Friday, July 6, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में पूरी तरह अलग-थलग पड़े पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी 'बचाने/बनाने' के लिए जोन 4 के किसी अन्य डिस्ट्रिक्ट में ट्रांसफर लेने की तैयारी कर रहे हैं क्या ?

नई दिल्ली । डिस्ट्रिक्ट 3012 के पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रमेश अग्रवाल रोटरी जोन 4 के किसी अन्य डिस्ट्रिक्ट में 'जाने' की तैयारी करते सुने जा रहे हैं । उनके नजदीकियों के हवाले से सुना जा रहा है कि रमेश अग्रवाल डिस्ट्रिक्ट 3012 में जिस तरह से अलग-थलग पड़े हैं, उसके चलते उन्हें इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर पाना मुश्किल क्या, असंभव ही लग रहा है - और इसीलिए वह जोन 4 के किसी ऐसे डिस्ट्रिक्ट में ट्रांसफर ले लेना चाहते हैं, जहाँ से वह इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत कर सकें । उल्लेखनीय है कि जोन 4 में वर्ष 2021-22 में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद का चुनाव होना है, जिसके लिए बनने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के सदस्यों का चुनाव इस जोन के डिस्ट्रिक्ट्स में वर्ष 2020-21 में होगा । रमेश अग्रवाल इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उम्मीदवार बनने की तैयारी में हैं । इस तैयारी में उन्हें लेकिन अपना खुद का डिस्ट्रिक्ट ही आड़े आता नजर आ रहा है । रमेश अग्रवाल अपने ही डिस्ट्रिक्ट में बुरी तरह से अलग-थलग पड़ गए हैं । इसका अहसास उन्हें पिछले दिनों तब हुआ, जब डीआरएफसी बनने के लिए उन्होंने एड़ी-चोटी का जोर लगा लिया; जिसके तहत उन्होंने डिस्ट्रिक्ट से लेकर रोटरी के बड़े नेताओं तक में न जाने किस किस की खुशामद तक कर ली, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी आलोक गुप्ता को धमकी तक दे डाली - लेकिन फिर भी वह डीआरएफसी न बन सके । रमेश अग्रवाल ने बड़ी मिन्नतें कीं कि वह डीआरएफसी सिर्फ एक वर्ष ही रहेंगे, बाकी के दो वर्ष जिसे चाहे उसे बना देना - लेकिन किसी ने उनकी एक न सुनी । उनका कहना था कि वह यदि एक वर्ष भी डीआरएफसी के पद पर रह लेते हैं, तो इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए प्रस्तुत किया जाने वाला उनका बायोडेटा स्ट्रॉन्ग हो जायेगा । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट दीपक गुप्ता ने बड़ी चालाकी के साथ डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी आलोक गुप्ता पर उनका समर्थन न करने का दोष मढ़ दिया, जिस पर रमेश अग्रवाल ने आलोक गुप्ता के लिए धमकी तक दे डाली कि मैं देखूँगा कि वह डिस्ट्रिक्ट में गवर्नरी कैसे करता है ? 
तमाम खुशामद और धमकी के बावजूद रमेश अग्रवाल को जब अपने डिस्ट्रिक्ट में डीआरएफसी बनने का मौका नहीं मिला, तो उन्होंने बड़ी चाल चली और गुपचुप रूप से अपने डिस्ट्रिक्ट - डिस्ट्रिक्ट 3012 को विभाजित करवाने के लिए रोटरी इंटरनेशनल में आवेदन कर दिया । रोटरी इंटरनेशनल को उन्होंने जो ड्राफ्ट भेजा, उसमें दिल्ली और सोनीपत के क्लब्स को मिला कर एक अलग डिस्ट्रिक्ट बनाने की वकालत की गई । रमेश अग्रवाल ने पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता सहित रोटरी के अन्य कुछेक बड़े नेताओं व पदाधिकारियों से सिफारिश की कि वह डिस्ट्रिक्ट 3012 को विभाजित करवा कर एक और नया डिस्ट्रिक्ट बनवा दें । हर किसी ने यह कहते/बताते हुए रमेश अग्रवाल को फटकारा ही कि तुम रोटरी के बड़े जानकर बनते हो, और इतनी सी बात नहीं जानते हो कि किसी भी डिस्ट्रिक्ट के विभाजित होने के लिए एक प्रक्रिया का पालन करना होता है, उसके बिना डिस्ट्रिक्ट को विभाजित नहीं किया जा सकता है । डिस्ट्रिक्ट को विभाजित करवाने की गुपचुप रूप से की गई रमेश अग्रवाल की हरकत की पोल खुली तो डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच भी उनकी किरकिरी हुई और गाजियाबाद व उत्तर प्रदेश के अन्य क्लब्स के उनके साथ देखे/पहचाने वाले प्रमुख लोगों से उनकी दूरी बनी/बढ़ी । इस तरह अपने लिए एक नया डिस्ट्रिक्ट बनवाने की कोशिश में रमेश अग्रवाल को रोटरी के बड़े नेताओं के बीच तो फजीहत झेलनी ही पड़ी, अपने डिस्ट्रिक्ट में उनका अकेलापन और बढ़ गया ।
इसके बाद से ही रमेश अग्रवाल को लगने लगा है कि डिस्ट्रिक्ट 3012 से इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत कर पाना उनके लिए मुश्किल क्या, असंभव ही होगा । इसलिए रमेश अग्रवाल को जोन 4 के किसी अन्य डिस्ट्रिक्ट में ट्रांसफर ले लेने की जरूरत महसूस होने लगी है । उन्हें लग रहा है कि इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए उन्हें अपनी उम्मीदवारी यदि सचमुच प्रस्तुत करना है, तो उन्हें जल्दी से जल्दी किसी अन्य डिस्ट्रिक्ट में ट्रांसफर ले लेना चाहिए । रमेश अग्रवाल के नजदीकियों के हवाले से लोगों के बीच चर्चा है कि रमेश अग्रवाल को लगता है कि रोटरी इंडिया विन्स के सेक्रेटरी के रूप में उन्होंने अपनी जो पहचान बनाई है, उसका इतना प्रभाव तो है कि किसी भी डिस्ट्रिक्ट के पदाधिकारी उन्हें अपने यहाँ किसी क्लब में ले लेंगे । रमेश अग्रवाल किस डिस्ट्रिक्ट में जायेंगे, यह तो अभी स्पष्ट नहीं है; लेकिन उनके नजदीकियों के हवाले से जो सुना जा रहा है उसके अनुसार, वह देख/समझ रहे हैं कि जोन 4 के किस डिस्ट्रिक्ट में पूर्व गवर्नर्स के बीच ज्यादा उठापटक नहीं है और कहाँ वह आराम से 'रह' सकते हैं तथा इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए बिना किसी बाधा के अपनी राजनीति कर सकते हैं । लोगों के बीच जो चर्चा है, उसमें हालाँकि यह भी सुना/बताया जा रहा है कि उनके शुभचिंतकों ने उन्हें सलाह दी है कि वह बदहवासी में ऐसा कोई फैसला न करें, जिसके लिए उन्हें बाद में पछताना पड़े । रमेश अग्रवाल के साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों का कहना है कि रमेश अग्रवाल के साथ यह बड़ी समस्या है कि प्रतिकूल हालात से वह तुरंत ही बौखला जाते हैं और फिर ऐसा कुछ कर जाते हैं, जिससे उन्हें अंततः नुकसान उठाने के साथ-साथ फजीहत का भी शिकार होना पड़ता है । डीआरएफसी बनने तथा डिस्ट्रिक्ट को विभाजित करवाने के उनके प्रयासों में ऐसी ही बदहवासी देखी गई, जिसके नतीजे के रूप में उन्हें चौतरफा फजीहत ही झेलना पड़ी है । शुभचिंतकों व हमदर्दों की सलाह का रमेश अग्रवाल पर कोई असर होता है या नहीं, यह देखना दिलचस्प होगा ।

