Saturday, September 12, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नागपुर ब्रांच के स्थापना दिवस समारोह में हुईं बातों ने पिछली बार हुई राजेश लोया की पराजय तथा उस पराजय के लिए जुल्फेश शाह को जिम्मेदार ठहराए जाने की चर्चा को पुनर्जीवित किया और रीजनल काउंसिल के चुनाव को दिलचस्प बनाया

नागपुर । ब्रांच के स्थापना दिवस के समारोह में रीजनल काउंसिल के उम्मीदवारों की संख्या घटाने के कुछेक लोगों के प्रयास को जिस तरह से मुँहकी खानी पड़ी है, उसके कारण नागपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की चुनावी राजनीति आपसी होड़ की प्रतिस्पर्धा में प्रवेश करती दिखाई दे रही है । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के संदर्भ में नागपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की एकता वेस्टर्न रीजन में प्रशंसा और ईर्ष्या का विषय रही है । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति से जुड़े फैसले नागपुर में जिस तरह से आपसी विचार-विमर्श से मिलजुल कर लिए जाते रहे हैं, वह वेस्टर्न रीजन के चुनावी खिलाड़ियों के लिए कभी प्रशंसा के तो कभी चिंता के विषय रहे हैं । वेस्टर्न रीजन के खिलाड़ी नेताओं ने पिछले वर्षों में नागपुर की इस एकता को तोड़ने की कुछेक बार जो कोशिशें कीं, वह बुरी तरह विफल रहीं हैं । लेकिन इस बार के चुनाव में नागपुर में की यह एकता बिखरती हुई नजर आ रही है - और इसकी अभिव्यक्ति या इसके सुबूत रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत चार लोगों की उम्मीदवारी में देखे/पहचाने जा रहे हैं । चुनावी राजनीति के गुणा-भाग को समझने वाला नागपुर का कमोवेश हर व्यक्ति मान रहा है और कह रहा है कि रीजनल काउंसिल के लिए नागपुर से इस बार दो सीट निकल सकती हैं - इसलिए आपस में विचार विमर्श करके दो लोगों की ही उम्मीदवारी प्रस्तुत होनी चाहिए, जिससे कि दो सीटों को सचमुच में सुरक्षित किया जा सके । इस संबंध में अभी तक जो भी प्रयास हो रहे थे, वह कामयाब होते हुए नहीं नजर आए - इसलिए ब्रांच के स्थापना दिवस समारोह में ब्रांच की मैनेजमेंट कमेटी में अभी तक रहे लोगों के सम्मान के बहाने नागपुर के प्रमुख लोग जब इकट्ठा हुए, तो फिर रीजनल काउंसिल के लिए दो उम्मीदवार वाला मुद्दा उठा । मुद्दा उठा तो तरह तरह के फार्मूले सामने आए - लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद किसी फार्मूले पर सहमति नहीं बन सकी और रीजनल काउंसिल के उम्मीदवारों की संख्या घटाने के प्रयास एक बार फिर - और शायद अंतिम बार, फेल हो गए । 
इस असफलता में कुछेक लोगों को इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के संदर्भ में नागपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की एकता को ग्रहण लगता दिख रहा है । कुछेक लोगों का मानना और कहना हालाँकि यह है कि यह पिछली बार हुई 'राजनीति' का स्वाभाविक नतीजा है; इस बार नागपुर में उम्मीदवारी के बारे में फैसले करने की सामूहिक एप्रोच में जो बिखराब हुआ है - उसकी नींव वास्तव में पिछली बार ही पड़ गई थी । दरअसल पिछली बार राजेश लोया की पराजय के लिए राजेश लोया के समर्थकों ने जिस तरह से जुल्फेश शाह को जिम्मेदार ठहराया था, उससे नागपुर के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच एक विभाजक रेखा खिंच गई थी । जुल्फेश शाह और उनके समर्थकों ने इस आरोप की गंभीरता को नहीं समझा, और इसे राजेश लोया के समर्थकों की खीज मान कर अनदेखा कर दिया । पिछली बार का चुनावी नतीजा घोषित होने के तुरंत बाद से जिस तरह जुल्फेश शाह की तरफ से सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी का दावा किया/सुना जाने लगा, उसने राजेश लोया के समर्थकों के जले पर नमक छिड़कने का काम किया । जुल्फेश शाह के समर्थकों ने अभिजीत केलकर के समर्थकों/सहयोगियों के दूसरी वरीयता के वोट न मिलने की बात करते हुए धोखा देने का आरोप भी लगाया । उनका तर्क था कि अभिजीत केलकर को पहली वरीयता के जो 655 वोट मिले थे, उनके दूसरी वरीयता के वोट उन्हें मिलने चाहिए थे; किंतु जो उन्हें नहीं मिले । पिछली बार, चुनावी नतीजा आने के बाद आरोपों-प्रत्यारोपों का जो दौर चला था, उससे नागपुर में तलवारों के म्यान से बाहर निकल आने के संकेत मिलने लगे थे । इन संकेतों को या तो पहचाना नहीं गया, और या पहचान कर भी जिनकी अनदेखी कर दी गई । 
नागपुर में उभर रहे विभाजनकारी संकेतों को सतीश सारदा की उम्मीदवारी की प्रस्तुति से और बढ़ावा मिला । दरअसल अभिजीत केलकर चाहते थे कि रीजनल काउंसिल की इस बार की उनकी उम्मीदवारी में कोई विध्न-बाधा न पड़े, इसके लिए नागपुर में कोई और अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत न करे । सतीश सारदा ने लेकिन इस तर्क के साथ अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की कि नागपुर में रीजनल काउंसिल के दो उम्मीदवारों को जिता लेने की क्षमता है, इसलिए उनकी उम्मीदवारी से अभिजीत केलकर को चिंता करने की जरूरत नहीं है । नागपुर में रीजनल काउंसिल के दो उम्मीदवारों को जिता लेने की क्षमता होने के बावजूद अभिजीत केलकर पिछली बार चूँकि नहीं जीत पाए थे, इसलिए उन्होंने इस तर्क को 'स्वीकार' नहीं किया । यहाँ तक भी बात लेकिन ज्यादा नहीं बिगड़ी थी; बात ज्यादा तब बिगड़ी जब सतीश सारदा ने यह बताना शुरू किया कि उन्होंने तो पहले ही घोषणा कर दी थी कि जुल्फेश शाह जब रीजनल काउंसिल को छोड़ेंगे, तब वह रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनेंगे - इससे लोगों के बीच यह मैसेज गया कि सतीश सारदा की उम्मीदवारी के पीछे जुल्फेश शाह हैं । अभिजीत केलकर व दूसरे लोगों को भी लगा कि जुल्फेश शाह ने अभिजीत केलकर की राह में रोड़ा बिछाने की कोशिश के तहत ही सतीश सारदा की उम्मीदवारी को प्रस्तुत किया/करवाया है । इससे फिर बात बिगड़ गई, और परस्पर अविश्वास का भाव पैदा हुआ तथा फैसले करने/लेने की सामूहिक भावना मिट गई । अश्विन अग्रवाल और स्वप्निल अग्रवाल की उम्मीदवारी की प्रस्तुति ने इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया । 
इस प्रक्रिया के तेज होने का एक कारण यह भी है कि नागपुर में रीजनल काउंसिल के लिए जिन चार लोगों की उम्मीदवारी सामने आई है, उनके समर्थकों को उनके जीतने का पूरा पूरा विश्वास है; और इसलिए समर्थक अपने अपने उम्मीदवार को पीछे करने को हरगिज तैयार नहीं हैं । रीजनल काउंसिल के संदर्भ में नागपुर में इस बार मजेदार सीन यह है कि चुनावी राजनीति के होशियार खिलाड़ी भी किसी एक की जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं । अलग अलग कारणों से चारों को जीतने वाले उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है - और माना जा रहा है कि सफल होने वाले उम्मीदवार की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपनी खूबियों के प्रति लोगों को किस हद तक प्रभावित कर पाता है, और चुनावी समीकरणों को अपने पक्ष में किस तरह से मैनेज करता है । ब्रांच के स्थापना दिवस समारोह में ब्रांच की मैनेजमेंट कमेटि(यों) में रहे लोगों को सम्मानित करने के लिए जुटे लोगों के बीच जिस तरह से बातें हुईं और लोग खेमों में बँटे नजर आए, उससे एक बात जरूर साफ हो गई है कि पिछली बार हुई राजेश लोया की पराजय तथा उस पराजय के लिए जुल्फेश शाह को जिम्मेदार ठहराए जाने की चर्चा ने नागपुर में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की एकता को जो चोट पहुँचाई है, उसकी छाया रीजनल काउंसिल के चुनाव पर भी पड़ती दिख रही है । यह छाया क्या राजनीतिक समीकरण बनाती है, और कौन उम्मीदवार इस समीकरण को बनाने में क्या भूमिका निभाता है और कैसे इसे इस्तेमाल करता है - इस पर उसकी सफलता निर्भर करेगी । 

