Saturday, November 14, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के प्रेसीडेंट मनोज फडनिस को लिखे विजय गुप्ता के पत्र से 'भेद' खुला कि फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग के काम में घपला करने वाले लोगों को संरक्षण तो पंकज त्यागी व अतुल गुप्ता ने दिया और निशाना बने विजय गुप्ता

फरीदाबाद/नई दिल्ली । फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग के घपले की जाँच कराये जाने की माँग करते हुए विजय गुप्ता ने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट मनोज फडनिस को जो पत्र लिखा है, उसने पंकज त्यागी तथा अतुल गुप्ता को बुरी तरह बेचैन कर दिया है । विजय गुप्ता के उक्त पत्र को सरसरी तौर पर पढ़ने वालों को तो उक्त पत्र के पीछे विजय गुप्ता की अपने को बचाने व पाक-साफ दिखाने की कोशिश नजर आती है; लेकिन पंकज त्यागी तथा अतुल गुप्ता ने पत्र की बिटविन-द-लाइंस को पढ़ा है, और यह समझने में देर नहीं की है कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को लिखे इस पत्र के जरिए विजय गुप्ता ने दरअसल उन्हें निशाने पर लेने का प्रयास किया है । मजे की बात यही है कि विजय गुप्ता ने अपने पत्र में इनका कहीं कोई जिक्र नहीं किया है, लेकिन फिर भी विजय गुप्ता के उक्त पत्र के सार्वजनिक होने के बाद से इन दोनों के होश उड़े हुए हैं । अपने पत्र में विजय गुप्ता ने इस तथ्य को खास तौर से रेखांकित करके बाजी पलटने तथा पंकज त्यागी व अतुल गुप्ता को निशाने पर लाने की जमीन तैयार की है कि 2010 से 2012 के बीच जब ब्रांच बिल्डिंग का काम हुआ था, तब वह न तो काउंसिल के सदस्य थे और न ही किसी अन्य रूप में ब्रांच में संबद्ध थे - यानि बिल्डिंग के काम से उनका किसी भी तरह का कोई लेना-देना नहीं था । इस तथ्य के जरिए विजय गुप्ता दरअसल फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग के घपले में दिलचस्पी लेने वाले लोगों के बीच इस सवाल को उकसाने की कोशिश करते नजर आते हैं कि वर्ष 2010 से 2012 के बीच हुए ब्रांच बिल्डिंग के काम को इंस्टीट्यूट की तरफ से कौन सुपरवाइज कर रहा था ? इस सवाल में ही पंकज त्यागी और अतुल गुप्ता के लिए फजीहत के मौके छिपे हैं । फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग के घपले में दिलचस्पी लेने तथा सवाल उठाने वाले लोगों में से किसी ने भी अभी तक इस सवाल पर चूँकि गौर नहीं किया था, इसलिए पंकज त्यागी व अतुल गुप्ता इस मामले में मजे ले रहे थे और फरीदाबाद में विजय गुप्ता की मुसीबत के बीच वह अपनी अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने व बढ़ाने के काम में लगे थे । 
विजय गुप्ता के मनोज फडनिस को लिखे पत्र ने लेकिन उनके मजे को अब किरकिरा कर दिया है । विजय गुप्ता तो अपने पत्र के जरिए सवाल उकसा कर किनारे हो गए, सवाल का जबाव दूसरों ने प्राप्त कर लिया और पाया/जाना कि उस दौरान हुए ब्रांच बिल्डिंग के काम को इंस्टीट्यूट की तरफ से सुपरवाइज करने की जिम्मेदारी पंकज त्यागी को सौंपी गई थी, और उस दौरान पंकज त्यागी बिल्डिंग कमेटी के चेयरमैन थे । ऐसे में, उस दौरान हुए घपले की जिम्मेदारी और जबावदेही क्या पंकज त्यागी की नहीं बनती है ? मजे की और पंकज त्यागी के लिए खुशकिस्मती की बात यह रही कि फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग में घपले को लेकर आरोपों-प्रत्यारोपों के मोटे तौर पर जो दो खेमे बने नजर आये, उनमें से किसी ने भी घपले में पंकज त्यागी की भूमिका को लेकर सवाल नहीं उठाया । ब्रांच बिल्डिंग में घपले को लेकर जो लोग विजय गुप्ता को घेरने की कोशिशों में जुटे, उन्होंने तो पंकज त्यागी की भूमिका पर गौर नहीं ही किया और पंकज त्यागी के 'अपराध' भी विजय गुप्ता के सिर मढ़ दिए; मजे की तथा हैरान करने की बात लेकिन यह रही कि विजय गुप्ता और उनके समर्थकों की तरफ से भी जो सफाईयाँ आईं, उनमें भी इस तथ्य का कोई जिक्र नहीं हुआ । पर अब जब इस मामले में बात काफी आगे बढ़ गई है, तब इस मामले की अभी तक ढकी/छिपी परतें खुलने लगीं हैं और इस प्रक्रिया में पंकज त्यागी की भूमिका सवालों के घेरे में आ गई है । फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग का ऑडिट करने के लिए इंस्टीट्यूट द्वारा नियुक्त की गई एलसी कैलाश एंड कंपनी ने जिन वित्तीय अनियमितताओं को रेखांकित किया है, उसके लिए बिल्डिंग कमेटी के चेयरमैन के नाते पंकज त्यागी भी जिम्मेदार और जबावदेह हैं । इस तथ्य के खुल जाने से पंकज त्यागी के लिए समस्या और मुसीबत की बात यह हो गई है कि उनके जिस 'अपराध' के लिए अभी तक विजय गुप्ता को 'पीटा' जा रहा था, उसके लिए अब उन्हें लपेटे में लिया जायेगा । 
फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग के घपले से जुड़ी यह परत खुली है तो इसके पीछे की राजनीति की परतें भी खुलने लगी हैं । उल्लेखनीय है कि वर्ष 2010 से 2012 के बीच फरीदाबाद ब्रांच पर प्रमोद माहेश्वरी, एमएस लड्ढा, संजय चांडक, संतोष गुप्ता ग्रुप का कब्जा था - जो ब्रांच के पदाधिकारियों का चुनाव करने से लेकर ब्रांच में क्या/कैसे होगा तक के फैसले कर रहे थे । वर्ष 2009 के चुनाव में इस ग्रुप ने पंकज त्यागी का समर्थन किया था । उस चुनाव में पंकज त्यागी जीत गए थे, और विजय गुप्ता हार गए थे । इसका नतीजा यह रहा कि वर्ष 2010 से 2012 के बीच फरीदाबाद ब्रांच में इस ग्रुप का कब्जा पूरी तरह रहा, और इन्होंने विजय गुप्ता के नजदीकियों व समर्थकों को पीछे धकेले रखा । पंकज त्यागी ने ब्रांच बिल्डिंग कमेटी के चेयरमैन पद की जिम्मेदारी लेकर इस ग्रुप के साथ अपनी मिलीभगत का रिश्ता और मजबूत कर लिया; ब्रांच बिल्डिंग के घपले की बंदरबाँट में मिलीभगत का यह रिश्ता भी सवालों के घेरे में है । वर्ष 2010 से 2012 के बीच फरीदाबाद ब्रांच की बिल्डिंग का निर्माण हो गया, उसमें घपला हो गया और उसकी बंदरबाँट भी हो गयी - लेकिन इस ग्रुप के साथ बदकिस्मती यह हुई कि 2012 के चुनाव में इनके समर्थन के बावजूद पंकज त्यागी चुनाव हार गए और विजय गुप्ता चुनाव जीत गए । इनकी बदकिस्मती ने इनका और पीछा किया, जिसका नतीजा यह हुआ कि वर्ष 2013 में ब्रांच बिल्डिंग में हुए घपले की पोल खुल गई । ऐसे में, घपले के लिए जिम्मेदार लोगों को इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में एक मददगार की जरूरत महसूस हुई । यह जरूरत इन्हें अतुल गुप्ता के पास ले गई । अतुल गुप्ता को फरीदाबाद में अपनी राजनीतिक जमीन बढ़ाने की जरूरत थी ही, लिहाजा वह इनके साथ तालमेल बनाने के लिए तुरंत तैयार हो गए ।
