Monday, January 21, 2013

सौ करोड़ रुपयों के नागपुर जमीन घोटाले में मिलीभगत वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव में चरनजोत सिंह नंदा के लिए मुसीबत बनी

नई दिल्ली । चरनजोत सिंह नंदा की इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के अध्यक्ष पद तक की दौड़ में नागपुर का सौ करोड़ रुपयों का जमीन घोटाला बाधा बनता दिख रहा है । उल्लेखनीय है कि उक्त घोटाले के संभव होने में चरनजोत सिंह नंदा का प्रमुख हाथ बताया/पहचाना जाता है । इसी तथ्य का वास्ता देकर कहा जा रहा है कि चरनजोत सिंह नंदा यदि कहीं अध्यक्ष बन गए तो वह तो इंस्टीट्यूट को बिलकुल लुटवा ही देंगे । इंस्टीट्यूट की सेंट्रल काउंसिल के एक सदस्य का कहना है कि चरनजोत सिंह नंदा जब अध्यक्ष नहीं थे, तब उन्होंने इंस्टीट्यूट को सौ करोड़ रुपयों की चपत लगवा दी - तो समझिये कि यदि वह अध्यक्ष बन गए तो इंस्टीट्यूट में कैसी लूट मचवा देंगे ।
चरनजोत सिंह नंदा और उनके समर्थक हालाँकि इस तरह की बातों से निश्चिंत दिखने की कोशिश कर रहे हैं । उनका तर्क है कि इस तरह की बातों के बावजूद अभी हाल ही में हुए चुनाव में अपने रीजन में उन्हें सबसे ज्यादा वोट मिले हैं । नागपुर के सौ करोड़ रुपयों के जमीन घोटाले में मिलीभगत के आरोपों के बावजूद चरनजोत सिंह नंदा को जिस तरह से चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का समर्थन मिला है, उसी तरह से - उन्हें उम्मीद है कि - वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में भी उन्हें समर्थन मिल जायेगा । वाइस प्रेसीडेंट पद के लिए समर्थन जुटाने के अपने अभियान में चरनजोत सिंह नंदा ने वोटरों को समझाया है - और उनके समर्थक भी धड़ल्ले से दावा कर रहे हैं कि चुनाव जीतने की एक ट्रिक होती है, और चरनजोत सिंह नंदा को वह ट्रिक पता है । चरनजोत सिंह नंदा को और उनके समर्थकों को विश्वास है कि सौ करोड़ रुपयों के नागपुर जमीन घोटाले में मिलीभगत के आरोपों के बावजूद चरनजोत सिंह नंदा के लिए जब सेंट्रल काउंसिल का चुनाव जीतना मुश्किल नहीं हुआ - उसमें बल्कि उन्हें सबसे ज्यादा वोट मिले, तो फिर वाइस प्रेसीडेंट का चुनाव जीतना क्यों मुश्किल होगा ?
चरनजोत सिंह नंदा और उनके कुछेक समर्थकों को भले ही विश्वास हो, लेकिन उनके ही अन्य कई एक समर्थकों को लगता है कि सौ करोड़ रुपयों के नागपुर जमीन घोटाले में उनकी मिलीभगत वाइस प्रेसीडेंट के चुनाव में उन्हें ले डूबेगी । ऐसा मानने वाले लोगों का तर्क है कि सेंट्रल काउंसिल की पिछली मीटिंग में नागपुर जमीन घोटाले को लेकर एस संथनाकृष्णन और महेश सारडा के बीच जो गर्मागर्मी हुई, उससे यह संकेत स्पष्ट रूप से मिलता है कि नागपुर घोटाले में जिन जिन लोगों की मिलीभगत है - सेंट्रल काउंसिल के सदस्य उनसे दूरी बनाने और दिखाने को लेकर सावधान हैं । ऐसे में चरनजोत सिंह नंदा के लिए वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव में समर्थन जुटाना सचमुच मुश्किल ही होगा ।
चरनजोत सिंह नंदा के नजदीकियों का कहना है कि चरनजोत सिंह नंदा इस बात से परेशान तो हैं कि वाइस प्रेसीडेंट पद के कुछेक उम्मीदवार सौ करोड़ रुपयों के नागपुर जमीन घोटाले में उनकी मिलीभगत को वाइस प्रेसीडेंट पद के चुनाव में उनके खिलाफ इस्तेमाल कर रहे हैं; पर उन्हें इस नकारात्मक प्रचार से निपटने का कोई उपाय अभी समझ में नहीं आ रहा है । सचमुच, सौ करोड़ रुपयों का नागपुर जमीन घोटाला चरनजोत सिंह नंदा के लिए बड़ी मुसीबत बन गया है ।

Friday, January 11, 2013

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद की लड़ाई में नरेश गुप्ता के जरिये सत्ता खेमे के नेताओं ने सुरेश बिंदल को क्या 'पप्पू' बना दिया है