Thursday, September 10, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में पूर्व गवर्नर हितेश कुमार शर्मा के फर्जी पत्र मामले में मनोज देसाई के रवैये से उत्साहित राजीव सिंघल और उनके समर्थकों ने जिस षड्यंत्रपूर्ण तरीके से मंजु गुप्ता को रास्ते से हटाने की कोशिश की है, उससे राजीव सिंघल की उम्मीदवारी की कमजोरी ही साबित हुई है

मेरठ । राजीव सिंघल और उनके समर्थक नेताओं ने इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई के नाम पर डिस्ट्रिक्ट में जो गंदगी फैलाई हुई है, उस पर चुप्पी साध कर मनोज देसाई ने अपनी फजीहत और कराई हुई है । मनोज देसाई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर हितेश कुमार शर्मा के पत्र पर जिस तरह कुंडली मार कर बैठ गए हैं, उससे राजीव सिंघल तथा उनके समर्थक नेताओं के हौंसले और बुलंद हुए हैं । इस बुलंद हौंसले की बदौलत ही राजीव सिंघल तथा उनके समर्थक नेताओं ने रोटरी क्लब मेरठ डायमण्ड में फर्जी तरीके से अधिकांश सदस्यों को ड्रॉप कर/करवा दिया है, ताकि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए राजीव सिंघल को मंजु गुप्ता से मिल रही चुनौती को खत्म किया जा सके । उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए राजीव सिंघल और उनके समर्थकों ने जब मंजु गुप्ता की उम्मीदवारी को मिल रहे समर्थन के सामने अपने आपको कमजोर पाया, तो उन्होंने षड्यंत्र करके मंजु गुप्ता को रोटरी से ही 'बाहर' कर/करवा दिया है । राजीव सिंघल और उनके समर्थक नेता इस मामले में अब सीधे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील गुप्ता को चुनौती दे रहे हैं कि वह मंजु गुप्ता तथा अन्य सदस्यों की सदस्यता बचा कर दिखाएँ । दरअसल रोटरी क्लब मेरठ डायमण्ड के अध्यक्ष तन्मय शर्मा ने जिस षड्यंत्रपूर्ण तरीके से मंजु गुप्ता तथा क्लब के अन्य सदस्यों को क्लब से बाहर कर दिया है, उसे अमान्य बताते हुए रोटरी इंटरनेशनल के दिल्ली स्थित कार्यालय के पदाधिकारियों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील गुप्ता से कार्रवाई करने के लिए कहा है । राजीव सिंघल और उनके समर्थक नेताओं का कहना है कि रोटरी इंटरनेशनल के इस स्पष्ट निर्देश के बाद सुनील गुप्ता ने क्लब के अध्यक्ष तन्मय शर्मा के साथ मीटिंग व बातचीत तो कर ली है, किंतु कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील गुप्ता अपने ही डिस्ट्रिक्ट के एक क्लब के अध्यक्ष के सामने अपने आपको जिस तरह से असहाय पा रहे हैं - उसे राजीव सिंघल और उनके समर्थक नेता अपनी जीत के रूप में देख रहे हैं; और अपनी इस 'जीत' का श्रेय मनोज देसाई को दे रहे हैं । 
मनोज देसाई लेकिन राजीव सिंघल और उनके समर्थक नेताओं की इससे भी बड़ी मदद हितेश कुमार शर्मा के फर्जी पत्र के मामले में कर रहे हैं । मनोज देसाई जिस दिन यह मदद करना बंद कर देंगे, उस दिन राजीव सिंघल और उनके समर्थक नेताओं में से कोई एक बड़ी मुसीबत में फँस जायेगा । दरअसल हुआ यह कि डिस्ट्रिक्ट के पूर्व गवर्नर हितेश कुमार शर्मा की तरफ से निवर्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर संजीव रस्तोगी तथा मौजूदा गवर्नर सुनील गुप्ता के खिलाफ आरोप लगाते हुए एक पत्र निवर्तमान इंटरनेशनल डायरेक्टर पीटी प्रभाकर को भेजा गया, जिसकी प्रति मनोज देसाई को भी संलग्न की गई । इंटरनेशनल डायरेक्टर होने के नाते मनोज देसाई ने इस पत्र का संज्ञान लिया, और हितेश कुमार शर्मा से कुछ स्पष्टीकरण माँगे । इस पर हितेश कुमार शर्मा का माथा चकराया । उन्होंने मनोज देसाई से कहा कि यह पत्र उन्होंने न तो लिखा है, और न ही भेजा है । हितेश कुमार शर्मा का एक बड़ा तर्क रहा कि उन्होंने अपना समस्त पत्र व्यवहार हिंदी में ही किया है; यहाँ तक कि जब वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर थे, तब भी उन्होंने हिंदी में ही पत्र लिखे थे - लिहाजा अब यदि उन्हें कोई पत्र लिखना ही होता, तो वह अंग्रेजी में क्यों लिखते ? हितेश कुमार शर्मा ने कहा कि उनके नाम का इस्तेमाल करते हुए किसी ने अपनी राजनीति साधने के लिए यह ओछा काम किया है । हितेश कुमार शर्मा ने मनोज देसाई से अनुरोध किया कि उनके नाम से भेजे गए इस फर्जी पत्र को जिस ईमेल से भेजा गया है, उस ईमेल का विवरण वह उन्हें उपलब्ध करवाएँ, जिससे कि वह यह ओछी हरकत करने वाले के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकें । मनोज देसाई ने लेकिन हितेश कुमार शर्मा को उक्त ईमेल का विवरण उपलब्ध नहीं करवाया है । हितेश कुमार शर्मा के फर्जी पत्र पर कार्रवाई करने में मनोज देसाई ने जो तत्परता दिखाई, वैसी तत्परता चूँकि वह उक्त फर्जी ईमेल का विवरण उपलब्ध करवाने में नहीं कर रहे हैं - इसलिए इस मामले में उनकी भूमिका संदेहास्पद हो गई है । 
हितेश कुमार शर्मा के नाम से लिखे/भेजे गए फर्जी पत्र में जो बातें और आरोप हैं, वह कमोवेश वही हैं जो राजीव सिंघल के एक समर्थक नेता पूर्व गवर्नर एमएस जैन द्वारा पहले लिखे/भेजे गए पत्र में हैं - इसलिए अनुमान लगाया जा रहा है कि हितेश कुमार शर्मा के नाम से फर्जी पत्र भेजने के पीछे राजीव सिंघल और उनके समर्थक नेताओं में से ही किसी का हाथ है । मजे की बात यह है कि एमएस जैन द्वारा लिखे गए पत्र पर डिस्ट्रिक्ट में जब बबाल मचा था, तब एमएस जैन ने यह कह कर पीछा छुड़ाया था कि उक्त पत्र उन्होंने नहीं लिखा/भेजा था; उनकी ईमेल आईडी किसी ने हैक करके यह शरारत की है । इस पर उनसे कहा गया था कि ईमेल आईडी हैक होने की रिपोर्ट उन्हें पुलिस में करना चाहिए ताकि हैकर को पकड़वा कर उसे सजा दिलवाई जा सके । एमएस जैन ने लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं की - जिससे साबित हुआ कि ईमेल आईडी हैक होने की उनकी बात उनका सिर्फ एक बहाना है और उक्त शिकायती मेल उन्होंने ही किया था । उक्त ईमेल को लेकर एमएस जैन की लोगों के बीच बहुत ही थू थू हुई और उन्हें भारी शर्मिंदगी से गुजरना पड़ा । समझा जाता है कि एमएस जैन की हुई फजीहत से सबक लेकर ही राजीव सिंघल और उनके समर्थक नेताओं ने निवर्तमान व मौजूदा गवर्नर तथा अन्य कुछेक वरिष्ठ रोटेरियंस को झूठे आरोपों में बदनाम करने के लिए फर्जी तरीके अपनाने की राह चुनी - और इसके लिए हितेश कुमार शर्मा के नाम का इस्तेमाल किया । किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल हो रहा है कि गवर्नर्स तथा वरिष्ठ रोटेरियंस को झूठी बातों के सहारे बदनाम करने तथा इस तरह रोटरी को कलंकित करने वालों को प्रश्रय देकर और उन्हें बचाने का प्रयास करके मनोज देसाई आखिर हासिल क्या करना चाहते हैं ?
