारण हो रहा है । रवि चौधरी ने अपनी हरकतों और कारस्तानियों से तमाम लोगों को अपना विरोधी बनाया हुआ है; उधर अशोक कंतूर पर रवि चौधरी की ऐसी गहरी छाप लगी हुई है कि जिन लोगों को अशोक कंतूर से हमदर्दी है भी, वह भी रवि चौधरी की छाप देख कर उनसे दूर हट जाते हैं । अशोक कंतूर के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि इस बार के चुनाव में कंधे से कंधा मिलाकर उनका साथ देने वाले अजीत जालान अगले वर्ष उम्मीदवार बनने की तैयारी करने लगे हैं । अजीत जालान हालाँकि पहले से ही अगले वर्ष उम्मीदवार होने की बात कर रहे थे, लेकिन यह तब की बात है जब वह और उनके गॉडफादर्स अशोक कंतूर की जीत के प्रति पूरी तरह आश्वस्त थे । अशोक कंतूर का कहना है कि इस बार चूँकि उन्हें कामयाबी नहीं मिली है, इसलिए उनके समर्थक रहे लोगों को उन्हें और मौका देना चाहिए; अजीत जालान और उनके समर्थक नेता फिलहाल लेकिन अशोक कंतूर को एक और मौका देने के लिए राजी नहीं दिख रहे हैं ।
अशोक कंतूर और अजीत जालान के लिए मुसीबत की बात लेकिन यह भी है कि इनमें से जो भी पीछे हटा, उसके लिए आगे भी रास्ते बंद ही हो जायेंगे और फिर इन्हें गवर्नर बनने की अपनी इच्छा को दफ्न ही करना होगा । इन दोनों के साथ समस्या वास्तव में यह देखी/पहचानी जा रही है कि इनका अपना कोई 'जज़्बा' नहीं है; लोगों को लगता है कि अशोक कंतूर ने रवि चौधरी की ऊँगली पकड़ी हुई है, जिसका हश्र उन्होंने इस बार देख लिया है, जबकि अजीत जालान को विनोद बंसल से उम्मीद है - लेकिन लगता नहीं है कि विनोद बंसल अपने कंधे पर अजीत जालान को बैठा कर चुनावी वैतरणी पार करवाने में ज्यादा दिलचस्पी लेंगे । ऐसे में, इनमें से जो भी अपनी उम्मीदवारी से पीछे हटेगा, वह लोगों के बीच चर्चित बात को ही सही साबित करेगा और फिर कभी दूसरी पहचान नहीं बना सकेगा । यानि इनके लिए आगे खाई है तो पीछे कुआँ । गौर करने की बात यह है कि संभावित उम्मीदवारों के रूप में जिन महेश त्रिखा व रवि गुगनानी के नाम अभी चर्चा में हैं, उनकी डिस्ट्रिक्ट में अभी कोई खास पहचान या सक्रियता नहीं है और इस नाते यह दोनों ही अशोक कंतूर और/या अजीत जालान के लिए कोई खास चुनौती नहीं हैं - लेकिन अशोक कंतूर और अजीत जालान जब पहले से ही हार माने बैठे हों, तो फिर दूसरा कोई क्या कर सकता है ? अशोक कंतूर और अजीत जालान डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच जिस 'परसेप्शन' में फँसे हैं, उससे निकलने/उबरने का भी वह चूँकि कोई प्रयास करते हुए नहीं नजर आ रहे हैं इसलिए वह अपनी स्थिति को और कमजोर बना रहे हैं । इसी पृष्ठभूमि में, रोटरी क्लब दिल्ली चाणक्यपुरी के आयोजन में जिस तरह से उन्हें उपेक्षित किया गया और डिस्ट्रिक्ट में अलग-थलग करने का प्रयास किया गया - उसके कारण अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के लिए की जा रही उनकी तैयारी मुसीबतों में घिर गई है ।

Monday, December 3, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के चुनाव में अपने झूठे और बढ़े-चढ़े दावों के चलते आरोपों के घेरे में घिरे राजेश शर्मा द्वारा कन्वोकेशन समारोह में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स लड़कियों के साथ की गई हरकत के मामले के फिर से सिर उठाने से राजेश शर्मा के लिए मुश्किलें और बढ़ीं