नई दिल्ली । नरेश गुप्ता को आगे करके डिस्ट्रिक्ट के सत्ता खेमे के नेताओं ने एक तरफ विपक्षी नेताओं को तो दूसरी तरफ अलग होने की कोशिश करते दिख रहे डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश त्रेहन को दबाव में ले लिया है । मजे की बात यह है कि दो दिन पहले दिल्ली के पूर्व गवर्नरों की मीटिंग में नरेश गुप्ता का नाम जिन सुरेश बिंदल ने आगे किया था, वही सुरेश बिंदल अपने लोगों के बीच नरेश गुप्ता को लेकर अपनी नापसंदगी व्यक्त कर रहे हैं । सुरेश बिंदल के कुछेक नजदीकी बता रहे हैं कि नरेश गुप्ता की उम्मीदवारी सुरेश बिंदल के गले में ऐसी फँसी है जिसे सुरेश बिंदल के लिए न उगलते बन रहा है और न निगलते बन रहा है । उल्लेखनीय है कि सुरेश बिंदल ने पहले अपने क्लब के एस जयरमन का नाम आगे बढ़ाया था लेकिन किसी का समर्थन नहीं मिलने के कारण उन्हें मुहँकी खानी पड़ी । नेता बनने की कोशिश में सुरेश बिंदल ने तब लायंस क्लब दिल्ली प्रभात के प्रमोद अग्रवाल और देवेंद्र जैन को राजी करने का प्रयास किया । इन दोनों ने लेकिन इस झमेले में पड़ने से इंकार कर दिया । सुरेश बिंदल भी तब यह सोच कर चुप बैठ गए कि अभी उनकी किस्मत में 'डिस्ट्रिक्ट का नेता' बनना है नहीं । नरेश गुप्ता के नजदीकियों के अनुसार, यही वजह रही कि जब नरेश गुप्ता ने सुरेश बिंदल से उनका नाम आगे बढ़ाने के लिए कहा, तो सुरेश बिंदल ने साफ इंकार कर दिया । सुरेश बिंदल ने नरेश गुप्ता की सिफारिश करने वाले प्रभात क्लब के सदस्यों से कहा भी कि इसे कौन उम्मीदवार स्वीकार करेगा ? नरेश गुप्ता और उनके समर्थकों ने सुरेश बिंदल को किसी तरह बड़ी मुश्किल से इस बात के लिए राजी किया कि वह नरेश गुप्ता का नाम आगे तो बढ़ायें ।
सुरेश बिंदल ने पूर्व गवर्नर्स की मीटिंग में बहुत ही बेमन से नरेश गुप्ता की उम्मीदवारी की बात रखी । लेकिन वह यह देख कर हैरान रह गए कि मीटिंग में मौजूद सभी पूर्व गवर्नर्स ने नरेश गुप्ता की उम्मीदवारी के प्रति सकारात्मक रवैया ही दिखाया । सुरेश बिंदल के लिए चौंकने की बात यह रही कि सत्ता खेमे के मुखिया डीके अग्रवाल ने तो आगे बढ़ कर यह सुझाव भी दिए कि नरेश गुप्ता को किस तरह अपनी उम्मीदवारी के लिए समर्थन जुटाने के लिए काम करना चाहिए । सुरेश बिंदल जब तक माजरा समझते, तब तक नरेश गुप्ता की उम्मीदवारी की बात पूर्व गवर्नर्स के बीच स्थापित हो चुकी थी । दरअसल उस मीटिंग में और किसी उम्मीदवार का नाम ही नहीं लिया गया । एक अकेले नरेश गुप्ता का नाम आया और किसी ने भी उनके नाम पर नकारात्मक रवैया नहीं दिखाया । नरेश गुप्ता की उम्मीदवारी को लेकर नकारात्मक बातें होना तो बाद में शुरू हुईं; और यह नकारात्मक बातें सुरेश बिंदल के प्रभाव वाले क्लब्स के लोगों की ही तरफ से ज्यादा आईं । अधिकतर लोगों को लगता है कि नरेश गुप्ता तो ज्यादा सक्रिय ही नहीं हैं; न वह डिस्ट्रिक्ट में लोगों को जानते/पहचानते हैं, और न लोग ही उन्हें जानते/पहचानते हैं - ऐसे में वह कैसे गवर्नर बन सकते हैं और कैसे और क्यों सुरेश बिंदल ने उनका नाम आगे बढ़ाया ।
नरेश गुप्ता की उम्मीदवारी से हतप्रभ लोगों को लगता है कि सत्ता खेमे के कुछेक नेताओं ने बड़ी होशियारी से नरेश गुप्ता को तैयार करके सुरेश बिंदल के जरिये उनका नाम आगे बढ़वाया है; और इस तरह सत्ता खेमे के नेताओं ने नरेश गुप्ता के जरिये सुरेश बिंदल को 'पप्पू' बना दिया । सत्ता खेमे के सामने समस्या दरअसल यह है कि उनके पास 'अपना' कोई उम्मीदवार ही नहीं है । दूसरे लोगों के बीच सत्ता खेमे के उम्मीदवार के रूप में जिन ओंकार सिंह को देखा/पहचाना भी जा रहा है; सत्ता खेमे में ही उन्हें राकेश त्रेहन के उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है और यही बात उनके विरोध का कारण बनी हुई है । सत्ता खेमे में ओंकार सिंह से किसी को शिकायत नहीं है, लेकिन राकेश त्रेहन के नजदीक होना ही उनके लिए मुसीबत बन गया है । सत्ता खेमे के नेताओं की चिंता यह भी है कि राकेश त्रेहन कहीं विपक्षी खेमे के साथ मिल कर ओंकार सिंह को न नोमिनेट करवा लें - इसलिए उन्हें एक ऐसा उम्मीदवार चाहिए, जिसके नाम पर विपक्षी खेमा ऐतराज न व्यक्त कर सके । समझा जाता है कि इसी चाहत में उनकी निगाह नरेश गुप्ता पर पड़ी । कहने/दिखाने को तो नरेश गुप्ता विपक्षी खेमे के हैं, लेकिन सत्ता खेमे के नेता उन्हें विपक्षी खेमे में अपने 'आदमी' के रूप में देखते/पहचानते हैं । सत्ता खेमे के नेताओं ने जिस होशियारी के साथ नरेश गुप्ता को सुरेश बिंदल के गले में फँसाया है, उसके चलते सुरेश बिंदल अपने आपको ठगा हुआ सा महसूस कर रहे हैं ।
मजे की बात यह है कि सत्ता खेमे के नेताओं ने अपनी इस चाल से अपने दोनों हाथों में पत्ते कर लिए हैं - उन्हें यदि नरेश गुप्ता के रवैये को लेकर कोई समस्या हुई तो वह यह कह/बता कर बच निकल सकते हैं कि उनकी उम्मीदवारी से सुरेश बिंदल ही बिदके हुए थे; और यदि उन्हें कोई बेहतर विकल्प नहीं मिला और वह नरेश गुप्ता को ही नोमिनेट करवाने के लिए मजबूर हुए तो सुरेश बिंदल के बिदकने की परवाह करने की उन्हें कोई जरूरत नहीं है । सत्ता खेमे के एक प्रमुख नेता ने इन पंक्तियों के लेखक से साफ कहा कि होगा वह जो 'वे' चाहेंगे; दूसरे लोगों का कहना लेकिन यह है कि मौटे तौर पर तो यह बात सच है कि होगा वही, जो 'वे' चाहेंगे लेकिन सत्ता खेमे के लोगों के बीच जिस तरह की उठा-पटक और विकल्पहीनता की स्थिति है उसे समझते हुए यह देखना दिलचस्प होगा कि 'वे' जो चाहेंगे उसे खुशी से चाहेंगे या मजबूरी में स्वीकार करेंगे ?

