Monday, April 15, 2019

रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता के साथ बनी दूरी के कारण इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव में पतली हुई हालत से उबरने के लिए विनोद बंसल ने शेखर मेहता व मनोज देसाई की मदद से अशोक गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट के एक प्रमुख कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति 'दिखा' कर बड़ा 'कांड' किया

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट 3054 तथा डिस्ट्रिक्ट 3060 द्वारा संयुक्त रूप से अहमदाबाद में आयोजित किए गए प्रेसीडेंट इलेक्ट व सेक्रेटरी इलेक्ट के ट्रेनिंग सेमीनार में आमंत्रित वक्ताओं में विनोद बंसल की उपस्थिति ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति के बनते-बिगड़ते समीकरणों में दिलचस्पी रखने वाले रोटेरियंस को चौंकाया है; और उन्हें उक्त कार्यक्रम में विनोद बंसल की मौजूदगी एक पहेली की तरह लगी है । हालाँकि कार्यक्रम जिन 'लोगों' का था, और कार्यक्रम में जो भी प्रमुख लोग शामिल थे - उनके साथ विनोद बंसल के नजदीक के संबंध रहे हैं; और विनोद बंसल उनके काम आते रहे हैं और बदले में समय-समय पर उनसे 'फायदे' भी लेते रहे हैं । इस पृष्ठभूमि में, उक्त कार्यक्रम में विनोद बंसल की उपस्थिति पर सवाल नहीं उठने चाहिए थे - लेकिन वह उठे हैं, तो इसका कारण इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के लिए बनने वाला समीकरण है । उल्लेखनीय है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए डिस्ट्रिक्ट 3054 के पूर्व गवर्नर अशोक गुप्ता उम्मीदवार हैं, तो डिस्ट्रिक्ट 3011 के पूर्व गवर्नर विनोद बंसल भी तैयारी करते सुने/देखे जा रहे हैं । इसलिए डिस्ट्रिक्ट 3054 के कार्यक्रम में विनोद बंसल की उपस्थिति राजनीतिक रूप से मामले को हैरान करने वाला बनाती है । मजे की बात यह है कि अशोक गुप्ता और विनोद बंसल - दोनों एक ही खेमे के उम्मीदवार के रूप में देखे/पहचाने जा रहे हैं, और जिन बड़े नेताओं को अशोक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है, विनोद बंसल भी उन्हीं नेताओं के भरोसे अपनी दाल गलाने की फिराक में बताये/सुने जा रहे हैं । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति के संदर्भ में लोगों के बीच अभी जो परसेप्शन है, उसमें अशोक गुप्ता का पलड़ा ही भारी देखा/समझा जा रहा है; लेकिन इसके बावजूद विनोद बंसल जिस तरह से तैयारी करते हुए देखे जा रहे हैं, उससे लोगों को यह अहसास भी हो रहा है कि विनोद बंसल को कहीं से तो 'फूँक' मिल रही है, जिसके भरोसे उन्हें 'लग' रहा है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद को लेकर जोन के रोटेरियंस के बीच अभी भले ही जो परसेप्शन हो, लेकिन उनके लिए मौका बन सकता है ।
दरअसल इसी कवायद के चलते डिस्ट्रिक्ट 3054 और डिस्ट्रिक्ट 3060 के संयुक्त कार्यक्रम में विनोद बंसल की उपस्थिति ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के कान खड़े किए हैं । इन खड़े कानों में उन्हें जो सुनाई दिया है, उससे परस्पर विरोधी दावे किए गए हैं । कुछेक लोगों का कहना है कि कार्यक्रम में विनोद बंसल का शामिल होना 'घर की बात' है, और इसमें 'राजनीति' नहीं देखी जानी चाहिए; लेकिन अन्य कुछेक लोगों का कहना है कि विनोद बंसल जब 'घर' में बबाल करने वाले हालात पैदा करने का काम कर रहे हैं तो फिर राजनीति तो देखी ही जाएगी । कहा/बताया और सुना जा रहा है कि उक्त कार्यक्रम का निमंत्रण पाने के लिए विनोद बंसल ने पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर शेखर मेहता और मनोज देसाई से तगड़ी सिफारिश करवाई, और उन दोनों की सिफारिश के बाद ही विनोद बंसल को उक्त कार्यक्रम का निमंत्रण मिला । यूँ तो विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के कार्यक्रमों का निमंत्रण पाने के लिए विनोद बंसल द्वारा लॉबिइंग करने की बात सुनी/बताई जाती है; लेकिन उस बात में कोई बुराई न देखने वाले लोगों का भी मानना/कहना है कि विनोद बंसल को डिस्ट्रिक्ट 3054 के कार्यक्रम में शामिल होने से बचना चाहिए था, क्योंकि उससे नाहक ही एक विवाद की सी स्थिति बनी है । कुछेक लोगों को आशंका है कि हो सकता है कि विनोद बंसल ने यह विवाद की सी स्थिति बनाने/दिखाने के लिए ही अशोक गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3054 के एक प्रमुख कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति को संभव बनाने के लिए शेखर मेहता व मनोज देसाई से दबाव डलवाया हो । इससे विनोद बंसल यह जताने/दिखाने में भी 'सफल' हुए हैं कि वह शेखर मेहता और मनोज देसाई से कभी भी कुछ भी करवा सकते हैं - उन्हें लगता है कि इससे इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उनकी उम्मीदवारी का 'वजन' बढ़ेगा ।
विनोद बंसल को इसकी बहुत 'जरूरत' भी है । असल में पिछले दिनों घटी कई घटनाओं से लोगों के बीच यह बात स्थापित हुई है कि खेमे के सबसे बड़े नेता - इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी सुशील गुप्ता के यहाँ विनोद बंसल का 'कद' घटा है । विनोद बंसल ने हालाँकि सुशील गुप्ता के यहाँ अपनी अच्छी 'जगह' बना ली थी, लेकिन इंटरनेशनल प्रेसीडेंट नॉमिनी बनने के बाद से उनके प्रति सुशील गुप्ता का रवैया कुछ बदला बदला सा दिख रहा है । सेन डिएगो में अभी पिछले ही दिनों संपन्न हुई इंटरनेशनल असेम्बली में सुशील गुप्ता ने विनोद बंसल की बजाये रंजन ढींगरा को अपने साथ ले जाने के मामले में जो तवज्जो दी, उसे विनोद बंसल के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा/पहचाना । अभी हाल ही में, सुशील गुप्ता की सरपरस्ती वाले रोटरी इंडिया वाटर कंजर्वेशन ट्रस्ट द्वारा दिल्ली में आयोजित किए गए 'वर्ल्ड वाटर डे' के कार्यक्रम में रंजन ढींगरा और अशोक गुप्ता की मौजूदगी तो लोगों को नजर आई, लेकिन विनोद बंसल उक्त कार्यक्रम में नहीं दिखे । विनोद बंसल के अपने डिस्ट्रिक्ट में लोगों का मानना/कहना है कि इस वर्ष हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में विनोद बंसल द्वारा निभाई गई भूमिका ने सुशील गुप्ता को नाराज करने का काम किया है, और इसीलिए विनोद बंसल अब उनकी गुडबुक में नहीं रह गए हैं । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में विनोद बंसल ने उन निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रवि चौधरी के उम्मीदवार अशोक कंतूर का समर्थन किया, जिन्होंने पिछले रोटरी वर्ष के अपने गवर्नर-काल में सुशील गुप्ता को तरह तरह से अपमानित किया और नीचा दिखाने वाले काम किए । विनोद बंसल के लिए बदकिस्मती की बात यह रही कि उनके समर्थन के बावजूद अशोक कंतूर चुनाव भी हार गए । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के चक्कर में विनोद बंसल की सुशील गुप्ता के साथ जो दूरी बनी, उससे इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के चुनाव के मामले में उनकी हालत खासी पतली कर दी । इस स्थिति से उबरने के लिए विनोद बंसल को कोई बड़ा 'कांड' करने की जरूरत थी - अशोक गुप्ता के डिस्ट्रिक्ट के एक प्रमुख कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति 'दिखा' कर जो उन्होंने कर दिया है । इसका उन्हें कोई राजनीतिक फायदा मिलेगा या नहीं, यह बात लेकिन आगे पता चलेगी ।

