Wednesday, November 4, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार अतुल गुप्ता को दिल्ली में नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के उम्मीदवार विशाल तायल ने आईना दिखाया, तो अतुल गुप्ता भड़क कर सड़क-छाप स्टाइल पर उतर आए

नई दिल्ली । नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के कुछेक उम्मीदवारों और/या उनके समर्थकों को पिछले दिनों सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार अतुल गुप्ता के गुस्से और नाराजगी का जिस तरह शिकार होना पड़ा, उससे लोगों के बीच इस चर्चा को बल मिला है कि चुनावी नतीजों को लेकर अतुल गुप्ता खासा दबाव महसूस कर रहे हैं क्या ? दूसरे लोगों को उनकी चुनावी स्थिति भले ही कंफर्टेबल लग रही हो; लेकिन उनके नजदीकियों के अनुसार, खुद अतुल गुप्ता अपनी स्थिति को लेकर आश्वस्त नहीं हैं । उनके सामने समस्या दरअसल चुनाव जीतने की नहीं है । किसी को भी - उनके घनघोर किस्म के विरोधियों को भी उनके जीतने को लेकर कोई शक नहीं है । अतुल गुप्ता की समस्या लेकिन अपनी छवि और अपने ऑरा (आभामंडल) को लेकर है । अतुल गुप्ता ने बहुत सावधानी के साथ और बहुत सुनियोजित तरीके से अपनी 'छवि' गढ़ी है, और अपने आप को दूसरों से अलग व बेहतर 'दिखाने' व 'बनाने' का प्रयास किया है । शुरू में ऐसा लगा भी कि वह अपने प्रयास में कामयाब हो रहे हैं, लेकिन पिछले दिनों उनकी जिस तरह की 'हरकतें' सामने आईं, उससे लोगों के बीच उनकी असलियत की पोल खुलने लगी । मजे की बात यह रही कि अपनी कई 'हरकतों' को उन्होंने जाने/अनजाने खुद ही लोगों के बीच 'जाहिर' किया । इंस्टीट्यूट के आयोजनों में अपने भाई/भतीजों को आगे करना/रखना; प्रोफेशनल सेमिनार के बीच अपनी शादी की वर्षगाँठ मनाना; विदेशी प्रोफेशनल टूर में अपने परिवार को साथ ले जाना; 'अकेले' किए गए विदेशी प्रोफेशनल टूर से लौट कर लोगों को बॉडी मसाज के फायदे बताना; आदि-इत्यादि बातों/हरकतों के जरिए अतुल गुप्ता ने लोगों के बीच खुद को खुद ही 'गिराया' ।
अतुल गुप्ता के लिए पिछली बार के चुनाव के दौरान अपने ऑफिस में नौकरी पर रखे गए वह युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स पहले से ही मुसीबत बने हुए हैं, जिन्हें चुनाव के तुरंत बाद तरह-तरह की बहानेबाजी करके नौकरी से निकाल दिया गया था । उल्लेखनीय है कि पिछले चुनाव से पाँच-छह महीने पहले अतुल गुप्ता ने करीब पच्चीस-तीस युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स को यह आश्वासन देकर अपने ऑफिस में 12 से 20 हजार रुपये प्रति माह की नौकरी पर रखा कि उनके यहाँ काम करके वह प्रोफेशनली एक्सपर्ट बनेंगे । काम किंतु उनसे चुनाव का कराया और चुनाव होते ही उन्हें निकाल बाहर किया । वह युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स अब दूसरी जगहों पर काम कर रहे हैं, या अपनी प्रैक्टिस कर रहे हैं - और हर उपलब्ध व संभव तरीके से अतुल गुप्ता की कारस्तानियों के बारे में लोगों को बताते हैं । अतुल गुप्ता के प्रति उनके मन में कितनी नफरत व गुस्सा भरा है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि उनमें से कुछेक ने 'रचनात्मक संकल्प' को फोन करके अतुल गुप्ता के 'असली चेहरे' को दिखाने का प्रयास किया है । उनके इस तरह के प्रयास अतुल गुप्ता के चुनावी भविष्य पर भले ही कोई असर न डालें, किंतु अतुल गुप्ता की छवि और गढ़े जा रहे 'ऑरा' को मटिया देने का काम तो कर ही रहे हैं । अपनी राजनीति ज़माने के उद्देश्य से कुछेक ब्रांचेज में अतुल गुप्ता ने किसी को उठाने व किसी को गिराने का जो खेल किया हुआ है, उसके नतीजे भी उनके लिए चुनावी गणित के नजरिए से भले ही फायदेमंद रहे हों - लेकिन उनकी छवि को चोट पहुँचाने वाले साबित हुए हैं । लगता है कि अतुल गुप्ता को भी अपना यह अंतर्विरोध समझ में आ रहा है कि वह बनना तो 'बड़ा' चाहते हैं, लेकिन बन 'छोटे' रहे हैं । 
अतुल गुप्ता की समस्या लेकिन यह है कि अपने को अंतर्विरोधी स्थिति में फँसा पाकर भी वह यह नहीं समझ पा रहे हैं कि वह इस स्थिति से निपटें कैसे ? यदि सचमुच समझ पा रहे होते, तो रोहिणी में की गई अपनी चुनावी मीटिंग में रीजनल काउंसिल के उम्मीदवारों के साथ बदतमीजी नहीं करते । उल्लेखनीय है कि इंस्टीट्यूट के चुनाव में यह एक बड़ा आम दृश्य है कि सेंट्रल काउंसिल के उम्मीदवार द्वारा आयोजित की गई मीटिंग/पार्टी में रीजनल काउंसिल के कुछेक उम्मीदवार और/या उनके समर्थक भी पहुँच जाते हैं और मीटिंग में आने वाले लोगों को वह अपनी उम्मीदवारी की प्रचार सामग्री देते हैं और इस तरह से अपनी उम्मीदवारी का प्रचार करते हैं । कई बार मीटिंग/पार्टी के आयोजक को इससे परेशानी तो होती है, लेकिन कुछ कर न सकने की बेचारगी में वह चुप लगा जाता है । कुछेक आयोजक-उम्मीदवार अपनी मीटिंग/पार्टी ऐसी जगह पर करते हैं कि इस तरह की कार्रवाई हो ही नहीं पाती है । अतुल गुप्ता ने रोहिणी में की गई अपनी मीटिंग/पार्टी में इस स्थिति से बचने के लिए व्यवस्था तो कुछ की नहीं; और जब उन्हें पता चला कि उनकी मीटिंग/पार्टी में आए लोगों को रीजनल काउंसिल के कुछेक उम्मीदवार और उनके समर्थक अपनी अपनी चुनाव प्रचार सामग्री बाँट रहे हैं, तो वह भड़क गए और उन्हें खदेड़ने में जुट गए । प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, इस मौके पर अतुल गुप्ता की नॉर्दर्न इंडिया रीजनल काउंसिल के उम्मीदवार विशाल तायल से तेज झड़प हुई । विशाल तायल का कुसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने अतुल गुप्ता को याद दिलाया कि वह खुद भी तो दूसरों की मीटिंग/पार्टी में अपने समर्थकों को अपनी चुनाव सामग्री बाँटने के लिए भेजते रहे हैं । विशाल तायल से यह सुनकर अतुल गुप्ता का पारा इतना गर्म हुआ कि वह विशाल तायल तथा दूसरे लोगों से सड़क-छाप स्टाइल में पेश आने लगे । यहाँ यह याद करना प्रासंगिक होगा कि विशाल तायल कुछ समय पहले तक अतुल गुप्ता की 'अपरा टीम' के सदस्य हुआ करते थे, और इस नाते अतुल गुप्ता के काम करने के तरीकों को जानते/पहचानते ही होंगे । इसी बिना पर अतुल गुप्ता को लगा कि विशाल तायल उन्हें आईना दिखा रहे हैं, सो वह बुरी तरह भड़क गए । वहाँ मौजूद रीजनल काउंसिल के कुछेक उम्मीदवारों व उनके समर्थकों को खदेड़ने के लिए अतुल गुप्ता ने अपने भाई व भतीजों के साथ-साथ अपने दूसरे कुछेक समर्थकों को भी इकट्ठा कर लिया, और उन्हें खदेड़ कर ही दम लिया । इस 'काम' में अतुल गुप्ता को जीत तो मिली, लेकिन इस जीत ने उनके फ्रस्ट्रेशन को भी लोगों के बीच जाहिर कर दिया । इसी से लोगों को लगा है कि इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में अपनी 'स्थिति' को लेकर अतुल गुप्ता खासे परेशान हैं । हालाँकि यह तय है कि यह परेशानी जीत के बाबत तो नहीं ही है ।

Tuesday, November 3, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी को मिल रहा जयपुर की बड़ी फर्मों का समर्थन श्याम लाल अग्रवाल की सीट के लिए सचमुच खतरा बनेगा क्या ?

