Wednesday, October 30, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 के दीवाली मेले में अपने क्लब के लोगों के धोखे के शिकार सुधीर मंगला ने झोपड़-पट्टियों में वोट जुटाने वाले फार्मूले को अपनाया

नई दिल्ली । सुधीर मंगला अपने क्लब के पदाधिकारियों और दूसरे सदस्यों से बुरी तरह खफा हैं । इसका कारण बताते हुए उनके क्लब के कुछेक सदस्यों का ही कहना है कि सुधीर मंगला को लगता है कि डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले में उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में खड़े होने से इंकार करके उनके क्लब के सदस्यों ने उनके साथ धोखा किया है और इस तरह से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में उन्हें अकेला छोड़ दिया है । उल्लेखनीय है कि क्लब के सदस्यों की हरकत के कारण सुधीर मंगला को डिस्ट्रिक्ट में लोगों के तरह-तरह के सवालों का सामना करना पड़ा है - जिनमें प्रमुख सवाल यही रहा कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई में जब वह अपने क्लब के सदस्यों का ही सहयोग और समर्थन नहीं जुटा पा रहे हैं, तो उन्हें डिस्ट्रिक्ट के दूसरे क्लब्स का सहयोग और समर्थन भला कैसे और क्यों मिलेगा ? इस तरह के सवालों के चलते डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच सुधीर मंगला की खासी किरकिरी हो रही है । इसलिए क्लब के पदाधिकारियों और सदस्यों के प्रति उनकी नाराजगी और उनके आरोप स्वाभाविक ही जान पड़ते हैं ।
सुधीर मंगला के सामने यह स्थिति हाल ही में आयोजित हुए डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले में उस समय पैदा हुई, जब वहाँ मौजूद डिस्ट्रिक्ट के लोगों ने पाया कि सुधीर मंगला के क्लब से तो एक भी पदाधिकारी और या सदस्य यहाँ नहीं है । लोगों ने सुधीर मंगला से पूछा तो सुधीर मंगला ने पहले तो यह कहते हुए सवालों को टाला कि 'आ रहे हैं, रास्ते में हैं', 'मुझसे तो कहा था कि आयेंगे' आदि-इत्यादि । फिर वह एक अलग कहानी सुनाने लगे कि उनके क्लब के पदाधिकारी और सदस्य चूँकि विनोद बंसल से नाराज हैं, इसलिए उन्होंने दीवाली मेले का बहिष्कार किया है । सुधीर मंगला ने कुछेक लोगों को बताया कि विनोद बंसल ने अपनी टीम में उनके क्लब के किसी भी सदस्य को जगह नहीं दी है और इसके चलते डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में किसी सदस्य का नाम और फोटो नहीं छप सका है, इसलिए उनके क्लब के लोग विनोद बंसल से बहुत नाराज हैं । नाराजगी दरअसल इस कारण से और बढ़ी क्योंकि क्लब के कई सदस्यों के विनोद बंसल के साथ वर्षों के संबंध हैं और वह विनोद बंसल से भी पुराने रोटेरियन हैं  - विनोद बंसल ने लेकिन किसी भी बात का लिहाज नहीं रखा ।
यह कहानी सुनाने के बाद भी, लोगों के सवालों से सुधीर मंगला का लेकिन पीछा नहीं छूटा । लोगों ने सुधीर मंगला से कहा भी कि उनके क्लब के सदस्यों के विनोद बंसल से चाहें जैसी जो नाराजगी है, पर यहाँ तो उन्हें आपकी उम्मीदवारी को मजबूती देने के लिए आना था - आना चाहिए था । सुधीर मंगला इस बात का कोई जबाव नहीं दे पाये । इससे लोगों ने यही नतीजा निकाला कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत सुधीर मंगला की उम्मीदवारी को लेकर उनके अपने ही क्लब के लोगों में न तो कोई उत्साह है और न ही सहयोग व समर्थन का कोई भाव है । इस लिहाज से सुधीर मंगला की स्थिति चारों उम्मीदवारों में सबसे ज्यादा ख़राब नज़र आई । क्योंकि बाकी तीनों उम्मीदवारों के क्लब से - किसी से कम तो किसी से ज्यादा - लोग डिस्ट्रिक्ट दीवाली मेले में शिरकत करने आये हुए थे और इस तरह अपने अपने उम्मीदवार के प्रति सहयोग और समर्थन व्यक्त कर रहे थे । सुरेश भसीन के साथ उनके क्लब के दो-तीन सदस्यों को देखा/पहचाना जा रहा था; राजीव देवा के क्लब की अध्यक्षा को भी लोगों के साथ मिलते-जुलते देखा गया; रवि भाटिया के क्लब से तो पच्चीस से तीस सदस्य अपने-अपने परिवारों के साथ वहाँ मौजूद थे । जाहिर है कि रवि भाटिया के क्लब के पदाधिकारियों व सदस्यों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत रवि भाटिया की उम्मीदवारी को बहुत गंभीरता से लिया हुआ है और अपने-अपने तरीके से उन्होंने रवि भाटिया की उम्मीदवारी का प्रमोशन किया ।
उम्मीदवारी का 'प्रमोशन' सुधीर मंगला ने भी किया - क्लब के साथी रोटेरियंस उनके साथ भले ही न खड़े हों, लेकिन उनके दोनों बेटे बड़ी मेहनत से लोगों को शराब बाँटने में लगे हुए थे । इस तरह - वोट जुटाने के लिए शराब बाँटने के जिस फार्मूले को झोपड़-पट्टियों में इस्तेमाल करते/होते सुना जाता है, सुधीर मंगला ने उसे रोटरी में इस्तेमाल करने का दाँव चला है । सुधीर मंगला को लगता है कि उनके क्लब के लोग भले ही उनके काम न आ रहे हों, लेकिन शराब बाँटने की उनकी तरकीब अवश्य ही उनके काम आयेगी । रोटरी की चुनावी प्रक्रिया में उम्मीदवार लोग फैलोशिप की आड़ में शराब पिलाते ही हैं, और इसे लोगों के बीच स्वीकार्यता प्राप्त है । लेकिन सुधीर मंगला ने शराब पिलाने के काम को जिस तरह से अंजाम दिया, उसे देख कर कई लोगों को गंभीर ऐतराज हुए और वे वहाँ कहते हुए सुने गए कि सुधीर मंगला ने रोटेरियंस को झोपड़-पट्टी वाला समझ लिया है क्या जो शराब के जरिये उनके वोट खरीदने की कोशिश कर रहे हैं । कई वरिष्ठ रोटेरियंस का भी कहना रहा कि चुनावी प्रक्रिया में फैलोशिप के नाम पर खाना-'पीना' होता ही है, और इससे संबंध मजबूत व विश्वासपूर्ण बनते हैं; लेकिन सुधीर मंगला ने जो किया वह 'आउट ऑफ प्रोपोर्शन' है और इसलिए उसमें फूहड़ता दिखी । वोट पाने के लिए शराब पिलाने के काम में अपने बेटों को इस्तेमाल करने के लिए तो सुधीर मंगला की आलोचना उन लोगों ने भी की, जो उनके साथ समझे जाते हैं ।
सुधीर मंगला के नजदीकियों का इस पर हालाँकि कहना यह भी है कि सुधीर मंगला को जब अपने क्लब के सदस्यों से सहयोग नहीं मिल रहा है, तो वह अपने बेटों की मदद ही लेंगे । इस तरह की बातों की प्रतिक्रिया में ही सुधीर मंगला ने अपने क्लब के पदाधिकारियों तथा दूसरे सदस्यों के प्रति अपनी नाराजगी प्रकट की है और अपने क्लब के सदस्यों पर धोखा देने का और उन्हें अकेला छोड़ देने का आरोप लगाया है । सुधीर मंगला के क्लब के लोगों ने क्यों उन्हें अकेला छोड़ दिया है और क्यों उनके साथ धोखा कर रहे हैं - यह तो वही जानें; सुधीर मंगला ने लेकिन चुनाव जीतने के लिए झोपड़-पट्टियों वाला फार्मूला अपना लिया है । सुधीर मंगला को विश्वास है कि उनकी उम्मीदवारी के प्रमोशन में उनके क्लब के लोग भले ही उनके साथ सहयोग न करें, लेकिन झोपड़-पट्टियों वाला फार्मूला जरूर उनके काम आयेगा ।