Wednesday, July 4, 2018

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल के डायरेक्टर पद की कुर्सी तो तमाम मुसीबतों के बावजूद जेपी सिंह को मिल गई है, लेकिन लीडरशिप के स्वार्थी नेता अपने अपने स्वार्थ पूरा करने के चक्कर में उन्हें ठीक से डायरेक्टरी करने भी देंगे क्या ?

नई दिल्ली । जेपी सिंह अंततः इंटरनेशनल डायरेक्टर बन ही गए । इंटरनेशनल डायरेक्टर पद पाने के लिए जेपी सिंह को जैसी मुसीबतों का सामना करना पड़ा है, वैसी मुसीबतें शायद ही किसी और इंटरनेशनल डायरेक्टर ने झेली होंगी । हालाँकि मजे की बात यह रही कि हालात हमेशा ही पूरी तरह जेपी सिंह के अनुकूल ही रहे और लीडरशिप का उन्हें लगभग एकतरफा समर्थन मिलता रहा, लेकिन फिर भी शुरू से लेकर ऐन मौके तक मुसीबतें जैसे उनके पीछे पड़ी रहीं । कई लोगों का मानना और कहना है कि वास्तव में अधिकतर बार मुसीबतों को जेपी सिंह ने खुद ही आमंत्रित किया । अपनी राह आसान बनाने के लिए जेपी सिंह ने लीडरशिप से जो 'फैसले' करवाए, वह उलटे पड़े और उन्हीं फैसलों ने उनकी राह को आसान बनाने की बजाये मुश्किल बनाने का काम किया । दरअसल डिस्ट्रिक्ट से लेकर मल्टीपल तक में एंडोर्स होने के लिए जेपी सिंह ने मुकाबले से बचने की जो कोशिशें कीं, वहीं मुसीबत बन कर उन पर भारी पड़ीं । पहले डिस्ट्रिक्ट में अपने प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवार को चुनावी मैदान से हटवाने की उन्होंने जो कोशिश की, वह उन पर इतनी भारी पड़ी कि अकेले उम्मीदवार होने के बावजूद वह डिस्ट्रिक्ट में एंडोर्समेंट लेने में फेल हो गए । यह तथ्य जेपी सिंह के लिए भारी फजीहत का कारण बना । किसी भी चुनाव में अकेला उम्मीदवार भी हार जाये - इससे पहले यह नहीं सुना गया था । पर यह रिकॉर्ड जेपी सिंह के नाम बना । इसके बाद मल्टीपल में भी अन्य प्रतिद्धंद्धी उम्मीदवारों को रास्ते से हटाने के लिए षड्यंत्र रचा गया, जिस पर जो बबाल हुआ - उसने ऐन मौके तक जेपी सिंह का साथ नहीं छोड़ा । लेकिन जैसा कि कहा/माना जाता है कि 'अंत भला, तो सब भला'; और 'जो जीता, वही सिकंदर' - इसलिए जेपी सिंह फिलहाल सिकंदर तो बन गए हैं - लेकिन आगे भी बने रहते हैं या नहीं, यह देखने की बात होगी ।
दरअसल जेपी सिंह ने अपने व्यवहार से अपने ही डिस्ट्रिक्ट में अपने 'दुश्मनों' की संख्या खासी बढ़ाई हुई है, और उनके अपने डिस्ट्रिक्ट के यही दुश्मन उनके बाहर के विरोधियों को 'गोली/बारूद' उपलब्ध करवाते रहते हैं । यूँ तो हर (पूर्व) डायरेक्टर को अपने अपने डिस्ट्रिक्ट में विरोध और अलग-थलग पड़ने का दंश झेलना पड़ता है, लेकिन जेपी सिंह के मामले में बात थोड़ी अलग है; और यह अलग इसलिए है क्योंकि डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति में झटके लगते रहने के बावजूद अपने डिस्ट्रिक्ट में उनका एक अच्छा-खासा समर्थन आधार है, और उनकी सक्रियता देख/समझ कर ऐसा भी नहीं लगता है कि दूसरे (पूर्व) डायरेक्टर्स की तरह वह सिर्फ जुगाड़ू बन कर रहना चाहते हैं । वह खासे ऊर्जावान हैं, उनके पास लायनिज्म को लेकर एक विज़न है, वास्तव में कुछ करने के लिए जरूरी इच्छाशक्ति भी उनमें है - इसलिए उम्मीद की जाती है कि वह डिस्ट्रिक्ट और मल्टीपल में ही नहीं, बल्कि उसके ऊपर भी एक बड़ी भूमिका निभा सकते हैं । उनके सामने बस एक ही चुनौती है, और वह चुनौती वह खुद हैं । एक खुन्नसी सोच के चलते वह खुद मुसीबतों को जैसे आमंत्रित करते हैं । जैसे, पिछले लायन वर्ष में उनके डिस्ट्रिक्ट में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के चुनाव में यह शुरू से ही स्पष्ट था कि रमन गुप्ता की उम्मीदवारी का मुकाबला करने का दम मदन बत्रा में नहीं है; जेपी सिंह ने लेकिन मदन बत्रा को जबर्दस्ती सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए उम्मीदवार बना/बनवा कर डिस्ट्रिक्ट पर चुनाव थोपा, मदन बत्रा की हुई बुरी हार से अंततः जेपी सिंह की ही फजीहत हुई । जेपी सिंह की खुन्नस 'किसी और' से थी, उसका बदला लेकिन उन्होंने रमन गुप्ता और मदन बत्रा से निकाला और इस तरह न सिर्फ अपनी ही फजीहत करवाई, बल्कि अपने विरोधियों की संख्या में इजाफा और किया ।
जेपी सिंह को डिस्ट्रिक्ट व मल्टीपल तथा उससे ऊपर एक बड़ी भूमिका निभाते देखने के इच्छुक लोगों का मानना और कहना है कि जेपी सिंह यदि छोटे-छोटे स्वार्थों में पड़ना छोड़ दें और सचमुच में एक बड़ी सोच को व्यवहार में उतारें, तो वह वास्तव में हर किसी नेता पर खासे भारी पड़ेंगे । यह उन्होंने किया भी है । अपने डिस्ट्रिक्ट में ब्लड बैंक से चिपके रह कर उन्होंने खासी बदनामी और मुसीबतें 'कमाई' थीं, लेकिन जब वह ब्लड बैंक छोड़ने के लिए तैयार हुए और उन्होंने अपने आप को ब्लड बैंक से दूर कर लिया तब धीरे धीरे उनकी बदनामी और मुसीबतें भी कम होती गईं । जैसा कि कहा जा चुका है कि अपनी तमाम मुसीबतों के लिए जेपी सिंह खुद ही जिम्मेदार रहे हैं, इसलिए उम्मीद की जाती है कि वह अपने ही अनुभवों से सबक लेंगे और सावधानी बरतते हुए अपनी प्राथमिकताओं पर ध्यान देंगे, तो निश्चय ही लायनिज्म में बड़ी भूमिका निभायेंगे । कई लोगों का मानना और कहना है कि तमाम बाधाओं के बावजूद जेपी सिंह इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की कुर्सी तक पहुँच गए हैं, तो इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि लीडरशिप का उनको एकतरफा समर्थन मिला है । लीडरशिप के समर्थन के भरोसे जेपी सिंह को इंटरनेशनल डायरेक्टर की कुर्सी तो मिल गई है, लेकिन आगे का काम उन्हें खुद ही करना है । कुछेक लोगों का मानना और कहना है कि लीडरशिप के जो लोग अभी तक उनकी मदद करते रहे हैं, वही लोग अब अपने अपने स्वार्थ पूरे करने के लिए उनका इस्तेमाल करेंगे - अपने व्यवहार के साथ-साथ लीडरशिप के स्वार्थी नेताओं से निपटना जेपी सिंह के लिए भारी चुनौती होगा । यह देखना दिलचस्प होगा कि जेपी सिंह इस चुनौती से निपटने की जरूरत समझते भी हैं, या दूसरे (पूर्व) डायरेक्टर्स की तरह जुगाड़ू बने रह कर ही खुश रहते हैं ?