जयपुर । श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थकों ने प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी को पहले भले ही गंभीरता से नहीं लिया हो, लेकिन अब उन्हें समझ में आने लगा है कि प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल में उनकी वापसी को मुश्किल बना सकती है । दरअसल यह दोनों एक ही खेमे के हैं; और खेमे की तरफ से श्याम लाल अग्रवाल पिछली बार इस समझौते के तहत ही उम्मीदवार बने थे - कि अबकी बार श्याम लाल अग्रवाल और अगली बार प्रकाश शर्मा उम्मीदवार होंगे । उक्त समझौते के तहत इस बार प्रकाश शर्मा को उम्मीदवार होना था । श्याम लाल अग्रवाल ने लेकिन पिछली बार हुए समझौते को मानने से इंकार दिया और अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर दी । श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थकों को विश्वास रहा कि मौजूदा सेंट्रल काउंसिल में उनकी जो सक्रियता रही है, उससे उनका अपना एक खेमा बन गया है और इसलिए उन्हें अब पहले वाले खेमे के लोगों के सहयोग/समर्थन की कोई जरूरत नहीं है । इसके अलावा, उन्होंने यह भी माना/समझा कि पहले वाले खेमे के अधिकतर लोग भी उनके साथ सीधे जुड़ गए हैं - इसलिए उन्हें खेमे के नेताओं की परवाह करने की जरूरत नहीं है । श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थकों ने यह भी माना और कहा/बताया कि पिछली बार हुए समझौते का नाम लेकर खेमे के जो तथाकथित नेता प्रकाश शर्मा को उम्मीदवार बनाने की जिद पर अड़े हैं, उन्हें जल्दी ही वास्तविकता का अहसास हो जायेगा और फिर वह भी प्रकाश शर्मा का साथ छोड़ कर उनके समर्थन में आ जायेंगे । 
श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थक लेकिन यह देख/जान कर परेशान हो रहे हैं कि उन्होंने जैसा जो कुछ सोचा था, वैसा कुछ तो हो नहीं रहा है - बल्कि उल्टा ही हो रहा है । उम्मीदवार के रूप में प्रकाश शर्मा ने भी अपनी अच्छी सक्रियता दिखाई है, और खेमे के नेताओं की तरफ से भी उन्हें उम्मीद से ज्यादा सहयोग व समर्थन मिलता हुआ दिख रहा है । श्याम लाल अग्रवाल के ही कुछेक समर्थकों का कहना है कि पिछली बार हुए समझौते की श्याम लाल अग्रवाल ने जिस तरह से अवमानना की और खेमे के नेताओं को नीचा समझने/दिखाने का एटीट्यूड प्रदर्शित किया, उससे खेमे के नेताओं ने अपने आप को हर्ट व अपमानित महसूस किया है - और इसी की प्रतिक्रिया में वह अब श्याम लाल अग्रवाल को सबक सिखाने के लिए सक्रिय हो गए हैं । उल्लेखनीय है कि खेमे की पहचान जयपुर की कुछेक बड़ी फर्म से है और जयपुर ही नहीं, बल्कि राजस्थान में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में इन्हीं फर्मों का दबदबा रहा है । इन्हीं फर्मों ने प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी की कमान जिस तरह से सँभाल ली है, उसके कारण ही श्याम लाल अग्रवाल के लिए मामला गंभीर हो गया है । श्याम लाल अग्रवाल के ही नजदीकियों व समर्थकों का मानना/कहना है कि पिछली बार इन्हीं फर्मों का समर्थन श्याम लाल अग्रवाल की जीत का प्रमुख कारण था - इसलिए इस बार यदि इनका समर्थन नहीं मिल रहा है, तो श्याम लाल अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए मुश्किल पैदा होना स्वाभाविक ही है । 
प्रकाश शर्मा और उनकी उम्मीदवारी के समर्थन में सक्रिय बड़ी फर्मों से श्याम लाल अग्रवाल की उम्मीदवारी के लिए जो चुनौती खड़ी हुई है, वह सेंट्रल काउंसिल के लिए राजस्थान के छह उम्मीदवार होने के कारण और गंभीर हो गई है । उल्लेखनीय है कि पिछली बार राजस्थान से कुल तीन उम्मीदवार थे, और तीनों जयपुर के थे । इस बार जयपुर के चार उम्मीदवारों के साथ राजस्थान के छह उम्मीदवार हैं । इससे श्याम लाल अग्रवाल को दोहरा नुकसान है - एक तरफ तो उन्हें अपने ही खेमे के प्रमुख लोगों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है; और दूसरी तरफ ज्यादा उम्मीदवार होने से वोट बँटने की जो स्थिति बनेगी, उसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ेगा । इससे भी बड़ी समस्या यह है कि राजस्थान की अधिकतर ब्रांचेज के लोगों में ऐंटी-जयपुर वाली जो भावना रहती है, उसका फायदा उठाने के लिए जयपुर से बाहर के दो उम्मीदवार हैं; और इसलिए राजस्थान की दूसरी ब्रांचेज के लोगों के लिए ऐंटी-जयपुर वाली भावना के बावजूद जयपुर के उम्मीदवारों के साथ जाने की मजबूरी नहीं है - और इससे जयपुर के उम्मीदवारों को नुकसान होना लाजिमी ही है । यहाँ श्याम लाल अग्रवाल के लिए समस्या की बात यह है कि दूसरी ब्रांचेज के जो लोग ऐंटी-जयपुर वाली भावना में नहीं भी पड़ेंगे/फँसेंगे, वह भी प्रोफेशनल कारणों से जयपुर की बड़ी फर्मों के कहे के अनुसार ही वोट देना चाहेंगे - और जहाँ श्याम लाल अग्रवाल की तुलना में प्रकाश शर्मा का पलड़ा भारी पड़ता है । 
श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थकों का हालाँकि दावा है कि प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन 'दिख' चाहें जो रहा हो, उस समर्थन को वोट में बदलने का मैनेजमेंट चूँकि उनके पास नहीं है - इसलिए वह उनके लिए कोई खतरा नहीं खड़ा कर पायेंगे । श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थकों का यह भी दावा है कि बड़ी फर्मों के लोग पार्टियों में तो इकट्ठा हो सकते हैं, लेकिन अपने उम्मीदवार को वोट नहीं दिला सकते । अपने इन दावों को तर्कपूर्ण बनाने हेतु उनका तर्क है कि प्रकाश शर्मा को आज जिन बड़ी फर्मों का समर्थन मिल रहा है, उनका समर्थन उन्हें वर्ष 2009 में भी मिला था - किंतु फिर भी प्रकाश शर्मा चुनाव में जीत नहीं पाए थे । जयपुर में इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के अनुसार, श्याम लाल अग्रवाल और उनके समर्थकों के इन तर्कों में सच्चाई हो सकती है - लेकिन सवाल प्रकाश शर्मा के जीतने या हारने को लेकर नहीं है; सवाल प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी के कारण श्याम लाल अग्रवाल की चुनावी संभावना पर पड़ने वाले असर को लेकर है । श्याम लाल अग्रवाल के ही समर्थकों के बीच चर्चा और स्वीकारोक्ति है कि प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी के कारण श्याम लाल अग्रवाल के लिए चुनावी मुकाबला खासा मुश्किल हो गया है । मजे की बात यह हुई है कि काउंसिल के सदस्य होने के नाते जिन श्याम लाल अग्रवाल की जीत को आसान और सुनिश्चित माना जा रहा था, प्रकाश शर्मा की उम्मीदवारी की हवा बनने के चलते उन्हीं श्याम लाल अग्रवाल की जीत को लेकर संदेह बनने लगा है ।

