Thursday, March 2, 2017

लायंस इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए टू की चुनावी लड़ाई में यशपाल अरोड़ा व चमनलाल गुप्ता की जोड़ी से पिछड़ने के लिए जेपी सिंह और गुरचरण सिंह भोला ने एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराना शुरू किया

नई दिल्ली । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी लड़ाई में गुरचरण सिंह भोला को बुरी तरह से पिछड़ता हुआ देख कर उनके नजदीकियों ने जेपी सिंह को कोसना शुरू कर दिया है । जेपी सिंह के नजदीकियों का कहना लेकिन यह है कि जेपी सिंह ने अपनी तरफ से गुरचरण सिंह भोला की उम्मीदवारी के गुब्बारे में हवा भरने की बहुत कोशिश की है, लेकिन डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच यशपाल अरोड़ा के मुकाबले वह यदि टिक नहीं पा रहे हैं - तो जेपी सिंह क्या करें ? जेपी सिंह के लिए मुसीबत की बात यह हुई है कि गुरचरण सिंह भोला की उम्मीदवारी के चक्कर में इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी की उनकी अपनी उम्मीदवारी के लिए संकट खड़ा होता जा रहा है, लिहाजा उन्होंने अपनी उम्मीदवारी पर ध्यान देना शुरू किया है । गुरचरण सिंह भोला और उनके नजदीकियों की नाराजगी इसीलिए जेपी सिंह पर फूट रही है कि जेपी सिंह उनसे पैसे तो अनाप-शनाप खर्च करवा रहे हैं, लेकिन उनकी उतनी मदद नहीं कर रहे हैं, जितनी और जैसी मदद की उन्हें जरूरत है । इन दोनों के समर्थकों को भी लग रहा है कि यशपाल अरोड़ा ने इंटरनेशनल डायरेक्टर एंडोर्सी पद के दूसरे उम्मीदवार चमन लाल गुप्ता के साथ जिस तरह का गठजोड़ बनाया हुआ है, वैसा गठजोड़ गुरचरण सिंह भोला और जेपी सिंह का नहीं नजर आ रहा है - और इस कारण से यशपाल अरोड़ा के सामने गुरचरण सिंह भोला की तथा चमनलाल गुप्ता के सामने जेपी सिंह की चुनावी हालत पतली होती हुई दिख रही है ।
जेपी सिंह को डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच दरअसल गुरचरण सिंह भोला की उम्मीदवारी 'लाने' के लिए लताड़ा जा रहा है । डिस्ट्रिक्ट में लोगों का कहना और पूछना है कि गुरचरण सिंह भोला की लायनिज्म में जब कोई ज्यादा दिलचस्पी व संलग्नता ही नहीं रही, तो फिर जेपी सिंह उन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जैसे महत्त्वपूर्ण व जिम्मेदारी के पद के लिए चुनवाने/बनवाने के लिए क्यों लगे हुए हैं ? उल्लेखनीय है कि लायनिज्म में सक्रियता और संलग्नता के मामले में गुरचरण सिंह भोला चूँकि यशपाल अरोड़ा के सामने बिलकुल भी नहीं ठहरते, इसलिए डिस्ट्रिक्ट में लोगों को लग रहा है कि गुरचरण सिंह भोला को जेपी सिंह और विनोद खन्ना सिर्फ अपने स्वार्थ में डिस्ट्रिक्ट पर थोपना चाहते हैं । लायनिज्म में यशपाल अरोड़ा और गुरचरण सिंह भोला की सक्रियता व संलग्नता की तुलना करें तो देखते हैं कि हालाँकि दोनों ने एक ही साथ, वर्ष 2002 में अलग अलग क्लब्स की सदस्यता लेकर लायनिज्म ज्वाइन किया था; जिसके बाद यशपाल अरोड़ा तो चार वर्ष बाद, वर्ष 2006-07 में ही क्लब के अध्यक्ष बन गए थे, लेकिन गुरचरण सिंह भोला को अपने क्लब का अध्यक्ष बनने में ही 11 वर्ष लग गए और वह वर्ष 2013-14 में अध्यक्ष बन सके । क्लब के ही लोगों का कहना रहा कि इससे पहले कई बार उनसे अध्यक्ष बनने के कहा गया, लेकिन गुरचरण सिंह भोला कभी किसी बहाने तो कभी किसी बहाने से अध्यक्ष बनने से बचते रहे । वह यह भी कहते रहे कि वह तो लायनिज्म में मौज-मजे के लिए आए हैं, यहाँ किसी पद पर काम करने या कोई जिम्मेदारी निभाने या यहाँ कुछ करने नहीं आए हैं ।