Friday, January 4, 2013

सुधीर मंगला की शिकायत का रोटरी इंटरनेशनल में स्वीकार होना इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव का साइड इफेक्ट है क्या

नई दिल्ली । रमेश अग्रवाल द्धारा मनमाने तरीके से कोंक्रेंसेज को निरस्त करने की सुधीर मंगला की शिकायत के रोटरी इंटरनेशनल में स्वीकार हो जाने ने सभी को हैरान किया है । अपनी हार से बौखलाये सुधीर मंगला हालाँकि रमेश अग्रवाल के फैसले को चेलैंज करने की बात तो शुरू से कर रहे थे, किंतु उनकी बात को कोई गंभीरता से ले नहीं रहा था । हर किसी को लग रहा था कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद पर जेके गौड़ के चुने जाने की औपचारिक घोषणा के बाद सुधीर मंगला जिस तरह अलग-थलग पड़ गए हैं, और उनका समर्थन करने वाले पूर्व गवर्नर नेताओं ने भी उनसे दूरी बना ली है - उसके बाद सुधीर मंगला के लिए करने-धरने को कुछ बचा नहीं है । इससे भी बड़ी बात यह कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में रमेश अग्रवाल ने चुनाव को लेकर जो फैसला किया, वह इंटरनेशनल डायरेक्टर यश पाल दास को दिखा/बता कर - उन्हें विश्वास में लेकर किया; जिसके बाद रोटरी इंटरनेशनल द्धारा किसी शिकायत को तवज्जो देने की कोई सूरत ही नहीं बची रह जाती है । इसी कारण से सभी - यहाँ तक की सुधीर मंगला के समर्थक छोटे-बड़े नेता भी यह मान बैठे थे कि खेल पूरा हो चुका है और सुधीर मंगला के लिए करने को न तो कुछ बचा है और न उनकी कहीं कोई सुनवाई होगी ।
लेकिन रोटरी इंटरनेशनल ने सुधीर मंगला की शिकायत को स्वीकार करके न सिर्फ सभी को हैरान कर दिया है, बल्कि यह भी जता दिया है कि रमेश अग्रवाल ने फैसला भले ही यश पाल दास को विश्वास में लेकर किया हो - मामला लेकिन फिर भी ख़त्म नहीं मान लिया जा सकता । रोटरी इंटरनेशनल द्धारा सुधीर मंगला की शिकायत को स्वीकार करने के साथ ही वह किस्से महत्वपूर्ण हो उठे हैं, जिनमें कहा/बताया जा रहा था कि रमेश अग्रवाल के फैसलों पर यश पाल दास की सहमति उन पर दबाव बना कर, उन्हें घेर-घार कर ली गई है । उल्लेखनीय है कि रमेश अग्रवाल के कई मनमाने फैसलों को यश पाल दास ने पलटा है । कुछेक मामलों में तो पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के समर्थन के बाद भी रमेश अग्रवाल के लिए यश पाल दास के कोप से बचना संभव नहीं हुआ । कहा/बताया जाता है कि इसके बाद ही रमेश अग्रवाल और सुशील गुप्ता की जोड़ी ने यश पाल दास को तरह-तरह से घेरा और डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी के चुनाव के संदर्भ में लिए अपने फैसलों में उन्हें साझीदार बनाया । इस मामले में यश पाल दास के नजदीक रहे कुछेक लोगों का दावा रहा कि रमेश अग्रवाल और सुशील गुप्ता ने यश पाल दास से जो 'करवाया', उससे यश पाल दास ने अपने आपको बहुत अपमानित-सा भी महसूस किया ।
रोटरी इंटरनेशनल द्धारा सुधीर मंगला की शिकायत स्वीकार करने को यश पाल दास द्धारा अपमानित महसूस करने की बात से जोड़ कर देखने से मामला गंभीर हो जाता है । यह गंभीरता तब और बढ़ जाती है, जब इंटरनेशनल डायरेक्टर का चुनाव करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव को लेकर सुशील गुप्ता तक को रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा की धोखाधड़ी का शिकार होना पड़ रहा है । सुधीर मंगला की शिकायत के रोटरी इंटरनेशनल में स्वीकार होने की टाईमिंग महत्वपूर्ण है और यह बड़े उथल-पुथल का संकेत करती है । डिस्ट्रिक्ट के जो कई बड़े नेता अभी दो दिन पहले तक सुधीर मंगला को शिकायत को लेकर हतोत्साहित कर रहे थे, अचानक से सुधीर मंगला की शिकायत के प्रति गंभीर नज़र आने लगे हैं । सुधीर मंगला के कुछेक नजदीकियों का कहना/बताना है कि किसी का भी समर्थन न मिलता देख सुधीर मंगला ने तो शिकायत करने का इरादा छोड़ ही दिया था; लेकिन फिर अचानक ही उनमें 'हवा भरती हुई' दिखी । यह हवा तब से भरती हुई दिखी जब से इंटरनेशनल डायरेक्टर की नोमीनेटिंग कमेटी को लेकर रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा ने डिस्ट्रिक्ट के और ऊपर के नेताओं को ठेंगा दिखाना शुरू किया । रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा ने रंग बदल कर पहले तो जेके गौड़ की जीत का श्रेय लेने की बेशर्म-सी कोशिश की, और फिर नोमीनेटिंग कमेटी की राजनीति में दूसरों को - यहाँ तक की सुशील गुप्ता तक को नीचा दिखाने की कोशिश की; जिससे राजनीतिक समीकरण बुरी तरह गड़बड़ा गए हैं । नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव में मुकेश अरनेजा और उनके अकेले समर्थक रमेश अग्रवाल के रवैये ने रोटरी के बड़े नेताओं को भी नाराज किया है ।
रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा के खिलाफ बने इस माहौल ने सुधीर मंगला के लिए कुछ करने को उत्सुक नेताओं को प्रेरित किया और इसके साथ ही सुधीर मंगला में हवा भरी और उनकी शिकायत रोटरी इंटरनेशनल में स्वीकार हो गई । रोटरी के बड़े नेताओं की हरी झंडी मिले बिना इस शिकायत का दर्ज होना मुश्किल ही नहीं असंभव ही था । इसी कारण से सुधीर मंगला की शिकायत के दर्ज होने को नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव के साइड इफेक्ट के रूप में ही देखा/पहचाना जा रहा है । यह सभी जानते हैं कि रोटरी इंटरनेशनल में फैसले तथ्यों के आधार पर नहीं, राजनीतिक समीकरणों के आधार पर होते हैं । राजनीतिक समीकरणों के चलते ही पिछले रोटरी वर्ष में दो डिस्ट्रिक्ट में चुनावी नतीजों को निरस्त कर दिया गया था । रमेश अग्रवाल और मुकेश अरनेजा ने अपनी अपनी बेवकूफीपूर्ण और जिदभरी मनमानियों से जो जो बदनामी कमाई है, उसके चलते डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी के चुनाव की लगभग बंद हो चुकी फाइल फिर से खुल गई है ।

Wednesday, January 2, 2013

लायंस क्लब्स इंटरनेशनल डिस्ट्रिक्ट 321 ए थ्री में सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए राकेश त्रेहन का समर्थन यदि ओंकार सिंह रेनु के लिए वरदान की तरह है तो साथ ही यह मुश्किलों का कारण भी है

