Tuesday, March 15, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में करीब सौ सदस्यों की सदस्यता के साथ, मनोज देसाई व सुशील गुप्ता जैसे रोटरी के बड़े पदाधिकारियों व नेताओं की मौजूदगी में खासे धूमधाम से डिस्ट्रिक्ट में 'शामिल' हो रहे योगेश गर्ग के नए क्लब का 'आगाज़' डिस्ट्रिक्ट में हलचल तो मचायेगा ही

गाजियाबाद । नवगठित रोटरी क्लब गाजियाबाद विकास के चार्टर प्रेजेंटेशन समारोह की तैयारी और तैयारी से जुड़ी चर्चाओं ने डिस्ट्रिक्ट 3012 की चुनावी राजनीति के नेताओं के बीच जिस तरह की हलचल मचाई हुई है, उसने एक दिलचस्प नजारा बनाया हुआ है । इस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई के उपस्थित होने के तथ्य ने वैसे भी समारोह को और नवगठित क्लब को उल्लेखनीय बना दिया है । मजे की बात है कि जब तक इस समारोह का निमंत्रण पत्र छपा और लोगों को मिला नहीं था, तब तक रमेश अग्रवाल, जेके गौड़ और शरत जैन इस समारोह में मनोज देसाई के आने की बात को झूठा बता रहे थे और दावा कर रहे थे कि नवगठित क्लब के लोग मनोज देसाई को क्लब के कार्यक्रम में आने के लिए राजी ही नहीं कर पायेंगे । उनका तर्क था कि एक इंटरनेशनल डायरेक्टर के पास इतना समय ही नहीं होता है कि वह किसी क्लब के चार्टर प्रेजेंटेशन समारोह में शामिल हो सके । यूँ भी देखा जाता रहा है कि किसी क्लब का कोई बड़ा आयोजन हो या कोई प्रमुख प्रोजेक्ट हो - तो उसमें तो इंटरनेशनल डायरेक्टर शामिल होने के लिए समय निकाल लेते हैं; किंतु किसी नए क्लब के चार्टर प्रेजेंटेशन कार्यक्रम में इंटरनेशनल डायरेक्टर के मुख्य अतिथि बनने की बात थोड़ी अव्यावहारिक सी जरूर लगती है । इसी परसेप्शन का फायदा उठा कर रमेश अग्रवाल, जेके गौड़ व शरत जैन ने नवगठित रोटरी क्लब गाजियाबाद विकास के चार्टर प्रेजेंटेशन समारोह को लेकर खासा दुष्प्रचार किया । यही तीनों नेता पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के भी इस समारोह में आने के दावे को झुठला रहे थे । इनका कहना था कि सुशील गुप्ता को तो 17 मार्च को दिल्ली से दूर किसी कार्यक्रम में जाना है, वह भला कैसे गाजियाबाद में होने वाले रोटरी क्लब गाजियाबाद विकास के समारोह में शामिल सकेंगे ? लेकिन समारोह के निमंत्रण पत्र जब लोगों को मिलना शुरू हुए, और लोगों ने निमंत्रण पत्र में मनोज देसाई का नाम मुख्य अतिथि के रूप में तथा सुशील गुप्ता का नाम विशिष्ट अतिथि के रूप में उसमें छपा देखा - तो रमेश अग्रवाल, जेके गौड़ तथा शरत जैन की बोलती बंद हुई ।
नवगठित रोटरी क्लब गाजियाबाद विकास के प्रति रमेश अग्रवाल, जेके गौड़ व शरत जैन का विरोध का भाव दरअसल इसलिए है - क्योंकि इसे योगेश गर्ग के क्लब के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । उल्लेखनीय है कि योगेश गर्ग इस नए क्लब को बनाने/बनवाने की प्रक्रिया में मौजूदा रोटरी वर्ष के शुरू से ही प्रयासरत थे, किंतु उक्त तिकड़ी उनके प्रयास में रोड़ा बनी हुई थी । दरअसल इस नए क्लब के गठन के पीछे योगेश गर्ग की राजनीतिक चाल को 'देखा' गया, जिसके पीछे छिपे उद्देश्य में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत सुभाष जैन की उम्मीदवारी को चोट पहुँचाने की 'सोच' को पहचाना गया था । योगेश गर्ग की राजनीतिक चाल को फेल करने के लिए सत्ता खेमे के नेताओं को उनके नए क्लब के बनने/बनाने की राह में रोड़े डालना जरूरी लगा - तो इसे चुनावी राजनीति की 'एक आवश्यक बुराई' के रूप में स्वीकार कर लिया गया । चुनावी राजनीति में होता ही है कि सभी पक्ष अपने अपने हथकंडे और अपनी अपनी तरकीबें अपनाते हैं, और इस प्रक्रिया में एक-दूसरे को कमजोर करने/बनाने के लिए नाजायज बातें/हरकतें तक करते ही हैं - खेमेबाजी की सीमाओं में इसे स्वीकार भी कर लिया जाता है । इसीलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव होने तक सत्ता खेमे के नेताओं ने योगेश गर्ग के नए क्लब की राह में रोड़े डालने का जो काम किया, उसे लेकर कोई बबाल नहीं हुआ - मजे की बात यह रही कि विरोधी पक्ष की तरफ से भी इस बात को कोई बड़ा मुद्दा बनाने का प्रयास नहीं हुआ । कुछेक लोगों का प्रयास था और उन्होंने योगेश गर्ग को भड़काने की कोशिश भी की थी कि इस मामले को वह 'बड़े' स्तर पर ले जाएँ - जिससे कि सत्ता खेमे के नेताओं पर दबाव भी पड़ेगा और राजनीतिक लाभ भी मिलेगा । योगेश गर्ग ने लेकिन बड़प्पन दिखाया और अपने 'राजनीतिक उद्देश्य' को पाने के लिए गंदगी करने की राह से दूर ही रहे । नए क्लब के गठन को वास्तविकता देने के लिए उन्होंने चुनाव के पूरा होने तक का इंतजार करना मुनासिब समझा और इंतजार किया । कुछेक लोगों ने इसे उनकी मजबूरी बताया - इसे मान भी लिया जाए तो भी योगेश गर्ग की इस बात के लिए तारीफ होनी ही चाहिए कि इस मजबूरी को उन्होंने पूरी गरिमा के साथ निभाया ।
उम्मीद की गई थी कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव पूरा होने के बाद सत्ता खेमे की तिकड़ी योगेश गर्ग के नए क्लब के प्रति 'दुश्मनी' वाला विरोध का भाव नहीं रखेगी - और बाकी कार्रवाई आराम से पूरी हो जायेगी । यह उम्मीद इसलिए भी थी कि रमेश अग्रवाल, जेके गौड़ और शरत जैन अपने अपने चुनाव में योगेश गर्ग की मदद लेने के लिए उनकी खुशामद कर चुके थे; और इन्हें योगेश गर्ग की मदद मिली भी थी - यह ठीक है कि इस वर्ष के राजनीतिक समीकरणों के चलते योगेश गर्ग चूँकि इनके साथ नहीं थे, और इसलिए इन्होंने योगेश गर्ग का क्लब समय से नहीं बनने दिया; लेकिन उम्मीद की गई थी कि योगेश गर्ग के अहसानों को याद करते/रखते हुए ये चुनाव हो जाने के बाद विरोधी रवैया नहीं अपनायेंगे और नाशुक्रे साबित नहीं होंगे । हालाँकि इसमें इन बेचारों की कोई गलती भी नहीं है । योगेश गर्ग ने दरअसल इन्हें जो धोबीपाट दिया, उससे इनकी सारी हेकड़ी निकल गई और फिर खिसिआहट में यह विरोधी बौखलाहट दिखाने को 'मजबूर' हुए । असल में, इन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस क्लब के बनने की राह में यह रोड़े बिछाते आ रहे थे, उसके चार्टर प्रेजेंटेशन समारोह में मनोज देसाई तथा सुशील गुप्ता जैसे रोटरी के बड़े लोग आयेंगे । इससे इन्हें दोतरफा चोट लगी : एक तरफ तो लोगों के बीच यह संदेश गया कि इन्होंने क्लब के बनने में बाधा खड़ी करके वास्तव में अपना छोटापन दिखाया; और दूसरी तरफ यह 'साबित' हुआ कि योगेश गर्ग चाहते तो इनकी बाधा(ओं) को फेल करके पहले ही क्लब बनवा लेते, लेकिन अपनी गरिमापूर्ण सोच के चलते उन्होंने ऐसा नहीं किया । इस दोतरफा चोट से, योगेश गर्ग के नए क्लब को न बनने देने में अपनी जीत का अहसास कर रहे तथा लोगों को इसे दिखा रहे सत्ता खेमे की तिकड़ी का सारा नशा उड़नछू हो गया और उन्हें अपनी जीत अपनी हार में बदलती दिखने लगी । इससे बचने का उनके पास एक ही तरीका था - और वह यह कि वह किसी भी तरह से मनोज देसाई और सुशील गुप्ता को नवगठित क्लब के चार्टर प्रेजेंटेशन समारोह से दूर कर दें ।
रमेश अग्रवाल, जेके गौड़ और शरत जैन की तिकड़ी ने इसे करने के लिए अफवाहबाजी का सहारा लिया और इसी के तहत इन्होंने उड़ाया कि एक इंटरनेशनल डायरेक्टर किसी क्लब के चार्टर प्रेजेंटेशन जैसे छोटे समारोह में कैसे आ सकता है ? उल्लेखनीय है कि इसी तरह की अफवाहबाजी से पिछले दिनों इन्होंने इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन का डिस्ट्रिक्ट 3011 की कॉन्फ्रेंस में जाना रद्द करवा दिया था । पिछले दिनों केआर रवींद्रन डिस्ट्रिक्ट 3012 के एक कार्यक्रम  सिलसिले में ठीक उन्हीं दिनों दिल्ली में थे, जिन दिनों दिल्ली में डिस्ट्रिक्ट 3011 की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस हो रही थी । इस बात का फायदा उठा कर डिस्ट्रिक्ट 3011 के पदाधिकारियों ने केआर रवींद्रन को अपने एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए राजी करने का प्रयास किया, जिसे लेकिन रमेश अग्रवाल की खुराफाती खोपड़ी ने प्रोटोकॉल का कन्फ्यूजन फैला कर विफल कर दिया था । रमेश अग्रवाल और जेके गौड़ व शरत जैन जैसे उनके सिपहसालारों ने योगेश गर्ग के नवगठित क्लब में मनोज देसाई व सुशील गुप्ता के आने को रोकने के लिए उसी तर्ज पर कन्फ्यूजन फैलाने का प्रयास तो खूब किया, किंतु योगेश गर्ग की तैयारी के चलते उनका प्रयास कामयाब नहीं हो सका । नए क्लब के गठन के मामले में योगेश गर्ग को मजबूर बना देने तथा 'दबा' देने में अपनी सफलता दिखा/जता रहे सत्ता खेमे की तिकड़ी पर योगेश गर्ग ने पलट कर जो 'हमला' किया है, उसने सत्ता खेमे के तिकड़ी नेताओं को चोट तो गहरी दी ही है, साथ ही डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के समीकरणों को भी प्रभावित करने के संकेत दिए हैं । माना जा रहा है कि करीब सौ सदस्यों की सदस्यता के साथ, मनोज देसाई व सुशील गुप्ता जैसे रोटरी के बड़े पदाधिकारियों व नेताओं की मौजूदगी में खासे धूमधाम से डिस्ट्रिक्ट में 'शामिल' हो रहे एक नए क्लब का 'आगाज़' डिस्ट्रिक्ट में हलचल तो मचायेगा ही ।