मजे की बात यह रही कि फरीदाबाद बिल्डिंग के घपलों के लिए जिम्मेदार लोगों को अतुल गुप्ता से जिस मदद की दरकार थी, उनकी वह मदद विजय गुप्ता ने ही कर दी । घपले के जिम्मेदार लोगों पर इंस्टीट्यूट की जो तलवार गिर सकती थी, उसे विजय गुप्ता ने ही गिरने से रोक लिया । कुछेक लोगों को लगता है कि विजय गुप्ता ने ऐसा होशियारी के चलते किया, जो अंततः उनकी बेवकूफी साबित हुआ; अन्य कुछेक लोगों का मानना/कहना लेकिन यह है कि विजय गुप्ता ने जो किया वह उनका बेवकूफीभरा फैसला ही था और वह अंततः वही साबित भी हुआ । फरीदाबाद की राजनीति को नजदीक से देखने/समझने वाले लोगों का मानना/कहना है कि विजय गुप्ता दूसरों के 'अपराधों' के लिए जिम्मेदार ठहराए जाने की राजनीति के चलते आज जिस मुसीबत में फँसे हुए हैं, वह अपनी खुद की करनी से ही फँसे हैं । दिलचस्प नजारा यह है कि वर्ष 2010 से 2012 के बीच ब्रांच बिल्डिंग के काम में घपला करने वाले लोगों को संरक्षण तो पंकज त्यागी व अतुल गुप्ता दे रहे हैं, और आरोपों व सवालों का सामना विजय गुप्ता को करना पड़ रहा है । यह परिदृश्य देख कर विजय गुप्ता के विरोधियों को भी यह कहने के लिए मजबूर होना पड़ा है कि राजनीतिक चतुराई के मामले में विजय गुप्ता के विरोधी उन पर भारी पड़े हैं; और विजय गुप्ता अपनी राजनीतिक अपरिपक्वता की कीमत चुका रहे हैं । पर अब लगता है कि जैसे विजय गुप्ता के सितारे जाग रहे हैं । दरअसल उनके तमाम विरोधी जो अभी तक एकजुट थे, अब बिखरते दिख रहे हैं - और उनके बिखरने में ही विजय गुप्ता को अपने लिए उम्मीद की किरण नजर आ रही है । 
फरीदाबाद की राजनीति में विजय गुप्ता विरोधी जो लोग पहले पंकज त्यागी के साथ थे और फिर अतुल गुप्ता के साथ आ गए थे, उनमें से कुछ को पंकज त्यागी पुनः अपने साथ जोड़ने में सफल हुए हैं । इनमें कुछेक लोग राजेश शर्मा की वकालत करते हुए भी सुने/देखे गए हैं । इस तरह, फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग के घपले से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े लोग अतुल गुप्ता, पंकज त्यागी व राजेश शर्मा के साथ खड़े दिख रहे हैं - जो अभी तक तो विजय गुप्ता को ही निशाने पर लिए हुए थे; लेकिन जो अब एक-दूसरे को भी गिराने के प्रयत्नों में भी लग गए हैं । मनोज फडनिस को विजय गुप्ता द्वारा लिखे गए पत्र ने उनके विरोधियों के बीच जो खलबली मचाई है, उससे उनके बीच के अंतर्विरोध और तल्ख होने लगे हैं; तथा उन्होंने अपनी अपनी खाल बचाने के उद्देश्य से विजय गुप्ता को भूल/छोड़ कर एक दूसरे को निशाना बनाना शुरू कर दिया है । इससे विजय गुप्ता के लिए राहत की स्थिति बनी है; लेकिन देखने की बात यह होगी कि इस स्थिति का वह कोई फायदा सचमुच में उठा पाते हैं या नहीं ? फरीदाबाद में ब्रांच बिल्डिंग के घपले की आड़ को लेकर विजय गुप्ता, पंकज त्यागी, अतुल गुप्ता, राजेश शर्मा के बीच जो राजनीति हो रही है - उसमें नवीन गुप्ता और संजय अग्रवाल के लिए मजे की स्थिति बनी हुई है । फरीदाबाद में इन दोनों का जो समर्थन-आधार है, वह चूँकि इस झमेले से अलग है - इसलिए इन्हें इस झमेले से नुकसान तो कुछ होना नहीं है; इस झमेले के कारण जो नए समीकरण बनेंगे उनमें फायदा बनाने का मौका उन्हें जरूर मिल सकता है । विजय गुप्ता के मनोज फडनिस को लिखे पत्र से इसीलिए पंकज त्यागी व अतुल गुप्ता के सामने समस्या आ खड़ी हुई है ।

Friday, November 13, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में निर्मल सोनी की बुरी और निराशाजनक स्थिति देख सत्यनारायण माहेश्वरी उनके समर्थन से पीछे हटे, तो देवेंद्र सोमानी का पलड़ा और भारी हुआ

उदयपुर । सत्यनारायण माहेश्वरी और उनके समर्थकों ने निर्मल सोनी से जिस तरह बचना शुरू कर दिया है, उसके चलते सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत निर्मल सोनी की उम्मीदवारी के लिए संकट और बढ़ गया है । उल्लेखनीय है कि सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार के रूप में सत्यनारायण माहेश्वरी जब तक निर्मल सोनी की उम्मीदवारी का समर्थन करते दिख रहे थे, तब तक निर्मल सोनी को चुनावी मुकाबले में बने रहने की उम्मीद थी; लेकिन अब जब सत्यनारायण माहेश्वरी ने उनकी उम्मीदवारी के समर्थक के रूप में दिखने से बचना शुरू कर दिया है, तो निर्मल सोनी के लिए दो तरफा मुसीबत खड़ी हो गई है और उनकी उम्मीदवारी को मिल सकने वाले समर्थन का ग्राफ तेजी से गिर गया है । निर्मल सोनी के लिए एक तरफ तो मुसीबत यह हुई कि सत्यनारायण माहेश्वरी के समर्थकों का समर्थन मिलने की संभावना धूमिल पड़ी, और दूसरी मुसीबत यह हुई कि सत्यनारायण माहेश्वरी के पीछे हटने से लोगों के बीच उनकी उम्मीदवारी की कमजोरी का लोगों के बीच संदेश गया । इस दूसरी मुसीबत ने रीजनल काउंसिल उम्मीदवार के रूप में निर्मल सोनी के लिए संकट ज्यादा बढ़ा दिया है । 
सत्यनारायण माहेश्वरी के नजदीकियों के अनुसार, उन्हें शुरू में दरअसल यह लगा कि रीजन में निर्मल सोनी का अच्छा समर्थन-आधार है और इसलिए उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने में उनका भी फायदा है । लेकिन जल्दी ही उन्हें समझ में आ गया कि रीजनल काउंसिल उम्मीदवार के रूप में उदयपुर में भी और राजस्थान की अन्य ब्रांचेज में भी निर्मल सोनी की बजाए देवेंद्र सोमानी का पलड़ा भारी है; और तब उन्हें निर्मल सोनी की उम्मीदवारी के साथ बने रहने तथा 'दिखने' में अपना नुकसान नजर आया । इसके चलते सत्यनारायण माहेश्वरी ने निर्मल सोनी की उम्मीदवारी के समर्थन से पीछा छुड़ा लेने में अपनी भलाई देखी/पहचानी । सत्यनारायण माहेश्वरी के नजदीकियों का कहना है कि पिछले चुनाव में निर्मल सोनी हालाँकि चुनाव जीत नहीं सके थे, किंतु उनकी स्थिति चूँकि बहुत बुरी नहीं थी - इसलिए हमें लगा कि निर्मल सोनी ने पिछली बार की अपनी स्थिति में सुधार ही किया होगा और ऐसे में उनके साथ रहने में हमें लाभ ही होगा; किंतु हमने लोगों के बीच आना-जाना शुरू किया तो पता चला कि इस बार देवेंद्र सोमानी ने उनका सारा खेल ही बिगाड़ा हुआ है, और रीजनल काउंसिल उम्मीदवार के रूप में निर्मल सोनी के लिए इस बार बहुत ही बुरी स्थिति है । 