यशपाल अरोड़ा के साथ ही लायनिज्म में शामिल होने वाले गुरचरण सिंह भोला जब क्लब के अध्यक्ष बने थे, तब तक यशपाल अरोड़ा जोन चेयरमैन, रीजन चेयरमैन और डिस्ट्रिक्ट कैबिनेट ट्रेजरार जैसे महत्त्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके थे । बात सिर्फ पदों पर रहने की नहीं है - यशपाल अरोड़ा 10 बार डिस्ट्रिक्ट लायंस लीडरशिप इंस्टीट्यूट में तथा एक बार रीजनल लायंस लीडरशिप इंस्टीट्यूट में शामिल हो चुके हैं, जबकि गुरचरण सिंह भोला ने इनमें एक बार भी शामिल होने की जरूरत नहीं समझी । इसलिए ही डिस्ट्रिक्ट में लोगों के बीच सवाल है कि जिन गुरचरण सिंह भोला ने कभी किसी लीडरशिप इंस्टीट्यूट में शामिल होने की जरूरत नहीं समझी, वह अचानक से लीडर क्यों बनना चाहते हैं ? वह बिना 'पढ़ाई' किए ही 'डिग्री' क्यों लेना चाहते हैं ? और क्यों जेपी सिंह व विनोद खन्ना उन्हें गवर्नर चुनवाना/बनवाना चाहते हैं ? डिस्ट्रिक्ट में लोगों को लगता है कि जेपी सिंह और विनोद खन्ना को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में एक 'पढ़ालिखा' और ट्रेंड व्यक्ति नहीं चाहिए, उन्हें गवर्नर के रूप में एक ऐसी कठपुतली चाहिए जिसे कुछ पता न हो और जो उनके इशारों पर नाचे ।
यशपाल अरोड़ा और गुरचरण सिंह भोला में तुलना यहीं खत्म नहीं हो जातीं हैं - यशपाल अरोड़ा 10 बार मल्टीपल कॉन्फ्रेंस में और तीन बार इंटरनेशनल कन्वेंशन में तथा एक बार इसामे फोरम की मीटिंग में शामिल हुए हैं; गुरचरण सिंह भोला ने इनमें से किसी एक में भी एक बार भी शामिल होने की जरूरत नहीं समझी है । गुरचरण सिंह भोला ने डिस्ट्रिक्ट के दो महत्त्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स - लायंस आई हॉस्पिटल तथा लायंस ब्लड बैंक के ट्रस्टी बनने में भी  दिलचस्पी नहीं ली; यशपाल अरोड़ा इन दोनों जगहों में ट्रस्टी हैं । लायनिज्म में अपनी सेवाओं के लिए यशपाल अरोड़ा समय समय पर सम्मानित होते रहे हैं, जिसका नतीजा है कि उनके पास 10 इंटरनेशनल सर्टीफिकेट्स तथा 13 इंटरनेशनल पिन्स जैसे महत्त्वपूर्ण ईनाम हैं, गुरचरण सिंह भोला की जेब इस मामले में पूरी तरह खाली है । इस तुलना के चलते ही डिस्ट्रिक्ट में लोगों को लग रहा है कि जिन गुरचरण सिंह भोला को अपने लायन-जीवन के पंद्रह वर्षों में लायनिज्म के कामों में कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही, जिन्होंने कभी किसी प्रोजेक्ट में हिस्सा नहीं लिया, लायनिज्म में जिनकी कोई उपलब्धि नहीं है - उन गुरचरण सिंह भोला को तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के बारे में अभी सोचना भी नहीं चाहिए । डिस्ट्रिक्ट में लोगों की इसी सोच के चलते सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में गुरचरण सिंह भोला की हालत पतली बनी हुई है ।
जेपी सिंह और विनोद खन्ना ने अपनी अपनी तरह से हालाँकि गुरचरण सिंह भोला की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का भरसक प्रयास किया । उन्हें लगा कि गुरचरण सिंह भोला ने भले ही लायनिज्म के लिए कभी कुछ न किया हो, लायनिज्म के किसी भी काम में कोई दिलचस्पी न ली हो और अपना कोई सहयोग न दिया हो तथा लायनिज्म में उनकी कोई उपलब्धि न रही हो - लेकिन फिर भी वह डिस्ट्रिक्ट के लोगों को गुरचरण भोला की उम्मीदवारी का समर्थन करने के लिए मना लेंगे । किंतु जल्दी ही यह स्पष्ट हो गया कि इन दोनों की तमाम मदद के बावजूद गुरचरण सिंह भोला के लिए समर्थन जुट नहीं रहा है । जेपी सिंह को गुरचरण सिंह भोला के चक्कर में जब अपना चुनाव भी खतरे में पड़ता नजर आया, तो उन्होंने भी गुरचरण सिंह भोला की उम्मीदवारी के लिए ज्यादा सक्रियता दिखाने से बचना शुरू कर दिया । गुरचरण सिंह भोला के नजदीकी जेपी सिंह के इस रवैये से भड़के हुए हैं । उनका आरोप है कि जेपी सिंह और विनोद खन्ना तरह तरह की बहानेबाजियों से उनसे पैसे तो खर्च करवा रहे हैं, लेकिन उनकी उम्मीदवारी को समर्थन दिलवाने के काम में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं । गुरचरण सिंह भोला के नजदीकियों की इस नाराजगी ने जेपी सिंह की उम्मीदवारी के लिए भी समस्या पैदा कर दी है ।