Monday, October 28, 2013

एमसीआई में प्रतिनिधित्व को लेकर हो रहे चुनाव में डॉक्टर विनय अग्रवाल के खिलाफ चलाये जा रहे डॉक्टर पंकज सिंघल के प्रचार अभियान ने प्रोफेशन को कलंकित किया हुआ है

नई दिल्ली । एमसीआई (मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया) में दिल्ली प्रदेश काउंसिल का प्रतिनिधित्व करने को लेकर छिड़ी चुनावी लड़ाई में सड़क छाप राजनीति के सारे नज़ारे और तमाशे देखे जा सकते हैं । एमसी आई में दिल्ली प्रदेश काउंसिल का प्रतिनिधित्व करने को लेकर जो दो उम्मीदवार - डॉक्टर विनय अग्रवाल और डॉक्टर पंकज सिंघल चुनावी मैदान में हैं; उन्हें ऐसी-ऐसी बातों को लेकर निशाना बनाया जा रहा है जिनका प्रोफेशन और प्रोफेशन की बुनियादी जरूरतों से दूर-दूर तक का कोई वास्ता नहीं है । एमसीआई में दिल्ली प्रदेश काउंसिल का प्रतिनिधि करेगा क्या, कैसे करेगा और कुछ कर भी सकेगा या नहीं - इसे लेकर कोई बात नहीं हो रही है । बात हो रही है एक दूसरे की बेईमानियों की । जिम्मेदार डॉक्टर्स का कहना है कि चुनाव में जो दो उम्मीदवार हैं, उन पर किसी भी तरह के कोई आरोप यदि रहे भी हैं तो अब मजबूरी यह है कि इन्हीं दोनों में से किसी एक को चुनना है इसलिए समझने की कोशिश यह होनी चाहिए की इनमें से कौन एमसीआई में दिल्ली प्रदेश काउंसिल का प्रभावी तरीके से प्रतिनिधित्व कर पायेगा । लेकिन यही समझने की कोशिश नहीं हो रही है और पूरे चुनावी अभियान को गटर छाप बना दिया गया है ।
इसकी शुरुआत करने का श्रेय डॉक्टर पंकज सिंघल को है । डॉक्टर पंकज सिंघल पिछले काफी समय से अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग तरीके से डॉक्टर विनय अग्रवाल को घेरने की कोशिश करते रहे हैं । डॉक्टर पंकज सिंघल की अभी तक की कोशिशों को डॉक्टर विनय अग्रवाल के साथ उनकी व्यक्तिगत किस्म की रंजिश या खुन्नस के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है । लेकिन एमसीआई में प्रतिनिधित्व की चुनावी लड़ाई में डॉक्टर पंकज सिंघल ने जिस तरह डॉक्टर विनय अग्रवाल के खिलाफ ताल ठोकी है, उसे देख कर लगता है कि डॉक्टर पंकज सिंघल को मेडिकल प्रोफेशन में डॉक्टर विनय अग्रवाल के दूसरे विरोधियों से खाद-पानी न सिर्फ मिल रहा है, बल्कि वह डॉक्टर विनय अग्रवाल के विरोधियों के हाथों इस्तेमाल भी हो रहे हैं, जिनका एकमात्र उद्देश्य डॉक्टर विनय अग्रवाल को बदनाम करना भर है ।
दरअसल, एमसीआई में प्रतिनिधित्व को लेकर उत्सुकता दिखा रहे दिल्ली प्रदेश काउंसिल के तमाम सूरमाओं ने जिस तरह डॉक्टर विनय अग्रवाल के सामने समर्पण कर दिया, उसे देख कर डॉक्टर विनय अग्रवाल के विरोधियों का तगड़ा झटका लगा । डॉक्टर विनय अग्रवाल दिल्ली प्रदेश में एकमात्र नेता होने का तमगा न प्राप्त कर लें और लोगों के बीच ऐसा संदेश न जाये कि डॉक्टर विनय अग्रवाल का सामना करने का दम किसी में है ही नहीं - इसके लिए आनन-फानन में डॉक्टर पंकज सिंघल की उम्मीदवारी सामने लाई गई । उल्लेखनीय है कि दिल्ली प्रदेश में चलने वाली डॉक्टर्स की राजनीति में कई गुट सक्रिय हैं; इन गुटों की तरफ से एमसीआई में प्रतिनिधित्व को लेकर जो भी नाम चर्चा में थे उनमें डॉक्टर पंकज सिंघल का नाम कहीं नहीं था । दिल्ली में डॉक्टर्स की चुनावी राजनीति में डॉक्टर पंकज सिंघल की ऐसी हैसियत कभी दिखी भी नहीं कि उन्हें एमसीआई में प्रतिनिधित्व करने को लेकर होने वाले चुनाव के संभावित खिलाड़ी के रूप में देखा/पहचाना भी जाये । डॉक्टर पंकज सिंघल ने पीछे आईएमए की ईस्ट दिल्ली ब्रांच का जो चुनाव लड़ा था, उसमें उन्हें अपने प्रतिद्धंद्धी को मिले करीब ढाई हज़ार वोटों के मुकाबले मात्र 90 के करीब वोट मिले थे । डॉक्टर्स की सबसे छोटी चुनावी लड़ाई में इस गति को प्राप्त होने वाले डॉक्टर पंकज सिंघल से कौन उम्मीद कर सकता है कि वह उन डॉक्टर विनय अग्रवाल को चुनावी टक्कर दे सकेंगे जिनके सामने डॉक्टर्स की चुनावी राजनीति के सचमुच के सूरमा पहले ही समर्पण कर चुके हैं ?
दिल्ली के डॉक्टर्स की चुनावी राजनीति में डॉक्टर विनय अग्रवाल के घनघोर विरोधियों को भी यह उम्मीद नहीं है कि एमसीआई में प्रतिनिधित्व को लेकर जो चुनावी मुकाबला हो रहा है, उसमें डॉक्टर विनय अग्रवाल को किसी भी तरह से मात दी जा सकेगी । डॉक्टर विनय अग्रवाल की उम्मीदवारी को जिस तरह से चारों तरफ से समर्थन सिर्फ मिल ही नहीं रहा है, बल्कि बाकायदा घोषित हो रहा है; तमाम प्रमुख डॉक्टर्स और उनके संगठन डॉक्टर विनय अग्रवाल के समर्थन में सार्वजनिक रूप से बयान दे रहे हैं उससे हर कोई यह मान/समझ रहा है कि यह चुनाव एकतरफा चुनाव है और डॉक्टर विनय अग्रवाल की भारी जीत होगी । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि पीछे इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष पद के चुनाव में डॉक्टर पंकज सिंघल ने डॉक्टर विनय अग्रवाल के प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार का खुला समर्थन किया था और डॉक्टर विनय अग्रवाल को हरवाने की हर संभव कोशिश की थी, लेकिन डॉक्टर विनय अग्रवाल भारी बहुमत से उक्त चुनाव जीते थे । इस तथ्य को यहाँ याद करने की प्रासंगिकता सिर्फ यह समझने के लिए है कि डॉक्टर पंकज सिंघल कभी भी डॉक्टर विनय अग्रवाल के लिए कोई चुनौती पैदा नहीं कर सके हैं ।
ऐसे में, हर किसी के लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि डॉक्टर पंकज सिंघल ने डॉक्टर विनय अग्रवाल के खिलाफ नफरत भरा जो अभियान चला रखा है, उसके पीछे उद्देश्य वास्तव में क्या है ? और इस अभियान के लिए डॉक्टर पंकज सिंघल को खाद-पानी कहाँ से मिल रहा है ?
दिल्ली के डॉक्टर्स की चुनावी राजनीति के कई खिलाड़ियों का मानना और कहना है कि डॉक्टर विनय अग्रवाल की चुनावी सफलताएँ किसी को भी चमत्कृत तो कर सकती हैं, किंतुं उनकी यह सफलताएँ उनकी लोकप्रियता का कम और चुनावों को मैनेज करने की उनकी सामर्थ्य का ज्यादा सुबूत हैं । दूसरे चुनावी नेताओं में चूँकि यह सामर्थ्य नहीं है इसलिए चुनावी मुकाबले में पिछड़ जाने के बावजूद वह डॉक्टर विनय अग्रवाल को मन से स्वीकार नहीं कर पाते हैं और डॉक्टर विनय अग्रवाल के प्रति एक नकारात्मक भाव उनके मन में बन जाता है । डॉक्टर विनय अग्रवाल की हर सफलता उक्त नकारात्मक भाव को और मजबूत करती जाती है । तमाम सफलताओं के बावजूद कई डॉक्टर्स डॉक्टर विनय अग्रवाल को इसलिए भी ऐक्सेप्ट नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें लगता है कि डॉक्टर विनय अग्रवाल प्रोफेशनली बहुत क्वालीफाई नहीं हैं । डॉक्टर विनय अग्रवाल मात्र एमबीबीएस हैं । प्रोफेशन आज जिस स्थिति में है, उसमें मात्र एमबीबीएस की कोई वकत नहीं है । इसीलिये लोग मानते और कहते हैं कि डॉक्टर विनय अग्रवाल 'डॉक्टर' नहीं हैं, उन्होंने डॉक्टरी की सिर्फ डिग्री ली हुई है और डॉक्टरी के प्रोफेशन में वह एक बिजनेसमैन हैं । इसीलिये प्रोफेशन की तमाम संस्थाओं में डॉक्टर विनय अग्रवाल की गहरी घुसपैठ और उनकी लगातार कामयाबियों ने उनके विरोधियों की संख्या में भी इजाफ़ा किया है ।
डॉक्टर विनय अग्रवाल के विरोधियों का दुखड़ा लेकिन यह है कि वह उनका कुछ बिगाड़ भी नहीं पाते हैं । इस कारण से उनके बीच जो निराशा पैदा होते है, वह उन्हें डॉक्टर पंकज सिंघल जैसे लोगों के नजदीक ले जाती है । डॉक्टर विनय अग्रवाल के विरोधी यह अच्छी तरह जानते/समझते हैं कि पंकज सिंघल - जो खुद लज्जित करने जैसे आरोपों में घिरे हैं और कुछेक मामलों में 'सजा' तक पा चुके हैं - के जरिये वह डॉक्टर विनय अग्रवाल को कोई चुनावी चुनौती तो नहीं दे पायेंगे, लेकिन डॉक्टर पंकज सिंघल के जरिये वह डॉक्टर विनय अग्रवाल को परेशान और बदनाम जरूर कर सकेंगे । एमसीआई में प्रतिनिधित्व को लेकर चुनाव की स्थिति इसी उद्देश्य से जबर्दस्ती ऐन मौके पर बनाई गई; और इसी 'उद्देश्य' को प्राप्त करने के नजरिये से डॉक्टर पंकज सिंघल का चुनाव प्रचार प्रेरित है । डॉक्टर पंकज सिंघल के प्रचार की टोन डॉक्टर विनय अग्रवाल को कितना परेशान और बदनाम कर पायेगी, यह तो डॉक्टर विनय अग्रवाल जानें - दूसरे लोग जो जान रहे हैं, वह यह कि डॉक्टर पंकज सिंघल के प्रचार ने प्रोफेशन को जरूर बदनाम और कलंकित किया हुआ है ।