Friday, October 30, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने वास्ते की गई विजय गुप्ता की मीटिंग का बहिष्कार करके फरीदाबाद के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स ने विजय गुप्ता की स्थिति को और मुश्किल बनाया

फरीदाबाद । विजय गुप्ता की सेंट्रल काउंसिल की अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के उद्देश्य से फरीदाबाद में आयोजित की गई मीटिंग के बुरी तरह फ्लॉप होने से विजय गुप्ता के बचे-खुचे समर्थकों का हौंसला भी पस्त होता दिख रहा है । उनके नजदीकियों व समर्थकों ने बताया कि उन्हें यह आभास तो पहले से था कि विजय गुप्ता के लिए इस बार मामला मुश्किल बना हुआ है; लेकिन यह अंदाज उन्हें बिलकुल नहीं था कि उनके लिए हालात सिर्फ मुश्किल नहीं, बल्कि वास्तव में बहुत ही बुरे बन गए हैं । फरीदाबाद में लोग उनसे खफा हैं, यह चर्चा तो रही है; लेकिन लोग उनसे इतने खफा हैं कि उनके द्वारा लगातार खुशामद करते रहने के बावजूद लोग उनके साथ खड़े तक दिखने के लिए तैयार नहीं हुए - तो विजय गुप्ता के लिए खतरे की घंटी को उनके नजदीकियों व समर्थकों ने भी साफ साफ सुन लिया है । विजय गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार ही, विजय गुप्ता ने फरीदाबाद की मीटिंग के लिए फरीदाबाद के करीब छह सौ लोगों को खुद फोन करके निमंत्रित किया था । कई लोगों से उन्होंने साफ साफ कहा भी था कि मेरी हालत इस बार बहुत टाइट है, इसलिए तुम्हें आना जरूर है ताकि मैं दूसरे शहरों के लोगों को बता/दिखा सकूँ कि मेरी हालत उतनी खस्ता नहीं है, जितनी की बताई जा रही है । कई लोगों से उन्होंने यह भी कहा कि अपने साथ जिसे चाहो उसे भी ले आओ, तुम लोगों की पार्टी हो जायेगी और मेरा काम बन जायेगा । मीटिंग शुरू होने के समय तक वह लोगों को फोन करके मीटिंग में आने की बात याद दिलाते रहे और पूछते रहे कि अभी तक निकले नहीं, कहाँ तक पहुँचे, कितनी देर में पहुँच रहे हो, आदि-इत्यादि । लेकिन मीटिंग में पहुँचने वालों की संख्या पचास-साठ के बीच तक ही पहुँच पाई । उनके समर्थकों ने हालाँकि करीब अस्सी लोगों के मीटिंग में पहुँचने का दावा किया ।
फरीदाबाद की मीटिंग के फ्लॉप होने का विजय गुप्ता पर दोहरा असर पड़ा है । इससे एक तरफ तो उनके सामने 'अपने घर' को संभालने की जरूरत पैदा हुई है, और दूसरी तरफ दूसरे शहर के लोगों को यह समझाने में दिक्कत खड़ी हुई है कि जब उनके अपने शहर के लोग उनके साथ नहीं हैं, तो वह क्यों उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करें ? उल्लेखनीय है कि पिछले महीनों में विजय गुप्ता से दूसरे शहरों में लगातार यह पूछा जाता रहा है कि फरीदाबाद में तुम्हारी स्थिति के खराब होने की बातें क्यों हो रही हैं ? विजय गुप्ता लोगों को आश्वस्त करते रहे कि यह सब दूसरे उम्मीदवारों के समर्थकों का झूठा प्रचार है, जो उन्हें बदनाम करने के लिए किया जा रहा है । विजय गुप्ता दूसरे शहरों के लोगों को आश्वस्त करते रहे कि फरीदाबाद में लोग उनके साथ पहले भी थे और अब भी हैं; जब भी मैं फरीदाबाद में मीटिंग करूँगा तब यह बात साबित हो जायेगी । लेकिन अब जब फरीदाबाद में की गई उनकी मीटिंग बुरी तरह फ्लॉप हो गई है, तो दूसरे शहरों के लोगों का सामना करना उनके लिए मुश्किल हो गया है । दूसरे शहरों के उन लोगों का सामना करना तो उनके लिए और भी मुश्किल हो गया है, जिनसे वह यह दावा कर चुके थे कि फरीदाबाद में लोग पूरी तरह उनके साथ हैं । फरीदाबाद की मीटिंग के फ्लॉप होने से वास्तव में यह साबित हो गया है कि फरीदाबाद में अपनी बुरी स्थिति को छिपाने के लिए वह लगातार झूठ पर झूठ बोले जा रहे थे, और दूसरे उम्मीदवारों के समर्थकों पर नाहक ही आरोप मढ़ रहे थे । 
फरीदाबाद में अपनी बुरी स्थिति का विजय गुप्ता को आभास तो था; यह दावा करते हुए उनके नजदीकियों ने बताया कि लेकिन उन्हें उम्मीद थी कि वह जब मीटिंग में लोगों को आमंत्रित करेंगे तो मीटिंग में तो लोग आ ही जायेंगे । विजय गुप्ता ने चालाकी यह खेली कि लोगों से सहयोग/समर्थन की सीधी बात करने की बजाए उन्हें मीटिंग में आने का निमंत्रण दिया । उन्हें पता था कि वह पहले यदि सहयोग/समर्थन की बात करेंगे, तो लोग भड़केंगे और अपना गुस्सा निकालेंगे; इससे बचने के लिए उन्होंने मीटिंग में आने का निमंत्रण दिया । उनका सोचना यह था कि मीटिंग में खाने-पीने के चक्कर में लोग आ जायेंगे और वह जब वहाँ खाते-पीते हुए लोगों की भीड़ देखेंगे, तो उनका गुस्सा खुद-ब-खुद ठंडा पड़ जायेगा । फरीदाबाद में मीटिंग करने के जरिए विजय गुप्ता ने एक तीर से दो निशाने लगाने की योजना बनाई थी - उन्हें उम्मीद थी कि उनकी इस योजना से एक तरफ तो फरीदाबाद में उनके प्रति लोगों के बीच जो गुस्सा है, वह शांत हो जायेगा; तथा दूसरी तरफ इस मीटिंग में जुटी भीड़ को दिखा/बता कर वह दूसरे शहरों के लोगों को समझा सकेंगे कि फरीदाबाद में उनकी पतली हालत की जो बातें हो रही हैं, वह दूसरे उम्मीदवारों के समर्थकों द्वारा फैलाई जा रही अफवाहें हैं । लेकिन फरीदाबाद में हुई उनकी मीटिंग जिस बुरी तरह से पिटी, और फरीदाबाद में लोगों ने उनकी मीटिंग का जिस संगठित तरीके से बहिष्कार किया - उससे साबित हुआ है कि फरीदाबाद में लोग उनकी चालों व कारस्तानियों से अब सावधान हो गए हैं तथा उनमें फँसने को तैयार नहीं हैं । 
विजय गुप्ता को फरीदाबाद में सार्वजनिक रूप से पहला झटका कुछेक महीने पहले तब लगा था जब फरीदाबाद ब्रांच की मैनेजमेंट कमेटी के सदस्य विपिन मंगला ने फरीदाबाद के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की ई डायरेक्टरी इंस्टीट्यूट के पूर्व प्रेसीडेंट वेद जैन के हाथों रिलीज करवा दी थी । उल्लेखनीय है कि फरीदाबाद के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की डायरेक्टरी छापना और चुनाव से पहले उसे रिलीज करना विजय गुप्ता का पुराना फंडा रहा है; लेकिन विपिन मंगला ने जिस तरह विजय गुप्ता से उनका यह फंडा छीन लिया - उसके कारण वह न केवल फंडा-विहीन हो गए, बल्कि उनकी भारी किरकिरी भी हुई । इस मामले को लेकर फरीदाबाद में और फरीदाबाद के बाहर भी लोगों को यह कहने का मौका मिला कि फरीदाबाद में विजय गुप्ता का यह कैसा हाल है कि उनकी नाक के नीचे फरीदाबाद ब्रांच की मैनेजमेंट कमेटी के एक सदस्य ने उनसे उनका फंडा छीन लिया, और उन्हें भनक तक नहीं मिली । विपिन मंगला ने जिस कार्यक्रम में वेद जैन के हाथों ई डायरेक्टरी रिलीज करवाई थी, उस कार्यक्रम में विजय गुप्ता भी मौजूद थे; और विपिन मंगला द्वारा ई डायरेक्टरी प्रस्तुत करने पर वह हक्के-बक्के रह गए थे । विजय गुप्ता भुनभुनाए तो बहुत थे, लेकिन विपिन मंगला ने उन्हें जो चोट पहुँचाई - उसके दर्द से वह बच नहीं सके । उनके समर्थक मानते हैं और कह भी रहे हैं कि विपिन मंगला ने उन्हें जो चोट पहुँचाई थी, उससे उन्हें सावधान हो जाना चाहिए था - और स्थिति को सँभालने की कोशिश करना चाहिए थी । विजय गुप्ता ने लेकिन सच्चाई को ठीक से समझा/पहचाना नहीं, और यह मान लिया कि वह अपनी चालबाजियों से स्थिति को अपने पक्ष में ले आयेंगे । फरीदाबाद में मीटिंग के जरिए विजय गुप्ता ने वास्तव में यही करने की कोशिश की थी - लेकिन जो उन्हें उलटी पड़ी है और जिसने पलट कर उनकी स्थिति को और मुश्किल बना दिया है । 