Wednesday, March 1, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में मुकेश कुशवाह की नियम विरुद्ध मनमानी के सामने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे असहाय क्यों बने हुए हैं ?

कानपुर । दीप कुमार मिश्र को बेईमानीपूर्ण तरीके से सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल का चेयरमैन 'चुनवा' कर चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य मुकेश कुशवाह ने इंस्टीट्यूट के नए बने प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे को खासे धर्मसंकट में फँसा दिया है । उन पर एक तरफ मुकेश कुशवाह की कारस्तानी को अनदेखा करने का दबाव है, तो दूसरी तरफ प्रेसीडेंट पद के रूप में अपने पद व इंस्टीट्यूट की गरिमा को बचाने की चुनौती है । मुकेश कुशवाह की तरफ से दावा सुना गया है कि उन्होंने नीलेश विकमसे के खास सेंट्रल काउंसिल सदस्य अनिल भंडारी से बात कर ली है और अनिल भंडारी ने उन्हें आश्वस्त किया है कि उन्होंने जो किया है, प्रेसीडेंट के रूप में नीलेश विकमसे उसे पलटेंगे नहीं । मुकेश कुशवाह इसलिए भी आश्वस्त हैं क्योंकि उनकी कारस्तानी को सेंट्रल रीजन के बाकी चार सेंट्रल काउंसिल सदस्यों में से तीन - मनु अग्रवाल, प्रकाश शर्मा तथा केमिशा सोनी का खुला समर्थन है । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में नीलेश विकमसे के जो अन्य नजदीकी हैं, उनका कहना लेकिन यह भी है कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में चुनाव अधिकारी के रूप में मुकेश कुशवाह ने जो हरकत की है - उसे लेकर नीलेश विकमसे खासे परेशान भी हैं और उनका मानना है कि इस तरह की हरकतों पर वह यदि चुप रहे तो मुकेश कुशवाह जैसे लोग इंस्टीट्यूट और प्रोफेशन को अपनी कारस्तानी से बदनाम करते रहेंगे । 
मुकेश कुशवाह सहित सेंट्रल रीजन के चार सेंट्रल काउंसिल सदस्यों की मनमानीभरी दादागिरी का पहला लक्षण तो तब दिखा, जब उन्होंने सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में वोट डालने का फैसला किया । नैतिकता का तकाजा यह कहता है कि रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों के चुनाव में रीजन के सेंट्रल काउंसिल सदस्यों को वोटिंग में शामिल नहीं होना चाहिए, और रीजनल काउंसिल के सदस्यों को ही पदाधिकारी चुनने देना चाहिए । मुकेश कुशवाह, मनु अग्रवाल, प्रकाश शर्मा व केमिशा सोनी ने लेकिन लगता है कि नैतिकता का पाठ पढ़ा ही नहीं है । इनकी बदकिस्मती लेकिन यह रही कि निर्लज्जता के साथ नैतिकता के पाठ की अनदेखी करने के बाद भी चेयरमैन पद के इनके उम्मीदवार दीप कुमार मिश्र को जीत नहीं मिल सकी । पंद्रह वोटों में दीप कुमार मिश्र और चेयरमैन पद के दूसरे उम्मीदवार रोहित रुवाटिया अग्रवाल को पहली वरीयता के सात-सात वोट मिले और एक वोट में पहली वरीयता का वोट नहीं दिया गया था, जबकि दूसरी वरीयता का वोट दीप कुमार मिश्र के लिए था । तर्कशील तरीके से देखें तो जो वोटर दीप कुमार मिश्र को दूसरी वरीयता का वोट दे रहा है, उसका पहली वरीयता का वोट रोहित रुवाटिया अग्रवाल के लिए ही रहा होगा - जो किसी तकनीकी गड़बड़ी के चलते मार्क नहीं हो पाया होगा । इंस्टीट्यूट का कामकाज लेकिन तर्कशीलता के आधार पर नहीं चलता है, वह ठोस साक्ष्यों के आधार पर ही काम करेगा - और इसके लिए ही नियम-कानून बनाए गए हैं । इंस्टीट्यूट के नियम-कानून के अनुसार, इस पंद्रहवें वोट को रद्द होना चाहिए था ।
मुकेश कुशवाह ने चुनाव अधिकारी के रूप में लेकिन इंस्टीट्यूट के नियम-कानून की अनदेखी करते हुए इस पंद्रहवें वोट को दीप कुमार मिश्र के खाते में जोड़ कर उन्हें विजेता घोषित कर दिया । इससे पहले मुकेश कुशवाह ने एक हरकत यह और की थी कि रोहित रुवाटिया अग्रवाल को मिले एक वोट को दीप कुमार मिश्र के खाते में जोड़ दिया था, उनकी यह हरकत लेकिन तुरंत से पकड़ में आ गई थी । रद्द हो जाने वाले वोट को गिनती में शामिल करने के मामले में भी मुकेश कुशवाह की मनमानी का आलम यह रहा कि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के तत्कालीन चेयरमैन अभय छाजेड़ ने इंस्टीट्यूट के मुख्यालय से इस मामले में निर्देश लिया, तो संयुक्त सचिव जी रंगनाथन की तरफ से ईमेल के जरिये उनसे स्पष्ट कहा गया कि नियमानुसार उक्त वोट रद्द होगा - मुकेश कुशवाह ने लेकिन उनके फैसले को भी मानने से इंकार करते हुए दीप कुमार मिश्र को विजेता घोषित कर दिया । मुकेश कुशवाह ने चुनाव अधिकारी  के रूप में जिस निर्लज्जता के साथ इंस्टीट्यूट के नियम की ऐसीतैसी की है, उसके कारण वह अनुशासनात्मक कार्रवाई के पात्र बनते हैं - लेकिन उनका आत्मविश्वास दिखाता है कि इस मामले में उनकी इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट नीलेश विकमसे के साथ सेटिंग हो चुकी है, और वह आश्वस्त हैं कि उनकी हरकत के चलते न तो उनके खिलाफ कोई कार्रवाई होगी और न उनका फैसला ही बदला जायेगा ।
मुकेश कुशवाह ने चुनाव अधिकारी के रूप में जो हरकत की है, उसे जयपुर ब्रांच की राजनीति के संदर्भ में बदले की कार्रवाई के रूप में भी देखा/बताया जा रहा है । जयपुर ब्रांच पर कब्जे की लड़ाई में प्रकाश शर्मा और गौतम शर्मा की जोड़ी को श्याम लाल अग्रवाल, प्रमोद कुमार बूब व रोहित रुवाटिया अग्रवाल की तिकड़ी से मात खानी पड़ रही है । प्रकाश शर्मा और गौतम शर्मा ने रोहित रुवाटिया अग्रवाल को अपनी तरफ करने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन उन्हें किसी भी तरह से सफलता नहीं मिली । रीजनल काउंसिल के चेयरमैन के चुनाव में रीजनल काउंसिल के सदस्यों में रोहित रुवाटिया अग्रवाल का पलड़ा जब भारी दिखा, तो प्रकाश शर्मा को उन्हें दबाव में लेकर जयपुर ब्रांच पर कब्जे को लेकर सौदेबाजी करने का मौका मिला । चर्चा है कि प्रकाश शर्मा ने रोहित रुवाटिया अग्रवाल को साफ बता दिया था कि जयपुर ब्रांच के मामले में वह यदि उनके ग्रुप का समर्थन नहीं करेंगे, तो उन्हें किसी भी कीमत पर रीजनल काउंसिल का चेयरमैन नहीं बनने दिया जायेगा । जो हुआ, उसके जरिये प्रकाश शर्मा ने अपनी धमकी को सच साबित करके दिखा दिया । उल्लेखनीय है कि जयपुर को आठ वर्ष बाद रीजनल काउंसिल में चेयरमैन पद मिलने जा रहा था - जिसे लेकिन मुकेश कुशवाह, मनु शर्मा, केमिशा सोनी की मदद से प्रकाश शर्मा व गौतम शर्मा की ब्लैकमेल की राजनीति ने संभव नहीं होने दिया ।