नई दिल्ली । ओंकार सिंह रेनु का नाम सुभाष गुप्ता के आकस्मिक निधन से खाली हुए सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए आने के बाद से डिस्ट्रिक्ट के राजनीतिक माहौल में खासी गर्मी पैदा हो गई है । इस 'गर्मी' में उनके लिए शुभकामनाएँ व्यक्त करने वाले लोग भी हैं, तो उनकी राह में कांटे बिछाने की तैयारी करते हुए लोग भी हैं । ओंकार सिंह रेनु को यूँ तो लायनिज्म में ज्यादा समय नहीं हुआ है, लेकिन मौजूदा लायन वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश त्रेहन के साथ उनकी सक्रियता के चलते उनका नाम लोगों के बीच तेजी से उभरा है । डिस्ट्रिक्ट की गतिविधियों में उनकी सक्रियता और संलग्नता को देखते हुए ही उन्हें अगले लायन वर्ष में - दिल्ली का नंबर आने के समय - सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के संभावित उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना जाने लगा था । दरअसल इसी कारण से, सुभाष गुप्ता के आकस्मिक निधन के कारण खाली हुए पद के लिए उनके नाम की चर्चा तेज हो गई । उनके नाम की चर्चा तेज होने के लिए एक तो वह खुद जिम्मेदार हैं और दूसरे उनकी राकेश त्रेहन के साथ की निकटता जिम्मेदार है ।
ओंकार सिंह रेनु खुद इसलिए जिम्मेदार हैं क्योंकि उन्होंने अपने को नोमीनेट कराने के लिए तेजी से लॉबिइंग की; और तेजी के साथ की गई उनकी लॉबिइंग को जब राकेश त्रेहन के साथ की उनकी निकटता के साथ जोड़ कर देखा गया तो फिर उनके नाम की चर्चा तेज होनी ही थी । लॉबिइंग हालाँकि आरके शाह ने भी तेजी से की है, और उनके पक्ष में राजिंदर बंसल ने भी नए समीकरणों की संभावनाओं को बनाने की कोशिश की है । आरके शाह और उनके पक्ष में सत्ता खेमे के नेताओं से बात कर रहे राजिंदर बंसल ने तर्क दिया है कि आरके शाह ने पहले राकेश त्रेहन को और फिर सुभाष गुप्ता को सेकेंड वाइस डिस्ट्रिक्ट गवर्नर पद के लिए निर्विरोध चुनवाने का रास्ता बनाने के लिए अपनी उम्मीदवारी की दो-दो बार जो बलि दी हुई है, उसको ध्यान में रखते हुए उन्हें नोमीनेट किया जाना चाहिए । तर्क भले ही आरके शाह के पक्ष में मजबूत हों, लेकिन राजनीतिक समीकरण उनके अनुकूल नहीं है । इसलिए राजनीतिक समीकरणों में कोई बड़ा उलटफेर हुए बिना आरके शाह की दाल के गलने का कोई मौका नहीं दिख रहा है ।
आरके शाह की दाल गलने का मौका कुछेक लोगों को लेकिन ओंकार सिंह रेनु की उम्मीदवारी में छिपा दिख रहा है । दरअसल ओंकार सिंह रेनु की उम्मीदवारी को सत्ता खेमे में दरार पैदा करने वाले एक कारण के रूप में देखा/पहचाना जा रहा है । ओंकार सिंह रेनु इतने अचानक और इतनी तेजी से 'सामने' आये हैं कि अभी सत्ता खेमे के दूसरे नेताओं के साथ उनकी ठीक से पहचान ही नहीं हो पाई है । सत्ता खेमे के दूसरे नेताओं के साथ उनका विश्वास का संबंध अभी नहीं बन सका है - राकेश त्रेहन के साथ उनकी निकटता के कारण सत्ता खेमे के दूसरे नेताओं के साथ विश्वास का संबंध जल्दी से बन पाना थोड़ा मुश्किल-सा भी दिख रहा है । ओंकार सिंह रेनु ने सत्ता खेमे के नेताओं का विश्वास जीतने के लिए जल्दी-जल्दी में जो प्रयास किये भी हैं, और जिस तरह से किये हैं - उनमें उनकी चाल की बजाये चूँकि राकेश त्रेहन की 'चाल' को देखा/पहचाना जा रहा है, इसलिए भी ओंकार सिंह रेनु के लिए सत्ता खेमे के नेताओं के बीच विश्वास बना सकना थोड़ा मुश्किल हुआ है ।
राजनीतिक लड़ाईयाँ लेकिन चूँकि सिर्फ अपने बल के भरोसे ही नहीं जीती जातीं, वह अपने प्रतिद्धंद्धियों की कमजोरियों के भरोसे भी जीती जाती हैं - इसलिए ओंकार सिंह रेनु के लिए उम्मीद अपने प्रतिद्धंद्धियों की कमजोरी में बनी हुई है । उनके प्रमुख प्रतिद्धंद्धी के रूप में विजय गोयल को देखा/पहचाना जा रहा है, जिन्हें दीपक टुटेजा का समर्थन प्राप्त है । इन दोनों को लेकिन अभी तक लॉबिइंग करते हुए नहीं सुना/पाया गया है । विजय गोयल की सत्ता खेमे के नेताओं के बीच पहचान तो अच्छी है, विश्वास भी है लेकिन उनके 'कुछ कर सकने' को लेकर सत्ता खेमे के नेताओं के बीच अविश्वास भी है । विजय गोयल को महत्वाकांक्षी और संभावनाशील उम्मीदवार के रूप में देखा/पहचाना तो जाता रहा है, लेकिन विजय गोयल को उम्मीदवार के रूप में 'व्यवहार' करते हुए हुए नहीं देखा/पाया गया है । पिछले लायन वर्ष में विजय गोयल को उम्मीदवार बनाने के प्रयास किये गए थे, लेकिन विजय गोयल ने कोई दिलचस्पी ही नहीं ली और तब अभी के सत्ता खेमे के नेताओं को झकमार कर सुभाष गुप्ता का समर्थन करने के लिए मजबूर होना पड़ा था । विजय गोयल की यह 'कमजोरी' ओंकार सिंह रेनु के काम आ सकती है ।
लेकिन अभी कुछ भी कह सकना मुश्किल है । कुछेक नामों की और चर्चा हवा में तो है, किंतु उन नामों पर कई-कई 'किंतु' 'परंतु' हैं । कुल मिला कर अभी ओंकार सिंह रेनु के नाम की ज्यादा चर्चा है । इसका कारण यही है कि एक तो उन्होंने अपने आपको भावी उम्मीदवार के रूप में प्रोजेक्ट करने के उद्देश्य से काम करना शुरू कर दिया है, और दूसरे उन्हें डिस्ट्रिक्ट गवर्नर राकेश त्रेहन का खुला और सक्रिय समर्थन प्राप्त है । लेकिन राकेश त्रेहन का समर्थन उनके लिए एक तरफ यदि वरदान की तरह है, तो दूसरी तरफ उक्त समर्थन कई मुश्किलों का कारण भी है । अगले कुछ दिनों में घटना चक्र तेजी से चलेगा इसलिए खुले-छिपे रूप में चलने वाली गतिविधियाँ महत्वपूर्ण साबित होंगी ।

Tuesday, January 1, 2013

सुशील गुप्ता के सामने मुकेश अरनेजा और विनोद बंसल की मिलीजुली राजनीति के सामने समर्पण करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा लगता है