Sunday, October 27, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3261 में अरुण गुप्ता और राकेश दवे के बीच होते दिख रहे सीधे मुकाबले की संभावना ने वर्ष 2015-16 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव को दिलचस्प बनाया

जबलपुर/रायपुर । बलदीप सिंह मैनी की उम्मीदवारी के ढीले पड़ने से वर्ष 2015-16 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए होने वाला चुनाव खासा दिलचस्प हो गया है । उल्लेखनीय है कि यह चुनाव पिछले रोटरी वर्ष में ही होना था, लेकिन बलदीप सिंह मैनी की उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले उनके क्लब ने कोर्ट-कचहरी करके मामले को ऐसा फँसाया कि फिर चुनाव स्थगित ही कर देना पड़ा । लंबी जद्दो-जहद के बावजूद बलदीप सिंह मैनी और उनके क्लब - रोटरी क्लब जबलपुर को कुछ भी हासिल नहीं हुआ; पर उन्होंने जो किया उसके चलते डिस्ट्रिक्ट को इस वर्ष डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी नहीं मिला । पिछले वर्ष न हो पाया चुनाव अब जब इस वर्ष होने जा रहा है तो बलदीप सिंह मैनी अपनी उम्मीदवारी को लेकर ढीले-से लग रहे हैं, जिस कारण यह चुनाव अब जबलपुर के अरुण गुप्ता और रायपुर के राकेश दवे के बीच सीधे मुकाबले में बदल गया दिख रहा है ।
वर्ष 2015-16 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए होने वाले चुनाव के बदले समीकरण ने अरुण गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों को यह दावा करने का बल दिया है कि बलदीप सिंह मैनी के ढीले पड़ने से अरुण गुप्ता की उम्मीदवारी को फायदा होगा । यह दावा करने के पीछे उनका तर्क है कि जबलपुर और मध्य प्रदेश के जो क्लब बलदीप सिंह मैनी के साथ जा सकते थे, वह अब अरुण गुप्ता का समर्थन करेंगे और इससे अरुण गुप्ता का समर्थन आधार बढ़ेगा । राकेश दवे की उम्मीदवारी के समर्थक लेकिन इस तर्क से सहमत नहीं है और बलदीप सिंह मैनी के रवैये को राकेश दवे के लिए अनुकूल मान रहे हैं । उनका तर्क है कि बलदीप सिंह मैनी अभी भी उम्मीदवार हैं, इसलिए उनके समर्थन में जो क्लब थे वह तो उनके साथ रहेंगे ही - जिसमें उनका खुद का क्लब भी शामिल है; इसलिए अरुण गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक जिस फायदे की उम्मीद कर रहे हैं, उसका तो कोई सवाल ही नहीं है । बलदीप सिंह मैनी के रवैये में राकेश दवे की उम्मीदवारी के समर्थकों को अपने लिए फायदा इसलिए भी दिख रहा है क्योंकि उन्हें उम्मीद है कि बलदीप सिंह मैनी को सक्रिय न पाकर उनके समर्थक अरुण गुप्ता की तरफ जाने की बजाये राकेश दवे की तरफ जायेंगे ।
अरुण गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों को लगता है कि इस बात का आभास है कि बलदीप सिंह मैनी के ढीले पड़ने से अरुण गुप्ता को फायदा अपने आप नहीं मिलेगा, बल्कि फायदा जुटाने के लिए उन्हें प्रयास करना पड़ेगा । अरुण गुप्ता और उनके समर्थकों ने इस बाबत प्रयास शुरू भी कर दिया है । अपने प्रयास के तहत उन्होंने एक तरफ तो जबलपुर और मध्य प्रदेश में अपने लिए समर्थन संगठित करने का अभियान शुरू किया है तो दूसरी तरफ डिस्ट्रिक्ट के बाकी लोगों को भावनात्मक अपील से प्रभावित करने का दाँव चला है । इस दाँव से उन्होंने राकेश दवे का 'शिकार' करने का लक्ष्य निर्धारित किया है । अरुण गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों का कहना है कि वर्ष 2015-16 में मध्य प्रदेश के क्लब्स को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, क्योंकि डिस्ट्रिक्ट में तय हुई सर्वसम्मत व्यवस्था के तहत यह उनका अधिकार है । उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश, ओडिसा और छत्तीसगढ़ क्षेत्र में फैले डिस्ट्रिक्ट में सर्वसम्मत रूप से यह तय हुआ समझौता है कि तीनों प्रदेशों के क्लब्स को बारी-बारी से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय में प्रतिनिधित्व मिलेगा । इस समझौते के तहत वर्ष 2015-16 में मध्य प्रदेश के क्लब्स का नंबर है । उक्त समझौते का हवाला देकर अरुण गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों ने राकेश दवे को घेरने की तैयारी की है ।
राकेश दवे की उम्मीदवारी के समर्थकों ने इस 'हमले' से अपना बचाव करने की तैयारी के तहत अपना जबाव लगता है कि पहले से बना के रखा हुआ है । उनका कहना है कि यह सच है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय में तीनों प्रदेशों के क्लब्स को बारी-बारी से प्रतिनिधित्व देने को लेकर एक अलिखित समझौता है - लेकिन यह समझौता दरअसल एक सुविधा है, कोई अधिकार नहीं है । यह सुविधा देने/लेने के पीछे उद्देश्य यह रहा है कि हर प्रदेश के क्लब्स अपने-अपने यहाँ नेतृत्व को विकसित करें और सक्रिय करें । राकेश दवे की उम्मीदवारी के समर्थकों का कहना है कि वर्ष 2015-16 में मध्य प्रदेश के क्लब्स का प्रतिनिधित्व करने की इच्छा रखने वाले वाले लोगों ने न तो नेतृत्व विकसित करने को लेकर कोई काम किया और न कोई सक्रियता ही दिखाई । उन्होंने इसका सुबूत यह दिया कि मध्य प्रदेश से दो लोगों ने अपनी अपनी उम्मीदवारी तो प्रस्तुत कर दी, लेकिन उनके क्षेत्र के क्लब्स के ड्यूज समय से जमा हों - इसके लिए उनमें से किसी ने भी कोई प्रयास नहीं किया । यही कारण रहा कि जबलपुर के 12 क्लब्स में से कुल 6 के ही ड्यूज समय से जमा हो सके । यह हाल तब है जब जबलपुर से दो लोग डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की दौड़ में शामिल हुए । राकेश दवे की उम्मीदवारी के समर्थकों का कहना/पूछना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय में मध्य प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने की इच्छा और कोशिश करने वाले लोगों को यह भी बताना चाहिए कि नेतृत्व करने की उनकी ऐसी कैसी कोशिश है कि इनके अपने शहर के आधे क्लब्स के ड्यूज ही समय से जमा नहीं हो सके ? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ड्यूज यदि समय से जमा होते तो इन्हें ही तो फायदा होता ।
राकेश दवे की उम्मीदवारी के समर्थकों का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय में प्रतिनिधित्व को लेकर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में टकराव पहले भी होता रहा है और दोनों ही तरफ से दूसरे की बारी पर दावा करने के प्रयास होते रहे हैं, इसलिए राकेश दवे यदि मध्य प्रदेश की बारी पर दावा कर रहे हैं, तो इससे उनके खिलाफ लोगों के बीच कोई माहौल नहीं बनता है । क्योंकि लोग यह भी देखेंगे कि राकेश दवे ने ऐसा तब किया जब मध्य प्रदेश से कोई भी उम्मीदवार बनने को तैयार होता हुआ नहीं दिख रहा था ।
अरुण गुप्ता और राकेश दवे के बीच होते दिख रहे चुनावी मुकाबले में दोनों तरफ से जिस तरह की तैयारी और जिस तरह के तर्क देखे/सुने जा रहे हैं उससे वर्ष 2015-16 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए होने वाला चुनावी मुकाबला रोमांचपूर्ण होता जान पड़ रहा है । यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मुकाबले में और कौन-कौन से मोड़ आते हैं ।