Monday, March 14, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080, यानि राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में सर्विस टैक्स की व्यवस्था के विरोध के पीछे कहीं लूट-खसोट को बनाए रखने की नीयत तो काम नहीं कर रही है ?

चंडीगढ़ । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चेतन अग्रवाल सर्विस टैक्स डिपार्टमेंट में सर्विस टैक्स से जुड़े मामले का प्रतिनिधित्व करने के लिए डिस्ट्रिक्ट के क्लब्स के प्रेसीडेंट्स से पॉवर ऑफ अटॉर्नी माँगने/लेने के चलते मुसीबत में फँस गए हैं । कुछेक प्रेसीडेंट्स ने उनसे दोटूक तरीके से पूछा है कि सभी क्लब्स का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार उन्हें किसने दिया है; आखिर किसके कहने से उन्होंने यह तय कर लिया है कि सर्विस टैक्स डिपार्टमेंट में डिस्ट्रिक्ट के सभी क्लब्स की तरफ से वह मामले की पैरवी करेंगे । चेतन अग्रवाल बेचारों को राजेंद्र उर्फ राजा साबू का नाम लेकर प्रेसीडेंट्स के गुस्से से अपने आप को बचाना पड़ा है । चेतन अग्रवाल ने लोगों को यह बताते हुए शांत करने का प्रयास किया है कि सर्विस टैक्स के मुद्दे पर राजा साबू ने उन्हें डिपार्टमेंट में पैरवी करने की जिम्मेदारी दी है । इस मामले में मधुकर मल्होत्रा व हेमंत अरोड़ा से उनकी मदद करने के लिए कहा गया है । प्रेसीडेंट्स के भड़कने का कारण दरअसल यह भी रहा कि पॉवर ऑफ अटॉर्नी के साथ-साथ चेतन अग्रवाल ने 100 रुपए प्रति सदस्य के हिसाब से पैसे जमा करने और देने का फरमान भी प्रेसीडेंट्स को सुनाया । उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ने के लिए पैसा खर्च करना होगा, और उसी खर्च को पूरा करने के लिए डिस्ट्रिक्ट के प्रत्येक सदस्य से 100-100 रुपए लेना तय किया गया है । मजे की बात यह रही कि चेतन अग्रवाल की तरफ से प्रेसीडेंट्स को जो पत्र मिला, उसमें पॉवर ऑफ अटॉर्नी की तो बात थी, लेकिन पैसों की कोई बात नहीं थी; इसके अलावा लोगों ने इस बात पर भी गौर किया कि अभी तो मामला चंडीगढ़ डिपार्टमेंट में है, मामला यदि बढ़ा और सुप्रीम कोर्ट तक जाने की बात आई भी - तो यह अभी बहुत बाद की बात है, इसके लिए अभी से पैसे क्यों लिए जा रहे हैं ? लोगों को लगा कि सर्विस टैक्स मामले की आड़ में कुछेक पूर्व गवर्नर्स ने पैसे बनाने/कमाने का खेल शुरू कर दिया है । इसीलिए उनका गुस्सा चेतन अग्रवाल पर फूट पड़ा है । चेतन अग्रवाल यह कह कर अपनी जान बचाने की कोशिश करने के लिए मजबूर हो रहे हैं कि वह जो कुछ भी कह और कर रहे हैं, उसे कहने और करने के लिए उन्हें राजा साबू ने निर्देशित किया है ।
उल्लेखनीय है कि सर्विस टैक्स के मुद्दे पर पिछले कुछ समय से डिस्ट्रिक्ट 3080, यानि राजा साबू के डिस्ट्रिक्ट में खासा बबाल मचा हुआ है । सर्विस टैक्स डिपार्टमेंट की तरफ से क्लब्स को सर्विस टैक्स चुकाने के मामले में सम्मन मिले हुए हैं, और क्लब्स के पदाधिकारियों के लिए यह समझना मुश्किल बना हुआ है कि वह करें तो क्या करें ? डिस्ट्रिक्ट के पदाधिकारियों व खास लोगों की बेसिरपैर की बयानबाजियों ने मामले को और गंभीर बना दिया है । औरों को तो छोड़ो, पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजा साबू का रवैया तक इस मामले में गैर जिम्मेदारी भरा रहा । डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में राजा साबू ने लोगों को बताया था कि सर्विस टैक्स के मुद्दे पर किसी को भी चिंता करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उच्च न्यायालय के दो फैसलों में रोटरी के हक में निर्णय दिए गए हैं । किंतु कुछेक लोगों ने राजा साबू से जब उन दो फैसलों के डिटेल्स जानने चाहे, जिनका सहारा लेकर वह डिपार्टमेंट को अपना जबाव भेज सकें - तो राजा साबू बगलें झाँकने लगे । जाहिर है कि राजा साबू ने डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में लोगों के सामने झूठा दावा किया । उन्हें आखिर ऐसा झूठ बोलने की जरूरत क्यों पड़ी ? लोगों के लिए यह समझना भी मुश्किल हुआ कि राजा साबू ने जानबूझ कर झूठ बोला, या उन्हें खुद को ही झूठ ही पता था ? इन दोनों में से चाहे कोई सी भी बात सच हो, लेकिन राजा साबू के व्यवहार से एक सच यह जरूर सामने आया कि डिस्ट्रिक्ट के पदाधिकारियों - यहाँ तक कि राजा साबू ने भी सर्विस टैक्स के मामले को गंभीरता से नहीं लिया ।
मजे की बात यह है कि एमपी गुप्ता द्धारा बार-बार सचेत किए जाने के बावजूद डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारियों ने सर्विस टैक्स मामले में लापरवाही दिखाई । एमपी गुप्ता रोटरी क्लब चंडीगढ़ सिटी ब्यूटीफुल के वरिष्ठ सदस्य हैं, और उन्होंने बार-बार लगातार डिस्ट्रिक्ट पदाधिकारियों को आगाह किया कि सर्विस टैक्स के मुद्दे को गंभीरता से लेना चाहिए अन्यथा क्लब्स के पदाधिकारियों को जो परेशानी होगी, वह तो होगी ही - साथ में रोटरी की बदनामी भी होगी । राजा साबू से लेकर डिस्ट्रिक्ट के दूसरे प्रमुख लोगों का रवैया सर्विस टैक्स को लेकर जहाँ लापरवाही वाला और विरोधपूर्ण है, वहाँ एमपी गुप्ता ने सर्विस टैक्स को लेकर संजीदा व सकारात्मक रवैया अपनाया/दिखाया है । एमपी गुप्ता का कहना है कि रोटेरियंस को सर्विस टैक्स को अपने 'दुश्मन' के रूप में नहीं, बल्कि अपने 'दोस्त' के रूप में देखना/पहचानना चाहिए; और उससे होने वाले फायदों पर गौर करना चाहिए । एमपी गुप्ता की दलील है कि अभी शुरू में सर्विस टैक्स को लेकर कुछेक व्यावहारिकतारूपी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन अंततः कुल मिलाकर इसमें सभी को फायदा मिलेगा । एमपी गुप्ता के अनुसार, सबसे बड़ा फायदा तो यह होगा कि क्लब व डिस्ट्रिक्ट में हिसाब-किताब रखना जरूरी हो जायेगा, जिससे कि पैसों की हेराफेरी होना/करना मुश्किल हो जायेगा, और पैसे का सही सही इस्तेमाल हो सकेगा । एमपी गुप्ता की इस तरह की बातों ने डिस्ट्रिक्ट में लोगों को यह समझने का संकेत और मौका दिया है कि डिस्ट्रिक्ट के कुछेक बड़े नेता आखिर क्यों सर्विस टैक्स से डरे हुए नजर आ रहे हैं, और क्यों इससे बचने की वकालत व कोशिश कर रहे हैं ?
उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट में और कुछेक क्लब्स में अक्सर ही पैसों की हेराफेरी को लेकर तरह तरह के सवाल और बबाल सुनने/देखने को मिलते रहते हैं । हो सकता है कि सभी मामलों में पैसों की हेराफेरी वास्तव में न होती हो; और हिसाब-किताब छिपाने के पीछे वास्तविक कारण हिसाब-किताब रखने में बरती जा रही अव्यवस्था ही हो - लेकिन इसके चलते आरोपों/प्रत्यारोपों का जो शोर सुनाई देता है, वह जिम्मेदार लोगों को 'चोर' व 'ठग' के रूप में पहचान देने का काम करता है । सर्विस टैक्स के घेरे में आने के बाद, इस तरह की बातें नहीं उठ सकेंगी और जिम्मेदार लोगों को नाहक ही 'चोर' व 'ठग' जैसे शब्दों से निशाना नहीं बनना पड़ेगा । ऐसे में, डिस्ट्रिक्ट के लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि हिसाब-किताब को नियमित बनाने/बनवाने तथा पैसों की हेराफेरी को बंद करवाने में सहायक हो सकने वाले सर्विस टैक्स के घेरे का विरोध क्यों किया जा रहा है ? खास बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट के कुछेक बड़े खास लोग ही सर्विस टैक्स की व्यवस्था में शामिल होने का विरोध करते हुए देखे जा रहे हैं । इसी से लोगों के बीच शक पैदा हो रहा है कि इसके विरोध के पीछे कहीं लूट-खसोट को बनाए रखने की नीयत तो काम नहीं कर रही है ? इसी शक के चलते, सर्विस टैक्स के मामले का प्रतिनिधित्व करने के लिए पॉवर ऑफ अटॉर्नी माँगने तथा चंदा जुटाने की भूमिका बनाने में चेतन अग्रवाल को लोगों के गुस्से का शिकार होना पड़ा है ।