राजीव सिंघल की उम्मीदवारी के समर्थक नेताओं ने सिर्फ डिस्ट्रिक्ट के लोगों को ही नहीं, बल्कि अपनी हरकतों से रोटरी के बड़े नेताओं तक को चुनौती दी हुई है । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन ने रोटरी में राजनीति को हतोत्साहित करने का आह्वान किया हुआ है और स्पष्ट चेतावनी दी हुई है कि जो कोई भी राजनीति करता हुआ पाया जायेगा, उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी । इंटरनेशनल प्रेसीडेंट की इस स्पष्ट चेतावनी के बावजूद पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर एमएस जैन, गजेंद्र सिंह धामा, योगेश मोहन गुप्ता खुलेआम राजीव सिंघल की उम्मीदवारी के समर्थन में अभियान चलाए हुए हैं । केआर रवींद्रन के आह्वान और उनकी चेतावनी की याद दिलाए जाने पर इनकी तरफ से प्रायः यही सुनने को मिलता है कि - हम तो जो कर रहे हैं, खुलेआम कर रहे हैं; हम भी देखेंगे कि रवींद्रन क्या करते हैं ? रोटरी को कलंकित करने के मामले में इनके हौंसले इस कदर ऊँचे हैं कि रोटरी क्लब मुरादाबाद नॉर्थ के एक कार्यक्रम में पूर्व गवर्नर योगेश मोहन गुप्ता रोटरी फाउंडेशन में पैसे न देने के लिए यह कहते हुए आह्वान करते हैं कि रोटरी फाउंडेशन का पैसा रोटरी के बड़े पदाधिकारियों और नेताओं की मौजमस्ती में इस्तेमाल होता है, इसलिए उसमें पैसे देने से क्या फायदा ? यही लोग राजीव सिंघल की उम्मीदवारी का झंडा उठाए हुए हैं । 
डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में राजीव सिंघल की समस्या यह है कि उनके समर्थक नेता नकारात्मक और ओछी किस्म की हरकतें करने के कारण डिस्ट्रिक्ट में खासे बदनाम हैं; जिस कारण लोगों के बीच उनकी उम्मीदवारी को लेकर कोई सकारात्मक सोच बन ही नहीं पा रही है । राजीव सिंघल के लिए मेरठ में ही समर्थन जुटाना मुश्किल हो रहा है । मेरठ में लोगों के बीच उनसे ज्यादा स्वीकार्यता मंजु गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए बनती नजर आ रही है । मंजु गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट में ही नहीं, डिस्ट्रिक्ट के बाहर भी - बल्कि दूसरे देशों तक में अपनी सक्रियता व संलग्नता से अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है । इस पहचान के चलते ही मेरठ में उनके लिए अच्छा समर्थन है । राजीव सिंघल के कुछेक समर्थकों ने उन्हें 'मेरठ के उम्मीदवार' के रूप में प्रमोट करने का प्रयास किया, किंतु मेरठ के कई प्रमुख रोटेरियंस ने उन्हें साफ बता दिया कि यदि सचमुच चाहते हो कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी मेरठ का चुना जाए, तो राजीव सिंघल को छोड़ कर मंजु गुप्ता की उम्मीदवारी का समर्थन करो । मंजु गुप्ता की उम्मीदवारी से मिल रही चुनौती से निपटना राजीव सिंघल और उनके समर्थकों को जब मुश्किल और असंभव लगा, तो उन्होंने षड्यंत्रपूर्वक मंजु गुप्ता की उम्मीदवारी को समाप्त करने का दुष्चक्र रचा । उनकी बदकिस्मती रही कि उनके दुष्चक्र की पोल जल्दी ही खुल गई, और मंजु गुप्ता तथा उनके समर्थकों ने समय रहते आवश्यक कार्रवाई कर ली । मनोज देसाई के रवैये के कारण अनिश्चय में फँसे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील गुप्ता अभी भले ही मंजु गुप्ता को न्याय देने में ढील-ढाल कर रहे हैं, लेकिन इस मामले में रोटरी इंटरनेशनल के दिशा-निर्देश इतने स्पष्ट हैं कि देर-सबेर सुनील गुप्ता को मंजु गुप्ता को न्याय देना/दिलवाना ही होगा । मंजु गुप्ता की उम्मीदवारी से निपटने के लिए राजीव सिंघल और उनके समर्थक नेताओं ने जिस तरह की कायराना हरकत की, उससे राजीव सिंघल की उम्मीदवारी की कमजोरी ही साबित हुई है - और इसके चलते लोगों के बीच राजीव सिंघल की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन और कमजोर हो गया है । 

Wednesday, September 9, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए संजय पवार की उम्मीदवारी प्रस्तुत करने के जरिए एसबी जावरे को घेर कर यशवंत कसार को मिल सकने वाले समर्थन को कमजोर करने की सर्वेश जोशी द्वारा चली गई चाल ने पुणे में चुनावी राजनीति के परिदृश्य को रोमांचक बनाया

पुणे । संजय पवार की सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत होने के साथ ही सर्वेश जोशी की उम्मीदवारी की 'पोजीशन' को लेकर घिरे हुए अनिश्चय के बादल पूरी तरह छंट गए हैं, और पुणे में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति का परिदृश्य लगभग साफ हो गया है । उल्लेखनीय है कि पुणे के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच पिछले कई दिनों से सर्वेश जोशी की उम्मीदवारी को लेकर यह अनिश्चय बना हुआ था कि वह रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवार होंगे, और या सेंट्रल काउंसिल के लिए । दरअसल रीजनल काउंसिल के लिए यशवंत कसार की उम्मीदवारी प्रस्तुत होने से रीजनल काउंसिल में सर्वेश जोशी की सीट खतरे में पड़ती/फँसती हुई दिख रही है । यशवंत कसार की उम्मीदवारी को लेकर सर्वेश जोशी ने एसबी जावरे के प्रति गुस्सा और नाराजगी व्यक्त की है - उन्हें लगता है कि रीजनल काउंसिल से उन्हें बाहर धकेलने के लिए ही एसबी जावरे ने यशवंत कसार को उम्मीदवार बनाया/बनवाया है । सर्वेश जोशी की इस बात से पुणे में उनके विरोधी भी बहुत हद तक सहमत हैं । इससे सर्वेश जोशी को बल मिला, तथा एसबी जावरे के प्रति उनकी नाराजगी और परवान चढ़ी । एसबी जावरे के प्रति सर्वेश जोशी की नाराजगी के जाहिर होने के साथ-साथ पुणे में सर्वेश जोशी की सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी की चर्चा भी गर्म होने लगी । सर्वेश जोशी ने अपनी तरफ से इस चर्चा को ठंडा करने की कोई कोशिश नहीं की; उनके नजदीकियों ने बल्कि यह कहते हुए इस चर्चा में और उबाल पैदा किया कि सर्वेश जोशी का उद्देश्य अब अपना चुनाव जीतना नहीं रह गया है, बल्कि उनका उद्देश्य अब एसबी जावरे को सबक सिखाना हो गया है । सर्वेश जोशी के कुछेक समर्थकों ने तो बाकायदा लोगों को बताया कि एसबी जावरे ने यशवंत कसार के जरिए सर्वेश जोशी के लिए जो मुसीबत खड़ी की है, उसका बदला सर्वेश जोशी सेंट्रल काउंसिल लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करके लेंगे । नजदीकियों व समर्थकों की इसी तरह की बातों के कारण सर्वेश जोशी की उम्मीदवारी को लेकर पुणे में संशय के बादल घिरे और कन्फ्यूजन पैदा हुआ । 