Saturday, April 13, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में अलग-थलग पड़े होने की फजीहत से छुटकारा पाने के लिए विन्स सेमीनार को मौके के रूप में इस्तेमाल करने की रमेश अग्रवाल की कोशिश को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता ने फेल किया; जिसके चलते रमेश अग्रवाल के लिए 'बैक टु स्क्वायर वन' वाली स्थिति बन गई है

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट 3012 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक गुप्ता ने दिल्ली में आयोजित हुए रीजनल विन्स ट्रेनिंग सेमीनार के आयोजन में दिलचस्पी न दिखा कर अपने ही डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर रमेश अग्रवाल और उनकी 'राजनीति' को खासा तगड़ा झटका दिया है । दीपक गुप्ता की बेरुखी के चलते उक्त सेमीनार के आयोजन की जिम्मेदारी रोटरी इंटरनेशनल के दिल्ली स्थित साऊथ एशिया ऑफिस के सिर पड़ी, जिसके कारण रमेश अग्रवाल को खासी फजीहत का सामना करना पड़ा । दरअसल रमेश अग्रवाल चाहते थे कि उक्त सेमीनार के आयोजन की जिम्मेदारी डिस्ट्रिक्ट 3012 ले ले, ताकि जोन के डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारियों के बीच यह संदेश जाए कि रमेश अग्रवाल की अपने डिस्ट्रिक्ट में गहरी पैठ है और उन्हें अपने डिस्ट्रिक्ट के पदाधिकारियों तथा सदस्यों का अच्छा समर्थन प्राप्त है । उल्लेखनीय है कि रमेश अग्रवाल इस 'प्रचार' से बड़े परेशान हैं कि उनके अपने ही डिस्ट्रिक्ट में उनकी कोई पूछ/पहचान नहीं है । मौजूदा डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुभाष जैन ने तो रमेश अग्रवाल को किनारे कोने में बैठाये रखा ही; डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी आलोक गुप्ता और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी नामित अशोक अग्रवाल भी उनके खिलाफ रहे हैं । दीपक गुप्ता और आलोक गुप्ता के विरोध के चलते ही रमेश अग्रवाल डीआरएफसी नहीं बन सके; और इस वर्ष हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में अशोक अग्रवाल को हरवाने के लिए रमेश अग्रवाल ने दिन-रात एक किया - लेकिन फिर भी अशोक अग्रवाल भारी जीत से विजयी हुए । पिछले रोटरी वर्ष में, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में सतीश सिंघल ने तो रमेश अग्रवाल का ऐसा बुरा हाल बना कर रखा हुआ था, कि रमेश अग्रवाल के दूसरे किसी डिस्ट्रिक्ट में ट्रांसफर लेने की चर्चा चल पड़ी थी । अपने ही डिस्ट्रिक्ट में ऐसी भारी फजीहत झेल रहे रमेश अग्रवाल के लिए यह फजीहत ज्यादा बड़ी मुसीबत की बात इसलिए भी थी कि इसके कारण उन्हें दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों के सामने लज्जित होना पड़ता था ।
रमेश अग्रवाल अपने आपको इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवार के रूप में प्रोजेक्ट करने के प्रयास में लगे हुए हैं; और इसके लिए रोटरी इंडिया विन्स के सेक्रेटरी पद को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं । उक्त सीढ़ी के जरिये वह दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स में घुसने की कोशिश करते हैं, लेकिन दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारी किसी न किसी तरह से उन्हें अहसास करा देते रहे हैं कि उन्हें पता है कि खुद अपने डिस्ट्रिक्ट में रमेश अग्रवाल की कैसी क्या हैसियत है ? इस बात को अनुभव करते हुए ही रमेश अग्रवाल ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता के साथ संबंध सुधारने का प्रयास किया । पिछले दिनों संपन्न हुए इस वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव ने रमेश अग्रवाल को दीपक गुप्ता के नजदीक आने का मौका भी दे दिया । दरअसल अशोक अग्रवाल को सुभाष जैन के उम्मीदवार के रूप में देखने के कारण दीपक गुप्ता और रमेश अग्रवाल ने अशोक अग्रवाल के विरोध का झंडा उठाया - तो वह अशोक अग्रवाल का तो कुछ नहीं बिगाड़ सके, लेकिन उस प्रक्रिया में उन दोनों को नजदीक आने का अवसर जरूर मिल गया । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में दीपक गुप्ता ने अपने कार्यक्रमों में रमेश अग्रवाल को तवज्जो दी, तो रमेश अग्रवाल को भी लगा कि उनका 'डिस्ट्रिक्ट-निकाला' खत्म हो गया है और अब वह डिस्ट्रिक्ट के कार्यक्रमों में शामिल हो सकेंगे । रमेश अग्रवाल के साथ एक बड़ी समस्या बताई जाती है कि कोई उन्हें ऊँगली पकड़ाए तो वह उसका पहुँचा पकड़ने के लिए लपकते हैं; इसी 'आदत' के चलते उन्होंने दीपक गुप्ता से उम्मीद की कि वह रीजनल विन्स ट्रेनिंग सेमीनार का आयोजन कर लें - दीपक गुप्ता ने लेकिन खर्चे का रोना रोकर इससे इंकार कर दिया । दीपक गुप्ता के बारे में भी मशहूर है कि वह दूसरों से तो काम लेना चाहते हैं, लेकिन दूसरों के काम आने से वह बचते हैं और दूर भागते हैं । रोटरी विन्स ट्रेनिंग सेमीनार के 'आयोजन' से इंकार करके दीपक गुप्ता ने रमेश अग्रवाल की सारी योजना पर पानी फेर दिया ।
रमेश अग्रवाल की योजना थी कि उनका डिस्ट्रिक्ट ही जब उक्त रीजनल सेमीनार आयोजित करेगा, तो रीजन/जोन में हो रखी उनकी बदनामी के दाग कुछ साफ होंगे और लोगों को पता चलेगा कि उनकी अपने डिस्ट्रिक्ट में अच्छी पैठ है । दीपक गुप्ता ने लेकिन बदनामी के दाग धोने की उनकी योजना को फेल कर दिया । दीपक गुप्ता ने कुछ ही दिन पहले रोटरी इंडिया वाटर कंजर्वेशन ट्रस्ट द्वारा आयोजित किए गए 'वर्ल्ड वाटर डे' का उदाहरण देते हुए तर्क दिया कि उक्त रीजनल ट्रेनिंग सेमीनार रोटरी इंडिया विन्स को ही करना चाहिए । उल्लेखनीय है कि रोटरी इंडिया विन्स ने गोवा, दिल्ली, कोलकाता व चेन्नई में रीजनल ट्रेनिंग सेमीनार करने की योजना बनाई है, जिनमें गोवा तथा दिल्ली में सेमीनार हो चुके हैं । दीपक गुप्ता का कहना रहा कि उक्त सेमीनार जब रोटरी इंडिया विन्स का कार्यक्रम है, तो कार्यक्रम रोटरी इंडिया विन्स को ही करना चाहिए । दीपक गुप्ता के स्पष्ट इंकार के बाद उक्त सेमीनार रोटरी इंटरनेशनल के दिल्ली स्थित साऊथ एशिया ऑफिस को आयोजित करना पड़ा, जिसके चलते ट्रेनिंग सेमीनार में उपस्थित विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारियों के सामने साऊथ एशिया ऑफिस के पदाधिकारियों के रूप में संजय परमार तथा निदा हसन की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो गई - और इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवार के संदर्भ में रमेश अग्रवाल से अपने आपको महत्त्वपूर्ण दिखलाने का मौका छिन गया । अपने ही डिस्ट्रिक्ट में अलग-थलग पड़े होने की फजीहत झेल रहे रमेश अग्रवाल के सामने विन्स ट्रेनिंग सेमीनार एक अच्छा मौका था, जिसमें वह उक्त फजीहत से छुटकारा पा सकते थे - लेकिन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता के रवैये ने उन्हें 'बैक टु स्क्वायर वन' वाली स्थिति में ला दिया है ।