Thursday, March 10, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में राजा साबू के 'आशीर्वाद' के बावजूद मधुकर मल्होत्रा क्या प्रवीन चंद्र गोयल की उम्मीदवारी की संभावना को झंझटों में फँसा देने की तैयारी कर रहे हैं

चंडीगढ़ । राजेंद्र उर्फ राजा साबू - पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजा साबू के क्लब से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए नोमीनेटिंग कमेटी द्वारा चुने गए अधिकृत उम्मीदवार जितेंद्र ढींगरा के खिलाफ चैलेंजिंग उम्मीदवार घोषित हो जाने के बावजूद प्रवीन चंद्र गोयल अपनी चुनावी जीत को लेकर आशंकित बने हुए हैं । अपने नजदीकियों के बीच उन्होंने आशंका भरे सवाल किए हैं कि जिन पूर्व गवर्नर्स के भरोसे वह चुनावी मैदान में कूद पड़े हैं, वह पूर्व गवर्नर्स उन्हें चुनाव जितवा भी पायेंगे क्या ? अपनी आशंका, अपने डर और अपने सवाल को तर्कपूर्ण बनाने के लिए उन्होंने उदाहरण भी दिया कि इन्हीं पूर्व गवर्नर्स ने उन्हें अधिकृत उम्मीदवार चुनवाने को जिम्मा लिया था, लेकिन अपनी तमाम कोशिशों व तिकड़मों के बावजूद यह उन्हें अधिकृत उम्मीदवार चुनवा नहीं सके । प्रवीन चंद्र गोयल के पास डीसी बंसल का उदाहरणरूपी एक तर्क और है : प्रवीन चंद्र गोयल का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट के सभी तुर्रमखाँ पूर्व गवर्नर्स ने डीसी बंसल को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुनवाने/बनवाने का बीड़ा उठाया था, लेकिन अपनी बेवकूफियों व हवाई दावों के चलते यह लोग अभी तक तो डीसी बंसल को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी नहीं बनवा सके हैं । प्रवीन चंद्र गोयल को डर है कि कहीं उनका हाल भी डीसी बंसल जैसा न हो ।
प्रवीन चंद्र गोयल को सबसे ज्यादा डर मधुकर मल्होत्रा से है । मजे की बात यह है कि मधुकर मल्होत्रा ही हैं जिन्होंने प्रवीन चंद्र गोयल को चुनाव जितवाने का बीड़ा अपने सिर उठाया हुआ है । लेकिन प्रवीन चंद्र गोयल उनकी ही भूमिका को लेकर आशंकित हैं । अपने नजदीकियों के बीच प्रवीन चंद्र गोयल ने आशंका जताई है कि मधुकर मल्होत्रा विश्वास करने योग्य व्यक्ति नहीं हैं - वह कहते कुछ हैं और करते कुछ और हैं; इसलिए उनके कहने पर विश्वास करने का मतलब है अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारना होगा । मधुकर मल्होत्रा को लेकर प्रवीन चंद्र गोयल की आशंका और उनका डर इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि मधुकर मल्होत्रा और प्रवीन चंद्र गोयल एक ही क्लब में हैं और क्लब में परस्पर विरोधी खेमे में सक्रिय रहते आए हैं; दोनों ही एक दूसरे को नीचा दिखाने और पीछे धकेलने के प्रयास करते रहे हैं । मधुकर मल्होत्रा को जो लोग जानते हैं, वह मानते हैं और कहते भी हैं कि मधुकर मल्होत्रा कभी नहीं चाहेंगे कि उनके क्लब में कोई और - और खासकर क्लब में उनके विरोधी खेमे का कोई सदस्य डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बने । इसी कारण से, नोमीनेटिंग कमेटी के सामने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद लिए जिन उम्मीदवारों के नाम सामने थे - उनमें मधुकर मल्होत्रा का समर्थन प्रवीन चंद्र गोयल की बजाए नवजीत सिंह औलख को था । लोगों ने उनसे पूछा भी था कि अपने ही क्लब के प्रवीन चंद्र गोयल की बजाए वह दूसरे क्लब के नवजीत सिंह औलख की उम्मीदवारी का समर्थन क्यों कर रहे हैं ? मधुकर मल्होत्रा की तरफ से हर किसी को यही सुनने को मिला था कि प्रवीन चंद्र गोयल उनके क्लब के सदस्य जरूर हैं, लेकिन वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने लायक नहीं हैं । प्रवीन चंद्र गोयल को पक्का विश्वास है कि नोमीनेटिंग कमेटी में उनका जो खेल खराब हुआ और वह तमाम 'व्यवस्था' के बावजूद अधिकृत उम्मीदवार नहीं चुने जा सके, तो इसके लिए मधुकर मल्होत्रा ही जिम्मेदार हैं ।
प्रवीन चंद्र गोयल जिन लोगों से मधुकर मल्होत्रा को लेकर यह रोना रो रहे हैं, उनमें से कुछेक ने उन्हें यह कहते हुए ढाँढस बंधाने की कोशिश की है कि उन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुनवाना राजा साबू का उद्देश्य है, और मधुकर मल्होत्रा को तो राजा साबू के उद्देश्य को कामयाब बनाने की जिम्मेदारी मिली है - मधुकर मल्होत्रा भले ही आप को पसंद न करते हों, और न चाहते हों कि आप डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनें; लेकिन राजा साबू के उद्देश्य के खिलाफ जाना उनके बस की बात नहीं होगी, इसलिए आपको चिंता करने की जरूरत नहीं है । ऐसा कहने वालों को प्रवीन चंद्र गोयल से सुनने को मिला है कि आप मधुकर मल्होत्रा को नहीं जानते, वह बड़ी ऊँची चीज हैं । वह क्या कहेंगे और क्या करेंगे, इसे समझना आसान नहीं है । प्रवीन चंद्र गोयल को आशंका और डर दरअसल इस कारण से है क्योंकि वह देख रहे हैं कि चुनावी प्रक्रिया को लेकर असमंजस बना हुआ है और किसी के सामने यह स्पष्ट नहीं है कि चैलेंज करने तथा कॉन्करेंस देने के लिए समय-सीमा क्या है और चुनाव कब होगा ? प्रवीन चंद्र गोयल का कहना है कि जब सब कुछ तय है और राजा साबू ने उन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुनवाने का फरमान जारी कर दिया है, तथा सत्ता पक्ष के सभी लोग उनका फरमान पूरा करने के लिए तैयार हो गए हैं - तब फिर चुनावी प्रक्रिया को नियमानुसार और जल्दी से जल्दी पूरा क्यों नहीं करवा लिया जा रहा है, और चुनावी प्रक्रिया को लेकर नाहक ही मनमानी क्यों की जा रही है ? प्रवीन चंद्र गोयल तथा उनके शुभचिंतकों को लग रहा है कि चुनावी प्रक्रिया को लेकर की जा रही यह मनमानी उनका काम बिगाड़ सकती है, जैसा कि डीसी बंसल के मामले में हुआ है । उल्लेखनीय है कि डीसी बंसल के मामले में नाहक ही ऐसी ऐसी बेवकूफियाँ की गईं, जो उल्टी पड़ीं और बनता बनता काम बिगड़ गया । प्रवीन चंद्र गोयल को आशंका है तथा उन्हें डर है कि इस बार भी वैसा ही कुछ किया जा रहा है - और इस बार तो ऐसा लग रहा है जैसे कि जानबूझ कर किया जा रहा है । प्रवीन चंद्र गोयल इसीलिए मधुकर मल्होत्रा की भूमिका को लेकर सशंकित और डरे हुए हैं ।
इस वर्ष के चुनाव को लेकर चुनावी-प्रक्रिया के बाबत जो मनमानी होती हुई नजर आ रही है, उसमें सुना यह जा रहा है कि सत्ता खेमे के नेता इस वर्ष होने वाले वर्ष 2018-19 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के चुनाव से पहले वर्ष 2017-18 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का चुनाव करवाना चाहते हैं - और इसके लिए वर्ष 2018-19 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के चुनाव की प्रक्रिया को मनमाने तरीके से लंबा खींच देना चाहते हैं । वर्ष 2017-18 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद पर सत्ता खेमे की तरफ से डीसी बंसल का 'अधिकार' देखा जा रहा है, लेकिन मधुकर मल्होत्रा उनकी जगह नवजीत सिंह औलख को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुनवाना चाहते हैं । प्रवीन चंद्र गोयल तथा उनकी उम्मीदवारी के समर्थकों को लगता है कि वर्ष 2017-18 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का चुनाव पहले करवाने का फार्मूला मधुकर मल्होत्रा का ही है, और इस फार्मूले के पीछे मधुकर मल्होत्रा की नीयत वर्ष 2018-19 के लिए उनकी जीत की संभावना को धूमिल करना और या झमेले में फँसा देने की है । सत्ता खेमे के नेताओं के लिए इस बात पर यकीन करना हालाँकि मुश्किल तो हो रहा है कि मधुकर मल्होत्रा ऐसा कोई काम करेंगे, जिससे कि राजा साबू की और ज्यादा फजीहत हो - लेकिन पिछले करीब एक वर्ष में राजा साबू की जैसी छीछालेदर हुई है, उसे ध्यान में रखते हुए लोगों को लग रहा है कि राजा साबू को जब अपनी इज्जत की खुद ही परवाह नहीं है, तो फिर मधुकर मल्होत्रा ही उनकी परवाह क्यों करेंगे ? इसी तरह की बातों ने, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की चुनावी राजनीति के संदर्भ में अनुकूल स्थितियों के बावजूद प्रवीन चंद्र गोयल को डराया हुआ है और मधुकर मल्होत्रा के इरादों में उन्हें अपनी उम्मीदवारी की संभावना झंझटों में फँसती/पड़ती नजर आ रही है । मजबूरी लेकिन उनकी यह है कि वह करें भी तो आखिर क्या करें ?

Saturday, March 5, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन में एके सिंह की उम्मीदवारी को घोषित किए अपने समर्थन पर लोगों के बीच भरोसा न बन पाने का ठीकरा केएस लूथरा ने शिव कुमार गुप्ता के सिर फोड़ा

