Sunday, September 23, 2012

रमेश अग्रवाल ने ललित खन्ना की उम्मीदवारी के मामले में जो शीर्षासन किया, मुहावरे की भाषा में उसे - 'थूक कर चाटना' कहते हैं

नई दिल्ली | रमेश अग्रवाल ने करीब चार महीने पहले ललित खन्ना की उम्मीदवारी को लेकर जो तड़ी दिखाई थी, ललित खन्ना ने उसका उन्हें सटीक जबाव दे दिया है | नतीजा यह हुआ है कि रमेश अग्रवाल की सारी तड़ी निकल गई और अब उन्होंने मान लिया है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए ललित खन्ना की उम्मीदवारी प्रस्तुत हो सकती है | इस प्रसंग से एक बार फिर साबित हुआ है कि रमेश अग्रवाल को अपनी फजीहत कराने का कुछ ज्यादा ही शौक है | शौक क्या है - वह बिना सोचे-विचारे तड़ी दिखाते हैं और फिर फजीहत का शिकार होते हैं | ललित खन्ना के मामले में उन्होंने जो किया, मुहावरे की भाषा में उसे - 'थूक कर चाटना' कहते हैं | उल्लेखनीय है कि मई में रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड द्धारा तय किए गए दिशा-निर्देशों को बिना समझे-बूझे रमेश अग्रवाल ने ललित खन्ना को फरमान सुना दिया कि चूँकि उन्होंने डिस्ट्रिक्ट का एक असाइनमेंट स्वीकार किया हुआ है, इसलिए वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उम्मीदवार नहीं हो सकेंगे | रमेश अग्रवाल ने जो कुछ कहा, ललित खन्ना ने उसका मतलब यही समझा था जैसे कि वह उन्हें सलाह दे रहे हैं कि उन्हें यदि सचमुच उम्मीदवार होना है तो जो असाइनमेंट उनके पास है उसे छोड़ दें | ललित खन्ना ने रमेश अग्रवाल की सलाह मानने में जरा सी भी देर नहीं लगाई और तुरंत अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया | बात यहीं ख़त्म हो जानी चाहिए थी | लेकिन वह यदि यहीं ख़त्म हो जाती तो रमेश अग्रवाल को अपना घटियापन दिखाने का मौका कैसे मिलता और कैसे वह अपनी फजीहत के लिए स्थितियां बनाते ?
रमेश अग्रवाल ने ललित खन्ना को तुरंत यह बताना जरूरी समझा कि वह यह न समझ लें कि अपने पद से इस्तीफ़ा देने के बाद वह उम्मीदवार हो जायेंगे | यह जून 2012 की बात है - जबकि न तो इस तरह की बातें करने का समय था और न ही कोई जरूरत थी और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट के रूप में रमेश अग्रवाल को इस बात को कहने का न कोई अधिकार था | लेकिन रमेश अग्रवाल इस तरह की बातों की परवाह नहीं करते हैं और अपनी तड़ीबाजी दिखाने के लिए कभी भी कोई भी बात करना अपना अधिकार समझते हैं | इसी तड़ीबाजी में रमेश अग्रवाल ने जून में ललित खन्ना को बाकायदा लिख कर बता दिया कि वह उम्मीदवार नहीं हो सकते | ललित खन्ना को दिखाई गई रमेश अग्रवाल की इस तड़ीबाजी से निपटने का जिम्मा पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर केके गुप्ता ने संभाला | केके गुप्ता उसी रोटरी क्लब दिल्ली नॉर्थ के सदस्य हैं, जिसमें ललित खन्ना हैं | ललित खन्ना के साथ की जा रही रमेश अग्रवाल की बदतमीजी को केके गुप्ता ने क्लब पर हमले के रूप में देखा/पहचाना और क्लब की इज्ज़त व साख बचाने के उद्देश्य से उन्होंने इस मामले में आगे आने का फैसला किया | यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर मुकेश अरनेजा भी इसी क्लब के सदस्य हैं, और वह इस वर्ष डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद पर भी हैं - लेकिन उन्होंने ललित खन्ना को दिखाई जा रही रमेश अग्रवाल की तड़ीबाजी का कोई नोटिस नहीं लिया | मुकेश अरनेजा ने न ललित खन्ना के साथ हो रहे अन्याय की परवाह की, और न क्लब की इज्ज़त व साख की ही चिंता की | मुकेश अरनेजा को जानने वालों का कहना रहा कि मुकेश अरनेजा अपने को चाहे जितना तीसमारखां समझते/दिखाते हों, लेकिन वह भी जानते/समझते हैं कि रमेश अग्रवाल की बदतमीजी का विरोध करने की उनकी 'औकात' है नहीं |
रमेश अग्रवाल का 'नशा' उतारने के लिए केके गुप्ता ने रोटरी इंटरनेशनल के जिम्मेदार पदाधिकारियों से बात करने का जिम्मा संभाला, तो ललित खन्ना ने डिस्ट्रिक्ट के वरिष्ठ सदस्यों - खासकर पूर्व गवर्नर्स से बात की और उन्हें अपनी उम्मीदवारी के पक्ष में तैयार करने का काम किया | रमेश अग्रवाल द्धारा खड़ी की गई प्रतिकूल स्थिति का सामना करने के मौके का ललित खन्ना ने बड़ी होशियारी के साथ इस्तेमाल किया | अपनी उम्मीदवारी के खिलाफ रमेश अग्रवाल के रवैये को लेकर ललित खन्ना ने पूर्व गवर्नर्स के बीच जो गुहार लगाई - उसका उन्होंने दो तरह से फायदा उठाया : एक तरफ तो उन्होंने अपनी उम्मीदवारी को संभव बनाने का काम किया, और साथ ही साथ दूसरी तरफ अपनी उम्मीदवारी के प्रति पूर्व गवर्नर्स के बीच विश्वास और समर्थन पैदा करने का काम भी किया | ललित खन्ना की समस्या थी कि उनकी उम्मीदवारी को लेकर जो असमंजस बना हुआ था, उसके चलते वह अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने का काम कर ही नहीं पा रहे थे | लिहाजा अपनी उम्मीदवारी को संभव बनाने के लिए उनको जो कोशिश करनी थी, उस कोशिश को उन्होंने इस तरह से संयोजित किया कि वह उनका समर्थन जुटाने का अभियान भी बन गई | दरअसल अपनी उम्मीदवारी को संभव बनाने के लिए ललित खन्ना ने जो प्रयास किए, उन्हें आक्रामक तेवर इसी रणनीति के तहत दिए ताकि लोगों के बीच उनकी उम्मीदवारी के प्रति भरोसा पैदा हो | अपनी उम्मीदवारी के प्रति लोगों के बीच भरोसा पैदा करने में ललित खन्ना को जो सफलता मिल रही थी, उसका ही नतीजा था कि दूसरे संभावित उम्मीदवारों के बीच घबराहट फैली और इसी घबराहट में ललित खन्ना की उम्मीदवारी की खिलाफत करते हुए उन्होंने भी इंटरनेशनल डायरेक्टर यश पाल दास के सामने ललित खन्ना की उम्मीदवारी को स्वीकृत न करने की मांग रखी | कई लोगों को लगता है कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी के विरोध में यश पाल दास के साथ संभावित उम्मीदवारों की मुलाकात का 'स्टेज' पर्दे के पीछे से रमेश अग्रवाल ने ही सजाया था | रमेश अग्रवाल का यह टुच्चापन भी लेकिन उनके काम नहीं आया |
ललित खन्ना की उम्मीदवारी को रोकने की रमेश अग्रवाल की हर कोशिश जब पिट गई तब रमेश अग्रवाल यह स्वीकार करने के लिए मजबूर हुए कि ललित खन्ना की उम्मीदवारी को प्रस्तुत होने से नहीं रोका जा सकता है | 'थूक के चाटना' वाला मुहावरा किसने बनाया था और किस घटना से प्रेरित होकर बनाया था - यह तो पता नहीं, लेकिन रमेश अग्रवाल ने ललित खन्ना की उम्मीदवारी को लेकर जो शीर्षासन किया, उस पर पूरी तरह फिट जरूर बैठता है | रमेश अग्रवाल की तड़ीबाजी से निपटने में ललित खन्ना ने जिस तरह से केके गुप्ता का सक्रिय समर्थन जुटाया, मुकेश अरनेजा के खुले विरोध के बावजूद अपने क्लब के पदाधिकारियों व अन्य सदस्यों का समर्थन प्राप्त किया और रमेश अग्रवाल की हर तिकड़म को फेल किया - उससे उन्होंने अपनी 'लड़ने' की सामर्थ्य का तथा प्रतिकूल स्थितियों को अनुकूल बना सकने के अपने हुनर का सुबूत ही पेश किया है | ललित खन्ना के शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि अपनी उम्मीदवारी को संभव बनाने की जो लड़ाई ललित खन्ना ने जीती है उसका उनकी उम्मीदवारी के संदर्भ में एक प्रतीकात्मक महत्व है; और उनकी यह जीत डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए उनकी उम्मीदवारी के दावे को गंभीर बनाती है |