Thursday, October 29, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव में राजस्थान में उम्मीदवारों की चुनावी तैयारियों को देखते हुए फिलवक्त गौतम शर्मा, रोहित अग्रवाल व देवेंद्र सोमानी का पलड़ा भारी नजर आ रहा है

जयपुर । गौतम शर्मा, रोहित अग्रवाल व देवेंद्र सोमानी ने सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी अपनी उम्मीदवारी को लेकर जो गंभीरता दिखाई है - उसके चलते प्रमोद बूब, रोहित माहेश्वरी, सचिन जैन व निर्मल सोनी के लिए चुनावी मुकाबला चुनौतीपूर्ण हो गया दिख रहा है । यह सातों इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल की दस सीटों के लिए होने वाले चुनाव में राजस्थान के उम्मीदवार हैं - जिनमें देवेंद्र सोमानी व निर्मल सोनी उदयपुर के हैं तथा बाकी पाँचों जयपुर के हैं । यह छोटी सी जानकारी इसलिए उल्लेखनीय है क्योंकि सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में अभी जो नौ सदस्य हैं, उनमें तीन राजस्थान का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं; और इन तीन में से दो जयपुर के हैं तथा एक जयपुर के बाहर के शहर के हैं । दरअसल इसी तर्ज पर उम्मीद की जा रही है कि इस बार भी जयपुर के दो और जयपुर के बाहर के एक उम्मीदवार तो चुनाव जीत ही जायेंगे । सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल में इस बार जो एक सीट बढ़ी है, उसके जयपुर को मिल जाने का अनुमान भी लगाया जा रहा है । हालाँकि कुछेक लोगों की खामख्याली यह भी है कि रीजनल काउंसिल में इस बार राजस्थान को चार सीटें मिल जायेंगी और यह चारों सीटें जयपुर के हिस्से में आयेंगी । जयपुर के अलावा उदयपुर से चूँकि दो उम्मीदवार हैं, इसलिए जयपुर के कुछेक लोगों को लगता है कि वह दोनों एक दूसरे को ही मार-काट लेंगे, और इसका फायदा जयपुर को मिलेगा । इस तर्क का जबाव लेकिन इसी तर्ज के तर्क से मिल रहा है कि जयपुर में भी तो पाँच उम्मीदवार हैं, क्या वहाँ मार-काट नहीं मचेगी - और उस मार-काट का फायदा उदयपुर के उम्मीदवारों को क्यों नहीं मिलेगा ?
गौर करने वाला तथ्य यह है कि चुनावी नजरिए से सकारात्मक समझी जाने वाली बातों के आधार पर राजस्थान के सातों उम्मीदवारों का पलड़ा भारी नजर आ रहा है और कोई भी किसी दूसरे से कम साबित होता नहीं दिख रहा है : प्रमोद बूब वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेंट होने के नाते जयपुर में एक जाना-पहचाना चेहरा हैं; गौतम शर्मा ने नेटवर्किंग अच्छी जमाई हुई है; रोहित माहेश्वरी ने राजस्थान के बाहर की ब्रांचेज में अपनी अच्छी पकड़ बनाई हुई है; रोहित अग्रवाल की युवा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स में अच्छी पैठ है; सचिन जैन को रीजन के जैन वोट मिलने का भरोसा है; देवेंद्र सोमानी ने चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के हितों के लिए संघर्ष करने को लेकर पीछे जिस तरह की सक्रियता दिखाई, उसके चलते रीजन में उन्होंने संघर्षशील व्यक्तित्व की पहचान बनाई; निर्मल सोनी पिछले चुनाव में हालाँकि कामयाब नहीं हो पाए थे, किंतु उनका प्रदर्शन बहुत बुरा नहीं था और पहली वरीयता के वोटों की गिनती में वह ग्यारहवें नंबर पर थे तथा नितीश अग्रवाल से आगे थे । जाहिर है कि आधार-क्षेत्र के आकलन के अनुसार राजस्थान के सभी सातों उम्मीदवार मजबूत दिखाई दे रहे हैं - लेकिन समस्या की बात यह है कि सातों को तो जीतना नहीं है; इसलिए मुसीबत दरअसल यहाँ से शुरू होती है । कोई भी चुनाव सिर्फ समर्थन के आधार-क्षेत्र की मजबूती के भरोसे नहीं जीता जा सकता है ! चुनाव वास्तव में एक प्रबंधन-कला भी है । चुनाव में जीतता वह है जो अपने समर्थन-आधार को व्यावहारिक तरीके से मैनेज कर पाता है । 