Monday, April 8, 2019

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी वन की डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में ऑब्जर्वर की माँग के साथ नियमानुसार पैसे जमा करवाने से बचने की जगदीश अग्रवाल की कोशिश से लग रहा है जैसे कि उन्होंने मान लिया है कि वह एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं, जिसमें उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होना है

लखनऊ । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार जगदीश अग्रवाल की तरफ से ऑब्जर्वर की माँग तो कर दी गई है, उनकी माँग स्वीकार भी कर ली गई है - लेकिन इस माँग को व्यावहारिक रूप देने के लिए नियमानुसार जो पैसा जमा कराना होता है, जगदीश अग्रवाल अभी उससे बचने की कोशिश कर रहे हैं । इस बात से तथा इसी तरह के अन्य कुछेक उदाहरणों से जगदीश अग्रवाल के नजदीकियों को ही लग रहा है कि जगदीश अग्रवाल ने चुनाव में अपनी हार जैसे स्वीकार कर ली है, और वह संभल संभल कर पैसा खर्च कर रहे हैं । जगदीश अग्रवाल के समर्थक नेता हालाँकि उनमें जोश भरने का भरसक प्रयास कर रहे हैं, और उन्हें आश्वस्त कर रहे हैं कि 'लड़ाई' को चाहें किसी भी 'स्तर' पर ले जाना पड़े, वह लड़ेंगे और बीएम श्रीवास्तव को किसी भी कीमत पर जीतने नहीं देंगे । इस तरह के आश्वासनों से जगदीश अग्रवाल में कुछ समय के लिए जोश तो पैदा होता है, लेकिन फिर जल्दी ही उनके जोश की हवा निकल जाती है । दरअसल जगदीश अग्रवाल के समर्थक नेताओं ने अपनी खुन्नसबाजी में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनावी मुकाबले को उस 'स्थिति' में पहुँचा दिया है, जहाँ 'कोई नहीं जीतेगा' जैसे हालात बनेंगे । ऐसे में, जगदीश अग्रवाल को लगने लगा है कि जब वह जीतेंगे ही नहीं, तो फालतू में पैसा खर्च करने की जरूरत क्या है ? हालत यह हो गई है कि चुनाव अभियान से जुड़े दूसरे कई खर्चों में कटौती करने के साथ-साथ जगदीश अग्रवाल ने ऑब्जर्वर की माँग को व्यावहारिक रूप से पूरा करवाने के लिए दी जाने वाली रकम तक भी रोक ली है ।
उल्लेखनीय है कि लायंस इंटरनेशनल के नियमानुसार, सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का कोई उम्मीदवार चुनावी प्रक्रिया को लेकर यदि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की भूमिका पर संदेह करता है, तो वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की भूमिका को नियंत्रित करने के लिए लायंस इंटरनेशनल से ऑब्जर्वर नियुक्त करने की माँग कर सकता है । ऑब्जर्वर नियुक्त करने की माँग करते हुए उसे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर कार्यालय में एक हजार अमेरिकी डॉलर जमा करवाने होते हैं, जिससे ऑब्जर्वर के खर्चे पूरे किए जाते हैं । जगदीश अग्रवाल की तरफ से ऑब्जर्वर की माँग करते समय तो पैसे जमा नहीं ही करवाए गए, माँग स्वीकार हो जाने पर उन्होंने पैसे जमा करवाने की सुध नहीं ली और वह पैसा जमा करवाने से बचते हुए दिख रहे हैं । उनके नजदीकियों का कहना है कि जगदीश अग्रवाल अभी अपनी उम्मीदवारी को मंजूर किए जाने को लेकर चूँकि आश्वस्त नहीं हैं, इसलिए वह ऑब्जर्वर का पैसा जमा करवाने से बच रहे हैं; नजदीकियों के अनुसार ही, जगदीश अग्रवाल का सोचना/मानना/कहना है कि यदि उनकी उम्मीदवारी ही रिजेक्ट हो गई, तब फिर ऑब्जर्वर के आने या न आने का उनके लिए कोई मतलब ही नहीं रह जायेगा; और तब उनके द्वारा जमा करवाया गया पैसा बेकार ही चला जायेगा । जगदीश अग्रवाल के इस तर्क में दम तो है; लेकिन उनका यह तर्क यह भी जता/दिखा रहा है कि अपनी उम्मीदवारी को लेकर वह सशंकित बने हुए हैं । वास्तव में, जगदीश अग्रवाल की उम्मीदवारी पर शुरू हुए विवाद के बाद जगदीश अग्रवाल के समर्थकों ने जो बबाल मचाया है, उसने जगदीश अग्रवाल की उम्मीदवारी की जीत संभावनाओं पर कई तरह से प्रतिकूल असर डाला है - और जगदीश अग्रवाल की उम्मीदवारी को चौतरफा मुश्किलों ने घेर लिया है ।