Saturday, September 22, 2012

राजेश बत्रा को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बना कर विनोद बंसल ने कहीं मुसीबत तो मोल नहीं ले ली है ?

नई दिल्ली | राजेश बत्रा ने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के रूप में विनोद बंसल की ऐसी दशा कर दी है कि विनोद बंसल के लिए न कुछ कहते बन रहा है और न कुछ करते | राजेश बत्रा के दबावपूर्ण व्यवहार के चलते विनोद बंसल को ऐसे लोगों को महत्वपूर्ण पद देने पड़े हैं, जिन्होंने न तो उनके चुनाव में उनकी सक्रिय मदद की थी, और न उनके कहने के बावजूद पिछले वर्ष रवि चौधरी का समर्थन किया था | जो लोग विनोद बंसल के किसी भी तरह से काम नहीं आये, विनोद बंसल को उन्हें जिस तरह से महत्वपूर्ण पद देने के लिए मजबूर होना पड़ा है - उससे लोगों के बीच यही संदेश गया है कि उनकी टीम का गठन वह नहीं, बल्कि राजेश बत्रा कर रहे हैं | इसका नतीजा यह है कि विनोद बंसल के चुनाव में खुल कर उनका साथ देने वाले लोग अपने आपको उपेक्षित पा रहे हैं | ऐसे लोगों का 'दर्द' यह याद करके और टीस मार उठता है कि अपने चुनाव के समय तो विनोद बंसल उन्हें 'खुल कर' साथ आने के लिए प्रेरित करते थे, लेकिन अब उनसे बात करने से भी कतराते हैं और दूसरों के जरिये संदेश भिजवाते हैं | विनोद बंसल की मौजूदा दशा से परिचित लोग इस स्थिति के लिए लेकिन राजेश बत्रा को जिम्मेदार ठहराते हैं | उनका कहना है कि राजेश बत्रा ने विनोद बंसल के लिए वास्तव में कोई मौका ही नहीं छोड़ा है, ताकि वह 'अपने' लोगों का ख्याल रख सकें - और चूँकि वह अपने लोगों के काम नहीं आ पा रहे हैं इसलिए वह उनसे बात करने से भी बच रहे हैं | राजेश बत्रा को हावी देख कर विनोद बंसल के हाथ-पैर ऐसे फूल गए हैं कि उनके लिए छोटे-मोटे दबावों से बच पाना भी मुश्किल बना हुआ है, जिस कारण अपने फैसलों को क्रियान्वित कर पाने में भी वह लाचार से बने हुए हैं | रोटरी क्लब गाजियाबाद प्लेटिनम के अमित अग्रवाल को असिस्टेंट गवर्नर बनाने का विनोद बंसल ऐलान कर चुके हैं, लेकिन अपने इस ऐलान को क्रियान्वित कर पाने को लेकर उनके पसीने छूटे हुए हैं | विनोद बंसल ने जो फैसले किए हैं उन्हें दबाव में लिए फैसले के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है, और जिस एक फैसले को वह क्रियान्वित नहीं कर पा रहे हैं - उसके पीछे भी दबाव बताया जा रहा है |
राजेश बत्रा के चौधराहटपूर्ण रवैये ने विनोद बंसल को सहयोगी आम रोटेरियन ही नहीं, सहयोगी रहे रोटेरियन नेताओं के निशाने पर भी ला दिया है | सबसे ज्यादा क्रोध में असित मित्तल हैं | विनोद बंसल को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर 'बनवाने' का असित मित्तल चूँकि अकेले ही श्रेय लेते हैं, इसलिए वह विनोद बंसल से खास व्यवहार की उम्मीद रखते हैं | विनोद बंसल के लिए असित मित्तल लेकिन 'दूध में पड़ी मक्खी' बने हुए हैं | इसके लिए कुछ तो विनोद बंसल का अपना स्वभाव जिम्मेदार है, और कुछ राजेश बत्रा का रवैया | विनोद बंसल ने पीछे अपना जो पहला कार्यक्रम किया था - उसमें राजेश बत्रा के रवैये के चलते असित मित्तल को मंच की बजाये, आम रोटेरियंस के बीच जगह मिली थी | कार्यक्रम ख़त्म हो जाने और अधिकतर लोगों के चले जाने के बाद, जब मुश्किल से छह-आठ लोग बचे रह गए थे तब विनोद बंसल ने असित मित्तल की सुध ली थी | असित मित्तल ने नोट किया और कई लोगों से कहा भी कि विनोद बंसल उन्हें जानबूझ कर किनारे लगाये हुए हैं | असित मित्तल का कष्ट यह है कि वह उम्मीद लगाये हुए थे कि विनोद बंसल उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनायेंगे - लेकिन जो हुआ उसमें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनाना तो दूर, विनोद बंसल उन्हें किनारे/ठिकाने लगाने में लगे हुए हैं | विनोद बंसल ने असित मित्तल को दोहरी चोट दी - डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर न बना कर उनकी उम्मीदों पर तो पानी फेरा ही; असित मित्तल को फूटी आँख न देख पाने वाले राजेश बत्रा को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बना दिया | असित मित्तल के प्रति राजेश बत्रा के रवैये ने विनोद बंसल का 'काम' आसान और कर दिया है - असित मित्तल इसी बात से भड़के हुए हैं |  
राजेश बत्रा के रवैये ने विनोद बंसल के लिए अजीब-अजीब तरह की मुसीबतें पैदा कर दी हैं | जैसे राजेश बत्रा ने घोषणा कर दी है कि वह हैदराबाद में आयोजित हो रहे इंस्टीट्यूट में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर की ट्रेनिंग कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगे | क्यों नहीं होंगे ? क्योंकि उक्त ट्रेनिंग कार्यक्रम के ट्रेनर अशोक घोष बनाये गए हैं | राजेश बत्रा को अशोक घोष से ट्रेनिंग लेने में अपनी नाक नीची होती हुई लगती है | अपनी नाक को नीची होने से बचाने के लिए ही राजेश बत्रा ने रोटरी इंटरनेशनल द्धारा डिजाइन किए गए महत्वपूर्ण ट्रेनिंग कार्यक्रम से गायब रहने का फैसला किया है | राजेश बत्रा को लगता है और उन्होंने कहा है कि जब वह उक्त कार्यक्रम में शामिल ही नहीं होंगे, तो अशोक घोष से ट्रेनिंग लेने से नाक नीची होने के 'खतरे' से बच जायेंगे | राजेश बत्रा के इस रवैये पर लोगों का कहना है कि राजेश बत्रा को अपनी नाक की यदि इतनी ही चिंता है तो उन्हें डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद नहीं स्वीकार करना चाहिए था | राजेश बत्रा ने डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद क्यों स्वीकार किया - इसका उन्होंने बड़ा दिलचस्प और बचकाना-सा जबाव दिया है | उन्होंने कहा है कि डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद पाने के लिए उन्होंने कोई लॉबिंग नहीं की; विनोद बंसल ने उनसे डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद स्वीकार करने का अनुरोध किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया | राजेश बत्रा बताते/कहते हैं कि वह 'इस' पद पर रह चुके हैं, 'उस' पद पर रह चुके हैं; दो बार डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर रह चुके हैं - तीसरी बार डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बनने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी | कुर्सी का मोह दरअसल होता ही ऐसा है | सयाने लोग 'दिखाते' तो यह हैं कि उन्हें कुर्सी का कोई मोह नहीं है - लेकिन कुर्सी जब उन्हें मिल रही होती है तो उसे लेने से वह बेचारे इंकार नहीं कर पाते | डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर का पद तो बेचारे राजेश बत्रा को विनोद बंसल के अनुरोध पर स्वीकार करने के लिए 'मजबूर' होना पड़ा - लेकिन अपनी टीम अपने आप चुनने और हैदराबाद में आयोजित हो रहे इंस्टीट्यूट में डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर की ट्रेनिंग कार्यक्रम में शामिल होने का विनोद बंसल का 'अनुरोध' राजेश बत्रा को न सुनाई दे रहा है और न समझ आ रहा है | डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर की ट्रेनिंग कार्यक्रम में शामिल होने से राजेश बत्रा के इंकार ने विनोद बंसल को अशोक घोष तथा उनके नजदीकियों के साथ-साथ रोटरी के बड़े नेताओं व दूसरे डिस्ट्रिक्ट के पदाधिकारियों के सामने अजीब-सी स्थिति में ला दिया है; और उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि वह इस स्थिति से कैसे निपटे ?
इन्हीं सब बातों व तथ्यों के संदर्भ में, विनोद बंसल के शुभचिंतकों को लग रहा है कि राजेश बत्रा को डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर बना कर विनोद बंसल ने कहीं मुसीबत तो मोल नहीं ले ली है ?