संजय पवार की उम्मीदवारी ने लेकिन इस कन्फ्यूजन को दूर कर दिया है । सर्वेश जोशी की उम्मीदवारी को लेकर कन्फ्यूजन भले ही दूर हो गया है, किंतु संजय पवार की उम्मीदवारी से सर्वेश जोशी की 'राजनीति' पर मोहर भी लग गई है । संजय पवार को सर्वेश जोशी के 'आदमी' के रूप देखा/पहचाना जाता है - और इसी आधार पर माना/कहा जा रहा है कि सर्वेश जोशी ने संजय पवार को एसबी जावरे की नाक में दम करने के लिए ही उम्मीदवार बनाया/बनवाया है । एसबी जावरे के कट्टर से कट्टर विरोधी और आलोचक भी मान रहे हैं तथा कह रहे हैं कि एक उम्मीदवार के रूप में संजय पवार कोई उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं कर पायेंगे तथा जीत से बहुत दूर ही छूट जायेंगे । मजे की बात यह है कि संजय पवार और सर्वेश जोशी के नजदीकी भी/ही यह कह/बता रहे हैं कि संजय पवार का उद्देश्य चुनाव जीतना है भी नहीं - इसीलिए अपनी उम्मीदवारी घोषित करने के बावजूद संजय पवार अपनी उम्मीदवारी के अभियान चलाने को लेकर गंभीर नहीं हुए हैं । इन नजदीकियों का ही कहना/बताना है कि संजय पवार की उम्मीदवारी के जरिए सर्वेश जोशी ने एसबी जावरे की उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने की व्यूह-रचना की है । सर्वेश जोशी ने संजय पवार को सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवार बनाया/बनवाया ही इसलिए है क्योंकि संजय पवार, एसबी जावरे की ही जाति के हैं; और संजय पवार इस नाते से एसबी जावरे को मिलने वाले वोटों में तोड़फोड़ मचायेंगे । किसी को भी यह उम्मीद तो नहीं है कि संजय पवार की उम्मीदवारी के सहारे एसबी जावरे को चुनाव हरवाया जा सकता है, लेकिन सर्वेश जोशी और संजय पवार के कुछेक समर्थकों को यह विश्वास जरूर है कि संजय पवार की उम्मीदवारी के भरोसे एसबी जावरे के वोटों को कम अवश्य किया जा सकेगा, तथा एसबी जावरे को अपने चुनाव अभियान को गंभीरता से लेने के लिए मजबूर किया जा सकेगा । 
एसबी जावरे को संजय पवार की उम्मीदवारी के मार्फ़त सेंट्रल काउंसिल के अपने चुनाव में 'फँसा' कर सर्वेश जोशी ने दरअसल रीजनल काउंसिल के अपने चुनाव को सुरक्षित बनाने का दाँव चला है । उनका आकलन है कि एसबी जावरे अपने चुनाव में व्यस्त होंगे, तो यशवंत कसार के लिए कम समय निकाल सकेंगे । यशवंत कसार को एसबी जावरे के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता है । यशवंत कसार की उम्मीदवारी को सर्वेश जोशी के लिए बड़े खतरे के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । सर्वेश जोशी पिछली बार लुढ़कते/पुढ़कते ही जीत प्राप्त कर सके थे - और 21वें नंबर पर रहे थे । इस बार के चुनाव आते आते तक सर्वेश जोशी ने अपनी पिछली बार के बहुत से समर्थकों को अलग अलग कारणों से खो दिया है, जिस कारण उनके लिए अपनी सीट बचा पाना पहले से ही मुश्किल हो रहा था । यशवंत कसार की उम्मीदवारी ने उनकी मुसीबतों को और बढ़ाने का ही काम किया है । दरअसल यशवंत कसार की उम्मीदवारी के चलते सर्वेश जोशी के सामने पिछली बार उन्हें मिले मराठा वोटों के छिन जाने का खतरा पैदा हो गया है - इसके चलते सर्वेश जोशी के लिए रीजनल काउंसिल में अपनी सीट बचा पाना वास्तव में मुश्किल हो गया है । यशवंत कसार की उम्मीदवारी को चूँकि एसबी जावरे की प्रेरणा व प्रोत्साहन से प्रस्तुत हुआ माना/देखा जा रहा है, इसलिए आशंका और डर यह भी है कि एसबी जावरे ने यदि यशवंत कसार की खुली वकालत कर दी, तो फिर सर्वेश जोशी को कोई नहीं बचा सकेगा । 
एसबी जावरे किसी भी तरह से यशवंत कसार की मदद न कर सकें, इस वास्ते उन्हें घेरने के लिए सर्वेश जोशी ने संजय पवार को 'फील्डिंग' पर लगाया है । सर्वेश जोशी के समर्थकों का कहना है कि संजय पवार की उम्मीदवारी के जरिए एसबी जावरे को घेर कर यशवंत कसार को मिल सकने वाले समर्थन को कमजोर करने की चाल चली गई है । कुछेक लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि एसबी जावरे को संदेश भेजा गया है कि वह यदि यशवंत कसार की उम्मीदवारी को वापस कर/करा लें, तो संजय पवार की उम्मीदवारी भी वापस हो जाएगी - और एसबी जावरे बड़ी जीत प्राप्त करने की अपनी तैयारी को सफल कर सकेंगे । इसीलिए उम्मीदवारी घोषित करने के बावजूद संजय पवार अपनी उम्मीदवारी के अभियान को लेकर सुस्त बने हुए हैं - दरअसल उन्हें लगता है कि एसबी जावरे 'उनके' ऑफर को स्वीकार कर लेंगे और यशवंत कसार की उम्मीदवारी को वापस कर/करा लेंगे; इसलिए अपनी उम्मीदवारी के लिए उन्हें कुछ करने की जरूरत ही क्या है ? एसबी जावरे और यशवंत कसार के समर्थकों ने हालांकि यशवंत कसार की उम्मीदवारी वापस होने की संभावना से स्पष्ट रूप से इंकार किया है । उनका कहना है कि संजय पवार की उम्मीदवारी से एसबी जावरे की उम्मीदवारी की जीत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, और यशवंत कसार को भी लोगों के बीच अपनी उम्मीदवारी के लिए अच्छा समर्थन मिल रहा है, इसलिए सर्वेश जोशी की चाल में फँसने की उन्हें कोई जरूरत नहीं है । संजय पवार के जरिए सर्वेश जोशी ने जो चाल चली है, उससे उन्हें सचमुच क्या फायदा मिलेगा - यह तो बाद में पता चलेगा; अभी लेकिन उनकी इस चाल से पुणे में चुनावी राजनीति का परिदृश्य रोमांचक जरूर हो गया है । 

Tuesday, September 8, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के पूर्व प्रेसीडेंट बंसीधर मेहता की बेटी दृष्टि देसाई की उम्मीदवारी ने वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मुंबई के उम्मीदवारों के बीच खासी हलचल मचा दी है और उनकी किस्मत को नए सिरे से बनाने-बिगाड़ने के हालात पैदा कर दिए हैं

मुंबई । दृष्टि देसाई ने वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करके वेस्टर्न रीजन में ही नहीं, बल्कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में हलचल मचा दी है । दृष्टि देसाई बंसीधर मेहता की बेटी हैं । बंसीधर मेहता का परिचय सिर्फ यही नहीं है कि वह करीब तीन दशक पूर्व, वर्ष 1981-82 में इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट थे; उनका परिचय इससे कहीं बड़ा है - और वह यह कि वह चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच आज भी एक 'सुपर स्टार' की हैसियत रखते हैं; मुंबई जैसे शहर के किसी सेमिनार में वह स्पीकर होते हैं तो तीन-चार हजार चार्टर्ड एकाउंटेंट्स तुरंत से उपस्थित हो जाते हैं; और इन उपस्थित होने वालों में भी अधिकतर नामी और व्यस्त रहने वाले चार्टर्ड एकाउंटेंट्स होते हैं । उनकी प्रोफेशनल एक्सपर्टीज की स्थिति यह है कि देश के बड़े कॉर्पोरेट्स घरानों की कंपनियाँ उनकी क्लाइंट हैं, और उनकी फर्म के ऑर्टिकल्स बड़ी चार्टर्ड एकाउंटेंट्स फर्मों में - यहाँ तक की बिग फोर फर्मों में पार्टनर हैं । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में उनकी 'उपस्थिति' की स्थिति यह है कि उनके बाद सेंट्रल काउंसिल में गौतम दोषी, भावना दोषी, पंकज जैन, प्रफुल्ल छाजेड़ उनके नाम को बनाए हुए हैं । ऐसे में दृष्टि देसाई के इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में पड़े कदम को इंस्टीट्यूट की राजनीति के संदर्भ में एक बड़ी घटना के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है - और लोग चार्टर्ड एकाउंटेंट इंस्टीट्यूट की अगले वर्षों की चुनावी राजनीति को दृष्टि देसाई के इर्द-गिर्द घूमते हुए देखने/पहचानने लगे हैं ।