Friday, October 25, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी अभियान में रवि भाटिया के मुकाबले पिछड़ते जाने के लिए सुधीर मंगला ने सुरेश भसीन को जिम्मेदार ठहराना शुरू किया

नई दिल्ली । सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के समर्थकों को सुरेश भसीन की सक्रियता ने बुरी तरह निराश किया हुआ है और उन्हें लगने लगा है कि सुरेश भसीन की उम्मीदवारी के रहते उनके लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए रवि भाटिया की उम्मीदवारी से मुकाबला करना मुश्किल हो रहा है । सक्रियता के लिहाज से सुधीर मंगला निश्चित रूप से दूसरे उम्मीदवारों से इक्कीस दिख रहे हैं, लेकिन लोग जब इस बात पर विचार करना शुरू करते हैं कि उनका डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कैसा हो, तो सुधीर मंगला के नंबर कम हो जाते हैं । सुधीर मंगला के व्यवहार और रवैये के प्रति लोगों को जैसी जो शिकायतें हैं, वह तो हैं हीं - रही सही कसर सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के झंडाबरदार विनय कुमार अग्रवाल ने पूरी कर दी है । विनय कुमार अग्रवाल की गाली-गलौच पूर्ण बातों के कारण सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के प्रति नकारात्मक भावना ही पैदा हुई है । सुधीर मंगला के समर्थकों का ही कहना है कि इस कारण से सुधीर मंगला के साथ आ सकने वाले कई लोगों का झुकाव सुरेश भसीन की तरफ होता जा रहा है । सुरेश भसीन ने अपनी सक्रियता के बल पर अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने में अच्छी सफलता प्राप्त की है । अलग-अलग कारणों से जो लोग रवि भाटिया के साथ नहीं जा सकते हैं, और इस कारण जो सुधीर मंगला के साथ जाते दिख रहे थे - वह सुरेश भसीन के समर्थन में आते दिख रहे हैं । सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के समर्थकों के बीच इसी कारण से चिंता और निराशा पैदा हुई है ।
सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के समर्थकों ने दावा किया था कि वह सुरेश भसीन की उम्मीदवारी को वापस करवा देंगे; सुरेश भसीन अपनी उम्मीदवारी के साथ लेकिन चुनावी मैदान में न सिर्फ डटे हुए हैं, बल्कि अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन भी जुटाते जा रहे हैं । सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के समर्थक हालाँकि अभी भी उम्मीद बनाये हुए हैं और तर्क दे रहे हैं कि सुरेश भसीन खुद तो रवि भाटिया का मुकाबला कर नहीं पायेंगे, सुधीर मंगला के लिए भी हालात को मुश्किल बना रहे हैं । सुरेश भसीन के समर्थकों की तरफ से उन्हें लेकिन इसका सटीक जबाव मिल रहा है, जिसमें उन्हें सुनने को मिल रहा है कि सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के समर्थक नेता यदि सचमुच रवि भाटिया की खिलाफत करना चाहते हैं तो इसके लिए उन्हें सुधीर मंगला को छोड़ कर सुरेश भसीन की उम्मीदवारी के साथ जुड़ना/जुटना चाहिए ।
सुधीर मंगला के लिए बड़ी मुसीबत दरअसल अपने समर्थक नेताओं के कारण से ही पैदा हुई है । उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में जो नेता समझे जाते हैं वह उनके प्रति सकारात्मक रुख के कारण नहीं हैं, बल्कि अपनी नकारात्मक सोच के कारण उनके साथ हैं । जो लोग अलग-अलग कारणों से रवि भाटिया का विरोध करना चाहते हैं, वह मजबूरी में सुधीर मंगला के साथ खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं । सुधीर मंगला के और उनके घोषित समर्थक विनय कुमार अग्रवाल के रवैये के कारण वह लेकिन सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के साथ ज्यादा देर तक खड़े भी नहीं रह पा रहे हैं । कोई सुनियोजित और एकाग्र सोच व तैयारी न होने के कारण वह वास्तव में आपस में ही लड़-मर रहे हैं ।
सुधीर मंगला की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों को जेके गौड़ और उनके साथी नेताओं का समर्थन तो चाहिए - लेकिन अपनी बातों में वह जेके गौड़ और उनके साथी नेताओं को बदनाम करने का काम कर रहे हैं । जैसे, सुधीर मंगला और उनके कुछेक समर्थक नेता यह कहने से नहीं चूक रहे हैं कि जेके गौड़ के पक्ष में बेईमानी न की गई होती तो सुधीर मंगला तो पिछले वर्ष ही डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुन लिए गए होते । सुधीर मंगला और उनके कुछेक समर्थक पिछले वर्ष हुई राजनीति का आकलन जिस तरह कर रहे हैं उसमें जेके गौड़ और उनके नेताओं को बेईमान बताया जा रहा है : कहा/बताया जा रहा है कि पिछले वर्ष काम तो जेके गौड़ का ज्यादा था, लेकिन लोगों के बीच समर्थन सुधीर मंगला के प्रति था । सुधीर मंगला के प्रति लोगों के बीच समर्थन होने का कारण यह बताया जा रहे है कि जेके गौड़ को लोग गवर्नर-मैटेरियल नहीं मान रहे थे, जिसका फायदा सुधीर मंगला को मिल रहा था । सुधीर मंगला और उनके समर्थकों का दावा है कि जेके गौड़ के पक्ष में तब के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल ने यदि बेईमानी न की होती तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी सुधीर मंगला ही चुने गए होते ।