जगदीश अग्रवाल की उम्मीदवारी के पेपर्स पर जो विवाद हुआ है, उससे एक बात तो लोगों के सामने साबित हो ही गई है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर बनने की इच्छा रखने वाले जगदीश अग्रवाल और उनका समर्थन करने वाले पूर्व गवर्नर्स नेता जब उम्मीदवारी के पेपर्स भी नियमानुसार तैयार करने/करवाने की काबिलियत नहीं रखते हैं, तो गवर्नर बन कर यह कैसे कैसे गुल खिलायेंगे ? जगदीश अग्रवाल की उम्मीदवारी के आधे-अधूरे पेपर्स रिजेक्ट होने से बचाने के लिए जगदीश अग्रवाल के समर्थक नेताओं ने कोर्ट-कचहरी करने की बात करके दबाव बनाने कजो प्रयास किया, उसका भी उल्टा असर होता दिख रहा है । बीएम श्रीवास्तव के समर्थकों की तरफ से भी सुना जा रहा है कि दबाव डाल कर जगदीश अग्रवाल की उम्मीदवारी के पेपर्स यदि स्वीकार करवा लिए गए, तो कोर्ट-कचहरी का रास्ता तो उन्हें भी पता है । इस तरह की बातों से लग रहा है कि जगदीश अग्रवाल की उम्मीदवारी यदि मंजूर हो जाती है, और किसी तरह की जुगाड़बाजी से जगदीश अग्रवाल चुनाव यदि जीत जाते हैं, तब फिर बीएम श्रीवास्तव कोर्ट-कचहरी जा कर जगदीश अग्रवाल की जीत को निरस्त करवा देंगे । जगदीश अग्रवाल के लिए मुसीबत की बात यह हो गई है कि उनके समर्थक नेताओं ने उनकी उम्मीदवारी बचाने के लिए जो 'छड़ी' उठाई थी; बीएम श्रीवास्तव और उनके समर्थकों ने उसी 'छड़ी' को जगदीश अग्रवाल पर तान दिया है । ऐसा लगता है कि बीएम श्रीवास्तव के समर्थकों ने तय किया है कि वह जगदीश अग्रवाल की उम्मीदवारी के मंजूर होने या न होने के पचड़े में अभी नहीं पड़ेंगे और चाहेंगे कि जगदीश अग्रवाल की उम्मीदवारी मंजूर हो जाए; उसके बाद दो बातें हो सकती हैं : एक यह कि बीएम श्रीवास्तव चुनाव जीत जाएँ; यदि ऐसा हुआ, तब तो कोई बात ही नहीं है; दूसरी संभावना के अनुसार, लेकिन यदि जगदीश अग्रवाल चुनाव जीत जाते हैं, तब बीएम श्रीवास्तव कोर्ट-कचहरी का रास्ता पकड़ेंगे और जगदीश अग्रवाल की उम्मीदवारी की योग्यता को ही चुनौती देंगे और इस तरह जगदीश अग्रवाल की चुनावी जीत निरस्त ही हो जायेगी । यानि हालात-ए-सूरत चाहें जो हो जगदीश अग्रवाल को दोनों ही स्थितियों में घाटा ही घाटा होना है । दरअसल, इसीलिए जगदीश अग्रवाल को लगने लगा है कि वह एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं, जिसमें उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होना है । इसीलिए उन्होंने उम्मीदवार के रूप में पैसे खर्च करने में 'सोचना' शुरू कर दिया है । ऑब्जर्वर की माँग के साथ नियमानुसार पैसे जमा करवाने से बचने की उनकी कोशिश ने लेकिन दिलचस्प स्थिति पैदा कर दी है ।

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3054 में बूढ़ों, बीमारों, गरीबों और अनपढ़ों की मदद के नाम पर ली गई ग्लोबल ग्रांट की रकम को हड़पने के मामले में रोटरी फाउंडेशन को गच्चा देने की पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनिल अग्रवाल की कोशिशों को इंटरनेशनल डायरेक्टर भरत पांड्या की मदद मिलेगी क्या ?