Thursday, August 30, 2012

नोमीनेटिंग कमेटी के लिए अचानक और आश्चर्यजनक रूप से प्रस्तुत हुई दमनजीत सिंह की उम्मीदवारी ने बड़े रोटरी नेताओं की सक्रियता का खेल उजागर किया

नई दिल्ली/मुंबई | दमनजीत सिंह ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करके अपने डिस्ट्रिक्ट के लोगों को तो चक्कर में डाल ही दिया है, पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता की राजनीति के लिए भी गंभीर संकट पैदा कर दिया है | दमनजीत सिंह राजनीति से कोसों दूर रहने वाले एक भले रोटेरियन के रूप में डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच पहचाने जाते हैं; लेकिन 'राजनीति से कोसों दूर रहने वाले' दमनजीत सिंह की एक चाल ने डिस्ट्रिक्ट ही नहीं देश की रोटरी की राजनीति की चाल बिगाड़ दी है | चूँकि सच यही है कि दमनजीत सिंह राजनीति से कोसों दूर रहने वाले रोटेरियन हैं, इसलिए इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए जैसे ही दमनजीत सिंह की उम्मीदवारी की प्रस्तुति की चर्चा चली, जूलियस सीजर के 'यू टू ब्रूटस' वाली स्टाइल में डिस्ट्रिक्ट के लोगों ने जैसे एक-दूसरे से पूछा - 'दमनजीत सिंह भी !' एक तरफ सच यदि यह है कि दमनजीत सिंह राजनीति से कोसों दूर रहने वाले रोटेरियन हैं, तो दूसरी तरफ सच यह भी है कि कोयले की खदान में रहते हुए कोई कब तक अपने हाथ काले होने से बचा सकता है | सो, डिस्ट्रिक्ट के लोगों के सामने एक ऐसा सच सामने था जिसे स्वीकार करते हुए उन्हें चक्कर आ रहा था - इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए दमनजीत सिंह भी उम्मीदवार बनने की तैयारी कर रहे हैं | जो लोग सिर्फ दमनजीत सिंह को जानते हैं उन्हें इस जानकारी से आश्चर्य हो रहा था; लेकिन जो लोग मानते हैं कि हर 'घटना' के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है उन्होंने समझने की कोशिश की कि राजनीति से कोसों दूर रहने वाले दमनजीत सिंह के राजनीति के मैदान में उतरने के पीछे कारण आखिर क्या है ?
दमनजीत सिंह के निकटवर्तियों के हवाले से ऐसे लोगों ने जाना/पाया कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए प्रस्तुत होने वाली दमनजीत सिंह की उम्मीदवारी के पीछे भरत पांड्या और मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर यशपाल दास तथा पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर अशोक महाजन हैं | यहाँ यह जानना महत्वपूर्ण है कि भरत पांड्या इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवार हैं और यशपाल दास व अशोक महाजन ने उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवाने का बीड़ा उठाया हुआ है | डिस्ट्रिक्ट 3010 में अशोक महाजन का काम अभी कुछ समय पहले तक मुकेश अरनेजा देखते थे, लेकिन 'जहाँ देखी तवा परांत, वहीं बिताई सारी रात' जैसी अपनी फितरत के चलते मुकेश अरनेजा ने अब शेखर मेहता से अपने तार जोड़े हुए हैं; लिहाजा अशोक महाजन को डिस्ट्रिक्ट 3010 में अपनी राजनीति चलाने के लिए कोई और 'आधार' चाहिए | दमनजीत सिंह पर हाथ रख कर अशोक महाजन ने वास्तव में डिस्ट्रिक्ट 3010 में अपनी पैठ बनाने की कोशिश की है | अशोक महाजन और शेखर मेहता की निगाह रोटरी इंटरनेशनल के प्रेसीडेंट पद पर है, और इसीलिए उन्हें प्रत्येक डिस्ट्रिक्ट में 'अपने' आदमी चाहिए हैं | डिस्ट्रिक्ट 3010 की चौधराहट सुशील गुप्ता अपने पास रखना चाहते हैं - उनका राजनीतिक गठजोड़ शेखर मेहता के साथ तो बनता है, लेकिन अशोक महाजन के साथ नहीं बनता |
इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव के जरिये डिस्ट्रिक्ट 3010 को इन तीनों ने अपनी अपनी प्रयोगशाला बना लिया है | सुशील गुप्ता अपने डिस्ट्रिक्ट की चौधराहट को अपने पास बनाये रखने के लिए रंजन ढींगरा पर दांव लगाना चाहते हैं; शेखर मेहता को लगता है कि मुकेश अरनेजा इस डिस्ट्रिक्ट में 'उनकी' राजनीति करेंगे; उन्हें दरअसल एक 'खाड़कू' किस्म का व्यक्ति चाहिए और वह मुकेश अरनेजा को इसके लिए बिलकुल फिट पाते हैं - इसलिए वह सुशील गुप्ता को मुकेश अरनेजा का समर्थन करने के लिए समझा रहे हैं | सुशील गुप्ता उन्हें मुकेश अरनेजा पर भरोसा करने से सावधान करने की कोशिश कर रहे हैं | कुछेक और लोगों ने भी शेखर मेहता को मुकेश अरनेजा जैसे अवसरवादी से बचने की सलाह दी है - शेखर मेहता को बताया/समझाया गया है कि मुकेश अरनेजा ने हर किसी को अपने स्वार्थ में इस्तेमाल ही किया है और हर किसी को धोखा ही दिया है | डिस्ट्रिक्ट 3010 में सुशील गुप्ता और शेखर मेहता के बीच इस मत-भिन्नता में आशोक महाजन ने अपनी दाल गलाने के लिए दमनजीत सिंह पर हाथ रखा है - उन्हें विश्वास है कि दमनजीत सिंह की साफ छवि उनका काम आसान बनायेगी | अशोक महाजन को विश्वास है कि दमनजीत सिंह को आगे करके वह डिस्ट्रिक्ट 3010 के उन नेताओं को भी अपने पाले में ले आयेंगे, जो राजा साबू के आदमी के रूप में जाने/पहचाने/समझे जाते हैं |
राजा साबू और कल्याण बनर्जी के बीच पिछले कुछ समय से जो 'सीजफायर' बना हुआ है, उसके चलते उम्मीद है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव बहुत दूर तक नहीं जायेगा और ज्यादा घमासान नहीं मचेगा और सारा खेल नोमीनेटिंग कमेटी के फैसले तक ही चलेगा | इसलिए रोटरी की राजनीति में राजा साबू और कल्याण बनर्जी की छाया से निकल कर अपना अपना झंडा फहराने की तैयारी कर रहे सुशील गुप्ता, शेखर मेहता और अशोक महाजन ने अपनी सारी ताकत इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव में लगा दी है | नोमीनेटिंग कमेटी का चुनाव इस कारण से भी महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवारों की पसंद और भरोसा उन्हें चुनवाने/जितवाने का 'ठेका' लिए नेताओं की पसंद और भरोसे से अलग भी दिख रहा है | इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए भरत पांड्या यदि राजा साबू/अशोक महाजन ग्रुप के भरोसे हैं तो उन्हीं के डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3140 - के गुलाम वहनवती को कल्याण बनर्जी ग्रुप की शह है | कल्याण बनर्जी ग्रुप से लेकिन डिस्ट्रिक्ट 3060 के मनोज देसाई का पलड़ा भारी दिखता है, क्योंकि उनकी उम्मीदवारी में मौजूदा इंटरनेशनल डायरेक्टर शेखर मेहता दिलचस्पी लेते सुने गए हैं | डिस्ट्रिक्ट 3131 के विनय कुलकर्णी को भरोसा है कि राजा साबू/अशोक महाजन ग्रुप उन पर भी दांव लगा सकता है | डिस्ट्रिक्ट 3132 के राजीव प्रधान और उनके समर्थकों को उम्मीद है कि रोटरी के भले के लिए दोनों ग्रुप के नेता उन्हें ही इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवायेंगे | डिस्ट्रिक्ट 3040 के आलोक बिल्लोरे तथा डिस्ट्रिक्ट 3030 के मधु रुघवानी भी अपनी उम्मीदवारी के लिए माहौल बनाने की जुगत में लगे हैं, लेकिन अभी उन्हें अपनी उम्मीदवारी के प्रति लोगों को आश्वस्त करने का काम ही करना पड़ रहा है |
दमनजीत सिंह की अचानक और आश्चर्यजनक रूप से इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अधिकृत उम्मीदवार चुनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के लिए प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने नोमीनेटिंग कमेटी के लिए होने वाले चुनाव में पर्दे के पीछे चलने वाले खेल का एक संकेत भर दिया है | लेकिन यह ऐसा संकेत है जो बताता है कि नोमीनेटिंग कमेटी का चुनाव खासा दिलचस्प होने जा रहा है, क्योंकि इसमें बड़े नेताओं की सक्रिय भूमिका रहेगी |  
 

Wednesday, August 29, 2012

लोगों की उपस्थिति के मामले में जेके गौड़ से पीछे रहने के बावजूद, आलोक गुप्ता डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की राजनीति के चुनावी मैदान के बीचोंबीच तो आ ही गए हैं