सुधीर मंगला और उनके समर्थक इस तरह की बातें करके अपने लिए समर्थन घटाने का ही काम कर रहे हैं । उनकी इन बातों को सुनकर जेके गौड़ की गुडबुक में आने और या बने रहने की इच्छा रखने वाले लोग स्वतः ही सुधीर मंगला से दूर होंगे, और वह हो भी रहे हैं । सुधीर मंगला और उनकी उम्मीदवारी के समर्थक जिस तरह के तर्क दे रहे हैं उनमें जिस तरह के विरोधाभास दिख रहे हैं उससे भी साफ हो रहा है कि वह सच्चाई और तथ्यों को लेकर पूरी तरह भ्रमित हैं । पिछले वर्ष को लेकर उनका मानना और कहना है कि पिछले वर्ष उम्मीदवार के रूप में काम जेके गौड़ का ज्यादा था, लेकिन फिर भी लोगों के बीच समर्थन सुधीर मंगला के लिए ज्यादा था । इस तरह, वह खुद मानते हैं कि ज्यादा काम का कोई खास मतलब नहीं होता है और अपेक्षाकृत कम काम करने वाला भी लोगों के बीच अच्छा समर्थन जुटा सकता है । लेकिन इस वर्ष की बात करते हुए वह बिलकुल उल्टा तर्क देते हैं और दावा करते हैं कि चूँकि रवि भाटिया का काम उनके मुकाबले कम है इसलिए लोगों के बीच उनका समर्थन ज्यादा है । यह उलटबयानी क्यों ? पिछले वर्ष कम काम के बावजूद यदि सुधीर मंगला को ज्यादा काम करने वाले जेके गौड़ के मुकाबले अच्छा समर्थन मिल रहा था तो इस वर्ष ज्यादा काम करने वाले सुधीर मंगला को अच्छा समर्थन मिलने के प्रति आश्वस्त कैसे हुआ जा सकता है ? सुधीर मंगला और उनके समर्थकों का मानना और कहना है कि पिछले वर्ष कम काम के बावजूद सुधीर मंगला को लोगों का समर्थन इसलिए था क्योंकि गवर्नर-मैटेरियल के संदर्भ में जेके गौड़ के मुकाबले सुधीर मंगला को ज्यादा नंबर मिल रहे थे । यही तर्क इस वर्ष लेकिन सुधीर मंगला के खिलाफ जा रहा है । गवर्नर-मैटेरियल के संदर्भ में रवि भाटिया को सुधीर मंगला से ज्यादा नंबर मिल रहे हैं । जिन लोगों को यह शिकायत है भी कि रवि भाटिया ने उनसे देर में संपर्क किया और या वह उनसे कम मिले - उन लोगों का भी मानना और कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लायक तो रवि भाटिया ही हैं ।
रोटरी में और डिस्ट्रिक्ट में किये गए कामकाज के संदर्भ में बात हो या आपसी व्यवहार की बात हो - सुधीर मंगला पर रवि भाटिया ही भारी पड़ते/दिखते हैं । एक उदाहरण से इसे समझा/पहचाना जा सकता है : जिस वर्ष डॉक्टर सुब्रमणियन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार बने उसी वर्ष उनके क्लब के रवि भाटिया भी उम्मीदवार होना चाहते थे, क्लब में लेकिन डॉक्टर सुब्रमणियन को समर्थन मिला । रवि भाटिया को इससे दुःख और निराशा तो हुई, लेकिन क्लब के फैसले को उन्होंने एक सच्चे खिलाड़ी की तरह स्वीकार किया और डॉक्टर सुब्रमणियन की उम्मीदवारी की वह जैसी जो मदद कर सकते थे उन्होंने की । ऐसी ही परिस्थितियों में लेकिन जब सुधीर मंगला पड़े तो उनका आचरण बिलकुल उलट था । सुधीर मंगला ने पहली बार अपनी उम्मीदवारी के लिए अचानक से तब दावा ठोका, जब उनके ही क्लब के विनोद बंसल अपनी उम्मीदवारी को लेकर काफी काम कर चुके थे । सुधीर मंगला ने जिद पकड़ी कि विनोद बंसल ने काम चाहें जितना कर लिया हो, लेकिन उम्मीदवार वह बनेंगे । इसे लेकर उन्होंने अपने ही क्लब में संघर्ष की स्थिति पैदा की । क्लब में उम्मीदवारी को लेकर विनोद बंसल के साथ हुए संघर्ष में उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा - लेकिन फिर भी उन्होंने चुप बैठने की जरूरत नहीं समझी और क्लब में ऐसा बखेड़ा खड़ा किया कि क्लब में फूट हुई और सुधीर मंगला भी क्लब और अपने वर्षों पुराने साथियों को छोड़ गए ।
सुधीर मंगला ने अपने इसी तरह के व्यवहार और रवैये से अपने दोस्तों और अपने साथियों को अपने से दूर कर लिया है । उनके चुनाव अभियान पर भी इसका असर है । कई लोगों को - जिन्हें पहले सुधीर मंगला के साथ समझा/पहचाना जाता रहा था, अब उनसे अलग और या रवि भाटिया व सुरेश भसीन के साथ देखा/पहचाना जा रहा है । सुधीर मंगला और उनके समर्थक दावा तो करते हैं कि कई नेता उनके साथ हैं लेकिन 'वे' कई नेता उनके लिए कुछ करते हुए दिखते तो नहीं हैं; कुछेक नेता तो ऐसे हैं जिनके खुद के क्लब के ड्यूज का झगड़ा पड़ा हुआ है और यही साफ नहीं है कि चुनाव में उनके खुद के क्लब की कोई भागीदारी होगी भी या नहीं । इन्हीं नेताओं में से कुछ का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट के लोगों में सुधीर मंगला और उनके घोषित समर्थक विनय कुमार अग्रवाल के प्रति जो नकार का भाव है, उसे देख/पहचान कर ही उन्होंने सुधीर मंगला के साथ दिखना बंद कर दिया है । सुधीर मंगला और उनके समर्थकों ने अपनी कमजोरी का ठीकरा सुरेश भसीन के सर फोड़ना शुरू कर दिया है । उनका कहना है कि सुरेश भसीन की उम्मीदवारी उनका खेल ख़राब कर रही है । मजे की बात यह है कि सुरेश भसीन के समर्थक भी ऐसी ही बात कह रहे हैं । उनका कहना है कि सुधीर मंगला की उम्मीदवारी हट जाये तो वह रवि भाटिया को अच्छी चुनौती दे सकेंगे । रवि भाटिया के मुकाबले पर आने के लिए सुधीर मंगला और सुरेश भसीन के बीच जो लड़ाई छिड़ी है, उसने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी लड़ाई को दिलचस्प बना दिया है ।

Wednesday, October 23, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में दीपक बाबू के लिए दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करने की राकेश सिंघल ने जो चाल सोची है, उसे अमल में लाना उनके लिए संभव होगा क्या