जयपुर । डिस्ट्रिक्ट ग्रांट के हड़पे गए करीब 20 लाख रुपए वापस करने के लिए रोटरी फाउंडेशन की तरफ से मिली समय-सीमा को पूरा होने में मुश्किल से दो दिन बचे हैं, लेकिन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर अनिल अग्रवाल पैसा वापस करते हुए 'लग' नहीं रहे हैं । रोटरी फाउंडेशन को गच्चा देने की अनिल अग्रवाल की कोशिश ने इंटरनेशनल डायरेक्टर भरत पांड्या को खासी मुश्किल में डाल दिया है । उल्लेखनीय है कि बूढ़ों, बीमारों, गरीबों और अनपढ़ों की मदद के नाम पर ली गई ग्लोबल ग्रांट की करीब 20 लाख रुपए की रकम को हड़पने के मामले में रोटरी इंटरनेशनल ने यह अनोखा फैसला लिया है कि घपले के किस्से के 'साइड हीरोज' को तो सजा दे दी गई है, लेकिन किस्से के मुख्य 'हीरो' अनिल अग्रवाल को बचने का मौका दिया गया । अनिल अग्रवाल के नजदीकियों का ही कहना/बताना रहा है कि बचने का यह मौका उन्हें भरत पांड्या की 'कोशिशों' से ही मिला है । रोटरी फाउंडेशन की तरफ से अनिल अग्रवाल को बचने का मौका मिला, तो ऐसा लगा कि अनिल अग्रवाल घपलेबाजी की रकम वापस करके अपने ऊपर लगे दाग को धोने/मिटाने की कोशिश करेंगे; उन्होंने दावे/वायदे भी किए कि वह चार/पाँच किस्तों में उक्त रकम वापस कर रहे हैं - लेकिन रोटरी फाउंडेशन से मिली समय-सीमा में वह इकन्नी भी जमा करने की कोशिश करते नहीं नजर आए हैं । इससे लग रहा है कि डिस्ट्रिक्ट ग्रांट के हड़पे गए करीब 20 लाख रुपए वापस करने के मामले में अनिल अग्रवाल रोटरी फाउंडेशन को धोखा दे रहे हैं । ऐसे में, यह देखना दिलचस्प होगा कि भरत पांड्या आगे भी उन्हें 'सजा' से बचा पायेंगे और/या उनकी मदद से हाथ खींच लेंगे ।
मामला अनिल अग्रवाल के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर-काल - वर्ष 2013-14 में मंजूर हुई डिस्ट्रिक्ट स्पोंसर्ड ग्लोबल ग्रांट (नंबर 1420550) का है, जिसके तहत 32169 अमेरिकी डॉलर की रकम डिस्ट्रिक्ट अकाउंट में आई । इस रकम को एक ओल्ड ऐज होम, एक कम्प्यूटर एजुकेशन सेंटर, एक टेलरिंग ट्रेनिंग सेंटर, एक प्रौढ़ शिक्षा केंद्र तथा प्राकृतिक चिकित्सा सुविधाओं से परिपूर्ण एक आयुर्वेदिक क्लीनिक खोलने में खर्च होना था; लेकिन इसमें बंदरबाँट हो गई और आरोपों के अनुसार यह कुछेक लोगों की जेबों में चली गई । रोटरी फाउंडेशन के पदाधिकारियों की पकड़ में मामला आया, और उन्होंने अनिल अग्रवाल से जबाव-तलब किया तो अनिल अग्रवाल ने यह तर्क देते हुए अपने आपको बचाने की कोशिश की कि आरोपित ग्रांट वास्तव में क्लब ग्रांट है, इसलिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में उनका उससे कोई लेनादेना नहीं है । हालाँकि तथ्य बताते हैं कि रोटरी फाउंडेशन को उक्त ग्रांट के लिए आवेदन डिस्ट्रिक्ट ग्रांट के नाम से दिया गया था; स्वीकृत रकम डिस्ट्रिक्ट अकाउंट में आई थी और जो अनिल अग्रवाल के हस्ताक्षर से ही अकाउंट से ली जा सकती थी और ली गई - और 'बँटी' । रोटरी फाउंडेशन के पदाधिकारियों के सामने मामले से अपने आपको बचाने की अनिल अग्रवाल की चालबाजियाँ काम नहीं आईं और उन्होंने अनिल अग्रवाल को जिम्मेदार ठहराते हुए ग्रांट की पूरी रकम रोटरी फाउंडेशन को वापस करने के लिए कहा । रोटरी फाउंडेशन की सिफारिश पर रोटरी इंटरनेशनल ने उक्त घपलेबाजी के मामले में डिस्ट्रिक्ट के दो क्लब्स को ग्रांट्स के लिए प्रतिबंधित कर देने का फैसला किया है; और साथ ही उनके दो पूर्व प्रेसीडेंट्स तथा एक वरिष्ठ रोटेरियंस को रोटरी में किसी भी अवॉर्ड तथा पोजीशन से प्रतिबंधित कर दिया गया है । रोटरी इंटरनेशनल की इस कार्रवाई से घबराए और परेशान हुए अनिल अग्रवाल ने इसके बाद दूसरा नाटक शुरू कर दिया ।
अनिल अग्रवाल ने रोटरी फाउंडेशन को विश्वास दिलाया कि वह 31 मार्च तक चार/पाँच किस्तों में उक्त रकम वापस कर देंगे । रोटरी फाउंडेशन ने उन्हें 10 अप्रैल तक पैसा जमा करा कर मामला क्लियर करने की समय-सीमा तय कर दी । अनिल अग्रवाल ने इस बीच तमाशेबाजी तो खूब की, जिसके तहत उन्होंने डिस्ट्रिक्ट के विभिन्न पदाधिकारियों को समय समय पर मेल लिखी कि मैं आपको चेक देने कब आ जाऊं - हर किसी ने उन्हें जबाव दिया कि उन्हें चेक किसी को देना नहीं है बल्कि संबंधित एकाउंट में जमा करवाना है, जिससे कि मामला सुलटे । रोटरी फाउंडेशन द्वारा दी गई समय सीमा समाप्त होने में अभी जब दो कार्यदिवस बचे हैं, अनिल अग्रवाल ने लेकिन एक किस्त का चेक भी संबंधित एकाउंट में जमा नहीं करवाया है । इससे लग रहा है कि रोटरी फाउंडेशन के पदाधिकारियों द्वारा मिली रियायत का फायदा उठाते हुए अनिल अग्रवाल ने मामले को उलझाने की ही कोशिश की है, और पैसा वापस/जमा करने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है । अनिल अग्रवाल की इस हरकत ने इंटरनेशनल डायरेक्टर भरत पांड्या के सामने गंभीर समस्या खड़ी कर दी है । भरत पांड्या ने अनिल अग्रवाल को इंदौर में होने वाली रोटरी जोन इंस्टीट्यूट में वीआईपी हॉस्पिटिलिटी कमेटी का चेयरमैन बनाया हुआ है; इंस्टीट्यूट में लेकिन लोग जब पूछेंगे कि रोटरी फाउंडेशन के साथ 'ठगी' करने वाले को उक्त कमेटी का चेयरमैन क्यों बनाया गया है - तो भरत पांड्या के लिए जबाव देना मुश्किल तो होगा ही । अनिल अग्रवाल के नजदीकियों को ही डर है कि भरत पांड्या ने अभी तक तो अनिल अग्रवाल को बचाया है; लेकिन पैसा वापस करने के मामले में अनिल अग्रवाल द्वारा की गई तमाशेबाजी से पैदा हुई स्थिति के चलते उनके लिए आगे अनिल अग्रवाल का बचाव कर पाना मुश्किल होगा । अनिल अग्रवाल हालाँकि अपने नजदीकियों को आश्वस्त कर रहे हैं कि रोटरी फाउंडेशन की तमाम कार्रवाई के बावजूद जैसे अभी तक उनका कुछ नहीं हुआ है, वैसे ही आगे भी उनका कुछ नहीं होगा । 

Saturday, April 6, 2019

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3011 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए महेश त्रिखा की उम्मीदवारी को स्वीकार करने तथा प्रस्तुत करने के लिए बड़े धूमधाम से हुई उनके क्लब की मीटिंग ने अशोक कंतूर व अजीत जालान के मुकाबले उनकी उम्मीदवारी को खासा महत्त्वपूर्ण बना दिया है