Tuesday, February 28, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के विरोध के 'मलहम' से सुभाष जैन को दिए गए धोखे का घाव भरने की जेके गौड़ की कोशिश सफल होगी क्या ?

गाजियाबाद । आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के विरोध में तेवर दिखा कर जेके गौड़ कहीं सुभाष जैन को दिए गए धोखे का पश्चाताप करने तथा सुभाष जैन की 'गुड बुक' में फिर से शामिल होने का जुगाड़ तो नहीं बैठा रहे हैं ? यह सवाल लोगों के बीच दरअसल इसलिए पैदा हुआ, क्योंकि अगले रोटरी वर्ष में होने वाले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में आलोक गुप्ता की संभावित उम्मीदवारी के विरोध में एक अकेले जेके गौड़ की आवाज ही सुनाई दे रही है - जिसे वास्तव में बेमतलब और फिजूल की कसरत के रूप में देखा/पहचाना गया है । अगले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव अभी अपनी प्रारंभिक अवस्था में ही है, और अभी संभावित उम्मीदवार अपनी अपनी योजना बनाने में ही लगे हैं; इस अवस्था में समर्थन और विरोध के कोई मतलब नहीं हैं । अगले रोटरी वर्ष के संभावित उम्मीदवारों में अभी तक आलोक गुप्ता और ललित खन्ना के नाम सामने आए हैं, जिनके समर्थन या विरोध की नेताओं ने अभी कोई घोषणा नहीं की है - हालाँकि चुनाव यदि सचमुच इनके बीच ही हुआ तथा और कोई तीसरा उम्मीदवार नहीं आया तो कौन नेता किसके साथ होगा, इसका अनुमान लगाना कोई मुश्किल नहीं है । इस बीच लेकिन एक अकेले जेके गौड़ की आवाज ही जोर से सुनाई दी है, जिसमें आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी का विरोध है । किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल हुआ है कि जेके गौड़ को अभी से अगले रोटरी वर्ष की आलोक गुप्ता की संभावित उम्मीदवारी के विरोध में आवाज उठाने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी है ?
जेके गौड़ के नजदीकियों का कहना है कि ऐसा करके जेके गौड़ ने दरअसल सुभाष जैन के 'नजदीक' आने की कोशिश की है । इस वर्ष के चुनाव में जेके गौड़ ने सुभाष जैन की 'पीठ में छुरा भौंकने' का जो काम किया है, आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के विरोध में अभी से नजर आ कर, वास्तव में वह सुभाष जैन को दिए गए घाव को भरने की कोशिश कर रहे हैं । मौजूदा वर्ष जेके गौड़ के लिए यूँ तो 'उपलब्धियों' भरा रहा है, लेकिन उपलब्धियों के लिए उन्हें भारी कीमत भी चुकानी पड़ी है - जो उनके लिए आगे मुसीबत भरी साबित हो सकती है । आगे की संभावित मुसीबतों को कम करने के लिए ही जेके गौड़ को आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के विरोध में खड़ा होने की जल्दबाजी करना पड़ी है । जेके गौड़ की इस वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने डिस्ट्रिक्ट के बड़े समझे जाने वाले नेता रमेश अग्रवाल की 'नाक काट' ली - और कुछ ज्यादा ही काट ली । उल्लेखनीय है कि इस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में रमेश अग्रवाल के उम्मीदवार अशोक जैन को हरवाने में तो जेके गौड़ ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई ही, साथ ही इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी में जाने की रमेश अग्रवाल की योजना को भी ध्वस्त करने में उन्होंने सफलता पाई । इन सफलताओं की बात तक तो मामला ठीक है, लेकिन समस्या हुई है कि इन सफलताओं को पाने के लिए जेके गौड़ को सुभाष जैन के साथ भी धोखा करना पड़ा, और सिर्फ धोखा ही नहीं करना पड़ा - मामला उनकी 'पीठ में छुरा भौंकने' जैसा हुआ ।
जेके गौड़ का रोटरी का इतिहास यूँ तो धोखे का ही भरापूरा उदाहरण है - ज्यादा पुरानी बात नहीं है, जब उन्हें मुकेश अरनेजा के 'आदमी' के रूप में देखा/पहचाना जाता था; लेकिन जैसे ही उन्हें अहसास हुआ कि फायदा मुकेश अरनेजा के साथ नहीं, बल्कि रमेश अग्रवाल के साथ रहने में है तो वह झट से रमेश अग्रवाल की गोद में जा बैठे । रमेश अग्रवाल के साथ जब उनका पूरा काम निकल गया, तो वह झट से उनकी गोद से उतर भी गए और उन्हें बुरा-भला कहने लगे । रमेश अग्रवाल को सबक सिखाने के चक्कर में उन्होंने सुभाष जैन के साथ भी धोखा कर दिया - और जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि सुभाष जैन के साथ उन्होंने धोखा ही नहीं किया है, बल्कि उनकी पीठ में छुरा भौंकने का काम किया है । जेके गौड़ चाहते तो रमेश अग्रवाल से सीधे ही निपट सकते थे - लेकिन उस स्थिति में वह सफलता के प्रति खुद को ही आश्वस्त नहीं कर सके, और इसलिए सफलता तक पहुँचने के लिए उन्होंने सुभाष जैन को सीढ़ी बना लिया । सुभाष जैन के जरिए जेके गौड़ ने अशोक जैन को समर्थन देने का भरोसा दिया और बदले में उम्मीद की कि रमेश अग्रवाल इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी में पहुँचने के उनके रास्ते का रोड़ा नहीं बनेंगे । यह 'डील' कर लेने के बाद भी जेके गौड़ ने अशोक जैन का समर्थन नहीं किया । दरअसल अशोक जैन को हरवा कर ही जेके गौड़ का रमेश अग्रवाल से बदला पूरा हो पाता । रमेश अग्रवाल से पूरा बदला लेने के लिए लेकिन उन्होंने जिस तरह से सुभाष जैन की पीठ में छुरा भौंका, उससे उनके लिए मामला काफी मुसीबतभरा हो गया है ।
असल में, जेके गौड़ के क्लब के कुछेक प्रमुख सदस्य सुभाष जैन के निकटवर्तियों में हैं, और उन्हें भी जेके गौड़ का सुभाष जैन के साथ धोखा करना पसंद नहीं आया है । इसके अलावा, जेके गौड़ भी जानते/समझते हैं कि भले ही उन्होंने दीपक गुप्ता का समर्थन किया है - लेकिन दीपक गुप्ता इसका कोई अहसान नहीं मानेंगे और पहले की तरह ही उन्हें अपमानित और जलील करते रहेंगे । मुकेश अरनेजा और सतीश सिंघल से उन्हें वैसे ही कोई उम्मीद नहीं है । ऐसे में, उन्हें भी लग रहा है कि सुभाष जैन से धोखा करके उन्होंने अपने लिए मुश्किलों को और बढ़ा लिया है । वास्तव में, इस वर्ष 'उपलब्धियों' को पाने के बाद भी - जेके गौड़ ने अपनी दशा ऐसी कर ली है, जिसमें कि वह न घर के रहे और न घाट के । डिस्ट्रिक्ट में ठीक-ठाक तरीके से बने रहने के लिए जे के गौड़ को सुभाष जैन के पास 'लौटने' का ही विकल्प सूझ रहा है । वह समझ रहे हैं कि अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद को लेकर जो भी राजनीतिक बिसात बिछेगी, उसमें सुभाष जैन किसी भी रूप में आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के साथ तो नहीं ही रहेंगे । इसलिए जेके गौड़ ने अभी से ही आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के विरोध में झंडा उठा लिया है । जेके गौड़ को विश्वास है कि उनके हाथ में यह झंडा रहेगा, तो सुभाष जैन उनसे धोखा खाने के बावजूद उन्हें अपने यहाँ जगह दे देंगे । राजनीति में वैसे भी दोस्तियाँ और दुश्मनियाँ ज्यादा दिन कहाँ चलती हैं ?

Sunday, February 26, 2017

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में विवेक खुराना को धोखे का शिकार बनाते हुए राकेश मक्कड़ के चेयरमैन चुने जाने को लोगों ने काउंसिल की बदकिस्मती के रूप में देखा/पहचाना है