सत्यनारायण माहेश्वरी की तरफ से मिले इस झटके से निर्मल सोनी के समर्थकों के बीच भारी सन्नाटा खिंचा है । हालाँकि उनकी तरफ से यह दिखाने/जताने के प्रयास भी हो रहे हैं कि सत्यनारायण माहेश्वरी के इस बदले रवैये से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा है । निर्मल सोनी के समर्थकों का कहना/पूछना है कि सत्यनारायण माहेश्वरी अपने स्वार्थ में उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करने को तैयार हुए थे, इसलिए अब समर्थन से पीछे हटने के उनके फैसले से निर्मल सोनी की स्थिति पर भला क्या असर पड़ेगा । निर्मल सोनी लोगों को फोन कर कर के बता रहे हैं कि इस बार मैं आपको जीत के दिखाऊँगा । निर्मल सोनी के बारे में लोगों के बीच यह प्रचार दरअसल जोर पकड़ गया है कि वह दो बार उदयपुर ब्रांच का चुनाव लड़े हैं तथा दोनों बार हारे हैं, और पिछली बार रीजनल काउंसिल का चुनाव भी वह नहीं जीत सके - इसलिए लगता है कि चुनाव जीतना या तो उनकी किस्मत में नहीं है; और या चुनाव जीतने के लिए जिस तरह के हुनर की जरूरत होती है, वह हुनर उनमें नहीं है ।
इस बार, रीजनल काउंसिल के चुनाव में उदयपुर से ही देवेंद्र सोमानी द्वारा प्रस्तुत की गई उम्मीदवारी ने निर्मल सोनी की उम्मीदवारी के लिए शुरू में ही संकट खड़ा कर दिया था । लोगों को लगा कि पिछली बार निर्मल सोनी जब उदयपुर से अकेले उम्मीदवार थे, तब चुनाव नहीं जीत सके - तो इस बार उदयपुर से देवेंद्र सोमानी के भी उम्मीदवार हो जाने से तो उनके लिए और भी मुसीबत हो गई है । चुनाव अभियान आगे बढ़ा तो देवेंद्र सोमानी को उदयपुर में भी और राजस्थान की अधिकतर ब्रांचेज के साथ साथ रीजन के दूसरे क्षेत्रों में भी अच्छा समर्थन मिलता दिखा । निर्मल सोनी की तुलना में देवेंद्र सोमानी का चुनाव अभियान भी लोगों ने ज्यादा व्यापक, सक्रियताभरा और संगठित पाया; जिसके कारण उनके समर्थन-आधार में तेजी से वृद्धि हुई । देवेंद्र सोमानी के समर्थन-आधार में वृद्धि हुई, तो नतीजे के रूप में निर्मल सोनी का समर्थन-आधार घटा । जो कोई भी निर्मल सोनी से यह बात कहता, निर्मल सोनी उसे देवेंद्र सोमानी का 'आदमी' घोषित कर देते । लेकिन अब जब उम्मीदवार के रूप में निर्मल सोनी की बुरी और निराशाजनक स्थिति देख कर सत्यनारायण माहेश्वरी ने भी उनके समर्थन से हाथ खींच लिए हैं, तो निर्मल सोनी के लिए अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में लोगों के बीच कोई तर्क देना खासा मुश्किल हो गया है । अब सत्यनारायण माहेश्वरी को तो वह देवेंद्र सोमानी का 'आदमी' घोषित नहीं कर सकते न ! 

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की चुनावी लड़ाई में रोहित रुवाटिया अग्रवाल की आक्रामक व प्रभावी सक्रियता से गौतम शर्मा को रीजन में सबसे ज्यादा वोट पाने की अपनी योजना में पलीता लगता दिख रहा है

जयपुर । रोहित रुवाटिया अग्रवाल ने सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु जिस तरह की सक्रियता दिखाई हुई है, उसके चलते गौतम शर्मा के लिए रीजनल काउंसिल में सबसे ज्यादा वोट पाने का लक्ष्य दूर जाता नजर आ रहा है । उल्लेखनीय है कि उम्मीदवार के रूप में गौतम शर्मा ने चुनाव में अपनी अच्छी पकड़ प्रदर्शित की है, और राजस्थान के उम्मीदवारों में उन्हें सबसे आगे देखा/पहचाना जा रहा है । उनके इस प्रदर्शन को देखते हुए उनके कुछेक समर्थक दावा करने लगे कि गौतम शर्मा राजस्थान में ही नहीं, बल्कि पूरे रीजन में सबसे ज्यादा वोट पायेंगे और रीजन में सबसे आगे रहेंगे ।
रीजन में सबसे आगे रहने वाले उम्मीदवार के रूप में हालाँकि अभी तक भोपाल के अभय छाजेड़ को देखा/पहचाना जा रहा है । अभय छाजेड़ अकेले उम्मीदवार हैं, जो सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की मौजूदा टर्म में सदस्य होते हुए अगली टर्म के लिए चुनावी मैदान में हैं । इस नाते, इस बार के चुनावी खेल में अभय छाजेड़ को न सिर्फ सबसे सुरक्षित उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता रहा है, बल्कि नंबर एक की पोजीशन पर भी माना जाता रहा है । लेकिन जैसे जैसे चुनाव अभियान ने गर्मी पकड़ी, वैसे वैसे गौतम शर्मा के भी 'भाव' बढ़े और नंबर एक की पोजीशन के लिए उन्हें भी दावेदार के रूप में देखा/पहचाना जाने लगा । जयपुर में उनके समर्थकों की तरफ से सुनाई देने लगा कि काउंसिल में सदस्य होने के नाते रीजन में अभय छाजेड़ की पहचान का दायरा भले ही बड़ा हो, लेकिन गौतम शर्मा ने अपने चुनावी प्रबंधन को जिस तरह से मैनेज किया है और खास तौर से जयपुर व राजस्थान में अपने लिए समर्थन जुटाया है, उसके चलते रीजनल काउंसिल के चुनाव में उनके लिए वोट प्राप्त करने के मामले में अभय छाजेड़ से आगे निकलना मुश्किल नहीं होगा । 
किंतु जयपुर में गौतम शर्मा के जो समर्थक अभी कल तक यह दावा करते हुए सुने जा रहे थे, उन्हीं में से कुछेक समर्थक अब यह आशंका व्यक्त करने लगे हैं कि रोहित रुवाटिया के कारण गौतम शर्मा का रीजन में सबसे ज्यादा वोट पाने का लक्ष्य खतरे में पड़ सकता है । गौतम शर्मा के ही समर्थकों का कहना है कि राजस्थान की विभिन्न ब्रांचेज के लोगों से उन्हें जो फीडबैक मिल रहा है, उसमें यह बात कॉमन रूप से सामने आ रही है कि रोहित रुवाटिया अग्रवाल ने राजस्थान की अधिकतर ब्रांचेज में अपने लिए समर्थन पैदा किया है । इसे उनके आक्रामक व प्रभावी तरीके से चलाए जा रहे प्रचार/संपर्क अभियान के नतीजे के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । हालाँकि कुछेक लोगों का यह भी मानना/कहना है कि रोहित रुवाटिया अग्रवाल ने अपने आक्रामक व प्रभावी तरीके से चलाए गए प्रचार/संपर्क अभियान से लोगों के बीच अपने आप को परिचित तो कराया है, किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि इस परिचय से उन्हें वोट भी मिलेंगे ही । तकनीकी रूप से यह बात सच तो है, लेकिन यह एक ऐसा सच है जो प्रत्येक उम्मीदवार पर लागू होता है । उम्मीदवार अपने प्रचार/संपर्क अभियान से लोगों के बीच अपने आप को परिचित कराता है, और कोई नहीं सकता कि इस परिचय के चलते उसे वोट सचमुच में कितने मिलेंगे । यह बात रोहित रुवाटिया अग्रवाल के बारे में भी सच है, तो गौतम शर्मा के बारे में भी सच है, और अन्य दूसरे उम्मीदवार भी इस सच के दायरे में हैं । 