नई दिल्ली । महेश त्रिखा को लंबे इंतजार के बाद अंततः अपने क्लब - रोटरी क्लब दिल्ली साऊथ ईस्ट से डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की उम्मीदवारी के लिए हरी झंडी मिल गई है । उनकी उम्मीदवारी को हरी झंडी देने के लिए हुए आयोजन में क्लब के सदस्य - दोनों पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स सुरेश जैन और संजय खन्ना के साथ-साथ क्लब के कई पूर्व प्रेसीडेंट्स भी जिस उत्साह के साथ शामिल हुए, उससे लोगों को महेश त्रिखा की उम्मीदवारी को खासा 'दम' मिलता नजर आया है । उल्लेखनीय है कि जब से अगले रोटरी वर्ष के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवारों की दौड़ शुरू हुई है, तभी से महेश त्रिखा की उम्मीदवारी को लेकर संशय बना हुआ था । हालाँकि महेश त्रिखा खुद तो उम्मीदवार के रूप में खासे सक्रिय थे, लेकिन उनकी उम्मीदवारी की चूँकि कोई 'वकालत' करता हुआ नजर नहीं आ रहा था - इसलिए उनकी उम्मीदवारी को ज्यादा गंभीरता से नहीं देखा/पहचाना जा रहा था । दरअसल, महेश त्रिखा की उम्मीदवारी के जो स्वाभाविक सहयोगी/समर्थक हो सकते थे, उन्हें रविंदर उर्फ रवि गुगनानी की उम्मीदवारी के समर्थक के रूप में देखा/पहचाना जा रहा था; और इस कारण महेश त्रिखा के लिए 'अपने' लोगों के बीच ही अपनी उम्मीदवारी की दाल गलाना मुश्किल बना हुआ था । रवि गुगनानी के चुनावी मैदान छोड़ने के बाद बनी स्थिति में महेश त्रिखा के लिए रास्ता आसान तो हो गया था, लेकिन फिर भी नेता लोगों ने महेश त्रिखा की उम्मीदवारी को हरी झंडी देने से पहले स्थितियों को - खासतौर से उम्मीदवार के रूप में महेश त्रिखा की 'क्षमताओं' को ठीक से समझ लेना जरूरी समझा; और आश्वस्त हो जाने के बाद उन्होंने महेश त्रिखा की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है ।
माना/समझा जाता है कि महेश त्रिखा की उम्मीदवारी को उन नेताओं का समर्थन स्वाभाविक रूप से मिल सकेगा, जो पिछले चुनाव में अनूप मित्तल की उम्मीदवारी के साथ थे और जिन्होंने अपने अपने तरीके से अनूप मित्तल की चुनावी जीत में भूमिका निभाई थी । महेश त्रिखा ने शायद अपनी उम्मीदवारी को लेकर पहले से ही मन बना लिया था, और इसीलिए अनूप मित्तल के समर्थन में सक्रिय पूर्व गवर्नर्स के साथ वह किसी न किसी तरह संपर्क में रहे - ताकि अनूप मित्तल के बाद जब वह अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करें, तो उन पूर्व गवर्नर्स का समर्थन जुटाने में उनके सामने कोई समस्या खड़ी न हो । लगता है कि महेश त्रिखा का उक्त 'फार्मूला' काम कर गया है; क्योंकि क्लब से हरी झंडी मिलने के बाद उनकी उम्मीदवारी के स्वाभाविक सहयोगियों व समर्थकों ने उनकी उम्मीदवारी के प्रति जो उत्साह प्रकट किया है - उससे लगता है कि जैसे वह क्लब से महेश त्रिखा की उम्मीदवारी के क्लियर होने का ही इंतजार कर रहे थे । क्लब से महेश त्रिखा की उम्मीदवारी को हरी झंडी मिलने का उतना महत्त्व नहीं है; वह तो मिल ही जाती - हर उम्मीदवार को अपने क्लब से क्लियरेंस तो मिल ही जाती है; महत्त्व की ज्यादा बड़ी बात यह है कि महेश त्रिखा की उम्मीदवारी को स्वीकार करने तथा प्रस्तुत करने के लिए क्लब की बड़े धूमधाम से मीटिंग हुई और उसमें क्लब के आम व खास लोगों ने खासे जोशोखरोश के साथ हिस्सा लिया । यह बात इसलिए और भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के बाकी दोनों संभावित उम्मीदवारों - अशोक कंतूर व अजीत जालान को अपने अपने क्लब में वैसा एकजुट व उत्साहपूर्ण समर्थन नहीं है, जैसा कि महेश त्रिखा के लिए उनके क्लब में दिखा है ।
उल्लेखनीय है कि अशोक कंतूर ने तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के पिछले चुनाव में मिली हार के लिए अपने क्लब के सदस्य - पूर्व गवर्नर रमेश चंदर को भी जिम्मेदार ठहराया था । लगता नहीं है कि अगले चुनाव में भी उन्हें रमेश चंदर का सहयोग/समर्थन मिल पायेगा । अजीत जालान की तो अपने क्लब में हालत और भी पतली है । अजीत जालान खुद लोगों से कहते/बताते रहे हैं कि मौजूदा प्रेसीडेंट विनोद कुमार बंसल उनकी उम्मीदवारी में रोड़ा अटका कर खुद उम्मीदवार बनने के चक्कर में हैं, और उन्होंने बड़ी मुश्किल से घेराबंदी कर/करवा कर उन्हें रोका/संभाला हुआ है तथा अपनी उम्मीदवारी को बचाया हुआ है । अशोक कंतूर और अजीत जालान को अपने अपने क्लब में जिन चुनौतियों और मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, उसके चलते उन्हें अपनी अपनी उम्मीदवारी के लिए हरी झंडी मिलने में तो कोई समस्या नहीं आयेगी; जैसा कि पहले ही कहा/बताया जा चुका है कि वह तो हर उम्मीदवार को मिल ही जाती है - लेकिन क्लब में ही उम्मीदवारी को लेकर झगड़े/टंटे हों, तो उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के अभियान पर प्रतिकूल असर तो पड़ता ही है । अशोक कंतूर और अजीत जालान को इस मुश्किल से तो दो-चार होना ही पड़ेगा; महेश त्रिखा ने लेकिन इस समस्या से निजात पा ली है । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उनकी उम्मीदवारी की प्रस्तुति के कार्यक्रम में क्लब के हर आम और खास सदस्य की जैसी भूमिका और सक्रियता रही तथा 'दिखी', उससे महेश त्रिखा की उम्मीदवारी खासी महत्त्वपूर्ण हो उठी है ।

Friday, April 5, 2019

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 सी टू में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मधु सिंह और उनके पति पूर्व गवर्नर विश्वदीप सिंह की सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के दोनों उम्मीदवारों के साथ 'दिखने' की कार्रवाई ने सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के अभियान को तगड़ा झटका दिया है