नई दिल्ली । राजेश शर्मा अपनी फरेबी व तिकड़मी चालबाजियों से राकेश मक्कड़ को अंततः नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल का चेयरमैन चुनवाने में कामयाब हुए - उनकी इन कामयाबी को संभव बनाने में विरोधियों के बीच एकजुटता और विश्वास के अभाव ने भी हालाँकि महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई । कहा जाता है न कि समाज बुरे लोगों की बुरी हरकतों से खराब नहीं होता है, वह अच्छे लोगों के अपनी जिम्मेदारी न निभाने यानि कुछ न करने से खराब होता है । इस फलसफ़े को नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के संदर्भ में देखें तो देखने में आया कि नार्दर्न रीजन के कई सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने रीजनल काउंसिल के पॉवर ग्रुप की हरकतों को जी भर कर कोसा और उनकी हरकतों को इंस्टीट्यूट व प्रोफेशन को बदनाम करने वाला बताया, लेकिन पॉवर ग्रुप को सत्ता से बाहर करने के लिए प्रयास करने का जब समय आया - तो वह ऊँची नैतिकता और ऊँचे आदर्शों का हवाला देते हुए पीछे हट गए । सेंट्रल काउंसिल सदस्यों का यह व्यवहार इसलिए सवालों के घेरे में है, क्योंकि इन्हीं सेंट्रल काउंसिल सदस्यों ने दो वर्ष पहले राज चावला के चेयरमैन चुने जाने के समय रीजनल काउंसिल के कामकाज में सीधा हस्तक्षेप किया था - ऊँची नैतिकता व ऊँचे आदर्शों ने उस समय तो इन्हें हस्तक्षेप करने से नहीं रोका था ? इसलिए नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में पॉवर ग्रुप की करतूतों की कुछेक सेंट्रल काउंसिल सदस्यों द्धारा की जा रही आलोचना बेमानी है - क्योंकि पॉवर ग्रुप को पॉवर में बनाए रखने के लिए 'कुछ न करने वाले' यह सेंट्रल काउंसिल सदस्य भी जिम्मेदार हैं ।
राकेश मक्कड़ नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के ऐसे पहले चेयरमैन हैं, जिनके चेयरमैन बनने पर अधिकतर लोगों ने प्रतिकूल प्रतिक्रिया ही दी है; अधिकतर लोगों की तरफ से यही सुनने को मिला है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में अब अगले वर्ष भी घटियापन और टुच्चापन व बेईमानियाँ देखने को मिलेंगी । उल्लेखनीय है कि रीजनल काउंसिल में हर वर्ष एक नया चेयरमैन चुना जाता है - जो चुना जाता है, उसकी खूबियों और कमियों को अधिकतर लोग जानते/पहचानते हैं; लेकिन फिर भी लोग उससे उम्मीद करते हैं कि चेयरमैन पद पर बैठने के बाद यह अपनी कमियों को कम करने तथा खूबियों को बढ़ाने पर ध्यान देगा और अच्छा काम करेगा । राकेश मक्कड़ का मामला ऐसा है कि किसी को उनसे कुछ अच्छा करने की उम्मीद ही नहीं है । दरअसल पिछले महीनों में उनकी ऐसी ऐसी हरकतें रही हैं कि अधिकतर लोगों ने उनके चेयरमैन बनने को नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल की बदनसीबी के रूप में ही देखा/माना है । कुछेक लोगों ने तो इसे चुनावी सिस्टम की कमी के रूप में भी देखा/समझा - उनका कहना है कि यह चुनावी सिस्टम की कोई बहुत बड़ी कमी ही है कि इसमें फूलन देवी जैसी डकैत सांसद चुन ली जाती है और राकेश मक्कड़ जैसे लोग नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के चेयरमैन चुन लिए जाते हैं ।
राकेश मक्कड़ को चेयरमैन चुनवाने में सेंट्रल काउंसिल सदस्य राजेश शर्मा ने जैसी जो तिकड़म की, उससे वाइस चेयरमैन बने विवेक खुराना ने अपने आप को ठगा हुआ पाया है । उल्लेखनीय है कि विवेक खुराना भी चेयरमैन पद के उम्मीदवार थे, और राजेश शर्मा को भनक थी कि विवेक खुराना ने विरोधी खेमे के लोगों के साथ भी तार जोड़े हुए हैं और यदि मौजूदा पॉवर ग्रुप में उन्हें चेयरमैन बनने की संभावना नहीं दिखी तो वह विरोधी खेमे के समर्थन से चेयरमैन बन जायेंगे । विवेक खुराना चेयरमैन तो बनना चाहते थे, लेकिन राकेश मक्कड़ की तरह 'किसी भी तरह' नहीं - बल्कि एक स्वस्थ व लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत ही वह चेयरमैन बनना चाहते थे । उनके नजदीकियों का कहना था कि विवेक खुराना के तार विरोधी खेमे के लोगों से जुड़े हुए तो थे, लेकिन वह सिर्फ चेयरमैन बनने के लिए विरोधी खेमे में जाने के लिए तैयार नहीं थे; लेकिन हाँ, अपने खेमे में उन्हें यदि अपने साथ नाइंसाफी और बेईमानी होते हुए दिखी, तो वह विरोधी खेमे में जा सकते थे । ऐसे में, राजेश शर्मा और राकेश मक्कड़ की जोड़ी ने उन्हें इस तरह उल्लू बनाया कि जब तक उन्हें समझ में आया कि उनके साथ धोखा हो गया है, तब तक विरोधी खेमे में जाने का उनका रास्ता बंद हो चुका है । मनमार कर विवेक खुराना को वाइस चेयरमैन पद स्वीकारने में ही अपनी भलाई दिखी ।
राजेश शर्मा और राकेश मक्कड़ से विवेक खुराना को मिले धोखे की पीड़ा को कई लोगों ने विवेक खुराना की फेसबुक टाइमलाइन से भी 'पहचाना' । कई लोगों ने बताया/दिखाया कि विवेक खुराना ने अपनी फेसबुक टाइमलाइन पर जिस तरह सिर्फ अपने वाइस चेयरमैन चुने जाने की सूचना चस्पां की है, और चेयरमैन सहित बाकी पदाधिकारियों के जिक्र से वह बचे हैं - उससे स्पष्ट झलकता है कि जिस तरह से चुनाव हुए हैं, उससे वह खासे नाराज हैं । यह निष्कर्ष निकालने/लगाने वाले लोगों का तर्क रहा कि पिछले दिनों इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट/वाइस प्रेसीडेंट से लेकर विभिन्न ब्रांचेज तक के पदाधिकारियों के जो चुनावी नतीजे आए हैं, उनके विजेताओं का जिक्र करते हुए विवेक खुराना ने अपनी टाइमलाइन पर सभी को बधाई दी है - लेकिन नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में विजेता बने अपने ही साथियों के मामले में वह चुप्पी साध गए हैं । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के विजेता पदाधिकारियों के प्रति विवेक खुराना के इस सौतेलेपन को लोगों ने उनकी नाराजगी के पुख्ता सुबूत के रूप में ही देखा/पहचाना है । राकेश मक्कड़ के लिए मुसीबत और चुनौती की बात यही है कि उनके चेयरमैन बनने को लेकर जब उनकी अपनी टीम के सदस्यों में ही नाराजगी और असंतोष है, तो फिर बाकी लोगों की नाराजगी व असंतोष का तो कहना ही क्या ? राकेश मक्कड़ के चेयरमैन बनने को लेकर जिस तरह लोगों के बीच निराशा है, उससे लग रहा है कि नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में बदनामी के दाग अभी और गहरे होंगे ।

Friday, February 24, 2017

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में दीपक गुप्ता का रूखा रूखा सा नसीहतभरा व्यवहार विजेता के रूप में लोगों के साथ बनने वाले उनके 'हनीमून पीरियड' को जल्दी खत्म कर रहा है