नई दिल्ली । नए बने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को इंस्टीट्यूट की सदस्यता का सर्टीफिकेट देने के लिए यमुना स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में पिछले दिनों आयोजित हुए कन्वोकेशन समारोह में की गई अपनी हरकतों और कारस्तानियों पर पर्दा डालने की राजेश शर्मा की कोशिशें लगता है कि चुनाव से ठीक पहले फेल हो रही हैं, और राजेश शर्मा के लिए उन्हें और ज्यादा समय तक छिपाये/दबाये रखना मुश्किल हो रहा है । उल्लेखनीय है कि नए बने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के लिए हुए कन्वोकेशन समारोह में मौजूद कुछेक अभिभावकों ने आरोप लगाया था कि सर्टीफिकेट लेने मंच पर पहुँचने वाली लड़कियों को मंच पर व्यवस्था बनाये रखने के नाम पर राजेश शर्मा गलत तरीके से और गलत जगहों पर छू रहे हैं । उससे पहले नए बने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स, उनके अभिभावकों और मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित भारतीय सेना के पूर्व चीफ जनरल वीके मलिक के सामने अन्य सेंट्रल काउंसिल सदस्यों के साथ भाषण देते हुए राजेश शर्मा भाषण के नाम पर फूहड़ व सस्ते किस्म के शेर कहते हुए अपने लोगों से तालियाँ व सीटियाँ बजवा कर अपना 'चरित्र' दिखा चुके थे । इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नवीन गुप्ता तथा कुछेक सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने इशारों इशारों में कई बार प्रयास भी किया कि कार्यक्रम में कम से कम सीटियाँ तो न बजाई जाएँ, लेकिन राजेश शर्मा के लोगों को इस तरह से सिखा/पढ़ा कर लाया गया था कि उन्होंने किसी की नहीं सुनी और जब तक राजेश शर्मा का भाषण व शेर-ओ-शायरी चलती रही - वह अपनी हरकतों को दोहराते हुए इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की पहचान और साख के साथ खिलवाड़ करते रहे । लोगों ने कई कई तरीकों से इस बात को कहा/दोहराया कि राजेश शर्मा की हरकतों पर यदि लगाम नहीं लगा सकते हैं, तो इंस्टीट्यूट के कार्यक्रमों में बाहर के प्रतिष्ठित लोगों को आमंत्रित नहीं करना चाहिए, ताकि कम से कम बाहर के लोगों को तो न पता चले कि एक गंभीर और प्रतिष्ठित समझे जाने वाले विषय के प्रमुख इंस्टीट्यूट के बड़े आयोजनों तक में खुद आयोजक-सदस्यों की तरफ से ही किस तरफ की टुच्ची और लफंगईभरी हरकतें होती हैं ।
दरअसल राजेश शर्मा के इस 'रूप' के उद्घाटित होने के कारण मंच पर सर्टीफिकेट लेने/देने के दौरान लड़कियों को गलत तरीके से और गलत जगहों पर छूने/पकड़ने की राजेश शर्मा की हरकत ने गंभीर रूप ले लिया, और अभिभावकों ने राजेश शर्मा की हरकत पर शोर-शराबा किया - जिसे इंस्टीट्यूट के स्टॉफ ने बड़ी मुश्किल से जैसे-तैसे करके शांत करवाया । इंस्टीट्यूट के स्टाफ के लोगों ने अनुभव किया कि राजेश शर्मा के भाषण के दौरान जिस तरह का बेहूदा व फूहड़ सीन बना, उसे तथा मंच पर राजेश शर्मा की बेमतलब में की जा रही उछल-कूद को देख कर अभिभावकों के बीच राजेश शर्मा को लेकर समझ बनी कि वह कोई सड़कछाप व्यक्ति हैं; और इस समझ के चलते ही बहानेबाजी से लड़कियों को छूने की राजेश शर्मा की हरकत उन्हें नागवार लगी । इस सारे नजारे को देख कर नए बने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स, उनके अभिभावक और मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित पूर्व सेना चीफ जनरल वीके मलिक यह नजारा देख कर हैरान थे; उनके लिए यह समझना मुश्किल हुआ कि चार्टर्ड एकाउंटेंट्स जैसे प्रोफेशन में ऐसे 'सड़कछाप' लोग हैं कैसे ? राजेश शर्मा के व्यवहार से नाराज अभिभावकों को उस समय तो इंस्टीट्यूट के स्टॉफ ने किसी तरह शांत किया और मामले को संभाला, लेकिन अभिभावकों ने लिखित में शिकायत दर्ज करके और कार्यक्रम की वीडियो रिकॉर्डिंग के असंपादित - रॉ फुटेज माँग कर इंस्टीट्यूट प्रशासन के सामने मुसीबत खड़ी