लखनऊ । केएस लूथरा ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार गुप्ता को इस बात के लिए कोसना शुरू कर दिया है कि एक वही हैं जो एके सिंह को उनके समर्थन के प्रति आश्वस्त नहीं होने दे रहे हैं - और एके सिंह तथा डिस्ट्रिक्ट में लोगों को उनके खिलाफ भड़का रहे हैं । केएस लूथरा के लिए समस्या की बात दरअसल यह हुई है कि एके सिंह की सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की उम्मीदवारी के पक्ष में होने तथा बातें करने के बावजूद एके सिंह और उनके समर्थकों के बीच ही नहीं, बल्कि डिस्ट्रिक्ट के तमाम लोगों के बीच उनकी भूमिका को लेकर संदेह बना हुआ है; तथा सभी को लगता है कि केएस लूथरा कभी भी एके सिंह के खिलाफ अपना उम्मीदवार ला सकते हैं । एके सिंह की उम्मीदवारी के प्रति व्यक्त किए जा रहे केएस लूथरा के समर्थन को डिस्ट्रिक्ट में अधिकतर लोग मजबूरी में किए जा रहे उनके नाटक के रूप में देख रहे हैं, और एके सिंह को सलाह दे रहे हैं कि केएस लूथरा की बातों में आकर उन्हें निश्चिन्त नहीं हो जाना चाहिए तथा सावधान रहना चाहिए । इस तरह की बातों ने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में केएस लूथरा की भूमिका को न सिर्फ अप्रासंगिक बना दिया है, बल्कि उन्हें एक मजबूर नेता के रूप में 'दिखाने' का भी काम किया है । केएस लूथरा ने हालाँकि अभी पिछले दिनों ही बलरामपुर में एके सिंह की उम्मीदवारी के पक्ष में जोरदार भाषण दिया था और उनकी तारीफ में लंबे-चौड़े कसीदे पढ़े थे - किंतु फिर भी एके सिंह के समर्थकों के बीच तथा डिस्ट्रिक्ट के कई लोगों के बीच उनकी भूमिका को लेकर बना हुआ संदेह दूर नहीं हुआ है; और एके सिंह की तारीफों से भरे केएस लूथरा के भाषण को केएस लूथरा की एक चाल के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है ।
केएस लूथरा अपनी भूमिका के प्रति बने इस संदेह के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर शिव कुमार गुप्ता को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं । केएस लूथरा का कहना है कि शिव कुमार गुप्ता अपने स्वार्थ में उनकी पहचान एके सिंह की उम्मीदवारी के विरोधी के रूप में बनाए रखना चाहते हैं, और इसके लिए वह लोगों के बीच उन्हें तरह तरह से बदनाम करते रहते हैं । केएस लूथरा का कहना है कि शिव कुमार गुप्ता चूँकि खुद डिस्ट्रिक्ट का नेता बनना चाहते हैं, इसलिए एके सिंह को गवर्नर बनवाने/चुनवाने का श्रेय वह अकेले ही लेना चाहते हैं - और अपनी इसी चाहत को पूरा करने के लिए वह उन्हें तथा दूसरे नेताओं के बारे में तरह तरह की बातें कहते/उड़ाते रहते हैं । शिव कुमार गुप्ता के प्रति केएस लूथरा की नाराजगी इस हद तक है कि वह यह याद दिलाने से भी नहीं चूक रहे हैं कि शिव कुमार गुप्ता उन्हीं की कृपा से आज गवर्नर हैं, और इस अहसान को मानने की बजाए आज वह उन्हीं की जड़ खोदने में लगे हुए हैं । उल्लेखनीय है कि शिव कुमार गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का कामकाज सँभालना शुरू करने के साथ ही केएस लूथरा की उनके प्रति नाराजगी दिखना शुरू हो गई थी । केएस लूथरा की शिकायत रही कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में शिव कुमार गुप्ता ने उन्हें उतनी तवज्जो नहीं दी, जितनी कि उन्हें मिलना चाहिए थी । इस मुद्दे पर दोनों के बीच शुरू हुआ खटराग सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के उम्मीदवार लेकर को और परवान चढ़ा । शिव कुमार गुप्ता ने शुरू से ही एके सिंह को अपने उम्मीदवार के रूप में प्रोजेक्ट किया, जबकि केएस लूथरा उम्मीदवार की तलाश में भटकते देखे/पाए । उम्मीद की जा रही थी कि एके सिंह की उम्मीदवारी के नाम पर डिस्ट्रिक्ट में जो आम सहमति बनती दिख रही है, उससे शिव कुमार गुप्ता व केएस लूथरा के बीच चल रहा खटराग समाप्त हो जायेगा - लेकिन देखने में आ रहा है कि समाप्त होने की बजाए उनके बीच का खटराग भड़क और रहा है ।
लोगों को लग रहा है कि उम्मीदवार खोज पाने की अपनी असफलता का ठीकरा शिव कुमार गुप्ता के सिर फोड़ने की केएस लूथरा की कोशिश इस खटराग को भड़काने का काम कर रही है । लोगों का कहना है कि एके सिंह की उम्मीदवारी के प्रति केएस लूथरा के समर्थन को डिस्ट्रिक्ट में यदि मजबूरी से प्रेरित तथा संदेह से देखा जा रहा है, तो इसके लिए खुद केएस लूथरा जिम्मेदार हैं - इसके लिए लेकिन शिव कुमार गुप्ता को जिम्मेदार ठहरा कर वह उनके प्रति अपने मन में गहरे से बैठी अपनी भड़ास को निकालने का काम कर रहे हैं । लोगों का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट में हर कोई जानता है कि एके सिंह की उम्मीदवारी के प्रति केएस लूथरा ने कभी भी समर्थन का भाव नहीं दिखाया और वह पीएस जग्गी को उम्मीदवार के रूप में प्रेरित करते हुए ही हमेशा नजर आए । केएस लूथरा वोटों का पूरा गणित जेब में रखकर रहते और जबतब लोगों को दिखाते/बताते रहते कि सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर तो वह बनेगा, जिसे उनका समर्थन मिलेगा । केएस लूथरा की बदकिस्मती लेकिन यह रही कि अपनी इस बात का भरोसा वह पीएस जग्गी को ही नहीं दिला पाए और केएस लूथरा के जीत के गणित के बावजूद वह एके सिंह के सामने उम्मीदवार बनने की हिम्मत नहीं कर सके । पीएस जग्गी के पीछे हटने के बाद अनीता गुप्ता का नाम चला - लेकिन उनका नाम जिस अचानक तरीके से सामने आया था, उतने ही अचानक तरीके से वह लुप्त भी हो गया । अनीता गुप्ता की अचानक प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी के पीछे भी केएस लूथरा को ही देखा/पहचाना गया, और माना गया कि केएस लूथरा के जीत के गणित पर उन्हें भी भरोसा नहीं हुआ । यानि बलरामपुर में केएस लूथरा ने एके सिंह की उम्मीदवारी को समर्थन देने की जो घोषणा की, वह उनका मजबूरी में लिया गया फैसला था । केएस लूथरा के लिए मुसीबत की बात यह रही कि केएस लूथरा के नजदीकी समझे जाने वाले लोगों ने ही एके सिंह और उनके समर्थकों को आगाह किया कि इसे केएस लूथरा की तरफ से अंतिम फैसला मत समझ लेना - चुनाव से पंद्रह दिन पहले भी यदि कोई उम्मीदवार बनने को राजी हो गया, तो लूथरा जी उसे समर्थन दे देंगे; जीत का गणित उनके पास है ही ! ऐसे में, एके सिंह और उनके समर्थक यदि केएस लूथरा पर भरोसा नहीं कर रहे हैं, और सावधानी बरते हुए हैं - तो केएस लूथरा भड़क क्यों रहे हैं ?

Friday, March 4, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में रोटरी वरदान ब्लड बैंक की आड़ में 45 लाख रुपए से ज्यादा की रकम हड़पने के उद्देश्य से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ तथा ब्लड बैंक से जुड़े लोगों के खुले मुँह तो खुले के खुले ही रह गए हैं, और साथ ही ब्लड बैंक का बन पाना भी खटाई में पड़ता दिख रहा है