गौतम शर्मा के समर्थकों को डर दरअसल यह जान/देख कर हुआ कि प्रचार/संपर्क अभियान में रोहित रुवाटिया अग्रवाल का पलड़ा सबसे भारी है; हालाँकि कुछेक लोग उनकी बातों और उनके दावों को लेकर उनके मैच्योरिटी लेबल के बारे में सवाल जरूर उठा रहे हैं - लेकिन इससे उनकी चुनावी संभावना पर कोई प्रतिकूल असर पड़ता नहीं दिख रहा है । रोहित रुवाटिया अग्रवाल ने युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच जिस तरह का परिचय बनाया है, उसके कारण तो गौतम शर्मा के लिए अपना लक्ष्य पाना मुश्किल बना ही है; अग्रवाल वोटों के मामले में भी रोहित रुवाटिया अग्रवाल उनकी योजना को लंगड़ी लगाते दिख रहे हैं । अग्रवाल समाज में प्रभाव रखने वाले एक बड़े नेता ओपी अग्रवाल का समर्थन जुटा कर गौतम शर्मा ने अग्रवालों का वोट जुटाने का जो जुगाड़ किया था, रोहित रुवाटिया अग्रवाल ने अपनी सक्रियता से उनके उस जुगाड़ में भारी सेंध लगा दी है । हर उम्मीदवार का अपना अपना समर्थन आधार होता है, और हर समर्थन-आधार में एक से अधिक उम्मीदवारों को खपाने की क्षमता भी होती है; इसलिए रोहित रुवाटिया अग्रवाल की सक्रियता गौतम शर्मा को कोई सीधी चुनौती नहीं देती है - लेकिन खुद गौतम शर्मा के समर्थकों का ही कहना है कि रोहित रुवाटिया अग्रवाल की आक्रामक व प्रभावी सक्रियता रीजन में सबसे ज्यादा वोट पाने की गौतम शर्मा की योजना में पलीता जरूर लगाती दिख रही है ।

Thursday, November 12, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के उम्मीदवार रतन सिंह यादव अपने चुनाव अभियान में किए गए झूठे दावे के 'पकड़े जाने' के कारण मुसीबत में फँसे

नई दिल्ली । रतन सिंह यादव अपने एक घनघोर किस्म के समर्थक जयदीप सिंह गुसाईं के कारण भारी फजीहत का शिकार हो गए हैं - जिसके चलते उन्हें और उनके समर्थकों को लोगों के बीच से भागना/छिपना पड़ रहा है । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के उम्मीदवार रतन सिंह यादव तथा उनके घनघोर समर्थक जयदीप सिंह गुसाईं दरअसल उस 'सोच' के शिकार हो गए जिसमें चुनावी जोश में उम्मीदवार और उनके समर्थक लंबी-लंबी फेंकने लगते हैं - वह समझते हैं कि लोग मूर्ख हैं और कुछ जानते/समझते नहीं हैं; तथा उन्हें अपनी झूठी बातों से उल्लू बनाया जा सकता है । उल्लेखनीय है कि इसी सोच के चलते जयदीप सिंह गुसाईं ने ऊँची ऊँची बातों से रतन सिंह यादव की तारीफों के पुल बाँधते हुए दावा किया कि रतन सिंह यादव इंस्टीट्यूट की 'कई' कमेटियों में रहे हैं । उनके इस दावे पर सवाल उठे और उनसे पूछा गया कि रतन सिंह यादव इंस्टीट्यूट की कौन कौन सी कमेटियों में कब कब रहे ? यह सीधा सा और आसान सा सवाल सुनकर जयदीप सिंह गुसाईं के होश उड़ गए । इस सवाल की उन्हें उम्मीद ही नहीं थी । उन्होंने तो सोचा यह था कि वह जो कुछ भी अंटशंट बकेंगे, लोग उसे चुपचाप सुन लेंगे और मान लेंगे । उनकी बदकिस्मती से किंतु ऐसा नहीं हुआ । उनके दावे के झूठ को लोगों ने तुरंत 'पकड़' लिया । 
जयदीप सिंह गुसाईं ने हालाँकि शुरू में साहस दिखाया और वह सवाल का सामना करते हुए दिखे भी - उन्होंने घोषणा की कि वह दो-तीन दिन में इंस्टीट्यूट की उन कमेटियों के नाम बतायेंगे, जिनमें रतन सिंह यादव रहे हैं । यह घोषणा करते हुए वह फिर लोगों को मूर्ख समझने वाली सोच का शिकार हुए । दरअसल उन्होंने सोचा कि दो-तीन में लोग बात भूल जायेंगे और उनका झूठ बेनकाब होने से बच जायेगा । उनकी बदकिस्मती लेकिन उनके पीछे पीछे चल रही थी । लोग बात को भूले ही नहीं, और सवाल दोहराते रहे । बात बढ़ती देख रतन सिंह यादव ने खुद मोर्चा सँभाला, लेकिन सँभालने की बजाये उन्होंने बात को और बिगाड़ दिया । बात को रफा-दफा करने के उद्देश्य से रतन सिंह यादव ने कहा कि अभी मैं चुनाव अभियान में व्यस्त हूँ, चुनाव पूरा होने पर मैं उन कमेटियों के नाम बतायूँगा जिनमें मैं रहा हूँ । रतन सिंह यादव से यह सुनकर मामला और भड़क गया । लोगों ने रतन सिंह यादव और जयदीप सिंह गुसाईं को बुरी तरह हड़काया कि लोगों को मूर्ख समझते हो तथा झूठे दावे करते हो । लोगों की नाराजगी और अपनी फजीहत देख कर जयदीप सिंह गुसाईं ने सोशल साइट पर से उक्त दावा करने वाली अपनी पोस्ट को हटा लिया । अपने दावे से भागने/छिपने की उनकी इस कार्रवाई से लोगों के बीच नाराजगी और बढ़ी । लोगों का कहना है कि जयदीप सिंह गुसाईं और रतन सिंह यादव को या तो इंस्टीट्यूट की उन 'कई' कमेटियों के नाम बताने चाहिये जिनमें रतन सिंह यादव के होने/रहने के दावे किए गए, अन्यथा अपनी इस हरकत के लिए चार्टर्ड एकाउंटेंट्स से माफी माँगनी चाहिए तथा वायदा करना चाहिए कि अपनी उम्मीदवारी के प्रचार अभियान में वह कोई झूठा दावा नहीं करेंगे । रतन सिंह यादव और जयदीप सिंह गुसाईं अभी तक इन दोनों में से कोई भी काम नहीं कर सके हैं, तथा छिप-छिपाकर यह उम्मीद बनाये हुए हैं कि जल्दी ही यह बबाल अपने आप थम जायेगा । 
जयदीप सिंह गुसाईं के जोशो-खरोश ने रतन सिंह यादव को जैसा फँसाया है, उसने लोगों को सुधीर कत्याल द्वारा हरित अग्रवाल को फँसाए जाने का मामला याद दिला दिया है । सुधीर कत्याल ने जीएमसीएस के मुद्दे को लेकर बेबकूफ़ाना तरीके से बड़ी उछल-कूद मचाई थी । उन्होंने इस बात पर गौर ही नहीं किया कि उनकी इस उछल-कूद से उनके ही उम्मीदवार हरित अग्रवाल का ही बंटाधार हो रहा है । हरित अग्रवाल ने जब उनके कान उमेंठे, तब जीएमसीएस के मुद्दे को उन्होंने छोड़ा । सुधीर कत्याल जैसे समर्थक की बेबकूफ़ाना हरकत से हरित अग्रवाल का जितना जो नुकसान हुआ, वह तो एक अलग बात है; अब लेकिन यह दिलचस्प नजारा देखने को मिल रहा है कि सुधीर कत्याल जैसे 'महान नेता' की महानता अब सिर्फ गेट-टु-गेदर की सूचना देने लायक ही बची रह गई है । 