आगरा । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर विश्वदीप सिंह का अपेक्षित समर्थन न मिल पाने के कारण सुनीता बंसल की उम्मीदवारी का अभियान जोर पकड़ने से पिछड़ता जा रहा है, जिस कारण उनके समर्थकों के बीच निराशा बढ़ती जा रही है । उल्लेखनीय है कि सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के समर्थकों ने जोरशोर से घोषणा की हुई थी कि विश्वदीप सिंह और उनकी पत्नी फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मधु सिंह का समर्थन सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के साथ है । इस घोषणा के जरिये सुनीता बंसल के समर्थकों का उद्देश्य दरअसल अगले लायन वर्ष की डिस्ट्रिक्ट टीम में प्रमुख पद पाने के आकांक्षी लोगों का समर्थन जुटाना था । सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के समर्थन को वास्तव में इसीलिए महत्त्वपूर्ण माना/पहचाना जाता है, क्योंकि उसके पास ही पदों का लालच देकर वोट खींचने की क्षमता होती है । मधु/विश्वदीप सिंह की इसी क्षमता को देखते/पहचानते हुए सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के समर्थक उनके समर्थन के दावे करते हुए खासे जोश में थे । सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन जुटाने/दिखाने के उद्देश्य से होली मिलन के बहाने से आगरा में जो पहला कार्यक्रम हुआ, उसमें मधु/विश्वदीप सिंह की उपस्थिति ने सुनीता बंसल के समर्थकों के जोश को और बढ़ाने का काम किया । लेकिन मधु/विश्वदीप सिंह जब सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के दूसरे उम्मीदवार श्याम बिहारी अग्रवाल के कार्यक्रम में भी पहुँचे हुए दिखे, तो सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के समर्थकों का उक्त जोश ठंडा पड़ गया । उसके बाद भी मधु/विश्वदीप सिंह ने ऐसा कोई काम नहीं किया है, जिसे सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के समर्थन में किये गए काम के रूप में देखा/पहचाना जा सके । इससे सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए प्रस्तुत सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं के हौंसले पस्त हुए पड़े हैं ।
डिस्ट्रिक्ट की राजनीति की खेमेबाजी के समीकरणों से परिचित लोगों का मानना और कहना है कि खेमेबाजी के समीकरणों के आधार पर विश्वदीप सिंह को रहना/होना तो सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के साथ ही चाहिए; लेकिन पिछले अनुभवों को ध्यान में रखते हुए विश्वदीप सिंह फूँक-फूँक कर कदम रख रहे हैं और ऐसा कोई काम नहीं करना चाहते हैं जिससे कि मधु सिंह का गवर्नर-वर्ष और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में मधु सिंह का नाम खराब हो । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट की राजनीति में विश्वदीप सिंह ने अपनी चौधराहट बनाने/दिखाने/चलाने के लिए काम तो धमाकेदार किए थे, लेकिन उनके नतीजों के रूप में उन्हें और डिस्ट्रिक्ट को सिर्फ बदनामी ही हाथ लगी थी । उस बदनामी के चलते विश्वदीप सिंह डिस्ट्रिक्ट में लोगों से इतने दूर हो गए कि कई वर्ष बाद जब उनकी पत्नी मधु सिंह सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार बनीं, तो चुनाव हार गईं । डिस्ट्रिक्ट में लोगों ने उस हार को मधु सिंह की हार के रूप में नहीं, बल्कि विश्वदीप सिंह की हार के रूप में देखा/पहचाना । उसके अगले वर्ष, जब मधु सिंह सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर चुनी गईं, तो अप्रत्याशित रूप से उन्हें उन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का भी समर्थन मिला, जो विश्वदीप सिंह के फैसलों के शिकार हुए थे - और इसी कारण से उनकी 'जीत' को विश्वदीप सिंह की जीत के बजाए 'मधु सिंह की जीत' के रूप में देखा/पहचाना गया । जो लोग विश्वदीप सिंह और मधु सिंह, दोनों को जानते हैं - उनका कहना/बताना है कि दोनों के स्वभाव व व्यवहार में जमीन/आसमान का अंतर है, और विश्वदीप सिंह का स्वभाव अभी भी लगभग पहले जैसा ही 'गर्म' है । लेकिन लगता है कि बुरे नतीजों और अनुभवों से विश्वदीप सिंह ने शायद इतना सबक सीख लिया है कि फालतू के पंगे करने से बचा जाये; और या उन्हें लगता हो कि उनकी गवर्नरी और गवर्नर के रूप में उन्हें जैसी जो बदनामी मिली, वैसा हाल मधु सिंह का न हो । लोगों को लगता है कि इसीलिए मधु/विश्वदीप सिंह सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में किसी एक उम्मीदवार के साथ 'दिखने' से बच रहे हैं ।
मधु/विश्वदीप सिंह की इस 'स्थिति' ने सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के लिए गंभीर चुनौती और मुसीबत खड़ी कर दी है । सुनीता बंसल की उम्मीदवारी को यूँ तो कई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का समर्थन मिल रहा है, लेकिन फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मधु सिंह के पति होने के नाते विश्वदीप सिंह के समर्थन का उनके लिए खास महत्त्व था; विश्वदीप सिंह ने लेकिन दोनों उम्मीदवारों के साथ 'दिख' कर सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के समर्थकों को बुरी तरह निराश किया है और सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के अभियान को तगड़ा झटका दिया है । सुनीता बंसल की तरफ से हालाँकि खासी मेहनत की जा रही है, और रिश्तेदारियाँ निकाल निकाल कर उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन जुटाने का प्रयास किया जा रहा है - जिस कारण सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद का चुनाव रोमांचपूर्ण होता दिख रहा है । लेकिन चुनावी राजनीति के समीकरणों में होने वाले उलटफेर से परिचित लोगों का मानना और कहना है कि चुनाव में जीत सिर्फ 'शोर-शराबे' से नहीं मिलती, उसके लिए ठोस व्यवस्था करना होती है और जो किसी महत्त्वपूर्ण 'ऑफिस' के जरिये होती है । फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के 'ऑफिस' के समर्थन का शोर सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के समर्थकों ने दरअसल इसीलिए मचाया हुआ था - जिसे लेकिन मधु/विश्वदीप सिंह की दोनों उम्मीदवारों के साथ 'दिखने' की कार्रवाई ने झटका दिया हुआ है । एक समस्या और है, और वह यह कि सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के समर्थन में वह लोग भी देखे/पहचाने जा रहे हैं, पूर्व में जिनका विश्वदीप सिंह के साथ टंटा रहा है - ऐसे में उनका और विश्वदीप सिंह का एकसाथ सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के समर्थन में चलना मुश्किल ही है; और इसीलिए सुनीता बंसल के चुनाव अभियान में सक्रियता तो अच्छी दिख रही है, लेकिन वह सक्रियता चुनावी नजरिये से कोई प्रभाव बनाती/छोड़ती हुई नहीं नजर आ रही है; और यही बात सुनीता बंसल की उम्मीदवारी के समर्थकों को निराश/हताश कर रही है ।