Tuesday, July 3, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डायरेक्टर का पद मिलने से पहले ही भरत पांड्या पद का रौब दिखा कर डिस्ट्रिक्ट 3080 के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट जितेंद्र ढींगरा को मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर करके राजा साबू गिरोह की 'सेवा' करेंगे क्या ?

चंडीगढ़ । भरत पांड्या को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की कुर्सी तो अभी करीब एक वर्ष बाद मिलेगी, लेकिन डिस्ट्रिक्ट 3080 से जुड़ी मुसीबतों ने उन्हें अभी से घेरना शुरू कर दिया है । पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट राजेंद्र उर्फ राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स ने भरत पांड्या पर दबाव डालना शुरू किया है कि वह रोटरी फाउंडेशन से संबद्ध डिस्ट्रिक्ट क़्वालीफिकेशन मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टेंडिंग पर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट जितेंद्र ढींगरा के हस्ताक्षर करवाएँ । भरत पांड्या चूँकि जितेंद्र ढींगरा के डायरेक्टर होंगे, इसलिए राजा साबू और उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स को यकीन है कि भरत पांड्या दबाव डालेंगे, तो जितेंद्र ढींगरा उक्त मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर करने से बच नहीं सकेंगे । उल्लेखनीय है कि उक्त मेमोरेंडम के अनुसार, डिस्ट्रिक्ट्स में रोटरी फाउंडेशन से जुड़े खर्चों की निगरानी की जिम्मेदारी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट तथा डीआरएफसी की होती है; इसलिए रोटरी फाउंडेशन को उक्त मेमोरेंडम पर डिस्ट्रिक्ट के इन तीनों पदाधिकारियों के हस्ताक्षर चाहिए होते हैं । डिस्ट्रिक्ट 3080 में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट जितेंद्र ढींगरा उक्त मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर करने से पहले यह जानना चाहते हैं कि रोटरी फाउंडेशन से मिलने वाली रकम का किन प्रोजेक्ट्स में कैसे और कितना कितना इस्तेमाल होगा ? डीआरएफसी के रूप में शाजु पीटर का कहना है कि यह सब जानकार वह क्या करेंगे, वह तो बस चुपचाप उक्त मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर कर दें - जैसे कि अभी तक के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट्स करते आ रहे हैं । शाजु पीटर का कहना है कि यह सब तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर प्रवीन गोयल ने भी उनसे नहीं पूछा या कहा है और उन्होंने चुपचाप वहाँ हस्ताक्षर कर दिए, जहाँ उनसे हस्ताक्षर करने को कहा गया - जितेंद्र ढींगरा तो अभी डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट हैं, वह यह सब आखिर क्यों जानना चाह रहे हैं ?
उल्लेखनीय है कि डिस्ट्रिक्ट 3080 में रोटरी फाउंडेशन सहित दूसरे फंड्स के मामले में जिस फार्मूले को अपनाया जाता है, वह है - 'खाता न बही, जो राजा साबू कहें वही सही ।' डिस्ट्रिक्ट के कई एकाउंट्स पर राजा साबू और उनके चहेते कुंडली मारे बैठे हैं, और उनमें काला-सफेद करते रहते हैं । इसी कारण निवर्त्तमान डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने के बावजूद डिस्ट्रिक्ट से जुड़े कई एकाउंट्स के हिसाब-किताब देखने को नहीं मिले; जिसके चलते रोटरी के सौ वर्षों से अधिक के इतिहास में पहली बार एक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को यह निवेदन करते हुए इंटरनेशनल बोर्ड में पिटीशन दायर करना पड़ी कि उन्हें उनके डिस्ट्रिक्ट से जुड़े एकाउंट्स के हिसाब-किताब उपलब्ध करवाए जाएँ । राजा साबू रोटरी इंटरनेशनल में यह जुगाड़ कर लेने में सफल हुए कि टीके रूबी की पिटीशन पर इंटरनेशनल बोर्ड टीके रूबी को हिसाब-किताब उपलब्ध करवाने का आदेश न जारी कर दे; रोटरी इंटरनेशनल बोर्ड के सामने यह मजबूरी भी थी कि वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर से यह भी नहीं कह सकता था कि भई, तुम क्यों हिसाब-किताब माँग रहे हो, राजा साबू और उनके साथी जो काला-सफेद कर रहे हैं वह उन्हें करते रहने दो ! लिहाजा रोटरी इंटरनेशनल ने बीच का रास्ता निकाला और उसने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी को लिखा कि यह आपके डिस्ट्रिक्ट का अंदरूनी मामला है, इसे आप डिस्ट्रिक्ट में ही आपस में मिल-बैठ कर हल करो - और हमें माफ करो । इस तरह, रोटरी इंटरनेशनल में पिटीशन दायर करने के बाद भी टीके रूबी को डिस्ट्रिक्ट से जुड़े हिसाब-किताब देखने को नहीं मिल सके । पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर और रोटरी फाउंडेशन के ट्रस्टी सुशील गुप्ता की सहमति तथा रोटरी इंटरनेशनल की रीजनल ग्रांट्स ऑफिसर चंद्रा पामर के आदेश के बावजूद डिस्ट्रिक्ट ग्रांट 1860814 को स्वीकृति देने के मामले में लगातार इंकार करते हुए और फिर अपने इंकार से पलटते हुए डीआरएफसी के रूप में शाजु पीटर ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी को कितना और कैसे कैसे परेशान किया, उसे 'रचनात्मक संकल्प' की 17 जून की रिपोर्ट में पढ़ा जा सकता है ।