देखने/पहचानने की इसी प्रक्रिया में लोगों को हालाँकि आश्चर्य इस बात पर है कि दृष्टि देसाई ने रीजनल काउंसिल की बजाए सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत क्यों नहीं की ? सभी मानते और कहते हैं कि दृष्टि देसाई यदि सेंट्रल काउंसिल के लिए भी उम्मीदवारी प्रस्तुत करतीं, तो शर्तिया जीततीं । वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में उन्हें सबसे ज्यादा वोट प्राप्त करने वाले उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । इस नाते दृष्टि देसाई की उम्मीदवारी को प्रीति सावला और श्रुति शाह के लिए खासी बड़ी चुनौती के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । प्रीति सावला तो पिछली बार वोट पाने वालों में पहली वरीयता के 1514 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रही थीं, इसलिए बहुत संभव है कि दृष्टि देसाई की उम्मीदवारी से उन्हें वोटों का झटका भले ही लगे, लेकिन रीजनल काउंसिल में उनकी सीट बची रह जाए; किंतु पहली वरीयता के 516 वोटों के साथ 28वें नंबर पर रहने वाली श्रुति शाह के लिए हालात सचमुच मुश्किल हो गए हैं । मामूली अंतर से पिछड़ जाने वाली वंदना डोढिया के लिए, दृष्टि देसाई की उम्मीदवारी के चलते इस बार संभावना और कमजोर पड़ गई दिख रही है । दरअसल इसीलिए दृष्टि देसाई की उम्मीदवारी ने वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मुंबई के उम्मीदवारों के बीच खासी हलचल मचा दी है । माना जा रहा है कि दृष्टि देसाई की उम्मीदवारी - और उनकी निश्चित जीत की उम्मीद ने वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के मुंबई के उम्मीदवारों की किस्मत को नए सिरे से बनाने-बिगाड़ने के हालात पैदा कर दिए हैं । रीजनल काउंसिल के मुंबई के बाहर के उम्मीदवारों को लग रहा है कि दृष्टि देसाई मुंबई के उम्मीदवारों को वोटों का जो नुकसान पहुँचाएंगी, उसके कारण उनकी 'लॉटरी' निकल सकती है । 
रीजनल काउंसिल के उम्मीदवारों के बीच हो रहे नफे-नुकसान के इस आकलन के बीच कुछेक लोगों का हालाँकि यह भी मानना और कहना है कि दृष्टि देसाई की सफलता एक उम्मीदवार के रूप में उनकी चुनावी व्यूह-रचना और उनकी सक्रियता पर निर्भर करेगी । यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनके पिता बंसीधर मेहता उनकी उम्मीदवारी के लिए वैसी सक्रियता बिलकुल भी नहीं दिखाएंगे, जैसी सक्रियता अहमदाबाद से रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले अनिकेत तलति के लिए उनके पिता पूर्व प्रेसीडेंट सुनील तलति दिखा रहे हैं । बंसीधर मेहता को बहुत ही सिद्धांत-प्रिय और तड़क-भड़क तथा महत्वाकांक्षाओं से दूर रहने वाले व्यक्ति के रूप में देखा/पहचाना जाता है; इसीलिए विश्वास किया जाता है कि दृष्टि देसाई को अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ेगी । बंसीधर मेहता के ऑरा का, लोगों के बीच उनके प्रभाव का, लोगों की उनके प्रति 'भक्ति' का फायदा दृष्टि देसाई को अवश्य ही मिल सकेगा - लेकिन यह तब मिल सकेगा, जब दृष्टि देसाई इस फायदे को जुटाने के लिए 'व्यवस्था' करेंगी । इस बात को स्वीकार करते हुए दूसरे लोगों का कहना है कि दृष्टि देसाई अब जब चुनावी मैदान में कूद पड़ी हैं, तो इतना तो वह समझ ही रही होंगी कि यहाँ एक उम्मीदवार के रूप में उन्हें अपनी सक्रियता तो दिखानी ही होगी और चुनाव को 'मैनेज' करने में उन्हें जुटना ही होगा । उन्होंने देखा ही है, और अवश्य ही इसे नोट भी किया होगा कि बंसीधर मेहता के 'नाम' के बावजूद गौतम दोषी, भावना दोषी, पंकज जैन और प्रफुल्ल छाजेड़ ने इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में अपने अपने पापड़ स्वयं ही बेले हैं ।   
दृष्टि देसाई एक प्रोफेशनल होने के साथ साथ सामाजिक भूमिका निभाने में दिलचस्पी लेती रही हैं, और सेमीनारों में वक्ता के रूप में वह अपनी रुचि से भाग लेती रही हैं । वह जिन कुछेक कमेटियों में सदस्य और या पदाधिकारी रही हैं, वहाँ भी उन्होंने अपनी संलग्नता प्रदर्शित की है । इन तथ्यों को रेखांकित करते हुए उन्हें जानने वाले लोगों का कहना है कि 'चुनावी जरूरतों' का उन्हें निश्चित ही अहसास और आभास होगा, तथा उन्हें पूरा करने में वह कोई कमी भी नहीं रहने देंगी । उन्हें निश्चित ही इस बात का भी अहसास और आभास होगा कि उनकी चुनावी सक्रियता और उपलब्धियाँ प्रोफेशन और इंस्टीट्यूट में 'लेजेंड' के रूप में देखे/पहचाने जाने वाले उनके पिता बंसीधर मेहता की प्रतिष्ठा से भी जुड़ी है - और इसलिए वह एक उम्मीदवार के रूप में अपनी सक्रियता को गंभीरता से ही लेंगी । इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में दृष्टि देसाई ने अपनी उपस्थिति को यदि सचमुच गंभीरता से लिया - तो लोगों का मानना और विश्वासपूर्वक कहना है कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में वह एक नया अध्याय लिखेंगी ।

Sunday, September 6, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की फरीदाबाद ब्रांच में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स छात्रों पर मनमाने तरीके से थोपी गई लायब्रेरी फीस मामले में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की नाराजगी से अपने आप को बचाने के लिए विजय गुप्ता और दीपक गर्ग ने फरीदाबाद में लोगों से छिप कर रहने का फार्मूला अपनाया

फरीदाबाद । इंस्टीट्यूट की फरीदाबाद ब्रांच में छात्रों से लायब्रेरी फीस लेने के मामले ने इतना तूल पकड़ लिया है कि सेंट्रल काउंसिल और रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले उम्मीदवारों ने फरीदाबाद से 'भाग' खड़े होने में ही अपनी खैर समझी है । उल्लेखनीय है कि फरीदाबाद में अपने खिलाफ माहौल देख/पहचान कर विजय गुप्ता और दीपक गर्ग तो पहले से ही फरीदाबाद में लोगों से मुँह छिपाते फिर रहे हैं, और सिर्फ अपने अपने खास लोगों के ही फोन उठा रहे हैं । जो लोग एसएमएस और ईमेल जैसे संवाद के व्यक्तिगत माध्यमों के जरिए, तथा फेसबुक जैसे खुले/सार्वजनिक मंच से इनसे सवाल पूछ रहे हैं - उन्हें भी जबाव देने से यह कन्नी काट रहे हैं । तेजिंदर भारद्वाज और विपिन शर्मा के लिए भी माहौल चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है - फलस्वरूप इन दोनों ने भी कभी जबाव देने तो कभी चुप लगा जाने वाला फार्मूला अपना लिया है । इनके किन्हीं किन्हीं समर्थकों ने साहस करके सवाल उठाने वाले लोगों से अनुरोध भी किया कि इंस्टीट्यूट की समस्याओं पर सार्वजनिक रूप से बात नहीं की जानी चाहिए - किंतु उन्हें भी लोगों से जब लताड़ सुनने को मिली, तो वह भी पीछे हट गए । 