पहले हरित अग्रवाल और अब रतन सिंह यादव अपने अपने घनघोर समर्थक के बेबकूफ़ाना जोश-खरोश के कारण जिस फजीहत का शिकार बने हैं, उसे देख कर दूसरे उम्मीदवारों को अपने अपने समर्थकों पर निगाह रखने की जरूरत महसूस हुई है । हरित अग्रवाल और रतन सिंह यादव की हालत देख कर लगता है कि जोशीले समर्थक मदद कम करते हैं, मुसीबत ज्यादा पैदा करते हैं ।

Tuesday, November 10, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई की तरफ से राजीव सिंघल से मिले आश्वासन के भरोसे ही सुनील गुप्ता ने मंजु गुप्ता की उम्मीदवारी की बलि लेकर 'लक्ष्मी जी' की व्यवस्था करके अपनी दीवाली तो अच्छे से मनाने का इंतजाम कर लिया है

मेरठ । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील गुप्ता ने अपनी दीवाली अच्छे से मनाने की व्यवस्था कर ली है । उनके नजदीकियों का ही कहना/बताना है कि राजीव सिंघल की तरफ से 'लक्ष्मी जी' का इंतजाम करने के उद्देश्य से ही सुनील गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के लिए प्रस्तुत मंजु गुप्ता के आवेदन को निरस्त कर दिया है । उल्लेखनीय है कि राजीव सिंघल और उनके समर्थक पहले से ही मंजु गुप्ता की उम्मीदवारी को प्रस्तुत न होने देने के प्रयासों में लगे हुए थे, और उनकी तरफ से सुनील गुप्ता पर मंजु गुप्ता के आवेदन को स्वीकार न करने के लिए भारी दबाव भी था । इसी कारण से राजीव सिंघल और उनके समर्थकों ने मंजु गुप्ता के क्लब में बबाल तक करवा दिया, जिसका मामला रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय तक पहुँचा । रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय ने लेकिन राजीव सिंघल और उनके समर्थकों की चाल को कामयाब नहीं होने दिया । मंजु गुप्ता की उम्मीदवारी के संदर्भ में रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय ने जैसा स्पष्ट रुख अपनाया, उसके चलते सुनील गुप्ता चाहते हुए भी राजीव सिंघल और उनके समर्थकों की 'उचित' सेवा नहीं कर सके । राजीव सिंघल और उनके समर्थकों ने लेकिन हार नहीं मानी । दरअसल उन्हें पता था कि जब सारे फार्मूले फेल हो जाएँ तब भी सुनील गुप्ता से काम कराने के लिए एक फार्मूला बचा रह जाता है । सुनील गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार, उसी अंतिम फार्मूले को इस्तेमाल करते हुए सुनील गुप्ता से मंजु गुप्ता की उम्मीदवारी को निरस्त करने की कीमत पूछी गई - तो सुनील गुप्ता ने रोटरी इंटरनेशनल के फैसले को अनदेखा करने में देर नहीं लगाई । 
सुनील गुप्ता के बारे में दरअसल हर कोई यह जान गया है कि सुनील गुप्ता 'न बाप बड़ा न मय्या, सबसे बड़ा रुपय्या' फलसफे को मानने वाले व्यक्ति हैं । रोटेरियन और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सुनील गुप्ता यह भी समझ गए हैं कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में पैसा बनाने/कमाने के जो मौके अभी उनके पास हैं, वह ज्यादा समय तक नहीं बने/बचे रहेंगे - इसलिए पैसा बनाने/कमाने के चक्कर में हो रही बदनामी की परवाह करना भी उन्होंने छोड़ दिया है । सुनील गुप्ता में हालाँकि थोड़ा सा डर इस बात का जरूर दिखाई दे रहा है कि उनकी कारस्तानियों के चलते उनका डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पद कहीं न छिन जाए । उनके नजदीकियों का कहना है कि लेकिन इस संदर्भ में वह राजीव सिंघल की तरफ से मिले इस आश्वासन पर भरोसा कर रहे हैं कि उन्होंने इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई से हरी झंडी ले ली है कि सुनील गुप्ता से गवर्नरी नहीं छीनी जाएगी । सुनील गुप्ता के नजदीकियों का कहना है कि सुनील गुप्ता ने इस भरोसे के साथ-साथ अपने आप को इस बात के लिए भी तैयार कर लिया है कि यदि उनकी गवर्नरी छिन जाने का खतरा हो भी, तो भी उन्हें पैसा बनाने/कमाने के मौके नहीं छोड़ने हैं । सुनील गुप्ता ने जब यह तय कर ही लिया कि इज्जत चली जाए, कोई परवाह नहीं; गवर्नरी चली जाए, कोई परवाह नहीं; लेकिन पैसा आने का मौका वापस नहीं लौटना चाहिए - तब राजीव सिंघल को अपना काम कराना मुश्किल नहीं लगा । 
उल्लेखनीय है कि सुनील गुप्ता काफी समय तक मंजु गुप्ता की उम्मीदवारी के आवेदन को स्वीकार करने से बचते फिर रहे थे । मंजु गुप्ता की उम्मीदवारी के आवेदन को स्वीकार करने के बाबत रोटरी इंटरनेशनल कार्यालय से स्पष्ट आदेश न मिला होता, तो सुनील गुप्ता हरगिज हरगिज उनकी उम्मीदवारी का आवेदन स्वीकार न करते; लेकिन रोटरी इंटरनेशनल के फैसले से उनके हाथ बंध गए और वह मनमानी न कर सकें । सुनील गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार, मंजु गुप्ता की उम्मीदवारीरूपी काँटे को निकालने लिए राजीव सिंघल की तरफ से सुनील गुप्ता को दीवाली के मौके पर 'लक्ष्मी जी' का स्वागत करने का ऑफर लेकिन जैसे ही मिला - तब फिर सुनील गुप्ता ने रोटरी इंटरनेशनल के फैसले को भी धता बताने में देर नहीं की । 'लक्ष्मी जी' की कृपा के असर में सुनील गुप्ता ने इलेक्शन कमेटी के सदस्यों के रूप में अपने डिस्ट्रिक्ट के रवि भार्गव, ललित मोहन गुप्ता तथा अखिलेश कोठीवाल जैसे पूर्व गवर्नर्स को भी नहीं बख्शा । दरअसल हुआ यह कि इलेक्शन कमेटी की मीटिंग में कमेटी के इन तीनों सदस्यों को सुनील गुप्ता से यह सुनकर हैरानी हुई कि उन्होंने मंजु गुप्ता की उम्मीदवारी का आवेदन निरस्त कर दिया है । इन तीनों सदस्यों ने इस मामले से संबंधित रिकॉर्ड देखना चाहा तो सुनील गुप्ता ने टालमटोल करके रिकॉर्ड दिखाने से मना कर दिया । सुनील गुप्ता के इस रवैये से यह तीनों निराश और नाराज तो बहुत हैं, लेकिन सुनील गुप्ता को इनकी नाराजगी की परवाह इसलिए नहीं है - क्योंकि वह यह विश्वास कर रहे हैं कि यह तीनों पूर्व गवर्नर्स उनसे नाराज भले ही हों, किंतु उनका कुछ कर नहीं पायेंगे । 