गाजियाबाद । जुम्मा जुम्मा चार दिन पहले गवर्नर पद की कुर्सी तक पहुँचने की लाइन में लगने का नंबर पाए दीपक गुप्ता ने क्लब्स के पदाधिकारियों को जो तेवर दिखाने शुरू किए हैं, उसके कारण क्लब्स के पदाधिकारी सकते में हैं और वह सोचने लगे हैं कि दीपक गुप्ता को वह झेलेंगे कैसे ? मजे की बात यह हुई है कि जिन क्लब्स के पदाधिकारी बढ़चढ़ कर दीपक गुप्ता को समर्थन और वोट देकर जितवाने का श्रेय ले रहे थे, वही अब दीपक गुप्ता के रवैये और व्यवहार की शिकायत करने लगे हैं । शिकायत एक ही है और वह यह कि दीपक गुप्ता उनके फोन न तो उठाते हैं और न ही वापस कॉल करते हैं; किसी तरह बात हो पाती है और उस बात में उनका सम्मान करने के लिए उन्हें आमंत्रित करो तो वह नसीहत देने लगते हैं कि समय और तारीख तय करने से पहले उनसे पूछ तो लेते ! क्लब्स के जो पुराने सदस्य हैं और पदाधिकारी रह चुके हैं, वह दीपक गुप्ता के रवैये और व्यवहार की बातें सुन कर कहने/बताने लगे हैं कि पिछले गवर्नर्स भी अपने रवैये और व्यवहार के चलते लोगों की आलोचना का शिकार बनते/होते रहे हैं - लेकिन चुने जाने के महीने भर से भी कम समय के भीतर दीपक गुप्ता जिस तरह से क्लब्स के पदाधिकारियों के निशाने पर आ रहे हैं, वह सचमुच डिस्ट्रिक्ट व रोटरी के साथ-साथ दीपक गुप्ता के लिए भी चिंता की बात होनी चाहिए ।
दीपक गुप्ता का अपने समर्थकों के साथ 'हनीमून पीरियड' जितनी जल्दी से खत्म होता दिख रहा है, उससे कुछेक लोगों को चिंता हुई है तो अन्य कुछेक लोगों को मजे लेने का मौका मिला है । वरिष्ठ व अनुभवी रोटेरियंस का मानना/कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुने जाने के बाद के कुछेक महीने तो जीतने वाले के बारे में अच्छी अच्छी बातें होती ही हैं, लेकिन दीपक गुप्ता एक महीने के भीतर ही जिस तरह से अपने ही वोटरों की आलोचना का शिकार होने लगे हैं - उससे उन्हें यह सबक लेने की जरूरत है कि जीतने के बाद का समय उम्मीदवार बने होने के समय से कम मुश्किल और चुनौतीपूर्ण नहीं होता है । लोगों का कहना है कि दीपक गुप्ता को समझना चाहिए कि वह चुनाव जीते हैं और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी बने हैं, तो क्लब्स में उनका सम्मान करने के लिए उन्हें आमंत्रित किया ही जायेगा और क्लब का कार्यक्रम क्लब्स के पदाधिकारी ही तय करेंगे - समय और तारीख का एडजस्टमेंट दीपक गुप्ता को ही करना पड़ेगा । और यह एडजस्टमेंट करते समय 'शराफत' दीपक गुप्ता को ही दिखानी पड़ेगी - वह यदि नसीहत देने लगेंगे, तो क्लब्स के पदाधिकारियों को बुरा लगेगा ही - और फिर वह बात का बतंगड़ बनायेंगे ही । जाहिर है कि सावधानी दीपक गुप्ता को ही बरतनी है - जिस पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया, और वह अपने ही समर्थकों के निशाने पर आ गए ।
कुछेक क्लब्स के पदाधिकारियों की तरफ से तो यहाँ तक शिकायतें सुनने को मिली हैं कि दीपक गुप्ता अपने सम्मान कार्यक्रम को 'अच्छे' से करने तथा आमंत्रितों की संख्या बढ़ाने तक के लिए दबाव बनाते हैं । कुछेक क्लब्स में हुए सम्मान कार्यक्रम की उन्होंने यह कहते हुए शिकायत तक की कि वहाँ सम्मान के नाम पर महज खानापूर्ति ही हुई है, वहाँ नाहक ही उनका समय खराब हुआ । कुछेक मौकों पर दीपक गुप्ता यह शिकायत करते हुए भी सुने गए कि पिछले वर्ष सुभाष जैन के जीतने पर कई क्लब्स ने उनका सम्मान तो बड़े जोरशोर से किया था, जिसकी डिस्ट्रिक्ट में भी खूब खूब चर्चा रही/हुई थी, लेकिन इस बार क्लब्स उनका सम्मान फीके फीके रूप में कर रहे हैं - और डिस्ट्रिक्ट में कहीं कोई चर्चा तक नहीं होती, उन्हें ही दूसरों को बताना पड़ता है कि फलाँ फलाँ क्लब में उनका सम्मान हो चुका है । इस तरह की बातें सुन कर दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी का समर्थन करने वाले लोगों का कहना है कि लगता है कि लोगों ने सहानुभूति में दीपक गुप्ता को वोट तो दे दिया, लेकिन उनको जितवा कर भी लोग खुश नहीं हैं - जिसका नतीजा सम्मान कार्यक्रमों में देखने को मिल रहा है । इस वर्ष हो रहे सम्मान कार्यक्रमों में पिछले वर्ष के सम्मान कार्यक्रमों जैसा जोश और उत्सवी माहौल यदि नहीं दिख रहा है, तो इसके लिए अधिकतर लोग दीपक गुप्ता को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं - लोगों का कहना है कि दीपक गुप्ता का रूखा रूखा सा और शिकायती अंदाज वाला रवैया व व्यवहार 'देख' कर लोग जोश के साथ उनके लिए कुछ करने को लेकर उत्साहित नहीं हुए हैं । ऐसी स्थिति में उनकी नसीहतें सुन कर लोग भड़क और जा रहे हैं । चुनावी विजेता के रूप में लोगों के साथ बनने वाला उनका 'हनीमून पीरियड' जितनी तेजी से खत्म होता नजर आ रहा है, उससे डिस्ट्रिक्ट में एक अलग नजारा ही बन रहा है ।

Thursday, February 23, 2017

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ई में जगदीश गुलाटी को सबक सिखाने की कुँवर बीएम सिंह की कोशिश में मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने की अनिल तुलस्यान की तैयारी फजीहत का शिकार होती नजर आ रही है