गाजियाबाद | अपने क्लब के नए पदाधिकारियों के अधिष्ठापन समारोह के आयोजन के जरिये आलोक गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी दौड़ में ऊँची छलांग लगाई है और कल तक जो लोग उनकी उम्मीदवारी को गंभीरता से नहीं ले रहे थे, उन्हें भी उनकी उम्मीदवारी का नोटिस लेने पर मजबूर किया है | डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव के संदर्भ में उम्मीदवार के क्लब का अधिष्ठापन समारोह उम्मीदवार के शक्ति-प्रदर्शन का एक जरिया हो गया है | हालाँकि यह शक्ति-प्रदर्शन चुनावी नतीजे पर कोई निर्णायक असर नहीं डालता है - पिछले रोटरी वर्ष का ही उदाहरण देखें : संजय खन्ना के क्लब का अधिष्ठापन समारोह महज खानापूरी की तरह हुआ था, जबकि रवि चौधरी ने अपने क्लब का अधिष्ठापन समारोह जोर-शोर से किया था | रवि चौधरी को लेकिन उसका कोई लाभ नहीं मिला था | इसके बावजूद उम्मीदवार के क्लब के अधिष्ठापन समारोह पर लोगों की नजर होती है - उससे चुनावी नतीजे पर निर्णायक असर भले ही न पड़ता हो, लेकिन वह 'हवा' बनाने का काम तो करता ही है | यही कारण रहा कि जेके गौड़ के क्लब का अधिष्ठापन समारोह जिस भव्यता और भारी भीड़ के साथ संपन्न हुआ था, उसके बाद जेके गौड़ की उम्मीदवारी का वजन काफी बढ़ गया | क्लब के अधिष्ठापन समारोह के जरिये जेके गौड़ द्धारा अपनी उम्मीदवारी के दावे को मजबूत बनाने/दिखाने के बाद डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों की निगाह आलोक गुप्ता के क्लब के अधिष्ठापन समारोह पर थी |
आलोक गुप्ता की उम्मीदवारी के संदर्भ में उनके क्लब के अधिष्ठापन समारोह की महत्ता इसलिए भी थी, क्योंकि इससे पहले तक उनकी उम्मीदवारी को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा था - कोई भी क्या, वह खुद भी अपनी उम्मीदवारी के प्रति गंभीर नज़र नहीं आ रहे थे | कई कई दिनों तक वह लोगों को कहीं दिखाई ही नहीं दे रहे थे | एक उम्मीदवार के रूप में उनका कभी गर्म तो कभी नर्म रवैया लोगों को उनकी उम्मीदवारी के प्रति असमंजस में डाले हुए था | अपनी उम्मीदवारी को लेकर आलोक गुप्ता खुद बहुत संजीदा नहीं दिख रहे थे, और इसीलिए उनकी उम्मीदवारी को किसी गिनती में नहीं लिया जा रहा था | इसी कारण से उनके क्लब का अधिष्ठापन कार्यक्रम उनकी उम्मीदवारी को बनाये रखने के संदर्भ में उनके लिए आख़िरी मौका था | आख़िरी मौका इसलिए भी था क्योंकि उन्होंने देख/जान लिया था कि जेके गौड़ अपने क्लब के अधिष्ठापन कार्यक्रम को लेकर दिन-रात एक किए हुए हैं | आलोक गुप्ता के क्लब के एक पदाधिकारी ने ही इन पंक्तियों के लेखक को बताया कि जेके गौड़ के क्लब के अधिष्ठापन कार्यक्रम की तैयारियों को देख/जान कर ही उनके क्लब के अधिष्ठापन समारोह को 'अच्छे तरीके' से करने की जरूरत को समझा गया था | जेके गौड़ से कमजोर न दिखने की होड़ में ही आलोक गुप्ता ने समारोह स्थल के रूप में कंट्री इन पर जोर दिया | आमंत्रितों की संख्या के मामले में हालाँकि आलोक गुप्ता ने जेके गौड़ से पहले ही 'हार' मान ली थी और अपने सलाहकारों को बता दिया था कि वह ज्यादा लोगों को नहीं बुलाएँगे | इस बाबत उन्होंने एक अच्छा सा तर्क भी दिया कि वह कोई लंगर नहीं लगा रहे हैं | आलोक गुप्ता ने ज्यादा से ज्यादा क्लब-अध्यक्षों की उपस्थिति को संभव बनाने पर जोर दिया | जो लोग दोनों समारोहों में उपस्थित रहे, उन सभी का कहना रहा कि क्लब-अध्यक्षों की उपस्थिति के मामले में भी आलोक गुप्ता को जेके गौड़ से पीछे ही रहना पड़ा | आलोक गुप्ता के यहाँ जितने क्लब-अध्यक्ष उपस्थित हुए, जेके गौड़ के यहाँ उससे अधिक क्लब-अध्यक्ष उपस्थित थे |
लोगों की उपस्थिति के मामले में जेके गौड़ से पीछे रहने के बावजूद, आलोक गुप्ता अपने कार्यक्रम के जरिये डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के बीच अपनी धाक ज़माने में कामयाब रहे | उनकी इस कामयाबी ने उनकी उम्मीदवारी को चुनावी मैदान के बीचोंबीच ला दिया है - जो इससे पहले तक मैदान के किनारे-किनारे पर थी | इस कामयाबी को बनाये रखने और इसे बढ़ाने की जो चुनौती आलोक गुप्ता के सामने है - उनसे निपटने की उनकी सीमा भी लेकिन उनके इस धमाकेदार आयोजन में ही सामने आई | उनके आयोजन और आयोजन की व्यवस्था की जोरशोर से तारीफ करने वाले लोगों ने आलोक गुप्ता की मुकेश अरनेजा की तारीफ में पढ़े गए कसीदे की लेकिन आलोचना भी की है | आलोक गुप्ता ने मुकेश अरनेजा को लेकर जो भारी-भारी शब्द कहे, उनके उन शब्दों ने आयोजन में शामिल गवर्नर किस्म के लोगों को तो एक तरह से चिढ़ाने का ही काम किया है और कई लोगों का साफ कहना रहा कि मुकेश अरनेजा के प्रति यह 'भक्ति' ही आलोक गुप्ता को भारी पड़ेगी | आलोक गुप्ता से हमदर्दी रखने वाले लोगों का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट में मुकेश अरनेजा की बदनामी को देखते/पहचानते हुए आलोक गुप्ता को यह समझना और तय करना ही होगा कि उन्हें मुकेश अरनेजा के साथ कितना और कहाँ 'दिखना' है | डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की चुनावी राजनीति में मुकेश अरनेजा का सहयोग/समर्थन उनके काम आ सकता है, लेकिन केवल मुकेश अरनेजा के भरोसे रहना उनके लिए आत्मघाती होगा | पिछले रोटरी वर्ष में हुए चुनाव में रवि चौधरी को कई लोगों ने समझाया था कि अपना चुनाव बचाना है तो मुकेश अरनेजा और असित मित्तल से बचो, रवि चौधरी ने लेकिन किसी की नहीं सुनी और चुनावी हार का शिकार हुए | इस बार भी सुना जा रहा था कि मुकेश अरनेजा ने रवि चौधरी को अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित किया है - रवि चौधरी ने अपनी कुछ सक्रियता प्रदर्शित भी की थी; लेकिन जब उन्होंने देखा/पाया कि एक मुकेश अरनेजा के अलावा और कोई उनके समर्थन में नहीं आ रहा है तो उन्होंने घर बैठने में ही अपनी भलाई देखी | इस बार रवि चौधरी पिछले वर्ष वाली गलती नहीं दोहराना चाहते हैं और इसीलिए अपनी उम्मीदवारी से पीछे हटते दिख रहे हैं | रवि चौधरी के अनुभव से आलोक गुप्ता ने लेकिन लगता है कि कोई सबक नहीं लिया है | सबक नहीं लिया, इसका नतीजा यह हुआ है कि अपने क्लब के अधिष्ठापन समारोह के शानदार आयोजन से उन्होंने जो चमक पैदा की, उस चमक को मुकेश अरनेजा की तारीफ करके लेकिन उन्होंने खुद ही धुंधला भी बना दिया |

Saturday, August 25, 2012

पहले दाँव में ललित खन्ना से 'पिटने' के बाद, मुकेश अरनेजा ने ललित खन्ना पर उनके बिजनेस संबधी घपले को उजागर करके अब सीधी चोट की है