मुरादाबाद । दिवाकर अग्रवाल को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी होड़ से बाहर करने की षड़यंत्रपूर्ण आहट ने डिस्ट्रिक्ट 3100 में चुनावी माहौल को खासा गर्मा दिया है । इस षड्यंत्र को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल की शह और समर्थन मिलने की ख़बरों ने गर्मी के तापमान को और बढ़ाने का काम किया है ।  उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय को इस वर्ष होने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव के लिए दो आवेदन प्राप्त हुए हैं - एक रोटरी क्लब मुरादाबाद हैरिटेज के दिवाकर अग्रवाल का और दूसरा रोटरी क्लब मुरादाबाद मिडटाउन के दीपक बाबू का । इन दोनों उम्मीदवारों के नामांकन दस्तावेजों की जाँच होनी है और उन्हें स्वीकार या अस्वीकार करने का फैसला होना है । यह काम एक औपचारिकता भर होता है, इसीलिए नामांकन की तारिख के गुजरते ही डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच यह चर्चा स्थापित हो गई कि इस बार का चुनाव दिवाकर अग्रवाल और दीपक बाबू के बीच होगा । इन दोनों के बीच मुकाबले की रणभेरी भी बज गई और दोनों की तरफ से सेना भी सजने लगी । लेकिन अचानक से पहले फुसफुसाहट के रूप में और फिर तथ्यात्मक रूप से यह चर्चा गर्म होने लगी कि दीपक बाबू के चुने जाने को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से दिवाकर अग्रवाल को चुनावी मुकाबले से बाहर कर दिए जाने की तैयारी की जा रही है ।
इस तैयारी को चूँकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल की डिस्ट्रिक्ट टीम के प्रभावी सदस्यों द्धारा अंजाम देते हुए देखा/पहचाना जा रहा है, इसलिए इस तैयारी में राकेश सिंघल की मिलीभगत की चर्चा को बल मिला । कुछेक लोगों का कहना है कि यह षड्यंत्र राकेश सिंघल के दिमाग की उपज है, जो डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के खर्चे को जुटाने की जरूरत के चलते पैदा हुई है; तो अन्य कुछेक लोगों का कहना है कि यह राकेश सिंघल के नजदीकी ऐसे लोगों का आयोजित किया गया षड्यंत्र है जो दीपक बाबू के खास हैं और इस वर्ष दीपक बाबू को किसी भी तरह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुनवा देना चाहते हैं । राकेश सिंघल के कुछेक अन्य नजदीकियों का कहना लेकिन यह है कि राकेश सिंघल इस बात को जान/समझ रहे हैं कि दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करना आसान नहीं होगा और इसके चलते जो लफड़ा पैदा होगा उसके कारण उन्हें सिर्फ बदनामी ही मिलेगी और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनकी ही किरकिरी होगी । राकेश सिंघल पर लेकिन अपनी टीम के कुछेक प्रमुख सदस्यों का दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करने को लेकर जो दबाव है उससे निपट पाना भी उनके लिए आसान नहीं है ।
राकेश सिंघल की डिस्ट्रिक्ट टीम के कुछेक जिन प्रमुख सदस्यों ने दीपक बाबू को इस बार डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुनवाने का बीड़ा उठाया है, उन्होंने दरअसल यह भाँप/समझ लिया है कि दिवाकर अग्रवाल से मुकाबला करते हुए तो दीपक बाबू को चुनाव नहीं जितवाया जा सकेगा । डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच उम्मीदवार के रूप में दिवाकर अग्रवाल और दीपक बाबू की जो सक्रियता रही है उसके नतीजे के रूप में बाजी दिवाकर अग्रवाल के हाथ में जाती दिख रही है । मेरठ क्षेत्र के क्लब्स में दिवाकर अग्रवाल को जो एकतरफा समर्थन मिलता नजर आ रहा है, उसने दीपक बाबू और उनके समर्थकों के लिए उम्मीद बिलकुल तोड़ दी है । मुजफ्फरनगर और मुरादाबाद क्षेत्र में भी दीपक बाबू के लिए ऐसा कोई समर्थन नहीं दिख रहा है जिससे मेरठ में हो रहे नुकसान की भरपाई की जा सके । ऐसे में दीपक बाबू के समर्थकों को एक ही उपाय समझ में आ रहा है और वह उपाय यह कि दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को ही ख़त्म कर दिया जाये ताकि न रहेगा बाँस और न बजेगी बाँसुरी - यानि जब दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी ही नहीं रहेगी तो दीपक बाबू को कोई मुकाबला ही नहीं करना पड़ेगा; और तब दीपक बाबू आराम से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बन जायेंगे ।
दीपक बाबू के इन समर्थकों को लगता है कि वे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल पर दबाव बना कर दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करवा लेंगे । दीपक बाबू के इन समर्थकों का दावा है कि इलेक्शन कमेटी के जो तीन सदस्य हैं उनमें दो - विष्णु सरन भार्गव और कृष्ण गोपाल अग्रवाल का समर्थन तो वह दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करने के लिए जुटा लेंगे और उसके बाद इलेक्शन कमेटी के तीसरे सदस्य योगेश मोहन गुप्ता यदि समर्थन नहीं करेंगे तो वह अल्पमत में रहेंगे और उनके विरोध का कोई मतलब नहीं होगा । यह बात दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करने की तैयारी में जुटे लोगों ने इसलिए कही है क्योंकि योगेश मोहन गुप्ता सार्वजनिक रूप से घोषणा कर चुके हैं कि दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करने का कोई कारण है ही नहीं ।
दिवाकर अग्रवाल के नामांकन को निरस्त करने की तैयारी कर रहे लोगों ने तर्क यह दिया है कि इस वर्ष की डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में दिवाकर अग्रवाल का नाम और पता/परिचय प्रकाशित हुआ है, जो चुनाव के लिए बने नियमों का उल्लंघन है और इस आधार पर दिवाकर अग्रवाल का नामांकन रद्द कर दिया जाना चाहिए । इस मुद्दे पर दिवाकर अग्रवाल के समर्थकों का कहना है कि असिस्टेंट गवर्नर प्रोजेक्ट को-ऑर्डीनेटर का जो पद दिवाकर अग्रवाल को ऑफर किया गया था, उसे दिवाकर अग्रवाल ने 30 जून से पहले ही छोड़ दिया था । डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में उनका जो नाम और पता/परिचय प्रकाशित हुआ है वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर और या डायरेक्टरी तैयार करने वाले लोगों की गलती है; उनकी गलती की सजा दिवाकर अग्रवाल को भला क्यों मिलनी चाहिए ?
इसके अलावा, डिस्ट्रिक्ट डायरेक्टरी में नाम और पता/परिचय प्रकाशित होने की ही बात है तो वह तो दीपक बाबू का भी प्रकाशित हुआ है - दीपक बाबू का नाम और पता/परिचय तो विज्ञापन के रूप में प्रकाशित हुआ है जो प्रचार करने की श्रेणी में आता है, रोटरी इंटरनेशनल के नियमों के अनुसार जिसकी पूरी तरह से मनाही है । दिवाकर अग्रवाल के समर्थकों का कहना है कि इस आधार पर नामांकन तो दीपक बाबू का निरस्त होना चाहिए । दिवाकर अग्रवाल के समर्थकों का कहना है कि लेकिन वह दीपक बाबू की उम्मीदवारी को निरस्त करने की मांग नहीं कर रहे हैं; वह खुले चुनावी मुकाबले के लिए तैयार हैं और विश्वास करते हैं कि डिस्ट्रिक्ट के लोगों को फैसला करने देना चाहिए ।
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश सिंघल के लिए जाहिर है कि फैसला करना आसान नहीं होगा । उनकी चिंता इस बात को लेकर भी है कि दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को मनमाने तरीके से निरस्त करने के फैसले को रोटरी के बड़े नेताओं ने यदि समर्थन नहीं दिया तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनकी तो बहुत बदनामी होगी । चुनावी मुकाबले के नजरिये से डिस्ट्रिक्ट में दीपक बाबू की बजाये यदि दिवाकर अग्रवाल का पलड़ा भारी दिख रहा है तो फिर डिस्ट्रिक्ट में ही दिवाकर अग्रवाल की उम्मीदवारी को निरस्त करने के फैसले पर बबाल हो जायेगा और उसमें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में राकेश सिंघल की ही फजीहत होगी । जाहिर है कि दीपक बाबू को जबर्दस्ती और हेराफेरी से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुनवाने की कोशिश की राकेश सिंघल को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है और उसके बाद भी कोई गारंटी नहीं है कि उनकी कोशिश सफल हो ही जाये । इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा दीपक बाबू के लिए राकेश सिंघल और उनकी टीम के सदस्यों ने जो चाल सोची है, उसे वह अमल में ला भी पाते हैं या नहीं ?