वाराणसी । अनिल तुलस्यान की मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने की तैयारी शुरू होते ही दम तोड़ती हुई नजर आ रही है, और अनिल तुलस्यान इसके लिए पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर जगदीश गुलाटी तथा फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कुँवर बीएम सिंह को कोसते सुने जा रहे हैं । अनिल तुलस्यान अभी पिछले दिनों ही दो पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के साथ मल्टीपल के कुछेक बड़े नेताओं से उनके घर/शहर जा कर मिले थे, और उन्होंने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने की अपनी मंशा और अपनी रणनीति के बारे में उनसे बात की थी । अनिल तुलस्यान के नजदीकियों के अनुसार, मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद को लेकर अनिल तुलस्यान का रणनीतिक फंडा बड़ा क्लियर है - उनका मानना और कहना है कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने के लिए पाँच फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को 'खरीदना' है, बस ! अनिल तुलस्यान पाँच फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को खरीदने की कीमत देने के लिए तैयार हैं - मल्टीपल की लीडरशिप से वह बस इतनी मदद चाहते हैं कि यह 'खरीद' वह करवाएँ । अनिल तुलस्यान को डर है कि उन्होंने फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की यदि सीधे ही खरीद की, तो कहीं ऐसा न हो कि फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स उनसे पैसे भी ले लें - और फिर उन्हें वोट भी न दें; जैसा कि सहजीव रतन जैन के साथ हुआ था । उल्लेखनीय है कि तीन वर्ष पहले डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू के तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सहजीव रतन जैन ने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन की सीट पक्की करने के लिए तबके फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को महँगे 'गिफ्ट' दिए थे, लेकिन चुनाव के समय गिफ्ट लेने वाले फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स जब उन्हें धोखा देते दिखे - तो सहजीव रतन जैन ने उन सभी से अपने गिफ्ट वापस ले लिए थे । अनिल तुलस्यान का मानना/कहना है कि सहजीव रतन जैन के साथ धोखा इसलिए हुआ, क्योंकि उन्होंने लीडरशिप के नेताओं को 'सौदेबाजी' में शामिल नहीं किया था ।
अनिल तुलस्यान ने सहजीव रतन जैन वाली गलती से बचने के लिए पहले मल्टीपल की लीडरशिप से बात की । लीडरशिप से बात करना उन्हें इसलिए भी जरूरी लगा, क्योंकि लीडरशिप अभी मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए डिस्ट्रिक्ट 321 एफ के गवर्नर योगेश सोनी के समर्थन में 'सुनी' जा रही है । लीडरशिप को उन्हें यह समझाने की जरूरत महसूस हो रही थी कि योगेश सोनी के लिए फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का समर्थन 'जुटाना' मुश्किल होगा - और यह 'काम' तो वही कर सकते हैं । लीडरशिप के साथ उनकी बात यूँ तो उत्साहवर्धक रही, लेकिन एक मामले में उनके लिए समस्या खड़ी हो गई । अनिल तुलस्यान के लिए फजीहत की बात यह रही कि मल्टीपल में हर किसी को यह पता है कि उनके अपने डिस्ट्रिक्ट का फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर उनके साथ नहीं है, इसलिए लीडरशिप ने उनसे कहा कि पहले अपने फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का समर्थन पक्का करो । अनिल तुलस्यान ने मल्टीपल के लोगों को तो यह कहते हुए टरकाया/निपटाया कि उनके फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का समर्थन उन्हें दिलवाने का काम जगदीश गुलाटी करेंगे; उन्होंने मल्टीपल के लोगों को आश्वस्त किया कि जगदीश गुलाटी का कहना कुँवर बीएम सिंह हरगिज नहीं टाल पायेंगे, और इस तरह उन्हें अपने डिस्ट्रिक्ट के फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का समर्थन मिल ही जायेगा ।
कुँवर बीएम सिंह के समर्थन को लेकर अनिल तुलस्यान ने मल्टीपल के लोगों को तो जगदीश गुलाटी का नाम लेकर आश्वस्त कर दिया - किंतु वह खुद कुँवर बीएम सिंह के समर्थन को लेकर आश्वस्त नहीं हो सके हैं । कुँवर बीएम सिंह ने यह कहते हुए उनकी चिंता/परेशानी को और बढ़ा दिया है कि अनिल तुलस्यान ने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की उम्मीदवारी को लेकर पहले कभी कोई बात ही नहीं की, इसलिए उन्होंने दूसरे संभावित उम्मीदवारों से कमिट कर लिया है - जिन्हें अब वह धोखा नहीं दे सकेंगे । अनिल तुलस्यान का कहना है कि यह तर्क कुँवर बीएम सिंह का सिर्फ एक बहाना है; वह उन्हें मल्टीपल के लोगों के बीच नीचा दिखाना चाहते हैं और उन्हें मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन नहीं बनने देना चाहते हैं - इसीलिए वह इस तरह की बहानेबाजी कर रहे हैं । कुँवर बीएम सिंह से भी ज्यादा नाराज अनिल तुलस्यान, जगदीश गुलाटी से हैं । अनिल तुलस्यान का कहना है कि जगदीश गुलाटी उन्हें पहले तो मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित करते रहे और आश्वस्त करते रहे कि कुँवर बीएम सिंह के समर्थन को लेकर चिंता मत करो - उनका समर्थन 'मैं दिलवाऊँगा', किंतु अब जब समय और जरूरत आन पड़ी है, तो वह पीछे हटते नजर आ रहे हैं ।
जगदीश गुलाटी की समस्या दूसरी है - वह तो कुँवर बीएम सिंह को अनिल तुलस्यान के समर्थन के लिए राजी करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, समस्या वास्तव में यह है कि कुँवर बीएम सिंह उनकी बात मान नहीं रहे हैं । इलाहाबाद के प्रमुख लायंस सदस्यों का कहना/बताना है कि डिस्ट्रिक्ट में और मल्टीपल में कुँवर बीएम सिंह को भले ही जगदीश गुलाटी के 'आदमी' के रूप देखा/पहचाना जाता हो, लेकिन कुँवर बीएम सिंह उनसे खुश नहीं हैं । उनकी नाराजगी का कारण यह है कि उन्हें लगता है कि उन्हें सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का उम्मीदवार बनवा कर जगदीश गुलाटी ने अपना राजनीतिक उल्लू सीधा किया था, और उनका मोटा पैसा खर्च करवा दिया था । कुँवर बीएम सिंह को लगता है कि जगदीश गुलाटी की लड़ाई अशोक सिंह से थी, जिसमें जगदीश गुलाटी ने उन्हें मोहरा बनाया और इस्तेमाल किया । इलाहाबाद के प्रमुख लोगों का मानना और कहना है कि कुँवर बीएम सिंह को अनिल तुलस्यान से कोई ज्यादा शिकायत नहीं है; वह तो जगदीश गुलाटी की राजनीति को फेल करने के लिए अनिल तुलस्यान का समर्थन न करने की जिद पर अड़े हुए हैं । कुँवर बीएम सिंह को लगता है कि अनिल तुलस्यान मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद को लेकर कभी भी उत्सुक नहीं थे; जगदीश गुलाटी ने अपनी राजनीति के चक्कर में उन्हें उकसा कर उम्मीदवार बना/बनवा दिया है - और अब जगदीश गुलाटी उन्हें भी 'अपना' आदमी दिखा/जता कर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने की जुगाड़ में हैं । अनिल तुलस्यान को समर्थन न देकर कुँवर बीएम सिंह वास्तव में अनिल तुलस्यान को नहीं - बल्कि जगदीश गुलाटी को सबक सिखाना चाहते हैं ।
जगदीश गुलाटी से निपटने की कुँवर बीएम सिंह की इस कोशिश में अनिल तुलस्यान को लेकिन अपनी फजीहत होती नजर आ रही है ।

Tuesday, February 21, 2017

लायंस इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी मल्टीपल ड्यूज के लिए जेसी वर्मा को तो झाँसा दिए ही हुए हैं, डिस्ट्रिक्ट के एमजेएफ लोगों को भी फूल देकर 'फूल' बनाने की तैयारी कर रहे हैं