नई दिल्ली । सुशील गुप्ता की इंटरनेशनल डायरेक्टरी की हेकड़ी की नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव को लेकर मुकेश अरनेजा ने जैसी रेड़ मारी है, उसके चलते सुशील गुप्ता की खासी किरकिरी हो रही है । सुशील गुप्ता ने डिस्ट्रिक्ट के और डिस्ट्रिक्ट के बाहर के नेताओं के बीच रुतबा तो यह जताया/दिखाया था कि उनके डिस्ट्रिक्ट में नोमीनेटिंग कमेटी के लिए उसका नाम जायेगा जिसे वह चाहेंगे/कहेंगे - लेकिन मुकेश अरनेजा के रवैये के चलते उनके लिए अपने रुतबे की घोषणा को कार्यरूप दे पाना मुश्किल हो रहा है । सुशील गुप्ता की इस 'दुर्गति' के एक गवाह का कहना है कि सुशील गुप्ता चाहते हैं कि रंजन ढींगरा नोमीनेट कमेटी में शामिल हों, लेकिन मुकेश अरनेजा ने उन्हें ऐसी टंगड़ी मारी है कि उनके लिए अपनी इज्ज़त बचाना मुश्किल हो गया है । दरअसल सुशील गुप्ता को विश्वास था कि वह मुकेश अरनेजा से उम्मीदवारी छोड़ने को कहेंगे तो मुकेश अरनेजा तुरंत से अपनी उम्मीदवारी को वापस ले लेंगे । मुकेश अरनेजा ने लेकिन उन्हें ठेंगा दिखा दिया है । जिन लोगों ने मुकेश अरनेजा को समझाने की कोशिश की कि सुशील गुप्ता ने चूँकि सीओएल के चुनाव में उनकी मदद की थी इसलिए भी अब उन्हें सुशील गुप्ता की बात को मान लेना चाहिए । लेकिन मुकेश अरनेजा ने इस समझाईश को मानने से साफ इंकार कर दिया है ।
मुकेश अरनेजा का कहना है कि सीओएल के चुनाव में सुशील गुप्ता ने उनकी मदद तो इसलिए की थी ताकि कहीं अशोक घोष सीओएल में न पहुँच जाएँ । इस तरह से, मुकेश अरनेजा का तर्क है कि सीओएल के चुनाव में सुशील गुप्ता ने उनकी मदद नहीं की थी, बल्कि उन्होंने सुशील गुप्ता की मदद की थी । नोमीनेटिंग कमेटी को लेकर मुकेश अरनेजा ने खुली घोषणा की है कि सुशील गुप्ता यदि रंजन ढींगरा को नोमीनेटिंग कमेटी में भेजना चाहते हैं तो उन्हें चुनाव लड़वायें और जितवा लें । मुकेश अरनेजा के इन तेवरों के बाद सुशील गुप्ता की सिट्टी-पिट्टी गुम है । सिट्टी-पिट्टी इसलिए गुम है, क्योंकि सुशील गुप्ता इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के संभावित उम्मीदवारों को और उन उम्मीदवारों के सिपहसालारों को बता चुके हैं कि वह रंजन ढींगरा को नोमीनेटिंग कमेटी में भिजवा रहे हैं; लेकिन मुकेश अरनेजा ने इंटरनेशनल डायरेक्टर पद के उन्हीं संभावित उम्मीदवारों को और उन उम्मीदवारों के सिपहसालारों को बताया हुआ है कि डिस्ट्रिक्ट के चौधरी बनते भले ही सुशील गुप्ता हों, किन्तु उनके बस की कुछ है नहीं; रंजन ढींगरा को नोमीनेटिंग कमेटी में भिजवाना तो उनके बस की बात बिलकुल भी नहीं है ।
मुकेश अरनेजा के हाथों हो रही सुशील गुप्ता की इस किरकिरी के लिए कुछेक लोग सुशील गुप्ता को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं । उनका कहना है कि सुशील गुप्ता को पहले ही समझ लेना चाहिए था कि मुकेश अरनेजा धोखेबाज व्यक्ति हैं और उन पर विश्वास करके वह कभी भी मुसीबत में फँस जायेंगे । कई एक लोगों ने सुशील गुप्ता को आगाह भी किया था कि मुकेश अरनेजा भरोसा करने लायक व्यक्ति नहीं हैं - लेकिन सुशील गुप्ता ने किसी की नहीं सुनी, और नतीजे में अब उन्हें मुँह छिपाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है । मजे की बात यह हो रही है कि मुकेश अरनेजा ने ही यह उपाय भी सुझाया है कि सुशील गुप्ता रोटरी नेताओं के बीच अपनी इज्जत कैसे बचा सकते हैं ? मुकेश अरनेजा ने उपाय सुझाया है कि सुशील गुप्ता के सामने अब इसके आलावा कोई चारा नहीं है कि वह लोगों को यह कहने/बताने लगें कि वह तो मुकेश अरनेजा को ही नोमीनेटिंग कमेटी में भेजना चाहते हैं । सुशील गुप्ता को यह उपाय जँच तो रहा है, लेकिन उनकी समस्या यह है कि वह अभी तक चूँकि रंजन ढींगरा का नाम लेते रहे हैं इसलिए अब अचानक से मुकेश अरनेजा का नाम लेंगे तो लोगों के बीच और ज्यादा हँसी होगी । रोटरी नेताओं के बीच रंजन ढींगरा को सुशील गुप्ता के 'ब्ल्यू आइड ब्यॉय' के रूप में देखा/पहचाना जाता है, इसलिए कोई भी इस उपाय की बात पर विश्वास नहीं करेगा और यही माना जायेगा कि मुकेश अरनेजा का नाम सुशील गुप्ता मजबूरी में ही ले रहे हैं ।
विनोद बंसल ने जब रंजन ढींगरा के लिए लॉबिइंग शुरू की थी तो कुछ लोगों को लगा था कि विनोद बंसल के जरिये सुशील गुप्ता ने मुकेश अरनेजा को अलग-थलग करने/दिखाने के लिए कोई जाल बिछाया है; लेकिन अब उन्हीं लोगों को लग रहा है कि वह जाल सुशील गुप्ता के लिए नहीं बल्कि मुकेश अरनेजा का काम आसान बनाने के लिए बिछाया गया था । विनोद बंसल की उस लॉबिइंग ने पहले तो मंजीत साहनी को नोमीनेटिंग कमेटी की चुनावी दौड़ से बाहर किया, और ऐसा करते हुए रंजन ढींगरा को लेकर सुशील गुप्ता के दावे को विश्वसनीय-सा बनाया । इसके बाद जब सुशील गुप्ता जोर-शोर से रंजन ढींगरा का नाम लेने लगे तो अगली चाल मुकेश अरनेजा ने यह घोषणा करते हुए चली कि वह सुशील गुप्ता के कहने में आकर अपनी उम्मीदवारी बिलकुल भी नहीं छोड़ेंगे और सुशील गुप्ता चाहें तो रंजन ढींगरा को चुनाव लड़वा लें । मुकेश अरनेजा ने यह दावा करके कि चुनाव होने की स्थिति में विनोद बंसल उनका समर्थन करेंगे, न कि रंजन ढींगरा का - लोगों को यह अनुमान लगाने के लिए प्रेरित किया है कि कहीं मुकेश अरनेजा और विनोद बंसल ने मिलकर तो सुशील गुप्ता को 'पोपट' नहीं बनाया है ? खुद को डिस्ट्रिक्ट का चौधरी समझने वाले पूर्व इंटरनेशनल डायरेक्टर सुशील गुप्ता के सामने वास्तव में बड़ी विकट स्थिति है - उनके लिए यह तय कर पाना मुश्किल हो रहा है कि वह रंजन ढींगरा के लिए कुछ करें या मुकेश अरनेजा और विनोद बंसल की मिलीजुली राजनीति के सामने समर्पण करें ?