उल्लेखनीय है कि यह चारों फरीदाबाद ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी के सदस्य हैं - और इस नाते यदि यह चाहें तो सेकेंड्स में छात्रों से फीस बसूलने का फरमान वापिस हो सकता है । चारों को छोड़िये, एक अकेले विजय गुप्ता फरीदाबाद ब्रांच में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स छात्रों के साथ हो रही 'लूट' को रोक सकते हैं । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के सदस्य विजय गुप्ता अक्सर दावा करते हुए सुने गए हैं कि इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट मनोज फडनिस तो उनके इशारे पर नाचते हैं, और फरीदाबाद के मामले में तो मनोज फडनिस ने उन्हें ही प्रेसीडेंट 'बना' दिया है । यंग मेंबर्स एम्पॉवरमेंट कमेटी के चेयरमैन के रूप में विजय गुप्ता जिस तरह की मनमानियाँ करते चल रहे हैं, और उनकी मनमानियों पर मनोज फडनिस जिस तरह से आँखें बंद करके बैठे हुए हैं, उससे विजय गुप्ता का उक्त दावा लोगों को सच भी जान पड़ता है । इसके बावजूद विजय गुप्ता चार्टर्ड एकाउंटेंट्स छात्रों की सुध नहीं ले रहे हैं । दीपक गर्ग रीजनल काउंसिल में होने के कारण फरीदाबाद में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स छात्रों की फीस वाली समस्या को सीधे और तुरंत हल कर/करवा सकते हैं; रीजनल काउंसिल जब दूसरी जगहों पर छात्रों से फीस नहीं ले रही है, तो फिर फरीदाबाद में छात्रों से फीस बसूलने का वैसे भी कोई तर्क तो बनता नहीं है । दीपक गर्ग ने भी लेकिन अपने राजनीतिक गुरु विजय गुप्ता की तरह मामले पर चुप्पी ही साध ली है - और फरीदाबाद के लोगों से बचते/छिपते ही फिर रहे हैं । फरीदाबाद में कई लोगों की शिकायत है कि विजय गुप्ता और दीपक गर्ग तो उनके फोन ही नहीं उठा रहे हैं; और यदि कभी उठा भी लेते हैं तो यह कह कर बात सुनने/करने से बच लेते हैं कि अभी मैं बाहर हूँ या मीटिंग में हूँ, बाद में फोन करता हूँ - और उनका 'बाद में' कभी आता ही नहीं है । 
तेजिंदर भारद्वाज का मामला फरीदाबाद ब्रांच के चेयरमैन संतोष अग्रवाल ने खराब कर दिया । दरअसल तेजिंदर भारद्वाज ने बाहर तो अपना मत व्यक्त किया कि छात्रों से लायब्रेरी की फीस नहीं लेनी चाहिए, किंतु ब्रांच के चेयरमैन संतोष अग्रवाल ने यह कह कर उनकी पोल खोल दी कि फीस बसूलने के फैसले में तेजिंदर भारद्वाज की पूरी सहमति थी । लायब्रेरी फीस को लेकर तेजिंदर भारद्वाज का 'नेताओं वाला' दोहरा रवैया सामने आया, तो उनके लिए भारी मुसीबत खड़ी हो गई । इस मुसीबत से निपटने के लिए उन्होंने जो तरीका अपनाया, उससे बात वास्तव में और बिगड़ गई । इस मामले में बात करने/उठाने वाले लोगों पर उन्होंने आरोप लगाया कि वह राजनीति कर रहे हैं । इस पर उन्हें सुनने को मिला कि वह रीजनल काउंसिल में चुने जाने के लिए जो जो तिकड़में लगा रहे हैं, उसे क्या सत्संग करना कहते हैं; वह भी राजनीति ही है - और जिस तरह उन्हें राजनीति करने का हक़ है, ठीक उसी तरह दूसरों को भी राजनीति करने का हक है । तेजिंदर भारद्वाज ने यह तर्क देकर भी जान छुड़ाने की कोशिश की कि इस मामले में सवाल सिर्फ चार लोगों से ही क्यों किए जा रहे हैं, ब्रांच की मैनेजिंग कमेटी के सभी ग्यारह सदस्यों से क्यों नहीं किए जा रहे हैं ? इसका जबाव उन्हें यह मिला कि जो चार लोग इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल व रीजनल काउंसिल में जाने की तैयारी कर रहे हैं, उनसे ही खासतौर पर इस मामले में सवाल यह जानने/समझने के लिए किए जा रहे हैं, जिससे कि उनका 'असली वाला चेहरा' लोगों के सामने आ सके । लायब्रेरी फीस मामले में तेजिंदर भारद्वाज चूँकि बाहर कुछ और भीतर कुछ और कहने के आरोपी बने, तो उसके कारण सवालों का फंदा उन पर कुछ ज्यादा कसता हुआ दिखा - इस फंदे से बचने की कोशिश में फिर उन्होंने चुप्पी साध लेने में ही अपनी भलाई देखी । 
विपिन शर्मा के रवैये ने लेकिन लोगों को, और खासतौर से उनके समर्थकों को ज्यादा निराश किया है । यह निराशा दरअसल इसलिए भी है, क्योंकि लोगों को उन्हीं से उम्मीद भी ज्यादा थी । ब्रांच में अपनी सक्रियता तथा सभी को विश्वास में लेकर काम करने के अपने तरीके से विपिन शर्मा ने फरीदाबाद में अपनी अच्छी साख बनाई है; जिसमें लायब्रेरी फीस मामले में विरोधी रवैया अपनाने के चलते उन्होंने और इजाफा ही किया है । लायब्रेरी फीस लागू करने के फैसले के प्रति अपना विरोध जता कर विपिन शर्मा ने फरीदाबाद के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स, खासकर युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के बीच अपनी अच्छी पैठ बनाई है । किंतु इस मामले में वह चूँकि जुबानी जमा-खर्च से आगे बढ़ते हुए नहीं दिख रहे हैं, इसलिए वह लोगों के निशाने पर आ रहे हैं । विपिन शर्मा के समर्थकों ने उन्हें सलाह दी है कि उनके लिए मौका अच्छा है, जिसमें कि वह अपने समर्थन-आधार को और बढ़ा व मजबूत कर सकते हैं; उन्हें लायब्रेरी फीस मामले में आक्रामक रुख अपनाना चाहिए और रीजनल काउंसिल के पदाधिकारियों तथा इंस्टीट्यूट के प्रेसीडेंट के सामने सक्रियताभरा प्रतिनिधित्व करना चाहिए । समर्थकों को यह देख कर लेकिन निराशा हो रही है कि विपिन शर्मा इस मामले में ज्यादा सक्रियता दिखाने से बचने की ही कोशिश कर रहे हैं, और सिर्फ जुबानी समर्थन देने तक ही अपने को सीमित रखे हुए हैं । विपिन शर्मा के समर्थकों व शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि लायब्रेरी फीस मामले में विजय गुप्ता, दीपक गर्ग और तेजिंदर भारद्वाज जिस तरह अलग-थलग पड़े हैं; उसे देखते हुए इस मामले के जरिए फरीदाबाद की राजनीति में अपना अच्छा मुकाम बनाने का विपिन शर्मा के पास बढ़िया मौका है । उनके बीच निराशा लेकिन इस बात को लेकर है कि विपिन शर्मा मौके का फायदा उठाने का प्रयास करने में कोई दिलचस्पी ही नहीं ले रहे हैं । इस मामले में पड़ने और पड़ सकने वाले दबाव से बचने के लिए विपिन शर्मा ने भी इस मामले में ज्यादा बात करने से बचने वाला रवैया अपना लिया है ।
इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल व रीजनल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले उम्मीदवारों ने फरीदाबाद ब्रांच में छात्रों पर थोपी गई लायब्रेरी फीस के मामले में जिस तरह से पूरी तरह उपेक्षा का, दोहरेपन का और सिर्फ बातों का रवैया अपनाया है - उससे लग रहा है कि यह मामला उनके गले में एक ऐसी हड्डी की तरह से फँस गया है, जिसे उनके लिए न उगलते बन रहा है और न निगलते ही बन रहा है । 

Saturday, September 5, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के वेस्टर्न रीजन में सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत धीरज खण्डेलवाल तथा बीएम अग्रवाल की उम्मीदवारी ने अग्रवाल वोटों पर कब्जे की लड़ाई को दिलचस्प बनाया

मुंबई । बीएम अग्रवाल की सेंट्रल काउंसिल के लिए अचानक से प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने धीरज खण्डेलवाल की उम्मीदवारी के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है । दरअसल धीरज खण्डेलवाल को इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट उत्तम अग्रवाल के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाता है, और उत्तम अग्रवाल चूँकि इंस्टीट्यूट की राजनीति के साथ साथ अग्रवाल समाज की राजनीति में भी सक्रिय हैं - इस नाते उम्मीद की जाती है कि धीरज खण्डेलवाल अग्रवाल वोटों का अच्छा-खासा समर्थन प्राप्त कर सकेंगे । किंतु बीएम अग्रवाल की अचानक प्रस्तुत हुई उम्मीदवारी ने धीरज खण्डेलवाल की इन उम्मीदों को तगड़ा झटका दिया है । धीरज खण्डेलवाल की उम्मीदवारी के लिए यह झटका इसलिए और बड़ा है - क्योंकि अभी तक अग्रवाल वोटों के सबसे बड़े सौदागर राजकुमार अदुकिया रहे हैं, जिनकी उत्तम अग्रवाल से बनती नहीं है; और ऐसे में समझा जाता है कि राजकुमार अदुकिया के जो समर्थक हैं, वह धीरज खण्डेलवाल की बजाए बीएम अग्रवाल के साथ जुड़ सकते हैं । उत्तम अग्रवाल के 'आदमी' के रूप में देखे/पहचाने जाने के कारण धीरज खण्डेलवाल को एक तरफ बहुत से फायदे हैं, तो साथ ही साथ नुकसान भी बहुत हैं । उत्तम अग्रवाल ने दरअसल दुश्मनियाँ बहुत बनाई हैं; और समझा जाता है कि अलग अलग कारणों से जिन लोगों की भी दुश्मनियाँ उत्तम अग्रवाल से हैं, वह सब उसका बदला धीरज खण्डेलवाल से लेंगे । धीरज खण्डेलवाल का स्वभाव हालाँकि दोस्ती करने और निभाने का है - और इस तरह उत्तम अग्रवाल के स्वभाव के ठीक विपरीत है; लेकिन खतरा यह देखा जा रहा है कि चुनाव में लोग धीरज खण्डेलवाल को नहीं, उनके रूप में उत्तम अग्रवाल को देखेंगे । धीरज खण्डेलवाल के लिए यही बात सबसे बड़ी समस्या है, और उनकी इस समस्या को बीएम अग्रवाल की उम्मीदवारी ने और बड़ा कर दिया है । 
इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के जो खिलाड़ी हैं, वह बीएम अग्रवाल और धीरज खण्डेलवाल की तुलना करते हुए धीरज खण्डेलवाल का पलड़ा भारी पाते हैं । बीएम अग्रवाल पिछले छह वर्ष से लोगों के संपर्क में नहीं हैं, जबकि पिछले नौ वर्षों से रीजनल काउंसिल में होने के कारण धीरज खण्डेलवाल का लोगों के साथ निरंतर संपर्क बना हुआ है; मंच पर भूमिका निभाने के मामले में धीरज खण्डेलवाल, बीएम अग्रवाल के मुकाबले ज्यादा स्मार्ट 'दिखते' रहे हैं; 'साधनों' के मामले में भी धीरज खण्डेलवाल को बीएम अग्रवाल से ज्यादा समर्थ माना जाता है - धीरज खण्डेलवाल ने पिछले दिनों ही अपनी पत्नी के जन्मदिन पर उन्हें महंगी बीएमडब्ल्यूएक्सथ्री कार गिफ्ट करके अपने 'साधनों' की जो धमक प्रस्तुत की है, उसकी गूँज दूर और देर तक सुनाई दी है; इन सबसे बड़ी बात यह कि धीरज खण्डेलवाल के पास उत्तम अग्रवाल जैसा एक 'गॉडफादर' है, बीएम अग्रवाल के पास कोई 'गॉडफादर' तो नहीं ही है - जिन दोस्तों के समर्थन का वह भरोसा कर भी रहे हैं, उनका भी कोई भरोसा नहीं कि कौन कब किस राह मुड़ जाए ? जैसा कि एनसी हेगड़े के मामले में हुआ - बीएम अग्रवाल दावा कर रहे थे कि एनसी हेगड़े उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करेंगे और कॉर्पोरेट्स के वोट उन्हें दिलवायेंगे, बाद में लेकिन लोगों ने देखा/पाया कि एनसी हेगड़े खुद उम्मीदवार हो गए हैं । इन कुछेक तुलनाओं के आधार पर बीएम अग्रवाल के मुकाबले धीरज खण्डेलवाल का पलड़ा भारी भले ही देखा/पहचाना जा रहा हो - किंतु फिर भी उन्हें 'वॉकओवर' मिलता हुआ नहीं दिख रहा है । 
राजनीति - और चुनावी राजनीति दरअसल अंतर्विरोधों को साधने तथा समन्वय बैठाने की कला है - जिसमें धीरज अग्रवाल व बीएम अग्रवाल के बीच तुलना करें तो बीएम अग्रवाल को बढ़त बनाते देखते/पाते हैं । इसका सबसे बड़ा सुबूत यह है कि तमाम खूबियों के बावजूद धीरज खण्डेलवाल रीजनल काउंसिल में चेयरमैन नहीं बन पाए । धीरज खण्डेलवाल का स्वभाव यूँ तो बहुत मिलनसार है, और राजनीतिक विरोधियों से भी वह संबंध बनाने का प्रयास करते हैं तथा उन्हें तवज्जो देते हैं - लेकिन राजनीतिक रूप से समीकरण बनाने/बैठाने के मामले में वह प्रायः फेल हो जाते हैं । रीजनल काउंसिल में चेयरमैन बनने की उनकी कोशिशें इसीलिए कामयाब नहीं हो पाई । इसके लिए हालाँकि उत्तम अग्रवाल को जिम्मेदार ठहराया जाता है । तमाम लोगों का कहना है कि उत्तम अग्रवाल के कारण ही धीरज खण्डेलवाल वेस्टर्न इंडिया रीजनल काउंसिल में चेयरमैन नहीं बन पाए हैं । धीरज खण्डेलवाल ने यद्यपि उत्तम अग्रवाल के कारण होने वाले नुकसान से बचने का भरसक प्रयास किया है, और उत्तम अग्रवाल से अलग अपनी एक पहचान बनाने के लिए भी उन्होंने हाथ-पैर मारे हैं, किंतु सफलता प्राप्त करने में वह चूकते ही रहे हैं । दूसरी तरफ, बीएम अग्रवाल बिना किसी 'गॉडफादर' के होते हुए भी तथा अन्य कई 'कमजोरियों' के बावजूद रीजनल काउंसिल में चेयरमैन बने हैं - जिससे साबित है कि राजनीतिक समीकरण बनाने के लिए जिस तरह का लचीलापन चाहिए होता है, वह बीएम अग्रवाल में है और प्रतिकूल स्थितियों के बीच भी राह बनाने का हुनर उन्हें आता है । 
अपनी अपनी कमियों और अपनी अपनी खूबियों की इस पृष्ठभूमि के साथ बीएम अग्रवाल और धीरज खण्डेलवाल के बीच खासतौर से अग्रवाल वोटों पर कब्जे की लड़ाई खासी दिलचस्प हो जाती है । उत्तम अग्रवाल का जो समर्थन कुछेक लोगों के अनुसार धीरज खण्डेलवाल के लिए वरदान है, वही अन्य बहुत से लोगों के लिए अभिशाप है । हालाँकि चुनावी खिलाड़ियों का मानना और कहना है कि धीरज खण्डेलवाल ने यदि उत्तम अग्रवाल के समर्थन को होशियारी से इस्तेमाल किया तथा अपनी भी एक अलग पहचान वह यदि बना सके तो अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटा सकेंगे । उधर बीएम अग्रवाल के सामने अपने समर्थक नेताओं को 'सचमुच में' सक्रिय बनाने/करने की चुनौती है - इस चुनौती को वह यदि संभव कर सके, तो अपनी उम्मीदवारी की बढ़त बनाने में सफल हो सकेंगे । बाकी तो जो है, सो हइये है !