राजा साबू तथा उनके गिरोह के पूर्व गवर्नर्स, खासकर डीआरएफसी के रूप में शाजु पीटर के रवैये को देखते हुए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट जितेंद्र ढींगरा ने साफ कह दिया है कि जब उन्हें यह बताया ही नहीं जा रहा है कि रोटरी फाउंडेशन से मिलने वाली रकम कहाँ और कैसे खर्च होगी, तब फिर वह उसकी निगरानी की जिम्मेदारी कैसे ले सकते हैं । समझा जाता है कि राजा साबू गिरोह के लोग रोटरी फाउंडेशन के पैसे पर किसी दूसरे देश एक मेडिकल मिशन पर जाने की तैयारी कर रहे हैं, जिसे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर इलेक्ट जितेंद्र ढींगरा से छिपाया जा रहा है । उल्लेखनीय है कि अभी करीब तीन-चार महीने पहले ही पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर रंजीत भाटिया तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी के साथ धोखाधड़ी करके एक मेडीकल मिशन ले गए थे । दरअसल रंजीत भाटिया को जब टीके रूबी उक्त मेडीकल मिशन में ज्यादा दिलचस्पी दिखाते हुए नजर आए, तो रंजीत भाटिया ने उन्हें मेडीकल मिशन पर जाने का कार्यक्रम रद्द कर देने की सूचना दी और उक्त मिशन के लिए डीडीएफ से मिली रकम को भी वापस कर दिया; लेकिन बाद में पता चला कि टीके रूबी - डिस्ट्रिक्ट गवर्नर टीके रूबी से छिपा कर एक दूसरे डिस्ट्रिक्ट से डीडीएफ की रकम लेकर उक्त मिशन पर जाने का कार्यक्रम पूरा कर लिया गया । जितेंद्र ढींगरा का कहना है कि जिस तरह से टीके रूबी को धोखाधड़ी का शिकार बनाया गया, उस तरह से वह शिकार नहीं बनेंगे । रोटरी फाउंडेशन से मिली रकम के एक एक पैसे का हिसाब यदि उन्हें जानने/देखने को नहीं मिलेगा, तो वह संदर्भित मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे । राजा साबू गिरोह के पूर्व गवर्नर्स ने अभी तक जिन जिन लोगों से जितेंद्र ढींगरा पर हस्ताक्षर करवाने के लिए दबाव डलवाया है, उनसे जितेंद्र ढींगरा ने एक ही बात कही है कि क्या आप गारंटी लेते हो कि रोटरी फाउंडेशन के पैसे का दुरूपयोग नहीं होगा; यदि आप गारंटी लो, तो मैं अभी हस्ताक्षर कर देता हूँ । लेकिन मजेदार दृश्य यह बना है कि कोई भी इस बात की गारंटी लेने को तैयार ही नहीं हो रहा है कि राजा साबू गिरोह के लोग रोटरी फाउंडेशन के पैसे में घपला नहीं करेंगे ।
राजा साबू गिरोह ने संदर्भित मेमोरेंडम पर जितेंद्र ढींगरा के हस्ताक्षर करवाने के लिए अब अगले रोटरी वर्ष में इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने वाले भरत पांड्या पर दबाव बनाना शुरू किया है । गिरोह के ही एक सदस्य ने इन पंक्तियों के लेखक को बताया है कि भरत पांड्या का कहना टालना जितेंद्र ढींगरा के लिए मुश्किल होगा, और इस तरह भरत पांड्या के दबाव में जितेंद्र ढींगरा मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर हो जायेंगे । भरत पांड्या के लिए मुसीबत की बात लेकिन यह है कि जितेंद्र ढींगरा रोटरी फाउंडेशन से जुड़े हिसाब-किताब में पारदर्शिता रखने की जो माँग कर रहे हैं, उसे वह न तो ठुकरा सकते हैं - और न ही राजा साबू गिरोह के लोगों को उसके लिए राजी कर सकते हैं । भरत पांड्या को बताया गया है कि रोटरी के पैसों के इस्तेमाल को लेकर राजा साबू दोहरा रवैया दिखाते हैं : वरिष्ठ होने के नाते उनसे जब कहा जाता है कि वह मामलों को देखें और उन्हें दुरुस्त करवाएँ, तो राजा साबू यह कहते हुए बच निकलते हैं कि मुझे बीच में मत डालो, मुझसे कोई मतलब नहीं है; लेकिन जब मलाई बँट रही होती है तो राजा साबू लाइन में सबसे आगे खड़े नजर आते हैं । ऐसे में भरत पांड्या के सामने समस्या है कि कैसे वह मेमोरेंडम पर जितेंद्र ढींगरा के हस्ताक्षर करवाने की राजा साबू गिरोह की कोशिशों को सफल करें/करवाए ? देखना दिलचस्प होगा कि भरत पांड्या इंटरनेशनल डायरेक्टर का पद मिलने से पहले ही अपने पद का रौब दिखा कर अपने डायरेक्टर-काल के एक गवर्नर को कैसे मजबूर करके राजा साबू गिरोह की सेवा करते हैं ?