गाजियाबाद । रोटरी वरदान ब्लड बैंक के मामले को निपटाने के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ की तरफ से जो 'प्रयास' हुए हैं, उससे यह बात अब रिकॉर्ड पर आ गई है कि इस ब्लड बैंक की आड़ में जेके गौड़ और उनके संगी-साथियों ने 70 हजार डॉलर, यानि 45 लाख रुपए से अधिक की रकम डकार जाने की पूरी और अच्छी तैयारी की थी । उल्लेखनीय है कि ग्लोबल ग्रांट नंबर 1527923 के तहत रोटरी वरदान ब्लड बैंक के लिए जेके गौड़ की देख-रेख में एक लाख 90 हजार डॉलर से अधिक रकम का एक प्रोजेक्ट तैयार किया था, और इसके लिए रोटरी फाउंडेशन से पैसा लेना था । इस प्रोजेक्ट के लिए 57 हजार 500 डॉलर रोटरी फाउंडेशन से मिलना तय हो चुका था, और इतनी ही रकम पाकिस्तान के रोटेरियंस से मैचिंग ग्रांट के तहत मिलना सुनिश्चित हो चुका था । दस हजार डॉलर डिस्ट्रिक्ट फंड से मिलने थे और 70 हजार डॉलर तीन क्लब्स - रोटरी क्लब साहिबाबाद, रोटरी क्लब गाजियाबाद ग्रेटर व रोटरी क्लब गाजियाबाद इंडस्ट्रियल टाउन ने अपने अपने सदस्यों से इकठ्ठा किए थे । यह सारी रकम रोटरी फाउंडेशन में संबंधित प्रोजेक्ट के नाम से इकठ्ठा हो चुकी थी - और बस मशीनों की खरीद के बिल प्रस्तुत होने का इंतजार किया जा रहा था । मशीनों की खरीद के नाम पर एक लाख 70 हजार डॉलर का जो बिल डीआरएफसी मुकेश अरनेजा की संस्तुति के लिए प्रस्तुत हुआ, उसमें लेकिन भारी लोचा देखा गया ।
'रचनात्मक संकल्प' की पिछली कुछेक रिपोर्ट्स में विस्तार से बताया जा चुका है कि मशीनों की खरीद से संबंधित विवरणों को छिपाया गया तथा मशीनों की सप्लायर कंपनी के पते व फोन नंबर देने से इंकार किया गया; और यहाँ तक कि खरीदी जा रही मशीनों की निर्माता कंपनी का नाम बताने तक से इंकार कर दिया गया । डीआरएफसी के रूप में मुकेश अरनेजा को शक हुआ कि ऐसा मशीनों की असली कीमत को छिपाने के उद्देश्य से किया गया है । उनका यह शक इस प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों द्वारा इशारों इशारों में यह बताए जाने से और मजबूत हुआ कि मशीनों की कीमतें खूब बढ़ा-चढ़ा कर - किन्हीं मामलों में तो दुगनी तक 'दिखाई' गई हैं । मुकेश अरनेजा ने स्पष्ट कर दिया कि इस तरह की बातों/चर्चाओं के बीच, मशीनों की खरीद से संबंधित पूरे डिटेल्स मिले बिना उनके लिए रकम रिलीज करने का ऑर्डर पास करना संभव नहीं होगा । इसके बाद भी जेके गौड़ और ब्लड बैंक की आड़ में पैसे 'बनाने' की तिकड़म में लगे पदाधिकारियों ने मशीनों की खरीद से जुड़े डिटेल्स नहीं दिए । डीआरएफसी के रूप में मुकेश अरनेजा को मामले से हटाने के लिए जेके गौड़ ने रोटरी फाउंडेशन से चालाकी भरा यह प्रयास जरूर किया कि इस प्रोजेक्ट को डिस्ट्रिक्ट प्रोजेक्ट की बजाए क्लब प्रोजेक्ट मान/बना दिया जाए । रोटरी फाउंडेशन के पदाधिकारियों ने लेकिन उनकी चालाकी को भाँप लिया और उनकी माँग को स्वीकार करने से मना कर दिया ।
रोटरी वरदान ब्लड बैंक की आड़ में कमाई करने की तैयारी कर चुके जेके गौड़ और उनके साथियों ने जब अपने आप को चारों तरफ से घिरा पाया, तो उन्होंने समर्पण करने में ही अपनी भलाई देखी/पहचानी । डीआरएफसी के रूप में मुकेश अरनेजा को मशीनों की खरीद से संबंधित जेके गौड़ की तरफ से जो संशोधित बिल मिला - इन पँक्तियों को पढ़ने वालों, यह जानने से पहले अपने अपने दिल थाम लेना कि उसमें मशीनों की कीमत एक लाख 70 हजार डॉलर से घटा कर मात्र एक लाख डॉलर कर दी गई । जेके गौड़ और इस प्रोजेक्ट से जुड़े दूसरे लोग यह बताने को तैयार नहीं हैं कि ब्लड बैंक के लिए आवश्यक जो मशीनें पहले एक लाख 70 हजार डॉलर में 'खरीदी' जा रही थीं, वह अब सिर्फ एक लाख डॉलर में कैसे मिल रही हैं ? आरोपपूर्ण आशंका है कि मशीनों की खरीद के नाम पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर जेके गौड़ और इस प्रोजेक्ट से जुड़े कर्ता-धर्ताओं ने 70 हजार डॉलर, यानि 45 लाख रुपए से अधिक की रकम डकार जाने का 'इंतजाम' कर लिया था - और इसके तहत ही पहले मशीनों की कीमत को 70 हजार डॉलर बढ़ा कर दिखाया गया था; मुकेश अरनेजा के सख्त रवैये के चलते लेकिन जो कामयाब नहीं हो सका । जेके गौड़ और उनके साथियों की बदकिस्मती रही कि अपने 'इंतजाम' को सफल बनाने के लिए उन्होंने चालबाजी दिखाते हुए रोटरी फाउंडेशन के पदाधिकारियों की जो 'मदद' लेने की कोशिश की, वह भी सफल नहीं हो सकी ।
जेके गौड़ और रोटरी वरदान ब्लड बैंक के दूसरे कर्ता-धर्ता इस तरह 70 हजार डॉलर की रकम की हेराफेरी करने के मामले में जब 'रंगे-हाथ' पकड़े गए, तो उन्होंने लीपापोती करने के अंदाज में एक होशियारी और दिखाई - बाद में उन्होंने 70 हजार डॉलर के खर्चे दिखाते/बताते हुए एक बिल डीआरएफसी मुकेश अरनेजा को और भेज दिया । रोटरी वरदान ब्लड बैंक को लेकर शुरू से ही बेवकूफी पर बेवकूफी करते जाने तथा रकम हड़पने के आरोपों में गहरे से गहरे धँसते जाने से बचने के लिए चला गया यह दाँव भी जेके गौड़ और ब्लड बैंक के कामकाज से जुड़े लोगों को उल्टा पड़ा है । डीआरएफसी मुकेश अरनेजा ने अभी हाल ही में जेके गौड़ को लिखा है कि ब्लड बैंक के लिए खरीदी जाने वाली मशीनों के लिए जो तीन-तीन तरफ के बिल दिए गए हैं, उससे मशीनों पर आने वाले खर्च का तथ्य स्पष्ट नहीं हो पा रहा है - इसलिए वह उचित तरीके से बनाया गया और ऑडिट किया हुआ बिल प्रस्तुत करें । समस्या की बात यह है कि उचित तरीके से बनाया गया बिल यदि वास्तव में प्रस्तुत किया जा सकता होता, तो फिर बिल व खर्चे को लेकर जेके गौड़ तथा ब्लड बैंक से जुड़े लोगों को बार-बार कलाबाजियाँ क्यों खानी पड़तीं तथा क्यों उन्हें फजीहत झेलनी पड़ती । मामला जहाँ आकर फँसा है - वहाँ का नजारा देखकर अभी तो यही लग रहा है कि ब्लड बैंक की आड़ में 45 लाख रुपए से ज्यादा की रकम हड़पने के उद्देश्य से जेके गौड़ तथा ब्लड बैंक से जुड़े लोगों के जो मुँह खुले थे, वह खुले के खुले ही रह गए हैं - और साथ ही ब्लड बैंक का बन पाना भी खटाई में पड़ता दिख रहा है ।

Wednesday, March 2, 2016

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी वन में रेखा गुप्ता और उनकी उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं के बीच एक-दूसरे की कमियाँ निकालने/बताने का खेल शुरू हो जाने से उनके समर्थकों के बीच न केवल निराशा पैदा हुई है, बल्कि वह विनय मित्तल के समर्थन की तरफ जाते हुए भी नजर आने लगे हैं