Thursday, April 4, 2019

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल के मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 की चुनावी राजनीति लीडरशिप के प्रयासों से इस बार जिस सौहार्दपूर्ण तरीके से निपटती नजर आ रही है, उससे मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए विनय मित्तल के नाम पर बनती दिख रही सहमति को निर्णायक रूप लेते हुए देखा/पहचाना जा रहा है

नई दिल्ली । मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के पद को लेकर शुरू में गर्मी खा रही राजनीति अब जिस तरह ठंडी पड़ती और गंतव्य पर पहुँचती दिख रही है, उसमें संभावित उम्मीदवारों में सबसे पीछे चल रहे विनय मित्तल की दाल गलने का मौका बनता नजर आ रहा है । उल्लेखनीय है कि अभी दो/ढाई महीने पहले तक मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद को लेकर राजनीतिक उठापटक खासी तेज थी, और उक्त पद के लिए लीडरशिप के बीच वीके हंस तथा बिरिंदर सोहल की दावेदारी पर चर्चा थी, और विरोधी उम्मीदवार के रूप में तेजपाल खिल्लन की सक्रियता थी । विनय मित्तल का नाम भी उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना तो जा रहा था, लेकिन चूँकि उनकी उम्मीदवारी की वकालत लीडरशिप का कोई बड़ा नेता नहीं कर रहा था - इसलिए संभावित चार उम्मीदवारों में उन्हें सबसे पीछे माना/समझा जा रहा था । लेकिन पिछले दिनों मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट तथा मल्टीपल के विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स में राजनीति की जैसी जो हवा चली, उसके चलते मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की चुनावी राजनीति के सारे समीकरण उलट-पलट गए । दरअसल वीके हंस और बिरिंदर सोहल अपने अपने डिस्ट्रिक्ट के राजनीतिक चक्रव्यूह में ऐसे फँसे कि उनकी वकालत करने वाले नेता पीछे हट गए और इस तरह मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद की उनकी उम्मीदवारी पर नकारात्मक असर पड़ा । इनके उलट, विनय मित्तल ने अपने डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में अपनी ऐसी धमक दिखाई, जो किसी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के लिए सोची भी नहीं जा सकती है । डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में विनय मित्तल ने जो हासिल किया, वह धैर्य-धीरज, मिलनसार, सभी को उचित सम्मान देने, ईमानदारी से काम करने और प्रशासनिक प्रबंधन की खूबी रखने जैसे अपने रवैये से हासिल किया । विनय मित्तल ने अपने इसी रवैये से मल्टीपल के छोटे-बड़े नेताओं तथा विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के बीच अपनी पहचान, साख और विश्वसनीयता बनाई ।
मल्टीपल के नेताओं के बीच विनय मित्तल की पहचान, साख और विश्वसनीयता भले ही बनी हो; लेकिन मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए वकालत करने वाला नेता विनय मित्तल को तब भी नहीं मिला । वीके हंस तथा बिरिंदर सोहल की तरफ से निराश होने के बाद मल्टीपल के नेताओं के बीच प्रभात चतुर्वेदी का नाम आया । प्रभात चतुर्वेदी ने लेकिन निजी कारणों से मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन बनने से इंकार कर दिया । लीडरशिप के बीच मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के उम्मीदवार को लेकर असमंजस व अनिर्णय दिखा, तो तेजपाल खिल्लन ने अपनी उम्मीदवारी के लिए कमर कस ली । तेजपाल खिल्लन की सक्रियता ने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए उम्मीदवार तय करने के मामले में लीडरशिप के नेताओं को चौकन्ना किया, और तब विनय मित्तल का नाम लीडरशिप के नेताओं के बीच चर्चा में आया । यह सच है कि लीडरशिप के नेताओं में विनय मित्तल की उम्मीदवारी का कोई 'वकील' नहीं है, लेकिन सच यह भी है कि विनय मित्तल के नाम पर किसी का कोई विरोध भी नहीं है । बल्कि अपने डिस्ट्रिक्ट में विनय मित्तल ने जो 'राजनीतिक धमाल' किया है, उसके 'राजनीतिक संदेशों' को 'पढ़ते' हुए लीडरशिप के नेताओं के बीच विनय मित्तल को लेकर एक बड़ी 'राजनीतिक उम्मीद' बनी है । लीडरशिप के बीच मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए विनय मित्तल का नाम जिस तरह चर्चा में आ गया है, उसने विनय मित्तल की उम्मीदवारी को अचानक से महत्त्वपूर्ण और गंभीर बना दिया है ।
मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए लीडरशिप के बीच विनय मित्तल की उम्मीदवारी के गंभीर रूप लेने का एक अन्य प्रमुख कारण विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के बीच विनय मित्तल के लिए बना/दिखा समर्थन भी रहा । दरअसल धैर्य-धीरज, मिलनसार, सभी को उचित सम्मान देने, ईमानदारी से काम करने और प्रशासनिक प्रबंधन की खूबी रखने जैसे अपने रवैये से विनय मित्तल ने डिस्ट्रिक्ट में अपनी जो धमक जमाई; उसी रवैये से उन्होंने विभिन्न डिस्ट्रिक्ट्स के पदाधिकारियों के बीच भी अपनी पहचान व साख बनाई - जो मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए समर्थन में परिवर्तित हुई नजर आ रही है । लीडरशिप के नेताओं ने मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की राय जानने का काम किया, तो उन्हें विनय मित्तल के लिए अच्छा समर्थन दिखा । इस बार लीडरशिप के व्यवहार में एक बड़ा परिवर्तन यह भी देखने में आ रहा है कि वह अपनी पसंद थोपने की जिद नहीं पकड़े हुए है, और फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की राय को भी महत्त्व देती हुई नजर आ रही है और उन्हें विश्वास में लेकर एक बेहतर प्रशासनिक क्षमता के व्यक्ति को ही मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के पद पर लाना चाहती है । इस चक्कर में मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद के लिए विनय मित्तल की उम्मीदवारी महत्त्वपूर्ण होती हुई लग रही है । मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन के चुनाव में अभी हालाँकि करीब एक महीने से कुछ अधिक का समय बाकी है और इतना समय बड़े उलट-फेर के लिए काफी माना जाता है - लेकिन इस बार मल्टीपल की चुनावी राजनीति जिस सौहार्दपूर्ण तरीके से निपटती दिख रही है, और लीडरशिप छोटे-छोटे झगड़े आपसी बातचीत से हल करने तथा उन्हें बढ़ने न देने में दिलचस्पी ले रही है, उससे लगता नहीं है कि मल्टीपल काउंसिल चेयरमैन पद को लेकर अब ज्यादा उथल-पुथल होने का मौका बचा है; लेकिन राजनीति में कब क्या हो जाए - यह भी दावे के साथ कोई नहीं कह सकता है ।