Sunday, July 1, 2018

इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स की सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाले संजीव सिंघल के 'चीयर लीडर' के रूप में दिख कर गिरीश आहुजा ने अपने प्रशंसकों को परेशान, निराश और नाराज किया हुआ है

नई दिल्ली । संजीव सिंघल के चक्कर में गिरीश आहुजा को हाल-फिलहाल के दिनों में नॉर्दर्न रीजन की कुछेक ब्रांचेज में जिस तरह से फजीहत का शिकार होना पड़ा है, उसके चलते उन्हें चाहने वालों को डर हो गया है कि अपनी चुनावी राजनीति के लिए संजीव सिंघल जिस तरह से गिरीश आहुजा को इस्तेमाल कर रहे हैं - उसके नतीजे के रूप में गिरीश आहुजा कहीं लोगों के बीच बने अपने मान-सम्मान से हाथ न धो बैठें । उल्लेखनीय है कि प्रोफेशन के लोगों के बीच गिरीश आहुजा का अच्छा प्रभाव है और लोग उन्हें बहुत आदर के साथ देखते/सुनते हैं । किसी सेमीनार में स्पीकर के रूप में उनकी उपस्थिति को सेमीनार की सफलता की गारंटी के रूप में देखा जाता है । किसी का सेमीनार कराने को 'धंधा' पिट रहा होता है या नहीं चल रहा होता है तो वह गिरीश आहुजा को स्पीकर के रूप में आमंत्रित कर लेता है और उसका धंधा चमक उठता है । गिरीश आहुजा की इस 'पहचान' का फायदा इंस्टीट्यूट की चुनावी राजनीति के खिलाड़ी समय समय पर उठाते रहते हैं; जिसके तहत वह प्रयास करते हैं कि सेमीनार की आड़ में होने वाली अपनी चुनावी सभा में वह गिरीश आहुजा को भी आमंत्रित कर लेते हैं । गिरीश आहुजा के नाम पर भीड़ जुट जाती है, और उनकी राजनीति हो जाती है । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करते हुए संजीव सिंघल ने गिरीश आहुजा के 'महत्त्व' को समझा और पहले से ही उन्हें सेमीनार की आड़ में होने वाली अपनी चुनावी सभाओं के लिए 'बुक' कर लिया । इंस्टीट्यूट के चुनावी मौसम में प्रोफेशन के लोग गिरीश आहुजा को सक्रिय देखने के आदी भी हैं, इसलिए संजीव सिंघल के साथ उन्हें देख कर किसी को आश्चर्य भी नहीं हुआ । लेकिन संजीव सिंघल के मामले में गिरीश आहुजा के बदले बदले से रवैये ने लोगों को जरूर परेशान, निराश और नाराज किया है ।
गिरीश आहुजा दरअसल अभी तक सेमिनार के रूप में होने वाली चुनावी सभाओं में अपनी तरफ से यह गरिमा बना कर रखते थे कि वह किसी उम्मीदवार के लिए समर्थन नहीं माँगते थे । सेमीनार के नाम पर होने वाली चुनावी सभा में वह अप्रत्यक्ष रूप से 'भीड़ खेचूँ' का काम तो कर देते थे, लेकिन उन्होंने कभी किसी उम्मीदवार को वोट देने की या उम्मीदवार का ध्यान रखने की अपील लोगों से नहीं की । इस तरह गिरीश आहुजा ने हमेशा ही अपनी गरिमा बना कर रखी और लोगों से मिलने वाले सम्मान के प्रति सम्मान प्रकट किया । गिरीश आहुजा ने हमेशा ही इस बात को समझा और उसका सम्मान किया कि लोग उन्हें अपने विषय के एक एक्सपर्ट के रूप में सुनने के लिए आते हैं, किसी उम्मीदवार के 'चीयर लीडर' के रूप में उन्हें सुनने नहीं आते हैं । गिरीश आहुजा लेकिन संजीव सिंघल के मामले में अपनी गरिमा को छोड़ते हुए नजर आए हैं, और कुछेक जगह उन्होंने संजीव सिंघल के 'चीयर लीडर' की भूमिका निभाने का काम भी किया । गिरीश आहुजा के लिए बदकिस्मती की बात रही कि ऐसा करते हुए उन्हें प्रायः हर जगह विरोध और फजीहत का सामना करना पड़ा । एक ब्रांच के कार्यक्रम में गिरीश आहुजा ने जब संजीव सिंघल को वोट देने की अपील की, तो लोग भड़क उठे और उन्होंने यह कहते हुए गिरीश आहुजा को लताड़ने की कोशिश की कि आपकी बगल में हमारा भी एक (रीजनल काउंसिल का) उम्मीदवार बैठा है, और आप उसकी कोई बात नहीं कर रहे हैं, सिर्फ संजीव सिंघल की बात कर रहे हैं । लोगों के तीखे विरोध को देखते हुए गिरीश आहुजा को यह कहते हुए लोगों से माफी माँगनी पड़ी कि चूँकि मैं इन्हें जानता नहीं हूँ, इसलिए इनके बारे में मैंने कुछ नहीं कहा ।
गिरीश आहुजा ने जहाँ कहीं भी संजीव सिंघल की उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने की कोशिशें कीं, प्रायः हर जगह कहीं गर्म रूप में तो कहीं नर्म रूप में उन्हें विरोध और फजीहत का ही सामना करना पड़ा है । प्रोफेशन के लोगों को दरअसल संजीव सिंघल के लिए गिरीश आहुजा का 'चीयर लीडर' बनना हजम नहीं हो रहा है । लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि संजीव सिंघल से गिरीश आहुजा को आखिर ऐसा कौन सा लाभ मिल रहा है या मिल सकेगा - जो उनके लिए वह 'चीयर लीडर' बनने को तैयार हो गए हैं, और प्रोफेशन के लोगों के बीच बने अपने सम्मान को भी दाँव पर लगाने के लिए तैयार हो गए हैं । मजे की बात है कि अभी तक इस बात को कोई ठोस आधार नहीं मिला है कि गिरीश आहुजा के साथ सेमीनार में हिस्सेदारी कर लेने से उम्मीदवार को वास्तव में कितना/क्या फायदा होता है; फायदे की बात अभी तक भी सिर्फ परसेप्शन पर ही आधारित है; क्योंकि इस बात के भी उदाहरण हैं कि गिरीश आहुजा के साथ सेमीनार में हिस्सेदारी करके गिरीश आहुजा को अपने समर्थन में 'दिखाने' वाले उम्मीदवार भी बस जैसे-तैसे करके ही चुनाव जीते हैं । लगता है कि संजीव सिंघल इसीलिए गिरीश आहुजा को सेमीनार में अपने साथ 'दिखाने' भर से ही संतुष्ट नहीं हैं और वह चाहते हैं तथा अपनी इसी चाहत में उन्होंने गिरीश आहुजा से 'चीयर लीडर' का काम भी करवा लिया है । संजीव सिंघल का 'स्वार्थ' तो हर किसी को समझ में आ रहा है, लेकिन हर किसी के लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि गिरीश आहुजा के सामने आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी आ पड़ी है कि अपनी गरिमा और प्रोफेशन के लोगों के बीच अपने सम्मान की परवाह न करते हुए उन्होंने संजीव सिंघल के लिए 'चीयर लीडर' बनना स्वीकार कर लिया है ?