देहरादून । रेखा गुप्ता और शिव कुमार चौधरी की तरफ से संभावित हार का ठीकरा एक दूसरे के सिर फोड़ने की तैयारी जिस तरह से अभी से शुरू हो गई 'दिखने' लगी है, उससे रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थकों के बीच असमंजस पैदा हो गया है और वह विनय मित्तल की उम्मीदवारी के समर्थन की तरफ बढ़ने लगे हैं । पिछले दिनों रेखा गुप्ता की तरफ से उनकी उम्मीदवारी के समर्थकों को कई मौकों पर सुनने को मिला कि शिव कुमार चौधरी ने उन्हें जिस तरह का समर्थन दिलवाने का भरोसा दिया था, वैसा समर्थन वह अभी तक दिलवाते नजर नहीं आ रहे हैं । रेखा गुप्ता की शिकायत है कि उनकी पार्टियों में लोग आते तो हैं, लेकिन पार्टी में खाने-पीने के बाद ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे उन्हें उनकी उम्मीदवारी से कोई मतलब ही नहीं है । रेखा गुप्ता का कहना है कि कई पार्टियाँ कर लेने और तमाम पैसा खर्च कर देने के बाद भी उन्हें डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन जुटता हुआ नहीं दिख रहा है; और वह देख रही हैं कि जो नेता लोग उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में हैं भी - वह भी उनकी उम्मीदवारी को समर्थन दिलवाने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं । अपने समर्थक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स से तो रेखा गुप्ता बहुत ही नाराज हैं । अपने नजदीकियों के बीच उन्होंने हाल ही में कई बार यह बात कही है कि अपने समर्थक कई एक पूर्व गवर्नर्स पर उन्हें शक है कि वह अपने क्लब के वोट भी उन्हें दिलवा सकेंगे ? रेखा गुप्ता का स्पष्ट आरोप है कि उनकी उम्मीदवारी के समर्थक कई पूर्व गवर्नर्स उनसे पैसे खर्च करवाने में तो बहुत दिलचस्पी लेते हैं, किंतु उनकी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का काम करने की कोई परवाह नहीं करते हैं । अपनी उम्मीदवारी के प्रस्तोता/प्रवर्तक शिव कुमार चौधरी पर तो उनका बड़ा दिलचस्प किस्म का आरोप है; और वह यह कि शिव कुमार चौधरी तो बस उनसे यही कहते/बताते रहते हैं कि फलाँ गवर्नर नाराज है मैं उनसे मिल लूँ - और इस तरह कभी 'इस' पूर्व गवर्नर से तो कभी 'उस' पूर्व गवर्नर से मिल लेने के लिए ही कहते रहते हैं !
रेखा गुप्ता की शिकायतों की बात शिव कुमार चौधरी तक पहुँचती हैं, तो वह भी 'अपने तरीके' से उन पर भड़ास निकालते हैं । शिव कुमार चौधरी का कहना रहता है कि रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी को जो भी समर्थन मिल पा रहा है, वह सिर्फ उनकी अकेले की मेहनत का नतीजा है - और उम्मीदवार के रूप में रेखा गुप्ता अपनी ही उम्मीदवारी की खुद कोई मदद नहीं कर रही हैं । रेखा गुप्ता मीटिंग में न तो ठीक से बोल पाती हैं और न ही अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में एक भी वोट जोड़ पा रही हैं - सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह पैसे भी नहीं खर्च करना चाहती हैं । शिव कुमार चौधरी का कहना रहता है कि उनका बहुत सा समय तो रेखा गुप्ता को राजनीति बताने/समझाने में तथा उनसे पैसा निकलवाने में खर्च हो जाता है । शिव कुमार चौधरी का कहना है कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का जो समर्थन रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी को मिलता नजर आ रहा है, वह उनके कारण संभव हो सका है - और रेखा गुप्ता इस समर्थन को वोट में बदलने की कबायद कर सकने में असफल साबित हो रही हैं, तो इसमें मैं क्या सकता हूँ ? रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी के दूसरे कई समर्थकों की भी शिकायत है कि एक उम्मीदवार को लोगों के बीच जितना सक्रिय होना चाहिए, रेखा गुप्ता न तो उतना सक्रिय हैं - और न ही वह पैसे खर्च कर रही हैं जिससे कि कुछ न करने के बावजूद सक्रियता 'दिखे' तो ! मजे की बात यह देखने में आ रही है कि रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी के ही कई समर्थक विनय मित्तल को रेखा गुप्ता के मुकाबले एक बेहतर उम्मीदवार बता रहे हैं, और यह कहने में भी नहीं हिचकते हैं कि लायनिज्म व डिस्ट्रिक्ट की भलाई के लिए जरूरी है कि विनय मित्तल गवर्नर बनें ।
रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में  दिख रहे कई प्रमुख नेता इस बात को छिपाने की भी कोई कोशिश नहीं करते हैं और साफ साफ कहते भी हैं कि विनय मित्तल बढ़िया व्यक्ति हैं, उन्हें विनय मित्तल से कोई शिकायत नहीं है - वह तो मुकेश गोयल के विरोध के कारण रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में आए हैं । जाहिर है कि ऐसे लोगों/नेताओं की रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी  के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं बन सकी है । कहीं की ईंट और कहीं का रोड़ा लेकर रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थन में भानुमति का कुनबा तो जुड़ गया है - लेकिन यह कुनबा चूँकि कुछ करता हुआ नजर नहीं आ रहा है, इसलिए रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रति खुद रेखा गुप्ता भी और उनके समर्थक भी नाउम्मीद व निराश हो चले हैं और अपने ही समर्थकों को कोसने लगे हैं । रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी को चूँकि उनके अपने गृह-क्षेत्र देहरादून में ही समर्थन मिलता नहीं दिख रहा है, इसलिए दूसरे क्षेत्र के लोगों के बीच भी उनकी उम्मीदवारी को लेकर उत्साह पैदा नहीं हो पा रहा है । चुनाव में अपनी हार को सुनिश्चित जान कर रेखा गुप्ता ने जिस तरह से अपने समर्थक नेताओं को ही जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया है, उससे मामला और खराब होता जा रहा है । रेखा गुप्ता और उनकी उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं के बीच एक-दूसरे की कमियाँ निकालने/बताने का जो खेल शुरू हुआ है, उससे उनके समर्थकों के बीच न केवल निराशा पैदा हुई है - बल्कि उनके बीच कन्फ्यूजन भी फैला है और उनमें से कई लोग विनय मित्तल की उम्मीदवारी के समर्थन में जाते नजर आने लगे हैं ।

Tuesday, March 1, 2016

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई के भरोसे कॉलिज ऑफ गवर्नर्स का फैसला मानने से बचते दिख रहे दीपक बाबु पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अपमानित करने की हद तक जा पहुँचे हैं