रोटरी को 'बेचने' के मामले में सुनील गुप्ता जो हिम्मत दिखा रहे हैं, उसका सबसे गंभीर पहलू यह है कि उनकी इस हिम्मत के पीछे इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई के समर्थन की बात की जा रही है । राजीव सिंघल और उनके समर्थक मनोज देसाई के साथ अपनी नजदीकी का दावा करते हुए सुनील गुप्ता को भरोसा दिलाये हुए हैं कि वह उनकी गवर्नरी को आँच नहीं आने देंगे । राजीव सिंघल और उनके समर्थकों ने मनोज देसाई का नाम लेकर सुनील गुप्ता को एमएस जैन तथा हितेश कुमार शर्मा की तरफ से भी आश्वस्त किया है कि यह दोनों नाराज चाहें जितने हों तथा बातें चाहें जो कर रहे हों - किंतु सचमुच में करेंगे कुछ नहीं । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट के कई गवर्नर्स सुनील गुप्ता की कारस्तानियों के चलते सुनील गुप्ता से खासे नाराज हैं, और उनकी इस नाराजगी के डर से ही सुनील गुप्ता कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग बुलाने की हिम्मत नहीं कर रहे थे । राजीव सिंघल और उनके समर्थकों ने लेकिन उन्हें आश्वस्त किया है कि मनोज देसाई के नाम पर सभी गवर्नर्स को मैनेज कर लिया गया है और नाराज गवर्नर्स थोड़ा बहुत गाली-गलौच भले कर लें, लेकिन उनकी कमाई/लूट के संदर्भ में उनकी गवर्नरी पर आँच नहीं आने देंगे । यह आश्वासन मिलने के बाद ही सुनील गुप्ता कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग बुलाने के लिए राजी हुए हैं । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में और रोटरी को बेचने की सुनील गुप्ता की कार्रवाई में इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई का नाम जिस धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है - उसने डिस्ट्रिक्ट 3100 में चल रही घटनाओं को खासा महत्वपूर्ण बना दिया है । 
मनोज देसाई की तरफ से राजीव सिंघल से मिले आश्वासन के भरोसे ही सुनील गुप्ता ने मंजु गुप्ता की उम्मीदवारी की बलि लेकर 'लक्ष्मी जी' की व्यवस्था करके अपनी दीवाली तो अच्छे से मनाने का इंतजाम कर लिया है ।

Friday, November 6, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की फरीदाबाद ब्रांच में विजय गुप्ता, दीपक गर्ग और तेजेंद्र भारद्वाज को क्लीन चिट देने की गुमनाम कोशिश से साबित है कि बेईमान लोग कायर भी हैं

फरीदाबाद । चार्टर्ड एकाउंटेंट्स इंस्टीट्यूट की फरीदाबाद ब्रांच में ऑडीटोरियम बनाने में हुए घपले की जिम्मेदारी थोपने को लेकर फरीदाबाद में आरोपों-प्रत्यारोपों का जो खेल चल रहा है, वह अब उस मुकाम तक जा पहुँचा है - जहाँ 'नंगे' हुए लोग यह साबित करने का प्रयास करने में जुट गए हैं कि 'हमाम में तो सभी नंगे थे'; और अपने इस प्रयास में वह हमाम से बाहर आने को भी तैयार हो गए हैं - यानि उनका जो नंगापन अभी तक दूसरे लोग दिखा रहे थे, उसे अब वह खुद ही दिखाने को तैयार हो गए हैं । उल्लेखनीय है कि फरीदाबाद ब्रांच में आर्थिक घपलों को लेकर अभी तक विजय गुप्ता, दीपक गर्ग और तेजेंद्र भारद्वाज निशाने पर थे; लेकिन अभी हाल में सामने आए एक गुमनाम पत्र में दावा किया गया है कि इन बेचारों ने तो इंस्टीट्यूट की गाइडलाइंस के अनुसार ही काम किया था, और घपलों के लिए वास्तव में जिम्मेदार तो विपिन शर्मा हैं । गौर करने वाला तथ्य यह है कि फरीदाबाद ब्रांच में घपलों के लिए जो लोग विजय गुप्ता, दीपक गर्ग और तेजेंद्र भारद्वाज को जिम्मेदार ठहराते हैं - वह जाने/पहचाने लोग हैं और जो अपनी पहचान के साथ आरोप लगाते रहे हैं तथा सुबूत पेश करते रहे हैं; किंतु जिन लोगों ने घपलों के लिए विपिन शर्मा को जिम्मेदार ठहराया है, उन्होंने अपनी पहचान छिपा कर यह काम किया है । यानि उनमें न तो अपनी पहचान बताने का साहस है, और न उन्होंने सीधे विपिन शर्मा का नाम लिया है । इस तरह से उन्होंने साबित किया है कि जो बेईमान और कायर थे, वह बेईमान और कायर ही रहेंगे । यह कौन लोग हैं ? गुमनाम पत्र में जिस तरह से विजय गुप्ता, दीपक गर्ग और तेजेंद्र भारद्वाज को क्लीन चिट देने की फूहड़ सी कोशिश की गई है, उससे स्पष्ट रूप से जाहिर/साबित है कि इस गुमनाम पत्र के पीछे यही लोग हैं ।
उल्लेखनीय बात यह भी है कि इन चारों लोगों में विजय गुप्ता सेंट्रल काउंसिल की तथा दीपक गर्ग रीजनल काउंसिल की सीट बचाने की चुनौती का सामना कर रहे हैं, और यह दोनों गुरु-चेले के रूप में पहचाने जाते हैं; तेजेंद्र भारद्वाज और विपिन शर्मा रीजनल काउंसिल में प्रवेश करने के लिए प्रयासरत हैं । तेजेंद्र भारद्वाज एक समय विजय गुप्ता गिरोह के सदस्य हुआ करते थे, लेकिन गिरोह में नंबर दो की दौड़ में दीपक गर्ग से पिछड़ जाने के कारण वह हालाँकि गिरोह से अलग हो गए थे, किंतु ब्रांच में मची लूट में चूँकि उनकी भी भागीदारी को रेखांकित किया जाता है, इसलिए उन्हें भी विजय गुप्ता गिरोह के साथ ही देखा जाता है ।  विपिन शर्मा अपने आप को प्रोफेशन में 'ट्रू सेवक' के रूप में प्रस्तुत करते हैं । मजे की बात यह है कि फरीदाबाद में जो लोग विजय गुप्ता गिरोह की कारस्तानियों को उद्घाटित करते हैं, उन्हें विपिन शर्मा के समर्थकों के रूप में देखा/पहचाना जाता है । विजय गुप्ता और उनके गिरोह के सदस्यों के लिए मुसीबत की बात यह है कि करीब दो हजार की सदस्यता वाली फरीदाबाद ब्रांच में उन्हें एक व्यक्ति ऐसा नहीं मिला, जो अपनी पहचान के साथ उनकी करतूतों की वकालत कर सके, और इसलिए ही उन्हें गुमनाम पत्र का सहारा लेने के लिए मजबूर होना पड़ा । यानि जिन लोगों पर बेईमान और कायर होने के आरोप रहे, वह बेईमान और कायर ही साबित हुए । 