नई दिल्ली | मुकेश अरनेजा ने ललित खन्ना को निपटाने के लिए अब उनके एक बिजनेस संबंधी घपले को हथियार बना लिया है | मुकेश अरनेजा ने अपने कुछेक खास लोगों को जो किस्सा बताया है, उसके अनुसार ललित खन्ना को रोटरी इंटरनेशनल के एक प्रोजेक्ट के लिए वाटर पंप्स सप्लाई करने का एक बड़ा आर्डर मिला था, जिसे उन्होंने अपनी एक कंपनी एओवी इंटरनेशनल के जरिये पूरा किया था | ललित खन्ना ने अपनी उक्त कंपनी के जरिये जो वाटर पंप्स निर्यात किए थे, वह घटिया निकले - न सिर्फ घटिया निकले, बल्कि उनके इस्तेमाल के कारण लोगों की जान पर ही बन आई थी | उक्त वाटर पंप्स दरअसल रोटरी इंटरनेशनल के एक प्रोजेक्ट के तहत अफ्रीकी देशों में लगने थे, और उन्हें पानी की गुणवत्ता को भी नियंत्रित करना था तथा पानी को पीने योग्य बनाना था | ललित खन्ना ने लेकिन जो वाटर पंप्स निर्यात किए, वह अपनी गुणवत्ता पर खरे नहीं उतरे और उनके द्धारा सप्लाई किए गए वाटर पंप्स लोगों को जहरीला पानी देते हुए पाये गए | रोटरी इंटरनेशनल के उक्त प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों ने मामले को बहुत गंभीरता से लिया और - जैसा कि मुकेश अरनेजा का दावा है कि ललित खन्ना के खिलाफ कड़ी कार्यवाई करने की तैयारी की थी | मुकेश अरनेजा लोगों को बता रहे हैं कि उन्होंने ललित खन्ना को उस मामले से बचाया था | ललित खन्ना की कंपनी एओवी इंटरनेशनल द्धारा सप्लाई किए गए पंप्स की खामियों को लेकर तैयार की गई लिंडा मोरेला की रिपोर्ट तथा लिंडा मोरेला को ललित खन्ना की कंपनी के मार्केटिंग वाइस प्रेसीडेंट नरेश मेहता द्धारा सफाई में लिखे गए पत्र की प्रतिलिपियाँ 'रचनात्मक संकल्प' के पास मौजूद हैं |
ललित खन्ना के नजदीकियों के अनुसार, मुकेश अरनेजा इस किस्से को उछाल कर दरअसल ललित खन्ना पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं | उल्लेखनीय है कि इससे पहले डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए ललित खन्ना की उम्मीदवारी का विरोध करके मुकेश अरनेजा ने ललित खन्ना पर दबाव बनाने की जो कोशिश की थी, वह बूमरेंग कर गई और उसने पलट कर मुकेश अरनेजा पर ही करारी चोट की | मुकेश अरनेजा को क्लब से निकालने की तैयारी की जाने लगी | मुकेश अरनेजा ने क्लब के पदाधिकारियों से माफी मांग कर क्लब से अपने निष्कासन को तो टलवा दिया, लेकिन अपनी इस फजीहत को वह पचा नहीं पाये हैं | ललित खन्ना को सबक सिखाने के लिए ही मुकेश अरनेजा ने रोटरी में किए उनके बिजनेस घपले को हथियार बना लिया है | मुकेश अरनेजा कह/बता रहे हैं कि उनके पास ललित खन्ना को ठिकाने लगाने के लिए बहुत से हथियार हैं - इसलिए ललित खन्ना और उनके समर्थक व शुभचिंतक उनके एक हथियार के फेल हो जाने पर ज्यादा खुश न हों | मुकेश अरनेजा लोगों को बता रहे हैं कि उनके पहले हमले को तो ललित खन्ना ने केके गुप्ता की मदद से झेल लिया है, लेकिन उनके अगले हमलों को झेल पाने में केके गुप्ता भी उनकी कोई मदद नहीं कर पायेंगे | मुकेश अरनेजा का दो टूक कहना है कि वह ललित खन्ना की ऐसी हालात कर देंगे कि ललित खन्ना के लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार बने रहना ही मुश्किल हो जायेगा और वह मैदान छोड़ने को मजबूर हो जायेगा | जो लोग ललित खन्ना को जानते/पहचानते हैं, उनका भी मानना और कहना है कि ललित खन्ना के बस की उम्मीदवार बने रहना है भी नहीं - मुकेश अरनेजा नाहक ही अपनी एनर्जी और समय बर्बाद कर रहे हैं | मुकेश अरनेजा को जानने वाले लोगों का कहना है कि मुकेश अरनेजा भी जानते हैं कि ललित खन्ना के बस की उम्मीदवार बनना नहीं है - लेकिन वह ऐसा कुछ करते रहना चाहते हैं जिससे लोगों को लगे कि ललित खन्ना का काम जो बिगड़ा है वह मुकेश अरनेजा ने बिगाड़ा है |
मुकेश अरनेजा को ललित खन्ना से बड़ी शिकायत यह हुई है कि ललित खन्ना उन्हें छोड़ कर केके गुप्ता के साथ जा मिले हैं | उल्लेखनीय है कि क्लब की राजनीति में पिछले कई वर्षों से ललित खन्ना की हैसियत और पहचान मुकेश अरनेजा के लिए काम करने वाले की थी | मुकेश अरनेजा उन्हें आगे बढ़ने - गवर्नर बनने के लिए प्रेरित तो करते रहे हैं, लेकिन ललित खन्ना जब सचमुच गवर्नर पद का चुनाव लड़ने को तैयार हो गए तब मुकेश अरनेजा पीछे हट गए | मुकेश अरनेजा के रवैये में धोखा देखने वाले ललित खन्ना ने तब केके गुप्ता का दामन पकड़ा | केके गुप्ता ने ललित खन्ना को जो राह पकड़वाई, ललित खन्ना को उस राह पर चलता देख मुकेश अरनेजा के तो हाथों के तोते उड़ गए | मुकेश अरनेजा के लिए अब किसी भी तरह ललित खन्ना की बढ़ती राह को रोकना जरूरी हो गया | मुकेश अरनेजा ने ललित खन्ना की बढ़ती राह को रोकने के लिए जिस तरह उनके बिजनेस संबंधी मामले को इस्तेमाल करना शुरू किया है - उससे उन लोगों को भी हैरानी हुई है जो मुकेश अरनेजा को पहले से ही एक घटिया सोच का व्यक्ति मानते थे | उनका कहना है कि उन्हें अंदाज़ नहीं था कि मुकेश अरनेजा उनकी सोच से भी ज्यादा घटिया साबित होंगे, और ललित खन्ना के खिलाफ इस हद तक जायेंगे | इस तरह की बातों से बेपरवाह, मुकेश अरनेजा ने ललित खन्ना की रोटरी में की गई बिजनेस संबधी बेईमानी को बताने/उछालने के जरिये यह दिखाना शुरू किया है कि ललित खन्ना के लिए रोटरी सिर्फ अपने बिजनेस को बढ़ाने का जरिया है |
मजे की बात यह है कि खुद ललित खन्ना का रवैया भी मुकेश अरनेजा की 'बात' को ही सही बताता है | ललित खन्ना क्लब की राजनीति में बहुत सक्रिय रहे हैं, लेकिन क्लब से आगे बढ़ने में उन्होंने कभी कोई दिलचस्पी नहीं ली | उनकी पत्नी नीलू खन्ना इनरव्हील क्लब में सक्रिय हैं और चेयरपरसन बनने की राह पर हैं | इनरव्हील में कई महिलाएँ सक्रिय हैं जिनके पति रोटरी में बिलकुल भी सक्रिय नहीं हैं | लेकिन नीलू खन्ना के साथ ऐसा नहीं है | उनके पति ललित खन्ना रोटरी में घमासान रूप में सक्रिय तो हैं - लेकिन कोई बड़ी जिम्मेदारी लेने से बचते रहे हैं | मुकेश अरनेजा अब जो बात ललित खन्ना के बारे में 'बता' रहे हैं, उससे लोगों को यही समझ में आ रहा है कि ललित खन्ना की रोटरी में सक्रियता अपने बिजनेस को बढ़ाने का जरिया भर है | पहले दाँव में ललित खन्ना से 'पिटने' के बाद, मुकेश अरनेजा ने ललित खन्ना पर उनके बिजनेस संबधी घपले को उजागर करके सीधी चोट की है | यह देखने की बात होगी कि ललित खन्ना इस चोट से मिले जख्म को कैसे भरते हैं और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की अपनी उम्मीदवारी को बनाये रहते हैं या उससे पीछे हट जाते हैं ?  