Friday, September 4, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3080 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में राजा साबू ने टीके रूबी को ही नहीं हराया, डिस्ट्रिक्ट के रोटेरियंस तथा रोटरी को भी औकात बता दी है; और बेचारे इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन की तो मिट्टी ही कूट दी है - और इस तरह रोटरी के इतिहास में उन्होंने एक विलक्षण अध्याय जोड़ा है

चंडीगढ़ । राजेंद्र उर्फ़ राजा साबू के नेतृत्व में डिस्ट्रिक्ट के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स ने एक बड़ी लड़ाई जीती है, पर उनके बीच जीतने की खुशी कहीं दिखाई नहीं दे रही है । अजीब बात यह है कि इस जीत का नेतृत्व करने वाले राजा साबू और उनके संगी-साथी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स जीत की खुशी मनाने और जीत की बधाई तक लेने से बचते हुए दिखे हैं । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए करीब छह महीने से चली आ रही लड़ाई के नतीजे से जो लोग सचमुच खुश हैं, उनकी बदकिस्मती यह रही कि उन्होंने अपनी खुशी में राजा साबू तथा अन्य पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को शामिल करने का प्रयास किया भी, तो उन्हें उपेक्षा का ही सामना करना पड़ा है । ऐसा लगता है कि इस जीत के लिए व्यूह रचना तैयार करने वाले राजा साबू और उनके गिरोह के लोगों को भी 'पता' है कि इस जीत के बावजूद रोटेरियंस के बीच उनकी चमक फीकी पड़ी है, रोटेरियंस के बीच उनका सम्मान घटा है - और सिर्फ डिस्ट्रिक्ट में ही नहीं, बल्कि दूसरे डिस्ट्रिक्ट्स के लोगों के बीच भी उनकी जमकर थू थू हो रही है । यह जानने के कारण ही उनमें इस जीत को लेकर न कोई खुशी है और न कोई उत्साह । कुछ लोगों को लगता है कि इस जीत को पाने के लिए इन्हें जो जो (कु)कर्म करने पड़े, उन्हें लेकर इन्हें आत्मग्लानि भी है; पर कई अन्य लोगों का कहना है कि आत्मग्लानि इन्हें नहीं होगी - यदि इसका कोई अहसास भी इन्हें होता, तो इतने (कु)कर्म यह करते ही क्यों ?
कहते हैं कि सफलता हर घाव भर देती है । रोटरी में भी जब भी कोई नतीजा आता/निकलता है, तो अपने साथ आरोपों-प्रत्यारोपों को भी लाता ही है - किंतु देखने में आता है कि फिर जल्दी ही सब सामान्य हो जाता है, और लोग सफलता पाने वाले के साथ आ खड़े होते हैं । लेकिन राजा साबू के नेतृत्व में लड़ी गई लड़ाई में जीत पाने के बाद भी खुशी की बजाए जैसा मातम पसरा हुआ है, उससे साफ लग रहा है कि खुद 'जीतने' वालों को भी लग रहा है कि वह जीत जरूर गए है, पर इस जीत के सही 'हकदार' वह नहीं हैं । मनुष्य के साथ सबसे बड़ी समस्या यही है कि वह दूसरों से तो झूठ बोल सकता है, किंतु अपने आप से झूठ नहीं बोल पाता । जीत के बाद भी जीत में मुख्य भूमिका निभाने वाले मनुष्य जीत की खुशी नहीं मना पा रहे हैं, तो इसका कारण सिर्फ यही है कि वह भी जान रहे हैं कि उनकी यह जीत एक नकली जीत है - और इसे पाने के लिए उन्होंने खोया ज्यादा है । जो खोया है, उसका अहसास और उसकी समझ ही उन्हें जीत की खुशी में शामिल होने से रोक रही है । 
और यह हाल तब है, जब 'यह जीत' कोई सामान्य जीत नहीं है - बल्कि एक बहुउउउउउउउउउउउउउउउत बड़ी जीत है । राजा साबू और उनके गिरोह ने सिर्फ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद का चुनाव ही नहीं जीता है; उन्होंने नोमीनेटिंग कमेटी द्वारा चुने गए अधिकृत उम्मीदवार टीके रूबी को ही नहीं हराया है - उन्होंने डिस्ट्रिक्ट के रोटेरियंस तथा रोटरी के नियम-कानूनों व आदर्शों को भी हराया है; और एक तरह से डिस्ट्रिक्ट के रोटेरियंस व रोटरी को उनकी 'औकात' दिखाई है । राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स की यह जीत इसलिए भी बड़ी जीत है, क्योंकि इस जीत के जरिए उन्होंने बेचारे इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन की तो मिट्टी ही कूट दी है । राजा साबू ने दिखा/बता दिया है कि रोटरी में उन्हें 'राजा' सिर्फ नाम के लिए ही नहीं कहा जाता है - उनके सामने यदि डिस्ट्रिक्ट के रोटेरियंस आयेंगे, रोटरी के नियम-कानून आयेंगे और यदि खुद रोटरी के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट भी आयेंगे; तो वह उन्हें भी 'पीट' कर अपना लक्ष्य हासिल करेंगे । दरअसल, राजा साबू को यह बात बिलकुल पसंद नहीं आई कि डिस्ट्रिक्ट के लोगों ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी चुनने में उनकी पसंद को अनदेखा किया; राजा साबू ने इस बात की जरा भी परवाह नहीं की कि डिस्ट्रिक्ट के लोगों द्वारा लिए गए फैसले को बदलने की उनकी कोशिश में खुद उनके ही द्वारा तय किए गए मानदंड व रोटरी के नियम-कानूनों की बलि चढ़ रही है; और राजा साबू ने इस बात को तो तवज्जो देने लायक भी नहीं समझा कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन ने रोटरी की चुनावी राजनीति में रोटरी गवर्नर्स की सक्रिय भूमिका को हतोत्साहित करने के लिए अभियान छेड़ा हुआ है, और साफ घोषणा की हुई है कि जो कोई चुनावी राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाता हुआ मिलेगा, उसके खिलाफ वह कड़ी कार्रवाई करेंगे । राजा साबू जानते हैं कि केआर रवींद्रन कह चाहें जो रहे हों, उनकी 'औकात' है नहीं कि उनके और उनके साथी गवर्नर्स के खिलाफ कोई कार्रवाई कर सकें ।
राजा साबू के नेतृत्व में प्राप्त की गई यह जीत वास्तव में रोटरी के इतिहास में सिर्फ इसीलिए याद रखी जाएगी, क्योंकि इस जीत में रोटरी इंटरनेशनल प्रेसीडेंट की सार्वजनिक तौर पर हुई फजीहत का तथ्य मौजूद है । रोटरी के इतिहास की यह एक विलक्षण घटना है जिसमें रोटरी के एक पूर्व प्रेसीडेंट राजा साबू ने मौजूदा प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन की खुलेआम मिट्टी कूटी । दरअसल इसी कारण से राजा साबू के नेतृत्व में मिली यह जीत एक बड़ी जीत हो जाती है, लेकिन जो राजा साबू को बहुत 'छोटा' बना देती है । छोटेपन का यही अहसास राजा साबू और उनके साथी गवर्नर्स को जीत की खुशी मनाने से रोक रहा है । 
राजा साबू के सामने एक समस्या और है । उन्हें संकेत मिल रहे हैं कि टीके रूबी का क्लब - रोटरी क्लब हिमालयन रेंजेस मनसादेवी, खुली बेईमानी से हुए इस चुनावी नतीजे को स्वीकार नहीं करेगा, और रोटरी ने विरोध दर्ज कराने के जो अधिकार दिए हैं, उनका इस्तेमाल करते हुए रोटरी इंटरनेशनल में इस जीत के खिलाफ अपील करेगा । उल्लेखनीय है कि टीके रूबी के क्लब को पहले भी, राजा साबू के दिशा-निर्देशन में लिए गए मनमाने और बेईमानीपूर्ण फैसले के खिलाफ न्याय मिला है; इसलिए राजा साबू और उनके गिरोह के लोगों को डर है कि उनकी बेईमानीपूर्ण कारस्तानियों को रोटरी इंटरनेशनल ने यदि 'पकड़' लिया और इस जीत के फैसले को पलट दिया - तो उनके लिए तो 'प्याज भी खाने और जूते भी खाने' वाला किस्सा हो जायेगा । वास्तव में, इसी डर के चलते राजा साबू और उनके गिरोह के लोग एक बड़ी जीत हासिल करने के बावजूद जीत की खुशी मनाने से दूर बने हुए हैं ।