Saturday, June 30, 2018

रोटरी इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 3012 में स्थितियों के चलते डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच मिल रहे लाभ को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी उम्मीदवारी के लिए राजनीतिक समर्थन में ट्रांसफर कर पाना अमित गुप्ता के लिए बड़ी चुनौती भी है

गाजियाबाद । अमित गुप्ता को सुभाष जैन की टीम में डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी होने तथा उनके क्लब के सक्रिय सदस्य होने के चलते डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी उम्मीदवारी के लिए जिस तरह का लाभ मिलता दिख रहा है, उसने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनावी परिदृश्य को खासा दिलचस्प बना दिया है । दरअसल हाल-फिलहाल में सुभाष जैन की विभिन्न उपलब्धियों के मौकों पर जिस तरह से अमित गुप्ता को आगे-आगे तथा सक्रियता निभाते देखा गया, और इसके चलते वह लोगों की निगाह में आते/चढ़ते दिखे - उसे चुनावी राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले नेताओं ने उल्लेखनीय माना/पाया है; और उन्हें लगा है कि अमित गुप्ता इस स्थिति का यदि राजनीतिकरण कर सके तो डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के चुनाव में फायदा उठा सकेंगे । मजे की बात यह रही है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के दूसरे उम्मीदवार अशोक अग्रवाल को लोगों तक अपनी पहुँच बनाने/दिखाने के लिए अपने 'स्तर' पर आयोजन करने पड़े हैं, जबकि अमित गुप्ता क्लब और डिस्ट्रिक्ट के कार्यक्रमों में अपनी सहभागिता के चलते ही लोगों के बीच 'पहुँच' रहे हैं । सुभाष जैन के क्लब का सदस्य होना भी अमित जैन को चुनावी फायदा पहुँचा रहा है । दरअसल सुभाष जैन का क्लब यूँ भी डिस्ट्रिक्ट का एक अच्छा सक्रिय क्लब है, और सुभाष जैन का क्लब होने के नाते उसकी गतिविधियों को डिस्ट्रिक्ट स्तर की पहचान भी मिल जा रही है । इस पृष्ठभूमि में, क्लब के आयोजनों में सक्रिय भूमिका निभा कर अमित गुप्ता सहज रूप में डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच अपनी पहचान को बढ़ा लेने के साथ-साथ और पुख्ता कर लेने का काम भी कर ले रहे हैं । यही बात डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में उन्हें फायदा पहुँचाती नजर आ रही है ।
अभी पिछले दिनों सुभाष जैन के क्लब ने अपने एक आयोजन में रोटरी न्यूज ट्रस्ट के सेक्रेटरी चुने जाने पर सुभाष जैन का स्वागत किया । गौर करने की बात यह है कि रोटरी न्यूज ट्रस्ट में प्रत्येक वर्ष पदाधिकारी चुने जाते हैं, लेकिन उनका कोई नोटिस तक नहीं लेता; 'ऊपर' के कुछेक लोगों को छोड़कर किसी को इस बात में दिलचस्पी नहीं होती कि रोटरी न्यूज ट्रस्ट में कौन किस पद पर है । सुभाष जैन का क्लब चूँकि उत्सवप्रिय है और हर मौके को उत्सव में बदल देने का हुनर रखता है, इसलिए उनके क्लब ने उनके रोटरी न्यूज ट्रस्ट के सेक्रेटरी बनने को एक जश्न के रूप में सेलीब्रेट किया; इस सेलीब्रेशन के दृश्य तस्वीरों के रूप में डिस्ट्रिक्ट के लोगों तक पहुँचे तो लोगों ने सुभाष जैन के ठीक बगल में खड़े अमित गुप्ता का खास नोटिस लिया - और इस तरह सुभाष जैन की एक उपलब्धि और उनके क्लब के द्वारा उस उपलब्धि को सेलीब्रेट करने की कार्रवाई अमित गुप्ता के लिए लोगों के बीच पहचान बनाने और उस पहचान को 'प्रतिष्ठित' करने का अवसर बन गया । सुभाष जैन को रोटरी फाउंडेशन के लिए जो जोरदार समर्थन मिल रहा है, उसके चलते भी अमित गुप्ता को लोगों के बीच अपनी 'इमेज' बनाने का मौका मिल रहा है । दरअसल रोटरी फाउंडेशन के लिए कोई जब सुभाष जैन को चेक देता है तो उस मौके की तस्वीर खिंचती है, और उस तस्वीर में डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी होने के नाते अमित गुप्ता कभी दाएँ तो कभी बाएँ खड़े नजर आते हैं, और फिर वह तस्वीर डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद के उम्मीदवार के रूप में अमित गुप्ता को महत्त्वपूर्ण बना देती है ।
स्थितियों को बयाँ करते तथ्यों की लोगों के बीच होने वाली आवाजाही स्थितियों से जुड़े - और जुड़े 'दिखने' वाले लोगों की पहचान बनाने तथा उस पहचान को प्रतिष्ठा दिलाने का काम करती है; जिसे तस्वीरें और हवा देती हैं । अमित गुप्ता के मामले में यह 'काम' सिर्फ इसलिए हो रहा है क्योंकि वह डिस्ट्रिक्ट सेक्रेटरी के पद पर हैं और सुभाष जैन के क्लब के सदस्य हैं । कुछेक लोगों का हालाँकि यह भी कहना है कि अमित गुप्ता को हो रहे फायदे को 'संयोगवश' होने वाले फायदे के रूप में देखना अमित गुप्ता के साथ अन्याय करना होगा, क्योंकि इस तरह के संयोग तो हर किसी के साथ बनते ही हैं । उनका कहना है कि अमित गुप्ता चूँकि अपने पद की जिम्मेदारी को अच्छे से निभाते हैं और पद के अनुरूप जरूरत के हिसाब से काम में जुटते हैं, जिसके कारण दूसरों की तुलना में वह सहज रूप से आगे नजर आते हैं । दूसरे लोग ऐसा नहीं कर पाते है, इसलिए उन्हें संयोगों का भी कोई फायदा नहीं मिल पाता है । अमित गुप्ता से हमदर्दी रखने वाले तथा उनकी उम्मीदवारी  समर्थन करने वाले लोगों को हालाँकि यह भी लगता है कि स्थितियों के चलते अमित गुप्ता को जो लाभ मिल रहा है, उसका वह डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी उम्मीदवारी के लिए फायदा उठाने का कोई प्रयास करते हुए नहीं दिख रहे हैं । इसलिए माना/समझा जा रहा है कि स्थितियों के चलते अमित गुप्ता को डिस्ट्रिक्ट में जो लाभ मिल रहा है, उसे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नॉमिनी पद की अपनी उम्मीदवारी के लिए राजनीतिक समर्थन में ट्रांसफर कर पाना उनके लिए बड़ी चुनौती भी है ।

Thursday, June 28, 2018

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 बी टू के डिस्ट्रिक्ट गवर्नर दीपक राज आनंद के खिलाफ हुई कड़ी कार्रवाई के चलते, गवर्नरी की आड़ में मनमानी व बेईमानी करने के मौके वंदना निगम से छिन गए हैं - और इस तरह उनके लिए गवर्नरी करने का सारा मजा ही खराब हो गया है