Friday, December 28, 2012

रवि भाटिया की डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद की उम्मीदवारी को राजेश बत्रा के ‘कनेक्शन’ के कारण विनोद बंसल का समर्थन भी मिल सकेगा क्या ?

नई दिल्ली । रवि भाटिया के जरिये रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल की अगले रोटरी वर्ष में डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के लिए उम्मीदवारी प्रस्तुत करने की खबरों ने अगले रोटरी वर्ष की चुनावी राजनीति को दिलचस्प बना दिया है । दिलचस्प इसलिए क्योंकि रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल ने मौजूदा रोटरी वर्ष में डॉक्टर सुब्रमणियन के जरिये अपनी जो उम्मीदवारी प्रस्तुत की थी, उसमें उसे सफलता नहीं मिली; लिहाजा हर किसी के लिए उत्सुकता का विषय यह है कि मौजूदा रोटरी वर्ष के अनुभव से रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल के लोगों ने क्या सबक सीखा है और उस सीखे हुए सबक से वह रवि भाटिया की उम्मीदवारी को किस तरह लोगों के बीच समर्थन दिलवाते हैं और स्वीकार्य बनाते/बनवाते हैं । क्लब के एक वरिष्ठ सदस्य का कहना है कि डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के चुनाव में यूँ तो उम्मीदवार की अपनी सक्रियता ही काम आती है और क्लब की कोई बहुत भूमिका नहीं होती है - लेकिन फिर भी कोई उम्मीदवार यदि क्लब के लोगों को अपने अभियान में प्रभावी तरीके से शामिल करता है; क्लब के लोगों की मदद लेता है तो निश्चित ही उसे इसका फायदा मिलता है । रवि भाटिया चूँकि क्लब के पुराने सदस्य हैं, इसलिए क्लब के पुराने और प्रमुख लोगों के साथ उनके गहरे विश्वास के संबंध हैं । जाहिर है की यह संबंध चुनाव में व्यावहारिक तरीके से उनके काम आयेंगे । यूँ तो क्लब के लोगों के साथ डॉक्टर सुब्रमणियन के भी अच्छे संबंध थे; और क्लब के लोगों ने उनकी उम्मीदवारी के पक्ष में काम भी किया - लेकिन क्लब के लोगों का काम डॉक्टर सुब्रमणियन के काम इसलिए नहीं आ सका, क्योंकि क्लब के लोगों के साथ उनका बहुत जुड़ाव नहीं था; और जो लोग डॉक्टर सुब्रमणियन के साथ सक्रिय थे, उनका न डिस्ट्रिक्ट के लोगों के साथ और न डिस्ट्रिक्ट की चुनावी राजनीति के साथ कोई परिचय रहा है ।
रवि भाटिया के मामले में संबंधों का ‘गणित’ और संबंधों की 'केमिस्ट्री’ लेकिन बिल्कुल अलग है । रवि भाटिया ने कई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स के साथ काम किया है; और इस कारण से वह कई डिस्ट्रिक्ट गवर्नर्स की कोर टीम का हिस्सा रहे हैं । इस नाते से डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच रवि भाटिया की पहचान तो है ही, लोग उनकी कार्य-क्षमताओं और रोटरी में तथा डिस्ट्रिक्ट में उनकी सक्रिय संलग्नता से भी परिचित हैं । डिस्ट्रिक्ट के लोगों के बीच रवि भाटिया के इस परिचय के चलते क्लब के लोगों के लिए भी रवि भाटिया की उम्मीदवारी के लिए अभियान चलाना सुविधाजनक हो जाता है । उल्लेखनीय है कि रवि भाटिया की उम्मीदवारी के संदर्भ में इन्हीं ‘सुविधाओं’ का वास्ता देकर क्लब के कुछेक प्रमुख लोग मौजूदा वर्ष में ही रवि भाटिया की उम्मीदवारी की वकालत कर रहे थे; किंतु पिछली डिस्ट्रिक्ट कांफ्रेंस में निभाई गई अपनी सक्रिय भूमिका से लाभ मिलने का वास्ता देकर डॉक्टर सुब्रमणियन ने अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत करने का प्रस्ताव रखा, तो रवि भाटिया की उम्मीदवारी की वकालत करने वालों ने डॉक्टर सुब्रमणियन को मौका दे देने की बात मान ली । डॉक्टर सुब्रमणियन के चुनावी मुकाबले से बाहर होने के बाद रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल के तथा डिस्ट्रिक्ट के कई एक नेताओं का मानना और कहना रहा कि रवि भाटिया यदि उम्मीदवार होते तो इस वर्ष डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के चुनाव का परिदृश्य कुछ और होता । किंतु जो हुआ, उसे खिलाड़ीभावना के साथ स्वीकार करते हुए रोटरी क्लब दिल्ली सेंट्रल के प्रमुख लोगों ने अगले रोटरी वर्ष में रवि भाटिया की उम्मीदवारी के लिए कमर कसना शुरू कर दिया है ।