Sunday, August 19, 2012

सुरेश चंदर ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी तो प्रस्तुत कर दी है, लेकिन क्या वह एक उम्मीदवार के रूप में सक्रिय हो पायेंगे और काम कर सकेंगे

फरीदाबाद | सुरेश चंदर को उम्मीद तो यह थी कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करते ही उन पर समर्थन की बारिश होने लगेगी, लेकिन वह यह जान/देख कर हैरान हुए हैं कि जिन लोगों से उन्हें खुले समर्थन और सहयोग की उम्मीद थी उन्हीं लोगों ने उनका खेल ख़राब करने/बिगाड़ने का काम शुरू कर दिया है | सुरेश चंदर को सबसे तगड़ा झटका तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल की तरफ से लगा है | रमेश अग्रवाल ने उन्हें चेतावनी के लहजे में बताया है कि वह उनके नेतृत्व वाली डिस्ट्रिक्ट एक्जीक्यूटिव काउंसिल के सदस्य हैं, इसलिए वह उम्मीदवार हो ही नहीं सकते हैं | रमेश अग्रवाल की इस चेतावनी के अलावा, सुरेश चंदर को फरीदाबाद में ही ऐसे लोगों के विरोध की आहटें सुनाई देने लगी हैं, जिनके साथ उनके सिर्फ अच्छे संबध ही नहीं रहे हैं, बल्कि वह जिनके काम भी आते रहे हैं | ऐसे लोगों को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के उम्मीदवार के रूप में सुरेश चंदर दरअसल अपने प्रतिद्धंदी लगने लगे हैं और इसलिए उनके लिए जरूरी हो गया है कि वह सुरेश चंदर को आगे बढ़ने से तथा सफल होने से रोकें | उल्लेखनीय है कि अजय जोनेजा और पप्पू सरना अगले रोटरी वर्ष में उम्मीदवार बनने की तैयारी करते बताये जाते हैं - लिहाजा इन्हें सुरेश चंदर की अचानक से प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी में अपने लिए खतरा दिखाई देने लगा है |
सुरेश चंदर की अचानक से प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने अजय जोनेजा और पप्पू सरना के लिए तीन तरह से खतरा पैदा किया है - सुरेश चंदर यदि सफल हो जाते हैं, तो इनके लिए अगले वर्ष क्या अगले तीन-चार वर्षों तक उम्मीदवारी प्रस्तुत करना मुश्किल ही होगा; सुरेश चंदर यदि सफल नहीं होते हैं तो डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच संदेश जायेगा कि फरीदाबाद के उम्मीदवार में दम नहीं होता है और यह यूँ ही उम्मीदवार बन जाते हैं, और इसलिए जब अगले वर्ष यह उम्मीदवार बनेंगे तो कोई भी इन्हें गंभीरता से नहीं लेगा |  तीसरा और सबसे बड़ा खतरा अजय जोनेजा और पप्पू सरना को उन बातों से लगा है जिनमें बताया गया है कि सुरेश चंदर दरअसल अगले वर्ष की उम्मीदवारी की तैयारी कर रहे हैं और इस बार तो वह बैठने के लिये 'खड़े' हुए हैं  | फरीदाबाद में कुछेक लोगों का मानना और कहना है कि सुरेश चंदर वास्तव में अगले वर्ष उम्मीदवार होने की तैयारी में थे, लेकिन उनकी समस्या यह थी कि अगले वर्ष अजय जोनेजा और पप्पू सरना भी उम्मीदवार होने की तैयारी में सुने जा रहे थे | ऐसे में, सुरेश चंदर के सामने चुनौती यह थी कि वह कैसे अपने आप को इनसे आगे दिखाएँ/करें | किसी ने समझाया होगा या सुरेश चंदर को खुद समझ में आया होगा कि वह यदि इसी वर्ष अपनी उम्मीदवारी पेश कर दें और फिर जीतते हुए दिखने वाले किसी उम्मीदवार के पक्ष में 'बैठ' जाएँ तो अगले वर्ष अजय जोनेजा और पप्पू सरना के मुकाबले उनका दावा मजबूत हो जायेगा | सुरेश चंदर ने किन्हीं किन्हीं लोगों से यह कहा भी है कि वह तो इस वर्ष अपनी उम्मीदवारी नहीं प्रस्तुत करना चाहते थे, लेकिन उनके शुभचिंतकों ने उन पर दवाब डाल कर उनकी उम्मीदवारी को इसी वर्ष प्रस्तुत करवा दिया है |
सुरेश चंदर ने अपनी उम्मीदवारी तो प्रस्तुत कर दी है, लेकिन अपनी उम्मीदवारी के प्रति लोगों को - अपने ही लोगों को आश्वस्त करना उनके लिए मुश्किल हो रहा है | हर कोई उनसे यही पूछ रहा है कि उन्हें यदि सचमुच इसी वर्ष उम्मीदवार होना था, और वह अपनी उम्मीदवारी को लेकर वास्तव में गंभीर हैं तो अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत करने में उन्होंने इतनी देर क्यों लगा दी ? सुरेश चंदर चूँकि इसका कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पा रहे हैं, इसलिए इसी चर्चा को बल मिल रहा है कि सुरेश चंदर इस वर्ष अपनी उम्मीदवारी को लेकर बिलकुल भी गंभीर नहीं हैं और वास्तव में उन्होंने अगले वर्ष प्रस्तुत की जाने वाली अपनी उम्मीदवारी की तैयारी के तहत अभी अपनी उम्मीदवारी का शगूफा खड़ा किया है | हालाँकि कुछेक लोगों का मानना और कहना है कि सुरेश चंदर की उम्मीदवारी के पीछे किसी रणनीति और या षड्यंत्र को देखने की जरूरत नहीं है; सुरेश चंदर ऐसा कुछ नहीं कर सकते - उन्होंने जो कुछ किया है वह सिर्फ उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता और नासमझी का नतीजा है | फरीदाबाद के कुछेक नेताओं का ही कहना है कि सुरेश चंदर पिछले तीन-चार वर्षों में चूँकि प्रत्येक गवर्नर के साथ रहे हैं और तवज्जो पाते रहे हैं; रमेश अग्रवाल तो चूँकि उनकी खुलकर तारीफ करते रहे हैं इसलिए उन्हें गलतफहमी हो गई कि वह अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे तो हर कोई उनका समर्थन व सहयोग करने को खड़ा हो जायेगा | पर अब जब वह उम्मीदवार हो गए हैं तो हर कोई उनकी कमियों और कमजोरियों की पिटारी खोल कर बैठ गया है | सुरेश चंदर की क्षमताओं पर सवालिया निशान लगाते हुए सबसे गंभीर आरोप यह सुनने को मिला है कि पिछले रोटरी वर्ष में वह डिस्ट्रिक्ट चेयरमैन रायला थे, लेकिन रायला वह कर नहीं सके | लोगों का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर की गुडबुक में आना एक बात है, लेकिन पद की जिम्मेदारियों का निर्वाह करना बिलकुल दूसरी बात है और मुश्किल काम है | इसी तर्ज पर, सुरेश चंदर के नजदीकियों का ही मानना और कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उन्होंने अपनी उम्मीदवारी तो प्रस्तुत कर दी है, लेकिन एक उम्मीदवार के रूप में सक्रिय हो पाना और काम कर पाना उनके लिए शायद ही संभव हो पायेगा |   