कानपुर । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद से बर्खास्त किए गए दीपक राज आनंद को उनकी कारस्तानियों की सजा दिलवाने के बाद डिस्ट्रिक्ट के विरोधी खेमे के नेताओं ने वंदना निगम तथा उनके साथी पूर्व गवर्नर्स की नकेल कसने/कसवाने के लिए भी तैयारी शुरू कर दी है । लोगों का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस के होने को लेकर झूठे तथ्य गढ़ने तथा लायंस इंटरनेशनल को गुमराह करने के जिस आरोप में दीपक राज आनंद को डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के पद से हटाया गया है और उन्हें 'पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर' की पहचान से भी वंचित कर दिया गया है, वह काम अकेले दीपक राज आनंद का ही नहीं है - बल्कि उस काम में वंदना निगम तथा कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की भी मिलीभगत थी, और इसलिए उन्हें भी दंडित किया जाना चाहिए । लोगों का कहना है कि जो कुछ भी हुआ, उसके लिए डिस्ट्रिक्ट गवर्नर होने के नाते दीपक राज आनंद की जिम्मेदारी ज्यादा बनती है, इसलिए उन्हें जो सजा मिली वह उचित ही है; लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि दीपक राज आनंद यदि लायंस इंटरनेशनल के साथ 'बेईमानी' करने का साहस कर सके, तो इसलिए क्योंकि उन्हें फर्स्ट वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में वंदना निगम तथा कुछेक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स का खुल्ला समर्थन व सहयोग मिला - इसलिए उनकी मिलीभगत को यदि अनदेखा कर दिया गया तो वह आगे भी लायंस इंटरनेशनल को 'ठगने' तथा उसके साथ 'बेईमानी' करने का काम कर सकते हैं । लोगों का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस को लेकर फर्जीवाड़ा करने के लिए तकनीकी रूप से भले ही दीपक राज आनंद दोषी हैं, लेकिन असली मुजरिम वंदना निगम तथा उनके सहयोगी पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स हैं - इसलिए उन्हें भी ऐसा कोई सबक दिया जाना चाहिए, जिससे कि वह आगे कभी फर्जीवाड़ा और बेईमानी करने के बारे में सोच भी न सकें ।
लायंस इंटरनेशनल की तरफ से दीपक राज आनंद को सजा मिलने की घोषणा के बाद डिस्ट्रिक्ट के सत्ता खेमे के लोगों के बीच निराशा है, जबकि विरोधी खेमे के लोग बम-बम हैं - और इसीलिए विरोधी खेमे के लोगों ने सत्ता खेमे के नेताओं पर दबाव बनाने के लिए आक्रामक रवैया अपना लिया है । सत्ता खेमे के लोगों ने इस बात पर राहत महसूस की है कि वंदना निगम के लिए गवर्नरी करने का मौका बच गया है और उनकी स्थिति पर कोई आँच नहीं आई है । सत्ता खेमे के लोगों को यह भी भरोसा है कि विरोधी खेमे के लोगों ने वंदना निगम तथा कुछेक पूर्व गवर्नर्स को घेरने के लिए जो आक्रामकता दिखाना शुरू किया है, उसका उनके लिए कोई खराब नतीजा नहीं निकलेगा और विरोधी खेमे की आक्रामकता कुछ दिनों का शोर-शराबा बन कर ही रह जाएगी । सत्ता खेमे के नेताओं के सामने समस्या लेकिन दूसरी है, और वह यह कि वंदना निगम की गवर्नरी की आड़ में उनके लिए मनमानी करने के मौके छिन गए हैं । दीपक राज आनंद के खिलाफ कठोर फैसला करके लायंस इंटरनेशनल ने संकेत दिया है कि वह किसी भी तरह की 'बेईमानी' को बर्दाश्त नहीं करेगा । गौर करने वाली बात यह है कि लायंस इंटरनेशनल के सौ वर्षों से ज्यादा के इतिहास में यह पहला अवसर है, जबकि गलत रिपोर्टिंग के मामले में एक डिस्ट्रिक्ट गवर्नर को न सिर्फ गवर्नर पद से बल्कि लायनिज्म से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है । इस फैसले से वंदना निगम पर दबाव बना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में वह नियमानुसार ही काम करें और किसी भी तरह की बेईमानीपूर्ण हरकत से दूर ही रहें ।
वंदना निगम के लिए मुसीबत की बात यह है कि उन्होंने तथा उनके पति पूर्व गवर्नर श्याम निगम ने अपने व्यवहार के चलते डिस्ट्रिक्ट में आम और खास लोगों को बुरी तरह नाराज किया हुआ है । डिस्ट्रिक्ट कॉन्फ्रेंस में हुए गड़बड़झाले के बाद तो यह दोनों लोगों से बात-बेबात उलझते रहे हैं, और 'चोरी व सीनाजोरी' वाला रवैया दिखा कर लोगों से बदतमीजी करते रहे हैं । इसके चलते यह दोनों ही लोगों के निशाने पर हैं, और लोग मौके के इंतजार में हैं कि यह कोई गड़बड़ी करें तो वह इन्हें घेरें । ऐसे में, डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में वंदना निगम पर दबाव बढ़ गया है । अपनी टीम के पदों को 'बेचने' तथा उम्मीदवारों से पैसे ऐंठने की उनकी योजनाएँ खतरे में पड़ गई हैं । मुसीबत की बात यह हुई है कि उन्होंने यदि ज्यादा चूँ-चपड़ की तो लोग विरोध व शिकायत करने के लिए तैयार ही बैठे हैं; उधर लीडरशिप की भौहें तनी हुई हैं ही । वंदना निगम के लिए समस्या की बात यह हुई है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में लोगों के बीच उनके लिए न तो सम्मान है, और न ही वह रौबदाब दिखाने की स्थिति में रह गई हैं - और इस तरह उनके लिए गवर्नरी करने का सारा मजा ही खराब हो गया है । हालाँकि उनके शुभचिंतकों का मानना और कहना है कि वंदना निगम यदि होशियारी व उदारता से काम लें और अपने रवैये को व्यवहारकुशल बनाएँ तो स्थितियों को काफी हद तक संभालने के साथ-साथ अनुकूल बना सकती हैं । देखना दिलचस्प होगा कि मुश्किल हो गए हालात को संभालने के लिए वंदना निगम अपने रवैये में कोई परिवर्तन व सुधार करती हैं, या पहले जैसे रवैये को बनाए रखते हुए अपनी मुश्किलों में और इजाफा करती हैं ।

Wednesday, June 27, 2018

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल में मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 की तरफ से डायरेक्टर बनने की जेपी सिंह की तैयारी को रोकने की अरविंद संगल की कोशिश फेल तो हुई ही, अदालत से अरविंद संगल को कड़ी फटकार और खानी पड़ी