मुरादाबाद । दीपक बाबु जिस तरह से डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स को छका रहे हैं और उनकी बात को अनसुना कर रहे हैं, उससे जाहिर है कि उन्होंने सुनील गुप्ता के साथ हुए प्रकरण से कुछ नहीं सीखा है और उन्होंने भी डिस्ट्रिक्ट व रोटरी का मजाक बनाने का फैसला कर लिया है । दीपक बाबु हालाँकि अभी थोड़े से भाग्यशाली दिख रहे हैं कि उनकी हरकतों से खिन्न और नाराज पूर्व गवर्नर्स अभी उनके पीछे उस तरह से नहीं पड़े हैं, जैसे कि सुनील गुप्ता से नाराज पूर्व गवर्नर्स उनके पीछे पड़ गए थे । किंतु दीपक बाबु अपनी बातों और अपनी हरकतों से जिस तरह से पूर्व गवर्नर्स को चिढ़ा रहे हैं, और उन्हें लगातार अपमानित महसूस करा रहे हैं - उससे लगता नहीं है कि अपने डिस्ट्रिक्ट में दीपक बाबु का 'हनीमून पीरियड' ज्यादा दिन चल पायेगा । दीपक बाबु के लिए मुसीबत की बात दरअसल यह हो गई है कि सुनील गुप्ता के खिलाफ हुई कार्रवाई ने लोगों को आश्वस्त किया है तथा भरोसा दिया है कि उनके द्वारा की गई शिकायतों पर रोटरी इंटरनेशनल ध्यान देता है तथा कार्रवाई करता है - इस बात से लोगों को शिकायत करने का बल मिला है, और जाहिर तौर पर इसका खामियाजा दीपक बाबु को ही भुगतना पड़ेगा । दीपक बाबु हालाँकि इस बात की कोई परवाह करते हुए अभी नहीं देखे जा रहे हैं । उनके नजदीकियों का कहना है कि दीपक बाबु का मानना और कहना है कि सुनील गुप्ता तो मौजूदा इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन की सनक का शिकार हो गए हैं, और इंटरनेशनल प्रेसीडेंट पद पर केआर रवींद्रन के दिन अब ज्यादा नहीं बचे हैं - इसलिए उनकी परवाह करने की जरूरत नहीं है । उनके बाद इंटरनेशनल प्रेसीडेंट का पदभार सँभालने वाले जॉन जर्म उनके जैसे बिलकुल नहीं हैं, और वह शिकायतों पर कोई तवज्जो नहीं देंगे । रही बात इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई की - तो उनके बारे में दीपक बाबु का मानना/कहना है कि मनोज देसाई बड़े सज्जन पुरुष हैं, उनकी बस खुशामद करते रहो, और बाकी फिर चाहे जो करो - उन्हें कोई परवाह नहीं है ।  रोटरी इंटरनेशनल के बड़े पदाधिकारियों के इस आकलन के भरोसे ही दीपक बाबु ने अपने डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर्स को, उनकी सलाह को और कॉलिज ऑफ गवर्नर्स के फैसले को ठेंगा दिखाया हुआ है ।
उल्लेखनीय है कि पिछले महीने के शुरू में कॉलिज ऑफ गवर्नर्स ने अपनी मीटिंग में डिस्ट्रिक्ट में घटने वाली घटनाओं के कारण डिस्ट्रिक्ट की होने वाली बदनामी का संज्ञान लेते हुए कुछेक महत्वपूर्ण फैसले किए थे । गहन विचार-विमर्श के बाद कॉलिज ऑफ गवर्नर्स के बीच जिन बातों पर सहमति बनी, वह इस प्रकार थे : डिस्ट्रिक्ट में किसी को व्यवस्था संबंधी कोई शिकायत है तो वह सीधे रोटरी इंटरनेशनल में शिकायत नहीं करेगा; रोटरी इंटरनेशनल से अनुरोध किया जायेगा कि उसे कोई शिकायत मिले तो उसे वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को भेजे, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर उसे डिस्ट्रिक्ट आर्बिट्रेशन कमेटी के हवाले करे; पाँच सदस्यीय डिस्ट्रिक्ट आर्बिट्रेशन कमेटी का गठन किया जाए, जिसमें वरिष्ठता क्रम के अनुसार हर वर्ष दो वरिष्ठ पूर्व गवर्नर्स हों; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के मौजूदा दोनों उम्मीदवार अपनी अपनी उम्मीदवारी से इस्तीफा दें, तथा कॉलिज ऑफ गवर्नर्स जोन-अनुसार उनकी उम्मीदवारी के बारे में फैसला करें; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए डिस्ट्रिक्ट को तीन जोन में बाँटा जाए, जहाँ से बारी बारी से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार आएँ; आदि-इत्यादि । मीटिंग में इन मुद्दों पर पूर्व गवर्नर्स के बीच हालाँकि परस्पर विरोधी विचार भी थे, और कुछेक मौकों पर उनके बीच गर्मा-गर्मी भी हुई - लेकिन अंततः डिस्ट्रिक्ट व रोटरी के हित में इन मुद्दों पर उनके बीच सहमति बनी । रोटरी इंटरनेशनल के एक विशेष फैसले के आधार पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार सँभाल रहे दीपक बाबु ने कॉलिज ऑफ गवर्नर्स में घोषणा की कि वह तीन-चार दिन में इस मीटिंग के मिनिट्स डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच सार्वजनिक कर देंगे, जिससे कि इन फैसलों को लागू करने के लेकर डिस्ट्रिक्ट के लोगों की भी सहमति बनाई जा सके और मीटिंग के फैसलों को क्रियान्वित करने की दिशा में आगे बढ़ा जा सके । यह घोषणा किए हुए दीपक बाबु को करीब करीब तीन सप्ताह से ऊपर का समय हो चुका है, लेकिन उन्होंने अभी तक उक्त मीटिंग के मिनिट्स सार्वजनिक करने को लेकर कोई कार्रवाई नहीं की है । इस बीच जिन पूर्व गवर्नर्स ने उनसे इस बारे में बात की, उन्हें उन्होंने अलग अलग तरह की बहानेबाजी करके टरका दिया है । मजे की बात यह है कि दीपक बाबु के नजदीकियों से लोगों को सुनने को मिल रहा है कि दीपक बाबु न तो आर्बिट्रेशन कमेटी बनाने के पक्ष में हैं, और न डिस्ट्रिक्ट को तीन जोन में विभक्त करने के लिए राजी हैं, और न डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव को हतोत्साहित करने के लिए तैयार हैं - और इसीलिए वह कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में सर्वसम्मति से हुए फैसलों को क्रियान्वित करने को लेकर टाल-मटोल वाला रवैया अपना रहे हैं ।