देहरादून । एमजेएफ बनने के लिए आवश्यक रकम देने वाले कई लायन सदस्य एमजेएफ प्लेट और पिन न मिलने के कारण इस बात से डरे हुए हैं कि कहीं उनके द्धारा दी गई रकम डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार चौधरी ने अपनी जेब में तो नहीं कर ली है ? पैसे ऐंठने और हड़पने के मामले में शिव कुमार चौधरी ने चूँकि काफी नाम कमाया हुआ है, इसलिए एमजेएफ बनने के लिए रकम देने वाले लोग और ज्यादा डरे हुए हैं । लायंस इंटरनेशनल फाउंडेशन की डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन के एमजेएफ की जो लिस्ट है, उसमें भी चूँकि इस वर्ष किसी का नाम नहीं जुड़ा है - इसलिए भी लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं कि एमजेएफ के लिए दिया गया पैसा आखिर गया कहाँ ? शिव कुमार चौधरी लोगों को लगातार आश्वासन तो देते रहे हैं कि एमजेएफ की आधिकारिक लिस्ट में नाम भी आ जायेगा, और प्लेट व पिन भी मिल जाएगी - लेकिन उनका आश्वासन पूरा होने में ही नहीं आ रहा है । ऐसे में लोगों को अपना हाल लायंस क्लब मसूरी के सतीश अग्रवाल जैसा होता हुआ दिख रहा है - जिनके पैसे लौटाने का शिव कुमार चौधरी आश्वासन तो कई बार दे चुके हैं, लेकिन सतीश अग्रवाल को अपने पैसे मिले नहीं हैं । मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन जेसी वर्मा तक के साथ शिव कुमार चौधरी यही हरकत रहे हैं । जेसी वर्मा मल्टीपल ड्यूज के लिए कई बार तकादा कर चुके हैं, लेकिन शिव कुमार चौधरी के कानों पर जूँ तक नहीं रेंगी है, और उन्होंने मल्टीपल ड्यूज के खाते में एक पैसा तक जमा नहीं कराया है ।
मल्टीपल ड्यूज जमा करने की अंतिम तारीख 15 जनवरी थी । मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन जेसी वर्मा ने कई रिमाइंडर भेजे । उन्होंने यहाँ तक कहा कि मल्टीपल के नरेश अग्रवाल इंटरनेशनल प्रेसीडेंट होने जा रहे हैं, इसलिए मल्टीपल में ऐसी कोई हरकत नहीं होनी चाहिए जिससे मल्टीपल का और नरेश अग्रवाल का नाम खराब हो - इस नाते ड्यूज समय पर जमा होना जरूरी है, लेकिन शिव कुमार चौधरी ने न उनके रिमाइंडर की परवाह की और न मल्टीपल व नरेश अग्रवाल का नाम खराब होने की चिंता की । उल्लेखनीय तथ्य यह है कि मल्टीपल के बाकी सभी डिस्ट्रिक्ट्स ने अपने अपने हिस्से के मल्टीपल ड्यूज की आधे से ज्यादा और कुछेक डिस्ट्रिक्ट्स ने तो पूरी रकम जमा करा दी है, लेकिन डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन ने मल्टीपल ड्यूज के खाते में इकन्नी भी जमा नहीं करवाई है । प्राकृतिक आपदा का शिकार हुए लोगों की मदद के लिए लायंस इंटरनेशनल से मिली इमरजेंसी ग्रांट को लेकर शिव कुमार चौधरी ने कैसी घपलेबाजी की है, यह बात अब जगजाहिर है ।
इन्हीं बातों/तथ्यों के आलोक में एमजेएफ बनने के लिए पैसा देने वालों को डर हुआ है कि गरीबों और पीड़ितों की मदद के लिए दिया गया उनका पैसा कहीं शिव कुमार चौधरी ही तो नहीं हड़प जायेंगे ? एमजेएफ बनने के लिए पैसा देने वाले लायन सदस्यों का कहना है कि शिव कुमार चौधरी ने उनसे 900 डॉलर के बराबर रुपये यह बताते हुए लिए हैं कि बाकी के सौ डॉलर फाउंडेशन के लिए इकट्ठा हुए पैसों से दिए जायेंगे । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में पिछले कुछेक वर्षों से एमजेएफ बनने/बनाने को लेकर यही व्यवस्था चली आ रही है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में शिव कुमार चौधरी ने इसी व्यवस्था को अपनाने की कोई सार्वजनिक घोषणा तो नहीं की है, लेकिन व्यक्तिगत रूप से एमजेएफ बनने वालों को उन्होंने यही व्यवस्था बताई है, और इसी के अनुसार पैसे लिए हैं । लोगों से लिए गए पैसे लेकिन उन्होंने अभी तक लायंस इंटरनेशनल फाउंडेशन को नहीं भेजे हैं, इसी से लोगों को डर लगा है कि उनके पैसे आखिर गए कहाँ ? एमजेएफ के पैसे लेने/देने की प्रक्रिया से परिचित जानकारों का कहना है कि लायंस इंटरनेशनल फाउंडेशन को पैसे मिलते ही आठ/दस दिन में पैसे देने वाले का नाम एमजेएफ लिस्ट में दर्ज हो जाता है, और तुरंत ही एमजेएफ की प्लेट व पिन रिलीज हो जाती है । इस आधार पर एमजेएफ बनने के लिए पैसे दे चुके लोगों का नाम लिस्ट में आ जाने के साथ साथ उनके नाम की प्लेट व पिन आ जाना चाहिए थी, लेकिन लोगों को सिर्फ शिव कुमार चौधरी का आश्वासन मिल रहा है ।
शिव कुमार चौधरी का आश्वासन इसलिए भी डरा रहा है, क्योंकि वह लायंस इंटरनेशनल फाउंडेशन के लिए प्रत्येक सदस्य से कम से कम दो डॉलर के अपेक्षित दान को जबरन बसूलने की कोशिश कर रहे हैं । उल्लेखनीय है कि लायंस इंटरनेशनल फाउंडेशन लायन सदस्यों से अनुरोध करता है कि वह कम से कम दो डॉलर तो फाउंडेशन के लिए दान करें ही । जाहिर है कि यह अनुरोध है, जिसे मानने और पूरा करने के लिए सदस्यों पर बाध्यता नहीं है । लेकिन शिव कुमार चौधरी ने इसे जरूरी बना दिया है । उन्होंने कहा है कि जो क्लब्स दो डॉलर प्रति सदस्य के हिसाब से लायंस इंटरनेशनल फाउंडेशन के लिए पैसे नहीं देंगे, वह उन क्लब्स को नो-ड्यूज सर्टीफिकेट नहीं देंगे । उनकी इस कार्रवाई को लायंस इंटरनेशनल फाउंडेशन के पैसों में हेराफेरी करने की तिकड़म के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । आरोप है कि इसीलिए वह एमजेएफ के लिए मिली रकम को दबा कर बैठे हैं । कहा जा रहा है कि प्रत्येक सदस्य से दो दो डॉलर लेकर इकट्ठा हुई रकम से वह एमजेएफ के लिए पैसा देने वालों को एमजेएफ बनवा देंगे, और उनसे मिली हुई रकम को अपनी जेब में कर लेंगे । यह 'खेल' और इस खेल का 'हिसाब-किताब' चूँकि बाद में ही हो पायेगा, इसलिए एमजेएफ बनने के लिए मिली रकम को उन्होंने अभी लायंस इंटरनेशनल फाउंडेशन को नहीं भेजा है ।
एमजेएफ बनने के लिए पैसा देने वाले लोग ज्यादा परेशान न हों और शोर न करें - इसके लिए शिव कुमार चौधरी ने उनका सम्मान करने का एक कार्यक्रम करने की बात शुरू की है - जिसमें गेंदे के फूलों की माला पहना कर वह एमजेएफ बनने के लिए पैसा देने वालों को 'फूल' बनाने का काम करेंगे ।