कर दी । हालाँकि शिकायतों को जाँच के नाम पर कैसे लटकाये रखा जाता है, और कैसे उन्हें 'अपनी मौत मरने' के लिए छोड़ दिया जाता है - मामले में इंस्टीट्यूट प्रशासन को अच्छा अनुभव है; और उनके इसी अनुभव ने राजेश शर्मा को बचा लिया । राजेश शर्मा ने भी अपने खिलाफ हुई शिकायत को 'खुद मरने के लिए' छोड़ देने का दबाव बनाया ही होगा । लेकिन राजेश शर्मा के खिलाफ कोई कार्रवाई होती न देख चार्टर्ड एकाउंटेंट्स बनी लड़कियों के साथ की गई राजेश शर्मा की हरकत पर आवाज उठाने वाले अभिभावकों ने जिस तरह से इंस्टीट्यूट का दरवाजा फिर से खटखटाया है, उससे राजेश शर्मा की मुश्किलें बढ़ी हुई नजर आ रही हैं । वास्तव में उक्त शिकायत के फिर से उठने/उभरने की टाइमिंग ने राजेश शर्मा के लिए फजीहत की स्थिति बना दी है । उन्हें और उनके समर्थकों को डर हुआ है कि इंस्टीट्यूट की विभिन्न काउंसिल्स के लिए हो रहे चुनाव से ठीक पहले कन्वोकेशन समारोह में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स लड़कियों के साथ की गई उनकी हरकत की बात यदि उछली और उसने जोर पकड़ा, तो उससे उनका चुनावी गणित गड़बड़ा सकता है ।
राजेश शर्मा इस समय अपने झूठे और बढ़े-चढ़े दावों के चलते यूँ भी आरोपों के घेरे में हैं । सॉफ्टवेयर द्वारा बैंक ऑडिट अलॉट होने तथा नॉन-प्रैक्टिसिंग अलाउंस के फैसले को लेकर किए जा रहे उनके दावों को लेकर लोगों के बीच चर्चा है कि राजेश शर्मा चुनाव जीतने के लिए झूठ बोल कर लोगों को धोखा देने तक से बाज नहीं आ रहे हैं । उल्लेखनीय है कि बैंक ऑडिट अलॉट करने वाले सॉफ्टवेयर को तैयार करने का काम 32 सदस्यों वाली प्रोफेशनल डेवलपमेंट कमेटी ने किया है, जिसके चेयरमैन रंजीत अग्रवाल हैं और जिसमेँ नॉर्दर्न रीजन से राजेश शर्मा के अलावा संजय वासुदेवा तथा विजय गुप्ता भी सदस्य हैं । कमेटी द्वारा किए गए काम का राजेश शर्मा ने जिस तरह से अकेले ही श्रेय लेने का प्रयास किया है, उससे जाहिर है कि अपनी चुनावी जीत को लेकर वह भारी आशंका में हैं और किसी भी तरह झूठ बोल कर लोगों को बरगला कर वह वोट पा लेना चाहते हैं । नॉन-प्रैक्टिसिंग चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को अलाउंस के मामले में तो राजेश शर्मा ने झूठ बोलने की हद ही कर दी है । उल्लेखनीय है कि कंपनियों में काम करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स अक्सर ही डॉक्टर्स की तरह नॉन-प्रैक्टिसिंग अलाउंस की माँग करते सुने गए हैं; उनकी भावनाओं का इस्तेमाल करते हुए राजेश शर्मा ने कई जगह कंपनियों में काम करने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को बताया है कि उनकी पहल पर सेंट्रल काउंसिल ने नॉन-प्रैक्टिसिंग अलाउंस के प्रस्ताव को पास कर दिया है, और पास प्रस्ताव को क्रियान्वन के लिए मंत्रालय में भेज दिया गया है । इस मामले में सच्चाई जबकि यह है कि उक्त मामले में प्रस्ताव पास होना तो दूर सेंट्रल काउंसिल में कभी एजेंडे के रूप में भी नहीं आया है । दरअसल राजेश शर्मा को लगता है कि उनके झूठ कुछ ही लोग पकड़ पायेंगे, और अधिकतर लोगों को जब तक सच्चाई पता चलेगी - तब तक चुनाव हो चुकेंगे और लोग वोट डाल चुकेंगे । राजेश शर्मा के लिए बदकिस्मती की बात लेकिन यही रही कि उनके झूठे दावे तुरंत ही पकड़े जा रहे हैं, और उनकी फजीहत करा रहे हैं । पिछले वर्ष 'सीए डे' से जुड़ी बदनामी उनकी लाख कोशिशों के बाद भी उनका पीछा छोड़ती नहीं दिख रही है, और 'सीए डे' की हरकतों को लेकर लोग अभी भी उन्हें जहाँ-तहाँ जलील करने लगते हैं । ऐसे में, कन्वोकेशन समारोह में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स लड़कियों के साथ की गई उनकी हरकत के मामले के फिर से सिर उठाने से राजेश शर्मा के लिए मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं ।