वरिष्ठ पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर व इलेक्शन कमेटी के चेयरमैन केजी अग्रवाल को तो इस मामले में चुनौती सी देते हुए दीपक बाबु ने अपमानित तक कर दिया । इलेक्शन कमेटी के चेयरमैन के रूप में अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए केजी अग्रवाल ने दीपक बाबु को फोन करके यह जानना चाहा कि कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में लिए गए फैसलों को क्रियान्वित कराने के लिए वह क्या कदम उठा रहे हैं; दीपक बाबु ने उनकी बात का जबाव देने की बजाए उन्हें चुनौती सी दे डाली कि आप दोनों उम्मीदवारों से इस्तीफा ले लें और जो उचित समझें वह फैसला करें । दीपक बाबु यह कहते हुए यह भूल गए कि डिस्ट्रिक्ट व रोटरी के हित में उचित फैसला करने की जिम्मेदारी केजी अग्रवाल की नहीं, बल्कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का पदभार सँभालने के कारण उनकी है । भूले शायद वह कुछ नहीं, वह वास्तव में केजी अग्रवाल को अपमानित करते हुए यह जता/बता रहे थे कि मुझे कुछ नहीं करना है - अब तुमसे जो सकता हो वह कर लो । इकत्तीस वर्ष पहले गवर्नर रहे केजी अग्रवाल को मनमसोस कर रह जाना पड़ा । दीपक बाबु के नजदीकियों की मानें तो दीपक बाबु कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में हुए फैसलों पर धूल पड़ने देंगे, जिससे कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का चुनाव हो और उन्हें अपनी चौधराहट दिखाने/जताने का तथा पैसे बनाने का मौका मिले । दिवाकर अग्रवाल से बदला लेने के लिए भी दीपक बाबु को कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग के फैसले को ठंडे बस्ते में डालना जरूरी लग रहा है । दीपक बाबु को लगता है कि कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में लिए गए फैसले यदि लागू हो गए तो दिवाकर अग्रवाल इस वर्ष नहीं, तो अगले वर्ष आराम से गवर्नर बन जायेंगे । दीपक बाबु ऐसा नहीं होने देना चाहते हैं और इसके लिए वह अपने ही डिस्ट्रिक्ट के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को अपमानित करने की हद तक जाने के लिए तैयार हैं ।
दीपक बाबु के इस रवैये ने राजीव सिंघल और उनके नजदीकियों को भी डराना शुरू कर दिया है । उनकी चिंता यह है कि दीपक बाबु ने अपने रवैये से पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को ज्यादा नाराज कर दिया, तो कहीं डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए प्रस्तुत उनकी उम्मीदवारी मुसीबत में न पड़ जाए । राजीव सिंघल की उम्मीदवारी के समर्थक और शुभचिंतक हालाँकि जोरशोर से यह दावा करने में लगे हुए हैं कि दिल्ली स्थित रोटरी इंटरनेशनल के साउथ एशिया कार्यालय के पदाधिकारियों की देखरेख में चुनाव होने से उनकी जीत 'और पक्की' हो गई है; किंतु राजीव सिंघल और उनके नजदीकियों को डर यह सता रहा है कि सुनील गुप्ता की तरह कहीं उनके साथ भी धोखा हो गया तो क्या होगा ? उल्लेखनीय है कि सुनील गुप्ता को भी आश्वस्त किया गया था - और इस काम में राजीव सिंघल खुद भी आगे आगे थे - कि मनोज देसाई के होते हुए उन्हें डरने की चिंता नहीं करना चाहिए । पर यह आश्वासन सुनील गुप्ता के काम नहीं आया । राजीव सिंघल के कुछेक नजदीकियों का मानना और कहना है कि कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग में लिए गए फैसले से उनका गवर्नर बनने का रास्ता आसान हो गया है; अब उन्हें कोशिश सिर्फ यह करनी है कि जोन-अनुसार गवर्नर बनने की जो बात हो रही है उसमें उन्हें पहला नंबर मिल जाए - उन्हें लग रहा है कि इस कोशिश को सफल करना/बनाना कोई ज्यादा मुश्किल नहीं है । इसीलिए दीपक बाबु का रवैया उन्हें डरा रहा है और उन्हें लग रहा है कि दीपक बाबु की कारस्तानी कहीं उन्हें न ले डूबे - चुनाव आखिर चुनाव है, नतीजे का ऊँठ न जाने किस करवट बैठे ? राजीव सिंघल के कुछेक नजदीकी कहने भी लगे हैं कि दीपक बाबु और कॉलिज ऑफ गवर्नर्स के फैसले को न मानने में उनका साथ दे रहे लोग दरअसल अपना स्वार्थ देख रहे हैं, और उनके स्वार्थ के चक्कर में कहीं राजीव सिंघल का बंटाधार न हो जाए । राजीव सिंघल के जो नजदीकी ज्योतिष में विश्वास करते हैं, उनका तो और भी मजेदार आकलन है : उनका कहना है कि राजीव सिंघल की उम्मीदवारी के जो जो लोग घनघोर समर्थक रहे - जैसे योगेश मोहन गुप्ता, बृजभूषण और सुनील गुप्ता; वह सब एक एक करके सीन से गायब होते गए हैं; अब दीपक बाबु उनकी उम्मीदवारी के समर्थक के रूप में उभरे हैं, तो उनको भी मुश्किलों ने घेरना शुरू कर दिया है । राजीव सिंघल के लिए यह कोई अच्छे संकेत नहीं हैं - इसलिए उनके और उनके समर्थकों के लिए अच्छा यही होगा कि कॉलिज ऑफ गवर्नर्स के फैसले ने जो एक मौका बनाया है, उससे वह फायदा उठाएँ । दीपक बाबु के रवैये ने लेकिन उन्हें असमंजस में डाला हुआ है; और राजीव सिंघल व उनके नजदीकियों के लिए भी यह समझना मुश्किल हो रहा है कि दीपक बाबु की कारस्तानियाँ उनका काम बनायेंगी या बिगाड़ेंगी ?