नई दिल्ली । जेपी सिंह को इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने से रोकने की कोशिश में अरविंद संगल को अदालत से जो फटकार पड़ी है, उससे एक बार फिर साबित हो गया है कि झूठ और 'ठगी' के सहारे ज्यादा दिनों तक राजनीति नहीं की जा सकती है । लायंस इंटरनेशनल की कन्वेंशन में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए जेपी सिंह की उम्मीदवारी प्रस्तुत होने के खिलाफ बीती 31 मई को अदालत से स्टे ले कर अरविंद संगल ने जो बड़ा 'धमाका' करने का भ्रम फैलाया था, उसका नकली धुँआ 25 जून को आए एक अन्य अदालती फैसले से हवा हो गया है । इस मामले में गंभीर पहलू यह सामने आया है कि मामला सिर्फ कानूनी हार-जीत का ही नहीं है, कानूनी मामले में 'ठगी' करने का भी है । अरविंद संगल यदि सिर्फ कानूनी लड़ाई हारे होते, तो बात ज्यादा गंभीर नहीं बनती; अरविंद संगल के लिए फजीहत की बात यह हुई कि कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए उन्होंने जिस तरह के दाँव-पेंच इस्तेमाल किए, उसके चलते उन्हें अदालत की फटकार भी खानी पड़ी । अदालती फैसले में अरविंद संगल पर अदालत को गुमराह करने तथा अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग करने का गंभीर आरोप लगाया गया है । स्वयं अदालत के इस आरोप से साबित होता है कि अरविंद संगल एक पहले से ही हारी हुई लड़ाई लड़ रहे थे, जिसमें कुछ देर के लिए उन्होंने भले ही सनसनी पैदा कर दी थी - लेकिन जिसमें अंततः उन्हें कुछ मिलना नहीं था । लगता है कि जेपी सिंह और उनके पीछे खड़ी लीडरशिप का विरोध कर रहे तेजपाल खिल्लन और सुशील अग्रवाल को भी इस बात का आभास था, और इसीलिए वह अरविंद संगल से दूरी न सिर्फ बना चुके थे, बल्कि 'दिखा' भी रहे थे । जेपी सिंह को इंटरनेशनल डायरेक्टर बनने से रोकने की लड़ाई में अरविंद संगल को लायंस लोगों के बीच 'चोट्टे' के रूप में कुख्यात एक पूर्व डिस्ट्रिक्ट गवर्नर का ही सहयोग मिल पाया ।
25 जून के अदालती फैसले में अरविंद संगल को इस बात के लिए फटकार लगाई गई कि जिन तथ्यों और तर्कों के आधार पर जेपी सिंह को मिले मल्टीपल एंडोर्समेंट को रद्द करवाने की कार्रवाई करीब एक वर्ष पहले अदालती फैसले में असफल हो गई थी, उन्हीं तथ्यों और तर्कों के साथ करीब एक वर्ष बाद फिर अदालत का दरवाजा खटखटाया गया और पिछली अदालती कार्रवाई को छिपाया गया । उल्लेखनीय है कि पिछले लायन वर्ष में मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के लिए हुए एंडोर्समेंट को लेकर खासे आरोप और हंगामे रहे थे; और इस हंगामे का कभी पर्दे के पीछे से तो कभी सामने आकर नेतृत्व करते हुए तेजपाल खिल्लन मामले को अदालत भी ले गए थे, लेकिन जल्दी ही उन्हें समझ में आ गया कि जेपी सिंह को मिले एंडोर्समेंट को अदालती कार्रवाई के जरिए रोका नहीं जा सकेगा - इसलिए जेपी सिंह के मामले को छोड़ दिया गया और मान लिया गया कि जेपी सिंह इंटरनेशनल डायरेक्टर बन ही जायेंगे । इस बीच लीडरशिप के खिलाफ मोर्चा खोले बैठे पूर्व इंटरनेशनल प्रेसीडेंट अशोक मेहता तथा पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर राजू मनवानी के साथ विभिन्न कारणों से तेजपाल खिल्लन और सुशील अग्रवाल की नजदीकी बनी; अशोक मेहता और राजू मनवानी ने संतोष शेट्टी को इंटरनेशनल डायरेक्टर चुनवाने की लड़ाई के जरिये लीडरशिप को टक्कर देने की तैयारी की हुई थी । समझा जाता है कि उन्हें लगा कि जेपी सिंह को अदालती मामले में फँसा कर वह संतोष शेट्टी को कामयाबी दिलवा देंगे, और इसीलिए मल्टीपल डिस्ट्रिक्ट 321 में जेपी सिंह के एंडोर्समेंट के मामले को फिर से 'जिंदा' कर दिया गया । यह काम अरविंद संगल को मोहरा बना कर किया गया । पिछले करीब एक महीने में पड़ी अदालती तारीखों में कई मौकों पर अरविंद संगल जिस तरह अनुपस्थित दिखे, उससे लोगों को आभास मिला कि यह मुकदमा अरविंद संगल को मोहरा बना कर वास्तव में 'कोई और' लड़ रहा है । यह 'कोई और' इतना होशियार भी था कि उसे पता था कि मामले में कुछ होना नहीं है और इसीलिए वह सामने भी नहीं आया ।
अरविंद संगल को मोहरा बना कर लड़ी गई इस लड़ाई में कोशिश सिर्फ यह 'दिख' रही थी कि अदालत को गुमराह करके तथा अदालती प्रक्रिया का दुरूपयोग करके जेपी सिंह का रास्ता यदि रोक लिया जाये, तो हो सकता है कि संतोष शेट्टी का 'काम' बन जाए । 25 जून के फैसले से साबित हुआ कि अदालत ने इस चालबाजी को पकड़ लिया । अदालती फैसले में अरविंद संगल को इस बात के लिए फटकार लगाई गई कि मामले से जुड़े सारे तथ्य पिछले करीब एक वर्ष से सभी की जानकारी में थे, और यदि अरविंद संगल को सचमुच न्याय चाहिए था तो वह पिछले एक वर्ष से क्या कर रहे थे; और वह 31 मई को ही अदालत क्यों आए, जो कि छुट्टियाँ शुरू होने से पहले का अंतिम कार्यदिवस था । इसमें भी, मामले से जुड़ी पिछली अदालती कार्रवाई और उसमें हुए फैसले को छिपाया गया । 25 जून के अदालती फैसले ने इस बात की पोल भी खोली है कि लीडरशिप से लड़ने की कोशिश करने वाले नेताओं के पास न तो पर्याप्त तथ्य हैं, और न उन तथ्यों को इस्तेमाल करने की समझ है और न लड़ाई में निरंतरता बनाए रखने का हौंसला है । इसके चलते वह अपनी कोई मजबूत टीम भी नहीं बना पाते हैं, और इस कारण जरूरत पड़ने पर मौकापरस्त व चोट्टे किस्म के लोगों पर उन्हें निर्भर होना पड़ता है । ऐसे में, लीडरशिप से बार बार उन्हें 'पिटना' पड़ता है, और लीडरशिप की मनमानियों तथा बेईमानियों के खिलाफ होने या हो सकने वाली लड़ाई कमजोर पड़ती है । 25 जून के अदालती फैसले में अरविंद संगल के लिए तो 'प्याज भी खाने और जूते भी खाने' वाला किस्सा ही चरितार्थ हुआ है ।