Tuesday, October 22, 2013

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3010 में मुकेश अरनेजा को डिस्ट्रिक्ट काउंसलर बना कर भी उनकी गंदी हरकतों से संजय खन्ना क्या बचे रह सकेंगे ?

नई दिल्ली । संजय खन्ना ने अपने गवर्नर-काल के प्रमुख पदों की घोषणा करते हुए मुकेश अरनेजा को डिस्ट्रिक्ट काउंसलर बनाने का ऐलान किया तो दूसरों को तो छोड़िये, खुद मुकेश अरनेजा तक को बड़ी हैरानी हुई । संजय खन्ना के चुनाव में उनकी मदद करने वाले रोटेरियंस को लेकिन संजय खन्ना के इस फैसले ने बुरी तरह निराश किया । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए जब संजय खन्ना चुनावी संघर्ष में थे, तब मुकेश अरनेजा ने उन्हें हरवाने की हर संभव कोशिश की थी । याद रखने की, या महत्व की बात यह नहीं है कि मुकेश अरनेजा ने संजय खन्ना की उम्मीदवारी के खिलाफ काम किया था - कोई भी चुनाव होता है तो लोग 'इस' तरफ या 'उस' तरफ होते ही हैं; और अच्छी बात यही मानी/समझी जाती है कि जीतने वाला इस बात को ज्यादा दिन तक याद न रखे कि कौन-कौन उसके खिलाफ था । इसलिए संजय खन्ना अपने गवर्नर-काल के लिए पदों का बँटवारा करते समय यदि इस बात को भूल रहे हैं कि किस किस ने उनकी उम्मीदवारी का समर्थन या विरोध किया था, तो इसे उनके बड़प्पन और उनकी महानता के रूप में ही देखा जाना चाहिए ।
मुकेश अरनेजा का मामला लेकिन अलग है । जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि याद करने/रखने की बात यह नहीं है कि मुकेश अरनेजा ने संजय खन्ना की उम्मीदवारी का विरोध किया था; संजय खन्ना की उम्मीदवारी के समर्थकों को लेकिन यह बहुत अच्छी तरह से याद है कि संजय खन्ना को हरवाने के लिए मुकेश अरनेजा ने हद दर्जे के घटियापन और नीचता के स्तर का काम किया था । चुनाव में हर कोई किसी 'एक तरफ' होता ही है - यह बहुत स्वाभाविक है और हर किसी का लोकतांत्रिक अधिकार भी है; मुकेश अरनेजा लेकिन इस स्वाभाविक से अपने अधिकार को जिस धौंस और धमक के साथ इस्तेमाल करते हैं उसके कारण ही रोटरी में और डिस्ट्रिक्ट में उन्हें खूब बदनामी मिली है । रोटरी में और डिस्ट्रिक्ट में चुनावी राजनीति को लेकर विवाद और झगड़े पहले भी रहे/हुए हैं; मुकेश अरनेजा को लेकिन डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को गटर-छाप बना देने का श्रेय है । संजय खन्ना को चुनाव में हरवाने के लिए मुकेश अरनेजा ने गटर-छाप हरकतों का जैसे एक नया रिकॉर्ड ही बना डाला था । मुकेश अरनेजा की उस समय की हरकतें लोगों को चूँकि खूब याद हैं, इसीलिए उन्हें संजय खन्ना द्धारा अपने कार्य-काल के लिए डिस्ट्रिक्ट काउंसलर बनाये जाने का फैसला करते देख लोगों को घोर आश्चर्य हुआ है । खुद मुकेश अरनेजा को भी आश्चर्य हुआ और अपने इस आश्चर्य को उन्होंने कई लोगों के सामने अभिव्यक्त भी किया । दरअसल, मुकेश अरनेजा को भी इस बात का अहसास तो होगा ही कि संजय खन्ना की उम्मीदवारी के साथ उन्होंने किस तरह की घटिया राजनीति की थी । मुकेश अरनेजा के लिए तो यह सचमुच अचरज की ही बात हुई कि संजय खन्ना उनकी घटिया किस्म की हरकतों को भी भूल और माफ़ कर सकते हैं !
संजय खन्ना के इस फैसले में कई लोगों ने संजय खन्ना की सदाशयता और समन्वयवादी सोच को व्यवहारिक रूप लेते हुए देखा है । उनका मानना और कहना है कि संजय खन्ना चूँकि एक बड़ी सोच के व्यक्ति हैं, इसलिए वह इस बात को याद करना/रखना नहीं चाहते हैं कि मुकेश अरनेजा ने उनके साथ क्या किया था; वह सभी लोगों को साथ लेकर चलना चाहते हैं और अपने गवर्नर-काल को प्रभावी बनाने के लिए सभी को - सज्जनों को भी और दुष्टों को भी - अपने साथ रखना चाहते हैं और इसीलिये उन्होंने मुकेश अरनेजा को भी अपनी टीम में प्रमुख जगह दी है । लेकिन कई अन्य लोगों को लगता है कि संजय खन्ना ने डर की वजह से मुकेश अरनेजा को काउंसलर का पद दिया है । कई लोगों को लगता है कि संजय खन्ना ने जाना/समझा कि मुकेश अरनेजा को उन्होंने यदि कोई पद नहीं दिया तो मुकेश अरनेजा बदला लेने के लिए अपनी गंदी चालों से उन्हें परेशान करेगा/रखेगा और नुकसान पहुँचायेगा - जैसा कि उसने अमित जैन के साथ किया और विनोद बंसल के साथ कर रहा है । लोगों के अनुसार, मुकेश अरनेजा को काउंसलर बना कर संजय खन्ना ने उम्मीद की है कि उन्हें मुकेश अरनेजा की गंदी हरकतों का शिकार नहीं होना पड़ेगा ।
मुकेश अरनेजा को काउंसलर बनाने के संजय खन्ना के फैसले पर लोगों को हैरानी इसलिए भी हुई है, क्योंकि उन्हें लगता है कि संजय खन्ना ने चाहे जिस भी कारण से यह फैसला लिया हो - इसका कोई सुफल संजय खन्ना को नहीं ही मिलने वाला है । वह असंतोषी किस्म के प्राणी हैं और अपनी हरकतों से बाज न आने की जैसे कसम खाये हुए हैं । अमित जैन ने तो उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाया था, लेकिन फिर भी उन्होंने अमित जैन को इतना तंग किया कि अमित जैन उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद से हटाने को मजबूर हुए और फिर उसके बाद तो मुकेश अरनेजा ने शर्मसार कर देने वाली हरकतों को अंजाम दिया । विनोद बंसल के साथ तो मुकेश अरनेजा पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर शेखर मेहता की चौकड़ी के सदस्य हैं, लेकिन फिर भी विनोद बंसल को उनकी कारस्तानियों का शिकार होना पड़ रहा है । लोगों के आश्चर्य का कारण यही है कि ऐसे में संजय खन्ना को क्यों और कैसे यह उम्मीद बनी है कि मुकेश अरनेजा को साथ में लेकर वह मुकेश अरनेजा की कारस्तानियों से बच सकेंगे ?
मुकेश अरनेजा ने जिस तरह खुशी-खुशी संजय खन्ना के ऑफर को स्वीकार कर लिया, उसे देख कर भी लोगों को कम हैरानी नहीं हुई है । लोगों का कहना है कि संजय खन्ना ने तो उन्हें पद का ऑफर देकर अपनी सदाशयता और अपने बड़प्पन का परिचय दिया है, किंतु मुकेश अरनेजा ने पद को स्वीकार करके अपने 'छोटे' होने का और पदों का लालची होने का ही एक बार फिर सुबूत दिया है । मुकेश अरनेजा के साथियों तक का कहना है कि मुकेश अरनेजा को जब इस बात का अहसास है कि उन्होंने संजय खन्ना के चुने जाने में हर संभव तरीके से रोड़े अटकाने का ही काम किया था, और उसे भी निहायत घटिया तरीके से किया था - तो उन्हें संजय खन्ना के ऑफर को स्वीकार करते हुए कुछ तो शर्म दिखानी चाहिए थी और उनके ऑफर को विनम्रता के साथ अस्वीकार कर देना चाहिए था । इससे उनकी कुछ तो इज्ज़त बनती । मुकेश अरनेजा को लेकिन इज्ज़त से ज्यादा पद की परवाह रहती है - इसीलिये उन्होंने संजय खन्ना के ऑफर को स्वीकार करने में जरा भी देर नहीं लगाई ।