फरीदाबाद ब्रांच बिल्डिंग में घपलों का मामला मुख्य रूप से पिछली टर्म से शुरू हुआ, जबकि ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी में दूसरे कुछेक लोगों के साथ विजय गुप्ता के पार्टनर महेश गोयल, दीपक गर्ग, तेजेंद्र भारद्वाज व विपिन शर्मा भी होते थे । ब्रांच बिल्डिंग कमेटी के अध्यक्ष विजय गुप्ता रहे हैं । ऑडिट रिपोर्ट में ब्रांच बिल्डिंग में अनियमितता/फ्रॉड बताया गया । एक तर्क यह बनता है कि ब्रांच बिल्डिंग में यदि घपला हुआ, तो ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी के सभी सदस्य उसके लिए जिम्मेदार हुए । यह तर्क घपले के लिए जिम्मेदार लोगों को बचाने का काम करता है; क्योंकि जब सभी को जिम्मेदार बता दिया गया तो मामले को रफा-दफा करना आसान हो जाता है । और यदि इस तर्क को सच मान भी लिया जाए, तो यह सवाल तो फिर भी बचा रह जाता है कि घपले के जिम्मेदार सभी लोगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की/करवाई गई ? इसलिए देखने/समझने की बात यह है कि जब घपले का मामला सामने आया, तो किस किस का क्या क्या रवैया था ? कौन मामले को छिपाना/दबाना चाहता था, और कौन घपलेबाजों को पकड़ना/पकड़वाना चाहता था ? इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में फरीदाबाद ब्रांच की बिल्डिंग के घपले का मामला संजीव चौधरी ने उठाया था, और उन्होंने फंड रोक देने की सिफारिश की थी - जिसका विजय गुप्ता ने जोरदार तरीके से विरोध किया था । विजय गुप्ता का कहना था कि ऑडिट रिपोर्ट में जिसे अनियमितता कहा गया है - उसका संबंध पैसों की हेराफेरी से नहीं है, बल्कि व्यवस्थासंबंधी ऊँच-नीच से है; और इस आधार पर फंड रोकना अन्याय होगा । 
यह विजय गुप्ता ही हैं, जिनकी शह पर ब्रांच के फंड इस्तेमाल करने की प्रक्रिया से ट्रेजरर को बाहर करने/रखने के काम हुए । तेजेंद्र भारद्वाज के चेयरमैन-काल में ट्रेजरर रहे विपिन मंगला ने इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को लिख कर आरोप लगाया था कि उन्हें ट्रेजरर की जिम्मेदारी नहीं निभाने दी जा रही हैं । विजय गुप्ता की लॉबीइंग के चलते तत्कालीन प्रेसीडेंट ने इस शिकायत पर कान नहीं दिया । उसके अगले वर्ष, सेक्रेटरी के रूप में विपिन मंगला ने ऑडिटोरियम के खर्चे का स्पेशल ऑडिट करने की माँग करते हुए इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट को फिर एक पत्र लिखा था, लेकिन विजय गुप्ता ने उसकी भी कोई सुनवाई नहीं होने दी । उल्लेखनीय है कि फरीदाबाद ब्रांच में मोटे तौर पर दो ग्रुप बन गए थे - एक ग्रुप का नेतृत्व विजय गुप्ता के हाथ में था; और विजय गुप्ता ने हमेशा यह प्रयास किया कि चेयरमैन पद उनके गिरोह के पास ही रहे, जिससे कि वह अपनी बेईमानियों पर पर्दा डाले रह सकें और बेईमानियों को करने का मौका बनाए रख सकें । दूसरे ग्रुप में वह लोग थे जो समय समय पर आरोप लगाते रहे और जाँच कराए जाने की माँग करते रहे । विपिन शर्मा इस दूसरे ग्रुप में थे । चेयरमैन पद अपने हाथ में रखने के लिए विजय गुप्ता को जब भी जरूरी लगा, एक्स-ऑफिसो सदस्य के रूप में उन्होंने अपने वोट का इस्तेमाल किया । अपने वोट का इस्तेमाल करते हुए विजय गुप्ता ने विपिन शर्मा को दरअसल इसीलिए चेयरमैन नहीं बनने दिया, क्योंकि उन्हें डर रहा कि विपिन शर्मा चेयरमैन बन गए तो ब्रांच बिल्डिंग के घपले सामने आ जायेंगे, और वह तथा उनके साथी फँसेंगे । विजय गुप्ता को चूँकि पत्थर पर अपना नाम लिखवाना था, इसलिए उन्होंने हर धतकर्म किया और अपने साथियों से साथ भी फरेब करने से नहीं चूके । विजय गुप्ता, दीपक गर्ग, तेजेंद्र भारद्वाज की तिकड़ी ने ब्रांच बिल्डिंग के घपले के मामले को कभी भी ब्रांच की एजीएम में नहीं उठने/आने दिया; और विजय गुप्ता ने सेंट्रल काउंसिल में कभी इस मामले को उठाने का प्रयास तक नहीं किया । जैसा कि पहले बताया गया है कि सेंट्रल काउंसिल की मीटिंग में संजीव चौधरी ने मामला उठाया भी, तो विजय गुप्ता ने उनका विरोध किया ।  
इन तथ्यों से जाहिर है कि विजय गुप्ता और उनके गिरोह के लोगों ने न सिर्फ ब्रांच बिल्डिंग में घपला किया, बल्कि घपले को छिपाने व दबाए रखने के लिए अनैतिक किस्म की राजनीति भी की; और अब कायरों की तरह अपनी पहचान छिपा कर लोगों को यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि घपला तो उन्होंने किया था, जो बार-बार जाँच कराए जाने की माँग करते रहे हैं । विपिन शर्मा, विपिन मंगला आदि का यह दोष तो माना जा सकता है कि उन्होंने घपलेबाजों को रोकने/पकड़ने का और और ज्यादा प्रयास नहीं किया - उन्हें और ज्यादा प्रयास करना चाहिए था; लेकिन इस दोष के कारण उन्हें घपलेबाजों से भी बड़ा दोषी मानना घपलेबाजों को सम्मान देने जैसा काम है । यह काम भी लेकिन जिस तरह गुमनाम रह कर किया जा रहा है, उससे साबित है कि बेईमान लोग कायर भी हैं । 

Thursday, November 5, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में दिल्ली, सोनीपत व गाजियाबाद की मीटिंग से निराश हुए दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों को प्रवीन निगम की अचानक बढ़ी सक्रियता से और झटका लगा है

गाजियाबाद/नई दिल्ली । प्रवीन निगम ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने हेतु गाजियाबाद में पिछले दो-तीन दिनों में जो चक्कर लगाए हैं, और अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में गाजियाबाद में मीटिंग करने का मौका बनाने का जो प्रयास किया है, उसने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों को निराश व हताश करने का काम किया है । इसका कारण बनता भी है । प्रवीन निगम अपनी उम्मीदवारी को लेकर कभी भी इतने गंभीर नहीं दिखे हैं, जितने गंभीर वह पिछले दो-तीन दिनों में नजर आए हैं - और इन दिनों की अपनी सारी गंभीरता उन्होंने गाजियाबाद में ही उड़ेल दी है । प्रवीन निगम की इस गंभीरतापूर्ण सक्रियता पर लोगों का ध्यान इस कारण से और गया है, क्योंकि इन्हीं दिनों मुकेश अरनेजा को दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रचार अभियान से पीछे हटते हुए देखा गया है । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में दिल्ली में हुई मीटिंग में तो मुकेश अरनेजा बहुत सक्रिय थे - सक्रिय क्या थे, पूरी मीटिंग की कमान उन्होंने ही संभाली हुई थी; किंतु उसके बाद सोनीपत व गाजियाबाद में हुई मीटिंग्स से वह पूरी तरह नदारत रहे । मुकेश अरनेजा चूँकि कुछ ही दिन पहले यह घोषणा कर चुके थे कि चुनावी प्रक्रिया में खुल कर भाग लेने को लेकर उनकी हुई शिकायत की उन्हें कोई परवाह नहीं है, और वह किसी से नहीं डरते हैं, और वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में खुलकर काम करते रहेंगे - इसलिए दीपक गुप्ता के प्रचार अभियान से मुकेश अरनेजा के अंतर्ध्यान होने का लोगों ने नोटिस लिया । लोगों के बीच चर्चा रही कि 'मैं किसी से नहीं डरता' का उद्घोष करने वाले मुकेश अरनेजा आखिर दीपक गुप्ता को बीच मँझदार में छोड़ कर कहाँ छिप गए हैं ? लोगों को पिछले तीन-चार दिनों में हुई इन दो 'घटनाओं' ने चकराया हुआ है - जिनमें दीपक गुप्ता के प्रचार अभियान से मुकेश अरनेजा के गायब होने के साथ साथ प्रवीन निगम के प्रचार अभियान में अचानक से गर्मी देखी गई । कुछ लोगों को यह महज एक संयोग दिख रहा है, तो कुछ लोग इसमें पर्दे के पीछे की राजनीति देख रहे हैं । 