Sunday, December 2, 2018

चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट के सेंट्रल काउंसिल चुनाव में अनुज गोयल की हो रही फजीहत ज्ञान चंद्र मिसरा और या राजस्थान के उम्मीदवारों के लिए वरदान बनती नजर आ रही है

गाजियाबाद । अनुज गोयल की पतली हालत की खबरें सुनकर विनय मित्तल में अचानक से जोश भरा है, और वह सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी को लेकर तेजी से गंभीर और सक्रिय हो गए हैं । उनके नजदीकियों का हालाँकि कहना यह भी है कि लखनऊ में जब से अविचल कपूर ने एक उम्मीदवार के रूप में उनकी तारीफ की है, तब से विनय मित्तल में ज्यादा जोश भरा है और उन्हें लगता है कि चुनाव में उनका कुछ हो सकता है । जोश के बावजूद विनय मित्तल की सक्रियता का आलम यह है कि अभी जब चुनाव में मुश्किल से चार दिन बचे हैं, तब वह सोशल मीडिया में विभिन्न शहरों/राज्यों के अपने दोस्तों से अनुरोध कर रहे हैं कि वह उन्हें अपने परिचित व नजदीकी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के नाम/नंबर दें, ताकि वह उनसे अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन माँग सकें । उनकी इस 'सक्रियता' पर लोग हँस रहे हैं और कह रहे हैं कि जो काम उन्हें कम से कम चार महीने पहले तो कर ही लेना चाहिए था, उसे अब चुनाव से चार दिन पहले करके वह क्या हासिल कर लेंगे ? उनके नजदीकियों का ही मानना/कहना है कि विनय मित्तल ने अपनी उम्मीदवारी को दरअसल गंभीरता से कभी लिया ही नहीं; वह असल में इस बात से बेफिक्र से थे कि अनुज गोयल और उनके भाई को तो चुनाव में आना नहीं है, इसलिए इस बार का चुनाव आसान होगा । ज्ञान चंद्र मिसरा को वह गंभीरता से ले नहीं रहे थे, और उन्हें विश्वास था कि सेंट्रल रीजन में जो एक सीट बढ़ रही है, वह उन्हें आराम से मिल जाएगी । लेकिन अचानक से जब अनुज गोयल ने सेंट्रल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर दी, तो विनय मित्तल को अपनी उम्मीद खत्म होती हुई नजर आई और वह अपनी उम्मीदवारी को लेकर ढीले पड़ गए । 
लेकिन विनय मित्तल को अब जब सुनने को मिला है कि अनुज गोयल की उम्मीदवारी को लोगों के बीच अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पा रहा है, तो विनय मित्तल को फिर से अपनी उम्मीदवारी के लिए उम्मीद बंधी है और वह पुनः सक्रिय हुए हैं । अनुज गोयल को रीजन में यूँ तो करिश्माई नेता के रूप में देखा/पहचाना जाता है, लेकिन इस बार के चुनाव में उनका करिश्मा फीका पड़ता नजर आ रहा है । उनके करिश्मे के फीके पड़ने के संकेत हालाँकि पिछली बार के चुनाव में ही मिल गया था, जब उनके भाई जितेंद्र गोयल पहली वरीयता के वोटों की गिनती में नौवें नंबर पर जा पहुँचे थे । इसे जितेंद्र गोयल की नहीं, बल्कि अनुज गोयल की हार के रूप में देखा/पहचाना गया था । दरअसल लोगों को यह अच्छा नहीं लगा था कि नियमानुसार जब अनुज गोयल को उम्मीदवार बनने का अधिकार नहीं मिला, तो उन्होंने अपने भाई को उम्मीदवार बना/बनवा दिया है और इस तरह इंस्टीट्यूट को उन्होंने जैसे अपनी बपौती समझ लिया । अनुज गोयल की इस समझ का बदला पिछली बार लोगों ने जितेंद्र गोयल से लिया, तो इस बार लोग अनुज गोयल को सबक सिखाना चाहते हैं । अनुज गोयल ने सोचा तो यह था कि रीजन में एक सीट जो बढ़ी है, उसका फायदा उन्हें मिल जायेगा और वह आसानी से विजयी हो जायेंगे । किंतु अनुज गोयल जब अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने निकले तो अधिकतर जगहों पर उन्हें लोगों से लताड़ ही सुनने को मिली कि 12 वर्ष सेंट्रल काउंसिल में रहते हुए उनके लिए और क्या करना बाकी रह गया है, जो अब वह फिर सेंट्रल काउंसिल में जाना चाहते हैं और या उन्होंने इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल को अपनी पारिवारिक संपत्ति समझ लिया है, जहाँ कि उनकी कुर्सी हमेशा रहनी ही चाहिए । लोगों का कहना है कि पिछली बार अपने भाई की और इस बार अपनी उम्मीदवारी के जरिये अनुज गोयल ने सत्ता से चिपके रहने की अपनी हवस दिखा कर वास्तव में इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन की पहचान व साख को कलंकित ही किया है । 
अनुज गोयल को इस बार लोगों के बीच जिस विरोध और तीखी बातों को झेलना/सुनना पड़ रहा है, उसके चलते उनकी उम्मीदवारी मुसीबत में फँसी नजर आ रही है । समस्या की बात यह भी है कि गाजियाबाद और उत्तर प्रदेश में उम्मीदवारों की संख्या काफी है, जो आपस में एक दूसरे को ही नुकसान पहुँचायेंगे; इसके अलावा इस बार के चुनाव में राजस्थान के मुकाबले उत्तर प्रदेश के वोटों की संख्या काफी घटी है - इस कारण से एक अनुमान यह लगाया जा रहा है कि रीजन में बढ़ी हुई सीट उत्तर प्रदेश की बजाये राजस्थान में भी जा सकती है । उत्तर प्रदेश में मनु अग्रवाल की सीट तो सुरक्षित ही समझी/देखी जा रही है; मुकेश कुशवाह की उम्मीदवारी को हालाँकि कई झटके लगे हैं - सबसे बड़ा झटका तो यही कि पिछली बार के उनके एक बड़े समर्थक रहे ज्ञान चंद्र मिसरा इस बार खुद उम्मीदवार बन गए हैं, जिन्होंने मुकेश कुशवाह के कुछेक और समर्थकों को भी अपने साथ कर लिया है - लेकिन फिर भी लोगों को लग रहा है कि मुकेश कुशवाह अपनी सीट बचा लेंगे । रीजन में जो एक सीट बढ़ी है, उसे पाने के लिए ज्ञान चंद्र मिसरा ने ऐड़ी-चोटी का जोर लगाया हुआ है । मजेदार संयोग यह है कि गाजियाबाद से सेंट्रल काउंसिल सदस्य होने वाले अनुज गोयल और मुकेश कुशवाह ने सेंट्रल काउंसिल का पहला चुनाव उस वर्ष लड़ा था, जिस वर्ष वह सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन थे - यह तीसरा उदाहरण होगा कि ज्ञान चंद्र मिसरा सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के पद पर रहते हुए पहली बार सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ रहे हैं । इनके अलावा गाजियाबाद से वेद गोयल, सुनील गुप्ता, जितेंद्र गोयल और विनय मित्तल ने रीजनल काउंसिल में चेयरमैन हुए बिना सेंट्रल काउंसिल का चुनाव लड़ा, लेकिन कामयाब नहीं हो सके । यह अनोखा संयोगभरा तथ्य ज्ञान चंद्र मिसरा की उम्मीदवारी की सफलता की संभावना को बढ़ा देता है । ज्ञान चंद्र मिसरा की उम्मीदवारी हालाँकि सिर्फ संयोग के भरोसे नहीं है, और रीजनल काउंसिल का चेयरमैन होने के नाते उन्होंने प्रत्येक ब्रांच में अपनी पैठ बनाने और अपने लिए समर्थन जुटाने का प्रयास किया है । ज्ञान चंद्र मिसरा ने उत्तर प्रदेश के अलावा उत्तराखंड तथा बिहार व झारखंड में समर्थन जुटाने के लिए सघन प्रयास किए हैं । इन क्षेत्रों में प्रयास हालाँकि दूसरे उम्मीदवारों ने भी किए हैं, लेकिन पूर्व के होने के नाते ज्ञान चंद्र मिसरा के प्रयासों को पूर्वीय क्षेत्र में अच्छा समर्थन मिलने की उम्मीद है । अनुज गोयल की हो रही फजीहत ने इस उम्मीद को और बढ़ा दिया है । अनुज गोयल की हो रही फजीहत को देख कर विनय मित्तल में भी उम्मीद तो जगी है और उनमें जोश भी पैदा हुआ है, लेकिन लोगों को लग रहा है कि उनमें जोश देर से पैदा  हुआ है, इसलिए उनका जोश उनके काम आ सकेगा, इसमें संदेह है ।