Monday, October 21, 2013

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में दीपक टुटेजा का जन्मदिन मनवा कर ओंकार सिंह रेणु के शुभचिंतकों ने विक्रम शर्मा को अपने खेमे के नेताओं के बीच बदनाम करने की चाल चली है क्या

नई दिल्ली । विक्रम शर्मा ने अपने क्लब के सदस्यों के साथ मिल कर दीपक टुटेजा का जन्मदिन क्या मनाया, डिस्ट्रिक्ट के चुनावी खिलाड़ियों को जैसे साँप सूँघ गया है । विक्रम शर्मा इस वर्ष सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की तैयारी कर रहे हैं; और जिन नेताओं के भरोसे वह यह तैयारी कर रहे हैं उनके लिए पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक टुटेजा दुश्मन नंबर वन हैं । ऐसे में, विक्रम शर्मा द्धारा अपने क्लब के सदस्यों के साथ दीपक टुटेजा के जन्मदिन को समारोह पूर्वक मनाये जाने की खबर ने सभी को हैरान किया है । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के बाद विक्रम शर्मा ने विरोधी खेमे के नेताओं के साथ मिलना-जुलना शुरू किया तो इसे एक बहुत स्वाभाविक तरीके से लिया गया । कोई भी उम्मीदवार सभी लोगों से मिलेगा-जुलेगा ही - इसलिए विरोधी खेमे के नेताओं से विक्रम शर्मा के मिलने-जुलने पर उनके खेमे के नेताओं ने कोई आपत्ति नहीं की । लेकिन विरोधी खेमे के एक प्रमुख नेता दीपक टुटेजा का जन्मदिन मनाना - और तब मनाना, जबकि विक्रम शर्मा के प्रमुख सलाहकार अजय बुद्धराज ने दीपक टुटेजा को दुश्मन नंबर एक घोषित किया हुआ हो; किसी को भी हजम नहीं हो रहा है । चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों का यह मानना तो है कि विक्रम शर्मा ने दीपक टुटेजा का जन्मदिन मनाया है तो इसके लिए उन्होंने अपने खेमे के प्रमुख लोगों से अनुमति तो ले ही ली होगी; लेकिन हर किसी के लिए यह बात पहेली बनी हुई है कि विक्रम शर्मा को दीपक टुटेजा का जन्मदिन मनाने की अनुमति देने के पीछे उनके खेमे के नेताओं की चाल आखिर है क्या ?
इस बारे में लेकिन जितने मुँह, उतनी बातें हैं । विक्रम शर्मा के नजदीकियों का कहना है कि विक्रम शर्मा के जरिये दीपक टुटेजा का जन्मदिन मनवा कर दीपक टुटेजा को फुसलाने और अपनी तरफ करने का दाँव चला गया है । यह दाँव चलने/चलवाने वाले लोग भी हालाँकि जानते/समझते हैं कि इस तरह की कार्रवाईयों से दीपक टुटेजा को फुसलाना आसान नहीं होगा; लेकिन फिर भी उन्होंने यह दाँव चला/चलवाया है तो इसके पीछे उनकी सोच यह है कि इस कार्रवाई से दीपक टुटेजा को फुसलाया भले न जा सके, लेकिन उनके और विजय शिरोहा के बीच झगड़ा जरूर पैदा किया जा सकेगा । दीपक टुटेजा और विजय शिरोहा के बीच 'पैदा हुए' झगड़े में अपने लिए मौका देख रहे विरोधी खेमे के नेताओं का विश्वास है कि तब इन दोनों में से कोई एक उनके साथ आने के लिए मजबूर होगा - और तब उनका राजनीतिक वनवास दूर हो जायेगा । विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं के बीच यह विश्वास इसलिए और बढ़ा/मजबूत हुआ है, क्योंकि वे देख/जान रहे हैं कि सत्ता खेमे में आरके शाह की उम्मीदवारी को लेकर बहुत भरोसा नहीं बन पा रहा है । उम्मीदवारी के लिहाज से आरके शाह को कमजोर आँकते हुए विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं को लगता है कि यही समय है जबकि वह सत्ता खेमे की एकता को छिन्न-भिन्न कर सकते हैं । विक्रम शर्मा द्धारा दीपक टुटेजा का जन्मदिन मनाये जाने के पीछे सत्ता खेमे की एकता को ख़त्म करने की कोशिश को देखा/पहचाना तो जा रहा है, लेकिन उस मूल सवाल का जबाव तो इसमें भी नहीं मिला है कि इस काम के लिए उन दीपक टुटेजा को 'हीरो' क्यों बनाया गया - जिन दीपक टुटेजा को विक्रम शर्मा के प्रमुख सलाहकार अजय बुद्धराज ने दुश्मन नंबर एक घोषित किया हुआ है ।
विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी के एक बड़े समर्थक नेता ने हालाँकि इस प्रकरण को यह कहते/बताते हुए ज्यादा तवज्जो देने लायक मानने से इंकार किया कि विक्रम शर्मा ने तो अन्य पूर्व गवर्नर्स का भी जन्मदिन मनाया है; बल्कि दूसरे पूर्व गवर्नर्स का जन्मदिन तो उन्होंने ज्यादा तैयारी के साथ और ज्यादा बड़े स्तर पर मनाया है; दीपक टुटेजा का जन्मदिन तो विक्रम शर्मा ने साधारण तरीके से ही मनाया है । विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी के एक अन्य समर्थक नेता का कहना है कि विक्रम शर्मा द्धारा दीपक टुटेजा का जन्मदिन आयोजित करवा कर विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी के एक समर्थक ने दरअसल अजय बुद्धराज को नीचा दिखाने और अपमानित करने का काम किया है । इन समर्थक नेता का कहना है कि विक्रम शर्मा के साथ समस्या यह हुई है कि कई नेता उनके सलाहकार हो गए हैं और सभी अपने-अपने राजनीतिक हित साधने के लिए उनका इस्तेमाल कर रहे हैं । किसी को यह बात पसंद नहीं आ रही है कि अजय बुद्धराज ने स्वतः ही विक्रम शर्मा के प्रमुख सलाहकार का 'पद' संभाल लिया है; तो किसी का दुःख यह है कि खेमे की तरफ से उम्मीदवार ओंकार सिंह रेणु को बनना चाहिए था, विक्रम शर्मा क्यों हो गए ? इसी तर्ज पर, कुछेक लोगों को लगता है कि दीपक टुटेजा का जन्मदिन मनवा कर ओंकार सिंह रेणु के शुभचिंतकों ने विक्रम शर्मा को अपने खेमे के नेताओं के बीच बदनाम करने की चाल चली है जिससे कि विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी खतरे में पड़े और ओंकार सिंह रेणु का काम बने ।
विक्रम शर्मा द्धारा दीपक टुटेजा का जन्मदिन मनवा कर विक्रम शर्मा की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने चाहें जो भी राजनीतिक हित साधने का उपक्रम किया हो, उसका नतीजा तो बाद में देखने को मिलेगा - लेकिन अभी जो दिख रहा है वह यह कि इस कार्रवाई से उनके बीच आपस में ही एक-दूसरे को लेकर शक/संदेह पैदा हो गया है; और इस स्थिति ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति को खासा दिलचस्प बना दिया है ।