पिछली बार अशोक ताम्बी चुनावी प्रबंधन में कौशल न दिखा पाने के कारण ही जीतते-जीतते हार गए थे; और आशीष व्यास जीतने की तरफ बढ़ते बढ़ते हार की तरफ निकल गए । गौर करने वाला तथ्य यह है कि पहली वरीयता के वोटों की गिनती में अशोक ताम्बी सातवें नंबर पर तथा आशीष व्यास नौवें नंबर पर थे, लेकिन फिर भी काउंसिल में नहीं जा पाए । राजस्थान के इस बार के जो उम्मीदवार हैं, वह अशोक ताम्बी व आशीष व्यास के साथ पिछली बार जो हुआ - चाहें तो उससे सबक ले सकते हैं । पिछली बार के चुनावी नतीजों का विश्लेषण यदि करें, तो एक मजेदार तथ्य यह पता चलता है कि एक नितीश अग्रवाल को छोड़ कर राजस्थान के बाकी सभी उम्मीदवारों को दूसरी/तीसरी वरीयता के वोटों का टोटा पड़ गया था, और इस कारण उनकी रैंकिंग पीछे गई । पहली वरीयता के वोटों की गिनती में तीसरे नंबर पर रहने वाले सीएल यादव फाइनली पाँचवें नंबर पर रहे; मनीष बारोद छठे नंबर से पहले तो सातवें नंबर पर खिसके, लेकिन अंततः अपने छठे नंबर को बचाए रखने में कामयाब रहे; अशोक ताम्बी और आशीष व्यास का हाल पहले ही बताया जा चुका है; निर्मल सोनी के लिए भी अपने ग्यारहवें नंबर को बचाये रख पाना संभव नहीं हुआ । एक अकेले नितीश अग्रवाल ने अपनी स्थिति सुधारी थी और वह बारहवें नंबर से आठवें नंबर पर पहुँचे थे । यह नतीजा बताता है कि राजस्थान के उम्मीदवार दूसरी/तीसरी वरीयता के वोटों का फायदा उठाने की व्यवस्था करने में पिछड़ जाते हैं । पिछली बार जयपुर के बाहर के शहरों के उम्मीदवार के रूप में नितीश अग्रवाल, आशीष व्यास और निर्मल सोनी का जो प्रदर्शन रहा, वह जयपुर के उम्मीदवारों की उम्मीदों पर पानी फेरने का काम करता है । 
समझा जाता है कि जयपुर के बाहर के शहरों के तीनों उम्मीदवारों का जो प्रदर्शन रहा था, उसमें जयपुर-विरोधी भावना की महत्वपूर्ण भूमिका थी । उल्लेखनीय है कि राजस्थान में कई ब्रांचेज में लोगों को इस बात पर बड़ी चिढ़ है कि इंस्टीट्यूट की दोनों काउंसिल में सारी सीटें जयपुर के लोग ही हथिया लेना चाहते हैं । इसी चिढ़ के कारण जयपुर के उम्मीदवारों के लिए राजस्थान की दूसरी ब्रांचेज में वोट जुटाना मुश्किल हो जाता है; और यही बात जयपुर के बाहर के उम्मीदवारों के लिए वरदान बन जाती है । देवेंद्र सोमानी ने इसी स्थिति का फायदा उठाने की अच्छी तैयारी दिखाई है, और इसी बिना पर उनकी चुनावी स्थिति को मजबूत देखा/पहचाना जा रहा है । उनकी स्थिति को खतरा बस निर्मल सोनी की तरफ से देखा जा रहा है । दोनों चूँकि एक ही शहर के हैं, और निर्मल सोनी का पिछली बार का प्रदर्शन अपेक्षाकृत ठीक ही रहा था - इसलिए कुछेक लोगों को लगता है कि देवेंद्र सोमानी के लिए मामला आसान नहीं होगा । किंतु उदयपुर में लोगों का मानना/कहना है कि निर्मल सोनी को पिछली बार जो वोट मिले थे, वह इसलिए मिले थे क्योंकि पिछली बार वह पूरे रीजन में अकेले माहेश्वरी थे; इस बार राजस्थान में ही चार माहेश्वरी हैं । दावा किया जा रहा है कि उदयपुर में ही निर्मल सोनी को खास समर्थन नहीं है; और उदयपुर में इस बार उनकी उम्मीदवारी के पीछे उन लोगों को देखा/पहचाना जा रहा है, जो पिछली बार उनके खिलाफ थे - और जो इस बार सिर्फ उनके साथ इसलिए हैं क्योंकि उन्हें देवेंद्र सोमानी का विरोध करने के लिए कोई 'मोहरा' चाहिए । देवेंद्र सोमानी ने निर्मल सोनी की तरफ से मिलने वाली चुनौती को पहचाना हुआ है, और उससे निपटने की रणनीति के तहत राजस्थान की विभिन्न ब्रांचेज के साथ-साथ मध्य प्रदेश की इंदौर ब्रांच में तथा बिहार की कुछेक ब्रांचेज में समर्थन जुटाने की कोशिशें की हैं । देवेंद्र सोमानी ने अपने पक्ष में 'हवा' तो अच्छी बनाई है, लेकिन फिर भी उनकी सफलता इस बात पर निर्भर होगी कि अपने समर्थन-आधार को वह व्यवस्थित कैसे करते हैं । 
जयपुर के उम्मीदवारों में गौतम शर्मा और रोहित अग्रवाल अपनी चुनावी तैयारी को गंभीरता से लेते दिख रहे हैं - इसलिए उनकी चुनावी स्थिति को बाकी उम्मीदवारों की तुलना में फिलवक्त बेहतर देखा/पहचाना जा रहा है । जयपुर में कई लोगों का हालाँकि यह भी मानना/कहना है कि जयपुर के दूसरे उम्मीदवारों का भी समर्थन-आधार चूँकि अच्छा है, इसलिए यदि वह अपनी अपनी चुनावी तैयारियों को लेकर वास्तव में गंभीर हो जाते हैं - तब फिर गौतम शर्मा व रोहित अग्रवाल के लिए मामला उतना आसान शायद नहीं रह जायेगा, जितना आसान वह अभी दिख रहा है । सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के चुनाव के संदर्भ में राजस्थान का चुनावी परिदृश्य इसलिए दिलचस्प है क्योंकि यहाँ सीन बहुत कुछ स्पष्ट होने के बावजूद अभी भी पूरी तरह सुनिश्चित नहीं माना/कहा जा सकता है । 

Tuesday, October 27, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में 26 अक्टूबर के आलोक गुप्ता के शो के मुकेश अरनेजा के प्रति बढ़ते/फैलते विरोध का शिकार होने से दीपक गुप्ता के चुनाव अभियान में मुसीबत बढ़ी