दीपक गुप्ता के प्रचार अभियान से मुकेश अरनेजा के गायब होने को लेकर दीपक गुप्ता के समर्थक अलग अलग कारण बता रहे हैं - कोई कह रहा है कि मुकेश अरनेजा निजी व्यस्तता के चलते पिछले तीन-चार दिन रोटरी से छुट्टी पर रहे और इसलिए वह दीपक गुप्ता के आयोजनों में नजर नहीं आए; तो किसी ने बताया कि दीपक गुप्ता की दिल्ली की मीटिंग के फ्लॉप होने का ठीकरा जिस तरह मुकेश अरनेजा के सिर फोड़ा गया, उससे नाराज होकर मुकेश अरनेजा ने खुद को दीपक गुप्ता के प्रचार अभियान से दूर कर लिया है । उल्लेखनीय है कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने/दिखाने हेतु दिल्ली में हुई मीटिंग में उपस्थिति तो अच्छी थी, लेकिन चुनावी मुकाबले में महत्वपूर्ण व निर्णायक भूमिका निभाने वाले लोग वहाँ न के बराबर थे । यह देख कर दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों व शुभचिंतकों का माथा ठनका । दिल्ली मीटिंग का सारा जिम्मा चूँकि मुकेश अरनेजा के पास था, इसलिए उन्हीं से पूछा गया कि जो लोग यहाँ दिख रहे हैं, क्या इन्हीं के भरोसे चुनाव जीता जायेगा ? चुनाव में महत्वपूर्ण व निर्णायक भूमिका निभाने वाले लोगों की अनुपस्थिति से मुकेश अरनेजा खुद भी उखड़े हुए से थे, और ऐसे में इस तरह के सवालों ने उन्हें बुरी तरह बौखला दिया था । दिल्ली की मीटिंग में मुकेश अरनेजा ने जो बकवासबाजी  की, उसे उनकी बौखलाहट के नतीजे के रूप में ही देखा/पहचाना गया । मुकेश अरनेजा की बौखलाहटभरी बकवासबाजी की खबर डिस्ट्रिक्ट में फैली, तो दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के संदर्भ में मामला और खराब हुआ । इसी के बाद दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों व शुभचिंतकों की तरफ से सुझाव मिलता सुना गया कि मुकेश अरनेजा के कारण फायदा कम, नुकसान ज्यादा हो रहा है - इसलिए दीपक गुप्ता के प्रचार अभियान में उन्हें पीछे कर देना चाहिए । कुछेक लोगों का कहना है कि मुकेश अरनेजा इसी सुझाव पर अमल करने के चलते दीपक गुप्ता की सोनीपत व गाजियाबाद की मीटिंग से दूर रहे; तो अन्य कुछेक लोगों का कहना है कि उक्त सुझाव से नाराज होकर मुकेश अरनेजा ने दीपक गुप्ता की मीटिंग्स से खुद को दूर कर लिया । 
मुकेश अरनेजा की नाराजगी की बात को प्रवीन निगम की सक्रियता से बल मिला । कई लोगों को लगता है कि प्रवीन निगम की सक्रियता के पीछे मुकेश अरनेजा ही हैं । मजे की बात है कि अभी कुछ दिन पहले ही दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों ने दावा किया था कि प्रवीन निगम जल्दी ही दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में अपनी उम्मीदवारी वापस ले लेंगे । प्रवीन निगम ने इस दावे पर सार्वजनिक रूप से गहरी नाराजगी व्यक्त की थी । दावा करने वाले लोगों का कहना था कि उन्हें मुकेश अरनेजा ने प्रवीन निगम की उम्मीदवारी की वापसी के बारे में आश्वस्त किया था; लेकिन प्रवीन निगम का कहना था कि मुकेश अरनेजा उनके निरंतर संपर्क में हैं और मुकेश अरनेजा ने उनसे कभी भी उम्मीदवारी को वापस लेने के बारे में नहीं कहा है । प्रवीन निगम यह बात अलग अलग मौकों पर लोगों को बताते रहे हैं कि मुकेश अरनेजा अपनी कंपनी के झगड़े /लफड़े में उनकी प्रोफेशनल मदद ले रहे हैं, और इसके बदले में उन्हें उनकी उम्मीदवारी के बारे में सलाह-सुझाव देते रहते हैं । प्रवीन निगम ने कभी-कभार इस बात पर निराशा तो जाहिर की कि उन्हें मुकेश अरनेजा से जितनी मदद की उम्मीद थी, मुकेश अरनेजा से उन्हें उतनी मदद नहीं मिली है - लेकिन इस बात को लेकर प्रवीन निगम ने ज्यादा रोना/धोना नहीं मचाया । घटना-चक्र ने जो मोड़ लिया है, उससे कुछेक लोगों को यह भी लग रहा है कि प्रवीन निगम को मुकेश अरनेजा की तरफ से यह आश्वासन रहा होगा कि ऐन मौके पर वह उनके साथ आ जायेंगे । धोखेबाजी में मुकेश अरनेजा ने दरअसल इतना नाम कमाया हुआ है कि लोग विश्वास करते हैं कि मुकेश अरनेजा कुछ भी कर सकते हैं । प्रवीन निगम के नजदीकियों का कहना है कि मुकेश अरनेजा को भी वास्तव में समझ में आ गया है कि दीपक गुप्ता के लिए वह ज्यादा कुछ कर नहीं सकते हैं, इसलिए अब वह प्रवीन निगम पर दाँव लगाना चाहते हैं । दिल्ली में दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में हुई मीटिंग के फ्लॉप होने से मुकेश अरनेजा को सचमुच खासा तगड़ा वाला झटका लगा है, और इसके बाद ही मुकेश अरनेजा ने अपने आपको दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी से दूर करना/दिखाना शुरू कर दिया है - जिससे कि दीपक गुप्ता की पराजय का ठीकरा उनके सिर पर न फूटे । वह कह सकेंगे कि दीपक गुप्ता ने उन्हें अपने अभियान से चूँकि अलग कर दिया, और सोनीपत व गाजियाबाद में हुई मीटिंग की योजना व तैयारी से उन्हें दूर रखा - इसलिए इन दोनों जगहों पर हुई मीटिंग्स भी बहुत खराब गईं । गाजियाबाद की मीटिंग का हाल इसलिए और बुरा हुआ क्योंकि  मीटिंग के लिए आमंत्रित किए गए कई एक क्लब-अध्यक्षों से तो फिर कहना पड़ा कि वह उनके कार्यक्रम में न आएँ । प्रवीन निगम के नजदीकियों के अनुसार, दीपक गुप्ता की तरफ से क्लब-अध्यक्षों का यह जो अपमान हुआ - उसके लिए मुकेश अरनेजा व दीपक गुप्ता के अभियान के बीच पैदा हुई तनातनी ही जिम्मेदार है । इस तनातनी से प्रवीन निगम और उनके समर्थक बम बम हैं - और इसकी प्रतिक्रिया में ही प्रवीन निगम ने अपनी सक्रियता अचानक से बढ़ा दी है । प्रवीन निगम की सक्रियता ने दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी की बची-खुची उम्मीद को भी ग्रहण लगा दिया है ।