रवि भाटिया के समर्थक व शुभचिंतक अब की बार वह गलती नहीं करना चाहते हैं, जो पिछली बार हो जाने के कारण उम्मीदवारी प्रस्तुत करने का मौका उनसे छिन गया था । पिछली बार रवि भाटिया के समर्थक व शुभचिंतक रवि भाटिया की उम्मीदवारी की घोषणा करने की टाइमिंग को लेकर गच्चा खा गये थे । वह रवि भाटिया की उम्मीदवारी को जब तक सामने लाते, उससे पहले ही डॉक्टर सुब्रमणियन ने चूँकि अपनी उम्मीदवारी के लिए लॉबीइंग शुरू कर दी - जिस कारण रवि भाटिया की उम्मीदवारी के प्रस्तुत होने का मौका जाता रहा । अगले रोटरी वर्ष के लिए चूँकि अभी तक किसी ने भी अपनी उम्मीदवारी की बात नहीं की है, इसलिए रवि भाटिया के समर्थकों व शुभचिंतकों ने अभी से उनकी उम्मीदवारी की बात करना शुरू करके बढ़त बनाने का लाभ लेने की होशियारी चली है । अगले रोटरी वर्ष के लिए उम्मीदवार के रूप में कुछेक नाम बीच-बीच में सुने तो गये हैं, लेकिन जितने अचानक तरीके से वह नाम सामने आये उतने ही रहस्यपूर्ण ढंग से वह गुम भी हो गये हैं । पिछले दो-तीन वर्षों का नजारा देखें तो एक बात कॉमन दिखती है और वह यह कि जिस उम्मीदवार ने पहले से अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत की, चुनावी बाजी उसके हाथ लगी । इस वर्ष जेके गौड़ चुने गये हैं, तो उनकी उम्मीदवारी की चर्चा दूसरे उम्मीदवारों की तुलना में पहले से थी । उनसे पहले संजय खन्ना और उनसे भी पहले विनोद बंसल जीते तो उनकी उम्मीदवारी भी अपने-अपने प्रतिद्धंद्धियों से पहले सामने आई थी । यह कोई टोटके का मामला नहीं है - पहले से उम्मीदवारी प्रस्तुत करने से आम लोगों के बीच यह संदेश जाता है कि पहले से उम्मीदवारी प्रस्तुत करने वाला उम्मीदवार अपनी उम्मीदवारी को गंभीरता से ले रहा है । जब कोई उम्मीदवार अपनी उम्मीदवारी को गंभीरता से लेता नजर आता है, तो दूसरे लोग भी उसकी उम्मीदवारी को गंभीरता से लेते हैं । देर से उम्मीदवारी प्रस्तुत होने के मामले में इम्प्रेशन यही पड़ता है कि उक्त उम्मीदवार लगता है कि अपनी उम्मीदवारी को लेकर खुद ही कन्फ्यूज रहा होगा, इसलिए देर से अपनी उम्मीदवारी को प्रस्तुत कर रहा है । अब जो उम्मीदवार अपनी उम्मीदवारी को लेकर खुद ही कन्फ्यूज रहा हो, उसके लिए अपनी उम्मीदवारी के प्रति लोगों के कन्फ्यूजन को दूर कर पाना मुश्किल ही होता है । चुनावी नतीजों से भी यही बात साबित होती रही है । इसलिए ही रवि भाटिया के समर्थकों व शुभचिंतकों को अभी से ही रवि भाटिया की उम्मीदवारी को प्रस्तुत करना जरूरी भी लगा और उपयोगी भी ।
रवि भाटिया के समर्थकों व शुभचिंतकों को अगले रोटरी वर्ष में स्थितियाँ यदि रवि भाटिया के अनुकूल लग रही हैं तो इसका एक बड़ा कारण राजेश बत्रा का डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर के पद पर होना है । राजेश बत्रा यूँ तो चुनावी राजनीति में कोई सक्रिय भूमिका निभाते हुए नहीं देखे/पाये गये हैं, लेकिन रवि भाटिया के साथ उनके नजदीकी संबंधों को देखते हुए यह विश्वास तो किया ही जा सकता है कि उनके नजदीकी संबंधों के चलते मनोवैज्ञानिक फायदा तो रवि भाटिया को मिलेगा ही । राजेश बत्रा के डिस्ट्रिक्ट ट्रेनर होने के कारण डिस्ट्रिक्ट गवर्नर के रूप में विनोद बंसल के लिए भी ऐसा कुछ कर पाना संभव नहीं होगा, जिससे कि रवि भाटिया की उम्मीदवारी को नुकसान पहुंचे । रवि भाटिया से विनोद बंसल के कोई विरोध के संबंध नहीं हैं; लेकिन मुकेश अरनेजा के साथ विनोद बंसल की जो निकटता है उसे देखते हुए रवि भाटिया के समर्थकों व शुभचिंतकों को विनोद बंसल के रवैये को लेकर कुछ आशंका है । रवि भाटिया हालाँकि इस नाते से खुशकिस्मत हैं कि जिन लोगों के विनोद बंसल के भरोसे उम्मीदवार बनने की चर्चा/संभावना थी, वह पीछे हटते दिख रहे हैं; और अभी तक ऐसे किसी नाम की चर्चा नहीं है जिसे विनोद बंसल के उम्मीदवार के तौर पर देखा/पहचाना जाये । रवि भाटिया के कुछेक समर्थकों व शुभचिंतकों को ही नहीं, दूसरे अन्य लोगों को यह विश्वास भी है कि राजेश बत्रा के ‘कनेक्शन’ के कारण रवि भाटिया ही हो सकता है कि विनोद बंसल के उम्मीदवार हो जायें । यह विश्वास इसलिए बना और बढ़ा है क्योंकि रवि भाटिया की उम्मीदवारी की चर्चा शुरू होते ही कुछेक संभावनाशील उम्मीदवारों ने अपनी-अपनी उम्मीदवारी से इंकार करना शुरू कर दिया है । ऐसा ही नजारा रहा तो नेताओं के पास और डिस्ट्रिक्ट के पास ज्यादा विकल्प ही नहीं होंगे - और तब रवि भाटिया को हो सकता है कि किसी खास चुनौती का सामना ही न करना पड़े । हालाँकि यह सोचना/मानना थोड़ा जल्दबाजी करना भी होगा । डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी पद के लिए आक्रामक तरीके से अभियान चला सकने की क्षमता रखने वाले कुछेक रोटेरियंस को उम्मीदवारी प्रस्तुत करने को लेकर उत्सुक देखा/सुना जा रहा है । हालाँकि उनके बारे में अभी यह सुनिश्चित नहीं है कि वह अगले वर्ष उम्मीदवारी प्रस्तुत करेंगे या और आगे आने वाले वर्षों में ? जो होगा, वह तो आगे पता चलेगा - फ़िलहाल तो रवि भाटिया के समर्थकों व शुभचिंतकों ने रवि भाटिया की उम्मीदवारी की चर्चा चला कर अगले वर्ष होने वाली चुनावी दौड़ में रवि भाटिया की उम्मीदवारी को आगे तो बढ़ा ही दिया है ।

Thursday, December 27, 2012

विनोद बंसल ने रंजन ढींगरा के जरिये मंजीत साहनी को इंटरनेशनल डायरेक्टर पद की नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव से 'बाहर' करने की रणनीति बनाई