नई दिल्ली/गाजियाबाद । मुकेश अरनेजा की चुनावी भूमिका की शिकायत इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई के यहाँ तक पहुँच जाने के कारण डिस्ट्रिक्ट 3012 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के लिए सुभाष जैन और दीपक गुप्ता के बीच हो रहा मुकाबला खास हो उठा है । इसके चलते हालाँकि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों व शुभचिंतकों के बीच आशंकाभरा सवाल भी पैदा हो गया है कि मुकेश अरनेजा का चुनावी हथकंडा कहीं आत्मघाती तो साबित नहीं हो जायेगा ? दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों को लगता है, और वह यह कहते भी हैं कि मुकेश अरनेजा का लोगों के बीच जैसा विरोध है और इस विरोध के बावजूद जैसी वह हरकतें करते हैं - उसके कारण दीपक गुप्ता का चुनाव अभियान जितना आगे नहीं बढ़ता, उससे ज्यादा पीछे खिसक जाता है । दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के पक्ष में समर्थन जुटाने के मकसद से 25 अक्टूबर को हुए अमित अग्रवाल के 'शो' के मुकाबले 26 अक्टूबर को हुए आलोक गुप्ता के 'शो' के फीका रहने के एक बड़े कारण के रूप में मुकेश अरनेजा की उपस्थिति/अनुपस्थिति को ही देखा/पहचाना गया । अमित अग्रवाल अपने शो से मुकेश अरनेजा को दूर रखने के कारण ज्यादा होशियार साबित हुए; उनके शो से दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के अभियान को बढ़त मिलती दिखी थी, जिसे लेकिन अगले ही दिन हुए आलोक गुप्ता के शो से खासा तगड़ा झटका लगा । आलोक गुप्ता के शो में मुकेश अरनेजा को मुख्य अतिथि के रूप में देख कर आमंत्रित लोगों ने शो से दूर रहना ही उचित समझा - और इस बात ने एक दिन पहले ही बनी 'हवा' की हवा निकालने का काम किया । 
इस झटके पर लीपापोती करने की कोशिश में हालाँकि तर्क दिया गया है कि आलोक गुप्ता के शो का दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के अभियान से कोई लेना-देना नहीं था; और वह क्लब का कार्यक्रम था, जिसमें ज्यादा लोगों को बुलाया ही नहीं गया था । इस तर्क के चलते लेकिन बात और बिगड़ गई । कहा/पूछा जाने लगा कि आलोक गुप्ता जब दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक बने हुए हैं और अपने कार्यक्रम में वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रवर्तक मुकेश अरनेजा को मुख्य अतिथि बना रहे हैं, तो चुनावी घमासान के मौके पर आयोजित हो रहे अपने क्लब के एक कार्यक्रम को दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के अभियान से जोड़ने का काम उन्होंने क्यों नहीं किया ? फिर वह दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के कैसे समर्थक हैं ? यह तर्क यदि वास्तव में सच है, तो इस बात को साबित करता है कि दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के समर्थक पूरे मन/कर्म से उनके समर्थक नहीं हैं । और यदि यह तर्क सिर्फ बहाने के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, तो इससे जाहिर हो रहा है कि दीपक गुप्ता और उनके समर्थक अपनी मेहनत से जितना समर्थन बना/जुटा पाते हैं, मुकेश अरनेजा एक झटके में उस पर पानी फेर देते हैं । दीपक गुप्ता के कुछेक समर्थकों का कहना है कि उन्हें मुकेश अरनेजा के समर्थन से फायदा तो उठाना चाहिए, लेकिन मुकेश अरनेजा को 'आगे' रखने तथा सब कुछ उनके ऊपर छोड़ देने से सिर्फ नुकसान ही होगा ।
मुकेश अरनेजा की चुनावी भूमिका की शिकायत इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई तक पहुँच जाने से मामला और गंभीर हो गया है । चर्चा है कि मुकेश अरनेजा की हरकतों की जो शिकायतें मनोज देसाई तक पहुँची हैं, मनोज देसाई ने अपने स्तर पर उनकी पुष्टि की है और मामले को गंभीर माना है । इस मामले में मनोज देसाई को दरअसल इसलिए दिलचस्पी लेना पड़ रहा है, क्योंकि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन ने रोटरी की चुनावी राजनीति में गवर्नर्स द्वारा भूमिका निभाने को लेकर कड़ी चेतावनी दी हुई है । पिछले दिनों दिल्ली में डिस्ट्रिक्ट 3012 व डिस्ट्रिक्ट 3011 द्वारा संयुक्त रूप से की गई इंटरसिटी में भाषण देते हुए केआर रवींद्रन ने अपनी चेतावनी को दोहराते हुए साफ कहा था कि कोई पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रोटरी की चुनावी राजनीति में संलग्न दिखा, तो उसका 'डिस्ट्रिक्ट गवर्नर' छीन कर उसे सिर्फ 'पूर्व' बना दिया जायेगा । केआर रवींद्रन के इस रवैये के चलते मनोज देसाई को डर है कि उन्होंने यदि इस तरह के मामलों को गंभीरता से नहीं लिया, तो केआर रवींद्रन की ब्लैक लिस्ट में शामिल होंगे । मुकेश अरनेजा का दावा लेकिन यह है कि उनके बारे में मनोज देसाई को चाहें जितनी शिकायतें मिल जाएँ, मनोज देसाई उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेंगे । अपने इस दावे के पक्ष में उनका तर्क है कि मनोज देसाई इस बात को अच्छे से जानते हैं कि वह आज यदि इंटरनेशनल डायरेक्टर हैं, तो उनकी वजह से हैं - ऐसे में वह उनके खिलाफ कोई भी कार्रवाई भला कैसे कर सकेंगे ? मुकेश अरनेजा इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन के बारे में भी इसी तरह की बातें कर रहे हैं । उनका कहना है कि केआर रवींद्रन सिर्फ बातें बना रहे हैं, कुछ करना-धरना उनके बस में नहीं है । मुकेश अरनेजा का कहना है कि खुद केआर रवींद्रन पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की राजनीति के सहारे ही इंटरनेशनल प्रेसीडेंट के पद तक पहुँचे हैं, और अभी भी राजनीति करते हैं । 
मनोज देसाई और केआर रवींद्रन को लेकर मुकेश अरनेजा का जो कहना है, हो सकता है कि वह सच हो; और मुकेश अरनेजा की चुनावी भूमिका की शिकायत पर कार्रवाई करने की हिम्मत हो सकता है कि मनोज देसाई सचमुच न कर पाएँ - लेकिन दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के कुछेक समर्थकों का कहना है कि उनकी हरकतों से एक नकारात्मक प्रभाव तो बन ही रहा है, जो कुल मिलाकर नुकसान पहुँचाने का ही काम करेगा । मुकेश अरनेजा ने क्लब्स तथा लोगों के बीच दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रति समर्थन बनाने की बजाए क्लब्स में तोड़फोड़ कराने तथा क्लब्स के सदस्यों के बीच झगड़ा पैदा करने/करवाने वाले जो काम किए हैं, उन्हें लेकर उनके प्रति विरोध और फैला है । नोमीनेटिंग कमेटी के लिए नाम तय कराने से लेकर तय हुए नामों वाले लोगों पर दबाव डालने का जो काम मुकेश अरनेजा ने किया है, उसका उल्टा ही असर पड़ता नजर आ रहा है । कई लोगों का मानना और कहना है कि मुकेश अरनेजा की सक्रियता के नाम पर लोगों के साथ की जा रही बेहूदगियाँ लोगों को उनके साथ-साथ उनके नजदीकियों व समर्थकों तक से दूर करने का काम कर रही हैं, जिसका सुबूत 26 अक्टूबर के आलोक गुप्ता के शो में देखने को मिला - और यही बात दीपक गुप्ता की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने में मुसीबत बनी हुई है ।

Monday, October 26, 2015

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल रीजन में नितिन गुप्ता को अनुज गोयल की चालों में मदद करता देख विनय मित्तल ऐसा भड़के हैं कि अपना चुनाव छोड़ कर उन्होंने नितिन गुप्ता के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया है