Wednesday, August 15, 2012

भावना दोषी की हमेशा ही खिलाफत करते रहना पंकज जैन के लिए मुसीबत बना, और प्रफुल्ल छाजेड़ के लिए वरदान

मुंबई | भावना दोषी के चुनावी मैदान छोड़ने से पंकज जैन को जो फायदा होने की उम्मीद बनी थी, वह ललित गांधी की उम्मीदवारी की प्रस्तुति से मुसीबत में पड़ गई है - जिसका फायदा प्रफुल्ल छाजेड़ को मिलने का कयास लगाया जा रहा है | उल्लेखनीय है कि गौतम दोषी के टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले में जेल जाने के बाद जब भावना दोषी के इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया की सेंट्रल काउंसिल के चुनाव से बाहर होने के संकेत मिलने लगे थे तब पंकज जैन के मन में लड्डू फूट रहे थे | इसका कारण यह था कि सेंट्रल काउंसिल के लिए होने वाली चुनावी दौड़ से भावना दोषी के बाहर होने में पंकज जैन अपना सीधा फायदा देख रहे थे | भावना दोषी और पंकज जैन चूँकि बंसीधर मेहता की फर्म में रहे हैं, इसलिए पंकज जैन को उम्मीद रही कि भावना दोषी के उम्मीदवार न होने से बंसीधर मेहता की फर्म के भावना दोषी समर्थक वोट अब उन्हें मिल सकेंगे | भावना दोषी के समर्थकों के वोटों के भरोसे अपनी चुनावी स्थिति में सुधार की उम्मीद कर रहे पंकज जैन को लेकिन उस समय तगड़ा झटका लगा, जब उन्हें पता चला कि ललित गांधी इस बार सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनने की तैयारी कर रहे हैं | ललित गांधी कई वर्ष पहले वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में रह चुके हैं | ललित गांधी की उम्मीदवारी के कारण पंकज जैन के सामने अपने जैन वोटों के कटने/बिदकने का खतरा पैदा हुआ | पंकज जैन ने हालाँकि ललित गांधी की स्थिति को कमजोर बताने/दिखाने के जरिये यह स्थापित करने की कोशिश की कि ललित गांधी के लिए सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जीतना आसान नहीं होगा - लेकिन वह खुद को आश्वस्त नहीं कर सके कि ललित गांधी की उम्मीदवारी उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचायेगी | सेंट्रल काउंसिल की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले कई लोगों का मानना और कहना है कि ललित गांधी का क्या होगा, उन्हें चुनाव में सफलता मिलेगी या नहीं मिलेगी - यह तो समय बताएगा, लेकिन जो एक बात अभी से बताई जा सकती है वह यह कि ललित गांधी की उम्मीदवारी से पंकज जैन को जैन वोटों का काफी नुकसान होगा |
पंकज जैन अभी यह समझने की कोशिश कर ही रहे थे कि भावना दोषी के उम्मीदवार न बनने से उन्हें बंसीधर मेहता की फर्म के भावना दोषी समर्थकों के कितने क्या वोट मिलेंगे और उन मिल सकने वाले वोटों से ललित गांधी की उम्मीदवारी के कारण होने वाले नुकसान की भरपाई हो सकेगी या नहीं - कि उन्होंने पाया कि बंसीधर मेहता की फर्म के जिन वोटों पर वह निगाह लगाये हुए हैं, उनका झुकाव तो प्रफुल्ल छाजेड़ की तरफ है | दरअसल प्रफुल्ल छाजेड़ भी बंसीधर मेहता की फर्म में रहे हैं और उनका भी प्रशिक्षण भावना दोषी व पंकज जैन की तरह बंसीधर मेहता की फर्म में ही हुआ है | बंसीधर मेहता की फर्म के और उनसे जुड़े वोटों पर भावना दोषी का अच्छा कब्ज़ा रहा है | पंकज जैन ने पिछले चुनावों में इन वोटों में सेंध लगाने की हालाँकि काफी कोशिश की, लेकिन उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली | भावना दोषी के उम्मीदवार न होने की स्थिति में पंकज जैन को उक्त वोट मिलने की पूरी-पूरी उम्मीद थी, लेकिन उनकी वह उम्मीद भी पूरी होती हुई नहीं दिख रही है | बंसीधर मेहता की फर्म के और उनसे जुड़े लोगों की पंकज जैन से इस बात को लेकर खासी नाराजगी है कि पंकज जैन ने हमेशा ही भावना दोषी के वाइस प्रेसीडेंट बनने के प्रयासों में रोड़ा अटकाने का काम किया है | भावना दोषी के समर्थक व शुभचिंतक भावना दोषी के प्रेसीडेंट न बनने के लिए काफी हद तक पंकज जैन को भी जिम्मेदार मानते/ठहराते हैं | इसीलिए वह अब - भावना दोषी की उम्मीदवारी की अनुपस्थिति में पंकज जैन को ओबलाइज़ करने के लिए, उन्हें वोट देने के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं नज़र आ रहे हैं |
प्रफुल्ल छाजेड़ को इसका फायदा मिलता हुआ दिख रहा है | बंसीधर मेहता की फर्म के और उनसे जुड़े लोग दरअसल 'घर' के व्यक्ति के साथ ही रहना चाहते हैं और प्रफुल्ल छाजेड़ भी चूँकि उनके साथ लगातार संपर्क बनाये रहे हैं इसलिए भावना दोषी की उम्मीदवारी की अनुपस्थिति में उनके प्रफुल्ल छाजेड़ के साथ जुड़ने की संभावना देखी जा रही है | बंसीधर मेहता की फर्म के और उनसे जुड़े लोगों के बीच पंकज जैन की तुलना में प्रफुल्ल छाजेड़ का पलड़ा लोगों को यदि भारी नज़र आ रहा है, तो इसका प्रमुख कारण यह है कि प्रफुल्ल छाजेड़ हमेशा ही भावना दोषी के साथ खड़े दिखे हैं | इंडियन मर्चेंट्स चैम्बर में पिछले वर्ष जब भावना दोषी अध्यक्ष थीं, तब भी प्रफुल्ल छाजेड़ ने को-ऑपटेड चेयरमैन के रूप में उनके साथ मिलकर काम किया था | प्रफुल्ल छाजेड़ ने अपने व्यवहार और अपनी सक्रियता के भरोसे अपनी पहचान और अपने संबंध तो बनाये ही, भावना दोषी के प्रति सहयोग और सम्मान का उनका जो रवैया रहा - उसके चलते भी भावना दोषी के समर्थकों व शुभचिंतकों के बीच उनकी पैठ बनी है | बंसीधर मेहता की फर्म के तथा उनसे जुड़े भावना दोषी समर्थकों के बीच पंकज जैन की तुलना में प्रफुल्ल छाजेड़ का पलड़ा यदि भारी दिख रहा है तो इसका कारण यही है कि पंकज जैन ने हमेशा ही भावना दोषी की खिलाफत की और उनसे आगे निकलने/दिखने की कोशिश की | भावना दोषी समर्थकों ने इसे पसंद नहीं किया है और इसीलिए वह पंकज जैन से दूरी बनाये रखना चाहते हैं | उनकी यह चाहत ही प्रफुल्ल छाजेड़ के लिए वरदान बनी है | कई लोगों का लेकिन मानना/कहना है कि इस 'वरदान' को बनाये रखने तथा हासिल करने के लिए प्रफुल्ल छाजेड़ को लगातार प्रयास भी करते रहने पड़ेंगे |