नई दिल्ली । मंजीत साहनी को इंटरनेशनल डायरेक्टर का चयन करने वाली नोमीनेटिंग कमेटी के चुनाव से बाहर रखने के लिए रंजन ढींगरा को आगे करने की जो चाल विनोद बंसल ने चली है, उसके कारण उक्त नोमीनेटिंग कमेटी का चुनावी परिदृश्य खासा दिलचस्प हो गया है । उल्लेखनीय है कि इस चुनाव में मंजीत साहनी को पहले कोई रूचि नहीं थी, लेकिन फिर अचानक से उन्हें इस चुनाव की होड़ में शामिल देखा जाने लगा । माना/समझा गया कि उन्हें ऊपर के नेताओं से इसके लिए इशारा और समर्थन का भरोसा मिला होगा । यही मानने/समझने के चलते नोमीनेटिंग कमेटी के लिए मंजीत साहनी की उम्मीदवारी को गंभीरता के साथ देखा/पहचाना जाने लगा । चुनावी राजनीति के समीकरणों को समझने/पहचानने वाले लोगों ने भी मान लिया कि मंजीत साहनी उम्मीदवार हुए तो चुनावबाज मुकेश अरनेजा भी उम्मीदवार बने रहने का दम नहीं बनाये रख पायेंगे और मंजीत साहनी निर्विरोध ही चुन लिए जायेंगे । लेकिन विनोद बंसल के एक 'राजनीतिक' स्ट्रोक ने इस संभावना के घुर्रे उड़ा दिए हैं ।
मंजीत साहनी के निर्विरोध चुने जाने की संभावना में रूकावट पैदा करने के उद्देश्य से विनोद बंसल ने बड़ी होशियारी से नोमीनेटिंग कमेटी के लिए रंजन ढींगरा की वकालत शुरू कर दी । विनोद बंसल की होशियारी यह रही कि उन्होंने भाँप लिया कि वह यदि मंजीत साहनी की उम्मीदवारी का सिर्फ विरोध करेंगे तो उनकी बात कोई नहीं सुनेगा और वह सफल नहीं होंगे, और कि वह रंजन ढींगरा को आगे करके ही मंजीत साहनी का 'शिकार' कर सकते हैं । इसी समझ के साथ, विनोद बंसल ने काउंसिल ऑफ गवर्नर्स के सदस्यों में मंजीत साहनी के विरोधियों की पहचान करते हुए चर्चा चलाई कि मंजीत साहनी का समर्थन करने को लेकर कुछेक लोगों को ऐतराज है, इसलिए उनके नाम पर सहमति बनना मुश्किल है; लेकिन रंजन ढींगरा के नाम पर सहमति बनाई जा सकती है । विनोद बंसल ने तर्क दिया कि रंजन ढींगरा चूँकि पिछली बार नोमीनेटिंग कमेटी का चुनाव हार गए थे, इसलिए इस बार उन्हें चुन लिए जाने पर सहमति बनाई जा सकती है । मजे की बात यहाँ यह है कि रंजन ढींगरा की उम्मीदवारी के प्रति सहमति बनाये जाने की कोई वकालत या कोशिश विनोद बंसल ने उस समय तक बिलकुल भी नहीं की थी, जब तक कि मंजीत साहनी ने अपनी उम्मीदवारी प्रस्तुत नहीं की थी । उस समय तो वह रंजन ढींगरा के लिए समर्थन जुटने/जुटाने की मुश्किलों का ही विवरण दिया करते थे । लेकिन अब वह रंजन ढींगरा के बड़े समर्थक बन गए हैं ।
रंजन ढींगरा को आगे करके मंजीत साहनी को 'बाहर' करने की विनोद बंसल की तरकीब के पीछे कुछेक लोगों को मुकेश अरनेजा की मदद करने की रणनीति भी दिख रही है । मुकेश अरनेजा के प्रति विनोद बंसल का समर्थन-भाव राजेश बत्रा के कारण मुसीबत में है । राजेश बत्रा को मुकेश अरनेजा फूटी आँख भी नहीं भाते हैं । मुकेश अरनेजा के साथ विनोद बंसल के संबधों को लेकर राजेश बत्रा विभिन्न तरीकों से अपनी नाराजगी जता चुके हैं । राजेश बत्रा के रवैये को देख कर विनोद बंसल ने मुकेश अरनेजा को लेकर थोड़ा सावधानी रखना तो शुरू किया है, लेकिन रंजन ढींगरा का नाम लेकर उन्होंने जो राजनीति शुरू की है - उसके पीछे उनकी राजेश बत्रा को धोखे में रख कर मुकेश अरनेजा का काम आसान करने की तरकीब को देखा/पहचाना जा रहा है । तरकीब यह कि मंजीत साहनी और रंजन ढींगरा मुकाबले में रहेंगे तो मुकेश अरनेजा के विरोधियों में फूट पड़ेगी और उसका फायदा स्वाभाविक रूप से मुकेश अरनेजा को मिलेगा ।
विनोद बंसल की इस राजनीति की बात लोगों को चूंकि अशोक अग्रवाल के मुँह से सुनने को मिल रही है, इसलिए भी विनोद बंसल की इस राजनीति के पीछे मुकेश अरनेजा की मदद को देखा/पहचाना जा रहा है । जेके गौड़ को प्राप्त हुई चुनावी जीत के बाद से अशोक अग्रवाल को 'सुपर गवर्नर' के अवतार में देखा जा रहा है और वह लगातार मंजीत साहनी तथा अमित जैन को निशाना बना रहे हैं और उनके बारे में गाली-गलौजपूर्ण अपशब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग करते हुए लोगों को बता रहे हैं कि मंजीत साहनी का ईलाज तो विनोद बंसल करेंगे । अशोक अग्रवाल के अनुसार ही विनोद बंसल ने रंजन ढींगरा रूपी इंजेक्शन से मंजीत साहनी का ईलाज शुरू भी कर दिया है । मंजीत साहनी से अशोक अग्रवाल की नाराजगी इस बात को लेकर है क्योंकि मंजीत साहनी ने डिस्ट्रिक्ट गवर्नर नोमिनी के चुनाव में जेके गौड़ की बजाये सुधीर मंगला का साथ दिया । मंजीत साहनी के रवैये का हो सकता है कि जेके गौड़ को भी बुरा लगा हो, लेकिन जेके गौड़ अपनी बड़ी हो गई जिम्मेदारी को समझते हुए अब सभी का साथ लेने की जरूरत को समझते हुए चुप हैं; लेकिन अशोक अग्रवाल आपे से बाहर दिख रहे हैं । विनोद बंसल की भी मंजीत साहनी से कुछ पुरानी खटपट है - लिहाजा उन्होंने रंजन ढींगरा के कंधे का सहारा लेकर मंजीत साहनी को निशाने पर लिया तो अशोक अग्रवाल को भी मंजीत साहनी के खिलाफ भड़ास निकालने का मौका मिल गया है । अशोक अग्रवाल की भड़ास ने लेकिन विनोद बंसल की राजनीति को सबके सामने ला दिया है ।