गाजियाबाद । नितिन गुप्ता के अनुज गोयल से हाथ मिला लेने की खबरें सुन कर विनय मित्तल इतने खफा हुए हैं कि वह सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने की बात भूल कर रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत नितिन गुप्ता की उम्मीदवारी के खिलाफ प्रचार करने में जुट गए हैं । इस 'जुटने' के तहत ही विनय मित्तल जहाँ भी जाते हैं, वहाँ के लोगों को नितिन गुप्ता की धोखेबाजी का किस्सा बताने से नहीं चूकते हैं । किस्सा भी सिर्फ यह कि नितिन गुप्ता ने उनसे उनकी उम्मीदवारी के लिए काम करने का वायदा किया था, लेकिन फिर अचानक से पता नहीं क्या हुआ कि अपने वायदे को भूल कर नितिन गुप्ता खुद ही उम्मीदवार हो गए । विनय मित्तल को लगता है कि उनके चुनाव अभियान को नुकसान पहुँचाने के इरादे से अनुज गोयल ने नितिन गुप्ता को उम्मीदवारी के लिए प्रेरित किया; और अनुज गोयल की बातों में आकर नितिन गुप्ता ने उनके साथ धोखा किया । विनय मित्तल लोगों को यह भी बताते हैं कि नितिन गुप्ता को रीजनल काउंसिल का चुनाव जितवाने का लालच देकर अनुज गोयल ने नितिन गुप्ता को पूरी तरह अपने वश में कर लिया है, तथा नितिन गुप्ता के जरिए उनके समर्थकों को बरगलाने व तोड़ने का काम करते हुए सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत उनकी उम्मीदवारी को नुकसान पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं । 
उल्लेखनीय है कि नितिन गुप्ता पिछले चुनाव में विनय मित्तल के साथ थे, और पिछली बार रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत विनय मित्तल की उम्मीदवारी के पक्ष में उन्होंने जम कर काम किया था । गाजियाबाद में ही नहीं, गाजियाबाद के आसपास की ब्रांचेज में भी लोगों का मानना और कहना रहा है कि पिछली बार रीजनल काउंसिल के चुनाव में विनय मित्तल को जो जीत मिली थी - उसमें नितिन गुप्ता की महत्वपूर्ण भूमिका थी । पिछले चुनाव के दौरान लोगों को विनय मित्तल और नितिन गुप्ता के बीच जो केमिस्ट्री देखने को मिली थी, उसके आधार पर ही अनुमान लगाया जा रहा था कि अबकी बार सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत विनय मित्तल की उम्मीदवारी के अभियान की बागडोर नितिन गुप्ता के हाथ में ही होगी । खुद विनय मित्तल भी नितिन गुप्ता के सहयोग को लेकर आश्वस्त थे । किंतु नितिन गुप्ता ने सभी अनुमानों और आश्वस्तियों को गलत साबित करते हुए सेंट्रल इंडिया रीजनल काउंसिल के लिए अपनी उम्मीदवारी घोषित कर दी । नितिन गुप्ता की इस घोषणा से विनय मित्तल को तगड़ा वाला झटका तो लगा, तथा दूसरों को भी आश्चर्य तो हुआ - लेकिन यह मान लिया गया कि आखिर नितिन गुप्ता की भी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ हैं और यदि वह उन्हें पूरा करना चाहते हैं, तो किसी को भी उन पर ऊँगली उठाने का हक नहीं है । विनय मित्तल ने भी इस सच्चाई को स्वीकार कर लिया कि सेंट्रल काउंसिल का चुनाव उन्हें नितिन गुप्ता की मदद के बिना ही लड़ना होगा; तथा इस हकीकत के चलते पैदा हुई स्थितियों से निपटने लिए उन्होंने अपनी उम्मीदवारी के संदर्भ में तैयारी भी कर ली । 
विनय मित्तल लेकिन यह देख/जान कर भड़क गए हैं कि नितिन गुप्ता ने अनुज गोयल से नजदीकी बना ली है । रीजनल काउंसिल के चुनाव के संदर्भ में अनुज गोयल को पहले हालाँकि मुकेश बंसल के समर्थन में देखा/पहचाना जा रहा था, और अनुज गोयल कुछेक जगह मुकेश बंसल की उम्मीदवारी को समर्थन दिलाने के प्रयास करते देखे/सुने भी गए थे; किंतु अभी उन्हें नितिन गुप्ता के साथ देखा जाने लगा है । लोगों के बीच चर्चा है कि अनुज गोयल ने मुकेश बंसल का साथ छोड़ कर अब नितिन गुप्ता की उम्मीदवारी का झंडा उठा लिया है । यह तो कोई ऐसी बात नहीं है, जिस पर विनय मित्तल भड़कें - लेकिन उनके भड़कने का कारण अनुज गोयल का नितिन गुप्ता को उनके खिलाफ इस्तेमाल करना बना । नितिन गुप्ता का अनुज गोयल के हाथों इस्तेमाल होने के लिए तैयार जाने ने उनके 'भड़कने' को और ज्यादा भड़काने का काम किया । दरअसल देखा/पाया यह गया कि अनुज गोयल ने नितिन गुप्ता की मदद से विनय मित्तल की जड़ें खोदने का काम शुरू किया है, और चुन चुन कर विनय मित्तल के समर्थकों व शुभचिंतकों को 'तोड़ने' व विनय मित्तल से दूर करने का प्रयास कर रहे हैं । नितिन गुप्ता चूँकि विनय मित्तल के समर्थकों व शुभचिंतकों को अच्छे से जानते/पहचानते हैं, इसलिए नितिन गुप्ता की मदद अनुज गोयल के खूब काम आ रही है । नितिन गुप्ता की मदद से अनुज गोयल सिर्फ विनय मित्तल के नजदीकियों को पहचानने का ही काम नहीं कर रहे हैं, बल्कि नितिन गुप्ता की मदद से वह विनय मित्तल के खिलाफ नकारात्मक अभियान भी चला रहे हैं । अनुज गोयल जो कर रहे हैं, या करना चाहते हैं - वह तो अपनी जगह है ही; विनय मित्तल के लिए झटके की बात यह है कि नितिन गुप्ता इस काम में बढ़चढ़ कर अनुज गोयल की मदद कर रहे हैं । 
अनुज गोयल दरअसल नहीं चाहते हैं कि सेंट्रल काउंसिल में उनके द्वारा खाली की गई सीट पर विनय मित्तल काबिज हों । इसके लिए उन्होंने अपने भाई जितेंद्र गोयल को भी बलि का बकरा बना दिया, लेकिन जल्दी ही उन्हें समझ में आ गया कि जितेंद्र गोयल के जरिए वह विनय मित्तल को शायद न रोक सकें । जितेंद्र गोयल को समर्थन दिलाने की अनुज गोयल ने जितनी जो कोशिशें  की हैं, उनसे फायदा होना तो दूर की बात - रीजन में उनकी फजीहत और हुई है । लोग खुलेआम कहने भी लगे हैं कि चुनाव में जितेंद्र गोयल की हालत तो अमरेश वशिष्ट से भी बुरी होनी है । जितेंद्र गोयल के जरिए विनय मित्तल को 'रोकने' में असफलता मिलती देख कर ही अनुज गोयल ने नितिन गुप्ता के मार्फत विनय मित्तल का शिकार करने की योजना बनाई । नितिन गुप्ता को अपनी तरफ मिलाना अनुज गोयल के लिए इसलिए भी आसान हुआ, क्योंकि खुद नितिन गुप्ता अपनी उम्मीदवारी के संदर्भ में विनय मित्तल के रवैये से आहत थे । असल में, नितिन गुप्ता को विश्वास था कि विनय मित्तल के साथ पीछे उनके जैसे सहयोगात्मक संबंध रहे हैं, उसके कारण विनय मित्तल उनकी मदद करेंगे । लेकिन मदद करना तो दूर की बात, विनय मित्तल ने उनकी उम्मीदवारी के प्रति दुश्मनी जैसा भाव रखा । इसीलिए अनुज गोयल ने जैसे ही उनकी तरफ सहयोग का हाथ बढ़ाया, तो उन्होंने हाथ पकड़ने में देर नहीं लगाई - और फिर वह विनय मित्तल को उखाड़ने के लिए चली जा रही अनुज गोयल की चालों में भी मदद करते हुए दिखने लगे । यह देख/जान कर विनय मित्तल ने नितिन गुप्ता के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है । लोगों का कहना है कि विनय मित्तल सेंट्रल काउंसिल के लिए प्रस्तुत अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने की बजाए नितिन गुप्ता की रीजनल काउंसिल के लिए प्रस्तुत उम्मीदवारी के खिलाफ काम करने में ज्यादा दिलचस्पी ले रहे हैं । 

Sunday, October 25, 2015

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3100 में राजीव सिंघल की उम्मीदवारी के समर्थक पूर्व गवर्नर्स की 'ठुकाई'/'बजाई' से बचने लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील गुप्ता ने कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग का विचार छोड़ने में ही अपनी भलाई देखी है

मेरठ । पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स पर भरोसा न कर पाने के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील गुप्ता कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग बुलाने को लेकर असमंजस में फँस गए हैं । मजे की बात यह हुई है कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट केआर रवींद्रन से मिले चेतावनी पत्र की मार से बचने के लिए सुनील गुप्ता ने पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के यहाँ शरण खोजने की जो कोशिश की, उसका उन्हें बड़ा उत्साहजनक जबाव मिला और प्रायः हर पूर्व गवर्नर ने कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग बुलाने के उनके प्रस्ताव का हाथों-हाथ समर्थन किया - किंतु फिर भी कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग बुलाने का वह कोई फैसला नहीं कर पा रहे हैं । दरअसल राजीव सिंघल व उनके समर्थकों ने सुनील गुप्ता को आगाह किया है कि कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग बुलाने के उनके प्रस्ताव पर पूर्व गवर्नर्स ने जो उत्साह दिखाया है, वह उनकी मदद करने के संदर्भ में नहीं दिखाया है - बल्कि उनकी 'ठोकने'/'बजाने' का मौका बनाने/पाने के संदर्भ में दिखाया है । राजीव सिंघल व उनके समर्थकों ने सुनील गुप्ता को कहा/बताया है कि कुछेक पूर्व गवर्नर्स तो कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग को लेकर इसलिए उत्साहित हैं क्योंकि उसमें 'उन्हें' उन्हें 'धोने' का मौका मिलेगा, और बाकी कई फ्री का तमाशा देखने की उम्मीद में कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग करवा लेना चाहते हैं । सुनील गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार ही, यह कहते/बताते हुए राजीव सिंघल ने सुनील गुप्ता को आश्वस्त किया है कि इन पूर्व गवर्नर्स के चक्कर में मत पड़ो - मैं इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई से कह कर तुम्हें बचवाऊँगा । 
राजीव सिंघल से यह आश्वासन मिलने के बाद ही सुनील गुप्ता ने दो काम एक साथ किए - एक तरफ तो उन्होंने यह कहते हुए अपना 'दम' दिखाना शुरू किया कि इंटरनेशनल प्रेसीडेंट की चिट्ठी से क्या होता है, देखना मैं सब मैनेज कर लूँगा; और दूसरी तरफ उन्होंने कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग के विचार से पीछे हटने के संकेत देने शुरू कर दिए । कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग से उन्हें पीछे हटता पाकर कुछेक पूर्व गवर्नर्स ने अपने आप को ठगा हुआ महसूस किया है । उनका कहना है कि सुनील गुप्ता ही तो उनके पास आया था; रोते-धोते हुए और अपने बच्चों की कसमें देते हुए खुद को बचाने की गुहार लगाते हुए उनके पैरों में बैठ गया था; खुद ही कह/बता रहा था कि अब पूर्व गवर्नर्स ही मुझे बचा सकते हैं; उसके रोने-धोने को देखते हुए उन्होंने आपस में विचार-विमर्श भी किया तथा उसकी मदद करने को लेकर सक्रिय भी हुए - अब सुना है कि सुनील गुप्ता लोगों के बीच कह रहे हैं कि उन्हें पूर्व गवर्नर्स पर भरोसा ही नहीं है । मजे की बात यह हुई है कि राजीव सिंघल की उम्मीदवारी को समर्थन देने के चक्कर में सुनील गुप्ता ने जिन बृज भूषण व योगेश मोहन गुप्ता को तवज्जो दी, वही दोनों सुनील गुप्ता के हाथों उपेक्षित होने की शिकायत करते सुने गए हैं । उनकी शिकायतों की सुनील गुप्ता हालाँकि कोई परवाह करते हुए भी नहीं देखे जा रहे हैं । कहीं कहीं तो सुनील गुप्ता यह तक कहते सुने गए हैं कि बृज भूषण और योगेश मोहन गुप्ता ने ज्यादा शिकायतबाजी की, तो उनका हाल भी एमएस जैन जैसा कर दिया जायेगा । एमएस जैन भी राजीव सिंघल की उम्मीदवारी के बड़े समर्थक हैं, जिनकी सुनील गुप्ता ने खासी दुर्गति करते हुए उन्हें उनके क्लब से निकलवा दिया हुआ है । 
कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग कराने से पीछे हटने के पीछे सुनील गुप्ता का एक बड़ा डर दरअसल एमएस जैन वाला किस्सा भी है । राजीव सिंघल की तरफ से सुनील गुप्ता को स्पष्ट बता दिया गया है कि कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग यदि हुई तो एमएस जैन तथा दूसरे गवर्नर्स उनकी ऐसी हालत करेंगे, जैसी उन्होंने सोची भी नहीं होगी । सुनील गुप्ता ने अपनी हरकतों और बातों से पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को इतना अपमानित किया हुआ है, कि कई पूर्व गवर्नर्स बदला लेने की ताक में ही बैठे हुए हैं । कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स को सुनील गुप्ता से बदला लेने का अच्छा मौका उपलब्ध करवा सकती है । राजीव सिंघल के समर्थक पूर्व गवर्नर्स की तरफ से बन रहे इस खतरे को भाँप कर ही सुनील गुप्ता कॉलिज ऑफ गवर्नर्स की मीटिंग करने/कराने से बच रहे हैं ।    
इस तरह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर सुनील गुप्ता और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार राजीव सिंघल के संबंध एक पहेली की तरह बन गए हैं - जिसमें हर किसी के लिए फिलहाल यह समझना मुश्किल हो रहा है कि कौन किसको इस्तेमाल कर रहा है ? सुनील गुप्ता डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में राजीव सिंघल की हर संभव मदद कर रहे हैं और करने के प्रयासों में लगे हैं, किंतु दूसरी तरफ राजीव सिंघल के समर्थक नेता सुनील गुप्ता की पूरी तरह ऐसी-तैसी करने में लगे हैं । डिस्ट्रिक्ट में हर किसी के लिए हैरानी की बात यह है कि राजीव सिंघल के समर्थक नेता जब सुनील गुप्ता की गवर्नरी खराब करने के साथ-साथ 'छीनने' की भी कोशिश कर रहे हैं, तब सुनील गुप्ता आखिर किस 'लालच' में   राजीव सिंघल की उम्मीदवारी के समर्थन में अपना तन-मन लगाए हुए हैं ? राजीव सिंघल के नजदीकियों की तरफ से हालाँकि इसका कारण यह बताया गया है कि राजीव सिंघल की उम्मीदवारी का समर्थन करने के बदले में उनसे मोटी रकम ऐंठ लेने की उम्मीद में सुनील गुप्ता उनके समर्थक नेताओं से प्रताड़ित व अपमानित होने के बावजूद उनकी उम्मीदवारी का काम करने में लगे हुए हैं । राजीव सिंघल ने इंटरनेशनल डायरेक्टर मनोज देसाई के नाम का इस्तेमाल करते हुए सुनील गुप्ता को उनकी गवर्नरी बचाने का आश्वासन देकर अपनी तरफ और खींच लिया है । 
डिस्ट्रिक्ट में लोगों का कहना/पूछना लेकिन यह है कि राजीव सिंघल के मनोज देसाई के साथ यदि सचमुच नजदीकी संबंध हैं, और उन संबंधों के चलते वह वास्तव में सुनील गुप्ता की गवर्नरी को बचा लेंगे - तो उन्होंने सुनील गुप्ता की गवर्नरी को मुसीबत में फँसने ही क्यों दिया ? उल्लेखनीय है कि सुनील गुप्ता की गवर्नरी पर जो आफत है, उसके प्रमुख सूत्रधार के रूप में मनोज देसाई को ही देखा/पहचाना जा रहा है । मनोज देसाई यदि चाहते तो सुनील गुप्ता के खिलाफ हुई शिकायतों को बीच में ही दफ़्न कर सकते थे । उन्होंने ऐसा नहीं किया, उससे जाहिर है कि राजीव सिंघल ने उनसे सुनील गुप्ता की वकालत या तो की नहीं और या उनकी सुनी नहीं गई । यह इस बात का सुबूत है कि मनोज देसाई का नाम लेकर राजीव सिंघल वास्तव में डिस्ट्रिक्ट के लोगों को तथा सुनील गुप्ता को उल्लू ही बना रहे हैं । सुनील गुप्ता इसलिए खुशी खुशी बन भी रहे हैं, क्योंकि दूसरी बातों की बजाए उनकी निगाह राजीव सिंघल से रकम ऐंठने पर ज्यादा है ।